UG Regular Semester-I Examination 2025 Patliputra University, Patna QUESTION PAPER

UG Regular Semester-I Examination 2025

Patliputra University, Patna

QUESTION PAPER




UG Regular Semester-I Examination 2025

(Major Core Course or MJC-1)

(Session: 2025-29)

Paper Code : 410801

Geomorphology (Theory)

Time: Three Hours] [Maximum Marks: 70

Note : Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the sections as directed.

परीक्षार्थी यथासंभव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दें।

Section-A / खंड -अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note : Attempt all Multiple choice questions from this part. Each question carries 2 marks. [10×2=20]

इस भाग से सभी बहुविकल्पीय प्रश्नों को हल कीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. Choose the correct option from each question:

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए:

(i) Which is the outermost layer of the Earth?

(a) Mantle

(b) Core
(c) Crust

(d) Lithosphere

पृथ्वी की सबसे बाहरी परत कौन-सी है?

(a) मेंटल

(b) कोर

(c) क्रस्ट

(d) स्थलमंडल

(ii) What does the Big Bang Theory explain:

(a) The end ofthe universe

(b) The structure of the Earth

(c) The origin of the universe

(d) The movement of galaxies

बिग बैंग सिद्धान्त किसकी व्याख्या करता है?

(a) ब्राह्मांड का अंत

(b) पृथ्वी का संरचना

(c) ब्रह्मांड की उत्पत्ति

(d) आकाशगंगाओं की गति

(iii) Which layer of the Earth is broken into tectonic plates?

(a) Inner Core

(b) Asthenosphere

(c) Lithosphere

(d) Mantle

पृथ्वी की कौन-सी परत विवर्तनिक प्लेटों में विभाजित होती है?

(a) आंतरिक कोर

(b) एस्थेनोस्फीयर

(c) स्थलमंडल

(d) मेंटल

(iv) The boundary where two tectonic plates move away from each other is called:

(a) Convergent boundary

(b) Transform boundary

(c) Divergent boundary

(d) Passive margin

जिस सीमा पर दो प्लेट एक-दूसरे से दूर हटती हैं? उसे क्या कहा जाता है?

(a) अभिसरण सीमा

(b) परिवर्तित सीमा

(c) अपसारी सीमा

(d) निष्क्रिय किनारा

Which of the following is a major cause of volcanic eruptions?

(a) Solar radiation

(b) Movement of tectonic plates

(c) Weathering

(d) Ocean currents

निम्नलिखित में से कौन ज्वालामुखी विस्फोट का प्रमुख कारण है?

(a) सौर विकिरण

(b) विवर्तनिक प्लेटों की गति

(c) अपक्षय

(d) समुद्री धाराएं

(vi) What is the point inside the Earth where an earthquake originates called?

(a) Epicenter

(b) Focus (Hypocenter)

(c) Fault line

(d) Seismic zone

पृथ्वी के अन्दर वह स्थान जहाँ भूकम्प की उत्पत्ति होती है, क्या कहलाता है?

(a) उपकेन्द्र

(b) केन्द्र बिन्दु

(c) अंश रेखा

(d) भूकम्पीय क्षेत्र

(vii) Karst topography is primarily formed due to the action of:

(a) Wind

(b) Glaciers

(c) Groundwater action on limestone

(d) Volcanic activity

कार्स्ट स्थलाकृति मुख्य रूप से निम्नलिखित की क्रिया के कारण बनती है:

(a) पवन

(b) हिमनद

(c) चूना पत्थर पर भूमिगत जल की क्रिया

(d) ज्वालामुखी गतिविधि

(viii) Which of the following is a depositional feature formed by glaciers?

(a) Cirque

(b) Moraine

(c) Arete

(d) U-shaped valley

निम्नलिखित में से कौन-सी स्थलरूपी संरचना हिमनदों द्वारा निक्षेपण के कारण बनती है?

(a) सर्क

(b) मोरेन

(c) एरेट

(d) यू-आकार की घाटी

(ix) Which of the following landforms is commonly found in arid regions?

(a) Cirque

(b) Yardang

(c) Moeraine

(d) Delta

निम्नलिखित में से कौन-सी स्थलाकृति शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है?

(a) सर्क

(b) यारडांग

(c) मोरेन

(d) डेल्टा

(x) A mushroom rock is formed due to:

(a) Glacial erosion

(b) Volcanic activity

(c) Wind erosion

(d) Chemical weathering

मशरूम चट्टान किसके कारण बनती है?

(a) हिमनदी अपरदन

(b) ज्वालामुखी क्रिया

(c) पवन अपरदन

(d) रासायनिक अपक्षय

PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।

2. Discuss is briefabout the scope of Geomorphology.

भू-आकृति विज्ञान के क्षेत्र पर संक्षेप में चर्चा कीजिए।

3. Discuss about the convergent plate boundary.

अभिसारी प्लेट सीमा के बारे में चर्चा कीजिए।

4. Write about the different types of volcanoes.

ज्वालामुखियों के विभिन्न प्रकारों के बारे में लिखिए।
5. Write about the difference between the Weathering and Erosion Process.

अपघटन और अपरदन की प्रक्रियाओं में क्या अंतर है? लिखिये।

6. Explain the major landforms created by glacial erosion.

हिमानी अपरदन द्वारा निर्मित प्रमुख स्थलरूपों की व्याख्या कीजिए।

What is isostasy? Discuss the postulates made by Airy or Pratt.

समस्थिति क्या है? एयरी या प्रेट द्वारा दिए गए सिद्धान्तों की चर्चा कीजिए।

PART-C/ भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marks. [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।
8. Explain the Nebular Hypothesis or Tidal Hypothesis and discuss its importance in understanding the origin of the Earth.

निहारिका सिद्धान्त अथवा ज्वारीय सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए तथा पृथ्वी की उत्पत्ति को समझने में इसकी महत्ता पर चर्चा कीजिए।
9. Describe the internal structure of the Earth with the help of a labelled diagram.

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का वर्णन एक चिन्हित आरेख की सहायता से कीजिए।
10. Describe Alfred Wagener’s Continental Drift Theory.

अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।
11. Explain the theory of mountain building proposed by Kober or Holmes.

कोबर या होम्स द्वारा प्रस्तुत पर्वत निर्माण सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
12. Explain the Normal cycle of Erosion as proposed by William Morris Davis.

विलियम मॉरिस डेविस द्वारा प्रतिपादित सामान्य अपरदन चक्र की व्याख्या कीजिए।

32. चट्टानें एवं चट्टानों का प्रकार (Rocks and its Types)

32. चट्टानें एवं चट्टानों का प्रकार

(Rocks and its Types)



चट्टानें

           भू-पटल निर्माण करने वाले पदार्थों को चट्टान कहते है अर्थात भू-पटल का निर्माण चट्टानों से हुआ है। चट्टानें मुख्यतः खनिजों के संयोग से बनती हैं, अर्थात् चट्टानें खनिजों का समुच्चय हैं। पृथ्वी पर लगभग 200 प्रकार के खनिज पाये जाते हैं। इनमें 24 ऐसे हैं, जो मुख्यतः भू-पृष्ठ की चट्टानों का निर्माण करते हैं। अत: इन्हें चट्टान निर्माणक खनिज कहा जाता है। ये खनिज मुख्यतः सिलिकेट, ऑक्साइड एवं कार्बोनेट के रूप में पाये जाते हैं। इन चट्टान निर्माणकारी खनिजों में सिलिकेट सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है एवं इसके बाद ऑक्साइड का स्थान आता है। जैव पदार्थों से निर्मित चट्टानों में खनिज नहीं मिलता है, जैसे- कोयला। चट्टानें पत्थर की तरह कड़ी एवं पंक की तरह मुलायम हो सकती हैं।

चट्टानों के प्रकार (Types of Rocks)

             उत्पत्ति के आधार पर चट्टानों को तीन भागों में बांटा गया है-

1. आग्नेय (Igneous) 

2. अवसादी (Sedimentary) 

3. कायांतरित (Metamorphic)

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks):-

        आग्नेय चट्टानों का निर्माण मैग्मा के ठंडा होकर जमने एवं ठोस होने से होता है। चूंकि सर्वप्रथम इसी चट्टान का निर्माण हुआ, अतः इसे प्राथमिक चट्टान (Primary Rock) भी कहा जाता है। ये आधारभूत चट्टानें हैं, जिनसे परतदार एवं रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है।

चट्टानें

आग्नेय चट्टान

आग्नेय चट्टान

⇒ ये चट्टानें रवेदार (Crystalline) होती हैं। जब मैग्मा धरातल पर आकर ठंडा होता है, तब तीव्र गति से ठंडा होने के कारण चट्टानों के रवे बहुत बारीक होते हैं, जैसे- बेसाल्ट। इसके विपरीत जब मैग्मा धरातल के नीचे ठंडा होता है, तब धीरे-धीरे जमने के कारण रवे बड़े-बड़े होते हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

⇒ ये चट्टानें तुलनात्मक रूप से कठोर होती हैं, इनमें जल काफी कठिनाई से जोड़ों के सहारे ही अंदर प्रविष्ट हो पाता है।

⇒ इनमें परत का अभाव होता है, परंतु जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ आग्नेय चट्टानों में जीवों के अवशेष (Fossils) का अभाव होता है।

⇒ ज्वालामुखी चट्टानों में रवों का विकास नहीं होने पर उनका गठन कांच की तरह (Glassy) होता है, जैसे ऑब्सीडियन।

⇒ आग्नेय चट्टानों के उदाहरण- ग्रेनाइट, रायोलाइट, बेसाल्ट, पेग्माटाइट (Pegmatite), साइनाइट (Syenite), डायोराइट (Diorite), एण्डेसाइट (Andesite), गैब्रो (Gabro), डोलेराइट (Dolerite), पेरिडोटाइट (Peridotite) आदि हैं।

आग्नेय चट्टान के प्रकार

          स्थिति एवं संरचना के अनुसार आग्नेय चट्टानें दो प्रकार की होती हैं-

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)-

           वह आग्नेय चट्टानें जिनका निर्माण सतह के ऊपर लावा के ठंडा होने और जमने से होता है, बहिर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं। इनमें क्रिस्टल बहुत छोटे होते हैं क्योंकि लावा तेजी से जम जाता है। बेसाल्ट एवं रायोलाइट इसका अच्छा उदाहरण है। इस चट्टान की क्षरण से ही काली मिट्टी का निर्माण होता है जिसे रेगुड़ (Regur) कहते हैं।

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)-

         वह आग्नेय चट्टानें जो सतह के नीचे लावा के ठंडे और ठोस होने से निर्मित होती है, अंतर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती है।

      इसके दो पुन: उपवर्ग हैं-

(a) पातालीय चट्टान (Plutonic Rock)

            इसका निर्माण पृथ्वी के अंदर काफी अधिक गहराई पर होता है। इसका नामकरण प्लूटो (यूनानी देवता) के नाम पर किया गया है। जो पाताल के देवता माने जाते हैं। अत्यधिक धीमी गति से ठंडा होने के कारण इसके क्रिस्टल बड़े बड़े होते हैं। ग्रेनाइट चट्टान इसका उदाहरण है।

(b) मध्यवर्ती चट्टान (Hypobyssal Rock)

        ज्वालामुखी के उदगार के समय धरातलीय अवरोध के कारण लावा दरारों, छिद्रों एवं नली में ही जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है, बाद में अपरदन की क्रिया के बाद यह चट्टाने धरातल पर नजर आने लगती है। डोलेराइट, मैग्नेटाइट इन चट्टानों के महत्वपूर्ण उदाहरण है।

मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानों के विभिन्न रूप

            जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर भूपटल के नीचे ही ठंडा होने की प्रवृति रखता है। तब आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति का निर्माण होता है। जैसे–Volcano

⇒ जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तो डाइक, क्षैतिज ठोस होता है तो सिल, जब उत्तल दर्पण के समान ठोस होता है तो लैकोलिथ, जब अवतल दर्पण के समान ठोस होता है तो लोपोलिथ, जब तरंग के समान ठोस होता है तो फैकोलिथ स्थलाकृति का निर्माण होता है। इसी तरह जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससे बैथोलिथ का निर्माण होता है।

⇒ रासायनिक संरचना की दृष्टि से आग्नेय चट्टानों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) अम्लीय चट्टानें (Acid Rocks)-

        इनमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। इनका रंग हल्का होता है। ये चट्टानें अपेक्षाकृत हल्की होती हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

(ii) क्षारीय चट्टानें (Basic Rocks)-

        इनमें सिलिका की मात्रा कम होती है। इनमें फेरो-मैग्नेशियम की प्रधानता होती है। लोहे की अधिकता के कारण इन चट्टानों का रंग गहरा होता है। इनका घनत्व भी अधिक होता है, जैसे- गैब्रो, बेसाल्ट, रायोलाइट आदि।

⇒ पूर्व की चट्टानों के ऊपर स्थित बेसाल्ट चट्टान टोपी (Caps) के समान दिखाई पड़ता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को ‘मेसा’ (Mesa) कहा जाता है।

⇒ अपरदन के कारण मेसा का अधिकांश भाग कट जाता है एवं उसका आकार छोटा होने लगता है। अत्यंत छोटी आकार वाली मेसा को ‘बुटी’ (Butte) कहा जाता है।

⇒ धरातल के नीचे परतदार चट्टानों के बीच स्थित लावा गुम्बद (जैसे बैथोलिथ) के ऊपर की मुलायम चट्टानें अपरदन द्वारा नष्ट होती जाती हैं। इस प्रकार लावा गुम्बद धरातल पर दिखने लगता है एवं यह अवरोधक (Resistant) चट्टान संकरी एवं लंबी कटक में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को “होगबैक’ (Hogback) कहा जाता है।

⇒ हौगबैक से मिलती-जुलती एक स्थलाकृति, जिसका ढाल एवं डिप (Dip) झुका हुआ हो ‘कवेस्टा’ (Questa) कहलाती है।

2. अवसादी या तलछटी या परतदार चट्टानें (Sedimentary or Stratified Rocks):-

      ये वे चट्टानें हैं जिनका निर्माण विखण्डित ठोस पदार्थों, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों के जमाव से होता है।

अवसादी चट्टान

⇒ इन चट्टानों में अवसादों की विभिन्न परतें पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जीवावशेष (Fossils) पाये जाते हैं।

⇒ धरातल का 75% भाग अवसादी चट्टानों से ढका हुआ है एवं शेष 25% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से आवृत्त है।

⇒ यद्यपि अवसादी चट्टानें धरातल का अधिकांश भाग आवृत्त किये हुए हैं, फिर भी भूपटल के निर्माण में इनका योगदान 5% ही है, शेष 95% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से निर्मित है। इस प्रकार परतदार चट्टानों का महत्त्व क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से है, भू-पृष्ठ में गहराई की दृष्टि से नहीं।

⇒ ये चट्टानें रवेदार नहीं होती हैं।

⇒ ये चट्टानें क्षैतिज रूप में बहुत कम पाई जाती हैं। पार्श्ववर्ती दबाव के कारण परतों में मोड़ पड़ जाता है, अतएव ये चट्टानें सामूहिक रूप से अपनति एवं अभिनति के रूप में पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ ये चट्टानें प्रायः मुलायम होती हैं (जैसे- चीका मिट्टी, पंक आदि), परन्तु ये कड़ी भी हो सकती हैं (जैसे- बलुआ पत्थर)।

⇒ ये शैलें अधिकांशतः प्रवेश्य (Porous) होती हैं, परंतु चीका मिट्टी जैसी परतदार चट्टानें अप्रवेश्य भी हो सकती हैं।

⇒ इनका निर्माण अधिकांशतः जल में होता है। परंतु लोएस जैसी परतदार चट्टानों का निर्माण पवन द्वारा जल के बाहर भी होता है। बोल्डर क्ले (Boulder Clay) या टिल (Till) हिमानी द्वारा निक्षेपित परतदार चट्टानों के उदाहरण हैं, जिसमें विभिन्न आकार के चट्टानी टुकड़े मौजूद रहते हैं।

3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks):-

       जब ताप, दबाव, रासायनिक क्रियाओं आदि के प्रभाव से आग्नेय एवं परतदार चट्टानों का रूप परिवर्तित हो जाता है, तो रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है। कभी-कभी रूपांतरित चट्टानों का भी रूपांतरण हो जाता है। इस क्रिया को पुनः रूपान्तरण कहा जाता है। रूपांतरण के फलस्वरूप चट्टानों की मूलभूत विशेषताएं जैसे- घनत्व, रंग, कठोरता, बनावट, खनिजों का संघटन आदि आंशिक या पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती हैं।

कायांतरित चट्टान

           कायांतरित चट्टानों के उदाहरण

⇒ आग्नेय से कायांतरित चट्टान-

ग्रेनाइट- नीस,

बेसाल्ट- एम्फी बोलाइट

ग्रेबो- सर्पेन्टइन

⇒ अवसादी से कायांतरित चट्टानें-

बालुवा पत्थर- क्वार्टजाइट,

चूना पत्थ– संगमरम,

शेल- स्लेट,

कोयला-  ग्रेफाइट, हीरा,

⇒ रूपांतरित चट्टान से पुन: रूपांतरित चट्टान

स्लेट- शिष्ट

शिष्ट- फायलाइट



 

7. बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त/ महाविस्फोट सिद्धांत-जॉर्ज लैमेण्टर

7. बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त/ महाविस्फोट सिद्धांत-जॉर्ज लैमेण्टर


बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त

बिग बैंग

              ब्रह्माण्ड तथा आकाशगंगा तथा उनके सदस्य तारों तथा ग्रहों की उत्पत्ति की समस्या के समाधान के लिए ब्रह्माण्ड के अदृश्य घटकों अर्थात् काले पदार्थों के अस्तित्व के आधार पर प्रयास किये गये हैं। आकाश गंगा के निर्माण के विषय में वैज्ञानिकों के दो वैकल्पिक विचार हैं- काले पदार्थों का अस्तित्व ‘गर्म’ या ‘ठंडे’ (Hot or cold forms) रूप में रहा होगा।

         गर्म काले पदार्थों (Hot dark matter) की स्थिति में आकाशगंगायें (Galaxies) दूर-दूर होंगी जबकि ठंडे पदार्थों की स्थिति में वे झुण्ड में होंगी (वर्तमान समय में विभिन्न आकाशगंगायें पास-पास समूह में स्थित हैं)।

         बिग बैंग सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति आज से लगभग 15 बिलियन वर्ष (15 अरब वर्ष) पहले घने पदार्थों वाले विशाल अग्निपिण्ड (fireball) के आकस्मिक जोरदार विस्फोट तथा उससे जनित विकिरण के कारण हुई।

           इस सिद्धान्त का प्रतिपादन मुख्यतः जॉर्ज लैमेण्टर द्वारा 1950-60 तथा 1960-70 दशक में किया गया (इस सिद्धान्त के अनुसार आज से 15 अरब वर्ष पहले एक विशाल अग्निपिण्ड था जिसकी रचना भारी पदार्थों से हुई थी। इस विशालकाय अग्निपिण्ड का अचानक विस्फोट हुआ जिस कारण पदार्थों का बिखराव हो गया। इन पदार्थों को प्रारम्भिक सामान्य पदार्थ (Normal matter) कहा गया। शीघ्र ही सामान्य पदार्थों के अलगाव के कारण (काले पदार्थों का सृजन हुआ। इन काले पदार्थों का आपस में समेकन होने से (अनेकों पिण्डों का निर्माण हुआ। इन पिण्डों के चारों ओर सामान्य पदार्थों का जमाव होने लगा। जिस कारण इनका आकार बढ़ता गया। इन पिण्डों के आकार में वृद्धि होने से आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ।

 

            ज्ञातव्य है कि प्रारम्भ में ब्रह्माण्ड अत्यधिक छोटा था परन्तु इसमें त्वरित गति से फैलाव होने लगा। परिणामस्वरूप आकाशगंगायें, जो प्रारम्भ में पास-पास थीं वे निरन्तर दूर होती गयीं। आज से लगभग 15 अरब वर्ष पहले अपने निर्माण-काल से आज तक ब्रह्माण्ड आकार में लगातार फैलता रहा है तथा उसके पदार्थ शीतल होते रहे हैं। आकाशगंगाओं का भी भयंकर विस्फोट हुआ तथा विस्फोट से निकले पदार्थों के समेकन से बने असंख्य पिण्डों द्वारा प्रत्येक आकाशगंगा के तारों (stars) का निर्माण हुआ। इसी तरह प्रत्येक तारे, के विस्फोट के कारण जनित पदार्थों के समूहन द्वारा ग्रहों (Planets) का निर्माण हुआ।

          अमेरिकन वैज्ञानिक अलन गुथ (Alan Guth) ने 1980 में बिग बैंग सिद्धान्त को ब्रह्माण्ड (आकाशगंगा, तारों तथा ग्रहों) की उत्पत्ति की समस्या को सुलझाने में असमर्थ पाया। अत: इन्होंने स्फीति सिद्धान्त (inflationary theory) का प्रतिपादन किया। अलन गुथ की अवधारणा है कि ब्रह्माण्ड के दृश्य द्रव्यमान (visible mass) के घनत्व की तुलना में उसका वास्तविक घनत्व बहुत अधिक है। इससे निष्कर्ष निकलता है कि ब्रह्माण्ड में अदृश्य काले पदार्थों का अस्तित्व है। यद्यपि बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त लगभग एक जैसे हैं क्योंकि उनकी कई मान्यतायें उभयनिष्ठ हैं। उनमें अन्तर मात्र इस बात से सम्बन्धित है कि विशालकाय अग्निपिण्ड के विस्फोट के एक सेकेण्ड के अन्दर किस प्रकार की घटनायें घटीं।

          स्फीति सिद्धान्त के अनुसार विशालकाय अग्निपिण्ड के जोरदार विस्फोट के बाद अति अल्प काल में ब्रह्माण्ड का असाधारण त्वरित गति से फैलाव (स्फीति, rapaid, expansion or inflation) हुआ। इस प्रक्रिया के दौरान एक सेकेण्ड के अल्पांश के अन्तर्गत ही ब्रह्माण्ड के आकार में कई गुना वृद्धि हो गयी। काले पदार्थों के समूहन से आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ। इनके विस्फोट से जनित पदार्थों के समूह से निर्मित पिण्डों द्वारा तारों का निर्माण हुआ तथा तारों के विस्फोट से उत्पन्न पदार्थों के एकत्रित एवं संगठित होने से निर्मित पिण्डों से ग्रहों (पृथ्वी इत्यादि) का निर्माण हुआ।

6. रसेल की द्वैतारक परिकल्पना (Binary Star Hypothesis of Russell)

6. रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

(Binary Star Hypothesis of Russell)


रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

रसेल की द्वैतारक

              जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना से निम्नलिखित दो बातें प्रमाणित नहीं हो पा रहीं थीं-

(i) सूर्य तथा ग्रहों के बीच की वर्तमान दूरी और

(ii) ग्रहों के वर्तमान कोणीय आवेग (Angular momentum) की अधिकता।

       इन दो समस्याओं के समाधान हेतु रसेल ने द्वैतारक परिकल्पना का प्रतिपादन किया।

           आदिकाल में सूर्य के पास ही दो तारे थे। सर्वप्रथम सूर्य का एक साथी तारा था जो सूर्य के चारों ओर परिक्रमा कर रहा था। आगे चलकर एक विशालकाय तारा साथी तारे के समीप आया, किन्तु इसकी परिक्रमा की दिशा साथी तारे के विपरीत थी।

       इन दो तारों के बीच की दूरी सम्भवतः 48 से 64 लाख किमी० के बीच रही होगी। इस तरह विशालकाय तारा सूर्य से और अधिक दूर (साथी तारा तथा विशालकाय तारा के बीच की दूरी का कई गुना) रहा होगा जिस कारण विशालकाय तारे के ज्वारीय बल का प्रभाव सूर्य पर नहीं पड़ा, परन्तु साथी तारे पर ज्वारीय बल के कारण पदार्थ विशालकाय तारे की ओर आकर्षित होने (उभार) लगा। जैसे-जैसे विशालकाय तारा साथी तारे के करीब आता गया, आकर्षण बल बढ़ता गया और उभार अधिक होने लगा।

        जब विशालकाय तारा साथी तारे की निकटतम दूरी पर आ गया तो अधिकतम आकर्षण के कारण कुछ पदार्थ साथी तारे से अलग होकर विशालकाय तारे की दिशा में घूमने (साथी तारे की विपरीत दिशा) लगे। आगे चलकर इन पदार्थों से ग्रहों का निर्माण हुआ। प्रारम्भ में ग्रह करीब रहे होंगे तथा आपसी आकर्षण के कारण ग्रहों से पदार्थ निकलकर उनके उपग्रह बन गये होंगे जिसे निम्नांकित चित्रों में देखा जा सकता है-

रसेल की द्वैतारक

रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

         इस तरह युग्म तारे की कल्पना करके तथा सूर्य के स्थान पर साथी तारे से पदार्थ निस्सृत कराके ग्रहों तथा पृथ्वी की उत्पत्ति मानकर रसेल ने सूर्य तथा ग्रहों के बीच की वर्तमान दूरी तथा उनके कोणीय आवेग की समस्या का वैज्ञानिक स्तर पर समाधान कर दिखाया है।

आलोचना

(i) रसेल ने साथी तारे से निकले पदार्थ से ग्रहों की उत्पत्ति को समझाया है, परन्तु साथी तारे के अवशिष्ट भाग पर प्रकाश नहीं डाला है। अवशिष्ट भाग का क्या हुआ? कोई संतोषजनक हल नहीं दिया गया है।

(ii) निर्माण के समय ग्रह सूर्य से दू थे तथा एक-दूसरे दूर फैले थे, परन्तु विशालकाय तारे के भ्रमण पथ पर से आगे निकल जाने पर सभी ग्रह सूर्य की आकर्षण परिधि में आ गये, जबकि उसके सबसे करीब साथी तारे का अवशिष्ट भाग सूर्य के आकर्षण में नहीं आ सका। इस तरह विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रसेल ने इस समस्या का समाधान नहीं किया है।

(iii) यदि यह मान भी लिया जाय कि सभी ग्रह सूर्य की आकर्षण परिधि में आ गये, तो भी सेल विशद रूप में यह नहीं समझा पाते हैं कि किस प्रक्रिया द्वारा यह सम्भव हुआ।

5. जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना (Tidal Hypothesis of James Jeans)

5. जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना

(Tidal Hypothesis of James Jeans)


जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पनाजेम्स जीन्स की ज्वारीय

            सौर्य-मण्डल की उत्पत्ति से सम्बन्धित ”ज्वारीय परिकल्पना” का प्रतिपादन अंग्रेज विद्वान सर जेम्स जीन्स (Sir James Jeans) ने सन् 1919 में किया तथा जेफरीज (Jeffreys) नामक विद्वान ने उक्त परिकल्पना में सन् 1929 में कुछ संशोधन प्रस्तुत किया जिससे इस परिकल्पना का महत्व और अधिक बढ़ गया।

             यह ज्वारीय परिकल्पना आधुनिक परिक्लपनाओं तथा सिद्धान्तों में से एक है, जिसे अन्य की अपेक्षा अधिक समर्थन प्राप्त है। अपनी संकल्पना की पुष्टि के लिए जीन्स कुछ तथ्यों को स्वयं मानकर चले हैं।

        इस प्रकार ‘ज्वारीय परिकल्पना’ प्रतिपादक द्वारा कुछ निम्नलिखित कल्पित तथ्यों पर आधारित है।

1. सौर्य-मण्डल का निर्माण सूर्य तथा एक अन्य तारे के संयोग से हुआ।

2. प्रारम्भ में सूर्य गैस का एक बहुत बड़ा गोला था।

3. सूर्य के साथ ही साथ ब्रह्माण्ड में एक दूसरा विशालकाय तारा था।

4. सूर्य अपनी जगह पर स्थिर था तथा अपनी जगह पर ही घूम रहा था।

5. साथी तारा एक पथ के सहारे इस तरह घूम रहा था कि वह सूर्य के निकट आ रहा था।

6. साथी तारा आकार तथा आयतन में सूर्य से बहुत अधिक विशाल था।

7. पास आते हुए तारे द्वारा ज्वारीय शक्ति का प्रभाव सूर्य के वाह्य भाग पर पड़ा था।

ज्वारीय परिकल्पना के अनुसार ग्रहों का निर्माण 

          इस प्रकार उपर्युक्त स्वयं-कल्पित तथ्यों के आधार पर जीन्स ने बताया है कि साथी तारा निरन्तर एक पथ के सहारे सूर्य की ओर अग्रसर हो रहा था, जिस कारण साथी तारे की आकर्षण शक्ति द्वारा वायव्य ज्वार का प्रभाव सूर्य के वाह्य भाग पर पड़ने लगा। फलस्वरूप सूर्य में ज्वार उत्पन्न होने लगा। यह ज्वारीय क्रिया सूर्य में उसी प्रकार सम्भव हो सकी, जिस प्रकार वर्तमान समय में पृथ्वी के निकट चन्द्रमा के आ जाने से पृथ्वी के महासागरों में ज्वार उत्पन्न हो जाता है। ज्यों-ज्यों विशालकाय तारा सूर्य के पास आता गया, त्यों-त्यों उसकी आकर्षण शक्ति बढ़ती गयी तथा ज्वार की तीव्रता बढ़ती गयी।

          जब तारा सूर्य से निकटतम दूरी पर आया तो उसकी आकर्षण शक्ति सूर्य से अधिक हो गयी, जिस कारण हजारों किलोमीटर लम्बा सिगार के आकार का ज्वार सूर्य के वाह्य भाग में उठा। सिगार के आकार वाले इस भाग को फिलामेन्ट (Filament) कहा गया है। सूर्य के निकटतम दूरी पर पहुँचने के कारण तारे की अधिकतम आकर्षण शक्ति के प्रभाव से एक विशाल फिलामेन्ट सूर्य से हटकर तारे की तरफ अग्रसर हुआ। जीन्स के अनुसार पास आने वाला तारा सूर्य के मार्ग पर नहीं था, अत: यह सूर्य से आगे बढ़ने लगा।

           इस प्रकार तारे के दूर निकल जाने के कारण फिलामेन्ट तारे के साथ न जा सका, वरन् वह सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण करने लगा। यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि इस स्थिति में जब कि तारा अधिक दूर चला गया तो फिलामेन्ट सूर्य के पास पुन: वापस क्यों नहीं आ गया?

     व्याख्या सरल है। जब फिलामेन्ट टूटकर तारे की तरफ अग्रसर हुआ, उस परिस्थिति में यह सूर्य की आकर्षण शक्ति के क्षेत्र से बाहर (Neutral point) हो गया था, अत: वह सूर्य का ही चक्कर लगाने लगा, वापस नहीं आ सका।

     कुछ समय पश्चात् तारा सूर्य से इतना दूर चला गया कि पुन: कोई वायव्य भाग (फिलामेण्ट) सूर्य से अलग नहीं हो सका। आगे चलकर सूर्य से निकला हुआ ज्वारीय पदार्थ सिगार के आकार में अधिक लम्बा हो गया, जिसका मध्य भाग अधिक मोटा या चौड़ा तथा दोनों किनारे वाले भाग अत्यधिक पतले थे। किनारों के पतला होने का मुख्य कारण तारे तथा सूर्य की आकर्षण शक्ति का प्रभाव ही बताया जाता है। फिलामेंट में गति या परिभ्रमण का आविर्भाव दूर होते हुये (Receding) तारे की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के खिंचाव (Gravitational pull) के कारण हुआ था।

फिलामेन्ट से ग्रहों की उत्पत्ति:-

          सूर्य से अलगाव के बाद फिलामेन्ट शीतल होने लगा, जिस कारण उसके आकार में संकुचन प्रारम्भ हो गया। इस संकुचन के कारण फिलामेन्ट कई टुकड़ों में टूट गया तथा प्रत्येक भाग घनीभूत होकर ग्रह (Planet) के रूप में बदल गया। इसी क्रिया से फिलामेन्ट से नौ ग्रहों की रचना सम्भव हुई। इसी प्रक्रिया के अनुसार सूर्य की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से ग्रहों पर ज्वार उत्पन्न होने से उनके कुछ पदार्थ अलग हो गये, जो घनीभूत होकर उपग्रह बने।

          अब यह प्रश्न उठता है कि ग्रह से उपग्रह बनने का क्रम कब तक चलता रहा? जब तक ग्रहों से निकले हुये ज्वारीय पदार्थ बड़े आकार वाले थे तथा उनकी केन्द्रीय आकर्षण शक्ति अधिक थी, तब तक उपग्रह बनते रहे। परन्तु जब उनका आकार इतना छोटा होने लगा कि उनकी केन्द्रीय आकर्षण-शक्ति उन्हें संगठित रखने में असमर्थ हो गयी, उपग्रहों की रचना समाप्त हो गयी। इस प्रकार ग्रहों के उपग्रहों की संख्या ग्रहों के आकार के अनुसार निश्चित हुई।

          इस परिकल्पना द्वारा पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही साथ सौर्य-मंडल की अनेक समस्याएँ भी सुलझी-सी प्रतीत होती हैं-

(1) ग्रहों का क्रम तथा आकार-

        सूर्य से निस्सृत ज्वारीय फिलामेन्ट बीच में चौड़ा तथा किनारों की तरफ पतला था। इस प्रकार जब फिलामेन्ट के टूटने से ग्रहों का निर्माण हुआ तो बड़े ग्रह बीच में तथा छोटे ग्रह किनारे की ओर बने। ग्रहों का यह क्रम वर्तमान सौर्य मंडल के ग्रहों से पूर्णतया सामंजस्य रखता है।

            सूर्य की ओर से प्रारम्भ करने पर बुध ग्रह सबसे पहले है। यह अधिक छोटा है। इसके बाद शुक्र, पृथ्वी, मंगल (यह पृथ्वी से छोटा है) आदि एक-दूसरे से बड़े होते जाते हैं तथा बीच में बृहस्पति सबसे बड़ा ग्रह है । इसके बाद पुनः ग्रहों का आकार घटता जाता है तथा अन्त में कुबेर अत्यन्त छोटा ग्रह है। यह तथ्य निम्न तालिका से पूरी तरह प्रमाणित हो जाता है।

         जीन्स ने अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन कुबेर ग्रह( Pluto) की खोज के पहले किया था। बाद में अत्यन्त लघु ग्रह कुबेर की खोज ने इस परिकल्पना का महत्व और अधिक बढ़ा दिया क्योंकि यह परिकल्पना सौर्य-मंडल के सदस्यों के क्रम को पूर्णतया सिद्ध करती है। केवल मंगल की स्थिति इसके अनुसार ठीक नहीं बैठती है।

(2) उपग्रहों का क्रम-

        इस परिकल्पना के अनुसार ग्रहों के उपग्रहों का निर्माण ग्रहों से निकले हुए ज्वारीय पदार्थ से उसी प्रकार हुआ, जिस प्रकार सूर्य से निकले ज्वारीय पदार्थ से ग्रहों की रचना हुई। इस प्रकार ग्रहों के उपग्रहों का भी वही क्रम है जो कि ग्रहों का। अर्थात् एक ग्रह के यदि कई उपग्रह हैं तो सबसे बड़ा उपग्रह बीच में तथा छोटा उपग्रह किनारे की ओर पाया जाता है। यह तथ्य भी वर्तमान उपग्रहों की स्थिति तथा क्रम से पूर्णतया मेल खाता है। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि ग्रहों तथा उपग्रहों की रचना एक ही प्रणाली द्वारा हुई होगी।

(3) उपग्रहों की संरचना तथा आकार-

         इस ‘ज्वारीय परिकल्पना’ के अनुसार बड़े ग्रह ब्रह्माण्ड में अधिक समय तक गैस के रूप में रहे, क्योंकि आकार की विशालता के कारण उसके शीतल होने में अधिक समय लगा होगा। इस कारण बड़े ग्रहों के उपग्रह अधिक संख्या में बने, परन्तु अपेक्षाकृत ये छोटे आकार वाले थे। मध्यम आकार वाले (बड़े ग्रहों के समीपवर्ती ग्रह) ग्रहों से कम संख्या में उपग्रह (Satellites) बने, परन्तु इनका आकार बड़ा रहा। किनारे वाले ग्रह आकार में छोटे होने के कारण शीघ्र शीतल हो गये होंगे। परिणामस्वरूप उनसे उपग्रहों की रचना नहीं हो पायी होगी।

            यह तथ्य वर्तमान सौर्य-मंडल के उपग्रहों के क्रम से पूर्णतया मेल खाता है। शनि तथा बृहस्पति जैसे सबसे बड़े ग्रहों के छोटे आकार वाले अनेक उपग्रह हैं, जबकि बुध तथा शुक्र के पास एक भी उपग्रह नहीं है।

(4) ग्रहों का परिभ्रमण कक्ष-

        इस परिकल्पना के अनुसार ग्रहों के परिभ्रमण कक्ष (Orbit) अथवा ग्रह पथ को सूर्य के कक्ष (orbit) से मेल नहीं खाना चाहिये, बल्कि ग्रह-कक्ष को सूर्य कक्ष से एक निश्चित कोण पर झुका होना चाहिये, क्योंकि सूर्य की आकर्षण शक्ति से ग्रह झुक जाता है। यह तथ्य भी वर्तमान ग्रहों के कक्ष से पूर्णतया मेल खाता है, क्योंकि प्रत्येक ग्रह-कक्ष झुका हुआ है। 

प्रत्येक ग्रह का कोणीय झुकाव

ग्रह झुकाव
बुध
शुक्र 3.5°
पृथ्वी 23.5°
मंगल 2° 
बृहस्पति 1° 
शनि 2.5° 
अरुण 0° 
वरुण
कुबेर 17°

(5) निस्सृत वायव्य पदार्थ का आकार-

        पास आते हुये तारे की ज्वारीय शक्ति से सूर्य से जो फिलामेन्ट निकला वह सिगार के आकार का क्यों हो गया? इसका मुख्य कारण पास आते हुये तारे की आकर्षण शक्ति में विभिन्नता का होना ही बताया जाता है। अर्थात् तारा दूर था तो कम आकर्षण के कारण कम पदार्थ बाहर निकला तथा तारा ज्यों-ज्यों पास आता गया, बढ़ती आकर्षण शक्ति से पदार्थ की मात्रा बढ़ती गयी तथा तारे के सूर्य से निकटतम दूरी पर आने पर निस्सृत पदार्थ सबसे अधिक था।

           पुन: तारे के दूर जाने से आकर्षण शक्ति में कमी के कारण निस्सृत पदार्थ की मात्रा घटती गयी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि निस्सृत पदार्थ (Ejected matter) तारे की आकर्षण शक्ति के अनुपात में थे।

परिकल्पना में संशोधन

       सन् 1929 ई. में हेरोल्ड जेफरीज महोदय ने इस परिकल्पना को संशोधित करते हुए बताया कि ग्रहों की उत्पत्ति फिलामेंट बनने से नहीं हुई है, वरन् साथी तारा और सूर्य के आपस में टकराने से हुई है। साथी तारा और सूर्य के बीच जब टक्कर होती है तो कुछ पदार्थ सूर्य से बाहर निकल आते हैं और बाद में संगठित एवं शीतल होकर 9 ग्रहों का निर्माण करते हैं।      

     जेफरीज के इस संशोधन के मानने पर ग्रहों के परिभ्रमण (Rotation) सम्बन्धी अनेक कठिनाईयां सुलझ जाती हैं।

मूल्यांकन

         जीन्स द्वारा प्रतिपादित तथा जेफरीज द्वारा संशोधित एवं परिवर्द्धित ‘ज्वारीय परिकल्पना’ को बहुत समय तक समर्थन प्राप्त होता रहा तथा लोगों में इसके प्रति अधिक विश्वास हो गया था क्योंकि जीन्स को यह विश्वास था कि ब्रह्माण्ड की ग्रह-प्रणाली का निर्माण एक अनुपम विधान है।

         परन्तु पिछले कुछ वर्षों में इस विचारधारा की कटु आलोचनाएँ की गयी हैं तथा वर्तमान वैज्ञानिकों को जीन्स की यह परिकल्पना मान्य नहीं है। यदि कुछ आधुनिक वैज्ञानिकों के इस परिकल्पना में संशोधन मान लिये जाय तो सचमुच यह परिकल्पना बड़ी हद तक पृथ्वी की उत्पत्ति के विषय में सही ज्ञान दे सकती है।

आलोचनाएँ

      इस परिकल्पना के निम्नलिखित आलोचनाएँ बतायी जा सकती हैं:-

⇒ एक तारे से दूसरे तारे इतना दू है कि वो एक-दूसरे के समीप आ ही नहीं सकता।

⇒  रसेल का कहना है कि इस सिद्धांत के आधार पर इतना विशालकाय सौरमण्डल का निर्माण नहीं हो सकता।

⇒ सूर्य का आंतरिक भाग अत्यधिक गर्म है इसके काण सूर्य के आंतरिक भाग से पदार्थ स्वंय ही निकलने की स्थिति में होती है। विशालकाय तारा सूर्य के पास से होकर गुजरा होगा तो तापमान में वृद्धि हुई होगी, ऐसी स्थिति में सूर्य से अलग हुए पदार्थ अंतरिक्ष में बिखर जाने की प्रवृति रखेंगें न कि ठंडा होकर ग्रह का निर्माण करेंगें।

⇒ यह सिद्धांत ग्रहों के कोणीय वेग की व्याख्या नहीं करता।

4. लाप्लास की निहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis of Laplace)

4. लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

(Nebular Hypothesis of Laplace)


लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

लाप्लास की निहारिका

              फ्रान्सीसी विद्वान लाप्लास ने अपना मत सन् 1796 ई० में व्यक्त किया, जिसका वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक ‘Exposition of the World System’ में किया है। यह परिकल्पना काण्ट के विचार से कुछ साम्य रखती है। लाप्लास ने काण्ट की कुछ गलतियों को दूर करके अपना संशोधित विचार व्यक्त किया।

            काण्ट की परिकल्पना के मुख्य तीन दोष थे:-

(1) निहारिका अथवा आद्य पदार्थ के कणों के टकराव से पर्याप्त ताप उत्पन्न नहीं हो सकता है।

(2) कणों के टकराव से गति नहीं हो सकती है।

(3) आकार में वृद्धि के साथ गति में वृद्धि नहीं हो सकती है।

            इन अशुद्धियों को दूर करने के लिए लाप्लास ने कुछ कल्पनायें की हैं, जिन पर आधारित होकर उनका सिद्धान्त आगे चलता है:-

(1) प्रथम समस्या अर्थात् निहारिका के ताप की समस्या हल करने के लिये उन्होंने यह मान लिया कि ब्रह्माण्ड में पहले से एक विशाल तप्त निहारिका (नेबुला ) थी।

(2) यह निहारिका प्रारम्भ से ही गतिशील थी।

(3) यह निहारिका निरन्तर शीतल होकर आकार में सिकुड़ती गयी।

            इस प्रकार उपर्युक्त तीन स्वयं के माने हुये तथ्यों के अनुसार अतीत काल में ब्रह्माण्ड में एक गतिशील एवं तप्त महापिण्ड था, जिसको लाप्लास ने निहारिका नाम दिया है। निहारिका की गति के कारण विकिरण द्वारा उष्मा का ह्रास होने लगा जिस कारण इसका बहिर्भाग शीतल होने लगा।

           इस प्रकार निहारिका के निरन्तर शीतल होने के कारण उसमें संकुचन होने लगा। परिणामस्वरूप निहारिका के आकार अथवा आयतन में ह्रास होने लगा। आयतन में कमी के कारण निहारिका की गति में निरन्तर वृद्धि होने लगी। यहाँ पर काण्ट की तृतीय गलती भी दूर हो जाती है। अत्यधिक गति के कारण केन्द्रापसारित बल (centrifugal force) के कारण निहारिका के मध्यवर्ती भाग के पदार्थ भारहीन होने लगे तथा मध्य भाग बाहर की ओर उभरने लगा।

               ऊपरी भाग निरन्तर शीतल होने के कारण अत्यधिक घना हो गया, परन्तु यह ऊपरी भाग निचले भाग के साथ भ्रमण नहीं कर सका। इस प्रकार ऊपरी भाग, निरन्तर शीतल होते तथा सिकुड़ते मध्य भाग से, छल्ला के रूप में पृथक होने लगा। कुछ समय बाद यह गोल छल्ला निहारिका से अलग होकर बाहर निकल आया तथा निहारिका का चक्कर लगाने लगा।

              लाप्लास के अनुसार निहारिका से केवल एक ही छल्ला बाहर निकला तथा बाद में यह छल्ला नौ छल्लों में विभाजित हो गया। (जबकि काण्ट के अनुसार निहारिका से ही नौ छल्ले निकले थे) तथा प्रत्येक छल्ला एक-दूसरे से दूर हटता गया। प्रत्येक छल्ले के समस्त पदार्थ ने एक स्थान पर गांठ के रूप में एकत्रित होकर ‘गर्म वायव्य ग्रन्थि’ (Hot gaseous agglomeration) का रूप धारण किया, जो आगे चलकर  शीतल होकर ठोस बन कर ग्रह बन गया।

           इस प्रकार नौ ग्रहों का निर्माण हुआ। इसी क्रिया की पुनरावृत्ति के कारण ग्रहों से उपग्रहों का आविर्भाव हुआ। निहारिका का अवशिष्ट भाग सूर्य बना।

लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

          उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में फ्रान्सीसी विद्वान रॉस “(Roche) ने लाप्लास की परिकल्पना में संशोधन प्रस्तुत किया। लाप्लास के अनुसार निहारिका से निकले एक भारी छल्ले से कई पतले छल्ले बाहर निकल गये परन्तु रॉस ने बताया कि मुख्य निहारिका से ही कई पतले छल्ले क्रमश: अलग हो गये। प्रत्येक छल्ला घनीभूत होकर ग्रह बन गया। इसी क्रम के जारी रहने से समस्त ग्रहों की उत्पति हुई।

मूल्यांकन

      अपने सरल रूप के कारण लाप्लास की परिकल्पना को प्रारम्भ में पर्याप्त समर्थन मिला तथा लगभग 150 वर्षों तक इसका समादर (आदर) होता रहा। परन्तु सौर्य-मंडल सम्बन्धी नवीन वैज्ञानिक तथ्यों एवं सिद्धान्तों के प्रकाश में आने के कारण इस परिकल्पना का समर्थन जाता रहा।

          इस परिकल्पना में न केवल पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या ही हल की गयी है, वरन् उसकी रचना तथा स्वभाव का भी वर्णन किया गया है। इसके अनुसार ग्रह प्रारम्भ में मौलिक रूप में वायव्य अवस्था में थे। तत्पश्चात् शीतल होते समय तरल अवस्था में आये एवं अन्त में ठोस भूपटल (solid crust) का निर्माण हुआ। परन्तु इस मत के विपरीत कुछ विद्वानों ने यह बताया है कि पृथ्वी अपनी उत्पत्ति एवं वृद्धि-काल से ही एक ठोस रूप में रही होगी।

          अधिकांश विद्वानों के अनुसार पृथ्वी के इतिहास में एक तरल अवस्था अवश्य रही होगी। अत: ‘निहारिका परिकल्पना’ का इस सम्बन्ध में पर्याप्त महत्व है। इस परिकल्पना के विरोध में निम्नांकित तथ्य प्रस्तुत किये जा सकते हैं-

(1) सौर्य-मण्डल के विभिन्न ग्रहों का वर्तमान ‘कोणीय आवेग’ (angular momentum), जो कि प्रारम्भ में मौलिक निहारिका में व्याप्त था, भ्रमण की अधिकता से निहारिका को तोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि निहारिका के मौलिक कोणीय आवेग से पदार्थ निहारिका से अलग नहीं हो सकता था।

             ‘कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त’ (laws of conservation of angular momentum) के अनुसार मौलिक निहारिका का कोणीय आवेग, वर्तमान सूर्य एवं उसके सदस्य ग्रहों के कुल कोणीय आवेग के बराबर होना चाहिये, जबकि ऐसा न होकर सम्पूर्ण कोणीय आवेग का 98 प्रतिशत भाग ग्रहों तथा शेष 2 प्रतिशत भाग वर्तमान सूर्य में है। इस प्रकार यह परिकल्पना गणितीय सूत्रों के विपरीत है।

(2) निहारिका से 9 छल्ले ही क्यों निकले? नौ से अधिक भी छल्ले निकल सकते थे। इस समस्या का निदान लाप्लास की तरफ से नहीं मिलता है। घनीभवन के कारण एक छल्ले का सारा पदार्थ एक ही गोल पिण्ड के रूप में नहीं बदल सकता है। वस्तुत: छल्ला छोटे-छोटे कई टुकड़ों में टूट जायेगा तथा एक ही छल्ले से कई छोटे-छोटे स्वतंत्र ग्रह बनेंगे।

(3) निहारिका के कणों की ”अल्प पारस्परिक संलग्नता” (small degree of cohesion between the particles of nebula) के द्वारा छल्लों के निकलने का क्रम जारी रहेगा तथा उस क्रिया में अवकाश नहीं हो सकता।

(4) यदि ग्रहों की उत्पत्ति निहारिका से हुई तो प्रारम्भ में वे द्रवित अवस्था में रहे होंगे। परन्तु द्रवित अवस्था में ग्रह निर्बाध रूप से परिभ्रमण तथा परिक्रमा नहीं कर सकते क्योंकि द्रव के विभिन्न स्तरों की गति समान नहीं होती और उनमें घर्षण होता रहता है। केवल ठोस पिण्ड ही पूर्णरूपेण  परिभ्रमण तथा परिक्रमा कर सकता है।

(5) इस परिकल्पना के अनुसार सभी ग्रहों के उपग्रहों को अपने पिता ग्रहों की दिशा में ही घूमना चाहिए। इस तथ्य के विपरीत शनि तथा वृहस्पति के उपग्रह अपने पिता-ग्रह के विपरीत दिशा में भ्रमण करते हैं। सम्भवत: लाप्लास की परिकल्पना के समय तक केवल ऐसे ही उपग्रहों का पता लग पाया था जो अपने पिता ग्रह के चारों तरफ घूमते थे। बाद में चलकर ऐसे अन्य उपग्रहों की खोज हुई जो कि अपने पिता-ग्रह के विपरीत दिशा में घूमते हैं।

(6) यदि सूर्य, निहारिका का ही एक भाग है तो तरल अवस्था में होने के कारण इसके बीच में उभार होना चाहिए जिससे यह मालूम पड़ता हो कि एक नवीन छल्ला पृथक् होकर बाहर निकलने ही वाला है। पर ऐसा नहीं देखा जाता है।

(7) लाप्लास यह मानकर चलते हैं कि प्रारम्भ में एक गतिशील तथा तप्त निहारिका थी, पर यह निहारिका कहाँ से आयी? उसमें उष्मा तथा गति कैसे पैदा हुई? इन प्रश्नों का उत्तर इस परिकल्पना से नहीं मिल पाता है।

            इस प्रकार यह कहा जाता है कि लाप्लास की यह परिकल्पना कल्पना मात्र ही है। उपर्युक्त त्रुटियों के आधार पर यह प्रमाणित किया जाता है कि यह ‘निहारिका परिकल्पना’ पृथ्वी की उत्पति के विषय में गलत धारणा तो प्रस्तुत करती ही है, साथ ही साथ पृथ्वी के इतिहास तथा उसके भूगर्भ के विषय में भी गलत तथ्यों का प्रचार करती है। वर्तमान समय में यह परिकल्पना मान्य नहीं है।

3. काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना (Kant’s Gaseous Hyphothesis)

3. काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना

(Kant’s Gaseous Hyphothesis)


काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना 

काण्ट की वायव्य राशि

      पृथ्वी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जर्मन दार्शनिक काण्ट ने सन् 1755 ई० में अपनी ”वायव्य राशि परिकल्पना” का प्रतिपादन किया जो कि न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियमों पर आधारित थी। प्रारम्भ में इस मत की सराहना हुई, परन्तु बाद में इसे तर्कहीन प्रमाणित कर दिया गया, क्योंकि यह मत गणित के गलत नियमों पर कल्पित किया गया था।

       प्रस्तुत परिकल्पना काण्ट द्वारा कल्पित अनेक तथ्यों पर आधारित है। सर्वप्रथम काण्ट ने यह मान लिया कि प्राचीन काल में (अतीत काल में) ब्रह्माण्ड में दैवनिर्मित आद्य पदार्थ (Premordial matter) बिखरे हुए थे। प्रारम्भ में ये पदार्थ अत्यन्त कठोर, शीतल तथा गतिहीन थे।

       पुनः काण्ट ने यह मान लिया कि आपसी आकर्षण के कारण ये कण (आद्य पदार्थ) एक-दूसरे से टकराने लगे। इस आपसी टकराव के कारण ताप तथा भ्रमण गति का आविर्भाव हुआ। ताप में निरन्तर वृद्धि होती गयीं, जिस कारण आद्य पदार्थ एक वायव्य राशि में परिवर्तित होने लगे। ताप तथा भ्रमण गति (Rotation) के परिणामस्वरूप प्रारम्भिक शीतल तथा गतिहीन वायव्य पदार्थ एक तप्त तथा गतिशील निहारिका (Nebula) में परिवर्तित हो गया। निहारिका ताप के आविर्भाव के साथ ही घूमने लगी, उसके आकार में वृद्धि होने लगी, जिस कारण ताप में वृद्धि से निहारिका की परिभ्रमण गति में भी वृद्धि होने लगी।

       इस प्रकार निहारिका इतनी तीव्र गति से घूमने लगी कि केन्द्रापसारित बल (केन्द्र से बाहर की ओर जाने वाला बल-Centrifugal force) के प्रभाव से निहारिका के मध्य भाग में उभार आने लगा तथा इस क्रिया की तीव्रता के कारण (अर्थात् केन्द्रापसारितल की तीव्रता के कारण) पदार्थ का एक छल्ला निहारिका से बाहर निकल गया।

      इसी क्रिया की पुनरावृत्ति (Repetition) के कारण पदार्थ के नौ (9) गोल छल्ले निहारिका से अलग हो गये। धीरे-धीरे एक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर एकत्रित होकर एक गाँठ के रूप में शीतल होकर जमकर ठोस हो गये। इस तरह नौ छल्लों से (गाँठ के रूप में) नौ ठोस पदार्थों का निर्माण हुआ, जो कि आगे चलकर नौ ग्रह के रूप में बदल गये।

काण्ट की वायव्य राशि

            इस प्रकार काण्ट के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति, केन्द्रापसारित बल द्वारा निहारिका से अलग हुये छल्ले के पदार्थों के एक स्थान पर गाँठ के रूप में जमकर ठोस होने से हुई। मौलिक निहारिका का जो भाग अवशिष्ट रह गया, वह सूर्य के रूप में परिवर्तित हो गया।

         उपर्युक्त प्रक्रिया की पुनरावृत्ति के कारण ग्रहों से उनके उपग्रहों का निर्माण हुआ अर्थात् नव-निर्मित गतिशील ग्रहों से केन्द्रापसारित बल के प्रभाव से पदार्थों के वलयाकार छल्ले अलग हो गये, जिनमें से प्रत्येक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर घनीभूत होकर उपग्रह (Satellite) बन गये। इस तरह सम्पूर्ण सौर्य-मंडल का आविर्भाव हुआ।

आलोचना (Criticism):-

           यद्यपि काण्ट महोदय ने पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या के समाधान के लिए विज्ञान के तथ्यों का सहारा लिया था तथापि इनका मत वर्तमान समय में आधारहीन प्रमाणित कर दिया गया है, क्योंकि इस पकिल्पना के निम्नलिखित कई तथ्य गणित के नियमों के विपरीत हैं:-

(1) सर्वप्रथम यह आरोप लगाया जाता है कि कणों के आपसी टकराव से भ्रमण गति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस प्रकार निहारिका की निरन्तर गति-वृद्धि त्रुटिपूर्ण है।

(2) काण्ट की यह परिकल्पना कि आद्य पदार्थ में गति कणों के आपसी टकराव से हुई, जो कि ”कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त” (Laws of conservation of angular momentum) के विपरीत है, क्योंकि आपसी टकराव से गति नहीं उत्पन्न हो सकती है।

(3) काण्ट की यह धारणा कि निहारिका के आकार में वृद्धि के साथ गति भी बढ़ती गयी जो कि इस सिद्धान्त के विपरीत है, क्योंकि ‘कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त’ के अनुसार यदि किसी पिंड का आकार बढ़ता है तो गति घटती है और यदि आकार बढ़ता है तब गति घटती है।

निष्कर्ष:

          निष्कर्षत: कहा जा सकता है की वह मूल आधार ही, जिस पर काण्ट की परिकल्पना आधारित है, गलत प्रमाणित किया जाता है। काण्ट की परिकल्पना का महत्व इस बात में है कि उन्होंने इस क्षेत्र में प्रयास करके आगे आने वाले विद्वानों के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया। यह परिकल्पना आगे चलकर लाप्लास की निहारिका परिकल्पना की आधारशिला बनी।

1. Nature and Scope of ​​Geomorphology (भू-आकृति विज्ञान की प्रकृति और विषय क्षेत्र)

1. Nature and Scope of ​​Geomorphology  

(भू-आकृति विज्ञान की प्रकृति और विषय क्षेत्र)



             स्थलमण्डल के दृश्य भागों अर्थात् स्थलरूपों का वैज्ञानिक अध्ययन भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है, इसलिए भू-आकृति विज्ञान को स्थलरूपों का विज्ञान कहते हैं। भू-आकृति विज्ञान के लिए अंग्रेजी में प्रयुक्त किये जाने वाले Geomorphology शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ (Geo-पृथ्वी, morphi-रूप और logos-वर्णन) भी स्थलरूपों के अध्ययन से सम्बन्धित है।

Nature and Scope of ​​Geomorphology

      इस विज्ञान के अन्तर्गत अध्ययन किये जाने वाले उच्चावचनों को तीन श्रेणियों में रखा जाता है-

(i) प्रथम श्रेणी के उच्चावचन-

        इसके अन्तर्गत महाद्वीप तथा महासागरीय बेसिन को सम्मिलित करते हैं। इनके वितरण, वर्तमान प्रारूप तथा उत्पत्ति का अध्ययन किया जाता है।

(ii) द्वितीय श्रेणी के उच्चावचन–

       इसके अन्तर्गत पृथ्वी के अन्तर्जात बलों द्वारा उत्पन्न रचनात्मक स्थलाकृतियों यथा पर्वत, भ्रंश, पठार, मैदान तथा झीलों का अध्ययन सम्मिलित है। इन स्थलाकृतियों के अध्ययन के लिए पृथ्वी के अन्तर्जात बलों तथा प्रक्रमों के स्वरूप तथा क्रियाविधि का अध्ययन भी आवश्यक होता है।

(iii) तृतीय श्रेणी के उच्चावचन-

      इसके अन्तर्गत बहिर्जात प्रक्रमों (वायुमंडल से उत्पन्न यथा– जल, सरिता, सागरीय जल, भूमिगत जल, पवन, हिमनद एवं परिहिमानी) द्वारा अपक्षय, अपरदन एवं निक्षेपण द्वारा जनित स्थलरूपों की आकारिकी, उत्पत्ति एवं विकास का गहन अध्ययन किया जाता है इन स्थलरूपों को निर्मित्त, प्रभावित एवं परिमार्जित करने वाले प्रक्रमों को सम्मिलित रूप में अनाच्छादनात्मक प्रक्रम (Denudational Processes) कहते है जिसके अंतर्गत अपक्ष्य (Weathering) तथा अपरदन (Erosion, निक्षेपण भी) को सम्मिलित करते है।

थार्नबरी के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान स्थलरूपों का विज्ञान है, परन्तु इसमें अन्तः सागरीय रूपों के अध्ययन को सम्मिलित किया जाता है।

स्ट्राहलर के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान भौतिक भूगोल का एक प्रमुख अंग है जो सभी प्रकार के स्थलरूपों की उत्पत्ति तथा उनके व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध विकास की व्याख्या करता है।

ए. एल. ब्लूम के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान स्थलाकृतियों तथा उन्हें परिवर्तित करने वाले प्रक्रमों का क्रमबद्ध वर्णन एवं विश्लेषण करता है।

बारसेस्टर महोदय ने इसे पृथ्वी के उच्चावचों का व्याख्यात्मक वर्णन करने वाला विज्ञान कहा है। यह भू-पटल के विभिन्न रूपों, उनकी उत्पत्ति, इतिहास तथा विकास की व्याख्या करता है।

       निष्कर्षतः भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों का व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। इसमें न केवल स्थलरूपों के आकार (आकृति) का अध्ययन किया जाता है अपितु इन स्थलरूपों पर क्रियाशील अपरदनात्मक एवं निक्षेपणात्मक प्रक्रमों की भी व्याख्या समयानुसार क्रमबद्ध विकास के आधार पर की जाती है।

           ज्ञातव्य है कि भू-आकृति विज्ञान में पृथ्वी सतह पर विद्यमान स्थलरूपों का, उनके ऐतिहासिक विकास क्रम का तथा उन प्रक्रमों का अध्ययन किया जाता है जिनसे स्थलरूपों का निर्माण होता है। इन प्रक्रमों में विवर्तनिक शक्तियाँ (उत्थान, अवतलन) अपक्षय, अपरदन, परिवहन और निक्षेपण महत्वपूर्ण हैं।

          भौतिक भूगोल और भूविज्ञान (Earth Sciences) दोनों से ही भू-आकृति विज्ञान घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है। भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों का स्थानिक पैमाने पर (उर्मिकाओं से लेकर पर्वतों तक) और कालिक पैमाने पर (सैकण्ड से लेकर लाखों वर्षों तक) अध्ययन किया जाता है। वस्तुतः स्थलरूप, जिन पदार्थों से बने हैं (शैल और आवरण सामग्री) तथा जो प्रक्रम एवं बल इन पदार्थों पर क्रियाशील रहते हैं, के बीच सन्तुलन के प्रतीक हैं।

           अपक्षय और अपरदन के प्रक्रम सम्मिलित रूप से क्रियाशील रहकर जहां एक ओर स्थलरूपों का विनाश करते हैं वहीं दूसरी ओर वे स्थलरूपों का सृजन अथवा निर्माण करते हैं। उल्लेखनीय है कि पृथ्वी सतह पर तल शैल अथवा आधार प्रस्तर (Bedrock) और मिट्टी जैसे निष्क्रिय पदार्थों पर जलवायु और भूपृष्ठीय गतियां (Crustal Dynamics) जैसे क्रियाशील कारकों के सक्रिय होने से स्थलरूपों का निर्माण होता है। विभिन्न प्रकार के भू-आकृति प्रक्रमों में गुरुत्व बल महत्वपूर्ण चालक शक्ति होती है।

           गुरुत्व बल के अतिरिक्त सूर्यताप तथा पृथ्वी के आन्तरिक भाग में विद्यमान ऊर्जा भी भू-आकृतिक प्रक्रमों के संचालन में सहायक होती है। पृथ्वी के आन्तरिक भाग में विद्यमान ऊर्जा भ्रंशन क्रिया को जन्म देती है। इस दृष्टि से पृथ्वी की उत्पत्ति, आकार, सौरमण्डलीय सम्बन्धों, गतियों, शक्तियों तथा प्रक्रियाओं का अध्ययन भी भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

         भूदृश्य या दृश्यभूमि के मानव कल्याणकारी उपयोग हेतु स्थलरूपों का अध्ययन एवं उनका सम्यक ज्ञान एक व्यावहारिक आवश्यकता बन गई है, विशेषकर वर्तमान समय में जबकि भूदृश्य में होने वाले कुछ परिवर्तन मानव एवं प्राकृतिक पर्यावरण के लिए विपत्तिकारक बन चुके हैं। इसी कारण से वर्तमान में मानवीय कार्यों के भू-आकृतिक प्रक्रमों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन भी इसके अन्तर्गत किया जाने लगा है।

विषय क्षेत्र:-

         विकासवादी भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों के विकास क्रम का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इसी के अन्तर्गत क्षेत्र के भू-आकृतिकीय विकास की प्रमुख घटनाओं का तिथिकरण किया जाता है।

         डेविस ने स्थलरूपों के विकास क्रम को अपरदन चक्र के द्वारा समझाया है, जिसमें तीव्र ढाल समय के साथ अन्ततः धीमे ढाल वाले पेनीप्लेन में बदल जाता है। अन्य भू-आकृति विज्ञानवेत्ताओं, जिन्हें अनाच्छादन कालक्रम विज्ञानवेत्ता (Denudation Chronologists) कहा जाता है, ने बताया है कि किस तरह प्रादेशिक स्थलरूप समय के साथ हुए अपरदन एवं भूपृष्ठीय सतह के उत्थान की तीव्रता अथवा दर के अनुरूप विकसित हुए हैं। इन्होंने भूतकाल की अपरदनात्मक सतहों पर तिथिकरण द्वारा स्थलरूपों के विकास को समझाने का प्रयास किया।

         कुछ भू-आकृति विज्ञानवेत्ताओं ने परिवर्तित जलवायु के प्रभावों द्वारा स्थलरूपों के विकास को समझाया है। जलवायवीय भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों और उनके ऊपर क्रियाशील भू-आकृतिक प्रक्रमों को प्रादेशिक जलवायवीय दशाओं से सम्बन्धित कर अध्ययन किया जाता है। जैसे ठण्डे क्षेत्रों में विद्यमान जलवायवीय दशाओं में हिमनद एक प्रभावी भू-आकृतिक प्रक्रम है जो भूदृश्य में परिवर्तन लाता है। इसी प्रकार वनस्पति विहीन रेगिस्तानी क्षेत्रों में पवन प्रमुख भू-आकृतिक प्रक्रम है।

           चट्टानों के प्रकार और भूगर्भिक संरचना (जैसे भ्रंश और वलन) के स्थलरूपों पर प्रभावों का अध्ययन संरचनात्मक भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है। अधिकांश भू-आकृतिक प्रक्रमों की क्रियाशीलता चट्टानों की कठोरता और कोमलता से प्रभावित होती है। इसी तरह अधिकांश ढाल रूप चट्टानों की कठोरता और विन्यास (Disposition) के अनुरूप विकसित होते हैं। स्थलरूपों पर क्रियाशील प्रक्रमों (जैसे अपक्षय, अपरदन) की तीव्रता और प्रकृति का अध्ययन प्रक्रम भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है। इसी में नदी बेसिनों और पहाड़ी ढालों पर होने वाले शैल पुंज प्रवाह (Mass Wasting) का अध्ययन किया जाता है। इन गतिशील प्रक्रमों की क्रियाविधि पर मानव के क्रियाकलापों से उत्पन्न प्रभावों का अध्ययन जैव-भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

        मानव ने अपनी गतिविधियों के द्वारा विभिन्न भू-आकृतिक प्रक्रमों की क्रियाविधि में परिवर्तन ला दिया है। भूमि उपयोग में परिवर्तन तथा वन विनाश से मृदा अपरदन बढ़ा है। इसी प्रकार अम्ल वर्षा से शैलों के विघटन की प्रक्रिया तीव्र हुई है। मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए भू-आकृति विज्ञान के व्यावहारिक ज्ञान के उपयोग का अध्ययन व्यावहारिक भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

        आज सम्पूर्ण विश्व में तटीय भागों में अपरदन, हिमनदों का पिघलना और उनकी गति का तीव्र होना, भूस्खलन, जल संयोजकों का अपरदन, बांधों में अवसादों का जमाव, मरुद्यानों और परिवहनों मार्गों पर बालुका स्तूपों का विस्तार, उत्खात भूमि का विस्तार, आदि जैसे समस्याओं की मॉनीटरिंग, पहचान और प्रबन्धन में व्यावहारिक भू-आकृति विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है।

प्रश्न प्रारूप

1. भू-आकृति विज्ञान को परिभाषित कते हुए इसके विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिये।

22. वाताग्र किसे कहते है? / वाताग्रों का वर्गीकरण

22. वाताग्र किसे कहते है? / वाताग्रों का वर्गीकरण


वाताग्र किसे कहते है?

        जब दो अलग-अलग स्वभाव अर्थात तापमान और आर्द्रता में भिन्न वाली वायुराशियाँ दो विपरीत दिशाओं से आकर अभिसरण करने का प्रयास करती हैं, तब वे पूर्ण रूप से मिश्रित नहीं हो पाती एवं उनके सीमांत प्रदेश में ढलुआं सीमा सतह का निर्माण होता है, जिसे ही वाताग्र कहा जाता हैं।

       इस प्रकार वाताग्र से आशय उस ढलुआं सीमा से है जिसके सहारे दो विपरीत स्वभाव वाली वायु-राशियाँ आकर मिलती है। जहाँ कहीं दो भिन्न वायु-राशियों का अभिसरण होता है वहाँ उनके बीच एक विस्तृत संक्रमणीय प्रदेश स्थापित हो जाता है। इस संक्रमणीय प्रदेश को ही वाताग्र प्रदेश अथवा वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र कहा जाता है।

        वाताग्र तथा वाताग्र उत्पत्ति के संबंध में कई विद्वानों ने अपने मत प्रकट किये है। प्रसिद्ध विद्वान पीटरसन के अनुसार, “वाताग्री सतह एवं धरातलीय सतह को अलग करने वाली रेखा को वाताग्र कहते हैं तथा जिस प्रक्रिया द्वारा वाताग्र की उत्पत्ति होती है उसे वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र कहा जाता है।”

       ट्रिवार्था के अनुसार “वाताग्र कोई रेखा नहीं अपितु वे पर्याप्त चौड़ाई वाले ऐसे क्षेत्र होते है जो 3 से 50 मील तक चौड़े होते है। इसके साथ ही वे क्षेत्र जहाँ दो भिन्न स्वभाव वाली वायु राशियाँ आमने-सामने से आकर अभिसरण करती है तो उस अभिसरण क्षेत्र को वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र कहा जाता है।”

    अतः स्पष्ट है कि वाताग्र न तो धरातल के ऊपर लम्बवत् रूप में होता है और न धरातलीय सतह के समान्तर ही पाया जाता है। इसके विपरीत वह कुछ कोण पर झुका हुआ होता है। वाताग्र का ढाल पृथ्वी की घूर्णन गति पर आधारित होता है जो ध्रुवों की ओर बढ़ता जाता है। इस प्रकार वाताग्र विपरीत स्वभाव वाली वायु-राशियों को अलग करने वाली ढलुआं सीमा सतह का ही दूसरा नाम है।

   ट्रिवार्था के अनुसार “The sloping Boundary surfaces separating contrusting air-masses are called surfaces of discontinuity of front.” वाताग्र अपनी उत्पत्ति के बाद कुछ विशिष्ट अवस्थाओं में नष्ट हो जाते हैं।

            वाताग्रों के इस प्रकार लोप होने की प्रक्रिया को वाताग्र-क्षय कहते है। किसी क्षेत्र-विशेष की जलवायु तथा मौसम को समझने के लिए आजकल जलवायु विज्ञान में वाताग्र का अध्ययन महत्वपूर्ण स्थान रखता है क्योंकि ये मौसम संबंधी विशिष्ट अवस्थाओं को जन्म देते हैं जिन्हें चक्रवातीय अथवा प्रतिचक्रवातीय अवस्थायें कहा जाता है। इस प्रकार वाताग्र चक्रवातों और प्रतिचक्रवाती के पालने कहे जाते हैं।

वाताग्र उत्पत्ति (Frontogenesis)

         वाताग्रों के बनने की क्रिया को वाताग्र उत्पत्ति कहा जाता है। मुख्य रूप से वाताग्रों की उत्पत्ति निम्नलिखित दो बातो पर आधारित होती हैं:-

1. भौगोलिक कारक (Geographical Factor):-

      जब दो भिन्न स्वभाव वाली वायुराशियों एक-दूसरे के समीप आती हैं तो वाताग्रों की उत्पत्ति होती है। दूसरे शब्दों में वाताग्रों की उत्पत्ति के लिए तापमान और आर्द्रता की दृष्टि से वायु राशियों में भिन्नता होना आवश्यक है।

2. गतिक कारक (Dynamic Factor ):-

      वाताग्रों की उत्पत्ति के लिए वायु राशियों में प्रवाह अर्थात् गति होना आवश्यक है। पीटरसन एवं बर्गरान नामक विद्वानों ने अपने अध्ययन के द्वारा इस बात को प्रमाणित किया है कि वायुराशियों की गति वाताग्रों को तीव्र बना देती है। इस प्रकार वाताग्र बनने के लिए अभिसरण की स्थिति का होना परम आवश्यक है।

वाताग्र-उत्पत्ति एवं वाताग्र-क्षय क्षेत्र (Areas of Frontogenesis and Frontolysis)

1. उत्पत्ति क्षेत्र:-

        जिन क्षेत्रों में दो भिन्न गुण वाली वायु-राशियाँ आकर परस्पर मिलती हैं अर्थात् अभिसरण करती हैं उन क्षेत्रों को वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र कहते हैं। उदाहरण के लिए जाड़े की ऋतु में पूर्वी एशिया, उत्तरी अमेरीका का पूर्वी तट एवं ग्रीनलैंड आदि वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र हैं।

2. क्षय क्षेत्र:-

          जिन क्षेत्रों में वायुराशियाँ अपसरित होती हैं उन क्षेत्रों में वाताग्रों का क्षय होने लगता है। अतः ऐसे क्षेत्रों को वाताग्र-क्षय क्षेत्र कहा जाता है। उदाहरण के लिए साइबेरिया तथा उत्तरी कनाडा आदि वाताग्र-क्षय क्षेत्र हैं।

वाताग्र

वाताग्र उत्पत्ति के लिए आवश्यक दशाएँ

     धरातल पर वाताग्रों की उत्पत्ति कुछ विशिष्ट दशाओं में ही होती हैं। प्रमुख रूप से इन दशाओं का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है-

1. तापमान की भिन्नता:-

       वाताग्र की उत्पत्ति के लिए दो विपरीत तापमान वाली वायु-राशियों का होना आवश्यक है। इसमें एक वायु-राशि ठण्डी और शुष्क तथा दूसरी वायु-राशि का गर्म तथा आर्द्र होना आवश्यक है। ये वायु-राशियाँ जब परस्पर मिलती हैं जो ठण्डी वायु-राशि गर्म तथा हल्की वायु-राशि को ऊपर उठा देती है जिससे वहाँ वाताग्र का निर्माण हो जाता है।

2. वायु-राशियों की विपरीत दिशा:-

      जब कभी वितरित तापमान वाली दो वायुराशियाँ विपरीत दिशाओं से आकर आमने-सामने मिलती है तो एक-दूसरे के क्षेत्र में घुसने की चेष्टा करती हैं। परिणामस्वरूप उनके मिलने के क्षेत्र में एक लहरनुमा वाताग्र बन जाता है। इसके विपरीत जब कभी दो भिन्न तापमान वाली वायु-राशियाँ आमने-सामने न मिलकर विपरीत दिशाओं की ओर चलने लगती हैं तो उस अवस्था में वहाँ वाताग्र का निर्माण नहीं हो सकता।

       प्रसिद्ध विद्वान पीटरसन ने विभिन्न पवन क्रमों को स्पष्ट कर यह बताने का प्रयास किया है कि किन अवस्थाओं में वाताग्र के निर्माण की संभावनायें होती हैं। वाताग्र निर्माण की सम्भावनाओं का विवेचन निम्नलिखित बिंदुओं के अन्तर्गत किया गया है-

(i) स्थानान्तरणी प्रवाह:-

        इस प्रकार के पवन प्रवाह में हवायें क्षैतिज रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान को एक ही दिशा में चलती है। इस दशा में तापमान की विपरीत अवस्था पैदा नहीं हो पाती। फलस्वरूप इस प्रकार के पवन प्रवाह से वाताग्र की उत्पत्ति नहीं होती।

(ii) घूर्णन प्रवाह:-

       इसमें हवायें चक्रवातीय और प्रतिचक्रवातीय रूप में प्रवाहित होती हैं। यद्यपि इस प्रकार के पवन प्रवाह में विपरीत तापमान की अवस्थायें होती हैं लेकिन फिर भी वाताग्र की उत्पत्ति नहीं हो पाती। क्योंकि इसमें हवायें विपरीत दिशाओं से आकर आमने-सामने नहीं मिलती।

(iii) अभिसरण तथा अपसरण:-

      जब हवायें चारों ओर से आकर एक ही बिन्दू पर मिलती हैं तो वह अभिसरण की स्थिति होती है। इस स्थिति में यद्यपि विपरीत तापमान की अवस्था रहती है फिर भी वाताग्र का निर्माण नहीं हो पाता है क्योंकि इस दशा में विपरीत तापक्रम एक रेखा के सहारे न होकर एक केन्द्र पर होता है जहाँ चारों ओर की हवायें आकर तापमान और आर्द्रता की आदर्श दशाओं को भंग कर देती हैं।

     इसके विपरीत जब हवायें एक बिन्दु से चारों ओर चलती हैं तो वे परस्पर कभी नहीं मिल पाती जिससे वहाँ वाताग्र का निर्माण कदापि सम्भव नहीं होता। हवाओं की इस स्थिति को अपसरण कहते हैं।

(iv) विरूपणी प्रवाह:-

      इस प्रकार के पवन प्रवाह में दो विपरीत तापमान वाली हवायें एक-दूसरे से क्षैतिज रेखा के सहारे आकर मिलती हैं। इस प्रकार की हवायें दो प्रकार की बाह्य प्रवाह अक्ष और अन्त प्रवाह अक्ष रेखायें बनाती हैं। वाताग्र निर्माण की दृष्टि से पवन-प्रवाह का यह क्रम सर्वाधिक अनुकूल होता है। फिर भी वाताग्र का बनना न बनना स्थान विशेष की प्राकृतिक स्थिति तथा अक्षांशों पर निर्भर करता है।

वाताग्रों का वर्गीकरण

वाताग्रों के प्रमुख लक्षण

     वाताग्र प्रदेशों में पाये जाने वाले वाताग्रों के मुख्य लक्षणों का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है-

1. वाताग्रों की गति:-

      यद्यपि मानचित्रों पर वाताग्र स्थिर दिखलाई देते है, किन्तु वस्तुतः वाताग्रों में गति होती है। ये प्रायः 50 से 80 किलोमीटर प्रति घण्टे की गति से चलते है। इस प्रकार वाताग्र एक दिन-रात अथवा 25 घण्टे में एक विस्तृत क्षेत्र को पार कर जाते है।

2. वाताग्रों की ऊर्ध्व गति:-

       वाताग्र क्षेत्र में वायु सदैव नीचे से ऊपर उठती रहती है। इस प्रकार ऊर्ध्व गति वाताग्रों का एक प्रमुख लक्षण है। इस गति के कारण वाताग्र क्षेत्र में ऊष्ण वायु शीतल वायु के ऊपर चढ़ती है क्योंकि उष्ण वायु हल्की एवं शीतल वायु भारी होती है। उष्ण व आर्द्र वायु के ऊपर उठने से मेघ बनते हैं और वर्षा होती है।

3. वाताग्रों की गहराई:-

      वाताग्रों की रचना करने वाली वायुराशियों में ऊपरी तलों की अपेक्षा निम्न तलों अर्थात् धरातल के समीप गति अधिक होती है। इसलिए वाताग्रों की रचना ऊपरी भागों में नहीं होती। सामान्यतः वाताग्रों की रचना 3,000 मीटर के ऊपर बहुत कम और 5,000 मीटर के ऊपर तो बिल्कुल ही नहीं होती।

4. वाताग्रों की चौड़ाई:-

         यद्यपि वाताग्रों की कोई निश्चित चौड़ाई नहीं होती। ये प्राय: 5 से 80 किलोमीटर तक चौड़े होते हैं।

5. वाताग्रों का भंग होना:-

       वाताग्र में दोनों ओर की वायु-राशियों के गुण भिन्न होते हैं। जब वायु-राशियों के अपने गुणों का फैलाव बहुत विस्तृत क्षेत्र में हो जाता है तो वाताग्र भंग हो जाते हैं। वायु-राशियों के गुणों में तापमान, वायुदाब, पवन-दिशा, प्रवणता आदि मुख्य हैं। वायु-राशियों के इन गुणों में परिवर्तन के साथ ही वाताग्र की समाप्ति हो जाती है।

वाताग्रों के प्रकार (Types of Fronts)

     तापमान और आर्द्रता की भिन्नता के आधार पर वाताग्रों को निम्नलिखित बिन्दुओं के अर्न्तगत विभाजित किया गया है:-

1. उष्ण वाताग्र (Warm Front):-

      जब आगे बढ़ती हुई उष्ण वायु-राशि किसी ठण्डा वायु-राशि के ऊपर चढ़ती है तो उसे उष्ण वाताग्र कहते हैं। उष्ण वाताग्र सदैव दायीं तरफ से बायीं तरफ आगे बढ़ता है। इसका ढाल मध्य अक्षांशों में प्राय: 1:100 से 1:400 अनुपात में पाया जाता है।

2. शीत वाताग्र (Cold Front ):-

         एक ही दिशा से आती हुई ठण्डी एवं उष्ण वायु-राशियाँ जब आपस में मिलती हैं और ठण्डी वायु-राशि आक्रामक होती हैं तो वह उष्ण वायु-राशि को ऊपर धकेल देती है। इसी को शीत वाताग्र कहा जाता है। इनका ढाल 1:25 से 1:100 तक होता है। इसमें वाताग्र शीतल से ऊष्ण भाग की ओर अर्थात् बायीं ओर से दायीं ओर बढ़ता है।

3. अवशिष्ट वाताग्र (Oecluded Front):-

       जब कभी शीत वाताग्र तीव्र गति से चलकर ऊष्ण वाताग्र से मिल जाता है तो ऊष्ण वायु ऊपर उठ जाती है और धरातल से उसका सम्पर्क समाप्त हो जाता है। इसी अवस्था को अवशिष्ट वाताग्र कहते हैं।

4. स्थायी वाताग्र (Stationary Front):-

      जब कभी दो विपरीत स्वभाव वाली वायु-राशियाँ एक-दूसरे के समान्तर चलकर एक वाताग्र के रूप में अलग हो जाती है तो ऐसी दशा में वायु ऊपर नहीं उठ पाती जिसे स्थायी वाताग्र कहते हैं।

वाताग्र प्रदेश (Frontal Zones)

     पृथ्वी तल पर उन प्रदेशों में वाताग्रों की उत्पत्ति होती है जहाँ वायु-राशियों के तापमान में अधिक अन्तर पाया जाता है और जहाँ वायु-राशियाँ अभिसरित होती हैं। पृथ्वी के धरातल पर चलने वाली वायु-राशियों और उनके मिलने के क्षेत्रों का वर्णन निम्नलिखित दिन्दुओ के अन्तर्गत किया गया है-

1. ध्रुवीय वाताग्र प्रदेश (Polar Frontal Zone):-

      यह प्रदेश दोनों गोलार्द्ध में 30° से 45° अक्षांशों के मध्य स्थित है। इस प्रदेश में ध्रुवीय ठण्डी वायु-राशि तथा ऊष्ण कटिबंधीय गर्म वायु-राशि के मिलने से ध्रुवीय वाताग्र का निर्माण होता है। इनका विस्तार उत्तरी अटलांटिक महासागर तथा उत्तरी प्रशान्त महासागर में अधिक पाया जाता है। ये वाताग्र जाड़ों में अत्यधिक सक्रिय होते हैं किन्तु गर्मियों में शिथिल हो जाते हैं।

2. आर्कटिक वाताग्र प्रदेश (Arctic Frontal Zone):-

        ध्रुव वृत्तीय क्षेत्रों में महाद्वीपीय ध्रुवीय हवायें तथा सागरीय ध्रुवीय हवायें परस्पर मिलती है। इसी से यहाँ वाताग्रों का निर्माण होता है। इन दोनों वायु-राशियों के तापमान में विशेष अन्तर नहीं पाया जाता। परिणामस्वरूप यहाँ वाताग्र अधिक सक्रिय नहीं होते। इन वाताग्रों का विस्तार मुख्यतः यूरेशिया तथा उत्तरी अमेरीका के उत्तरी भागों में पाया जाता है।

3. आन्तरिक उष्ण कटिबंधीय वाताग्र प्रदेश (Inter Tropical Frontal Zone):-

     यह प्रदेश विषुवतीय रेखीय न्यून वायुदाब की पेटी में फैला हुआ है। यहाँ जब कभी उत्तरी-पूर्वी तथा दक्षिणी-पूर्वी व्यापारिक हवायें मिलती हैं तो वाताग्र का निर्माण हो जाता है। इस प्रकार यहाँ व्यापारिक हवाओं के अभिसरण के कारण वाताग्रों का निर्माण होता है। ये वाताग्र प्रदेश के मौसम के अनुसार ऊपर-नीचे सरकते रहते है।

निष्कर्ष:

     उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि वाताग्रों की उत्पत्ति कुछ निर्दिष्ट दशाओं के सम्यक रूप से अनुकूल होने पर ही होती है। इनमें विभिन्न विपरीत तापमान वाली दो वायु-राशियों की उपस्थिति तथा उनकी विपरीत प्रवाह दिशा मुख्य है। अन्यथा किसी एक के अनुपस्थित होने पर उनका बनना असंभव हो जाता है।

प्रश्न प्रारूप

प्रश्न 1. सीमाग्र क्या है? स्पष्ट कीजिए। (What do you mean by Front ? Explain.)

Or वाताग्र किसे कहते हैं? प्रत्येक की उत्पत्ति एवं लक्षणों की व्याख्या कीजिए। (What is Fronts? Describe the origin and characteristics of each.)

Or वाताग्र से आप क्या समझते हो? प्रमुख वाताग्र प्रदेशों का वर्णन कीजिए। (What do you understand by Fronts? Describe main Frontal Zones.)

Or, वाताग्रों का वर्गीकण कीजिए एवं उनकी विशेषताओं की विवेचना करें।


Read More:-

21. जलवायु परिवर्तन के विभिन्न प्रमाण

21. जलवायु परिवर्तन के विभिन्न प्रमाण

 (Evidences of Climatic Change)


जलवायु परिवर्तन के विभिन्न प्रमाण

         यह सनातन सत्य है कि अनुकूल जलवायु के कारण ही पृथ्वी पर जीवन संभव हो पाया है, लेकिन मानवीय और कुछ प्राकृतिक गतिविधियों के कारण जलवायु की दशा बदल रही है। इस स्थिति को जलवायु परिवर्तन (Climate change) की संज्ञा दी जाती है। हाल के वर्षों और दशकों में गर्मी के कई रिकॉर्ड टूट गए हैं: यूएन जलवायु रिपोर्ट 2019 इस बात की पुष्टि करती है कि रिकॉर्ड में साल 2019 दूसरा सबसे गर्म वर्ष था, और 2010-2019 सबसे गर्म दशक। वर्ष 2019 में वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) तथा अन्य ग्रीनहाउस गैसें नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थी। जलवायु में परिवर्तन के कारण ही विशालकाय जीव जैसे डायनासोर आदि जिनकी इस पृथ्वी पर बहुलता थी आज उपलब्ध नहीं है। इसी प्रकार राजस्थान के मरु प्रदेश में किसी समय हिमाच्छादन था। वातावरण की गैसों, धूलकणों तथा जलवाष्प की मात्रा में आये परिवर्तन और रूप में धरातलीय भौतिक दशाओं के परिवर्तन के परिणाम है। धरातलीय दशाओं के अतिरिक्त पृथ्वी के आन्तरिक भागों में होने वाला समस्थिति असंतुलन भी इसके लिए कुछ सीमा तक जिम्मेदार हैं। तारों, ग्रहों तथा उपग्रहों की स्थितियों में परिवर्तन भी पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करता है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन को प्रमुख रूप से तीन कारक प्रभावित करते हैं।

1. धरातलीय भौतिक दशाओं में परिवर्तन

2. सौर मण्डलीय स्थितियों में परिवर्तन

3. भूर्भिक दशाओं में परिवर्तन 

          उपरोक्त प्रभावी कारको का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

1. धरातलीय भौतिक दशाओं में परिवर्तन:-

      पृथ्वी के धरातल पर भौतिक दशाओं में परिवर्तन के प्रमुख कारण धरातल पर बनने वाली विशालकाय नदी जल परियोजनायें, राजमार्ग तथा रेलमार्ग, विशाल औद्योगिक संस्थान, वनों का समाप्त होना, प्रदूषण की वृद्धि, अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि, नगरीकरण व औद्योगीकरण, जलचक्र एवं नाइट्रोजन चक्रों का विनाश आदि है।

       मनुष्य अपनी क्रियाओं से वातावरण को प्रभावित करता है। मनुष्य प्रकृति का अंग है और प्राकृतिक संतुलन के बिना मानव अस्तित्व खतरे में है। यही कारण है कि पृथ्वी में अनियंत्रित वनों की कटाई से उष्ण कटिबंधीय वर्षा में परिवर्तन हुये है। नगरीकरण व औद्योगीकरण ने हरित पेटी संकल्पना प्रायः समाप्त कर दी है। अतः इन क्षेत्रों में ध्वनि, वायु तथा जल प्रदूषणों ने वायुमण्डलीय गैसों में ऑक्सीजन की कमी तथा कार्बन डाईआक्साइड की अधिकता कर दी है।

      इसी प्रकार पृथ्वी की आन्तरिक सतह से सिंचाई हेतु अत्यधिक जल निकास से तथा वर्षा द्वारा जल के पुनः सतह पर एकत्र न होने से जल चक्र विनष्ट हो जाता है और जल का स्तर लगातार गिरता जाता है। बड़े पैमाने पर कीटनाशकों के प्रयोग से वायुमण्डलीय दशाओं में परिवर्तन आता है। पृथ्वी में इनका निर्धारित प्रयोग वायु संतुलन ही स्थापित कर सकता है। चरनोबिल तथा भोपाल दुर्घटनायें विकिरण के प्रभाव को स्पष्ट करती है। इन से स्पष्ट हो चुका है कि गैस तथा परमाणु संयंत्रों से कितना विनाश हो सकता है। पृथ्वी से प्रेरित परीक्षण हेतु उपग्रहों, रॉकेटों तथा वायुयानों के बढ़ते दबाव से भी वायुमण्डलीय दशाओं में अन्तर आता है।

      ये सभी धरातलीय परिवर्तन कम या अधिक मात्रा में जलवायु के विभिन्न कारकों को प्रभावित करते हैं।

जलवायु परिवर्तन2. भूगर्भिक दशाओं में परिवर्तन:-

        पृथ्वी की सतह तथा वायु मण्डलीय परिवर्तनों का प्रभाव आन्तरिक भागों में पड़ता है। ज्वालामुखी तथा भूकम्पों की संख्या में लगातार वृद्धि पृथ्वी के अन्दर होने वाले परिवर्तनों को सिद्ध करती है। अब तक प्राप्त ज्ञान के अनुसार ज्वालामुखी तथा भूकम्पीय दशाओं का प्रभाव प्रायः पृथ्वी की कमजोर पर्त वाले भागों में होता था। परन्तु अब अत्यन्त ठोस तथा स्थिर भूभागों में भी भूकम्प तथा ज्वालामुखी उद्गार देखने को मिलते हैं। जर्जिया का भूकम्प इसका नवीनतम उदाहरण है। पृथ्वी में होने वाली अपरदन निक्षेपण तथा समस्थिति परिवर्तन आदि कारकों के साथ-साथ विशाल जल परियोजनायें, परमाणु परीक्षणों तथा बड़े पैमाने पर होने वाली उत्खनन क्रियाओं के फलस्वरूप पृथ्वी के बाह्य तथा आन्तरिक भागों में संबंध परिवर्तित हो रहे हैं। इन परिवर्तनों से आन्तरिक क्रियायें तीव्र हो जाती है। आन्तरिक क्रियाओं से होने वाले उद्गार एवं झटके पृथ्वी की सतह पर वायु-ताप तथा जलवायु आदि दशाओं में परिवर्तन करते हैं।

जलवायु परिवर्तन

3. सौर मण्डलीय स्थिति में परिवर्तन:-

        तारों, ग्रहों, उपग्रहों, नीहारिकाओं, उल्काओं आदि के मध्य प्राकृतिक संतुलन पाया जाता है। इस संतुलन के पीछे सौरमण्डलीय निरक्षेप तथा सापेक्षिक गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। सौर परिवार के अन्तर्गत सूर्य धब्बों के प्रभाव से पृथ्वी पर औसत ताप बढ़ जाता है। इसी प्रकार ग्रहों के परिभ्रमण मार्ग में आने से सापेक्षिक आकर्षण बढ़ता है, इससे भी वायुदाब कम तथा तापीय असंतुलन बढ़ जाता है। चन्द्रमा में पाये जाने वाले धब्बों का प्रभाव भी पृथ्वी पर पड़ता है। वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हुआ है कि पृथ्वी की सूर्य तथा चन्द्रमा के सन्दर्भ में स्थिति से पृथ्वी पर तापीय असंतुलन बढ़ता है। खगोलशास्त्रीय अध्ययनों से सिद्ध हो चुका है कि सौर मण्डलीय प्रभावों से वायुमण्डलीय परतों में गैसीय अनुपात असंतुलित हो रहा है।

जलवायु परिवर्तन

निष्कर्ष:-

      निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि ओजोन परतों का पतला पड़ना, पृथ्वी में औसत तापमान का बढ़ना, हरित गृह प्रभाव में अनवरत वृद्धि, उष्णकटिबन्धीय वर्षा की मात्रा में स्थानिक एवं कालिक अन्तर, नगरीय तथा वनों की स्थितियों में परिवर्तन आदि पृथ्वी में जलवायु परिवर्तन के स्पष्ट संके है।

प्रश्न प्रारूप

1. जलवायु परिवर्तन के विभिन्न प्रमाणों का उल्लेख करें।


Read More:-

18. Coastal Topography / समुद्र तटीय स्थलाकृति

18. Coastal Topography

(समुद्र तटीय स्थलाकृति) 

Coastal Topography


             स्थलाकृति के विकास के पांच प्रमुख दूतों में से एक दूत समुद्री तरंग है। समुद्री तरंग के द्वारा स्थलाकृतियों का निर्माण तटीय क्षेत्रों में होता है। इसीलिए समुद्री तरंग से निर्मित स्थलाकृति को तटीय स्थलाकृति कहते हैं। समुद्री तरंग के द्वारा अपरदित एवं निक्षेपित दोनों प्रकार के स्थलाकृति का निर्माण होता है। समुद्री तरंग प्रायः ऊपरी भागों का अपरदन करती है जबकि निचली भागों में निक्षेपण का कार्य करती है। समुद्री तरंग अपरदन का कार्य मुख्यतः 5 प्रक्रियाओं से करती है। जैसे-
(1) संक्षारण
(2) अपघर्षण
(3) सन्निघर्षण
(4) जल गतिक दबाब
(5) टूटते हुए लहरों के दवाब द्वारा इत्यादि।
                 
                तटीय भागों में अपरदन एवं निक्षेपण का कार्य कई कारकों पर निर्भर करता है। जैसे-
(i) तटीय भाग में प्रहर करने वाले तरंगों की आकार एवं उसमें व्याप्त ऊर्जा की मात्रा पर
(ii) तटीय प्रदेश की ढाल पर
(iii) तट रेखा की ऊँचाई पर
(iv) तटीय प्रदेशों की चट्टानों की संरचना पर
(v) तटीय प्रदेश में जल की गहराई पर
(vi) कहीं-कहीं तटीय क्षेत्रों में कई जीव-जंतु छिद्र बनाकर निवास करते हैं। ऐसी जीव तटीय क्षेत्रों में अपरदन के लिए अनुकूल परिस्थिति का निर्माण करते हैं।
               समुद्री तरंगों के द्वारा तटीय क्षेत्रों में दो प्रकार की स्थलाकृति विकसित होते हैं-
(A)अपरदनात्मक स्थलाकृति और
(B) निक्षेपात्मक स्थलाकृति
(A)अपरदनात्मक स्थलाकृति 
(1) गल्फ और खाड़ी (Bay)-
   
              तटीय क्षेत्रों में कठोर एवं मुलायम चट्टानों का वैकल्पिक जमाव समुद्री तरंग के सापेक्ष में दो प्रकार से संभव है।
(i) अगर कठोर एवं मुलायम चट्टान वैकल्पिक रूप से समुद्री तरंग के सापेक्ष में समानांतर अवस्थित हो तो समुद्री तरंग मुलायम चट्टानों को अपरदित कर खाड़ी का निर्माण करती है। जैसे- बंगाल की खाड़ी
       
         बंगाल की खाड़ी के पूर्वी भाग में मलाया प्रायद्वीप और पश्चिमी भाग में प्रायद्वीपीय भारत रूपी कठोर चट्टानें अवस्थित है। इन दोनों के बीच अवस्थित मुलायम चट्टानों को हिंद महासागर का जल अपरदित कर बंगाल की खाड़ी का निर्माण किया है। इसे नीचे चित्र में देखा जा सकता है।
(ii) दूसरी परिस्थिति के अनुसार तटीय क्षेत्रों में समुद्री तरंग के सापेक्ष में कठोर एवं मुलायम चट्टानों का जमाव लम्बवत हो तो समुद्री तरंग के प्रहार से पहले कठोर चट्टानों के अपरदन से एक निवेशिकों का विकास होता है निवेश का सेजल मुलायम चट्टानों के क्षेत्र में घोष कर चट्टानों के अपरदन से एक निवेशिका का विकास होता है। निवेशिका से जल मुलायम चट्टानों के क्षेत्र में घुसकर चट्टानों को अपरदित कर देती है और गल्फ का निर्माण करती है। जैसे- परसियन गल्फ। इसे इस चित्र में देखा जा सकता है- 
(2) समुद्री क्लिफ और तरंग घर्षित प्लेटफार्म-
            समुद्री तरंग तटीय भागों में अपने प्रहार के कारण चट्टानों को अपरदित करते रहती है। समुद्री तरंगों का जब तटीय भागों में स्थित खड़ी चट्टानों पर सतत प्रहार चलता रहता है तो उनके अपरदन से एक क्लिपनुमा संरचना का निर्माण होता है जिसे समुद्री क्लिप कहते हैं। जब समुद्री क्लिप का ऊपरी भाग असंतुलित होकर नीचे गिर जाती है तो “वेव कट प्लेटफार्म” का निर्माण करती है। समुद्री क्लिप सतत पीछे की ओर हटने की प्रवृत्ति रखती है जबकि वेव कट प्लेटफार्म सतत विस्तृत होने की प्रवृत्ति रखती है। इसे नीचे के चित्र में देखा जा सकता है-
(3) समुद्री गुफा- 
       जब तटीय भागों में कठोर चट्टानों के बीच-बीच में मुलायम चट्टान भी खड़ी अवस्था में स्थित हो तो समुद्री तरंग मुलायम चट्टानों को अपरदित कर गुफानुमा स्थलाकृति का विकास करती है, जिसे समुद्री गुफा कहते है।
(4) समुद्री मेहराव एवं तटीय स्तंभ- 
         तटीय भागों में चट्टानों काफी दूर तक कहीं-कहीं घुँसे हुए दिखाई देते हैं। अगर समुद्र में घुसे हुए चट्टान के बीच-बीच में मुलायम चट्टान और उसके चारों और कठोर चट्टान स्थित हो तो समुद्री तरंग उस प्रक्षेपित चट्टान के दोनों ओर प्रहार कर अपरदित कर देती है और मेहरावनुमा स्थलाकृति का निर्माण करती है जिसे “समुद्री मेहराव”कहते हैं। 
           जब समुद्री मेहराव का ऊपरी भाग असंतुलित होकर गिर जाता है तो चिमनी के समान कठोर चट्टाने समुद्र में खड़े दिखाई देते हैं जिन्हें समुद्री स्तंभ(Skerries) कहते हैं। इसे चित्र में देखा जा सकता है। 
(B) निक्षेपात्मक स्थलाकृति- 
          जब समुद्री तरंग तटीय क्षेत्रों से टकराकर पीछे की ओर लौटने लगती है तो वह जहाँ एक ओर कमजोर हो जाती है वहीं दूसरी ओर तटीय क्षेत्रों को काटकर लाई जा रही मलवा का निक्षेपण मंद ढाल वाले क्षेत्रों में प्रारंभ कर देती है। चट्टानों के निक्षेपण से तटीय क्षेत्रों में कई स्थलाकृति विकसित होते हैं। जैसे-
(1) स्पीट
(2) बालू रोधिका
(3) लैगून
स्पीट- 
       स्पीट बालू और पत्थर के टुकड़ों से बना बाँधनुमा स्थलाकृति है जो तट के लंबवत स्थित होता है। इसका एक भाग तट से जुड़ा होता है जबकि दूसरा भाग समुद्र की ओर प्रक्षेपित रहता है। अगर इसका आकार सीधा हो तो उसे सामान स्पीट कहते हैं। लेकिन जब समुद्री तरंगों के प्रहार की दिशा में परिवर्तन हो तो उससे टेढ़ी स्पीट का निर्माण होता है जिसे हुक कहते हैं।
         
             जब किसी एक ही स्थान पर सामान्य स्पीट और हुक स्थित मिलते हैं तो उसे संयुक्त या मिश्रित स्पीट कहते हैं।
बालू रोधिका & लैगून- 
         कभी-कभी जलमग्न तटीय भागों में समुद्री तरंगें बालू एवं कंकड़-पत्थर का निक्षेपण तट के समानांतर करती है लेकिन तट से थोड़ा अलग होती है तो वैसे निर्मित स्थलाकृति को बालू रोधिका कहते हैं। बालू रोधिका और तट के बीच के पीछे अवस्थित जलाशय को लैगून कहते हैं। भौगोलिक स्थिति के अनुसार बालू रोधिका तीन प्रकार का हो सकता है। जैसे – 
(i) संयोजक रोधिका- इसमें बालू रोधिका का दोनों किनारा स्थल से जुड़ा होता है। जैसे – केरल के एर्नाकुलम के पास। 
(ii) लुप रोधिका- जब किसी द्वीप के चारों ओर बालू रोधिका का विकास हो तो उसे लूप रोधिका कहते हैं। 
(iii) टोम्बोलो रोधिका- जब बालू रोधिका का एक भाग तट से और दूसरा भा किसी द्वीप से जुड़ा हुआ हो तो उसे टोम्बोलो रोधिका कहते हैं। 
निष्कर्ष-

          इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री तरंगों द्वारा किए गए अपरदन एवं निक्षेपण से तटीय क्षेत्रों में कई विशिष्ट स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।


Read More:

17. Karst Topography / कार्स्ट स्थलाकृति

17. Karst Topography

(कार्स्ट स्थलाकृति)



चुना प्रधान वाले क्षेत्रों को कार्स्ट प्रदेश के नाम से जानते हैं। कार्स्ट प्रदेश शब्द एड्रियाटिक सागर के पूर्वी भाग में स्थित चूना पत्थर युक्त मैदान से लिया गया है। युगोस्लाविया के लोग ही चुना पत्थर (limestone) मैदान को कार्स्ट नाम से संबोधित करते हैं।  

        कार्स्ट प्रदेश में भूमिगत जल (underground water)अपरदन का सबसे प्रमुख दूत (agent) होता है। कार्स्ट प्रदेश में बनने वाले स्थलाकृतियों का सबसे पहले 1911 ई०  में जे.डब्ल्यू. बीड  एवं 1918 ई० में जे. स्वीजिक  ने अध्ययन किया था। कार्स्ट स्थलाकृति का निर्माण उन्हीं प्रदेश में होता है जहाँ निम्नलिखित तीन परिस्थितियाँ रहती है:-

(i) जहाँ विलियन (soluble) करने वाली चुना प्रधान चट्टाने पाई जाती हो।

(ii) चुना प्रधान चट्टानों में संरोध (Joints) का विकास हुआ हो।

(iii) चुना प्रधान चट्टानों के नीचे अपारगम्य चट्टान (Impermeable) पाई जाती हो तथा उसके अंदर पर्याप्त ढाल का विकास हुआ हो।

        कार्स्ट स्थलाकृति में निम्नलिखित अपरदित एवं निक्षेपित स्थलाकृति का निर्माण होता है-

अपरदित स्थलाकृति

(1) लैपिज (Lapies)

(2) विलियन रन्ध्र (Swallow Holes) और घोलरन्द्र (Sink Holes)

(3) डोलाइन (Doline)

(4) युवाला (Uvalas)

(5) पोल्जे (Polje) 

(6) पोनोर (Ponor)

(7) अंधी घाटी (Blind Valley)

(8) पोल्जे (Polje)

(9) कार्स्ट खिड़की (Karst Window)

निक्षेपित स्थलाकृति

(1) स्टैलैक्टाइट (Stalactite)

(2) स्टैलेग्माइट (Stalagmite)

(3) कन्दरा स्तम्भ/ गुफा स्तम्भ (Cave Pillars)

(4) टेरारोसा (Tera Rosa)

अपरदित स्थलाकृति

लैपिज (Lapies):

     लैपिज स्थलाकृति की तुलना यारदांग से की जा सकती है। यह यारदांग के समान उबड़-खाबड़ स्थलाकृति है। लैपीज का विकास उसी चूना पत्थर प्रदेश में होता है जहाँ संरोध का विकास नहीं हो पाता है। संरोध के अभाव में चूना पत्थर जल के साथ घुल कर प्रवाहित हो जाती हैं और धरातल पर उबड़-खाबड़ स्थलाकृति का विकास होता है, जिसे लैपीज कहते हैं।

विलियन रन्ध्र और घोलरन्द्र:   

         जिस चूना प्रधान प्रदेश में संरोध का विकास होता है उन प्रदेशों में संरोध के ऊपरी भाग में चूना पत्थर युक्त चट्टान जल में घुलकर भूमिगत हो जाती है जिससे घोलरन्ध्र (Sink Holes) का निर्माण होता है। घोलरन्द्र का आकार एक कीप के समान होता है। लेकिन जब चुना पत्थर चट्टान का विलियन तेजी से होता है तो घोलरन्ध्र के स्थान पर विलियन रन्ध्र (Swallow Holes) का निर्माण होता है। विलियन रन्ध्र का आकार एक बेलन के समान होता है।

डोलाइन (Doline):

      डोलाइन घोलरन्ध्र का ही विकसित रूप है। इसका ऊपरी व्यास 30 फीट से 40 फीट तक होता है। इसकी गहराई 6 से 75 फीट तक होता है। डोलाइन एक अस्थायी झील के समान होता है। कुछ समय के बाद इसके जल संरोध के सहारे भूमिगत हो जाते हैं और झील सूख जाती है। युगोस्लाविया से अलग हुए सर्बिया राज्य में डोलाइन के अनेक उदाहरण मिलते हैं।

 

पोनोर (Ponor):

        डोलाइन के नीचे स्थित संरोध के सहारे जब जल भूमिगत होती है तो संरोध के किनारे स्थित चूना पत्थर का विलियन हो जाता है जिसके कारण संरोध काफी चौड़ा हो जाता है। इसी चौड़े संरोध वाले स्थलाकृति को पोनोर कहते हैं। अर्थात् पोनोर एक प्रकार का संरचनात्मक पाइप है, जो डोलाइन एवं उपसतही (Subsurface Cave) के मध्य विकसित होता है। इसका विकास भी संरोध के सहारे होता है। इसे गुफा का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।

 

युवाला (Uvalas):

    डोलाइन भी क्रमशः बड़ा होता जाता है। जब दो डोलाइन आसपास होते हैं तो बढ़ते-बढ़ते उनके बीच की दीवार टूट कर गिर जाती है और वे आपस में मिल जाते हैं। इससे एक वृहद् गड्ढे का निर्माण होता है, जो युवाला (Uvalas) कहलाता है।

      अर्थात् जब दो या दो से अधिक डोलाइन आपस में मिल जाते हैं तो एक विस्तृत गर्तनुमा स्थलाकृति का निर्माण होता है जिसे युवाला कहते हैं। युवाला का व्यास कई किलोमीटर तक हो सकता है। जल से भर जाने पर यह एक वृहद् झील के रूप में नजर आता है।

 
पोल्जे (Polje)

      अंधी गुफा के ऊपरी छत में घोलरन्ध्र के सहारे विकसित संरोध विलयन की क्रिया से चौड़ा होकर कार्स्ट खिड़की का निर्माण करती है। जब अंधी घाटी का ऊपरी छत धँस जाता है तो धँसान से निर्मित गर्त को पोल्जे कहते हैं।

      पोनोर के सहारे जब विलियन की क्रिया अति तीव्र हो जाती है तो धरातल और अपारगम्य चट्टान के बीच एक चौड़ी गुफानुमा स्थलाकृति का विकास होता है जिसे अंधी घाटी या अंधी गुफा कहते हैं। दूसरे शब्दों में, पोनोर का ही अति विस्तृत भाग अंधी घाटी या अंधी गुफा कहलाता है।

कार्स्ट खिड़की (Karst Window):

     गुफा स्तंभ के अभाव में जब कभी गुफा की छत का कुछ भाग ध्वस्त होकर गिर जाता है तो गुफा की छत में वृहद् छिद्र का निर्माण हो जाता है, जो ‘कार्ट खिड़की’ के नाम से जाना जाता है। इसे खिड़की इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसके द्वारा घरातल के ऊपर से भूमिगत जल-प्रवाह एवं अन्य उपसतही स्थल रूपों को देखा जा सकता है।

निक्षेपित स्थलाकृति

(1) स्टैलैक्टाइट (Stalactite)

(2) स्टैलेग्माइट (Stalagmite)

(3) कन्दरा स्तम्भ/ गुफा स्तम्भ (Cave Pillars)

(4) टेरारोसा (Tera Rosa)

      चुना प्रधान प्रदेशों में निक्षेपण की प्रक्रिया दो स्थानों पर संभव है:-

(i)  धरातल के ऊपर और

(ii) गुफा के अंदर।

     धरातल के ऊपरी भाग में स्थित चूना पत्थर युक्त चट्टानें घुलकर किसी निम्न प्रदेशों में निक्षेपित हो जाती है तो चूना पत्थर युक्त मिट्टी के मैदान का निर्माण करती है। चुना पत्थर युक्त मिट्टी को ही टेरारोसा कहते हैं और निर्मित मैदान को टेरारोसा का मैदान कहते हैं।

         ब्राजील के दक्षिणी पूर्वी भाग में टेरारोसा मैदान का विकास हुआ है। इसी मैदान में वहाँ बड़े पैमाने पर कहवा की खेती की जाती है।

     गुफा के अंदर निम्न प्रकार के निक्षेपित स्थलाकृति विकसित होते हैं।

(i)  स्टैलेक्टाइट

(ii) स्टैलेगमाइट

(iii) कन्दरास्तम्भ

(iv) ट्रेवर्टाइन (Travertine)

         स्टैलेगटाइट का निर्माण गुफा के छत के सहारे होता है जबकि स्टैलेगमाइट का निर्माण गुफा के निचली सतह पर होता है।

         जब स्टैलेक्टाइट और स्टैलेगमाइट आपस में मिल जाते हैं तो उससे स्तंभ का निर्माण होता है। जब अंधी गुफा के ऊपरी क्षेत्र में स्थित संरोध के सहारे जल भूमिगत होती है तो चूना पत्थर युक्त जल गुफा के सतह पर बूंद-बूंद टपकने की प्रवृत्ति रखती है। धरातल पर चुनायुक्त जल के गिरते ही जल वाष्पीकृत हो जाता है और चुना का निक्षेपण हो जाता है तो उससे निर्मत गुम्बदाकार स्थलाकृति को स्टैलेगमाइट कहते हैं।

     जब गुफा (कन्दरा) में गुफा के छत के सहारे निर्मित संरोध के सहारे भूमिगत होने वाले जल का रफ्तार काफी धीमी हो तो चुना का निक्षेपण मधुमक्खी के छत के समान गुफा के छत के सहारे हो जाता है जिसे स्टैलेगटाइट करते हैं।

  Karst Topography

     कालांतर में जब स्टैलेक्टाइट और स्टैलेगमाइट मिल जाते हैं तो उसे कन्दरा स्तम्भ करते हैं। जब गुफा के अन्दर चूना पत्थर प्रधान वाले क्षेत्रों में लंबे समय तक अपरदन एवं निक्षेपण का कार्य  चलता रहता है तो अंत में “अपरदन सह निक्षेपित मैदान” मैदान का निर्माण होता है जिसे कार्स्ट मैदान के नाम से जानते हैं। इसे समप्राय मैदान से तुलना की जा सकती है।

ट्रेवर्टाइन (Travertine):

     गुफा की सतह पर निक्षेपित चूना-प्रधान मलबों कोट्रेवर्टाइनकहते हैं। ये प्रायः सफेद, हल्का पीला या पीला-भूरा होते हैं। चूना या कार्बोनेट खनिज की प्रधानता के कारण ये मुलायम एवं पारगम्य होते हैं। बाद में, इन्हीं निक्षेपित मलबों द्वारा कार्स्ट मैदान का निर्माण होता है।

        समप्राय मैदान के समान ही यहाँ भी कठोर चट्टान के टीले मिलते हैं जिसे यूरोप के लोग हम्स (Hums), क्यूबा के लोग मेंगॉट या Hay Stack तक कहते हैं।

निष्कर्ष:

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि चुना पत्थर वाले प्रदेश में भूमिगत जल से अनेक प्रकार के अपरादित एवं निक्षेपित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

नोट: सर्वप्रथम अमेरिकी भूगर्भवेत्ता जे.डब्ल्यू. बीडे (J.W. Beede) ने सन् 1911 ई. में “कार्स्ट प्रदेश में अपरदन चक्र की संकल्पना” प्रस्तुत की थी। बाद में सन् 1918 ई. में, साइबेरियाई भूगोलवेत्ता जोवान स्वीजिक (Jovan Cvijic) ने यूगोस्लाविया के कार्स्ट क्षेत्र के अध्ययन के आधार पर “कार्स्ट चक्र की संकल्पना” को व्यवस्थित ढंग से सामने रखा।

बिहार के रोहतास पठार पर पायी जाने वाली गुप्त-धाम कंदरा भी अंतर्भौम गुफा का एक प्रमुख उदाहरण है।



Read More:

error: