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बिहार का भूगोल

15. Bihar’s Tribal Problem and Solution (बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान)

15. Bihar’s Tribal Problem and Solution

(बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान)



प्रश्न प्रारूप

Q.1 बिहार में जन‌जातियों की मुख्य समस्याओं एवं उसके निवारण की व्याख्या कीजिए।

Q.2 बिहार की आदिवासी जनसंख्या की विभिन्न विशेषताओं एवं उनके पिछड़ेपन के आधारभूत कारकों के बारे में लिखिए।

Q.3  बिहार की जनजातियों की समस्याओं एवं समाधान की व्याख्या कीजिए।

     जनजाति प्राय: आदिवासी, वनवासी, सरल समाज, आदिम समाज, अनुसूचित जनजाति इत्यादि के नाम से जाने जाते हैं। यह एक ऐसा मानवीय समूह है जो दूर दराज के क्षेत्रों में एकांकी जीवन जीता है। वर्तमम बिहार में जनजातियों की कुल जनसंख्या मात्र 1 % है। बिहार के अधिकांश जनजातीय समाज नवगठित झारखण्ड राज्य में चले गये हैं।

     वर्तमान बिहार में संथाल परगणा से आये हुए कुछ संथाली जनजाति के लोग सहरसा, पूर्णिया, किशनगंज, भागलपुर, मंगेर, कटिहार इत्यादि जिलों में निवास करते हैं। बिहार के तराई क्षेत्रों में थारू जनजाति के लोग निवास करते हैं। इसी तरह कैमूर क्षेत्र में खैरवार खैरवार जनजाति के लोग पाये जाते हैं। जनजाति की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित है:-

जनजातियों की विशेषताएँ

(1) मध्य भारत में मिलने वाले जनजाति प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड प्रजाति के हैं जबकि हिमालय प्रदेश में निवास करने वाले जनजाति मंगोलायड प्रजाति के है।

(2) ये क्रमशः ऑस्ट्रिक भाषा और तिब्बती-चीनी भाषा का प्रयोग करते हैं।

(3) ये एकांकी जीवन जीते है। इनका निवास स्थान प्रायः घने जंगल, पर्वत, पहाड़, पठार और नदी घाटी क्षेत्र में देखने को मिलता है।

(4) इनका समाज टोटम के आधार पर गोत्र में विभक्त होता है।

(5) ये गोत्र बहिर्विवाही होते हैं। इनके समाज में वधू मूल्य की प्रथा पायी जाती है।

(6) धर्म के दृष्टिकोण से ये आत्मावादी, प्रकृतिवादी, जीववादी और बोंगावादी होते हैं। जादू-टोना में अधिक विश्वास करते हैं।

(7) इसमें विनिमय का कार्य वस्तु विनिमय और उत्सवी विनिमय के रूप में होता है।

(8) समाज में नातेदारी व्यवस्था की भूमिका अधिक होती है। 

(9) इनका स्वतंत्र और विशिष्ट जनजातीय पहचान होती है। ये राज्यविहीन के उदाहरण है।

जनजातीय समस्याओं के कारण

     स्वीकृत बिहार के जनजातीय समाज कई समस्याओं से ग्रसित है जिसके लिए कई कारण जिम्मेदार माने जाते हैं:-

(1) औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण

(2) जलवायु परिर्वतन

(3) सामाजिक सांस्कृतिक सम्पर्क

(4) कनीय कानून एवं नीतियाँ

(5) जनजातीय समाज में व्याप्त निरक्षरता

(6) आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था

(7) प्रशासनिक राजनीतिक एवं माफियाओं गठजोड़

(8) परम्परागत जनाजातीय संस्कृति

(9) गैर जनजातीय समाज के प्रति गलत नजरिया

      उपरोक्त कारणों के चलते जनजातियों निम्मलिखित समस्याओं का अभ्युदय हुआ है-

(1) वातावरणीय समस्या

(2) सामाजिक समस्या

(3) सांस्कृतिक समस्या

(4) आर्थिक समस्या

(5) राजनैतिक समस्या

(6) जैविक समस्या

(7) मनोवैज्ञानिक समस्या

(1) वातावरणीय समस्या:-

        जनजातीय समाज प्राय: कठोर एवं प्रतिकूल वातावरण में निवास करती है। ऐसे क्षेत्रों में पहुंच पाना आसान नहीं होता है जिसके कारण जनजातीय क्षेत्रों में परिवहन साधनों का विकास नहीं हो सका है। प्रति इकाई विकास की लागत अधिक आती है। विकास के लिए यहाँ उच्च तकनीक आवश्यकता पड़ती है, इसलिए यहाँ प्रति इकाई लाभ की प्राप्ति सीमित होती है। जनजातिय समाज वनों को काटकर झूम कृषि करते हैं। इसलिए उनके क्षेत्रों में वनीय ह्रास की समस्या उत्पन्न हुई है।

       कृषि के लिए भूमिगत जल दोहन के कारण भूमिगत जल स्तर गिरता जा रहा है। औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण के कारण सतही जल प्रदूषण के शिकार है। वैश्विक तापन के कारण अनेक क्षेत्रों में भूमि तापन की समस्या उत्पन्न हो रही है। उनके क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक सम्पदा पाये जाते हैं जिसका राष्ट्रीय स्तर पर दोहन किये जाने के कारण भूमि अपरदन की समस्या और प्राकृतिक संपदा ह्रास की समस्या उत्पन्न हो रही है। बड़े-बड़े उद्योग एवं बहुद्देशीय नदी घाटी परियोजना के कारण विस्थापन एवं पुनर्वास की गंभीर समस्याएं देखी जा सकती है।

(2) सामाजिक समस्याएँ:-

     जनजातीय समाज आज कई समस्याओं से ग्रसित है। जैसे- इनमें संयुक्त परिवार की परम्परा टूट रही है। परिवार में बूढ़े एवं बुजुर्गो की सम्मान घट रही है। बधूमूल्य के स्थान पर दहेज प्रथा प्रचलन प्रारंभ हो चुका है। मुण्डा, उराँव, हो, संथाल में जनसंख्या वृद्धि की दर काफी तीव्र है जबकि बंजारन समाज की समस्या ह्रास की ओर अग्रसर है। इनके समाज में मध्यपान से समस्या काफी गंभीर है। साक्षरता का स्तर काफी निम्न है। महिला साक्षरता 3% से भी कम है। इनके समाज में अनेक प्रकार की सामाजिक बुराइयाँ भी स्थायी रूप से घर बना चुकी है। जिनमें वेश्यावृति की समस्या, भिश्वावृति की समस्या प्रमुरख है।

(3) सांस्कृतिक समस्याएँ:-

     वेरियर एल्विन महोदय ने कहा था कि जनजातीय संस्कृति धीरे-2 विलुप्त होते जा रही है। इसका तात्पर्य है कि जनजातीय समाज अपने संस्कृति का परित्याग कर दूसरे की संस्कृति को अपनाने लगे हैं। इनके समाज में गैर जनजातीय धार्मिक संस्थान स्थायी रूप से निवास करते हुए धार्मान्तरण का कार्य करते हैं जिससे साम्प्रदायिक महौल का निर्माण हुआ है।

     गैर जनजातीय समाज के कुछ लोग उनके क्षेत्र में जाकर नक्सलवाद की समस्या को जन्म दिया है। उनके समाज में धार्मिक एवं जादूई पम्परा की गहरी जड़े है। इसलिए ये ज्यादा अंधविश्वासी, जादूटोना, मुण्डाखेट जैसे परम्पराओं में विश्वास करते है। गैर जनजातीय भाषा को अपनाये जाने के कारण द्विभाषावाद की समस्या उत्पन्न हुई, जनजातीय नृत्य, संगीत, स्थापत्य कला, वास्तुकला इत्यादि की वास्तविक पहचान न किये जाने के कारण ये पतन की ओर है।

(4) आर्थिक समस्याएँ:-

    भूमि हरण, ऋग्रस्ता, बन्धुआ मजदूरी इत्यादि की इनमें गंभीर समस्याएँ है। गैर-जनजातीय समाज की तरह इनके समाज में भी गरीबी एवं बेरोजगारी की समस्या मौजूद है। जनजातीय क्षेत्रों में चलने वाले औद्योगिक प्रतिष्ठानों में इनकी भागीदारी बहुत कम है। जनजातीय समाज के द्वारा उत्पन्न किये गये उत्पादों का सही तरीके से विपणन का कार्य नहीं होने के कारण उन्हें वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता है। गैर जनजातीय समाज उनके आर्थिक शोषण में लगा हुआ है। इसलिए गैर जनजातीय समाज को वे  ‘दिकू’ से संबोधित करते हैं।

(5) राजनीतिक समस्याएँ:-

       नवीन लोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण परम्परागत जनजातीय परिषद, बुजुर्ग परिषद, युवा गृह इत्यादि विलुप्त होते जा रहे हैं और उसके स्थान पर जटिल राजनीतिक व्यवस्था की जड़े गहरी होती जा रही है। जटिल राजनीतिक व्यवस्था उनके समझ से परे हैं। न्यायपालिका उन्हें न्याय देने में सक्षम नहीं हो पाती है। प्रशासनिक तंत्र में लगे हुए लोग उनके रक्षक कम भक्षक ज्यादा है। उनके समाजों में भी क्षेत्रवाद, नये राज्य, आरक्षण जैसे राजनीतिक मुद्दों को लेकर अक्सर आंदोलित होते रहते हैं।

(6) जैविक समस्याएँ:-

     जनजातीय समाज मे कुपोषण एवं प्रोटीन अल्पता की गंभीर समस्याएँ हैं। स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के प्रति ज्ञानाभाव के कारण उनमें कई गंभीर संक्रामक बीमारियाँ, सफाई, पेयजल इत्यादि से संबंधित समस्याएँ पायी जाती हैं। वनों से खाद्य- पदार्थों के संग्रहण एवं शिकार पर रोक, झूम कृषि पर रोक, परम्परागत तकनीक इत्यादि के कारण खाद्यान्न संकट की समस्या उत्पन्न हुई है। बाल मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर काफी उच्च है।

(7) मनोवैज्ञानिक समस्याएँ:-

      जनजातीय समाज जहाँ उपरोक्त समस्याओं से पीड़ित है वहीं गैर जनजातीय समाज के द्वारा किये जा रहे विकास को देखकर वह भौंचक है। उनमें गंभीर अवसाद (Depression) की समस्या देखी जा सकती है। इसी अवसाद का परिणाम है कि वे अन्य समाजों को शक की दृष्टि से देखते है।

जनजातीय समस्याओं का निवारण

     जनजातीय समस्यायों के निवारण हेतु प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही सतत प्रयास किये जाते रहे हैं। जैसे:- 1954 ई० में जनजातीय विकास प्रखण्ड का गठन किया गया था जिसका उद्देश्य था- जनजातीय प्रदेश के विकास को और तीव्र करन।

     चौथी पंचवर्षीय योजना में जनजातीय उपयोजना चलाया गया जिसका उद्देश्य निम्नलिखित है:-
(1) पारिवारिक लाभ की योजना को प्रारंभ कर लोगों को निर्धनता रेखा के ऊपर उठाना। इस उद्देश्य के आपूर्ति हेतु कुकुट पालन (मुर्गा, बतख), सुअर पालन, पशुपालन, सब्जी एवं फल कृषि, कुटीर उद्योग, उद्योग के लिए ब्याज मुक्त ऋण की व्यवस्या और उसपर भी 80% सब्सीडी दी गयी।

(2) उनके आर्थिक-सामाजिक वातावरणीय परिस्थितियों में सुधार लाना। उनकी भूमि की वापसी, साहुकारों के ऋण जनजाल से बचाना, प्रदूषित देशी शराब के सेवन पर प्रतिबंध और वन संरक्षण ये संबंधित कार्यक्रम चलाये गये।

(3) प्राथमिक शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, महिला साक्षरता इत्यादि को बढ़ावा देकर जनजातीय क्षेत्रों में मानवीय संसाधनों का विकास करना।

(4) वैसे जनजातीय समाज जो जनसंख्या ह्रास की समस्या से ग्रसित है उन्हें संरक्षण प्रदान करना।

      पांचवी पंचवर्षीय योजना के दौरान जनजातीय समाज को जनजातीय प्रादेशिक योजना के तहत शामिल किया गया। छठी पंचवर्षीय योजना में ‘मारजिनल एरिया डेवलपमेन्ट एजेन्सी’ की स्थापना की गई। साथ समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) का अंग बनाया गया।

     सातवी पंचवर्षीय योजना के दौरान जवाहर रोजगार योजना, इंदिरा आवास योजना के माध्यम से उन्हें लाभ पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया।

      जनजातीय प्रदेशों में कई कल्याणकारी कार्यक्रम भी चलाये जा रहे हैं। साक्षरता विकास के लिए संथाल परगणा में विशेष कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। जनजातीय बाजारों की स्थापना की जा रही है। स्कूल एवं कॉलेज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को छात्रवृति प्रदान की जाती है। रोजगार में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए आरक्षण की सुविधा प्रदान की गई है। जनजातीय समस्याओं पर अनुसंधान करने के लिए राँची में जनजातीय अनुसंधान केन्द्र की स्थापना की गई है।

     गैर सरकारी प्रयास भी किये जा रहे हैं। जैसे ‘टाटा ग्रुप’ और ‘सेल’ जैसे संस्थाओं ने शिक्षा, रोजगार एवं खेलकूद को बढ़ावा दे रहा है। कई NGO एवं धार्मिक मिशनरियों इनके क्षेत्रों में आकर शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में सराहनीय कार्य कर रही है।

निष्कर्ष

     इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि जनजातीय समाज जहाँ कई समस्याओं से पीड़ित है वहीं उन समस्याओं पर कार्यक्रम चलाक चतुर्दिक प्रहार किया जा रहा है ताकि उन्हें समस्याओं से मुक्त किया जा सके।

Tribal Problem and Solution



Read More:

1. बिहार : सामान्य जानकारी

2. बिहार का प्राकृ‌तिक प्रदेश / भौतिक इकाई

3. बिहार की जलवायु

4. बिहार के भौगोलिक इकाई का आर्थिक विकास पर प्रभाव

5. बिहार की मिट्टियाँ

6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

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I ‘Dr. Amar Kumar’ am working as an Assistant Professor in The Department Of Geography in PPU, Patna (Bihar) India. I want to help the students and study lovers across the world who face difficulties to gather the information and knowledge about Geography. I think my latest UNIQUE GEOGRAPHY NOTES are more useful for them and I publish all types of notes regularly.

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