3. Multidisciplinary Course MDC-2 For Humanities

Multidisciplinary Course MDC-2 For Humanities

(Climatology and Oceanography)

(Theory)

Solved Questions Paper 2024



(Patliputra University Patna)

Multidisciplinary Course MDC

UG (Regular) (Sem.-II) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

(MDC-2: Multidisciplinary Course)

GEOGRAPHY

(Climatology and Oceanography)

Time: Three Hours]

[Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the sections as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question. [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए।

1. (i) All activity related to climate happens in this layer of atmosphere:

(a) Stratosphere

(b) Troposphere

(c) Ionosphere

(d) None of the above

मौसम सम्बन्धी सभी घटनाएँ, वायुमण्डल के इस परत में होती है:

(a) समतापमण्डल

(b) क्षोभमण्डल

(c) आयनमण्डल

(d) उपरोक्त से कोई नहीं

उत्तर- (b) क्षोभमण्डल

(ii) Which layer protect the Earth from Sun’s harmful rays?

(a) Oxygen layer

(b) Ozone layer

(c) Nitrogen layer

(d) Green house gas

कौन-सी परत पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाती है?

(a) ऑक्सीजन परत

(b) ओजोन परत

(c) नाइट्रोजन परत

(d) ग्रीन हाउस गैस

उत्तर- (b) ओजोन परत

(iii) Which among the following is

(a) Hailstorm 

(b) Shower

(c) Thunderstorm

(d) All of the above

इनमें से कौन वर्षा का एक रूप है?

(a) ओलावृष्टि

(b) बौछार

(c) तूफान

(d) उपरोक्त से सभी

उत्तर- (d) उपरोक्त से सभी

(iv) As one gaes above in the atmosphere, the air pressure :

(a) Increases

(b) Decreases

(c) Remain same

(d) None of the above

वायुमण्डल में ऊपर की तरफ बढ़ने पर, वायुदाब:

(a) बढ़ता है

(b) घटता है

(c) एक जैसा रहता है

(d) उपरोक्त से कोई नहीं

उत्तर- (b) घटता है

(v) This is a local wind of India:

(a) Loo

(b) Chinook

(c) Siroco

(d) Harmattan

यह भारत की स्थानीय पवन है:

(a) लू

(b) चिनूक

(c) सिरोको

(d) हरमट्टान

उत्तर- (a) लू

(vi) Where do temperate cyclones come?

(a) 5o – 10o north latitude

(b) 5o – 15o north latitude

(c) 5o – 10o south latitude

(d) 5o – 15o south latitude

शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात कहाँ आते हैं?

(a) 5o – 10o उत्तरी अक्षांश

(b) 5o – 15o उत्तरी अक्षांश

(c) 5o – 10o दक्षिणी अक्षांश

(d) 5o – 15o दक्षिणी अक्षांश

उत्तर- शीतोष्ण चक्रवात दोनों गोलार्द्धों में 35o से 65o अक्षांशों के बीच मध्य-अक्षांशीय क्षेत्र के ऊपर सक्रिय होते हैं।

(vii) Find out the wrong pair:

(a) China Sea – Typhoon

(b) India – Cyclone

(c) Eastern Island – Hurricane

(d) Australia-Tornado

गलत जोड़ा बताइए :

(a) चीन सागर – टाइफून

(b) भारत – चक्रवात

(c) पूर्वी द्वीप समूह – हरीकेन

(d) आस्ट्रेलिया- टॉरनैडो

उत्तर- (d) आस्ट्रेलिया- टॉरनैडो

(viii) Highest saline sea in the world is:

(a) Salt lake

(b) Red sea

(c) Dead sea

(d) Sambher lake

विश्व के सबसे अधिक खारे सागर का नाम है:

(a) साल्ट झील

(b) लाल सागर

(c) मृत सागर

(d) सांभर झील

उत्तर- (c) मृत सागर

(ix) Going from equator to pole the salinity:

(a) Decreases

(b) Increases

(c) Remain same

(d) None of the above

विषुवतरेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर लवणता:

(a) घटती है

(b) बढ़ती है

(c) समान रहती है

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (a) घटती है

(x) Andaman-Nikobar ridge is situated in:

(a) Indian Ocean

(b) Pacific Ocean

(c) Atlantic Ocean

(d) Arctic Ocean

अंडमान-निकोबार कटक स्थित है:

(a) हिन्द महासागर में

(b) प्रशान्त महासागर में

(c) अन्ध महासागर में

(d) आर्कटिक महासागर में

उत्तर- (a) हिन्द महासागर में

Semester-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. State the importance of ozone layer in the atmosphere.

वायुमण्डल में ओजोन परत का महत्त्व बताइए।।

Discuss the composition of atmosphere.

वायुमडण्ल के संघटन की चर्चा कीजिए।

4. Why does Antarctic Bottom water have more nutrient than North Atlantic Bottom water?

उत्तर अटलाण्टिक नितल जल की तुलना में अन्टार्क्टिक तलीय जल में अधिक पोषक तत्व क्यों होते हैं?

5. Explain different air pressure belts on Earth.

पृथ्वी पर पायी जाने वाली विभिन्न वायुदाब की पेटियों को समझाइए।

6. Write the characteristics of anticyclone.

प्रतिचक्रवात की विशेषताओं को लिखिए।

7. Describe the general characteristics of ocean bottom.

महासागरीय तली की सामान्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Attempt any three questions of the following. [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Describe the structure and composition of atmosphere
with suitable diagram.

वायुमंडल की संचना एवं संघटन का सचित्र वर्णन कीजिए।

9. Discuss the different types of rainfall.

वर्षा के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।

10. Describe the mechanism of cyclone.

चक्रवात की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।

11. Explain Ocean bottom relief of either Pacific or Indian ocean.

प्रशान्त अथवा हिन्द महासाग के महासागरीय तल उच्चावच की व्याख्या कीजिए।

12. What is Ocean Salinity? Describe its different sources.

महासागरीय खारापन क्या होता है? इसके विभिन्न स्रोतों का वर्णन कीजिए।

4. Multidisciplinary Course or MDC-2 / Solved Questions Paper 2024

Multidisciplinary Course or MDC-2 For Science and Commerce

Climatology and Oceanography (Theory)

Solved Questions Paper 2024



(Patliputra University Patna)

Multidisciplinary Course or MDC

UG (Regular) (Sem.-II) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

(MDC-2: Multidisciplinary Course)

GEOGRAPHY

(Climatology and Oceanography)

Time: Three Hours]

[Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figure in the marginindicate full marks. Answer from all sections as directed.

परीक्षार्थी यथासम्भव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Multiple Choice Questions)

(बहुविकल्पीय प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question. [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए।

1. (i) The uppermost layer of atmosphare is:

(a) Troposphere

(b) Stratosphere

(c) Ionosphere

(d) Exosphere

वायुमण्डल की सबसे ऊपरी परत है-:

(a) क्षोभमण्डल

(b) समतापमण्डल

(c) आयनमण्डल

(d) बाह्ममण्डल

उत्तर- (d) बाह्ममण्डल

(ii) Which one of the following gases constitute the major portion of the atmosphare.

(a). Oxygen

(b) Argon

(c) Nitrogen

(d) Carbon dioxide

निम्नलिखित में से कौन-सी गैस वायुमण्डल में सबसे अधिक मात्रा में मौजूद है?

(a) ऑक्सीजन

(b) आर्गन

(c) नाइट्रोजन

(d) कार्बन डाइऑक्साइड

उत्तर- (c) नाइट्रोजन

(iii) Ozone layer is found in which layer of atmosphare?

(a) Troposphere

(b) Stratosphere

(Ionosphere

(d) Exosphere

ओजोन परत, वायुमण्डल की किस परत में पायी जाती है?

(a) क्षोभमण्डल

(b) समतापमण्डल

(c) आयनमण्डल

(d) बाह्ममण्डल

उत्तर- (b) समतापमण्डल

(iv) Which gas from the following gases protect us from Sun’s harmful ultraviolet rays?

(a) Nitrogen

(b) Ozone

(c) Oxygen

(d) Carbon dioxide

निम्नलिखित में से कौन-सी गैस हमें सूर्य की पराबैंगनी विकिरण से बचाती है?

(a) नाइट्रोजन

(b) ओजोन

(c) ऑक्सीजन

(d) कार्बन डाइऑक्साइड

उत्तर- (b) ओजोन

(v) The monsoon rainfall in India in which type of rainfall?

(a) Convectional rainfall

(b) Orographic rainfall

(c) Cyclonic rainfall

(d) None of the above

भारत की मानसून वर्षा, इनमें से किस तरह की वर्षा है?

(a) संवहनीय वर्षा

(b) पर्वतीय वर्षा

(c) चक्रवातीय वर्षा

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (b) पर्वतीय वर्षा

(vi) What happens when on move towards height from the surface on Earth?

(a) Air pressure increases

(b) Air pressure decreases

(c) Air pressure remain same

(d) None of the above

पृथ्वी पर धरातल से ऊँचाई की तरफ बढ़ने से क्या होता है?

(a) वायुदाब बढ़ता है

(b) वायुदाब घटता है

(c) वायुदाब सामान्य रहता है

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (b) वायुदाब घटता है

(vii) An imaginary line joining places of equal air pressure at sea level is called:

(a) Isobar

(b) Isohyet

(c) Isohaline

(d) None of the above

सागर तल पर समान वायुदाब वाले स्थानों को दर्शाने वाली काल्पनिक रेखा को कहते हैः

(a) समदाब रेखा

(b) समवृष्टि रेखा

(c) समलवण रेखा

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (a) समदाब रेखा

(viii) The part continent which submerged into water is called:

(a) Continental slope

(b) Continental shelf

(c) Deep sea plain

(d) Ocean deep

महाद्वीप का वह भाग जो महासागरीय जल में डूबा रहता है, कहलाता है

(a) महाद्वीपीय मग्नढ़ाल

(b) महाद्वीपीय मग्नतट

(c) गहरा सागरीय मैदान

(d) महासागरीय गर्त

उत्तर- (b) महाद्वीपीय मग्नतट

(ix) Average depth of Pacific Ocean is:

(a) 1280 meters

(b) 4000 meters

(c) 3920 meters

(d) 5000 meters

प्रशान्त महासागर की औसत गहराई हैः

(a) 1280 मीटर

(b) 4000 मीटर

(c) 3920 मीटर

(d) 5000 मीटर

उत्तर- (b) 4000 मीटर

(x) Highest saline sea in the world is:

(a) Salt lake

(b) Red Sea

(c) Dead Sea

(d) Sambher lake

विश्व में सबसे अधिक खारा सागर हैः

(a) साल्ट लेक

(b) लाल सागर

(c) मृत सागर

(d) सांभर झील

उत्तर- (c) मृत सागर

Section-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. What is Troposphere? What is its importance?

क्षोभमण्डल क्या है? इसका क्या महत्व है?

3. Explain precipitation and its different types.

वर्षण एवं इसके विभिन्न प्रकारों को समझाइए।

4. Show different air pressure belts on Earth.

पृथ्वी पर वायुदाब की विभिन्न पेटियों को दर्शाइए।

5. Describe local winds around the world.

विश्व में पाये जाने वाले स्थानीय पवनों का वर्णन कीजिए।

6. What are the sources of salinity in ocean water?

महासागरीय जल में खारेपन के क्या स्रोत हैं?

7. Describe general characteristics of ocean bottom.

महासागरीय तल की सामान्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following. [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Describe structure and characteristics of different layers of atmosphare.

वायुमण्डल की विभिन्न परतों की बनावट और विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

9. Explain different types of rainfall.

वर्षा के विभिन्न प्रकारों की व्याख्या कीजिए।

10. What is Cyclone? Differentiate tropical and temperate cyclones.

चक्रवात किसे कहते हैं? उष्णकीटबन्धीय एवं समशीतोष्ण चक्रवातों में अंतर स्पष्ट कीजिए।

11. Describe bottom surface of either Pacific or Indian Ocean.

प्रशान्त महासाग अथवा हिन्द महासागर के धरातलीय स्वरूप का वर्णन कीजिए।

12. What do you understand by oceanic salinity? Describe its world distribution pattern.

महासागरीय लवणता से आप क्या समझते हैं? इसके विश्व वितण प्रतिरूप का वर्णन कीजिए।

1. Major Course (Climatology and Oceanography) / MJC-2 Questions Paper 2024

Major Course or MJC-2

Climatology and Oceanography (Theory)

Solved Questions Paper 2024



(Patliputra University Patna)

Major Course

UG (Regular) (Sem.-II) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

(MJC-2: MAJOR CORE COURSE)

GEOGRAPHY

(Climatology and Oceanography)

Time: Three Hours

Maximum Marks: 70

Note: Candiates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the parts as directed.

परीक्षार्थी यथासंभव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

PART-A/भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Select the correct option from each question. Each question carries 2 marks. [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंकों का है।

1. (i) What are two forms of oxygen found in the atmosphere?

(a) Water and Oxygen

(b) Water and Ozone

(c) Ozone and Oxygen

(d) None of the above

वायुमण्डल में पाये जाने वाले ऑक्सीजन के दो रूप क्या हैं?

(a) जल एवं ऑक्सीजन

(b) जल एवं ओजोन

(c) ओजोन एवं ऑक्सीजन

(d) उपरोक्त से कोई नहीं

उत्तर- (b) जल एवं ओजोन

(ii) The transfer of heat energy through the movement of a mass of substance from one place to another place is called:

(a) Conduction

(b) Convection

(c) Condensation

(d) Radiation

किसी पदार्थ के द्रव्यमान के एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने से ऊष्मा ऊर्जा का स्थानान्तरण कहलाता हैः

(a) चालन

(b) संवहन

((c) संघनन

(d) विकिरण

उत्तर- (b) संवहन

(iii) When two different air masses meet, the boundary zone between them is a:

(a) Front

(b) Fault

(c) Current

(d) Cyclone

जब दो अलग-अलग वायु राशियां मिलती हैं, तो उनके मध्य का सीमा क्षेत्र एक…… होता है।

(a) वाताग्र

(b) अंश

(c) धारा

(d) चक्रवात

उत्तर- (a) वाताग्र

(iv) The centre of a cyclone is a calm area. It is called ….of the storm.

(a) arm

(b) head

(c) heart

(d) eye

चक्रवात का केन्द्र एक शांत क्षेत्र है। इसे तूफान का…… कहा जाता है।

(a) भुजा

(b) सिर

(c) हृदय

(d) नेत्र

उत्तर- (d) नेत्र

(v) Which of the following codes signify the cold climate with dry winters acording to Koppen?

(a) EF

(b) Df

(c) ET

(d) Dw

कोपेन के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा संकेत शीत जलवायु के साथ शुष्क शीत ऋतु को दर्शाता है?

(a) EF

(b) Df

(c) ET

(d) Dw

उत्तर- (d) Dw

(vi) Which of the following gases has the maximum contribution to global warming?

(a) Chlorofluorocarbons (CFCs)

(b) Methane (CH4)

(c) Sulfur Hexafluoride (SF6)

(d) Carbon dioxide (CO)

निम्नलिखित में से किस गैस का भूमण्डलीय तापन में सर्वाधिक योगदान है?

(a) क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs)

(b) मीथेन (CH4)

(c) सल्फर हेक्साफ्लोराइड (SF)

(d) कार्बन डाइऑक्साइड (CO)

उत्तर- (d) कार्बन डाइऑक्साइड (CO)
(vii) A mid-ocean ridge is an underwater mountain system formed by:

(a) Plate tectonics

(b) Earthquake

(c) Ocean currents

(d) Submarine landslides

मध्य महासागरीय कटक एक जलमग्न पर्वतीय प्रणाली है, जिसका निर्माण होता है :

(a) प्लेट विवर्तनिकी से

(b) भूकम्प से

(c) महासागरीय धाराओं से

(d) अन्तः सागरीय भूस्खलन से

उत्तर- (a) प्लेट विवर्तनिकी से

(viii) Which of the following oceans has the shape of the english alphabet ‘S’?

(a) Atlantic ocean

(b) Arctic ocean

(c) Pacific ocean

(d) Indian ocean

निम्नलिखित में से किस महासागर का आकार अंग्रेजी वर्णमाला के ‘S’ के समान है?

(a) अटलांटिक महासागर

(b) आर्कटिक महासागर

(c) प्रशान्त महासागर

(d) हिन्द महासागर

उत्तर- (a) अटलांटिक महासागर

(ix) The deepest part of the Indian Ocean is:

(a) Mariana Trench

(b) Sunda Trench

(c) Tonga Trench

(d) Bonin Trench

हिन्द महासागर का सबसे गहरा भाग है:

(a) मेरियाना गर्त

(b) सुण्डा गर्त

(c) टोन्गा गर्त

(d) बोनिन गर्त

उत्तर- (b) सुण्डा गर्त

(x) The salinity of ocean water is calculated as the amount of salt (in gm) dissolved in——gm of seawater.

(a) 10,000

(b) 100

(c) 1000

(d) More than one of the above

महासागरीय जल की लवणता की गणना….. ग्राम सागरीय जल में घुले लवण की मात्रा (ग्राम में) के रूप में की जाती है?

(a) 10,000

(b) 100

(c) 1000

(d) उपरोक्त में से एक से अधिक

उत्तर- (c) 1000

 

PART-B/ भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. Each question carries four marks.    [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न चार अंकों का है। [4×5=20]

2. What do you understand by heat budget of the Earth? Explain in detail.

पृथ्वी के ताप बजट से आप क्या समझते हैं? विस्तार से समझाइये।

3. What is an Air Mass? Write the name of different types of air masses.

वायुराशि क्या है? वायुराशियों के विभिन्न प्रकारों के नाम लिखिए।

4. What is Tropical Cyclone? What is the name given to tropical cyclone in China and Japan?

उष्णकटिबन्धीय चक्रवात क्या है? चीन और जापान में उष्णकटिन्धीय चक्रवात को क्या नाम दिया गया है?

5. What are the indicators of climate change?

जलवायु परिवर्तन के संकेतक क्या हैं?

6. How many types of ocean relief are there? Which is the largest relief in ocean?

महासागरीय उच्चावच के कितने प्रकार होते हैं? महासागर में सबसे बड़ा उच्चावच कौन-सा है?

7. What do you mean by salinity of ocean water? What is the average salinity of ocean water?

महासागरीय जल की लवणता से आप क्या समझते हैं? महासागरीय जल की औसत लवणता क्या है?

PART-C/ भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following. Each question carries three marks.

[3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न तीन अंकों का है।

Present an account of the composition and structure of atmosthere.

वायुमण्डल के संघटन एवं संरचना का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

9. What is front? Explain various types of fronts with diagrams.

वाताग्र क्या है? वाताग्र के विभिन्न प्रकारों की व्याख्या रेखाचित्रों के साथ कीजिए।

10. Critically examine the classification of climate as given by Koppen.

कोपेन द्वारा दिये गये जलवायु वर्गीकरण का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

11. Describe the major features of the bottom relief of Indian Ocean.

हिन्द महासाग के नितल की प्रमुख उच्चावच विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

12. Give an account of the horizontal distribution of salinity in ocean water.

महासागरीय जल में लवणता के क्षैतिज वितरण का विवण दीजिए।

31. Wind Rose / Star Diagram (पवनारेख / तारा आरेख)

31. Wind Rose / Star Diagram

(पवनारेख / तारा आरेख)



         पवनारेखों को तारा आरेख भी कहा जाता है। किसी स्थान के पवनों की दिशा तथा बारंबारता प्रकट करने के लिए इस आरेख का प्रयोग किया जाता है।

      तारा आरेखों को वृत्त या घड़ी आरेख (Clock Diagram), रोज आरेख (Rose Diagram) तथा वेक्टर आरेख (Vector Diagram) आदि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। इन आरेखों के द्वारा सदिश या वेक्टर मूल्यों को केंद्र या मूल बिंदु से संबंधित दिशाओं में सरल रेखाएँ या कॉलम खींचकर प्रकट करते हैं तथा इन आरेखों या कॉलमों की लंबाइयों को दिए हुए मूल्यों के अनुपात में मापनी (Scale) के अनुसार निश्चित करते हैं।

      किसी स्थान पर दिशाओं के अनुसार वर्ष में पवनों की बारंबारता दिखलाने के लिए यह आरेख बहुत उपयोगी होते हैं परंतु आर्थिक वितरण जैसे व्यापार की दिशा अथवा विभिन्न दिशाओं में जनसंख्या के स्थानांतरण के आंकड़ों को भी इन आरेखों के द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।

पवनारेख के प्रकार (Types of Wind Rose)

1. साधारण पवनारेख (Simple Wind Rose):-

    इस आरेख के द्वारा किसी स्थान की एक वर्ष में पवन की दिशा तथा शांत दिनों की संख्या को प्रदर्शित किया जाता है। पवन चलने के दिनों को लंबी रेखाओं द्वारा तथा शांत पवन वाले दिनों को केन्द्र पर बनाये गये छोटे वृत्त के भीतर अंकों में लिखकर इंगित करते हैं।

उदाहरण:

(i) निम्नलिखित आँकड़ों की सहायता से जयपुर का पवनारेख बनाइए।

Wind Direction / पवन की दिशा
N NE E SE S SW W NW Calm
No. of Days 24 23 25 15 29 58 77 79 17

रचना विधि:

      साधारण पवनारेख बनाने हेतु पहले सुविधानुसार कोई अर्द्धव्यास लेकर एक छोटा वृत्त खींचते हैं एवं इसके भीतर शांत पवनों की दिश (17) लिखते हैं। इसके बाद वृत्त के केन्द्र से दी हुई दिशाओं की ओर सरल रेखाएँ खींचते हैं। अब इन रेखाओं में किसी उचित मापनी के अनुसार वृत्त की परिधि से मापते हुए संबंधित दिनों की संख्या के बराबर दूरियाँ काटकर रेखाओं के सिरों का सरल रेखाओं द्वारा मिला देते हैं। इस प्रकार बने अष्टभुज के प्रत्येक कोने पर उसकी दिशा लिख देते हैं एवं आरेख के नीचे दिनों की मापनी बनाकर Windrose पूर्ण कर लेते हैं।

       सामान्यतः साधारण पवन आरेख में पवन की आठ दिशाएँ (उत्तर, उत्तर-पूर्व, पूर्व, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम तथा उत्तर-पश्चिम) प्रकट की जाती है परंतु आवश्यकता होने पर उत्तर-उत्तर पूर्व, उत्तर पूर्व-पूर्व आदि शेष आठ दिशाओं की पवनों की बारंबारताओं को भी आरेख में प्रदर्शित किया जा सकता है।

2. पवन तथा दृश्यता रोज (Wind and Visibility Rose):

     ये साधारण पवनारेखों की भाँति ही बनाए जाते हैं, परन्तु इनमें केवल इतना अंतर है कि इस आरेख में किसी स्तंभ की लंबाई उस दिशा में चलने वाली पवनों के कुल दिनों में उत्तम दृश्यता (Good Visibility) अथवा अत्यल्प दृश्यता (Bad Visibility) के दिनों की बारंवारता का प्रतिशत प्रकट करती है।

उदाहरण :

(ii) किसी काल्पनिक स्थान पर प्रेक्षित निम्नलिखित आँकड़ों के आधार पर एक पवन तथा दृश्यता रोज की रचना कीजिए।

 पवन की दिशा
पवन की बारम्बारता (दिन) N NE E SE S SW W NW Calm
30 20 30 50 12 20 80 100 23
अत्यल्प दृश्यता की बारंबारता (दिन) 12 14 18 20 3 3 8 5

रचना विधि:

    पवन तथा दृश्यता रोज बनाने के लिए सर्वप्रथम एक छोटा वृत्त बनाकर उसमें शांत दिनों की संख्या (23) लिख दिया जाता है। उसके बाद कोई उचित मापनी लेकर पहले बतलाई गयी विधि के अनुसार वृत्त की परिधि से संबंधित दिशाओं में अत्यल्प दृश्यता की बारंबारताओं के प्रतिशत मूल्यों के बराबर लंबाईयों वाले स्तंभ खींचा जाता है। अंत में अब आरेख के नीचे मापनी बनाक आरेख पूर्ण क लिया जाता है।

Wind Rose

33. Interpretation of Weather Map (मौसम मानचित्रों का विश्लेषण)

33. Interpretation of Weather Map

(मौसम मानचित्रों का विश्लेषण)



मौसम सम्बन्धी तत्व और उनके निरूपण (Weather Phenomena and their Representation)

संघनन- जल के गैसीय अवस्था से तरल या ठोस अवस्था में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को संघनन कहा जाता है। यदि हवा का तापमान ओसांक बिन्दु से नीचे पहुंच जाये तो संघनन की क्रिया प्रारंभ होती है। संघनन की प्रक्रिया पर वायु के आयतन, तापमान, वायुदाब एवं आर्द्रता का प्रभाव पड़ता है।

यदि संघनन हिमांक (Freezing Point) से नीचे होता है, तो तुषार (Frost), हिम (Snow) एवं पक्षाभ मेघ (Cirrus Cloud) का निर्माण होता है।

यदि संघनन हिमांक से ऊपर होता है तो ओस, कुहरा, कुहासा एवं बादलों का निर्माण होता है।

 यदि संघनन पृथ्वी के धरातल के समीप होता है तो ओस (Dew), पाला (Frost), कुहरा एवं कुहासे का निर्माण होता है।

 जब संघनन की क्रिया अधिक ऊँचाई पर होती है तो बादलों का निर्माण होता है।

ओस (Dew)- हवा का जलवाष्प जब संघनित होकर छोटी-छोटी बूंदों के रूप में धरातल पर पड़ी वस्तुओं (घास पत्तियों आदि) पर जमा हो जाता है, तो इसे ओस कहा जाता है। ओस के निर्माण के लिए साफ आकाश, लगभग शांत वायुमंडल, उच्च सापेक्षिक आर्द्रता एवं ठंडी तथा लंबी रात का होना आवश्यक है।
ओस के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि तापमान हिमांक से ऊपर हो।

तुषार या पाला (Frost)- जब संघनन की क्रिया हिमांक से नीचे होती है (0°C या उससे कम पर) तो जलवाष्प जल कणों के बदले हिम कणों में परिवर्तित हो जाता है। इसे ही तुषार या पाला कहा जाता है। पाला के निर्माण के लिए उन सभी अन्य परिस्थितियों का होना आवश्यक है, जो ओस के निर्माण के लिए हैं।

नोट :- ओस या पाला ऊपर से नहीं गिरता है, बल्कि यह वहीं बनता है जहां हम इसे देखते हैं।

कुहरा (Fog)- कुहरा एक प्रकार का बादल है। जब जलवाष्प का संघनन धरातल के बिल्कुल समीप होता है तो कुहरे का निर्माण होता है। कुहरे में कुहासे की तुलना में जल के कण अधिक छोटे एवं सघन होते हैं।

कुहासा (Mist)- कुहासा भी एक प्रकार का कुहरा है, जिसमें कुहरे की अपेक्षा दृश्यता (Visibility) दूर तक रहती है। इसमें दृश्यता एक किलोमीटर से अधिक, परंतु दो किलोमीटर से कम होती है।

धुआंसा (Smog)- बड़े-बड़े शहरों में फैक्टरियों के निकट जब कुहरे में धुएं के कण मिल जाते हैं तो उसे धुआंसा (Smoke+Fog = Smog) कहा जाता है। धुआंसा कुहरे की तुलना में और अधिक सघन होता है एवं इसमें दृश्यता और भी कम होती है।

बादल (Clouds):-

    जब वायु का तापमान ओसांक (Dew-point) से नीचे गिर जाता है, तो जलवाष्प धूल तथा धुँए के कणों पर केन्द्रित होकर बादल का रूप धारण कर लेती है। बादलों को निम्नलिखित चार प्रमुख प्रकारों में विभक्त किया जाता है:-

1. वर्षा-मेघ (Nimbus):-

    काले-काले मेघ जब आकाश घेर लेते हैं तथा पृथ्वी के निकट होते हैं, तो इन्हें वर्षा-मेघ कहते हैं। इनसे काफी वर्षा होती है।

2. स्तरी मेघ (Stratus):-

   ये पृथ्वी से 300-2500 मीटर की ऊँचाई पर होते हैं तथा आकाश पर पूर्णतया छा जाते हैं। इनका निर्माण दो भिन्न पवनों के मिलने से होता है।

3. कपासी पेघ (Cumulus):-

   इनकी आकृति, रूई के ढेर जैसी होती है। इन बादलों में गड़गड़ाहट होती है।

4. पक्षाभ मेघ (Circus):-

   ये बहुत अधिक ऊँचाई (5-13 किमी) पर होते हैं। प्राय: ये घुँघराले बालों जैसे दिखाई पड़ते हैं। इनके द्वारा वर्षा नहीं होती।

समवायु-दाब रेखाओं का अध्ययन

    मौसम-मानचित्रों में समवायु-दाब रेखाएँ खींची जाती हैं। किसी भी मौसम-मानचित्र का अध्ययन इन रेखाओं के अध्ययन पर ही अधिकतर अवलम्बित होता है। समभार रेखाओं के अनेक आकार होते हैं, परन्तु इसके निम्न तीन मुख्य आकार हैं:

(क) चक्रवात (Cyclone),

(ख) प्रतिचक्रवात (Anti-Cyclone),

(ग) कोल (Coal)।

चक्रवात (Cyclones):-

    इसमें समदाब-रेखाओं का आकार वृत्ताकार होता है तथा रेखाएँ मिली होती हैं और वायु-दाब भीतर की ओर कम होता जाता है। सबसे कम वायु-दाब रेखा के भीतर ‘Low’ लिखा रहता है। प्रत्येक चक्रवात एक निश्चित दिशा की ओर चलने लगता है। उत्तरी गोलार्द्ध के चक्रवात में पवनें अन्दर की ओर घड़ी की सुइयों के विपरीत दिशा में चलती हैं।

प्रतिचक्रवात (Anti Cyclone)

     चक्रवात का उल्टा प्रतिचक्रवात होता है। प्रतिचक्रवात के केन्द्र में एक अपना वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता और हवाएँ केन्द्र से बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। उत्तरी गोलार्द्ध में प्रतिचक्रवात Clock wise और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anticlock wise घुमने की प्रवृति रखती है।

चक्रवात और प्रतिचक्रवात में अंतर

1. चक्रवात की स्थिति में निम्न वायुदाब केन्द्र और प्रतिचक्रवात की स्थिति में उच्च वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है।

2. चक्रवात में हवा बाहर से केन्द्र की ओर आने की प्रवृत्ति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में केन्द्र से बाहर की ओर जाने की प्रवृत्ति रखती है।

3. चक्रवात की स्थिति में परिवर्तन के फलस्वरूप बादल, वर्षण एवं तेज हवाएं जैसी मौसमी परिस्थतियाँ उत्पन्न होती हैं। वहीं प्रतिचक्रवात की स्थिति में मौसम साफ होने की प्रवृति रखती है।

4. चक्रवात के केन्द्र में हवाएँ नीचे से ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में हवाएँ ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृति रखती है।

5. जिस स्थान पर चक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। ठीक उसके ऊपर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। अत: स्पष्ट है कि चक्रवात और प्रतिचक्रवात जलवायु विज्ञान की दो अलग-2 धारणाएँ है।

ब्यूफोर्ट संकेत (Beaufort Notation)

b नीला आकाश

h ओले (Hail)

bc आकाश कुछ साफ (Sky partly clean)

p वर्षा के मेघ गुजर रहते हैं (Passing Shower)

e आकाश अधिकतर बादलों से घिरा हुआ (Generally cloudy sky)

f धुन्ध (Fog)

m कुहरा (Mist)

o आकाश बादलों से सम्पूर्ण घिरा हुआ (Over-cast sky)

x पाला (Frost)

w ओस (Dew)

d फुहार (Drizzle), वर्षा (Rain), हिम (Snowfall)

q अल्पकालिक झंझा (Squall)

t गरज (Thunder)

I बिजली (Lighting)

s सहिम वृष्टि (Sleet)

i कभी चमक कभी गरज (Intermittent)

Interpretation of Weatherकोल (Col):-

    दो चक्रवातों अथवा दो प्रति चक्रवातों से घिरे मध्यस्थ क्षेत्र को हम ‘कोल’ कहते हैं। यहाँ पर पवन शांत रहती है। ग्रीष्म ऋतु में गरज तथा विद्युत की कड़क सुनाई देती है।

गौण अपदान (Secondary Depresion):-

     जब विशाल चक्रवात में छोटा वायु-दाब क्षेत्र (Low Pressure Area) बन जाता है, तो उसे गौण अपदाब कहते हैं। इसमें मौसम अस्थायी (Varaible) होता है, कभी शांत होता है, कभी विद्युत की गरज होती है। गौण अवदाब मुख्य चक्रवात के साथ ही आगे बढ़ता है।

‘V’ आकार का चक्रवात:-

    जब चक्रवात का न्यून वायु-दाब क्षेत्र ‘V’ के आकार का हो जाता है, तो से Trough of Low Pressure कहते हैं। इसके अगवाड़े में गर्मी तथा वर्षा होती है। यदि वह उष्ण वाताग्र (Warm Front) प्रकार का होता है तो धूप तथा ठंड होती है। इसमें वायु-दाब बाहर की ओर बढ़ता जाता है।

फान (Wedge):-

    अनेक बार दो चक्रवातों के बीच समदाब रेखाओं का आकार उल्टे ‘V’ की भाँति हो जाता है तथा भीतरी वायु-दाब अधिक होता जाता है। इसके अग्रभाग (Front Part) में मौसम शांत तथा सुहावना होता है, ज्योंहि पिछला भाग (Rear Part) आता है, मौसम बादलों से घिरा तथा खराब हो जाता है।

भारत का सामान्य मौसम मानचित्र

    भारतीय मौसम मानचित्रों के अध्ययन में देश में पाई जाने वाली विभिन्न मौसमों की जानकारी की अधिक आवश्यकता पड़ती है। परम्परानुसार भारत में एक वर्ष की अवधि को तीन ऋतुओं में विभक्त किया जाता है:

(i) जाड़े की ऋतु (नवम्बर से फरवरी के अन्त तक)

(ii) गर्मी की ऋतु (प्रारम्भिक मार्च से मध्य जून तक)

(iii) वर्षा ऋतु (मध्य जून से अक्टूबर के अन्त तक)

    मौसम की दृष्टि से वर्षा का महत्व अधिक होता है इस मौसम के मानचित्रों पर अनेक संश्लिष्ट दृश्य भी उभरते है।

दक्षिणी-पश्चिमी मानसून की ऋतु (मध्य जून से मध्य सितम्बर या अक्टूबर तक):-

     इस मौसम के मानचित्र की प्रमुख विशेषता यह है कि उत्तरी-पश्चिमी पाकिस्तान के ऊपर निम्न वायु दाब केन्द्र तथा हिन्द महासागर में प्रायः श्रीलंका के पश्चिम उच्च वायु दाब पाया जाता है। इसके फलस्वरूप उच्च दाब का एक उभार या गर्त बना जाता है और पश्चिमी तट पर विशेष रूप से उसके दक्षिणी भाग में समदाब रेखाएँ कुछ उत्तर की ओर मुड़ जाती है। प्रायद्वीप के दक्षिणी अर्द्धभाग में ये रेखाएँ दक्षिण की ओर मुड़ जाती है।

    पश्चिम के आधे भाग पर ये प्रायः पश्चिम दिशा में फैली होती है। पूर्व में समदाब रेखाओं की आकृति चक्रवात की उपस्थिति पर निर्भर करती है। उत्तरी प्रायद्वीप को पार करने वाली समदाब रेखाएँ प्रायः चक्रवात को दक्षिण भाग में घेरने की कोशिश करती है। यदि चक्रवात नहीं है तो ये प्राय: उत्तर की ओर से बंगाल की खाड़ी के ऊपर मुड़ जाती है और हिमालये से 60° के कोण पर मिलती है।

लौटती मानसून की ऋतु (मध्य सितम्बर से दिसम्बर)-

    मानसून के समाप्त होते ही पश्चिमोत्तर भारत का निम्न दाब क्षेत्र धीरे-धीरे उच्च दाब में बदल जाता है। पश्चिमी पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम में एक उच्च दाब का क्षेत्र उपस्थित रहता है। इस केन्द्र से गंगा के मैदान में उच्च दाब का एक कटक (Wedge) फैला रहता है फिर भी यहाँ दाब प्रवणता बहुत कम रहता है। समदाब रेखाएँ पहले उत्तरी पश्चिमी पाकिस्तान के ऊपर पश्चिम से उत्तर-पूरब की ओर चलती है और फिर गुजरात तथा काठियावाड़ा से पूर्व पश्चिम हो जाती है।

    श्रीलंका के पूर्व में बंगाल की खाड़ी पर एक निम्न दाब का क्षेत्र उपस्थित रहता है। जब गंगा के मैदान पर उच्च दाब क्षेत्र रहता है, पश्चिमी पाकिस्तान तथा पश्चिमी भारत पर फैली समभार रेखाएँ उच्च दाब के पश्चिम किनारे के समान्तर हो जाती है और उनकी दिशा उत्तर-दक्षिण हो जाती है।

शीत ऋतु या जाड़े का मौसम (जनवरी से मार्च के मध्य तक)-

     इस समय के मौसम मानचित्र पर उत्तरी-पश्चिमी उच्च दाब के स्थान पर एक हल्का निम्न दाब क्षेत्र बन जाता है। क्षेत्र की वास्तविक स्थिति चक्रवात पर निर्भर करती है।

ग्रीष्म ऋतु (मार्च से जून तक)-

    इस समय गर्मी अधिक बढ़ जाने से भारत के उत्तरी-पश्चिम भाग और पाकिस्तान के ऊपर निम्न दाब का क्षेत्र बनना प्रारम्भ हो जाता है। बाद में वह गंगा के मैदान में फैलता है। उच्च दाब क्षेत्र अरब सागर पर स्थित रहता है। अतः समभार रेखाएँ पश्चिमी घाट पर उत्तर से दक्षिण मुँह की हो जाती हैं। मध्य प्रायद्वीप के उत्तरी भाग में समदाब रेखाएँ अपनी दिशा को बदल उत्त-पूर्वी दिशा में मुड़ जाती हैं। वायुदाब रेखाओं के कम होने के कारण दाब प्रवणता अल्प तथा इस प्रकार वायुगति अधिक तेज नहीं होती।

भारतीय मौसम मानचित्रों की व्याख्या

     किसी दैनिक मौसम मानचित्र का अध्ययन निम्न शीर्षकों में किया जाता है:-

1. भूमिका- दिन, मानचित्र की तिथि तथा समय, ऋतु आदि।

2. आकाश की दशा (Sky Conditions)

(i) मेघ आवरण की मात्रा (Amount of Cloudiness)

(ii) मेघों के प्रकार या प्रकृति

(iii) अन्य घटनाएँ-कोहरा, बिजली, तुषार आदि वायुमण्डलीय तत्व

3. वायुदाब का वितरण:

(i) मौसमी निम्न वायुदाब (Low) क्षेत्र की स्थिति

(ii) मौसमी उच्च वायुदाब (High) को स्थिति

(iii) समदाब रेखाओं की प्रवृत्ति (Trends of isobars)

(iv) वायुदाब को प्रवणता (Pressure Gradient)

(v) चक्रवात को उपस्थिति और मौसम पर उसका प्रभाव

4. वायु (Wind)

(1) पवन की दिशा और

(ii) पवन की गति

5. सामान्य वायुदाब से विचलन

6. वर्षा का वितरण (Precipitation)

(i) सामान्य वितरण, साधारण, अधिक, कम आदि

(ii) भारी वर्षा के प्रमुख क्षेत्र

7. सामान्य तापमान से विचलन (Departure from normal Temp.)

8. समुद्र की दशा (Sea Condition)

   उपर्युक्त शीर्षकों के अन्तर्गत सामान्यतः प्रातः कालीन (08.30) मुख्य मानचित्र का सविस्तार वर्णन मानचित्र पर उद्धत कुछ प्रमुख संकेतों की सहायता से करते हैं। छोटे मानचित्र भी उपरोक्त समय की दशा को ही दर्शाते हैं जिनका उपयोग पठन में किया जाता है।

शीतकाल का ऋतु मानचित्र (बुधवार 31 जनवरी, सन् 1973 शक्, 11 माघ 1894):-

(a) प्रारम्भिक सूचना-

    शीतकाल के इस मुख्य ऋतु मानचित्र में बुधवार दिनांक 31 जनवरी, सन् 1973, भारतीय समयानुसार प्रातः 8.30 बजे की मौसम की वास्तविक दशाओं का चित्रण किया गया है। ऋतु मानचित्र के ऊपरी भाग में दिनांक, दिन एवं भारतीय समय के अतिरिक्त ग्रीनविच समय (0300 GMT) दिया है। यहाँ ई० सन् के साथ-साथ शक् संवत् भी दिया रहता है। ऋतु मानचित्र में मंगलवार दिनांक 30 जनवरी, सन् 1973, भारतीय समयानुसार सायं 5.30 17.30) की मौसम की वास्तविक दशाओं का वर्णन किया गया है। मौसम की वास्तविक दशाओं का वर्णन करते समय दोनों पृष्ठों के मुख्य एवं सहायक मानचित्रों की भी आवश्यकतानुसार सर्वत्र सहायता ली गयी है।

(b) वायुदाब व्यवस्था-

    मानचित्र में वायुदाब व्यवस्था अधिक सरल है। इसमें वायुदाब की सामान्य प्रवणता हिन्द महासागर से उ०-५० भारत की ओर है। सम्पूर्ण मानचित्र में समदाब रेखाएँ दूर- दूर फैली हुई हैं। हिन्द महासागर एवं केरल तट के सहारे 1014 मिलीबार की समदाब रेखा अण्डाकार स्वरूप बनाती हुई सर्पिल मार्ग से पूर्व की ओर चली गयी है। अधिकांश दक्षिण का पठार 1014 और 1016 मिलीबार समभार रेखा की सीमा में आ जाता है।

निम्न वायुदाब के क्षेत्र-

    ऋतु मानचित्र में स्पष्टत: उ० प० भारत और संलग्न पाकिस्तान में निम्न वायुदाब का विकास हुआ है। यहाँ पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में 1018 मिलीबार समभार रेखा अण्डाक्ति बनाती है। इसी भाँति दक्षिणी पठार के पश्चिमी भाग को 1010 मिलीबार समभार रेखा घेरे हुए हैं। यह दोनों ही निम्न भार के केन्द्र हैं।

उच्च वायुदाब के क्षेत्र-

    सर्वाधिक वायुदाब पृष्ठ छः के मुख्य ऋतु मानचित्र में उत्तरी-पश्चिमी भारत एवं पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में विकसित हुआ है। यहाँ 1022 मिलीबार वायुदाब पाया जाता है। यह वायुदाब उत्तरी राजस्थान और उत्तरी-पूर्वी भारत में उपूसी और सलंग्न वर्मा में विकसित हुआ है। सामान्यतः सारे ही उत्तरी भारत में 1020 से 1022 मिलीबार के बीच उच्च वायुदाब की दिशा पायी जाती है। यहाँ की समभार रेखाएँ उत्तर प्रदेश के पश्चिम में पश्चिमोत्तर दिशा में और पूर्व में पूर्वोत्तर दिशा में मुड़ गयी हैं।

     दक्षिणी भारत में 1014, 16 और मिलोबार की तीन समभार रेखाएँ अरब सागर से भूमि की ओर तेजी से मुड़कर एवं पुनः सागर की ओर झुककर पूर्व की ओर चली गयी हैं। उत्तरी भारत में इनका वितरण अधिक व्यवस्थित एवं दो उपखण्डों पूर्वोत्तर और पश्चिमोत्तर में बँट गया है। समदाब रेखाओं की उपयुक्त व्यवस्था से तो यही आभास होता है कि स्थानीय अपवादों को छोड़ कुछ घण्टों तक सर्वत्र मौसम खुला एवं स्वच्छ रहना चाहिए।

सामान्य वायुदाब के विचलन (प्रातः 8.30 बजे)-

    दक्षिणी-पूर्वी कोने में दिये गये लघु मानचित्र को ध्यान से देखने से स्पष्ट हो जाता है कि प्रायः सारे ही देश में औसत से अधिक वायुदाब की दशा का विकास हुआ है। केवल मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र के कुछ ही भागों में औसत वायुदाब मिलता है। सामान्यतः ज्यों-ज्यों हम उत्तर की ओर जाते हैं वायुदाब उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। सर्वाधिक विचलन पश्चिमोत्तर एवं पूर्वोत्तर भारत +4 मिलीबार और दक्षिण भारत में +2 मिलीबार से कम पाया गया है।

वायु दिशा एवं वायुवेग-

    ऋतु मानचित्र के उत्तरी-पश्चिमी भाग में वायु प्रायः शान्त है। उत्तरी भारत के अधिकांश भागों में वायु धीमी गति (5 नॉट या कम) से बह रही है। कंवल बारीसाल (बंगला देश) के निकट इसकी सर्वाधिक गति 20 नॉट प्रति घण्टा कित की गई है। इस ऋतु मानचित्र में कंवल उत्तरी भारत में ही ‘अ’ श्रेणी के बीस ऐसे केन्द्र बनाए गए हैं जहाँ कि वायु शान्त है। दक्षिणी भारत के अधिकांश केन्द्रों पर वायु प्रवाह की गति 5 से 15 नॉट के बीच है। इस भाग में वायु प्रवाह की सामान्य दिशा अरब सागर की ओर है। निकोबार के दक्षिण-पश्चिमी सागर में वायु गति 20 नॉट प्रति घण्टा अंकित की गई है। यहाँ पश्चिम की ओर प्रवाहित हो रही है।

1.5 किमी0 ऊँचाई पर वायु की स्थिति-

    दक्षिण-पूर्व कोने में ऑकत लघु मानचित्र में 1.5 किमी० की ऊँचाई पर देश के विभिन्न स्टेशनों से लिये गये प्रेक्षण के आधार पर वायु की दिशा एवं गति दर्शायी गई है। मानचित्र के अध्ययन से स्पष्ट है कि उपर्युक्त ऊँचाई पर वायु की गति 5 से 20 नॉट के बीच है। पश्चिमी तट एवं हिमालय के ढालों के निकट वायु प्रवाह अपेक्षाकृत तेज है। सम्पूर्ण उत्तरी भारत में वायु की दिशा भूमि की भाँति ही है। दक्षिणी भारत के विक्षोभ मण्डल में पवन धीमी गति से पश्चिम से पूर्व, उत्तर-पूर्व से पश्चिम की ओर बह रही है।आकाशीय दशा एवं मेघाच्छन्नता-

    शीत ऋतु होने से देश के अधिकांश मौसम केंन्द्र मेघ रहित है। पूर्ण मेघाच्छन्नता श्रीनगर, शिमला, चांदा और देहरादून में पायी जाती है। खण्डित मेघाच्छन्नता कहीं-कहीं उत्तरी मध्य और दक्षिण-पश्चिमी भारत एवं दोनों सागरों में एक-चौथाई से तीन-नौथाई तक पायी जाती है। सर्वत्र निम्न मेघों का ही वितरण दर्शाया गया है। आधे से अधिक मेघान्छन्नता भारत में जबलपुर और दक्षिणी भारत में औरंगाबाद व बंगलौर और मिनिकोय, कोलम्बो एवं वर्मा के दक्षिण में मिलती है। आकार में मेघों के अतिरिक्त जबलपुर के निकट तड़ित (lightning) अंकित की गयी है। मानचित्र में पूर्ण मेघाच्छन्नता पश्चिमी उत्तर प्रदेश, नई दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में अंकित की गई है।

वर्षा और भूतल पर आर्द्रता के विभिन्न रूप-

     उच्च भार एवं प्रायः मेघरहित आकाश होने से देश के अधिकांश भाग में वर्षा रहित मौसम अंकित किया गया है। ऋतु मानचित्र में शिमला और श्रीनगर के निकट हिमपात होता हुआ बताया गया है। दिल्ली और इलाहाबाद में हल्का कुहरा एवं कहीं-कहीं धुंध (Haze) भी फैली हुई है। पिछले 24 घण्टों में कहीं भी जलवृष्टि, हिमपात या ओलावृष्टि अंकित नहीं की गयी है।

समुद्र की दशा-

    बंगाल की खाड़ी और अरब सागर की दशा प्रायः शान्त बतायी गयी है। बंगाल की खाड़ी में गंगा के डेल्टा के मुहाने, मद्रास और खाड़ी के दीपों के निकट कहीं भी दशा विशेष को उल्लिखित नहीं किया गया है। मद्रास व म्यांसार के बीच सागर मध्य तरंगित (moderate) बताया गया है। इसी भाँति अरब सागर में द्वीपों के निकट सागर कुछ अशान्त है, शेष भागों में यह प्रायः शान्त है।

न्यूनतम तापमान का औसत दशा से विचलन (सायं 8.30 बजे):-

    पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार सम्पूर्ण उत्तरी-पश्चिमी भारत में औसत न्यूनतम तापमान से वास्तविक न्यूनतम तापमान 2° स 4°C कम रहे हैं। गुजरात, दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान और उत्तर प्रदेश में 4°C या अधिक नीचे तापमान रहे हैं। दूसरी ओर सम्पूर्ण दक्षिणी-पूर्वी और पूर्वी भारत के तापमान औसत से 2°C तक ऊँचे अंकित किये गये हैं। कर्नाटक, महाराष्ट्र एवं आंध्र के संलग्न भागों में वृद्धि 4°C तक अंकित की गई है। औसत तापमान रेखा या 0°C विचलन रेखा मार्मा गोआ एवं भारत के मध्यवर्ती भागों से होकर सुदूर पूर्वी भारत में पूर्वी हिमालय की ओर मुड़ गई है।

अधिकतम तापमान का औसत दशा से विचलन (सांय 5.30 बजे):-

    दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार देश के सारे उत्तर और मध्य भाग में अधिकतम तापमान औसत से 2° से 4°C तक कम अंकित किये गये हैं। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश के वास्तविक तापमान 4°C से भी कम अंकित किये गये हैं। देश के शेष भागों में अधिकतम तापमान प्राय: औसत के निकट रहे। केवल महाराष्ट्र में कहीं-कहीं औसत से 2°C अधिक तापमान अंकित किये गये। औसत समताप रेखा अत्यधिक बल खाती हुई भूमि की ओर मुड़कर पूर्व एवं पूर्वोत्तर भारत में पूर्वी हिमालय की ओर मुड़ गयी है।

ग्रीष्मकाल का ऋतु मानचित्र (बुधवार 16 मई सन् 1973, शक 26 वैशाख 1895)

(i) प्रारंभिक सूचना:-

    ग्रीष्मकाल के इस मुख्य ऋतु मानचित्र में बुधवार दिनांक 16 मई, सन् 1973, भारतीय समयानुसार प्रातः 8.30 की मौसम की वास्तविक दशा का चित्रण किया गया है। मानचित्र के ऊपरी भाग में भारतीय समय के साथ-साथ ग्रीनविच समय (3.00 बजे) एवं ईसवी सन् के साथ-साथ शक् सम्वत् भी दिया गया है। मानचित्र में मंगलवार 15 मई, सन् 1973 भारतीय समयानुसार सायं 5.30 बजे की मौसम की वास्तविक दशा का चित्रण किया गया है। मौसम की वास्तविक दशा का वर्णन करते समय दोनों ही मुख्य मानचित्रों एवं उनके नीचे के चारों लघु मानचित्रों की भी आवश्यकतानुसार सहायता ली गयी है।

(ii) वायुदिशा एवं वायुवेग:-

    मुख्य ऋतु मानचित्र के अधिकांश भाग में पवन धीमी गति से बह रही है। उत्तरी भाग में वायु की गति 10 से 5 नॉट के बीच और मध्यवर्ती भाग में 5 से 15 नॉट के बीच ऑकत की गई है। देश में सबसे तेज पवन नागपुर के निकट 25 नॉट प्रति घण्टा की गति से चल रही है। उत्तरी भारत में वायु के प्रायः शान्त रहने का मुख्य कारण वहाँ पायी जाने वाली वायुदाब और समदाब रेखाओं का दूर-दूर होना है।

   दक्षिणी-पश्चिमी भारत एवं तटवर्ती भाग में वायु प्रायः पश्चिमी एवं उत्तर-पश्चिमी दिशा में प्रवाहित हो रही है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी तट पर इसकी दिशा अनिश्चित है। पूर्वी तट पर हवा एक-दूसरे से विपरीत दिशा में प्रवाहित होती हुई दर्शायी गयी है। मध्यवर्ती भारत में हवाएँ उत्तर-पश्चिम और पश्चिम दिशा से और पूर्व में दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व से प्रवाहित हो रही है। देश के शेष भागों में पवन प्रायः शान्त है। मानचित्र में वायुदाब की भाँति ही वायु प्रवाह की दिशा भी अधिक व्यवस्थित है, यहाँ पश्चिमी भारत एवं पश्चिमी तट पर हवा पश्चिम या उत्तर-पश्चिम से एवं मध्यवर्ती भारत में उत्तर-पश्चिम से प्रवाहित हो रही है। शेष भागों में पवन प्रायः शान्त है।

(iii) आकाशीय दशा एवं मेघाच्छन्नता:-

     ग्रीष्म ऋतु के कारण मुख्य मानचित्र के अधिकांश मौसम केन्द्रों पर आकाश मेघरहित बताया गया है। परन्तु तटवर्ती मौसम केन्द्रों की स्थिति इससे कुछ भिन्न है। यहाँ पर कच्छ से कोचीन तक न्यूनाधिक मेघाच्छन्नता पायी जाती है। कोचीन, कालीकट और त्रिवेन्द्रम के निकट 7/8 से लेकर पूर्ण आकाश मेघाच्छादित है। इसी भाँति पूर्वी भारत में पूर्ण मेघाच्छन्नता कटक, बालासोर और गौहाटी में, पश्चिम भारत में चण्डीगढ़ में पूर्ण, दिल्ली व देहरादून में 7/8, अण्डमान निकोबार में 5/8 और बीकानेर में 1/2 भाग मेघाच्छादित है। मानचित्र के दक्षिण और पूर्वी तट, द्वीप समूहों और पूर्वी भारत में अधिक मेघाच्छन्नता पायी जाती है।

     दोनों ही मुख्य ऋतु मानचित्रों में उत्तरी और मध्यवर्ती भारत में कई स्थानों पर धूल भरी आँधियाँ चलती हुई बतायी गयी हैं। इसके अतिरिक्त, मद्रास के निकट तड़ित (lightning) चमकते हुए भी बताया गया है।

(iv) सामान्य वायुदाब से विचलन (प्रातः 8.30 बजे):-

    दक्षिणी-पूर्वी कोने के लघु मानचित्र से स्पष्ट है कि इस समय देश के अधिकांश भाग में लगभग औसत बायुदाब की दशा ही पायी जाती है। मध्यवर्ती व उत्तरी भारत में कहीं-कहीं औसत से 2 मिलीबार अधिक एवं मद्रास के निकट 2 मिलीबार कम वायुदाब दर्शाया गया है। सम्पूर्ण पूर्वी व दक्षिणी-पूर्वी भाग में औसत से कम और शेष भागों से औसत से अधिक वायुदाब पाये जाते हैं। (५०-५० मानचित्र देखें)

(v) 1.5 किमी० की ऊँचाई पर वायु की स्थिति:-

    दक्षिण-पूर्व के लघु मानचित्र में 1.5 किमी० की ऊंचाई पर प्रवाहित हवाओं को देखने से स्पष्ट है कि यहाँ की वायु गति अधिक तीव्र है, और इसकी दिशा में भी अव्यवस्था है। सम्पूर्ण पश्चिमी भारत में उत्तर से दक्षिण तक वायु गति से 10 से 40 नॉट के बीच है। सर्वाधिक गति 40 नॉट भुज के निकट ऑकत की गई है। देश के मध्यवर्ती भागों में हवाएँ उत्तर-पश्चिम एवं उत्तर की ओर से और पूर्वी भारत में अनिश्चित दिशा में प्रवाहित हो रही है। यहाँ इनकी गति धीमी है।

(vi) वायुदाब व्याख्या:-

    मानचित्र की वायुदाब व्याख्या विषम है। इस समय देश के उत्तरी और दक्षिण दोनों भागों में वायुदाब वितरण भिन्न प्रकार का है। दक्षिणी प्रायद्वीप के पश्चिमी एवं मध्यवर्ती भाग और सौराष्ट्र में समदाब रेखाएँ अपेक्षाकृत अधिक निकट हैं। मध्यवर्ती एवं सम्पूर्ण उत्तरी-पश्चिमी एवं अधिकांश उत्तरी भारत को केवल 1002 और 1004 मिलीबार की दो समभार रेखाएँ घेरे हुए हैं। देश के इस भाग से बाहर की ओर सर्वत्र वायुदाब बढ़ता हुआ है। मानचित्रों की समभार रेखाएँ अधिक स्पष्ट विकसित हैं। इस पर निम्न एवं उच्च भार केन्द्रों का अधिक व्यवस्थित विकास हुआ है। यहाँ भी पश्चिम घाट के सहारे समभार रेखाएँ तेजी से निकट होती हुई चली गई हैं।

निम्न वायुदाब के क्षेत्र-

    मानचित्र में तीन भार के केन्द्र बने हुए हैं। इनमें से दो केन्द्रों का न्यूनतम वायुभार 1001 मिलीबार है। पहला वृत्ताकार केन्द्र द० पू० मध्य प्रदेश और उत्तरी-पश्चिमी उड़ीसा की सीमा पर दूसरे विषम आकृक्ति के केन्द्र का वायु भार भी 1001 मिलीबार है, यह पूर्वी राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विकसित हुआ है। अर्द्ध-विकसित निम्न भार की दशा हिमाचल प्रदेश, जम्मू और संलग्न पाकिस्तान में दर्शायी गई है।

    मानचित्र में भी सुस्पष्ट दो निम्न वायुदाब के केन्द्र विकसित हुए हैं। पहला अण्डाकार केन्द्र उत्तर-पश्चिमी राजस्थान एवं संलग्न पाकिस्तान की सीमा पर 996 मिलीबार वायुदाब दर्शाता है। इतने ही निम्न वायुदाब का दूसरा केन्द्र पूर्वी मध्य प्रदेश की सीमा पर विकसित हुआ है।

उच्च वायुदाब क्षेत्र-

     ऋतु मानचित्रों में भारतवर्ष के बाहर निकटवर्ती सागरों के सुदूर क्षेत्र में उच्च भार की दशा दर्शायी गई है। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की बाहरी सीमा पर 1008 मिलीबार एवं मानचित्र में लगभग इन्हीं स्थानों पर 1010 मिलीबार समभार रेखाएँ गुजरती हैं। यहीं पर ‘H’ (उच्च भार) लिखा है। इस भाँति मानचित्र में पूर्वांचल अरब सागर में सहायक उच्च भार के क्षेत्र दर्शाये गये हैं।

    उत्तरी एवं मध्य भारत में सामान्यतः निम्नदाब की दशा ग्रीष्म के लक्षणों को ही सुस्पष्ट करते हैं।

(vii) वर्षा और भूतल पर आर्द्रता के विभिन्न रूप:-

     ग्रीष्म ऋतु होने से बहुत ही कम स्थानों पर पिछले 24 घण्टों में वर्षा अंकित की गई है। सर्वाधिक वर्षा निकोबार द्वीपसमूह के दोनों केन्द्रों पर क्रमश: 8 और 7 सेमी०, नेपाल में काठमाण्डू में । सेमी० वर्षा व माण्डले में 2 सेमी० वर्षा अंकित की गई है। केवल मेघालय और निकोबार में ही प्रेक्षण के समय वर्षा हो रही थी। अहमदाबाद केन्द्र पर हल्का कुहरा (Haze) छाया हुआ है। शेष भागों में वायुमण्डल स्वच्छ और मौसम शुष्क बताया गया है।

(viii) समुद्र की दशा:-

     मानचित्र में अधिकांश अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की दशा को नहीं बताया गया है जो कि सम्भवतः सामान्य मानी गयी है। विशाखापतनम से श्रीलंका से बीच का सागर सरल एवं मन्द तरंगित (Smooth & Slight) और दक्षिण में मध्य तराँगत (mod) बताया गया है। पश्चिमी अरब सागर की दशा को भी कहीं-कहीं सरल एवं मन्द तरंगित (Slight & smooth) बताया गया है।

(ix) अधिकतम तापमान का औसत दशा में विचलन (सायं 5.30 बजे):-

      दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार सारे उत्तर-पश्चिम और पूर्वी मध्यवर्ती भारत में अधिकतम ताप का औसत से विचलन 0° से 8°C तक रहा। सबसे कम 8°C (या -8°C) दिल्ली, निकटवर्ती राजस्थान और हरियाणा की सीमा पर अंकित किये गये। दूसरी ओर सारे दक्षिणी भारत और पूर्वांचल के तापमान का विचलन 0° से 6°C के बीच अधिक (+) रहा। दक्षिणी-पूर्वी भारत में यह विचलन 2° से 4° के बीच और मद्रास एवं उसके उत्तरी तट पर 6°C (या +6°C) तक अधिक रहा। औसत समताप रेखा गुजरात से बांग्लादेश की ओर लहरदार मार्ग से चली गयी है। बर्मा के अधिकांश भाग में औसत से 0° से 6°C के बीच कम तापामन अंकित किया गया है।

(x) न्यूनतम तापमान का औसत दशा से विचलन (प्रात: 8.30 बजे):-

     दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार औसत न्यूनतम तापमान से विचलन की दशा अधिक विषम है। उत्तरी-पश्चिमी भारत में औसत 0° से 6°C (या -6°C) के बीच तापमान अंकित किये गये, जबकि निकट ही उत्तर, प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं विहार की सीमा पर तापमान औसत से 0° से 4°C (या +4°C) के बीच अधिक अंकित किये गये। देश के शेष भागों में तापमान औसत या औसत से कुछ अधिक अंकित किये गये।

    पहली औसत समताप रेखा उत्तरी-पश्चिमी भारत में कच्छ के तट से महाराष्ट्र की ओर मुड़कर पुनः कर्नाटक से उत्तर की ओर घूमती हुई पश्चिमी एवं मध्य उत्तर प्रदेश होकर जम्मू-कश्मीर तक चली गयी है। दूसरी औसत समताप रेखा मध्य नेपाल से पश्चिमी बिहार के दक्षिण से उड़ीसा होकर वहाँ से पुनः उ०-पु० बंगाल की ओर घूमती हुई हिमाचल की ओर चली गयी है। वर्मा के अधिकांश भाग और खाड़ी के द्वीपों में तापमान औसत के निकट अंकित किये गये हैं। (चित्र द०पू० लघु मानचित्र देखें)

वर्षा काल का ऋतु मानचित्र (शुक्रवार 6 जुलाई, सन् 1973; शक 15 आषाढ़ 1895)

(i) प्रारम्भिक सूचना:-

    वर्षाकाल के इस मुख्य मानचित्र पें शुक्रवार दिनांक 6 जुलाई, सन् 1973 भारतीय समयानुसार प्रातः 8.30 बजै की मौसम की वास्तविक दशा का चित्रण किया गया है। मानचित्र में गुरुवार दिनांक 5 जुलाई, सन् 1973 भारतीय समयानुसार सायं 5.30 बजे की मौसम की वास्तविक दशा को दर्शाया गया है। आगे के वर्णन एवं विश्लेषण में दोनों बड़े व चार लघु मानचित्रों के मौसम के विभिन्न तत्वों की विकसित एवं परिवर्तनशील दशाओं का भी सर्वत्र ध्यान रखा गया है।

(ii) वायुदाब व्यवस्था:-

     मुख्य मानचित्र की वायुदाब व्यवस्था वर्षा काल होने से विशेष प्रकार से विकसित है। सारे भारतीय उपमहाद्वीप की समभार रेखाएँ विकसित चक्रवातों का अनुसरण करती हैं। दक्षिणी भारत और निकटवर्ती सागरों पर समभार रेखाएँ रेखाओं 998, 996 और 994 मिलीबार का ही विस्तार है। समभार रेखाओं की सामान्य व्यवस्था भी इससे मिलती-जुलती है।

निम्न वायुदाब के केन्द्र और गर्त चक्र-

     मानचित्र में भारतीय उप-महाद्वीप में तीन वायुदाब के केन्द्र बताये गये हैं इनमें से सबसे महत्वपूर्ण पूर्वी भारत का विकसित चक्रवात (Depresion) है। यहाँ मानचित्र में D लिखा है। वृत्ताकार आकृक्ति के इस चक्रवात को 922 और 994 दो समभार रेखाएँ सभी ओर से एवं अगली चार समभार रेखा तीन ओर से घेरे हुए हैं। उपर्युक्त सभी सम्भार रेखाएँ एक-दूसरे से प्रायः समानान्तर हैं। इनकी प्रवणता पूर्व एवं दक्षिण-पूर्व की ओर अधिक तीव्र है। मानचित्र में अंकित इसी चक्रवात के अध्ययन से स्पष्ट है कि यह धीमी गति से भीतर की ओर बढ़ रहा है। इसमें गर्त चक्र या चक्रवात की भीतरी समभार रेखा 900 मिलीबर है। यह वायुदाब सामान्य से बहुत निम्न है।

    दूसरे निम्न वायुदाब केन्द्र का विकास सौराष्ट्र के निकट हुआ है, जहाँ कि 995 मिलीबार के घेरे में L (निम्न भार) लिख है। इसे एवं पूर्व के चक्रवात दोनों को ही वृहद अण्डाकार में 994 मिलीबार समभार रेखा घेरे हुए हैं। ये समतल भाग में दो गर्ती जैसी प्रतीत होती है, क्योंकि दोनों ही निम्न भार के बीच कोई भी समभार रेखा नहीं गुजरती है। इस वृहद व्यवस्था के उत्तर और दक्षिण की ओर वायुदाब बराबर बढ़ता जाता है। तीसरे निम्न वायुदाब के केन्द्र का विकास पाकिस्तान के सुदूर पश्चिम में एवं ईरान की सीमा पर हुआ है।

     ऋतु मानचित्र में कटक के निकट के चक्रवात या गर्त चक्र के अतिरिक्त राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी निम्न वायुदाब केन्द्रों का विकास हुआ है। इनमें से पूर्वी निम्न भार स्फान (wedge) की भाँति फैला हुआ है। सभी को 990 मिलीबार समभार रेखा प्रायः वृत्ताकार घेरे हुए हैं।

उच्च वायुदाब के केन्द्र:-

   ग्रीष्मकालीन वर्षा काल के इस ऋतु मानचित्र के हिन्द महासागर या मानचित्र के सुदूर दक्षिण-पश्चिम एवं दक्षिण-पूर्व और उत्तर में कश्मीर के उत्तरी भाग में उच्च वायुदाब की दिशा का विकास बताया गया है। इसमें हिन्द महासागर में 1006 मिलीबार रेखा और कश्मीर में 1002 मिलीबार रेखा पूर्व-पश्चिम दिशा में गयी है। इस प्रकार दक्षिणी उच्च वायुदाब अधिक गहन और विकसित है। इस कारण भी 8.30 बजे वाले ऋतु मानचित्र में दक्षिणी भारत में समभार रेखाएँ अधिक निकट हैं।

     सामान्यतः समभार रेखाओं की दिशा पूर्व-पश्चिम है, और सागर पर यह अधिक नियमित है। मध्यवर्ती और पूर्वी भारत में यह निम्न वायुदाब के केन्द्रों की ओर मुड़ गयी है। इसी कारण सुदूर पूर्व की समभार रेखाओं की दिशा उत्तर-दक्षिण हो गयी है।(iii) सामान्य वायुदाब से विचलन:-

     प्रातः 8.30 बजे के सम्बन्धित मानचित्र के अध्ययन से स्पष्ट है कि देश के उत्तरी-पश्चिमी भाग को छोड़ सर्वत्र औसत से कम वायुदाब पाया जाता है। यही नहीं कर्क रेखा में दक्षिण में यह औसत से 4 से 8 मिलीबार तक कम है। सबसे कम वायुदाब-8 मिलीबार दक्षिणी सौराष्ट्र, कोंकण के तट और निकटवर्ती सागर एवं पूर्वी भारत में उड़ीसा के तट व निकटवर्ती सागर पर पाया जाता है।

    स्पष्टतः इसका सीधा सम्बन्ध उस निम्न वायुदाब व्यवस्था से है जो कि इन केन्द्रों के निकट ही विकसित हुए हैं। औसत से 6 मिलीचार समदाब रेखा उपर्युक्त दोनों केन्द्रों पर, -8 मिलीबार समुदाब रेखा को घेरे हुए हैं। औसत वायुदाब की 0 समभार रेखा पाकिस्तान से उत्तरी राजस्थान होकर पश्चिमी भारत को घेरते हुए कश्मीर की ओर मुड़ गयी है। पूर्वी भारत में यद्यपि औसत से कुछ कम वायुदाब (-2 से -4 तक) पाया जाता है परन्तु यहाँ इसकी प्रवणता धीमी है।

(iv) वायु दिशा एवं वायु वेग:-

      सारे भारतीय उप महाद्वीप में इस समय स्पष्टतः दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी हवाएँ चल रही हैं। ये हवाएँ दक्षिणी भारत में दक्षिण-पश्चिम, उत्तरी बंगाल की खाड़ी में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व और देश के शेष भागों में पूर्व दिशा से चल रही है। पश्चिमी तट एवं बंगाल की खाड़ी के तट पर इन हवाओं का वेग देश के अन्य भागों की तुलना में अधिक है।

    यहाँ हवा की गति 10 से 30 नॉट के बीच है। 30 नॉट की गति मार्मा गोआ और पूना के निकट अंकित की गयी है। देश के शेष भागों में वायु वेग सामान्यतः 0 से 10 नॉट प्रति घण्टा के बीच है। अधिकांश भागों में वायु वेग 5 नॉट से भी कम अंकित किया गया है। ऋतु मानचित्र में सर्वाधिक वायु वेग उत्तरी लक्षद्वीप में 40 नॉट प्रति घण्टा विशेष उल्लेखनीय है।

    पूर्वी भारत के चक्रवात के कारण यहाँ वायु दिशा औसत दिशा से भिन्न है और स्थानीय रूप से प्रभवित हुई है।

(v) 1.5 कि० मी० की ऊँचाई पर वायु की स्थिति:-

    इस ऊँचाई पर देश के अधिकांश विक्षोभ मण्डल में वायु तीव्र गति से चल रही है। दक्षिणी भारत में इसकी गति 30 से 70 नॉट है जबकि पूर्वी भारत में 10 से 30 नॉट एवं सबसे धीमी गति उत्तरी-पश्चिमी भारत में 5 से 15 नॉट के बीच है।

    सबसे तेज गति से वायु मछलीपट्टनम (आंध्र प्रदेश) में 70 नॉट एवं दक्षिणी लक्षद्वीप में 65 नॉट प्रति घण्टा अंकित की गयी है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस ऊँचाई पर भी वायु की दशा सर्वत्र दक्षिण-पश्चिमी मानसून हवाओं के अनुसार ही है।

(vi) आकाशीय दशा एवं मेघाच्छन्नता:-

    वर्षाकाल होने से देश के सभी भागों में मेघ छाये हुए हैं। कोटा, डाल्टेनगंज, लखनऊ और तेजपुर ही अपवाद स्वरूप ऐसे मौसम केन्द्र हैं, जहाँ कि मेघाच्छन्न 1/8 से कम है। सर्वाधिक मेघाच्छन्नता दक्षिणी भारत में पायी जाती है।

    यहाँ के अधिकांश केन्द्र पूर्ण मेघाच्छादित बताये गये हैं। इनमें से अधिकांश केन्द्रों पर या तो वर्षा हो रही है या पिछले 24 घण्टों में वर्षा हुई है। शेष भारत में मेघाच्छन्नता अनिश्चित है। 7/8 या अधिक मेघाच्छन्नता पश्चिमी भारत में उदयपुर, जोधपुर, बाड़मेर, जयपुर, देहरादून, शिमला एवं गंगा के डेल्टा, उड़ीसा और खाड़ी के द्वीपों में दर्शायी गयी है।

    सारे ऋतु मानचित्र में एक भी केन्द्र ऐसा नहीं है जहाँ कि आकाशीय दशा अनिश्चित बतायी गयी हो। पूर्व दिन की संध्या के मानचित्र में भी मेघाच्छन्नता प्रायः इसी भाँति ही है।

(vii) वर्षा और भूतल पर आर्द्रता के विभिन्न रूप:-

     वर्षा काल, अधिक मेघाच्छन्नता और चक्रवात सभी व्यापक वर्षा के लिए अनुकूल दशाएँ उत्पन्न करते हैं। ऋतु मानचित्र में पिछले 24 घण्टों में दूर-दूर तक वर्षा हुई भी है। वर्षा की मात्रा प्रत्येक केन्द्र के वृत्त के दक्षिण-पूर्व दिशा में अंकित की गई है। सर्वाधिक वर्षा पश्चिमी तट पर हुई है। यहाँ पिछले 24 घण्टों में पूना में 18, कोलावा में 16, होनावर में 14, रत्नागिरी और कोल्हापुर में 11-11, मंगलौर एवं मुम्बई में 9.9 और शेष स्थानों पर 3 से 8 सें० मी० के बीच वर्षा ऑकत की गयी है।

    मुख्य पठार पर नागपुर में 9 से० मी० और शेष भागों में ०.25 से 3 से० मी० के बीच, बंगाल की खाड़ी के उत्तरी तट पर 1 से 3 से० मी० के बीच, खाड़ी के द्वीपों में क्रमशः 7 से 11 से० मी० और उत्तरी लक्षद्वीप में 3 से० मी० वर्षा अंकित की गयी। इस मानचित्र में उत्तरी एवं उत्तरी-पश्चिमी भारत में वर्षा प्रायः नहीं के बराबर हुई है। यहाँ सबसे अधिक वर्षा झालावाड़ में 3 से० मी०, उदयपुर और जोधपुर में 1-1 से० मी० अंकित की गयी।

    वर्तमान में (6 जुलाई, 1973) को प्रातः 8.30 बजे) सारे पश्चिमी तट पर एवं खाड़ी द्वीपों में दूर-दूर तक वर्षा हो रही है। मुख्य पठार और उत्तरी बंगाल की खाड़ी में कहीं-कहीं वर्षा और बौछारें हो रही हैं, देश के शेष भागों में इस समय वर्षा प्रायः नहीं हो रही है।

(viii) समुद्र की दशा:-

     बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में समभार रेखाएँ पास-पास होने से यहाँ तेज पवन चल रही है। सागर में सभी स्थानों पर 20 से 25 नॉट के बीच पवन बह रहा है अतः सामान्य सागर की दशा भी प्रतिकूल है।

    अरब सागर में अशान्त (Rough) और बंगाल की खाड़ी में अति अशान्त (V. Rough) से उत्तंग तरंग गति (V. High) के बीच सागर दशा अंकित की गयी है। यद्यपि अरब सागर में केवल एक स्थान पर और बंगाल की खाड़ी में दो स्थानों पर ही सागर की दशा अंकित की गयी है। परन्तु इसमें ही सागर की दशा का स्पष्ट आभास हो जाता है।

(ix) अधिकतम तापमान का सामान्य दशा से विचलन (सायं 5.30 बजे):-

     दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार अधिकांश दक्षिणी और उत्तरी-पश्चिमी भारत में अधिकतम तापमान औसत से कम अंकित किये गये। सबसे कम -4°C उत्तरी आन्ध्र प्रदेश, पश्चिमी कश्मीर और निकटवर्ती पाकिस्तान में अंकित किये गये। औसत से अधिक तापमान +4°C हाड़ौती (राजस्थान) और मालवा (मध्य प्रदेश) एवं उत्तरी-पूर्वी उत्तर प्रदेश में अंकित किये गये।

    अधिकतम औसत या 0°C विचलन वाली समताप रेखा देश की तीन स्थानों से होकर गुजरती है। पहली दक्षिणी-पश्चिमी कर्नाटक से केरल होती हुई श्रीलंका की तरफ चली गयी है। दूसरी सौराष्ट्र, पूर्वी गुजरात, उत्तरी महाराष्ट्र, उत्तरी-पूर्वी मध्य प्रदेश, उड़ीसा और दक्षिणी-पश्चिमी बंगाल होती हुई खाड़ी की ओर मुड़ गयी है और तीसरी पाकिस्तान से पश्चिमी व उत्तरी राजस्थान की सीमा से पूर्व की ओर मुड़कर पश्चिम उत्तर प्रदेश से हिमालय की ओर मुड़ गयी है। इस प्रकार औसत अधिकतम तापमान की दशा इस समय प्रायः विषम है।

(x) न्यूनतम तापमान का औसत दशा से विचलन (प्राय: 8.30 बजे):-

     दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार देश के अधिकांश मध्यवर्ती, उत्तरी-पूर्वी और सुदूर पूर्वी भागों में न्यूनतम तापमान औसत से अधिक से अधिक और शेष दक्षिण पठार और उत्तरी-पश्चिम भारत में औसत से कम तापमान अंकित किये गये हैं।

     औसत दशा से कहीं भी +2℃ या -2°C से अधिक का विचलन नहीं पाया जाता। अधिकांश दक्षिणी पठार और मध्यवर्ती भारत में यह विचलन इससे भी कम है। औसत तापमान रेखा रेखा सर्वाकार मार्ग से प्रथम उत्तर से दक्षिण की ओर जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र होकर पुनः उत्तर-पूर्व की ओर कर्नाटक, महाराष्ट्र, पूर्वी मध्य प्रदेश, उड़ीसा, उत्तरी बंगाल व बंग्लादेश होती हुई सुदू पूर्व की ओ चली गयी है।

34. Climograph and Hythergraph

Climograph and Hythergraph



क्लाइमोग्राफ

         Climograph का आविष्कार सर्वप्रथम ग्रिफिथ टेलर महोदय ने किया था।

Climograph X-अक्ष पर Relative Humidity (सापेक्षिक आर्द्रता) को और Y-अक्ष पर Wet Bulb Temperature (आर्द्र बल्ब तापमान) को ध्यान में रखकर मानचित्र या ग्राफ बनाया जाता है।

इंग्लैण्ड के निवासी औपनिवेशिक काल में Climograph का उपयोग वैश्विक स्तर पर निवास करने योग्य स्थान के निर्धारण में किया कर‌ते थे।

जबकि हीदरग्राफ का प्रयोग स्थानीय स्तर पर निवास करने योग्य स्थान का निर्धारण किया करते थे।

प्रश्न 1. क्लाइमोग्राफ (Climograph) के अभिप्राय को समझाते हुए दिए आँकड़ों के आधार पर भोजपुर का क्लाइमोग्राफ बनाइए।

 

Months JAN. FUB. MAR. APR. MAY. JUN. JUL. AUG. SEP. OCT. NOV. DEC.
आर्द्र-वल्ब तापमान (0°C) 13 15 17 19 22 24 26 25 23 20 18 14
आपेक्षिक आर्द्रता 40 30 14 10 12 42 71 74 74 60 42 40

उत्तर-

       Climograph का आविष्कार सर्वप्रथम ग्रिफिथ टेलर महोदय ने किया था। इनके द्वारा क्लाइमोग्राफ का विकास शीत कटिबन्ध में निवास करने वाले यूरोपियों के लिए उष्ण कटिबन्ध में निवास करने की संभावना को ध्यान में रख कर किया गया।

     इससे किसी स्थान के आर्द्र बल्ब तापमान (Wet bulb temperature) तथा प्रतिशत में सापेक्षिक आर्द्रता (Relative humidity) की आवश्यकता होती है इन्हीं दोनों आँकड़ों की सहायता से ग्राफ पेपर पर स्केल के अनुसार x-अक्ष पर सापेक्षिक आर्द्रता तथा y-अक्ष पर आर्द्र बल्ब तापमान को प्रदर्शित करके, प्रत्येक महीना के लिए निर्देशांक से 12 बिन्दु प्राप्त करके उन्हें क्रम से रेखा में मिला देते हैं। इससे क्लाइमोग्राफ का निर्माण हो जाता है।

     टेलर महोदय ने एक निवास्यता मापक्रम का भी निर्माण किया है। जिससे हमें वहाँ की जलवायु सुखद है या दुःखद है, इसका भी आसानी से ग्राफ देखकर पता चलता है।

निवास्यता मापक्रम (Hability Scale)

क्रम सुखद या दुःखद के प्रकार तापमान
1. अत्यल्प दुःखद (Very rarely uncomfortable) 40° से 45° F (4° से 7° C)
2. आदर्श (Ideal) 45° से 55° F (7° से 13° C)
3.

अत्यल्प दुःखद (Very rarely uncomfortable)

55° से 60° F (13° से 16° C)
4. बहुधा दुःखद (Sometimes uncomfortable) 60° से 70° F (16° से 19° C)
5.

बहुधा दुःखद (Often comfortable)

65° से 70° F (19° से 21° C)
6. हमेशा दुःखद (Usually uncomfortable) 70° से 75° F (21° से 24° C)

          टेलर ने कुछ विशेष प्रकार की जलवायु को भी दर्शाया है जो क्लाइमोग्राफ के चारों कोनों पर होता है। इसके चार प्रकार हैं:

1. झुलसता हुआ (SCORCHING):-

        NW कोने पर, आर्द्र बल्ब तापमान 60° F से अधिक तथा सापेक्षिक आर्द्रता 40% से कम अर्थात् उष्ण-शुष्क जलवायु।

2. उमसदार (MUGGY):-

       NE कोने पर तापमान 60° F से अधिक तथा सापेक्षिक आर्द्रता 70% से अधिक अर्थात् उष्णार्द्र जलवायु।

3. शीतार्द्र (RAW):-

      SE कोने पर, तापमान 40° F से कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता 70% से अधिक अर्थात् ठंडी आर्द्र जलवायु।

4. शीत-शुष्क (KEEN):-

       SW कोने पर, तापमान 40° F से कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता 40% से कम अर्थात् शीत व शुष्क जलवायु।

    इस प्रकार क्लाइमोग्राफ की आकृतियों से विभिन्न स्थानों की जलवायु में भिन्नता का पता चलता है। जैसे- शुष्क क्षेत्रों के लिए क्लाइमोग्राफ की आकृति तकुए की भाँति होती है, भूमध्यसागरीय जलवायु हेतु विकर्ण तथा मानसूनी जलवायु हेतु उल्टे विकर्ण की आकृति बनती है। जिससे विभिन्न स्थानों की जलवायु का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।

CLIMOGRAPH OF BHOJPUR

रचना विधि:

      एक ग्राफ कागज लेकर क्षैतिज रेखा खींचा जो X-अक्ष हुआ। इस पर समान दूरी के अंतर पर आपेक्षिक आर्द्रता के आँकड़ों के अनुसार मापनी निश्चित कर 0, 10, 20, 30, 40, 50, 60, 70, 80 लिखा। इसके नीचे मोटे अक्षरों में RELATIVE HUMIDITY (In %) लिख दिया। X-अक्ष पर लंब डाला और Y-अक्ष बनाया। अब भोजपुर के आर्द्र बल्ब तापमान (Wet bulb Temperature) के आँकड़ों के अनुसार मापनी निश्चित कर 0, 10, 20, 30 व 40 लिखा तथा इसके समीप ही WET BULB TEMPERATURE (°C) लिख दिया।

    अब January के आर्द्र बल्ब तापमान 13°C और आपेक्षिक आर्द्रता 40% के आँकड़ों को मिलाते हुए सीधी रेखाएँ खीचीं। जिस बिन्दु पर ये दोनों रेखाएँ मिलती हैं उसे चिह्नित कर J लिखा। इसी प्रकार Febuary, March से November तथा December तक के आर्द्र बल्ब तापमान और आपेक्षिक आर्द्रता के आँकड़ों को मिलाते हुए खीचें बिन्दुओं पर क्रमशः F, M ……. N व D लिखा।

     अब सरल रेखा द्वारा January के बिन्दु को Febuary के बिन्दु से, Febuary के बिन्दु को March के बिन्दु से… November के बिन्दु को December के बिन्दु से तथा अंततः December के बिन्दु को January के बिन्दु से मिलाते हुए 12 रेखाएँ खींची। इस प्रकार प्राप्त 12 भुजी आकृति ही हमारा अभीष्ट Climograph होगा। Climograph के NW कोने पर SCORCHING, NE कोने पर MUGGY, SE कोने पर RAW तथा SW कोने पर KEEN लिख दिया।

Climograph



हीदरग्राफ

          हीदरग्राफ का निर्माण सर्वप्रथम टेलर महोदय ने किया था।

हीदरग्राफ में जलवायु के आँकड़े को प्रदर्शित किया जाता है।

हीदरग्राफ में X-अक्ष पर वर्षा और Y-अक्ष पर तापमान को दिखाया जाता है।

हीदरग्राफ का प्रयोग औपनिवेशिक काल में अँग्रेज लोग बड़े पैमाने पर किया करते थे।

हीदरग्राफ पर बहुत अधिक गर्म, बहुत अधिक ठण्डा, बहुत अधिक सूखा और बहुत अधिक आर्द्रता के साथ-2 अधिवासित होने के लिए उपयुक्त क्षेत्र को प्रदर्शित किया जाता था।

प्रश्न 1. हीदरग्राफ (Hythergraph) के अभिप्राय को समझाते हुए दिये गये आँकड़ों के आधार पर भोजपुर के हीदरग्राफ की रचना कीजिए।

Months JAN. FUB. MAR. APR. MAY. JUN. JUL. AUG. SEP. OCT. NOV. DEC.

औसत मासिक तापमान (0°C)

17 20 27 30 32 31 30 28 28 27 23 18
औसत मासिक वर्षा (cm) 2 2 1 1 3 12 28 25 18 5 1 1

उत्तर-

      हीदरग्राफ (Hydhergraph) एक ऐसा आरेख है जिसमें वर्षा और तापमान के सम्बन्धों एक साथ को प्रदर्शित किया जाता है। इसमें वर्षा तथा तापमान के मासिक वितरण को प्रदर्शित किया जाता है।

    इसमें क्षैतिज भुजा (X-axis) पर मिलीमीटर या इंचों में वर्षा और लम्बवत् भुजा (Y-axis) पर °F या °C में तापमान बताये जाते हैं। टेलर का हीदरग्राफ पहले के विद्वानों फास्टर व हटिंगटन द्वारा बनाया गया क्लाइमोग्राफ ही है। इसमें मासिक वर्षा और शुष्क तापमान को टेलर के क्लाइमोग्राफ की भाँति प्रतिमास अंकित कर बारह बिन्दु प्राप्त करते हैं। इन्हें आपस में जोड़कर बन्द आकृति बना दी जाती है।

     इसके द्वारा किसी स्थान विशेष की वर्षा और वाष्पीकरण के सम्बन्ध को समझाकर वास्तविक जल उपलब्धता को समझा जा सकता है। टेलर के हीदरग्राफ में तापमान और वर्षा की सीमा नहीं दी गई है। जिन भागों में गर्मियों में वर्षा होती है वाष्पीकरण भी अधिक होने से वास्तविक जल उपलब्धता तेजी से घटने लगती है।

HYTHERGRAPH OF BHOJPUR

रचना विधि:

     एक ग्राफ कागज लेकर आधार के समानांतर एक रेखा खींचा जो X-अक्ष होगा। इस अक्ष पर एक लंबवत् रेखा खींचा जो Y-अक्ष होगा। X-अक्ष पर औसत मासिक वर्षा के आँकड़ों के अनुसार समान दूरी के अंतर पर मापनी निश्चित करके 0, 5, 10, 15, 20, 25, 30 व 35 की संख्याएँ लिखीं। इनके नीचे मोटे अक्षरों में AVERAGE MONTHLY RAINFALL (CM) लिख दिया।

    अब Y-अक्ष पर औसत मासिक तापमान के आँकड़ों को आधार मानकर मापनी निश्चित करके 0, 5, 10, 15, 20, 25, 30 व 35 की संख्याएँ लिख दीं। इसके ऊपर मोटे अक्षरों में AVERAGE MONTHLY TEMPERATURE (°C) लिख दिया।

     अब January के तापमान 17°C और वर्षा 2 cm के आँकड़ों को मिलाते हुए रेखाएँ खींची। जहाँ ये दोनों रेखाएँ मिलती हैं, उस बिन्दु को चिह्नित क J लिखा। इसी प्रका Febuary, March….. November, December के तापमान एवं वर्षा के आँकड़ों के आधार पर 12 बिन्दु चिह्नित करके संबंधित बिन्दुओं क्रमशः F, M, N, तथा D लिखा।

      अब January के बिन्दु को सरल रेखा द्वारा Febuary के बिन्दु से, Febuary के बिन्दु को March के बिन्दु से November के बिन्दु को December के बिन्दु से तथा अंततः December के बिन्दु को January के बिन्दु से मिलाते हुए 12 भुजी बहुभुज बनाया जो अभीष्ट Hythergraph हुआ।

25. सूर्यातप (Insolation)

25. सूर्यातप (Insolation)


 सूर्यातप

        वायुमण्डल तथा पृथ्वी की ऊष्मा (Heat) का प्रधान स्रोत (सूर्य) है। सौर्यिक ऊर्जा को ही ‘सूर्यातप’ कहते हैं।

          दूसरे शब्दों में “लघु तरंगों के रूप में संचालित लगभग 3 लाख किमी० प्रति सेकेण्ड की गति से भ्रमण करती हुई प्राप्त सौर्यिक ऊर्जा को ‘सौर्य विकिरण’ या ‘सूर्यातप’ कहते हैं”। सूर्य धधकता हुआ गैस का वृहद् गोला है, जिसकी व्यास पृथ्वी से 100 गुना तथा उसके आयतन से 100,000 गुना अधिक है। सूर्य के धरातल जिसे फोटोस्फेयर कहते है, का तापक्रम 6000 डिग्री सेल्सियस तथा केन्द्रीय भाग का 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस बताया जाता है। पृथ्वी के वायुमण्डल का औसत तापक्रम 15.2°C होता है।

       सूर्य की ऊर्जा का प्रधान स्रोत उसका आन्तरिक भाग जहाँ पर अत्यधिक दबाव तथा उच्च तापमान के कारण नाभिकीय संलयन के कारण हाइड्रोजन का हीलियम में रूपान्तर होने से ऊष्मा का उत्सर्जन होता है। यह ऊष्मा परिचालन तथा संवहन द्वारा सूर्य की बाहरी सतह तक पहुँचती है। सूर्य की वाह्य सतह से निकलने वाली ऊर्जा को फोटान कहते हैं। इसी तरह सूर्य की वाह्य सतह को फोटोस्फीयर कहते हैं। इस सतह से ऊर्जा का विद्युत् चुम्बकीय तरंग द्वारा विकिरण होता है।

        सूर्य के धरातल के प्रत्येक वर्ग इंच से विकीर्ण ऊर्जा 100,000 अश्व शक्ति के बराबर होती है, सूर्य की वह्य सतह (फोटोस्फीयर) से निकलने वाली ऊर्जा प्रायः स्थिर रहती है। इस तरह पृथ्वी की सतह के प्रति इकाई क्षेत्र पर सूर्य से प्राप्त ऊर्जा प्राय: स्थिर रहती है। इसे सौर्यिक स्थिरांक (Solar constant) कहते हैं।

      इस तरह सौर्यिक स्थिरांक सूर्य के विकिरण की दर को प्रदर्शित करता है जो प्रति वर्ग सेण्टीमीटर प्रति मिनट 2 ग्राम कैलरी है। सूर्य से लगभग 15 करोड़ किमी० दूर स्थित पृथ्वी सौर्यिक ऊर्जा का केवल 1/2×109 भाग ही प्राप्त कर पाती है। परन्तु यह स्वल्प मात्रा भी 23×1012 अश्व शक्ति के बराबर हो जाती है। सूर्य से प्राप्त इस न्यून ऊर्जा के कारण ही भूतल पर सभी प्रकार के जीवों का अस्तित्व सम्भव हो सका है। इसी कारण धरातल पर पवन संचार, सागरीय धाराओं का प्रवाह तथा मौसम एवं जलवायु का आविर्भाव होता है।

         प्रत्येक वस्तु, जिसमें ऊष्मा होती है, विकिरण करती है। नियमानुसार जो वस्तु जितनी अधिक गर्म होती है, उसकी तरंगें उतनी ही छोटी होती हैं। इसी कारण से सूर्य विकिरण द्वारा निकली ऊष्मा लघु तरंगों के रूप में होती है तथा प्रति सेकेण्ड 300000 किमी० की गति से भ्रमण करती है। इसके विपरीत अपेक्षाकृत कम तापक्रम वाली वस्तु से विकिरण तो कम होता है, परन्तु दीर्घ तरंग के रूप में होता है। उदाहरण के लिए पृथ्वी से विकीर्ण ऊर्जा दीर्घ तरंगों के रूप में होती है।

धरातल पर सूर्यातप का वितरण

         सूर्यातप की सर्वाधिक मात्रा विषुवत रेखा के पास होती है क्योंकि यहाँ पर दिन-रात की लम्बाई बराबर होती है तथा सूर्य की किरणें लगभग लम्बवत् होती हैं। परन्तु सूर्य के दक्षिणायन तथा उत्तरायण की स्थितियों के कारण अत्यधिक सूर्यताप मण्डल विषुवत रेखा के दोनों ओर सरकता रहता है। विषुवत रेखा से सूर्यातप ध्रुवों की ओर कम होता जाता है। ध्रुवों पर यह ताप इतना कम हो जाता है कि विषुवत रेखा का केवल 40 प्रतिशत ही प्राप्त हो पाता है।

        इस तरह ध्रुवीय क्षेत्र न्यूनतम सूर्यातप प्राप्त करते हैं। ‘इक्वीनाक्स (Equinox-विषुव) के समय दोनों गोलाद्धों में सूर्यातप का वितरण प्राय: समान रहता है। इसके विपरीत कर्क तथा मकर संक्रांति (Solstices) के समय दोनों गोलार्द्ध में ध्रुवों के बीच सूर्यातप के वितरण में पर्याप्त असमानता होती है।

         यहाँ पर यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि सूर्यातप के वितरण पर वायुमण्डल के परावर्तन, शोषण तथा प्रकीर्णन आदि प्रभावों का पर्याप्त असर होता है। इसी कारण से कर्क संक्रान्ति के समय सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में कर्क रेखा पर लम्बवत् होता है, ध्रुवों पर दिन की अवधि सर्वाधिक लम्बी होने पर भी सूर्यातप सर्वाधिक नहीं हो पाता है, अपितु अधिकतम सूर्यातप 40° अक्षांश के आस-पास ही प्राप्त होता है। धरातलीय तापक्रम निम्न मध्य अक्षांश वाले भागों में सर्वाधिक होता है, न कि भूमध्य रेखा के पास।

सूर्यातप के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक

         सूर्यातप के उपर्युक्त वितरण से स्पष्ट हो गया है कि भूतल के विभिन्न भागों पर सूर्यातप की मात्रा समान नहीं हुआ करती है, सूर्य की किरणों को वायुमण्डल की एक मोटी परत से होकर गुजरना पड़ता है, अत: वायुमण्डल का प्रभाव सूर्यातप की मात्रा पर पड़ना स्वाभाविक ही है। इसके अलावा सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य तिरछापन, दिन की अवधि, पृथ्वी से सूर्य की दूरी, सौर कलंक इत्यादि कारक किसी भी स्थान पर (वायुमण्डल की अनुपस्थिति में) सूर्यातप की मात्रा को प्रभावित करते हैं।

(i) सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य तिरछापन:-

           पृथ्वी के गोलाकार रूप के कारण सूर्य की किरणें सर्वत्र समान कोण पर नहीं पड़ती हैं। भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें लम्बवत् होती हैं क्योंकि सूर्य सर्वाधिक ऊँचाई पर होता है, परन्तु ध्रुवों की ओर किरणों का कोण कम होता जाता है अर्थात् वे तिरछी होती जाती हैं। यद्यपि किरणों के सापेक्ष्य तिरछापन में कुछ परिवर्तन होता रहता है, उदाहरण के लिए 21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर तथा 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर लम्बवत् चमकता है, जिस कारण पहली स्थिति में दक्षिणी गोलार्द्ध में किरणें अधिक तिरछी होती हैं, तथापि साधारण रूप में भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर किरणों का तिरछापन बढ़ता जाता है।

(ii) दिन की अवधि

          यदि अन्य दशाएं समान हों तो दिन की अवधि जितनी अधिक होगी, सूर्यातप की मात्रा उतनी ही अधिक होगी। पृथ्वी अपनी कक्षा पर 66.5° का कोण बनाती हुई लगभग 24 घण्टे में अपनी धुरी पर एक परिक्रमा पूरा करती है तथा साथ ही सूर्य के चारों तरफ भी वर्ष में एक बार चक्कर लगाती है।

        यदि पृथ्वी भी अपनी जगह पर स्थिर होती तो वर्तमान स्थिति के विपरीत दशा होती, परन्तु पृथ्वी की दैनिक तथा वार्षिक गति के कारण भूमध्य रेखा को छोड़कर शेष भागों पर दिन की अवधि में अन्तर आता रहता है। भूमध्य रेखा पर दिन सदैव 12 घण्टे का इसलिए होता है कि प्रकाश वृत्त भूमध्य रेखा को दो बराबर भागों में काटता है।

        सूर्य की उत्तरायण स्थिति के समय (जब सूर्य कर्क रेखा पर होता है) भूमध्य-रेखा से उत्तर की ओर दिन की अवधि बढ़ती जाती है तथा उत्तरी ध्रुव पर 6 मास का दिन होता है। इसके विपरीत भूमध्य रेखा से दक्षिण जाने पर दिन की अवधि कम हो जाती है, जबकि द० ध्रुव पर केवल रात (6 मास) ही होती है।

        सूर्य की दक्षिणायन स्थिति में (जबकि सूर्य मकर रेखा पर होता है) भूमध्य रेखा से दक्षिण की ओर दिन की अवधि बढ़ती जाती है और उत्तर की ओर घटती जाती है। केवल 21 मार्च तथा 23 सितम्बर को, जबकि सूर्य की स्थिति भूमध्य रेखा पर होती है, सर्वत्र दिन-रात बराबर होते हैं। स्मरणीय है कि किरणों के तिरछेपन तथा दिन की अवधि के प्रभाव सापेक्ष्य हुआ करते हैं। उच्च अक्षांशों में (21 जून, उत्तरी गोलार्द्ध) दिन की अवधि 6 मास होने पर भी सूर्यातप न्यूनतम इसलिए होता है कि सूर्य की किरणें सर्वाधिक तिछी होती हैं। जहाँ पर दिन की अवधि अधिक होती है तथा साथ ही साथ किरणें सीधी पड़ती हैं वहाँ पर निश्चित रूप से ताप अधिक प्राप्त होता है। 

(iii) पृथ्वी से सूर्य की दूरी

     पृथ्वी अण्डाकार कक्ष के सहारे सूर्य की परिक्रमा करती है, जिस कारण उसकी सूर्य से दूरी में परिवर्तन होता रहता है। औसत रूप में पृथ्वी सूर्य से लगभग 15 करोड़ किमी० दूर है, परन्तु निकटतम दूरी 14.70 करोड़ किमी० है। इस स्थिति को उपसौर (Perihelion) कहते हैं। यह स्थिति 3 जनवरी को होती है। इसके विपरीत 4 जुलाई को अपसौर (Aphelion) की स्थिति होती है, जबकि पृथ्वी सूर्य से 15.20 करोड़ किमी० दूर होती है। साधारण नियम के अनुसार जब पृथ्वी सूर्य से निकटतम दूरी पर होती है, उस समय अधिकतम ताप तथा अधिकतम दूरी पर होने पर न्यूनतम ताप मिलना चाहिए। परन्तु वास्तविकता ठीक उसके विपरीत होती है।

       जनवरी के महीने में जबकि पृथ्वी सूर्य से निकटतम दूरी पर होती है, उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्म काल होने के बजाय शीत काल होता है। इसी तरह 4 जुलाई के समय शीत काल के बजाय ग्रीष्मकाल होता है। वास्तव में दिन की अवधि तथा सूर्य की किरणों के तिरछेपन के प्रभाव के आगे यह कारक नगण्य हो जाता है। हाँ, इतना अवश्य होता है कि जनवरी में उ० गोलार्द्ध में जितनी सर्दी होनी चाहिए, उसकी अपेक्षा 7 प्रतिशत कम होती है तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में गर्मियां 7 प्रतिशत अधिक तीव्र होती हैं। अपसौर की स्थिति में उत्तरी गोलार्द्ध में (4 जुलाई) गर्मियां 7 प्रतिशत कम तीव्र तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में शीतकाल 7 प्रतिशत अधिक तीव्र हो जाता है।  

सूर्यातप

 

(iv) सौर कलंक

       चन्द्रमा के समान सूर्य-तल पर कलंक या धब्बे मिलते हैं। इनका कोई स्थायी रूप नहीं होता है, वरन् ये बनते-बिगड़ते रहते हैं तथा इनकी संख्या घटती-बढ़ती रहती है। यह अन्तर चक्रीय रूप में सम्पन्न होता है। औसत रूप में एक चक्र ग्यारह वर्ष में पूरा होता है।

        जब सौर कलंकों की संख्या अधिक हो जाती है तो सूर्यातप की मात्रा भी अधिक हो जाती है, परन्तु इनकी मात्रा में कमी हो जाने के कारण प्राप्त होने वाला सूर्यातप कम हो जाता है। इस कारण की सत्यता अभी तक संदिग्ध है। सौर कलंकों के कारण सूर्य विकिरण में अन्तर आता रहता है। विश्व स्तर पर मौसम तथा जलवायु में कभी-कभी विश्वव्यापी अनियमितता होती हती है। सौर कलंकों के कारण होने वाला अनियमित सूर्यातप इस विश्वव्यापी मौसम सम्बन्धी अनियमितता का कारण हो सकता है, परन्तु इसे निश्चितता के साथ स्वीकार नहीं किया जा सका है।

(v) वायुमण्डल का प्रभाव

         सूर्यातप वितरण को प्रभावित करने वाले उपर्युक्त कारकों की विवेचना के समय वायुमण्डल के प्रभाव को ध्यान में नहीं रखा गया था, वास्तव में (सूर्य की) प्रकाश किरणों को वायुमण्डल की पारदर्शक मोटी परत से होकर गुजरना पड़ता है, जिस कारण उसका प्रकीर्णन (Scattering), परावर्तन (Reflection) तथा अवशोषण (Absorption) होता रहता है। प्रकीर्णन के अन्तर्गत सौर्यिक शक्ति का कुछ भाग पारदर्शक वायुमण्डल में स्थित अदृश्य कणों तथा अणुओं के कारण बिखर कर फैल जाता है।

       प्रकीर्णन मुख्य रूप से वरणात्मक (Selective) होता है, अर्थात् यह उस समय होता है जबकि अदृश्य कणों (धूलकण आदि) की व्यास विकिरण तरंग से छोटी होती है। इस तरह लघु तरंगों का प्रकीर्णन सर्वाधिक होता है, जिस कारण विभिन्न प्रकार के रंगों का आविर्भाव होता है। उदाहरण के लिए आकाश का नीला रंग, सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य की लालिमा आदि प्रकीर्णन के कारण ही सम्भव हो पाती है।

      जब वायुमण्डल में अदृश्य कणों की व्यास विकिरण तरंग से बड़ी होती है तो विसरित परावर्तन (diffuse reflection) की क्रिया होती है। इस क्रिया के कारण सौर्यिक शक्ति का कुछ भाग परावर्तित होकर वापस लौट जाता है, जबकि कुछ भाग वायुमण्डल में चारों तरफ छिटक जाता है। पृथ्वी की सतह से भी कुछ ताप शक्ति का परावर्तन आकाश में हो जाता है। पृथ्वी के इस परावर्तन के कारण ही चन्द्रमा का अंधेरा भाग भी आसानी से दृष्टिगत हो जाता है।

           प्रकीर्णन तथा परावर्तन के कारण वायुमण्डल से कुछ सौर्यिक ऊर्जा पृथ्वी की सतह पर पहुँच जाती है। इसे आकाश का विसरित नीला प्रकाश (diffuse blue light of sky) कहते हैं अथवा विसरित दिवा प्रकाश (diffuse day light) की संज्ञा प्रदान की जाती है। इसी प्रकाश के कारण पूर्ण बदली के दिन अथवा किसी भी स्थान के वे भाग जहाँ पर सूर्य की किरणें नहीं पहुँच पाती हैं, आसानी से देखें जा सकते हैं।

         अवशोषण की क्रिया मुख्य रूप में जलवाष्प तथा गौण रूप में आक्सीजन एवं ओजोन गैसों द्वारा सम्पादित होती है। अवशोषण भी वरणात्मक होता है अर्थात् सभी विकिरण तरंगों का अवशोषण न होकर केवल दीर्घ तरंगों का ही हो पाता है। प्रकीर्णन, परावर्तन तथा अवशोषण द्वारा सूर्यातप की नष्ट होने वाली मात्रा मुख्य मुख्य रूप से सूर्य की किरणों के कोण तथा वायुमण्डल के पारदर्शक तत्व पर आधारित होती है।

         सूर्य से विकीर्ण समस्त सूर्यातप का लगभग 35 प्रतिशत भाग परावर्तन तथा प्रकीर्णन द्वारा आकाश में वापस लौट जाता है तथा इसका उपयोग न ही वायुमण्डल को गर्म करने में हो पाता है और न ही पृथ्वी को सूर्यातप के 14 प्रतिशत भाग का वायुमण्डल द्वारा अवशोषण हो जाता है।

       इस तरह सूर्यातप का केवल 51 प्रतिशत भाग पृथ्वी को प्राप्त हो पाता है, जिससे वायुमण्डल का निचला भाग गर्म होता है। किसी भी सतह से विकिरण ऊर्जा के परावर्तित भाग को अलबिडो (Albedo) कहा जाता है। पृथ्वी की सतह का औसत अलबिडो 24 से 34 प्रतिशत के बीच बताया जाता है।


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8. OCEAN SALINITY / सागरीय  लवणता

OCEAN SALINITY

सागरीय  लवणता

OCEAN SALINITY




OCEAN SALINITY / सागरीय  लवणता 

         समुद्री जल में लवण की घुली हुई मात्रा को समुद्री लवणता कहते है प्रारंभ में जब पृथ्वी का निर्माण हुआ तो उसका उपरी भाग ठंडा होकर भूपटल का निर्माण किया। भूपटल का वह भाग जिसका घनत्व कम था उससे महाद्वीपीय भूपटल का निर्माण हुआ और भूपटल का वह भाग जिसका घनत्व अधिक था उससे महासागरीय भूपटल का निर्माण हुआ 

     कालान्तर में स्थ्लमंडल से अपरदन के दूतों के द्वारा लवणों को सागर तक पहुँचाने का कार्य अनवरत जारी है समुद्री जल में मुख्यतः 47 प्रकार के लवण पाए जाते है जिसमें NaCl की मात्रा सर्वाधिक (77.08%) है इसके अतिरिक्त MgCl (10.09%), MgSo4 (4.9%) कैल्सियम सल्फेट (3.6%) भी प्रमुख लवण पाए जाते है शेष अन्य प्रकार के लवण पाए जाते है

लवणता का मापन:

        लवणता का मापन प्रति हजार ग्राम जल में उपस्थित लवण की मात्रा के अनुपात से ज्ञात करते है इसे प्रति हजार (gm ‰) के द्वारा निरुपित करते है डिटमर महोदय के अनुसार सागरीय जल में औसत लवणता 35 ‰ पायी जाती है समुद्री जल में लवणता सर्वत्र एक सामान नहीं पाई जाती है लवणता को प्रभावित करने वाले कई कारक है-

लवणता को प्रभावित करने वाले  कारक:

1. वर्षा एवं वाष्पीकरण-

      वर्षा एवं लवणता  के बीच व्यत्क्रमानुपाती संबंध होता है अर्थात जिन स्थानों पर वर्षा ज्यादा होती है वहाँ लवणता कम होती है जहाँ पर वर्षा कम होती है वहाँ पर लवणता अधिक होती हैइसी तरह लवणता एवं वाष्पीकरण के बीच समानुपाती का संबंध होता है जिन क्षेत्रों में वाष्पीकरण अधिक होता है उन क्षेत्रों में लवणता अधिक पाई जाती है और जहाँ वाष्पीकरण कम होता है वहाँ लवणता भी कम पायी जाती है इन संबंधों को नीचे के ग्राफ में देखा जा सकता है-

चित्र : लवणता एवं वर्षा में व्युत्क्रमानुपाती संबंध
चित्र: लवणता एवं वाष्पीकरण में समानुपाती का सम्बंध

          विषुवतीय क्षेत्र को छोड़कर अन्य उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में वाष्पीकरण का प्रभाव कम होता है और वर्षा कम होती है। यही कारण है की विश्व के अधिक लवणता वाले क्षेत्र विषुवतीय क्षेत्र में स्थित नहीं है बल्कि 30° से 35° अक्षांश के बीच उपोष्ण उच्च वायुदाब वाले क्षेत्र में स्थित है। जैसे- तुर्की का वानगोलु झील (330 ‰), मृत सागर (340 ‰), ग्रेट बेसिन (220 ‰)।

            विषुवतीय क्षेत्रों में वाष्पीकरण की तुलना में वर्षा अधिक होती है। इसीलिए वहाँ लवणता कम पाए जाते है।

2. समुद्री जलधाराएँ-

       विश्व के सभी महासागरों में समुद्री जलधाराएँ चला करती है। उत्तरी गोलार्द्ध  में जलधाराएँ Clock Wise  और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anticlock Wise चला करती है। इसका तात्पर्य हुआ कि निम्न अक्षांश से जलधाराएँ उच्च अक्षांश की ओर जाती है और कुछ जलधाराएँ उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर आती है। तापमान के विशेषता के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार के होती है-

(i) ठंडी जलधारा

(ii) गर्म जलधारा।

     गर्म जलधारा में वाष्पीकरण अधिक होता है जिससे लवणता बढ़ने की प्रवृति रखती है। इसके विपरीत ठंडी जलधाराओं में वाष्पीकरण कम होता है। इसीलिए लवणता भी कम होती है। उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह के कारण ही उत्तरी सागर में लवणता बढ़ जाती जाती है। इसी तरह उत्तरी प्रशांत गर्म जल जलधारा के कारण अलास्का की खाड़ी में लवणता बढ़ जाती है।

 3. बर्फ का पिघलना-

       यह ज्ञात है कि ध्रुवीय क्षेत्र बर्फ से ढके हुए हैं। सूर्याताप प्राप्त करके जब बर्फ पिघलती हैं तो समुद्र में जलापूर्ति बढ़ जाती है। जिसके परिणामस्वरूप लवणता में भी कमी आ जाती है। यही कारण है कि आर्कटिक सागर और अंटार्कटिका के तटीय क्षेत्रों में लवणता कम पाई जाती है।

4. नदियों के द्वारा स्वच्छ जल की  आपूर्ति-

          नदी जल स्वच्छ जल के उदाहरण है। विश्व के कई बड़ी बड़ी नदियां अपना जल सतत समुद्र में उधेड़ रही है। काला सागर और कैस्पियन सागर दोनों एक ही अक्षांश पर है लेकिन काला सागर में डेन्यूब नदी और वोल्गा नदी के गिरने के कारण काला सागर की लवणता कम और कैस्पियन सागर की लवणता अधिक है।

5. तटीय आकृति-

       जिन क्षेत्रों में समुद्र का किनारा सीधा और सपाट है वहाँ पर जल का मिश्रण आसानी से हो जाता है। जबकि अधिक कटे-फटे तटीय क्षेत्रों में जल का मिश्रण आसानी से नहीं हो पाता है जिसके कारण ऐसे क्षेत्रों में लवणता अधिक पाई जाती है।

6. ज्वालामुखी उदगार की क्रिया-

        प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर और भूमध्यसागर में कई जीवित ज्वालामुखी पाये जाते हैं। इन ज्वालामुखी उदगारों के कारण जल वाष्पीकृत होते है और लवणता को बढ़ा देते हैं। ज्वालामुखी उदगार के ही कारण अटलांटिक कटक के सहारे लवणता अधिक पायी जाती है।

7. वायुदाब-

       अधिक वायुदाब के कारण जल के सतह नीचे की ओर धँस जाता है जबकि निम्न वायुदाब क्षेत्रों में जल का सतह सामान्य जल स्तर से ऊपर उठा होता है। इस परिघटना के कारण समुद्री जलधाराएँ  उच्च जल स्तर वाले क्षेत्र से निम्न जलस्तर वाले क्षेत्र की ओर चलने लगते है जिसके कारण समुद्री लवणताएँ प्रभावित होती है।

       इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री लवणता को कई कारक प्रभावित करते हैं।

लवणता का वितरण

         विश्व के सभी महासागर आपस में जुड़े हुए हैं। इसीलिए बड़े महासागर और छोटे महासागरों के लवणता में कोई विशेष अंतर नहीं पायी जाती है। लेकिन धरातल  पर कुछ ही जलाशय हैं जो समुद्र से जुड़े हुए नहीं हैं। ऐसे ही बंद सागरों की लवणता खुली सागरों की तुलना में अधिक है। सामान्य तौर पर समुद्री लवणता का अध्ययन दो शीर्षकों में बाँटकर किया जा सकता है-

(A) क्षैतिज लवणता

(B) लम्बवत लवणता

(A) क्षैतिज लवणता

      इसके अंतर्गत महासागरीय लवणता का वितरण का अध्ययन अक्षांशीय आधार पर किया जाता है। सामान्यतः पृथ्वी को दो भागों में बाँटा जाता है- उत्तरी गोलार्द्ध एवं  दक्षिणी गोलार्द्ध। 

     उत्तरी गोलार्द्ध में महासागर का विस्तार कम और महाद्वीपों का विस्तार अधिक हुआ है। जबकि दक्षिणी  गोलार्द्ध में सागर का विस्तार अधिक और स्थल का विस्तार कम हुआ है। यही कारण है कि उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी  गोलार्द्ध के पानी में लवणता कम पायी जाती है। दोनों गोलार्द्धों में समुद्री लवणता के अक्षांशीय वितरण को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है-

अक्षांशीय क्षेत्र उत्तरी गोलार्द्ध में लवणता दक्षिणी गोलार्द्ध में लवणता प्रमुख कारण
0°–10° (भूमध्यरेखीय क्षेत्र) कम (≈ 34‰) कम (≈ 34‰) अधिक वर्षा, नदियों का मीठा जल
10°–20° मध्यम मध्यम वर्षा में कमी, वाष्पीकरण बढ़ता
20°–30° (उपोष्ण कटिबंध) अधिकतम (≈ 36–37‰) अधिकतम (≈ 36‰) तीव्र वाष्पीकरण, कम वर्षा
30°–40° घटती हुई घटती हुई पश्चिमी पवनों से वर्षा
40°–60° कम कम कम तापमान, हिम पिघलना
60°–90° (ध्रुवीय क्षेत्र) बहुत कम (≈ 30–32‰) बहुत कम (≈ 30–32‰) हिम गलन, न्यून वाष्पीकरण
   उपरोक्त तालिका के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी गोलार्द्ध की लवणता कम होती है। लेकिन समुद्री लवणता के वितरण को आधार बनाकर विश्व के महासागरीय क्षेत्र को सामान्य रूप से चार भागों में वर्गीकृत कर अध्ययन करते है।

(1) अत्यधिक लवणता वाले क्षेत्र

(2) अधिक लवणता वाले क्षेत्र

(3) निम्न लवणता वाले क्षेत्र

(4) अति निम्न लवणता वाले क्षेत्र

(1) अत्यधिक लवणता वाले क्षेत्र-

     इसके अंतर्गत वैसे सागरों एवं झीलों को शामिल किया जाता है जिनकी औसत लवणता 40 ०/०० से अधिक है। इसके अंतर्गत उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र के बन्द सागर एवं झील आते है। ये वे क्षेत्र है जहाँ वाष्पीकरण अधिक एवं जलापूर्ति या वर्षा कम होती है। यह सामान्यतः 30° से 35° अक्षांश के बीच के क्षेत्र है। इन्ही क्षेत्रों में मरुस्थलीय एवं अर्द्धमरुस्थलीय जलवायु पायी जाती है। विश्व में सर्वाधिक लवणता रखने वाला मृत सागर (340‰), वानगोलू/वुलर झील (330 ‰), ग्रेट बेसिन (220 ‰), ऑस्ट्रेलिया के आयर झील आते है। इसके अलावे लाल सागर, पार्सियन की खाड़ी, कैस्पियन सागर, भूमध्य सागर के अफ्रीकी तट और जिब्राल्टर के मुहाना पर भी समुद्री लवणता 40 ‰ से अधिक पायी जाती है।

(2) अधिक लवणता वाले क्षेत्र-

      इसके अंतर्गत 30 से 40 ‰ लवणता रखने वाले जलाशयों को शामिल करते है। भौगोलिक वितरण की दृष्टि से विषुवतीय क्षेत्र 5º से 5º को छोड़कर 5º से 30º अक्षांश वाले क्षेत्र को और 45° से 50° अक्षांश के मध्य दोनों गोलार्द्धों में लवणता अधिक पायी जाती है। 40° से 50° अक्षांश के बीच गर्म समुद्री जलधारा के कारण लवणता अधिक पायी जाती है। जबकि 5° से 30° अक्षांश के बीच वर्षा एवं वाष्पीकरण में विभिन्नता के कारण लवणता अधिक पायी जाती है।

(3) निम्न लवणता वाले क्षेत्र- 

      इसके अंतर्गत 20 से 30 ‰ लवणता वाले क्षेत्र को शामिल करते है। इसके अंतर्गत मुख्यतः तीन क्षेत्र आते है-

(क) विषुवतीय क्षेत्र के महासागरों में 5°N से 5°S के बीच। यहाँ पर लवणता कम होने का प्रमुख कारण वर्षा अधिक और वाष्पीकरण का कम होना है।

(ख) 35° से 45°अक्षांश के बीच

(ग) 55° अक्षांश से ध्रुव (90° अक्षांश) तक

      विषुवतीय क्षेत्रों में निम्न लवणता का एक प्रमुख कारण बड़ी-बड़ी नदियों का समुद्र में गिरना भी है। जैसे- जायरे एवं अमेजन नदी अपना मुहाना विषुवतीय क्षेत्रों में ही बनाती है। यही कारण है कि इनके मुहाने पर औसत लवणता 10 ‰ तक पहुँच जाती है।

      उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में न्यून लवणता का प्रमुख कारण सूर्य के तापीय प्रभाव का कम होना है। सूर्य के कम तापीय प्रभाव के कारण वाष्पीकरण की क्रिया भी कम होती है। इसके अलावे उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में ध्रुवीय हिम शीलाखण्ड और सेंटलॉरेन्स, राईन, एनेसी, ओब, लीना, जैसे नदियों के द्वारा बड़े पैमाने पर जलापूर्ति की जाती है।

(4) अति निम्न लवणता वाले क्षेत्र- 

       इसके अंतर्गत 20‰ से कम लवणता वाले क्षेत्रों को शामिल करते है। इसके अंतर्गत उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों के बन्द सागर और झील को शामिल करते है। उच्च अक्षांशीय क्षेत्र में शामिल होने के कारण यहाँ वाष्पीकरण कम होता है और हिमानियों के द्वारा स्वच्छ जल की आपूर्ति अधिक होती है।

      विश्व में सबसे कम लवणता बाल्टिक सागर के गल्फ ऑफ बोथनियाँ में गोटलैंड द्वीप (6 से 8 ‰) के पास पायी जाती है। इसके अलावे हड्सन की खाड़ी, कारा सागर, उजला सागर और बाल्टिक सागर की भी औसत लवणता बहुत कम पायी जाती है।

(B) लम्बवत लवणता का वितरण 

           महासागरों में लम्बवत दृष्टिकोण से भी लवणीय विषमता दिखाई पड़ती है। जैसे-

(i) विषुवतीय क्षेत्रों में सतह के ऊपर वर्षा अधिक होने के कारण लवणता कम पायी जाती है। जबकि लवण का घनत्व अधिक होने के कारण नीचे की ओर बैठने की प्रवृति होती है। इसी कारण से ऊपर से नीचे की ओर जाने पर विषुवतीय क्षेत्रों में लवणता अधिक मिलती है।

(ii) मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में 200 फैदम की गहराई तक लवणता में वृद्धि होती है। लेकिन उसके बाद लवणता में कमी आती है क्योंकि उपसतही जलधारा के कारण मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों के नीचले भागों में जलापूर्ति बढ़ जाती है।

(iii) ध्रुवीय क्षेत्रों के ऊपरी भागों में हिमशीलाखण्डों के पिघलने के कारण लवणता कम पायी जाती है। जबकि लवण के बैठने के कारण निचले भागों में लवणता अधिक पायी जाती है। सम्पूर्ण लम्बवत सागरीय लवणता के वितरण को नीचे के Flow Chart में देखा जा सकता है-

निष्कर्ष:

     इस प्रकार उपर्युक्त तथ्यों  से स्पष्ट है कि सागरीय लवणता में क्षैतिज एवं लम्बवत रूप से काफी विषमताएँ पायी जाती है। सागरीय लवणता में विषमता उतपन्न करने वाले कई कारक है। लेकिन इसके अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वर्षा और वाष्पीकरण लवणता को प्रभावित करने वाले दो सबसे प्रमुख कारक हैं।

नोट:

👉 वानगोलू झील (Lake Van) तुर्की के पूर्वी अनातोलिया क्षेत्र में स्थित एक अंत:स्थलीय खारी क्षारीय झील है। यह तुर्की की सबसे बड़ी झील है और समुद्र से कोई निकास नहीं रखती।

👉 मृत सागर

  • यह मध्य पूर्व (Middle East) में स्थित है।

  • इज़राइल और जॉर्डन की सीमा के बीच फैली हुई है।

  • यह पृथ्वी का सबसे निचला स्थल है (समुद्र तल से लगभग 430 मीटर नीचे)।

  • अत्यधिक लवणता के कारण इसमें जीव लगभग नहीं पाए जाते इसीलिए इसे मृत सागर कहा जाता है।

👉 ग्रेट बेसिन झील 

  • ग्रेट बेसिन झील उत्तरी अमेरिका के ग्रेट बेसिन क्षेत्र में स्थित है।
  • यह झील मुख्यतः Utah राज्य में पाई जाती है।
  • इसे सामान्यतः Great Salt Lake के नाम से जाना जाता है।
  • यह एक आंतरिक अपवाह (Inland Drainage) क्षेत्र की झील है, अर्थात इसका जल समुद्र तक नहीं पहुँचता।
  • अधिक वाष्पीकरण के कारण इसका जल अत्यधिक लवणीय (खारा) है।


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9. एशिया का लौह के उत्पादन एवं वितरण / Distribution and Production of Iron-Ore of Asia

9. एशिया का लौह के उत्पादन एवं वितरण 

(Distribution and Production of Iron-Ore of Asia)


एशिया का लौह के उत्पादन एवं वितरण

एशिया का लौह

              लौह विश्व की एक महत्वपूर्ण खनिज धातु है। यह पृथ्वी के अन्दर चट्टानों में कच्ची धातु के रूप में पाया जाता है जिसे अग्नि भट्टियों में डालकर उपयोगी बनाया जाता है। दैनिक प्रयोग में आने वाली अनेक मशीने, यातायात के साधन-रेल, मोटर, साइकिल, हवाई जहाज, जलयान, हथियार आदि वस्तुओं को तैयार करने के लिये लौह की ही आवश्यकता पड़ती है। लौह अयस्क निम्नलिखित प्रकार का होता है –

(i) हेमेटाइट: इसमें लौह का अंश 75 प्रतिशत तक होता है। यह आसानी से गल जाता है। यह कठोर तथा कम वजन का होता है। 

(ii) मैगनेटाइट: यह हरे भूरे काले रंग का लौह खनिज है। इसमें लोहे का अंश 72 प्रतिशत तक होता है। यह चुम्बक द्वारा सरलता से आकर्षित हो जाता है।

(iii) लिमोनाइट: इसमें लौह अयस्क अंश 60 प्रतिशत तक रहता है। इसकी खुदाई सरलता से हो जाती है। यह पीले व भूरे रंग में मिलता है। 

(iv) साइडेराइट: इसमें लौह अंश 20-30 प्रतिशत तक होता है। यह अशुद्ध मिश्रित लौह धातु है। यह भी भूरे रंग का होता है।

उत्पादन : 

          एशिया में विश्व का लगभग 14 प्रतिशत लौह उत्पन्न होता है। एशिया के प्रमुख लौह उत्पादक देश चीन, सोवियत एशिया, भारत, उत्तरी कोरिया, फिलीपाइन तथा मलेशिया है। जापान, बर्मा, थाइलैंड, टर्की, पाकिस्तान तथा दक्षिण कोरिया भी कुछ लौह का उत्पादन करते हैं।

चीन: चीन में लौह अयस्क के भण्डारों का अनुमान 46 बिलियन टन का है। अधिकांश लोहा उत्तर के कोयला क्षेत्रों के साथ ही निकाला जाता है। विश्व में लौह-अयस्क के उत्पादन में चीन का प्रथम स्थान है। यहाँ विश्व में लोह अयस्क के कुल उत्पादन का 28% होता है। चीन विश्व का अग्रणी लौह-अयस्क उत्पादक देश है। चीन में लौह अयस्क के भण्डार शन्सी कोयला क्षेत्र के पास हेबेई और शान्डोंग में पाया जाता है। हुपेड़ तथा चिनलिंग की खानों से भी लोहा निकाला जाता है। अन्य लोहे की खाने भीतरी मंगोलिया, आन्हेई, लिआओनिंग, चिघाई, आदि राज्यों में मिलती है।

एशिया में लौह उत्पादन

देश     उत्पादन (मिलियन टन)

चीन    – 610.0

भारत  -140.0

कजाखस्तान  -19.20

ईरान   -18.20

मलेशिया  -6.6

भारत: भारत एशिया का प्रमुख लोहा उत्पादक देश है। भारत का लगभग 50% लोहा झारखण्ड की सिंहभूम तथा ओडिशा की मयूरभंज एवं क्योंझर की खानों से प्राप्त होता है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र की खानों से भी लोहा निकाला जाता है। भारत लोहे का निर्यात करता है। यहाँ से निर्यात जापान, चैक, स्लोवाक, जर्मनी, रोमानिया, इटली, पोलैण्ड, बेल्जियम, हंगरी आदि देशों को होता है। 

कजाखस्तान: मध्य एशियाई देशों में कजाखस्तान लौह अयस्क का उल्लेखनीय उत्पादक देश है। यहाँ लौह अयस्क का खनन कारगाण्डा तथा कोस्तानाय क्षेत्रों में होता है। 

ईरान: यहाँ लौह अयस्क का खान रश्त् (गिलान) क्षेत्र में होता है।

जापान: जापान के मुरोरां जिला तथा कैमेशी क्षेत्र की खानों से भी उत्तम प्रकार की लौह धातु प्राप्त की जाती है। कैमेशी में मिलने वाली लौह धातु मैगनेटाइट श्रेणी की है। अन्य खानों में मोथाइशी तथा ओमोरी हैं। 

मलेशिया: मलेशिया संघ के मलाया प्रायद्वीप की जोहोर तथा ट्रैगानू राज्यों की लौह खानों से लोहा निकाला जाता है। ट्रैगानू राज्य की डुंगन तथा बुकिनवेसी लौह खाने प्रसिद्ध हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार  

          आज के इस्पात युग में लोहे का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मलाया प्रायद्वीप, उत्तरी कोरिया, भात तथा चीन देश लोहे का निर्यात करते हैं। जापान तथा फिलीपाइन प्रमुख आयात करने वाले देश है।

प्रश्न प्रारूप

1. एशिया में लौह अयस्क के उत्पादन और प्रमुख उत्पादक देशों प संक्षेप में प्रकाश डालें।

8. एशिया का पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरण / Distribution and Production of Petroleum of Asia

8. एशिया का पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरण 

(Distribution and Production of Petroleum of Asia)


एशिया का पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरणएशिया का पेट्रोलियम

        शक्ति के साधनों में कोयला के बाद पेट्रोलियम का दूसरा स्थान है। परिवहन सुविधा के कारण इसका खर्चा कम आता है। आधुनिक युग में संसार की बढ़ती हुई यातायात की मांग तथा तेज रफ्तार में चलने वाले यंत्रों की चालक शक्ति के कारण पेट्रोलियम की काफी अधिक मांग है। औद्योगिक युग का विस्तार तथा विकास प्रत्यक्ष रूप से पेट्रोलियम की प्राप्ति पर निर्भर करता है।

उत्पादन: 

          एशिया महाद्वीप विश्व का लगभग 40% खनिज तेल अथवा पेट्रोलियम का उत्पादन करता है। दक्षिणी-पश्चिमी एशिया के तेल उत्पादक देश ईरान, इराक, सऊदी अरब, कुवैत, कतार, बहरीन, टर्की, इजरायल, आदि है। दक्षिणी-पूर्वी एशिया तथा एशियाई रूस में भी तेल का उत्पादन किया जाता है। दक्षिणी-पूर्वी एशिया के पेट्रोलियम उत्पादक देश इण्डोनेशिया, चीन, ब्रूनी, मलेशिया, म्यांमार आदि हैं

पेट्रोलियम का वितरण (Distribution of Petroleum): 

           एशिया में खनिज तेल का वितरण निम्नलिखित है-

1. दक्षिणी-पश्चिमी एशिया (South-West Asia):

               दक्षिण-पश्चिम एशिया आज केवल एशिया का ही नहीं बल्कि विश्व को सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पादक क्षेत्र है। यहाँ पर पेट्रोलियम का काफी विशाल भण्डार है। यहाँ तेल के अनेक कुएँ हैं। इन तेल भण्डारो को पाइप लाइन से आपस में जोड़ दिया गया है। यह तेल पाइप भूमध्य सागर के पूर्वी किनारे के तट तक फैले हुए हैं।

             हैफा और त्रिपोली बन्दरगाह को इस तेल की बहुत मात्रा इन पाइप लाइन से पहुँचा दी जाती है जहाँ से तेल का निर्यात किया जाता है। ईरान का आबादान तेल शोधन करने का विश्व में सबसे बड़ा केन्द्र है। दक्षिण-पश्चिमी एशिया के प्रमुख तेल क्षेत्र निम्नलिखित हैं –

सऊदी अरब: 

       संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सोवियत रूस के बाद सऊदी अरब विश्व का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। यहाँ रासतबूरा पत्तन के समीप दाहरीन क्षेत्र में तेल कूपों का आविष्कार 1936 में हुआ। इसके बाद अबैक्वेक और घावर क्षेत्र की खोज हुई। इस क्षेत्र में पेट्रोलियम उत्पादन फार्म इतनी शीघ्र प्रगति कर गया कि इस देश में पेट्रोलियम उत्पादन मुख्य पेशा बन गया। यहाँ से लेवनान के सिदोन पत्तन तक पाइप लाईन है। यहाँ पेट्रोलियम की सुरक्षित सम्पत्ति अति विशाल है।

         यहाँ के प्रमुख तेल क्षेत्र अल खाबर, अवकेक, हाफर, शेदगम, दम्माम सफानिया, कानिफ खुरेस, आबू अली, आबू, हिरेन, फथीली आदि है। रासतनूरा यहाँ का तेल शोधन केन्द्र है। यहां जल की कमी, तापमान की अधिकता, बालू के स्तूपों की प्रचुरता तथा परिवहन सुविधाओं में कमी पेट्रोल के विकास में प्रधान बाधायें है।

ईरान: 

           सउदी अरब के बाद ईरान एशिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। लेकिन ईराक-ईरान युद्ध के कारण यहाँ खनिज तेल का उत्पादन काफी गिर गया है। यहाँ 1908 में मस्जिदे सुलेमान पेट्रोल क्षेत्रों के अन्तर्गत पेट्रोल उत्पादन कार्य आरम्भ किया। यहाँ का प्रमुख तेल क्षेत्र आगाजरी, मस्जिदे सुलमान, हफ्ते केल, गाकसरन, नपत खानाह, नपतेशाह, नपते सफीद, लाली, गुलखरी, मारून आदि है।

         आबादान और करमन शाह यहाँ के तेल शोधन केन्द्र है। इस देश में पेट्रोल उत्पादन कार्य एंग्लो ईरानी कम्पनी के द्वारा होता था। अंग्रेज और ईरानी सरकार के बीच मतभेद हो जाने पर 1951 में इस कम्पनी का राष्ट्रीयकरण कर लिया जिससे कुछ समय के लिए उत्पादन कार्य ठप्प हो गया। इस कारण 1953 में यहाँ से मात्र 90 लाख वैरल पेट्रोल प्राप्त हुआ। इसके पश्चात् पुन: समझौता हो जाने के बाद पेट्रोल उत्पादन की व्यवस्था पूर्ववत हो गयी।

इराक: 

          पेट्रोल उत्पादन में इसका स्थान छठा है। 1927 में किरकुक पेट्रोल क्षेत्र के अन्तर्गत बाबागुरगुर स्थान पर पेट्रोल का पता लगा और वहाँ तेल कूप बनाये गये। सन् 1934 तक पेट्रोल उत्पादन में विशेष प्रगति नहीं हो पायी। कुछ वर्ष पूर्व किरकुक से त्रिपोली तथा हैफा पत्तनी तक तेल की पाइप लाइन बिछाई गयी। 1952 में यहाँ से सीरिया के बनेस स्थान तक पाइप लाइन ले जाई गयी।

        पेट्रोल उत्पादन के लिए डच, फ्रांसीसी तथा अमेरिकन कम्पनियों को लाइसेंस प्राप्त हुए हैं। प्रतिवर्ष यहाँ लगभग 3.4 करोड़ मीट्रिक टन पेट्रोल उत्पन्न किया जाता है। यहां के प्रमुख तेल क्षेत्र ऐनजलेह, मौसल, केयारा, किरकुक, जाम्बुरी, नहर उमर, जुबैर, रूमैला, बसरा खानविवन आदि है। किरकुक यहाँ का सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है। दौरा तथा करमनशाह में तेलशोधक कारखाने हैं। इसक अपने कुल उत्पादन का 80 प्रतिशत तेल निर्यात कर देता है।

कुवैत: 

       सुरक्षित मात्रा के विचार से इसका संसार में तीसरा स्थान है परन्तु उत्पादन में इसका चौथा स्थान है। यहाँ वर्धन क्षेत्र से पेट्रोल प्राप्त होता है। इस क्षेत्र में पेट्रोल निकालने का लाइसेंस एंग्लो अमेरिकन कम्पनी को प्राप्त हुआ है। यहाँ तेल फारस की खाड़ी के तट के समीप फैला हुआ है। यहाँ के प्रमुख तेल क्षेत्र बरगन, अलजहरा, मगब इत्यादि हैं। बरगन सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है। मीना अल अहमदी तेल शोधन केन्द्र तथा निर्यात करने वाला बन्दरगाह है।

कतार:

       फारस की खाड़ी के पश्चिमी तट पर स्थित कतार दक्षिणी-पश्चिमी एशिया का महत्वपूर्ण तेल उत्पादक देश है। यहाँ तेल के 24 कुएँ हैं। दूखन तेल क्षेत्र यहाँ का सबसे बड़ा तेल उत्पादक क्षेत्र है। दोहा में तेल शोधक कारखाना है। 

बहरीन:

        कुवैत और कतार के मध्य स्थित बहरीन फारस की खाड़ी का एक महत्वपूर्ण द्वीप है। यहाँ तटीय क्षेत्र में तेल के अनेक क्षेत्र फैले हुए हैं। बहेसि यहाँ का सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है। बहरीन में तेल शोधक कारखाना भी है। 

सीरिया: 

        यहाँ तेल उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र बनियास है। यहाँ नये तेल क्षेत्रों का पता लगाने के लिए मनहल कम्पनी काफी प्रयत्न कर रही है। होम्स नगर में तेल शोधन कारखाना है।

टर्की: 

       यहाँ का तेल क्षेत्र 1,21,000 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है। यहाँ तेल उत्पादक दो क्षेत्र है- (i) रमन और (ii) बरजन इस क्षेत्र में तेल प्राप्त करने का कार्य सरकार की टर्किश पेट्रोलियम कम्पनी करती है। वरजन तेल क्षेत्र से सन् 1949 ई. में प्रथम बार तेल प्राप्त किया गया। इस क्षेत्र का सम्भावित तेल भण्डार लगभग 525 लाख बैरल है।

        विभिन्न योजनाओं में ईरान और तुर्की के बीच 985 कि.मी. लम्बी पाइप लाइन का निर्माण किया। यहाँ दो पम्पिंग स्टेशनों की स्थापना की गयी। इनकी क्षमता 9000 से 10,000 अश्व शक्ति है। यहाँ प्रतिवर्ष 3.56 करोड़ टन कच्चा तेल पम्प करने के लिए प्राप्त होता है। 

दक्षिणी-पूर्वी एशिया  के तेल:

           क्षेत्र दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में तेल के उत्पादन की बहुत कमी है। इसका कारण यहाँ के तेल भण्डारों में सुरक्षित तेल की मात्रा कम होना है। दक्षिणी-पूर्वी एशिया में इण्डोनेशिया सबसे अधिक तेल का उत्पादन करता है। इस क्षेत्र के प्रमुख देशों के तेल क्षेत्र निम्न प्रकार है – 

1. इण्डोनेशिया:

         इण्डोनेशिया दक्षिणी पूर्वी एशिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक राष्ट्र है। यहाँ तेल के प्रमुख क्षेत्र सुमात्रा, जावा तथा कालीमण्टन (बोर्नियों) में है। सुमात्रा से पैलेमबाग, मेदन व जाम्बी, कालीमण्टन (बोर्नियों) में बालिक, पापन व तराकन तथा जावा में रेमबाग तथा सुरखाया प्रमुख तेल क्षेत्र हैं। सुमात्रा में मेदन तथा साबाग तेलशोधक केन्द्र है।

2. चीन: 

        चीन के दक्षिणी भाग में अनेक तेल के क्षेत्र पाए जाते हैं, जिनमें से काराभाई, तुन्शाजे, सैदाम बेसिन, आदि प्रमुख है।

3. म्यांमार: 

         म्यांमार के प्रमुख तेल क्षेत्र येनाग, सिगू, डण्डो, यनान्मा आदि है। यंगून (रंगून) तथा बेनांगयांग तेल शोधन केन्द्र है। यहाँ से विश्व का लगभग 1% खनिज तेल प्राप्त किया जाता है। यहाँ इरावदी नदी घाटी में तेल के कुएँ खोदे गए है। 

4. मलेशिया: 

               मलेशिया के प्रमुख तेल क्षेत्र साबाह तथा साराबाक है। लुटांग तेल शोधन केन्द्र है।

5. भारत:

         यहाँ गुजरात तथा असम राज्य प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादक है। मुम्बई के निकट मुम्बई हाई से बड़ी मात्रा में खनिज तेल निकाला जाता है। अभी हाल में गोदावरी डेल्टा में, कावेरी डेल्टा में तथा पश्चिमी राजस्थान में भी खनिज तेल के पर्याप्त भण्डा पाए गये है।

प्रश्न प्रारूप 

1. एशिया में पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितण की विवेचना कीजिए।

(Discuss the production and distribution of petroleum in Asia.) 

7. एशिया का कोयले के उत्पादन एवं वितरण / Distribution and Production of Coal of Asia

7. एशिया का कोयले के उत्पादन एवं वितरण

(Distribution and Production of Coal of Asia)


एशिया का कोयले के उत्पादन एवं वितरण⇒एशिया का कोयले

            शक्ति के साधनों में कोयला संसार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण खनिज पदार्थ है। आज के औद्योगिक युग में कोयले का महत्व और बढ़ गया है क्योंकि अनेक विशाल उद्योग कोयले पर ही निर्भर है। कोयला पृथ्वी के अन्दर चट्टानों के रूप में अनेक पत में पाया जाता है। इसमें प्रमुख रूप से कार्बन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, राख आदि पदार्थ प्राप्त होते है। कार्बन की मात्रानुसार कोयले के निम्नलिखित भेद है-

1. एन्थेसाइट: यह अच्छी किस्म का कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 90% से 959 तक होती है। इसका सामान्य प्रयोग घरेलू ईंधन के रूप में किया जाता है। 

2. विटूमीनस: यह भी अच्छी किस्म का कोयला है। इसमें कार्बनिक मात्रा 75 से 90 प्रतिशत तक होती है। इसका सामान्य प्रयोग उद्योग में शक्ति के रूप में किया जाता है।

3. लिग्नाइट: इसे भूरे कोयले के नाम से जाना जाता है। यह घटिया किस्म का अशुद्ध कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 40 से 60% तक होती है। इसमें मोम व कृत्रिम पेट्रोल बनाया जाता है।

4. पीट: यह कच्चा कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 40 प्रतिशत होती है। यह कोलतार बनाने में प्रयोग किया जाता है। 

उत्पादन (Production)

          एशिया समस्त विश्व के कुल कोयला उत्पादन का लगभग 27% भाग उत्पादन करता है। एशिया के प्रमुख कोयला उत्पादक देश चीन, भारत, जापान, एशियाई रूस, दक्षिणी एवं उत्तरी कोरिया, टर्की, ताईवान आदि है।

भारत: भारत संसार का लगभग 7% तथा एशिया का 14% कोयला उत्पन्न करता है। यहाँ कोयला झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों से निकला जाता है। कुछ मात्रा में कोयला उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, असम, बिहार तथा जम्मू-कश्मीर में भी है। भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण के अनुसार देश में 23.411.4 करोड़ टन कोयला के भण्डार है।

जापान: देश का अधिकांश कोयला उत्तरी क्यूशू द्वीप की चिकूहो, सागा, होकुशू तथा मिको खानी से निकाला जाता है। थोड़ी मात्रा होकैडो द्वीप की इशीकारी व कुशिरों खानों से एवं होन्शू की जीवान एवं उबे खानों से निकाला जाता है। जापान अपनी अधिकांश आवश्यकता का कोयला आयात करता है। 

चीन: एशिया एवं विश्व में कोयला का सर्वाधिक उत्पादन चीन में होता है। यहाँ कोयला का खनन हेदी, हिलोगजिआग, हेनान, लिआओनिंग शानडॉग, शान्सी, सिचुआन, निगजिआ तथा नी मंगोल क्षेत्रों में होता है। यहाँ कोयले का उत्पादन विश्व उत्पादन का 35% है। 

कोरिया: उत्तरी कोरिया की एलांग खाड़ी के तट क्षेत्र तथा दक्षिणी कोरिया दक्षिणी पूर्वी क्षेत्र भी प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र है। उत्तरी कोरिया में दक्षिणी कोरिया की अपेक्षा अधिक कोयला मिलता है।

पाकिस्तान: पाकिस्तान में अच्छे किस्म के कोयले की कमी है परन्तु टर्शियरी किस्म का कोयला यहाँ अधिक पाया जाता है। यहाँ कोयले का उत्पादन 2140 हजार टन है। कोयला यहां रावलपिडी, मजराबल तथा हैदराबाद में पाया जाता है।

म्यांमार: कोयला यहाँ चिन्दविन घाटी तथा शान पठार पर निकाला जाता है। 

थाइलैण्ड: कोयला थाइलैण्ड में दक्षिणी थाइलैण्ड के क्रावी क्षेत्र में मायेमोह की खानों से निकाला जाता है। यह घटिया किस्म का कोयला है। आमफरली में भी लिग्नाइट कोयले के भण्डार मिले हैं। 

मलेशिया: यहाँ घटिया किस्म का कोयला मिलता है जो कुछ गहराई पर निकाला जाता है। इस कारण यह कम निकाला जाता है। मलाया में कोयला सेलांगोर, सारावाक, सिलाप्टेक एवं साबाह में पाया जाता है।

 इण्डोनेशिया: इन्डोनेशिया का सबसे अधिक कोयला सुमात्रा द्वीप में पाया जाता है। कोयले की मुख्य खाने दक्षिण सुमात्रा में बुकिन आसाम तथा मध्य सुमात्रा में ओमविलिन में है। कालीमण्टन की महाकाम क्षेत्र की खानों में भी कोयला का उत्पादन होता है।

ताइवान: कोयला यहाँ का प्रमुख खनिज है। यहाँ के सम्पूर्ण भण्डार का 80 प्रतिशत उत्तरी ताइवान में पाया जाता है। इस कोयले की प्रमुख खाने चिलाओ, नानचुआंग, हिब्रू, कीलंग आदि है। यहाँ का लगभग 75 प्रतिशत कोयला विटमिनस किस्म का है जो धरातल पर कम गहराई में मिलता है।

सोवियत एशिया: कोयला साइबेरिया का मुख्य खनिज है। कोयला के भण्डारों के दृष्टिकोण से यह विश्व का धनी देश है। अन्तर्राष्ट्रीय भू-वैज्ञानिक कांग्रेस के अनुसार साइबेरिया में 1,73,900 करोड़ मीट्रिक टन कोयले का भण्डार है। साइबेरिया में कोयला उत्पादन क्षेत्र हैं- कुण्नेटस्क बेसीन यनीसो, लीना बेसीन चिलियाविस्क, इर्कुटस्क मिनुसिक्स, कारागंडा, आमूर दी की घाटी, ट्रान्स बैकाल ।

बांग्लादेश: खनिज पदार्थ के दृष्टिकोण से यह काफी निर्धन राष्ट्र है। यहाँ घटिया कोयला पाया जाता है। यहाँ के प्रमुख कोयला क्षेत्र रंगपुर, फरीदपुर, खुलना, मैमन सिंह इत्यादि हैं।

अफगानिस्तान: अफगानिस्तान में सबसे अधिक मात्रा में हिन्दुकुश पर्वतीय क्षेत्र में काफी कोयला पाया जाता है। दरे साफ में कोयले का काफी भण्डार है। कोयला को वार्षिक उत्पादन लगभग 150 हजार मीट्रिक टन पाया जाता है। 

       इस प्रकार एशिया समस्त संसार के कुल कोयला उत्पादन का लगभग 27 प्रतिशत भाग उत्पन्न करता है। संचित भण्डार के दृष्टिकोण से चीन का स्थान प्रथम है। परन्तु अच्छी श्रेणी के कोयले के उत्पादन के दृष्टिकोण से भारत का स्थान प्रथम है। 

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार (International Trade):

             कोयला का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापा बहुत महत्वपूर्ण है तथा इसकी माँग भी काफी अधिक है। भारत तथा चीन एशिया के प्रमुख कोयला निर्यात करने वाले देश है। जापान, पाकिस्तान, श्रीलंका तथा बर्मा प्रमुख कोयला आयात करने वाले देश है। कोयले की माँग भी निरन्तर बढ़ ही है। 

प्रश्न प्रारूप

1. एशिया कोयले के उत्पादन एवं वितरण का वर्णन कीजिये। 

6. एशिया के प्राकृतिक वनस्पति / Natural Vegetation of Asiya

6. एशिया के प्राकृतिक वनस्पति

(Natural Vegetation of Asiya)


एशिया के प्राकृतिक वनस्पति⇒

                  प्राकृतिक वनस्पति मूलरूप से जलवायु की दशाओं पर निर्भर होती है। यही कारण है कि एशिया महाद्वीप में मिलने वाली भिन्न-भिन्न प्रकार की जलवायु भिन्न-भिन्न प्रकार की वनस्पति को जन्म देती है। इस विशाल भूखण्ड पर प्राकृतिक वनस्पति का विस्तृत आवरण है। एशिया को 12 वनस्पतिक प्रदेशों में विभक्त किया गया है, जिनका वर्णन इस प्रकार है –

(1) आर्द्र सदाबहार वन- ये वन एशिया महाद्वीप के विषुवत् रेखीय प्रदेशों एवं समीपवर्ती मानसूनी प्रदेशों में विस्तृत है। विषुवत् रेखीय प्रदेशों में जहाँ वर्षपर्यन्त वर्षा व उच्च तापमान रहता है वहीं दक्षिणी-पूर्वी एशिया के मानसूनी जलवायु वाले क्षेत्रों में 125 सेमी. से अधिक वर्षा होती है। विषुवत् रेखीय प्रदेशों में मलाया, फिलीपीन्स व इण्डोनेशिया के भाग सम्मिलित हैं।

         दक्षिणी-पूर्वी एशिया में भारत का पश्चिमी घाट, असम, म्यांमार, बांग्लादेश, थाइलैण्ड के वे भाग जहाँ 125 सेमी. से अधिक वर्षा पायी जाती है। उन भागों में ये वन विस्तृत हैं।

         इन वनों में पाये जाने वाले वृक्षों में महोगनी, गाटापार्चा, बाँस, बेंत, रबड़, सिनकोना आदि प्रमुख हैं। इन वृक्षों की लकड़ी अत्यधिक कठोर होती है। ये वृक्ष अत्यधिक पास-पास सघन रूप में पाये जाते हैं। इस क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के पेड़-पौधे एक साथ पाये जाते हैं। मुख्य वृक्षों के नीचे अन्य छोटे-छोटे पौधे तथा लताएँ पायी जाती हैं। अत्यधिक वर्षा व उच्च तापमान के कारण यहाँ वृक्ष 55 मीटर की ऊँचाई तक पाये जाते हैं।

          ये वृक्ष इतने सघन होते हैं कि सूर्य का प्रकाश तक धरातल पर नहीं पहुँच पाता। इन वनों में पाये जाने वाले कठोर लकड़ी के वृक्ष विविध कार्यों में प्रयोग किये जाते हैं। अत्यधिक मिश्रित होने तथा परिवहन की सुविधा नहीं होने के कारण इन वनों की आर्थिक उपयोगिता बहुत कम है।

एशिया के प्राकृतिक

एशिया के प्राकृतिक वनस्पति

(2) मानसूनी पतझड़ वन- मानसूनी वन क्षेत्र का विस्तार भारत के अनेक भागों तथा म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, कम्बोडिया, लाओस, वियतनाम, दक्षिणी चीन तथा जावा-सुमात्रा द्वीपों के कुछ भागों तक है।

        जहाँ वर्षा की मात्रा 200 सेमी. के लगभग होती है वहाँ सदाबहार वन पाये जाते हैं एवं 100 से 200 सेमी. के मध्य वर्षा वाले भागों में पतझड़ वन पाये जाते हैं। अधिक वर्षा वाले भागों में सागवान, सिनकोना, महोगनी एवं नारियल वृक्ष होते हैं एवं जहाँ वर्षा 100 सेमी. के लगभग होती है वहाँ शीशम, साल, आम, नीम, जामुन आदि वृक्षों की बहुतायत होती है।

          इन वनों में अधिकांश वृक्ष ग्रीष्मकाल में पत्तियाँ गिरा देते हैं। मानसूनी वनों से प्राप्त होने वाली लकड़ी बहुमूल्य होती है। यह लकड़ी इमारती सामान तथा फर्नीचर बनाने के काम आती है। ये वन सघन तथा लम्बे नहीं पाये जाते हैं। इन वनों की ऊँचाई लगभग 30 मीट तक पायी जाती है।

(3) शीतोष्ण मानसूनी वन प्रदेश- इन वनों का विस्तार जापान के दक्षिणी भाग, चीन के मध्यवर्ती भाग, मंचूरिया तथा ताइवान तक फैला हुआ है। इन वनों में पाये जाने वाले वृक्षों में ओक, मेपल, लारेल, वालनट, शहतूत आदि प्रमुख हैं। ये वृक्ष ग्रीष्म पत्तियाँ गिरा देते हैं। ये वन अधिक सघन नहीं होते हैं। इन वनों की लकड़ी बहुमूल्य होती ऋतु में अपनी है। जापान के पर्वतीय भागों में इन वनों को काटकर चाय के बागानों में परिवर्तित कर दिया है तथा चीन में इन वनों को काटकर कृषि भूमि बना ली गई है। इस प्रकार इन वनों का विस्तार कम होता जा रहा है।

(4) पर्वतीय वनस्पति- यह वनस्पति हिमालय से लेकर उत्तरी-पूर्वी साइबेरिया के पर्वतीय ढालों पर पायी जाती है जिसे अल्पाइन के नाम से भी जाना जाता है। ऊँचाई के साथ जैसे-जैसे जलवायु में परिवर्तन होता है वैसे ही प्राकृतिक वनस्पति का स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है। ऊँचाई के साथ वृक्षों को आकृति छोटी होती जाती है।

          इन वनों में चीड़-देवदार जैसे नरम वृक्ष पाये जाते हैं 1000 मीटर की ऊँचाई तक तो सघन वनस्पति पायी जाती है इसके पश्चात् 3000 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले भागों पर तो बहुत कम वनस्पति होती है। 4000 मीटर की ऊँचाई के बाद मात्र घास पायी जाती है।

(5) समशीतोष्ण घास के मैदान- समशीतोष्ण घास के मैदान मध्य एशिया में स्थित है। ये मंगोलिया, मध्य मंचूरिया तथा साइबेरिया के दक्षिणी भाग में फैले हुए हैं। मध्य शिया में स्थित इस वृक्षविहीन घास की पेटी को स्टेपी के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र में वर्षा बहुत कम होती है। इस कारण वृक्ष बहुत कम उगते हैं एवं घास बहुतायत में उगती है। ग्रीष्म ऋतु में यह स्टेपी घास झुलस जाती है। ग्रीष्म काल में उच्च ताप, न्यून वर्षा एवं शीत काल में न्यून तापमान व शुष्कता के कारण इस क्षेत्र में स्टेपी घास के अलावा अन्य वनस्पति उगने की सम्भावना नहीं है। इस क्षेत्र की घास गुच्छेदार होती है। जो पशुचारण के लिए उपयोगी होती है। इस क्षेत्र में पशुचारण का अधिक प्रचार है। 

(6) कोणधारी पतझड़ मिश्रित वन- इस प्रकार की वनस्पति मुख्यतः जापान, उत्तरी चीन, कोरिया, दक्षिणी-पूर्वी साइबेरिया तथा तुर्की के पठारी भागों एवं पर्वतीय दालो पर पायी जाती है। यहाँ पतझड़ तथा सदाबहार दोनों प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं। इन वृक्षों में नरम लकड़ी तथा कठोर लकड़ी दोनों प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं।

         नरम लकड़ी वाले वृक्षों में मेपल, बैतूल, चौड़ तथा हेमलाक प्रमुख है। जहाँ पर्याप्त वर्षा होती है वहाँ चौड़ी पत्ती वाले सदावहार वृक्ष पाये जाते हैं। चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वृक्षों में शहतूत, तुंग तथा कपूर आदि वृक्ष प्रमुख हैं।

(7) मिश्रित सदाबहार एवं पतझड़ वन- पूर्वी एशिया के सामान्य तापमान तथा पर्याप्त मानसूनी वर्षा वाले भागों में चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वन पाये जाते हैं। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पतझड़ वन के रूप में मिश्रित वन पाये जाते हैं।

        चीन तथा हिन्दचीन में इस प्रकार की वनस्पति पायी जाती है लेकिन जनाधिक्य के कारण इन देशों में अधिकांश वनस्पति का विनाश हो गया है। अब केवल उच्च भागों में इनके अवशेष हैं। चीन में ऐसे उच्च क्षेत्र नानशान तथा टिसिनलिंग है। यहाँ अनेक प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं। इनके मध्य में घास, बाँस आदि के भी विस्तार हैं।

(8) भूमध्यसागरीय वन प्रदेश- भूमध्यसागर के तटवर्ती देश इजरायल, लेबनान, सीरिया, टर्की के तटवर्ती भाग तथा उत्तरी ईराक, इरान आदि में इस वनस्पति का विस्तार पाया जाता है। वर्षा शीत ऋतु में होती है, ग्रीष्म ऋतु शुष्क होती है लेकिन इस वनस्पति क्षेत्र के वृक्षों को जड़ें लम्बी तथा पत्तियाँ मोटी व चिकनी होने के कारण ग्रीष्मकाल के तीव्र वाष्पीकरण को झेल लेती है। इस कारण वाष्पीकरण कम होता है तथा ये वृक्ष सदैव हरे-भरे रहते हैं।

           जैतून, ओक, अंगूर, अंजीर, नौबू, नारंगी, पाइन व फर इन वनों के मुख्य वृक्ष हैं। इन वनों में रसदार फल बहुतायत में उगते हैं। जैतून, अंगूर, नींबू आदि रसदार फल बहुतायत में पाये जाते हैं।

(9) शुष्क घास के मैदान- इस वनस्पति क्षेत्र का विस्तार ब्लूचिस्तान से लालसागर तक और साइबेरिया के कुछ भागों में फैला हुआ है। इस क्षेत्र में तीव्र गर्मी व वर्षा की मात्रा अति न्यून होती है जिसके कारण ग्रीष्मकाल में घासें सूख जाती हैं व धरातल वनस्पति विहीन हो जाता है। इस क्षेत्र में केवल वही वनस्पति जीवित रह सकती हैं जो गर्मी व वाष्पीकरण को सहन कर सके। खजूर, बबूल, झाड़ियाँ और ताड़ के वृक्ष यहाँ विकसित हो सकते हैं, क्योंकि इनमें शुष्कता सहन करने की क्षमता होती है।

(10) उष्ण मरुस्थलीय वनस्पति प्रदेश- एशिया महाद्वीप में उष्ण मरुस्थलीय वनस्पति का विस्तार भारत के थार के मरुस्थल, अरब, ईराक, इरान आदि के क्षेत्रों में है। इन क्षेत्रों में अल्प वर्षा व उच्च तापमान के कारण इस प्रकार की उष्ण मरुस्थलीय वनस्पति पायी जाती है। रेगिस्तानी भागों में उच्च तापमान व निम्न वर्षा के कारण काँटेदार वृक्ष तथा झाड़ियाँ पायी जाती हैं।

         कंटीली झाड़ियाँ, नागफनी, बबूल, खजूर आदि इस क्षेत्र में पाये जाने वाले प्रमुख वृक्ष हैं। रेगिस्तानी क्षेत्र में पौधों की जड़ें लम्बी, छाल मोटी तथा पत्तियाँ कम एवं काँटे अधिक पाये जाते हैं। यह वनस्पति ईंधन के अलावा और किसी उपयोग की नहीं होती हैं। 

(11) कोणधारी वन प्रदेश (टैगा)- सम्पूर्ण साइबेरिया के उत्तरी भाग में एक लम्बी-चौड़ी पेटी के रूप में पाये जाने वाले कोणधारी वन को टैगा वन कहा जाता है। टैगा वनों को बोरियल वन भी कहा जाता है। इन वनों में स्प्रूस, चीड़, लार्च, हेमलाक, फर, सीडार आदि वृक्ष प्रमुखता से मिलते हैं। टैगा वन प्रदेश में पाये जाने वाले वृक्षों की पत्तियाँ नुकीले आकार की होती हैं, जिनकी नोंक सुई की तरह होती है। अतः इसी कारण इन्हें कोणधारी वन कहते हैं।

          टैगा वन क्षेत्र में ग्रीष्मकाल में तापमान 6° सेल्सियस तक पाया जाता है एवं शीतकाल में तापमान हिमांक से नीचे चला जाता है। ग्रीष्मकालीन 3-4 महीनों में वर्षा होती है। अत: यहाँ ऐसी वनस्पति पायी जाती है जो लघु समय में विकसित हो सके।

(12) शीत टुण्ड्रा वनस्पति प्रदेश- यह वनस्पति प्रदेश एशिया महाद्वीप के उत्तरी भाग में उत्तरी ध्रुव महासागर के तट पर फैला हुआ है। यहाँ दस महीने तक कठोर सर्दी पड़ती है जिससे भूमि बर्फ से ढकी रहती है। वर्ष भर न्यूनतम तापमान रहता है। इसलिए यहाँ लम्बी शीत ऋतु के कारण मॉस, लाइकेन, काई आदि किस्म की छोटी घास पायी जाती हैं।

प्रश्न प्रारूप 

 Q.8. एशिया महाद्वीप को वनस्पतिक प्रदेशों में विभक्त कते हुये प्रत्येक की प्रमुख विशेषतायें बताइये।

(Divide Asia into the region of vegetation and explain the characteristics of each region.)

Or, एशिया के प्राकृतिक वनस्पति प्रदेशों के नाम बताइये तथा उनमें से किन्हीं दो की विवेचना कीजिए। 

(Name the natural vegetation region of Asia and discuss any two of them.)

Or, “वनस्पति जलवायु का सच्चा सूचक है।” एशिया के सन्दर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए।

(Natural vegetation is the true index of climate. Explain this statement in relation to Asia.) 

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