Category GEOGRAPHICAL THOUGHT(भौगोलिक चिंतन)

10. Recent Trends in Geography / भूगोल में हाल के रुझान

Recent Trends in Geography

भूगोल में हाल के रुझान

Recent Trends in Geographyभूगोल में हाल के रुझान

       भूगोल एक गतिशील और विकसित होती हुई शास्त्रीय एवं आधुनिक विज्ञान की शाखा है, जो पृथ्वी की सतह, मानव-प्रकृति संबंधों तथा स्थानिक (spatial) प्रक्रियाओं का अध्ययन करती है।

     हाल के वर्षों में भूगोल में कई नए रुझान (trends) उभरे हैं, जिन्होंने इस विषय को अधिक वैज्ञानिक, तकनीकी और अंतःविषय (interdisciplinary) बना दिया है।

    नीचे प्रमुख रुझानों का विस्तार से वर्णन किया गया है-

(i) भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी (Geospatial Technology) का विकास:-

     भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी आधुनिक भूगोल का एक महत्वपूर्ण और तेजी से विकसित होता क्षेत्र है, जिसमें Geographic Information System (GIS), Remote Sensing तथा Global Positioning System (GPS) शामिल हैं। इन तकनीकों के माध्यम से पृथ्वी की सतह से संबंधित स्थानिक (spatial) डेटा को एकत्रित, संग्रहित, विश्लेषित और प्रदर्शित किया जाता है।

     GIS विभिन्न प्रकार के मानचित्रों और आंकड़ों को एकीकृत कर निर्णय लेने में सहायता करता है, जबकि Remote Sensing उपग्रहों और सेंसरों की मदद से बिना सीधे संपर्क के पृथ्वी की जानकारी प्रदान करता है। GPS तकनीक सटीक स्थान निर्धारण और नेविगेशन को संभव बनाती है।

   इन प्रौद्योगिकियों का उपयोग शहरी नियोजन, आपदा प्रबंधन, कृषि, पर्यावरण संरक्षण और परिवहन जैसे क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहा है। इससे भूगोल अधिक वैज्ञानिक, सटीक और उपयोगी बन गया है, जो भविष्य में और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

(ii) जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय अध्ययन:-

     जलवायु परिवर्तन आज भूगोल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है, जिसमें पृथ्वी के तापमान, वर्षा और मौसम के दीर्घकालिक परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है। Global Warming के कारण हिमनद पिघल रहे हैं, समुद्र स्तर बढ़ रहा है और गंभीर मौसमी घटनाएँ जैसे सूखा, बाढ़ और चक्रवात बढ़ रहे हैं।

   इस अध्ययन में Greenhouse Effect की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, जो वायुमंडल में गैसों के कारण गर्मी को रोकता है। पर्यावरणीय अध्ययन सतत विकास, जैव विविधता संरक्षण और संसाधनों के संतुलित उपयोग पर जोर देता है, जिससे मानव और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके।

(iii) मानव भूगोल में नई प्रवृत्तियाँ:-

    मानव भूगोल में हाल के वर्षों में कई महत्वपूर्ण नई प्रवृत्तियाँ उभरकर सामने आई हैं, जिनसे इस विषय का दायरा व्यापक हुआ है। अब अध्ययन केवल जनसंख्या और बस्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव जीवन के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहलुओं को भी गहराई से समझा जा रहा है। Cultural Geography के अंतर्गत विभिन्न संस्कृतियों और उनके स्थानिक वितरण का अध्ययन किया जाता है, जबकि Feminist Geography महिलाओं की भूमिका और लैंगिक असमानताओं पर ध्यान केंद्रित करता है।

     इसके अलावा Political Geography और वैश्वीकरण (Globalization) ने भी मानव भूगोल को प्रभावित किया है, जिससे देशों के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध मजबूत हुए हैं। आधुनिक मानव भूगोल अब सामाजिक न्याय, पहचान, प्रवासन और शहरी समस्याओं जैसे विषयों पर भी केंद्रित है, जिससे यह अधिक प्रासंगिक और व्यावहारिक बन गया है।

(iv) शहरी भूगोल और स्मार्ट सिटी अवधारणा:-

   शहरी भूगोल वर्तमान समय में अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि विश्वभर में शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है। इसका अध्ययन शहरों की संरचना, जनसंख्या, आर्थिक गतिविधियों और समस्याओं जैसे यातायात, प्रदूषण और आवास पर केंद्रित होता है। आधुनिक संदर्भ में “स्मार्ट सिटी” की अवधारणा उभरकर सामने आई है, जिसका उद्देश्य शहरों को तकनीकी रूप से उन्नत, टिकाऊ और नागरिकों के लिए सुविधाजनक बनाना है।

   Smart Cities Mission के अंतर्गत शहरों में डिजिटल तकनीक, बेहतर परिवहन, स्वच्छ ऊर्जा और कुशल प्रशासन को बढ़ावा दिया जा रहा है। स्मार्ट सिटी में सेंसर, डेटा एनालिटिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग कर सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाया जाता है।

    इस प्रकार शहरी भूगोल और स्मार्ट सिटी अवधारणा मिलकर शहरों के सतत विकास, जीवन स्तर में सुधार और संसाधनों के कुशल प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

(v) आपदा प्रबंधन और जोखिम मूल्यांकन:-

   आपदा प्रबंधन और जोखिम मूल्यांकन आधुनिक भूगोल के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, जिनका उद्देश्य प्राकृतिक एवं मानवजनित आपदाओं के प्रभाव को कम करना है। भूकंप, बाढ़, चक्रवात, सूखा और भूस्खलन जैसी आपदाएँ मानव जीवन और संसाधनों पर गंभीर प्रभाव डालती हैं।

    आपदा प्रबंधन में पूर्व तैयारी (Preparedness), प्रतिक्रिया (Response), पुनर्वास (Rehabilitation) और शमन (Mitigation) जैसे चरण शामिल होते हैं। वहीं जोखिम मूल्यांकन के अंतर्गत किसी क्षेत्र की संवेदनशीलता, खतरे की तीव्रता और संभावित नुकसान का आकलन किया जाता है।

    Hazard Mapping और Risk Assessment जैसी तकनीकों की सहायता से आपदा संभावित क्षेत्रों की पहचान की जाती है। साथ ही GIS और Remote Sensing जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने में किया जा रहा है।

   इस प्रकार, प्रभावी आपदा प्रबंधन और सटीक जोखिम मूल्यांकन से जनहानि और आर्थिक नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

(vi) जैव विविधता और संरक्षण:-

   जैव विविधता पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवों, पौधों और सूक्ष्मजीवों की विविधता को दर्शाती है। यह पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। Biodiversity के संरक्षण के बिना प्राकृतिक संसाधनों और जीवन चक्र का संतुलन बिगड़ सकता है।

    वर्तमान समय में वनों की कटाई, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और मानव गतिविधियों के कारण जैव विविधता को खतरा उत्पन्न हो रहा है। इसके संरक्षण के लिए राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और बायोस्फीयर रिजर्व स्थापित किए जाते हैं।

    इस प्रकार, जैव विविधता का संरक्षण सतत विकास और भविष्य की पीढ़ियों के लिए आवश्यक है, जिससे पर्यावरण संतुलन बना रहे।

(vi) कृषि भूगोल में परिवर्तन:-

   कृषि भूगोल में हाल के वर्षों में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले हैं, जो नई तकनीकों और नीतियों के कारण संभव हुए हैं। आधुनिक कृषि में Precision Agriculture का उपयोग बढ़ा है, जिससे संसाधनों का सटीक और कुशल उपयोग किया जा रहा है। इसके अलावा जैविक खेती (Organic Farming), उच्च उत्पादक बीज और उन्नत सिंचाई तकनीकों का विकास हुआ है।

   ड्रोन, सेंसर और GIS तकनीकों के माध्यम से फसल की निगरानी और उत्पादन में सुधार किया जा रहा है। साथ ही बाजार आधारित कृषि और वैश्वीकरण के प्रभाव से कृषि प्रणाली में भी बदलाव आया है।

    इस प्रकार, कृषि भूगोल अब अधिक वैज्ञानिक, तकनीकी और उत्पादक बनता जा रहा है।

(vii) डिजिटल भूगोल (Digital Geography):-

    डिजिटल भूगोल भूगोल का एक आधुनिक क्षेत्र है, जिसमें डिजिटल तकनीकों और डेटा का उपयोग करके स्थानिक जानकारी का अध्ययन किया जाता है। इसमें Big Data, Geographic Information System (GIS) और इंटरनेट आधारित सेवाओं का महत्वपूर्ण योगदान है।

  डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे Google Maps के माध्यम से स्थान, मार्ग और सेवाओं की जानकारी आसानी से प्राप्त की जा सकती है।

   यह क्षेत्र शहरी नियोजन, परिवहन, आपदा प्रबंधन और पर्यावरण अध्ययन में उपयोगी है। डिजिटल भूगोल के कारण डेटा विश्लेषण अधिक तेज, सटीक और प्रभावी हो गया है, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुधार हुआ है।

(viii) सतत विकास लक्ष्य (SDGs) और भूगोल:-

    सतत विकास लक्ष्य (SDGs) संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित 17 वैश्विक लक्ष्य हैं, जिनका उद्देश्य गरीबी उन्मूलन, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक विकास सुनिश्चित करना है। United Nations द्वारा निर्धारित ये लक्ष्य 2030 तक प्राप्त करने का लक्ष्य रखते हैं।

    भूगोल इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यह स्थानिक (spatial) विश्लेषण के माध्यम से संसाधनों के वितरण, जनसंख्या और पर्यावरणीय समस्याओं को समझने में सहायता करता है।

   GIS और Remote Sensing जैसी तकनीकों से जल, भूमि और ऊर्जा संसाधनों का बेहतर प्रबंधन संभव होता है। इस प्रकार भूगोल सतत विकास की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।

(ix) अंतःविषय दृष्टिकोण (Interdisciplinary Approach):-

    अंतःविषय दृष्टिकोण वह पद्धति है जिसमें विभिन्न विषयों के ज्ञान और तकनीकों को मिलाकर किसी समस्या का समग्र अध्ययन किया जाता है। भूगोल में यह दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि यह प्राकृतिक और मानवीय दोनों पहलुओं को जोड़ता है।

   उदाहरण के लिए, Geography का संबंध अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, पर्यावरण विज्ञान और राजनीति विज्ञान से जोड़ा जाता है। इससे जटिल समस्याओं जैसे जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और संसाधन प्रबंधन को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।

    इस दृष्टिकोण से शोध अधिक व्यापक, सटीक और व्यावहारिक बनता है, जो सतत विकास और प्रभावी नीति निर्माण में सहायक है।

(x) क्षेत्रीय नियोजन (Regional Planning):-

    क्षेत्रीय नियोजन वह प्रक्रिया है जिसमें किसी क्षेत्र के संतुलित और समग्र विकास के लिए योजनाएँ बनाई जाती हैं। इसका उद्देश्य संसाधनों का उचित उपयोग, क्षेत्रीय असमानताओं को कम करना और जीवन स्तर में सुधार लाना है।

   इसमें भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक तत्वों का समन्वय किया जाता है। Regional Planning के अंतर्गत भूमि उपयोग, परिवहन, उद्योग और आवास की योजनाएँ तैयार की जाती हैं।

   GIS और अन्य भू-स्थानिक तकनीकों की मदद से क्षेत्रों का विश्लेषण कर प्रभावी योजनाएँ बनाई जाती हैं। इस प्रकार क्षेत्रीय नियोजन सतत विकास और संतुलित क्षेत्रीय प्रगति सुनिश्चित करता है।

(xi) स्वास्थ्य भूगोल (Health Geography):-

   स्वास्थ्य भूगोल भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जिसमें रोगों के वितरण, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। Health Geography के अंतर्गत यह देखा जाता है कि विभिन्न क्षेत्रों में बीमारियाँ क्यों और कैसे फैलती हैं।

   इसमें जलवायु, स्वच्छता, जनसंख्या घनत्व और संसाधनों की उपलब्धता जैसे कारकों का विश्लेषण किया जाता है। महामारी जैसे COVID-19 ने इस क्षेत्र के महत्व को और बढ़ा दिया है।

   स्वास्थ्य भूगोल बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की योजना बनाने, रोग नियंत्रण और जनस्वास्थ्य सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

निष्कर्ष:-

    इस प्रकार भूगोल में हाल के रुझान यह दर्शाते हैं कि यह विषय अब केवल पृथ्वी के भौतिक स्वरूप तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव जीवन, तकनीक, पर्यावरण और वैश्विक समस्याओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। आधुनिक तकनीकों (GIS, Remote Sensing), जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण, और सतत विकास जैसे मुद्दों ने भूगोल को अधिक प्रासंगिक और उपयोगी बना दिया है।

    भविष्य में भूगोल का महत्व और बढ़ेगा, क्योंकि यह हमें पृथ्वी और मानव के बीच संतुलन स्थापित करने में मार्गदर्शन प्रदान करता है।

12. Concept and Methodological Development in Geography /भूगोल में संकल्पनात्मक एवं पद्धतिगत विकास

Concept and Methodological Development in Geography

भूगोल में संकल्पनात्मक एवं पद्धतिगत विकास 




परिचय:

        भूगोल केवल पृथ्वी की सतही विशेषताओं का वर्णन करने वाला विषय नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, मानव और उनके पारस्परिक संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन है। समय के साथ भूगोल में न केवल विषय-वस्तु बदली, बल्कि संकल्पनाओं (Concepts) और अध्ययन-पद्धतियों (Methodologies) में भी व्यापक परिवर्तन हुआ।

        प्रारम्भिक काल में भूगोल वर्णनात्मक (Descriptive) था, किंतु आधुनिक काल में यह विश्लेषणात्मक, वैज्ञानिक और बहु-विषयी बन गया है। इस विकास को समझने के लिए भूगोल के संकल्पनात्मक एवं पद्धतिगत विकास का अध्ययन आवश्यक है।

भूगोल में संकल्पना (Concept) का अर्थ:

   सामान्यतय: संकल्पना से आशय उन मौलिक विचारों और धारणाओं से है, जिनके आधार पर किसी विषय का अध्ययन किया जाता है। भूगोल में संकल्पनाएँ विषय को दिशा प्रदान करती हैं और यह तय करती हैं कि हम पृथ्वी और मानव को किस दृष्टि से देखें।

भूगोल की प्रमुख संकल्पनाएँ:   

       भूगोल की प्रमुख संकल्पनाएँ पृथ्वी को एक समग्र इकाई मानकर प्रकृति और मानव के आपसी संबंधों को समझने पर आधारित हैं। इनमें विविधता में एकता, क्षेत्रीय भिन्नता, मानव–पर्यावरण अंतःक्रिया, क्षेत्र की व्यक्तित्वता और समग्रता शामिल हैं, जो भूगोल को वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करती हैं।

(i) पृथ्वी एक इकाई के रूप में

    प्रारम्भिक भूगोलवेत्ताओं जैसे हम्बोल्ट और रिटर ने पृथ्वी को एक समग्र इकाई (Unity of Earth) माना। उनका विचार था कि पृथ्वी पर घटित सभी प्राकृतिक घटनाएँ आपस में जुड़ी हुई हैं।

(ii) विविधता में एकता (Unity in Diversity)

    यह संकल्पना बताती है कि पृथ्वी पर विविध भौतिक और मानवीय स्वरूप पाए जाते हैं, किंतु उनके पीछे कुछ सामान्य नियम कार्य करते हैं। यह विचार भूगोल को वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।

(iii) क्षेत्रीय भिन्नता (Areal Differentiation)

        रिचर्ड हार्टशोर्न द्वारा प्रतिपादित यह संकल्पना भूगोल की केंद्रीय अवधारणा मानी जाती है। इसके अनुसार- “भूगोल का उद्देश्य पृथ्वी की सतह पर पाए जाने वाले क्षेत्रों की भिन्नताओं का अध्ययन करना है।”

(iv) मानव-पर्यावरण संबंध

    भूगोल की सबसे महत्वपूर्ण संकल्पनाओं में से एक है मानव और पर्यावरण का संबंध। इसके अंतर्गत विभिन्न विचारधाराएँ विकसित हुईं-

⇒ पर्यावरण नियतिवाद (Environmental Determinism)

⇒ संभावनावाद (Possibilism)

⇒ नव-नियतिवाद (Neo-determinism)

(v) क्षेत्र की व्यक्तित्वता (Regional Individuality)

    यह संकल्पना बताती है कि प्रत्येक क्षेत्र की अपनी अनोखी पहचान होती है, जो प्राकृतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक तत्त्वों के सम्मिलन से बनती है।

(vi) समग्रता (Holism / Totality)

    इस संकल्पना के अनुसार किसी क्षेत्र या घटना का अध्ययन उसके सभी घटकों को एक साथ लेकर किया जाना चाहिए, न कि अलग-अलग।

भूगोल में पद्धति (Methodology) का अर्थ

    पद्धति से आशय उन तरीकों और विधियों से है जिनके माध्यम से भूगोल में तथ्यों का संग्रह, विश्लेषण और व्याख्या की जाती है। पद्धति यह तय करती है कि भूगोल का अध्ययन कैसे किया जाएगा।

भूगोल के पद्धतिगत विकास के चरण:

(i) वर्णनात्मक पद्धति (Descriptive Method)

✍️ प्रारम्भिक काल में भूगोल पूर्णतः वर्णनात्मक था

✍️ यात्रियों और खोजकर्ताओं के विवरण पर आधारित

✍️ वैज्ञानिक विश्लेषण का अभाव

✍️ यह पद्धति ज्ञान-संग्रह के लिए उपयोगी थी, परंतु नियम-निर्माण में असमर्थ थी।

(ii) ऐतिहासिक पद्धति (Historical Method)

✍️ किसी क्षेत्र या घटना के विकास क्रम का अध्ययन

✍️ विशेष रूप से प्रादेशिक भूगोल में उपयोगी

✍️ मानव और पर्यावरण के ऐतिहासिक संबंधों पर बल

(iii) आगमनात्मक पद्धति (Inductive Method)

✍️ विशिष्ट तथ्यों से सामान्य नियमों की ओर

✍️ हम्बोल्ट और रिटर द्वारा समर्थन

✍️ अनुभव और अवलोकन पर आधारित

(iv) निगमनात्मक पद्धति (Deductive Method)

✍️ सामान्य सिद्धांतों से विशिष्ट निष्कर्षों की ओर

✍️ गणितीय एवं भौतिक भूगोल में अधिक प्रयोग

✍️ तर्कसंगत और सैद्धांतिक दृष्टिकोण

(v) क्षेत्रीय (प्रादेशिक) पद्धति (Regional Method)

✍️ किसी विशिष्ट क्षेत्र का समग्र अध्ययन

✍️ विदाल द ला ब्लाश द्वारा विकसित

✍️ प्राकृतिक एवं मानवीय तत्त्वों का समन्वय

(vi) तुलनात्मक पद्धति (Comparative Method)

✍️ विभिन्न क्षेत्रों या घटनाओं की तुलना

✍️ समानताओं और भिन्नताओं की पहचान

✍️ सामान्यीकरण में सहायक

(vii) मात्रात्मक पद्धति (Quantitative Method)

✍️ 1950 के दशक के बाद विकास

✍️ सांख्यिकी, गणित और मॉडल का प्रयोग

✍️ भूगोल को अधिक वैज्ञानिक बनाया

👉 इसे Quantitative Revolution कहा जाता है।

(viii) प्रणाली पद्धति (Systems Approach)

✍️ पृथ्वी को विभिन्न उप-प्रणालियों का समूह माना

✍️ प्राकृतिक और मानवीय प्रणालियों का अध्ययन

✍️ आधुनिक भौगोलिक विश्लेषण का आधार

(ix) व्यवहारवादी पद्धति (Behavioural Approach)

✍️ मानव के निर्णय और व्यवहार पर बल

✍️ स्थानिक व्यवहार (Spatial Behaviour) का अध्ययन

✍️ मानव भूगोल में महत्वपूर्ण

(x) समालोचनात्मक एवं मानववादी पद्धति

✍️ मानव अनुभव, मूल्य और भावना पर बल

✍️ भूगोल को मानवीय दृष्टिकोण से देखने का प्रयास

संकल्पना और पद्धति का परस्पर संबंध:

संकल्पना और पद्धति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि पूरक हैं।

✍️ संकल्पना → क्या अध्ययन करना है

✍️ पद्धति → कैसे अध्ययन करना है

बिना स्पष्ट संकल्पना के पद्धति दिशाहीन हो जाती है और बिना उचित पद्धति के संकल्पना अमूर्त रह जाती है।

आधुनिक भूगोल में समन्वित दृष्टिकोण

आधुनिक भूगोल में-

✍️ सामान्य और प्रादेशिक का समन्वय

✍️ गुणात्मक और मात्रात्मक दोनों पद्धतियों का प्रयोग

✍️ बहु-विषयी (Interdisciplinary) दृष्टिकोण

      भूगोल अब एक समग्र, वैज्ञानिक और व्यावहारिक विज्ञान बन चुका है।

निष्कर्ष:

      भूगोल में संकल्पनात्मक और पद्धतिगत विकास ने इसे एक साधारण वर्णनात्मक विषय से आधुनिक वैज्ञानिक अनुशासन में परिवर्तित कर दिया है। समय के साथ नई संकल्पनाएँ और पद्धतियाँ जुड़ती गईं, जिससे भूगोल का दायरा व्यापक हुआ। आज भूगोल न केवल पृथ्वी और मानव के संबंधों को समझता है, बल्कि भविष्य की योजनाओं और सतत विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

8. Systematic Geography vs Regional Geography / क्रमबद्ध भूगोल बनाम प्रादेशिक भूगोल

Systematic Geography vs Regional Geography

(क्रमबद्ध भूगोल बनाम प्रादेशिक भूगोल)




परिचय (Introduction)

      वारेनियस ने सत्रहवीं शताब्दी में भूगोल की जिन दो शाखाओं सामान्य भूगोल एवं विशिष्ट भूगोल की चर्चा किया वही आगे चलकर क्रमशः व्यवस्थित अथवा क्रमबद्ध भूगोल एवं प्रादेशिक भूगोल कहा जाने लगा। सामान्य या व्यवस्थित या क्रमबद्ध भूगोल सामान्य नियमों, सिद्धांतों एवं संकल्पनाओं के निर्माण से संबंधित है। इसे भौतिक भूगोल तक सीमित रखा गया है। यह विश्व को एक इकाई के रूप में अध्ययन करता है। इसमें भूगोल के किसी एक तत्व का अध्ययन विश्व के सारे ही भागों के लिए किया जाता है।

     इसके विपरीत प्रादेशिक भूगोल में विश्व के किसी एक प्रदेश के तमाम भौगोलिक कारकों का अध्ययन किया जाता है

चित्र:Systematic Geography vs Regional Geography

      हालाँकि ऐसे अध्ययनों को द्वैधता के अन्तर्गत रखना लाजिमी नहीं है क्योंकि ये एक-दूसरे के पूरक हैं विरोधी नहीं।

    अर्थात संक्षेप में भूगोल एक ऐसा विषय है जो प्रकृति और मानव के बीच संबंधों का अध्ययन करता है। इसके विकास के दौरान यह प्रश्न उठा कि भूगोल का अध्ययन सामान्य नियमों के आधार पर किया जाए या विशिष्ट क्षेत्रों के आधार पर। इसी बहस से भूगोल की दो प्रमुख धाराएँ विकसित हुईं-

1. सामान्य/क्रमबद्ध भूगोल (General/Systematic Geography)

2. प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography)

     इस विभाजन को भूगोल में द्वैतवाद (Dichotomy) कहा गया।

बर्नहार्ड वेरेनियस (Bernhard Varenius) का योगदान:

    17वीं शताब्दी में वेरेनियस ने सबसे पहले भूगोल को दो भागों में विभाजित किया-

(i) सामान्य / सार्वत्रिक भूगोल

✍️ इसमें सामान्य नियम, सिद्धांत और अवधारणाएँ शामिल हैं

✍️ सम्पूर्ण पृथ्वी को एक इकाई मानकर अध्ययन

✍️ प्राकृतिक नियमों पर आधारित

✍️ वैज्ञानिक और व्यवस्थित दृष्टिकोण

(ii) विशेष / प्रादेशिक भूगोल

✍️ किसी विशिष्ट क्षेत्र का अध्ययन

✍️ उस क्षेत्र की अनोखी (Unique) विशेषताओं पर बल

✍️ मानव और पर्यावरण के आपसी संबंधों का वर्णन

      वेरेनियस ने सामान्य भूगोल को अधिक वैज्ञानिक, जबकि प्रादेशिक भूगोल को अधिक वर्णनात्मक माना।

सामान्य भूगोल (General Geography) की मुख्य विशेषताएँ:

✍️ पृथ्वी को एक समग्र इकाई के रूप में देखता है

✍️ सामान्य नियमों की खोज करता है

✍️ विश्लेषणात्मक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

✍️ नियम-स्थापना (Law formulation) पर बल

अध्ययन के क्षेत्र:

  • स्थलरूप (Landforms)

  • जलवायु (Climate)

  • मृदा (Soils)

  • वनस्पति (Plants)

  • जनसंख्या, आर्थिक, सामाजिक भूगोल आदि

👉 उदाहरण: पूरी दुनिया में मानसून प्रणाली का अध्ययन

प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) की मुख्य विशेषताएँ:

✍️ किसी विशेष क्षेत्र का समग्र अध्ययन

✍️ क्षेत्र की व्यक्तिगत पहचान (Individuality) पर जोर

✍️ प्राकृतिक + मानवीय तत्त्वों का समन्वित अध्ययन

✍️ वर्णनात्मक, तुलनात्मक और समग्र दृष्टिकोण

अध्ययन का केंद्र:

  • क्षेत्र की अनोखी विशेषताएँ

  • ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारक

  • मानव–पर्यावरण अंतःक्रिया

✍️ उदाहरण: अफ्रीका का प्रादेशिक भूगोल

अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट (Humboldt)

✍️ तुलनात्मक अध्ययन के समर्थक

✍️ आगमनात्मक (Inductive) विधि पर विश्वास

✍️ विविधता में एकता (Unity in diversity) का सिद्धांत

✍️ प्राकृतिक भूगोल को वैज्ञानिक आधार दिया

✍️ उनकी प्रसिद्ध रचना “Kosmos” में सामान्य नियमों पर बल

कार्ल रिटर (Carl Ritter)

✍️प्रयोजनवादी (Teleologist) दृष्टिकोण

✍️ भूगोल को निगमनिक (Deductive) नहीं बल्कि आनुभविक (Empirical) विज्ञान माना

✍️ पृथ्वी को एक जीवित इकाई माना

✍️ “Terrestrial Unity” की अवधारणा

✍️ क्षेत्रीय समग्रता (Totality) पर जोर

✍️ उनका मानना था कि भूगोल का उद्देश्य केवल वर्णन नहीं, बल्कि नियमों की खोज है।

 फ्रेडरिक रैटजेल (Friedrich Ratzel)

✍️ मानव–पर्यावरण संबंध पर बल

✍️ निगमनिक (Deductive) विधि पर विश्वास

✍️ डार्विन के विकासवाद से प्रभावित

✍️ मानव समाज को पर्यावरण से संघर्षरत माना

✍️ मानव भूगोल के विकास में योगदान

विडाल डि ला ब्लाश (Vidal de la Blache)

✍️ फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता

✍️ Possibilism के प्रवर्तक

✍️ मानव को सक्रिय और रचनात्मक माना

✍️ ‘Pays’ (लघु प्रदेश) की अवधारणा

✍️ प्रादेशिक भूगोल को भूगोल का कोर (Core) माना

✍️ उनके अनुसार क्षेत्र का अध्ययन इतिहास + संस्कृति + प्रकृति के साथ होना चाहिए।

रिचर्ड हार्टशोर्न (Richard Hartshorne):

✍️ क्षेत्रीय विभेदन (Areal Differentiation) की अवधारणा

✍️ भूगोल का उद्देश्य- “क्षेत्रों के बीच भिन्नता को समझना”

✍️ प्रादेशिक अध्ययन को भूगोल का केंद्रीय विषय माना

आलोचना : आधुनिक दृष्टिकोण 

       आधुनिक भूगोल में सामान्य (Systematic) और प्रादेशिक (Regional) भूगोल के बीच कठोर विभाजन को उचित नहीं माना जाता। यह माना जाता है कि दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। सामान्य भूगोल द्वारा स्थापित नियमों की वास्तविक परीक्षा प्रादेशिक अध्ययन से होती है, जबकि प्रादेशिक भूगोल को वैज्ञानिक आधार सामान्य भूगोल से मिलता है।

    आधुनिक विद्वानों के अनुसार भूगोल का उद्देश्य केवल नियम बनाना या क्षेत्रीय वर्णन करना नहीं, बल्कि मानव-पर्यावरण संबंधों की समग्र समझ विकसित करना है। इसलिए क्रमबद्ध भूगोल बनाम प्रादेशिक भूगोल द्वैतवाद का स्थान अब समन्वयात्मक और एकीकृत दृष्टिकोण ने ले लिया है।

✍️ प्रसिद्ध कथन: संपूर्ण, उसके भागों के योग से बड़ा होता है। “Whole is greater than the sum of parts.”

निष्कर्ष:     

      इस प्रकार सामान्य भूगोल और प्रादेशिक भूगोल का विभाजन भूगोल के विकास की एक ऐतिहासिक अवस्था को दर्शाता है। प्रारम्भ में जहाँ सामान्य भूगोल ने सार्वभौमिक नियमों और सिद्धांतों की खोज पर बल दिया, वहीं प्रादेशिक भूगोल ने विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्टताओं और मानव-पर्यावरण अंतःक्रिया को स्पष्ट किया।

     आधुनिक भूगोल में यह द्वैतवाद लगभग समाप्त हो चुका है, क्योंकि दोनों दृष्टिकोण एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। सामान्य सिद्धांतों के बिना प्रादेशिक अध्ययन अधूरा है और प्रादेशिक अध्ययन के बिना सामान्य नियम अमूर्त रहते हैं। अतः भूगोल एक समन्वित, समग्र एवं बहुआयामी विज्ञान के रूप में विकसित हुआ है।

8. Physical Geography vs Human Geography/भौतिक भूगोल बनाम मानव भूगोल

Physical Geography vs Human Geography

भौतिक भूगोल बनाम मानव भूगोल



भौतिक भूगोल एवं मानव भूगोल

(Physical Geography vs Human Geography)

      20वीं सदी से पूर्व भूगोल का समस्त अध्ययन मुख्यतः भौतिक भूगोल तक ही सीमित था। इसे सामान्य या क्रमबद्ध भूगोल भी कहा जाता था। उस समय मानव से संबंधित विषयों का अध्ययन भी भौतिक भूगोल के अंतर्गत ही किया जाता था। 19वीं शताब्दी के मध्य में अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Cosmos (1845) में प्रकृति की एकता पर बल दिया और यह स्पष्ट किया कि प्राकृतिक तत्व परस्पर जुड़े हुए हैं। इसके बाद कार्ल रिटर ने Erdkunde (1859) में मानव को भौगोलिक अध्ययन के केंद्र में रखते हुए मानव-केंद्रित दृष्टिकोण को विकसित किया।

        हम्बोल्ट और रिटर के विचारों के प्रभाव से भूगोल में सौंदर्यवादी एवं समन्वयात्मक दृष्टिकोण का विकास हुआ। वे प्रकृति को जड़ तत्व न मानकर सजीव और सृजनशील शक्ति के रूप में देखते थे। 1887 में मैकिंडर ने अपने व्याख्यान Scope and Methods of Geography में यह स्पष्ट किया कि भूगोल में प्राकृतिक और सामाजिक तथ्यों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद 20वीं सदी के प्रारंभ में भूगोल स्पष्ट रूप से दो शाखाओं- भौतिक भूगोल और मानव भूगोल में विभाजित हो गया। विश्वविद्यालयों में दोनों के अलग-अलग विभाग स्थापित होने लगे, जिससे यह द्वंद्व और गहरा हो गया।

      इस काल में कुछ भूगोलवेत्ताओं जैसे पेंक, डेविस आदि ने भौतिक भूगोल को ही वास्तविक भूगोल माना और मानव तत्वों की उपेक्षा की। इसके विपरीत फ्रेडरिक रैट्जेल ने मानव को भौगोलिक अध्ययन का केंद्र मानते हुए Anthropogeographie में यह सिद्ध किया कि मानव की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को प्राकृतिक वातावरण से अलग नहीं किया जा सकता। रैट्जेल के अमेरिकी शिष्य एलन चर्चिल सेम्पल ने History and Its Geographical Conditions (1903) के माध्यम से मानव-केंद्रित भूगोल को और मजबूत किया।

   फ्रांस में विडाल-डी-ला-ब्लांश ने मानव भूगोल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने यह माना कि प्राकृतिक पर्यावरण मानव जीवन की संभावनाएँ प्रदान करता है, परंतु मानव अपनी संस्कृति और तकनीक के माध्यम से उनका चयन करता है। उनके शिष्य जीन ब्रून्स और अन्य विद्वानों ने भी मानव और प्रकृति के पारस्परिक संबंधों को भूगोल का मूल विषय माना। इसी क्रम में हार्टशोर्न (1959) ने कहा कि यदि भूगोल को भौतिक और मानव तथ्यों में विभाजित कर दिया गया, तो भूगोल एक समग्र विज्ञान नहीं रह पाएगा।

निष्कर्ष:

     अंततः 20वीं सदी के मध्य और उत्तरार्द्ध में यह विचार प्रबल हुआ कि भौतिक भूगोल और मानव भूगोल एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं दोनों मिलकर ही भूगोल को एक संपूर्ण और एकीकृत विज्ञान बनाते हैं। आधुनिक भूगोल में मानव-पर्यावरण अंतःक्रिया, क्षेत्रीय अध्ययन और समन्वयात्मक दृष्टिकोण को विशेष महत्व दिया गया है। इस प्रकार भौतिक बनाम मानव भूगोल का विवाद धीरे-धीरे समाप्त होकर भौगोलिक एकता और समन्वय की दिशा में विकसित हुआ।




 उत्तर लिखने का दूसरा तरीका




परिचय

         20वीं सदी के प्रारंभ में ही भूगोल स्पष्टतया दो-भौतिक एवं मानव-भागों में विभक्त हो गया। भूगोल की इन दोनों ही शाखाओं के मध्य दूरी इतनी बढ़ गयी कि विश्व भर के विश्वविद्यालयों में भौतिक एवं मानव भूगोल के अलग-अलग विभागाध्यक्षों की भी नियुक्तियाँ होने लगी। अर्थात् भौतिक बनाम मानव भूगोल के द्वन्द चरम पर पहुंच गये।

     इस दौर में एक ओर पेंशल, डेविस तथा पेंक सदृश भूगोलवेत्ताओं ने वैज्ञानिक या व्यवस्थित या भौतिक भूगोल को ही भूगोल माना वहीं रेटजेल, हैकल, बकल एवं कुमारी सैंपुल सदृश विद्वानों ने मानव भूगोल को भौगोलिक अध्ययन का आधार घोषित कर दिया।

      इसी समय ब्लॉश, ब्रून्स तथा हेटनर जैसे विद्वानों ने भौगोलिक अध्ययन में प्रकृति एवं मानव दोनों ही तथ्यों को अविभाज्य करार कर दिया।

     इन्हीं द्वंदों के मध्य मेकिन्डर, कार्ल शॉवर एवं रिचथीफेन जैसे विद्वानों ने भौगोलिक एकता को अक्षुण्ण रखने में योगदान किया।

      संक्षेप में भूगोल को सामान्यतः दो भागों में बाँटा जाता है-

1. भौतिक भूगोल

2. मानव भूगोल

     इन दोनों के बीच लंबे समय से द्वैत (Dualism) का विवाद चला आ रहा है, लेकिन व्यवहार में इन्हें पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

✍️यूनानी विद्वानों ने सबसे पहले भूगोल को दो भागों में बाँटा।

✍️हेकाटियस ने भौतिक भूगोल को अधिक महत्व।

✍️हेरोडोटस और स्ट्रैबो ने मानव दृष्टिकोण पर जोर।

     इसी कारण भूगोल में भौतिक और मानव पक्षों के बीच अंतर की बहस शुरू हुई।

भौतिक भूगोल (Physical Geography)

अध्ययन के विषय:

⇒ जलवायु

⇒ मौसम

⇒ जलराशियाँ एवं प्रवाह

⇒ समुद्र विज्ञान

⇒ भू-आकृतियाँ

⇒ भूगर्भ विज्ञान

प्रमुख विशेषताएँ :

✍️यह प्राकृतिक विज्ञान (Natural Sciences) से जुड़ा होता है।

✍️अध्ययन मापन योग्य होता है।

✍️परिणाम अधिक सटीक, निश्चित और वैज्ञानिक होते हैं।

✍️प्रयोग और गणना संभव होती है।

मानव भूगोल (Human Geography)

अध्ययन के विषय:

⇒ सामाजिक घटनाएँ

⇒ सांस्कृतिक गतिविधियाँ

⇒ मानव क्रियाएँ और उनका पर्यावरण से संबंध

प्रमुख विशेषताएँ:

✍️ये घटनाएँ समय और स्थान के अनुसार बदलती रहती हैं

✍️इन्हें पूरी तरह मापा नहीं जा सकता

✍️परिणाम अनिश्चित और संभावनात्मक होते हैं

✍️प्राकृतिक विज्ञान की विधियाँ पूरी तरह लागू नहीं होतीं

अध्ययन की पद्धति में अंतर

भौतिक भूगोल मानव भूगोल 
प्राकृतिक विज्ञान आधारित सामाजिक विज्ञान आधारित
मापन योग्य मापन कठिन
अधिक निश्चित परिणाम अनिश्चित परिणाम
स्थिर नियम परिवर्तनशील नियम

द्वैतता (Dualism) का कारण

✍️कुछ विद्वान दोनों भूगोलों को अलग-अलग विषय मानते हैं।

✍️यहाँ तक कि उनकी अध्ययन पद्धतियों को भी अलग माना जाता है।

✍️इसी सोच से भौतिक–मानव द्वैत की धारणा बनी।

निष्कर्ष

✍️भौतिक और मानव भूगोल को पूरी तरह अलग करना व्यावहारिक नहीं है।

✍️दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

✍️आधुनिक भूगोल में समन्वय दृष्टिकोण (Integrated Approach) को अधिक महत्व दिया जाता है।



YOU TUBE LINK- https://youtu.be/2wHXXc-nQoQ

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1. Meaning and Definition of Geography (भूगोल का अर्थ एवं परिभाषा)

Meaning and Definition of Geography

(भूगोल का अर्थ एवं परिभाषा)




Meaning and Definition of Geography

परिचय

    भूगोल एक ऐसा विज्ञान है जो पृथ्वी की सतह, उस पर पाए जाने वाले प्राकृतिक तथा मानवीय तत्वों और उनके पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करता है।

    मानव जीवन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी के भौतिक वातावरण से जुड़ा हुआ है। पर्वत, मैदान, नदियाँ, जलवायु, मिट्टी, वनस्पति तथा मानव की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ इन सभी का स्थानिक (Spatial) वितरण और पारस्परिक प्रभाव भूगोल के अध्ययन का मुख्य विषय है। इसलिए भूगोल को “पृथ्वी और मानव के संबंधों का विज्ञान” भी कहा जाता है।

भूगोल शब्द की उत्पत्ति (Etymology)

     ‘भूगोल’ शब्द की उत्पत्ति दो ग्रीक शब्दों से हुई है-

1. Geo = पृथ्वी

2. Graphy = वर्णन / विवरण

     इस प्रकार भूगोल का शाब्दिक अर्थ हुआ- “पृथ्वी का वर्णन”। प्रारंभिक काल में भूगोल का उद्देश्य केवल पृथ्वी, महाद्वीपों, महासागरों, पर्वतों और देशों का वर्णन करना था, परंतु समय के साथ इसका क्षेत्र अत्यंत व्यापक और वैज्ञानिक हो गया।

भूगोल का अर्थ (Meaning of Geography)

     भूगोल का अर्थ केवल पृथ्वी का वर्णन करना नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की सतह पर होने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाओं तथा मानव क्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। भूगोल यह समझने का प्रयास करता है कि-

✍️ विभिन्न प्राकृतिक तत्व (जैसे जलवायु, स्थलरूप, मिट्टी) मानव जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं।

✍️ मानव अपनी आवश्यकताओं के अनुसार प्राकृतिक पर्यावरण को किस प्रकार परिवर्तित करता है।

✍️ विभिन्न भौगोलिक तत्वों का स्थानिक वितरण (Spatial Distribution) क्यों और कैसे होता है।

    इस प्रकार भूगोल एक समन्वयात्मक (Integrative) विज्ञान है, जो प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञान इन दोनों के बीच सेतु का कार्य करता है।

भूगोल की प्रमुख परिभाषाएँ

(Definitions of Geography)

(i) प्राचीन विद्वानों की परिभाषाएँ

✍️ हिकेटियस (Hecataeus):-

       “भूगोल पृथ्वी की सतह और उस पर स्थित वस्तुओं का वर्णन है।”

✍️ टॉलेमी (Ptolemy):-

      “भूगोल पृथ्वी के ज्ञात भागों का मानचित्रात्मक विवरण प्रस्तुत करता है।”

✍️ प्राचीन काल में भूगोल मुख्यतः वर्णनात्मक (Descriptive) था।

(ii) आधुनिक विद्वानों की परिभाषाएँ

✍️ इमैनुअल कांट (Immanuel Kant):-

     “भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वी की सतह पर घटित घटनाओं का स्थान के आधार पर अध्ययन करता है।”

✍️ अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट (Alexander von Humboldt):-

     “भूगोल पृथ्वी की सतह पर प्राकृतिक घटनाओं की पारस्परिक निर्भरता का अध्ययन करता है।”

✍️ कार्ल रिटर (Carl Ritter):-

    “भूगोल पृथ्वी को मानव का निवास स्थान मानकर मानव और प्रकृति के संबंधों का अध्ययन करता है।”

✍️ रिचर्ड हार्टशोर्न (Richard Hartshorne):-

    “भूगोल का उद्देश्य पृथ्वी की सतह पर घटित विभिन्न घटनाओं के क्षेत्रीय भेदों (Areal Differentiation) का अध्ययन करना है।”

✍️ एलन सी. सेम्पल (Ellen C. Semple):-

    “भूगोल मानव और उसके भौतिक पर्यावरण के संबंधों का अध्ययन है।”

    इन परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि आधुनिक भूगोल केवल वर्णनात्मक न होकर विश्लेषणात्मक और वैज्ञानिक है।

भूगोल की प्रकृति

(Nature of Geography)

    भूगोल की प्रकृति को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है-

(i) स्थानिक विज्ञान (Spatial Science):-

     भूगोल स्थान, दूरी, दिशा और वितरण का अध्ययन करता है।

(ii) समन्वयात्मक विज्ञान:-

    यह भौतिक और मानव तत्वों को जोड़कर देखता है।

(iii) गतिशील विज्ञान:-

    प्राकृतिक एवं मानवीय प्रक्रियाएँ समय के साथ बदलती रहती हैं।

(iv) व्यावहारिक विज्ञान:-

    भूगोल का उपयोग योजना निर्माण, पर्यावरण संरक्षण, आपदा प्रबंधन आदि में होता है।

भूगोल का अध्ययन क्षेत्र

(Scope of Geography)

     भूगोल का अध्ययन क्षेत्र बहुत व्यापक है, जिसमें प्रमुख रूप से शामिल हैं-

✍️ भौतिक भूगोल: स्थलरूप, जलवायु, महासागर, मिट्टी, जैव भूगोल

✍️ मानव भूगोल: जनसंख्या, कृषि, उद्योग, बस्तियाँ, परिवहन

✍️ आर्थिक भूगोल

✍️ राजनीतिक भूगोल

✍️ पर्यावरण भूगोल

✍️ प्रादेशिक भूगोल इत्यादि

निष्कर्ष

    अतः यह स्पष्ट है कि भूगोल केवल पृथ्वी का साधारण वर्णन नहीं, बल्कि एक व्यापक, वैज्ञानिक और उपयोगी विषय है। यह हमें पृथ्वी और मानव के बीच संतुलन बनाए रखने की समझ देता है।

   आज के समय में जब पर्यावरणीय संकट, संसाधनों की कमी और शहरीकरण की समस्याएँ बढ़ रही हैं, तब भूगोल का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है।

संक्षेप में कहा जाए तो-
👉 भूगोल पृथ्वी, प्रकृति और मानव के पारस्परिक संबंधों का समग्र अध्ययन है।  अर्थात Geography is the holistic study of the interrelationships of the earth, nature, and human beings.

41. Applied Geography (व्यावहारिक भूगोल)

 Applied Geography

(व्यावहारिक भूगोल)



प्रश्न प्रारूप

Q. व्यवहारिक भूगोल पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Applied Geography.)    

उत्तर- समाज में भौगोलिक ज्ञान को व्यवहार में प्रयुक्त कर समस्याओं का समाधान करना व्यावहारिक भूगोल का प्रमुख उद्देश्य है। बहुत समय तक भूगोलवेत्ता खनिज-उत्पादन और प्राकृतिक संसाधनों के विदोहन संबन्धी अध्ययनों में व्यस्त रहे। वे समाज कल्याण और सामाजिक-न्याय जैसी महत्त्वपूर्ण समस्याओं की ओर से आँखें मूंदे रहे।

    व्यावहारिक भूगोलवेत्ताओं का तर्क विषय में शोध कार्य के प्रति था विशिष्ट को उजागर बनाना, और अध्यापन का भी जोर मानव व प्रकृति के बीच सामंजस्य की ओर था, न कि विषय में विद्वता हासिल करना।

    व्यावहारिक भूगोल आर्थिक संपन्नता पर नहीं, सामाजिक दृष्टि से स्वास्थ्यप्रद विकास में विश्वास व्यक्त करता है। वह कार्यक्षमता और निपुणता के स्थान पर समानता पर और साज-समान की मात्रात्मक बढ़ोतरी के स्थान पर जीवन की गुणवत्ता पर ध्यानाकर्षित कराने वाला विषय है।

    व्यावहारिक भूगोल के बारे में पहली बार विस्तृत व्याख्या डडले स्टाम्प ने 1960 में प्रस्तुत किया। वह भूगोलवेत्ता का अनूठा योग मानव और वातावरण के बीचे ‘समस्तता’ का दृष्टिकोण (Holistic Approach) विकसित कराना जानता था। इस प्रकार का दृष्टिकोण विकसित बनाने में भौगोलिक सोपानों में मुख्य पद हैं-

(i) क्षेत्र का प्रेक्षण, अवलोकन कार्य, और

(ii) वस्तुनिष्ठता से व्यवस्थित तथ्यों का संकलन।

   अर्थात संग्रहीत आंकड़ों व सूचनाओं को मानचित्र में अंकित कर वैज्ञानिक रूप से उनका अध्ययन करना। यह निवर्चन-अध्ययन विश्व की महत्त्वपूर्ण समस्याओं के अवबोध के लिए आवश्यक है। इससे भूमि पर जनसंख्या का दबाव जैसी समस्या, आर्थिक विकास, रहन-सहन संबन्धी स्तर में असमानताएँ और प्रादेशिक नियोजन के बारे में यथार्थ स्थिति प्रकट बनती हैं।

   स्वयं डडले स्टाम्प ने ग्रेट ब्रिटेन का भू-उपयोग सर्वे कार्य कर Land of Britain: Its Use and Misuse पुस्तक प्रकाशित की जो Applied Geography में मील का पत्थर साबित हुई।

  डडले स्टाम्प के इस प्रयास ने अनेक भूगोलवेत्ताओं को केन्द्रीय व स्थानीय निकायों में नियोजन-अधिकारी पद पर आसीन बनाने हेतु सक्षम बनाया। 

    युद्धकाल में भी अनेक लोगों को राष्ट्रीय सरकारी कार्यालयों और सैन्य-कौशल व खुफिया विभागों में रोज़गार मिला। वायव्य मानचित्रों के निवर्चन और दूर-संवेदन एजेन्सी में भी भूगोल के ज्ञाताओं को प्रशिक्षित बनाने की नींव पड़ी। ये विधियाँ आजकल भूगोल में अति महत्त्वपूर्ण स्थान ग्रहण कर गयी हैं। सर्वे कार्य और मानचित्रण क्रिया के ये महत्त्वपूर्ण उपकरण हैं।

    1960 के उपरान्त भूगोल की तकनीक और अभिगमों में विकास आया। मात्रात्मक क्रांति से परिवर्तन आए और तदुपरान्त भौगोलिक सूचना-तंत्र (Geographic Information System- GIS) ने व्यावहारिक भूगोल के योगदान की दिशा में वृद्धि की। इससे अनेक सरकारी व गैर सरकारी सेक्टर में लोगों को रोज़गार मिला।

    भूगोलवेत्ताओं का ध्यान वातावरणीय आपदाओं और पुनर्वास जैसी गंभीर समस्याओं की ओर आकर्षित किया। सन् 1981 में Journal of Applied Geography की स्थापना हुई। Coppock ने अब भूगोल के अन्तर्गत ‘सार्वजनिक नीति’ (Public Policy) को स्थान दिया। विषय में बाजारी-कौशल (Marketable Skills) में वृद्धि व विकास हेतु व्यावहारिक भूगोल के विद्वानों ने GIS तथा दूरस्थ संवेदन तकनीक के भरपूर उपयोग पर जोर दिया।

    यूरोपीय देशों की तुलना में इस दिशा में उत्तरी अमेरिका आगे था जहाँ भूगोल ने विश्वविद्यालयों के बाहर आकर समाज की संस्थाओं, कार्यालयों में उपयोगी योगदान दिया। इसमें The Association of American Geographers का योगदान सक्रिय था जिसके अधीन व्यावहारिक भूगोल का विशेष दल संगठित था।

    व्यापारिक निजी फर्मों के अन्तर्गत अनेक निविदाएं भूगोल ज्ञाताओं को मिलने लगीं। पूर्वी यूरोप के समाजवादी व्यवस्था वाले देशों और पूर्ववर्ती USSR में 1950 और 2000 ई. के दौरान व्यावहारिक भूगोल के ज्ञान का सदुपयोग तत्कालीन आर्थिक समस्याओं के हल में और वातावरणीय समस्याओं के निराकरण में पूंजीवादी विश्व की तुलना में अधिक हुआ।

     कतिपय भूगोलवेत्ताओं ने व्यावहारिक भूगोल का विघटन कर उसे संकुचित दायरे में समस्याओं के हल-हेतु प्रयोग किया जैसे-

(i) ‘स्थानिक विश्लेषण’ जो प्रत्यक्षवाद पर आधारित बन GIS द्वारा अवस्थितिक आबंटन की समस्याओं को हल करने पर जोर देता है,

(ii) ‘मानवतावादी भूगोल’ का केन्द्रीय बिन्दु मानव एजेन्सी है और

(iii) आमूल परिवर्तनवादी भूगोल का प्रमुख उद्देश्य लोगों का ध्यान उस समाज के प्रति जाग्रत बनाना था जिसमें वे दिन काट रहे थे, और उससे उन्हें मुक्त कराने हेतु उसकी पुनर्रचना पर जोर है।

    स्टोडार्ट (Stoddart, 1987) ने व्यावहारिक भूगोल की आलोचना करते हुए उसे अत्यन्त तुच्छ व नगण्य प्रश्नों में केन्द्रित कहा है। उसका मत है कि व्यावहारिक भूगोल के स्थान पर भूगोलवेत्ताओं को अपना ध्यान यथार्थ समस्याओं के भूगोल में लगाना चाहिए और मानव-वातावरण से संबन्धित मत्वपूर्ण समस्याओं पर केन्द्रित करना चाहिए।

भूगोल और सार्वजानिक नीति

     भूगोल को विश्वविद्यालयों में स्थान 19वीं सदी के आरम्भिक दशकों से मिलना प्रारम्भ हुआ। जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों में भूगोल विभागों के अधीन विषय का विकास हुआ। वह अनेक वैचारिक, दार्शनिक एवं पद्धति-विषयक समस्याओं में भी उलझा रहा और विषय सुनिश्चित रूप में कलेवर ग्रहण करने हेतु संघर्षरत बना रहा। भौगोलिक साहित्य, दर्शन एवं विधियों में व्यक्तिगत धारणाएँ एवं राजनीतिक तंत्र, सामाजिक आवश्यकताएँ व क्षेत्रीयता छायी रही। विगत पच्चीस वर्षों की अवधि में वृहत् रूप से भौगोलिक सामग्री रची गयी। गैर-सरकारी और सरकारी संगठनों के लिए तथा अध्ययन-अध्यापन में उपयोगी भूगोल-सामग्री प्रत्यक्ष बनी।

       द्वितीय विश्व युद्ध तक भूगोल मुख्यतः धरातल, प्राकृतिक आकृतियों, मौसम व जलवायु, पर्वतों, नदियों, मार्गों, नगरों व शहरों और बन्दरगाहों विषयक सामान्य सूचनाएँ प्रदान करने का विषय ही समझा जाता था। सामान्य जनता इसे सामान्य ज्ञान कराने का विषय ही मानती थी। परन्तु निकट भूतकाल से भूगोल की नवीन योजना-नीति (New Strategy) उभरी है, और विषय का पुनर्संगठन व पुनर्रचना हुई है।

    भूगोल में नए विषयों को स्थान दिया गया और समाज कल्याण की दष्टि से स्थानीय चेतना जाग्रत बनाने हेतु पर्यावरण, स्थानीय भौगोलिक बोध, प्रदेश-जगत् की गहन जानकारी तथा विश्व वातावरण एवं संबन्धों को अध्ययन हेतु अपनाया गया।

    वातावरण के प्रबन्ध, नियोजन तथा प्रदूषण की समस्याओं के प्रति ध्यानाकर्षण कराकर भूगोल को सार्वजनिक और लोक-हित का विषय बनाने के अथक प्रयास आरम्भ हो गए है।

   लोक-कल्याण के उद्देश्य और निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति हेतु भूगोल में सामाजिक पिछड़ेपन और जीवन-स्तर के विभिन्न सोपानों, गरीब एवं बेरोजगारी के संबन्ध में भौगोलिक व्याख्या स्थान प्राप्त करने लगी है। ऐसे भौगोलिक आधार पर प्रस्तुत निवर्चनों से स्थानीय निकायों और राजकीय प्रशासन को लाभ मिला है।

    अन्तर्राज्यीय एवं अंतर्प्रदेशी समस्याएँ न केवल प्रत्यक्ष बनीं, अपितु उनकी यथार्थता का बोध हुआ है। इनके हल के आधार प्रत्यक्ष बने हैं, और प्रादेशिक असमानताएँ व जीवन संबन्धी गुणवत्ता के सुधार में भूगोल का योगदान महत्वपूर्ण बना है। दृश्य-वस्तुओं के पुनर्वितरण की आवश्यकता प्रत्यक्ष बनाने में भौगोलिक स्थानिक विश्लेषण महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

    नौकरी-पेशा और रोजगार की दृष्टि से भूगोल आरम्भ में विकसित देशों में भी केवल अध्यापन का विषय (Teaching Subject) था। तीसरी दुनिया के देशों में तो आजतक भी भूगोल को देश की योजनाओं एवं विकास प्रक्रिया में सक्रिय स्थान नहीं मिला है। शोध-ग्रंथ-भूगोल अभी तक पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाते देखे जा सकते हैं, उनका विकास योजनाओं हेतु सदुपयोग नहीं होता है। दुर्भाग्यवश, विशेषतः भारत में नियोजक-नीति- निर्धारक आज तक भी स्थानिक विमियों (Spatial Dimensions) विषयक समस्याओं से मुख-मोड़े बैठे हैं। उनमें आजतक यही धारणा घर कर बैठी हुई है कि भूगोल सामान्य- ज्ञान कराने मात्र की पूर्ति करने का विषय है, उसका कोई अन्य उपयोग नही है। इसका दोष भूगोलवेत्ताओं का ही है, क्योंकि उन्होंने सामाजिक क्षेत्र में कोई सार्थक योगदान नहीं दिया, और न ही प्रदेश के स्थानिक संगठन हेतु विकल्प व नीति-निर्धारक तथ्यों को इंगित किया।

      केवल विगत तीन दशकों में विषय की विधि-तंत्र, सोच और प्रसंगों के चयन में परिवर्तन प्रकट हुए भूगोलवेत्ताओं का ध्यान अब प्रधान रूप से गरीबी, भुखमरी, प्रदूषण, प्रजातीय भेदभाव, समाजिक ऊंच-नीच अथवा न्याय, पर्यावरण प्रदूषण और संसाधनों के उपयोग व दुरुपयोग आदि समस्याओं के प्रति जागरूक बना है। इसमें कतिपय उल्लेखनीय कार्यों में Geography of Crimes, Black-Ghetto, और Geography of Social Well-being हैं। यह एक उत्साहवर्द्धक परिवर्तन है कि आजकल विश्व के सभी भागों में नव-शोध की दिशा भूगोल में लोक-प्रशासन से जुड़ी समस्याओं पर आधारित है। सामाजिक समस्याओं के निराकरण हेतु जन-कल्याणकारी (Human Well-being) प्रसंगों में शोध आरम्भ हो चुकी है। असमानताओं की खाई को पाटने की दिशा में मानव भूगोल अब कदम उठा चुकी है। वस्तुतः कल्याणकारी भूगोल का ध्येय अब ऐसी सामाजिकता के विकास की आवश्यकता है जो भौगोलिक विकल्पों द्वारा रची जा सके और जनता की मूल सुविधाओं पर आधारित बने।

     उपयोगितावादियों (Pragmatists) का मत है कि मात्रात्मक क्रांति के वैज्ञानिक विधि-विधानों (प्रत्यक्षवाद) का प्रयोग मानवीय समस्याओं के निराकरण हेतु किया जाना चाहिए। इसी संदर्भ में David M.Smith ने कल्याणकारी अभिगम के अपनाने पर जोर दिया है। मानव भूगोल का भविष्य ऐसी ही समस्याओं के विश्लेषण में निहित है जो मानव-कल्याण की ओर उन्मुख है।

    कल्याणकारी भूगोल को भिन्न-भिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न रूपों से परिभाषित किया। मिशान (Mishan) के अनुसार सैद्धांतिक कल्याणकारी भूगोल अध्ययन की वह शाखा है जो अच्छे-बुरे का निर्णय करने वाले मापक द्वारा उपलब्ध भौगोलिक परिस्थितियों के विकल्पों को श्रेणी दे सके।

    नाथ (Nath) के अनुसार कल्याणकारी भूगोल ऐसा भौगोलिक क्षेत्र है जिसमें समाजकल्याण हेतु विभिन्न भौगोलिक नीतियों को परखा जा सकें। स्मिथ (Smith) ने इसे स्थानिक संदर्भ में परिभाषित करते हुए व्यक्त किया कि- कल्यणकारी भूगोल इसका अध्ययन है- “कौन, क्या, कहाँ और कैसे प्राप्त करता है। 

      तात्पर्य यह है कि कल्याणकारी भूगोल ऐसी भौगोलिक स्थिति अथवा दिशा इंगित करता है जिसमें संसाधनों, आय और जन-कल्याण के अन्य स्रोतों का स्थानिक विनियोजन अथवा आवंटन सम्भव हो सके।

    स्मिथ की व्याख्या का प्रयोग गरीबी एवं अन्य सामाजिक समस्याओं के अतिरिक्त अन्य महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों से भी जुड़ा है जैसे उद्योगों के अवस्थितिजन्य प्ररूप जनसंख्या-वितरण, सामाजिक सेवा-सुविधाएँ की अवस्थिति, यातायात-जाल, मानवों व माल की ढुलाई आवागमन-प्ररूप तथा विभिन्न भौगोलिक दशाओं के मध्य जीवन की गुणवत्ता स्थापित करने के प्रयास। इन सभी के तले ऐसी सामाजिक व्यवस्था जो आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक संरचनाओं को उत्पन्न कर सार्वजनिक कल्याण का विकास कर सके।

      कल्याणकारी अभिगम मानव इतिहास के विभिन्न कालों में भिन्न-भिन्न राष्ट्रों व समाजों ने भिन्न स्वरूप में अपनाया। यहूदियों, क्रिस्तानियों, मुसलिमों, कन्फ्यूशियनों, हेलिनीयों, मार्क्सवादियों, यथार्थवादियों, अस्तित्ववादियों आदि ने इस अवधारणा को अपनी-अपनी नीतियों और सामाजिक रीतियों व वातावरण में ही ग्रहण किया।

    मानव-दिशाओं में सुधार और मानव-कल्याण की अनुभाविक पहचान (Empirical Identification) इलाकों के स्तर पर जाना महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इसी दिशा में शोध भी करना जरुरी है। परन्तु दुर्भाग्यवश विकासशील देशों में, विशेषतः भारत में इलाकों के स्तर पर (On Territorial Levels) इस दिशा में न तो प्रयास हुए, और न शोधकार्य किए गए हैं। विभिन्न इलाकों के सभी प्रकार के भौगोलिक प्रारूपों को जाँच कर वहाँ अधिकतम लाभ और न्यूनतम लागत के आधार पर ही जनकल्याण की सार्वजनिक नीति अपनायी जाने की आवश्यकता है। कल्याणकारी नुस्खा प्रदेश अथवा राज्य की बदली हुई तस्वीर के लिए विकल्प सिद्ध हो, न कि घिसे-पिटे परम्परागत सुझावों में जकड़ा कोई स्थिर-स्थायी ढाँचा।

    नवीन अथवा विकल्प बने नुस्खे से इसका उत्तर स्पष्टतः मिलना चाहिए कि ‘किसे, क्या, और कहाँ से कितना मिले?’ पहले बनी हुई अवांछनीय दशा में विकल्प के लागू करने के उपरान्त नई-दिशा बेहतर परिणाम दे यह आवश्यक है।

    भूगोलवेत्ता का बदले वातावरण को (गुणकारी और बेहतर) उत्पन्न करने में उसका योगदान और उस रूप में उसकी हैसियत क्या होनी चाहिए, यह निर्णय किया जाना आवश्यक है। किसी क्षेत्र (Space) में विनियोजन अथवा आवंटन की क्षमता का निर्धारण कर और वहाँ के संसाधनों का विश्लेषण और संश्लेषण के आधार पर भूगोलवेत्ता सार्वजनिक नीति-निर्धारण में योगदान दे सकते हैं।

    भारत जैसे विकासशील देशों में घोर रूप में आन्तरिक असमानताएँ व्याप्त हैं। तीसरी दुनिया के देशों में पूंजी और अधिकार शक्ति (Wealth and Power) केवल कुछ ही शहरी लोगों और भूमिधरों के हाथों में केन्द्रित बनी है। दक्षिणी अफ्रीका इसका ज्वलन्त उदाहरण है।

    भारत में भी आधे से अधिक जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन-निर्वाह कर रही है, और कुल राष्ट्रीय परिसम्पत्ति (National Assets) का 50 प्रतिशत से भी अधिक भाग केवल दो दर्जन परिवारों के हाथों में सीमित है। यहाँ, यद्यपि गांवों में 70 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, परन्तु अधिकांश आर्थिक क्रिया महानगरी नाभियों (Metropolitan Cores) में संचालित बनी है।

    नगरोन्मुख औद्योगिक एवं सामाजिक पक्षपातपूर्ण नीति हमारे नियोजकों के मस्तिष्क में घर कर चुकी है। इससे शहरी व ग्रामीण जनसंख्या के बीच और अमीर-गरीब के बीच खाई चौड़ी होती जा रही है।

    संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा व आस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में भी लोक-कल्याण के स्तरों में स्थानिक अन्तर पाया जाता है। सामान्यतः संयुक्त राज्य अमेरिका में भौतिक- जीवन का स्तर विश्व के अन्य देशों की तुलना में बहुत ऊँचा है। परन्तु लाखों अमेरिकी, विशेषतः वहाँ के नीग्रो, गरीबी में शहरों की उपेक्षित बस्तियों (Ghettos) में जीवन काट रहे हैं।

     संयुक्त राज्य के दक्षिणी ग्रामीण भागों (टेक्सास, जार्जिया, आदि) में जन-जीवन की दशाएँ उतनी ही बदतर बनी हैं जैसी कि दक्षिणी अफ्रीकी भागों में हैं। वहाँ की नगरी गंदी बस्तियों (Slums) में अपराध, नशाखोरी आदि कुकृत्यों की दर पर्याप्त ऊँची है। यह U.S.A. की पूंजीवादी व्यवस्था और आर्थिक विकास का खोखलापन और असफलता ही है जहाँ लगभग 12 प्रतिशत (2.6 करोड़) लोग संयुक्त राज्य के जनगणना ब्यूरो (U.S. Census Bureau) के अनुसार, अधिकृत निर्धारित गरीबी रेखा की सीमा से नीचे की आय वाले हैं। वस्तुतः यह दयनीय आर्थिक स्थिति इसलिए भी विस्फोटक बनी है क्योंकि नगरी- पक्षपाती और धनिकोन्मुख नीति ने राज्य व समाज को जकड़ रखा है। इससे आर्थिक व सामाजिक असन्तुलन व असमानताएँ उत्पन्न हो रही हैं।

    प्राकृतिक अवरोधों जैसे अकाल, बाढ़, सूखा, तूफान, मरुस्थल आदि वातावरणीय विभीषिकाओं को पूर्णतः मिटाया नहीं जा सकता, हाँ कम कम किया जा सकता है। भूगोलवेत्ताओं का दायित्व ऐसी स्थितियों में और भी अधिक महत्त्वपूर्ण बन उठता है। वह समाज की आवश्यकताओं के अनुसार संसाधनों के संरक्षण और पुन: आबंटन से जीवन की गुणवत्ता बनाए रख सकते हैं। समानता को चरणबद्ध अर्जित कर लोक कल्याण के लक्ष्य पूर्ति के प्रयास में योगदान दे सकते हैं।

     भूगोलवेत्ता अन्य ज्ञान के विद्वानों की तुलना में वातावरण के प्रबन्धन में अधिक सक्षम सिद्ध हो सकते हैं। वे स्थानिक दृष्टि से समस्याओं को उजागर करने में और स्थानिक रूप से वितरित सूचनाओं व आंकड़ों का विश्लेषण करने में योग्य सिद्ध हो सकते हैं।

    वातावरण के प्रति चेतना और स्थानिक विमीय के अवबोध का अनुभव भूगोलवेत्ता जितना उचित व्याख्या कर सकता, अन्य विशिष्ट विषयों में केन्द्रित विज्ञान नहीं कर सकते। आपूर्ण- स्थानिक वातावरण में भूगोलवेत्ता की पैठ विश्वसनीय होती है क्योंकि वह समस्तता (Wholeness) से जुड़ी होती हैं।

    कल्याणकारी समाज की आवश्यकता आवश्यक वस्तुओं के बेहतर आवंटन, बेहतर वितरण और उत्पादन के साधनों के बेहतर विनियोग में निहित है। इनके द्वारा ही व्यक्तियों, वर्गों में और विभिन्न स्थानों में सुविधाएँ उपलब्ध कराकर लोक- कल्याण की मंजिल तक बढ़ा जा सकता है।

     अनेक देशों में भूगोलवेत्ता अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर लोकनीतियों के निर्धारण में सक्रिय बने हैं। वे संसाधनों के लाभकारी प्रभावों को सभी वर्गों के लोगों तक उपलब्ध बनाने में व्यस्त हैं।

     स्वीडन, नार्वे, नीदरलैण्ड, इजरायल, डेनमार्क, रूस, फ्रांस, न्यूज़ीलैण्ड व आस्ट्रेलिया के देशों में भूगोलवेत्ताओं व अन्य वैज्ञानिकों के मध्य अच्छा तालमेल बना है। इससे नियोजन द्वारा वहाँ मानव और वातावरण के बीच अन्तक्रिया को लोकनीति व कल्याणकारी दिशा में अपनाया गया है। शोध कार्य के उद्देश्य भी सर्वजनहितों के लिए निर्धारित हैं।

     भारत के भूगोलवेत्ता भी निरन्तर वृद्धि प्राप्त क रही जनसंख्या के लिए अनेक सामाजिक व आर्थिक समस्याओं और रोजगार विषयक संकट का सामना व्यावहारिक योजनाओं (Pragmatic Proposals) को अपनाकर हल कर सकते हैं।



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39. Model and Its Types (प्रतिरूप एवं इसके प्रकार)

Model and Its Types

(प्रतिरूप एवं इसके प्रकार)



प्रश्न प्रारूप

Q. प्रतिरूप की परिभाषा दीजिए एवं इसके प्रकार की विवेचना करें।

(Define model and discuss its types.)

उत्तर- भिन्न-भिन्न भूगोलवेत्ताओं ने ‘मॉडल’ को भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित किया है।

स्किलिंग के अनुसार “मॉडल एक सिद्धांत, नियम, परिकल्पना अथवा संरचित विचार है। भौगोलिक दृष्टि से इसमें विश्व की यथार्थता के बारे में तर्कसंगत सोच को सम्मिलित कर सकते हैं। यह स्थान व काल के सन्दर्भ में दृश्य-जगत् (प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक) के विषय में सुरचित विचार है। इसे योग, संबंध अथवा समीकरण में व्यक्त करते है।”

अकॉफ के अनुसार “किसी सिद्धांत अथवा नियम को तर्कसंगत उपकरणों, सेट-सिद्धांत और गणित का प्रयोग कर औपचारिक प्रस्तुतीकरण मॉडल कहा जा सकता है”।

हेंस, यंग एवं पेच ने मॉडल का अभिप्राय किसी ऐसी विधि अथवा यांत्रिक उपायों को मॉडल कहा जो पूर्वानुमान उत्पन्न करे। तात्पर्य यह है कि मॉडल रचना एक ऐसी प्रक्रिया है जो सिद्धान्तों का तर्कसंगत ढंग से परीक्षण करती है।

       इस प्रकार भौगोलिक यथार्थ, भू-दृश्य व मानव-प्रकृति संबंध को सरल बनाकर आदर्शों में प्रस्तुतिकरण ही मॉडल कहलाती है।

मॉडल/प्रतिरूप का महत्त्व 

     भूगोल में पृथ्वी एक ऐसा आलेख (डॉक्यूमेंट) है जो मानव संबंधों का अध्ययन कराती है। यह संबंध जटिल बना है, और सरलता से नहीं समझा जा सकता है, क्योंकि पृथ्वी तल पर प्राकृतिक सांस्कृतिक वैविध्य की विषमता का विकास हुआ है। इस विविधता को जो समय व स्थानानुसार परिवर्तनशील बनी है, सरल ढंग से समझने के अनेक साधन हैं।

     मॉडल एक ऐसा साधन है जो पृथ्वी की सतह पर विकसित जटिलताओं को परिकल्पनाओं व सिद्धांतों के परीक्षण द्वारा सरल बनाता है। मॉडल पूर्वानुमान का उपाय है।

भूगोल में मॉडल-रचना की आवश्यकता

      भूगोल में मॉडल-रचना की आवश्यकता के पक्ष में अनेक कारण हैं-

1. भावी अनुमानों, दृश्य-सत्ता के अनुरूपण (Simulation), अन्तर्वेशन (Interpolation), आंकड़ों के प्रजनन व आकलन के लिए मॉडलों का उपयोग लाभदायक है। इनकी सहायता से जनसंख्या के घनत्व और भावी विकास, भूमि-उपयोग व फसली- गहनता, जनसंख्या के प्रवास-प्रारूप, औद्योगीकरण, नगरीकरण, अवांछित बस्तियों का विकास जैसी घटनाएँ सरल ढंग से व्यक्त की जा सकती हैं। ये मौसम की भविष्यवाणी करने, जलवायु परिवर्तन, समुद्रतल के परिवर्तनों, पर्यावरण प्रदूषण, मिट्टी-अपरदन व मिट्टी क्षरण व भूमि की आकृतियों के विकास में भी उपयोगी सिद्ध होते हैं।

2. मॉडल के द्वारा व्याख्या, विश्लेषण और भौगोलिक तंत्र को सरल ढंग से व्यक्त किया जाता है। उद्योगों संबन्धी अवस्थितिजन्य सिद्धांतों, कृषि भूमि उपयोग के कटिबंधन, प्रवास-प्रारूप व भू-आकारों के विकास के सोपानों के बारे में समझबूझ और इनके पूर्वानुमानों में मॉडल सहायता प्रदान करते हैं।

3. भौगोलिक आंकड़ों की विविधता, विस्तार एवं उनके चयन तथा उनमें सहसंबन्धों की खोज में तथा उनके संगठित व संरचित करने में मॉडल-रचना सहायक क्रिया है।

4. तंत्रों के प्रतिनियुक्त प्रेक्षणों (Surrogate Observations) के लिए ‘विकल्पीय मॉडल’ (Alternative Models) प्रयोग किए जा सकते हैं। इन प्रेक्षणों को जो प्रत्यक्ष रूप में अवलोकित नहीं किए जा सकते व्यक्त करने हेतु विकल्पीय मॉडल रचे जाते हैं।

5. एक तंत्र के प्रधान व गौण लक्षणों को और उनका पर्यावरण के साथ संबन्ध को समझने में मॉडल उपयोगी विधि है।

6. औपचारिक रूप से व्यक्त सैद्धांतिक कथनों की आनुभविक यथार्थता को मॉडल का ढांचा स्पष्ट बनाता है।

7. मॉडल-क्रिया एक प्रकार की सूक्ष्म-भाषा है, इसे भौगोलिक एवं सामाजिक वैज्ञानिक समझते हैं।

8. मॉडलों द्वारा सामान्य एवं विशिष्ट नियमों का निर्माण एवं सिद्धांतों की रचना में सहायता मिलती है।

मॉडल/प्रतिरूप के लक्षण (Feature of a Model)

     मॉडल में मुख्य लक्षण सम्मिलित हैं:-

1. मॉडल विश्व में पृथ्वी की सतह व मानव-पर्यावरण के जटिल संबन्ध की यथार्थता को अथवा विश्व के किसी भाग को व्यक्त करने का साधन है।

2. मॉडलों से कुछ लक्षण अधिक महत्त्वपूर्ण और कुछ गौण-रूप में व्यक्त होते हैं, क्योंकि वह चयन-क्रिया पर आधारित हैं।

3. मॉडलों में सामान्यानुमानों के सुझाव निहित होते हैं। वस्तुतः मॉडल यथार्थ जगत् के पूर्वानुमान ही हैं।

4. मॉडलों को ‘अनुरूपताएँ’ (Analogies) भी कह सकते हैं। ये यथार्थ जगत् से भिन्न परन्तु उसकी मिलती-जुलती तस्वीर हैं।

5. मॉडल परिकल्पनाओं की रचना के लिए हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं।

6. मॉडल यथार्थ जगत् के कुछ ऐसे लक्षणों को सरलरूप में अवगत बनाता है जिससे निष्कर्ष निकाले जा सकें।

7. मॉडल सूचनाओं को परिभाषित करने, संग्रह करने व संरचित बनाने का ढाँचा प्रस्तुत करता है।

8. उपलब्ध आंकड़ों से अधिकतम सूचनाएँ निचोड़ लेने में मॉडल सहायक बनते हैं।

9. कोई विशेष घटना अथवा दृश्य-वस्तु किस भाँति पृथ्वीतल पर स्थित बनी, इसको स्पष्ट करने में मॉडल सहायक हैं।

10. मॉडल समान प्रकार के दृश्य-वस्तुओं के समूहों की तुलना में सहायक हैं।

11. दृश्य-वस्तुओं की विषमताओं के बीच में से इच्छित दृश्य-वस्तु समूह को दृष्टिपात कराने के साधन ‘मॉडल’ हैं।

12. सिद्धांत-रचना व नियम-निरूपण की प्राथमिक सीढ़ी का मॉडल काम करते हैं।

मॉडलों/प्रतिरूपों के प्रकार

        मॉडलों के विभाजन का एक पक्ष उन्हें (1) विवरणात्मक और (2) नियामक में विभक्त करता है।

       विवरणात्मक (Descriptive) मॉडल रीतिबद्ध विवरण द्वारा जगत् की यथार्थता प्रकट करते हैं। नियामक (Normative) मॉडल के द्वारा निश्चित परिस्थितियों अथवा मानी गई दशाओं के अधीन क्या कुछ घटित होना चाहिए, इसे प्रकट किया जाता है।

     विवरणात्मक मॉडल में आनुभविक सूचनाओं को संघटित करते हैं। इसमें आंकड़ों का वैज्ञानिक वर्गीकरण संभव होता है, अतः इन्हें प्रायोगिक डिजायन भी कहते हैं। इसमें अनुमानित परिस्थितियों के आधार पर संरचना होती है। अतः, विवरणात्मक में व्यक्त यथार्थता जगत् की अनुमानित तस्वीर है।

   मॉडलों को आंकड़ों की प्रकृति के आधार पर भौतिक (Hardware), प्राकृतिक अथवा प्रयोगमूलक (Physical or Experimenta) में विभक्त करते हैं। ये मॉडल मूर्तिनुमा (Iconic) हैं, और दृश्य-जगत् के यथार्थ की ज्यों-की-त्यों तस्वीर मापक परिवर्तन पर प्रस्तुत करते हैं। इनमें सार्थक लक्षण यथार्थ-जगत् के ही निहित होते हैं। इनके उदाहरण मानचित्र, ग्लोब और भू-गर्भीय मॉडल हैं। इन्हें भौतिक अथवा प्रयोगमूलक भी कहते हैं।

       मॉडल सादृश्य (Analogue) भी हो सकते हैं जो यथार्थ-जगत् के गुणों से रचे जाते हैं। परन्तु इनकी सादृश्यता यथार्थ जगत् के अनुरूप होते हुए भी, इनकी रचना में भिन्न लक्षणों का प्रयोग करते हैं। इसलिए ये मॉडल अनुकरण-मॉडल (Simulation Model) भी कहलाते हैं। इनका यथार्थ-जगत्-अनुरूपण एक स्वांग अथवा नकल ही होता है। इनको सांकेतिक विधि द्वारा व्यक्त किया जाता है और इन्हें तर्क गणितीय भाषा में भी व्यक्त किए जाते हैं।

मॉडलों/प्रतिरूपों का सामान्य वर्गीकरण (General Classification of Models)

     भौगोलिक भू-दृश्यों और भौगोलिक अवस्थाओं की जटिलता इस प्रकार की है कि भूगोल के अध्ययन में प्रतिरूपों का विशेष महत्त्व है। भूगोलवेत्ताओं द्वारा अनेकों प्रकार के मॉडलों की रचना की जा रही है। अतः, निम्न-परिच्छेदों में इनको सामान्य वर्गों में विभक्त कर स्पष्ट कर सकते हैं-

मापक ‘अनुमाप’ मॉडल (Scale Models)

     इनको ‘हार्डवेयर मॉडल (Hardware Models) भी कहते हैं। वे सरल होते हैं और लघुमापक पर यथार्थता को प्रत्यक्ष रूप में व्यक्त करते हैं। ये ‘स्थिर’ जैसे भूगर्भीय-मॉडल अथवा ‘सक्रिय’ जैसे नदी-अवनालिका (River Flume) आदि जैसे भौतिक गुणों को रीतिबद्ध कर व्यक्त किए जाते हैं। भूगोल में सक्रिय मॉडलों की महत्ता व रोचकता विकसित है। इसमें इनके कारगर-प्रक्रिया का नियंत्रण सम्भव है।

    सक्रिय मॉडल में प्रत्येक चर (Variable) का अध्ययन अलग-अलग कर सकते हैं। किसी तरंग- सरोवर में उसका भौतिक आकार, तरंग-लम्बाई, ढाल शुद्धतः मापी जा सकती है। इस हेतु दो चरों को स्थिर (Constant) बनाकर तीसरे को परिवर्तनीय रखते हैं। इस विधि पर आधारित मॉडल में दोनों स्थितियों से उपलब्ध संबंध-बिन्दु लगभग सीधे रेखा पर अथवा बिखराव (Scatter) में प्रकट होते हैं।

     यदि संबंध लगभग सीधी रेखा पर है तो महत्त्वपूर्ण बना है, अन्यथा बिखराव की स्थिति में न्यून अथवा कोई संबंध व्यक्त नहीं करता।

     ऐसे मॉडलों/प्रतिरूपों में एक दोष यह है कि इनसे स्वाभाविक स्थिति व्यक्त नहीं हो सकती। किसी वृहत् प्रोजेक्ट के बारे में कुछ कहने से पूर्व इंजीनियर उसका अनुमाप-मॉडल तैयार कर परीक्षण करते देखे जाते हैं। इनका प्रयोग अधिकतर भौतिक भूगोल में भू-आकार-वैज्ञानिक द्वारा किया जाता है। वे नदियों की क्रियाओं, हिमानियों की गति, वायु-अपरदन, समुद्री-क्रियाओं व भूगर्भीय-आवरण-क्षय जैसी प्रक्रियाओं को मापक-माडलों – द्वारा अपने शोध कार्यों में प्रयोग करते देखे जाते हैं।

मानचित्र (Maps)

    मानचित्र भी मॉडल हैं। इनका प्रयोग भूगोलवेत्ताओं द्वारा बहुतायत से किया जाता है। ये भी अनुमाप-मॉडल की एक विशेष जाति हैं। इसमें मापक जैसे-जैसे छोटा होता जाता है, इसमें यथार्थता समाप्त होती जाती है।

      परन्तु, सूचनाएँ विस्तृत मात्रा में अंकित होती हैं और यह अमूर्त बनता जाता है। इसके एक सिरे पर अनुलम्ब वायुव्य चित्र (Vertical Air Photograph) हैं जो यथार्थ- जगत् का सही मापक मॉडल प्रदान करते हैं। बड़े मापक पर रचे मानचित्र में यद्यपि सूचनाएँ सीमित दर्शायी जाती है, परन्तु इमारतें, सड़कें व अन्य आकृतियाँ सही-सही प्रकट होती हैं। लघुतर मापक पर सूचनाएँ अधिक सांकेतिक बन जाती है, और मापक भी विकृत हो जाता है। यथार्थ-जगत् के सादृश्य-मॉडल की तुलना में मानचित्रों में क्षेत्रों का विस्तार अधिक प्रकट किया जाता है। इनमें स्थानिक परस्पर संबंधों की जानकारी सम्भव होती है। इन्हें तुलनात्मक स्वरूप में समझ-बूझ सकते हैं, वास्तविक धरातल पर समझना संभव नहीं होता है।

     मानचित्रों का एक बड़ा दोष यह है कि वे क्षेत्र, दूरियों व दिशाओं के दृष्टिकोण से विकृत बने होते हैं। यह विकार इसलिए है कि गोलाभ पृथ्वी की वक्राकार सतह को चौकोर कागज पर उतारा गया है। इसका सही रूप ग्लोब है। परन्तु, ग्लोब भूगोल में उपयोग में कम आ सकता है। बड़े मापक ग्लोब तो अध्ययन कक्ष में समा भी नहीं सकता।

अनुकरण अथवा अनुरूपण और ‘स्टॉ‌क्स्टिक’ मॉडल (Simulation and Stochastie Models)

       किसी स्थिति के व्यवहार का अनुकरण का मॉडल रचने को अनुरूपण (Simulation) कहते हैं। यह अनुरूपण सादृश्य-स्थिति द्वारा अथवा उपकरण की सहायता से किया जा सकता है। स्टॉकस्टिक (Stochastic) से तात्पर्य बेतरतीव निर्धारित सम्भावना (Randomly Determined Probability) है। इसको सांख्यिकीय विधि द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं, परन्तु इसका पूर्वानुमान नहीं किया जा सकता।

     ये मॉडल गतिशील अथवा परिवर्तनशील स्थितियों को प्रकट करने के लिए विकसित हुए और मानचित्र (जो स्थिर स्थितियों का प्रदर्शन है) से भिन्न होते हैं। इनकी रचना किसी प्रक्रिया के अनुकरण को बेतरतीव चयनों द्वारा की जाती है। इसके घटित होने के अवसर हैं भी, अथवा नहीं भी हैं। जलप्रवाह का प्रारूप कैसा विकसित होगा, यह सम्भावना निश्चित रूप से निर्धारित नहीं की जा सकती। इन सम्भावनाओं का चयन बेतरतीव ही निर्धारित है। आकस्मिक चयन (Chance-Choice) की पुनरावृत्ति से जल प्रवाह प्रक्रिया का एक पूर्ण जाल प्रकट हो जाता है। यह जाल बहुत कुछ स्वाभाविक प्रवाह प्रारूप (Nature Drainage Pattern) के अनुरूप है।

    बेतरतीव सम्भावित अनुरूपण मानव भूगोल में भी सफलता पूर्वक उपयोग किए गए हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार के भू-दृश्यों के स्थानिक विसरण प्रक्रिया (Spatial Diffusion Process) को व्यक्त करने में इनका प्रयोग किया जा सकता है, जैसे जनसंख्या में मलेरिया विसरण, चेचक-रोग, क्षय-रोग, एड्स आदि। नवोन्मेष तकनीकों- मशीन, ट्रैक्टरों, रासायनिक उर्वरक, कीटाणुनाशक रसायन आदि के विसरण की संभावना प्रकट करने के लिए इन मॉडलों का उपयोग उपयुक्त ठहरता है। ‘मॉण्टे कार्लो’ और मारकोव चेन इसके उच्छे उदाहरण हैं। ये दोनों मॉडल भौगोलिक शोध के अनेक क्षेत्रों में व्यवहार में लाए गए हैं।

गणितीय मॉडल/प्रतिरूप (Mathematical Models)

      गणितीय मॉडल अधिक विश्वसनीय होते हैं। परन्तु, इनकी रचना कठिन है। इन मॉडलों से अनेक मानवीय मूल्य ओझल बन जाते हैं, अनेक प्रासंगिक व नियामक प्रश्नों और अभिवृत्तियों विषयक समस्याएँ भी अनुत्तरित रह जाती है। फिर भी, गणितीय मॉडल तर्कसंगत रूप से संकेत-भाषा में कथनों का सटीक विवेचन करते हैं। उदाहरण के लिए

(1) ‘A’ बड़ा है ‘B’ से और (2) ‘B’ बड़ा है ‘C’ से। अत: (1) व (2) के सम्मिलित आधार पर यह निष्कर्ष (Theorem) बना कि ‘A’ बड़ा है ‘C’ से ।

  इस निष्कर्ष की तर्कसंगत सार्थकता काल-परिवर्तन से भी नहीं बदलती है। तार्किक रूप से यह निष्कर्ष ई. पू. 3000 में भी सत्य था, 2000 ई. पू. में भी सत्य बना रहा, और 2025 ई. पू. व आगे भी सत्य ही बना रहेगा। तात्पर्य यह है कि इस निष्कर्ष की सार्थकता ऐतिहासिक अवधि पर निर्भर नहीं होती है। यह शाश्वत बनी सार्थकता है, और गैर-ऐतिहासिक है।

      इसी प्रकार सिद्धान्त की तार्किक यथार्थता स्थानिक रूप से भी शाश्वत है। यह तर्क संयुक्त राज्य अमेरिका में सार्थक है, जर्मनी, रूस, चीन, फ्रांस, भारत आदि सभी स्थानों में भी सार्थक है।

      गणितीय मॉडल को आगे उनकी संभाविता की मात्रा के आधार पर विभक्त किया जा सकता है- वे नियतिवादिता (Deterministic) और अनिश्चित-संभावना (Stochastic) प्रकार के हो सकते हैं।

     गणितीय मॉडल विशिष्ट प्रक्रियाओं के समीकरणों को हल करने के साधन हैं। इसके लिए सशक्त ज्ञान चाहिए जिससे भौतिक प्रक्रियाएँ जुड़ी हैं। अतः, यह मुख्यतः भौतिक विज्ञान के विद्वानों द्वारा उपयोग में आते हैं। जे. एफ.नाए ने ‘हिमानी-प्रवाह’ का गणितीय मॉडल रचा। उसने मूल अवधारणा को सरल बनाया और एक हल किए जाने योग्य सरल समीकरण की रचना की। हिमानी के तल (Bed) को U- आकार का एक चतुर्भुज माना जो समान आकार व विशेष उबड़-खबड़ (Specific Rougness) का है। हिम को दबाव के प्रति सुनम्र (Plastic) माना।

     मानव भूगोल में इनका चलन संभव बना, परन्तु वहाँ इनका स्वरूप अवकलन- समीकरणों में व्यक्त नहीं करते। यहाँ सम्बन्धों की प्रकृति भिन्न है और प्रायः ‘आनुभविक’ परीक्षा विश्व के अनेक भागों में की जा सकती है। प्रायः Double Log Scale पर यह लगभग रेखीय (Linear) सम्बन्ध है।

    गणितीय मॉडल अर्थशास्त्री भूगोल में Linear Programming है जो समस्या का अनुकूलतम हल (Optimum Solution) प्रस्तुत करते हैं। किसी Factory की आवश्यकताओं में श्रमिक, कच्चा माल,  यातायात, बाजार (माल की खपत क्षेत्र) आदि मुख्य हैं। ऐसी प्रतीक दशाओं की गणितीय समीकरणों को ग्राफ पर सीधी रेखाओं द्वारा व्यक्त करते हैं। ये सभी अंकित करके एक अनुकूलतम-बिन्दु ज्ञात हो जाता है जो उस Factory के लिए लाभदायक ‘अवस्थिति’ (Location) होगी।

अनुरूप मॉडल/प्रतिरूप (Analogue Models)

     अनुरूप मॉडल संकेतों व समीकरणों के स्थान पर दृश्य-जगत् के आकृति से मिलते-जुलते तुल्य रूप सादृश्य का अनुमान कर रचे जाते हैं। एक सुपरिचित परिस्थिति का प्रयोग कर कम परिचित परिस्थिति का मॉडल ‘अनुरूप मॉडल’ (Analogue Models) हैं। ऐसे मॉडल का मूल्य वह शोधकर्ता पहचानता है जो दो परिस्थितियों के समानुमानों की पहचान कर सकता है। समानुमानों के घटक सार्थक (Positive) होने चाहिए, और निरर्थक घटकों को नज़रन्दाज किया जा सकता है।

    सादृश्य की संकल्पना (Concept of Analogy) का भूगोल में बहुत समय से प्रयोग करते आ रहे हैं। जॉन हट्टन ने 1795 में ही. भू-दृश्य के उत्कर्ष और अपकर्ष में सामग्री के संरचण की तुलना शरीर में रक्त-परिसंचरण से करके दोनों में सादृश्यता की पहचान की। ऐसी सादृश्यता जलीय चक्र में भी देखी जा सकती है। डेविस के अपरदन-चक्र (Cycle of Erosion) और रेटजेल के ‘राज्य एक जैविक जीव’ (State as a Living Organism) संकल्पनाएँ अच्छे उदाहरण हैं जो राज्य एवं भूदृश्य को जैव-जगत् के सादृश्य मानते हैं।

     सादृश्य-मॉडल द्वारा किसी समस्या को बिल्कुल दूसरी स्थिति में बदल कर समझाने का प्रयास किया जाता है, जैसे गतिमूलक लहरों के अध्ययन से सड़क पर दौड़ने वाले वाहनों की भीड़-भाड़ को स्पष्ट बनाना, नदियों में बाढ़ के दौरान पत्थरों के टुकड़ों का वहन अथवा हिमानी-प्रोथ (Glacier Snout) पर प्रोतकर्ष के निर्माण को समझाना आदि-आदि।

    मानव भूगोल में अनेक समस्याएँ सादृश्यों द्वारा समझायी जाने की चेष्टा हुई है। इसका अच्छा उदाहरण ‘गुरुत्व मॉडल’ (Gravity Model) है। इसका तात्पर्य दो पिण्डों के मध्य गुरुत्व बल, उनके मात्रा के गुणक फल को उनके मध्य अन्तर के वर्ग से विभाज्य द्वारा ज्ञात करते हैं। यह गुरुत्व बल उन दो पिण्डों अथवा स्थानों में घटित क्रिया अथवा कार्य-विवरण बना है। इसी प्रकार अन्य भौतिक संबंधों का उपयोग भी ‘अनुरूप मॉडलों’ की ‘उष्मा-गतिकी’ के द्वितीय नियम आदि को भी अनुरूप मॉडलों में सम्मिलित किया जा सकता है।

सैद्धांतिक मॉडल/प्रतिरूप (Theoretical Models)

      सैद्धांतिक मॉडल दो श्रेणियों में विभक्त किए जा सकते हैं- संकल्पनात्मक (Conceptual) और सिद्धान्त (Theory)।

    संकल्पनात्मक किसी समस्या विशेष के लिए ऐसे सिद्धान्त में से निसृत किए (Deduced from a Theory) विचार हैं जो यथार्थ जगत् में मेल रखते हैं, जैसे समुद्र तल का तट पर ऊँचा उठना व नीचे गिरना और इसका तट पर प्रभाव। यह मान्यता है कि समुद्री लहरें किसी निश्चित गहराई तक चट्टानों का अपरदन करती हैं। यह सीमा 13 मीटर (40 फीट) के लगभग है। इसके नीचे लहरों का प्रभाव चट्टानी प्लेटफॉर्म पर नगण्य होता है। इस क्रिया में ढाल का आरंभिक भाग अधिक ढालू होता है। लहरों की यह क्रिया कालान्तर में पर्याप्त चौड़ा प्लेटफॉर्म का निर्माण करती है।

      सैद्धांतिक रूप से विभिन्न दशाओं के अधीन तटीय कटिबंध के विभिन्न स्वरूप स्थापित किए जा सकते हैं, और इनकी तुलना वास्तविक तटीय कटिबंधों से कर सकते हैं। इस संकल्पना का विस्तार आगे ‘ढाल पार्श्विका विकास’ (Slope Profile Evolution) के अध्ययन में कर सकते हैं। ऐसे अध्ययनों का आधार भिन्न-भिन्न ढाल प्रक्रियाओं के ज्ञात अथवा संकल्पित प्रभाव होते हैं।

     इस प्रकार के मॉडलों से विकास-चरणों के क्रमों की स्थापना की जा सकती है, और इस विभिन्न चरणों में सैद्धांतिक ढाल की वास्तविक ढालों से तुलना की जा सकती है। सैद्धांतिक मॉडल का दूसरा वर्ग ‘सिद्धांत’ (Theory) शब्द से संबंधित है। यह विषय के सम्पूर्ण जगत् का ढाँचा इंगित करता है (Framework of Whole Discipline) और सरल रचा गया है।

     यह मॉडल इतना दुर्गम्य अथवा जटिल (Rigid) नहीं होता है कि विषय को अवरुद्ध करे। यह लचीला ढाँचा भूगोल के विस्तार को समाए हुए हैं। विस्तृत होते हुए भी यह विषय को उद्देश्यपरक और सुसंगत बनाए रखता है। इस सिद्धांतपरक श्रेणी में मॉडल भूगोल के लिए मूल्यवान बन उठे हैं, क्योंकि वे विषय की सभी शाखाओं के लिए लागू हैं। अतः ये मॉडल विषय को एकता प्रदान करते हैं।

Model and Its Types

चित्र: भौगोलिक मॉडल का सैद्धांतिक ढाँचा

      विस्तृत भौगोलिक आंकड़ों का विश्लेषण-तकनीक हेतु किस भाँति सुसंगठित किया जाता है, इसका दिग्दर्शन ऊपर के आरेख में किया गया है। भूगोल का सैद्धांतिक ढाँचा एक पाँच-मंजिली इमारत के समान है। इसकी प्रत्येक मंजिल अपनी निचली मंजिल द्वारा सहायता प्राप्त करती है, और अपने से ऊपर स्थित मंजिल को सहायता पहुँचाती है।

(1) सबसे निचली आधारभूत मंजिल भौगोलिक अध्ययन की अव्यवस्थित सामग्री, अर्थात् आंकड़ों का समूह है।

(2) आंकड़ों के ऊपर स्थित दूसरी मंजिल उनको उपयुक्त विधि द्वारा सुसंगठित बनाने की है जिससे विश्लेषण में सरलता हो।

(3) विश्लेषण-तकनीक के लिए तीसरी मंजिल है जो अपनाए गए मॉडल (सिद्धांत) पर आधारित बनी है।

(4) चौथी मंजिल विश्लेषण से उपलब्ध सिद्धान्तों की है।

(5) अंतिम शीर्ष पर स्थित मंजिल सिद्धान्तों प आधारित नियम-निर्माण से संबंधित है। यही भौगोलिक विधि का लक्ष्य है।



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40. Paradigrms in Geography (भूगोल में प्रतिमान)

Paradigrms in Geography

(भूगोल में प्रतिमान)



प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल में प्रतिमान की विवेचना करें।

(Discuss the Paradigrms in Geography.)

उत्तर- भूगोल विवरणात्मक सीढ़ी को लांघकर मॉडल निर्माण में उसी भाँति जा उतरी जैसे कि मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र विषय उतरे। यह प्रक्रिया 19वीं सदी में आरम्भ हुई और 20वीं सदी के साठ-सत्तर शताब्दियों में तेज होती गई। भूगोल में परिवर्तन ‘वर्णनीय-स्तर’ से ‘वर्गीकरण’ में और आगे ‘नियम-निर्धारण’ स्तरों से गुजरा है। निकट भूतकाल में भूगोल का स्वरूप सिद्धान्त-निरूपण व मॉडल-रचना में लोकप्रिय बना। अब विषय में सर्वव्यापी नियमों को लागू करना उसी भाँति आरम्भ हो गया जैसे प्रकृति के नियम लागू हैं।

     ‘गुरुत्व का प्राकृतिक नियम’ Law of Gravitation भारत, यूरोप अथवा अमेरिका, सर्वत्र उपयोगी बना। यह परीक्षण के लिए सभी देशों में उपलब्ध बना और असंख्य स्थितियों में समान रूप से प्रामाणिक सिद्ध हुआ। वर्तमान सदी के सामाजिक वैज्ञानिकों ने भी अनुभव किया कि Stochastic नियमों की भाँति ही (जो सर्वमान्य व बहुमत की सोच है) उनके विषय में भी नियमों का निर्धारण संभव है।

     जब एक व्यक्ति के व्यवहार को भी एक सामान्य नियम में बांध सकते हैं। गोलेज व अमादी (Golledge and Amadee) ने एक रोचक बात यह कही कि ‘नियम’ की कोई एक मात्र स्वीकार बनी परिभाषा नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि सम्भावित नियम, अनुप्रस्थ काट नियम, समस्थितिक नियम, ऐतिहासिक नियम, विकास-नियम, सांख्यिकीय नियम, गणितीय नियम, आदि अनेक नियमों की रचना होती है।

       भूगोल क्योंकि प्रयोगशाला का विज्ञान नहीं है, इसके नियम प्राकृतिक विज्ञानों जैसे नहीं हो सकते। भौगोलिक नियमों की परख क्षेत्र में ही संभव हो सकती है, वहाँ प्रयोगशाला की भाँति दशाएँ नियंत्रित नहीं की जा सकतीं।

       भूगोल में जैसे क्रियाओं सम्बन्धी नियम (Principle of Activity) लागू होता है। इसका तात्पर्य है कि दृश्य-जगत् की वस्तुओं में परस्पर क्रिया घटित हुई है, और यह प्रक्रिया स्थान व कालानुरूप बदलाव उत्पन्न करती है। भूगोल में विधि प्रादेशिक एवं नियमबद्ध (Regional and Systematic) दानों पक्षों की बनी होने के कारण नियम व सिद्धान्त प्राकृतिक विज्ञानों से भिन्न हैं और अनेक स्थितियों में तो यह सामाजिक विज्ञानों के नियमों से भी अलग है।

      यहाँ आगे परिच्छेदों में कुछ प्रकाश भौगोलिक नियमों व प्रतिमानों पर डाला गया है। भूगोल, कुहन के अनुसार, अव्यवस्था के दौर से गुजर कर शांति की ओर बढ़ता विषय है। अन्य विषयों के विकास में भी अशांति-शांति के दौर आए।

कुहन का प्रतिमान (Kuhn’s Paradigm):-

       अमेरिका के थॉमस कुहन (S. Thomas Kuhn) ने विज्ञान के विकास के बारे में एक सिद्धान्त प्रस्तुत किया। उसके अनुसार विज्ञान कोई अच्छी प्रकार नियमित बनी क्रिया नहीं है जिसके परिणामों को प्रत्येक पीढ़ी स्वचालित होकर अपनाती चली गई। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें उतार-चढ़ाव, अशांति-शांति के क्रम घटित होते रहते हैं।

     ज्ञान संग्रह-काल की स्थिति में शांतिकालीन अवधियों का विकास देखा जाता है। परन्तु यह संकटकालीन अवधि आने से विलग हो जाता है। यह संकट विषय में उभार द्वारा परिवर्तन से आता है, और विकास क्रम की निरन्तरता (Continuity) को भंग कर देता है।

Paradigrms in Geography

कुहन के विज्ञान के विकास-सिद्धान्त का चित्रात्मक निवर्चन (हेनरिकसन के आधार पर, 1973)

     इस प्रक्रिया को व्यक्त करने के लिए कुहन ने एक मॉडल ‘विज्ञान का प्रतिमान’ रचा। वह कहता है- “प्रतिमान एक ऐसा मॉडल है जो काल विशेष में सर्वव्यापी बनी सर्वमान्य वैज्ञानिक उपलब्धि है। वह अभ्यासी समुदाय के लिए सामान्य समस्याएँ व हल प्रदान करता है। हैगेट इसी को एक प्रकार का सुपर-मॉडल कहता था।

      दूसरे सरल शब्दों में कहें तो प्रतिमान वैज्ञानिक क्रियाओं एवं पद्धतियों का ऐसा सिद्धान्त है जो अधिकांश भूगोलविदों के शोध कार्य को नियंत्रण में रखता है, अर्थात् जहाँ दो वर्ग के भूगोलवेत्ताओं में प्रतिमानों के विषय में मतभेद हैं, वहाँ भी यह दिशा निर्धारित करता है।”

      यह प्रतिमान शोधार्थियों को बताता है कि उन्हें क्या खोजना है, और किस विधि से खोजना है तथा इस विशेष स्थिति में कौन-सी विधियाँ भौगोलिक हैं। कुहन अपने अभिधारणा (Postulate) में विज्ञान के विकास में नई अवस्थाओं को इंगित करता है जैसे प्रतिमान-पूर्व अवस्था, व्यवसायीकरण, प्रतिमान अवस्था 1, 2, 3 आदि-आदि। इस अवधारणा को हेनरिकसन ने भौगोलिक दृष्टि से रचा जो उपरोक्त चित्र में प्रकट है।

      वैज्ञानिक ज्ञान एक पठार की भाँति विकसित होता है। इसमें एकाएक महापरिवर्तन आते हैं (Sudden Upheavals) और तब आकस्मिक खड़ा विकास देखा जाता है जो बाद में धीमे और समान प्रगति में बदल जाता है। वैज्ञानिक विकास की पहली अवस्था अनेक भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के विचारों के विवाद से ग्रस्त रहती है। इस अवधि में आंकड़ों का संकलन बेतरतीव रूप में विस्तार से होता है। इस संकलन में विशिष्ट कोटि के संकलन का स्तर निचला ही देखा जाता है। इसमें अनेक सम्प्रदायों के विचारों का समागम है, और कोई भी एक सम्प्रदाय दूसरे से अपनी स्थिति अधिक वैज्ञानिक नहीं समझता।

   पहली अवस्था से आगे बढ़कर वैज्ञानिक विकास-मार्ग व्यवसायीकरण-अवस्था पकड़ता है। इसमें एक सम्प्रदाय अन्य सम्प्रदायों पर अपना वर्चस्व प्रकट करता है। इस दौरान अनेक समस्याओं के हल स्पष्ट होते हैं। संप्रदाय विशेष के विचारों व नवीन खोजों से प्रगति होती है। खगोल विज्ञान और गणित विधियाँ पीछे छूटती जाती हैं। और सामाजिक विज्ञानों में बदलाव आता-जाता है।

      तीसरी अवस्था प्रतिमान अवस्था है। इस दौरान सिद्धान्त स्थापित कर समस्याग्रस्त विशेष क्षेत्र में क्रियाएँ सम्पन्न बनती हैं। इससे सामान्य विज्ञान (Normal Science) की स्थापना हो जाती है। सहज विज्ञान की स्थापना के उपरान्त शोध कार्य में ठहराव और अवरोध आता है जो संकट व हलचल की स्थिति उत्पन्न करता है। अस्थायी रूप से यह अन्धकार जैसी अवस्था है जिसमें ज्ञान-विज्ञान का विकास नहीं होता। यही संकट और हलचल प्रतिमान अवस्था 2 के लिए शोधकर्ता को उत्साहित करती है। यह क्रम-हलचल, क्रांति और नवीन प्रतिमान, विज्ञान के इतिहास में घटित होकर समाजों के विकास एवं अवसान में सहायक बनता है।

      नए प्रतिमानों का क्रम संग्रहीत समस्याओं का निपटारा करने के साथ सिद्धान्त निरूपण में सहायक बना है। संकटकालीन व हलचल की स्थिति पूर्व में संग्रह की गई सूचनाओं और आँकड़ों का पुनर्वीक्षण व पुनर्मूल्यांकन करने की ही अवस्था है। इससे नवीन सैद्धान्तिक सोच को जन्म मिलता है। इससे आधारभूत दार्शनिक विचारों के परिसंवाद आरम्भ हो जाते हैं। इस वाद-विवाद में कार्य-पद्धति से अनेक प्रश्नों व समस्याओं का हल प्रकट हो जाते हैं। इसकी समाप्ति पर पुनः बदस्तूर सहज-विज्ञान की अवस्था स्थापित होती है।

      यदि सन्तोषप्रद हल नहीं निकलता है, तो शोध-क्रिया जारी बनी रहती है। नया प्रतिमान स्थापित होने की अवस्था ही सकंट का अन्त और अनेक शोध कर्मियों में विकास की दिशा है। नए प्रतिमान में प्रवेश करने का अर्थ ही पुरानी समस्याओं का हल हो जाना है, और आगे शोध कार्य के लिए भूमि तैयार हो जाती है। इसमें शोध कर्मियों की नई-पौध की संख्या कार्य करने में आकर्षित बन उठती है।

      नए युवा पीढ़ी के वैज्ञानिक पुराने प्रौढ़-वैज्ञानिकों को सन्तुष्ट तो प्रायः नहीं कर पाते, फिर भी नए सोच व शोध के सम्मुख पुराने शोध मंद बनते जाते हैं। प्रौढ़ व पुराने वैज्ञानिकों के गुजर जाने पर उनके समर्थित सोच भी कमजोर बन जाते हैं।

       एक प्रतिमान (पुराने) के बदले में दूसरा प्रतिमान (नया) स्वीकार करने का अर्थ पूर्णतः यह नहीं है कि वह सौदा बुद्धिमानी व तर्कों से भरा उच्च कोटि का हुआ है। अर्थात् यह आवश्यक है कि नए प्रतिमान से सभी समस्याओं का हल खोज लिया गया।

     नया प्रतिमान उस समस्या का हल तो है जिसे पुराना प्रतिमान नहीं हल कर सका, परन्तु सभी समस्याओं का हल नहीं सिद्ध हो सकता। उनके लिए शोध को सतत् बनाए रखना आवश्यक है। अतः, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि प्रत्येक नवीन प्रतिमान पूर्व में सीधे पुराने प्रतिमानों की तुलना में श्रेष्ठ सिद्ध होगा।

      सच बात तो यह है कि नए प्रतिमान को अनेक प्रासंगिक मूल्य, नियम, लालित्य-विचार आदि प्रभावित बना सकते हैं। उसे सरल व अधिक सुरुचिपूर्ण बनाने के उत्साह में नवीन प्रतिमान पूर्व पुराने से भी घटिया हो सकता है। नए युवा शोध – कर्मियों के निजी स्वार्थ और अपने पूर्वकालीन बड़ों से आगे निकलने का आर्थिक उत्साह मौजूदा वैज्ञानिक विचारों में अनावश्यक परिवर्तन लाने की अनेक बार चेष्टा देखी जाती है। यह प्रयास वैज्ञानिक विकास के लिए अनुकूल नहीं है।

       कुहन का प्रतिमान वैज्ञानिक ज्ञान की शुद्धि की अवस्थाओं की एक अच्छी व वैज्ञानिक व्याख्या है। इसमें भी अन्य मॉडलों की भाँति गुण-दोष हैं, परन्तु यह युवा शोध कर्मियों को नए सिद्धांतों के अभिधारण का अवसर देता है।

        युवा शोध कर्मी बिना किसी परीक्षण के अपने प्रतिमान को वस्तुनिष्ठ बताते हैं। वह प्रत्यक्षवादी दृष्टिकोण व वैज्ञानिक शोध के विरुद्ध हो सकता है। फिर भी, यह तो विवाद रहित है कि नए प्रतिमान में दोष और कर्मियों के होते हुए भी, कुहन के सैद्धांतिक विचारों का आधुनिक विज्ञान पर सार्थक प्रभाव है। उनके विचार नवीन सिद्धांतों को स्वीकार करने में मदद करते हैं। वे हमारा प्रत्यक्ष-बोध विस्तृत बनाते हैं। परन्तु, यदि शोध कार्य में नौसिखिए व अयोग्य व्यक्ति हस्तक्षेप करने लेगेंगे तो प्रतिमान का प्रभाव शोध में उल्टा भी हो सकता है।

       कुहन का प्रतिमान विज्ञान-दर्शन में अच्छा मार्ग दर्शक है जो विषय के ऐतिहासिक विकास को नष्ट बनाने में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करता है। यह नहीं मान बैठना चाहिए कि वह पूर्ण व्याख्या प्रस्तुत करता है, परन्तु वह शोध कार्य नवीनता लाने के लिए एक अनूठा साधन है। कुहन के प्रतिमान के प्रकाश में भूगोल के इतिहास को आने की पंक्तियों द्वारा समझने में सरलता होगी।

       भौगोलिक विकास की कथा वर्णनात्मक व उद्देश्य मूलक अवस्था कर आगे मात्रात्मक, मूल सुधारवादी और द्वन्द्वात्मक सांसारिकता जैसी अवस्था में पहुँच चुकी है। उसने अनेक पद्धतियों को अपना लिया है। अपने विश्लेषण में भूगोल ने स्थानों का विवरण विश्वसनीय साहित्यिक भाषा में तथा मात्रात्मक, गणितीय भाषा में भी करना आरम्भ किया है। इससे विषय में वैज्ञानिक सूक्ष्मता और व्यवस्था प्रकट हुई है। परन्तु, अभी तक विषय के स्वरूप और उसकी प्रकृति के बारे में भूगोलवेत्ताओं में एकमत विकसित नहीं हो सका है। उसके नियमों, सिद्धांतों एवं प्रतिमानों के बारे में भी विद्वान अभी एकमत नहीं हैं।

भौगोलिक नियम प्राकृतिक नियमों की भाँति सुनिश्चित और संक्षिप्त नहीं बने हैं। प्राकृतिक नियम सर्वव्यापी एवं सर्वमान्य हैं। अधिकांश भूगोल-नियम आनुभाविक हैं, और उन्हें प्राकृतिक नियमों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वे विशेष स्थान व काल में ही यथार्थ बने रहते हैं, और अन्य सामाजिक विज्ञानों की भाँति वे विशिष्ट मॉडल अथवा संरचित-विचार अथवा प्रतिमान हैं। उनकी सर्वव्यापी मान्यता नहीं है, और सभी विद्वान उनके बारे में एकमत भी नहीं हैं।

   हार्वे (Harvey) नियम व सिद्धांत को विस्तृत महत्ता प्रदान करता है। वह उन्हें तीन-पदीय श्रेणी (Three-Fold Hierarchy) में बंधा मानता है। सिद्धांत की अवधारणा पहले स्तर पर तथ्यों में व्यवस्थित बने कथन (Systematized Factual Statements) है। इनकी मध्यम अवस्था अनुभवाश्रित व्यापक बने सामान्य नियम की (Empirical Generalizations or Laws) है, और तीसरी अवस्था में यह सैद्धांतिक नियमों (Theoretical Laws) का रूप लेते हैं। पिछले डेढ़ सौ वर्षों में भूगोल में कई प्रकार के मॉडलों का विकास हुआ। इनकी जानकारी रोचक विषय है।

       कार्ल रिटर आकड़ों की व्याख्या आगमनात्मक पद्धति द्वारा करके सरल अनुभवाश्रित व्यापक बने सामान्य निष्कर्षों पर पहुँचने का विश्वासी था। वह प्रयोजनवादी (Teleologist) था। वह दृश्य-वस्तुओं का क्षेत्र में मानव मात्र के लिए ईश्वरीय योजना व प्रयोजनानुसार वितरण मानता था। उसके सोच-दर्शन का अनुभवों के आधार पर परीक्षण करना संभव नहीं था। इसलिए यह सोच वैज्ञानिक व्याख्या नहीं है। फिर भी एक प्रतिमान उदाहरण तो है। जीवों में पार्थिव प्रकृति की एकता है। जैविक संबंध ‘समस्तता अथवा संयुक्त बनी’ (Holistic- Synthesis) प्रयोजनानुसार एकता का ही प्रतिमान है।

Organic relationships on earth are in holistic-synthesis and represent teleological explanatory models.

       रिटर के पश्चात् डार्विन ने भूगोल में नियतिवादी कार्य-कारण (Cause and Effect) दृष्टिकोण पर जोर दिया। उसका सोच अथवा प्रतिमान समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास को प्राकृतिक परिस्थितियों द्वारा निर्धारित मानता था।

     इसके बाद आगमनात्मक विश्लेषण के स्थान पर निगमनात्मक विधियों (Deductive Methods) पर आधारित व्याख्या पर जोर दिया जाने लगा। नियमों का परीक्षण किया जाने लगा। उनको प्रयोगों में कसा जाने (Testing Through Experiment) के बाद ही स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जाता था।

      डेविस का सामान्य अपरदन चक्र (Normal Cycle of Erosion) और मेकिण्डर का ‘हृदय-स्थल सिद्धांत’ (Heartland Theory) इसी प्रकार के प्रतिमान अथवा मॉडल थे। ऐसे नियमों द्वारा भूगोल की पहचान विज्ञानों में की जाने लगी थी।

      इन परिस्थितियों में विडाल-डि-ला-ब्लाश और उसके अनुयायियों का उदय हुआ। ब्लाश ने ‘सम्भववाद’ पर जोर दिया। विडालियन-सम्प्रदाय मनुष्य को निष्क्रिय-कारक नहीं मानता था। मनुष्य समाज के भाग्य को निर्धारित करने में मुख्य कारक था, और उसको आकार देने में उसका योगदान महत्वपूर्ण था।

     ब्लाश के सोच को ‘क्षेत्र वर्णिनीय’ अथवा ‘प्रादेशिक विज्ञान’ बनाया। ब्लाश के नवीन प्रतिमान पूर्णतः नियतिवादी मॉडल को नहीं हटा पाए और सम्भववाद के साथ-साथ नियतिवादी व्याख्या भी जीवित चलती रही। कुहन इस अवधि को ‘क्रांतिकारी अवस्था’ कहता था।

     जार्ज चाबोत (George Chabot) के मतानुसार ‘भूगोल में केन्द्र-बिन्दु ‘प्रादेशिक भूगोल’ बन उठा जिसके चारों ओर अन्य सभी कुछ अभिमुख है। प्रादेशिक भूगोल का प्रतिमान फ्रांस में फला-फूला और आस-पास के देशों में विसरित हो गया। परन्तु, बाद में यह विचार भी प्रादेशिक व्यक्तित्व को पूर्णतः व्यक्त करने में असमर्थ सिद्ध हुआ। इससे भूगोल में संकट काल (A Period of Crisis) विकसित हुआ। इसी संकट की प्रेरणा थी जिसने भूगोल में मात्रात्मक क्रांति और क्रियात्मक दृष्टिकोण विकसित बनाया। मानव भूगोल में भूगोल के विद्वान ‘मॉडलों’ का प्रयोग करने लगे और तंत्र-विश्लेषण पर जोर देने लगे।

निष्कर्ष:

     उपरोक्त तथ्यों से सपष्ट है कि भूगोल में पूर्ण-क्रांति उत्पन्न नहीं हुई थी। भूगोलवेत्ता अनेक प्रकार के विचारों में, जैसे प्रत्यक्षवाद, उपयोगितावाद, दृश्य-प्रपंच-शास्त्र, अस्तित्ववाद, आदर्शवाद, यथार्थवाद, सांसारिक द्वन्द्वात्मकवाद आदि में गोते लगाहे थे और विभक्त बन उठे थे। विषय की क्रांति के दौरान भूगोल में इस संकट ने पुनः एक नवीन प्रतिमान की अवस्था को जन्म दिया।


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38. Pragmatism in Geography (भूगोल में उपयोगितावाद)

Pragmatism in Geography

(भूगोल में उपयोगितावाद)



प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल में उपयोगितावाद पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Pragmatism in Geography.)

उत्तर- उपयोगितावाद एक दार्शनिक दृष्टिकोण है जो अनुभव द्वारा अर्थपूर्ण विचारों को जन्म देता है। यह सोच अनुभवों, प्रयोगात्मक खोजबीन और सत्य के आधार पर परिणामों का मूल्यांकन करता है। अनुभवों पर आधारित क्रियाओं के फल अर्थपूर्ण व ज्ञानप्रद हैं। इसकी जाँच समस्याग्रस्त स्थितियों के हल में निहित है। समस्याओं में जकड़ी स्थितियों से समायोजन कर लेना और उन्हें उपयोग में लाना ही अर्थपूर्ण है, वही सत्य है।

        उपयोगितावाद भी प्रत्यक्षवाद सोच का संशोधित स्वरूप है। यह भी वैज्ञानिक विधि के प्रयोग करने पर जोर देता है, अन्तर केवल इतना ही है कि उपयोगितावादी मानव समस्याओं के समाधान के प्रयास का आन्दोलन है। मूल्यों पर आधारित वैज्ञानिक पद्धति से समाज की व्यावहारिक, प्रयोगात्मक (Practical) समस्याएँ हल करना उपयोगितावाद का मुख्य लक्षण है। सामाजिक समायोजन ही वस्तुतः भौगोलिक यथार्थता है।

     स्थानिक परिस्थितियों की समस्याओं से घिरे समाज में मानव का समायोजन खोज लेना ही अर्थपूर्ण है, सत्य है औग यथार्थ है। शोध कार्य इसीलिए किए जाते हैं कि वे तुरंत जन्मी स्थानिक समस्याओं को अर्थपूर्ण हल खोज निकालें जो परिणामतः वहाँ जनसमुदाय के लक्ष्यों की पूर्ति कर सकने में सक्षम बन सकें। इसमें शोधकर्ता के सुझाव और उसकी क्रियाएँ परिणामों को लागू करने (उपयोग में लाकर) में अभिकर्ता (Action Agent) बन उठते हैं।

      भूगोल में उपयोगितावाद-अधिगम एक नियोजित क्रिया (Planned Action) है न कि केवल नियोजन के लिए सोच। इसमें परिणामों पर आधारित क्रियाओं के चरण सम्मिलित हैं। लक्ष्यों की पूर्ति के साधन जुटाना, मानवीय उपयोग के तथा जन-कल्याण से जुड़ी क्रियाओं का मूल्यों के आधार पर समाधान इसकी वास्तविकता है।

     अमेरिका के गृह-युद्ध (Civil War) के उपरान्त वहाँ उपयोगितावाद विकसित बना जिसने वहाँ द्वितीय विश्वयुद्ध तक सामाजिक व बौद्धिक परिवर्तन समाज में आए। इसके समर्थकों की एक अच्छी संख्या पश्चिमी यूरोपीय देशों में भी पायी जाती हैं।

      इस दार्शनिक सोच की एक सामान्य विशेषता इसका व्यावहारिक समस्याओं (Practical Problems) से निपटना ही है। अतएव इसका जोर उपयोगिता और प्रयोगात्मकता पर है। उपयोगितावादी का विश्वास सामने खड़ी वास्तविक (Concrete) स्थिति के हल के क्रिया में है। इसके वैज्ञानिक ज्ञान पर आधारित ही वह जगत् को समझने-बुझने में सक्रिय है। इस प्रक्रिया में उसके लिए ‘निरपेक्ष’ अथवा ‘सामान्य’ नियमों व सिद्धान्तों का योग भी महत्त्वपूर्ण निर्देशांक हैं।

     तात्पर्य यह है कि उपयोगितावादी सैद्धांतिक सोच एवं प्रयोगात्मक स्थितियाँ, दोनों ही क्रियाओं से जुड़ी है। सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रयासों को सुसंगठित बनाना, प्रेरित बनाना और क्रियान्वयन की आवश्यकता पर भूगोलवेत्ताओं की रणनीति टिकी है। उपयोगितवाद के प्रधान-लक्षण में सम्मिलित हैं-

(1) वास्तविकता का अभाव अथवा अपूर्णता:-

        उपयोगितावादियों का विश्वास बना है कि इस काल में ‘वास्तविकता’ विषयक ज्ञान अपूर्ण है, और उसमें त्रुटियाँ हैं।

(2) ज्ञान की भ्रामक विचार वीथी:-

      जगत् के प्रति वास्तविकता के बारे में हमारे मस्तिष्क में भ्रम उत्पन्न हैं। अतः, प्रयोगों से प्राप्त परिणामों में त्रुटियाँ विकसित हैं। भविष्य में सफलता संदिग्ध है, क्योंकि हमारे सोच भूतकाल की त्रुटियों से ग्रसित रहते हैं। अतः, परिकल्पनाओं व वर्तमान धारणाओं में बदलाव और उनका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।

(3) वैज्ञानिक पद्धति और परिकल्पना पर आधारित:-

       निगमनात्मक मॉडल सर्वोत्तम विधि है जिसका शोध कार्य में प्रयोग करना आवश्यक बन उठा है।

(4) समस्याओं को तार्किक आधार पर ही हल किया जाना चाहिए। समस्याएँ भी मानव-कल्याण विषयक चयन की जानी चाहिए, और वे व्यावहारिक (Practical) हों तथा जिनके हल मानव कल्याण के विकास में योग दे सकें।

      इन आधारों पर उपयोगितावादियों ने मूल्यविहीन प्रत्यक्षवाद को नकारा घोषित किया। उससे समाज का न तो कल्याण हो सकता है, और न वह जगत् की सम्पूर्ण वास्तविकता का ज्ञान करा सकता है।

     उपयोगितावाद ने भूगोल में प्रयोगात्मक (Applied) पक्ष का समर्थन कर प्रयोगात्मक भूगोल (Applied Geography) को जन्म दिया। प्रयोगात्मक भूगोल की नीतियाँ जन-कल्याण से सम्बन्धित मूल्यों पर आधारित बनायी जानी चाहिए। वे चाहे वातावरण में समायोजित बनाने हेतु परिवर्तन हों, चाहे समाज की आर्थिक, शैक्षिक, आवासीय, स्वास्थ्य विषयक असमानताओं के मेटने के प्रयास अथवा सांस्कृतिक दृश्य-जगत् का संरक्षण हो, सामाजिक मूल्यों पर आधारित किए जाने चाहिए। उनको जन-कल्याण हेतु उपयोगिता के आधार पर ही विकसित करना Pragmatism की मूल भावना है।

     उपयोगितावादी भूगोलवेत्ताओं के लिए परिकल्पनाओं की रचना हेतु ढाँचा प्रस्तुत करने के लिए तर्क-संगत स्थानिक नियमों (Spatial Laws) की आवश्यक होती है। ये निगमनात्मक परिकल्पनाएँ आनुभविक प्रमाणों द्वारा परीक्षण कर एवं संशोधित बनाकर अपनायी जानी चाहिए।

      उपयोगितावादी का लक्ष्य मानवीय घटक पर जोर देने से जुड़ा हुआ है। इसकी पूर्ति हमारे कार्यों को प्रेरित करता है। हमारे कार्यों का स्त्रोत विगत काल के जगत् की प्रकृति है। मानव, यहाँ केन्द्रीय स्थान ग्रहण किए रहता है। ये विचार विडाल-डि-ला ब्लाश (फ्रांसीसी सम्प्रदाय का अग्रणीय भूगोलवेत्ता) द्वारा व्यक्त मत से मिलते-जुलते हैं।

      मानवतावादी भूगोल में, मानव और विज्ञान को समन्वित बना दिया है। भूगोल में आधुनिक मानवतावाद का प्रधान ध्येय सामाजिक विज्ञान व मानव की सामंजस्यता है। इसी में वस्तुनिष्ठता और व्यक्तिनिष्ठता का भौतिकवाद और आदर्शवाद का और तर्क व वास्तविकता का समन्वय है। ऊपर जो कुछ व्यक्त हुआ है, इस आधार पर उपयोगितावादी भूगोल के कतिपय लक्षणों व घटकों की पहचान निम्न आधारों पर की जा सकती है:-

(i) भौगोलिक-स्थान ज्ञान और भ्रांतियों द्वारा संयुक्त बनी परिकल्पना है।

(ii) भौगोलिक-स्थान परिवर्तनशील है। इसके परिवर्तन का बोध और इसको परिवर्तन बनाने की दिशा के लिए हमारे ज्ञान और हमारी सोच के मापकों को परिशुद्ध बनाना आवश्यक प्रक्रिया है।

(iii) भौगोलिक-स्थान काल-अवधि के दौरान विकसित ‘मानवीय घटकों’ का विवरण है।

(iv) प्रयोगात्मक मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए भूगोल की संरचना और पुनर्रचना आवश्यक है।

(v) स्थानिक वास्तविकता मानवीय अनुभवों की संयुक्त बनी परिकल्पना है।

(vi) परिकल्पनाओं की रचना के लिए स्थानिक नियमों की आवश्यकता होती है। परन्तु साथ-साथ हमारे ज्ञान व काल के सन्दर्भ में इनमें संशोधन भी किया जाना चाहिए।

(vii) भौगोलिक अध्ययन वस्तुतः प्रयोगात्मक समस्याओं से संबंधित है औ प्रायोगिक समस्याएँ (Practical Problems) स्थानिक रूप से मानव के कल्याण से जुड़ी हैं। इनका अध्ययन वैज्ञानिक रीति-नीति से किया जाना चाहिए।



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37. Positivism in Geography (भूगोल में प्रत्यक्षवाद)

Positivism in Geography

(भूगोल में प्रत्यक्षवाद)



प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल में प्रत्यक्षवाद की विवेचना करें।

(Discuss the Positivism in Geography.)

उत्तर- प्रत्यक्षवाद एक प्रकार का दार्शनिक आन्दोलन है। यह धर्म और परम्पराओं के विरुद्ध खड़ा हुआ सोच है। इसका वैज्ञानिक आधार और वैज्ञानिक विधि ज्ञान का स्रोत है। यह तथ्यों (आंकड़ों) और मूल्यों (सांस्कृतिक) में भेद व्यक्त करने वाला सोच है।

     ऑगस्ट कॉम्टे (Auguste Comte) ने अध्यात्म (Metaphysics) और कोरे बुद्धिवाद को जाँच व अन्वेषण की एक निरर्थक शाखा बताया है। वह मानवता के विकास के लिए सामाजिककता को वैज्ञानिक धरातल पर स्थापित करने का पक्षपाती था।

     प्रत्यक्षवाद को अनुभववाद (Empiricism) भी कहते हैं। इस दार्शनिक सोच में ज्ञान का आधार तथ्य है। तथ्यों को प्रेक्षण (Observation) द्वारा अनुभव कर उनमें संबंधों पर आधारित ज्ञान प्रत्यक्षवाद का मुख्य उद्देश्य है। इसमें आनुभविक प्रश्नों का हल यथार्थ के दृष्टिकोण पर आधारित है। यथार्थ स्थिति के विषय में ‘तथ्य स्वयं साधन’ बनते हैं। (Facts Speak for Themselves)। विज्ञान का नाता भी वस्तुपरक तथ्यों से है।

    व्यक्तिपरकता (Subjective View Point) का इसमें कोई स्थान नहीं है। यथार्थ वही है जो प्रत्यक्ष में दिखता है। हमारी इन्द्रियाँ जो कुछ अनुभव कर रही हैं, वही ज्ञान है, वही वैज्ञानिक है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण वस्तुपरक, सत्य से पूर्ण बना और तटस्थ होता है। प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक एकता के हामी हैं। वे यथार्थ के बारे में सामान्यानुभावों, सामान्य वैज्ञानिक भाषा और प्रेक्षणों की पुनरावृत्ति को सुनिश्चित बनाने की विधि के विश्वासी हैं।

     वैज्ञानिक विधि इन्हीं लक्षणों के एकीकरण से बना व्यापक विज्ञान है। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि विज्ञान का आपूर्ण तंत्र भौतिकी, रसायन, जीव, मनोविज्ञान व सामाजिक विज्ञानों के नियमों के अन्तर्गत तार्किक रूप से जुड़ा तंत्र है।

    अतएव प्रत्यक्षवाद-दर्शन एक प्रकार से आदर्शवाद का विरोधी है, क्योंकि आदर्शवाद केवल मानसिक अथवा बुद्धिपरक है। वह नियामक और नीतिपरक भी नहीं है।

     मानव-मूल्यों, विश्वास, आस्था, अभिवृत्ति, पूर्वाग्रह, पक्षपात, रीति-रिवाज, परम्परा, रुचि, लालित्य व सौन्दर्यपरक मूल्यों से जुड़े प्रश्नों व समस्याओं में प्रत्यक्षवादी शोध नहीं करता क्योंकि इनका निर्णय व्यक्तिवादिता से ग्रसित होता है। ये नैतिक मापदण्ड देश, काल, समाजों के साथ-साथ बदलते रहते हैं, और इनके बारे में निर्णय वैज्ञानिक आधारों पर सम्भव नहीं है।

    प्रत्यक्षवाद का दर्शन वस्तुपरक, निष्पक्षता, तटस्थता पर आधारित विज्ञान है। प्रत्यक्षवाद में व्याख्या व कथनों का आधार-

(i) आनुभविक अर्थात् प्रत्यक्ष अनुभवों (जो कुछ हमारे सामने दृश्य-जगत्) से जुड़ा होता है।

(ii) वह एकीकृत बनी वैज्ञानिक विधि है।

(iii) वह अनुभवजन्य वैज्ञानिक नियमों व सिद्धांतों से जुड़ा है।

(iv) वह नियामक, नीति संगत, नैतिकता से मुक्त स्वतंत्र प्रेक्षण है।

(v) वह अपरिवर्तनीय, शाश्वत वैज्ञानिक व्यवस्था है जिसमें वैज्ञानिक नियमों के विकास-क्रम की एकीकृत बनी लोकव्यापी पद्धति सम्मिलित है।

     ऐतिहासिक रूप से इसका उदय फ्रांस की क्रांति के उपरान्त हुआ, और ऑगस्त कॉप्टे ने इसे स्थापित किया। क्रांति से पूर्व प्रचलित बना यह निषेधवादी-दर्शन (Negative Philosophy) की प्रतिक्रिया स्वरूप जन्मा वैज्ञानिक प्रत्यक्षवादी सोच था। निषेधवादी दर्शन न तो रचनात्मक था, और न प्रयोगात्मक (Practical)। वह भावना-प्रधान था जो काल्पनिक विकल्पों द्वारा वर्तमान प्रश्नों के हल खोजने में डूबा था।

     अतः, निषेधवाद के विरुद्ध प्रत्यक्षवाद एक प्रकार से खण्डन-मण्डनी वाद-विवादों से लैस हथियार सिद्ध हुआ। प्रत्यक्षवाद का आन्दोलन घिसे-पिटे निषिद्ध कर्मों व धार्मिक प्रपंचों के विरुद्ध खड़ा हुआ था।

    प्रत्यक्षवाद सामाजिक संबंधों को वैज्ञानिक धरातल पर उतरने में विश्वास व्यक्त करता है। वह सामाजिक-विज्ञान (Social Science) को भी प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति शाश्वत नियमों में ढालने का पक्षपाती था। कॉम्टे के अनुसार सामाजिक विकास तीन चरणों में घटित हुआ-

(i) ईश्वर मीमांसा (Theological) का पहला चरण जब मानव प्रत्येक घटना अथवा दृश्य को ईश्वरीय सत्ता व ईश्वरीय समझकर व्याख्या करता था,

(ii) दूसरे चरण में सामाजिक व्यवस्था का विकास तात्विक, बुद्धिपरक, अभौतिक (Metaphysical) विचारों द्वारा व्याख्या, और

(iii) तीसरे चरण में सामाजिक क्रियाओं व विकास के आधार के कार्य-कारण संबंध का जुड़ाव (Causal Connection)।

     मानव अपने निर्णयों को संबंधित कारणों के आधार पर सुनिश्चित बना कर अपनाता है। ऐसे कारकों की पहचान की जा सकती है। प्रत्यक्षवादी सोच अधिनायकवादी शासनों (Dictatorial Regimes) में विकसित सोच के विरुद्ध है।

    सन् 1930 में वियना (यूरोप) में ‘वियना-सर्किल’ की स्थापना हुई। वह तर्कसंगत प्रत्यक्षवादियों का समूह था। ये वैज्ञानिक उन सभी विचारों का विरोध करते थे जो आनुभविक रूप से परीक्षण नहीं किए जा सकते और जो नियंत्रित बनी पद्धतियों से नहीं खोजे जा सकते। नाजीवादी सोच (Nazism) को प्रत्यक्षवादी तर्कशून्य, पक्षपाती और हठधर्मितापूर्ण मानते थे।

   मानव भूगोल में किए गए प्रत्यक्षवादी सोच पर आधारित कार्यों की मार्क्सवादियों और यथार्थवादियों ने आलोचना की। ये कार्य ऐसे नियमों की खोज थे जो साधन सामग्री (Infrastructure) प्रक्रिया से नहीं जुड़े थे। वे अस्तित्वहीन ऐसे ढाँचे के नियम थे जो संसाधनों के ताम-झाम में बदलाव लाने में विश्वासी नहीं थे ।

    मानवतावादियों ने भी प्रत्यक्षवादी सोच की आलोचना की है क्योंकि उसमें मूल्यों व आदर्शों को कोई स्थान नहीं था। मानव जीवन उनके अभाव में अधूरा होता है। मार्क्सवादियों, व्यवहारवादियों और वैज्ञानिक प्रेक्षकों के अनुसार मूल्य विहीन, मात्रात्मक-गणितीयकरण व नियम-निरूपण एवं विवेचन सम्भव नहीं हैं। परन्तु, प्रत्यवादियों की मान्यता है कि प्रत्येक समस्या का तकनीकी हल संभव है और मूल्यविहीन शोध ही वैज्ञानिक है। परन्तु, व्यवहार में यह देखा गया है कि शोध कार्य अनेक स्थलों पर व्यक्तिनिष्ठता से प्रभावित बन जाता है।

     शोध विषय के चयन से लेकर दृश्य-वस्तुओं के वितरण व प्रारूपों की पहचान और निष्कर्ष-निर्धारण प्रक्रियाओं में कुछ न कुछ अंश में व्यक्तिनिष्ठता प्रवेश कर जाती है। जैसे ही परिणाम ज्ञात हो जाते हैं, मौजूदा वितरण के विवरण निर्णयकत्ताओं के सोच को प्रभावित करना आरम्भ कर देते हैं कि भावी वितरण कैसा होना चाहिए। तात्पर्य यह है कि वैज्ञानिक प्रक्रिया स्वयं ही यथार्थता का स्वरूप लेने लगी है। शोधकर्त्ता उदासीन और तटस्थ या वैज्ञानिक नहीं रह पाता।

     विज्ञानों में एकता भी आलोचना का पात्र है। सामाजिक वैज्ञानिकों में एकता का विकास सम्भव नहीं हो सका है। प्रत्येक विषय (समाज शास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीति विज्ञान, भूगोल आदि) के अपने-अपने अलग सोच व अभिगम हैं जिनके आधार पर वस्तुओं-दृश्य-जगत् आदि का विश्लेषण करते देखे जाते हैं। वे यथार्थता को अपनी-अपनी पद्धतियों, विधियों, अभिगमों आदि द्वारा व्यक्त करते हैं।

     एक अत्यन्त संगीन आलोचना प्रत्यक्षवाद की इस तथ्य पर आधारित है कि प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञानों की प्रकृति ही एक जैसे नहीं हैं। दोनों अलग प्रकृति की वैज्ञानिक-शाखाएँ हैं। वे प्रायोगिक दृष्टि से समान नहीं हैं। उनकी प्रयोगात्मक प्रक्रियाएँ (Experimental Processes) अलग-अलग हैं। उनको एक समान कोटि की विधियों द्वारा नहीं पूरा कर सकते हैं।

    सामाजिक विज्ञानों की विषय-वस्तु का केन्द्र ‘मानव’ है जिसे ‘वस्तु’ मानकर पदार्थवत् आकलन नहीं कर सकते क्योंकि उसका नीजी सोच व बुद्धि-कौशल है। मानव-व्यवहार अन्य जीवों के व्यवहार से भी अलग हैं। उसकी कल्पनाएँ, धारणाएँ, अभिवृत्ति, रुचि, आस्था आदि को प्राकृतिक विज्ञानों के वस्तु-जगत् की भाषा में नहीं बदला जा सकता। अतएव-व्यवहार प आधारित मानव भूगोल एवं अन्य सामाजिक विज्ञानों के नियम-निरूपण में व्यक्तिनिष्ठता का घटक समाया रहता है।



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36. Concept of Space in Geography (भूगोल में स्थान की विचारधारा)

Concept of Space in Geography

(भूगोल में स्थान की विचारधारा)



प्रश्न प्रारूप

Q. स्थानिक या क्षेत्रीय विज्ञान के रूप में भूगोल की व्याख्या कीजिए।

(Explain Geography as a Spatial or Regional Science.)

अथवा, भूगोल में स्थान की विचारधारा की विवेचना करें।

(Discuss the Concept of Space in Geography.)

उत्तर- भूगोल में क्षेत्र या स्थान (Space) और क्षेत्रीय संकल्पना (Spatial Concept) का केन्द्रीय स्थान है। क्षेत्र ठोस, तरल एवं गैसीय पदार्थों की ऐसी विलक्षण इकाई है जहाँ मानव एवं प्रकृति की क्रियाएँ घटित होती हैं। सामान्य भाषा में क्षेत्र से तात्पर्य भू-तल के किसी बिन्दु विशेष से क्षितिज तक वृत्ताकार आकृति में दिखाई देने वाले क्षेत्र से है। क्षितिज व आकाश मिलकर इसे सीमाबद्ध करते हैं।

     भूगोल में प्रयुक्त क्षेत्र शब्द व्यापक अर्थ रखता है। यह लघु या विस्तृत भी हो सकता है। यह भू-तल, वायुमण्डल, भूगर्भ या सागर में कहीं पर हो सकता है। यह आवश्यक नहीं कि वह सदैव क्षितिज तक ही फैला हो। भूगोल क्षेत्रों की विशेषतओं का ही अध्ययन करता है।

भूगोल में क्षेत्र (Space) की व्याख्या (Explanation of Space in Geography):-

      भूगोल में अध्ययन किए जाने वाले क्षेत्र या स्थान (Space) का अर्थ ‘गृहीत स्थान’ (Occupied Space) से लिया जाता है। क्षेत्रों का सीधा सम्बन्ध भू-तल की ग्लोबीय स्थिति से होता है। यह दिशा, दूरी, विस्तार, व्यापकता या विरलता से प्रभावी रहा है। क्षेत्र विशेष के लक्षणों पर किसी काल विशेष या गतिशिल प्रक्रिया का भी परिणामी प्रभाव बना रहता है।

    अमेरिकन विद्वान प्रेस्टन जेम्स का मत है कि “भूगोलवेत्ता एक ऐसा व्यक्ति होता है जो अवस्थिति, दूरी, दिशा, प्रसार व स्थानिक अनुक्रम के महत्त्व के बारे में प्रश्न पूछता है। वह सह-सामाजिकता, नवाचार, प्रसार घनत्व तथा सापेक्षिक स्थिति से जुड़ी अन्य समस्याओं का समाना करता है।”

       अरस्तू ने ‘वस्तुओं के अस्तित्व हेतु तार्किक दशा’ को क्षेत्र या स्थान कहा है (Space is the logical condition for existence of things)।

      सर आइजक न्यूटन  के अनुसार सभी स्थानिक संकल्पनाएँ मानव के चिन्तन से उद्भव होती हैं।

      भूगोल में हम जिन स्थानों का अध्ययन करते हैं वे विभेदशील (variable), गतिशील (dynamic) तथा परिवर्तनशील (changing) होने के कारण जटिल रूप से सम्बन्धित होते हैं। यदि स्थानों के मध्य पाये जाने वाले सम्बन्धों को प्रभावित करने वाली सभी घटनाएँ या कारक तत्व स्वतंत्र बने रहते तो सम्भवतः भूगोल मात्र स्थानों का वर्णनात्मक ज्ञान कोष ही बन कर रह जाता।

       वर्तमान में यह मान लिया गया है कि जटिल घटनाओं एवं तथ्यों के मध्य भी अन्तर्सम्बन्ध मिलता है। यह मान लिया है कि जटिल घटनाओं एवं तथ्यों के मध्य भी अन्तर्सम्बन्ध मिलता है और विभिन्न स्थानों की ऐसी घटनाओं के मध्य सम्बद्धता है। स्थानों के मध्य अन्तर व विभिन्नता की सीमा के स्तर से क्षेत्रों का निर्माण होता है। भौगोलिक स्थान के स्थिति निर्धारण हेतु जटिल घटनाओं के स्तरीय अन्तर तथा विविध प्रकार की सूचनाओं की सहायता ली जाती है।

      जर्मन विद्वान काण्ट का मत है कि एक स्वतंत्र विषय के रूप में भूगोल का अस्तित्व स्थान (Space) से जुड़ा है। अंग्रेजी शब्द स्पेश या क्षेत्र (Space) का अर्थ है खाली जगह (empty place)। इसका तात्पर्य क्षेत्रीय आयाम (areal dimension) से लिया जाता है। यह भूखण्ड या क्षेत्र का बोध कराता है।

    डेविड हार्वे का मत है कि भूगोल का सम्पूर्ण दर्शन एवं व्यवहार ऐसी संकल्पनात्मक परिसीमाओं के विकास पर निर्भर करता है जिसमें वस्तुओं एवं घटनाओं के क्षेत्र में वितरण का लेखा-जोखा किया जा सके।

     वस्तुतः क्षेत्र (Space) एक भौतिक शास्त्रीय संकल्पना है। काण्ट के अनुसार क्षेत्र के अन्तर्गत द्रव्यों (Substances) के मध्य सम्बन्ध की व्यवस्था को शामिल किया जाता है तथा क्षेत्रीय विस्तार द्रव्यों द्वारा निःसृत सक्रिय शक्तियों की गहनता का मापन मात्र है।

        काण्ट ने स्थान (Space) की अवधारणा को साक्ष्य कहा जिसमें वस्तुओं के मध्य संबंधों की व्यवस्था है।

     हार्टशोर्न एवं हेटनर क्षेत्र को निरपेक्ष (absolute) माना। हार्टशोर्न के अनुसार, “क्षेत्र स्वयं कोई लक्षण (तत्व) नहीं है, यह तत्वों की बौद्धिक परिसीमा है; एक अमूर्त्त संकल्पना जिसका वास्तविक नहीं है। उसकी एक तत्व के रूप में अन्य तत्वों से न तुलना की जा सकती है, न ही साहचर्य मूलक संकल्पनाओं की व्यवस्था में वर्गीकृत किया जा सकता है जिससे इसके अन्य तत्वों से सम्बन्ध परक नियम बनाए जा सकें। क्षेत्र स्वयं अपने आन्तरिक तत्त्वों से मात्र इस अर्थ में जुड़ा है कि यह उन तत्वों को अमुक अमुक स्थलों पर समाहित करता है।”

     कार्ल साँवर का मत है कि “भूगोल का उत्तरदायित्व क्षेत्रीय अध्ययन है, क्योंकि विद्यालय का प्रत्येक छात्र यह जानता है कि भूगोल विभिन्न देशों के सम्बन्ध में सूचना देता है, किसी अन्य विषय ने क्षेत्रीय अध्ययन (Spatial study) का दावा नहीं किया है।”

     विल्हेलम फाल्ज लिखता है, “भूगोल का उद्देश्य एवं अद्वितीय महत्त्व यह है कि उससे हमें पृथ्वी के धरातल का ज्ञान होता है।”

      फ्रोबेल पेशेल तथा जरलैंड ने भूगोल को पृथ्वी का विज्ञान (Science of the Earth- Erdkunde) बताया है। भूगोल के अन्तर्गत विविध प्रकार के भौतिक एवं मानवीय तत्वों का अध्ययन क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में ही किया जाता है। किसी वस्तु का धरातल पर वितरण कहाँ-कहाँ और क्यों है? इसकी व्याख्या भूगोल के माध्यम से की जा सकती है। भूगोल अपनी मूल प्रकृति के अनुसार भू-तल से विलग (isolate) नहीं हो सकता। इसलिये भूगोल को भू-तल का क्षेत्र-विश्लेषण करने वाला विज्ञान मानना चाहिये। पृथ्वी तल भूगोल का मौलिक आधार है।

      अतः, महाद्वीप, देश, प्रदेश, क्षेत्र, जिला, ग्राम आदि इकाइयों का मूलाधार भूगोल ही है जो भूतल के किसी न किसी अंश को व्यक्त करते हैं। प्रदेश किसी न किसी भौतिक व सांस्कृतिक तत्व के वितरण को ग्रहण किए हुए होता है। वीडाल-डी-ला-ब्लाश का मत है कि “मनुष्य के लिए किसी क्षेत्र की समस्त परिस्थितियों की समष्टि सर्वोपरि होती है।” महान् खोज यात्राओं के युग के आरंभ में क्षेत्रीय विभिन्नताओं से संबंधित सामाजिक दशाओं के दृश्य ने भूगोलवेत्ताओं का ध्यान आकृष्ट किया है।

    ब्लाश ने लिखा है कि “एक देश की विशिष्ट प्रकृति की अभिव्यक्ति उसके पर्वतों, मरुस्थलों तथा नदियों की अपेक्षा उसके निवासियों, उनकी बस्तियों तथा मानव जनसंख्या के भौतिक तत्व से कहीं अधिक होती है।”

     विश्व के सम्पूर्ण ज्ञान के लिए क्षेत्रीय विधि (Regional Method) को भूगोल में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। भूगोल की क्षेत्रीय विधि विश्व का सम्पूर्ण, शुद्ध तथा क्रमबद्ध ज्ञान प्रदान करके मानव उत्सुकता को संतुष्ट करने में समर्थ है। जिस प्रकार इतिहास काल (Time) का अतीत (Past) के संदर्भ अध्ययन करता है, उसी प्रकार भूगोल घटनाओं या तत्वों के स्थानों के संदर्भ में अध्ययन करता है।

    विश्व के प्रत्यक्ष ज्ञान के प्रसार से सम्बन्धित मानव शिक्षा में भूगोल के महत्व को किसी प्रकार कम नहीं आंकना चाहिए, परन्तु भूगोल को संसार का अध्ययन संकुचित क्षेत्रों के संदर्भ में ही करना चाहिए, जिनमें वस्तुओं में पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध हों। क्या भूगोलवेत्ता ही क्षेत्रीय ज्ञान की प्राप्ति के लिए सर्वाधिक उपयुक्त व्यक्ति होता है? निश्चय ही यह सत्य है कि अनेक गैर-भूगोलवेत्ता क्षेत्रीय ज्ञान में योगदान देने के इच्छुक रहते हैं।

       राल्फ ब्राउन द्वारा यू० एस० ए० के अटलांटिक तट का 1810 में किया गया अध्ययन इस बात का साक्षी है कि विश्व में केवल व्यावसायिक भूगोलवेत्ता ही इसके लिए समर्थ नहीं हैं। परन्तु, गैर-भूगोलवेत्ता या विद्वानों द्वारा एकत्रित सामग्री की विश्वसनीयता की जाँच यदि क्षेत्रीय अध्ययन के रूप में कर ली जाय तो भौगोलिक ज्ञान का महत्व और भी बढ़ जाता है। भूगोल में ऐसी तमाम सामग्री समाविष्ट कर ली गई है जो प्राचीन अन्वेषकों, यात्रियों व साहित्यकारों ने दी है। हेटनर का मत है कि यदि भूगोलवेत्ता और गैर-भूगोलवेत्ता दोनों एक साथ क्षेत्र का वर्णन करें तो भूगोल तथा क्षेत्र का अध्ययन सशक्त होगा।

     एक प्रादेशिक भूगोलवेत्ता का कार्य क्षेत्र का संश्लिष्ट वर्णन प्रस्तुत करना होता है। उसका कार्य कलाकार (Artist) से भिन्न होता है। यद्यपि भूगोलवेत्ता की विधि की प्रकृति फोटो ग्राफिक है जिसमें व्यक्तिगत प्रतिक्रियाओं का योगदान लघुत्तम होता है। भूगोलवेत्ता दृश्य घटनाओं के पारस्परिक संबंधों की व्याख्या क्षेत्र की सम्पूर्ण तस्वीर को लेकर करता है जो गैर-भूगोलवेत्ता के लिए संभव नहीं है। कोई प्रशिक्षिति भूगोलवेत्ता ही किसी क्षेत्र का वस्तुनिष्ठ, वैज्ञानिक तथा विश्वसनीय वर्णन प्रस्तुत कर सकता है।

      भूगोलवेत्ता कुछ-कुछ कलाकार, मानचित्रकार, साहित्यकार व वैज्ञानिक भी होता है। उसके द्वारा खींचा गया किसी क्षेत्र का चित्र-कलाकार के चित्र से कई अर्थों में भिन्न होता है। वह संकेतों व विरंजक चित्रों से क्षेत्रीय सूचनाओं को आँखों के समक्ष दिखाने में समर्थ होता है।

     एम० मार्टे ने यह स्वीकार किया था कि “भूगोल मूलतः वितरण का विज्ञान है” (Geography is the Science of Distribution)। उसने इस दृष्टिकोण पर सर्वाधिक बल दिया और भूगोल को ‘वस्तुओं के कहाँ? का अध्ययन बताया। यदि वितरण का अध्ययन, भूगोल की प्रकृति का मूल है तो इसे भूगोल प्रतीत होना चाहिए जिससे कि इसकी अन्य विज्ञानों से पहचान हो सके। जब वनस्पति शास्त्री पौधों के वितरण को निर्धारित करता है, तथा समाजशास्त्री जनसंख्या के वितरण को दर्शाता है तो वह भी भूगोलवेत्ता हो जाता है अथवा कम से कम वह भी भूगोल के क्षेत्र में कार्य करने लगता है।

     मिशोटे का तर्क है कि इनमें से प्रत्येक अपने विज्ञान के दृष्टिकोण से विशिष्ट प्रकार की घटनाओं का अध्ययन करता है, भूगोल के दृष्टिकोण से नहीं। हेटनर ने स्पष्ट किया कि ‘वितरण वस्तुओं का गुण है।’ (Distribution is the attribute of things)। वर्गीकृत विज्ञान घटनाओं पर बल देता है। जिनका वह वितरण अध्ययन करता है, भूगोल क्षेत्रों पर बल देता है जिसके तत्वों में विविधताएँ होती हैं। भूगोल की वितरण-विज्ञान की संकल्पना के सम्बन्ध में कार्ले सॉवर का मत है कि भूगोल कहाँ (where) का विज्ञान है। भूगोलवेत्ता सदैव यह जानने का प्रयास करता है कि उसकी दृश्य घटनाएँ कहाँ हैं? कहाँ? का अध्ययन भूगोल विषय का एक अंग है।

      हरमन लाटेन्साच का मत है कि भूगोल का अध्ययन क्षेत्र रूप के निरीक्षण से ही आरम्भ होता है। क्षेत्र में प्रवेश करते समय सर्वप्रथम भूगोलवेत्ता की दृष्टि पहाड़ियों, वनों, खेतों, ग्रामों व नगरों आदि की विभिन्नता पर ही जाती है। वास्तव में भूगोलवेत्ता भू-तल की मुखाकृति का आलोकन करके अलग-अलग क्षेत्रों में तथ्यों का वर्णन करता है।

     आइंस्टीन ने क्षेत्र (Space) को काल से विलग नहीं माना है। वे देश-काल (Space-time) के संदर्भ में भूगोल को देखते थे। क्षेत्र (Space) एवं काल (Time) एक-दूसरे के परिपूरक हैं। वे विलग नहीं किए जा सकते हैं। प्रत्येक कालावधि में क्षेत्रीय आयाम (गुण-धर्म) बदल जाता है अर्थात् प्रत्येक क्षेत्रीय इकाई की विशेषतायें काल-क्रमानुसार भिन्न होती है। इस प्रकार (Space) अन्तराल (Gap) नहीं अन्तर्सम्बन्धों का पुंज है।

    शेफर (Schaefer F) ने निरपेक्ष क्षेत्र (Absolute Space) के स्थान पर सापेक्ष्य क्षेत्र (Relatives Space) को अपनाने पर बल दिया है। इसीलिए वर्तमान वैज्ञानिकतावादी युग में विभिन्न सांख्यिकीय एवं ज्यामितिक संकल्पनाओं का उपयोग करते हुए विभिन्न तत्वों के क्षेत्रीय अन्तर्सम्बन्धों की व्याख्या विश्लेषण के आधा पर क्षेत्रीय प्रतिरूप एवं प्रक्रियाओं के विवेचन पर बल दिया जाता है।



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35. Development of Modern Indian Geography: Prospects, Problems and Future (आधुनिक भारतीय भूगोल का विकास: संभावनाएँ, समस्याएँ और भविष्य)

Development of Modern Indian Geography: Prospects, Problems and Future

(आधुनिक भारतीय भूगोल का विकास: संभावनाएँ, समस्याएँ और भविष्य)



प्रश्न प्रारूप

Q. भारत में भूगोल के अध्यापन के विकास एवं प्रगति की समीक्षात्मक विवेचना कीजिए।

(Critically examine the development and progress in teaching of Geography in India.)

अथवा, आधुनिक भारतीय भूगोल के विकास की संभावना, समस्याएँ एवं भविष्य की विवेचना करें।

(Discuss the possibilities, problems and future of development of modern Indian geography.)

उत्तर- आधुनिक भारत में भूगोल की शिक्षा का विकास पर्याप्त विलम्ब से हुआ है। यहाँ ब्रिटिश शासन द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में स्कूल स्तर पर भूगोल का अध्यापन कार्य आरम्भ किया गया। तत्कालीन भारत में सन् 1920 में लाहौर में स्नातक स्तर पर भूगोल विषय की शिक्षा की व्यवस्था की गई थी। उसके बाद 1924 में अलीगढ़ तथा पटना विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर भूगोल का शिक्षण प्रारम्भ हुआ।

      सन् 1936 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में स्नातकोतर स्तर पर भूगोल का पठन-पाठन प्रारम्भ हुआ। कलकत्ता विश्वविद्यालय में 1941, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में 1949 से स्नातकोत्तर स्तर पर भूगोल की शिक्षा दी जाती थी। आधुनिक भारत के भूगोल के विकास में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी उस समय जुड़ी जब 1938 में ‘इण्डियन साइंस कांग्रेस’ (Indian Science Congress) के रजत जयन्ती अधिवेशन में भूगोल को एक अलग खण्ड के रूप में स्वीकार किया गया।

    भारत में 1950 से पूर्व स्नातकोत्तर स्तर तक शिक्षण शोध की सुविधाएँ अलीगढ़, मद्रास, कलकत्ता, बनारस, इलाहाबाद (प्रयागराज), हैदराबाद, लुधियाना तथा पटना विश्वविद्यालयों में उपलब्ध थीं। स्नातक स्तर पर आगरा, कलकत्ता, बम्बई (मुम्बई), मद्रास (चेन्नई), बड़ौदा, मैसूर, हैदराबाद, राँची, वाराणसी, इलाहाबाद, नागपुर, उदयपुर, जोधपुर, गुवाहाटी आदि स्थानों पर भूगोल की शिक्षा प्राप्त की जा सकती थी।

     1950 से पूर्व तक भारत में भूगोल की उच्च शिक्षा के विकास में धीमी गति के पीछे रहने के निम्न कारण थे-

(i) ब्रिटेन में भूगोल की उच्च शिक्षा देर से प्रारम्भ हुई। भारत में 1947 तक ब्रिटेन का अधिकार रहा है। इसलिए ब्रिटिश भारतीय शिक्षण संस्थानों में नियुक्त न हो सके।

(ii) भारत में भूगोल में उच्च शिक्षा हेतु भारतीय विद्वानों की कमी थी।

(iii) भूगोल शिक्षा के विकास हेतु प्रारम्भ में राष्ट्रीय नीति एवं पाठ्यक्रम का अभाव था।

     भारत में 1951 से 1960 के दशक में कर्नाटक (धारवाड़), पूना, उस्मानिया (हैदराबाद) राँची, बड़ौदा, सागर, गौहाटी, सिलीगुड़ी, भागलपुर, गोरखपुर, मैसूर और दिल्ली विश्वविद्यालयों में भूगोल के स्नातकोत्तर विभाग स्थापित हुए।

       1961-1970 की अवधि में दार्जिलिंग, बोधगया, जोधपुर, उदयपुर, रायपुर, ग्वालियर, जयपुर, कुरुक्षेत्र तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में भूगोल के स्नातकोत्तर विभाग खोले गए।

     1971 के बाद गढ़वाल, कुमायूँ (नैनीताल), जम्मू-काश्मीर (श्रीनगर), हिमाचल (शिमला), शिलाँग आदि में भूगोल के स्नातकोत्तर विभाग स्थापित हुए। भारत में महाविद्यालय स्तर पर भूगोल की शिक्षा का प्रबन्ध स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद तेजी से हुआ है। यहाँ सेन्ट जोन्स कालेज (आगरा), बलवन्त राजपूत कालेज (आगरा), डी० ए० वी कालेज (मुरादाबाद) में 1950 से पूर्व भूगोल की शिक्षा दी जाती थी।

      1951 से 1970 तक डी० एस० बिष्ट (नैनीताल), के० एन० राजकीय ज्ञानपुर, वार्ष्णेय अलीगढ़, धर्म समाज (अलीगढ़), वर्धमान (बिजनौर), किशेरी रमन (मथुरा), नागपुर महाविद्यालय (नागपुर), विदर्भ म० वि० अमरावती महाकौशल महाविद्यालय (जबलपुर), महारानी लक्ष्मीबाई कालेज (ग्वालियर), गर्वन्मेण्ट हमीदिया कालेज (भोपाल), पार्ले महाविद्यालय (बम्बई), मेरठ कालेज (मेरठ), एस०एस०वी० कॉलेज (हापुड़), डी० जे० (बड़ौत), डी० बी० एस० (देहरादून), डी० ए० वी०, (देहरादून), राजकीय रजा स्नातकोत्तर कालेज (रामपुर), टी० डी० एस० कालेज (जौनपुर), जे० वी० जैन (सहारनपुर), एम० एम० एच० (गाजियाबाद), माधव कालेज (उज्जैन), दयानन्द महाविद्यद्यालय अजमेर, इन्दौर तथा शोलापुर में स्नातकोत्तर विभाग स्थापित हो चुके थे।

    आरम्भ में भारत में भूगोल की शिक्षा उन विद्वानों द्वारा दी गई जो विदेशों से उच्च शिक्षा ग्रहण करके आते थे। आरम्भिक काल में भूगोल के कार्यों का सम्बन्ध भारतीय भौमिकीय सर्वेक्षण विभाग (Geological Survey of India-G.S.I), भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (Indian Meteorological Department) तथा भारतीय सर्वेक्षण विभाग (Survey of India) से था। एन० सुब्रमण्यम, आई० आर० खान, एस० पी० चटर्जी, एच० एल० छिब्वर, आर० एन० दुबे, मोहम्मद सफी, रामलोचन सिंह, पी० दयाल, जार्ज कुरियन, एस० सी० चटर्जी, एस० एम० अली, एन० के० बोस, सी० डी० देशपाण्डे जैसे भूगोलविदों ने भारत में आधुनिक भूगोल की शुरुआत की है।

    आई० आर० खान ने लंदन से, एस० पी० चटर्जी ने लंदन से, एच० एल० छिब्बर ने लंदन से, आर० एन० दुबे ने पेरिस से, जार्ज कुरियन ने लंदन से, एस० सी० चटर्जी ने लंदन से तथा एस० एम० अली ने लंदन से पी-एच०डी० या डी० लिट् की डिग्री प्राप्त की थी। इन भूगोलविदों ने भूगोल का अनुसंधान निर्देशन भारतीय विश्वविद्यालयों में बड़ी लगन से किया। इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय विश्वविद्यालयों में भूगोल के एम० ए० और पी-एच० डी० प्राप्त करने वाले विद्वान तैयार होने लगे जिन्होंने भूगोल को आगे बढ़ाने में सहयोग किया है।

      भारत में 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध से ही शोध के विषयों, समस्याओं एवं चिन्तन पर अमेरिकन चिन्तन शैली का तेजी से प्रभाव बढ़ा है। भौगोलिक चिन्तन में नवीन तकनीक के प्रवेश के साथ नई पीढ़ी के स्नातकोत्तर एवं शोध में रत विद्यार्थियों में यहाँ के विशिष्ट परिवेश में उनका निरीक्षण कर व्याख्या प्रस्तुत करना और उनके समाधान के उपायों को बताने एवं समझाने की मनोवृत्ति का निरन्तर विकास हुआ है।

     भारत में अब नगरीय व ग्रामीण क्षेत्रों के विशिष्ट स्वरूपों एवं उनकी समस्याओं, भूमि के उपयोग व कृषि तकनीक के परिवर्तित स्वरूपों का विभिन्न स्तरीय व विभिन्न क्षेत्रों में प्रभाव संसाधन स्वरूप, प्रादेशिक नियोजन जैसे विषयों पर भौगोलिक शोध किए जा रहे हैं। 1975 से ही जनसंख्या समस्या और उसके समाधान की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।

    आधुनिक भारत में भूगोलवेत्ताओं के चिन्तन में कोई निजी दर्शन नहीं झलकता। काण्ट के भौगोलिक दर्शन के अनुसार यहाँ के भूगोल में काल एवं स्थान (Time and Space) के संदर्भ में परिघटनाओं का अध्ययन किया जाता है। भारत में 1980 के दशक के मध्य तक विगत दो दशकों में विभिन्न पक्षों पर शोध कार्य हुआ है। इसके विकास में अनेक सम्मेलनों, संगोष्ठियों, कार्यशालाओं तथा अधिवेशनों का योगदान है।

     1960-70 का दशक भारतीय भूगोल के इतिहास का महत्वपूर्ण दशक है। इस अवधि में 1968 में नई दिल्ली में अन्तराष्ट्रीय भूगोल संगठन (I.G.U.) की 21 वीं कांग्रेस प्रो० एस० पी० चटर्जी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। इस दशक में लगभग 1000 शोध-पत्र प्रकाशित हुए, 30 शोध ग्रन्थ छपे और 6 शोध पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। उत्तर भूगोल पत्रिका (गोरखपुर) तथा ‘भू-दर्शन’ (उदयपुर) का प्रकाशन इसी अवधि से प्रारम्भ हुआ है।

      इस दशक की अन्य उल्लेखनीय घटनाएँ निम्नांकित हैं-

(1) विश्वविद्यालय अनुदान द्वारा ग्रीष्मकालीन शिक्षण शिविर, संगोष्ठियाँ या कार्यशाला आयोजन हेतु अनुदान देना।

(2) अन्तराष्ट्रीय भूगोल कांग्रेस की देश में विभिन्न विश्वविद्यालयों में गोष्ठियों का आयोजन।

(3) यू० एन० ओ० तथा यूनेस्को द्वारा आयोजित संगोष्ठियाँ।

(4) योजना आयोग शुष्क क्षेत्र संस्थान (जोधपुर), नगर एवं ग्राम्य नियोजन संस्थान, आदि की स्थापना।

      भारत में भूगोल के विकास में संलग्न वैज्ञानिक संस्थान (Scientific Organisations Engaged in Development of Geography in India)

     भारत में विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के अलावा कुछ वैज्ञानिक संस्थाएँ भी भूगोल के विकास में मदद करती हैं। ये संस्थाएँ हैं-

(1) राष्ट्रीय एटलस संस्थान, कलकत्ता।

(2) सर्वे आफ इण्डिया, देहरादून।

(3) भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, पूना।

(4) केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर।

(5) भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वे संस्थान, कलकत्ता।

(6) भारतीय जनगणना विभाग, दिल्ली।

(7) भारत का योजना आयोग, नई दिल्ली।

(8) भारत का मानव वैज्ञानिक सर्वे संस्थान।

(9) भारतीय सांख्यिकीय संस्थान।

(10) भारत का तकनीकी आर्थिक सर्वे विभाग।

(11) भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् (ICSSR)।

(12) भारतीय सुदूर संवेदन अभिकरण (Indian Remote Sensing Agency)।

(13) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली (U.G.C)।

(14) भारतीय विज्ञान कांग्रेस (Indian Science Congress)।

   स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत में ग्रेट ब्रिटेन के भूगोलवेत्ता एल० डी० स्टाम्प का प्रभाव रहा था। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के मोहम्मद सफी ने उनके निर्देशन में भूमि उपयोग पर कार्य किया। उनका यह कार्य Land Utilization in Eastern Uttar Pradesh-1960′ में छपा था। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रामलोचन सिंह ने नगरीय भूगोल एवं सागर विश्वविद्यालय में प्रो० सक्सेना ने ‘वैदिक भारत का भूगोल’ एवं बेचन दुबे ने ‘प्राचीन भारत’, एस० सी० बोस ने ‘दामोदर घाटी’ का अध्ययन किया। देश में 1980 तक 55 विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर स्तर पर भूगोल के पठन-पाठन तथा अनुसंधान की सुविधा उपलब्ध हो चुकी थी।

    वर्तमान दशक में भूगोल में देहरादून स्थित भारतीय फोटो निर्वचन संस्थान (IPI), राष्ट्रीय सुदूर संवेदन अभिकरण, हैदराबाद (NRSA) तथा भारतीय एटलस संस्थान, कलकत्ता अति आधुनिक तरीकों से भूगोल के अध्ययन-अध्यापन में सहायता कर रहे हैं।

      1970-80 के दशक में भूगोलवेत्ताओं द्वारा जो कार्य किए गए उससे राष्ट्र निर्माण में पर्याप्त मदद मिली है। लेकिन भारतीय भूगोल की सबसे बड़ी कमी यह रही है कि यहाँ भूगोल के शोध की समस्याओं एवं क्षेत्रों के नियोजन से सम्बन्धित प्रशासकीय दृष्टिकोण से नहीं जोड़ा गया है। आधुनिक भारतीय भूगोलवेत्ता भूगोल का सैद्धान्तिक विकास करने में अक्षम रहे हैं। मो० मुनीस रजा (Moonis Raza) का कथन है कि “भारत का भूगोल वृहदाकार जीव की तरह है जिसकी रीढ़ की हड्डी नहीं है।” 

     भारत में राष्ट्रीय स्तर पर भूगोल का कोई विकसित संस्थान नहीं है और न भूगोल के विकास की कोई राष्ट्रीय नीति है। यहाँ भूगोलवेत्ताओं को नियोजन में वह स्थान नहीं दिया गया है जैसा कि विकसित देशों में दिया जाता है।

    भारतीय राष्ट्रीय भूगोल परिषद्, वाराणसी की स्थापना 1940 में प्रो० एच० एल० मि द्वारा की गई थी। 1955 के बाद से प्रो० रामलोचन सिंह के निर्देशन में भूगोल की प्रतिष्ठित पत्रिका National Geographical Journal का प्रकाशन होता रहा है। यहाँ 1966 में पहली बार All India Seminar on Applied Geography आयोजिन किया गया। इसके बाद विकासशील देशों के नगरीय भूगोल पर सम्मेलन 1968 में तथा राष्ट्रीय भूगोल परिषद् का जयन्ती समारोह 1971 में आयोजित किए गए। 1978 में IGU के अन्तर्गत ग्रामीण अधिकार पर विशेष संगोष्ठी आयोजित की गई थी। यहाँ मानसून एशिया के ग्रामीण अधिवासों पर 1971 में अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी भी सम्पन्न हुई।

   बम्बई भूगोल परिषद् भारत की ऐसी भूगोल परिषद् है जहाँ रॉयल ज्याग्राफिकल सोसायटी लंदन का कार्यालय था और जिसकी स्थापना 1832 में की गई। 1873 में इसे एशियाटिक सोसायटी, कलकत्ता से सम्बन्धित किया गया। 1963 से यह परिषद् नियमित रूप से चल रही है। भारतीय भूगोल परिषद्, मद्रास की स्थापना 1926 में की गई। यहाँ से Indian Geographical Journal पत्रिका प्रकाशित होती रही है।

     अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की भूगोल सोसायटी की स्थापना 1946 में की गई। यहाँ अनेक एशियाई तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के भूगोल सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं। यहाँ 1956 में पहला अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया जिसमें खाद्य एवं जनसंख्या समस्या, शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क प्रदेशों की समस्याएँ, नगरीय सर्वेक्षण, जल विद्युत निकास आदि विषयों पर 65 शोध पत्र पढ़े गए। इस सोसायटी द्वारा 1965 एवं 1966 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा भारत सरकार के विशेष आर्थिक सहयोग से नैनीताल में दो बार ग्रीष्मकालीन शिविरों का अयोजन किया गया। 1968 में मोहम्मद सफी ने यहाँ IGU की उत्तर भारत की एक बैठक बुलाई।

     भारत में भूगोल परिषदों का उत्साह अब समाप्त हो चुका है। यहाँ अधिकांश परिषद् विशेषीकरण (Specialisation) को प्रोत्साहन देकर भूगोल की नई प्रवृत्तियों का संवर्धन कर रही है। अल्पकाल में अनियमित होने वाली परिषदों की संख्या अधिक है। इसके पीछे संस्थापकों/संरक्षकों का देहावसान होना अथवा अवकाश ग्रहण के बाद प्रभावहीन हो जाना रहा है।

निष्कर्ष:-

   आधुनिक भारत में भूगोल की प्रगति एवं उसमें चिन्तन धारा को देखकर यह कहा जा सकता है कि भारत में भूगोल का अभी पूरी तरह से विकास नहीं हुआ है। इसका विकास थम-सा गया है। यहाँ भूगोल की शिक्षा के प्रति वह उत्साह नहीं दिखाई पड़ता है जो उत्साह स्वतंत्रता प्राप्ति के 20 वर्षों बाद तक रहा था। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत में भूगोल को वह सरकारी स्थान नहीं मिल पाया है जो मिलना चाहिए था।

     अतः, भारतीय भूगोल के सम्बन्ध में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यद्यपि भारतीय भूगोलवेत्ता व्यक्तिगत रूप से भूगोल के क्षेत्र में वास्तविक योगदान दे हे हैं, फिर भी भूगोल की भारतीय विचारधारा का उभरना अभी शेष है।



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