Category GEOGRAPHY OF INDIA(भारत का भूगोल)

11. Crop Combination and Crop Diversification / फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण

Crop Combination and Crop Diversification

 फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण

Crop Combination and Crop Diversification

परिचय:

      कृषि भूगोल (Agricultural Geography) में फसलों के वितरण, उत्पादन तथा कृषि पद्धतियों का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी क्षेत्र में एक से अधिक फसलों की खेती की जाती है, जिनका अनुपात एवं वितरण अलग-अलग होता है। इसी आधार पर फसल संयोजन (Crop Combination) तथा फसल विविधीकरण (Crop Diversification) की अवधारणाएँ विकसित हुई हैं। ये दोनों अवधारणाएँ कृषि प्रदेशों के निर्धारण, कृषि नियोजन तथा संसाधनों के समुचित उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

फसल संयोजन (Crop Combination):

      किसी क्षेत्र में एक साथ उगाई जाने वाली प्रमुख फसलों के समूह को फसल संयोजन कहते हैं। दूसरे शब्दों में, किसी कृषि क्षेत्र में जिन फसलों का संयुक्त रूप से सर्वाधिक क्षेत्रफल होता है, उन्हें उस क्षेत्र का फसल संयोजन कहा जाता है।

परिभाषा:

वीवर (J. C. Weaver, 1954) के अनुसार-

       “किसी क्षेत्र में सर्वाधिक भूमि पर उगाई जाने वाली फसलों का समूह ही उस क्षेत्र का फसल संयोजन कहलाता है।”

फसल संयोजन की विशेषताएँ (Characteristics of Crop Combination)

1. अनेक फसलों का संयुक्त वितरण (Combined Distribution of Crops):-

      फसल संयोजन की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि किसी क्षेत्र में एक से अधिक प्रमुख फसलें एक साथ उगाई जाती हैं। ये फसलें कुल कृषि क्षेत्र के अधिकांश भाग पर फैली होती हैं तथा उस क्षेत्र की कृषि संरचना एवं कृषि व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती हैं। फसलों का यह संयुक्त वितरण कृषि भूगोल के अध्ययन का आधार बनता है।

2. कृषि प्रदेशों के निर्धारण का आधार (Basis for Delineation of Agricultural Regions):-

     फसल संयोजन कृषि प्रदेशों के वैज्ञानिक वर्गीकरण का महत्वपूर्ण आधार है। जिन क्षेत्रों में समान प्रकार की प्रमुख फसलें उगाई जाती हैं, उन्हें एक ही कृषि प्रदेश में शामिल किया जाता है। इससे कृषि की क्षेत्रीय विशेषताओं का अध्ययन तथा कृषि नियोजन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

3. प्राकृतिक कारकों से प्रभावित (Influenced by Physical Factors):-

     फसल संयोजन मुख्यतः जलवायु, वर्षा, तापमान, मिट्टी, स्थलाकृति तथा जल संसाधनों जैसे प्राकृतिक कारकों पर निर्भर करता है। इन कारकों में परिवर्तन होने पर फसलों का प्रकार एवं उनका क्षेत्रफल भी बदल जाता है। इसलिए प्रत्येक क्षेत्र का फसल संयोजन उसकी प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित होता है।

4. कृषि विशेषीकरण का द्योतक (Indicator of Agricultural Specialization):-

       फसल संयोजन किसी क्षेत्र की कृषि विशेषता एवं उत्पादन प्रवृत्ति को स्पष्ट करता है। इससे यह ज्ञात होता है कि उस क्षेत्र में कौन-सी फसलें प्रमुख हैं तथा कृषि किस दिशा में विशेषीकृत (Specialized) है। उदाहरण के लिए, पंजाब गेहूँ उत्पादन तथा असम चाय उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

5. क्षेत्रीय एवं स्थानिक भिन्नता (Regional and Spatial Variation):-

      फसल संयोजन में स्थानिक (Spatial) एवं क्षेत्रीय (Regional) भिन्नता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। प्रत्येक क्षेत्र का फसल संयोजन उसकी भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग होता है। इसलिए एक ही देश में विभिन्न प्रकार के फसल संयोजन पाए जाते हैं।

6. कृषि नियोजन एवं संसाधन प्रबंधन में उपयोगी (Useful for Agricultural Planning and Resource Management):-

      फसल संयोजन का अध्ययन कृषि विकास, भूमि उपयोग नियोजन, सिंचाई प्रबंधन, फसल चक्र, उर्वरक उपयोग, कृषि निवेश तथा क्षेत्रीय कृषि योजनाओं के निर्माण में अत्यंत उपयोगी है। इसके आधार पर संसाधनों का संतुलित उपयोग, कृषि उत्पादकता में वृद्धि तथा सतत कृषि विकास (Sustainable Agricultural Development) को बढ़ावा दिया जा सकता है।

फसल संयोजन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Crop Combination)

1. जलवायु (Climate):-

    जलवायु फसल संयोजन का सबसे महत्वपूर्ण निर्धारक है। किसी क्षेत्र का तापमान, वर्षा, आर्द्रता, सूर्यप्रकाश तथा फसल वृद्धि अवधि (Growing Season) यह निर्धारित करते हैं कि वहाँ कौन-सी फसलें सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं। उदाहरण के लिए, अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में धान तथा कम वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रों में बाजरा, ज्वार एवं दालों की खेती प्रमुख होती है। इसलिए जलवायु में परिवर्तन होने पर फसल संयोजन भी बदल जाता है।

2. मिट्टी (Soil):-

    मिट्टी का प्रकार, उर्वरता, बनावट, जलधारण क्षमता एवं पोषक तत्व फसल संयोजन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। प्रत्येक फसल के लिए विशिष्ट प्रकार की मिट्टी उपयुक्त होती है। उदाहरणतः जलोढ़ मिट्टी में धान एवं गेहूँ, काली मिट्टी में कपास, लाल मिट्टी में दलहन एवं तिलहन तथा लेटराइट मिट्टी में चाय एवं रबर जैसी फसलों की खेती अधिक सफल होती है।

3. सिंचाई सुविधाएँ (Irrigation Facilities):-

सिंचाई फसल संयोजन का एक प्रमुख निर्धारक है। जहाँ नहर, ट्यूबवेल, कुएँ एवं अन्य सिंचाई साधनों की पर्याप्त व्यवस्था होती है, वहाँ किसान वर्ष में दो या तीन फसलें उगाने में सक्षम होते हैं। पर्याप्त सिंचाई वाले क्षेत्रों में गेहूँ, धान, गन्ना एवं सब्जियों जैसी अधिक जल की आवश्यकता वाली फसलें प्रमुख होती हैं, जबकि वर्षा आधारित क्षेत्रों में सूखा-सहिष्णु फसलें अधिक उगाई जाती हैं।

4. बाजार एवं परिवहन (Market and Transportation):-

      बाजार की मांग, कृषि उत्पादों का मूल्य तथा परिवहन सुविधाओं का विकास फसल संयोजन को प्रभावित करता है। जिन क्षेत्रों में बाजार एवं परिवहन की सुविधाएँ बेहतर होती हैं, वहाँ किसान अधिक लाभदायक नकदी फसलें, फल, सब्जियाँ, फूल एवं बागवानी फसलें उगाने के लिए प्रेरित होते हैं। शहरी क्षेत्रों के निकट व्यावसायिक कृषि का विकास इसी कारण अधिक देखा जाता है।

5. आधुनिक तकनीक (Modern Technology):-

     आधुनिक कृषि तकनीक जैसे उच्च उपज देने वाले बीज (HYV Seeds), रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, कृषि यंत्रीकरण, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई तथा वैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ फसल संयोजन में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाती हैं। इन तकनीकों से कृषि उत्पादकता बढ़ती है, उत्पादन लागत कम होती है तथा किसान नई एवं अधिक लाभदायक फसलों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। इसके परिणामस्वरूप कृषि का आधुनिकीकरण एवं फसल संयोजन में विविधता आती है।

फसल संयोजन के प्रमुख सिद्धांत

(Major Theories of Crop Combination)

1. वीवर का न्यूनतम विचलन सिद्धांत (Weaver’s Minimum Deviation Method, 1954):-

     अमेरिकी भूगोलवेत्ता जे. सी. वीवर (J. C. Weaver) ने 1954 में फसल संयोजन निर्धारण की सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं वैज्ञानिक विधि प्रस्तुत की। इस विधि में किसी क्षेत्र की विभिन्न फसलों के वास्तविक क्षेत्रफल प्रतिशत (Observed Percentage) की तुलना सैद्धांतिक प्रतिशत (Theoretical Percentage) से की जाती है। जिस संयोजन में वास्तविक एवं सैद्धांतिक प्रतिशत के बीच न्यूनतम विचलन (Minimum Deviation) प्राप्त होता है, वही उस क्षेत्र का वास्तविक फसल संयोजन माना जाता है। कृषि भूगोल में यह विधि सबसे अधिक प्रचलित है।

2. डोई की संशोधित विधि (Doi’s Modified Method):-

      डोई (Doi) ने वीवर की न्यूनतम विचलन विधि में सुधार करते हुए एक संशोधित पद्धति प्रस्तुत की। इस विधि में गणना अपेक्षाकृत सरल होती है तथा फसल संयोजन का निर्धारण अधिक व्यावहारिक एवं सटीक रूप से किया जा सकता है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ अनेक फसलें समान अनुपात में उगाई जाती हैं, वहाँ यह विधि अधिक उपयोगी मानी जाती है। इसलिए इसे वीवर विधि का उन्नत रूप माना जाता है।

3. रफीउल्लाह विधि (Rafiullah Method):-

       रफीउल्लाह ने भारतीय कृषि परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए फसल संयोजन निर्धारण की एक संशोधित विधि विकसित की। इस पद्धति में भारतीय कृषि की क्षेत्रीय विविधता, बहुफसली कृषि तथा फसलों के वास्तविक वितरण को अधिक महत्व दिया गया है। भारतीय कृषि भूगोल के अध्ययन, कृषि प्रदेशों के निर्धारण तथा क्षेत्रीय कृषि विश्लेषण में इस विधि का व्यापक उपयोग किया जाता है। यह भारतीय परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त एवं व्यावहारिक मानी जाती है।

फसल संयोजन का महत्व (Importance of Crop Combination)

1. कृषि प्रदेशों का निर्धारण:-

      फसल संयोजन किसी क्षेत्र की प्रमुख फसलों की पहचान करने में सहायता करता है। इसके आधार पर समान कृषि विशेषताओं वाले क्षेत्रों का वैज्ञानिक वर्गीकरण (Agricultural Regionalization) किया जाता है, जिससे कृषि प्रदेशों का निर्धारण सरल हो जाता है।

2. कृषि नियोजन में सहायता:-

      फसल संयोजन का अध्ययन कृषि विकास योजनाओं, सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरकों तथा कृषि तकनीकों के उचित वितरण में सहायक होता है। इससे संसाधनों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है।

3. भूमि उपयोग विश्लेषण:-

     यह किसी क्षेत्र में विभिन्न फसलों के भूमि उपयोग प्रतिरूप (Land Use Pattern) को स्पष्ट करता है। इसके आधार पर भूमि की उत्पादकता का मूल्यांकन तथा उपयुक्त फसल चयन किया जाता है।

4. कृषि उत्पादन में वृद्धि:-

        फसल संयोजन के अध्ययन से क्षेत्र की जलवायु एवं मिट्टी के अनुसार उपयुक्त फसलों का चयन किया जा सकता है, जिससे कृषि उत्पादन और किसानों की आय में वृद्धि होती है।

5. क्षेत्रीय कृषि विकास का अध्ययन:-

      फसल संयोजन विभिन्न क्षेत्रों की कृषि संरचना, उत्पादन क्षमता तथा विकास स्तर को समझने में सहायक होता है। इससे क्षेत्रीय असमानताओं की पहचान कर संतुलित कृषि विकास की योजनाएँ बनाई जा सकती हैं।

फसल संयोजन (Crop Combination) का उदाहरण

उदाहरण–1 (पंजाब):

यदि पंजाब के किसी जिले में कुल कृषि भूमि का 60% भाग गेहूँ, 25% भाग धान तथा 15% भाग गन्ने के अंतर्गत है, तो उस क्षेत्र का फसल संयोजन “गेहूँ-धान-गन्ना (Wheat–Rice–Sugarcane Combination)” कहलाएगा।

उदाहरण–2 (बिहार):

बिहार के उत्तरी मैदानी भागों में यदि किसी क्षेत्र में प्रमुख रूप से धान, गेहूँ एवं मक्का की खेती की जाती है, तो उस क्षेत्र का फसल संयोजन “धान-गेहूँ-मक्का (Rice–Wheat–Maize Combination)” कहलाएगा।

उदाहरण–3 (उत्तर प्रदेश):

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गेहूँ–गन्ना (Wheat–Sugarcane Combination) एक प्रमुख फसल संयोजन है।

उदाहरण–4 (राजस्थान):

शुष्क क्षेत्रों में बाजरा–चना–सरसों (Pearl Millet–Gram–Mustard Combination) प्रमुख फसल संयोजन का उदाहरण है।

अर्थात

     यदि किसी क्षेत्र में धान, गेहूँ एवं मक्का सबसे अधिक क्षेत्रफल में उगाई जाती हैं, तो उस क्षेत्र का फसल संयोजन “धान–गेहूँ–मक्का फसल संयोजन” कहलाता है। यही Crop Combination का सबसे सरल एवं उपयुक्त उदाहरण है।

फसल विविधीकरण

(Crop Diversification)

परिचय:

      जब किसान केवल एक या दो फसलों पर निर्भर न रहकर अनेक प्रकार की खाद्यान्न, दलहन, तिलहन, बागवानी एवं नकदी फसलों की खेती करता है, तो इसे फसल विविधीकरण कहा जाता है।

परिभाषा:

   फसल विविधीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें कृषि जोखिम कम करने तथा आय बढ़ाने के उद्देश्य से विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती की जाती है।

उद्देश्य:

✍️ किसानों की आय बढ़ाना।

✍️ कृषि जोखिम कम करना।

✍️ भूमि की उर्वरता बनाए रखना।

✍️ खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना।

✍️ बाजार की मांग को पूरा करना।

फसल विविधीकरण के कारण (Causes of Crop Diversification)

1. बदलती बाजार मांग (Changing Market Demand):-

    बाजार में फलों, सब्जियों, फूलों, मसालों, औषधीय पौधों तथा अन्य उच्च मूल्य वाली फसलों की मांग लगातार बढ़ रही है। अधिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से किसान पारंपरिक खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ नकदी एवं बागवानी फसलों की खेती अपनाने लगे हैं। इससे कृषि का व्यावसायीकरण बढ़ा है तथा किसानों की आय में वृद्धि हुई है।

2. सिंचाई सुविधाओं का विकास (Development of Irrigation Facilities):-

    नहरों, ट्यूबवेलों, कुओं तथा सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों (ड्रिप एवं स्प्रिंकलर) के विस्तार से किसानों को पूरे वर्ष विभिन्न प्रकार की फसलें उगाने की सुविधा प्राप्त हुई है। पर्याप्त सिंचाई उपलब्ध होने से किसान एक ही भूमि पर दो या तीन फसलें उगाने में सक्षम हुए हैं, जिससे फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिला है।

3. आधुनिक कृषि तकनीक (Modern Agricultural Technology):-

    उन्नत बीज (HYV Seeds), रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, कृषि यंत्र, आधुनिक सिंचाई तकनीक तथा वैज्ञानिक खेती की पद्धतियों ने कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि की है। इन तकनीकों के कारण किसान नई, उच्च मूल्य वाली एवं अधिक लाभदायक फसलों को अपनाने के लिए प्रेरित हुए हैं।

4. सरकारी नीतियाँ एवं प्रोत्साहन (Government Policies and Incentives):-

    सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), फसल बीमा, कृषि ऋण, सब्सिडी, बागवानी मिशन, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) तथा अन्य कृषि विकास योजनाओं के माध्यम से किसानों को विविध फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इन योजनाओं से फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिलता है।

5. जलवायु परिवर्तन एवं जोखिम प्रबंधन (Climate Change and Risk Management):-

    अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, तापमान में वृद्धि तथा अन्य जलवायु संबंधी समस्याओं के कारण एक ही फसल पर निर्भर रहना जोखिमपूर्ण हो गया है। इसलिए किसान विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती अपनाते हैं, जिससे फसल विफल होने की संभावना कम होती है, कृषि जोखिम घटता है तथा आय की स्थिरता बनी रहती है। फसल विविधीकरण जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की एक प्रभावी रणनीति भी है।

फसल विविधीकरण के लाभ (Advantages of Crop Diversification)

1. किसानों की आय में वृद्धि (Increase in Farmers’ Income)

     फसल विविधीकरण के माध्यम से किसान पारंपरिक खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ फल, सब्जियाँ, बागवानी, मसाले एवं अन्य उच्च मूल्य वाली फसलों की खेती करते हैं। इन फसलों से अधिक लाभ प्राप्त होता है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होती है तथा उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

2. कृषि जोखिम में कमी (Reduction in Agricultural Risk)

    यदि किसी एक फसल को प्राकृतिक आपदा, कीट या रोग के कारण नुकसान होता है, तो अन्य फसलें किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। इस प्रकार फसल विविधीकरण कृषि जोखिम को कम करता है तथा किसानों की आय को अधिक स्थिर बनाता है।

3. रोजगार के अवसरों में वृद्धि (Generation of Employment Opportunities):-

     फल, सब्जियाँ, फूल, बागवानी एवं व्यावसायिक फसलों की खेती में श्रम की आवश्यकता अधिक होती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षभर रोजगार के अवसर बढ़ते हैं तथा कृषि आधारित उद्योगों के विकास को भी प्रोत्साहन मिलता है।

4. भूमि की उर्वरता का संरक्षण (Maintenance of Soil Fertility):-

    विभिन्न प्रकार की फसलों का फसल चक्र (Crop Rotation) अपनाने से मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है। विशेष रूप से दलहनी फसलें नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से भूमि की उर्वरता बढ़ाती हैं तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।

5. पोषण सुरक्षा में सुधार (Improvement in Nutritional Security):-

     फसल विविधीकरण के कारण केवल खाद्यान्न ही नहीं, बल्कि फल, सब्जियाँ, दालें, तिलहन एवं बागवानी फसलों का उत्पादन भी बढ़ता है। इससे लोगों को संतुलित एवं पौष्टिक आहार उपलब्ध होता है तथा कुपोषण की समस्या को कम करने में सहायता मिलती है।

6. नकदी फसलों का विकास (Development of Cash Crops):-

     फसल विविधीकरण किसानों को गन्ना, कपास, तंबाकू, मसाले, फल, फूल एवं अन्य व्यावसायिक फसलों की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। इससे कृषि का व्यावसायीकरण बढ़ता है, निर्यात में वृद्धि होती है तथा किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।

7. सतत कृषि को बढ़ावा (Promotion of Sustainable Agriculture):-

     फसल विविधीकरण प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग, जैव विविधता के संरक्षण तथा पर्यावरण-अनुकूल कृषि प्रणाली को प्रोत्साहित करता है। इससे भूमि, जल एवं मिट्टी का संरक्षण होता है, रासायनिक इनपुट का अत्यधिक उपयोग कम होता है तथा दीर्घकालीन कृषि उत्पादकता एवं सतत कृषि विकास (Sustainable Agricultural Development) सुनिश्चित होता है।

फसल विविधीकरण की समस्याएँ (Problems of Crop Diversification)

1. सिंचाई का अभाव (Lack of Irrigation Facilities):-

     भारत के अनेक क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं का पर्याप्त विकास नहीं हुआ है, जिसके कारण किसान आज भी मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहते हैं। अनिश्चित वर्षा के कारण वे फल, सब्जियाँ, बागवानी तथा अन्य उच्च मूल्य वाली फसलों को अपनाने का जोखिम नहीं उठा पाते। परिणामस्वरूप फसल विविधीकरण की प्रक्रिया बाधित होती है।

2. छोटे एवं बिखरे जोत (Small and Fragmented Land Holdings):-

     भारत में अधिकांश किसानों के पास भूमि का आकार छोटा तथा विभिन्न स्थानों पर बिखरा हुआ होता है। ऐसी स्थिति में आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग, यंत्रीकरण तथा विभिन्न प्रकार की फसलों का वैज्ञानिक प्रबंधन कठिन हो जाता है। इसलिए किसान पारंपरिक फसलों की खेती तक ही सीमित रह जाते हैं।

3. बाजार सुविधाओं की कमी (Lack of Market Facilities):-

     फसल विविधीकरण के लिए किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य मिलना आवश्यक है। किन्तु अनेक क्षेत्रों में संगठित बाजार, भंडारण, मूल्य सूचना तथा विपणन व्यवस्था का अभाव है। इसके कारण किसानों को लाभकारी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता और वे पारंपरिक कृषि प्रणाली पर निर्भर रहते हैं।

4. भंडारण एवं परिवहन की समस्या (Problems of Storage and Transportation):-

      फल, सब्जियाँ, फूल तथा अन्य शीघ्र नष्ट होने वाली फसलों के लिए कोल्ड स्टोरेज, शीत-श्रृंखला (Cold Chain) एवं तेज परिवहन व्यवस्था की आवश्यकता होती है। इन सुविधाओं के अभाव में फसलें खराब हो जाती हैं, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है और वे विविधीकरण अपनाने से बचते हैं।

5. तकनीकी जानकारी का अभाव (Lack of Technical Knowledge):-

     कई किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों, उन्नत बीजों, वैज्ञानिक फसल प्रबंधन, कीट एवं रोग नियंत्रण तथा नई कृषि प्रणालियों की पर्याप्त जानकारी नहीं होती। कृषि विस्तार सेवाओं (Extension Services) की सीमित पहुँच के कारण वे नई एवं लाभकारी फसलों को अपनाने में संकोच करते हैं, जिससे फसल विविधीकरण की गति धीमी रहती है।

6. पूँजी एवं ऋण सुविधाओं की कमी (Lack of Capital and Credit Facilities):-

     फसल विविधीकरण के लिए उन्नत बीज, सिंचाई, उर्वरक, कृषि यंत्र, बागवानी एवं आधुनिक तकनीकों में पर्याप्त निवेश की आवश्यकता होती है। छोटे एवं सीमांत किसानों के पास सीमित पूँजी होती है तथा उन्हें समय पर सस्ती ऋण सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हो पातीं। परिणामस्वरूप वे नई फसलों में निवेश करने से बचते हैं और पारंपरिक खेती को ही अपनाए रखते हैं।

भारत में फसल विविधीकरण

    भारत में हरित क्रांति के बाद गेहूँ एवं धान का प्रभुत्व बढ़ा, किन्तु वर्तमान में बागवानी, फल, सब्जी, दलहन, तिलहन, औषधीय पौधे तथा व्यावसायिक फसलों की ओर विविधीकरण तेजी से बढ़ रहा है। पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात तथा बिहार में भी फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण में अंतर

आधार फसल संयोजन फसल विविधीकरण
अर्थ प्रमुख फसलों का समूह अनेक प्रकार की फसलों की खेती
उद्देश्य कृषि प्रदेशों का निर्धारण आय एवं जोखिम प्रबंधन
आधार क्षेत्रीय वितरण कृषि प्रणाली में परिवर्तन
प्रमुख विद्वान जे. सी. वीवर आधुनिक कृषि नीति
उपयोग कृषि भूगोल कृषि विकास एवं नियोजन

फसल विविधीकरण (Crop Diversification) के उदाहरण

उदाहरण-1: पंजाब एवं हरियाणा

     पहले इन राज्यों में मुख्य रूप से गेहूँ एवं धान की खेती होती थी। वर्तमान में किसान फल, सब्जियाँ, दलहन, तिलहन तथा बागवानी फसलों की खेती भी करने लगे हैं। यह फसल विविधीकरण का प्रमुख उदाहरण है।

उदाहरण-2: बिहार

     बिहार में पारंपरिक धान एवं गेहूँ के साथ-साथ मक्का, मखाना, सब्जियाँ, फल (लीची, आम, केला), मसाले एवं बागवानी फसलों की खेती तेजी से बढ़ रही है। यह फसल विविधीकरण का उत्कृष्ट उदाहरण है।

उदाहरण-3: महाराष्ट्र

     महाराष्ट्र में किसान कपास एवं ज्वार के साथ-साथ अंगूर, अनार, संतरा, गन्ना एवं सब्जियों की खेती कर रहे हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि हुई है।

उदाहरण-4: कर्नाटक

     कर्नाटक में रागी एवं धान के साथ कॉफी, काली मिर्च, इलायची, नारियल तथा बागवानी फसलों की खेती की जाती है, जो फसल विविधीकरण को दर्शाती है।

उदाहरण-5: उत्तर प्रदेश

     उत्तर प्रदेश में किसान गेहूँ, धान एवं गन्ने के साथ आलू, सब्जियाँ, सरसों, दलहन तथा बागवानी फसलों की खेती भी करते हैं। इससे कृषि आय एवं रोजगार दोनों में वृद्धि होती है।

अर्थात

    यदि कोई किसान पहले केवल धान की खेती करता था, लेकिन बाद में धान + गेहूँ + मक्का + सब्जियाँ + फल उगाने लगा, तो इसे फसल विविधीकरण (Crop Diversification) कहा जाएगा।

याद रखने का आसान सूत्र:

✍️ फसल संयोजन (Crop Combination) = एक क्षेत्र में प्रमुख फसलों का समूह (जैसे धान–गेहूँ–मक्का)।

✍️ फसल विविधीकरण (Crop Diversification) = आय बढ़ाने एवं जोखिम कम करने के लिए अनेक प्रकार की फसलों की खेती (जैसे धान + गेहूँ + सब्जियाँ + फल + दलहन + तिलहन)।

निष्कर्ष:

    फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण कृषि भूगोल की दो महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं। फसल संयोजन किसी क्षेत्र की प्रमुख फसलों के वितरण एवं कृषि विशेषीकरण को दर्शाता है, जबकि फसल विविधीकरण कृषि को अधिक लाभकारी, टिकाऊ एवं जोखिम-मुक्त बनाने की प्रक्रिया है। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा तथा किसानों की आय बढ़ाने के लिए फसल विविधीकरण अत्यंत आवश्यक माना जाता है। वहीं फसल संयोजन कृषि प्रदेशों के वैज्ञानिक वर्गीकरण एवं क्षेत्रीय कृषि नियोजन का आधार प्रदान करता है।

12. Cropping Pattern in India / भारत में फसल प्रतिरूप

Cropping Pattern in India 

भारत में फसल प्रतिरूप

परिचय:

     भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ लगभग 45–46% कार्यशील जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। देश की विविध जलवायु, मिट्टी, स्थलाकृति, वर्षा तथा सिंचाई सुविधाओं के कारण विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं। किसी क्षेत्र में एक निश्चित समय पर उगाई जाने वाली फसलों के प्रकार, उनका क्षेत्रीय वितरण तथा उनके अंतर्गत आने वाले क्षेत्रफल की व्यवस्था को फसल प्रतिरूप (Cropping Pattern) कहा जाता है।

     फसल प्रतिरूप कृषि भूगोल की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो किसी क्षेत्र की कृषि विशेषताओं, संसाधनों के उपयोग तथा कृषि विकास के स्तर को स्पष्ट करती है। भारत में फसल प्रतिरूप प्राकृतिक एवं सामाजिक-आर्थिक दोनों प्रकार के कारकों से प्रभावित होता है।

परिभाषा:

     फसल प्रतिरूप (Cropping Pattern) से तात्पर्य किसी क्षेत्र में एक निश्चित अवधि के दौरान विभिन्न फसलों के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रफल, उनके अनुपात तथा स्थानिक वितरण से है।

Spedding (1979) के अनुसार-

   “Cropping pattern refers to the yearly sequence and spatial arrangement of crops on a given area of land.”

भारत में फसल प्रतिरूप की प्रमुख विशेषताएँ

(Major Characteristics of Cropping Pattern in India)

1. कृषि की क्षेत्रीय विविधता (Regional Diversity in Agriculture):-

    भारत की जलवायु, मिट्टी, स्थलाकृति एवं वर्षा में अत्यधिक विविधता होने के कारण प्रत्येक क्षेत्र का फसल प्रतिरूप भिन्न-भिन्न है। उत्तर भारत में गेहूँ, पूर्वी भारत में धान, पश्चिमी भारत में कपास तथा दक्षिण भारत में चाय, कॉफी एवं मसालों जैसी फसलें प्रमुख हैं। यह विविधता भारत की कृषि प्रणाली को विशिष्ट बनाती है।

2. खाद्यान्न फसलों का प्रभुत्व (Dominance of Food Crops):-

     भारत में खाद्य सुरक्षा की आवश्यकता तथा विशाल जनसंख्या के कारण धान, गेहूँ, मक्का, ज्वार, बाजरा एवं दालों जैसी खाद्यान्न फसलें कृषि क्षेत्र के बड़े भाग में उगाई जाती हैं। विशेष रूप से गंगा के मैदानी क्षेत्रों में धान एवं गेहूँ का प्रभुत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

3. मानसून पर निर्भरता (Dependence on Monsoon):-

     भारत की कृषि का एक बड़ा भाग आज भी दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर है। समय पर एवं पर्याप्त वर्षा होने पर अच्छी फसल प्राप्त होती है, जबकि कम या अनियमित वर्षा से उत्पादन प्रभावित होता है। इसलिए मानसून की अनिश्चितता भारत के फसल प्रतिरूप एवं कृषि उत्पादन दोनों को प्रभावित करती है।

4. बहुफसली कृषि (Multiple Cropping System):-

     सिंचाई सुविधाओं, उन्नत बीजों एवं आधुनिक कृषि तकनीकों के विकास से अनेक क्षेत्रों में वर्ष में दो या तीन फसलें उगाई जाती हैं। इससे भूमि का अधिकतम उपयोग होता है, कृषि उत्पादन बढ़ता है तथा फसल सघनता (Cropping Intensity) में वृद्धि होती है। पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

5. व्यावसायिक कृषि का विस्तार (Expansion of Commercial Agriculture):-

    बढ़ती बाजार मांग, कृषि तकनीक के विकास तथा बेहतर परिवहन सुविधाओं के कारण फल, सब्जियाँ, गन्ना, कपास, चाय, कॉफी, रबर, मसाले एवं बागवानी फसलों का क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है। इससे किसानों की आय में वृद्धि हुई है तथा भारतीय कृषि धीरे-धीरे व्यावसायिक स्वरूप ग्रहण कर रही है।

6. क्षेत्रीय विशिष्टीकरण (Regional Specialization):-

    भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्राकृतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार विशिष्ट फसलों का संकेन्द्रण पाया जाता है। उदाहरण के लिए, असम चाय उत्पादन, केरल रबर एवं मसालों, कर्नाटक कॉफी, पंजाब गेहूँ तथा महाराष्ट्र कपास उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यह क्षेत्रीय विशिष्टीकरण कृषि नियोजन, कृषि व्यापार एवं क्षेत्रीय विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत में फसल प्रतिरूप को प्रभावित करने वाले प्राकृतिक कारक

(Natural Factors Affecting Cropping Pattern in India)

(A) प्राकृतिक कारक

1. जलवायु (Climate):-

    जलवायु फसल प्रतिरूप का सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक कारक है। तापमान, वर्षा, आर्द्रता, सूर्य का प्रकाश तथा बढ़वार अवधि (Growing Season) विभिन्न फसलों की उपयुक्तता निर्धारित करते हैं। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में धान, चाय एवं जूट जैसी फसलें उगाई जाती हैं, जबकि कम वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूँ, ज्वार, बाजरा एवं दलहन की खेती अधिक होती है। इसी प्रकार तापमान एवं आर्द्रता के अंतर के कारण भारत के विभिन्न भागों में फसल प्रतिरूप में स्पष्ट क्षेत्रीय भिन्नता दिखाई देती है।

2. मिट्टी (Soil):-

     मिट्टी का प्रकार, उसकी उर्वरता, बनावट, जलधारण क्षमता तथा पोषक तत्व फसल प्रतिरूप को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ अलग-अलग फसलों के लिए उपयुक्त होती हैं। उदाहरण के लिए, जलोढ़ मिट्टी धान, गेहूँ एवं गन्ने के लिए उपयुक्त है, काली मिट्टी कपास के लिए, लाल मिट्टी मोटे अनाज एवं दलहनों के लिए तथा लेटराइट मिट्टी चाय, कॉफी एवं रबर जैसी बागानी फसलों के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

3. स्थलाकृति (Relief or Topography):-

    किसी क्षेत्र की ऊँचाई, ढाल तथा भौतिक संरचना भी फसल प्रतिरूप को प्रभावित करती है। समतल एवं उपजाऊ मैदानों में कृषि करना आसान होता है, इसलिए वहाँ धान, गेहूँ, गन्ना एवं अन्य खाद्यान्न फसलें प्रमुख होती हैं। इसके विपरीत पर्वतीय एवं ढाल वाले क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेती (Terrace Farming) की जाती है, जहाँ चाय, कॉफी, फल एवं बागवानी फसलों का अधिक विकास हुआ है। इस प्रकार स्थलाकृति कृषि पद्धति एवं फसल चयन दोनों को प्रभावित करती है।

4. जल उपलब्धता (Availability of Water):-

    जल की उपलब्धता फसल प्रतिरूप का एक प्रमुख निर्धारक कारक है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएँ विकसित हैं, वहाँ वर्ष में दो या तीन फसलें उगाई जाती हैं तथा धान, गन्ना एवं सब्जियों जैसी अधिक जल की आवश्यकता वाली फसलें सफलतापूर्वक उगाई जाती हैं। इसके विपरीत वर्षा-आश्रित क्षेत्रों में कम जल की आवश्यकता वाली फसलें, जैसे ज्वार, बाजरा, चना एवं दालें प्रमुख होती हैं। इसलिए सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से फसल प्रतिरूप में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिलता है।

(B) सामाजिक एवं आर्थिक कारक (Socio-Economic Factors)

1. जनसंख्या दबाव (Population Pressure):-

   जनसंख्या किसी भी क्षेत्र के फसल प्रतिरूप को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण सामाजिक कारक है। जिन क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व अधिक होता है, वहाँ खाद्यान्न फसलों जैसे धान, गेहूँ एवं मक्का को प्राथमिकता दी जाती है ताकि स्थानीय खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। दूसरी ओर, कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में व्यावसायिक एवं नकदी फसलों की खेती का विस्तार अपेक्षाकृत अधिक होता है।

2. बाजार (Market):-

   बाजार की मांग एवं मूल्य (Price) फसल प्रतिरूप को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। जिन फसलों की बाजार में अधिक मांग एवं अच्छा मूल्य मिलता है, किसान उनकी खेती को प्राथमिकता देते हैं। शहरी क्षेत्रों के निकट फल, सब्जियाँ, फूल तथा डेयरी से संबंधित फसलों का उत्पादन अधिक होता है, जबकि औद्योगिक क्षेत्रों में कपास, गन्ना एवं तंबाकू जैसी नकदी फसलों का विस्तार देखा जाता है।

3. परिवहन एवं संचार (Transport and Communication):-

    विकसित परिवहन एवं संचार सुविधाएँ कृषि उत्पादों को शीघ्र एवं सुरक्षित रूप से बाजार तक पहुँचाने में सहायता करती हैं। सड़क, रेल एवं शीत-श्रृंखला (Cold Chain) जैसी सुविधाओं के विकास से शीघ्र नष्ट होने वाली फसलों, जैसे फल, सब्जियाँ एवं फूलों की खेती को बढ़ावा मिलता है। इसलिए बेहतर परिवहन व्यवस्था वाले क्षेत्रों में व्यावसायिक कृषि का अधिक विकास होता है।

4. सरकारी नीतियाँ (Government Policies):-

     सरकार की कृषि नीतियाँ फसल प्रतिरूप को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), कृषि सब्सिडी, फसल बीमा, सिंचाई योजनाएँ, उर्वरक सहायता, कृषि ऋण तथा विभिन्न सरकारी योजनाएँ किसानों को विशेष फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करती हैं। इसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में फसल प्रतिरूप में परिवर्तन देखने को मिलता है।

5. तकनीकी विकास (Technological Development):-

    आधुनिक कृषि तकनीकों ने भारत के फसल प्रतिरूप में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं। उच्च उपज देने वाली किस्में (HYV Seeds), रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, कृषि यंत्रीकरण, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई तथा आधुनिक कृषि उपकरणों के उपयोग से उत्पादकता में वृद्धि हुई है। इन तकनीकों के कारण किसान पारंपरिक फसलों के स्थान पर अधिक लाभदायक एवं व्यावसायिक फसलों की खेती अपनाने लगे हैं, जिससे कृषि का आधुनिकीकरण एवं फसल विविधीकरण दोनों को बढ़ावा मिला है।

भारत की प्रमुख फसल ऋतुएँ
फसल ऋतु बुवाई कटाई प्रमुख फसलें
खरीफ जून–जुलाई सितंबर–अक्टूबर धान, मक्का, बाजरा, कपास, सोयाबीन
रबी अक्टूबर–नवंबर मार्च–अप्रैल गेहूँ, चना, सरसों, जौ
जायद मार्च–अप्रैल जून तरबूज, खरबूज, खीरा, सब्जियाँ

भारत में प्रमुख फसल प्रतिरूप

1. धान प्रधान प्रतिरूप- पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, ओडिशा, छत्तीसगढ़

2. गेहूँ प्रधान प्रतिरूप- पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश,

3. कपास प्रतिरूप- महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना

4. गन्ना प्रतिरूप- उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक

5. चाय प्रतिरूप- असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु,

6. कॉफी प्रतिरूप- कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु

भारत में फसल प्रतिरूप की समस्याएँ (Problems of Cropping Pattern in India)

1. मानसून पर अत्यधिक निर्भरता (Excessive Dependence on Monsoon):-

    भारत के लगभग आधे कृषि क्षेत्र आज भी वर्षा आधारित (Rainfed) कृषि पर निर्भर हैं। यदि मानसून समय पर न आए या वर्षा कम अथवा असमान हो, तो फसल उत्पादन प्रभावित होता है। इससे फसल प्रतिरूप में अस्थिरता आती है तथा किसानों को आर्थिक हानि उठानी पड़ती है।

2. भूमि जोतों का छोटा आकार (Small and Fragmented Land Holdings):-

    भारत में अधिकांश किसानों के पास छोटे एवं बिखरे हुए कृषि जोत हैं। छोटी जोतों के कारण आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग, यंत्रीकरण तथा फसल विविधीकरण कठिन हो जाता है। परिणामस्वरूप किसान पारंपरिक फसलों की खेती तक सीमित रह जाते हैं।

3. सिंचाई सुविधाओं का असमान वितरण (Unequal Distribution of Irrigation Facilities):-

     देश के सभी क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएँ समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सिंचाई का व्यापक विकास हुआ है, जबकि पूर्वी एवं मध्य भारत के अनेक क्षेत्र आज भी वर्षा पर निर्भर हैं। इससे विभिन्न क्षेत्रों के फसल प्रतिरूप में असमानता उत्पन्न होती है।

4. मृदा क्षरण एवं उर्वरता में कमी (Soil Erosion and Declining Soil Fertility):-

    लगातार एक ही फसल की खेती (Monocropping), रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग, वनों की कटाई तथा जल एवं वायु अपरदन के कारण मिट्टी की उर्वरता कम होती जा रही है। इससे कृषि उत्पादकता घटती है और फसल प्रतिरूप पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

5. जलवायु परिवर्तन (Climate Change):-

     तापमान में वृद्धि, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाएँ फसल प्रतिरूप को प्रभावित कर रही हैं। बदलती जलवायु के कारण कई क्षेत्रों में पारंपरिक फसलें कम उपयुक्त होती जा रही हैं, जिससे किसानों को नई फसलों की ओर जाना पड़ रहा है।

6. नकदी फसलों पर बढ़ती निर्भरता (Increasing Dependence on Cash Crops):-

   अधिक लाभ प्राप्त करने की इच्छा से किसान खाद्यान्न फसलों की अपेक्षा गन्ना, कपास, तंबाकू, गन्ना, सोयाबीन एवं अन्य नकदी फसलों की खेती को प्राथमिकता देने लगे हैं। इससे कई क्षेत्रों में खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होता है तथा खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

7. कृषि लागत में वृद्धि (Rising Cost of Cultivation):-

     बीज, उर्वरक, कीटनाशक, डीज़ल, बिजली, सिंचाई तथा कृषि मशीनों की बढ़ती लागत के कारण खेती महँगी होती जा रही है। सीमांत एवं छोटे किसानों के लिए नई फसलें अपनाना कठिन हो जाता है, जिससे फसल प्रतिरूप में संतुलित परिवर्तन नहीं हो पाता और कृषि की लाभप्रदता भी प्रभावित होती है।

निष्कर्ष:

    भारत का फसल प्रतिरूप प्राकृतिक संसाधनों, जलवायु, मिट्टी, सिंचाई, बाजार, तकनीकी विकास तथा सरकारी नीतियों का संयुक्त परिणाम है। हरित क्रांति, सिंचाई विस्तार एवं कृषि आधुनिकीकरण के कारण इसमें महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। वर्तमान समय में फसल विविधीकरण, जल संरक्षण, सतत कृषि एवं जलवायु-अनुकूल कृषि प्रणाली को अपनाकर भारत के फसल प्रतिरूप को अधिक संतुलित, उत्पादक एवं टिकाऊ बनाया जा सकता है। यह खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय वृद्धि तथा ग्रामीण विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

23. Petro-Chemical Complexes with Reference to India / पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स : भारत के संदर्भ में

Petro-Chemical Complexes with Reference to India 

पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स : भारत के संदर्भ में

Petro-Chemical Complexes

परिचय:

     पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स वे एकीकृत औद्योगिक परिसर हैं जहाँ कच्चे तेल (Crude Oil) अथवा प्राकृतिक गैस से विभिन्न आधारभूत एवं उच्च मूल्य के रासायनिक उत्पादों का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। ये कॉम्प्लेक्स आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था के केंद्रीय स्तंभ माने जाते हैं, क्योंकि इनके उत्पाद प्लास्टिक, सिंथेटिक फाइबर, रबर, उर्वरक, डिटर्जेंट, पेंट, दवा, पैकेजिंग, ऑटोमोबाइल तथा इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे अनेक उद्योगों के लिए कच्चा माल प्रदान करते हैं।

     भारत में पेट्रोकेमिकल उद्योग का विकास 1960 के दशक में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से प्रारंभ हुआ, परंतु 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद निजी क्षेत्र की भागीदारी और विदेशी निवेश के कारण इस क्षेत्र में तीव्र वृद्धि हुई। आज भारत विश्व के प्रमुख पेट्रोकेमिकल उपभोक्ता और उत्पादक देशों में सम्मिलित है।

पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स की संरचना 

    पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स सामान्यतः तीन स्तरों में विभाजित होते हैं:

(1) अपस्ट्रीम (Upstream):-

     इस चरण में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का अन्वेषण एवं उत्पादन किया जाता है। रिफाइनरी में कच्चे तेल का आसवन कर विभिन्न अंश प्राप्त किए जाते हैं, जैसे- नेफ्था, एलपीजी, एथेन आदि। यही पदार्थ आगे पेट्रोकेमिकल उत्पादन के लिए फीडस्टॉक के रूप में प्रयुक्त होते हैं।

(2) मिडस्ट्रीम (Midstream):-

     इस चरण में क्रैकिंग प्रक्रिया द्वारा नेफ्था या गैस को तोड़कर एथिलीन, प्रोपिलीन, ब्यूटाडीन जैसे ओलेफिन तथा बेंजीन, टोल्यून, जाइलिन जैसे एरोमैटिक्स तैयार किए जाते हैं। ये आधारभूत रसायन आगे पॉलीमर उत्पादन में प्रयुक्त होते हैं।

(3) डाउनस्ट्रीम (Downstream):-

     इस चरण में पॉलीइथिलीन (PE), पॉलीप्रोपिलीन (PP), पॉलीविनाइल क्लोराइड (PVC), सिंथेटिक रबर, पॉलिएस्टर फाइबर, प्लास्टिक उत्पाद आदि का निर्माण होता है। यही उत्पाद उपभोक्ता वस्तुओं और औद्योगिक उत्पादों में उपयोग किए जाते हैं।

भारत के प्रमुख पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स

1. जामनगर (गुजरात):-

     जामनगर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित भारत का सबसे प्रमुख रिफाइनरी एवं पेट्रोकेमिकल केंद्र है। यहाँ विश्व के सबसे बड़े एकीकृत रिफाइनरी परिसरों में से एक स्थापित है, जिसका संचालन Reliance Industries द्वारा किया जाता है। जामनगर परिसर में दो विशाल रिफाइनरियाँ तथा उन्नत पेट्रोकेमिकल इकाइयाँ कार्यरत हैं।

     इस कॉम्प्लेक्स की प्रमुख विशेषता Oil-to-Chemicals (O2C) मॉडल है, जिसमें कच्चे तेल को रिफाइन कर सीधे उच्च मूल्य वाले रसायनों और पॉलिमर उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है। यहाँ एथिलीन, प्रोपिलीन, पॉलीइथिलीन, पॉलीप्रोपिलीन, एरोमैटिक्स तथा विभिन्न स्पेशलिटी केमिकल्स का उत्पादन होता है।

      जामनगर की तटीय स्थिति और आधुनिक बंदरगाह सुविधा के कारण कच्चे तेल का आयात और तैयार उत्पादों का निर्यात अत्यंत सुगम है। यह परिसर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात आय और औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

      उन्नत तकनीक, डिजिटल नियंत्रण प्रणाली और पर्यावरणीय मानकों के पालन के कारण जामनगर पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी माना जाता है। यह भारत को विश्व पेट्रोकेमिकल मानचित्र पर एक प्रमुख स्थान दिलाने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।

2. पानीपत (हरियाणा):-   

     पानीपत हरियाणा राज्य में स्थित उत्तर भारत का एक प्रमुख रिफाइनरी एवं पेट्रोकेमिकल केंद्र है। यहाँ स्थित पानीपत रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स का संचालन Indian Oil Corporation (IOCL) द्वारा किया जाता है। यह भारत की सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन एवं रिफाइनिंग कंपनी है।

    पानीपत कॉम्प्लेक्स की विशेषता इसकी नाफ्था क्रैकर इकाई है, जो एथिलीन और प्रोपिलीन जैसे आधारभूत पेट्रोकेमिकल्स का उत्पादन करती है। इन्हीं रसायनों से पॉलीइथिलीन, पॉलीप्रोपिलीन और अन्य पॉलिमर तैयार किए जाते हैं, जो प्लास्टिक, पैकेजिंग, ऑटोमोबाइल, वस्त्र एवं उपभोक्ता उद्योगों में व्यापक रूप से उपयोग होते हैं।

    यह कॉम्प्लेक्स राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) और उत्तर भारत के औद्योगिक बाजारों के निकट स्थित है, जिससे तैयार उत्पादों की आपूर्ति सुगम होती है। साथ ही, यह क्षेत्र रेल और सड़क नेटवर्क से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

     पानीपत पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स ने क्षेत्रीय आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और औद्योगिक आत्मनिर्भरता में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आधुनिक तकनीक, ऊर्जा दक्षता और पर्यावरणीय मानकों के पालन के कारण यह भारत के प्रमुख एकीकृत पेट्रोकेमिकल परिसरों में गिना जाता है।

3. दाहेज (गुजरात):-

      दाहेज गुजरात राज्य के भरूच (Bharuch) जिले में खंभात की खाड़ी (Gulf of Khambhat) के तट पर स्थित है। इसकी समुद्री स्थिति इसे एक प्रमुख औद्योगिक और बंदरगाह केंद्र बनाती है। यहाँ गहरे पानी का बंदरगाह (Deep Draft Port) उपलब्ध है, जिससे बड़े जहाज सीधे कच्चा माल और तैयार माल का परिवहन कर सकते हैं।

  अर्थात Dahej क्षेत्र को PCPIR (Petroleum, Chemicals and Petrochemical Investment Region) के रूप में विकसित किया गया है। यह क्लस्टर आधारित औद्योगिक मॉडल का उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ LNG टर्मिनल, बंदरगाह सुविधा और अनेक केमिकल इकाइयाँ स्थित हैं। यह भारत के सबसे बड़े निवेश आकर्षण क्षेत्रों में से एक है।

4. हल्दिया (पश्चिम बंगाल):-

    हल्दिया पश्चिम बंगाल के पूर्वी मेदिनीपुर जिले में स्थित एक प्रमुख औद्योगिक एवं पेट्रोकेमिकल केंद्र है। यहाँ Haldia Petrochemicals Limited कार्यरत है, जो पॉलीइथिलीन, पॉलीप्रोपिलीन तथा अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पादों का निर्माण करती है। हल्दिया बंदरगाह (Haldia Dock Complex) की उपलब्धता के कारण कच्चे माल का आयात और तैयार उत्पादों का निर्यात सुगम है। यह पूर्वी एवं उत्तर-पूर्वी भारत के लिए पेट्रोकेमिकल आपूर्ति का महत्वपूर्ण आधार है तथा क्षेत्रीय औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

5. हजीरा (गुजरात):- 

      हजीरा गुजरात राज्य के सूरत जिले में अरब सागर के तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण औद्योगिक एवं पेट्रोकेमिकल केंद्र है। इसकी तटीय स्थिति और विकसित बंदरगाह सुविधा इसे कच्चे माल के आयात तथा तैयार उत्पादों के निर्यात के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाती है।

     हजीरा में गैस आधारित पेट्रोकेमिकल इकाइयाँ प्रमुख हैं। यहाँ Oil and Natural Gas Corporation (ONGC) की गैस प्रसंस्करण इकाइयाँ तथा अन्य निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियाँ कार्यरत हैं। प्राकृतिक गैस की उपलब्धता के कारण यहाँ एथिलीन, प्रोपिलीन तथा विभिन्न पॉलिमर उत्पादों का निर्माण होता है।

    हजीरा औद्योगिक क्षेत्र दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर (DMIC) से जुड़ा हुआ है, जिससे परिवहन एवं लॉजिस्टिक सुविधाएँ मजबूत हुई हैं। यह क्षेत्र गुजरात को भारत का अग्रणी पेट्रोकेमिकल हब बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    इसके अतिरिक्त, हजीरा क्षेत्र में पर्यावरणीय प्रबंधन, आधुनिक अवसंरचना तथा ऊर्जा आपूर्ति की बेहतर व्यवस्था उपलब्ध है, जिससे यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय निवेश के लिए आकर्षक केंद्र बना हुआ है।

पेट्रो-केमिकल कॉम्प्लेक्स के प्रमुख उत्पाद:

✍️ प्लास्टिक और पॉलिमर: पॉलीइथाइलीन (PE), पॉलीप्रोपाइलीन (PP), पॉलिविनाइल क्लोराइड (PVC), पॉलीस्टाइनिन (PS)।

✍️ सिंथेटिक फाइबर: पॉलिएस्टर, नायलॉन, ऐक्रेलिक (कपड़ा उद्योग के लिए)।

✍️ सिंथेटिक रबर: टायर और ऑटोमोबाइल पार्ट्स के लिए।

✍️ औद्योगिक रसायन: एथिलीन ग्लाइकॉल, एसिड, एसीटोन, और सॉल्वैंट्स।

✍️ अन्य: उर्वरक (यूरिया), डिटर्जेंट, पेंट, और डिटर्जेंट के लिए कच्चे माल।

    इन परिसरों में नेफ्था या गैस को स्टीम क्रैकिंग प्रक्रिया के माध्यम से इन उत्पादों में बदला जाता है, जो आधुनिक विनिर्माण की नींव हैं।

भारत के प्रमुख पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स के स्थान चयन के कारक:

(i) कच्चे माल की उपलब्धता – नेफ्था, प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल की निकटता उत्पादन लागत को कम करती है।

(ii) तटीय स्थिति एवं बंदरगाह – आयात–निर्यात सुविधा हेतु गहरे पानी के बंदरगाह आवश्यक होते हैं (जैसे गुजरात तट)।

(iii) ऊर्जा संसाधन – पेट्रोकेमिकल उद्योग ऊर्जा-गहन है, इसलिए बिजली एवं गैस की निरंतर आपूर्ति जरूरी है।

(iv) जल उपलब्धता – शीतलन (Cooling) एवं औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए पर्याप्त जल की आवश्यकता होती है।

(v) परिवहन सुविधा – सड़क, रेल, पाइपलाइन एवं बंदरगाह नेटवर्क से जुड़ाव लागत घटाता है।

(vi) बाजार की निकटता – तैयार उत्पादों की खपत के लिए बड़े औद्योगिक एवं शहरी बाजार महत्वपूर्ण हैं।

(vii) सरकारी नीतिगत समर्थन – PCPIR /Petroleum, Chemicals and Petrochemicals Investment Region, औद्योगिक कॉरिडोर और कर प्रोत्साहन स्थान चयन को प्रभावित करते हैं।

(viii) भूमि एवं अवसंरचना – बड़े भू-क्षेत्र और विकसित औद्योगिक ढाँचा आवश्यक होता है।

आर्थिक महत्व:

✍️ विनिर्माण GDP में महत्वपूर्ण योगदान।

✍️ प्लास्टिक, ऑटोमोबाइल, वस्त्र, पैकेजिंग एवं फार्मा उद्योग को कच्चा माल उपलब्ध कराना।

✍️ निर्यात आय में वृद्धि।

✍️ प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन।

✍️ MSME / Ministry of Micro, Small and Medium Enterprises क्षेत्र को किफायती कच्चा माल।

✍️ औद्योगिक आत्मनिर्भरता और आयात प्रतिस्थापन को बढ़ावा।

सरकारी नीतियाँ:

✍️ PCPIR (Petroleum, Chemicals & Petrochemical Investment Region) नीति।

✍️ मेक इन इंडिया पहल।

✍️ आत्मनिर्भर भारत अभियान।

✍️ उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ।

✍️ विदेशी निवेश (FDI) को प्रोत्साहन।

✍️ औद्योगिक कॉरिडोर (DMIC आदि) का विकास।

पर्यावरणीय प्रभाव:

✍️ वायु प्रदूषण (SOx, NOx, CO₂ उत्सर्जन)।

✍️ जल प्रदूषण एवं रासायनिक अपशिष्ट।

✍️ ठोस एवं खतरनाक कचरा।

✍️ ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन।

✍️ समुद्री एवं तटीय पारिस्थितिकी पर प्रभाव।

✍️ समाधान हेतु ग्रीन टेक्नोलॉजी और रीसाइक्लिंग की आवश्यकता।

चुनौतियाँ: 

✍️ कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव।

✍️ उच्च पूंजी निवेश की आवश्यकता।

✍️ वैश्विक प्रतिस्पर्धा।

✍️ पर्यावरणीय नियमों का कड़ाई से पालन।

✍️ तकनीकी निर्भरता और नवाचार की कमी।

✍️ प्लास्टिक उपयोग पर वैश्विक प्रतिबंधों का प्रभाव।

भविष्य की संभावनाएँ:  

✍️ Oil-to-Chemicals (O2C) मॉडल का विस्तार।

✍️ स्पेशलिटी केमिकल्स उत्पादन में वृद्धि।

✍️ बायो-पेट्रोकेमिकल्स का विकास।

✍️ निर्यात उन्मुख उत्पादन रणनीति।

✍️ डिजिटल ऑटोमेशन और ऊर्जा दक्षता।

✍️ सर्कुलर इकोनॉमी और ग्रीन टेक्नोलॉजी को अपनाना।

निष्कर्ष:

      पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स भारत की औद्योगिक संरचना के महत्वपूर्ण आधार हैं। ये न केवल आर्थिक विकास को गति देते हैं, बल्कि रोजगार, निर्यात और औद्योगिक आत्मनिर्भरता को भी सुदृढ़ करते हैं। उचित नीति, पर्यावरण संतुलन और तकनीकी नवाचार के माध्यम से भारत इस क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

12. Sugar Industry of India and Bihar / भारत एवं बिहार का चीनी उद्योग

Sugar Industry of India and Bihar

 भारत एवं बिहार का चीनी उद्योग




Sugar Industry of India and Bihar

परिचय

     भारत का चीनी उद्योग एक प्रमुख कृषि आधारित उद्योग है, जो मुख्यतः गन्ने पर निर्भर करता है। भारत विश्व के प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में शामिल है और यह उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार सृजन तथा सहायक उद्योगों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। देश में चीनी उद्योग के दो प्रमुख क्षेत्र उत्तर भारत और दक्षिण भारत पाए जाते हैं।

     बिहार में चीनी उद्योग मुख्यतः गंगा के मैदानी क्षेत्र, विशेषकर उत्तर बिहार में विकसित हुआ है। यहाँ की उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी, पर्याप्त जल संसाधन और गन्ने की उपलब्धता इसके विकास के प्रमुख कारण हैं। उचित आधुनिकीकरण से यह उद्योग राज्य की अर्थव्यवस्था को और सशक्त बना सकता है।

भारत में चीनी उद्योग

स्थिति

✍️ भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है।

✍️ पहला स्थान: ब्राज़ील

✍️ भारत में चीनी उद्योग मुख्यतः उत्तर भारत और दक्षिण भारत में विकसित है।

कच्चा माल

✍️ गन्ना

✍️ गन्ना भारी एवं शीघ्र नष्ट होने वाला होता है, इसलिए चीनी मिलें गन्ना उत्पादक क्षेत्रों के पास स्थापित की जाती हैं।

चीनी उद्योग के प्रमुख क्षेत्र

(i) उत्तर भारतीय चीनी क्षेत्र- 

      उत्तर भारत का चीनी क्षेत्र भारत का प्रमुख गन्ना-उत्पादक एवं चीनी-निर्माण क्षेत्र है। इसमें मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड शामिल हैं। यहाँ की जलोढ़ मिट्टी, उपजाऊ मैदान, पर्याप्त वर्षा तथा नहरों व नलकूपों से सिंचाई की सुविधा गन्ने की खेती के लिए अनुकूल है। रेल-सड़क परिवहन, सस्ती श्रमशक्ति और बड़े उपभोक्ता बाजार के कारण इस क्षेत्र में चीनी उद्योग का तीव्र विकास हुआ है।

विशेषताएँ:

✍️ पुरानी मिलें

✍️ छोटे आकार की मिलें

✍️ कम तापमान के कारण गन्ने में शर्करा कम

(ii) दक्षिण भारतीय चीनी क्षेत्र– 

      दक्षिण भारतीय चीनी क्षेत्र भारत का एक प्रमुख चीनी उत्पादन क्षेत्र है। इसमें मुख्यतः महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना शामिल हैं। यहाँ उष्णकटिबंधीय जलवायु, पर्याप्त तापमान, लंबी फसल अवधि और सिंचाई सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जो गन्ने की खेती के लिए अनुकूल हैं। कृष्णा, गोदावरी और कावेरी नदियों से सिंचाई होती है। आधुनिक तकनीक, सहकारी मिलें और अधिक उत्पादक किस्में इस क्षेत्र को चीनी उद्योग में अग्रणी बनाती हैं।

विशेषताएँ:

✍️ नई और आधुनिक मिलें

✍️ बड़े आकार की मिलें

✍️ अधिक तापमान → गन्ने में शर्करा अधिक

✍️ उत्पादकता अधिक

भारत में चीनी उद्योग के प्रमुख राज्य

1. उत्तर प्रदेश (प्रथम स्थान)

2. महाराष्ट्र

3. कर्नाटक

4. तमिलनाडु

5. बिहार

भारत में चीनी उद्योग की समस्याएँ

✍️ गन्ने की अनियमित आपूर्ति

✍️ पुरानी तकनीक

✍️ उच्च उत्पादन लागत

✍️ किसानों को भुगतान में देरी

✍️ जल संकट (विशेषकर महाराष्ट्र)

भारत में चीनी उद्योग का महत्व:

      भारत में चीनी उद्योग का विशेष महत्व है। यह कृषि-आधारित उद्योग गन्ना किसानों को नियमित आय और रोजगार प्रदान करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगीकरण को बढ़ावा देकर यह आर्थिक विकास में सहायक है। इस उद्योग से चीनी के साथ-साथ गुड़, शीरा, एथेनॉल और विद्युत उत्पादन भी होता है। यह खाद्य सुरक्षा, निर्यात आय तथा परिवहन, व्यापार और सहायक उद्योगों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

बिहार में चीनी उद्योग

परिचय

      बिहार में चीनी उद्योग कृषि-आधारित उद्योगों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी, पर्याप्त वर्षा और गंगा व उसकी सहायक नदियों के मैदान गन्ने की खेती के लिए अनुकूल हैं। प्रमुख चीनी मिलें पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सीवान, सारण और मुजफ्फरपुर जिलों में स्थित हैं। स्वतंत्रता के बाद कई सरकारी और सहकारी चीनी मिलों की स्थापना हुई, जिससे ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा मिला। हालाँकि, कच्चे माल की कमी, पुरानी तकनीक, प्रबंधन की समस्याएँ और वित्तीय संकट के कारण कई मिलें बंद हो गईं। वर्तमान में आधुनिकीकरण और निजी निवेश से उद्योग को पुनर्जीवित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

✍️ बिहार में किसी समय पर करीब 130 चीनी मिलें थीं, लेकिन उनमें से अब लगभग 9 से कम ही सक्रिय मिलें हैं जो गन्ना क्रशिंग/उत्पादन कर रही हैं।

✍️ वर्तमान सरकार ने बंद मिलों को पुनर्जीवित करने और 25 मिलों की कुल गतिविधि बढ़ाने की योजना बनाई है; इस योजना के अंतर्गत कई मिलों को चालू किया जाना है, पर वे अभी तक पूर्ण रूप से चालू नहीं हुईं।

स्थिति

✍️ बिहार उत्तर भारत का प्रमुख चीनी उत्पादक राज्य है।

✍️ गंगा के मैदानी क्षेत्र में गन्ने की अच्छी खेती होती है।

✍️ स्वतंत्रता के बाद बिहार में चीनी उद्योग का अच्छा विकास हुआ।

✍️ गन्ना उत्पादक क्षेत्र: पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, गोपालगंज, सारण, मुज़फ्फरपुर

बिहार की प्रमुख चीनी मिलें

✍️ बगहा, लौरिया, मझौलिया, नरकटियागंज और रामनगर चीनी मिल- प. चंपारण

✍️ हसनपुर चीनी मिल- समस्तीपुर

✍️ हरिनगर, सिधवलिया चीनी मिल- गोपालगंज

बिहार में चीनी उद्योग के विकास के कारण:

✍️ उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी

✍️ पर्याप्त जल संसाधन

✍️ सस्ती श्रम शक्ति

✍️ गन्ने की स्थानीय उपलब्धता

✍️ बाजार की नजदीकी

बिहार में चीनी उद्योग की समस्याएँ

✍️ कई मिलों का बंद होना

✍️ पूँजी की कमी

✍️ पुरानी मशीनें

✍️ प्रबंधन की कमजोरी

✍️ किसानों को समय पर भुगतान नहीं

बिहार में चीनी उद्योग का महत्व:

✍️ ग्रामीण रोजगार का साधन

✍️ किसानों की आय में वृद्धि

✍️ सहायक उद्योगों का विकास

✍️ राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान

भारत एवं बिहार के चीनी उद्योग की तुलना:

बिंदु भारत बिहार
स्तर राष्ट्रीय राज्यीय
प्रमुख राज्य यूपी, महाराष्ट्र पश्चिम चंपारण आदि
तकनीक मिश्रित (नई+पुरानी) अधिकांशतः पुरानी
उत्पादन बहुत अधिक मध्यम
समस्याएँ लागत, जल बंद मिलें, पूँजी

निष्कर्ष:

       भारत का चीनी उद्योग देश का एक प्रमुख कृषि-आधारित उद्योग है, जो गन्ना उत्पादन पर आधारित होने के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाता है। यह उद्योग रोजगार सृजन, किसानों की आय वृद्धि तथा सह-उत्पादों जैसे शीरा, बगास और इथेनॉल के माध्यम से औद्योगिक विकास में योगदान देता है। बिहार में अनुकूल जलवायु, उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी और गंगा के मैदानी क्षेत्र के कारण चीनी उद्योग के विकास की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। हालाँकि, पूँजी की कमी, पुरानी तकनीक और बंद पड़ी मिलें प्रमुख बाधाएँ हैं। यदि आधुनिकीकरण, बेहतर प्रबंधन और सरकारी सहयोग मिले, तो बिहार का चीनी उद्योग पुनः विकास की नई ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकता है।

26. Physical features of India (भारत का भौतिक स्वरूप)

Physical features of India

(भारत का भौतिक स्वरूप)



1. एक स्थलीय भाग जो तीन ओर से समुद्र से घिरा हो- 

(क) तट

(ख) द्वीप 

(ग) प्रायद्वीप

(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं

2. भारत के पूर्वी भाग में म्यांमार की सीमा का निर्धारण करने वाले पर्वतों का संयुक्त नाम-

(क) हिमाचल

(ख) उत्तराखंड

(ग) पूर्वांचल

(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं

3. गोवा के दक्षिण में स्थित पश्चिमी तटीय पट्टी को क्या कहा जाता है?

(क) कोरोमंडल तट

(ख) कोंकण तट

(ग) कन्नड़ तट

(घ) उत्तरी सरकार

4. पूर्वी घाट की सर्वोच्च शिखर- 

(क) अनई मुडी

(ख) कंचनजंगा

(ग) महेंद्रगिरि

(घ) खासी

5. भूगर्भ वैज्ञानिक के अनुसार, निम्नलिखित में से कौन-से पृथ्वी की सतह पर प्राचीन भूभाग हैं?

(क) हिमालय

(ख) प्रायद्वीपीय पठार

(ग) थार रेगिस्तान

(घ) अंडमान और निकोबार

6. निम्न में से कौन हिमालय की विशेषता नहीं है?

(क) बहुत युवा स्थलाकृति हैं। 

(ख ) यहाँ गहरी घाटियाँ हैं। 

(ग) यहाँ ऊँची शिखर (चोटियाँ) हैं।  

(घ) यहाँ पर नदियाँ धीमी गति से बहती हैं। 

7. निम्नलिखित में से कौन सा प्रायद्वीपीय पठार की विशेषता नहीं है?

(क) यह आग्नेय और कायांतरित चट्टानों से बना है।

(ख) यहाँ पर पहाड़ियों की ढाल कम हैं। 

(ग) यहाँ गहरी घाटियाँ है। 

(घ) यहाँ चौड़ी घाटियाँ हैं। 

8. भौतिक विशेषताओं के आधार पर भारत को कितने भौगोलिक भागों में बांटा गया है?

(क) 3

(ख) 5

(ग) 6

(घ) 8

9. कश्मीर में हिमालय की चौड़ाई लगभग कितनी है?

(क) 150 किमी

(ख) 250 किमी

(ग) 400 किमी

(घ) 450 किमी

10. हिमालय की सबसे उत्तरी श्रृंखला को किस नाम से भी जाना जाता है?

(क) महान (वृहत)  हिमालय

(ख) आतंरिक हिमालय

(ग) हिमाद्रि

(घ) उपरोक्त सभी

11. महान हिमालय की औसत ऊंचाई लगभग कितनी है?

(क) 5000 मीटर

(ख) 6000 मीटर

(ग) 7000 मीटर

(घ) 8000 मीटर

12. निम्नलिखित में से कौन-सी सबसे उत्तरी पर्वत श्रृंखला है?

(क) कुनलुन पर्वत

(ख) काराकोरम

(ग) लद्दाख

(घ) जस्कर

13. निम्नलिखित में से कौन-सी सबसे उत्तरी पर्वत श्रृंखला है?

(क) कैलाश श्रृंखला 

(ख) काराकोरम

(ग) लद्दाख

(घ) जस्कर

14. निम्नलिखित में से कौन-सी सबसे पश्चिमी पर्वत श्रृंखला है?

(क) सुलेमान रेंज

(ख) गारो

(ग) खासी

(घ) पटकाई रेंज

15. निम्नलिखित में से कौन-सी सबसे पूर्वी पर्वत श्रृंखला है?

(क) नागा

(ख) गारो

(ख) मिजो पहाड़ियाँ

(घ) पटकाई रेंज

16. निम्नलिखित में से कौन-सी सबसे उत्तरी पहाड़ी है?

(क) नमचा बरवा

(ख) पटकाई बम

(ग) नागा हिल्स

(घ) मिजो पहाड़ियाँ

17. निम्नलिखित में से कौन-सी भारत की सबसे ऊँची पर्वत चोटी है?

(क) माउंट एवरेस्ट

(ख) कंचनजंगा

(ग) मकालू

(घ) नंदा देवी

18. निम्न में से कौन सा हिमनद महान हिमालय में स्थित है?

(क) गंगोत्री

(ख) कामेट

(ग) मिलाप

(घ) उपरोक्त सभी

19. निम्न में से कौन सा पर्वतीय दर्रा महान हिमालय से है?

(क) शिपकिला

(ख) नाथुला

(ग) बोमडिला

(घ)  उपरोक्त सभी

20. निम्नलिखित में से कौन सा सुमेलित नहीं है?

(क) कंचनजंगा-सिक्किम

(ख) नंगा पर्वत-उत्तराखंड

(ग) कामेट-उत्तराखंड

(घ) नंदा देवी-उत्तराखंड

21. निम्नलिखित में से किस हिमालय श्रृंखला की ऊँचाई 3,700 और 4,500 मीटर के बीच है और औसत चौड़ाई 50 किमी है?

(क) महान हिमालय

(ख) हिमाचल हिमालय

(ग) हिमाद्री रेंज

(घ) शिवालिक रेंज

22. निम्न में से कौन सी श्रेणी निम्न हिमालय में नहीं है?

(क) पीर पंजाल शृंखला 

(ख) धौला धार

(ग) महाभारत शृंखला 

(घ) जास्कर शृंखला 

23. निम्न हिमालय (हिमाचल हिमालय) में निम्न में से कौन सी श्रेणी सबसे लंबी और सबसे महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखला है?

(क) पीर पंजाल रेंज

(ख) धौला धार

(ग) महाभारत रेंज

(घ) जास्कर रेंज

24. निम्नलिखित में से कौन सी पर्वतमाला श्रृंखला अपने पहाड़ी नगरों (हिल स्टेशनों) के लिए प्रसिद्ध है?

(क) महान हिमालय

(ख) हिमाचल हिमालय

(ग) हिमाद्री पर्वत श्रृंखला 

(घ) शिवालिक पर्वत श्रृंखला 

25. कश्मीर, कांगड़ा और कुल्लू की प्रसिद्ध घाटियाँ निम्नलिखित में से किस पर्वत श्रृंखला में पाई जाती हैं?

(क) महान हिमालय

(ख) हिमाचल हिमालय

(ग) हिमाद्री शृंखला 

(घ) शिवालिक शृंखला 

26. कश्मीर घाटी किस पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित है?

(क) जास्कर और महान हिमालय

(ख) महान हिमालय और पीर पंजाल शृंखला 

(ग) पीर पंजाल और शिवालिक शृंखला 

(घ) हिमाचल हिमालय और शिवालिक शृंखला 

27. अरुणाचल प्रदेश में हिमालय की चौड़ाई लगभग कितनी है?

(क) 150 किमी

(ख) 250 किमी

(ग) 400 किमी

(घ) 450 किमी

28. हिमालय की सबसे दक्षिणी पर्वत श्रृंखला को क्या कहते है?

(क) महान हिमालय

(ख) हिमाचल हिमालय

(ग) हिमाद्री रेंज

(घ) शिवालिक रेंज

29. निम्नलिखित में से कौन सा पहाड़ी नगर (हिल स्टेशन) उत्तराखंड से नहीं है?

(क) मसूरी

(ख) नैनीताल

(ग) शिमला

(घ) रानीखेत

30. निम्नलिखित में से कौन सी पर्वत श्रृंखला सबसे दक्षिणी श्रेणी है?

(क) विंध्य रेंज

(ख) सतपुड़ा रेंज

(ग) गिर रेंज

(घ) महादेव हिल्स

31. लघु हिमालय और शिवालिक के बीच स्थित लंबवत घाटी को क्या कहते है?

(क) श्रृंखला 

(ख) दर्रा 

(ग) घाटी

(घ) दून 

32. सिंधु और सतलुज के बीच स्थित हिमालय के भाग को क्या कहा जाता है?

(क) पंजाब हिमालय

(ख) हिमाचल हिमालय

(ग) कश्मीर हिमालय

(घ) उपरोक्त सभी

33. सतलुज और काली नदी के बीच स्थित हिमालय के भाग को क्या कहा जाता है?

(क) पंजाब हिमालय

(ख) हिमाचल हिमालय

(ग) नेपाल हिमालय

(घ) कुमाऊं हिमालय

34. काली और तीस्ता नदियों के बीच स्थित हिमालय के भाग को क्या कहा जाता है?

(क) असम हिमालय

(ख) हिमाचल हिमालय

(ग) नेपाल हिमालय

(घ) कुमाऊं हिमालय

35. तीस्ता और दिहांग नदियों के बीच स्थित हिमालय के भाग को किस नाम से जाना जाता है?

(क) असम हिमालय

(ख) हिमाचल हिमालय

(ग) नेपाल हिमालय

(घ) कुमाऊं हिमालय

36. निम्नलिखित में से कौन सा पूर्वांचल पहाड़ियों का हिस्सा नहीं है?

(क) पटकाई पहाड़ियाँ

(ख) नागा हिल्स

(ग) मणिपुर की पहाड़ियाँ

(घ) गारो हिल्स

37. निम्नलिखित में से कौन सा तथ्य उत्तरी मैदान के बारे में सही नहीं है?

(क) यह 7 लाख वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ है।

(ख) मैदान लगभग 2400 किमी लंबा और 240 से 320 किमी चौड़ा है।

(ग) यह कम आबादी वाला भौगोलिक प्रदेश है।

(घ) यह कृषि की दृष्टि से भारत का एक उत्पादक हिस्सा है।

38. गंगा के मैदान का विस्तार किन नदियों के बीच है-

(क) घग्घर और तीस्ता नदियाँ।

(ख) सिंधु और गंगा नदी

(ग) गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी

(घ) गंगा और तीस्ता नदी

39. शिवालिक के ढालों के समांतर लगभग 8 से 16 किमी चौड़ी एक संकरी पट्टी है उसे किस नाम से जाना जाता है?

(क) भाबर

(ख) भांगर

(ग) तराई

(घ) खादर

40. भाबर पट्टी के दक्षिण में स्थित पट्टी को किस नाम से जाना जाता है जिसमे सरिताएँ एवं नदियाँ पुनः निकल आती हैं?

(क) भाबर

(ख) भांगर

(ग) तराई

(घ) खादर

41. उत्तरी मैदान का वह भाग जो नदियों के बाढ़ के मैदानों के ऊपर स्थित है तथा वेदिका जैसी आकृति प्रदर्शित करते हैं। इस भाग को क्या कहा जाता है-

(क) भाबर

(ख) भांगर

(ग) तराई

(घ) खादर

42. बाढ़ वाले मैदान के नये तथा युवा निक्षेपों को क्या कहा जाता है?

(क) भाबर

(ख) भांगर

(ग) तराई

(घ) खादर

43. निम्नलिखित में से कौन सा मैदान गहन कृषि के लिए आदर्श है?

(क) भाबर

(ख) भांगर

(ग) तराई

(घ) खादर

44. नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित प्रायद्वीपीय पठार का वह भाग जो कि मालवा पठार के अधिकतर भागों में फैला हैं उसे किस नाम से जाना जाता हैं?

(क) डेक्कन ट्रैप

(ख) दक्कन का पठार

(ग) मध्य उच्चभूमि ( सेंट्रल हाइलैंड्स)

(घ) छोटा नागपुर का पठार

45. मध्य उच्चभूमि पश्चिम में चौड़ा लेकिन पूर्व में संकरा है। इस पठार के पूर्वी विस्तार को स्थानीय रूप से किस नाम से जाना जाता है?

(क) छोटा नागपुर का पठार

(ख) बुंदेलखंड

(ग) बघेलखंड

(घ) बुंदेलखंड और बघेलखंड

46. निम्नलिखित में से कौन-सा पठार मध्य उच्चभूमि का भाग नहीं है?

(क) छोटा नागपुर का पठार

(ख) बुंदेलखंड का पठार

(ग) बघेलखंड का पठार

(घ) डेक्कन ट्रैप

47. दामोदर नदी किस पठार में बहती है?

(क) छोटा नागपुर का पठार

(ख) बुंदेलखंड

(ग) बघेलखंड

(घ) डेक्कन ट्रैप

48. दक्कन के पठार की आकृति कैसी है?

(क) वृतीय 

(ख) आयताकार

(ग) त्रिभुज

(घ) कोई नहीं

49. निम्नलिखित में से कौन-सा दक्कन के पठार का तथ्य नहीं है?

(क) दक्कन के पठार के उत्तर में सतपुड़ा श्रेणी है।

(ख) महादेव, कैमूर की पहाड़ियाँ और मैकाल रेंज दक्कन के पठार के पूर्वी विस्तार का निर्माण करती हैं।

(ग) दक्कन का पठार पूर्व में ऊंचा है और पश्चिम की ओर नम ढाल है।

(घ) मेघालय, कार्बी-एंगलोंग पठार और उत्तर कछार पहाड़ियाँ दक्कन के पठार का हिस्सा हैं।

50. निम्नलिखित में से कौन सा तथ्य पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट के बारे में ठीक नहीं है?

(क) थल, भोर और पाल घाट पहाड़ी दर्रे हैं जो पूर्वी घाट में स्थित हैं।

(ख) पश्चिमी घाट की औसत उचाई पूर्वी घाट से ज्यादा हैं।

(ग) पूर्वी घाट की औसत ऊंचाई 600 मीटर है जबकि पश्चिमी घाट की औसत ऊंचाई 900-1600 मीटर है।

(घ) पश्चिमी घाट, घाटों के पश्चिमी ढलानों पर पर्वतीय वर्षा होती हैं।

51. पश्चिमी घाट की सबसे ऊँची शिखर कौन सी है?

(क) अनई मुडी

(ख) डोडा बेट्टा

(ग) महेंद्र गिरी

(घ) सह्याद्री

52. तमिलनाडु की सबसे ऊँची शिखर (चोटी) कौन सी है?

(क) अनई मुडी

(ख) डोडा बेट्टा

(ग) महेंद्र गिरी

(घ) सह्याद्री

53. पूर्वी घाट की सबसे ऊँची शिखर (चोटी) कौन सी है?

(क) अनई मुडी

(ख) डोडा बेट्टा

(ग) महेंद्र गिरी

(घ) सह्याद्री

54. निम्नलिखित में से कौन सी पहाड़ी पश्चिमी घाट में स्थित है?

(क) शेवरॉय हिल्स

(ख) जावड़ी हिल्स

(ग) ऊटी या उदगमंडलम

(घ) महेंद्र गिरी

55. भारतीय मरुस्थल में वार्षिक वर्षा लगभग कितनी होती है?

(क) 250 मिमी से कम

(ख) 150 मिमी से कम

(ग) 100 मिमी से कम

(घ) 75 मिमी से कम

56. मुंबई से गोवा तक के तट को किस नाम से जाना जाता है?

(क) कोंकण तट

(ख) कन्नड़ मैदान

(ग) मालाबार तट

(घ) कोरोमंडल तट

57. गोवा से केरल के उत्तरी भाग तक के तट को किस नाम से जाना जाता है?

(क) कोंकण तट

(ख) कन्नड़ मैदान

(ग) मालाबार तट

(घ) कोरोमंडल तट

58. केरल तट को किस नाम से जाना जाता है?

(क) कोंकण तट

(ख) कन्नड़ मैदान

(ग) मालाबार तट

(घ) कोरोमंडल तट

59. निम्नलिखित में से कौन-सी भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है?

(क) सांभर झील

(ख) चिल्का झील

(ग) पैंगोंग झील

(घ) पुलीकट झील

60. किस वर्ष लक्षद्वीप, मिनिकॉय और अमीनदीव नाम बदलकर लक्षद्वीप रखा गया था?

(क) 1952

(ख) 1963

(ग) 1973

(घ) 1998

61. लक्षद्वीप का प्रशासनिक मुख्यालय कौन सा द्वीप है?

(क) लक्षद्वीप

(ख) मिनिकॉय

(ग) पिट्टी द्वीप

(घ) कवारत्ती द्वीप

62. निम्नलिखित में से कौन सा द्वीप निर्जन है, और एक पक्षी अभयारण्य है?

(क) लक्षद्वीप

(ख) मिनिकॉय

(ग) पिट्टी द्वीप

(घ) कवारत्ती द्वीप

63. भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थित है उसे किस नाम से जाना जाता हैं? 

(क) बैरेन द्वीप

(ख) हैवलॉक द्वीप

(ग) मार्शल द्वीप

(घ) स्वराज द्वीप

10. Automobile Industry (मोटर वाहन उद्योग)

 Automobile Industry

(मोटर वाहन उद्योग)



    Automobile Industry

     विश्व स्तर पर यह बहुत बड़ा उद्योग है और इसका अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान है। इस पर कई सहायक अथवा गौण उद्योग निर्भर करते हैं जिससे यह विभिन्न प्रकार की आर्थिक गतिविधियों को काफी बल प्रदान करता है। इस समय भारत में यह उद्योग काफी पनप गया है और इसमें विभिन्न प्रकार के वाहनों का उत्पादन होता है।

     हालांकि स्वतंत्रता से पूर्व भारत में मोटर वाहन उद्योग नगण्य था। केवल आयातित पुर्जों को जोड़ कर वाहन बनाए जाते थे। वर्ष 1928 में ‘जनरल मोटर्स’ मुम्बई ने ट्रकों तथा कारों का संयोजन शुरू किया था। फोर्ड मोटर कं. (इण्डिया) लि. चेन्नई में 1930 तथा मुम्बई में 1931 में कारों तथा ट्रकों का संयोजन शुरू किया। इस उद्योग का वास्तविक विकास प्रीमियर ऑटोमोबाइल लि. कुर्ला (मुम्बई) की स्थापना 1941 में तथा हिन्दुस्तान मोटर्स लि. उत्तरपाड़ा (कोलकाता) की स्थापना 1948 में होने में शुरू हुआ। पिछले तीन-चार दशकों में इस उद्योग ने बड़ी उन्नति की है।

    1991 की औद्योगिक उदारीकरण नीति से इस उद्योग को काफी लाभ मिला और अब यह हमारी अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग बन गया है। इस समय देश में 15 कंपनियाँ सवारी कारें व बहुउद्देशीय वाहन, 9 कंपनियाँ व्यावसायिक वाहन, 14 कंपनियाँ 2/3 पहिया वाहन, 14 कंपनियाँ ट्रैक्टर तथा पाँच कंपनियाँ इंजन बनाने में सक्रिय हैं।

स्थानीकरण

   मोटर वाहन उद्योग मुख्यतः लौह-इस्पात उत्पादक क्षेत्रों के निकट ही पनपता है क्योंकि इसका मुख्य कच्चा माल इस्पात है। यदि टायर, ट्यूब, बैटरी, पेंट तथा अन्य उपयोगी उत्पाद भी निकटवती क्षेत्र में हो तो सुविधा अधिक हो जाती है।

      इसके लिए बन्दरगाह भी उपयुक्त होता है क्योंकि वहां पर आयात-निर्यात की सुविधा होती है। सरकार की विकेन्द्रीकरण की नीति के अन्तर्गत दूर स्थित क्षेत्रों को भी प्राथमिकता दी जाती है।

उत्पादन तथा वितरण

     भारतीय मोटर वाहन उद्योग को सनराइज (Sun rise) उद्योग कहा जाता है। पिछले दशक में इस उद्योग ने प्रतिवर्ष 10-12 प्रतिशत की दर से उन्नति की। परन्तु 2008-09 में वैश्विक आर्थिक मन्दी के कारण इस उद्योग को भारी क्षति हुई। इसके बाद शीघ्र ही इस उद्योग में विकास हुआ और भारत एक महत्वपूर्ण उत्पादक बन गया। इस समय भारत विश्व का सातवां बड़ा मोटर वाहन उत्पादक, दूसरा बड़ा दो-पहिया उत्पादक, सबसे बड़ा ट्रैक्टर उत्पादक और पाँचवां बड़ा वाणिज्यिक वाहनों का उत्पादक है।

    मोटर वाहनों में मुख्य उत्पादक मुम्बई, चेन्नई, जमशेदपुर, जबलपुर तथा कोलकाता हैं। ये केन्द्र ट्रक, बस, कार, ति-पहिये एवं दो-पहिए सहित सभी प्रकार के वाहनों का निर्माण करते हैं। मोटर साइकिल फरीदाबाद, गुरुग्राम तथा मैसूर में बनाए जाने है। स्कूटरों का निर्माण लखनऊ, सतारा, अकुर्डी (पुणे के निकट), पनकी (कानपुर के निकट) तथा ओधव (अहमदाबाद जिला) में होता है। मारुति उद्योग लि. ने हरियाणा के गुरुग्राम में 1983 में कारों का उत्पादन शुरू किया। इस समय देश में 38 इकाइयाँ चार-पहिया, ति-पहिया तथा दो-पहिया वाहनों का निर्माण कर रही हैं।

वाणिज्यिक वाहन:- 

      वाणिज्यिक वाहन उद्योग को सवारी तथा माल ढोने वाले दो प्रकार के वाहनों में बांटा जाता है। सवारी वाहनों का उत्पादन मुख्यत: सरकारी संस्थानों द्वारा तथा माल ढोने वाले वाहनों का उत्पादन मुख्यत: निजी क्षेत्र में किया जाता है।

     इनका उत्पादन 1950 के दशक में शुरू हुआ और 1991 की नई औद्योगिक नीति के बाद इस उद्योग ने बहुत उन्नति की। बस, ट्रक, टैम्पू, तथा तीन पहिया वाहनों का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव क. लि. (TELCO) मध्यम तथा भारी वाहनों का मुख्य उत्पादक है और देश के 70% वाणिज्यिक वाहन बनाता है। चार केंद्रों पर हल्के वाणिज्यिक वाहन बनते हैं ये केंद्र हैदराबाद, पिथमपुर (मध्य प्रदेश), आरसन रूपनगर के निकट (पंजाब) तथा सूरजपुर (उत्तर प्रदेश) हैं। प्रीमीयर ऑटोमोबाइल तथा महेंद्रा एंड महेंद्रा मुम्बई में, अशोका लेलैण्ड लि. एवं स्टैंडर्ड मोटर प्रॉड्क्स ऑफ इंडिया लि. चेन्नई में, हिन्दुस्तान मोटर लि. कोलकाता में तथा बजाज टैम्पो लि. पुणे में सक्रिय है।

     उपरोक्त निर्माताओं के अतिरिक्त रक्षा मंत्रालय के अधीन शक्तिमान ट्रक तथा जापान की निस्सान (Nissan) की सहायता से जबलपुर में निस्सान जीप का उत्पादन होता है।

सवारी मोटर वाहन:-

      गुरुग्राम (हरियाणा) स्थित मारूति उद्योग लि. अग्रणीय है। जापान की सुजुकी मोटर कॉरपोरेशन के सहयोग से स्थापित की गई इस कंपनी ने 1983 में उत्पादन शुरू कर दिया था। इस समय यह भारत की लगभग 80% कारें बनाती है। इसने कई मॉडल बनाये हैं जिनमें से जैन, बेगन-R, एस्टीम, स्विफ्ट तथा जिप्सी अधिक लोकप्रिय हैं।

     मारुति 800 का उत्पादन बन्द कर दिया गया है। हिन्दुस्तान मोटर्स (कोलकाता एवं चेन्नई) तथा प्रीमियम ऑटोमोबाइल्स (मुम्बई), स्टेण्डर्ड मोटर प्रॉड्क्स (चेन्नई) तथा सनराईज इंडस्ट्रीज (बैंगलूरू) अन्य उत्पादक हैं।

    1991 की उद्योग नीति के बाद अन्य कंपनियों ने भारत में मोटर वाहन उद्योग में सहयोग दिया। इनमें हुंडई (तमिलनाडु), दायवू (Deawoo of Korea) सूरजपुर (उत्तर प्रदेश), टेल्को, पिम्परी (पुणे के निकट), होंडा आदि प्रमुख हैं।

⇒ जनरल मोटर्स ने ओपेल आस्तरा मैदान में उतारी हैं।

⇒ महेंद्रा के सहयोग से फोर्ट मोटर्स ने फार्ड का निर्माण किया है।

⇒ जापान के मित्शुविशी के सहयोग से मध्य आकर की लान्सन प्रस्तुत की है।

⇒ टेल्को के सहयोग से जर्मनी की मर्सिडीज वैन्ज ने E 220 तथा 250D मॉडल बाजार में उतारे हैं।

⇒ 1998 के अन्तिम चरणों में छोटे एवं मध्यम सवारी कार में बहुत-सी नई गाड़ियां आई जैसे- डेबू की माटिज, टाटा की इंडिका, हुंडई की सेन्ट्रा व मारुति की बेंगन आर, फियट की उनों, अपोलो की कोर्सा आदि।

⇒ 2008 में टाटा ने नानो नामक छोटी कार की रूपरेखा प्रस्तुत की। यह अधिक लोकप्रिय नहीं हो सकी।

    इस उद्योग के विकास में कई कारकों का सहयोग रहा। उत्पाद शुल्क (Excise duty) में कमी होने से इस उद्योग को काफी प्रोत्साहन मिला। सवारी गाड़ियों पर उत्पाद शुल्क कम होने से इनकी कीमत कम हो गई और बाजार में इनकी मांग बढ़ गई। इसके परिणामस्वरूप सवारी मोटर वाहनों के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। सरकार की भारत को एशिया का बहुत बड़ा मोटर वाहन उत्पादक देश बनाने की नीति से भी इस उद्योग को काफी प्रोत्साहन मिला। भारतीय बाजार में 65% छोटी कारें हैं जो ‘A’ तथा ‘B’ वर्ग की हैं। इन कारों की कम कीमत एवं इनकी उच्च गुणवत्ता के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं।

    भारत में कार पैठ (Car penetration) केवल 28 प्रति हजार व्यक्ति है जो यू. के. की 473 प्रति हजार, संयुक्त राज्य अमेरिका की 816 प्रति हजार, न्यूजीलैण्ड की 837 प्रति हजार तथा आइस लैण्ड 866 प्रति हजार की तुलना में काफी कम है। जहां तक कि अफगानिस्तान (47), भूटान (57) तथा इण्डोनेशिया (77) जैसे पिछड़े दिशों में भी भारत की अपेक्षा कार पैठ बेहतर हैं। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि भारत में मोटर कार उद्योग की मांग बढ़ेगी और भविष्य में यह उद्योग काफी उन्नति करेगा। इस उद्योग के लगभग 87 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ने का अनुमान है।

    ऋण की सुविधा से भी इस उद्योग को काफी प्रोत्साहन मिला है। एक समय था जबकि ऋण के लिए लम्बी प्रक्रिया होती थी और ऋण प्राप्त करने में काफी समय लगता था। अब विभिन्न स्रोतों से ऋण आसानी से मिल जाता है और ग्राहकों की क्रय क्षमता बढ़ जाती है। इस समय लगभग 70% कारें ऋण लेकर ही खरीदी जाती हैं।

जीप (Jeeps):-

      भारत की लगभग समस्त जीप मुम्बई स्थित महेन्द्रा बनाता है। इसकी वार्षिक क्षमता लगभग 13,000 जीप है।

दो-पहिया वाहन:-

        इस वर्ग में मोटर साइकिल, स्कूटर, मोपेड तथा स्कूटी आदि सम्मिलित हैं। यह उद्योग 1950 में शुरू हुआ जब आटोमोबाइल प्रोडक्टस ऑफ इंडिया ने स्कूटरों का निर्माण शुरू किया। वर्ष 1960 में बजाज ऑटो ने इटली की पिआजियों के सहयोग से स्कूटरों का निर्माण शुरू किया। 1980 के दशक में भारत के दो पहिया वाहन उद्योग में अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धा शुरू हो गई। विश्व की लगभग सभी बड़ी कंपनियों ने इनका निर्माण शुरू कर दिया। सबसे पहले 1984 में सुजुकी मोटर कॉर्पोरेशन ने (TVS) का निर्माण शुरू कर दिया। इसके अगले वर्ष होंडा ने अपने पैर जमाए। इसके बाद कावासाकी एवं यामाह ने क्रमशः बजाज ऑटो एवं एस्कॉर्ट के साथ समझौते किए। पियाजियों ने (LMR) बाजार में उतारा।

⇒ हीरो होंडा, अपने धारूहेड़ा प्लांट की क्षमता बढ़ा रहा है और इसने गुरुग्राम में एक नया प्लांट लगाया है।

⇒ यामाह एस्कॉर्ट नए वाहनों के निर्माण की योजना बना रहा है और अपने सूरजपुर प्लांट का विस्तार कर रहा है।

⇒ सार्वजनिक क्षेत्र के यूनिट हैदराबाद, बैंगलूरू, सतारा, लखनऊ तथा अलवर में सक्रिय हैं।

⇒ मोटर साइकिल उत्पादन की इकाइयाँ नई दिल्ली, चेन्नई, मैसूर तथा गुड़गांव में हैं। दो पहिया वाहनों में सबसे अधिक बिक्री मोटर साइकिलों की है।

     इस समय भारत विश्व में दो पहिया वाहनों का सबसे बड़ा उत्पादक है। दो-पहिया वाहन उद्योग कुल आद्यौगिक सकल घरेलू उत्पाद का 7% योगदान देता है। इससे 2% GST भी प्राप्त होता है। अनुमान है कि भारत में प्रतिवर्ष 190 मिलियन दो-पहिया वाहनों के उत्पादन की क्षमता है। कुल मोटर वाहनों के उत्पादन का लगभग 80% भाग दो पहिया वाहनों का है। भारत में दो पहिया वाहनों के उत्पादन की क्षमता 250 लाख इकाइयाँ है।

  भारत में वाहनों का उत्पादन

(हजार इकाईयाँ)

वाहन का नाम 2019-20 2020-21 परिवर्तन (%)
दो- पहिया 21033 18350 – 12.8
सवारी गाड़ियां 3425 3062 – 10.6
तीन- पहिया 1133 611 – 46.1
वाणिज्यिक 757 625 – 17.6

      उपरोक्त तालिका से स्पष्ट होता है कि सभी मोटर वाहनों के उत्पादन में 2019-20 की तुलना में 2020-21 में कमी आई है। इसका एक मात्र कारण कोविड-19 था।

      नगरीय इलाकों में दो-पहिया वाहन व्यक्तिगत परिवहन के भार को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। देश के लगभग 65% दो पहिया वाहन नगरीय एवं उपनगरीय क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। भारत के अधिकांश नगरों के पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर्याप्त नहीं हैं और ऐसी स्थिति में दो-पहिया वाहन अच्छा विकल्प हैं।



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परिचय

   भारत का मोटर वाहन उद्योग विश्व के सबसे बड़े और सबसे तेजी से उभरते औद्योगिक क्षेत्रों में से एक है। यह उद्योग न केवल देश की औद्योगिक वृद्धि का प्रमुख चालक है, बल्कि रोजगार, निर्यात, तकनीकी नवोन्मेष और क्षेत्रीय विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।

    वर्तमान में भारत विश्व का चौथा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल बाजार है और निकट भविष्य में तीसरा सबसे बड़ा बनने की क्षमता रखता है। “मेक इन इंडिया”, “ऑटोमोटिव मिशन प्लान”, और विद्युत वाहन नीति जैसे सरकारी कार्यक्रमों ने इस उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए और अधिक सक्षम बनाया है।

भारत में मोटर वाहन उद्योग का ऐतिहासिक विकास

    भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग का विकास विभिन्न चरणों से होकर गुजरा है-

(i) 1940–1960 का दौर:-

    उद्योग की शुरुआत मुख्यतः असेंबली यूनिट के रूप में हुई। हिंदुस्तान मोटर्स, प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स जैसी कंपनियाँ बाजार में आईं।

(ii) 1960–1980:-

    लाइसेंस राज, सीमित प्रतिस्पर्धा और प्रतिबंधात्मक नीतियों के कारण उत्पादन सीमित रहा।

(iii) 1980–1990:-

    मारुति उद्योग लिमिटेड की स्थापना भारतीय यात्री कार बाजार में क्रांतिकारी बदलाव लेकर आई।

(iv) 1991 के बाद का उदारीकरण:-

    विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के खुलने से सुज़ुकी, ह्युंडई, होंडा, टोयोटा, टाटा मोटर्स आदि ने विनिर्माण इकाइयाँ स्थापित कीं।

(v) 2014 के बाद:-

    Make in India, BS-IV और BS-VI जैसे उत्सर्जन मानक, इलेक्ट्रिक वाहन नीति और ग्लोबल सप्लाई चेन में एकीकरण ने उद्योग को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया।

उद्योग की संरचना

      भारत का मोटर वाहन उद्योग कई उप-क्षेत्रों में विभाजित है-

⇒ यात्री वाहन (Passenger Vehicles): कारें, यूवी, वैन आदि

⇒ वाणिज्यिक वाहन (Commercial Vehicles): ट्रक, बसें

⇒ द्विचक्र एवं त्रिचक्र वाहन (Two & Three Wheelers): मोटरसाइकिल, स्कूटर, ऑटो-रिक्शा

⇒ ऑटो कंपोनेंट उद्योग: इंजन, ट्रांसमिशन, टायर्स, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, बैटरी आदि

⇒ इलेक्ट्रिक वाहन (EVs) और चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर

   इन सभी क्षेत्रों में भारत की मजबूत उपस्थिति है, विशेषकर द्विचक्र वाहनों का उत्पादन भारत को वैश्विक नेता बनाता है।

भारत में मोटर वाहन उद्योग का आर्थिक महत्व

(क) जीडीपी में योगदान:-

    ऑटोमोबाइल उद्योग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देश के GDP का लगभग 7–8% योगदान देता है। इसमें विनिर्माण, परिवहन, सेवा क्षेत्र और संबद्ध उद्योग शामिल हैं।

(ख) रोजगार:-

    यह क्षेत्र लगभग 37 मिलियन लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है। उत्पादन, बिक्री, सर्विस सेंटर, लॉजिस्टिक्स, स्पेयर पार्ट्स और डीलरशिप के माध्यम से बड़े पैमाने पर नौकरियाँ सृजित होती हैं।

(ग) निर्यात:-

     भारत ऑटो कंपोनेंट और छोटे वाहनों का बड़ा निर्यातक है। लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशियाई देशों में भारतीय निर्मित मोटरसाइकिलें विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।

(घ) शहरी एवं क्षेत्रीय विकास:-

     चेन्नई, पुणे, गुरुग्राम-मानेसर, सानंद, और बेंगलुरु जैसे शहर ऑटोमोबाइल हब के रूप में विकसित हुए हैं, जहाँ उद्योग आधारित शहरीकरण तेजी से बढ़ा है।

सरकारी नीतियाँ और पहल

(1) ऑटोमोटिव मिशन प्लान (AMP 2006–2016 और AMP 2016–2026)

⇒ भारतीय ऑटो उद्योग को विश्वस्तरीय बनाने का लक्ष्य

⇒ विनिर्माण क्षमता, निर्यात और अनुसंधान को बढ़ाने पर बल

⇒ 2026 तक भारत को वैश्विक स्तर पर उत्पादन और नवाचार केंद्र बनाने का उद्देश्य

(2) राष्ट्रीय विद्युत वाहन नीति (FAME Scheme)

⇒ EV खरीद पर सब्सिडी

⇒ चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास

⇒ बैटरी निर्माण में आत्मनिर्भरता की दिशा में पहल

(3) BS-VI उत्सर्जन मानक

   2020 में BS-IV से सीधे BS-VI पर शिफ्ट करना एक ऐतिहासिक कदम रहा, जिससे प्रदूषण में कमी और हरित प्रौद्योगिकी का उपयोग बढ़ा।

(4) मेक इन इंडिया और PLI Scheme

⇒ High-value components के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन

⇒ EV बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, और विशेष स्टील उत्पादन पर केंद्रित प्रोत्साहन

उद्योग की वर्तमान स्थिति (Present Scenario)

(क) उत्पादन और बिक्री

भारत विश्व में-

⇒ मोटरसाइकिल उत्पादन में पहला

⇒ कार बाजार में चौथा

⇒ वाणिज्यिक वाहनों में पाँचवाँ स्थान रखता है।

(ख) EV सेक्टर का उभार

    दो-पहिया इलेक्ट्रिक वाहन तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। टाटा, ओला, Ather, महिंद्रा, और MG जैसे निर्माता EV लाइनअप बढ़ा रहे हैं।

     सरकारी योजनाओं के कारण EV का बाजार हिस्सा निरंतर बढ़ रहा है।

(ग) विदेशी निवेश

    ऑटोमोबाइल क्षेत्र में FDI का प्रवाह लगातार बढ़ रहा है। जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, अमेरिका और चीन प्रमुख निवेशक देश हैं।

भारत में मोटर वाहन उद्योग की चुनौतियाँ

(1) तकनीकी एवं नवाचार चुनौतियाँ

⇒ इलेक्ट्रिक वाहन तकनीक में बैटरी लागत अभी भी बहुत अधिक है।

⇒ स्वदेशी चिप निर्माण और सेमीकंडक्टर सप्लाई की कमी।

(2) बुनियादी ढाँचा (Infrastructure)

⇒ EV चार्जिंग नेटवर्क अभी प्रारंभिक अवस्था में है।

⇒ सड़क और लॉजिस्टिक्स लागत कई देशों की तुलना में अधिक है।

(3) पर्यावरणीय दबाव

⇒ प्रदूषण कम करने के लिए लगातार कठोर नियम लागू किए जा रहे हैं।

⇒ पारंपरिक पेट्रोल-डीजल वाहनों का भविष्य अनिश्चित दिख रहा है।

(4) वैश्विक प्रतिस्पर्धा

⇒ चीन, जापान, और दक्षिण कोरिया की कंपनियाँ तकनीक और R&D में बहुत आगे हैं।

⇒ भारत को भी R&D निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है।

(5) कौशल विकास

    ऑटोमोबाइल क्षेत्र में कुशल तकनीशियन और उन्नत इंजीनियरों की मांग तेजी से बढ़ रही है, परन्तु गुणवत्ता आधारित कौशल विकास पर्याप्त नहीं है।

अवसर (Opportunities)

(1) EV और ग्रीन टेक्नोलॉजी

      भारत में EV उद्योग के विस्तार की अपार संभावनाएँ हैं।

⇒ बैटरी निर्माण

⇒ हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक

⇒ इलेक्ट्रिक बसें और लॉजिस्टिक वाहन

    ये क्षेत्र निवेश का बड़ा अवसर प्रस्तुत करते हैं।

(2) निर्यात हब बनने की क्षमता

    सस्ती श्रम लागत, विशाल घरेलू बाजार और मजबूत कंपोनेंट उद्योग भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बना सकते हैं।

(3) डिजिटल परिवर्तन

⇒ स्मार्ट कारें

⇒ इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम

⇒ AI आधारित सुरक्षा फीचर

     इनके लिए भारतीय IT सेक्टर मजबूत बैकअप उपलब्ध कराता है।

भविष्य की संभावनाएँ

     भारत अगले दशक में टॉप-3 ऑटोमोबाइल बाजार बन सकता है।

⇒ PLI स्कीम

⇒ अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों का बढ़ता निवेश

⇒ EV मार्केट का तीव्र विस्तार

⇒ घरेलू अनुसंधान केंद्रों का विकास

     इन्हें देखते हुए यह उद्योग GDP में दो अंकों का योगदान कर सकता है।

2030 तक भारत-

⇒ दुनिया का सबसे बड़ा दो-पहिया EV बाजार

⇒ इलेक्ट्रिक बसों का अग्रणी उत्पादक

⇒ ऑटो कंपोनेंट का प्रमुख निर्यातक बन सकता है।

निष्कर्ष:

    भारत का मोटर वाहन उद्योग न केवल आर्थिक विकास बल्कि तकनीकी उन्नति, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, और ऊर्जा परिवर्तन का भी प्रतीक बन चुका है।

    उद्योग तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों, स्वचालन और हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है। सरकार की प्रगतिशील नीतियाँ और निजी निवेश मिलकर भारत को आगामी वर्षों में वैश्विक ऑटोमोटिव महाशक्ति बना सकते हैं।

46. Indian Agricultural Policies (भारतीय कृषि नीतियाँ)

Indian Agricultural Policies

(भारतीय कृषि नीतियाँ)



स्वतंत्रता के बाद कृषि सुधार के प्रयास

            स्वतंत्रता के बाद कृषि सुधार के लिए निम्नलिखित प्रयास किए गए हैं:- 

⇒ भूमि सुधारों पर केन्द्रित प्रथम संविधान संशोधन।

⇒ जमींदारी प्रथा की समाप्ति, भूमि हदबंदी सीमा अधिनियम।

⇒ प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि को प्राथमिकता।

⇒ भूदान और सर्वोदय आंदोलनों को प्रोत्साहन तथा।

⇒ भू-राजस्व वसूली के लिए उपयुक्त व्यवस्था तैयार करना।

⇒  खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने हेतु हरित क्रांति।

⇒ कृषि के लिए आवश्यक क्षेत्रों जैसे- सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरक आदि में निवेश।

⇒ कृषकों को वित्तीय सहायता, कर राहत, सब्सिडी आदि के प्रावधान।

नई कृषि नीति:-

     कृषि विकास की कम दर के कारण एक नई कृषि नीति की आवश्यकता महसूस की गई क्योंकि 1990-91 से 1998-99 में खाद्यान्न उत्पादन की विकास दर मात्र 1.8 प्रतिशत थी जो कि जनसंख्या वृद्धि दर के बराबर थी।

      भारत सरकार ने 28 जुलाई 2000 को एक नई कृषि नीति की घोषणा की जिसका मुख्य उद्देश्य कृषि क्षेत्र में 4% वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त करना है। 

   नई कृषि नीति में अपर्याप्त पूँजी, कृषि पदार्थों के संग्रहण तथा विपणन की समस्या को कृषि विकास की धीमी गति के लिए जिम्मेदार माना गया हैं।

कृषि क्षेत्र के विकास हेतु सरकार द्वारा किए गए हालिया प्रयास

⇒ 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने की दिशा में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि पहल।

⇒ कृषि के व्यापक विकास हेतु 2007 में राष्ट्रीय कृषक नीति।

⇒ कृषि संबंधी जानकारी हेतु किसान कॉल सेंटर की सुविधाएँ।

⇒ खेती में वित्त संबंधी समस्या हेतु किसान क्रेडिट कार्ड, ऋण सुविधा, न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी पहल।

⇒ सिंचाई समस्याओं को हल करने हेतु ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’।

⇒ रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभाव को कम करने हेतु नीम कोटेड यूरिया।

⇒ जमीन की उर्वरता और जैव विविधता को संरक्षित करने हेतु जैविक खेती को बढ़ावा।

मृदा स्वास्थ्य एवं पोषण की जानकारी हेतु मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना।

⇒ कृषि में जोखिम न्यूनता हेतु प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना।

⇒ खाद्यान्नों के भंडारण और उनके प्रसंस्करण से जुड़ी ढांचागत विकास पर ध्यान।

⇒ कृषि उत्पादों के बेचने हेतु बड़ा बाजार ई- नाम  (e-NAM) अर्थात् राष्ट्रीय कृषि बाजार (National Agricultural Market) और APMC अर्थात् कृषि उपज मंडी समिति (Agricultural Produce Market Committee) कानून।

⇒ जलवायु परिवर्तन के अनुसार जैविक खेती को बढ़ावा, कृषि में नवचार, अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा।

⇒ कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने हेतु 2018 में कृषि निर्यात नीति।

⇒ फसल कटाई के बाद बुनियादी ढाँचा प्रबंधन एवं कृषि परिसंपत्तियों में निवेश हेतु कृषि अवसंरचना कोष का गठन।

भारतीय कृषि नीतियों के मुख्य घटक

(i) न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP):-

    सरकार द्वारा घोषित यह मूल्य, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करता है, जिससे उन्हें नुकसान से बचाया जा सके 

    सरकार, कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों के आधार पर विभिन्न फसलों के लिए MSP (Minimum Support Price) निर्धारित करती है।

(ii) सिंचाई परियोजनाएँ:-

    सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से, विशेष रूप से सूखे और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में, कृषि उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है

(iii) उर्वरक और बीज सब्सिडी:-

   सरकार द्वारा उर्वरकों और बीजों पर दी जाने वाली सब्सिडी, किसानों को इनपुट लागत कम करने और अधिक उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित करती है 

(iv) कृषि ऋण:-

    किसानों को आसानी से ऋण उपलब्ध कराना, उन्हें निवेश करने और अपनी उपज बढ़ाने में मदद करता है

(v) भूमि सुधार:-

    भूमि सुधारों के माध्यम से, भूमि का समान वितरण और जोत की अधिकतम सीमा तय की जाती है, जिससे किसानों को अपनी जमीन पर बेहतर तरीके से काम करने में मदद मिलती है 

(vi) कृषि अनुसंधान और विकास:-

    सरकार कृषि अनुसंधान और विकास में निवेश करती है, ताकि नई और बेहतर तकनीकों का विकास हो सके और किसानों को उनका लाभ मिल सके

(vii) कृषि विपणन:-

    कृषि उपज के विपणन को बेहतर बनाने के लिए, सरकार भंडारण, परिवहन और प्रसंस्करण सुविधाओं में सुधार करती है 

(viii) कृषि शिक्षा और विस्तार:-

    कृषि शिक्षा और विस्तार सेवाओं के माध्यम से, किसानों को नवीनतम तकनीकों और सर्वोत्तम प्रथाओं के बारे में जानकारी दी जाती है 

(ix) कृषि निर्यात नीति:-

    निर्यात को बढ़ावा देने के लिए, सरकार कृषि उत्पादों के निर्यात को सरल और सुगम बनाने के लिए नीतियाँ बनाती है 

(x) कृषि वानिकी नीति:-

    यह नीति जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए कृषि उत्पादकता को अधिकतम करके कृषि आजीविका में सुधार करने के लिए डिजाइन की गई है

कृषि नीतियों का उद्देश्य:

            कृषि नीतियों का उद्देश्य निम्नलिखित है-

(i) कृषि उत्पादन तथा उत्पादकता में वृद्धि करना

(ii) किसानों की आय में वृद्धि करना

(iii) खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना

(iv) कृषि क्षेत्र में स्थिरता लाना

(v) किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से बचाना

(vi) कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा करना

चुनौतियाँ:

⇒ भारतीय कृषि मुख्य रूप से मानसून पर अधिक निर्भर है, जिससे कभी सूखा और कभी बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बना रहता है

⇒ छोटे और सीमांत किसानों की संख्या अधिक है, जिन्हें ऋण और अन्य संसाधनों तक पहुंचने में कठिनाई होती है

⇒ कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों का उपयोग अभी भी काफी सीमित है 

⇒ कृषि उत्पादों के विपणन में कई चुनौतियाँ हैं, जैसे भंडारण और परिवहन की कमी 

45. White Revolution in India (भारत में श्वेत क्रांति)

White Revolution in India

(भारत में श्वेत क्रांति)



भारत में श्वेत क्रांति (White Revolution in India):-

     भारत की श्वेत क्रांति जिसे ‘ऑपरेशन फ्लड’ के नाम से भी जाना जाता है, वर्ष 1970 में शुरू की गई एक पहल थी जिसका मुख्य उद्देश्य दूध उत्पादन को बढ़ाने के साथ-साथ भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बनाना था।

     इस क्रांति का नेतृत्व डॉ० वर्गीज कुरियन ने किया था, जिन्हें ‘श्वेत क्रांति का जनक’ भी कहा जाता है।

    ऑपरेशन फ्लड (Operation Flood) वह कार्यक्रम है जिसके कारण “श्वेत क्रांति” हुई। इसने पूरे भारत में उत्पादकों को 700 से अधिक कस्बों और शहरों में उपभोक्ताओं से जोड़ने वाला एक राष्ट्रीय दूध ग्रिड बनाया और मौसमी और क्षेत्रीय मूल्य भिन्नताओं को कम किया, जबकि यह सुनिश्चित किया कि बिचौलियों को खत्म करके उत्पादकों को लाभ का बड़ा हिस्सा मिले।

     ऑपरेशन फ्लड की नींव में गाँव के दूध उत्पादकों की सहकारी समितियाँ हैं, जो दूध खरीदती हैं और इनपुट और सेवाएँ प्रदान करती हैं, जिससे सभी सदस्यों को आधुनिक प्रबंधन और तकनीक उपलब्ध होती है।

श्वेत क्रांति का इतिहास (History of White Revolution)

     वर्ष 1964-1965 के दौरान भारत में सघन पशु विकास कार्यक्रम शुरू किया गया था, जिसमें देश में श्वेत क्रांति को बढ़ावा देने के लिए पशुपालकों को उन्नत पशुपालन का पैकेज प्रदान किया गया था। बाद में, राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने देश में श्वेत क्रांति की गति बढ़ाने के लिए “ऑपरेशन फ्लड” नामक एक नया कार्यक्रम शुरू किया।

   ऑपरेशन फ्लड की शुरुआत 1970 में हुई थी और इसका उद्देश्य देश भर में दूध ग्रिड बनाना था। यह NDDB (भारतीय राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड) द्वारा शुरू किया गया एक ग्रामीण विकास कार्यक्रम था।

    जब ऑपरेशन फ्लड को लागू किया गया था, तब डॉ. वर्गीस कुरियन राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के अध्यक्ष थे। अपने शानदार प्रबंधन कौशल के साथ डॉ. कुरियन ने सहकारी समितियों को क्रांति हेतु सशक्त बनाने के लिए आगे बढ़ाया। इस प्रकार, उन्हें भारत की ‘श्वेत क्रांति का वास्तुकार’ माना जाता है।

    कई बड़ी-बड़ी कंपनियों ने इसमें भाग लिया और इस क्रांति को सशक्त बनाया जिसने भारत में ऑपरेशन फ्लड को श्वेत क्रांति में बदल दिया। गुजरात स्थित सहकारी संस्था अमूल-आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड ने ऑपरेशन फ्लड कार्यक्रम की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

भारत में श्वेत क्रांति के उद्देश्य (Objectives of White Revolution in India)

      श्वेत क्रांति के उद्देश्य निम्नलिखित थे:-

⇒ दूध की खरीद, परिवहन और भंडारण का प्रबंधन शीतलन संयंत्रों में करना।

⇒ पशुओं के लिए चारा उपलब्ध कराना।

⇒ सहकारी समितियों द्वारा विभिन्न दुग्ध उत्पादों का उत्पादन और विपणन करना

⇒ बेहतर मवेशी नस्लों (गाय और भैंस), स्वास्थ्य सेवाएँ, पशु चिकित्सा, कृत्रिम गर्भाधान सुविधाएँ और विस्तार सेवाएँ प्रदान करना।

⇒ सहकारी समितियों के विस्तृत नेटवर्क पर आधारित तकनीक के माध्यम से डेयरी उद्योग का प्रबंधन करना।

⇒ गांव के संग्रहण केंद्र पर दूध एकत्र करने के बाद उसे तुरंत दूध शीतलन केंद्र स्थित डेयरी संयंत्र में पहुँचाना।

⇒ शीतलन केन्द्रों का प्रबंधन उत्पादक सहकारी संघों द्वारा किया जाता है, ताकि उनसे कुछ दूरी पर रहने वाले उत्पादकों से दूध एकत्रित करने में सुविधा हो, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त की जा सके।

ऑपरेशन फ्लड का महत्व एवं विशेषताएँ (Importance and features of Operation Flood)

(i) दूध उत्पादन में वृद्धि (Increase in milk production):

     इस क्रांति ने भारत के दूध उत्पादन को काफी हद तक बढ़ावा दिया, जिससे देश दुनिया भर में सबसे बड़े दूध उत्पादकों में से एक बन गया। इससे बड़ी आबादी को दूध और डेयरी उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित हुई।

(ii) ग्रामीण विकास और रोजगार (Rural development and employment):-

     इस क्रांति ने लाखों छोटे पैमाने के डेयरी किसानों के लिए आय का एक स्थायी स्रोत प्रदान किया, जिससे ग्रामीण आर्थिक विकास हुआ और डेयरी क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा हुए।

(iii) डेयरी उत्पादों में आत्मनिर्भरता (Self-sufficiency in dairy products):-

     भारत दूध की कमी वाले देश से आत्मनिर्भर बन गया है, आयात पर निर्भरता कम हो गई है और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो गई है।

(iv) बेहतर पोषण (Better Nutrition):

     दूध और डेयरी उत्पादों की बढ़ती उपलब्धता ने विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर पोषण में योगदान दिया, जिससे कुपोषण से निपटने और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करने में मदद मिली।

(v) महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment):

      कई महिलाएं डेयरी फार्मिंग में सक्रिय रूप से शामिल थीं, और इस क्रांति ने उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाया, घरेलू निर्णय लेने और सामुदायिक जीवन में उनकी भूमिका को बढ़ाया।

(vi) आर्थिक विकास (Economic development):-

       श्वेत क्रांति ने भारत की जीडीपी को बढ़ावा दिया, जिससे कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को बल मिला।

(vii) सहकारी समितियों का गठन (Formation of co-operative societies):-

      श्वेत क्रांति के तहत, सहकारी समितियों का एक मजबूत नेटवर्क स्थापित किया गया, जिसने दूध के संग्रह, प्रसंस्करण और वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(viii) आधुनिक तकनीकों का उपयोग (Use of modern techniques):-

      श्वेत क्रांति ने डेयरी फार्मिंग में आधुनिक तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा दिया, जिससे दूध उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार हुआ।

(ix) किसानों को सशक्त बनाना (Empowering the farmers):-

    श्वेत क्रांति ने किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त करने और अपनी उपज को संसाधित करने के लिए सहकारी समितियों के माध्यम से संगठित होने के लिए प्रोत्साहित किया। 

भारत में श्वेत क्रांति के विभिन्न चरण (Different Phases of White Revolution in India)

     ऑपरेशन फ्लड तीन चरणों में शुरू किया गया था जिनकी चर्चा नीचे की गई है:- 

1. पहला चरण / First Phase (1970-1980):-

     पहला चरण 1970 से शुरू हुआ और 10 वर्षों तक यानि 1980 तक चला। इस चरण का वित्तपोषण विश्व खाद्य कार्यक्रम के माध्यम से यूरोपीय संघ द्वारा दान किए गए मक्खन तेल और स्किम्ड मिल्क पाउडर की बिक्री से किया गया था। 

    कार्यक्रम के सफल क्रियान्वयन के लिए, पहले चरण के प्रारंभिक चरण में कुछ लक्ष्य निर्धारित किए गए थे। ऐसा ही एक लक्ष्य था, लक्ष्यों को पूरा करने के लिए महानगरों में दूध की विपणन रणनीति में सुधार करना।

2. दूसरा चरण / Second Phase (1981-1985):-

      दूसरा चरण 1981 से 1985 तक पाँच वर्षों तक चला। इस चरण के दौरान, दूध शेडों की संख्या 18 से बढ़कर 136 हो गई, दूध की दुकानों का विस्तार लगभग 290 शहरी बाजारों तक किया गया, एक आत्मनिर्भर प्रणाली स्थापित की गई जिसमें 43,000 ग्रामीण सहकारी समितियों में फैले 4,250,000 दूध उत्पादक शामिल थे।

    घरेलू दूध पाउडर का उत्पादन वर्ष 1980 में 22,000 टन से बढ़कर 1989 तक 140,000 टन हो गया, और सहकारी समितियों द्वारा दूध के प्रत्यक्ष विपणन के कारण दूध की बिक्री में भी प्रतिदिन कई मिलियन लीटर की वृद्धि हुई। उत्पादन में सभी वृद्धि केवल ऑपरेशन फ्लड के तहत स्थापित डेयरियों की वजह से हुई। 

3. तीसरा चरण / Third Phase (1985-1996):-

      तीसरा चरण भी लगभग 10 वर्षों तक चला, यानी 1985-1996 तक। इस चरण ने डेयरी सहकारी समितियों को विस्तार करने में सक्षम बनाया और कार्यक्रम को अंतिम रूप दिया। इसने दूध की बढ़ती मात्रा की खरीद और विपणन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को भी मजबूत किया। 

     श्वेत क्रांति या ऑपरेशन फ्लड के अंत में 73,930 डेयरी सहकारी समितियां स्थापित की गईं, जिनसे 3.5 करोड़ से अधिक डेयरी किसान सदस्य जुड़े। वर्तमान में श्वेत क्रांति के कारण भारत में कई सौ सहकारी समितियां हैं जो बहुत कुशलता से काम कर रही हैं। इसलिए, यह क्रांति कई भारतीय गांवों की समृद्धि का कारण है।

(i) असमान विकास (Uneven Development): भारत में श्वेत क्रांति के लाभ भारत के सभी क्षेत्रों में समान रूप से वितरित नहीं हुए। कुछ राज्यों में, विशेष रूप से उत्तर और पश्चिम में, महत्वपूर्ण प्रगति हुई, जबकि अन्य पिछड़ गए, जिसके कारण क्षेत्रीय असमानताएं पैदा हुईं।

(ii) पर्यावरणीय चिंताएं (Environmental concerns): डेयरी फार्मिंग के तीव्र होने से अतिचारण, जल प्रदूषण और स्थानीय संसाधनों की कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न हुईं, जिससे पारिस्थितिक स्थिरता संबंधी चिंताएं बढ़ गईं।

(iii) क्रॉस-ब्रीडिंग पर अत्यधिक जोर (Excessive emphasis on cross-breeding): विदेशी मवेशियों की नस्लों के साथ क्रॉस-ब्रीडिंग पर ध्यान देने से स्वदेशी मवेशियों की आबादी में गिरावट आई, जो स्थानीय परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त हैं और उन्हें कम रखरखाव की आवश्यकता होती है।

(iv) अपर्याप्त बुनियादी ढांचा (Inadequate Infrastructure): महत्वपूर्ण प्रगति के बावजूद, कई ग्रामीण क्षेत्रों में शीत भंडारण, परिवहन और पशु चिकित्सा सेवाओं के लिए बुनियादी ढांचा अपर्याप्त बना हुआ है, जिससे दूध उत्पादन और वितरण की पूरी क्षमता सीमित हो रही है।

(v) आर्थिक असमानताएँ (Economic inequalities): भारत में श्वेत क्रांति ने कई छोटे और सीमांत किसानों को लाभ पहुँचाया, लेकिन इसने असमानताएँ भी पैदा कीं। अधिक संसाधनों वाले बड़े किसान छोटे किसानों की तुलना में अवसरों का अधिक प्रभावी ढंग से लाभ उठा सकते हैं।

(vi) सहकारी संरचनाओं पर निर्भरता (Dependence on co-operative structures): भारत में श्वेत क्रांति की सफलता काफी हद तक सहकारी समितियों की दक्षता पर निर्भर थी।

(vii) कुछ क्षेत्रों में कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप ने उनके प्रदर्शन में बाधा उत्पन्न की, जिससे कार्यक्रम का समग्र प्रभाव सीमित हो गया।

(viii) पशु कल्याण के मुद्दे (Animal welfare issues):- दूध उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देने से पशु कल्याण के बारे में चिंताएं पैदा हुईं, डेयरी मवेशियों के लिए खराब रहने की स्थिति, अधिक दूध निकालना और अपर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल।

(ix) बाजार संतृप्ति (Market saturation):- कुछ क्षेत्रों में, दूध उत्पादन में तीव्र वृद्धि के कारण बाजार संतृप्ति हो गई, जिससे मूल्य में उतार-चढ़ाव और डेयरी किसानों के लिए आर्थिक अस्थिरता पैदा हो गई।

निष्कर्ष: इस प्रकार कहा जा सकता है कि श्वेत क्रांति ने भारत के डेयरी उद्योग में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाया, जिससे न केवल दूध उत्पादन में वृद्धि हुई, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लोगों के जीवन में भी सुधार हुआ। 

44. Major tribal groups of India (भारत की प्रमुख जनजातीय समूह)

  44. Major tribal groups of India

(भारत की प्रमुख जनजातीय समूह) 



       जनजातियाँ मुख्यतः वह मानव समुदाय हैं जो कि एक अलग निश्चित भू-भाग में निवास करती हैं और जिनकी एक अलग संस्कृति, रीति-रिवाज, भाषा होती है तथा ये केवल अपने ही समुदाय में विवाह करती हैं। सामान्य अर्थों में कहें तो जनजातियों का अपना एक वंशज, पूर्वज यहाँ तक कि देवी-देवता भी अलग होते हैं। ये प्राय: प्रकृति पूजक होते हैं।

     भारत की जनजातियाँ देश के प्राय: सभी राज्यों में फैली हुई है। अलग-अलग राज्यों में इनके रीति-रिवाज और रहन सहन भी प्राय: अलग होते हैं। जनजातियाँ, भारतीय आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत के संविधान में इसके लिए अनुसूचित जनजाति (ST) शब्द का प्रयोग हुआ है, इसलिए इसके लिए कुछ विशेष प्रावधान लागू किए गए हैं।

     जनजाति, भारत के आदिवासियों के लिए इस्‍तेमाल होने वाला एक वैधानिक शब्द भी है तो दूसरी ओर, इन्हें अन्य कई नामों से भी जानते है जैसे- आदिवासी, आदिम-जाति, वनवासी, प्रागैतिहासिक, असभ्य जाति, असाक्षर, निरक्षर तथा कबीलाई समूह इत्यादि।

मुख्य प्रजातीय विभाजन:

     प्रजातीय विशेषताओं के आधार पर, गुहा (1935) का मानना है कि वे निम्नलिखित तीन प्रजातियों से संबंधित हैं।

(i) मोगोलोइड्स

      उत्तर एल्पाइन या मंगोलियन गोल सिर के होते हैं। इनके बाल सीधे और चपटे, चेहरा और जबड़ा नतोदर होता है। नाक पतली और संकरी, रंग हल्का पीला-सा खुमानी रंग का होता है। ये विशेषताएं भोटिया (मध्य हिमालय), वांचू (अरुणाचल प्रदेश), नागा (नागालैंड), खासी (मेघालय), आदि के बीच पाई जाती हैं।

(ii) प्रोटो ऑस्ट्रलॉयड्स

    इस प्रजाति का सिर लम्बा और उभरा हुआ होता है। बाल पूर्णतः घुंघराले और त्वचा का रंग गहरे काले से लेकर कत्थई तथा हल्का पीला होता है। जबड़े कुछ निकले हुए और नाक साधारण रूप से चौड़ी होती है। ये विशेषताएं गोंड (मध्य प्रदेश), मुंडा (छोटानागपुर), हो (झारखंड) आदि में पाई जाती है।

(iii) नेग्रिटो

      इस प्रजाति का रंग लाल चाकलेटी से लेकर काला कत्थई तक होता है। इनका डील-डौल नाटा (5 फुट से कम) होंठ काफी मोटे, नाक चौड़ी और चपटी होती है। इनके बाल चपटे, फीते के समान और घने होते हैं। वे आपस में लिपटकर गांठ का निर्माण करते हैं। इनमें जबड़े और दांत आगे निकले होते हैं। इस समय कुछ ही हजार नीग्रिटो जीवित हैं। उनमें अन्य जातियों के रक्त का मिश्रण हो गया है। ये विशेषताएं कादर (केरल), ओंगे (लिटिल अंडमान), जारवा (अंडमान द्वीप) आदि के बीच पाई जाती हैं।

जनजातियों का भौगोलिक वितरण

     वर्तमान समय में भी भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण तथा पूर्व से लेकर पश्चिम तक जनजातियों के साथ-साथ संस्कृति का विविधीकरण भी देखने को मिलता है। सम्पूर्ण भारत में जनजातियों की वास्तविक स्थिति उनके भौगोलिक वितरण को समझकर आसानी से लिया जा सकता है।

     भौगोलिक आधार पर भारत की जनजातियों को विभिन्न भागों में विभाजित किया गया है। जैसे-

(i) उत्तर तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र:-

            उत्तर तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र के अंतर्गत हिमालय के तराई क्षेत्र, उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र सम्मिलित किये जाते हैं। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरी उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड तथा पूर्वोत्तर के सभी राज्य इस क्षेत्र में आते हैं। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से बकरवाल, गुर्जर, थारू, बुक्सा, राजी, जौनसारी, शौका, भोटिया, गद्दी, किन्नौरी, गारो, खासी, जयंतिया इत्यादि जनजातियाँ निवास करती हैं।

(ii) मध्य क्षेत्र:-

        मध्य क्षेत्र प्रायद्वीपीय भारत के पठारी तथा पहाड़ी क्षेत्र शामिल हैं। मध्य प्रदेश, दक्षिण राजस्थान, आंध्र प्रदेश, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडिशा आदि राज्य इस क्षेत्र में आते हैं जहाँ मुख्यतः भील, गोंड, रेड्डी, संथाल, हो, मुंडा, कोरवा, उरांव, कोल, बंजारा, मीणा, कोली आदि जनजातियाँ रहती हैं।

(iii) दक्षिण क्षेत्र:-

           दक्षिणी क्षेत्र के अंतर्गत कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल राज्य आते हैं जहाँ मुख्य रूप से टोडा, कोरमा, गोंड, भील, कडार, इरुला आदि जनजातियाँ बसी हुई हैं।

(iv) द्वीपीय क्षेत्र:-

        द्वीपीय क्षेत्र में अंडमान एवं निकोबार की जनजातियाँ आती हैं। जहाँ मुख्य रूप से सेंटिनलीज, ओंग, जारवा, शोम्पेन इत्यादि।

भारत की जनजातीय जनसँख्या

       भारत में अनुसूचित जनजातियों (ST) की जनसँख्या 10.42 करोड़ है, जो देश की कुल आबादी का 8.6% है। भारत में जनजातीय जनसंख्या अलग-अलग हिस्सों में फैली हुई है। देश के लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कई इलाकों में आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते हैं।

    भारत में अधिकतम जनजातीय जनसँख्या वाले पाँच राज्य है-

(i) मिजोरम (जनसंख्या का 94.4%)

(ii) लक्षद्वीप (94%)

(iii) नागालैंड (86.5%)

(iv) मेघालय (86.1%)

(v) अरुणाचल प्रदेश (68.79%)

      इसके अलावा, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, असम और पश्चिम बंगाल में भी महत्वपूर्ण जनजातीय बस्तियाँ हैं। 

भारत में पाई जाने वाली प्रमुख जनजातियाँ

      भारत की सबसे अधिक ज्ञात जनजातियों में गोंड, भील, संथाल, मुंडा, गारो, खासी, अंगामी, भूटिया, चेंचू, कोडाबा और ग्रेट अंडमानी जनजातियाँ शामिल हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, इन सभी जनजातियों में, भील आदिवासी समूह,  भारत की सबसे बड़ी जनजाति है। यह देश की कुल अनुसूचित जनजातीय आबादी का करीब 38% है।

      नीचे राज्य और उनमें निवास करने वाले जनजातियों के समूहों के बारे में जानकारी दी जा रही है-

 राज्य  निवास करने वाली प्रमुख जनजातियाँ
झारखण्ड संथाल, असुर, बैगा, बन्जारा, बिरहोर, गोंड, हो, खरिया, खोंड, मुंडा, कोरवा, भूमिज, मल पहाडिय़ा, सोरिया पहाडिय़ा, बिझिया, चेरू लोहरा, उरांव, खरवार, कोल, भील।
बिहार  बैंगा, बंजारा, मुण्डा, भुइया, खोंड।
मध्य प्रदेश   भील, मिहाल, बिरहोर, गडावां, कमार, नट।
उड़ीसा बैगा, बंजारा, बड़होर, चेंचू, गड़ाबा, गोंड, होस, जटायु, जुआंग, खरिया, कोल, खोंड, कोया, उरांव, संथाल, सओरा, मुन्डुप्पतू।
मेघालय  खासी, जयन्तिया, गारो।
अरुणाचल प्रदेश अबोर, अक्का, अपटामिस, बर्मास, डफला, गालोंग, गोम्बा, काम्पती, खोभा मिसमी, सिगंपो, सिरडुकपेन।
असम व नगालैंड बोडो, डिमसा गारो, खासी, कुकी, मिजो, मिकिर, नगा, अबोर, डाफला, मिशमिस, अपतनिस, सिंधो, अंगामी।
तमिलनाडु टोडा, कडार, इकला, कोटा, अडयान, अरनदान, कुट्टनायक, कोराग, कुरिचियान, मासेर, कुरुम्बा, कुरुमान, मुथुवान, पनियां, थुलया, मलयाली, इरावल्लन, कनिक्कर,मन्नान, उरासिल, विशावन, ईरुला।
कर्नाटक  गौडालू, हक्की, पिक्की, इरुगा, जेनु, कुरुव, मलाईकुड, भील, गोंड, टोडा, वर्ली, चेन्चू, कोया, अनार्दन, येरवा, होलेया, कोरमा।
आंध्र प्रदेश चेन्चू, कोचा, गुड़ावा, जटापा, कोंडा डोरस, कोंडा कपूर, कोंडा रेड्डी, खोंड, सुगेलिस, लम्बाडिस, येलडिस, येरुकुलास, भील, गोंड, कोलम, प्रधान, बाल्मिक।
छत्तीसगढ़ कोरकू, भील, बैगा, गोंड, अगरिया, भारिया, कोरबा, कोल, उरांव, प्रधान, नगेशिया, हल्वा, भतरा, माडिया, सहरिया, कमार, कंवर।
त्रिपुरा  लुशाई, माग, हलम, खशिया, भूटिया, मुंडा, संथाल, भील, जमनिया, रियांग, उचाई।
जम्मू-कश्मीर गुर्जर, भरवर वाल।
गुजरात कथोड़ी, सिद्दीस, कोलघा, कोटवलिया, पाधर, टोडिय़ा, बदाली, पटेलिया।
उत्तर प्रदेश बुक्सा, थारू, माहगीर, शोर्का, खरवार, थारू, राजी, जॉनसारी।
उत्तरांचल भोटिया, जौनसारी, राजी।
महाराष्ट्र  भील, गोंड, अगरिया, असुरा, भारिया, कोया, वर्ली, कोली, डुका बैगा, गडावास, कामर, खडिया, खोंडा, कोल, कोलम, कोर्कू, कोरबा, मुंडा, उरांव, प्रधान, बघरी।
पश्चिम बंगाल होस, कोरा, मुंडा, उरांव, भूमिज, संथाल, गेरो, लेप्चा, असुर, बैगा, बंजारा, भील, गोंड, बिरहोर, खोंड, कोरबा, लोहरा।
हिमाचल प्रदेश गद्दी, गुर्जर, लाहौल, लांबा, पंगवाला, किन्नौरी, बकरायल।
मणिपुर  कुकी, अंगामी, मिजो, पुरुम, सीमा।
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह औंगी आरबा, उत्तरी सेन्टीनली, अंडमानी, निकोबारी, शोपन।
केरल  कडार, इरुला, मुथुवन, कनिक्कर, मलनकुरावन, मलरारायन, मलावेतन, मलायन, मन्नान, उल्लातन, यूराली, विशावन, अर्नादन, कहुर्नाकन, कोरागा, कोटा, कुरियियान,कुरुमान, पनियां, पुलायन, मल्लार, कुरुम्बा।
पंजाब गद्दी, स्वागंला, भोट।
राजस्थान मीणा, भील, गरसिया, सहरिया, सांसी, दमोर, मेव, रावत, मेरात, कोली।
सिक्किम लेपचा।

भारत की जनजातियों के प्रमुख समस्याएँ

        भारत की जनजातियों में आदिम विशेषताएं, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बड़े समुदाय से संपर्क में संकोच और पिछड़ापन की प्रमुख मुद्दे है। परिणामस्वरूप, उन्हें अपने सम्पूर्ण जीवन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

      भारत में जनजातीय समस्याएँ निम्नलिखित है:-

(i) सामाजिक समस्याएँ:-

      सामाजिक समस्याओं की बात की जाय तो ये आज भी सामाजिक संपर्क स्थापित करने में अपने-आप को सहज नहीं पाते हैं। इस कारण ये सामाजिक-सांस्कृतिक अलगाव, भूमि अलगाव, अस्पृश्यता की भावना महसूस करती हैं। 

(ii) धार्मिक समस्याएँ:-

      धार्मिक अलगाव भी जनजातियों की समस्याओं का एक बहुत बड़ा पहलू है। इन जनजातियों के प्राय: अपने अलग देवी-देवता होते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है समाज में अन्य वर्गों द्वारा इनके प्रति छुआछूत का व्यवहार रखना। अगर हम थोड़ा पीछे जायें तो पाते हैं कि इन जनजातियों को अछूत तथा अनार्य मानकर समाज से बेदखल कर दिया जाता था, सार्वजनिक मंदिरों में प्रवेश तथा पवित्र स्थानों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया जाता था। आज भी इनकी स्थिति ले-देकर यही है।

(iii) शैक्षिक समस्याएँ:-

        आज भी जनजातीय समुदायों का एक बहुत बड़ा वर्ग निरक्षर है जिससे ये आम बोलचाल की भाषा को समझ नहीं पाती हैं। सरकार की कौन-कौन सी योजनाएँ इनके लिये हैं इसकी जानकारी तक इनको नहीं हो पाती है जो इनके शैक्षिक रूप से पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण है। 2001 से 2011 तक, ST के लिए साक्षरता दर में 11.86 प्रतिशत अंक और पूरी आबादी के लिए 8.15 प्रतिशत अंक की वृद्धि देखने को मिला है।

(iv) स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ:-

         स्वास्थ्य सेवा के मामले में जनजातीय आबादी के बीच संदिग्ध मुद्दे हैं। सबसे कमजोर कड़ी अनुसूचित जनजातियों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ हैं। अनुसूचित क्षेत्रों में काम करने के लिए इच्छुक, प्रशिक्षित और सुसज्जित स्वास्थ्य सेवा कर्मियों की कमी जनजातीय आबादी को सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में एक महत्वपूर्ण बाधा है। अनुसूचित क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में डॉक्टरों, नर्सों, तकनीशियनों और प्रबंधकों के बीच कमी, रिक्तियाँ, अनुपस्थिति या उदासीनता है।

     स्वास्थ्य क्षेत्र में नीतियों को आकार देने, योजना बनाने या सेवाओं को लागू करने में अनुसूचित जनजातियों के लोगों या उनके प्रतिनिधियों की भागीदारी का लगभग पूर्ण अभाव, अनुसूचित क्षेत्रों में अनुचित तरीके से डिजाइन किए गए और खराब तरीके से संगठित और प्रबंधित स्वास्थ्य सेवा के कारणों में से एक है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (RSBY) जैसे चिकित्सा बीमा कवरेज अनुसूचित क्षेत्रों में बहुत कम हैं। इसलिए, जनजातीय लोग भयावह और गंभीर बीमारियों के प्रति सुरक्षा के बिना रहते हैं। जनजातीय लोगों में शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 44 से 74 के बीच होने का अनुमान है।

(v) आर्थिक समस्याएँ:-

       इनके आर्थिक रूप से पिछड़ेपन की बात की जाए तो इसमें प्रमुख समस्या गरीबी तथा ऋणग्रस्तता है। आज भी जनजातियों के समुदाय का एक बड़ा तबका ऐसा है जो दूसरों के घरों में काम कर अपना जीवनयापन कर रहा है। माँ-बाप आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं पाते हैं तथा पैसे के लिये उन्हें बड़े-बड़े व्यवसायियों या दलालों को बेच देते हैं। बच्चे या तो समाज के घृणित से घृणित कार्य को अपनाने हेतु विवश हो जाते हैं या तो उन्हें मानव तस्करी का सामना करना पड़ता है।

      रही बात लड़कियों की तो उन्हें अमूमन वेश्यावृत्ति जैसे घिनौने दलदल में धकेल दिया जाता है। दरअसल जनजातियों के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण उनका आर्थिक रूप से पिछड़ापन ही है जो उन्हें उनकी बाकी सुविधाओं से वंचित करता है।

(vi) तम्बाकू और शराब का सेवन:-

    एक्सा कमेटी रिपोर्ट 2014 के आंकड़ों से स्पष्ट पता चलता है कि 15 से 54 वर्ष की आयु के पुरुष काफी अधिक मात्रा में तम्बाकू का सेवन करते हैं, या तो धूम्रपान करते हैं या चबाते हैं। जनजातियों के लगभग 72 % और गैर-जनजातियों के 56 % लोगों में तम्बाकू का सेवन प्रचलित था।

    नशाखोरी ने इन आदिवासियों के पारिवारिक आर्थिक एवं सामाजिक जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव डाला है। प्रत्येक आदिवासी परिवार त्योहार, विवाह आदि उत्सवों पर खूब शराब, गांजा, भांग व अन्य नशीले पदार्थ का सेवन करते है। शराब पीने से उनकी आर्थिक स्थिति और भी दयनीय हो जाती है।

(vii) गरीबी और ऋणग्रस्तता:-

      अधिकांश जनजातियाँ गरीब हैं। जनजातियाँ अल्पविकसित तकनीक पर आधारित कई तरह के सरल व्यवसायों में संलग्न हैं। अधिकांश व्यवसाय प्राथमिक व्यवसाय हैं जैसे- शिकार करना, लकड़ी इकट्ठा करना और कृषि करना। 

     विभिन्न जनजातियों के 60 प्रतिशत से अधिक परिवार किसी न किसी रूप में ऋणग्रस्त हैं। जन्म, मृत्यु, विवाह, सामूहिक भोज जैसे अवसरों के लिए ली गई ऋण की राशि द्वारा जनजातीय लोग भारत की सांस्कृतिक धरोहर जनजातियाँ अपने दायित्वों को पूरा करते हैं। यद्यपि सरकार की विभिन्न संस्थाओं आई.टी.डी.ए., सहकारी समितियों, बैंकों व जनजातीय कल्याण विभाग द्वारा नाममात्र के ब्याज पर ऋण की सुविधा उपलब्ध कराई गई है किन्तु अशिक्षा, अज्ञानता के कारण जनजातीय लोग अपनी जनजाति या महाजनों से ही ऋण लेना पंसद करते हैं। ऋणग्रस्तता के लिए निम्न कारण उत्तरदायी हैं-

⇒ नई वन नीति के कारण वन सम्पदा के उपयोग से वंचित,

⇒ जनजातीय कृषि भूमि का छोटा आकार व अनुपजाऊ होना,

⇒ उत्पादित वस्तुओं का उचित मूल्य प्राप्त ना होना,

⇒ खेतिहर मजदूरों की संख्या में वृद्धि होना,

⇒ मद्यपान व आय से अधिक खर्च करने की प्रवृत्ति,

⇒ ऋण लेने के लिए सरकारी संस्थाओं की अपेक्षा स्थानीय महाजनों पर निर्भरता।

     ऋणग्रस्तता की समस्या के कारण जनजातीय समाज का निरंतर विघटन हो रहा है क्योंकि गरीबी के कारण उचित मात्रा में भोजन का अभाव अनेक रोगों को जन्म देता है। साथ ही चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव होने के कारण बच्चों को शिक्षा प्राप्त नहीं होती। बाल श्रम, बंधुआ मजदूरी और कृषि भूमि से बेदखल होने की समस्याएं निरंतर बढ़ती जा रही हैं।

यातायात के साधनों का अभाव:-

     अधिकांश जनजातियाँ पहाड़ों, जंगलों और दूरवर्ती दुर्गम क्षेत्रों में निवास करती हैं जहां उनका अन्य लोगों से सम्पर्क नहीं हो पाता क्योंकि आवागमन के साधनों का अभाव है। अतः उन्हें जीवनयापन के उचित अवसर उपलब्ध नहीं होते हैं।

वन सम्पदा पर रोक:-

     जनजातीय क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की वन सम्पदा जैसे कीमती लकड़ी, फल-फूल, जड़ी-बूटियाँ, चाय बागान आदि प्रचुरता में उपलब्ध हैं जिनके कारण अनेक उद्योगों का विकास हुआ किन्तु इसका दुष्प्रभाव दो रूपों में पड़ा। बाह्य लोगों जैसे व्यापारी, महाजन, ठेकेदार, प्रशासक, पुलिस अधिकारियों के साथ समायोजन व्यवहार की समस्या तथा इनकी गरीबी व अशिक्षा का लाभ उठाकर बाह्य लोगों द्वारा इनका शोषण किया गया।

प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर रोक:-

      ब्रिटिश शासन से पूर्व ये जनजातियां राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र इकाइयां थीं। वन खनिज संपदा पर इनका एकाधिकार था किन्तु अंग्रेजों द्वारा सम्पूर्ण देश में एक राजनीतिक व्यवस्था स्थापित कर जनजातियों के अधिकार सीमित कर दिए गए और प्राकृतिक सम्पदा के उपभोग पर रोक लगा दी गई। नई प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था से संतुलन बनाने में जनजातीय समाज को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

धर्म परिवर्तन की समस्या:-

     ब्रिटिश शासनकाल में ही ईसाई मिशनरियों द्वारा उनके विकास, कल्याण के नाम पर आर्थिक प्रलोभन देकर उनका धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनाया गया जिसके फलस्वरूप अनेक आर्थिक व परसंस्कृति ग्रहण सम्बम्धी समस्याओं का विकास हुआ। मजूमदार तथा मदन के अनुसार भारतीय जनजातियों की अधिकांश समस्याएं उनके भौगोलिक पृथक्करण और नए सांस्कृतिक सम्पर्क का परिणाम हैं।

जनजातियों के उत्थान के लिये सरकार द्वारा उठाए गए कदम

       भारतीय संविधान में जहाँ एक ओर अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है तो वहीं दूसरी ओर, अनुसूची 6 में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध भी है। इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के अंतर्गत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे।    

      जनजातियों के उत्थान के लिए सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं-

शिक्षा

(i) एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (ईएमआरएस) की स्थापना करके दूर-दराज के इलाकों में आदिवासी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा रही है।

(ii) अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति (पीएमएस) और राजीव गांधी राष्ट्रीय फैलोशिप जैसी योजनाएँ चलाई जा रही हैं।

(iii) आदिवासी क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की जाती है।

आर्थिक विकास

(i) जनजातीय उत्पादन के विपणन को बढ़ावा दिया जाता है।

(ii) प्रधानमंत्री पीवीटीजी (Particularly Vulnerable Tribal Groups) विकास मिशन के तहत, कमजोर जनजातीय समूहों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने का काम किया जाता है।

सामुदायिक स्थिरता

(i) आदिवासी भूमि और संस्कृतियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है।

(ii) आदिवासी उप-योजना क्षेत्रों में आश्रम स्कूलों की स्थापना की जाती है।

(iii) आदिवासी महिलाओं और लड़कियों में साक्षरता के स्तर में अंतर को कम करने का काम किया जाता है।

     इनके अलावा, ग्राम पंचायतों और लोकसभाओं, विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण का भी प्रावधान किया गया है। 

1. Problem regions: Hilly regions (समस्याग्रस्त क्षेत्र: पहाड़ी क्षेत्र)

 1. Problem regions: Hilly regions

(समस्याग्रस्त क्षेत्र: पहाड़ी क्षेत्र)



परिचय:-

     पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसी समस्याएँ उत्पन्न होते हैं जो कि मैदानी क्षेत्रों की समस्याओं से अलग और विशिष्ट होते हैं। पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर हो गया है। जनसंख्या के बढ़ते दबाव ने कई तरह से तनाव और दबाव पैदा किया है और हालात ऐसे चरण में पहुँच रहे हैं जहाँ गंभीर उपायों की आवश्यकता है। सांस्कृतिक और सामाजिक-आर्थिक विविधताओं के अलावा भूभाग की विविधताओं के कारण नियोजन की पूरी तरह से अलग पद्धति तैयार करने की आवश्यकता है।

     देश के विभिन्न पहाड़ी क्षेत्रों के लिए क्षेत्र-विशिष्ट विकास रणनीतियों के निर्माण के लिए बुनियादी पूर्व शर्त के रूप में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विशेषताओं, संसाधन संपदा (मानव और भौतिक दोनों), विकास क्षमता और उनकी विशेष समस्याओं के बारे में विस्तृत जानकारी की आवश्यकता होती है।

      पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम के मार्गदर्शक सिद्धांत बुनियादी जीवन समर्थन प्रणाली को बढ़ावा देने और समग्र परिप्रेक्ष्य में भूमि, जल, खनिज और जैविक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग (पहाड़ी और मैदानी दोनों के हितों पर विचार करते हुए) पर आधारित हैं। पूरी रणनीति लोगों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति में उनकी सक्रिय भागीदारी पर केंद्रित होनी चाहिए। “सामाजिक बाड़बंदी” का तात्पर्य स्थानीय स्तर पर समाज के संसाधनों के प्रबंधन में स्वैच्छिक और स्व-लगाए गए अनुशासन से है।

पहाड़ी क्षेत्र:-

     भारत में पहाड़ी क्षेत्र देश के कुल भू-भाग का लगभग 17% हिस्सा हैं। ये क्षेत्र मोटे तौर पर दो श्रेणियों में आते हैं:-

(i) वे क्षेत्र जो राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सीमाओं के साथ-साथ विस्तृत हैं, और

(ii) वे जो राज्य का हिस्सा बनते हैं।

     पहली श्रेणी में उत्तर पूर्वी क्षेत्र के राज्य और केंद्र शासित प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं। इन्हें “विशेष श्रेणी के राज्य” कहा जाता है, जिनके व्यय को केंद्रीय सहायता से पूरा किया जाता है। उत्तर पूर्वी क्षेत्र के इन पहाड़ी राज्यों के एकीकृत विकास के लिए, केंद्र सरकार ने संसद के एक अधिनियम द्वारा 1971 में उत्तर पूर्वी पहाड़ी परिषद” की स्थापना की है।

     परिषद अपनी विकास योजना के तहत एक से अधिक राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों और पूरे क्षेत्र के लिए समान हित की योजनाओं को आगे बढ़ाती है। इसने बिजली उत्पादन, सड़कों के निर्माण, कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन आदि के अंतर-क्षेत्रीय कार्यक्रमों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह अनुसंधान और प्रयोगात्मक परियोजनाओं का भी समर्थन करता है।

      असम, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में उप-हिमालयी क्षेत्र में बड़े मिश्रित राज्य का हिस्सा बनने वाले पहाड़ी क्षेत्र हैं। इनमें असम के कार्बी आंगलोंग और उत्तरी कैचर जिले (15,200 वर्ग किमी), पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले (2400 वर्ग किमी) और उत्तराखंड के देहरादून, पौड़ी गढ़वाल, टिहरी गढ़वाल, चमोली, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और नैनीताल जिले (51,100) वर्ग किमी शामिल हैं।

    अन्य महत्वपूर्ण पहाड़ी क्षेत्र पश्चिमी घाटों तक फैले हुए हैं, जिनमें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा और केरल (1,34,500 वर्ग किमी) के 132 तालुका शामिल हैं। यहाँ उप-योजना की अवधारणा की शुरूआत से पहले विकास कार्यक्रमों के लिए केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है।

प्रमुख समस्याएँ:-

(i) वनों की कटाई,

(ii) मिट्टी का कटाव,

(iii) बाढ़ का खतरा,

(iv) कम उत्पादकता,

(v) वन आधारित उत्पादों में कमी,

(vi) भूमि-जल प्रबंधन का अभाव और

(vii) बढ़ती गरीबी।

पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान कार्यक्रम:-

(i) 5वीं पंचवर्षीय योजना- उपयोजना अवधारणा की शुरुआत

(ii) छठी पंचवर्षीय योजना- पारिस्थितिकी और विकास

(iii) 7वीं पंचवर्षीय योजना- पारिस्थितिकी विकास, पारिस्थितिकी संरक्षण

(iv) 8वीं पंचवर्षीय योजना- आधुनिक कृषि, लघु एवं कुटीर उद्योग, ग्रामीण उद्योग, भूमि-जल संसाधन, लोगों की भागीदारी

     इन पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की है। हालांकि, दूसरी पंचवर्षीय योजना के बाद से केंद्रीय सहायता की आवश्यकता महसूस की गई है। पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (एचएडीपी) के लिए केंद्रीय सहायता 5वीं पंचवर्षीय योजना के बाद से क्षेत्र और जनसंख्या को समान महत्व देते हुए घटक राज्यों को दी जा रही है।

    विशेष केंद्रीय सहायता (एससीए) गाडगिल फार्मूले के अनुसार विनियमित पहाड़ी क्षेत्रों के बीच आवंटित की जा रही है।

गाडगिल फार्मूला (1969-70):

      गाडगिल फार्मूला, वर्ष 1969 में धनंजय रामचंद्र गाडगिल ने तैयार किया था। इस फार्मूले के तहत भारत में राज्यों को योजनाओं के लिए केंद्र सरकार से सहायता राशि मिलती है। इसका इस्तेमाल 4थी और 5वीं पंचवर्षीय योजनाओं में किया गया था

      गाडगिल फार्मूला के तहत राज्यों को सहायता राशि देने का तरीका:

(i) 60 % राशि जनसंख्या के आधार पर दी जाती है।

(ii) 10 % राशि टैक्स एफर्ट के आधार पर दी जाती है।

(iii) 10 % राशि प्रति व्यक्ति आय के आधार पर दी जाती है।

(iv) 10 % राशि राज्य की खास समस्याओं के आधार पर दी जाती है।

(v) 10 % राशि सिंचाई और बिजली परियोजनाओं के लिए दी जाती है।

संशोधित गाडगिल फॉर्मूला (1980):   

     संशोधित गाडगिल फार्मूला, राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) ने अगस्त 1980 में मंजूरी प्रदान की थी। यह फार्मूला छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85) से लेकर सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) तक आवंटन का आधार बना। वर्ष 1990-91 में वार्षिक योजना के लिए भी इसका इस्तेमाल किया गया।

     संशोधित गाडगिल फार्मूला में ये बदलाव किए गए थे:

(i) 55% जनसंख्या के आधार पर

(ii) 25% PCI (प्रति व्यक्ति कर संग्रहण) के आधार पर

(iii) 5% राजकोषीय प्रबंधन के आधार पर।

(iv) 15% विशेष विकास समस्याओं के आधार पर।

योजना और कार्यक्रम:-

   पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम, बागवानी, कृषि, पशुपालन, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन, वानिकी, मृदा संरक्षण और उपयुक्त ग्राम उद्योगों के विकास के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए कार्यक्रमों के माध्यम से पहाड़ियों के स्वदेशी संसाधनों के दोहन पर पर्याप्त जोर देते हैं। मुख्य रूप से उन गतिविधियों के पैकेज पर ध्यान केंद्रित किया जाता है जिन्हें स्थानीय लोगों द्वारा अवशोषित किया जा सकता है। सहकारी समितियों या किसान समितियों को बहुत महत्व दिया गया है।

कार्यक्रम:-

(i) भूमि क्षरण को रोकना और फसल उत्पादकता बढ़ाना और भूमि जोतों का समेकन करना।

(ii) जनसंख्या नियंत्रण उपाय- परिवार नियोजन कार्यक्रम।

(iii) पूंजी और भौतिक योजनाओं की निगरानी के माध्यम से विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों में सुधार करना।

(iv) स्थानीय स्व-निकायों और अन्य के माध्यम से वनरोपण।

(v) कृषि-जलवायु क्षेत्रों, मिट्टी की उपयुक्तता परीक्षण के माध्यम से कृषि प्रथाओं में सुधार।

(vi) झूमियों के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किए गए हैं- झूम खेती को रोकने और उन्हें स्थायी कृषि प्रथाओं में पुनर्वासित करने के लिए।

(vii) रबड़ और कॉफी के बागान विकसित करने तथा ऐसे बागानों में झुमियों का पुनर्वास करने के लिए कृषि को प्रोत्साहित किया गया है।

(viii) पशुधन, चारागाह और वन की उपलब्धता को देखते हुए पशुपालन/पशुधन को प्रोत्साहित किया गया है।

(ix) कार्यक्रमों में वैज्ञानिक प्रजनन दृष्टिकोण, मजबूत सुरक्षात्मक और उपचारात्मक पशु स्वास्थ्य कवर तथा उत्पाद का प्रसंस्करण और विपणन भी शामिल है।

(x) वानिकी कार्यक्रमों में, बागान (कॉफी, चाय, मसाले आदि), कृषि वानिकी और सामाजिक वानिकी जैसे वानिकी उत्पादन पर जोर दिया गया है।

(xi) बागवानी कार्यक्रम में, बागों (सेब, अंगूर और केला) के विकास और उनके विपणन पर जोर दिया गया है।

(xii) पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसे उद्योग विकसित किए जा सकते हैं, जिनमें प्रदूषण रहित वातावरण, उच्च कौशल और उच्च मूल्य संवर्धन पर आधारित ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है- इलेक्ट्रॉनिक्स, घड़ी निर्माण, ऑप्टिकल ग्लास, फर्नीचर, दवाएँ और औषधियाँ। कालीन निर्माण और हथकरघा जैसे कुटीर उद्योग भी उपयुक्त गतिविधियाँ हैं।

(xiii) ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों का विकास।

(xiv) परिवहन और संचार के साधनों का विकास।

(xv) सुरक्षित उत्खनन और खनन।

(xvi) पर्यटन सबसे महत्वपूर्ण उद्योगों में से एक है, जिसका समुचित विकास किया जाना चाहिए।

(xvii) जैवमंडल रिजर्व, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के माध्यम से मूल्यवान वनस्पतियों और जीवों की प्रस्तुति के लिए एक एकीकृत रणनीति बनाई जानी चाहिए।

(xviii) पर्यावरण संबंधी मुद्दों के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए गतिविधियों में लोगों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर जोर दिया जाना चाहिए।

(xix) पहाड़ी क्षेत्रों में कोई भी गतिविधि करते समय पारिस्थितिकी संरक्षण को ध्यान में रखा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, एक पेपर प्रोजेक्ट में वनरोपण की लागत शामिल होनी चाहिए और इसके अनुसार इसकी आर्थिक व्यवहार्यता निर्धारित की जानी चाहिए।

(xx) पहाड़ी क्षेत्रों की वैज्ञानिक योजना के लिए उपलब्ध संसाधनों-मिट्टी, पानी, खनिज, वनस्पति आदि के बारे में जानकारी आरएस और जीआईएस के माध्यम से प्राप्त की जानी चाहिए।

(xxi) पहाड़ी क्षेत्रों में अधिकतम लाभ प्राप्त करने और संबंधित क्षेत्र के विकास को आगे बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल विकास रणनीतियों को अपनाना होगा।

सिफारिशें:-

1. विकासात्मक क्षेत्र:

     टास्क फोर्स ने सिफारिश की है कि प्राकृतिक संसाधन दोहन और संरक्षण के बीच संतुलन उत्तरार्द्ध के पक्ष में होना चाहिए। उपयुक्त गतिविधियों के लिए क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए जैसे कि:-

(i) बर्फ, अल्पाइन, उप-अल्पाइन क्षेत्रों और संरक्षित परिदृश्यों के क्षेत्रों को किसी भी कीमत पर संरक्षित किया जाना चाहिए, महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के प्रवाह को बनाए रखने और धर्म-सांस्कृतिक मूल्यों का सम्मान और संरक्षण करने के लिए।

(ii) सभी प्राकृतिक जल क्षेत्रों (ग्लेशियर, नदियाँ, झीलें और झरने) को सख्ती से संरक्षित किया जाना चाहिए। किसी भी क्षेत्र में ऐसी गतिविधियाँ जो किसी भी तरह से प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं, उन्हें प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक झरने हैं, उन्हें “स्प्रिंग अभयारण्य” में परिवर्तित किया जाना चाहिए और इस अवधारणा को सभी नियोजन में शामिल किया जाना चाहिए।

(iii) वन क्षेत्र को पर्यावरण सेवाओं और जैव विविधता मूल्यों के लिए संरक्षित और संवर्धित किया जाना चाहिए। ऐसे क्षेत्र टिकाऊ जैव और Non-timber forest products (NTFPs) के लिए भी उपलब्ध होने चाहिए, जिसमें बांस, पूर्वेक्षण और इको-पर्यटन शामिल हैं

(iv) निचले इलाकों में उपजाऊ नदी घाटियों के क्षेत्रों का उपयोग कृषि उत्पादन को अधिकतम करने के लिए किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसे क्षेत्रों में कृषि भूमि को अन्य उपयोगों में बदलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। जिन क्षेत्रों में स्थानान्तरित या सीढ़ीनुमा कृषि की जाती है, उन्हें विशिष्ट फसलों, जैविक कृषि, बागवानी, कृषि-वानिकी तथा बेहतर प्रबंधन पद्धतियों को अपनाने के लिए चिन्हित किया जाना चाहिए।

(v) घरेलू तथा लघु उद्योगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विकेंद्रीकृत विद्युत उत्पादन हेतु नदी क्षेत्रों को चिन्हित किया जाना चाहिए।

2. सड़क, रेल तथा हवाई सम्पर्क: 

     टास्क फोर्स ने दो लूप रेलवे लाइनों की सिफारिश की है, एक पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र के लिए जो जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को जोड़ेगी और दूसरी उत्तर पूर्वी क्षेत्र के लिए। इन दो लूपों को उत्तर और पूर्वी रेलवे के मौजूदा राष्ट्रीय नेटवर्क के माध्यम से एक दूसरे से जोड़ा जाना चाहिए।

     उपर्युक्त कार्यों को करने के लिए International Health Regulations (IHR) के सड़क नेटवर्क को उचित स्थानों पर रेल नेटवर्क से जोड़ा जाना चाहिए। सड़क नेटवर्क को हवाई सेवाओं से भी जोड़ा जाना चाहिए ताकि जल्दी खराब होने वाले सामान और आपातकालीन स्वास्थ्य की आवश्यकता वाले लोगों को देश के बाकी हिस्सों या बाहर तक पहुँचने के अवसर प्रदान किए जा सकें।

     टास्क फोर्स ने सिफारिश की है कि प्रत्येक IHR राज्य में बड़े हेलीकॉप्टरों और छोटे उड़ान भरने और उतरने वाले विमानों को स्वीकार करने के लिए कम से कम एक छोटी हवाई पट्टी होनी चाहिए।

अन्य अनुशंसाएँ:

1. पर्वतीय परिप्रेक्ष्य और संवेदनशीलता

2. शिक्षा और कौशल विकास

3. प्राकृतिक संसाधन विश्लेषण और परामर्श केंद्र

4. रणनीतिक पर्यावरण मूल्यांकन

5. वित्तीय प्रोत्साहन, पुरस्कार और छूट

6. IHR राज्यों के बीच संसाधन साझा करना

7. जलमार्ग और रोपवे

8. अपशिष्ट प्रबंधन

9. आपदा तैयारी और शमन

10. उद्योग

11. जलवायु परिवर्तन

12. हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन



नोट

पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (Hill Area Development Programme):-

     पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (HADP) 5वीं पंचवर्षीय योजना में आरम्भ हुआ जिसमें  उत्तराखण्ड, मिकिर पहाड़ी और असम की उत्तरी कछार की पहाड़ियाँ, पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग जिला तथा तमिलनाडु के नीलगिरि इत्यादि को मिलाकर कुल 15 जिलों को शामिल किया गया हैं। पिछड़े क्षेत्रों के विकास के लिए बनी राष्ट्रीय समिति ने सन् 1981 में सिफारिश किया था कि देश के उन सभी पर्वतीय क्षेत्रों को पिछड़े पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल कर लिया जाए जिनकी ऊँचाई 600 मीटर से अधिक है और जिनमें जनजातीय उपयोजना लागू नहीं है।

      राष्ट्रीय समिति ने पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के लिए जो सुझाव दिए, उनमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा गया था:-

(i) कार्यक्रम का लाभ पहाड़ी क्षेत्र के सभी लोगों तक पहुँच सके।

(ii) स्थानीय संसाधनों तथा प्रतिभाओं का विकास हो सके।

(iii) पहाड़ी लोग अपनी जीविका-निर्वाह अर्थव्यवस्था को निवेश-उन्मुखी बनाएँ व कुछ लाभ कमाना सीखें।

(iv) अन्तः प्रादेशिक व्यापार में पिछड़े अर्थात् पर्वतीय क्षेत्रों का शोषण न होने पाए।

(v) पिछड़े क्षेत्रों की बाजार व्यवस्था में पर्याप्त सुधार करके श्रमिकों को लाभ पहुँचाना।

(vi) पारिस्थितिकीय सन्तुलन बनाए रखना।

     इस कार्यक्रम के तहत पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की योजनाएँ बनाते समय उनकी स्थलाकृति, पारिस्थितिकी व सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दशाओं को ध्यान में रखा गया था।

उद्देश्य:-

    इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्थानीय लोगों को पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन, मृदा संरक्षण, वृक्षारोपण तथा उद्यान खेती इत्यादि का प्रशिक्षण देकर तथा उन्हें इन कार्यक्रमों में शामिल करके स्थानीय संसाधनों का दोहन करना था।

44. Types of Soil, Distribution, Causes of Erosion and Methods for Conservation of India (भारत की मृदा के प्रकार, वितरण, अपरदन के कारण एवं संरक्षण के उपाय)

44. Types of Soil, Distribution, Causes of Erosion and Methods for Conservation of India

(भारत की मृदा के प्रकार, वितरण, अपरदन के कारण एवं संरक्षण के उपाय)



            मृदा (मिट्टी) पृथ्वी की ऊपरी परत है जो पौधों की वृद्धि के लिये प्राकृतिक स्रोत के रूप में पोषक तत्त्व, जल एवं अन्य खनिज लवण प्रदान करती है। पृथ्वी की यह ऊपरी परत खनिज कणों तथा जीवांश का एक मिश्रण है जो लाखों वर्षों में निर्मित हुई है।

सामान्यतः मिट्टी की कई परतें होती हैं, जिसमें सबसे ऊपरी परत में छोटे मिट्टी के कण, सड़े-गले हुए पेड़-पौधों एवं जीवों के अवशेष होते हैं। यह परत फसलों की पैदावार के लिये बहुत उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण होती है।

इस तरह मृदा शैलों के अपक्षयण व विघटन से उत्पन्न भूपदार्थों, मलवा और विविध जैव सामग्रियों का सम्मिश्रण होती है, जो पृथ्वी की सतह (भू-पर्पटी की सतह) पर विकसित होती है।

दूसरी परत महीन कणों (जैसे-चिकनी मिट्टी) की होती है, जिसके नीचे विखंडित चट्टानें एवं मिट्टी का मिश्रण होता है तथा इसके नीचे अविखंडित सख्त चट्टानें होती हैं। यह कुछ सेमी. से लेकर कई मीटर तक हो सकती हैं।

पौधों की वृद्धि सामान्यतः 6.0-7.0 pH मान वाले मृदा में होती है। इसी pH मान के मध्य पौधे अपनी सारी क्रियाएँ करते हैं। अधिक अम्लीय अथवा क्षारीय मृदा पौधों के लिये हानिकारक होती है।

ह्यूमस, खनिज तत्व, जल एवं वायु मृदा के मुख्य घटक होते हैं। इन घटकों का संयोजन (अनुपात) मृदा के प्रकार को निर्धारित करता है।

मृदा परिच्छेदिका (Soil Profile):- 

     धरातल के ऊपरी सतह से जब नीचे की ओर बढ़ते हैं तो आधारभूत शैल तक मृदा के संघटकों तथा रासायनिक भौतिक गुणों में क्रमशः परिवर्तन होता जाता है। इन परिवर्तनों के आधार पर समस्त मृदामंडल को विशिष्ट स्तरों (distinct layers) में बाँटा गया है। ये स्तर ‘मृदा संस्तर’ (soil horizons) कहलाते हैं।

     ये संस्तर मोटे तौर पर मृदा-सतह के समानांतर एवं क्षैतिज अवस्था में होते हैं। मृदा के वैसे लम्बवत् खण्ड (vertical section), जिसमें मृदा के समस्त संस्तर शामिल हों, ‘मृदा परिच्छेदिका’ कहलाते हैं। मृदा परिच्छेदिका को मुख्य रूप से तीन संस्तरों में विभाजित किया जाता है:-

(i) जैविक संस्तर,

(ii) खनिज संस्तर एवं

(iii) आधार शैल संस्तर।

(i) जैविक संस्तर (Organic horizons):-

     मृदा परिच्छेदिका का सबसे ऊपरी संस्तर जैविक संस्तर कहलाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अन्य संस्तरों की तुलना में इसमें जैविक पदार्थों की बहुलता होती है। इस संस्तर को दो भागों में बाँटा जाता है:-

(क) O1 संस्तर:-

    यह सबसे ऊपरी संस्तर है जिसमें जीवित जैविक पदार्थ (वनस्पति एवं जंतु) के अलावा अनपघटित एवं आंशिक रूप से अपघटित जैविक पदार्थों की बहुलता होती है।

(ख) O2 संस्तर:-

    यह O1 के नीचे पाया जाने वाला संस्तर है। इसमें भी जैविक पदार्थों की अधिकता होती है, लेकिन ये अपघटित एवं ह्यूमस रूप में पाए जाते हैं। इसी कारण, इसे ‘ह्यूमस संस्तर’ भी कहा जाता है।

(ii) खनिज संस्तर (Mineral horizons):-

      यह जैविक संस्तर के नीचे पाया जाता है। इस संस्तर को तीन भागों में बाँटा जाता है-A संस्तर, B संस्तर एवं C संस्तर।

(क) A संस्तर:-

    यह खनिज संस्तर का सबसे ऊपरी स्तर है। इसमें सिलिकेट, एल्युमिनियम, लौह अयस्क, क्ले आदि खनिजों के साथ अल्प मात्रा में अपघटित जैविक तत्व भी पाए जाते हैं। इस संस्तर से खनिज पदार्थों का नीचे की और स्थानांतरण या अपवहन होता है, अतः इसे ‘अपवहन मंडल’ (eluviation zone) भी कहा जाता है।

(ख) B संस्तर:-

     संस्तर A से अपवहित होते खनिज पदार्थ इस संस्तर में आकर विनिक्षेपित या जमा हो जाते हैं, अतः इस संस्तर को ‘विनिक्षेपण मंडल’ (illuviation zone) भी कहा जाता है।

(ग) C संस्तर:-

     इस संस्तर में आधार शैल के ऋतुक्षरित चट्टानी टुकड़े असंगठित रूप में पाए जाते हैं। इस संस्तर को ‘अद्योस्तर संस्तर’ (subsurface horizon) एवं ‘ग्ले परत’ भी कहा जाता है।

(iii) आधार शैल संस्तर (Parent rock horizons):-

       इसे ‘D’ या ‘R’ से संबोधित किया जाता है। ऋतुक्षरण का प्रभाव यहाँ नहीं पड़ता है। अतः आधारभूत चट्टान संगठित एवं दृढ़ रूप में पायी जाती है।

     उपर्युक्त वर्णित मृदा-परिच्छेदिका एक आदर्श मृदा परिच्छेदिका का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसी परिच्छेदिका का विकास अत्यंत लम्बी अवधि के बाद तब होता है, जब मृदा-निर्माण की प्रक्रिया अपने आधार शैल क्षेत्र में ही सम्पन्न होती है। एक आदर्श मृदा-परिच्छेदिका में निम्न विशेषताएँ पाई जाती हैं:-

(i) मृदा-परिच्छेदिका में ऊपर से नीचे जाने पर जैविक पदार्थों (जीवित पदार्थ, मृत-अनपघटित या अपघटित पदार्थ तथा ह्यूमस) की मात्रा क्रमशः घटती जाती है।

(ii) ऊपर से नीचे जाने पर वायु की मात्रा क्रमशः घटती जाती है।

(iii) ऊपर से नीचे जाने पर खनिज पदार्थों की मात्रा एवं प्रकार में वृद्धि होती जाती है।

(iv) ऊपर से नीचे जाने पर जल की मात्रा में वृद्धि या हास की कोई निश्चित प्रवृत्ति (trend) नहीं पायी जाती है। किसी भी गहराई पर जल की मात्रा में ह्रास या वृद्धि हो सकती है।

Types of Soil

मृदा का प्रकार (Types of Soil)

     भारत एक विशाल देश है, जहाँ विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं। यहाँ की मिट्टी के क्षेत्रीय वितरण में असमानता का मुख्य कारण वनस्पति, उच्चावच, तापमान, वर्षा तथा आर्द्रता जैसे जलवायविक तत्त्वों में भिन्नता का होना है।

⇒ मिट्टी में पौधे एवं जंतु निरंतर सक्रिय रहते हैं, जिससे मिट्टी में परिवर्तन होता रहता है इसलिये मिट्टी को गतिशील कार्बनिक एवं खनिज पदार्थों का प्राकृतिक समुच्चय भी कहते हैं।

⇒ मृदा निर्माण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में उच्चावच, जनक सामग्री (चट्टानें), जलवायु, वनस्पति, समय इत्यादि हैं। मानवीय क्रियाएँ भी मृदा को प्रभावित करती हैं। भिन्न-भिन्न भौगोलिक वातावरण में भिन्न-भिन्न प्रकार की मृदा पाई जाती है।जो निम्न हैं:-

1. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil):-

     जलोढ़ मृदा मूलतः हिमालय से निकलने वाली नदियों के द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेपों से या सागर द्वारा पश्चगमन (पीछे हटने) के उपरांत छोड़े गए गाद से बनी है। इसे ‘काँप मृदा’ या ‘कछारी मिट्टी’ भी कहते हैं।

⇒ भारत के उत्तरी मैदान में जलोढ़ मृदा का सर्वाधिक विकास हुआ है। इसके अतिरिक्त, तटीय मैदान एवं प्रायद्वीपीय भारत के नदी बेसिन एवं डेल्टाई भागों में भी यह मृदा पाई जाती है।

⇒ इस मिट्टी का विस्तार लगभग 15 लाख वर्ग किलोमीटर तक है। भारत में सबसे अधिक भू-भाग पर जलोढ़ मिट्टी ही पाई जाती है।

⇒ विभिन्न स्रोतों से प्राप्त अवसादों के निक्षेपण से इस मृदा का विकास होने के कारण अन्य मिट्टियों की अपेक्षा इसमें खनिज विविधता भी अधिक होती है, जो कृषि के लिये अधिक उपयोगी होती है। इस प्रकार की मृदा पर प्रायः गहन कृषि की जाती है।

⇒ इसमें पोटाश (सर्वाधिक मात्रा) एवं चूने की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है, जबकि फॉस्फोरस, नाइट्रोजन तथा ह्यूमस की कमी होती है।

⇒ जलोढ़ मृदाएँ गठन में बलुई दोमट से चिकनी मिट्टी (मृत्तिका दोमट) की प्रकृति की पाई जाती हैं।

बलुई दोमट मृदा की जलधारण क्षमता सबसे कम होती है, क्योंकि इसमें भारी मात्रा में रवे होते हैं जबकि चिकनी जलोढ़ मिट्टी में जल धारण की क्षमता सबसे अधिक होती है।

⇒ भारत में जलोढ़ मृदा के अधिकांश क्षेत्र का संबंध अर्द्ध शुष्क जलवायु प्रदेश से होने के कारण ही इनके ऊपर की परतों में क्षारीय तत्त्वों की अधिकता रहती है। इसका रंग हल्के धूसर से राख धूसर जैसा होता है जो निक्षेपण की गहराई, गठन व निर्माण में लगने वाली समयावधि पर निर्भर करता है।

⇒ सतलज-यमुना का मैदान, पंजाब, हरियाणा तथा ऊपरी गंगा के मैदान में प्राचीन जलोढ़ मिट्टी (बांगर) पाई जाती है। मध्य एवं निम्न मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ के कारण मृदा का नवीनीकरण होता है। इसे ‘नवीन जलोढ़ मृदा’ अथवा ‘खादर’ कहते हैं। गंगा के मैदानी भागों में इसकी गहराई लगभग 2,000 मीटर तक है।

⇒ इस मिट्टी में मुख्यतः गेहूँ, गन्ना, जौ, दालें, तिलहन और गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी में जूट की फसलें उगाई जाती हैं।

⇒ इस मृदा में सामान्यतः मृदा संस्तर (Soil Profile) नहीं पाया जाता है।

⇒ जलोढ़ मृदा को सामान्यतः 4 वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) भाबर,

(ii) तराई,

(iii) बांगर,

(iv) खादर

2. लाल-पीली मृदा (Red-Yellow Soil):-

    यह भारत की दूसरी प्रमुख मृदा है, जिसका विकास दक्कन के पठार के पूर्वी तथा दक्षिणी भाग में कम वर्षा वाले उन क्षेत्रों में हुआ है, जहाँ रवेदार आग्नेय चट्टानें (ग्रेनाइट तथा नीस) पाई जाती हैं।

⇒ इसके अतिरिक्त पश्चिमी घाट के गिरिपद क्षेत्रों, ओडिशा तथा छत्तीसगढ़ के कुछ भागों तथा मध्य गंगा के मैदान के दक्षिणी भागों में भी इस मृदा का विकास हुआ है।

⇒ प्रायद्वीपीय पठार के अधिकांश क्षेत्रों में इस मिट्टी का विकास होने के कारण इसे ‘मंडलीय मृदा’ भी कहते हैं।

⇒ लोहे के ऑक्साइड (मुख्यतः फेरिक ऑक्साइड) की उपस्थिति के कारण ही इस मिट्टी का रंग लाल होता है।

⇒ इस मृदा में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश एवं ह्यूमस की कमी होती है। यह स्वभाव से अम्लीय प्रकृति की होती है।

⇒ महीन कण वाली लाल व पीली मृदाएँ सामान्यतः उर्वर होती हैं, जबकि मोटे कणों वाली मृदाएँ अनुर्वर होती हैं।

⇒ लाल मृदा ऊँची भूमियों पर बाजरा, मूंगफली और आलू की खेती के लिये उपयोगी है, जबकि निम्न भूमियों पर इसमें चावल, रागी, तंबाकू तथा सब्जियों आदि की खेती की जाती है।

3. काली/रेगुर मृदा (Black/Regur Soil):-

    इस मृदा का निर्माण दरारी उद्दभेदन से निकले लावा पदार्थों (बेसाल्ट चट्टान) के विखंडन से हुआ है।

⇒ यह भारत की तीसरी प्रमुख मृदा है। इसका सर्वाधिक विकास महाराष्ट्र के ‘दक्कन ट्रैप’ के उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र में हुआ है। इसके अलावा यह मध्य प्रदेश के मालवा पठार, गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप, कर्नाटक के बंगलूरू-मैसूर पठार, तमिलनाडु के कोयंबटूर पठार, आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना के पठार और छोटानागपुर के राजमहल पर्वतीय क्षेत्र में पाई जाती है।

⇒ यह मिट्टी कपास की खेती के लिये अधिक उपयोगी एवं विख्यात है, इसलिये इसे ‘काली कपासी मिट्टी’ या ‘रेगुर’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके अतिरिक्त इसे ‘उष्ण कटिबंधीय चेरनोज़म’ व ‘ट्रॉपिकल ब्लैक अर्थ’ भी कहते हैं। उत्तर प्रदेश में इस मृदा को ‘करेल’ की संज्ञा दी जाती है। कपास के अतिरिक्त यह मृदा गन्ना, गेहूँ, प्याज और फलों की खेती करने के लिये अनुकूल है।

⇒ काली मृदा मृणमय, गहरी और अपारगम्य होने के कारण, गीली होने पर चिपचिपी हो जाती है तथा शुष्क होने पर इसमें बड़ी-बड़ी दरारें बन जाती हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि इनकी स्वतः जुताई हो गई है इसलिये इसे ‘स्वतः जुताई वाली मृदा’ के नाम से भी जाना जाता है।

⇒ इस मृदा की जलधारण क्षमता अत्यधिक होती है, जिसके कारण सिंचाई की कम आवश्यकता पड़ती है। इसकी एक अन्य विशेषता यह है कि शुष्क ऋतु में भी यह मृदा अपने में नमी बनाए रखती है। यही कारण है कि शुष्क प्रदेशों में भी काली मृदा की उपस्थिति के कारण नमी आधारित फसलें उत्पादित की जाती हैं।

⇒ ह्यूमस, एल्युमीनियम एवं लोहा के टाइटेनीफेरस मैग्नेटाइट यौगिक की उपस्थिति के कारण ही इस मिट्टी का रंग ‘काला’ होता है।

⇒ इस मिट्टी में (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व जैव तत्त्वों की मात्रा कम) होती है तथा पोटाश, एल्युमीनियम, मैग्नीशियम कार्बोनेट की पर्याप्त मात्रा) पाई जाती है।

4. लैटेराइट मृदा (Laterite Soil):-

     इस मृदा का विकास उन क्षेत्रों में होता है, जहाँ उच्च तापमान एवं भारी वर्षा होती है। अधिक वर्षा के कारण जल के साथ चूना और सिलिका का निक्षालन हो जाता है तथा लोहे के ऑक्साइड और एल्युमीनियम के यौगिक मृदा में शेष बचे रहते हैं।

⇒ यह साधारणतः लाल-भूरे रंग की होती है एवं मुख्य रूप से पश्चिमी घाट के पर्वतों के गिरिपद क्षेत्रों में एक लंबी पट्टी के रूप में केरल (मालाबार प्रदेश), कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा के पठारी क्षेत्रों, राजमहल पहाड़ी क्षेत्रों, छोटानागपुर के पठार, असम के पहाड़ी क्षेत्रों एवं मेघालय के पठार में पाई जाती है।

⇒ उच्च तापमानों में आसानी से पनपने वाले जीवाणु, ह्यूमस की मात्रा को तीव्र गति से नष्ट या समाप्त कर देते हैं, जिसके कारण इसमें जैव पदार्थ, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और कैल्शियम की कमी होती है।

⇒ यह मृदा रबड़ और कॉफी की फसल के लिये सबसे अच्छी मानी जाती है।

⇒ इस मिट्टी में मुख्यतः चाय, कहवा, रबड़, सिनकोना, काजू, मोटे अनाजों एवं मसालों की कृषि की जाती है परंतु इसे कृषि के दृष्टिकोण से कम उपजाऊ मृदा की श्रेणी में रखते हैं।

⇒ यह मृदा सूखने के बाद बहुत कड़ी तथा पथरीली हो जाती है, इसलिये लैटेराइट मृदा का प्रयोग मकान निर्माण के प्रयोग में आने वाले ‘ईंटों’ के निर्माण में भी किया जाता है।

5. पर्वतीय मृदा (Hilly Soil):-

    हिमालय पर्वतीय क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी भाग तथा प्रायद्वीपीय भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में यह मिट्टी पाई जाती है।

⇒ इस मृदा के निर्माण पर पर्वतीय पर्यावरण का अधिक प्रभाव पड़ता है। पर्वतीय पर्यावरण में परिवर्तन के अनुरूप मृदा की संरचना व संघटन में भी परिवर्तन होता है। घाटियों में प्रायः यह दुमटी तथा ऊपरी ढालों पर इनकी प्रकृति मोटे कणों वाली होती है; साथ ही ऊपरी ढालों की अपेक्षा निचली घाटियों में ये मृदाएँ अधिक उर्वर होती हैं।

⇒ पर्वतीय मृदा का विकास सामान्यतः पर्वतों के ढालों पर होता है तथा मृदा अपरदन की समस्या से प्रभावित होने के कारण यह पतली परतों के रूप में पाई जाती है। अतः साधारणतया यह अप्रौढ़ (Immature) मृदा है।

⇒ पर्वतीय मृदा अम्लीय प्रकृति की होती है, क्योंकि यहाँ जीवाश्मों की अधिकता होने के बावजूद भी जीवाश्मों का अपघटन नहीं हो पाता है। इसमें पोटाश, फॉस्फोरस एवं चूने की कमी होती है।

⇒ इस मृदा में गहराई कम होती है तथा यह संरध्रयुक्त होती है।

⇒ पहाड़ी ढालों पर विकसित होने के कारण यह मृदा बागानी कृषि, जैसे-चाय, कहवा, मसालों एवं फलों की खेती के लिये बहुत उपयोगी होती है।

6. शुष्क अथवा मरुस्थलीय मृदा (Arid or Desert Soil):-

    शुष्क मृदा का विकास अत्यधिक तापमान वाले शुष्क जलवायवीय क्षेत्रों में हुआ है। इन क्षेत्रों में नगण्य वर्षा व अत्यधिक वाष्पीकरण के कारण मृदा में कम नमी तथा कार्बनिक तत्त्वों की अल्पता होने से ह्यूमस का अभाव पाया जाता है। अतः इसे कृषि के दृष्टिकोण से अनुर्वर मृदा के अंतर्गत रखा जाता है।

⇒ यह मृदा देश की कुल मृदाओं का लगभग 4.32 प्रतिशत है।

⇒ पश्चिमी राजस्थान, द‌क्षिणी पंजाब, पश्चिमी हरियाणा व उत्तरी गुजरात के शुष्क प्रदेशों में यह मिट्टी पाई जाती है।

⇒ इस मृदा में रेत सर्वाधिक मात्रा में पाई जाती है। इसमें कैल्शियम, लोहा और फॉस्फोरस भी पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं किंतु नाइट्रोजन एवं ह्यूमस का अभाव होता है, जिसके कारण यह संरचना के दृष्टिकोण से बलुई तथा प्रकृति के दृष्टिकोण से क्षारीय/लवणीय मृदा होती है, जो फसलों के लिये अनुपजाऊ होती है।

⇒ इस मृदा में सामान्यतः कम जल की आवश्यकता वाली फसलों को उगाया जाता है, जैसे-ज्वार, बाजरा, रागी, तिलहन आदि।

7. लवणीय मृदा (Saline Soil):-

    लवणीय मृदा का विकास शुष्क व अर्द्धशुष्क जलवायु तथा जलाक्रांत व अनूप क्षेत्रों में होता है। ये मृदा संरचना की दृष्टि से बलुई से लेकर दोमट तक हो सकती है। चूँकि इनमें लवणों की अधिकता होती है, अतः इनमें सोडियम, पोटैशियम व मैग्नीशियम के अनुपात की अधिकता तथा नाइट्रोजन व चूने की अल्पता पाई जाती है।

⇒ लवणीय मृदा को कृषि के दृष्टिकोण से अनुर्वर मृदा के अंतर्गत रखा जाता है, साथ ही इनमें वनस्पतियों का अभाव भी पाया जाता है।

⇒ लवणीय मृदा का अधिकतर प्रसार पश्चिमी गुजरात, पूर्वी तट के डेल्टाओं व सुंदरबन क्षेत्रों में पाया जाता है। इसके अलावा कच्छ के रन में भी लवणीय मृदा का प्रसार पाया जाता है, जिसके लिये दक्षिणी-पश्चिमी मानसून प्रमुख रूप से उत्तरदायी है।

⇒ शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में गहन कृषि के कारण सिंचाई के अतिरेक से केशिकत्व क्रिया को बढ़ावा मिलता है, जिसमें मृदा के ऊपरी परत पर सोडियम, पोटैशियम एवं कैल्शियम के लवणों एवं क्षारों का जमाव होता है। फलतः मृदा न केवल लवणीय मृदा में परिवर्तित हो जाती है बल्कि इसकी उर्वरता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

⇒ पंजाब व हरियाणा के क्षेत्रों में अतिरेक सिंचाई के कारण लवणीय मृदा के प्रसार में वृद्धि हो रही है। जिससे उपजाऊ जलोढ़ मृदा अनुर्वर मृदा में परिवर्तित होती जा रही है। यहाँ इस प्रकार की मृदा को रेह, ऊसर एवं कल्लर कहते हैं।

जिप्सम तथा पाइराइट का प्रयोग कर लवणीय मिट्टियों को कृषि योग्य बनाया जा सकता है।

⇒ भारत के हरित क्रांति वाले क्षेत्रों में नहरों के आस-पास लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी में अधिक तेजी से वृद्धि हुई है, जिसके कारण बंजर भूमि की समस्या उत्पन्न हुई है।

⇒ इस प्रकार की मृदाओं में बरसीम, धान, गन्ना, अमरूद, आँवला, फालसा तथा जामुन जैसी लवण प्रतिरोधी फसलें व फल वृक्ष लगाये जाते हैं।

8. पीट एवं जैव मृदा (Peat and Biotic Soil):-

    इस मृदा का निर्माण नदियों के द्वारा निर्मित डेल्टाई क्षेत्रों में जल का भराव होने के कारण हुआ है।

⇒ इस मृदा में भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन नगण्य होने के कारण अविघटित कार्बनिक पदार्थों की मात्रा अधिक होती है, जिसके कारण मृदा की अम्लीयता भी अपेक्षाकृत अधिक हो जाती है। यह उच्च लवणीय मृदा है, लेकिन इसमें पोटाश तथा फॉस्फेट की कमी होती है।

⇒ ये अम्लीय स्वभाव की होती है तथा फेरस आयरन होने से प्रायः इनका रंग नीला होता है।

⇒ भारत में पीट मृदा वाले क्षेत्रों में ही ‘मैंग्रोव वनस्पति’ का अधिक विकास हुआ है।

⇒ यह भारत में मुख्यतः केरल के अलप्पुझा ज़िला, उत्तराखंड के अल्मोड़ा एवं सुंदरबन डेल्टा में पाई जाती है।

⇒ यह हल्की उर्वरता वाली फसलों हेतु उपयुक्त मृदा है।

⇒ उपयुक्त दशा में वनस्पति की संवृद्धि के कारण इसमें जीवाश्म के अंश एवं ह्यूमस अधिक मात्रा में पाये जाते हैं, जिस कारण यह मृदा गहरे काले रंग की होती है।

मृदा अवकर्षण (Degradation):-

      मृदा में उर्वरता के ह्रास को ही ‘मृदा अवकर्षण’ कहते हैं।

⇒ इसमें मृदा का पोषण स्तर गिर जाता है तथा मृदा के दुरुपयोग एवं अपरदन के कारण मृदा की गहराई या परत की मोटाई कम हो जाती है।

⇒ मृदा अवकर्षण की दर भू-आकृतिक संरचना, पवनों की गति तथा वर्षा की मात्रा के अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्न भिन्न होती है।

मृदा अपरदन (Soil Erosion):-

     ‘मृदा अपरदन’ का तात्पर्य मृदा के ऊपरी संस्तरों का विनाश है। प्राकृतिक व मानवीय गतिविधियों से अपरदनात्मक प्रक्रियाओं द्वारा मृदा की ऊपरी परत का क्षरण होता है, जिसे ‘मृदा अपरदन’ की संज्ञा दी जाती है।

⇒ प्राकृतिक रूप से होने वाले मृदा अपरदन व मृदा निर्माण प्रक्रिया में एक प्रकार का संतुलन पाया जाता है किंतु मानवीय हस्तक्षेप द्वारा इस संतुलन में अव्यवस्था उत्पन्न होने से मृदा अपरदन की दर में वृद्धि होती है।

⇒ मृदा अपरदन के लिये उत्तरदायी अपरदनात्मक कारकों में परिवहित जल, प्रवाहित पवन, कृषि व पशुचारण की अवैज्ञानिक पद्धतियाँ, मानव बस्तियों का निर्माण, खनन व अन्य मानवीय गतिविधियों को शामिल किया जाता है।

मृदा अपरदन के कारण (Causes of Soil Erosion)

(i) निर्वनीकरणः-

     वन, पानी के बहाव तथा वायु की गति को कम करता है। वृक्षों की जड़ें मिट्टी को जकड़कर रखती हैं किंतु वृक्षों के अविवेकपूर्ण दोहन तथा कटाई से अपरदन की तीव्रता बढ़ती है।

(ii) अत्यधिक पशुचारणः-

     इससे मिट्टी का गठन ढीला हो जाता है। फलतः जलीय एवं वायु अपरदन तीव्र हो जाता है।

(iii) जलीय अपरदनः-

     जल द्वारा मिट्टी के घुलनशील पदार्थों को घुलाकर एक स्थान से दूसरे स्थान के लिये परिवहित करना जलीय अपरदन कहलाता है। जल के भार/चोट से उत्पन्न दबाव के कारण मिट्टी का स्थानांतरण ‘जलगति क्रिया’ कहलाती है। इसमें वर्षा की प्रमुख भूमिका होती है, क्योंकि अत्यधिक वर्षा वाले स्थानों में वर्षा के जल तथा बाढ़ से समस्याग्रस्त होने के बाद मृदा अपरदन की संभावना सर्वाधिक होती है।

(iv) वायु अपरदनः-

     तीव्र पवनों द्वारा सूक्ष्म कणों को अपने साथ उड़ाकर ले जाना ‘अपवहन’ कहलाता है। मृदा अपरदन चक्रवातों द्वारा भी होता है, जिसमें चक्रवात मिट्टी को उड़ाकर छोटे गर्त बना देते हैं।

     भारत में मई तथा जून माह में रबी की फसलों की कटाई के पश्चात् सतलुज-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान की उपजाऊ मिट्टी का भी पवन द्वारा पर्याप्त मात्रा में दोहन/अपरदन होता है।

(v) हिमानी अपरदनः-

      हिमालय में हिमरेखा के नीचे बहने वाले बर्फ तथा जल को हिमनद कहा जाता है। ये चट्टानों एवं मिट्टी को काटकर निचली घाटी में जमा कर देते हैं, जिन्हें ‘हिमोढ़’ कहते हैं।

(vi) झूम कृषिः-

     झूम कृषि के दौरान जब एक स्थान से दूसरे स्थान पर कृषि करने के लिये वृक्षों का कटाव किया जाता है तो वनों के कटाव से अपरदन की दर में वृद्धि हो जाती है तथा मिट्टी के पोषक तत्त्व बह जाते हैं।

(vii) भूस्खलन अपरदनः-

     भूस्खलन अपरदन पहाड़ी सतह या पर्वतीय ढालै के नीचे धसने के कारण होता है। सामान्यतः भूस्खलन, ढालों पर कटाई, खुदाई या कमजोर भूगर्भ ढाल होने के कारण होता है।

मृदा संरक्षण के उपाय (Methods for Soil Conservation)

     मृदा संरक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत न केवल मृदा की गुणवत्ता को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है बल्कि उसमें सुधार की भी कोशिश की जाती है।

⇒ देश में मृदा अपरदन व उसके दुष्परिणामों पर नियंत्रण के लिये 1953 में ‘केंद्रीय मृदा संरक्षण बोर्ड’ का गठन किया गया जिसका कार्य राष्ट्रीय स्तर पर मृदा संरक्षण के कार्यक्रमों का संचालन करना है।

यांत्रिक उपाय (Engineering Method):-

⇒ मेड़बंदी के अंतर्गत बड़े-बड़े जोत के खेतों में मेड़ बनाकर जल के प्रवाह को कम किया जा सकता है तथा वायु के तेज  प्रवाह से होने वाले अपरदन को रोकने में भी यह सहायक होता है।

⇒ मृदा समतलीकरण से जल के बहाव तथा वायु के तेज गति का प्रभाव कम पड़ता है।

⇒ सम्मोच्च रेखीय जुताई पहाड़ों के सबसे ऊँचे ढाल पर की जाती है। इस पद्धति में पहाड़ों से बहने वाले जल को रोकने के लिये समान ऊँचाई वाली रेखाओं से एक प्राकृतिक रूकावट बनाई जाती है, जिससे मृदा का संरक्षण होता है।

⇒ पत्थर के मेड़ चट्टान बांध के अंतर्गत पानी को तेजी से बहने से रोकने के लिये चट्टानों के द्वारा अवरोधक बनाए जाते हैं। चट्टानी बांध बनाने से नालियों की रक्षा होती है तथा मृदा का क्षय भी नहीं होता है।

⇒ बेसिन लिस्टिंग के अंतर्गत ढालों पर एक नियमित अंतराल के बाद लघु बेसिन या गर्त का निर्माण किया जाता है, जो जल प्रवाह को नियंत्रित रखने तथा जल को संरक्षित करने में सहायक होते हैं।

जैविक उपाय (Biological Method):-

     फसल चक्र के अंतर्गत अपरदन को कम करने वाली फसलों का अन्य फसल के साथ चक्रीकरण कर अपरदन को रोका जा सकता है। इससे मृदा की उर्वरता भी बढ़ती है।

⇒ पट्टीदार खेती के अंतर्गत इसमें बड़े जोतों के खेतों में पट्टी बनाकर जल प्रवाह के वेग को कम किया जाता है, जिससे मृदा अपरदन कम-से-कम हो।

⇒ पलवार या मल्चिंग के अंतर्गत खेतों में फसल अवशेष की 10-15 सेमी. पतली परत बिछाकर अपरदन तथा वाष्पीकरण को रोका जा सकता है। इससे मृदा का संस्तर सुरक्षित रहता है।

⇒ वर्मी कम्पोस्ट प्राचीन काल से ही किसानों का सबसे हितकारी प्रयोग रहा है क्योंकि यह पूरी तरह से केंचुए पर आधारित है। केंचुए को ‘किसानों का मित्र’ कहा जाता है। ये केंचुए मिट्टी में मौजूद घासफूस और अन्य खरपतवार को खाकर उन्हें खाद बनाते हैं तथा साथ ही मिट्टी को मुलायम और उपजाऊ भी बनाते हैं।

⇒ हरी एवं जैविक खाद के अंतर्गत मृदा संरक्षण को बनाए रखने के लिये खेत में हरी खाद का अधिक-से-अधिक प्रयोग किया जाता है। परंपरागत रूप में प्रचलित उड़द, सैजी, सनई, कैंचा, मूंग, लोबिया आदि को खेत में बोया जाता है और खड़ी फसल के बीच खेत की जुताई की जाती है। इससे खेत में विभिन्न प्रकार के जैविक तत्त्वों का समावेश हो जाता है, जिससे फसलों की उत्पादकता बढ़ती है। सैजी और सनई की फसल का हरी खाद के रूप में प्रयोग करने से सर्वाधिक मात्रा में नाइट्रोजन प्राप्त होता है।

⇒ कृषि वानिकी के अंतर्गत खेत के चारों तरफ मेड़ों पर दो या तीन पंक्तियों में एक निश्चित दूरी में फसलों के साथ वृक्षों को रोपित किया जाता है। इससे भी मृदा अपरदन को रोकने में सहायता मिलती है।

⇒ वृक्षों की जड़ें मृदा पदार्थों को बांधे रखती है, जो मृदा संरक्षण में सहायक है। अतः सरकार द्वारा सार्वजनिक मार्गों, नहरों, रेल पटरियों इत्यादि के दोनों ओर तीव्र गति से बढ़ने वाली प्रजातियों के वृक्षों को रेखीय पट्टियों के रूप में रोपित कर वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जा रहा है।

सामाजिक उपाय (Social Method):-

     अत्यधिक चराई से पहाड़ी ढालों की मृदा ढीली पड़ जाती है और पानी का बहाव इस ढीली मृदा को बड़ी आसानी से बहा ले जाती है। मृदा अपरदन को रोकने के लिये इन क्षेत्रों में नियोजित चराई से वनस्पति के आवरण को बचाया जा सकता है, जिससे मृदा संरक्षण में सकारात्मक सहयोग हो सके।

⇒ हमारे सामाजिक परिवेश में वृक्षों का कटाव व अत्यधिक दोहन भी मृदा अपरदन का एक कारक है। वनों के कटाव व दोहन का निम्नीकरण करके मृदा संरक्षण में सहयोग किया जा सकता है।

⇒ झूम खेती में जंगलों को काटकर व जलाकर खेती की जाती है, जिससे मृदा की बहुत हानि होती है। इस पर पूर्णतया रोक लगायी जानी चाहिये, जिससे मृदा संरक्षण हो सके।

⇒ लोक सहभागिता के माध्यम से ग्राम पंचायतों से लेकर शहरों तक वृक्षारोपण के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी। गैर सरकारी संस्थाओं को भी इस अभियान से जोड़ना होगा व मृदा संरक्षण के प्रति सराहनीय कार्य करने वाले व्यक्तियों को पुरस्कृत किया जाना चाहिये, जिससे मृदा संरक्षण को प्रोत्साहन मिल सके।

9. Green Revolution (हरित क्रांति)

9. Green Revolution

(हरित क्रांति)



प्रश्न प्रारूप

Q.1 हरित क्रांति से आप क्या समझते है? यह भारत के किस भाग में अधिक विकसित हुआ और क्यों?

Q.2 हरित क्रांति तथा भारतीय समाज पर उसके सामाजिक, आर्थिक प्रभावों के आलोचनात्मक व्याख्या करें।

Q.3 हरित क्रांति तकनीकी तथा भारतीय समाज पर इसके प्रभावों की आलोचनात्मक व्याख्या करे।

Q.4 आधुनिक कृषि तकनीकी से संबंधित पारिस्थैतिकीय समस्याओं की चर्चा करें। उनकी तीव्रता कम करने के लिए आप कौन से उपाय सुझायेंगे।

Q.5 हरित कांति एक आंशिक क्रांति रही है। इसका प्रभाव कुछ फसलों तथा कुछ क्षेत्रों तक सीमित रहा है?

Green Revolution

(1) हरित क्रांति क्या है?

        कृषि के क्षेत्र में त्वरित परिर्वतन लाने के लिए जो वैज्ञानिक प्रयास किये गये हैं, उसे ही हरित क्रांति की संज्ञा देते हैं। हरित क्रांति का तात्पर्य कृषि क्षेत्र में उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाकर आत्मनिर्भरता प्राप्त करने से है। विश्व में पहली बार हरित क्रांति की शुरुआत अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक और नोबेल पुरस्कार विजेता नॉर्मन बोरलॉग के द्वारा मैक्सिको में किया गया जबकि ‘हरित क्रांति’ शब्द का प्रथम प्रयोग विलियम एस. गौड महोदय के द्वारा किया गया था।

     मैक्सिको में हरित क्रांति को जन्म देकर कृषि उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि लायी गई और वहाँ भूखमरी की समस्या पर नियंत्रण स्थापित किया गया। ठीक उसी वक्त भारतीय वैज्ञानिक एम० एस० स्वामी नाथन ने नॉर्मन बोरलॉग के सम्पर्क में रहकर शोध कार्य कर रहे थे तथा इधर 60 के दशक में भारत खाद्यान्न की समस्या से झूझ रहा था। भारत में भी कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।

      तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गाँधी तथा तात्कालिक कृषि मंत्री डॉ. सुब्रह्यणयम स्वामी की प्रेरणा से भारत में भी हरित क्रान्ति की शुरुआत करने का निर्णय लिया गया। भारत में हरित क्रांति की शुरुआत 1966-67 ई० में उ०-प० भारत से किया गया। भारतीय संदर्भ में हरित क्रांति एक ऐसा पैकेज प्रोग्राम था जिसमें सिंचाई, उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक तथा उन्नत तकनीक का प्रयोग कर उत्पादन तथा उत्पादकता बढ़ाने का प्रयास किया गया।

(2) भारत के किस भाग में हरित क्रांति विकसित हुआ और क्यों?

        भारत में हरित क्रांति की शुरुआत उ०-प० भारत के मैदानी क्षेत्र से हुआ। इसके निम्नलिखित कारण थे-

(i) 1966-67 के आकाल से पूर्व इस प्रदेश में “संघन जिला कृषि विकास कार्यक्रम” चलाया जा रहा था जिसके कारण इस प्रदेश में पहले से ही संस्थागत और संरचनात्मक सुविधाएं मौजूद थी। इसलिए इनका लाभ उठाकर हरित क्रांति कार्यक्रम को लागू करने का प्रयास किया गया।

(ii) यह प्रदेश सूखा प्रधान क्षेत्र था किन्तु यहाँ विस्तृत जलोढ़ मैदान, उर्वर मिट्टी और सालोंभर बहने बाली नदियाँ मौजूद थी जिसके आधार पर सिंचाई सुविधाओं का विस्तार तेजी से किया जा सकता था।

(iii) उ०-प० भारत में रासायनिक खाद के प्रयोग से अधिक लाभ मिलता है क्योंकि बाढ़ यहाँ कम आती है। इस कारण से उर्वरक खेतों में अपने प्रभाव को स्पष्ट रूप से दिखाते हैं।

(iv) इस प्रदेश में रहने वाले किसानों के खेत विखरे हुए नहीं थे। सफलतापूर्वक चकबंदी का कार्यक्रम चलाकर भूमि को बड़े-2 जोत में तब्दील कर दिया गया था।

(v) बड़े-2 खेत बन जाने के कारण उसमें ट्रैक्टर का प्रयोग आसान हो गया।

(vi) इस प्रदेश में सिख एवं जाट जैसे जुझारू किसान पहले से मौजूद थे। कृषि के अलावे इसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। इसलिए संस्थागत सुविधाओं का इन लोगों ने भरपूर लाभ उठाया।

(vii) हरित क्रांति के शुरुआत के वक्त पंजाब मुखमंत्री प्रताप सिंह कैरो थे जिन्होंने राजनैतिक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता दिखाते हुए परिवहन, बिजली, बाजार एवं उचित कीमत का व्यवस्था किया।

    इन्हीं सब कारणों से इस प्रदेश में हरित क्रांति की शुरुआत हुई।

(3) उत्तर-प० भारत के मैदानी क्षेत्र को छोड़कर भारत के अन्य भागों में 1960 के दशक में हरित क्रांति की शुरूआत क्यों नहीं की गयी थी?

     सही अर्थों में ऊपर के सभी कारक देश के अन्य भागों में काम नहीं कर रहे थे। इसीलिए देश के अन्य भागों में हरित क्रांति की शुरुआत नहीं की गई। देश के दूसरे भागों में “गहन जिला कृषि विकास कार्यक्रम” शुरूआत नहीं किये जाने के कारण वहाँ संरचनात्मक संस्थागत सुविधाओं का विकास नहीं हुआ था।

         खासकर उ०-पू० भारत में सदैव बाढ़ की स्थिति बनी रहती थी, इसलिए वहाँ रासायनिक खाद के प्रयोग पर विशेष जोर नहीं दिया गया। पर्याप्त वर्षी हो जाने के कारण यहाँ सिंचाई सुविधाओं के विकास पर जोर नहीं दिया गया। इस क्षेत्र में चकबंदी जैसा कार्यक्रम असफल हो चुका था। भूमिहीन किसानों की संख्या ज्यादा थी। राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता की कमी थी। नवीन तकनीक इतने मँहगे थे कि किसान उसे खरीद नहीं सकते थे।

           उपरोक्त कारणों के चलते ही देश के अन्य भागों में हरित क्रान्ति की शुरुआत 1960 के दशक में नहीं हो सकी।

         5वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान देश के अन्य भागों में भी हरित क्रांति के संदेश को पहुँचाने का प्रयास किया गया। इसके लिए ऐसे क्षेत्रों को चुना गया जहाँ कमाण्ड एरिया प्रोजेक्ट कार्यक्रम पहले से चल रहे थे। कमाण्ड एरिया प्रोजेक्ट के तहत पूर्वी भारत, पूर्वी तटवर्ती मैदान के अनेक नदी घाटी क्षेत्र में नहरों का विकास कर प्रदेशों का सीमांकित किया गया था ऐसे ही सीमांकित क्षेत्र को कमाण्ड एरिया कहा गया था।

         इसमें कावेरी कमाण्ड एरिया, गण्डक कमाण्ड एरिया, मयूराक्षी कमाण्ड एरिया, कृष्णा तथा गोदावरी कमाण्ड एरिया इत्यादि में हरित क्रांति की शुरुआत की गई। इन कमाण्ड एरिया क्षेत्र में शुरुआत होते ही हरित क्रांति योजना एक विकेन्द्रीकत योजना बन गयी। लेकिन, कमाण्ड एरिया प्रोजेक्ट वाले किसान हरित क्रांति के मर्म को स्पष्ट रूप से समझ नहीं पाये थे, इसलिए उसका पूरा लाभ भी नहीं उठा पाये। परिणामतः प्रथम हरित क्रांति पंजाब, हरियाणा, प० उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ जिलों में ही यह कार्यक्रम सीमित रहा।

      हरित क्रांति का दूसरा चरण 1980 के दशक में प्रारंभ की गई। इसकी शुरुआत 1981 ई० में किया जा चुका था। लेकिन, 1987 ई० में पुन: अकाल की स्थिति उत्पन्न हुई तो देश के अन्य भागों में पुन. हरित क्रांति की संदेश को पहचानने का प्रयास किया गया। इसका लाभ तमिलनाडु से असम तक के किसानों को मिला।

     हरित क्रांति के दूसरे चरण की शुरुआत भारत है। 169 जिलों में किया गया। इनमें से 101 जिलों में चावल का और 68 जिलों में गेहूँ की प्राथमिकता दी गई। 169 जिलों में 38 जिला पूर्वी UP के, 30 जिले MP के, 18 जिला बिहार के, 14 जिले राजस्थान के, 12 जिले महाराष्ट्र के, 9 जिले कर्नाटक के, तमिलनाडु तथा आन्ध्र प्रदेश के 8-8 जिले, प० बंगाल, गुजरात तथा हरियाणा के 7-7 जिले, उड़ीसा के 5 जिले और असम के 3 जिले इसमें शामिल थे। इन क्षेत्रों में हरित क्रांति की दूसरी चरण प्रारंभ करने के पीछे दो कारण थे-

(1) इन जिलों में आकाल की समस्या काफी तीव्र थी। अतः यहाँ खाद्यान्न उत्पादन में शीघ्र बढ़ोतरी की आवश्यकता थी।

(2) इन जिलों में चावल कृषि के लिए पर्यावरण के अनुकूल थी।

     इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में हरित क्रांति की शुरुआत भले ही केन्द्रीकृत योजना के रूप में शुरुआत हुई थी। लेकिन, आज हरित क्रांति की संदेश पूरे भारत में पहुंच रहा है। इस तरह यह ए‌क विकेन्द्रीकृत योजना बन चुका है।

सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

     हरित क्रांति के कारण भारतीय समाज पर कई प्रकार के प्रभाव पड़े हैं। इनमे से कुछ प्रभाव सकारात्मक हैं लेकिन कुछ प्रभाव नाकारात्मक भी रहे हैं। इन प्रभावों को दो शीर्षकों में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

(A) सामाजिक प्रभाव:

(1) प्रादेशिक विषमता का अभ्युदय:-

      हरित क्रांति के तहत दो तरह की विषमताएँ उत्पन्न हुई-

(ⅰ) अन्तः प्रादेशिक विषमता और

(ⅱ) अन्तर प्रादेशिक विषमता।

      अन्तः प्रादेशिक विषमता के तहत एक ही राज्य के दो क्षेत्र में विषमताएँ उत्पन्न हुई। जैसे- राजस्थान के गंगानगर तथा हनुमानगढ़ जिला खाद्यान्न उत्पादन का भण्डार बन गया, जबकि राजस्थान का शेष भाग पिछड़ा ही रह गया।

     अन्तर प्रादेशिक विषमता के तहत पंजाब, हरियाणा, प० UP और उ० राजस्थान के क्षेत्र हरित क्रांति के कारण अन्न भण्डार के क्षेत्र में तब्दील हो गये।

     जबकि उ०-पूर्वी भारत के क्षेत्र में अभी हरित क्रांति का संदेश नहीं पहुंच पाया है। पंजाब में हरित क्रांति के चलते जो समृद्धि आयी, उसके कारण वहाँ अलगाववाद की समस्या उत्पन्न हुई। पुनः उ०-पूर्वी एवं पूर्वी भारत में हरित क्रांति की शुरुआत नहीं होने के कारण नक्सलवाद की समस्या उत्पन्न हुई है।

(2) सामाजिक विषमता का अभ्युदय:-

     हरित क्रांति में प्रयोग किये जाने वाले बीज, उर्वरक, कीटनाशक, तकनीक, सिंचाई के साधन काफी मँहगे थे। इसका प्रयोग अमीर किसानों ने बखूबी किया। लेकिन भूमिहीन किसान और छोटा जोत रखने वाला किसान के लिए यह संभव नहीं हो पाया। फलतः अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और बढ़ गई।

(3) रोजगार पर प्रभाव:-

     हरित क्रांति के कारण रोजगार पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ा है क्योंकि जिन-2 क्षेत्रों में हरित क्रांति की शुरुआत हुई वहाँ दूर-2 से मजदूर आकर खेतों में रोजगार प्राप्त करने लगे। इसके कारण अन्तर राज्यीय प्रवजन को बढ़ावा मिला। लेकिन हरित क्रांति के क्षेत्र वाले किसान मजदूरों का जबड़‌दस्त शोषण का कार्य किया जिससे उनके स्वास्थ्य पर बूरा प्रभाव पड़ा। लेकिन, भूमिहीन मजदूर किसान रोजी-रोटी पाकर न केवल अपने परिवार का भरण-पोषण किया बल्कि अपने स्रोत क्षेत्र में भी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया। उन मजदूरों से सिख एवं जाट किसानों ने इस तरह से मजदूरी करवाया कि उनके स्वरस्थ्य पर बहुत ही नाकारात्मक प्रभाव पड़ा। स्रोत क्षेत्र में मजदूरों की कमी हुई।

(B) आर्थिक प्रभाव 

    हरित क्रांति के कारण भारत के आर्थिक गतिविधियों पर जबड़दस्त प्रभाव पड़ा है जैसे-

(1) सिंचाई सुविधाओं में विस्तार:-

     हरित क्रांति के कारण सिंचाई सुविधाओं का जबड़दस्त विस्तार हुआ है। विश्व की सब‌से बड़ी नहर प्रणाली इंदिरा गांधी नहर तथा शारदा नहर हमारे देश में है। इसी तरह ट्यूबेल, कूँआ, तालाब जैसे सिंचाई साधनों का विकास हुआ लेकिन परम्परागत सिंचाई साधनों पर इसका नाकारात्मक प्रभाव पड़ा। जैसे- रेहड़, लाठा-कूड़ी, करिंग जैसे सिंचाई साधन विलुप्त हो रहे है।

(2) फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि:-

       हरित क्रांति के कारण फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता में भी वृद्धि हुई है। जैसे 1991 में खाद्यान्न का कुल उत्पादन 51 मिलियन टन हुआ करता था जो आज बढ़कर 285 (2017-18) मिलियन टन को पार कर चुका है।

     हरित क्रांति के कारण उत्पादकता में भी बढ़ोतरी हुई है। जैसे- 1981-82 में चावल का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 1300 kg था जो बढ़‌कर 2200 kg/हेक्ट० हो चुका है। इसी बीच 1981-82 में गेहूं का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 1696 kg हुआ करता था जो अब बढ़‌कर 2900 kg/हेक्ट० हो चुका है।

(3) दलहन एवं तेलहन के भूमि तथा उत्पादन में कमी:-

        हरित क्रांति के कारण तेलहन और दलहन पर नाकारात्मक प्रभाव पड़ा है। जैसे- तेलहन और दलहन वाले भूमि पर किसान खाद्यान्न फसल का उत्पादन करने लगे है जिसके कारण इसके सापेक्षिक उत्पादन में कमी आती है। तेलहन और दलहन का बढ़‌ता हुआ कीमत इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

(4) हरित क्रांति के प्रथम चरण में गेहूँ और आलू के उत्पादन पर साकारात्मक प्रभाव पड़ा था लेकिन चावल पर इसका नाकारात्मक प्रभाव देखा गया। इसी के मद्देनजर दूसरे चरण में चावल के कृषि को अधिक महत्व दिया गया।

(5) कृषि भूमि में  तेजी से विस्तार:-

      हरित क्रांति के कारण कृषि भूमि का तेजी से विस्तार हुआ है।

(6) गन्ना के क्षेत्र एवं उत्पादन में कमी:-

     हरित क्रांति ने नकदी फसल को भी प्रवाभित किया है। जैसे- उ० भारत के प्रसिद्ध गन्ना पेटी वाले क्षेत्र में खाद्यान्न फसलों का घुसपैठ हो जाने के कारण उ० भारत में गन्ना है उत्पादन में कमी आयी है और यह पेटी धीरे-2 द० भारत की ओर विस्थापित होते जा रही है।

(7) कृषि और पशुपालन के बीच सह-संबंध में कमी:-

      हरित क्रांति में उन्नत बीज का प्रयोग किया जाता है जिसका डण्ठल छोटा होता है जिसके कारण पशुओं के लिए पर्याप्त चारा प्राप्त नहीं हो पाती है। किसान खेती का कार्य ट्रैक्टर से करते हैं। इसलिए किसान श्रम करने वाले पशुओं का उपयोग नहीं कर पाते हैं जिनके कारण कृषि और पशुपालन के बीच सह-संबंध कमजोर हुआ है।

(8) कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा:-

     हरित क्रांति के कारण कृषि और विभिन्न प्रकार के उद्योगों के बीच में सह-संबंध और मजबूत हुआ है। जैसे- किसान बड़े पैमाने पर ट्रेक्टर, उर्वरक, तकनीक, ऊर्जा इत्यादि का प्रयोग करते हैं जिसके कारण यहाँ कृषि उपकरण निर्माण करने वाले कई कल कारखानों का विकास हुआ। पेट्रो रसायन पर आधारित कई बड़े-2 तेल शोधन कारखाने, उर्वरक संयंत्र का विकास हुआ। कई कुटीर एवं लघु उद्योगों को खासकर चावल मील, गेहूँ मील, बेकरी उद्योग को कच्चा माल मिलने लगा।

(9) परिवहन एवं व्यापार में वृद्धि:-

      हरित क्रांति के कारण परिवहन एवं व्यापार में भी वृद्धि हुई। जैसे- पंजाब और हरियाणा में सड़‌कों का जाल बिछ चुका है। भारत हरित क्रांति के पहले खाद्यान्न आयातक देश था। अब खाद्यान्न निर्यातक देश के रूप में बदल चुका है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है।

(10) सेवा क्षेत्र का तेजी से विस्तार:-

      हरित क्रांति के आगमन से किसानों के बीच में जो समृ‌द्धि आई जिसके कारण भारत में तेजी से शिक्षा, बैंकिंग, प्रबंधन, वित, वाणिज्य, इंजीनियरिंग, चिकित्सा जैसे सेवा क्षेत्र का तेजी से विस्तार हो रहा है।

निष्कर्ष:

       इस तरह उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हरित क्रांति वास्तव में एक क्रांतिकारी योजना है तभी तो इसने सामाजिक एवं आर्थिक सभी पहलुओं को प्रभावित किया है। हरित क्रांति के कारण जो नाकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहे हैं, उसे अल्पकालिक माना जाना चाहिए और उससे भारतीय संविधान तथा भारत के सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के दायरे में रहकर उससे निपटने का प्रयास किया जाना चाहिए।

हरित क्रांति के स्थायित्व के लिए सुझाव

(1) व्यापक क्षेत्र में विस्तार- हरित क्रांति को देश के सभी भागों में फैलाया जाय।

(2) सभी फसलों पर लागू- हरित क्रांति को गेहूँ के अतिरिक्त चावल एवं अन्य खाद्यान्नों एवं व्यापारिक फसलों की कृषि पर लागू किया जाना चाहिए।

(3) सिंचाई का उत्तम प्रबंध

(4) जैविक उर्वरक का प्रयोग

(5) जैव कीटनाशक दवाओं का प्रयोग

(6) बहुफसली कृषि प्रणाली पर जोर

(7) नई कृषि नीति में सुधार

(8) कृषि के संस्थागत एवं अवसंरचनात्मक सुविधाओं में सुधार



उत्तर लिखने का दूसरा तरीका



       फसल उत्पादन तथा उत्पादकता में त्वरित परिवर्तन लाने के लिए जो प्रयास किया गया, उसे हरित क्रांति कहते हैं।

उद्देश्य- फसलों की उत्पादन तथा उत्पादकता बढ़ाकर देश को कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना।

शुरुआत- 1966-67 ई०

शुरुआतकर्ता/ जन्मदाता (भारत में)- M.S. स्वामी नाथन

प्रधानमंत्री (उस समय)- श्रीमती इंदिरा गाँधी

कृषि मंत्री (उस समय)- M. सुब्रह्मणयम

“हरित क्रांति” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग टरनर महोदय ने किया। लेकिन अतर्राष्ट्रीय मंच / स्तर पर विलियम गॉड महोदय ने इसे प्रचारित किया।

हरित क्रांति का जन्मदाता- नॉर्मन बोरलॉग (USA)।

⇒ हरित क्रांति का सर्वप्रथम प्रयोग मैक्सिको में हुई, क्योंकि वहाँ सूखे पड़े हुए थे।

⇒ हरित क्रांति एक पैकेज प्रोगाम था जिसमें अधिकाधिक उन्नत बीज, उर्वरक, सिंचाई, कीटनाशक, आधु‌निक कृषि यंत्र इत्यादि के अधिकाधिक प्रयोग पर निर्णय लिया गया।

कमाण्ड एरिया:- कमाण्ड एरिया प्रोजेक्ट के तहत पूर्वी भारत, पूर्वी तटवर्ती मैदान के अनेक नदी घाटी क्षेत्रों में नहरों का विकास कर प्रदेशों का सीमांकन किया गया था। ऐसे सीमांकित क्षेत्र को कमाण्ड एरिया कहा गया। इसमे कावेरी कमाण्ड एरिया, गण्डक कमाण्ड एरिया, मयुराक्षी कमाण्ड एरिया, कृष्णा तथा गोदावरी कमाण्ड एरिया आदि शमिल है।

हरित क्रांति लाने वाले प्रमुख करक/घटक

(1) अधिक उपज देने वाले बीजों का प्रयोग।

नोट: फिलीपीन्स में अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान केन्द्र है।

(2) उर्वरकों का प्रयोग।

(3) सिंचाई में विस्तार।

(4) कीटनाशकों का प्रयोग।

(5) आधुनिक कृषि यंत्रों का प्रयोग।

(6) ग्रामीण विद्युतीकरण को बढ़ावा।

(7) ऋण की सुविधा।

(8) मृदा परीक्षण एवं भूमि संरक्षण।

(9) बहुफसल को बढ़ावा देना।

(10) फसलों के किस्मों का निर्धारण।

(11) कृषि उत्पादों के बिक्री हेतु या विपणन की व्यवस्था।

हरित क्रांति किस भाग में विकसित हुआ और क्यों?

            हरित क्रांति का शुभारंभ उतर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र से किया गया था क्योंकि-

(1) यहाँ पहले से सघन जिला कृषि विकास कार्यक्रम चलाये जा रहे थे।

(2) ये क्षेत्र सूखा प्रधान क्षेत्र थे।

(3) जलोढ़ का विस्तृत मैदान और सालोभर बहने वाली नदियाँ मौजूद थी।

(4) यह बाढ़ मुक्त क्षेत्र था जिसके करण उर्वरकों के बहने की संभावना नहीं थी।

(5) इस क्षेत्र में सदियों से सिख, जाट तथा राजपूत किसान रहते आ रहे थे।

(6) प्रताप सिंह कैरो जैसा व्यकि पंजाब का मुख्यमंत्री था जिसके पास राजनैतिक- प्रशासनिक सुझ-बूझ मौजूद थी।

(7) भाखड़ा-नांगल परियोजना के कारण अबाध्य रूप से विद्युत की आपूर्ति हो रही थी।

(8) दिल्ली जैसे महानगर को प्रभाव।

उत्तर-पूर्वी भारत में हरित क्रांति की शुरुआत नहीं की गई क्योंकि यहाँ-

(1) संस्थागत एवं संरचनात्मक कारकों का अभाव था।

(2) सघन जिला कृषि विकास कार्यक्रम नहीं चलाया जा रहा था।

(3) बाढ़ प्रभावित क्षेत्र था।

(4) चकबंदी के अभाव में भूमि टुकड़ों में बंटे थे।

(5) छोटे किसानों की संख्या अधिक थी।

(6) यहाँ के अधिकांश किसान गरीब थे।

        पाँचवी पंचवर्षीय योजना में हरित क्रांति का संदेश कमांड एरिया प्रोजेक्ट वाले क्षेत्र में पहुंचाया गया। जैसे- कावेरी कमाण्ड एरिया, मयूराक्षी कमाण्ड एरिया, कृष्णा एवं गोदावरी कमाण्ड एरिया। क्योंकि-

(1) कमांड एरिया प्रोजेक्ट शुरुआत किये जाने के कारण उस क्षेत्र में बाढ़ पर नियंत्रण स्थापित किया जा चुका था और सिंचाई एवं विद्युत सुविधाओं का विकास किया जा चुका था।

(2) हरित क्रांति के दूसरे चरण की शुरूआत 1981 से मानी जाती है क्योंकि फिलीपीन्स स्थित अन्तरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान केन्द्र से उन्नत धान के बीज (IR-8) का प्र‌योग किया गया। प्रारंभ में इसका प्रयोग प्रायोगिक तौर पर हुआ था। लेकिन 1887 ई० में 169 जिलों में इसका प्रयोग किया गया क्योंकि-

(1) इन जिलों में अकाल की समस्या मौजूद थी।

(2) यहाँ चावल कृषि हेतु अनुकूल पर्यावरण मौजूद थी।

हरित क्रांति का प्रभाव

        हरित क्रांति के कारण भारतीय समाज पर कई प्रकार के प्रभाव पड़े हैं। इनमे से कुछ प्रभाव सकारात्मक हैं लेकिन कुछ प्रभाव नाकारात्मक भी रहे हैं। इन प्रभावों को दो शीर्षकों में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

(A) सामाजिक प्रभाव:

(1) प्रादेशिक विषमता का अभ्युदय:-

      हरित क्रांति के तहत दो तरह की विषमताएँ उत्पन्न हुई-

(ⅰ) अन्तः प्रादेशिक विषमता और

(ⅱ) अन्तर प्रादेशिक विषमता।

      अन्तः प्रादेशिक विषमता के तहत एक ही राज्य के दो क्षेत्र में विषमताएँ उत्पन्न हुई। जैसे- राजस्थान के गंगानगर तथा हनुमानगढ़ जिला खाद्यान्न उत्पादन का भण्डार बन गया, जबकि राजस्थान का शेष भाग पिछड़ा ही रह गया।

     अन्तर प्रादेशिक विषमता के तहत पंजाब, हरियाणा, प० UP और उ० राजस्थान के क्षेत्र हरित क्रांति के कारण अन्न भण्डार के क्षेत्र में तब्दील हो गये।

     जबकि उ०-पूर्वी भारत के क्षेत्र में अभी हरित क्रांति का संदेश नहीं पहुंच पाया है। पंजाब में हरित क्रांति के चलते जो समृद्धि आयी, उसके कारण वहाँ अलगाववाद की समस्या उत्पन्न हुई। पुनः उ०-पूर्वी एवं पूर्वी भारत में हरित क्रांति की शुरुआत नहीं होने के कारण नक्सलवाद की समस्या उत्पन्न हुई है।

(2) सामाजिक विषमता का अभ्युदय:-

     हरित क्रांति में प्रयोग किये जाने वाले बीज, उर्वरक, कीटनाशक, तकनीक, सिंचाई के साधन काफी मँहगे थे। इसका प्रयोग अमीर किसानों ने बखूबी किया। लेकिन भूमिहीन किसान और छोटा जोत रखने वाला किसान के लिए यह संभव नहीं हो पाया। फलतः अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और बढ़ गई।

(3) रोजगार पर प्रभाव:-

     हरित क्रांति के कारण रोजगार पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ा है क्योंकि जिन-2 क्षेत्रों में हरित क्रांति की शुरुआत हुई वहाँ दूर-2 से मजदूर आकर खेतों में रोजगार प्राप्त करने लगे। इसके कारण अन्तर राज्यीय प्रवजन को बढ़ावा मिला। लेकिन हरित क्रांति के क्षेत्र वाले किसान मजदूरों का जबड़‌दस्त शोषण का कार्य किया जिससे उनके स्वास्थ्य पर बूरा प्रभाव पड़ा। लेकिन, भूमिहीन मजदूर किसान रोजी-रोटी पाकर न केवल अपने परिवार का भरण-पोषण किया बल्कि अपने स्रोत क्षेत्र में भी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया। उन मजदूरों से सिख एवं जाट किसानों ने इस तरह से मजदूरी करवाया कि उनके स्वरस्थ्य पर बहुत ही नाकारात्मक प्रभाव पड़ा। स्रोत क्षेत्र में मजदूरों की कमी हुई।

(B) आर्थिक प्रभाव 

    हरित क्रांति के कारण भारत के आर्थिक गतिविधियों पर जबड़दस्त प्रभाव पड़ा है जैसे-

(1) सिंचाई सुविधाओं में विस्तार:-

     हरित क्रांति के कारण सिंचाई सुविधाओं का जबड़दस्त विस्तार हुआ है। विश्व की सब‌से बड़ी नहर प्रणाली इंदिरा गांधी नहर तथा शारदा नहर हमारे देश में है। इसी तरह ट्यूबेल, कूँआ, तालाब जैसे सिंचाई साधनों का विकास हुआ लेकिन परम्परागत सिंचाई साधनों पर इसका नाकारात्मक प्रभाव पड़ा। जैसे- रेहड़, लाठा-कूड़ी, करिंग जैसे सिंचाई साधन विलुप्त हो रहे है।

(2) फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि:-

       हरित क्रांति के कारण फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता में भी वृद्धि हुई है। जैसे 1991 में खाद्यान्न का कुल उत्पादन 51 मिलियन टन हुआ करता था जो आज बढ़कर 285 (2017-18) मिलियन टन को पार कर चुका है।

     हरित क्रांति के कारण उत्पादकता में भी बढ़ोतरी हुई है। जैसे- 1981-82 में चावल का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 1300 kg था जो बढ़‌कर 2200 kg/हेक्ट० हो चुका है। इसी बीच 1981-82 में गेहूं का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 1696 kg हुआ करता था जो अब बढ़‌कर 2900 kg/हेक्ट० हो चुका है।

(3) दलहन एवं तेलहन के भूमि तथा उत्पादन में कमी:-

        हरित क्रांति के कारण तेलहन और दलहन पर नाकारात्मक प्रभाव पड़ा है। जैसे- तेलहन और दलहन वाले भूमि पर किसान खाद्यान्न फसल का उत्पादन करने लगे है जिसके कारण इसके सापेक्षिक उत्पादन में कमी आती है। तेलहन और दलहन का बढ़‌ता हुआ कीमत इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

(4) हरित क्रांति के प्रथम चरण में गेहूँ और आलू के उत्पादन पर साकारात्मक प्रभाव पड़ा था लेकिन चावल पर इसका नाकारात्मक प्रभाव देखा गया। इसी के मद्देनजर दूसरे चरण में चावल के कृषि को अधिक महत्व दिया गया।

(5) कृषि भूमि में  तेजी से विस्तार:-

      हरित क्रांति के कारण कृषि भूमि का तेजी से विस्तार हुआ है।

(6) गन्ना के क्षेत्र एवं उत्पादन में कमी:-

     हरित क्रांति ने नकदी फसल को भी प्रवाभित किया है। जैसे- उ० भारत के प्रसिद्ध गन्ना पेटी वाले क्षेत्र में खाद्यान्न फसलों का घुसपैठ हो जाने के कारण उ० भारत में गन्ना है उत्पादन में कमी आयी है और यह पेटी धीरे-2 द० भारत की ओर विस्थापित होते जा रही है।

(7) कृषि और पशुपालन के बीच सह-संबंध में कमी:-

      हरित क्रांति में उन्नत बीज का प्रयोग किया जाता है जिसका डण्ठल छोटा होता है जिसके कारण पशुओं के लिए पर्याप्त चारा प्राप्त नहीं हो पाती है। किसान खेती का कार्य ट्रैक्टर से करते हैं। इसलिए किसान श्रम करने वाले पशुओं का उपयोग नहीं कर पाते हैं जिनके कारण कृषि और पशुपालन के बीच सह-संबंध कमजोर हुआ है।

(8) कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा:-

     हरित क्रांति के कारण कृषि और विभिन्न प्रकार के उद्योगों के बीच में सह-संबंध और मजबूत हुआ है। जैसे- किसान बड़े पैमाने पर ट्रेक्टर, उर्वरक, तकनीक, ऊर्जा इत्यादि का प्रयोग करते हैं जिसके कारण यहाँ कृषि उपकरण निर्माण करने वाले कई कल कारखानों का विकास हुआ। पेट्रो रसायन पर आधारित कई बड़े-2 तेल शोधन कारखाने, उर्वरक संयंत्र का विकास हुआ। कई कुटीर एवं लघु उद्योगों को खासकर चावल मील, गेहूँ मील, बेकरी उद्योग को कच्चा माल मिलने लगा।

(9) परिवहन एवं व्यापार में वृद्धि:-

      हरित क्रांति के कारण परिवहन एवं व्यापार में भी वृद्धि हुई। जैसे- पंजाब और हरियाणा में सड़‌कों का जाल बिछ चुका है। भारत हरित क्रांति के पहले खाद्यान्न आयातक देश था। अब खाद्यान्न निर्यातक देश के रूप में बदल चुका है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है।

(10) सेवा क्षेत्र का तेजी से विस्तार:-

      हरित क्रांति के आगमन से किसानों के बीच में जो समृ‌द्धि आई जिसके कारण भारत में तेजी से शिक्षा, बैंकिंग, प्रबंधन, वित, वाणिज्य, इंजीनियरिंग, चिकित्सा जैसे सेवा क्षेत्र का तेजी से विस्तार हो रहा है।

निष्कर्ष:

       इस तरह उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हरित क्रांति वास्तव में एक क्रांतिकारी योजना है तभी तो इसने सामाजिक एवं आर्थिक सभी पहलुओं को प्रभावित किया है। हरित क्रांति के कारण जो नाकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहे हैं, उसे अल्पकालिक माना जाना चाहिए और उससे भारतीय संविधान तथा भात के सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के दायरे में रहक उससे निपटने का प्रयास किया जाना चाहिए।

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