Category ECONOMIC GEOGRAPHY (आर्थिक भूगोल)

11. Crop Combination and Crop Diversification / फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण

Crop Combination and Crop Diversification

 फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण

Crop Combination and Crop Diversification

परिचय:

      कृषि भूगोल (Agricultural Geography) में फसलों के वितरण, उत्पादन तथा कृषि पद्धतियों का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी क्षेत्र में एक से अधिक फसलों की खेती की जाती है, जिनका अनुपात एवं वितरण अलग-अलग होता है। इसी आधार पर फसल संयोजन (Crop Combination) तथा फसल विविधीकरण (Crop Diversification) की अवधारणाएँ विकसित हुई हैं। ये दोनों अवधारणाएँ कृषि प्रदेशों के निर्धारण, कृषि नियोजन तथा संसाधनों के समुचित उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

फसल संयोजन (Crop Combination):

      किसी क्षेत्र में एक साथ उगाई जाने वाली प्रमुख फसलों के समूह को फसल संयोजन कहते हैं। दूसरे शब्दों में, किसी कृषि क्षेत्र में जिन फसलों का संयुक्त रूप से सर्वाधिक क्षेत्रफल होता है, उन्हें उस क्षेत्र का फसल संयोजन कहा जाता है।

परिभाषा:

वीवर (J. C. Weaver, 1954) के अनुसार-

       “किसी क्षेत्र में सर्वाधिक भूमि पर उगाई जाने वाली फसलों का समूह ही उस क्षेत्र का फसल संयोजन कहलाता है।”

फसल संयोजन की विशेषताएँ (Characteristics of Crop Combination)

1. अनेक फसलों का संयुक्त वितरण (Combined Distribution of Crops):-

      फसल संयोजन की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि किसी क्षेत्र में एक से अधिक प्रमुख फसलें एक साथ उगाई जाती हैं। ये फसलें कुल कृषि क्षेत्र के अधिकांश भाग पर फैली होती हैं तथा उस क्षेत्र की कृषि संरचना एवं कृषि व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती हैं। फसलों का यह संयुक्त वितरण कृषि भूगोल के अध्ययन का आधार बनता है।

2. कृषि प्रदेशों के निर्धारण का आधार (Basis for Delineation of Agricultural Regions):-

     फसल संयोजन कृषि प्रदेशों के वैज्ञानिक वर्गीकरण का महत्वपूर्ण आधार है। जिन क्षेत्रों में समान प्रकार की प्रमुख फसलें उगाई जाती हैं, उन्हें एक ही कृषि प्रदेश में शामिल किया जाता है। इससे कृषि की क्षेत्रीय विशेषताओं का अध्ययन तथा कृषि नियोजन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

3. प्राकृतिक कारकों से प्रभावित (Influenced by Physical Factors):-

     फसल संयोजन मुख्यतः जलवायु, वर्षा, तापमान, मिट्टी, स्थलाकृति तथा जल संसाधनों जैसे प्राकृतिक कारकों पर निर्भर करता है। इन कारकों में परिवर्तन होने पर फसलों का प्रकार एवं उनका क्षेत्रफल भी बदल जाता है। इसलिए प्रत्येक क्षेत्र का फसल संयोजन उसकी प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित होता है।

4. कृषि विशेषीकरण का द्योतक (Indicator of Agricultural Specialization):-

       फसल संयोजन किसी क्षेत्र की कृषि विशेषता एवं उत्पादन प्रवृत्ति को स्पष्ट करता है। इससे यह ज्ञात होता है कि उस क्षेत्र में कौन-सी फसलें प्रमुख हैं तथा कृषि किस दिशा में विशेषीकृत (Specialized) है। उदाहरण के लिए, पंजाब गेहूँ उत्पादन तथा असम चाय उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

5. क्षेत्रीय एवं स्थानिक भिन्नता (Regional and Spatial Variation):-

      फसल संयोजन में स्थानिक (Spatial) एवं क्षेत्रीय (Regional) भिन्नता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। प्रत्येक क्षेत्र का फसल संयोजन उसकी भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग होता है। इसलिए एक ही देश में विभिन्न प्रकार के फसल संयोजन पाए जाते हैं।

6. कृषि नियोजन एवं संसाधन प्रबंधन में उपयोगी (Useful for Agricultural Planning and Resource Management):-

      फसल संयोजन का अध्ययन कृषि विकास, भूमि उपयोग नियोजन, सिंचाई प्रबंधन, फसल चक्र, उर्वरक उपयोग, कृषि निवेश तथा क्षेत्रीय कृषि योजनाओं के निर्माण में अत्यंत उपयोगी है। इसके आधार पर संसाधनों का संतुलित उपयोग, कृषि उत्पादकता में वृद्धि तथा सतत कृषि विकास (Sustainable Agricultural Development) को बढ़ावा दिया जा सकता है।

फसल संयोजन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Crop Combination)

1. जलवायु (Climate):-

    जलवायु फसल संयोजन का सबसे महत्वपूर्ण निर्धारक है। किसी क्षेत्र का तापमान, वर्षा, आर्द्रता, सूर्यप्रकाश तथा फसल वृद्धि अवधि (Growing Season) यह निर्धारित करते हैं कि वहाँ कौन-सी फसलें सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं। उदाहरण के लिए, अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में धान तथा कम वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रों में बाजरा, ज्वार एवं दालों की खेती प्रमुख होती है। इसलिए जलवायु में परिवर्तन होने पर फसल संयोजन भी बदल जाता है।

2. मिट्टी (Soil):-

    मिट्टी का प्रकार, उर्वरता, बनावट, जलधारण क्षमता एवं पोषक तत्व फसल संयोजन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। प्रत्येक फसल के लिए विशिष्ट प्रकार की मिट्टी उपयुक्त होती है। उदाहरणतः जलोढ़ मिट्टी में धान एवं गेहूँ, काली मिट्टी में कपास, लाल मिट्टी में दलहन एवं तिलहन तथा लेटराइट मिट्टी में चाय एवं रबर जैसी फसलों की खेती अधिक सफल होती है।

3. सिंचाई सुविधाएँ (Irrigation Facilities):-

सिंचाई फसल संयोजन का एक प्रमुख निर्धारक है। जहाँ नहर, ट्यूबवेल, कुएँ एवं अन्य सिंचाई साधनों की पर्याप्त व्यवस्था होती है, वहाँ किसान वर्ष में दो या तीन फसलें उगाने में सक्षम होते हैं। पर्याप्त सिंचाई वाले क्षेत्रों में गेहूँ, धान, गन्ना एवं सब्जियों जैसी अधिक जल की आवश्यकता वाली फसलें प्रमुख होती हैं, जबकि वर्षा आधारित क्षेत्रों में सूखा-सहिष्णु फसलें अधिक उगाई जाती हैं।

4. बाजार एवं परिवहन (Market and Transportation):-

      बाजार की मांग, कृषि उत्पादों का मूल्य तथा परिवहन सुविधाओं का विकास फसल संयोजन को प्रभावित करता है। जिन क्षेत्रों में बाजार एवं परिवहन की सुविधाएँ बेहतर होती हैं, वहाँ किसान अधिक लाभदायक नकदी फसलें, फल, सब्जियाँ, फूल एवं बागवानी फसलें उगाने के लिए प्रेरित होते हैं। शहरी क्षेत्रों के निकट व्यावसायिक कृषि का विकास इसी कारण अधिक देखा जाता है।

5. आधुनिक तकनीक (Modern Technology):-

     आधुनिक कृषि तकनीक जैसे उच्च उपज देने वाले बीज (HYV Seeds), रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, कृषि यंत्रीकरण, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई तथा वैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ फसल संयोजन में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाती हैं। इन तकनीकों से कृषि उत्पादकता बढ़ती है, उत्पादन लागत कम होती है तथा किसान नई एवं अधिक लाभदायक फसलों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। इसके परिणामस्वरूप कृषि का आधुनिकीकरण एवं फसल संयोजन में विविधता आती है।

फसल संयोजन के प्रमुख सिद्धांत

(Major Theories of Crop Combination)

1. वीवर का न्यूनतम विचलन सिद्धांत (Weaver’s Minimum Deviation Method, 1954):-

     अमेरिकी भूगोलवेत्ता जे. सी. वीवर (J. C. Weaver) ने 1954 में फसल संयोजन निर्धारण की सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं वैज्ञानिक विधि प्रस्तुत की। इस विधि में किसी क्षेत्र की विभिन्न फसलों के वास्तविक क्षेत्रफल प्रतिशत (Observed Percentage) की तुलना सैद्धांतिक प्रतिशत (Theoretical Percentage) से की जाती है। जिस संयोजन में वास्तविक एवं सैद्धांतिक प्रतिशत के बीच न्यूनतम विचलन (Minimum Deviation) प्राप्त होता है, वही उस क्षेत्र का वास्तविक फसल संयोजन माना जाता है। कृषि भूगोल में यह विधि सबसे अधिक प्रचलित है।

2. डोई की संशोधित विधि (Doi’s Modified Method):-

      डोई (Doi) ने वीवर की न्यूनतम विचलन विधि में सुधार करते हुए एक संशोधित पद्धति प्रस्तुत की। इस विधि में गणना अपेक्षाकृत सरल होती है तथा फसल संयोजन का निर्धारण अधिक व्यावहारिक एवं सटीक रूप से किया जा सकता है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ अनेक फसलें समान अनुपात में उगाई जाती हैं, वहाँ यह विधि अधिक उपयोगी मानी जाती है। इसलिए इसे वीवर विधि का उन्नत रूप माना जाता है।

3. रफीउल्लाह विधि (Rafiullah Method):-

       रफीउल्लाह ने भारतीय कृषि परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए फसल संयोजन निर्धारण की एक संशोधित विधि विकसित की। इस पद्धति में भारतीय कृषि की क्षेत्रीय विविधता, बहुफसली कृषि तथा फसलों के वास्तविक वितरण को अधिक महत्व दिया गया है। भारतीय कृषि भूगोल के अध्ययन, कृषि प्रदेशों के निर्धारण तथा क्षेत्रीय कृषि विश्लेषण में इस विधि का व्यापक उपयोग किया जाता है। यह भारतीय परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त एवं व्यावहारिक मानी जाती है।

फसल संयोजन का महत्व (Importance of Crop Combination)

1. कृषि प्रदेशों का निर्धारण:-

      फसल संयोजन किसी क्षेत्र की प्रमुख फसलों की पहचान करने में सहायता करता है। इसके आधार पर समान कृषि विशेषताओं वाले क्षेत्रों का वैज्ञानिक वर्गीकरण (Agricultural Regionalization) किया जाता है, जिससे कृषि प्रदेशों का निर्धारण सरल हो जाता है।

2. कृषि नियोजन में सहायता:-

      फसल संयोजन का अध्ययन कृषि विकास योजनाओं, सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरकों तथा कृषि तकनीकों के उचित वितरण में सहायक होता है। इससे संसाधनों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है।

3. भूमि उपयोग विश्लेषण:-

     यह किसी क्षेत्र में विभिन्न फसलों के भूमि उपयोग प्रतिरूप (Land Use Pattern) को स्पष्ट करता है। इसके आधार पर भूमि की उत्पादकता का मूल्यांकन तथा उपयुक्त फसल चयन किया जाता है।

4. कृषि उत्पादन में वृद्धि:-

        फसल संयोजन के अध्ययन से क्षेत्र की जलवायु एवं मिट्टी के अनुसार उपयुक्त फसलों का चयन किया जा सकता है, जिससे कृषि उत्पादन और किसानों की आय में वृद्धि होती है।

5. क्षेत्रीय कृषि विकास का अध्ययन:-

      फसल संयोजन विभिन्न क्षेत्रों की कृषि संरचना, उत्पादन क्षमता तथा विकास स्तर को समझने में सहायक होता है। इससे क्षेत्रीय असमानताओं की पहचान कर संतुलित कृषि विकास की योजनाएँ बनाई जा सकती हैं।

फसल संयोजन (Crop Combination) का उदाहरण

उदाहरण–1 (पंजाब):

यदि पंजाब के किसी जिले में कुल कृषि भूमि का 60% भाग गेहूँ, 25% भाग धान तथा 15% भाग गन्ने के अंतर्गत है, तो उस क्षेत्र का फसल संयोजन “गेहूँ-धान-गन्ना (Wheat–Rice–Sugarcane Combination)” कहलाएगा।

उदाहरण–2 (बिहार):

बिहार के उत्तरी मैदानी भागों में यदि किसी क्षेत्र में प्रमुख रूप से धान, गेहूँ एवं मक्का की खेती की जाती है, तो उस क्षेत्र का फसल संयोजन “धान-गेहूँ-मक्का (Rice–Wheat–Maize Combination)” कहलाएगा।

उदाहरण–3 (उत्तर प्रदेश):

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गेहूँ–गन्ना (Wheat–Sugarcane Combination) एक प्रमुख फसल संयोजन है।

उदाहरण–4 (राजस्थान):

शुष्क क्षेत्रों में बाजरा–चना–सरसों (Pearl Millet–Gram–Mustard Combination) प्रमुख फसल संयोजन का उदाहरण है।

अर्थात

     यदि किसी क्षेत्र में धान, गेहूँ एवं मक्का सबसे अधिक क्षेत्रफल में उगाई जाती हैं, तो उस क्षेत्र का फसल संयोजन “धान–गेहूँ–मक्का फसल संयोजन” कहलाता है। यही Crop Combination का सबसे सरल एवं उपयुक्त उदाहरण है।

फसल विविधीकरण

(Crop Diversification)

परिचय:

      जब किसान केवल एक या दो फसलों पर निर्भर न रहकर अनेक प्रकार की खाद्यान्न, दलहन, तिलहन, बागवानी एवं नकदी फसलों की खेती करता है, तो इसे फसल विविधीकरण कहा जाता है।

परिभाषा:

   फसल विविधीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें कृषि जोखिम कम करने तथा आय बढ़ाने के उद्देश्य से विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती की जाती है।

उद्देश्य:

✍️ किसानों की आय बढ़ाना।

✍️ कृषि जोखिम कम करना।

✍️ भूमि की उर्वरता बनाए रखना।

✍️ खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना।

✍️ बाजार की मांग को पूरा करना।

फसल विविधीकरण के कारण (Causes of Crop Diversification)

1. बदलती बाजार मांग (Changing Market Demand):-

    बाजार में फलों, सब्जियों, फूलों, मसालों, औषधीय पौधों तथा अन्य उच्च मूल्य वाली फसलों की मांग लगातार बढ़ रही है। अधिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से किसान पारंपरिक खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ नकदी एवं बागवानी फसलों की खेती अपनाने लगे हैं। इससे कृषि का व्यावसायीकरण बढ़ा है तथा किसानों की आय में वृद्धि हुई है।

2. सिंचाई सुविधाओं का विकास (Development of Irrigation Facilities):-

    नहरों, ट्यूबवेलों, कुओं तथा सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों (ड्रिप एवं स्प्रिंकलर) के विस्तार से किसानों को पूरे वर्ष विभिन्न प्रकार की फसलें उगाने की सुविधा प्राप्त हुई है। पर्याप्त सिंचाई उपलब्ध होने से किसान एक ही भूमि पर दो या तीन फसलें उगाने में सक्षम हुए हैं, जिससे फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिला है।

3. आधुनिक कृषि तकनीक (Modern Agricultural Technology):-

    उन्नत बीज (HYV Seeds), रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, कृषि यंत्र, आधुनिक सिंचाई तकनीक तथा वैज्ञानिक खेती की पद्धतियों ने कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि की है। इन तकनीकों के कारण किसान नई, उच्च मूल्य वाली एवं अधिक लाभदायक फसलों को अपनाने के लिए प्रेरित हुए हैं।

4. सरकारी नीतियाँ एवं प्रोत्साहन (Government Policies and Incentives):-

    सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), फसल बीमा, कृषि ऋण, सब्सिडी, बागवानी मिशन, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) तथा अन्य कृषि विकास योजनाओं के माध्यम से किसानों को विविध फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इन योजनाओं से फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिलता है।

5. जलवायु परिवर्तन एवं जोखिम प्रबंधन (Climate Change and Risk Management):-

    अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, तापमान में वृद्धि तथा अन्य जलवायु संबंधी समस्याओं के कारण एक ही फसल पर निर्भर रहना जोखिमपूर्ण हो गया है। इसलिए किसान विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती अपनाते हैं, जिससे फसल विफल होने की संभावना कम होती है, कृषि जोखिम घटता है तथा आय की स्थिरता बनी रहती है। फसल विविधीकरण जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की एक प्रभावी रणनीति भी है।

फसल विविधीकरण के लाभ (Advantages of Crop Diversification)

1. किसानों की आय में वृद्धि (Increase in Farmers’ Income)

     फसल विविधीकरण के माध्यम से किसान पारंपरिक खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ फल, सब्जियाँ, बागवानी, मसाले एवं अन्य उच्च मूल्य वाली फसलों की खेती करते हैं। इन फसलों से अधिक लाभ प्राप्त होता है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होती है तथा उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

2. कृषि जोखिम में कमी (Reduction in Agricultural Risk)

    यदि किसी एक फसल को प्राकृतिक आपदा, कीट या रोग के कारण नुकसान होता है, तो अन्य फसलें किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। इस प्रकार फसल विविधीकरण कृषि जोखिम को कम करता है तथा किसानों की आय को अधिक स्थिर बनाता है।

3. रोजगार के अवसरों में वृद्धि (Generation of Employment Opportunities):-

     फल, सब्जियाँ, फूल, बागवानी एवं व्यावसायिक फसलों की खेती में श्रम की आवश्यकता अधिक होती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षभर रोजगार के अवसर बढ़ते हैं तथा कृषि आधारित उद्योगों के विकास को भी प्रोत्साहन मिलता है।

4. भूमि की उर्वरता का संरक्षण (Maintenance of Soil Fertility):-

    विभिन्न प्रकार की फसलों का फसल चक्र (Crop Rotation) अपनाने से मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है। विशेष रूप से दलहनी फसलें नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से भूमि की उर्वरता बढ़ाती हैं तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।

5. पोषण सुरक्षा में सुधार (Improvement in Nutritional Security):-

     फसल विविधीकरण के कारण केवल खाद्यान्न ही नहीं, बल्कि फल, सब्जियाँ, दालें, तिलहन एवं बागवानी फसलों का उत्पादन भी बढ़ता है। इससे लोगों को संतुलित एवं पौष्टिक आहार उपलब्ध होता है तथा कुपोषण की समस्या को कम करने में सहायता मिलती है।

6. नकदी फसलों का विकास (Development of Cash Crops):-

     फसल विविधीकरण किसानों को गन्ना, कपास, तंबाकू, मसाले, फल, फूल एवं अन्य व्यावसायिक फसलों की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। इससे कृषि का व्यावसायीकरण बढ़ता है, निर्यात में वृद्धि होती है तथा किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।

7. सतत कृषि को बढ़ावा (Promotion of Sustainable Agriculture):-

     फसल विविधीकरण प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग, जैव विविधता के संरक्षण तथा पर्यावरण-अनुकूल कृषि प्रणाली को प्रोत्साहित करता है। इससे भूमि, जल एवं मिट्टी का संरक्षण होता है, रासायनिक इनपुट का अत्यधिक उपयोग कम होता है तथा दीर्घकालीन कृषि उत्पादकता एवं सतत कृषि विकास (Sustainable Agricultural Development) सुनिश्चित होता है।

फसल विविधीकरण की समस्याएँ (Problems of Crop Diversification)

1. सिंचाई का अभाव (Lack of Irrigation Facilities):-

     भारत के अनेक क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं का पर्याप्त विकास नहीं हुआ है, जिसके कारण किसान आज भी मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहते हैं। अनिश्चित वर्षा के कारण वे फल, सब्जियाँ, बागवानी तथा अन्य उच्च मूल्य वाली फसलों को अपनाने का जोखिम नहीं उठा पाते। परिणामस्वरूप फसल विविधीकरण की प्रक्रिया बाधित होती है।

2. छोटे एवं बिखरे जोत (Small and Fragmented Land Holdings):-

     भारत में अधिकांश किसानों के पास भूमि का आकार छोटा तथा विभिन्न स्थानों पर बिखरा हुआ होता है। ऐसी स्थिति में आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग, यंत्रीकरण तथा विभिन्न प्रकार की फसलों का वैज्ञानिक प्रबंधन कठिन हो जाता है। इसलिए किसान पारंपरिक फसलों की खेती तक ही सीमित रह जाते हैं।

3. बाजार सुविधाओं की कमी (Lack of Market Facilities):-

     फसल विविधीकरण के लिए किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य मिलना आवश्यक है। किन्तु अनेक क्षेत्रों में संगठित बाजार, भंडारण, मूल्य सूचना तथा विपणन व्यवस्था का अभाव है। इसके कारण किसानों को लाभकारी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता और वे पारंपरिक कृषि प्रणाली पर निर्भर रहते हैं।

4. भंडारण एवं परिवहन की समस्या (Problems of Storage and Transportation):-

      फल, सब्जियाँ, फूल तथा अन्य शीघ्र नष्ट होने वाली फसलों के लिए कोल्ड स्टोरेज, शीत-श्रृंखला (Cold Chain) एवं तेज परिवहन व्यवस्था की आवश्यकता होती है। इन सुविधाओं के अभाव में फसलें खराब हो जाती हैं, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है और वे विविधीकरण अपनाने से बचते हैं।

5. तकनीकी जानकारी का अभाव (Lack of Technical Knowledge):-

     कई किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों, उन्नत बीजों, वैज्ञानिक फसल प्रबंधन, कीट एवं रोग नियंत्रण तथा नई कृषि प्रणालियों की पर्याप्त जानकारी नहीं होती। कृषि विस्तार सेवाओं (Extension Services) की सीमित पहुँच के कारण वे नई एवं लाभकारी फसलों को अपनाने में संकोच करते हैं, जिससे फसल विविधीकरण की गति धीमी रहती है।

6. पूँजी एवं ऋण सुविधाओं की कमी (Lack of Capital and Credit Facilities):-

     फसल विविधीकरण के लिए उन्नत बीज, सिंचाई, उर्वरक, कृषि यंत्र, बागवानी एवं आधुनिक तकनीकों में पर्याप्त निवेश की आवश्यकता होती है। छोटे एवं सीमांत किसानों के पास सीमित पूँजी होती है तथा उन्हें समय पर सस्ती ऋण सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हो पातीं। परिणामस्वरूप वे नई फसलों में निवेश करने से बचते हैं और पारंपरिक खेती को ही अपनाए रखते हैं।

भारत में फसल विविधीकरण

    भारत में हरित क्रांति के बाद गेहूँ एवं धान का प्रभुत्व बढ़ा, किन्तु वर्तमान में बागवानी, फल, सब्जी, दलहन, तिलहन, औषधीय पौधे तथा व्यावसायिक फसलों की ओर विविधीकरण तेजी से बढ़ रहा है। पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात तथा बिहार में भी फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण में अंतर

आधार फसल संयोजन फसल विविधीकरण
अर्थ प्रमुख फसलों का समूह अनेक प्रकार की फसलों की खेती
उद्देश्य कृषि प्रदेशों का निर्धारण आय एवं जोखिम प्रबंधन
आधार क्षेत्रीय वितरण कृषि प्रणाली में परिवर्तन
प्रमुख विद्वान जे. सी. वीवर आधुनिक कृषि नीति
उपयोग कृषि भूगोल कृषि विकास एवं नियोजन

फसल विविधीकरण (Crop Diversification) के उदाहरण

उदाहरण-1: पंजाब एवं हरियाणा

     पहले इन राज्यों में मुख्य रूप से गेहूँ एवं धान की खेती होती थी। वर्तमान में किसान फल, सब्जियाँ, दलहन, तिलहन तथा बागवानी फसलों की खेती भी करने लगे हैं। यह फसल विविधीकरण का प्रमुख उदाहरण है।

उदाहरण-2: बिहार

     बिहार में पारंपरिक धान एवं गेहूँ के साथ-साथ मक्का, मखाना, सब्जियाँ, फल (लीची, आम, केला), मसाले एवं बागवानी फसलों की खेती तेजी से बढ़ रही है। यह फसल विविधीकरण का उत्कृष्ट उदाहरण है।

उदाहरण-3: महाराष्ट्र

     महाराष्ट्र में किसान कपास एवं ज्वार के साथ-साथ अंगूर, अनार, संतरा, गन्ना एवं सब्जियों की खेती कर रहे हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि हुई है।

उदाहरण-4: कर्नाटक

     कर्नाटक में रागी एवं धान के साथ कॉफी, काली मिर्च, इलायची, नारियल तथा बागवानी फसलों की खेती की जाती है, जो फसल विविधीकरण को दर्शाती है।

उदाहरण-5: उत्तर प्रदेश

     उत्तर प्रदेश में किसान गेहूँ, धान एवं गन्ने के साथ आलू, सब्जियाँ, सरसों, दलहन तथा बागवानी फसलों की खेती भी करते हैं। इससे कृषि आय एवं रोजगार दोनों में वृद्धि होती है।

अर्थात

    यदि कोई किसान पहले केवल धान की खेती करता था, लेकिन बाद में धान + गेहूँ + मक्का + सब्जियाँ + फल उगाने लगा, तो इसे फसल विविधीकरण (Crop Diversification) कहा जाएगा।

याद रखने का आसान सूत्र:

✍️ फसल संयोजन (Crop Combination) = एक क्षेत्र में प्रमुख फसलों का समूह (जैसे धान–गेहूँ–मक्का)।

✍️ फसल विविधीकरण (Crop Diversification) = आय बढ़ाने एवं जोखिम कम करने के लिए अनेक प्रकार की फसलों की खेती (जैसे धान + गेहूँ + सब्जियाँ + फल + दलहन + तिलहन)।

निष्कर्ष:

    फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण कृषि भूगोल की दो महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं। फसल संयोजन किसी क्षेत्र की प्रमुख फसलों के वितरण एवं कृषि विशेषीकरण को दर्शाता है, जबकि फसल विविधीकरण कृषि को अधिक लाभकारी, टिकाऊ एवं जोखिम-मुक्त बनाने की प्रक्रिया है। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा तथा किसानों की आय बढ़ाने के लिए फसल विविधीकरण अत्यंत आवश्यक माना जाता है। वहीं फसल संयोजन कृषि प्रदेशों के वैज्ञानिक वर्गीकरण एवं क्षेत्रीय कृषि नियोजन का आधार प्रदान करता है।

5. Inter-regional and Intra-regional Trade / अंतर-क्षेत्रीय एवं अंतः-क्षेत्रीय व्यापार

Inter-regional and Intra-regional Trade

(अंतर-क्षेत्रीय एवं अंतः-क्षेत्रीय व्यापार)

  Inter-regional and Intra-regional Trade

     व्यापार (Trade) आर्थिक भूगोल का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो विभिन्न क्षेत्रों के बीच वस्तुओं एवं सेवाओं के आदान-प्रदान से संबंधित है। संसाधनों, उत्पादन क्षमता, तकनीक और मांग में क्षेत्रीय असमानताओं के कारण व्यापार की आवश्यकता उत्पन्न होती है। व्यापार किसी क्षेत्र की आर्थिक प्रगति, रोजगार, औद्योगिक विकास और क्षेत्रीय एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

     आर्थिक भूगोल में व्यापार को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जाता है-

1. Inter-regional Trade (अंतर-क्षेत्रीय व्यापार)

2. Intra-regional Trade (अंतः-क्षेत्रीय व्यापार)

1. Inter-regional Trade (अंतर-क्षेत्रीय व्यापार):

     Inter-regional Trade का अर्थ विभिन्न क्षेत्रों, राज्यों या देशों के बीच वस्तुओं एवं सेवाओं का आदान-प्रदान है। उदाहरण के लिए पंजाब से बिहार में गेहूँ की आपूर्ति, मध्य पूर्व से भारत में पेट्रोलियम आयात।

अंतर-क्षेत्रीय व्यापार की विशेषताएँ:

   अंतर-क्षेत्रीय व्यापार विभिन्न क्षेत्रों, राज्यों या देशों के बीच वस्तुओं एवं सेवाओं के आदान-प्रदान पर आधारित होता है। इसकी प्रमुख विशेषता यह है कि यह संसाधनों एवं उत्पादन की असमानता के कारण विकसित होता है। इसमें लंबी दूरी का परिवहन शामिल होता है, जिससे परिवहन एवं लॉजिस्टिक लागत अधिक होती है।

    यह व्यापार बड़े बाजारों और व्यापक आर्थिक नेटवर्क से जुड़ा होता है। विभिन्न क्षेत्रों की मांग एवं आपूर्ति को संतुलित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके माध्यम से आर्थिक विकास, क्षेत्रीय एकीकरण और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा मिलता है।

अंतर-क्षेत्रीय व्यापार के कारण:

     अंतर-क्षेत्रीय व्यापार के कारण निम्नलिखित है-

(i) संसाधनों का असमान वितरण: सभी क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधन समान रूप से उपलब्ध नहीं होते, इसलिए आवश्यक वस्तुओं के आदान-प्रदान की आवश्यकता होती है।

(ii) उत्पादन में विशेषीकरण (Specialization): कुछ क्षेत्र विशेष वस्तुओं के उत्पादन में दक्ष होते हैं, जैसे पंजाब में गेहूँ उत्पादन एवं गुजरात में कपड़ा उद्योग।

(iii) मांग एवं आपूर्ति में अंतर: जिन क्षेत्रों में किसी वस्तु की मांग अधिक और उत्पादन कम होता है, वहाँ अन्य क्षेत्रों से आयात किया जाता है।

(iv) तकनीकी एवं औद्योगिक विकास में अंतर: विकसित क्षेत्र औद्योगिक वस्तुओं का उत्पादन अधिक करते हैं, जबकि पिछड़े क्षेत्र कृषि उत्पादों पर निर्भर रहते हैं।

(v) जलवायु एवं भौगोलिक विविधता: विभिन्न क्षेत्रों की जलवायु एवं भौगोलिक परिस्थितियाँ अलग-अलग फसलों और उत्पादों के उत्पादन को प्रभावित करती हैं।

(vi) परिवहन एवं संचार का विकास: बेहतर सड़क, रेल, बंदरगाह एवं संचार सुविधाएँ व्यापार को बढ़ावा देती हैं।

(vii) आर्थिक लाभ एवं बाजार विस्तार: व्यापार के माध्यम से उत्पादकों को बड़े बाजार मिलते हैं और अधिक लाभ प्राप्त होता है।

(viii) जनसंख्या एवं उपभोग पैटर्न: अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों में वस्तुओं की मांग अधिक होती है, जिससे व्यापार बढ़ता है।

महत्व:

    अंतर-क्षेत्रीय व्यापार विभिन्न क्षेत्रों के बीच आर्थिक संबंधों को मजबूत बनाता है तथा संसाधनों के प्रभावी उपयोग को सुनिश्चित करता है। यह उन क्षेत्रों की आवश्यकताओं को पूरा करता है जहाँ किसी वस्तु का उत्पादन कम होता है। इसके माध्यम से उत्पादन, रोजगार और आय में वृद्धि होती है, जिससे आर्थिक विकास को गति मिलती है।

    यह क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने तथा राष्ट्रीय एकीकरण को सुदृढ़ करने में भी सहायक है। इसके अतिरिक्त, व्यापार तकनीकी आदान-प्रदान, औद्योगिक विकास और बाजार विस्तार को बढ़ावा देता है, जिससे समग्र आर्थिक प्रगति संभव होती है।

समस्याएँ:

    अंतर-क्षेत्रीय व्यापार की समस्याएँ निम्नलिखित है-

  • परिवहन एवं लॉजिस्टिक लागत अधिक होने से व्यापार महंगा हो जाता है।
  • विभिन्न क्षेत्रों के बीच व्यापार असंतुलन आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न करता है।
  • खराब अवसंरचना (सड़क, रेल, बंदरगाह) व्यापार को प्रभावित करती है।
  • राजनीतिक एवं प्रशासनिक बाधाएँ व्यापारिक गतिविधियों में रुकावट पैदा करती हैं।
  • प्राकृतिक आपदाएँ एवं जलवायु परिवर्तन आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करते हैं।
  • वैश्विक एवं क्षेत्रीय आर्थिक संकट व्यापार की स्थिरता को कमजोर करते हैं।
  • तकनीकी एवं संचार सुविधाओं की कमी व्यापार के विस्तार में बाधा बनती है।
  • क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा एवं मूल्य अस्थिरता व्यापारिक संतुलन को प्रभावित करती है।

2. Intra-regional Trade (अंतः-क्षेत्रीय व्यापार):

    Intra-regional Trade का अर्थ एक ही क्षेत्र या राज्य के भीतर वस्तुओं एवं सेवाओं का व्यापार है। उदाहरण के लिए, बिहार के विभिन्न जिलों के बीच चावल एवं सब्जियों का व्यापार।

अंतः-क्षेत्रीय व्यापार की विशेषताएँ:

    अंतः-क्षेत्रीय व्यापार एक ही क्षेत्र, राज्य या देश के भीतर वस्तुओं एवं सेवाओं के आदान-प्रदान पर आधारित होता है। इसकी प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें व्यापार सीमित भौगोलिक क्षेत्र के भीतर होता है, जिससे परिवहन लागत कम रहती है। यह स्थानीय बाजारों एवं छोटे व्यापारिक नेटवर्क पर आधारित होता है।

    स्थानीय संसाधनों और मांग की पूर्ति में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके माध्यम से ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के बीच आर्थिक संबंध मजबूत होते हैं। यह छोटे व्यापारियों, स्थानीय उद्योगों तथा क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देकर रोजगार एवं आय के अवसर बढ़ाता है।

अंतः-क्षेत्रीय व्यापार के कारण:

   अंतः-क्षेत्रीय व्यापार के कारण निम्नलिखित है-

(i) स्थानीय मांग की पूर्ति: किसी क्षेत्र के भीतर लोगों की दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वस्तुओं एवं सेवाओं का आदान-प्रदान किया जाता है।

(ii) परिवहन सुविधा एवं कम लागत: कम दूरी होने के कारण परिवहन आसान एवं सस्ता होता है, जिससे व्यापार को बढ़ावा मिलता है।

(iii) स्थानीय संसाधनों की उपलब्धता: विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्ध स्थानीय संसाधनों के आधार पर वस्तुओं का उत्पादन एवं व्यापार होता है।

(iv) आर्थिक परस्पर निर्भरता: एक ही क्षेत्र के विभिन्न भाग कृषि, उद्योग एवं सेवाओं के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।

(v) ग्रामीण-शहरी संबंध: ग्रामीण क्षेत्र कृषि उत्पाद उपलब्ध कराते हैं, जबकि शहरी क्षेत्र औद्योगिक वस्तुएँ एवं सेवाएँ प्रदान करते हैं।

(vi) छोटे एवं मध्यम उद्योगों का विकास: स्थानीय स्तर पर छोटे उद्योगों और व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है।

(vii) जनसंख्या एवं उपभोग पैटर्न: क्षेत्रीय स्तर पर बढ़ती जनसंख्या और उपभोग की मांग व्यापार को प्रोत्साहित करती है।

(viii) स्थानीय बाजारों का विस्तार: बाजारों के विकास से वस्तुओं की उपलब्धता और व्यापारिक नेटवर्क मजबूत होते हैं।

महत्व:

  अंतः-क्षेत्रीय व्यापार स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह स्थानीय संसाधनों के प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देता है तथा छोटे एवं मध्यम व्यापारियों को रोजगार और आय के अवसर प्रदान करता है। इसके माध्यम से ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के बीच आर्थिक संबंध मजबूत होते हैं और वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित होती है।

    कम परिवहन लागत के कारण व्यापार अधिक सुविधाजनक और सस्ता होता है। यह क्षेत्रीय बाजारों के विकास, स्थानीय उद्योगों के विस्तार तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देकर समग्र क्षेत्रीय विकास में योगदान देता है।

समस्याएँ:

  अंतः-क्षेत्रीय व्यापार की समस्याएँ निम्नलिखित है-
  • सीमित बाजार होने के कारण व्यापार के विस्तार की संभावना कम रहती है।
  • पूंजी एवं निवेश की कमी व्यापारिक विकास को प्रभावित करती है।
  • कमजोर अवसंरचना (सड़क, भंडारण, परिवहन) व्यापार में बाधा उत्पन्न करती है।
  • तकनीकी एवं संचार सुविधाओं की कमी व्यापारिक दक्षता को कम करती है।
  • स्थानीय स्तर पर मूल्य अस्थिरता व्यापार को प्रभावित करती है।
  • क्षेत्रीय असमानताएँ एवं संसाधनों की कमी व्यापारिक संतुलन को कमजोर करती हैं।

निष्कर्ष:

    इस प्रकार Inter-regional और Intra-regional Trade आर्थिक विकास एवं क्षेत्रीय एकीकरण के महत्वपूर्ण आधार हैं। ये संसाधनों के प्रभावी उपयोग, उत्पादन वृद्धि और रोजगार सृजन में सहायक हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में संतुलित व्यापार व्यवस्था क्षेत्रीय असमानताओं को कम कर समावेशी विकास सुनिश्चित कर सकती है। अतः व्यापार को सतत एवं संतुलित रूप से विकसित करना आवश्यक है।

7. Smith Model of Industrial Location (स्मिथ का औद्योगिक अवस्थिति मॉडल)

Smith Model of Industrial Location

(स्मिथ का औद्योगिक अवस्थिति मॉडल)

परिचय:

    औद्योगिक अवस्थिति (Industrial Location) का अध्ययन आर्थिक भूगोल का महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें यह समझा जाता है कि उद्योग किसी विशेष स्थान पर क्यों स्थापित होते हैं। विभिन्न विद्वानों ने इस विषय पर अनेक सिद्धांत दिए, जिनमें David M. Smith का मॉडल विशेष महत्व रखता है।

    डी. एम. स्मिथ ने 1971 में प्रकाशित अपनी पुस्तक “Industrial Location” में औद्योगिक अवस्थिति का एक सरल एवं व्यवहारिक मॉडल प्रस्तुत किया, जो ब्राजील में इस्पात उद्योग के उनके अध्ययन पर आधारित था। Smith का दृष्टिकोण लाभ अधिकतम (Profit Maximization) के बजाय लागत न्यूनकरण (Cost Minimization) और व्यवहारिक (Behavioral) कारकों पर आधारित है।

Smith Model का अर्थ:

    Smith Model औद्योगिक अवस्थिति का एक व्यवहारिक (Behavioral) मॉडल है, जिसमें यह माना गया है कि उद्योग हमेशा अधिकतम लाभ प्राप्त करने के बजाय न्यूनतम लागत एवं संतोषजनक लाभ (Satisficing Profit) के आधार पर स्थान का चयन करते हैं।

✍️ यह मॉडल वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखता है, जहाँ निर्णय पूर्णतः तर्कसंगत (Perfectly Rational) नहीं होते।

मान्यताएँ (Smith Model Assumptions):

    स्मिथ ने अपने सिद्धांत के काम करने के लिए निम्नलिखित कुछ शर्तों को मान लिया, जो इस प्रकार हैं।

  • उत्पादकों को लागत एवं राजस्व की स्थानिक भिन्नताओं का पूर्ण नहीं, बल्कि अपूर्ण ज्ञान होता है।
  • भूमि, श्रम और पूंजी जैसे उत्पादन कारकों के स्रोत भौगोलिक रूप से स्थिर होते हैं तथा असमान रूप से वितरित रहते हैं।
  • उत्पादन कारकों की आपूर्ति पर्याप्त (लगभग असीमित) मानी जाती है।
  • उत्पादक तर्कसंगत (Rational) व्यवहार करते हैं, लेकिन पूर्णतः आदर्श नहीं होते।
  • वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग समय के साथ स्थिर रहती है, परंतु स्थान के अनुसार भिन्न होती है।
  • उत्पादक ऐसे स्थान का चयन करते हैं जो उन्हें संतोषजनक (Satisficing) लाभ प्रदान करे।
  • औद्योगिक समूह (Industrial Clusters) हमेशा सभी उत्पादकों के लिए उपयुक्त नहीं होते, फिर भी कुछ उत्पादक अधिक लाभ के लिए वहाँ स्थापित हो सकते हैं।

स्मिथ के औद्योगिक स्थान सिद्धांत की कार्यप्रणाली:

      स्मिथ ने प्रारंभ में वेबर की तरह न्यूनतम लागत वाले स्थान की खोज के लिए आइसोडेपेन्स का उपयोग किया, लेकिन इसे अव्यावहारिक मानते हुए उन्होंने वास्तविक दुनिया के तत्व—जैसे अपूर्ण ज्ञान और “संतोषजनक लाभ” (Satisficing) को शामिल किया। उन्होंने लागत कंटूर एवं राजस्व कंटूर (आइसोप्लेथ्स) के माध्यम से विभिन्न स्थानों पर लागत व राजस्व के परिवर्तन को दर्शाया, इसलिए इसे क्षेत्र-लागत वक्र सिद्धांत भी कहा जाता है।

1. स्थिर लागत – परिवर्तनीय राजस्व

     इस स्थिति में लागत सभी स्थानों पर समान रहती है, जबकि राजस्व स्थान के अनुसार बदलता है। मांग सामान्यतः शहरी क्षेत्रों में अधिक और ग्रामीण क्षेत्रों में कम होती है। इसलिए उद्योग ऐसे स्थान का चयन करता है जहाँ राजस्व लागत से अधिक हो। जहाँ लागत और राजस्व बराबर हो जाते हैं, उनके बीच का क्षेत्र लाभप्रदता का स्थानिक मार्जिन कहलाता है।

Smith Model of Industrial Location

2. परिवर्तनीय लागत – स्थिर राजस्व

     इसमें राजस्व स्थिर रहता है, जबकि लागत स्थान के अनुसार बदलती है। कच्चे माल के स्रोत के निकट लागत कम होती है (जैसे लोहा-इस्पात उद्योग)। इसलिए उद्योग लागत को न्यूनतम करने हेतु स्रोत के पास स्थापित होता है, क्योंकि लाभ बढ़ाने का एकमात्र तरीका लागत घटाना होता है।

3. परिवर्तनीय लागत – परिवर्तनीय राजस्व

    यह वास्तविक स्थिति है, जहाँ लागत और राजस्व दोनों स्थान के अनुसार बदलते हैं। उद्योग ऐसे स्थान का चयन करता है जहाँ राजस्व लागत से अधिक हो और लाभ अधिकतम (या संतोषजनक) हो। प्रतिस्पर्धा, परिवहन लागत और बाजार की दूरी इस चयन को प्रभावित करते हैं, जिससे एक निश्चित भौगोलिक सीमा के भीतर ही उद्योग टिके रहते हैं।

Smith Model की प्रमुख विशेषताएँ:

  • यह मॉडल व्यवहारिक (Behavioral) दृष्टिकोण पर आधारित है।
  • उद्योग अधिकतम लाभ के बजाय संतोषजनक लाभ (Satisficing Profit) को प्राथमिकता देते हैं।
  • निर्णय सीमित जानकारी और अनिश्चितता की स्थिति में लिए जाते हैं।
  • लागत न्यूनकरण (Cost Minimization) पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  • मानवीय व्यवहार एवं वास्तविक परिस्थितियों को शामिल किया जाता है।

मॉडल के मुख्य घटक:

(i) लागत (Cost Factors):

     इस मॉडल में उद्योग उस स्थान का चयन करता है जहाँ कुल लागत न्यूनतम हो। इसमें परिवहन लागत, श्रम लागत, भूमि एवं किराया, ऊर्जा तथा कच्चे माल की उपलब्धता जैसे कारक शामिल होते हैं, जो उत्पादन की कुल लागत को प्रभावित करते हैं।

(ii) राजस्व (Revenue):

    उद्योग के लिए बाजार की निकटता, उत्पाद की मांग और मूल्य निर्धारण महत्वपूर्ण होते हैं। जहाँ मांग अधिक और बाजार सुलभ होता है, वहाँ उद्योग को अधिक आय प्राप्त होने की संभावना रहती है।

(iii) लाभ (Profit):

     लाभ = राजस्व – लागत के आधार पर निर्धारित होता है, परंतु Smith Model में उद्योग अधिकतम लाभ के बजाय “संतोषजनक लाभ” (Satisficing Profit) को प्राथमिकता देते हैं, जो व्यवहारिक निर्णय को दर्शाता है।

औद्योगिक अवस्थिति के निर्धारक:
  • कच्चे माल की उपलब्धता उद्योग के स्थान चयन को प्रभावित करती है।
  • बाजार की निकटता उत्पाद की मांग और बिक्री को सुनिश्चित करती है।
  • परिवहन सुविधा लागत को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • श्रम की उपलब्धता और लागत उद्योग के लिए आवश्यक होती है।
  • ऊर्जा एवं बिजली की आपूर्ति उत्पादन के लिए अनिवार्य है।
  • भूमि की लागत और उपलब्धता स्थान चयन को प्रभावित करती है।
  • सरकारी नीतियाँ एवं प्रोत्साहन उद्योगों को आकर्षित करते हैं।

Smith Model के लाभ:

  • यह मॉडल वास्तविक परिस्थितियों और मानवीय व्यवहार को ध्यान में रखता है।
  • निर्णय प्रक्रिया में अनिश्चितता और सीमित जानकारी को शामिल करता है।
  • “संतोषजनक लाभ” (Satisficing) की अवधारणा से व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
  • आधुनिक औद्योगिक निर्णयों और बाजार स्थितियों के अधिक अनुकूल है।
  • केवल लागत ही नहीं, बल्कि अन्य व्यवहारिक कारकों को भी महत्व देता है।

Smith Model की सीमाएँ:

  • यह मॉडल स्पष्ट गणितीय आधार प्रदान नहीं करता, जिससे सटीक विश्लेषण कठिन होता है।
  • सभी प्रकार के उद्योगों पर समान रूप से लागू नहीं होता।
  • “संतोषजनक लाभ” (Satisficing) की अवधारणा अस्पष्ट और व्यक्तिपरक होती है।
  • निर्णय प्रक्रिया जटिल होती है और कई कारकों पर निर्भर करती है।
  • डेटा एवं जानकारी की उपलब्धता सीमित होने पर मॉडल की उपयोगिता घट जाती है।

आधुनिक संदर्भ में महत्व:

     वर्तमान वैश्वीकरण और प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के दौर में Smith Model का महत्व काफी बढ़ गया है। यह मॉडल बताता है कि उद्योग केवल अधिकतम लाभ पर नहीं, बल्कि व्यवहारिक परिस्थितियों, जोखिम और सीमित जानकारी के आधार पर निर्णय लेते हैं।

    आज बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ स्थान चयन में लागत के साथ-साथ बाजार, श्रम कौशल, जीवन गुणवत्ता और नीतिगत वातावरण को भी ध्यान में रखती हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था और ई-कॉमर्स के बढ़ते प्रभाव में भी लचीलापन और त्वरित निर्णय महत्वपूर्ण हो गए हैं। ऐसे में Smith Model का “संतोषजनक लाभ” दृष्टिकोण आधुनिक औद्योगिक नियोजन को समझने में अत्यंत उपयोगी और प्रासंगिक सिद्ध होता है।

निष्कर्ष:

    Smith Model औद्योगिक अवस्थिति के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण व्यवहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह मॉडल यह स्पष्ट करता है कि वास्तविक जीवन में उद्योग पूर्ण तर्कसंगत निर्णय नहीं लेते, बल्कि सीमित जानकारी और जोखिम को ध्यान में रखते हुए संतोषजनक विकल्प चुनते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ विविधता और अनिश्चितता अधिक है, यह मॉडल औद्योगिक नियोजन को समझने में अत्यंत उपयोगी है।

नोट:

Important Points

✍️ औद्योगिक अवस्थिति सिद्धांतों में ‘लाभप्रदता के स्थानिक उपांत’ (Spatial Margin of Profitability) की अवधारणा David M. Smith द्वारा प्रस्तुत की गई थी।

✍️ डी. एम. स्मिथ ने 1971 में प्रकाशित अपनी पुस्तक “Industrial Location” में औद्योगिक अवस्थिति का एक सरल एवं व्यवहारिक मॉडल प्रस्तुत किया, जो ब्राज़ील में इस्पात उद्योग के उनके अध्ययन पर आधारित था।

✍️ यह सिद्धांत बताता है कि एक निश्चित भौगोलिक सीमा (उपांत) के भीतर स्थित उद्योगों को लाभ प्राप्त होता है, जबकि इस सीमा के बाहर स्थित उद्योगों को हानि होती है। इसलिए इसे “स्थानिक उपांत सिद्धांत” कहा जाता है।

✍️ साथ ही, लागत और राजस्व के स्थानिक परिवर्तन को दर्शाने के कारण इसे “क्षेत्र-लागत वक्र सिद्धांत” (Area Cost Curve Theory) के नाम से भी जाना जाता है।

✍️ निष्कर्षतः, ‘लाभप्रदता के स्थानिक उपांत’ की अवधारणा डी. एम. स्मिथ द्वारा प्रतिपादित की गई थी।

3. Conventional Energy Resources: Coal – Distribution, Production, and Conservation / पारंपरिक ऊर्जा संसाधन: कोयला – वितरण, उत्पादन एवं संरक्षण

Conventional Energy Resources: Coal – Distribution, Production, and Conservation

पारंपरिक ऊर्जा संसाधन: कोयला – वितरण, उत्पादन एवं संरक्षण

Conventional Energy Resources

परिचय:     

    ऊर्जा संसाधन किसी भी देश के आर्थिक विकास की रीढ़ होते हैं। पारंपरिक ऊर्जा संसाधनों (Conventional Energy Resources) में कोयला (Coal) सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भारत सहित विश्व के कई देशों में बिजली उत्पादन, उद्योग एवं परिवहन में कोयले का व्यापक उपयोग होता है। कोयला एक जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) है, जो लाखों वर्षों पूर्व वनस्पतियों के अवशेषों के दबाव एवं ताप के कारण बना है। हालांकि, यह एक सीमित (Non-renewable) संसाधन है, इसलिए इसके संरक्षण और कुशल उपयोग की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

कोयले के प्रकार

(i) एंथ्रासाइट (Anthracite): उच्च गुणवत्ता, अधिक कार्बन

(ii) बिटुमिनस (Bituminous): औद्योगिक उपयोग के लिए प्रमुख

(iii) लिग्नाइट (Lignite): निम्न गुणवत्ता, अधिक नमी

(iv) पीट (Peat): प्रारंभिक अवस्था

विश्व में कोयले का वितरण (Distribution of Coal in World):

    विश्व में कोयले का वितरण असमान है और यह मुख्यतः प्राचीन भूवैज्ञानिक संरचनाओं, विशेषकर गोंडवाना एवं टर्शियरी कालीन चट्टानों से संबंधित है। एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में कोयले के प्रमुख भंडार पाए जाते हैं। चीन विश्व का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक और उपभोक्ता है, जबकि अमेरिका में विशाल भंडार विशेषकर एपलाचियन क्षेत्र में स्थित हैं।

    रूस के साइबेरिया क्षेत्र में भी बड़े कोयला भंडार हैं। ऑस्ट्रेलिया प्रमुख निर्यातक देश है, जो उच्च गुणवत्ता वाले कोयले के लिए जाना जाता है। भारत, दक्षिण अफ्रीका और जर्मनी भी प्रमुख कोयला उत्पादक देशों में शामिल हैं।

    इस प्रकार, कोयले का वितरण औद्योगिक विकास एवं ऊर्जा उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

भारत में कोयले का वितरण

     भारत में कोयले के भंडार मुख्यतः दो श्रेणियों में पाए जाते हैं-

1. गोंडवाना कोयला (Gondwana Coal):

    गोंडवाना कोयला भारत में पाया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक कोयला प्रकार है, जो लगभग 250 मिलियन वर्ष पूर्व गोंडवाना काल में बना था। यह भारत के कुल कोयला भंडार का लगभग 98% हिस्सा बनाता है और मुख्यतः कठोर, उच्च गुणवत्ता वाला बिटुमिनस कोयला होता है, जो उद्योगों एवं तापीय विद्युत उत्पादन के लिए उपयुक्त है।

   इसका वितरण मुख्य रूप से दामोदर, महानदी, सोन एवं गोदावरी नदी घाटियों में पाया जाता है। प्रमुख क्षेत्र हैं- झारखंड (झरिया, बोकारो), पश्चिम बंगाल (रानीगंज), छत्तीसगढ़ (कोरबा), ओडिशा (तालचेर) और मध्य प्रदेश।

    गोंडवाना कोयला भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, हालांकि इसके खनन से पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं, जिनका समाधान आवश्यक है।

2. टर्शियरी कोयला (Tertiary Coal):

    टर्शियरी कोयला अपेक्षाकृत नवीन भूवैज्ञानिक काल, अर्थात टर्शियरी युग (लगभग 15-60 मिलियन वर्ष पूर्व) में बना है। यह मुख्यतः निम्न गुणवत्ता का होता है, जिसमें कार्बन की मात्रा कम तथा नमी और अशुद्धियाँ अधिक होती हैं। इस कारण इसकी ऊष्मा उत्पादन क्षमता गोंडवाना कोयले की तुलना में कम होती है।

   भारत में टर्शियरी कोयला मुख्यतः पूर्वोत्तर राज्यों में पाया जाता है, जैसे- असम, मेघालय, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश। इसके अतिरिक्त कुछ भंडार जम्मू-कश्मीर में भी मिलते हैं।

    यह कोयला प्रायः स्थानीय उपयोग के लिए प्रयोग किया जाता है, जैसे घरेलू ईंधन एवं छोटे उद्योगों में। हालांकि इसकी गुणवत्ता कम होने के कारण बड़े औद्योगिक उपयोग में इसकी सीमित भूमिका होती है, फिर भी यह क्षेत्रीय ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

कोयला उत्पादन (Coal Production):

   भारत विश्व के प्रमुख कोयला उत्पादक देशों में शामिल है और चीन के बाद दूसरे स्थान पर आता है। हाल के वर्षों में भारत का कोयला उत्पादन निरंतर बढ़ा है, जो ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।

   वर्ष 2022-23 में भारत का कुल कोयला उत्पादन लगभग 893 मिलियन टन (MT) रहा, जबकि 2023-24 में यह बढ़कर लगभग 997 मिलियन टन तक पहुँच गया। सरकार का लक्ष्य 2025-26 तक उत्पादन को 1.5 बिलियन टन तक बढ़ाने का है।

    भारत में कोयला उत्पादन का अधिकांश हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी Coal India Limited द्वारा किया जाता है, जो कुल उत्पादन का लगभग 80% योगदान देती है। इसके अलावा SCCL (Singareni Collieries Company Limited) और निजी क्षेत्र की कंपनियाँ भी उत्पादन में भागीदारी करती हैं।

    प्रमुख उत्पादक राज्य हैं- झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल। इनमें छत्तीसगढ़ और ओडिशा अग्रणी हैं, जहाँ बड़े कोयला क्षेत्र जैसे कोरबा और तालचेर स्थित हैं।

    भारत में लगभग 85% कोयला ओपन-कास्ट (Open Cast Mining) विधि से निकाला जाता है, जो सस्ता और अधिक उत्पादन देने वाला है।

    कोयले का प्रमुख उपयोग तापीय विद्युत उत्पादन (लगभग 70%), इस्पात उद्योग और सीमेंट उद्योग में होता है।

    हालाँकि उत्पादन में वृद्धि से ऊर्जा उपलब्धता बढ़ती है, लेकिन इससे पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी उत्पन्न होती हैं, इसलिए संतुलित एवं सतत उत्पादन आवश्यक है।

कोयले का संरक्षण (Conservation of Coal):

    कोयला एक सीमित एवं अपुनर्नवीकरणीय संसाधन है, इसलिए इसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए ऊर्जा का कुशल उपयोग, उन्नत एवं स्वच्छ कोयला तकनीकों (Clean Coal Technology) का अपनाना और खनन में वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करना जरूरी है। कोयले के अपशिष्ट का पुनः उपयोग तथा ऊर्जा दक्षता बढ़ाने पर भी ध्यान देना चाहिए।

   इसके साथ ही सौर, पवन एवं जल ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण हेतु कार्बन उत्सर्जन को कम करना और भूमि पुनर्वास (Land Reclamation) जैसे उपाय भी महत्वपूर्ण हैं।

निष्कर्ष

    कोयला पारंपरिक ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जिसने औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, इसके सीमित भंडार और पर्यावरणीय प्रभावों को देखते हुए इसका विवेकपूर्ण उपयोग एवं संरक्षण आवश्यक है। भारत को ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के साथ-साथ वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर भी ध्यान देना होगा, ताकि संतुलित एवं सतत विकास सुनिश्चित किया जा सके।

23. International Trade (अंतर्राष्ट्रीय व्यापार)

 International Trade

(अंतर्राष्ट्रीय व्यापार)



International Trade

परिचय

    अंतर्राष्ट्रीय व्यापार उन आर्थिक गतिविधियों को संदर्भित करता है जिसके माध्यम से दो या अधिक देश वस्तुओं, सेवाओं, प्रौद्योगिकी, पूँजी, श्रम और ज्ञान का परस्पर आदान-प्रदान करते हैं। यह व्यापार वैश्विक आर्थिक तंत्र की रीढ़ है और विभिन्न देशों के बीच आर्थिक परस्पर निर्भरता को बढ़ाता है।

    आधुनिक युग में वैश्वीकरण (Globalization), उदारीकरण (Liberalization) और निजीकरण (Privatization) ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को नई गति दी है, जिसके कारण विश्व बाजारों का एकीकरण (Integration) तेजी से बढ़ा है।

परिभाषा

    विभिन्न विद्वानों के अनुसार-

एडम स्मिथ के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार ऐसे विनिमय को कहते हैं जिसमें देश अपने मध्य वस्तुओं और सेवाओं की खरीद-फरोख्त करते हैं।

रिचर्डो के अनुसार, यह व्यापार उन लाभों से प्रेरित होता है जो देश तुलनात्मक लाभ (Comparative Advantage) के कारण एक-दूसरे से प्राप्त करते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की विशेषताएँ

(i) सीमा पार लेन-देन:-

     इसमें राष्ट्रों की राजनीतिक सीमाओं को पार करते हुए आदान-प्रदान होता है।

(ii) भाषा और संस्कृति का अंतर:-

    लेन-देन में विभिन्न भाषाई, सांस्कृतिक और कानूनी व्यवस्थाओं का प्रभाव होता है।

(iii) मुद्रा विनिमय की आवश्यकता:-

     विदेशी मुद्राओं के विनिमय दर (Exchange Rate) व्यापार को प्रभावित करते हैं।

(iv) विभिन्न प्रशासनिक नियम:-

     आयात-निर्यात नीति, कस्टम शुल्क, कोटा, लाइसेंस आदि व्यापार को नियंत्रित करते हैं।

(v) विस्तृत परिवहन और संचार नेटवर्क:-

     समुद्री, वायुवाहित एवं भूमि परिवहन की आवश्यकता।

(vi) उच्च जोखिम और अनिश्चितता:-

     राजनीतिक संकट, युद्ध, आपूर्ति शृंखला टूटना, विदेशी मुद्रा संकट आदि का प्रभाव।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की आवश्यकता

(i) संसाधनों का असमान वितरण:-

     दुनिया में प्राकृतिक संसाधन समान रूप से वितरित नहीं हैं।

(ii) तकनीक और विशेषज्ञता का अंतर:-

      विकसित और विकासशील देशों में तकनीक की उपलब्धता अलग-अलग है।

(iii) उत्पादन लागत में भिन्नता:-

     कुछ देश कुछ वस्तुओं का उत्पादन सस्ता कर पाते हैं।

(iv) आर्थिक विकास को गति:-

     व्यापार से रोजगार, निवेश और आय बढ़ती है।

(v) प्रतिस्पर्धा और गुणवत्तावृद्धि:-

     अंतर्राष्ट्रीय बाजार प्रतिस्पर्धा द्वारा गुणवत्ता को बेहतर बनाते हैं।

(vi) उपभोक्ता को अधिक विकल्प:-

    वैश्विक वस्तुओं की उपलब्धता से विकल्प और सस्ते दाम प्राप्त होते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के रूप

(i) वस्तु व्यापार- देशों के बीच कच्चे माल, निर्मित वस्तुओं तथा उपभोक्ता वस्तुओं का आदान-प्रदान।

(ii) सेवा व्यापार- पर्यटन, परिवहन, संचार, बीमा, बैंकिंग व आईटी सेवाओं का लेन-देन।

(iii) पूँजी/निवेश प्रवाह- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) व पोर्टफोलियो निवेश का विनियोजन।

(iv) प्रौद्योगिकी हस्तांतरण- तकनीकी ज्ञान, पेटेंट, लाइसेंस व कौशल का अंतरदेशीय प्रवाह।

(v) ई-कॉमर्स आधारित व्यापार- डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय खरीद-फरोख्त।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लाभ

(i) विभिन्न देशों के बीच वस्तुओं व सेवाओं का आदान-प्रदान बढ़ता है।

(ii) उत्पादन का विशेषज्ञीकरण (Specialization) विकसित होता है।

(iii) देशों को सस्ती और बेहतर गुणवत्ता वाली वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं।

(iv) विदेशी मुद्रा अर्जित होती है, जिससे आर्थिक विकास तेज होता है।

(v) अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से उद्योगों की दक्षता बढ़ती है।

(vi) रोजगार के अवसर बढ़ते हैं और तकनीकी ज्ञान का आदान-प्रदान होता है।

(vii) देशों के बीच आर्थिक व राजनीतिक संबंध मजबूत होते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की बाधाएँ (Barriers to Trade)

(i) शुल्क (Tariffs):– आयातित वस्तुओं पर कर लगाना, जिससे विदेशी उत्पाद महंगे हो जाते हैं।

(ii) गैर-शुल्क बाधाएँ (Non-Tariff Barriers):- कोटा, लाइसेंस, मानक आदि जो व्यापार को सीमित करते हैं।

(iii) परिवहन एवं लॉजिस्टिक समस्याएँ:- ऊँची लागत और अविकसित अवसंरचना व्यापार धीमा करती है।

(iv) राजनीतिक व कूटनीतिक तनाव:- प्रतिबंध, प्रतिबन्धन और अस्थिर संबंध व्यापार में रुकावट पैदा करते हैं।

(v) मुद्रा उतार-चढ़ाव:- विनिमय दर में अस्थिरता व्यापार लागत बढ़ाती है।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के नियामक संस्थान

(International Trade Organizations)

(i) विश्व व्यापार संगठन (WTO)

⇒ वैश्विक व्यापार नियमों का निर्माण व निगरानी करता है।

⇒ शुल्क, सब्सिडी, व्यापार विवाद समाधान तथा मुक्त व्यापार को बढ़ावा देता है

(i) अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)

⇒ देशों के बीच वित्तीय स्थिरता, विनिमय दर नियंत्रण तथा भुगतान संतुलन सहायता प्रदान करता है।

⇒ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए आवश्यक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करता है।

(ii) विश्व बैंक समूह (World Bank Group)

⇒ विकासशील देशों को ऋण व तकनीकी सहायता प्रदान करता है।

⇒ बुनियादी ढाँचे और आर्थिक विकास को प्रोत्साहित कर व्यापार क्षमता बढ़ाता है।

(iii) संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD)

⇒ विकासशील देशों के व्यापार, निवेश और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देता है।

⇒ वैश्विक व्यापार नीतियों का विश्लेषण और सुझाव प्रदान करता है।

(iv) अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य मंडल (ICC)

⇒ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के मानक नियम, INCOTERMS तथा मध्यस्थता सेवाएँ प्रदान करता है।

⇒ व्यापार विवादों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    इन संस्थानों का मुख्य उद्देश्य वैश्विक व्यापार को सुचारु, संतुलित और न्यायसंगत बनाना है।

भारत में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

⇒ भारत का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मुख्यतः वस्त्र, दवा उद्योग, आईटी सेवाएँ, रत्न-जवाहरात, मशीनरी, कृषि उत्पाद तथा पेट्रोलियम उत्पादों पर आधारित है।

⇒ प्रमुख व्यापारिक साझेदार: अमेरिका, चीन, UAE, यूरोपीय संघ, सिंगापुर।

⇒ निर्यात-आधारित क्षेत्रों में IT/ITES, फार्मा, ऑटो पार्ट्स तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

⇒ आयात में कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, सोना और मशीनरी शामिल हैं।

⇒ सरकार व्यापार बढ़ाने हेतु FTA, ‘मेक इन इंडिया’, निर्यात प्रोत्साहन योजनाएँ और लॉजिस्टिक सुधार कर रही है।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की चुनौतियाँ

⇒ विभिन्न देशों के व्यापार नियम, शुल्क व गैर-शुल्क अवरोध।

⇒ मुद्रा विनिमय दरों में निरंतर उतार-चढ़ाव।

⇒ राजनीतिक अस्थिरता एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का प्रभाव।

⇒ लॉजिस्टिक समस्याएँ, परिवहन लागत व समय देरी।

⇒ सांस्कृतिक एवं भाषा भिन्नता से संचार बाधाएँ।

⇒ गुणवत्ता मानकों और प्रमाणन प्रक्रियाओं का पालन।

⇒ वैश्विक बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा।

⇒ प्राकृतिक आपदाएँ व वैश्विक संकट (जैसे महामारी) से आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित।

निष्कर्ष

    अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विश्व अर्थव्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है। यह न केवल देशों के आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करता है बल्कि वैश्विक सहयोग, शांति और तकनीकी आदान-प्रदान को भी बढ़ावा देता है।

    भविष्य में डिजिटल व्यापार, ई-कॉमर्स, सेवा क्षेत्र, एआई-आधारित प्रौद्योगिकी और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का विस्तार अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को नए आयाम प्रदान करेगा।

47. Factor Influencing Agricultural Pattern (कृषि पैटर्न को प्रभावित करने वाले कारक)

Factor Influencing Agricultural Pattern

(कृषि पैटर्न को प्रभावित करने वाले कारक)



      कृषि पैटर्न को प्रभावित करने वाले कारकों को मोटे तौर पर प्राकृतिक, आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी कारकों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

     प्राकृतिक कारकों में जलवायु, मिट्टी, स्थलाकृति और जल की उपलब्धता शामिल हैं। 

    आर्थिक कारकों में बाजार की मांग, कीमतें, श्रम की उपलब्धता और ऋण तक पहुंच शामिल हैं।

     सामाजिक कारकों में भूमि स्वामित्व, सांस्कृतिक प्रथाएं और जनसंख्या घनत्व शामिल हैं।

    तकनीकी कारकों में सिंचाई, उर्वरक, कीटनाशक और बेहतर बीज का चयन शामिल हैं। 

कृषि पैटर्न को प्रभावित करने वाले कारक:

1. प्राकृतिक कारक:

(i) जलवायु:

    तापमान, प्रकाश, वर्षा और आर्द्रता जैसे जलवायु कारक फसल के विकास और उसके उपज को बहुत हद तक प्रभावित करते हैं।

(ii) मिट्टी:

    मिट्टी की उर्वरता, बनावट और जल धारण करने की क्षमता फसल के प्रकार और उसके उपज को निर्धारित करती है।

(iii) स्थलाकृति:

    समतल भू-भाग, ऊँचाई और ढलान फसल के प्रकार और खेती के तरीकों को प्रभावित करते हैं।

(iv) जल की उपलब्धता:

   सिंचाई और वर्षा जल की उपलब्धता फसलों की सिंचाई और विकास के लिए आवश्यक है।

2. आर्थिक कारक:

(i) बाजार की माँग:

    फसलों की कीमतें और बाजार की मांग किसानों को यह तय करने में मदद करती है कि कौन सी फसलें उगाना है।

(ii) कीमतें:

    फसलों की कीमतें और इनपुट लागत (जैसे- उर्वरक, बीज, कीटनाशक) किसानों के मुनाफे को प्रभावित करती हैं जो कि फसल पैटर्न को प्रभावित करती हैं।

(iii) श्रम की उपलब्धता:

   श्रम की उपलब्धता और लागत कृषि कार्यों को प्रभावित करती है, जैसे कि बुवाई, निराई, कटाई इत्यादि।

(iv) ऋण तक पहुंच:

   किसानों को फसल उगाने के लिए काफी पूँजी की आवश्यकता होती है, और ऋण तक पहुंच उनके फसल पैटर्न को प्रभावित कर सकती है।

3. सामाजिक कारक:

(i) भूमि स्वामित्व:

     भूमि का स्वामित्व और आकार किसानों के फसल पैटर्न को प्रभावित करता है।

(ii) सांस्कृतिक प्रथाएं:

    कुछ क्षेत्रों में, विशिष्ट फसलें उगाने की सांस्कृतिक प्रथाएं होती हैं।

(iii) जनसंख्या घनत्व:

   अधिक जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्रों में, गहन कृषि और अधिक फसल चक्रण की प्रवृत्ति होती है।

4. तकनीकी कारक:

(i) सिंचाई:

     सिंचाई की उपलब्धता फसलों के प्रकार और उपज को प्रभावित करती है।

(ii) उर्वरक और कीटनाशक:

    उर्वरक और कीटनाशकों का उचित मात्रा में उपयोग फसलों की उपज को बढ़ाने में मदद करता है, लेकिन उनका अत्यधिक उपयोग मिट्टी और पर्यावरण को नुकसान भी पहुंचा सकता है।

(iii) बेहतर बीज का चयन:    उच्च उपज और बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों के चयन का उपयोग फसलों की उपज को बढ़ाने में मदद करता है।

अन्य कारक:

⇒ सरकारी नीतियाँ:

    सरकार की नीतियाँ, जैसे कि कृषि सब्सिडी और न्यूनतम मूल्य समर्थन, किसानों के फसल पैटर्न को काफी प्रभावित कर सकती हैं।

⇒ परिवहन और संचार:

     परिवहन और संचार सुविधाओं की उपलब्धता फसलों के परिवहन और बाजार तक पहुंचने में काफी मदद करती है।

⇒ शिक्षा और प्रौद्योगिकी:

     शिक्षा और प्रौद्योगिकी का स्तर किसानों को बेहतर कृषि पद्धतियों और फसल पैटर्न को अपनाने में काफी मदद करता है। 

27. Atomic Power (परमाणु शक्ति)

Atomic Power

(परमाणु शक्ति)



      परमाणु शक्ति वह शक्ति है जिसे नियंत्रित (गैर-विस्फोटक) नाभिकीय अभिक्रिया से उत्पन्न किया जाता है।   

   इस शक्ति का उपयोग विनाशकारी एवं निर्माणकारी दोनों ही है। इसका अधिक उपयोग सामरिक महत्व की शक्ति के रूप में किया जा रहा है। केवल इससे निःसृत रेडियोधर्मी समस्थानिकों (Radioactive isotopes) का उपयोग विज्ञान के क्षेत्र में किया जा रहा है। भारत भी इस ऊर्जा का उपयोग निर्माणकारी कार्यों में करने के लिए दृढ़ संकल्पित है।

   इसका उपयोग कम कोयला एवं खनिज तेल उत्पादक देशों तथा अन्य ऊर्जा के अभाव वाले देशों में किया जा सकता है।

परमाणु ऊर्जा के स्रोत:-

    इस शक्ति के प्रमुख स्त्रोत यूरेनियम तथा थोरियम खनिज हैं। बेरीलियम, लीथियम तथा जिरकोनियम खनिजों का भी उपयोग होता है। अच्छी यूरेनियम, पिचब्लैंड तथा कानोंटाइट अयस्कों से प्राप्त होती है। यूरेनियम की यूरेनिनाइट ऑक्साइड पिचब्लैंड से प्राप्त होती है और यह परमाणु ऊर्जा उत्पादन में सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। विश्व के ज्ञात यूरेनियम क्षेत्रों का 70% उत्तरी अमेरिका तथा अफ्रीका महाद्वीपों में उपलब्ध है।

अणु शक्ति का विकास:-

    अणु शक्ति का ज्ञान वर्ष 1930 के लगभग हो गया। इस शक्ति का विनशकारी उपयोग द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के हिरोशिमा नगर पर हुआ। इसके विकास में रेडियो सहधर्मी कणों से सुरक्षा, विखण्डित पदार्थों का निस्तारण तथा अधिक लागत प्रमुख समस्याएँ हैं जिनका समाधान आवश्यक है।

     विश्व के राष्ट्र अणुशक्ति के विकास की होड़ में संलग्न हैं। यूरेनियम एवं थोरियम की कुल उपलब्ध मात्रा 1700 × 10 लाख अरब ब्रिटिश ताप मापक इकाई मानी जाती है।

अणु शक्ति के उत्पादक देश:-

     परमाणु शक्ति का विश्व में वितरण विभिन्न देशों के बीच असमान है। कुछ देशों के पास परमाणु ऊर्जा के उत्पादन और उपयोग के लिए अधिक संसाधन हैं, जबकि अन्य देशों के पास परमाणु शक्ति का उपयोग करने की क्षमता काफी सीमित है

    इस शक्ति के मुख्य उत्पादक देश स्वतंत्र देशों के राष्ट्रमंडल, संयुक्त राज्य अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, चीन तथा भारत हैं। कनाडा, इटली, जापान, स्वीडन, चेक गणराज्य, जर्मनी तथा ऑस्ट्रेलिया में भी परमाण्विक शक्ति गृह हैं। इस समय विभिन्न देशों में एक सौ से अधिक अभिक्रियक क्रियाशील हैं।

स्वतंत्र देशों का राष्ट्रमंडल:-

     सर्वप्रथम सन् 1954 में पाँच हजार किलोग्राम की क्षमता का परमाणु शक्ति गृह बनाया गया। इस समय कई परमाणु शक्ति गृह कार्यरत हैं। जिनमें कुछ की क्षमता एक लाख किलोवाट तक है।

   मुख्य केन्द्र नीवो-वोरेनश, बेलीयार्क्सकोया, लेनिनग्राड, कोला तथा बिलविना हैं। मानग्रीश्लाक प्रायद्वीप पर 3.5 लाख किलोवाट का अभिक्रियक है, जो विश्व में सबसे बड़ा केन्द्र है।

नोट: स्वतंत्र राष्ट्रों का राष्ट्रमंडल (CIS) सोवियत संघ के विघटन के बाद 1991 में स्थापित एक अंतर-सरकारी संगठन है। इसमें 12 देश शामिल हैं: रूस, बेलारूस, यूक्रेन, आर्मेनिया, अजरबैजान, जॉर्जिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, मोल्दोवा, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान।

संयुक्त राज्य अमेरिका-

    वर्ष 1958 में पिट्सबर्ग, नेपिंगनेटा, शिपिंगपोर्ट में आण्विक शक्ति गृह स्थापित हुआ। इसके बाद अणुशक्ति प्रायद्वीप द्वारा कई केन्द्र स्थापित किये गये, जिनमें प्रमुख ओहियो, टेनेसी तथा कोलम्बियो नदी घाटियों में हैं। बर्कले तथा लिवरमोर (कैलिफोर्निया), हैसफोड (वाशिंगटन), लासवेगास (नेवादा), सेनेक्टैडी बुकहेवे (न्यूयार्क), आर्को (इडाहो), लास आलामास (न्यूमेक्सिको) तथा सवाना (जार्जिया) प्रमुख केन्द्र हैं। वर्तमान में यहाँ 7,167.7 अरब यूनिट परमाणु ऊर्जा उत्पादित होती हैं।

ग्रेट ब्रिटेन-

    वर्ष 1957 में कैल्डरहाल विश्व का द्वीतीय आण्विक संयन्त्र स्थापित किया गया, जिसकी उत्पादन क्षमता 65 हजार किलोवाट है। अल्प केन्द्र हटर्सटन, ट्राब्सफिनिड, केले, विण्डस्केल, चैकेलकास, विनफ्रिथ, ओल्डबरी, हिंकले, प्वाइण्ट, साइजवेल तथा डाउनेर हैं। अगले वर्ष तक आवश्यक विद्युत शक्ति का 40% परमाणु शक्ति के उत्पादन का लक्ष्य है।

फ्रांस-

    पश्चिम यूरोप के छः देशों जर्मनी, फ्रांस, इटली, बेल्जियम, नीदरलैण्डस तथा लक्सेम्बर्ग ने यूरेटम (Euratom-European Atomic Energy Community) का गठन किया है जो अणु शक्ति के विकास में प्रयत्नशील है। फ्रांस में मारकूले के निकट 40 मेगावाट क्षमता की अणु भट्टी स्थापित की गयी है।

   अन्य शक्ति केन्द्र तैयार हो रहे हैं। इस देश में सम्पूर्ण विद्युत शक्ति परमाणु शक्ति करने का लक्ष्य है। इस देश के समक्ष शक्ति की गम्भीर समस्या है, क्योंकि 40% शक्ति की आपूर्ति आयातित कोयला एवं खनिज तेल से करनी पड़ रही है।

   यूरोप महाद्वीप के देश इटली में भी वर्ष 1965 से परमाणु शक्ति का उत्पादन हो रहा है। इस समय पाँच कम्पनियाँ अणु गृहों पर कार्य कर रहीं हैं। स्वीडन में अणु शक्ति का विकास जारी है।

चीन-

    इस देश में अणु तथा हाइड्रोजन बमों के कई सफल विस्फोट किये गये है। यहाँ अणु शक्ति का प्रयोग सैनिक कार्यों में किया जा रहा है। अनुमान है कि विश्व परमाणु शक्ति का पाँचवा शक्तिशाली देश चीन है।

भारत-

    विश्व के ऊपर वर्णित पाँच देशों के पश्चात इसका स्थान विश्व में छठवाँ है। अणु शक्ति के उत्पादन का श्रीगणेश वर्ष 1969 में हुआ। प्रथम परमाणु भट्टी तारापुर (महाराष्ट्र) में स्थापित हुई जिसकी क्षमता 420 मेगावाट है। दूसरी इकाई राणा प्रताप सागर (राजस्थान) के रावतभाटा स्थान पर है, जहाँ 220 मेगावाट की दो इकाइयाँ कार्यरत हैं। इनकी कुल क्षमता 440 मेगावाट है। तीसरा केन्द्र कलपक्कम (तमिलनाडु) में है। इसकी क्षमता 470 मेगावट होगी। इसमें केवल भारतीय इंजीनियर तथा वैज्ञानिक कार्यरत हैं। उन तीनों भट्टियों में स्वस्थानिकों का उत्पादन हो रहा है जिनका निर्यात ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, चेक गणराज्य, हांगकांग तथा फिलिपीन्स को हो रहा है।

    नरोरा (उ.प्र). में भी एक अणु शक्ति गृह चालू है। इसकी क्षमता 440 मेगावाट है। इस समय सभी चौदह केन्द्रों की क्षमता 2,720 मेगावट है। 2016 तक भारत में आठ परमाणु ऊर्जा केन्द्रों पर 22 रियक्टर कार्यरत है। जिसकी क्षमता 6780 मेगावाट है। 6 अन्य परमाणु रियक्टर के बन जाने से 4300 मेगावाट क्षमता और बढ़ गयी है।

जापान-

    इस देश में वर्ष 1957 में अभिक्रिया की स्थापना हुई। इबाराकी प्रीफ्रेक्चर में टोकियो से 112 किमीo दूर टोकाई स्थान पर अणु भट्टी की स्थापना संयुक्त राज्य अमेरिका के सहयोग से हुई। सुरूगा में भी एक अणु भट्टी है। इस समय परमाणु शक्ति का उत्पादन 5 लाख किलोवाट है। चार संयंत्र लग रहे हैं। इनका उत्पादन लक्ष्य 780 लाख किलोवाट है। देश की आधी आवश्यकता परमाणु शक्ति से पूरी होने लगी है।

Atomic Power

28. Non-Conventional Sources of Energy (ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोत)

Non-Conventional Sources of Energy

(ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोत)



    Non-Conventional Sources of Energy

     ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्त्रोत वे हैं जो प्राकृतिक रूप से नवीकरणीय होते हैं तथा जिनका उपयोग ऊर्जा के स्रोत के रूप में किया जा सकता है। जैसे- सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलविद्युत ऊर्जा, बायोमास, भू-तापीय ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, लहर ऊर्जा आदि। 

    ये स्रोत पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं और पारंपरिक स्रोतों की तुलना में बहुत कम प्रदूषण करते हैं।

   आज विकासशील देशों में बढ़ते हुए औद्योगिकरण के कारण जीवाश्म ईंधन संसाधन जैसे कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस और परमाणु ऊर्जा एक सीमित संसाधन के रूप में रह गये हैं।

     ब्रून्श ने तो कोयला और खनिज तेल को लुटेरा संसाधन बताया है। वह दिन दूर नहीं है जब विश्व में इन संसाधनों के संचित भण्डार समाप्त हो जायेंगे। इसी डर के कारण आज विश्व के देश ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोतों पर निर्भर रहने लगे हैं।

    ऊर्जा के इन स्त्रोंतों का प्रयोग होने से न केवल जीवाश्म ईंधन की बचत होगी वरन् बहुत कुछ विदेशी मुद्रा भी बचेगी।

(i) सौर ऊर्जा (Solar Energy):-

       यद्यपि सौर ऊर्जा विश्व के सभी देशों में उपलब्ध है परन्तु सौर ऊर्जा की सर्वाधिक सम्भावता उष्ण कटिबंधीय देशों में है जहाँ सूर्य की किरणें सालोंभर अधिक तेज पड़ती हैं। विषुवत रेखा से उत्तर और दक्षिण बढ़ने के बाद सूर्यातप कम होने लगता है।

     सबसे अधिक सूर्याताप की सम्भावना मरूस्थलीय क्षेत्रों में होती है। सूर्य की किरणों से ऊर्जा तब प्राप्त होती है जब सीधी किरणें फोटो-वोल्टिक सैल (Photo-Voltaic-Cells) से टकराती हैं फिर उससे ऊर्जा उत्पन्न होती है। इस विधि द्वारा ऊर्जा दो प्रकार से उत्पन्न की जाती है-

(i) फोटोवोल्टिक ऊर्जा इस विधि द्वारा ऊर्जा सूर्य की किरणों से (Semi-conductor device) द्वारा उत्पन्न होती है। लेकिन इस विधि द्वारा उत्पन्न ऊर्जा काफी महँगी पड़ती है। आज अनेक शोधों द्वारा फोटो वोल्टिक विधि से ऊर्जा बनाने की विधि को सस्ता किया गया है।

   इस विधि से सौर की किरणों को बड़े-बड़े आतिशी शीशों, लेंसों अथवा रिफ्लेक्टरों की सहायता से बड़ी मात्रा में एकत्र किया जाता है।

(ii) दूसरी विधि से सौर ऊर्जा से सीधे विद्युत बनाई जाती है। इसके लिये विभिन्न प्रकार के सिलिकॉन सैलों का प्रयोग किया जाता है।

    ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोतों में विश्व ऊर्जा का 0.5% सौर ऊर्जा से प्राप्त होता है। सौर ऊर्जा के उत्पादन की सम्भावनाएँ भारत और चीन में पर्याप्त हैं। यहाँ सौर ऊर्जा से पानी गर्म करने, सौर कुकर बनाने तथा फसल पकाने आदि की तकनीकी विकसित की जा चुकी है।

भारत-

     यहाँ सौर ऊर्जा के विकास की पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं। ऊर्जा मंत्रालय ने 25 से 100 kW की तीन प्रकार की सौर फोटो-वोल्टिक ऊर्जा परियोजनाएँ स्थापित की हैं-

(i) सार्वजनिक भवनों की छत पर प्रणाली लगाना ताकि प्रमुख शहरी क्षेत्रों में पीक लोडिंग सेविंग हो सके।

(ii) सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रिड के अन्तिम भाग के लिये ही एण्ड स्पोर्ट प्रणाली की व्यवस्था।

(iii) दूर दराज क्षेत्रों में डीजल की बचत करने वाला लगाना।

    भारत में राजस्थान के जोधपुर जिले में 140 MW की एक समन्वित सौर शक्ति संयुक्त चक्र बिजली सहित 35 MW की ताप ऊर्जा प्रणाली की स्थापना का प्रस्ताव भी है। भारतवर्ष में 10 ग्रिड इंसेंटिव एस. पी. वी. परियोजनाएँ लगाई जा रही हैं जिनकी कुल क्षमता 925 kW है।

चीन-

    यहाँ सौर ऊर्जा से लगभग 20,000 Heat Collectors तैयार किये जाते हैं।

  सौर ऊर्जा की ओर विश्व के अन्य देश जैसे श्रीलंका, इण्डोनेशिया, यू. एस. ए. प्रयत्नशील हैं। यू एस. ए. में तो कैलीफोर्निया में 600 MW का एक संयंत्र स्थापित किया गया।

   वैज्ञानिकों की योजना है कि सूर्यातप को इस्पात नलिकाओं में एकत्रित करके आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सके। इसके लिये नलिकाओं में नाइट्रोजन प्रवाह करना होगा, जो इस ताप को गलित लवणों के टैंकों में परिवहित कर देंगी। यह टैंक बहुत दिनों तक ताप को बनाये रखते हैं, आवश्यकता पड़ने पर इसे टरबाइन जेनरेटर और परम्परागत बायलर में विद्युत उत्पादन के लिये प्रयोग किया जा सकेगा।

   आज अन्तरिक्ष उपग्रहों का भी सहयोग इसके लिये लिया जा रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलीफोर्निया और फ्लोरिडा में वाणिज्यिक स्तर पर सौर हीटरों का प्रचलन है। सौर कुकर, हीटर, ड्रायर, सिलिकन आदि सौर तापीय उपकरण विकसित किये गये हैं।

    विश्व की विषालतम सौर भट्टी लॉस एंजिलिस से 140 मील उत्तर-पूर्व की ओर है। यह मोजाब मरूस्थल में लूज में स्थापित है। इससे 10 विशाल सौर विद्युत उत्पादक संयंत्र संचालित होते हैं।

(ii) पवन ऊर्जा (Wind Energy):-

    पवन ऊर्जा, जिसे विंड एनर्जी भी कहते हैं। इसमें हवा की गतिज ऊर्जा का उपयोग करके बिजली का उत्पादन किया जाता है।

    पवन चक्कियों का प्रयोग ऊर्जा के रूप में बहुत समय से किया जा रहा है। ईरान में अन्न पीसने के लिये पहले पवन चक्कियों का प्रयोग होता है। इंग्लैण्ड में हल के निकट सन् 1186 में पवन चक्कियाँ स्थापित की गई थीं। आज हालैण्ड में पवन चक्कियों का प्रयोग ऊर्जा उत्पादन में होता है। इंग्लैण्ड की सबसे पुरानी पवन चक्की सन् 1670 की आज भी स्थित है।

     इस विधि द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करने में पवन द्वारा गतिज (Kinetic) ऊर्जा का प्रयोग टरबाइन के माध्यम से विद्युत उत्पादन में होता है।

    पवन द्वारा ऊर्जा उत्पादन सबसे अधिक जर्मनी में होता है। यहाँ सन् 2000 तक 9.369 पवन टरबाइन लगे हुए थे जिनसे 6,094.8 MW विद्युत उत्पादन होता है।

    संयुक्त राज्य अमेरिका का दूसरा स्थान है। यहाँ सन् 1999 तक 2,502 MW पवन ऊर्जा का उत्पादन हुआ। किसी समय तो अमेरिका के पश्चिमी मैदान में जल की पंपिंग के लिए पवन चक्की का प्रयोग होता था। यहाँ अधिकतर पवन ऊर्जा उत्पादन केन्द्र कैलीफोर्निया राज्य में हैं। यहाँ लगभग 15,000 टरबाइन ऊर्जा उत्पादन में कार्यरत हैं। जबकि डेनमार्क विश्व में तीसरा पवन ऊर्जा उत्पादक देश है। यहाँ सन् 2000 तक 2,417 MW विद्युत का उत्पादन हुआ।

     ग्रेट ब्रिटेन यहाँ सन् 2001 में 69 पवन फार्म थे जिनमें 941 टरबाइन लगे हुए थे तथा इनमें 473.6 MW विद्युत उत्पादित होती है।

    भारत भी पवन ऊर्जा के उत्पादन में पीछे नहीं हैं। भारत में पवन ऊर्जा उत्पादन में तेजी से वृद्धि हो रही है। भारत में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता 2023 में 42.633 गीगावाट थी, और देश दुनिया में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता के मामले में चौथे स्थान पर है। 

    एशिया की विशालतम 150 MW उत्पादन क्षमता परियोजना मुप्पंडाल (तमिलनाडु) में है। इस समय देश में 179 विण्ड मैपिंग और 83 विण्ड मोनीटरिंग स्टेशन कार्यरत हैं। तामिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में लगभग 80 स्थानों की पहचान की जा चुकी है।

(iii) भूतापीय शक्ति (Geo-thermal Energy):-

    पृथ्वी के आन्तरिक भाग में गहराई के अनुसार तापमान में वृद्धि होती है। ऐसा अनुमान है कि पृथ्वी के आंतरिक भाग का तापमान 4,500°C है जहाँ पर लोहा तथा निकिल जैसे भारी धात्विक पदार्थ भी तरल अवस्था में हैं।

    पृथ्वी की परत के धरातल पर दरार पड़ने के कारण मैग्मा बाहर आ जाता है। इसके ताप को एकत्रित करके विद्युत उत्पादन किया जा सकता है। यही विद्युत उत्पादन भूतापीय शक्ति कहलाता है।

    विशेषज्ञों का मत है कि इस ऊर्जा का उपयोग कूप खोदकर तथा शीत जल को पम्प द्वारा इस विभंगित शैल में प्रवाहित किया जाता है यह जल शैल की ऊष्मा से 350°F तक गर्म होकर संवहन द्वारा धरातल की ओर, को उठेगा, तब इसकी ऊर्जा को टरबाइनों में चलाने के लिये प्रयोग किया जायेगा।

     एक अन्य विचारधारा के अनुसार भूतापीय ऊर्जा के उपयोग के लिये दो कूपों (Shafts) को बनाया जाए। एक कूप जल को पम्प से नीचे की ओर भेजेगा जब जल अत्याधिक गर्म हो जायेगा तो दूसरे कूप से इसे ऊपर खींच लिया जायेगा और विद्युत शक्ति के उत्पादन में प्रयोग किया जायेगा।

     भूतापीय ऊर्जा प्रदूषण मुक्त एवं सस्ती होती है। न्यूजीलैण्ड, आइसलैण्ड और इटली में प्राकृतिक रूप से प्राप्त ऊष्मा का प्रयोग काफी पहले से किया जा रहा है। इटली के ट्यूस्केनी प्रान्त में फ्लोरेन्स के दक्षिण-पश्चिम में लारडेरेल्लो का प्राकृतिक वाष्प क्षेत्र सन् 1913 से विद्युत उत्पादन कर रहा है।

    भारतवर्ष में भी भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा देश भर में 340 भूतापीय गर्म झरनों की पहचान कर ली गई है। हाल ही में छत्तीसगढ़ में तातापानी भूतापीय क्षेत्रों में 300 kW क्षमता का भूतापीय बिजली संयंत्र लगाने की मंजुरी दी गई है।

    इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर में पूगा, भूतापीय क्षेत्रों में जलाशय की क्षमता का मूल्यांकन करने तथा बिजली संयंत्र लगाने की संभाव्यता की जाँच का काम राष्ट्रीय भू-वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान हैदराबाद द्वारा किया गया है।

    कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) में मणिवर्ण स्थान पर भूतापीय ऊर्जा पर आधारित एक कोल्ड स्टोरेज और एक बिजलीघर स्थापित किया गया है।

(iv) ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy):-

    ज्वारीय ऊर्जा, जिसे टाइडल एनर्जी भी कहा जाता है, समुद्र के ज्वार-भाटे के प्राकृतिक उतार-चढ़ाव से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा का एक नवीकरणीय रूप है।

   वर्तमान समय में ज्वार ऊर्जा द्वारा भी विश्व के कई देशों में विद्युत उत्पादन किया जाता है। विश्व में सर्वप्रथम ज्वार ऊर्जा उत्पादक प्लाण्ट फ्रांस के  ब्रिटनी में रेन्स नदी की एस्चुअरी पर स्थापित किया गया। इनमें ब्रिटेनी तट पर समुद्री टरबाइन लगे हैं जो ज्वार शक्ति से चालित होते हैं।

     इसी प्रकार कनाडा के न्यू ब्रुसविक और संयुक्त राज्य अमेरिका के मेन राज्य में पुंडी की खाड़ी के विभिन्न क्षेत्रों में जहाँ ज्वार 10 से 25 मीटर तक ऊँचे उठते हैं। ज्वार शक्ति से विद्युत उत्पादित की जाती है।

   रूस की किशलाया खाड़ी में भी इसी प्रकार के प्लाण्ट स्थापित किये गये हैं, भारतवर्ष में खम्भात की खाड़ी तथा सुन्दरवन इसके संभावित क्षेत्र हैं। यहाँ उत्पादित क्षमता 8,000-9,000 kW तक है।

(v) शहरी और औद्योगिक कचरे से ऊर्जा (Energy from Urban and Industrial Waste):-

     नगरों एवं औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले कूड़े-कचरे से पर्यावरण दूषित होता है। इस कूड़े-कचरे का उपचार करके न केवल पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है वरन् ऊर्जा उत्पादन में भी वृद्धि की जा सकती है। बड़े-बड़े महानगरों में यह कार्यक्रम विकसित किया जा रहा है।

      इस ऊर्जा से विद्युत के साथ-साथ गैस भी उत्पादित की जा सकती है। भारतवर्ष में सन् 1995 से शहरी, नगरपालिका और औद्योगिक कचरे से ऊर्जा प्राप्ति का राष्ट्रीय कार्यक्रम चल रहा है।

(vi) बायोमास ऊर्जा (Biogas Energy):-

      इसके अन्तर्गत कृषि और वन्य अवशेषों का उपयोग किया जाता है। इससे विद्युत के अतिरिक्त गैस भी उत्पन्न की जाती है। भारतवर्ष में बायोमास गैसीय कार्यक्रम के अन्तर्गत औद्योगिक उपयोगों के लिए ताप ऊर्जा उत्पन्न करने, पानी की पंपिंग और 500 kW तक बिजली पैदा करने के लिये बायोमास गैसीफायर विकसित किये गये हैं।

     इन गैसीफायर में लकड़ी के टुकड़ों और दूसरी वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। भारतवर्ष में 53.1 मेगावाट की क्षमता के बायोमास, गैसीफायर अब तक विकसित किये जा चुके हैं।

     इसके अतिरिक्त नई ऊर्जा प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत फ्यूज सेल्स, जिसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन गैसों के बीच अभिक्रिया के जरिये बिजली पैदा होती है।

    हाइड्रोजन ऊर्जा, इसका प्रयोग व्यापक रूप से जीवाश्म ईंधन के रूप में किया जाता है। जैव ईंधन आदि का प्रयोग भी विद्युत उत्पादन में किया जाता है।

26. The Idustrial Regions of USA (संयुक्त राज्य अमेरिका के औद्योगिक प्रदेश)

The Idustrial Regions of USA

(संयुक्त राज्य अमेरिका के औद्योगिक प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप Q. संयुक्त राज्य अमेरिका के औद्योगिक प्रदेश पर प्रकाश डालें ।

(What light on the Idustrial regions of USA)

उत्तर- संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया के प्रमुख औद्योगिक प्रदेशों में से एक है, जिसका इतिहास औद्योगीकरण और तकनीकी उन्नति से भरा हुआ है। संयुक्त राज्य अमेरिका में अनेक औद्योगिक क्षेत्र हैं जो विभिन्न उद्योगों में काफी अधिक विशेषज्ञता रखते हैं। 

       संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र निम्नलिखित हैं:-

(i) दक्षिणी न्यू इंग्लैंड औद्योगिक क्षेत्र

(ii) मध्य-अटलांटिक तटीय औद्योगिक क्षेत्र

(iii) पिट्सबर्ग-लेक एरी औद्योगिक क्षेत्र

(iv) डेट्रॉयट औद्योगिक क्षेत्र

(v) वृहद झील औद्योगिक क्षेत्र

(vi) दक्षिणी अप्लेशिया औद्योगिक क्षेत्र

(vii) पूर्वी टेक्सास औद्योगिक क्षेत्र

(viii) प्रशांत तटीय औद्योगिक क्षेत्र

(ix) रॉकी पर्वत-पदीय औद्योगिक क्षेत्र

(i) दक्षिणी न्यू इंग्लैंड औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ सूती वस्त्र (Cotton Textile)- सूती वस्त्र उद्योग (Cotton Textile) के लिए बोस्टन (Boston) प्रसिद्ध है।

⇒ ऊनी वस्त्र (Woolen Textile)- ऊनी वस्त्र उद्योग के लिए लोवेल (Lowel) और प्रोविडेंस (Providence) प्रसिद्ध है।

⇒ हार्टफोर्ड (Hartford)- बीमा उद्योग का अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (International Center of Insurance Industry) हार्टफोर्ड (Hartford) में स्थित है।

⇒ पैटरसन (Paterson)- सिल्क सिटी (Silk City) पैटरसन (Paterson) को कहा जाता है। क्योंकि पैटरसन में रेशम का अत्यधिक उत्पादन होता है।

(ii) मध्य-अटलांटिक तटीय औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ मध्य-अटलांटिक तटीय औद्योगिक क्षेत्र संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र है। 

⇒ यह क्षेत्र पेंसिल्वेनिया के पूर्वी भाग, न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, फिलाडेल्फिया, और मैरीलैंड राज्यों में फैला हुआ है। 

⇒ यह क्षेत्र अपने कुशल श्रम शक्ति, जल-विद्युत, रेल परिवहन, मशीनों और निकटवर्ती बाजार की सुविधाओं के कारण औद्योगिक गतिविधियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है।  

⇒ स्टील (Steel)- स्टील उद्योग (Steel) के लिए स्पैरो पोइंट (Sparrows Point) व मोरिसविल्ले (Morrisville) प्रसिद्ध है।

(iii) पिट्सबर्ग-लेक एरी औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ यह औद्योगिक प्रदेश मध्य अटलांटिक तटीय औद्योगिक प्रदेश तथा मिशीगन औद्योगिक प्रदेश के बाद तीसरा महत्व औद्योगिक प्रदेश है।

⇒ यह क्षेत्र लोहा-इस्पात के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ यहां यंग्सटाउन, बिहलिंग तथा जॉन्सटाउन द्वारा बनाए गए त्रिभुज के अंदर उद्योगों का केंद्रीकरण है।

⇒ इस त्रिभुज के मध्य में पिट्सबर्ग है। यह त्रिभुज धातु उद्योग, लोहा इस्पात तथा इंजिनियरिंग उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

(iv) डेट्रॉयट औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ यह अमेरिका का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल विनिर्माण क्षेत्र है, जिसका केंद्र डेट्रॉयट है।

⇒ यह शहर पहले वैगन और कैरिज-निर्माण का केंद्र था, जिसके बाद इस क्षेत्र में ऑटोमोबाइल की असेंबली होने लगी।

⇒ यह फोर्ड, क्रिसलर और जनरल मोटर्स सहित कई विशाल मोटर निगमों का मुख्यालय है।

(v) वृहद झील औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ महान झील प्रदेश को ही मिडवेस्ट प्रदेश कहा जाता है।

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश स्टील (Steel) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश में पीट्सबर्ग (Pittsburgh)- पेन्सिलवेनिया राज्य (Pennsylvania State), डुलुथ (Duluth), क्लीवलेंड (Cleveland), बफैलो (Buffalo)- न्यूयॉर्क राज्य (New York State), गैरी (Gary) स्थान स्टील उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश में शिकागो (Chicago) स्थान मांस प्रसंस्करण (Meat Processing) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश में डेट्रॉइट (Detroit) स्थान ऑटोमोबाइल (Automobile) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। 

⇒ महान झील प्रदेश या मिडवेस्ट प्रदेश में एक्रोन (Akron) स्थान सिंथेटिक रबर (Synthetic Rubber) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

(vi) दक्षिणी अप्लेशिया औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ दक्षिणी अप्लेशियन औद्योगिक क्षेत्र एक प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित है। 

⇒ इस क्षेत्र में कोयला, लकड़ी, और अन्य संसाधनों की प्रचुरता है, जिसके कारण यह वस्त्र, रसायन, और धातु उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बन गया है।

⇒ लौह इस्पात (Iron and Steel)- लौह इस्पात उद्योग के लिए अलबामा राज्य में बर्मिंघम प्रसिद्ध है।

(vii) गल्फ तटीय प्रदेश या पूर्वी टेक्सास औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ पूर्वी टेक्सास प्रदेश को ही गल्फ तटीय प्रदेश कहा जाता है।

⇒ पूर्वी टेक्सास प्रदेश तेल रिफाइनरी (Oil Refineries) और हवाई जहाज (Aircraft) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ पूर्वी टेक्सास प्रदेश या गल्फ तटीय प्रदेश में डलास (Dallas), ह्यूस्टन (Houston), न्यू आर्लीन्स (New Orleans) स्थान तेल रिफाइनरी के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ पूर्वी टेक्सास प्रदेश या गल्फ तटीय प्रदेश में फोर्टवर्थ (Fort Worth) स्थान हवाई जहाज उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

(viii) प्रशांत तटीय औद्योगिक क्षेत्र:-

⇒ प्रशांत तटीय प्रदेश में सिएटल (Seattle) स्थान वायुयान निर्माण (Aircraft Manufacturing) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ प्रशांत तटीय प्रदेश में पोर्टलैंड (Portland) स्थान जहाज निर्माण (Ship Manufacturing) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ प्रशांत तटीय प्रदेश में सेनफ्रांसिस्को (San Francisco) और सेन डीएगो (San Diego) सूचना एवं प्रौद्योगिकी (Information Technology- IT Industry) उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

⇒ सेनफ्रांसिस्को को सिलिकॉन वैली (Silicon Valley) भी कहा जाता है।

सेनफ्रांसिस्को क्षेत्र कैलीफोर्निया (California) में स्थित है।

⇒ प्रशांत तटीय प्रदेश में लॉस एंजिलीस (Los Angeles) स्थान हॉलीवुड़ (Hollywood) (फिल्म उद्योग) के लिए प्रसिद्ध है।

(ix) रॉकी पर्वत-पदीय औद्योगिक क्षेत्र:-

     रॉकी पर्वत-पदीय औद्योगिक क्षेत्र उत्तरी अमेरिका में एक व्यापक क्षेत्र है जो रॉकी पर्वत श्रृंखला के पूर्वी ढलान और उसके आसपास के इलाकों में स्थित है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि, पर्यटन और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित उद्योगों के लिए जाना जाता है।

निष्कर्ष:

    निष्कर्षत: कहा जा सकता कि संयुक्त राज्य अमेरिका का औद्योगिक प्रदेश एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है जो कि देश की अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी, और समाज को आकार देता है। यह विभिन्न उद्योगों, प्राकृतिक संसाधनों, और श्रम शक्ति के कारण विश्व भर में एक प्रमुख औद्योगिक शक्ति है।



नोट:

संक्षेप में

USA का प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र:

1. उत्तर-पूर्वी क्षेत्र:

   इस क्षेत्र में पिट्सबर्ग, क्लीवलैंड, डेट्रायट, शिकागो, ओहियो, मिशिगन और विस्कॉन्सिन जैसे प्रमुख स्थान शामिल हैं। यह क्षेत्र संयुक्त राज्य अमेरिका का सबसे पुराना और सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र है, जिसमें विनिर्माण उद्योग का महत्वपूर्ण स्थान है।

2. मध्य-पश्चिमी क्षेत्र:

   इसमें मुख्यतः शिकागो-गैरी, पिट्सबर्ग-लेक एरी, सेंट लुइस, कैनसस सिटी, ओमाहा, सिनसिनाटी, इंडियानापोलिस क्षेत्र शामिल है। यह क्षेत्र कृषि, परिवहन, और विनिर्माण उद्योगों के लिए जाना जाता है।

3. दक्षिण क्षेत्र:

     इसमें मिसिसिपी, टेनेसी, जॉर्जिया, फ्लोरिडा, अलबामा, ओक्लाहोमा और टेक्सास जैसे जगह शामिल हैं। इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक उत्पादों में कपड़ा, खाद्य और पेय पदार्थ, तंबाकू, फर्नीचर, पेट्रोकेमिकल्स, विमान और भारी रसायन शामिल हैं। यह क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि, तेल, और गैस उद्योगों के लिए जाना जाता है।

4. पश्चिमी क्षेत्र:

    इसमें व्योमिंग, यूटा, कोलोराडो, नेवादा और एरिजोना राज्य शामिल हैं। यह क्षेत्र प्रौद्योगिकी, पर्यटन, और फिल्म उद्योगों के लिए जाना जाता है। 

नोट :

विनिर्माण: कच्चे पदार्थ को मूल्यवान उत्पाद में परिवर्तित कर अधिक मात्रा में वस्तुओं के उत्पादन को विनिर्माण या वस्तु निर्माण कहा जाता है।

23. The Industrial Regions of Japan (जापान के औद्योगिक क्षेत्र)

23. The Industrial Regions of Japan

(जापान के औद्योगिक क्षेत्र)



प्रश्न प्रारूप

Q. जापान के औद्योगिक क्षेत्र पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Industrial regions of Japan.)

उत्तर-

जापान के औद्योगिक प्रदेश-

    उद्योगों की स्थापना की दृष्टि से जापान प्राचीन काल से ही एक विकसित देश रहा है, जहाँ पहले परम्परागत हस्त उद्योगों में उत्पादन होता था लेकिन 1870 के बाद जापान के उद्योगों में स्वचालित मशीनों द्वारा उत्पादन कार्य होने लगा। प्राचीन उद्योग रेशमी वस्त्र, चीनी मिट्टी के बर्तन, पोशाक, खिलौने, हस्त कलाकारी की वस्तुओं आदि का उत्पादन हाथ के बजाय स्वचालित मशीनों द्वारा होने लगा।

     निर्मित माल की विदेशों में बढ़ती हुई माँग को देखते हुए जापान सरकार ने 1930 के बाद भारी उद्योगों की स्थापना पर अधिक बल दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के समय में जापान में लोह इस्पात तथा विविध इंजीनियरिंग उद्योगों का विकास तीव्र गति से हुआ। सूती वस्त्र उद्योग जापान का प्राचीन उद्योग है जिसमें स्वचालित मशीनों द्वारा उत्पादन होने के कारण जापान का मुख्य उद्योग बन गया।

    1945 में आणविक बम विस्फोटों से अधिकतर उद्योग नष्ट हो गए थे लेकिन 1950 के बाद जापान सरकार की औद्योगिक नीति के द्वारा उद्योगों का सर्वाधिक विकास हुआ। जापान विश्व में संयुक्त राज्य तथा रूस के बाद तीसरा और एशिया में औद्योगिक विकास की दृष्टि से प्रथम स्थान रखता है।

    विविध खनिज पदार्थों की कमी होते हुए भी जापान विदेशों से आयातित कच्चे पदार्थों के आधार पर एक विकसित औद्योगिक देश बन गया है जिसके लिए द्विपीय स्थिति के कारण सस्ता जल परिवहन, कुशल श्रमिक, सघन जनंसख्या, तटीय स्थिति आदि सुविधाओं का प्रमुख योगदान है। जापान में उद्योगों के लिए कच्चा माल अन्य देशों से आयात करने के कारण उद्योगों की स्थापना महासागर के तटवर्ती क्षेत्र में अधिक हुई है। जापान के निम्नांकित पाँच औद्योगिक प्रदेश प्रमुख हैं-

1. क्वान्तो औद्योगिक प्रदेश

2. नगोया औद्योगिक प्रदेश

3. किंकी औद्योगिक प्रदेश

4. किता क्यूशू औद्योगिक प्रदेश

5. हिरोशिमा-कुरे-उत्तरी शिकोकु प्रदेश

The Industrial Regions of Japan

1. क्वान्तो या टोकियो-याकोहामा औद्योगिक प्रदेश:-

    क्वान्तो प्रदेश जापान के दक्षिण-पूर्व में स्थित जापान का सबसे बड़ा मैदान है जो प्रशान्त महासागर के तटवर्ती क्षेत्र में स्थित है। क्वान्तो जापान का सबसे बड़ा औद्योगिक प्रदेश है जहाँ टोकियो, याकोहामा, कावासाकी, चीबा, इथिकावा; काबागुची, हिताची, मितो, उरावा, कोगा, कोनोसू, ओमिया, ताबिकावा, तनावा इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं।

    क्वान्तो प्रदेश में पर्वतीय क्षेत्र से बहकर आने वाली नदियों से जल की प्राप्ति, तटीय क्षेत्र में स्थिति के कारण जल परिवहन की सुविधा जिसके द्वारा कच्चे पदार्थों के आयात तथा निर्मित माल के निर्यात का प्रमुख यातायात साधन है। सस्ते तथा कुशल श्रमिकों की व्यवस्था, उच्च तकनीकि सुविधाएँ, श्रमिकों की अपने कार्य के प्रति वफादारी, सघन जनसंख्या जिसके कारण पर्याप्त श्रमिक तथा स्थानीय बाजार की व्यवस्था तथा टोकियो जापान की राजधानी होने के साथ-साथ सबसे बड़ा आर्थिक सांस्कृतिक नगर है तथा रेलमार्गों द्वारा जापान के प्रमुख नगरों से जुड़ा हुआ है।

     इन विभिन्न सुविधाओं के कारण यह क्षेत्र जापान का प्रमुख औद्योगिक प्रदेश बन गया है। इस क्षेत्र में लौह-इस्पात, वायुयानों का निर्माण, वस्त्र उद्योग, कृषि यन्त्र, रासायनिक पदार्थ, कागज आदि उद्योग इस क्षेत्र में सघन रूप से अवस्थित हैं।

     टोकियो, कावासाकी, चीता तथा इथिकावा में लौह इस्पात, योकोहामा कावासाकी में भारी धातु निर्माण उद्योग, टोकियो-याकोहामा, कावासाकी उकागा में जलपोत निर्माण, ताविकावा-मिआमी तथा तनावा में वायुयान निर्माण उद्योगों की प्रधानता है।

2. नगोया औद्योगिक प्रदेश:-

    क्वान्तो औद्योगिक प्रदेश के पश्चिम में जापान के दक्षिणी तटवर्ती क्षेत्र में नगोया औद्योगिक प्रदेश स्थित है जहाँ नगोया, गिफू, ओकाजाकी, आकोशी, अन्जो, इशीकी, तायोहाशी, हिकोने, कामेयामा, तजू, ओका, तोबा प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं। जापान का यह औद्योगिक प्रदेश वस्त्र निर्माण उद्योगों की स्थापना के लिए प्रसिद्ध है जहाँ सूती, ऊनी, रेशमी तथा कृत्रिम रेयन वस्त्रों के निर्माण उद्योगों की प्रधानता है।

      वस्त्र उद्योग के अतिरिक्त, मशीन निर्माण, भारी धातु निर्माण, वायुयान तथा जलयान निर्माण, रसायन उद्योग, बिजली के सामान तथा रेल के डिब्बे तथा रेल इंजन निर्माण उद्योग भी अवस्थित हैं। नगोया-वाकायामा जापान के वस्त्र निर्माण के प्रमुख केन्द्र हैं जहाँ वर्तमान में वस्त्र निर्माण के अतिरिक्त मशीन निर्माण उद्योगों की स्थापना भी की गयी है।

     वायुयान निर्माण मिताका तथा इनाबागून में, जलपोत निर्माण उरागा में, मिट्टी के बर्तन गनोया में तथा यातायात के साधनों के निर्माण से सम्बन्धित उद्योग नगोया तथा शिगा में स्थित हैं। इस क्षेत्र में उद्योग स्थापित होने का प्रमुख कारण समतल भूमि, तटीय स्थिति तथा सघन जनसंख्या है।

3. किंकी या कोबे-ओसाका क्योटो औद्योगिक प्रदेश:-

     नगोया औद्योगिक प्रदेश के पश्चिमी भाग में तटीय क्षेत्र में स्थित कोबे-ओसाका तथा क्योटो नगरों में किंकी औद्योगिक प्रदेश का विस्तार पाया जाता है। अतः इसे कोबे-ओसाका क्योटो औद्योगिक प्रदेश भी कहते हैं। ओसाका, कोबे-क्योटो, हिमेजी, सकाई फ्यूजे, वाकायामा, नारा, किजू, यवाता, यासू, अवाजी, ओमिजो, अमागासाकी, निशिनोमिया इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं।

    इस क्षेत्र में लोह इस्पात उद्योगों की प्रधानता है। इसके अतिरिक्त ओसाका में सूती, ऊनी, रेशमी, वस्त्र निर्माण उद्योगों की प्रधानता है जिसके कारण इसे जापान का मेनचेस्टर कहा जाता है। जलयान, वायुयान, रासायनिक पदार्थ, मशीन निर्माण तथा खाद्य पदार्थों के निर्माण उद्योग भी इस क्षेत्र में पाए जाते हैं। इस औद्योगिक क्षेत्र में ओसाका खाड़ी पर स्थित होने के कारण स्वच्छ जल की प्राप्ति तथा सघन जनसंख्या के कारण पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध हैं।

4. किता क्यूशू या मौजी नागासाकी औद्योगिक प्रदेश:-

     जापान के दक्षिण-पश्चिम में समुद्र तटीय क्षेत्र में इस औद्योगिक प्रदेश का विस्तार पाया जाता है। यह प्रदेश जापान में लौह-इस्पात उद्योगों की दृष्टि से अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है जहाँ जापान के कुल लौह-इस्पात में उत्पादन का 50 प्रतिशत उत्पादित होता है। तटीय क्षेत्र में स्थिति के कारण तथा एशियाई देशों के समीप स्थित होने के कारण लौह अयस्क, कोयला आदि कच्चे पदार्थ जल परिवहन द्वारा आसानी से आयात कर लिया जाता है।

    निर्मित पदार्थों को जलयानों द्वारा विदेशों में निर्यात कर दिया जाता है। अतः यह प्रदेश पूर्णतया आयातित कच्चे पदार्थों पर आधारित है। क्यूशू-केमोगी-यावाता-कोकुश-वाकामात्सु-शिमोनो-सेकी-मोजी-ऊबे-फुकुओका-सासेबे-नागासाकी इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक प्रदेश हैं जहाँ लौह इस्पात के अतिरिक्त धातु निर्माण उद्योग, इंजीनियरिंग पदार्थों का निर्माण, सीमेंट, मोटर गाड़ियाँ, जलयान निर्माण तथा रासायनिक पदार्थों से सम्बन्धित उद्योग भी पाए जाते हैं।

5. हिरोशिमा-कुरे-उत्तरी शिकोकु प्रदेश:-

     जापान के दक्षिण-पश्चिम में किंकी तथा किता-क्यूशू औद्योगिक प्रदेशों के मध्यवर्ती भाग में इस प्रदेश का विस्तार पाया जाता है। हिरोशिमा-कुरे-नोमी ओकायामा-मत्सूयामा-ताकामात्सू-कूबा इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं जहाँ लौह इस्पात भारी धातु निर्माण-जलयान पेट्रो शोधन कारखाने-यंत्र निर्माण-बिजली के सामान तथा विविध रासायनिक पदार्थों के निर्माण से सम्बन्धित उद्योग पाए जाते हैं। जापान के ये सभी औद्योगिक प्रदेश दक्षिणी क्षेत्र में स्थित हैं।

     इनके अतिरिक्त उत्तर में सेन्दाई क्षेत्र तथा होकैडो द्वीप के दक्षिणी भाग में भी लघु औद्योगिक क्षेत्र हैं जहाँ केवल सामान्यतः उपभोक्ता वस्तुओं का ही उत्पादन किया जाता है। इस क्षेत्र में जलवायु दशाएँ प्रतिकूल तथा कच्चे पदार्थों की कमी के कारण जनसंख्या भी न्यूनतम ही पायी जाती है। अतः औद्योगिक विकास वर्तमान में अपनी प्रारम्भिक अवस्था में ही है।



नोट:

जापान में औद्योगिक उन्नति के कारण

     जापान एशिया महाद्वीप का अकेला ऐसा देश है जो औद्योगिक विकास की उस चरम सीमा तक पहुँच गया है, जहाँ तक पहुँचना साधन सम्पन्न विकसित देशों के लिए भी बहुत कठिन है। यह विश्व का प्रमुख औद्योगिक राष्ट्र है। 20वीं शताब्दी में जापान ने अद्वितीय औद्योगिक विकास किया है। जापान की औद्योगिक उन्नति के निम्नलिखित कारण हैं-

(1) भौगोलिक स्थिति- जापान की स्थिति द्वीपीय होने के कारण इसका जलमार्गों द्वारा विभिन्न देशों से सम्पर्क स्थापित हो सका है। जापान के लिए कच्चे माल के स्रोत एशियाई देश इसके बहुत समीप हैं।

(2) अनुकूल जलवायु- इस देश की जलवायु रेशम, कपास आदि के उत्पादन के लिए अनुकूल है। अक्षांशीय विस्तार अधिक होने के कारण इसके उत्तरी व दक्षिणी भागों में जलवायुवीय भिन्नता पायी जाती है।

(3) कच्चे माल की प्राप्ति- यद्यपि जापान में लोहा, कोयला, कपास आदि कच्चे मालों की कमी है फिर भी जापान अति तीव्र गति से औद्योगिक विकास हो रहा है। इसका प्रमुख कारण विदेशों से सस्ते कच्चे माल का प्राप्त होना है।

(4) जल-विद्युत- औद्योगिक शक्ति के साधन कोयले की कमी सस्ती जल-विद्युत द्वारा पूरी कर दी जाती है। यदि जापान में जल विद्युत उत्पादन की अनुकूल भौगोलिक दशाएँ न होर्ती तो जापान औद्योगिक दृष्टि से बहुत अधिक पिछड़ा हुआ होता।

(5) कुशल श्रमिक- देश की अधिकांश जनसंख्या के औद्योगिक क्षेत्रों में निवास करने से पर्याप्त मात्रा में सस्ते व कुशल श्रमिक उपलब्ध हो जाते हैं।

(6) बाजार की समीपता- जापान द्वारा निर्मित माल को इसके समीप दक्षिण व दक्षिण-पूर्वी एशिया के देश आयात कर लेते हैं।

(7) सामुद्रिक स्थिति- जापान के चारों ओर से समुद्र से घिरा होने के कारण यहाँ जल यातायात द्वारा कच्चा माल आयात करने तथा तैयार माल निर्यात करने की बहुत सुविधा है।

(8) परिवहन की सुविधाएँ- जापान की अधिकांश जनसंख्या का जमाव तटीय भागों में है। अतः यहाँ उद्योगों का विकास भी तटीय केन्द्रों पर ही हुआ है।

(9) सरकारी सहयोग- जापान की सरकार ने औद्योगिक विकास के लिए अनेक प्रकार सहयोग किया है। यहाँ सरकार द्वारा नवीन उद्योगों को संरक्षण दिया जाता है तथा वित्तीय सहायता दी जाती है। यहाँ सरकार औद्योगिक नीति को उदार और प्रगतिशील रखकर अनुकूल वातावरण प्रदान करती है।

(10) आधुनिक मशीनरी का प्रयोग- यहाँ कारखानों में आधुनिकतम मशीनरी का प्रयोग किया जाता है तथा ऐसी विधियों का प्रयोग किया जाता है जिनसे श्रम की बचत होती है। ये मशीनें सुविधाजनक भी होती हैं। आधुनिक मशीनरी के विकास की ओर जापान में विशेष ध्यान दिया जाता है।

(11) औद्योगिक सम्बन्ध- यहाँ उद्योगों का विकास निराले ढंग से किया गया है। बड़े उद्योगों की कुटीर उद्योगों से प्रतिस्पर्धा न करके बड़े उद्योगों और कुटीर उद्योगों में सम्पर्क रखा गया है।

(12) चीन-जापान संघर्ष- जब चीन तथा जापान का संघर्ष प्रारम्भ हुआ, जापान में वस्त्र व वस्त्र निर्माण उद्योगों का विकास प्रारम्भ हुआ।

(13) प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध- विश्व युद्ध में शामिल हो जाने के कारण जापान को सैनिक तथा आम जनता की माँग की पूर्ति के लिए सूती वस्त्र, ऊनी वस्त्र, रेशमी वस्त्र, जलयान, वायुयान, मशीनरी आदि के निर्माण में वृद्धि करनी पड़ी।

23. Intensive Subsistence Farming (गहन निर्वाहन कृषि)

23. Intensive Subsistence Farming

(गहन निर्वाहन कृषि)



         यह कृषि व्यवस्था विशेषकर मानसून एशिया के उन भागों में मिलती है जहाँ भौगोलिक दशाएँ कृषि के लिए विशेष अनुकूल है। स्थानीय उपयोग के के लिए खाद्यान्न फसलों का उत्पादन किया जाता है। विश्व की एक-तिहाई जनसंख्या इस प्रकार की कृषि में लगी हुई है। अधिक जनसंख्या के भरण-पोषण के लिए गहन कृषि को अपनाना अति आवश्यक हो जाता है। इस व्यवस्था की निम्न विशेषताएँ हैं-

(i) खाद्यान्न फसलों में ‘विशेषकर चावल’ की प्रधानता होती है।

(ii) फसलोत्पादन प्रमुख तथा पशुपालन का गौण स्थान है।

(iii) जनसंख्या की अधिकता से सभी प्रकार के कृषि कार्यों में मानवीय श्रम का उपयोग मिलता है।

(iv) कृषि क्षेत्र बिखरे एवं छोटे-छोटे होते हैं तथा कृषक गाँवों में निवास करते हैं।

(v) इस कृषि में आधुनिक कृषि उपकरणों का प्रयोग कम होता है। साथ ही रासायनिक उर्वरकों, दवाइयों आदि का भी प्रयोग कम होता है।

(vi) इस कृषि व्यवस्था में प्रति व्यक्ति उत्पादन कम होने से कृषकों की आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय होती है। बहुत ही मुश्किल से आवश्यकता की आपूर्ति उत्पादन से हो पाती है। जो पैदा करते हैं, वही खाते भी हैं। भोजन में सब्जी आदि का प्रयोग बहुत ही कम होता है।

(vii) जनसंख्या की अधिकता के कारण उत्पादन की खपत स्थानीय स्तर पर ही हो जाती है। बाजार के लिए अतिरिक्त उत्पादन नहीं हो पाता। बाजार या बड़ी-बड़ी मण्डियों का भी अभाव मिलता है।

     गहन निर्वाहन कृषि व्यवस्था को फसलों की प्रधानता के आधार पर दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

1. चावल प्रधान गहन जीविकोपार्जन कृषि व्यवस्था,

2. चावल विहीन गहन जीविकोपार्जन कृषि व्यवस्था।

1. चावल प्रधान गहन जीविकोपार्जन कृषि व्यवस्था

     विश्व के गहन चावल उत्पादक भागों में वर्ष पर्यन्त ऊँचा तापमान तथा वार्षिक वर्षा 200 सेमी. से अधिक मिलती है। भौगोलिक दशाओं की उपयुक्तता के कारण ही वर्ष में तीन बार तक चावल की कृषि होती है। चावल की इस कृषि व्यवस्था को ‘सावाह’ (Sawah) कृषि के नाम से जाना जाता है।

     मानसून एशियाई देश विश्व का लगभग 90% चावल उत्पन्न करते हैं। मुख्य चावल उत्पादक देश चीन (30%), भारत (21%), इण्डोनेशिया (8.5%), बांग्लादेश (5.6%), थाईलैण्ड (3.8%), वियतनाम (3.7%), म्यामांर (2.5%) एवं जापान (2.3%) हैं।

     इन उपर्युक्त सभी देशों में चावल की कृषि डेल्टाई भागों, बाढ़ के मैदानों, सीढ़ीदार तथा निम्नवर्ती भागों में की जाती है। मुख्य चावल उत्पादित भागों में- गंगा, ब्रह्मपुत्र, इरावदी, मीनांग, सीक्यांग, यांगटिसिक्यॉग के निचले मैदानी एवं डेल्टाई भाग है। कृषि भूमि उपयोग की दृष्टि से भी दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों में चावल के अन्तर्गत अधिकाधिक क्षेत्र मिलता है जिसमें लाओस (95%), थाईलैंड (65%), म्यामांर (60%), जापान (42%), भारत एवं चीन (25%) आदि प्रमुख हैं।

     इस भाग में जनसंख्या घनत्व अधिक है। अतः चावल उत्पादन का अधिकांश भाग स्थानीय उपयोग में ही खपत हो जाता है। इसके बावजूद दक्षिणी-पूर्वी एशिया के ही देश जिसमें म्यामांर, थाईलैंड, कम्बोडिया, ताइवान एवं दक्षिणी वियतनाम मुख्य हैं जो चावल का निर्यात करते हैं। दक्षिणी-पूर्वी एशिया के वही देश जहाँ जनसंख्या का घनत्व अधिक है, चावल उत्पादक हैं। इस प्रकार चावल उत्पादक क्षेत्र एवं सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व का घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता हैं।

2. चावल विहीन गहन जीविकोपार्जन कृषि व्यवस्था

        मानसून एशिया के ऐसे भाग जहाँ 100 सेमी. से कम वर्षा एवं निम्न तापमान होता है, वहाँ चावल के अतिरिक्त अन्य फसलें भी उत्पन्न की जाती हैं। ऐसे भागों में शुष्क कृषि की प्रधानता होती है जिसमें ज्वार, बाजरा, मक्का, अरहर आदि फसलें उगायी जाती हैं। जहाँ सिंचाई की सुविधा है, वहाँ गेहूँ एवं कपास का भी उत्पादन होता है। इस प्रकार तापमान एवं वर्षा की मात्रा के अनुसार गेहूँ, ज्वार, बाजरा आदि फसलों में से किसी एक ही फसल की प्रधानता रहती है। दक्षिणी पूर्वी एशिया विश्व का लगभग 60% मूंगफली, 57% ज्वार-बाजरा, 40% सोयाबीन, 20% गेंहूँ तथा 16% जौ उत्पन्न करता है।

     मौसमी परिवर्तन के फलस्वरूप जीविकोपार्जन कृषि को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(i) ग्रीष्म कालीन मौसम की फसलें

(ii) वर्षा कालीन मौसम की फसलें, एवं

(iii) शीत या शुष्क मौसम की फसलें।

      इस कृषि व्यवस्था वाले भाग में जनसंख्या का घनत्व अधिक है। कृषक वर्ष में दो या तीन फसलें उत्पन्न करते हैं। वर्षाकाल में ज्वार-बाजारा, मक्का, गन्ना, चावल; शीतकाल में गेहूँ, जौ, चना, मटर; तथा ग्रीष्मकाल में सब्जियाँ मूँग, हरे चारे आदि की खेती उन भागों में की जाती है, जहाँ सिंचाई की विशेष सुविधा होती है।

     इस व्यवस्था में मांस-पशु, दुग्ध पशु आदि का पालन कार्य कम है। जनसंख्या की अधिकता के कारण कृषक खाद्यान्न फसलों को ही उत्पन्न करना आवश्यक समझता है। चारागाहों के अन्तर्गत क्षेत्रफल नगण्य है। निम्नवर्गीय परिवारों के लोग भेड़, बकरी, सूअर, मुर्गी आदि पालते हैं। इस भाग के लोग शाकाहारी हैं। कृषक हल जोतने के लिए पशुओं (बैल) को पालते हैं। दुग्ध के लिए कृषक गाय, भैंस पालते हैं। हाल के वर्षों में भारत सरका द्वारा दुग्ध पशुपालन, सूअ पालन, भेड़ पालन, मुर्गीपालन, मत्स्यपालन, रेशम के कीड़ों आदि के पालन के लिए विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

Intensive Subsistence Farming

24. Fisheries of Japan (जापान का मत्स्योत्पादन)

24. Fisheries of Japan

(जापान का मत्स्योत्पादन)



परिचय

    जापान एशिया के पूरब में स्थित प्रशांत महासागर में एक द्वीपीय देश है। जापान में प्राचीनकाल से ही कृषि, वानिकी, मत्स्य उत्पादन और कुटीर उद्योग अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार रहे हैं। हलांकि अपनी सीमित कृष्य भूमि के कारण जापानी किसान गहन कृषि के पक्षधर रहे हैं। फिर भी खाद्यान्नों की कमी को मछली की आपूर्ति से पूरा करते आ रहे हैं। आज भी भोजन के लिए जापान अपनी भूमि से पर्याप्त खाद्यान्न उत्पादित नहीं कर पाता है, फलतः मछली भोजन में अपना प्राधान्य बनाये हुए है।

मत्स्य उत्पादन:-

    जापान में मत्स्य उत्पादन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ हैं जिसका प्रमुख कारण जापान के चुर्दिक विशाल जलराशि की उपस्थिति है। यही कारण कारण है कि जापान विश्व के तीन बड़े मछली पकड़ने वाले देशों में से एक हैं। 1959 से जापान विश्व का अग्रणी मछली पकड़ने वाला देश बन गया और 1993 के पश्चात् इसका स्थान प्रथम हो गया है। जापान में विश्व की 12.3 प्रतिशत मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। मछलियों में सालमन, हेरिंग, कांड, ट्यूना, सिल्फश और हेल मुख्य हैं। इन विभिन्न प्रकार की मछलियों का उत्पादन 2005 में 115 लाख मीट्रिक टन से अधिक था।

     जापान में मत्स्य उत्पादन के विकास का मुख्य कारण यहाँ पाई जाने वाली अनुकूल परिस्थितियाँ और खाद्यान्न उत्पादन की कमी है। आर्कटिक सागर से आने वाली क्यूराइल की ठण्डी धारा और दक्षिण से ऊष्ण कटिबन्धीय क्यूरोशियो की गर्म धारा जहाँ एक-दूसरे से मिलती हैं वहाँ पर मछलियों के लिए अनुकूल खाद्य पदार्थ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं। ये स्थान 45° उत्तरी अक्षांश के निकट पाये जाते हैं। इन स्थानों पर खूब प्लैंकटन घास उगती है जो मछलियों का प्रमुख खाद्य पदार्थ है।

       उत्तर में पाई जाने वाली मछलियों में सालमन, हेरिंग, कांड, केकड़े और हेल (ठण्डे जल की) तथा दक्षिण में टयूना, स्किपजैक, बोनिटो, मैकरे, सारडीन और सेल्फिश (गर्म जल की) प्रमुख मछलियाँ हैं।

मछली पकड़ने के प्रमुख क्षेत्र:-

       जापान में मछली पकड़ने के प्रमुख चार क्षेत्र हैं-

(i) होकैडो

(ii) उत्तरपूर्वी होंशू क्षेत्र

(iii) क्यूशू, शिकोकू तथा दक्षिणी होंशू क्षेत्र

(iv) अन्य क्षेत्र

Fisheries of Japan

     होकैडो मछली पकड़ने में अग्रणी हैं, जहाँ समस्त जापान की 40 प्रतिशत मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। पूर्वी टोहोके के चार बन्दरगाहों पर उत्तरी प्रशान्त महासागर और ओखोटस्क सागर में सालमन, हेरिंग, क्रैग, काड, हेल, मैकरेल इत्यादि मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। तृतीय मछली पकड़ने का क्षेत्र उत्तरी क्यूशू में नागाशाकी और पश्चिमी होंशू में शिमोनोशेकी हैं, जहाँ पर जापान की 25 प्रतिशत मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। टूना, नोनिटो, स्किप जैक, मैकरेल तथा हेल प्रमुख मछलियाँ हैं। मध्य होंशू के प्रशान्त महासागरीय तट पर टोकाई-काण्टो क्षेत्र में मछली पकड़ने के चार प्रमुख क्षेत्र हैं। 2005 में गहरे सागर से 30 प्रतिशत, उथले तटवर्ती सागर से 30 प्रतिशत एवं आन्तरिक सागर से 6 प्रतिशत मछलियाँ पकड़ी गईं।

     जापान में छोटे-छोटे मछुआरे छोटी-छोटी नौकाओं द्वारा तटीय भागों में मछलियाँ पकड़ते हैं, परन्तु बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ सागर के सभी क्षेत्रों में मछलियाँ पकड़ती हैं। जापानियों द्वारा उत्तरी एवं दक्षिणी प्रशान्त महासागर, आस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्व में भूमध्य रेखीय क्षेत्र, पश्चिमी अफ्रीका और ब्राजील के अटलांटिक भूमध्य रेखीय क्षेत्र, हिन्द महासागर और अण्टार्कटिक क्षेत्रों में मछलियाँ पकड़ी जाती हैं।

     2005 में अण्टार्कटिक में हेल पकड़ने के लिए जापान के सात बड़े-बड़े जहाजी बेडे भेजे गये थे, जिनमें प्रत्येक के पास मछली पकड़ने वाली दस नौकाएं थीं। जापान में नये मछली पकड़ने के क्षेत्र भूमध्य रेखीय जल क्षेत्र हैं, जहाँ टूना और बोनिटो मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। जापान में मत्स्य संस्कृति का विकास तेजी से हो रहा है। कैब, आक्टोपस, प्रान एवं एलोटेल का तेजी से उत्पादन हो रहा है। छोटे-छोटे तालाबों और सिंचित क्षेत्रों में भी मछली पालन का कार्य तीव्र गति से हो रहा है। टोकाई, इबारगी, नारा, एरिता तथा आन्तरिक सागर प्रमुख क्षेत्र है, जहाँ ट्राउट और सालमन पकड़ी जाती हैं।

       विश्व युद्ध के बाद जापान में मछली पकड़ने के प्रारूप में अन्तर आया है। जापान में मछली पकड़ने के लिए प्रयोग में आने वाली छोटी-छोटी नौकाओं की संख्या में कमी हो रही है, जबकि बड़ी-बड़ी नौकाओं की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। यही कारण है कि वर्तमान समय में युद्ध के पूर्व की तुलना में दोगुनी मछलियाँ पकड़ी जा रही हैं। बड़ी-बड़ी नौकोओं में मछलियों का पता लगाने के लिए राडार तक लगे हुए हैं। मछुआरों को सहकारी समितियाँ वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं। इसके अतिरिक्त जापान सरकार सस्ते ब्याज दर पर धन उपलब्ध कराकर इस उद्योग को प्रोत्साहित कर रही है। बड़ी नौकाओं की क्षमता इतनी अधिक है कि उनसे विश्व के किसी भी समुद्री क्षेत्र में मछली पकड़ी जा सकती है।

       इन सब प्रोत्साहन एवं सहायता के बावजूद मछुआरों की आय कृषकों की तुलना में बहुत कम है, परन्तु बड़ी-बड़ी नौकाओं के मछुआरों की आय अपेक्षाकृत अधिक है।

इन बड़ी नौकाओं के समक्ष सबसे बड़ी समस्या पड़ोसी देशों द्वारा अधिकृत जलीय क्षेत्र है। युद्ध से पूर्व जापानी नौकाएं ओखोटस्क सागर में मछली पकड़ती थीं परन्तु इस भाग पर रूस का अधिकार होने के कारण जापानी नौकाएं अब ओखोटस्क सागर में मछली नहीं पकड़ सकतीं हैं। इसी तरह कनाडा ने जापान के लिए 175° पूर्व देशान्तर, कोरिया के तट से 50 मील की दूरी तथा आस्ट्रेलिया का सम्पूर्ण महाद्वीपीय निमग्न तट के अन्दर जापानी नौकाओं का प्रवेश वर्जित कर रखा है।

        जापान द्वारा 90 प्रतिशत मछलियाँ प्रशान्त महासागर से 5 प्रतिशत आन्तरिक क्षेत्र से 4 प्रतिशत अटलांटिक सागर से और मात्र एक प्रतिशत हिन्द महासागर से प्राप्त की जाती हैं। स्पष्ट है कि गहरे समुद्र में मछली मारना जापानी मछुआरों के साहस और कौशल का प्रतीक है।

     मछली पकड़ने के प्रमुख बन्दरगाह जापान में यद्यपि मछली पकड़ने के छोटे-बड़े बन्दरगाहों की संख्या दो हजार है परन्तु इनमें चार बन्रगाहों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। शिकोकू में सुडा, ओकायामा के तट पर स्थित टोमो, उत्तरी-पूर्वी टोहोकू में हाचीनोहे और होकैडो का कुशिरो बन्दरगाह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

       सुडा बन्दरगाह में छोटी-छोटी नौकाओं द्वारा मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। प्रातः काल से शाम तक पकड़ी गई मछलियाँ शाम तक समुद्री किनारे पर लाई जाती हैं। सारडीन, प्रान, आक्टोपस और सेल्फिस महत्त्वपूर्ण हैं। ओकायामा का तटीय बन्दरगाह जापान के अन्य छोटे-छोटे बन्दरगाहों की भाँति है। इस बन्दरगाह पर भी छोटी-छोटी नौकाओं का प्रयोग होता है। इन नौकाओं की संख्या लगभग 200 तथा स्वचालित नौकाओं की संख्या 100 से अधिक है।

       समूह में यहाँ के मछुआरे आन्तरिक सागर में मछली मारने जाते हैं और शाम तक वापस लौटते हैं। मकरेल, आक्टोपस, सेल्फिश आदि मुख्य मछलियाँ हैं। यहाँ की महिलाएं निर्यात के लिए मछलियों को डिब्बों, टोकरियों तथा जालों में बन्द करने का कार्य करती हैं। यह कार्य अंशकालिक होता है, क्योंकि कृषि कार्य के अवकाश में ही यह कार्य सम्भव होता है।

       हाचीनोहे, जो उत्तरी-पर्वी टोहोक में स्थित है मछली पकड़ने के लिए विख्यात हैं। यहाँ पर मछलियों का वार्षिक उत्पादन एक लाख टन से अधिक हैं। यहाँ पर मछली पकड़ने वाली नौकाओं की संख्या लगभग 2000 है, जिनका वजन 15 से 60 टन के मध्य है। इन पर 10 मछुआरे कार्य करते हैं। विभिन्न प्रकार के प्रकाश के माध्यम से मैकरेल आदि मछलियाँ पकड़ी जाती हैं जो विभिन्न प्रतिष्ठानों को भेजी जाती हैं, यहाँ से मछलियों का निर्यात चीन और दक्षिणी-पूर्वी एशियाई देशों को होता है।

     होकैडो का कुशिरो बन्दरगाह सबसे बड़ा मछली पकड़ने का केन्द्र है। यहाँ मैकरेल, सालमन, काड, हेरिंग आदि पकड़ी जाने वाले मुख्य मछलियाँ हैं। यहाँ पर नौकाओं की संख्या 20,000 है। प्रत्येक बेड़ों के पास मछली पकड़ने की 10 से 30 नौकाएं हैं। ये बेड़े उत्तरी प्रशान्त महासागर में मछली पकड़ने के लिए 3 महीने तक के लिए बाहर निकल जाते हैं और यहाँ पकड़ी गई मछलियाँ सम्बन्धित नौकाओं द्वारा बन्दरगाह को भेज दी जाती हैं।

जापान में मत्स्य उद्योग के विकास के कारण

        जापान में मत्स्य उद्योग के विकास के निम्न कारण हैं-

1. जापान उत्तर-पश्चिमी प्रशान्त महासागर के महाद्वीपीय निमग्न तट पर स्थित है, अतः यहाँ का उथला जलीय क्षेत्र प्लैक्टन से युक्त होने के कारण मछलियों की पकड़ने के लिए अनुकूल है।

2. जापान की अधिकांश जनसंख्या तटीय भागों में केन्द्रित है। यही कारण है कि तटीय भाग में लोग मछली पकड़ने के लिए प्रेरित होते हैं और भोजन में प्रयोग भी करते हैं।

3. जापान तट रेखा लम्बी एवं कटी-फटी है इसलिए इसे खाड़ियों का देश (Country of Bays) कहते हैं। अच्छे बन्दरगाहों से युक्त होने के कारण मछली पकड़ने के लिए प्राकृतिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।

4. जापान की स्थिति खनिजों की कमी तथा कृषि योग्य भूमि की कमी आदि ने जापानियों को समुद्र का सहारा लेने के लिए बाध्य कर दिया है। यही कारण है कि यहाँ मछली उद्योग विकसित है।

5. जापान में पशुपालन के लिये चरागाह की कमी है, क्योंकि जापान का 85 प्रतिशत भाग पर्वतीय एवं पठारी है, जो निवास एवं कृषि के लिए अनुपयुक्त है। जापान के अधिकांश लोग बौद्ध धर्मावलम्बी हैं, जो माँस नहीं खाते हैं। इसलिए प्रोटीन के लिए मछलियाँ ही मुख्य आहार हैं।

6. आधुनिक तकनीक के विकास से गहरे समुद्र से मछली पकड़ने में सुविधा हुई है। इस कार्य को सफल बनाने में जापानी वैज्ञानिकों और तकनीक विशेषज्ञों ने सराहनीय कार्य किया है।

7. सरकारी प्रोत्साहन, बैंक सुविधा और सहकारी समितियों के कारण जापान में मत्स्य उत्पादन लगातार बढ़ता रहा है।

8. बढ़ती जनसंख्या के लिये भोजन जुटाना जापान की राष्ट्रीय समस्या है। इस समस्या के समाधान के लिये समुद्र की ओर मुड़ना स्वाभाविक है। जापान देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाने की चेष्टा में मछली उत्पादन पर बल देता रहा है।



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