Category SETTLEMENT GEOGRAPHY (बस्ती भूगोल)

2. Metropolitan Regions (मेट्रोपोलिटन क्षेत्र)

    2. Metropolitan Regions

(मेट्रोपोलिटन क्षेत्र)



     मेट्रोपोलिटन शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘महानगर’ अर्थात बड़े नगरों को ही महानगर कहा जाता है।

     भारतीय संविधान के 74वें संशोधन में महानगरीय क्षेत्र को “दस लाख या उससे अधिक की आबादी वाला क्षेत्र, जो एक या एक से अधिक नगर पालिकाओं के अंतर्गत आता हो और दो या अधिक नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायत या अन्य समीपवर्ती क्षेत्रों से मिलाकर बना हो, जिसे राज्य प्रमुख द्वारा लिखित अधिसूचना द्वारा महानगरीय क्षेत्र घोषित किया गया हो” के रूप में परिभाषित किया गया है।

      इस प्रकार भारत में दस लाख से अधिक आबादी वाले नगर महानगर कहलाता हैं। वर्तमान समय में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण से महानगरीय प्रदेश का महत्त्वपूर्ण स्थान है। विश्व के प्रायः सभी देशों में देश के आर्थिक विकास में महानगरीय प्रदेश की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इस प्रदेश में नगर के आस-पास का क्षेत्र भी सम्मिलित रहता हैं। महानगरीय प्रदेश के विकास में सबसे महत्त्वपूर्ण कारक यातायात के साधनों का विकास है। महानगरीय प्रदेश अर्थात् मेट्रोपोलिटन प्रदेशों में नगरों और उसके आस-पास के क्षेत्रों के बीच पारस्पारिक एवं अन्योनाश्रित संबंध रहता है।

     कोई भी वृहत् नगर अपने आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों में फैलता जाता है। नगरों के आकार में वृद्धि होने के साथ ही नगरों के क्रिया-कलापों में भी वृद्धि होने लगती हैं। इसके बाद नगरों के बाहर 20-30 कि.मी. की परिधि में स्थित सभी गांवों और छोटे-छोटे नगरों को मिला लिया जाता हैं। इस प्रकार नगर तथा नगर के संपूर्ण सम्मिलित नगरीय तथा ग्रामीण भाग को महानगरीय (Metropolitan) प्रदेश के नाम से जाना जाता हैं। उदाहरण के लिए दिल्ली NCR मेट्रोपोलिटन प्रदेश, मुम्बई मेट्रोपोटन प्रदेश, कोलकाता, चिन्नई, अहमदाबाद नगर के मेट्रापोलिटन प्रदेशों का नाम लिया जा सकता हैं।

     इस प्रदेश को नियोजन कहना अधिक उचित होगा क्योंकि संपूर्ण मेट्रोपोलिटन प्रदेश का वातावरण एक सा रहता है। अतः उसके विकास कार्य के लिए समस्त क्षेत्रों का समान रूप से विकास करने की आवश्यकता है। डिकिन्सन के शब्दों में यह महानगर प्रदेश आर्थिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण स्थान रखता हैं क्योंकि बड़े नगर आस-पास के छोटे नगरों पर अपना प्रभाव डालता है। पटना महानगर प्रदेश में स्थित दानापुर, फुलवारी, फतुहा आदि छोटे नगर प्रभावित होते हैं। इसी प्रकार दिल्ली मेट्रोपोलिटन प्रदेश में स्थित रोहतक, पानीपत सोनीपत, मेरठ, गजियाबाद, बुलंदशहर, फरीदाबाद, गुड़गांव, अलबर, रिवाड़ी आदि नगर दिल्ली से प्रभावित होते हैं।

नगरीकरण की प्रवृति:

      भारत में नगरीकरण की प्रवृति में तीव्रता आयी हैं। वर्ष 1981 ई. में भारत में 12 महानगर थे जो बढ़कर 1991 ई. में 23 और 2001 में 35 और 2011 में 53 हो गये। इन महानगरों में भारत की कुल नगरीय जनसंख्या का 1991 ई. में 32.54% तथा 2001 ई. में 37. 8% 2011 में 64.4% निवास करती है। 1981-91 के बीच इसकी जनसंख्या में 67.76% जबकि 1991-2001 में 52.69% की वृद्धि हुई है। 1941-51 में यह वृद्धि 121.56% हुई थी, 1981 ई. में इन 12 महानगरों की कुल जनसंख्या 42121700 थी जबकि 1991 ई. में यह बढ़कर 23 महानगरों में 70661259 तथा 2001 ई. में 35 महानगरों में 107881836 हो गयी और अब  2011 में 53 महानगरों में 16,07,00,000 (16.07 करोड़) हो गई।

     जनसंख्या का इतनी अधिक वृद्धि के कारण नगरों में अनेक समस्याओं का जन्म हुआ साथ ही नगर नियोजन भी असफल हो गया। नगर नियोजन का मुख्य उद्देश्य नगर के पुराने क्षेत्रों की दशा सुधारना होता है, जबकि मेट्रोपोलिटन प्रदेश में नये क्षेत्रों का समावेश होता है। अतः अब महानगरों की दशा सुधारने के साथ-साथ उसके आस-पास के क्षेत्रों की, जिसे मेट्रोपोलिटन प्रदेश (Metropolitan Region) कहते हैं, दशा में सुधार लाने की आवश्यकता समझी जाने लगी है।

     महानगर के पुराने क्षेत्र तथा नगरीय प्रदेश के नये क्षेत्रों की सेवाओं और सुविधाओं में काफी अंतर दिखने लगा है क्योंकि नये विकसित क्षेत्र में सुधार की संभावनायें अधिक पायी जाती है जबकि पुराने नगर के क्षेत्रों में सुधार लाने के लिए परिवर्तन की आवश्यकता हो जाती है जो बहुत ही कठिन हो जाता है। इसके विकास के लिये कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक हैं।

1. महानगरों तथा महानगरीय प्रदेशों का योजनाबद्ध एवं सीमाबद्ध विकास कार्य किये जाय जिससे नये तथा पुराने दोनों क्षेत्रों का समुचित विकास हो सके।

2. कार्य एवं उपयोगिता के आधार पर इन प्रदेशों की भूमि का उपयोग होना चाहिए।

3. विकास के लिए पूर्व निश्चित योजना बनायी जाय।

4. गंदी बस्तियों को नहीं पनपने दिया जाय।

5. नगर तथा उस प्रदेश की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर नियोजन कार्य किये जाय।

      किसी मेट्रापोलिटन प्रदेश में तीन संरचनात्मक कटिबंध (पेटी) होते हैं –

1. नगरीय क्षेत्र (Urban area)

2. ग्रामीण-नगर उपांत् (Rural-urbanfringe) तथा

3. समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्र (Peripheral rural area),

      मेट्रोपोलिटन प्रदेश में नगर का विस्तार सड़क तथा रेल के किनारे तीव्र गति से होता हैं फिर भी महानगरीय सीमा का निर्धारण एक कठिन समस्या है। अनेक विद्वानों ने इस प्रदेश का सीमांकन को अलग-अलग ढंग से किया है। भारत में इस प्रदेश की जनसंख्या दस लाख से अधिक मानी गयी हैं। इसमें नगर के आस-पास जितने भी छोट-छोटे नगर हैं तथा उससे सटे गांव है, उन सभी को मिलाकर महानगर (मेट्रापोलिटन प्रदेश) कहा गया है। भारत में वर्त्तमान (2015 ई.) समय में 57 महानगर है। इन महानगरों का प्रभाव क्षेत्र की आर्थिक एवं सामाजिक विशेषताऐं भी अलग-अलग रहती हैं। जैसे-

(i) महानगरों में मकानों की भीड़ तथा ऊँचे-ऊँचे मकान रहती है।

(ii) नगरीय जीवन में भी भारी गिरावट आ जाती हैं। इतना ही नहीं, नगरों के अधिकांश भाग जल, वायु एवं ध्वनि प्रदूषण से ग्रसित हो जाते हैं।

(iii) रेलवे स्टेशन, बस स्टैण्ड, हवाई अड्‌डे तथा मुख्य बाजारों में भारी भीड़ रहती हैं।

(iv) नगरों में दिनों-दिन पानी तथा बिजली आपूर्ति की समस्या जटिल होती जाती हैं।

(v) महानगरों में मनोरंजन स्थल का अभाव होने लगता है।

(vi) भूमि तथा मकानों के दामों में तेजी से बढ़ोतरी होने लगती है।

(vii) यातायात मार्गों पर नगर उपांत की बढ़ोतरी में तीव्रता आ जाती है।

(viii) नगरों में छोड़े गये उद्योग के लिए भूमि का अतिक्रमण होना प्रारंभ हो जाता है।

(ix) सामाजिक ढांचे के बदलाव की प्रवृति होने लगती हैं। लोग अपने काम में इतना व्यस्त हो जाते हैं कि उनके लिए अपने पड़ोसियों से बात करना कठिन हो जाता है। बहुत आवश्यक हुआ तो उनसे टेलिफोन पर बातें कर लेते हैं।

(x) टेलिफोन यहां की आवश्यक वस्तु हो जाती हैं तथा सभी मध्यमवर्ग के लोगों के लिए टेलिफोन सुविधा अनिवार्य हो जाती है। वर्तमान समय में टेलिफोन का स्थान मोबाइल ने ले लिया है।

(xi) नगर के मध्य भाग में आबादी का घनत्त्व बहुत रहता है। काम करने वालों में लगभग 50% लोग नगर के बाहर से अर्थात ग्रामीण नगरीय उपांत एवं ग्रामीण-नगरीय क्रमबद्धता (Rural Urban Fringe or Rural Urban Continuum) और सीमावर्ती क्षेत्र (Peripheral zone) से आते हैं, और रात में वे पुनः अपने-अपने घर लौट जाते है।

(xii) महानगरों में सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों से जनसंख्या का प्रवास तीव्र गति से होता है क्योंकि लोगों की यह धारणा रहती हैं कि नगरीय क्षेत्र में रोजगार की कमी नहीं रहती हैं।

(xiii) नगरीय सीमा के आस-पास अधिक किराया देने से बचने के लिए शयनागार (Dormitory) नगर का विकास होता है।

(xiv) महानगरों में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में दिनों-दिन घटती जाती है। जबकि महानगरों से सटे छोटे नगरों में बड़े नगरों की तुलना में महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रहती है। ऐसा इसलिए होता है कि सीमावर्ती क्षेत्रों से पुरुष श्रमिकों का पलायन तीव्र गति से होता है। महिलायें घर में रहती हैं और पुरुष रोजगार की तलाश में बाहर चला जाता हैं।

(xv) अन्य नगरों की भांति महानगर भी उस प्रदेश की सांस्कृतिक एवं सामाजिक स्थितियों का सही प्रतिनिधित्त्व करता है क्योंकि किसी भी महानगर का अस्तित्व महानगरीय प्रदेश के प्रभाव क्षेत्र पर निर्भर करता है जो नगर से 20-30 कि. मी. की दूरी तक चारों ओर फैला रहता हैं। महानगर ही इस प्रदेश को आर्थिक एवं सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

      यहां कई छोटे-बड़े सेवा केन्द्र विकसित होते हैं। जैसे- दिल्ली महानगर के आस-पास गाजियाबाद, गुड़गांव, सोनीपत, फरीदाबाद, आदि नगरों में अनेक प्रकार के उद्योग विकसित हुए हैं। यहां के उद्योग के विकास में दिल्ली महानगर का महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि दिल्ली में बाजार की सुविधा उपलब्ध हैं इसलिए आस-पास के नगरों में उद्योगों का विकास हुआ है। यही स्थिति प्रायः सभी महानगरों में तथा उसके सीमावर्ती प्रदेशों के साथ लागू होता है। यहां आवागमन की सुविधा का विकास होता है जिससे लोग कम खर्च एवं कम समय में एक स्थान से दूसरे स्थान तक आ जा सकते हैं। यहां झुग्गी-झोपड़ी की सख्या में भी तीव्रता से बढ़ोतरी होती है। दिल्ली से दूर-दूर तक व्यापारी लोग सामान ले जाते हैं। इसलिए दिल्ली के आस-पास के नगरों में उद्योग का विकास हुआ है।

    इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि महानगर से 20-30 कि.मी. की दूरी तक चारों तरफ महानगरीय प्रदेश (Metropolitan Region) का विस्तार रहता है, जहां से लोगों का रोजाना संपर्क बना रहता है। लोग रेल अथवा सड़क मार्ग से संपर्क बनाये रखते हैं।

    इस प्रकार महानगर तथा महानगरीय प्रदेश के बीच पारस्पारिक संबंध बना रहता है। महानगर के आस-पास से दूध, जलावन, हरी सब्जी, फल, अनाज आदि नगरों में आता है और सीमावर्ती क्षेत्र के लोग चिकित्सा, शिक्षा, मनोरंजन, बाजार आदि की सुविधा महानगरों से प्राप्त करते हैं। कुछ वर्षों में सीमावर्ती भाग महानगर में विलीन हो जाता है और पुनः महानगरीय प्रदेश का विस्तार होता है। जो महानगर जितना अधिक बड़ा होता हैं उसका महानगरीय प्रदेश भी उतना ही विकसित एवं विस्तृत होता है। महानगर के केन्द्र से जैसे-जैसे दूर जाते हैं लिंग अनुपात तथा जनसंख्या के घनत्त्व में कमी आ जाती है। महानगरीय प्रदेश में अनेक गहन कटिबंध (Zones) का विकास होता है जिसकी आर्थिक विशेषतायें अलग-अलग होती है।

    मुम्बई महानगर के आस-पास अनेक उपनगर पाये जाते हैं जहां विभिन्न प्रकार के उद्योगों का विकास हुआ है। इन उपनगरों से नगर में दूध, अंडा, मुर्गा, फल, सब्जी आदि भी आता है। 1991, 2001 तथा 2011 ई. में मुम्बई भारत का सबसे बड़ा नगर हो गया है। यहां 1991 ई. 35 लाख तथा 2001 ई. 56 लाख से भी अधिक जनसंख्या गंदी बस्तियों में रहती है। 20% जनसंख्या के रहने के लिए आवास नहीं है। एक लाख से अधिक लोग फुटपाथ पर रहते हैं।

      इस प्रकार महानगरीय प्रदेशों का आर्थिक महत्त्व बहुत ही अधिक है। यहां की 75% कार्यरत जनसंख्या अकृषित कार्य में लगी रहती हैं। महानगरीय प्रदेश किसी देश अथवा प्रदेश की नगरीकरण का द्योतक होता है। यह देश के आर्थिक विकास का सूचक है क्योंकि महानगरों के विकास पर औद्योगिकरण का प्रभाव पड़ता है। उद्योग वाले क्षेत्र में नगरीकरण की प्रवृति बहुत ही तीव्र रहती है। उसके साथ महानगरीय प्रदेश (Metropolitan Region) भी विकसित होता है। लोग गांवों से नगरों की ओर प्रवास करते हैं क्योंकि वहां यातायात, सुरक्षा, चिकित्सा, रोजगार, शिक्षा आदि की सुविधा रहती है। कुछ विद्वान महानगरीय प्रदेश को प्रभाव क्षेत्र (Umland) कहते हैं पर प्रभाव क्षेत्र का विस्तार बहुत अधिक दूर तक रहता है पर मेट्रोपोलिटन प्रदेश का विस्तार अपेक्षाकृत कम रहता है।

वृहत् मुम्बई (Greater Mumbai) प्रदेश (Metropolitan Region of Mumbai):-

     वृहत् मुम्बई की जनसंख्या 1991 में 12571720 थी जो बढ़कर 1995 में 151 लाख हो गयी। वर्त्तमान समय में मुम्बई का स्थान विश्व में सबसे बड़े नगरों में पांचवां है। इससे बड़ा दिल्ली महानगर है। यह भारत का एक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह है। अभी देश का लगभग 42% विदेशी व्यापार इसी बंदरगाह से होता है। यह देश के सबसे अधिक विकसित वृहत् नगरीय प्रदेश है। यहाँ अधिकांश वित्तीय संस्थायें तथा बैंकों का प्रधान दफ्तर (Head Office) केन्द्रित है। इस प्रदेश में राज्य का लगभग 69.2% नगरीय जनसंख्या निवास करती है। कुल औद्योगिक श्रमिकों का 2/5वां हिस्सा इसी प्रदेश में कार्यरत है। इसकी पृष्ठभूमि भी काफी विकसित है।

    मुम्बई सात द्वीपों में फैला हुआ हैं जहां पहले किसान तथा मछुआरे रहा करते थे। प्रारंभ में इसके सातों द्वीपों को परस्पर जोड़ दिया गया था तथा दो द्वीपों के बीच समुद्र के छिछले तथा संकरे गढ्ढे को भर दिया गया था। 1853 ई. में मुम्बई तथा थाने को रेल मार्ग द्वारा जोड़ दिया गया था। भारत के पश्चिमी तट पर मुम्बई एक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह है। यहां की जलवायु भी मातदिल है। दिसम्बर से फरवरी तक यहां का तापमान लगभग 20 से. रहता है तथा मार्च में मुम्बई का मौसम शुष्क हो जाता है। मई के बाद लगभग चार महीने तक वर्षा ऋतु का मौसम रहता है।

    बसीन, विरार, कल्याण, उड़ान, अरनाल, सतपती आदि मुम्बई के उपनगर है जो नगर को मछली, साग-सब्जी, दूध, अण्डे तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति करता हैं। मुम्बई नगरीय प्रदेश में प्रायः सभी उपनगर शयनागार नगरों के रूप में हैं। थाने, जो पहले उपनगर था, अब वह मुम्बई महानगर का मुख्य औद्योगिक क्षेत्र बन गया है। अतः वर्तमान समय में, महानगरीय प्रदेश में अनेक प्रकार के उद्योगों का विकास हुआ है। यहां से आस-पास के क्षेत्रों से कच्चा माल प्राप्त कर उद्योगों से तैयार माल देश तथा विदेशों के बाजार में भेजा जाता है। यहां रोजगार की भी सुविधा है और बाजार की भी है। इस प्रदेश में धन का भी अभाव नहीं है। इसलिए यह देश के महत्त्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ है।

     मुम्बई महानगर में जनसंख्या में भी तीव्र गति से वृद्धि हुई है। कहा जाता है पुर्तगाल के समय यहां लगभग दस हजार जनसंख्या थी बाद में अंग्रेजों के समय यह संख्या बढ़कर 60 हजार हो गयी। 1901 ई. यहां की आबादी 7.7 लाख थी जो बढ़कर 1951 ई. 23.2 लाख हो गयी। जनसंख्या की वृद्धि निम्न तालिका से स्पष्ट किया जा सकता है।

तालिका

वृहत् मुम्बई प्रदेश की जनसंख्या

वर्ष  जनसँख्या हजार में वृद्धि % प्रति दशक
1901 928
1911 1139 +23.8
1921 1380 +20.2
1931 1398 +1.3
1941 1801 +28.4
1951 2994 +66.2
1961 4152 +38.7
1971 5971 +43.8
1981 8243 +42.2
1991 12572 +52.5
2001 16368 +30.1
2011 18414 +30.1

       मुम्बई के आस-पास के उपनगरों की जनसंख्या में काफी वृद्धि हुई है। 1991 ई. में वृहत् मुम्बई की जनसंख्या 9910 हजार तथा 2001 ई. में 11914 हजार थी। शेष जनसंख्या इसके उपनगरों में थी। 1971 में 52% जनसंख्या नगरीय द्वीप में 28% भीतरी उपनगर में और 20% बाहरी उपनगर में थी। 1991 ई. में कुल जनसंख्या का 49% मुख्य द्वीपीय नगर में 29% भीतरी उपनगर में और 22% बाहरी उपनगर में थी। 1971 ई. में यहाँ जनसंख्या का घनत्व 13.6 हजार प्रतिवर्ग कि. मी. थी जो 1991 ई. में बढ़कर 16.4 एवं 2001 ई. 20. 3 हजार हो गयी थी। 2011 में 21000 प्रति वर्ग कि. मी. हो गयी।

     इस महाप्रदेश में लगभग 70% जनसंख्या शिक्षित है। 1981 ई. यहां प्रति 1000 पुरुष में 773 महिलायें थी जो बढ़कर 1991 ई. में 829 और 2001 में 823 हो गयी। जनसंख्या के वृद्धि के कारण यहां अनेक समस्यायें उत्पन्न हो गयी हैं। इन समस्याओं का निदान नहीं करने पर इस प्रदेश में जनसंख्या की वृद्धि अविवेक पूर्ण हो जायगी।

मुम्बई मेट्रोपोलिटन प्रदेश 3361 वर्ग कि. मी. में फैला हुआ हैं इसके उत्तर में शंसा नदी घाटी, दक्षिण में पाटल गंगा नदी, पूर्व में माठेरन पहाड़ी तथा पश्चिम में समुद्र है। यहां की जनसंख्या का 89% नगरीय है जिसमें 28 नगर और 847 गांव है। कुल मिलाकर यहां दस तहसील (तालुका) है।

      वृहत् मुम्बई में 1991 ई. में 1981 ई. की तुलना में 52.5 तथा 2001 ई. 1991 की तुलना में 30.1% जनसंख्या की वृद्धि हुई। यही वृद्धि यदि पूरे मुम्बई मेट्रोपोलिटन प्रदेश में मान ली जाय तो इस प्रदेश में जनसंख्या बहुत अधिक हो जायेगी जिसके कारण कई समस्यायें उत्पन्न होती है। जैसे-

1. मकानों की कमी तथा प्रति कमरा घनत्त्व में वृद्धि

2. औद्योगिक केन्द्रों का असमान वितरण

3. वायु एवं ध्वनि प्रदुषण में वृद्धि

4. विद्युत एवं पेयजल की आपूर्ति में कमी

5. भूमि की कीमतों में वृद्धि

6. मनोरंजन तथा खुले स्थानों की कमी

7. अभिगमनकर्त्ताओं में वृद्धि

8. हरी-पेटी के क्षेत्र में ह्रास तथा उस पर सड़क एवं मकानों का अतिक्रमण

9. नगरीय जीवन में भारी गिरावट

10. रेलवे स्टेशन, हवाई, अड्‌डा, बन्दरगाह जैसे सार्वजनिक स्थानों पर जनसंख्या का भारी जमाव

11. नगर के बाहरी क्षेत्रों में औद्योगिक केन्द्रों द्वारा भूमि का अविवेकपूर्ण अतिक्रमण

12. सामाजिक ढांचे में आपसी मेल का अभाव

13. द्रुतगामी आवागमन के साधनों में कमी

14. अपराधों में वृद्धि

15. रेल तथा सड़क दुर्घटना में वृद्धि

16. गंदी बस्तियों का विस्तार

17. पर्यावरण के संतुलन में ह्रास

     इस प्रकार मुम्बई महानगरीय प्रदेश में इन सभी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए इस प्रदेश का नियोजन करना चाहिए अन्यथा प्रदेश का अनियंत्रित विकास होने पर समस्यायें विकराल रूप धारण कर सकती है जिसका समाधान संभव नहीं होगा। नगरीय जीवन स्तर बिगड़ता चला जायेगा। गंदी बस्तियां बढ़ती चली जायगी और आर्थिक एवं सामाजिक स्तर गिरता चला जाएगा। नगरीय सुविधाओं का असमान वितरण होगा।

     इन्हीं सभी दुष्परिणामों से बचने के लिये मुम्बई महानगरीय प्रदेश के नियोजन की आवश्यकता है जिससे इस प्रदेश का संतुलित विकास हो सके। इस कार्य के लिए कुछ नये कदम उठाने की आवश्यकता है। जिसमें निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण है।

1. बढ़ती हुई जनसंख्या के लिये नये आवास कॉलनी बनाने की आवश्यकता पर बल देना होगा।

2. औद्योगिक ईकाईयों की स्थापना प्रदेश के प्रायः सभी क्षेत्रों में करनी होगी जिससे औद्योगिक ईकाईयों के वितरण में संतुलन बना रहे। ऐसा करने से उस प्रदेश में जनसंख्या का वितरण संतुलित हो सकेगा।

3. नगर में आर्थिक क्रियाओं के विकेन्द्रीकरण की आवश्यकता है जिससे जनसंख्या का खिंचाव एक जगह केन्द्रित नहीं हो बल्कि अनेक केन्द्रों की ओर आकर्षित हो।

4. अभिगमनकर्त्ताओं (Daily Commuters) की संख्या में कमी करने के लिए आर्थिक क्रियाओं का विकेन्द्रीकरण आवश्यक है तथा अभिगमनकर्त्ताओं की संख्या में कमी लाने का भी प्रयास करना आवश्यक हो जाएगा। यह भी उद्योग एवं आर्थिक क्रियाओं के विकेन्द्रीकरण से ही संभव है।

5. नये बन्दरगाह का निर्माण किया जाना चाहिए जिससे जनसंख्या का संतुलित वितरण हो सके।

6. पूरे प्रदेश में नगर तथा नगरीय प्रदेश के बीच यातायात की सुविधा में विकास करने की आवश्यकता है।

7. प्रदेश में अनेक नये नगरों का विकास करना होगा जिससे जनसंख्या का संतुलित वितरण हो सके।

8. प्रदेश में मुम्बई की तरह अन्य नगरों का भी विकास करने की आवश्यकता है।

9. सामाजिक विषमता को दूर करने का भी प्रयास आवश्यक है।

10. कल्याण, कोलशेट, बालखून, खौपौली मीरा-ममडार आदि नगरों को औद्योगिक नगर के रूप में विकसित करना भी इस प्रदेश के नियोजन में शामिल किया जाना चाहिये।

11. नये बन्दरगाह बनाकर उसके पास नया मुम्बई नगर की स्थापना भी इस नियोजन में शामिल है क्योंकि इससे मुम्बई नगर पर बढ़ते दबाव को रोका जा सकता है।

    मुम्बई महानगरीय प्रदेश नियोजन के अंतर्गत नये मुम्बई नगर की (New, Mumbai) स्थापना की गयी है। यह नगर थाने की संकरी घाटी के पूर्वी किनारे पर बसायी गयी हैं। इसके एक ओर कोल्बा बेलपुर सड़क मार्ग है तथा दूसरी ओर आवासीय क्षेत्र विकसित किया गया है। मुम्बई से पूना जाने वाली सड़क मार्ग इस नगर के मध्य से जाता है जो थाने के संकरी खाड़ी पर बने पुल से होता हुआ गुजरता है। इस नये नगर के आवासीय क्षेत्र को कई सेक्टर में बांटा गया है। प्रत्येक सेक्टर में हर प्रकार की नगरीय सुविधायें उपलब्ध है।

      यहां तीन बड़े व्यापारिक क्षेत्र हैं- उत्तरी भाग, दक्षिणी भाग तथा मध्य भाग। हरी-पेटी के निकट पार्क बनाये गये हैं तथा खुला मैदान भी छोड़ दिया गया है जहां लोग शाम अथवा सुबह में खुली हवा का आनन्द ले सकते हैं। यहां न्हेवा-शेवा नाम का एक नया बंदरगाह विकसित किया गया है जिससे इस नये नगर को विकसित होने में मदद मिल सकेगी।

    प्रशासन से संबंधित कुछ कार्यालय को जो मुम्बई में स्थित था, उसे नये नगर में स्थानान्तरित किया गया है जिससे पुराने मुम्बई नगर पर जनसंख्या के दबाव को कम किया जा सके। यह नया नगर 5000 हेक्टयर भूमि में विकसित किया गया हैं जिसकी लम्बाई 20 कि. मी. है। इस नये नगर को मुम्बई नगर की तरह हर प्रकार की सुविधायें प्रदान की जाती हैं और भविष्य में भी ऐसी सुविधायें मिलती रहेगी जिससे अंर्त्तराष्ट्रीय स्तर पर भी यह नया मुम्बई नगर पुराने मुम्बई महानगर की तरह महत्त्वपूर्ण रह सकेगा।



नोट:

1. नगरीय क्षेत्र (Urban area):-

            नगरीय क्षेत्र का तात्पर्य उस सामूहिक अधिवासीय स्थल से है जहाँ की दो-तिहाई जनसंख्या द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों  में संलग्न रहती है। यहाँ पर द्वितीय एवं तृतीय कार्यों का तात्पर्य उद्योग, निर्माण, विनिर्माण, परिवहन, वाणिज्य व व्यापार एवं सेवा क्षेत्र से है।

2. ग्रामीण-नगर उपांत् (Rural-Urban Fringe):-

        “ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र” का शाब्दिक अर्थ है- नगरों की सीमाओं पर स्थित वह क्षेत्र जहाँ ग्रामीण एवं नगरीय भूदृश्य की विशेषताएँ देखने को मिलती है। दूसरे शब्दों में उपान्त क्षेत्र वह क्षेत्र है जो नगर और ग्रामीण बस्ती के बीच में विकसित होते हैं तथा वहाँ पर नगरीय और ग्रामीण आर्थिक-क्रियाकलाप साथ-2 चलते रहती है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1942 ई० में बेहरबिन महोदय ने किया था।

           ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र को ग्रामीण नगरीय सांतत्य शब्द से संबोधित किया जाता है। इस संकल्पना में बताया गया है कि नगर के केन्द्र में विशुद्ध रूप से नगरीय संस्कृति होती है लेकिन ज्यों-2 नगर के केन्द्र से दूर जाते हैं त्यों-2 नगरीय संस्कृति या नगरीय विशेषता में कमी आते जाती है और ग्रामीण विशेषताएँ बढ़ने लगती हैं।

              दूसरे शब्दों में ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र मुख्यतः दो शब्दों का संग्रह है- उसमें से एक ग्रामीण उपान्त क्षेत्र एवं दूसरा नगरीय उपान्त क्षेत्र है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ग्रामीण- नगरीय उपान्त अतिक्रमण क्षेत्र का प्रतीक है। यह नगर के चारों ओर एक ऐसी संक्रमण पेटी का प्रतिनिधित्व करता है जो न तो पूर्णतया ग्रामीण है और न ही पूर्णतया नगरीय। इस प्रकार के संक्रमण पेटी में ग्रामीण एवं नगरीय दोनों प्रकार का वातावरण देखने को मिलता है।

3. समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्र (Peripheral rural area):-

         पेरिफेरल रूरल एरिया का मतलब है, “शहर के बाहर में स्थित ग्रामीण क्षेत्र” अर्थात शहरों के बाहरी इलाके में स्थित ग्रामीण इलाकों को ही समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्र कहते हैं।

भारत के 53 महानगरों की सूची:

  1. मुंबई

  2. दिल्ली

  3. कोलकाता

  4. चेन्नई

  5. बेंगलुरु

  6. हैदराबाद

  7. अहमदाबाद

  8. पुणे

  9. सूरत

  10. जयपुर

  11. कानपुर

  12. लखनऊ

  13. नागपुर

  14. इंदौर

  15. भोपाल

  16. पटना

  17. लुधियाना

  18. आगरा

  19. वाराणसी

  20. मेरठ

  21. प्रयागराज (इलाहाबाद)

  22. गाज़ियाबाद

  23. नोएडा

  24. फरीदाबाद

  25. गुरुग्राम

  26. अमृतसर

  27. जालंधर

  28. देहरादून

  29. हरिद्वार

  30. चंडीगढ़

  31. पंचकूला

  32. मोहाली

  33. श्रीनगर

  34. जम्मू

  35. रांची

  36. जमशेदपुर

  37. धनबाद

  38. बोकारो

  39. दुर्ग–भिलाई

  40. रायपुर

  41. बिलासपुर

  42. विशाखापट्टनम

  43. विजयवाड़ा

  44. गुंटूर

  45. तिरुपति

  46. कोयंबटूर

  47. मदुरै

  48. तिरुचिरापल्ली

  49. सलेम

  50. कोच्चि

  51. तिरुवनंतपुरम

  52. कोझिकोड

  53. मल्लापुरम

23. Christoller’s Central Place Theory (क्रिस्टॉलर का केन्द्रीय स्थल सिद्धांत)

23. Christoller’s Central Place Theory

(क्रिस्टॉलर का केन्द्रीय स्थल सिद्धांत)



         केन्द्रीय स्थल सिद्धांत मूलत: नगरीय भूगोल से संबंधित है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन क्रिस्टॉलर महोदय ने दक्षिण जर्मनी के नगरों के स्थानीयकरण के प्रतिरूप का अध्ययन कर (1933 ई०) में प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत के अनुसार केन्द्रीय स्थलों का वितरण षष्टकोणीय और पदानुक्रमिक तरीके से होता है।

    क्रिस्टॉलर ने केन्द्रीय स्थल की परिभाषा देते हुए बताया कि वैसा नगर जो किसी भौगोलिक क्षेत्र में कई बस्तियों के बीच में होता है तथा अन्य बस्तियों को सेवा प्रदान करती है एवं द्वितीयक तथा तृतीयक कार्यों का केन्द्र बिन्दु होती है।

   क्रिस्टॉलर के अनुसार केन्द्रीय स्थल का सिद्धांत उन्हीं क्षेत्रों में लागू होती है जहाँ निम्नलिखित मान्यताएँ काम करती है।

मान्यताएँ

(1) भौगोलिक दृष्टि से वह क्षेत्र समरूपता रखता हो। सम्पूर्ण प्रदेश में संसाधन, जनसंख्या, उत्पादक एवं उपभोक्ताओं का वितरण लगभग समान रूप से हो।

(2) दूसरी मान्यता यह है कि केंद्रीय स्थल से किसी भी दिशा में जाने पर परिवहन मूल्य में दूरी और भार के अनुसार वास्तविक वृद्धि होती है। 

     ऊपर वर्णित शर्तों को पूर्ण करने वाले प्रदेश में ही यह सिद्धांत लागू होता है।

    क्रिस्टॉलर के केन्द्रीय स्थल सिद्धांत तीन परिकल्पनाओं पर आधारित है:

(1) बस्तियों का वितरण षष्टकोणीय होता है और षष्टकोणीय बस्ती के बीच में केन्द्रीय बस्ती अवस्थित होती है। इसे नीचे के चित्र में देखा जा सकता है।Christoller
   क्रिस्टॉलर के पूर्व यह मान्यता कार्य करता था कि किसी भी भौगोलिक प्रदेश के बीच में केन्द्रीय स्थल होता है और उसके प्रभाव क्षेत्र की बस्ती वृत के आकार में विकसित होते हैं।

    चित्र से स्पष्ट है कि पूर्व की मान्यता में छाया प्रदेश का विकास होता है। लेकिन किस्टॉलर के षष्टकोणीय परिकल्पना में छाया प्रदेश के विकास की कोई संभवना नहीं हैं।

(2) क्रिस्टॉलर की दूसरी परिकल्पना यह है कि षष्टकोणीय वितरण प्रारूप पदानुक्रमिक होता है अर्थात् इसे स्पष्ट करते हुए क्रिस्टॉलर ने कहा है कि केन्द्रीय बस्ती एक छोटे बाजार से लेकर एक वृहद बाजार (बड़े-2 महानगर) तक हो सकते हैं। हर हाल में केन्द्रीय स्थान षष्टकोणीय बस्तियों के बीच में होता है। इसे नीचे के मानचित्र से समझा जा सकता है

          क्रिस्टॉलर के अनुसार बस्तियों का सात पदानुक्रम में विकास होता है।

दानुक्रम बस्ती का नाम केंद्रीय स्थल की जनसंख्या दो केंद्रीय स्थल के बीच की दूरी प्रभाव क्षेत्र का क्षेत्रफल प्रभाव क्षेत्र की जनसंख्या
1. मार्केट (M)

(बाजार-कस्बा)

1000 7 KM. 45 KM2 2700
2. टाउनशीप सेंटर (A) 2000 12 KM. 135 KM2 8100
3. काउंटी सिटी(K) 4000 21 KM. 400 KM2 24000
4. जिला नगर (B) 10,000 36 KM. 1200 KM2 75000
5. स्टेट कैपिटल सिटी (G) 30,000 62 KM. 3600 KM2 225000
6. प्रोविन्सियल सिटी (P) 1,00000 108 KM. 10800 KM2 675000
7. रिजनल कैप्टल सिटी (L) 5,000 182 KM. 32400 KM2 22025000

(3) क्रिस्टॉलर का तीसरा महत्वपूर्ण परिकल्पना यह है कि केन्द्रीय स्थान के प्रभाव में आने वाले बस्तियों की संख्या का विश्लेषण तीन मान्यताओं आधार पर किया जाता है। जैसे :-

(i) बाजार सिद्धांत या K=3 सिद्धांत

(ii) परिवहन सिद्धांत या K=4 सिद्धांत

(iii) प्रशासन सिद्धांत या K=7 सिद्धांत

    K=3 सिद्धांत का तात्पर्य यह है कि सबसे छोटी केन्द्रीय बस्ती (बाजार केन्द्र) औसतन तीन गाँवों को बाजार की सुविधा प्रदान करती है। पुन: जैसे-2 केन्द्रीय बस्ती के आकार में क्रमिक वृद्धि होती है। वैसे-2 उसके प्रभाव क्षेत्र में आने वाली बस्तियों का क्रमिक वृद्धि 3 के गुणनफल में होता है। जैसे- 3, 9, 27, 81 ……..।

     K=4 सिद्धांत का तात्पर्य है कि अगर केन्द्रीय बस्ती परिवहन के कारण विकसित हुआ हो तो वहाँ की सबसे छोटी परिवहन आधारित केन्द्रीय बस्ती 9 गाँव को सेवा प्रदान करेगी।

    पुन: जैसे-2 केन्द्रीय बस्ती के आकार में क्रमिक वृद्धि होगी। वैसे-2 बस्तियों की संख्या में 4 के गुणनफल में वृद्धि होगी।

   K=7 सिद्धांत का तात्पर्य है कि अगर कोई केन्द्रीय बस्ती प्रशासनिक दृष्टिकोण से विकसित हुआ हो तो सबसे छोटी प्रशासन पर आधारित केन्द्रीय बस्ती न्यूनतम 7 गाँवों को सेवा प्रदान करेगी। इसी तरह से ज्यों-2 केन्द्रीय बस्ती के पदानुक्रम में वृद्धि होते जायेगी। त्यों-त्यों 7 के गुणनफल में बस्तियों की संख्या में वृद्धि होते जायेगी।

K=3 सिद्धांत का विश्लेषण

    K=3 सिद्धांत अर्थात बाजार सिद्धांत का मूलभूत संकल्पना यह है कि षष्टकोण पर स्थित कोई भी बस्ती दो भुजाओं के मिलन केन्द्र पर होगी और कोई भी बस्ती तीन केन्द्रीय बस्ती से समान दूरी पर होगी। चूँकि षष्टकोण में छ: बस्तियाँ होती है और उनके तीन केन्द्रीय बस्तियों में सेवा वितरित होने की पूरी संभावनाएँ हैं। इसलिए एक केन्द्रीय बस्ती षष्टकोण की 6 बस्तियों में से दो बस्तियों की सेवा करेगा। इसके अलावे केन्द्रीय बस्ती स्वयं भी सेवा ग्रहण करेंगे। इस प्रकार से कुल तीन बस्तियों को केन्द्रीय बस्ती से सेवा मिलेगी। इसी के आधार पर K=3 सिद्धांत प्रतिपादित किया गया।

 

K=4 सिद्धांत का विश्लेषण

   K=4 सिद्धांत के अन्तर्गत यह माना गया है कि बस्तियाँ षष्टकोण के भुजाओं के मिलन केन्द्र पर न होकर भुजाओं के मध्य में स्थित होते हैं। ऐसी स्थिति में प्रत्येक बस्ती के लिए दो केन्द्रीय बस्ती समान दूरी पर होते हैं अर्थात् षष्टकोण छः बस्तियों में से प्रत्येक बस्ती का प्रभाव दो केन्द्रीय बस्ती में विभाजित हो जाती है और ऐसी स्थिति में 4 केन्द्रीय बस्ती से सेवा ग्रहण करते लगती है।

K=7 सिद्धांत का विश्लेषण

   K=7 सिद्धांत के अन्तर्गत माना गया है कि कोई भी बस्ती भुजा के मिलन बिन्दु या मध्य भुजा पर विकसित नहीं होती है बल्कि षष्टकोण के अन्दर विकसित होती है। चूंकि प्रशासनिक कार्य दो षष्ट कोण में विभाजित नहीं हो सकती है। इसलिए प्रशासन की सुविधा के हेतु एक षष्टकोण के अन्तर्गत कुल 7 बस्तियों प्रशासनिक क्षेत्र के अन्तर्गत आती हैं।

क्रिस्टॉलर सिद्धांत का परीक्षण

     क्रिस्टॉलर महोदय ने स्वयं यह बताया कि केन्द्रीय स्थल का सिद्धांत उसी क्षेत्र में लागू होगा जहाँ पर ऊपर में बताये गये मान्यताएँ कार्य करेंगी। अर्थात् उन्होंने स्वयं स्पष्ट कर दिया था कि उन‌का K-3, K-4 और K-7 का सिद्धांत विश्व व्यापी नहीं हो सकता क्योंकि इस सिद्धांत में बताये गये मान्यताएं पूर्ण रूप से लागू नहीं होती है।

   क्रिस्ट्रॉलर का सिद्धांत दक्षिणी जर्मनी में पूर्णतः लागू होती है क्योंकि वहाँ की भौगोलिक स्थिति एवं जनसंख्या वितरण में समरूपता पाई जाती है। भारत के UP और उत्तरी-पश्चिमी बिहार में यह सिद्धांत कुछ हद तक लागू होती है क्योंकि इस प्रदेश में भौगोलिक समरूपता एवं जनसंख्या का समान वितरण पाया जाता है।

लॉश का संशोधन

     क्रिस्टॉलर के सिद्धांत की जटिलताओं को समझते हुए लॉश महोदय ने बताया कि केन्द्रीय स्थल और बस्तियों का वितरण समान षष्टकोण में न होकर जालीनु‌मा षष्टकोण में वितरित होने की अधिक संभावनाएँ हैं।

   लॉश के अनुसार प्रत्येक केन्द्रीय स्थान के द्वारा किये जाने वाले प्रत्येक कार्य का प्रभाव समान रूप से सभी बस्तियों पर नहीं पड़ती है। लॉश ने यह भी स्पष्ट किया कि केन्द्रीय स्थल के ईर्द-गिर्द बस्तियों पर केन्द्रीय स्थल का प्रभाव नहीं पड़ता है बल्कि उसके द्वारा किये जा रहे कार्यों का प्रभाव पड़ता है। इसका परिणाम यह होता है कि एक ही केन्द्र के इर्द-गिर्द कई षष्टकोण का विकास हो जाता है जो देखने में जालीनुमा षष्टकोण लगता है।

आलोचना:-

(1) बेरी और गैरीसन ने केन्द्रीय स्थल का आलोचना करते हुए कहा है कि नगरीय बस्तियों का षष्टकोण के रूप में वितरण होना अत्यन्त ही कठिन है क्योंकि उनके वितरण पर निम्नलिखित दो कारकों का प्रभाव पड़ता है-

(1) उपभोक्ताओं के आचारपरकता (व्यवहार) का

(2) उपभोक्ताओं के खरीद बिक्री करने की क्षमताओं का।

        ये दोनों कारक भौगोलिक दूरियों को संशोधित कर देती है। इसीलिए केन्द्रीय स्थल के इर्द-गिर्द बस्तियों का वितरण षष्टकोण के रूप में हो भी नहीं सकता।

(2) बेरी ने यहाँ तक कहा है कि जीवन-निर्वाह अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्र में भी यह संभव नहीं है।

(3) हाँलाकि क्रिस्टॉलर ने यह स्वीकार किया है कि उनका सिद्धांत वहीं पर लागू होगा जहाँ पर उनके द्वारा बताये गए शर्त लागू होंगे। लेकिन कहीं भी व्यवहारिक रूप में ये उनकी मान्यताएँ लागू होती ही नहीं है। वैसी स्थिति में उनका सिद्धांत उपयोगी नहीं रह पाता है।

(4) क्रिस्टॉलर के सिद्धांत की आलोचना इस आधार पर भी की जाती है कि किसी भी भौगोलिक प्रदेश में केन्द्रीय स्थल का विकास 7 पदानुक्रम में नहीं हो सकता।

निष्कर्ष:

      क्रिस्टॉलर के केन्द्रीय स्थल सिद्धांत की कुछ सीमाएँ अवश्य है। इसके बावजूद इस सिद्धांत की व्यापक मान्यता प्राप्त है क्योंकि इस सिद्धांत के आधार पर ही कई देश के सरकारों ने प्रादेशिक नियोजन का कार्य किया है तथा बोडोविले जैसे भूगोलवेता ने विकास ध्रुव का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इसके अलावे केन्द्रीय बाजार का वितरण पदानुक्रमिक होता है। यह भी एक उपयोगी संकल्पना है। इस तह इनके सिद्धांतों को अव्यवहारिक घोषित नहीं किया जा सकता है।


Read More:-

22. Multiple Nuclei Theory (बहुनाभिक सिद्धांत)

22. Multiple Nuclei Theory (बहुनाभिक सिद्धांत)



Multiple Nuclei       

       यद्यपि संकेन्द्रित क्षेत्र और खण्ड क्षेत्र सिद्धान्त को अपनी आकर्षक सरलता का लाभ मिला, किन्तु अधिकांश नगरों की संरचना में इतनी अधिक जटिलता एवं विविधता पाई जाती है कि उसका सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता है। 1945 में सी. डी. हैरिस और ई. एल. उल्मान ने नगरीय संरचना के विविध प्रारूपों पर लागू होने वाले बहुनाभिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

         इस सिद्धान्त के अनुसार नगर का भूमि उपयोग प्रतिरूप एक ही केन्द्र या नाभि के चारों ओर विकसित न होकर प्रायः कई अलग-अलग केन्द्रों के चारों ओर विकसित होता है। इस प्रकार के विकास से नगर की संरचना कोशिकीय (Cellular) हो जाती है। इस कोशिकीय संरचना का निर्धारण नगर के अवस्थान (Site) सम्बन्धी विलक्षण कारकों और ऐतिहासिक कारकों द्वारा होता है। हैरिस एवं उल्मान के अनुसार भिन्न-भिन्न केन्द्र या नाभिक कुछ नगरों में उत्पत्ति के समय ही अस्तित्व में आ जाते हैं जबकि कुछ नगरों में इनका विकास नगर की वृद्धि के साथ-साथ होता रहता है। नगरों में भिन्न-भिन्न केन्द्रों या नाभि तथा उन पर निर्भर भूमि उपयोग कटिबन्धों का बनना निम्नलिखित चार कारकों के संयोजन का परिणाम होता है:

(i) कुछ मानवीय क्रियाकलापों को विशिष्ट सुविधाओं की आवश्यकता होती है, जैसे- खुदरा व्यापार का क्षेत्र नगर में परिवहन की दृष्टि से सर्वाधिक गम्य स्थान के पास, बन्दरगाह अनुकूल सागरीय तट पर तथा विनिर्माण उद्योग विस्तृत भू-भाग और जल, स्थल तथा रेल मार्गों से संयोजित होने जैसी सुविधाओं पर ही विकसित होते हैं।

(ii) कुछ क्रियाएँ साथ-साथ पाई जाती हैं, क्योंकि उन्हें सम्बद्धता से लाभ प्राप्त होता है। जैसे, वित्तीय संस्थान एवं कार्यालयों के क्षेत्र यातायात एवं संचार सुविधाओं की उपलब्धता पर निर्भर होते हैं।

(iii) कुछ भिन्न प्रकृति की क्रियाएं एक-दूसरे के लिए हानिकारक होती हैं। इस दृष्टि से औद्योगिक क्षेत्र एवं उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र का विरोधाभास सर्वविदित है। खुदरा व्यापार क्षेत्र में पैदल चलने वालों, दो पहिया वाहनों और कारों का भारी जमाव पाया जाता है, जो कि थोक व्यापार क्षेत्र के लिए आवश्यक रेल मार्ग सुविधाओं, विस्तृत स्थान एवं भारी सामान को लादने एवं उतारने जैसी क्रियाओं के प्रतिकूल है।

(iv) कुछ क्रियाएँ सर्वाधिक वांछनीय स्थलों को ऊँचा किराया या मूल्य देने में असमर्थ होती हैं। यह कारक इन क्रियाओं के अन्यत्र संयोजन का कार्य करता है। जैसे, थोक व्यापार एवं भण्डारण जैसी क्रियाओं के लिए अधिक कमरों या बहुत अधिक स्थान की आवश्यकता होती है, जो कि केन्द्र के निकट सम्भव नहीं है। इसी प्रकार निम्न आय वर्ग के आवास ऊंचे भूमि मूल्यों के कारण उच्च आय वर्ग के आवासीय क्षेत्र में स्थापित नहीं होते हैं।

        नाभिकों या केन्द्रों की संख्या विभिन्न नगरों में भिन्न-भिन्न होती है। इनकी संख्या ऐतिहासिक विकास तथा अवस्थिति शक्तियों का परिणाम होती है। नगर जितना बड़ा होता है, उसमें उतने ही अधिक एवं विशिष्ट केन्द्र मिलते हैं। हैरिस एवं उल्मान के अनुसार नगरों में केन्द्रों के चारों ओर विकसित होने वाले क्षेत्र निम्नलिखित हैं:

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र (Central Business District)

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण औद्योगिक क्षेत्र (Wholesale and Light Manufacturing)

3. भारी उद्योग क्षेत्र (Heavy Manufacturing)

4. उपनगर एवं अनुषंगी नगर (Suburb and Satellite)

5. लघु नाभि केन्द्र (Minor Nuclei)

6. आवासीय क्षेत्र (Residential)

7. भारी व्यापारिक पेटी (Heavy Business District)

8. रिहाइशी उपनगर (Residential Suburb)

9. औद्योगिक उपनगर (Industrial Suburb)

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र:-

       यह क्षेत्र अन्तरानगरीय यातायात सुविधाओं के केन्द्र में स्थित होता है। यह नगर के विभिन्न भागों से यातायात द्वारा जुड़ा होता है और नगर के सभी भागों से गम्य होता है। यहाँ भूमि का मूल्य सर्वाधिक होता है। डिपार्टमेण्टल स्टोर, वेरायटी स्टोर, रेडीमेड वस्त्र स्टोर, सर्वाधिक खुदरा व्यापार एवं सर्वाधिक ग्राहक संख्या इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।

      छोटे नगरों में वित्तीय संस्थान और कार्यालय भवन भी खुदरा व्यापार की दुकानों के साथ मिले जुले रूप में मिलते हैं जबकि बड़े नगरों में इनका क्षेत्र खुदरा क्षेत्र के पास, किन्तु अलग स्थित होता है। अधिकांश बड़े नगरों की विषम वृद्धि के कारण केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र अब सामान्यतः नगरों के क्षेत्रीय केन्द्र में स्थित न होकर वास्तव में किसी एक किनारे के पास मिलता है।

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण औद्योगिक क्षेत्र:-

      थोक व्यापार क्षेत्र प्रायः केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र के निकट (किन्तु उसके चारों ओर नहीं) यातायात मार्गों के सहारे सहारे स्थित होता है। यद्यपि इसको कुछ आधार स्वयं नगर से प्राप्त होता है, किन्तु यह प्रमुख रूप से पड़ोसी क्षेत्रों को सेवाएँ प्रदान करता है। अनेक प्रकार के हल्के विनिर्माण उद्योगों के विशिष्ट भवनों की आवश्यकता नहीं होती है। इन उद्योगों को तो अच्छे रेल एवं सड़क यातायात सम्पर्क, बड़े भवनों की उपलब्धि तथा स्वयं नगर के बाजार एवं श्रम से निकटता जैसी सुविधाएँ इन्हें आकर्षित करती हैं।

3. भारी उद्योग क्षेत्र:-

       यह क्षेत्र नगर के वर्तमान या पूर्ववर्ती बाह्य किनारों के निकट स्थित होता है। भारी उद्योगों को भूमि के बड़े भाग तथा अच्छी रेल, सड़क एवं जल यातायात सुविधाओं की आवश्यकता होती है। जो कि उन्हें नगर के केन्द्रीय भाग की अपेक्षा सीमावर्ती भाग में आसानी से उपलब्ध होती है। इसके अतिरिक्त भारी मशीनों से उत्पन्न ध्वनि प्रदूषण, उद्योगों द्वारा छोड़े जाने वाले हानिकारक अपशिष्टों और जान-माल के अन्य खतरों की वजह से भारी उद्योगों को नगर केन्द्र से दूर स्थित होने के लिए बाध्य करते हैं। यही कारण है कि नगरों की बाहरी सीमा पर भारी उद्योगों का स्थानीयकरण मिलता है।

4. उपनगर एवं अनुषंगी नगर:-

       उपनगर चाहे वह आवासीय हो या औद्योगिक, अधिकांश बड़े नगरों की प्रमुख विशेषता है। उपनगर एवं अनुषंगी नगर भी नगरों के विकास में केन्द्रों या नाभि के रूप में कार्य करते हैं। मोटर यातायात तथा उपनगरीय रेल सेवाओं के विकास ने उपनगरीकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया है। अनुषंगी नगर केन्द्रीय नगर से कई किमी दूर तथा सामान्य रूप से दैनिक अभिगमन की मात्रा भी कम होने के कारण उपनगर से भिन्न होते हैं। अनुषंगी नगरों की आर्थिक क्रियाएं उनकी केन्द्रीय नगर से निकटता प्रदर्शित करती है।

5. लघु नाभि केन्द्र:-

         नगर के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे केन्द्र पाए जाते हैं जैसे, सांस्कृतिक केन्द्र, बाह्यवर्ती व्यापार केन्द्र तथा छोटे औद्योगिक केन्द्र, आदि। एक विश्वविद्यालय भी किसी नगर में स्वतन्त्र रूप से नाभि या केन्द्र के रूप में कार्य कर सकता है। पार्क एवं अन्य मनोरंजन के क्षेत्र भी, जो कि बेकार पड़ी हुई भूमि को अधिग्रहीत किए हुए होते हैं, कभी-कभी उच्च श्रेणी के आवासीय क्षेत्र के केंद्र के रूप में विकसित हो जाते हैं। बाह्यवर्ती व्यापारिक क्षेत्र भी कालान्तर में प्रमुख केन्द्र बन जाते हैं, किन्तु छोटी संस्थाओं और हल्के विनिर्माण उद्योगों की व्यक्तिगत इकाइयों जैसे, बेकरी में ऐसी क्षमता नहीं होती है।

6. आवासीय क्षेत्र:-

        सामान्यतः उच्च श्रेणी के आवास अच्छा जल प्रवाह रखने वाले ऊंचे स्थलों पर तथा शोर, धुआं, दुर्गन्ध, रेलमार्ग, आदि से दूर स्थापित होते हैं। निम्न श्रेणी के आवास प्रायः कारखानों तथा रेलमार्गों के निकट स्थापित होते हैं। नगर के अधिक पुराने आवासीय क्षेत्रों जहाँ कि अधिकांश भवनों का ढाँचा जर्जर अवस्था में होता है, में भी निम्न वर्ग के लोगों के आवास होते हैं। यह वर्ग नगर के अन्य भागों में अधिक किराया देने में असमर्थ होता है। उच्च और निम्न श्रेणी के आवासीय क्षेत्रों के बीच में मध्यम श्रेणी के लोगों का रिहायशी क्षेत्र बन जाता है।

निष्कर्ष:

        यद्यपि वर्तमान समय में कोई भी एक सिद्धान्त नगरों पर पूर्णतया लागू नहीं होता है, किन्तु अधिकांश नगरों में तीनों ही प्रकार के यथा, संकेन्द्रित वलय, खण्ड क्षेत्र और बहुनाभिक क्षेत्र का कोई न कोई रूप अवश्य देखने को मिलता है।

     वस्तुतः एक नगर के विकास के विभिन्न कालों में कार्यरत विभिन्न शक्तियों के कारण ही एक नगर में उपरोक्त वर्णित तीनों सिद्धान्तों का सामंजस्य देखने को मिलता है।

      नगर की प्रारम्भिक वृद्धि केन्द्रीय क्षेत्र और नाभि केन्द्रों के चारों ओर होती है। कालान्तर में होने वाली वृद्धि परिवहन मार्गों के सहारे होती है। यह वृद्धि खण्ड प्रारूप को जन्म देती है। अन्त में भूमि मूल्यों के अनुसार भूमि का उपयोग जो नग के केन्द्र से दूरी के अनुसा निर्धारित होता है, नगरीय भूमि उपयोग को संकेन्द्रित प्रारूप प्रदान करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. नगरीय आकारिकी के सम्बन्ध में प्रतिपादित बहुनाभिक सिद्धांत (Multiple Nuclei Theory) का वर्णन कीजिए।

21. Sector Theory (खंड सिद्धांत)

21. Sector Theory (खंड सिद्धांत)



      Sector Theory

        1939 में अमेरिकी नगरीय अर्थशास्त्री होमर हॉयट ने संयुक्त राज्य अमेरिका के कुल 142 नगरों के भूमि उपयोग आंकड़ों के आधार पर नगरों की आन्तरिक संरचना एवं विकास के सम्बन्ध में खण्ड सिद्धान्त प्रस्तुत किया। हॉयट ने बर्गेस के संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त में रही कुछ कमियों को दूर करते हुए अपने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार नगरीय भूमि उपयोग का प्रारूप परिवहन मार्गों के विन्यास के अनुरूप विकसित होता है।

       नगर के केन्द्र से विभिन्न दिशाओं में जाने वाले परिवहन मार्गों के सहारे भूमि उपयोग और किराया-मूल्यों का प्रारूप खण्डीय रूप (Sectoral Pattern) में विकसित होता है। विकसित हुआ यह खण्ड प्रारूप पुनः नगरीय भूमि उपयोग प्रारूप को प्रभावित करता है।

       हॉयट के अनुसार नगर के एक खण्ड में विद्यमान सर्वाधिक किराया वाले आवासीय क्षेत्र का विस्तार उसी खण्ड में बाह्य भाग की ओर होता है। इसी प्रकार निम्न किराया वाले आवासीय क्षेत्रों का विकास बाह्य भाग की ओर होता है, लेकिन विभिन्न दिशाओं में हो सकता है।

       हॉयट के अनुसार भूमि उपयोग की दृष्टि से नगर कई खण्डों में बंटा होता है, जो कि नगर के केन्द्र से बाहर की ओर फैले रहते हैं। नगर केन्द्र के निकट जिस प्रकार का भूमि उपयोग मिलता है, बाहर की ओर भी उसी दिशा में उसी प्रकार का भूमि उपयोग मिलता है, जैसे नगर के पूर्वी भाग में उच्च आवासीय क्षेत्र नगर के पूर्वी भाग की बाह्य सीमा की ओर ही बढ़ेगा।

       हॉयट के अनुसार नगर में पांच प्रकार के खण्ड पाए जाते हैं:-

1. केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र,

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण क्षेत्र,

3. निम्न श्रेणी आवासीय क्षेत्र,

4. मध्यम श्रेणी आवासीय क्षेत्र,

5. उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र।

       केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र की स्थिति संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त की भांति ही नगर के केन्द्र में होती है। थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण क्षेत्र केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र से प्रारम्भ होकर दो विभिन्न खण्डों में परिधि की सीमा तक फैला हुआ होता है। निम्न श्रेणी के आवासीय क्षेत्र भी विनिर्माण उद्योग खण्ड के सन्निकट दोनों ओर फैले त्रिज्या खण्डों में एवं केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र के एक ओर सीमा पर पाए जाते हैं।

      मध्यम वर्ग के आवासीय क्षेत्र उच्च श्रेणी के आवासीय खण्ड के सहारे दोनों तरफ तथा निम्न श्रेणी आवासीय खण्ड के बाहर की ओर पाए जाते हैं। उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र एक या एक से अधिक खण्डों की बाहर की सीमा पर बसा मिलता है। आर्थिक स्तर के अनुसार विभिन्न वर्गों के आवासीय क्षेत्र स्थिर न होकर परिवर्तनशील होते हैं, किन्तु सामान्यतः उसी खण्ड की बाह्य सीमाओं की ओर बढ़ते हैं।

      हॉयट के अनुसार श्रेणी के आवासीय क्षेत्रों के बढ़ने की प्रवृत्ति निम्नलिखित भागों में पाई जाती है:

(i) अपने उत्पत्ति बिन्दु से प्रमुख मार्गों के सहारे या भवनों की अन्य विद्यमान नाभि या व्यापारिक केन्द्रों की ओर,

(ii) बाढ़ से सुरक्षित ऊंचे धरातल या झील, खाड़ी, नदी और महासागरीय सीमान्त की ओर,

(iii) नगर के उस क्षेत्र की ओर जो खुला हुआ हो,

(iv) सामुदायिक नेताओं और विशिष्ट व्यक्तियों के घरों की ओर,

(v) तीव्रतम यातायात मार्गों के सहारे।

      हॉयट के अनुसार सुसज्जित उच्च आवासीय फ्लेट वाले क्षेत्र, पुराने आवासीय क्षेत्र के व्यापारिक केन्द्र के निकट भी स्थापित होने की प्रवृत्ति रखते हैं। साथ ही जायदाद एवं भूमि सम्पदा व्यवसायी भी उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्रों की वृद्धि की दिशा को मोड़ सकते हैं।

        उच्च किराया आवासीय क्षेत्र हॉयट के सिद्धान्त का आधार है जिसे हॉयट ने 30 अमेरिकी नगरों के उच्च आवासीय क्षेत्रों के आरेखों द्वारा पुष्ट किया है। उच्च किराया आवासीय क्षेत्र नगरीय भूमि उपयोग संरचना के आकार निर्धारण में मुख्य भूमिका निभाता है। हॉयट ने अपने सिद्धान्त में संकेन्द्रित सिद्धान्त के प्रति उठाई गई आपत्तियों जैसे, उद्योगों की स्थिति एवं यातायात मार्गों पर पूरा ध्यान दिया है साथ ही नगर के भावी विकास एवं विस्तार का भी ध्यान रखा है।

        डब्ल्यू. फायरे ने बोस्टन के भूमि उपयोग का अध्ययन करके खण्ड सिद्धान्त में विद्यमान कमियों को उजागर किया है। इनका कहना है कि धरातलीय दशाएँ और जलीय भाग खण्ड प्रतिरूप को विकृत कर सकते हैं तथा भूमि उपयोग को निर्धारित करते समय सिद्धान्त में सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है।

        फायरे ने बोस्टन के बेकोनहिल उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र का उदाहरण देकर बताया है कि इसके विकास का कारण इसकी अवस्थिति नहीं है, अपितु सामाजिक काण है। नगरों की सम्पूर्ण संरचना के स्थान प हॉयट ने अपने सिद्धान्त को मात्र आवासीय वृद्धि जैसे विशिष्ट सन्दर्भ में ही लागू किया है। स्वयं हॉयट ने अपने सिद्धान्त का पुनर्मूल्यांकन आधुनिक यातायात के साधनों एवं अन्य परिवर्तनों के सन्दर्भ में 1964 में किया।

प्रश्न प्रारूप

नगरों की आन्तरिक संरचना एवं विकास के संबंध में प्रतिपादित खंड सिद्धांत (Sector Theory) का समालोचनात्मक वर्णन कीजिए।

20. Concentric Zone Theory (सकेंद्रित पेटी सिद्धांत)

20.  Concentric Zone Theory

(सकेंद्रित पेटी सिद्धांत)


        Concentric Zone Theory

        नगरों की सामान्य संरचना अथवा आकारिकी के सम्बन्ध में सिद्धान्त का प्रतिपादन सर्वप्रथम ई. डब्ल्यू. बर्गेस ने 1927 में किया, जिसे संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। यह सिद्धान्त इस धारणा पर आधारित है कि एक नगर का विकास केन्द्र से बाहर की ओर संकेन्द्रित क्षेत्रों (पेटियों) की शृंखला बनाते हुए होता है। ये पेटियाँ नगर की वृद्धि के साथ-साथ बाहर की ओर खिसकती जाती है।

        यह सिद्धान्त आदर्श दशाओं में ही लागू होता है अन्यथा प्रतिक्रियात्मक कारकों जैसे, यातायात मार्गों और धरातलीय अवरोध (नदी, झील, समुद्र, हिमनद, खाइयां) के उपस्थित होने पर अपने मूल रूप में लागू नहीं होता है। इस प्रकार बर्गेस का यह सिद्धान्त एक आदर्श संकल्पना है। बर्गेस ने शिकागो का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए नगर के संरचनात्मक विकास को निम्नलिखित पांच संकेन्द्रित क्षेत्र (पेटियों) द्वारा समझाया है।

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र (Central Business District)

2. संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone)

3. कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र (Zone of Workingmen’s Homes)

4. बेहतर आवासीय भवनों का क्षेत्र (Zone of Better Residences)

5. अभिगमनकर्ताओं का क्षेत्र (Commuter’s Zone)

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र:-

         नगर के केन्द्र में प्रथम पेटी के रूप में केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र स्थित होता है। यह नगर का हृदय क्षेत्र होता है। यह नगर के वाणिज्य, व्यापार और यातायात का केन्द्र होता है। गगनचुम्बी इमारतें, प्रमुख शोरूम, एम्पोरियम, थिएटर, होटल, नाचघर, क्लब एवं वाणिज्यिक संस्थानों के कार्यालय इसी क्षेत्र में स्थित होते हैं। इसका अधिकांश भाग गैर-आवासीय कार्यों के लिए प्रयुक्त होता है।

      शिकागो में इस भाग को लूप (Loop), न्यूयार्क में डाउन टाउन (Down Town) तथा पिट्सबर्ग में गोल्डन टेम्पल (Golden Temple) कहते हैं। बर्गेस ने केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र को भी दो भागों में बांटा है- पहला क्षेत्र केन्द्र में स्थित खुदरा व्यापार क्षेत्र है जो कि वृत्ताकार होता है, दूसरा इसके चारों ओर बाहर की ओर स्थित थोक व्यापार क्षेत्र होता है।

2. संक्रमण क्षेत्र:-

        यह क्षेत्र केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र के चारों ओर फैला हुआ होता है। इसमें व्यापारिक, औद्योगिक और आवासीय उपयोग के क्षेत्र पाए जाते हैं अतः इसे संक्रमण क्षेत्र कहते हैं। इसके आन्तरिक भाग में व्यापारिक संस्थान एवं हल्के विनिर्माण उद्योग का क्षेत्र होता है, तो बाहर की ओर आवासीय क्षेत्र होता है। इसमें अधिकांश भवन पुराने, छोटे एवं गन्दे होते हैं तथा कुछ भागों में गन्दी बस्तियां (Slum) भी होती हैं।

      इस क्षेत्र में निवास करने वाले अधिकांश लोगों का सामाजिक स्तर निम्न होता है। यह क्षेत्र अधिकांशतः आप्रवासियों द्वारा आवासित होता है।

3. कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र:-

          संक्रमण क्षेत्र को घेरे हुए कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र होता है। इसमें औद्योगिक श्रमिकों की संख्या अधिक होती है। ये लोग संक्रमण क्षेत्र में तो रहना पसन्द नहीं करते हैं, लेकिन अपने कार्यस्थल की समीपता को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र में रहते हैं अर्थात् इस क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश लोग संक्रमण क्षेत्र से ही इस क्षेत्र में आते हैं। इस क्षेत्र में दूसरी पीढ़ी के आप्रवासी लोगों की संख्या अधिक पाई जाती है। शिकागो में यह क्षेत्र दो मंजिलें भवनों वाला है।

4. बेहतर आवासीय भवनों का क्षेत्र:-

       बेहतर आवासीय भवनों अथवा मध्यम या उच्च-मध्यम श्रेणी के लोगों का यह निवास क्षेत्र कार्यशील लोगों के घरों के क्षेत्र के चारों ओर फैला हुआ होता है। यह एक उपनगरीय क्षेत्र जैसा होता है। अधिकांश व्यक्ति व्यावसायिक कार्यों में संलग्न होते हैं। इस क्षेत्र में होटल, एक परिवार वाले आवासीय भवन तथा उच्च श्रेणी के फ्लेट वाले भवन मिलते हैं। सभी भवनों में पर्याप्त खुला क्षेत्र होता है।

5. अभिगमनकर्ताओं का क्षेत्र:-

       नगर की बाह्य सीमा पर तीव्र यातायात सुविधाओं के कारण उपनगरीय क्षेत्रों तथा अनुषंगी नगरों का एक क्षेत्र बन जाता है। इसमें उच्च श्रेणी के आवासीय क्षेत्र नियमित न होकर बिखरे हुए रूप में होते हैं। यह क्षेत्र नगर के आवासीय क्षेत्रों से हरित पट्टी (Green Belt) द्वारा पृथक् होता है। यह पूर्ववर्ती गाँवों का ही क्षेत्र होता है जो कार्यात्मक दृष्टि से नगरीय विशेषताओं से युक्त होता है। इस क्षेत्र में निवास करने वाले अधिकांश व्यक्ति दिन में काम करने के लिए केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र में जाते हैं तथा रात्रि में पुनः यहां लौट आते हैं अतः इन्हें शयन नगर (Bed-Room Town) भी कहते हैं।

आलोचना

        बर्गेस के संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त की कुछ सामान्य विशेषताएं शिकागो तथा कुछ अन्य नगरों (भारतीय नगरों में मुजफ्फरपुर का नगर संकेन्द्रित सिद्धान्त के अनुरूप है) में पाई गईं जो कि सिद्धान्त को पुष्ट करती हैं, किन्तु कई विद्वानों ने अधिकांश नगरों पर सिद्धान्त लागू न होने के कारण इसकी आलोचना की है। सिद्धान्त में रही कमियों को आलोचना के रूप में स्पष्ट किया गया है। ये कमियां निम्नलिखित हैं :

(i) एक मात्र संक्रमण क्षेत्र में स्थित कुछ हल्के उद्योगों के अतिरिक्त संकेन्द्रित सिद्धान्त में किसी भी क्षेत्र में उद्योगों एवं औद्योगिक पेटी की स्थिति नहीं बताई गई है। आशय यह है कि औद्योगिक क्रियाकलाप किसी भी पेटी में मिल सकते हैं।

(ii) केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र गोलाकार न होकर प्रायः अनियमित या आयताकार अधिक होता है। आर. ई. डिकिन्सन ने अपने अध्ययन के आधार पर बताया है कि पेरिस, आदि नगर वृत्ताकार प्रतिरूप नहीं रखते हैं। इसी प्रकार थोक व्यापार क्षेत्र कुछ मात्रा में ही केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र के किनारे पर मिलते हैं। अधिकांशतः इनकी स्थिति रेलमार्गों के निकट होती है।

(iii) नगर में खुदरा व्यापार का एकमात्र क्षेत्र ही नहीं होता है बल्कि नगर के विस्तार एवं तीव्र परिवहन साधनों के कारण अन्यत्र भी छोटे-छोटे व्यापारिक केन्द्र विकसित हो जाते हैं।

(iv) निम्न आय वर्ग के आवासीय क्षेत्र एवं गन्दी बस्तियां भी मात्र संक्रमण क्षेत्र में केन्द्रित न होकर नगर के विभिन्न भागों जैसे- औद्योगिक इकाइयों एवं रेलमार्गों के निकट अधिक पाई जाती हैं।

(v) भूमि उपयोग स्वरूप के निर्धारण में परिवहन मार्गों की भूमिका की सिद्धान्त में उपेक्षा की गई है। नगर से निकलने वाली मुख्य सड़कों के किनारे विकसित हुए व्यापार तथा उसके साथ बढ़ते हुए भूमि मूल्यों को बर्गेस ने अपने सिद्धान्त में कोई स्थान नहीं दिया है।

(vi) नगर के बहिवर्ती भाग में जनसंख्या का जमाव प्रमुख मार्गों के सहारे होता है फलतः नगर का आकार संकेन्द्रित न होकर तारानुमा होता है।

(vii) धरातलीय अवरोधों के कारण संकेन्द्रित क्षेत्रों के विकास में बाधा उत्पन्न होती है। बर्गेस का सिद्धान्त बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक की दशाओं पर आधारित है तथा आदर्श दशाओं के अन्तर्गत ही लागू होता है।

         अतः इस सिद्धान्त को अत्यधिक सामान्यीकृत रूप में ही देखा जाना चाहिए। तीव्र परिवहन साधनों का विकास एवं नगरों में पुनर्विकास जैसी योजनाओं के कारण भी नगरों के भूमि उपयोग स्वरूप में अत्यधिक परिवर्तन आया है। अत्यधिक आलोचना के उपरान्त भी नगरों की आन्तरिक संरचना के सम्बन्ध में प्रथम सिद्धान्त होने के कारण इसका अपना महत्व है।

प्रश्न प्रारूप 

1. नग की आकारिकी अथवा सामान्य संचना के संबंध में प्रतिपादित सकेंद्रित क्षेत्र/पेटी सिद्धांत (Concentric Zone Theory) की विवेचना कीजिये।

10. नगरीय वर्गीकरण

10. नगरीय वर्गीकरण


नगरीय वर्गीकरण⇒नगरीय वर्गीकरण

            नगरों का वर्गीकरण चार आधार पर किया जाता है:-

1. उत्पत्ति तथा विकास के आधार पर

2. स्थानीयकरण अथवा बसाव स्थान एवं बसाव स्थिति के आधार पर

3. कार्यों के आधार पर

2. जनसंख्या आकार के आधार पर

उत्पत्ति तथा विकास के आधार पर नगरों का वर्गीकरण 

          नगरों के उत्पत्ति और विकास के आधार पर वैज्ञानिक विश्लेषण अनेक विद्वानों के द्वारा किया गया है। इस दृष्टि से पैट्रिक गेडिस, ममफोर्ड एवं ग्रिफिथ टेलर के कार्य अधिक महत्व के है। 

          पैट्रिक गेडिस के अनुसार नगरों का विकास व पत्तन की छः अवस्थाएँ जाती है जिन्हें मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जा सकता है।

1. पैलियोटेकनीक वाले नगर में पुरानी अर्थव्यवस्था वाले नगर और

2. नियोटेकनीक नगर में नई अर्थव्यवस्था वाले नगर आते है।

                 टेलर ने नगरों के उत्पत्ति एवं विकास के आधार पर मानव जीवन चक्र से तुलना करते हुए सात अवस्थाओं की चर्चा की गई है-

1. पूर्व शैशवावस्था (Sub-infantile stage)⇒ इस अवस्था में मकानों के अंदर की दुकान फिर गली अथवा सड़क के दोनों ओर मकान तथा दुकान बनने लगते हैं।

2. शैश्वावस्था (Infantile stage)⇒ इस अवस्था में गलियों व सड़कों का कुछ सुधरा रूप दिखाई देने लगता है तथा बस्ती बढ़ने लगती है।

3. बाल्यवस्था (Juvenile stage)⇒ इस अवस्था में मुख्य सड़क के दोनों किनारों पर गलियों का निर्माण होना शुरू हो जाता है।

4. किशोरावस्था (Adolescent Stage)⇒ नगर में विभिन्न प्रकार के मकान दिखलाई देने शुरू हो जाते है। नगर अपना व्यापार-क्षेत्र अलग से बना लेते हैं।

5. प्रौढ़ावस्था (Mature Stage)⇒ इस अवस्था में नगर की प्रत्येक क्षेत्र में विभिन्नता आ जाती है। रिहाइशी क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्र, व्यापारिक क्षेत्रों का पृथक्कीकरण स्पष्ट दिखाई देने लगता है। मकानों की ऊंचाई बढ़ने लगती है।

6. उत्तर प्रौढावस्था (Late Mature Stage)⇒ इस अवस्था में नगर का विकास योजना के अनुसार होने लगता है।

7. वृद्धावस्था (Sensile Stage)- यह नगर की अंतिम अवस्था है जिसमें नगर उजड़ने लगता है। चित्तौड़, कन्नौज, फर्रुखाबाद, इस्फान (ईरान) इसी के उदाहरण हैं।

मैगापोलिस

               ममफोर्ड ने सामाजिक वातावरण को ध्यान में रखकर नगरों की छ: अवस्थाएँ बतायी हैं-

1. इओपोलिस

2. पोलिस

3. पट्रोपोलिस

4. मैगापोलिस

5. टायरेनोपोलिय

6. मेक्रोपोलिस

1. Eopolis- इस अवस्था में केंद्रीय स्थान पर नगर का विकास अपने शैशवकाल में होता है लेकिन नगर के आकार की पहचान नहीं हो पाती है।

2. Polis- इस अवस्था में जनसंख्या आकार बड़े हो जाते हैं तथा नगरीय आकार की पहचान संभव है। बड़े गाँव कस्बे का रूप धारण कर लेते है।

3. Metropolis- मुख्य नगर के आकार में पुनः वृद्धि होती है तथा इस पर निर्भर रहने वाले कई छोटी-छोटी नगरीय बस्तियाँ भी विकसित हो जाती है।

4. Megapolis- यह अवस्था नगर की चरम सीमा को बताती हैं। इसमें प्रादेशिक नगरीकरण की प्रवृत्ति होती है। आस-पास की ग्रामीण बस्तियों में भी नगरीय कार्यों की प्रधानता हो जाती है। अमेरिकन मेगापोलिस का विस्तार बोस्टन से लेकर बाल्टीकमोर तक हैं। रोर्टरडम-एम्सटर्डम मेगापोलिस। टोक्यो-योकोहामा-कवासाकी-कोबे मेगापोलिस इसके उदाहरण है।

5. Trynopolis- इस अवस्था में नगर की जनसंख्या में ह्रास प्रारंभ हो जाता है। नगरीय आकर्षण पर्याप्त नहीं रह जाता। इसे Diging Stage of City कहते है। लंदन और पेरिस इसके उदाहरण है।

6. Nekropolis- इस अवस्था में नगर का पूर्ण पत्तन हो जाता है।उजड़े हुए नगर की इस अवस्था में चारों ओर  भग्नावशेष दिखाई देने लगते है। हड़प्पा, कन्नौज, तक्षशिला इसके उदाहरण है।

बसाव-स्थान (Site) व बसाव-स्थिति (Situation) में अंतर व संबंध  

             बसाव-स्थान (Site) वास्तव में बसाव-स्थिति (Situation) का एक छोटा अंग है। ये दोनों मिलकर नगर की उत्पत्ति व विकास पर प्रभाव डालते हैं। नगर एवं गाँव दोनों प्रकार के बस्ती के लिए Site और Situation महत्व रखता। इनके बीच निम्नलिखित अंतर है-

(i) बसाव-स्थान व बसाव-स्थिति में सबसे पहले अंतर रैटजेल ने किया। उसने बर्लिन नगर का अध्ययन कर यह बताया कि यह नगर ऐसे बसाव-स्थान पर है जहाँ कि उसके बड़ा नगर बनने की संभावना नहीं थी, परंतु जर्मनी के उपजाऊ मैदान में इसकी बसाव-स्थिति ही इसके विकास का कारण बनी और यह एक बड़ा नगर बन गया।

(ii) बसाव स्थान भौतिक विशेषताओं पर अधिक बल देता है, जबकि बसाव-स्थिति में प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों परिस्थितियों पर ध्यान दिया जाता है।

(iii) बसाव-स्थान विशिष्टता रखने वाला होता है लेकिन बसाव-स्थिति व्यापक होती है।

(iv) नगर व गाँव दोनों प्रकार की बस्ती के लिए बसाव-स्थान का महत्व होता है लेकिन बसाव-स्थिति ही होती है, जो गाँव के आकार को वृद्धि प्रदान करके उसको नगर में परिवर्तित कर देती हैं।

(v) गंगा-यमुना नदियों का संगम तथा गंगा के अर्द्ध-वृत्ताकार मोड़ बसाव-स्थान की विशेषता है। जिन्होंने नगर को वर्तमान आकृति प्रदान की है। इन नदियों के बीच की भूमि बाढ़ से सुरक्षित होने के कारण बसाव-स्थिति की दृष्टि से उपयुक्त थी। बसाव-स्थिति की दृष्टि से नगर अपने चारों और विस्तृत उपजाऊ भूमि, अतिरिक्त कृषि उत्पादन, रेल व सड़क मार्गों का जंक्शन आदि सुविधाएँ रखता है।

            बसाव स्थान वह भू-भाग है जहाँ पर नगर बसा होता है। किसी नगर का विकास किस दिशा में होगा यह उसके बसाव स्थान पर निर्भर करता है। जैसे-यदि नगर किसी सड़क या नदी के किनारे बसा है तो उसकी आकृति लंबी होगी। बसाव स्थान के अंतर्गत उस स्थान को धरातलीय दशा, भूगर्भिक दशा, जलप्राप्ति आदि का अध्ययन करते हैं।

           नगर प्रारंभ में बसाव स्थान की आकृति के अनुरूप ही फैलना शुरू करता है। बाद में समय के साथ-साथ अपने आकार में वृद्धि कर लेता है। उन दिशाओं में फैलता है, जहाँ पर भूमि नगरीय विकास के लिए उपयुक्त होती है और यातायात मार्गों के सहारे बढ़ता है लेकिन यदि किसी नगर का बसाव-स्थान कुछ भौतिक असुविधाओं से युक्त है तो भी वहाँ पर नगर का विस्तार होता है ऐसा तब होता है, जब नगर स्थिति बसाव स्थिति को तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे स्थान पर भूमि की कीमत ऊँची होती हैं। इस प्रकार बसाव स्थान का तात्पर्य उस जगह से है जहाँ नगरीय आकारिकी का विकास होता है जबकि बसाव स्थिति का संबंध बसाव स्थल के चारों तरफ पाये जाने वाले प्राकृतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक वातावरण से है, जो नगर के विकास में सहायक होता है। दोनों ही कारक मिलकर नगरीय बस्ती का स्थानीयकरण करते हैं। इस कारण बसाव स्थान और बसाव स्थिति के आधार पर किया गया वर्गीकरण स्थानीयकरण के आधार पर किया गया वर्गीकरण माना जाता है।

भौगोलिक स्थानीयकरण के आधार पर नगरों का वर्गीकरण अथवा बसाव-स्थान तथा बसाव-स्थिति के आधार पर नगरों का वर्गीकरण

         भौगोलिक स्थानीय करण अर्थात बसाव-स्थल तथा बसाव स्थिति के अनुसार नगरों को दो प्रमुख भागों में बाँटते है-

(A) जलीय सुविधा के किनारें बसे नगर और

(B) जलीय सुविधा से दूर बसे नगर

(A) जलीय सुविधा के किनारे बसे नगर- इसे पुन: तीन भागों में बाँटते है:-

(a) नदी के किनारे बसे नगर- इसे पुन: छ: भागों में बाँटते है:- 

(i) जलप्रपात नगर-  जलप्रपात के सुविधा के कारण पर्यटन स्थल बन गया है। उदाहरण सागर (कर्नाटक), भेड़ाघाट, नियाग्रा।

(ii) मोड़ लेते हुए बसाव-स्थलीय नगर- यह बाढ़ से मुक्त नगर होता है।  जैसे -आगरा, जायरे का लिविंग स्टोन नगर।

(iii) संगम स्थल पर बसा नगर- जहाँ दो नदियों का संगम होता है वहाँ बसे नगर इसके तहत आते है। जैसे प्रयाग, अलकनंदा और भागीरथी के संगम पर वसा देवप्रयाग, स्वर्णरेखा और खरकई के संगम पर बसा जमशेदपुर।

(iv) ब्रिजटाउन या नदियों के  दोनों किनारों पर बसे नगर। जैसे लंदन (टेम्स) बुडापेस्ट (डेन्यूब), श्रीनगर (झेलम)  

(v) ज्वारीय नगर – ज्वारभाटा के जल से नदियों के मुहानो पर बंदरगाह बन जाते हैं जिससे समुद्र से दूर आंतरिक भाग में नगर बन जाते हैं। जैसे हुगली के किनारे कलकत्ता।

(vi) प्राकृतिक बाँध नगर- बाढ़ के मलबे से धरातलीय ऊंचाई में वृद्धि होती है तो प्राकृतिक बाँध बन जाता है।

उसी पर नगर बस जाते हैं। जैसे पटना, बुहांग वियना।

(b) झील के किनारे बसे नगर:- प्रायः झील के किनारे भी नगरों का विकास हो जाता है। इसके कई कारण है।

जैसे-

(i) पर्यटन के चलते- पुष्कर झील के किनारे पुष्कर नगर, इसी तरह नैनीताल को भी लिया जा सकता है।

(ii) औद्योगिक गतिविधि के चलते- कर्लोस (झील के किनारे), ग्रेटसाल्ट लेक (USA)।

(iii) नौकागम्य के कारण- महान झील के किनारे- क्लीवलैंड, बफैलो, कम्पाला (युगांडा), डलुथ आदि अस्थावान (कैस्पीयन पर), बोल्गा नदी के मुहाना पर बने झील पर बसे नगर।

(c) समुद्री प्रभाव से भी कई प्रकार के नगर विकसित होते हैं। जैसे-

(i) पुलीन नगर- यहाँ पर पर्यटन का विकास हो जाता है। जैसे मियामी बीच सिटी, कोयलम, दीघा (WB) आदि।

(ii) ज्वारनद-मुख नगर- ज्वारनद्मुख नगर प्राकृतिक बंदरगाह के कारण जैसे सूरत (ताप्ती के किनारे) नावें और स्वीडेन के सभी।

बंदरगाह- जैसे डंवर फिस्ट, गोटेंवर्ग (नार्वे)

(iii) लैगुन के किनारे बसे लैगुन नगर- जैसे आस्ट्रेलिया के टाउंसविले, भारत में कोचीन का विकास।

(iv) द्वीपीय नगर- द्वीपों पर संचार या जहाजरानी के कारण जैसे पोर्टब्लेयर।

(v) बंदरगाह नगर या जलमार्ग नगर- समुद्री जलमार्ग के सुविधाओं के कारण तट के किनारे प्राकृतिक बंदरगाह के अलावे कृत्रिम बंदरगाह भी विकसित किए जाते है। जैसे मद्रास।

(B) जलीय सुविधा से दूर बसे नगर- इसके भी छः प्रमुख वर्ग आते है। जैसे-

(1) सीमावर्ती नगर- सीमा के किनारे सामरिक महत्त्व के कारण जैसे राजौरी एवं पिथौरागढ़ आदि।

(ii) परिवहन मार्ग पर विकास  नगर- काठगोदाम (नैनीताल) परिवर्तन से बने नगर और योगेन्द्र नगर (HP)। 

(iii) धर्मिक नगर-  धार्मिक कारण से बने नगर  जैसे- अजमेर, वाराणसी। 

(iv) शैक्षणिक नगर- जैसे पिलानी, रुढ़की।

(v) क्रोड नगर- परिवहन मार्गों के संगम स्थल पर बसा नगर है। जैसे लंदन, पेरिस, शिकागो, पंडित दीन दयाल उपाध्याय नगर। 

(vi) सेवा केंद्र नगरीय बस्ती- मूलत: ग्रामीण क्षेत्रों की केन्द्रीय बस्ती होती है और आसपास के लोगों के बाजार सुविधा के लिए ग्रामीण बाजार बस्तियाँ विकसित होती है जैसे प्राय: हर देश के ग्रामीण क्षेत्र में। 

नगरों का कार्यिक वर्गीकरण

          यद्यपि नगरों का कार्य द्वितीयक और तृतीयक प्रकार का होता है लेकिन नगरों में कार्यिक विशेषता की प्रवृत्ति होती है। इसी विशेषता के आधार पर नगरों का कार्यिक वर्गीकरण किया जाता है। यह विशेषता उसकी भौगालिक वातावरण का परिणाम होता है। 

       कई भूगोलवेत्ताओं ने कार्यिक विशेषीकरण के आधार पर नगरों के वर्गीकरण का प्रयास किया है। कुछ विद्वानों का वर्गीकरण इस प्रकार से है-

1. मेकेंजी का वर्गीकरण- मेकेंजी ने कार्यिक विशेषता को आधार मानते हुए नगरों को दो भागों में बाँटा है-

(A) सक्रीय नगर (Active Town or Basic Town)- वैसे नगर जो उत्पादन कार्यों में संलग्न है अथवा नगरीय अर्थव्यवस्था को आर्थिक लाभ दे रहें हो।

(B) अक्रीय नगर (Passive or Non-Basic Town)- वैसे नगर जहाँ उत्पादन कार्य ठप्प पड़ गया हो अथवा नगरीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक योगदान न के बराबर दे रहें हों इसके तहत अधिवासी नगर, शिक्षा नगर, धार्मिक नगर आदि आते हैं।

2. जेलसन का वर्गीकरण-

(i) औधोगिक नगर-जैसे ऐसेन, बर्मिधम आदि।

(ii) खनन नगर- जैसे जोहान्सबर्ग, चुकियामाता, कालगुर्ली, टैक्सास आदि।

(iii) परिवहन एवं संचार नगर- जैसे शिकागों, कोवे, वेनिस, डुजोन मारसर्ली आदि। 

(iv) प्रशासनिक नगर- जैसे कैनबेरा, इस्लामाबाद, मास्को, पैकिंग, वाशिंगटन, हेग आदि।

(v) व्यवसायिक नगर

(vi) वित्त एवं बीमा नगर

(vii) मुद्रा व्यापार नगर

(vi) थोक व्यापार का केंद्रीय नगर

(ix) सेवा केंद्र वाला नगर

(x) विविध कार्यों का नगर- सैनिक  महत्व, स्वास्थ्य केंद्र, क्रीडा केंद्र, धार्मिक केंद्र आदि।

3. एस्कार्ट एंड मोसर का वर्गीकरण- भूगोलवेत्ता एस्कोट एवं मोसर ने बहुचरक विधि का प्रयोग करते हुए  ब्रिटिश नगरों को चौदह भागों में बाँटा है। इसके लिए उन्होंने 67 चरों का प्रयोग किया। इस आधार पर निम्नलिखित वर्गीकरण है-

(1) समुद्रतटीय स्वास्थ्य

(ii) वाणिज्यिक प्रशासनिक नगर 

(iii) रेलवे जंक्शन वाला नगर

(iv) वृहत बंदरगाह नगर

(v) सूती वस्त्र वाला नगर

(vi) औद्योगिक नगर

(vii) औद्योगिक सह वाणिज्यिक नगर

(viii) उपनगर

(ix) मिश्रित अधिवासी नगर

(x) नवीन मिश्रित अधिवासी नगर

(xi) हल्के उद्योग का नगर

(xii) पुराने औद्योगिक नगर

(xiii) नवीन औद्योगिक नगर

(xiv) नवीन औद्योगिक उपनगरनगरीय वर्गीकरण

          बहुचरक विधि के एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि सभी देशों के लिए समान चर और समान वर्गीकरण नहीं हो सकते है। जैसे ब्रिटेन में अनेक नगर सूती वस्त्रों के कारण बसे हैं। इस प्रकार की संभावनाएँ थाइलैंड, इंडोनेशिया जैसे देशों में नहीं हो सकता। अतः एस्कोट एवं मोसर ने यह बताया है कि सभी देशों को अपनी परिस्थितियों के अनुरूप अपने चरों का निर्धारण करना होगा। इसी आधार पर कार्यिक वर्गीकरण संभव है।

4. अशोक मित्रा का वर्गीकरण- भारतीय नगरों के कार्यिक वर्गीकरण हेतु अशोक मित्रा का कार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। कार्यिक विशेषता के आधार पर भारतीय नगरों को निम्नलिखित सात वर्गों में रखा है-

(i) उत्पादन नगर⇒

औद्योगिक नगर- बोकारो, टाटा, भिलाई, सिंदरी, हावड़ा

खनन केंद्र- धनबाद

तेल निकालने वाला नगर- डिगबोई

(ii) वाणिज्यिक और व्यापारिक नगर⇒ हापुड़, काठगोदाम, रक्सोल आदि।

(iii) प्रशासनिक नगर⇒ गांधी नगर, चण्डीगढ़, ईटानगर, भोपाल, भुवनेश्वर।

(iv) परिवहन नगर⇒ पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर, कालीकट, विशाखापट्नम।

(v) सांस्कृतिक नगर⇒ अजमेर, पुष्कर, काशी, मथुरा, गया, अमृतसर, मदुरई।

(vi) पर्यटन तथा स्वास्थ्यवर्धक नगर⇒ श्रीनगर, नैनीताल, शिमला, मसूरी, ऊँटी आदि।

(vii) विविध कार्यों का नगर⇒ भारत के सभी महानगर इसमें आएँगे जैसे- दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई आदि।

छावनियाँ- अंबाला, मेरठ, लैंसडॉन आदि

शिक्षा का केंद्र- शांति निकेतन, उज्जैन, सागर

विस्थापितों का नगर⇒ द० हस्तिनापुर

            इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि नगरीय वर्गीकरण में कार्यिक विशेषता को विशेष महत्व प्राप्त है क्योंकि इससे नगर नियोजन कार्यक्रम में विशेष सहायता मिली है।

जनसंख्या के आधार पर नगरों का वर्गीकरण

          जनसंख्या के आधार पर नगरों का वर्गीकरण में कार्यिक विशेषता को विशेष महत्व प्राप्त है क्योंकि इससे नगर नियोजन कार्यक्रम में विशेष सहायता मिलती है।

 जनसंख्या के आधार पर भी नगरों का वर्गीकरण का प्रयास किया गया है। इसके लिए विभिन्न देशों में अलग-अलग मानदंड अपनाये गये है। भारत, मलेशिया, थाईलैंड जैसे देशों में नगरीय मान्यता के लिए 5000 जनसंख्या का होना आवश्यक है लेकिन नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क जैसे देशों में मात्र 200 जनसंख्या उसका आधार है। पुन: नगरीय जनसंख्या को आधार माना जाए तो USA में वह कोई भी नगर महानगर है जिसकी जनसंख्या करीब 54 हजार है और उसके कई सहयोगी नगरीय बस्तियों का विकास हुआ है। भारत की स्थिति भिन्न है। यहाँ पर महानगरीय मान्यता के लिए सहायक नगरीय बस्तियों का होना आवश्यक नहीं लेकिन महानगर की जनसंख्या 10 लाख से अधिक हो सकती है। 

        अगर सभी देशों की सामान्य मान्यता को देखा जाए तो जनसंख्या आकार के आधार पर नगरीय बस्तियाँ निम्न प्रकार की होती है-

1. छोटे आकार के सेवा केंद्र- वह छोटी से-छोटी बस्ती जो गैर प्राथमिक कार्यों से जुड़ा हो। ऐसे केंद्रों के लिए आवश्यक नहीं कि वह मान्यता प्राप्त नगरीय बस्ती हों।

2. शहर- जिसकी जनसंख्या एक लाख से कम हो।

3. नगर- जिसकी जनसंख्या एक लाख एवं उससे अधिक हो।

4. महानगर- भारत में कोई भी नगरीय बस्ती महानगर है जिसकी जनसंख्या 10 लाख या उससे अधिक हैं लेकिन USA तथा जापान में कोई भी नगरीय बस्ती तब तक महानगर नहीं हो सकता जब तक कि उसका सहयोगी नगर न हो। वहाँ वस्तुतः सबसे बड़ी नग के लिए 50,000 जनसंख्या जरूरी है।


Read More:-

9.  नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण / Functional Classification of Cities

9.  नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण

(Functional Classification of Cities)


नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण

           

       वह अधिवासीय क्षेत्र जहाँ मानव सामूहिक रूप से अधिवास करता है उस स्थान को बस्ती से सम्बोधित करते हैं। अगर किसी भी बस्ती की 2/3 जनसंख्या द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों में संलग्न हो तो वैसे बस्ती को नगरीय बस्ती से सम्बोधित करते हैं। द्वितीयक एवं तृतीयक कार्य भी कई प्रकार होते हैं। उन कार्यों के आधार पर नगरों का वर्गीकरण करना एक जटिल कार्य है। किस नगर में किस कार्य की महता अधिक है? इसके लिए अनुभावाश्रित विधि या सांख्यिकी विधि का प्रयोग किया जाता है।

      अशोक मिश्रा ने कार्यों के आधार पर भारतीय नगरों को सात वर्गों में बाँटा है। जैसे:-

(1) उत्पादन नगर

(2) व्यापारिक नगर

(3) राजनीतिक या प्रशानिक नगर

(4) सांस्कृतिक नगर

(5) मनोरंजनात्मक नगर

(6) परिवहन नगर  

(7) मिश्रित नगर

(1) उत्पादन नगर⇒ वैसे नगर जहाँ पर मुख्य रूप से उत्पादन का कार्य किया जाता है। उत्पादन के ये कार्य भी दो प्रकार के हो सकते हैं:-

(A) प्राथमिक उत्पादन के कार्य

(B) औद्योगिक उत्पादन के कार्य

     (A) प्राथमिक उत्पादन का कार्य करने वाले नगरों को पुनः 6 भागों में बाँटा जा सकता है:-

(a) खनन पर आधारित नग⇒ जैसे- झरिया (कोयला), खेतरी (ताम्बा), जादूगोडा (यूरेनियम) उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

(b) खनिज तेल उत्पादन करने वाले नगर ⇒ जैसे- असम का डिग्बोई, नूनमाटी, नरकटियागंज

(c) लकड़ी का कारोबार करने वाले नगर⇒ जैसे- काठ गोदाम, सहारनपुर (UP)

(d) मत्स्यन कार्य करने वाले नगर⇒ जैसे- तमिलनाडु का धनुषकोटी और रामेश्वरम्

(e) पशुपालन आधारित नगर ⇒ सोनपुर

(f) कृषि आधारित नगर⇒ भारत के अधिकांश कस्बाई नगर।

     (B) औद्योगिक उत्पादन करने वाले नगरों में कच्चे माल लाकर तैयार किया जाता है उसके बाद तैयार माल को बेचने का कार्य किया जाता है। भिलाई, दुर्गापुर, कुल्टी, बर्नपुर, सतना (MP), जमशेदपुर।

        औद्योगिक उत्पादन हेतु विभिन्न प्रकार की ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। अतः ऊर्जा उत्पादन के लिए अलग-2 ऊर्जा स्रोत पर अलग-2 संयंत्रों का विकास किया गया है और संयंत्रों के आस-पास नगरीय विकास को देखा जा सकता है। जैसे:

(a) नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन करने वाले नगर⇒ रावतभाटा (राजस्थान), नरौरा, कलपक्कम

(b) तापीय ऊर्जा पर आधारित नगर⇒ तालचर, संथालडीह (W.B), चन्द्रपुरा (बोकारों के पास), रामगढ़

(c) जलविद्युत पर आधारित नगर⇒ तिलैया, कुमारडुब्बी, मैथन, शिवसमुद्रम, इडुक्की

(d) खनिज तेल शोधन शाला पर आधारित नगर⇒ बरौनी, मथुरा, हल्दिया, जामनगर नगर, कोयली

(2) व्यापारिक नगर

                ऐसे नगर जहाँ पर व्यापारिक कार्य प्रमुख रूप से किये जाते हैं। इस तरह के नगरों का विकास दो स्थानों पर हुआ है।

(i) दो विभिन्न प्रकार के भौगोलिक विशेषता रखने वाले मिलन बिन्दु पर। जैसे: पर्वत तथा मैदान के मिलन बिन्दु पर हरिद्वार, कोंटासाहिब (उत्तराखंड)।

नोट :-

DAV ⇒ धौलीगंगा + अलकनंदा = विष्णुप्रयाग 

NAN ⇒ नंदाकिनी + अलकनंदा = नंदप्रयाग 

PAK ⇒ पिंडार + अलकनंदा = कर्णप्रयाग 

MAR ⇒ मन्दाकिनी + अलकनंदा = रुद्रप्रयाग 

BAD ⇒ भागीरथी + अलकनंदा = देवप्रयाग 

नगरों का कार्यात्मक वर्ग

         भारत में सभी नदियों के संगम स्थल पर धार्मिक नगर बसा हुआ है। जैसे- इलाहाबाद, वाराणसी, राजरप्पा।

मरुस्थल एवं उपजाऊ मैदान की मिलन बिन्दु पर : हनुमानगढ़, गंगानगर, जयपुर।

(ii) दो विभिन्न प्रकार के परिवहन साधनों के मिलन स्थान पर। जैसे:

(a) सड़‌क और रेलवे के मिलन बिंदु पर जैसे- बाजाल्दा (कश्मीर में उधमपुर जिला में)

(b) रेलवे मार्गो के जंक्शन पर जैसे- पंडित दीनदयाल उपाध्याय, कटनी, इटारसी।

(c) सड़‌कों के मिलन बिन्दु पर जैसे- झाँसी।

(3) राजनीतिक या प्रशासनिक नगर 

       वैसे नगर जहाँ पर मुख रूप से राजनीतिक एवं प्रशासनिक कार्य किये जाते हैं। जैसे- भारत के सभी राजधानी नगर। राजनीतिक एवं प्रशासनिक नगर को भी दो भागों में बाँटा जा सकता है:-

(i) किला नगर- जयपुर, उदयपुर, चितौड़‌गढ़, दरभंगा, जोधपुर।

(b) विशुद्ध रूप ने प्रशासनिक कार्य करने वाले नगर- दिसपुर, गाँधी नगर।

(4) सांस्कृतिक नगर

           प्राचीन काल से ही भारत में मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर इत्यादि के इर्द-गिर्द नगरों का विकास होता रहा है सांस्कृतिक नगर को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है:-

(i) धार्मिक नगर⇒ गया, मथुरा, वाराणसी, अयोध्या, देवघर।

(i) शैक्षणिक नगर⇒ नालंदा, विक्रमशीला, पिलानी, नेतरहाट, पटना, कोटा।

(iii) धार्मिक सह शैक्षणिक नगर⇒ प्रयागराज, वाराणसी, पटना।

(5) मनोरंजनात्मक नगर

      वैसे  नगर जहाँ प्राथमिक रूप से मनोरंजन के कार्य सम्पादित किये जाते हैं जो कई प्रकार के होते हैं। जैसे-

(i) पर्वतीय पर्यटक नगर ⇒ श्रीनगर, शिमला, मासुरी, दार्जलिंग, माऊण्ट आबू।

(ii) लैगून नगर ⇒ कोबलम, कुमारगम (केरल)

(iii) पुलिन नगर⇒ चेन्नई, पुरी, मुम्बई का जुहू बिच इत्यादि।

(6) परिवहन नगर

       ऐसे नगरों में परिवहन का कार्य मुख्य रूप से किया जाता है। जैसे:- डायमण्ड हार्बर, काल्का, पोर्ट द्वार (उतराखण्ड)

(7) मिश्रित नगर

       ऐसे नगरों में कई कार्य संपादित किये जाते हैं। कार्यों के आधार पर उन नगरों का पहचान कठिन हैं। वैसे नगर को मिश्रित नगर कहते है। उदा०- भारत के सभी महानगर इसके सर्वोत्तम उदाहरण है।

निष्कर्ष

           उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय नगरों को कार्यों के आधार पर कई भागों में बाँटा जाता है लेकिन कोई भी नगर विशुद्ध रूप से एक ही कार्य को संपादित नहीं करते हैं। ऐसे में बहुचर विश्लेषण विधि के आधार प नगरों का संश्लेषित वर्गीकरण प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।


Read More:-

11. नगरीय प्रभाव क्षेत्र / Urban Influence Area

11. नगरीय प्रभाव क्षेत्र


नगरीय प्रभाव क्षेत्र⇒

           नगरीय प्रभाव क्षेत्र का सामान्य तात्पर्य उस भौगोलिक प्रदेश से है जो किसी नगर के सीमा के बाहर अवस्थित है किंतु आर्थिक और सामाजिक कार्यों के लिए वह नगर पर निर्भर करता है। नगर भी कई प्रकार के कार्यों के लिए अपने आसपास के क्षेत्रों पर निर्भर करता है। जैफरसन महोदय ने उचित ही लिखा है कि नगर का विकास अपने आप नहीं होता है उनके विकास का आधार आसपास का ग्रामीण क्षेत्र निर्धारित करता है।

      गेडिज तथा स्मैल्स जैसे ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं की अवधारणा है कि नगर के बसाव स्थल (site) का विकास उसकी बसाव स्थिति (situation) पर निर्भर करता है। बसाव स्थिति ही नगर का प्रभाव क्षेत्र है।

नगरीय प्रभाव क्षेत्र

            नगरीय प्रभाव क्षेत्र शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग नॉर्दन महोदय ने पिछली शताब्दी के पाँचवें दशक के मध्य में किया था लेकिन उसके पूर्व भी नगरीय प्रभाव क्षेत्र का अध्ययन होता रहा था, लेकिन “नगरीय प्रभाव क्षेत्र” के बदले अमलैंड शब्द का अधिक प्रयोग होता था, यह जर्मन शब्द है जहाँ (अम) का अर्थ होता है चारों तरफ और लैंड का अर्थ भूमि अर्थात् नगर के चारों तरफ की भूमि जो नगर का प्रभाव क्षेत्र है। अमलैंड शब्द का विकास सर्वप्रथम एलिक्स महोदय द्वारा 1914 ई० में किया गया। इसके बाद इस शब्द का प्रयोग स्टेनली, डोड्ज, व्हिटेलसी और हैरिस जैसे विद्वानों ने किया।

        ब्रिटिश भूगोलवेत्ता ग्रीन ने नगरीय पृष्ठ (Urban Hinteland) प्रदेश शब्द का प्रारंभ में प्रयोग किया, लेकिन बाद में उन्होंने नगर प्रभाव क्षेत्र का प्रयोग किया। ब्रिटिश भूगोलवेत्ता स्मैल्स तथा गिल्बर्ट ने नगर क्षेत्र (Urban field) शब्द का प्रयोग किया लेकिन नगरीय भूगोल में द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व अमलैंड और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नगर प्रभाव क्षेत्र को सर्वाधिक मान्यता मिली।

       1970 के बाद नगरीय भूगोलवेत्ताओं द्वारा और मुख्यतः विकासशील देश के भूगोलवेत्ताओं द्वारा नगर प्रदेश शब्द का प्रयोग प्रमुखतया से किया जाता है। यद्यपि ये तीनों शब्द अमलैंड, नगर प्रभाव क्षेत्र, नगर प्रदेश एक ही संदर्भ में उपयोग किए जाते है लेकिन कार्यिक दृष्टि से तथा विधितंत्र के दृष्टि से उनमें अंतर है। अमलैंड शब्द का विकास नगर के कार्यों के प्रभाव पर आधारित है।

       नगरीय प्रभाव क्षेत्र का विकास गुरुत्वाकर्षण मॉडल पर आधारित है। जबकि नगर प्रदेश, नियोजन को ध्यान में रखकर प्रभाव क्षेत्र के बदले विकसित किया गया है। नगर प्रदेश के अंतर्गत न सिर्फ प्रभाव क्षेत्र आते है वरन् नगर को भी सम्मिलित किया जाता है।

सीमांकन की विधि:

          नगरीय प्रभाव क्षेत्र के सीमांकन की तीन प्रमुख विधियाँ है-

1. अनुभवाश्रित विधि

2. सांख्यिकी विधि

3. सांख्यिकी सह अनुभवाश्रित विधि

                द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व अनुभवाश्रित विधि की प्रधानता थी। इसके अंतर्गत नगर के कार्यों को आधार मानकर प्रमुख क्षेत्र सीमांकित किया जाता था। इस संदर्भ में अमेरिकी भूगोलवेत्ता हैरिस का कार्य महत्वपूर्ण है। उन्होंने अमेरिकी नगर (Salt Lake city) के अमलैंड का सीमांकन 12 कार्यिक चरों की मदद से किया था।

ये निम्नलिखित थे-

1. थोक व्यापार

2. खुदरा व्यापार

3. रेडियो प्रसारण (Radio Broad casting

4. बस सेवा (Bus service)

5. मंदिर परिसर (Temple Areas)

6. चिकित्सा सेवा (Medical service)

7. धार्मिक सेवा (Religious service)

8. प्रशासनिक सेवा (Administrative service)

9. समाचार पत्र का वितरण (News paper circulation)

10. शैक्षणिक सेवा (Educational service)

11. फल एवं सब्जी की उपलब्धता (Fruits and vegitables availability to the market)

12. अन्न (Grains)

            इन चरों को आधार मान कर नगर के प्रभाव क्षेत्र की बाहरी सीमा निर्धारित की गई। कई भारतीय भूगोलवेत्ताओं ने भी अनुभवाश्रित विधि का प्रयोग करते हुए भारतीय नगरों का सीमांकन किया है, लेकिन इनका कार्य द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ही संभव हो सका।

        वस्तुतः भारत में नगरीय भूगोल की पढ़ाई द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद प्रारंभ हुई। भारतीय भूगोलवेत्ताओं में R.L. Singh (B.H.U.) प्रथम थे, जिन्होंने 1955 में बनारस नगर का अमलैंड पाँच चरों की मदद से निर्धारित किया था। ये चर निम्नलिखित थे-

1. सब्जी आपूर्ति (Vegitable supply)

2. दूध आपूर्ति (Milk supply)

3. खाद्यान्न आपूर्ति (Grain supply)

4. बस सेवा (Bus service)

5. समाचार पत्र का वितरण (News paper circulation)

                 पुनः डॉ० उजागीर सिंह ने 1961 में KAVAL (A-ALLAHABAD, K-KANPUR, V-VARANASI, A-AGRA, L-LUCKNOW) नगरों के अमलैंड का सीमांकन किया। इसके लिए उन्होंने निम्नलिखित सात चरों का प्रयोग किया।

1. सब्जी आपूर्ति

2. दूध आपूर्ति

3. कॉलेज / विश्वविद्यालय (College service)

4. खाद्यान्न आपूर्ति

5. खुदरा व्यापार

6. थोक व्यापार

7. प्रशासनिक प्रभाव

        आर. एल. सिंह  की तुलना में यह ज्यादा विश्वसनीय कार्य था। यद्यपि इस विधि को व्यापक मान्यता प्राप्त थी लेकिन इसके साथ दो प्रमुख समस्याएँ थी-

         प्रथमत: एक ही नगर के लिए अलग-अलग भूगोलवेताओं द्वारा अलग-अलग प्रभाव क्षेत्र निर्धारित किया जा रहा था। इससे इस प्रकार की अध्ययन की विश्वसनीयता में कमी आती थी।

        इसकी दूसरी समस्या यह थी कि कई नगर कुछ कार्यों को व्यापक स्तर पर करते थे जबकि सही अर्थों में इसका प्रभाव क्षेत्र उतना वृहद और व्यापक नहीं होता है। वस्तुतः डॉ० बी० एल० सिंह ने इसी आलोचना को ध्यान में रखकर बनारस के धार्मिक कार्यों को आधार नहीं माना था।

      अतः द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मात्रात्मक क्रांति के प्रभाव में नगरीय भूगोलवेताओं ने गुरुत्वाकर्षण मॉडल का प्रयोग करते हुए नगर के प्रभाव क्षेत्र को सीमांकित करने का कार्य प्रारंभ किया।

       इस विधि के अंतर्गत यह माना गया कि नगर की जनसंख्या द्रव्यमान अथवा पिंड के समान है। जो भी पिंड जितना ही बड़ा होगा उसका गुरुत्वाकर्षण उतना ही अधिक होगा। नॉर्दन ने इस अवधारणा को विकसित किया कि नगर की जनसंख्या गुरुत्वाकर्षण का कार्य करती है।

      दूसरे नगरों  के द्रव्यमान के संदर्भ में बड़े नगरीय प्रभा क्षेत्र सीमांकित किया जा सकता है। रेली महोदय ने संशोधित गुरुत्वाकर्षण सूत्र विकसित किया जिसे भूगोलवेताओं ने व्यापक मान्यता दी। यह मॉडल इस प्रकार है-

P = MA X MB/d2

P = Point of Break सीमा 

MA= द्रव्यमान >MB

MB= द्रव्यमान <MA

d = दो द्रव्यमानों के बीच की दुरी 

           इस विधि को अपनाने से सीमांकित किये गये नगरीय क्षेत्र की उपयोगिता में वृद्धि होती है। नगर और प्रादेशिक नियोजकों द्वारा इसका प्रयोग किया जाने लगा। प्रसिद्ध भूगोलवेता प्रकाश राव का अनुसरण करते हुए एल०एन०सेन ने कर्नाटक के रायचूर जिला के केन्द्रीय बस्तियों का प्रमुख क्षेत्र के सीमांकन हेतु दिए गये सांख्यिकी विधि का प्रयोग किया था। जिसका सूत्र इस प्रकार है- 

 R = √T x A/U

R = Radius

T = Population of Town 

U = Total population of of the region

A =  Area of the region

            इसी विधि का प्रयोग प्रो० एल० ए० भट्ट ने भी हरियाणा के करनाल जिला के प्रभाव क्षेत्र के सीमांकन के लिए किया। लेकिन विकासशील देशों में डिकिंसन, हैगिस, और हैगेट द्वारा प्रदेश शब्द को 1970 के बाद अधिक मान्यता मिली है। नगर प्रदेश का सीमांकन मात्रात्मक सह अनुभवाश्रित विधि पर आधारित है।

         दूसरे शब्दों में यह विधि प्रदेश के लोगों के व्यवहार  तथा परिवहन साधनों के विकास को ध्यान में रखते हुए सांख्यिकी विधि द्वारा विकसित सीमाओं में आवश्यक संशोधन करता है। भारत में राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश का सीमांकन इसी विधि पर आधारित है।

       प्रथमतः गुरुत्वाकर्षण मॉडल के आधार पर सीमा निर्धारण के बाद कई चरों की मदद से उसमें आवश्यक संशोधित किया गया। वस्तुतः इस कार्य के लिए 8 चरों का प्रयोग किया गया। ये निम्नलिखित थे-

1. 1961 की जनगणना के अनुसार न्यूनतम जनसंख्या घनत्व 250 व्यक्ति वर्ग किमी०।

2. 1951-61 के दशक के न्यूनतम जनसंख्या वृद्धि दर 20%

3. कम-से-कम 30% कार्यिक जनसंख्या गैर-कृषि कार्यों में लगी हो।

4. वे सभी गाँव जो दिल्ली को प्रतिदिन दूध की आपूर्ति करते हैं।

5. वे सभी गांव जो दिल्ली के लिए प्रतिदिन ताजे सब्जी आपूर्ति करते हैं (1967)।

6. वे सभी बस्तियाँ जहाँ से प्रतिदिन कम-से-कम 1000 व्यक्ति बस द्वारा दिल्ली नगर आते है (1966)।

7.  वे सभी बस्तियाँ जहाँ से कम-से-कम 250 व्यक्ति रेल द्वारा दिल्ली नगर आते है (1966)।

8. वे सभी बस्तियाँ जहाँ से प्रतिदिन कम-से-कम 75 कॉल दिल्ली नगर आता है (1966)।

           इन चरों की मदद से गुरूत्वाकर्षण विधि द्वारा अपनाए गए सीमाओं में संशोधन किए गए। सामान्यतः यह पाया गया कि रेलमार्ग और सड़कमार्ग के किनारे प्रभाव क्षेत्र अधिक दूरी तक अवस्थित है। कुल मिलाकर इसके प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत 30242 वर्ग किमी० क्षेत्र आए। दिल्ली नगर से औसत दूरी 115 किमी० हुई और इस प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत 1981 की जनगणना के अनुसार दिल्ली के अतिरिक्त अन्य नगरीय बस्तियाँ और करीब 2000 ग्रामीण बस्तियाँ आई।

        फरीदाबाद, गुड़गांव, रोहतक, महेन्द्रनगर, सोनीपत और बहादुरगढ़ जैसी हरियाणा की बस्तियाँ इसके प्रभाव क्षेत्र में आई। राजस्थान का अलवर और यू०पी० का गाजियाबाद, बुंदेलखंड, मेरठ, हापुड़, मोदीनगर और दादर जैसी नगरीय बस्तियाँ इसके प्रभाव  में आये।

          दिल्ली नगर प्रदेश के सीमांकन से यह एक नियोजन प्रदेश के रूप में मान्यता पा चुका है। भारत के सभी महानगरों के लिए इस प्रकार का नगर प्रदेश सीमांकन और नियोजन की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है। विकासशील देशों के अधिकतर महानगरों के लिए भी यह प्रक्रिया अपनाई गई है। वस्तुतः वर्तमान समय में विकसित देशों में नगर प्रभाव क्षेत्र और विकासशील देशों में नगर प्रदेश शब्द को अधिक मान्यता प्राप्त है।

विशेषताएँ:

      भौगोलिक विशेषताओं की दृष्टि से नगर प्रभाव क्षेत्र को दो भागों में बाँटते हैं-

1. आंतरिक प्रभाव क्षेत्र (प्राथमिक अमलैंड)

2. बाह्य प्रभाव क्षेत्र (द्वितीयक अमलैंड)

1. आंतरिक प्रभाव क्षेत्र:-

        आंतरिक प्रभाव क्षेत्र को प्राथमिक अमलैंड और बाह्य प्रभाव क्षेत्र को द्वितीयक अमलैंड कहा गया है। आंतरिक प्रभाव क्षेत्र वह है जो मुख्य नगर से सतत् संबंध रखता है। यह नगर के तत्काल बाहर ग्रामीण क्षेत्र में नगरीय, उपनगरीय अथवा लगभग नगरीय भूदृश्य उत्पन्न करता है। अधिकतर भूगोलवेत्ताओं ने इसी प्रदेश को ग्रामीण-नगरीय उपांत कहा है।

      नियमतः यह ग्रामीण क्षेत्र है लेकिन व्यवहारिक तौर पर यह नगरीय क्षेत्र होता है। सामान्यतः इसके आकार तारे के समान होते हैं। नगर के बाहर निकलती हुई सड़को के दोनों तरफ निर्मित क्षेत्र ही ग्रामीण-नगरीय उपांत का निर्माण करते है।

       ग्रामीण-नगरीय उपांत का विकास मुख्यतः नगर में बढ़ते जनसंख्या दबाव का परिणाम होता है। जब नगरीय पारिस्थैतिकी असंतुलित होने लगती है तो नगर की सीमा के बाहर निर्मित क्षेत्र विकसित होने लगते है। इसमें मुख्यतः दो प्रकार के निर्मित क्षेत्र होते है-

1. उच्च आय वर्ग का क्षेत्र- उच्च आय वर्ग के लोग नगर के बहर आकर बस जाते है।  

2. उन कार्यों का विकास होता है जिसको अधिक भूमि चाहिए नगर में मूल्य अधिक होने के कारण वह कार्य नहीं होता है जैसे विश्वविद्यालय का निर्माण, प्रशानिक कार्य, औधोगिक संकुल का विकास इत्यादि। 

लेकिन विकासशील देशों में और मुख्यतः भारत में ग्रामीण-नगरीय उपांत के अंतर्गत दो अन्य निर्मित क्षेत्र होते है-

(i) उपस्तरीय अधिवासीय मकान- कम आय के वर्ग के लोग भी नगर के बाहरी क्षेत्र में भूमि खरीद कर किसी प्रकार मकान बनाते है।इसमें नगरीय विकास के नियमों के पालन नहीं होता है। अत: यह प्रारम्भ से ही देखने से मलिन बस्ती जैसा लगता है।  

(ii) नवीन निर्मित क्षेत्रों के मध्य पुराने गावों का होना कम आय वर्ग के लोगों का दबाव, नगरीय निर्मित क्षेत्र के अंतर्गत आने पर तेजी से बढ़ने लगता है। इसका परिणाम यह होता है कि उसके ग्रामीण पारिस्थैतिकी भी समाप्त हो जाते हैं और वे नगर बनने के पूर्व ही मलिन बस्ती बन जाते हैं।

         ग्रामीण-नगरीय उपांत की विशेषताओं का अध्ययन कई भूगोलवेत्ताओं ने विशेष रूप से किया है और पश्चिमी देशों के संदर्भ में R.F. Pahl का कार्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उन्होंने ग्रामीण-नगरीय उपांत की चार प्रमुख विशेषताएँ बताई है-

1. विलगाव

2. चयनित जनसंख्या का आगमन और

3. अभिगमन लोग प्रतिदिन मुख्य नगर जाते है और शाम को लौट आते है। परिणाम यह होता है कि दिन के समय जनसंख्या घनत्व कम होता है तथा रात्रि में जनसंख्या घनत्व अधिक हो जाता है।

4. भूमि का मिश्रित उपयोग- H.M. Mayor ने अमेरिकी नगरों के संबंध में बताया है कि ग्रामीण नगरीय उपांत एक संक्रमण क्षेत्र होता है जहां नगरीय भू-उपयोग में लगातार वृद्धि होती रहती है और उसी अनुपात में ग्रामीण भू-उपयोग में कमी आती है। उन्होंने यह भी लगा कि यहाँ भूमि के मूल्य में लगातार वृद्धि होती है।

       J.N.U. के प्रो० सुदेश नागिया ने 1976 में दिल्ली महानगर के ग्रामीण-नगरीय उपांत क्षेत्र का अध्ययन करते हुए इनकी निम्नलिखित छ: विशेषताएँ बताई है-

1. मलिन बस्तियाँ (Slums)

2. मिश्रित भू-उपयोग

3. कृषि भूमि में लगातार कमी आती है

4. नगरीय सुविधाओं का अभाव

5. बिखरे हुए निर्मित क्षेत्र

6. सांस्कृतिक मिश्रण का क्षेत्र (ग्रामीण-नगरीय संस्कृति के मिश्रण का क्षेत्र)

         ग्रामीण-नगरीय उपांत की ये विशेषताएँ विकासशील देशों के प्रायः सभी महानगरों में पाई जाती है।

निर्मित क्षेत्र और कार्यिक दृष्टि से ये नगर के अंग होते है प्रारम्भ में इसे नगर नियोजन के अंतर्गत सम्मिलित नहीं किया गया था लेकिन वर्तमान समय में नगर प्रदेश नियोजन  के अंतर्गगत इन प्रदेशों के भी नियोजित विकास को प्राथमिकता दी गई है। 

2. बाह्य प्रभाव क्षेत्र-

        बाह्य प्रभाव क्षेत्र मूलत: ग्रामीण क्षेत्र होता है। यह वही क्षेत्र होता है जहाँ रहने वाले लोग कुछ ही कार्यों के लिए केंद्रीय नगर पर निर्भर करता है। ऐसे कार्यों में प्रशासन, उच्च शिक्षा, थोक व्यापार, उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा, समाचार पत्र, इत्यादि प्रमुख है।

          अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इन क्षेत्रों के लोग स्थानीय बाज़ार में जाते है। वहाँ पदानुक्रमिक केन्द्रीय बस्तियों के अपने प्रभाव क्षेत्र होते है। लेकिन वे छोटे नगरीय बस्ती भी मुख्य नगरीय बस्ती पर अपने कार्यों के लिए निर्भर करता है। जैसे गौण नगरीय बस्तियाँ खुदरा व्यापार का कार्य करती है। उनका थोक व्यापार मुख्य केन्द्रीय बस्ती पर निर्भर करता है।

         वर्तमान समय में नगर प्रदेश नियोजन नीति के अंतर्गत इन प्रदेशों में भी  नगरीय सुविधाओं को विकसित कर ग्रामीण आवास की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है। विकासशील देशों में बाह्य नगर प्रभाव क्षेत्र ग्रामीण-नगरीय स्थानांतरण का कारण होता है।

     दिल्ली नगर पर बाह्य नगर प्रभाव क्षेत्र की जनसंख्या का सर्वाधिक दबाव था लेकिन वर्तमान समय में राजधानी नियोजन प्रदेश के अंतर्गत बाह्य क्षेत्रों में द्वितीयक और तृतीयक कार्यों का विकास किया जा रहा है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ग्रामीण-नगरीय स्थानांतरण प्रवृत्ति में कमी आई है। वास्तविकता यह है कि पिछले वर्षों के अंतर्गत दिल्ली महानगर में जनसंख्या का स्थानांतरण नगर प्रभाव क्षेत्र से कहीं अधिक अंतर प्रादेशिक प्रक्रियाओं से हुआ है।

निष्कर्ष:-

       ऊपर के तथ्यों और विश्लेषणों से स्पष्ट है कि अगर प्रभाव क्षेत्र का अध्ययन न सिर्फ भौगोलिक परिपेक्ष्य में आवश्यक है वरन् यह प्रादेशिक नियोजन के संदर्भ में भी आवश्यक है। अधिकतर विकासशील देशों में नगर आधारित प्रादेशिक नियोजन की नीति अपनाई गई है और उस कार्य में नगर प्रभाव क्षेत्र / नग प्रदेश का सीमांकन अनिवार्य है।


Read More:-

12. ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र / नगरीय सीमान्त क्षेत्र / ग्रामीण-नगरीय सांतत्य / Rural-Urban Fringe

12. ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र / नगरीय सीमान्त क्षेत्र / ग्रामीण-नगरीय सांतत्य


ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र के अर्थ⇒

            “ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र” का शाब्दिक अर्थ है- नगरों की सीमाओं पर स्थित वह क्षेत्र जहाँ ग्रामीण एवं नगरीय भूदृश्य की विशेषताएँ देखने को मिलती है। दूसरे शब्दों में उपान्त क्षेत्र वह क्षेत्र है जो नगर और ग्रामीण बस्ती के बीच में विकसित होते हैं तथा वहाँ पर नगरीय और ग्रामीण आर्थिक-क्रियाकलाप साथ-2 चलते रहती है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1942 ई० में बेहरबिन महोदय ने किया था।

            ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र को ग्रामीण नगरीय सांतत्य शब्द से संबोधित किया जाता है। इस संकल्पना में बताया गया है कि नगर के केन्द्र में विशुद्ध रूप से नगरीय संस्कृति होती है लेकिन ज्यों-2 नगर के केन्द्र से दूर जाते हैं त्यों-2 नगरीय संस्कृति या नगरीय विशेषता में कमी आते जाती है और ग्रामीण विशेषताएँ बढ़ने लगती हैं।

                  दूसरे शब्दों में ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र मुख्यतः दो शब्दों का संग्रह है- उसमें से एक ग्रामीण उपान्त क्षेत्र एवं दूसरा नगरीय उपान्त क्षेत्र है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ग्रामीण- नगरीय उपान्त अतिक्रमण क्षेत्र का प्रतीक है। यह नगर के चारों ओर एक ऐसी संक्रमण पेटी का प्रतिनिधित्व करता है जो न तो पूर्णतया ग्रामीण है और न ही पूर्णतया नगरीय। इस प्रकार के संक्रमण पेटी में ग्रामीण एवं नगरीय दोनों प्रकार का वातावरण देखने को मिलता है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्ष

                ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र वह भौगोलिक क्षेत्र है, जो नगर की प्रशासनिक प्रदेश की सीमा के बाहर है किन्तु नगरीय आकारिकी के विकास की प्रवृति जारी रहती है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र एक ऐसा गत्यात्मक क्षेत्र है जहाँ लगातार भू उपयोग में परिवर्तन की प्रवृति होती है अर्थात् कृषि क्षेत्र घटते जाते हैं और निर्मित क्षेत्र बढ़ते जाती है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र के प्रकार 

           ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र को दो भागों में बाँते हैं:-

(ii) प्रमुख उपान्त क्षेत्र

(ii) गौण उपान्त क्षेत्र

                प्रमुख उपान्त क्षेत्र वह है जहाँ पर नगरीय विशेषताओं का अनुपात अधिक है। और गौण उपान्त क्षेत्र वह है जहाँ पर ग्रामीण विशेषताओं का अनुपात अधिक है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र के विकास के कारण

(1) केन्द्रों उन्मुखी शक्तियों का सक्रिय होता⇒ चूँकि नगर के केन्द्र में भूमि का मूल्य और मकान का किराया बहुत अधिक होता है। जबकि उपान्त क्षेत्रों में भूमि का मूल्य और मकान का किराया कम होता है। इसलिए केन्द्रीय बस्ती के लोग बाहरी क्षेत्रों में बसने की प्रवृति रखते है।

               केन्द्रीय बस्ती में अधिवासीय क्षेत्रों की कमी और प्रदूषण ज्यादा होता है। इसलिए भी लोग बाहर की ओर जाकर बसने की प्रकृति रखते हैं। पुनः केन्द्रीय बस्ती में पार्क, खेल का मैदान, हवाई अड्‌डा, फर्म हाउस, शोरूम खोलने के लिए विस्तृत भूमि नहीं मिल पाती है जिसके कारण उपान्त क्षेत्रों का विकास होता है।

               केन्द्रीय बस्ती में प्रदूषण से संबंधित कड़े नियम लागू होते हैं लेकिन उपान्त क्षेत्रों में औद्योगिक इकाइयों के द्वारा प्रदूषणकारी पदार्थों के स्राव पर कोई रोक नहीं होता है इसलिए औद्योगिक इकाइयों प्रान्त क्षेत्रों में विकसित होकर इनके विकास में योगदान देते हैं।

(2) कर से बचने के लिए भी इस प्रदेश में औद्योगिक इकाइयों के विकसित होने से उपान्त क्षेत्र विकसित होता है।

(3) विकासशील देशों में ग्रामीण-स्थानान्तरित जनसंख्या उपान्त क्षेत्रों में भूमि का मूल्य कम होने के कारण निवास की प्रवृति रखती है जिसके कारण उपान्त क्षेत्रों का सतत विकास होता जाता है।

          कुछ कार्य नगरों के आन्तरिक भागों में संभव नहीं है। जैसे- सीवेज प्लांट का निर्माण, कचड़ा संग्रहण केन्द्र, कसाई खाना, श्मशान घाट, विस्फोटक पदार्थों के डिप्पो, माल गोडॉन इत्यादि का निर्माण संभव नहीं है। अत: इनका विकास नगर के बाहरी क्षेत्रों में ही उपयुक्त मानी जाती है। फलतः उपान्त क्षेत्रों का सतत विकास होता है।

(4) उपान्त क्षेत्र अभिगमन के क्षेत्र होते हैं जिसके कारण यहाँ पर तीव्र गति से चलने वाले परिवहन साधनों का विकास अधिक होता है। अत: सम्पन्न लोग केन्द्रीय बस्ती तक कम समय में तीव्र परिवहन साधन कर पहुँच जाते हैं जिसके कारण सम्पन्न लोग केन्द्रीय बस्ती से दू उपान्त क्षेत्र में अधिवासित होने की प्रवृति रखते है। इससे उपान्त क्षेत्रों का सतत् विकास होता है।

नगरीय उपान्त


Read More:-

13. ग्रामीण-नगरीय उपान्त की विशेषता तथा समस्याएँ

13. ग्रामीण-नगरीय उपान्त की विशेषता तथा समस्याएँ


ग्रामीण-नगरीय उपान्त की विशेषता⇒

                  ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेशों की विशेषताओं का अध्ययन कई भूगोलवेताओं ने किया है। इनमें आर. ई. पहल, उजागर सिंह, सुदेश नागिया इत्यादि का महत्वपूर्ण कार्य है। आर. ई. पहल के अनुसार विकसित देशों में ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्रों की निम्नलिखित विशेषताएं होती है-

(i) यहाँ अधिवासीय क्षेत्र विलगाव के नियम पर आधारित होता है।

(ii) यहाँ रखने वाले लोग आर्थिक-सांस्कृतिक कार्यों के लिए नगरों से जुड़े रहते हैं।

(iii) उपान्त प्रदेश में जगह-2 पर औद्योगिक प्रतिष्ठान, प्रशासनिक संस्थाएँ, शिक्षण संस्थान, शोरूम, वर्क शॉप, तथा विभिन्न आय के लोगों का अधिवासीय क्षेत्र दिखाई देता है।

(iv) उपान्त क्षेत्र चयनित जनसंख्या स्थानान्तरण का लक्ष्य क्षेत्र होता है क्योंकि नगर के केन्द्र में जनसंख्या दबाव अधिक होता है। प्रदूषण की समस्या होती है तथा अधिवासीय मकान और भूमि मँहगे होते हैं।

(v) उपान्त क्षेत्र जनसंख्या अभिगमन का क्षेत्र होता है। इन क्षेत्रों में दिन में जनसंख्या घनत्त्व घट जाती है और रात में जनसंख्या घनत्व बढ़ जाती है।

(vi) उपान्त क्षेत्र मिश्रित भूमि उपयोग के क्षेत्र होते हैं, अर्थात् खाली स्थानों में गहन कृषि का कार्य किया जाता है तो दूसरी ओर अधिवासीय कार्य भी साथ-2 किये जाते है।

(vii) कानून के दृष्टिकोण से उपान्त क्षेत्र ग्रामीण क्षेत्र होते हैं जबकि कार्य एवं जनसंख्या के दृष्टिकोण से नगर समान होते हैं।

(viii) विकसित देशों में उपांत क्षेत्र नियोजित होते हैं अर्थात् नगर नियोजन के साथ-2 उपान्त क्षेत्रों के नियोजन पर भी विशेष जोर दिया जाता है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त

         भारतीय नगरों के संदर्भ में 1961 ई० में पाँच नगर कानपुर, आगरा, वाराणसी, इलाहाबाद तथा लखनऊ (KAVAL) का अध्ययन करने के बाद ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्रों के विशेषताओं का चर्चा किया। जैसे :

(i) भूमि प्रयोग के दृष्टिकोण से यह सतत् परिवर्तन क्षेत्र होता है यानी कृषि भूमि में लगातार कमी आते जाती है और निर्मित क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी होते जाती है। यहाँ कार्यिक संरचना में भी तेजी से परिवर्तन होता है।

(ii) यहाँ लगातार घरों के आकार एवं प्रकार में परिवर्तन देखा जा सकता है।

(iii) यह मिश्रित अर्थव्यवस्था का क्षेत्र होता है।

(iv) उपान्त क्षेत्र में नगरीय सार्वजनिक सेवाओं का अभाव होता है क्योंकि यह क्षेत्र नगर प्रशासन अन्तर्गत नहीं आते हैं।

(v) उपान्त क्षेत्रों में नगरीय संस्कृति और नैतिकता का अभाव होता है।

              JNU के प्रो० सुदेश नागिया 1976 ई० में दिल्ली महानगरीय प्रदेश का अध्ययन करते हुए निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया हैं-

(i) उपांत क्षेत्र झुग्गी-झोपड़ी और गन्दी बस्ती के क्षेत्र होते हैं।

(ii) यह मिश्रित कृषि भूमि उपयोग का क्षेत्र होता है।

(iii) कृषि क्षेत्र की भूमि कम होती है लेकिन कृषि कार्यों की सघनता में वृद्धि होती है।

(iv) यहाँ नगरीय सुविधाओं का अभाव होता है।

(v) उपान्त क्षेत्र में सतत निर्माण की प्रक्रिया चलते रहती है।

(vi) उपान्त क्षेत्र में ग्रामीण एवं नगरीय संस्कृति साथ-2 मिलती है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेश के तीव्र फैलाव का कारण 

                 उपान्त क्षेत्रों के तीव्र फैलाव का दो प्रमुख कारण होते हैं:-

(i) विकसित देशों में CBD से जनसंख्या का चयनित स्थानान्तरण।

(ii) विकासशील देशों में ग्रामीण-नगरीय जनसंख्या के स्थानान्तरण का जमघट।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेश की समस्याएँ

              ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेश की निम्नलिखित समस्याएँ है:-

 (i) इसके तीव्र फैलाव के कारण यहाँ गंदी बस्तियों का विकास तेजी से होता है। लंदन, न्यूयार्क में एशियाई एवं निग्रो लोगों की गंदी बस्ती को घेटों से संबोधित करते हैं। जबकि दिल्ली के उपान्त क्षेत्रों में विकसित झुग्गी-झोपड़ी जे.जे. कोलनी के रूप में प्रसिद्ध है।

(ii) उपान्त क्षेत्रों में पूर्ण नगरीय विकास के पूर्व ही पर्यावरण असंतुलन की समस्याएँ पाई जाती है।

(ii) यहाँ अनियोजित विकास की समस्याएँ भी पायी जाती हैं।

(iii) सेवाओं एवं जन सुविधाओं का अभाव होता है। जैसे- पेयजल, सुलभ-शौचालय, मनोरंजन पार्क और स्वास्थ केन्द्र नहीं के बराबर मिलते हैं।

(v) उपांत क्षेत्रों में जल निकासी की भी गंभीर समस्या पायी जाती है।

(vi) सड़क एवं गलियों में प्रकाश प्रबंध नहीं होता है।

(vii) उपान्त क्षेत्र से बड़ी-2 एवं चौड़ी से चौड़ी सड़‌के तो अवश्य गुजरती है लेकिन सहायक लड़‌कों की स्थति दयनीय होती है।

(viii) इस प्रदेश में कई सामाजिक समस्याएँ भी होती है। जैसे- अशिक्षा, वेश्यावृति, प्रवजन, जनसंख्या वृद्धि, भूमि बेदखल, कर इत्यादि।

(ix) उपान्त क्षेत्र कई सांस्कृतिक समस्याओं से भी जूझ रहे होते हैं। इस प्रदेश में न तो नगरीय संस्कृति पायी जाती है और न हीं ग्रामीण संस्कृति।

(xi) उपान्त क्षेत्र में भूमि उपयोग संबंधी कोई नियंत्रण नहीं होता है।

निष्कर्ष:- इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ग्रामीण-नगरीय पान्त क्षेत्र बस्ती भूगोल की एक महत्वपूर्ण संकल्पना रहीं है। इस प्रदेश के विकास के कारण उनकी समस्याओं का अध्ययन करके ही संतुलित नगर नियोजन की संकल्पना विकसित की जा सकती है।

19. बहुस्तरीय नियोजन

19. बहुस्तरीय नियोजन



बहुस्तरीय नियोजनबहुस्तरीय नियोजन

          भारत भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से विविधताओं वाला देश है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए संविधान निर्माताओं ने भारत को एक संघीय राष्ट्र के रूप में स्थापित किये। भारत जैसे विविधता वाले देश में संविधान निर्माताओं ने बहुस्तरीय नियोजन की आवश्यकता महसूस किया। प्रो० R.P. मिश्रा, L.S. भट्ट और L.K. सेन जैसे भूगोलवेताओं ने भी बहुस्तरीय नियोजन को भारत के संदर्भ में उपयुक्त माना है।

     बहुस्तरीय नियोजन का तात्पर्य वैसी व्यवस्था से है जिसके तहत कई स्तर पर योजनाओं एवं विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का निर्माण, क्रियान्वयन और मूल्यांकन किया जाता है। बहुस्तरीय नियोजन कई स्तरीय राजनैतिक एवं प्रशासनिक तंत्र से मिला जुला एक तंत्र होता है जिसके ऊपर विभिन्न प्रकार कार्यक्रमों का निर्माण करने और उसे क्रियान्वयन करने का उत्तरदायित्त्व होता है।

           विश्व के कई बड़े-2 देश बहुस्तरीय नियोजन के माध्यम से ही सामाजिक-आर्थिक एवं प्रादेशिक विषमताओं को दूर करने के लिए विकास कार्यों को अंजाम दे रहे हैं।

       भारत में नियोजन का कार्य छः स्तरीय प्रदानुक्रमिक स्तर के द्वारा संचालित किया जा रहा है। जैसे-

(1) केन्द्र स्तरीय नियोजन

(2) राज्य स्तरीय नियोजन

(3) जिला स्तरीय नियोजन

(4) प्रखण्ड स्तरीय नियोजन

(5) ग्राम पंचायत स्तरीय नियोजन

(6) ग्राम सभा स्तरीय नियोजन

(1) केन्द्र स्तरीय नियोजन-

       भारत में संघीय प्रशासनिक व्यवस्था होने के कारण भारत में सामाजिक, आर्थिक नियोजन और विकास का दायित्व केन्द्र सरकार पर होता है। केन्द्र में इसका सर्वोच्च अधिकारी राष्ट्रपति होता है लेकिन वास्तविक कार्यकारिणी प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद होता है।

        केन्द्र स्तर पर योजना आयोग का गठन किया गया है। जो विभिन्न एजेन्सियों की सहायता से देश के विभिन्न संसाधनों का मूल्यांकन कर योजनाओं का निर्माण करता है। योजना आयोग के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। इसलिए इनका निर्णय राष्ट्रीय महत्त्व का होता है हालाँकि इस संस्था का गठन संविधान के तहत नहीं किया गया है।

       योजना आयोग योजनाओं का निर्माण कर राष्ट्रीय विकास परिषद के समक्ष रखता है। NDC की इच्छा पर यह निर्भर करता है कि योजना आयोग के द्वारा लाया गया कार्यक्रम को लागू किया जाए या नहीं। जब किसी योजना का NDC स्वीकार्य कर लेता है तो वित आयोग की अनुसंशा के आधार पर केन्द्र एवं राज्यों के बीच आवंटन एवं धन राशि बँटवारा किया जाता है।

     संघ स्तर पर धन-राशि की संग्रह और उसके वितरण संघसूची में उल्लेखित विषय से इकट्टा किये गये धन का होता है। केन्द्र सरकार सुरक्षा ,परिवहन, संचार विकास, वन विकास, बाद एवं सूखा जैसे विषयों पर ध्यान केन्द्रित करती है।

       केन्द्र सरकार अपना धन विभिन्न मंत्रालयों के माध्यम से खर्च करती हैं। मन्त्रिपरिषद संसद के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इन्हें प्रतिवर्ष अपना वित्तीय लेखा-जोखा संसद के समक्ष रखना पड़ता है। संसद कटौती प्रस्ताव एवं टोकेन प्रस्ताव के द्वारा खर्च पर नियंत्रण रखती है।
नोट : अब योजना आयोग का कार्य नीति आयोग द्वारा किया जाने लगा है।

(2) राज्य स्तरीय नियोजन-

        भारत में राज्यों के नियोजन प्रदेश के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। हालांकि भारत में राज्यों का गठन विशुद्ध रूप में भौगोलिक एवं आर्थिक कारकों के आधार पर नहीं किया गया है। बल्कि राज्यों के गठन में भाषा को अधिक महत्व दिया गया है। राज्य स्तर पर कई ऐसे नियोजन के कार्य किये गए है जो राजनीतिक सीमाओं का उल्लंघन करते हैं। जैसे कृषि-जलवायु प्रदेश का नियोजन।

               राज्य स्तर पर नियोजन का कार्य राज्य नियोजन बोर्ड के द्वारा किया जाता है। यह योजना आयोग के समान सशक्त और सक्षम नहीं है क्योंकि किसी भी योजना या कार्यक्रम को मॉडल का निर्धारण योजना आयोग ही कर देती है। ऐसे में राज्य नियोजन बोर्ड का प्रमुख कार्य विभागीय खर्च का लेखा-जोखा रखने के अलावे कोई कार्य नहीं रह जाता है।

       दूसरा इसके महत्व में कमी आने का कारण यह है कि राज्य मंत्रिमण्डल के सदस्य लघु स्तर पर अपने क्षेत्र के लोगों से सीधे जुड़े होते हैं। ऐसे में मंत्रिमण्डल के सदस्य विकास के लिए अपनी बात राज्य वियोजन बोर्ड में नहीं रखते हैं बल्कि मंत्रिमंडल की बैठक में रखते है।

               राज्य नियोजन बोर्ड और राज्य सरकार राज्य सूची के आधार पर विकास कार्यों को अंजाम देती है। इसके अलावे केन्द्र सरकार के द्वारा जो कार्यक्रम लागू किये जाते हैं। उसे राज्य में क्रियान्वित करने का उत्तरदायित्व होता है।

           राज्य सूची के विषय पर नियोजन का कार्य करने का अधिकार राज्य सरकार को सौपा गया है। केन्द्र सरकार के तर्ज पर ही राज्य व संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल होते हैं जो मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हैं। राज्यपाल राज्य एवं केन्द्र के बीच कड़ी का कार्य करते हैं।

       राज्य विधानसभा में भी प्रत्येक वर्ष राज्य सरकार को वित्तीय लेखा-जोखा रखना पड़ता है। विधानसभा यहाँ भी कटौती प्रस्ताव, टोकन प्रस्ताव के माध्यम से खर्च पर नियंत्रण रखती है। राज्य सरकार मूलतः राजमार्गो के निर्माण, सिंचाई, वन और विद्युत से संबंधित नियोजन कार्यों को अंजाम देती है।

(3) जिला स्तरीय नियोजन- बहुस्तरीय नियोजन की सबसे प्रमुख इकाई जिला नियोजन को माना गया है। इसे नीचे के मॉडल से समझा जा सकता है-

केन्द्र

राज्य

जिला

प्रखण्ड

पंचायत

           जिला स्तरीय नियोजन ऊपरी स्तरीय केन्द्र एवं राज्य और निचली स्तरीय प्रखण्ड एवं पंचायत के बीच योजक कड़ी का कार्य करता है। पुन: संवैधानिक एवं प्रशासनिक महत्व के साथ-2 यह एक ऐसी लघु स्तरीय इ‌काई हैं जहाँ पर प्रशासक एवं नियोजक आम जनता के संपर्क में रहती है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए चौथी पंचवर्षीय योजना में केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को यह सलाह दिया था कि आप प्रत्येक जिला में जिला नियोजन बोर्ड का गठन करें।

       पुनः छठी पंचवर्षीय योजना के दौरान केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार को सलाह दिया कि आप जिला नियोजन सृजित करें ताकि जिला अधिकारियों के ऊपर जो कार्य का दबाव बना रहता है उस दबाव को कम किया जा सके।

            नवीन पंचायती राज व्यवस्था के तहत लघु स्तरीय विकास के लिये प्रत्येक जिला में जिला परिषद के गठन का प्रावधान किया गया है। इस परिषद में तीन प्रकार के सदस्य शामिल होते हैं।

प्रथम- जिला के निर्वाचित सभा सदस्य जैसे- लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधान परिषद के सदस्य,

दूसरा- प्रत्येक जिला के प्रखण्ड स्तरीप प्रमुख नगर निगम एवं नगरपालिका के निर्वाचित सदस्य,

तीसरा- प्रत्येक जिला के जिला स्तरीय पदाधिकारी, इंजीनियर तथा कुछ विशेषज्ञ लोग इसमें शामिल होते हैं।      

     जिला परिषद के तीन प्रमुख कार्य होते है-

(i) लघु स्तर पर नियोजन के नीतियों का निर्धारण करना और पंचायत स्तरीय नियोजन के बीच समन्वय स्थापित करना।

(ii) प्राथमिकता के आधार पर धन राशि का आवंटन करना।

(iii) विकास कार्यों का मूल्यांकन खर्च किये धन राशि का Audit तथा केन्द्र एवं राज्य से जरूरत के अनुसार धन राशि की माँग करना तथा पंचायतों को यह सलाह देना, इनका कार्य सांवैधानिक प्रावधानों के अनुसार Tax लगा सकते है।

     जिला परिषद निर्वाचित सदस्यों एवं पदेन पदाधिकारियों का परिषद होता है जिसके कारण राजनीतिक हितों के टकराव की संभावना बनी रहती है। ऐसे में नियोजन कार्य प्रभावित होने की संभावना बनी रहती है।

(4) प्रखण्ड स्तरीय नियोजन-

          प्रथम पंचवर्षीय योजना के दौरान ही 1952 ई० में सामुदायिक विकास प्रखंडों की स्थापना की गई थी जिसका मुख्य उद्देश्य था- ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक विकास करना।

             भारत एक कृषि प्रधान देश है। इसलिए कृषि आधारित नियोजन पर बल दिया गया। कुछ राज्यों में प्रखण्ड स्तर पर B.A.O. (Block Agriculture Officer) की नियुक्ति की। लेकिन कुछ ऐसा नहीं कर पाये। कुछ राज्य सामुदायिक स्तर पर नियोजन अथवा कृषि पदाधिकारी की नियुक्त न कर B.D.O. की नियुक्ति कर संतुष्ट हो गये। लेकिन BDO के उपर अनेक प्रकार के प्रशासनिक जबावदेही होने के कारण विकास कार्यों को इन लोगों ने गौण कर दिया। पुनः 1976 ई0 के बाद पंचायतों का चुनाव न करवाये जाने के कारण सामुदायिक प्रखण्ड की अवधारणा असफल हो गई।

          समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) छठी पंचवर्षीय योजना के दौरान जब IRDP लागू किया जाने लगा तो इसके लिए सामुदायिक विकास प्रखण्ड को ही एक इकाई के रूप में चुना गया। 1977 ई० में गठित दाँतावाला कमिटि ने यह विचार प्रकट किया कि IRDP को न केवल प्रखण्ड स्तर पर लागू किया जाय, बल्कि निम्नलिखित 13 कार्यों को संपादित करने हेतु जबावदेही को भी सुनिश्चित जाय। ये 13 कार्य निम्नलिखित थे-

(1) कृषि और उससे संबंधित विकास कार्य

(2) लघु सिंचाई की व्यवस्था करना।

(3) मृदा संरक्षण की दिशा में कार्य करना

(4) पशुपालन एवं मुर्गीपालन की व्यवस्था करना।

(5) मत्स्य पालन

(6) वानिकी कार्यक्रम

(7) कृषि परिसंस्करण

(8) बाजार का प्रबंधन

(9) कुटीर एवं लघु उद्योग का विकास

(10) प्रशिक्षण कार्यक्रम

(11) कल्याणकारी कार्यक्रम

(12) चिकित्सा, शिक्षा, पेयजल, पोषण, आवास जैसे सामाजिक सेवाओं का विकास।

(13) स्थानीय आधारभूत संरचनाओं का विकास।

         स्पष्ट है कि दातावाला कमिटि की अनुशंसा के आधार पर उपरोक्त कार्यों को संचालित करने हेतु प्रखण्ड स्तरीय नियोजन की नींव रखी गयी। नवीन पंचायती राज व्यवस्था के तहत पंचायत समीति का गठन कर इस संस्था को लोकतांत्रिक बनाने का प्रयास किया है ताकि नियोजन के कार्यों को और त्वरित किया जाय।

ग्राम पंचायत एवं ग्रामसभा        

     73 वें संविधान संशोधन के तहत नियोजन हेतु सबसे निचले स्तर पर पंचायती राज व्यवस्था का गठन किया गया है। भारत में इसका गठन बलवन्त राय मेहता समिति की अनुसंशा पर किया गया था। 73वें संविधान संशोधन के तहत इसे संवैधानिक दर्जा दिया गया तथा 11वीं अनुसूची में पंचायतों को 29 कार्य सौपे गये। इनमें से कुछ प्रमुख कार्य निम्नलिखित है:-
(1) कृषि विकास

(2) भूमि सुधार,

(3) लघु सिंचाई विकास,

(4) पशुपालन, दुग्ध कृषि, कुक्कुट पालन

(5) मत्स्यपालन

(6) सामाजिक वानिकी

(7) लघु एवं कुटीर उद्योग

(8) कृषि प्रसंस्करण उद्योग

(10) आवास, ईंधन, चारा

(11) पेयजल सुविधा का विकास।

(12) सार्वजनिक वितरण प्रणाली

(13) प्राथमिक शिक्षा एवं चिकित्सा

(14) गरीबी निवारक कार्यक्रम

(15) विद्युतीकरण

(16) गैर परम्परागत ऊर्जा स्रोतों का विकास

(17) ग्रामीण परिवहन का विकास           

     इत्यादि का उत्तरदायित्व सौंपा गया। यह व्यवस्था किया गया है कि ग्राम पंचायतों के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक वित्तीय वर्ष में दिये गये उनके कार्यों के प्राथमिकता का निर्धारण करें और ग्रामसभा से अनुमति लेकर पंचायत समीति के पास भेजती है। पंचायत समीति ग्राम पंचायत के द्वारा भेजती है।

       पंचायत समिति ग्राम पंचायत के द्वारा भेजे गये प्रस्ताव की जाँच करती है और पुनः प्राथमिकता के आधार पर ही लागू करने के लिए जिला परिषद के पास अनुसंशा करती है। जिला परिषद से जब अनुमति मिल जाती है तो ग्राम पंचायत इसे लागू करती है और पंचायत समीति उस‌ पर निगरानी रखती है। स्वर्ण जयन्ती स्वरोजगार योजना, नरेगा जैसे कार्यक्रम पंचायत स्तर पर ही संचालित किये जा रहे हैं।

निष्कर्ष :

       अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में बहुस्तरीय नियोजन की व्यवस्था की गई है जो लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है। लेकिन राज्यों के द्वारा पंचायतों से पूरा अधिकार नहीं दिये जाने के कारण सुचारू रूप से पंचायतें कार्य नहीं कर पा रही हैं। ऐसे में जल्द-से-जल्द राज्यों को पदानुक्रमिक नियोजन में विश्वास करते हुए नीचले स्तर के संस्थाओं को और मजबूत करना चाहिए। केंद्र को चाहिए कि गाँव के विकास हेतु सीधे पंचायतों को धन उपलब्ध करवाये और बहुस्तरीय नियोजन प्रणाली के तहत उस प निगरानी रखा जाय।


Read More:-

 14. उपनगर या अनुषंगीनगर की सकल्पना

 14. उपनगर या अनुषंगीनगर की सकल्पना


 उपनगर या अनुषंगीनगर की सकल्पना ⇒ 

              अनुषंगीनगर का तात्पर्य उस नगरीय बस्ती से है जो किसी वृहद नगर अथवा महानगर के आसपास उसके प्रभाव से विकसित होता है। यह जनसंख्या आकार तथा कार्यिक संरचना के दृष्टि से मुख्य नगर की तुलना में छोटा होता है। यह नगर आर्थिक तथा सामाजिक कार्यों के लिए मुख्य नगर पर निर्भर करता है। ऐसे नगरों को कोई एकाकी अस्तित्व नहीं होता है। 20वीं शताब्दी के दौरान और मुख्यतः द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उपनगरों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। इसके दो प्रमुख कारण हैं-
1. जैविक कारक
2. मानवीय कारक

            जैविक कारक के अंतर्गत यह माना जाता है कि नगर एक जीवित प्राणी के समान है जैसे आयु वृद्धि के साथ परिवार के सदस्यों की संख्या में वृद्धि होती है उसी प्रकार नगरीय अकार और आयु में वृद्धि होती है तो अनुषंगीनगर विकसित होते है। मुख्य नगर में जब जनसंख्या घनत्व में भारी वृद्धि हो जाती है तथा भूमि के मूल्य और किराये के मूल्य में अप्रत्याशित वृद्धि होने लगती है तो लोग स्वत: मुख्य नगर छोडकर नगर के नजदीक अनुकूल जगह पर बसने लगते है जो अंतत: अनुषंगीनगर का रूप ले लेता है।

        मानवीय कारक के अंतर्गत नगरीय पारिस्थैतिकी को संतुलित होने के लिए नियोजित उपनगर विकसित किये जाते है। पश्चिमी देशों के अधिकतर अनुषंगीनगर नियोजित है जबकि विकासशील देशों में अनियोजित उपनगरों का भी विकास हुआ है। सामान्यतः उपनगरों का विकास विशिष्ट कार्यों के आधार पर होता है। आर्थिक विशेषताओं के आधार पर अनुषंगीनगर छ: प्रकार के होते है जो निम्नलिखित है-

अनुषंगीनगर के प्रकार  अनुषंगीनगर का उदाहरण (मुख्य नगर का नाम)
1. रिहायशी उपनगर लोनी (दिल्ली), येलाहंका (बैंगलोर), साऊथ हॉल (लंदन), पाटलीपुत्र कॉलोनी (पटना)
2. औद्योगिक उपनगर गाजियाबाद, फरीदाबाद, नोएडा, बहादुरगढ़, बलभगढ़ (दिल्ली के उपनगर)
3. प्रशासनिक उपनगर गांधीनगर (अहमदाबार) दिसपुर (गुआहाटी)
4. परिवहन उपनगर  जसीडीह (देवघर), वाल्टेयर (विशाखापतनम)
5. शिक्षा उपनगर Cambridge (लंदन का उपनगर), शांति निकेतन (ढोलपुर का उपनगर)
6. मिश्रित उपनगर  फूलवारी शरीफ (पटना), चास (बोकारो)

           ऊपर के तालिका से स्पष्ट है कि अनुषंगीनगर महानगर अथवा बड़े नगर के कुछ विशिष्ट कार्यों को करता है। इससे बड़े नगर पर जनसंख्या दबाव में कमी आती है तथा ग्रामीण तथा ग्रामीण-नगरीय स्थानांतरण की प्रवृत्ति में परिवर्तन होता है। दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई जैसे महानगर के उपनगर भी जनसंख्या दबाव के अंतर्गत आ गए है।

        प्रारंभ में ये आकर्षण शक्ति के रूप में कार्य करते है लेकिन विकासशील देशों में ग्रामीण जनसंख्या दबाव और बेरोजगारी के कारण आकर्षण शक्ति दबाव शक्ति में बदल जाती है और यही कारण है कि पूर्णतः नियिजित होने के बावजूद गाजियाबाद और फरीदाबाद जैसे अनुषंगीनगरों में मलिन बस्तियों का तेजी से विकास हुआ है। अतः यह आवश्यक है कि अनुषंगीनगरों के नगरीय पारिस्थैतिकी को संतुलित रखने के लिए या तो उसका विस्तार किए जाय या फिर जनसंख्या और कार्य की सीमा निर्धारित की जाए; अन्यथा ये नगर भी पूर्णतः मलिन बस्तियों में बदल सकते है।

अनुषंगीनगर का उदाहरण-

         कलकत्ता का अनुषंगीनगर– बजबज (औद्योगिक अनुषंगीनगर), दमदम (Residential अनुषंगीनगर), उत्तर पाड़ा (औद्योगिक अनुषंगीनगर) मुंबई का थाने जो मिश्रित अनुषंगीनगर और चेन्नई का पेराम्बु औद्योगिक अनुषंगीनगर है।

उपनगर

  कलकत्ता का अनुषंगीनगर

उपनगर

उपनगर


Read More:-

error: