Category एशिया का भूगोल

10. एशिया के जनसंख्या वृद्धि एवं वितरण / Population growth and Distribution of Asia

10. एशिया के जनसंख्या वृद्धि एवं वितरण

(Population Growth and Distribution of Asia)


एशिया के जनसंख्या वृद्धि एवं वितरण⇒एशिया के जनसंख्या

प्रश्न प्रारूप

1. एशिया महाद्वीप की जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।

(Describe the factors which effects the distribution of population of Asia.) Or, 

एशिया में जनसंख्या के असमान वितरण के कारणों का वर्णन कीजिए।

 उत्तर – एशिया महाद्वीप में जनसंख्या की अधिकता के साथ-साथ जनसंख्या का वितरण बड़ा असमान है। प्रसिद्ध विद्वान क्रेसी के अनुसार, “एशिया में अनेक स्थान ऐसे है जहाँ बहुत कम मानव निवास करते हैं और अनेक ऐसे स्थान है जहाँ बहुत अधिक संख्या में मानव निवास करते हैं।”

          वास्तव में अगर एशिया की जनसंख्या के वितरण में मानचित्र को देखा जाए तो एशिया महाद्वीप का लगभग एक-तिहाई भाग जो एशियाई रूस के अन्तर्गत है, ऐसा है जहाँ जनसंख्या बहुत कम मिलती है। दूसरी ओर चीन, जापान, भरत आदि मानसूनी जलवायु वाले दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों का भाग है जहाँ जनसंख्या इतनी अधिक है कि मानव बसाव के लिए भूमि नहीं है। एशिया महाद्वीप के जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित तत्व है-

1. धरातल: एशिया में जनसंख्या के असमान वितरण में धरातल की बनावट का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। दक्षिणी एवं दक्षिण-पूर्वी भागों में मिलने वाली नदियों के मैदानों में जनसंख्या अधिक मिलती है। उदाहरण के लिए, यांगटिसीक्यांग बेसिन में 5,000 मानव तक प्रति वर्ग किलोमीटर मिलते हैं।

2. जलवायु: जलवायु का जनसंख्या के वितरण पर बहुत प्रभाव पड़ता है। एशिया में दक्षिणी एवं दक्षिण-पूर्वी भागों में मिलने वाली मानसूनी जलवायु वाले देशों में जनसंख्या अधिक मिलती है। दूसरी ओर साइबेरिया की ठण्डी एवं उष्ण मरुस्थलीय प्रदेशों की गर्म जलवायु वाले भागा में जनसंख्या बहुत कम मिलती है। डडले स्टाम्प के अनुसार, “इसमें कोई संदेह नहीं कि एशिया की आधुनिक जनसंख्या के वितरण में सबसे अधिक प्रभाव जलवायु की दशाओं का पड़ा है।” 

3. मिट्टी: एशिया में जिन भागों में नदियों द्वारा लाकर बिछाई गई कॉप मिट्टी मिलती है वहाँ जनसंख्या अधिक मिलती है, क्योंकि जनसंख्या के लिए उन भागों में कृषि करने की सुविधाएं हैं।

4. जल की प्राप्ति: एशिया का दक्षिण-पश्चिमी भाग शुष्क है तथा यहाँ जल के अभाव के कारण जनसंख्या भी बहुत कम पाई जाती है। रेगिस्तानी भागों में जनसंख्या के कम मिलने का कारण यहाँ जल का अभाव है।  

5. यातायात के साधन: विकसित यातायात के साधन भी जनसंख्या के वितरण पर प्रभाव डालते हैं। जापान, भारत तथा चीन में जनसंख्या की अधिकता में यहाँ के यातायात के साधनों ने भी सहयोग दिया है। सुमात्रा, मलाया तथा साइबेरिया में यातायात के साधनों के अभाव के कारण मानव को सुविधाएं नहीं मिलने पाती हैं अतः ऐसे स्थानों पर मानव कम निवास करना पसंद करता है।

6. औद्योगिक विकास: जापान एशिया का सबसे अधिक उद्योग-धन्धों में विकसित देश है तथा जापान में जनसंख्या भी बहुत अधिक है। इस प्रकार जिन भागों में मनुष्य को जीवन निर्वाह के लिए रोजगार सुविधापूर्वक मिल जाता है वहाँ अधिक संख्या में मानव निवास करना पसन्द करते हैं।

7. राजनीतिक कारण: जापान में जनसंख्या अधिक होने का एक कारण यह भी है कि जापान सरकार ने युद्धकाल में जनसंख्या को बढ़ाने के लिए जनता को प्रोत्साहित किया था। उत्तरी कोरिया में दक्षिणी कोरिया की अपेक्षा जनसंख्या कम मिलने का कारण यहाँ की युद्ध की परिस्थितियाँ रही है।

8. शांतिपूर्ण वातावरण: एशिया अनेक धर्म, संस्कृति, सभ्यता एवं सम्प्रदायों का जन्म स्थल होने के कारण मानव जाति के लिए सुखमय जीवन व्यतीत करने के लिए शान्तिपूर्ण वातावरण प्रस्तुत करता है। नदी घाटियों की सभ्यता यहाँ के सामाजिक जीवन को मधुर बनाती है।

2. एशिया में अनेक स्थान ऐसे हैं जहाँ बहुत कम मानव निवास करते हैं और कम ऐसे निवास हैं जहाँ बहुत अधिक संख्या में मानव निवास करते हैं। विवेचन करें।

उत्तर – एशिया संसार का सबसे बड़ा महाद्वीप है। विश्व के कुल क्षेत्रफल का लगभग एक तिहाई भाग अकेले एशिया महाद्वीप में आता है लेकिन जब हम एशिया महाद्वीप की जनसंख्या का अध्ययन करते है तो हमें इस बात से और भी आश्चर्य होता है कि एशिया महाद्वीप में संसार के सबसे अधिक मानव निवास करते हैं। इस प्रकार विश्व के लगभग एक-तिहाई भाग पर विश्व की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या निवास करती है। वर्ष 2011 के अनुसार संसार में निवास करने वाले लगभग 700 करोड़ मानवों में से एशिया में लगभग 420 करोड़ से अधिक मानव निवास करते हैं।                             

              एशिया महाद्वीप में जनसंख्या की अधिकता के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस महाद्वीप में कुछ क्षेत्र ऐसे है जहाँ एशिया के बहुत अधिक मानव निवास करते हैं और अभी भी इन क्षेत्रों में मानव वृद्धि बड़ी तीव्रता से हो रही है। इसके विपरीत, बहुत-से क्षेत्र ऐसे है जहाँ एशिया के बहुत कम मानव निवास करते हैं तथा इन क्षेत्रों में मानव की कमी के कारण इन भागों में छिपे प्राकृतिक साधनों का भी प्रयोग नहीं होने पाया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि एशिया महाद्वीप में जनसंख्या का वितरण बड़ा असमान है।

जनसंख्या के घनत्व की अधिकता

            एशिया महाद्वीप में जनसंख्या की अधिकता के साथ-साथ जनसंख्या का प्रति वर्ग किलोमीटर घनत्व भी अधिक है। जैसा कि संसार की जनसंख्या का घनत्व 46 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है जबकि एशिया का 81  व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। जनसंख्या के प्रति वर्ग किलोमीटर घनत्व के आधार पर एशिया महाद्वीप को तीन भागों में बाँटा जा सकता है –

1. अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्र 

2. मध्यम जनसंख्या वाले क्षेत्र 

3. कम जनसंख्या वाले क्षेत्र।

1. अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्र : 

                     एशिया महाद्वीप के दक्षिणी एवं दक्षिण-पूर्वी भागों में मानव के निवास के लिए सभी सुविधाएं प्राप्त है इसलिए इस भाग में एशिया की लगभग 70% से अधिक जनसंख्या निवास करती है। इस प्रकार एशिया महाद्वीप के लगभग एक-तिहाई भाग पर लगभग दो-तिहाई मानव निवास करते हैं। इस क्षेत्र में जापान, चीन, भारत, इण्डोनेशिया, पाकिस्तान, वियतनाम इत्यादि देश सम्मिलित है। यहाँ के निवासियों का प्रधान व्यवसाय कृषि करना है। इन देशों में जनसंख्या की वृद्धि दर सबसे अधिक है। अत्यधिक जनसंख्या के केन्द्र होने के कारण यहाँ जनसंख्या का प्रति वर्ग किलोमीटर घनत्व भी अधिक है। इस क्षेत्र में आने वाले प्रमुख देशों की जनसंख्या एवं घनत्व की स्थिति निम्न प्रकार है-

एशिया में सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश
देश  जनसंख्या (मिलियन घनत्व (प्रति वर्ग किलोमीटर)
चीन 1341.33 141
भारत 1214.46 383
इंडोनेशिया 232.52 123
पाकिस्तान 184.75 232
बांग्लादेश 164.75 1118
जापान 127.00 337
वियतनाम 89.03 269

2. मध्यम जनसंख्या वाले क्षेत्र: 

         एशिया महाद्वीप के कुछ भाग ऐसे हैं जहाँ कि मानव के निवास के लिए सभी सुविधाएं प्राप्त नहीं है इसलिए इन भागों में एशिया महाद्वीप की लगभग 22% जनसंख्या निवास करती है। इस क्षेत्र में म्यांमार, थाईलैण्ड, मलेशिया, टर्की, नेपाल, कम्बोडिया, सीरिया आदि देश सम्मिलित है। यहाँ के निवासियों का प्रधान व्यवसाय कृषि करना है। जलवायु की उपयुक्त दशाओं के अनुसार ये पशुपालन का भी कार्य करते हैं। यहाँ जनसंख्या की वृद्धि दर अधिक नहीं है जितनी भारत, चीन तथा जापान में है। इन क्षेत्रों में आने वाले प्रमुख देशों की जनसंख्या एवं घनत्व की स्थिति निम्न प्रकार है-

प्रमुख देशों की जनसंख्या एवं घनत्व की स्थिति
देश  जनसंख्या (मिलियन घनत्व (प्रति वर्ग किलोमीटर)
टर्की 75.71 97
म्यांमार 50.50 75
थाईलैंड 68.14 133
नेपाल 29.85 157
लाओस 27.91 83
कम्बोडिया 15.05 74
सीरिया 22.51 97

3. कम जनसंख्या वाले क्षेत्र : इस क्षेत्र में एशिया महाद्वीप का वह भाग सम्मिलित है जहाँ मानव निवास के लिए सुविधाएं प्राप्त नहीं है। इस क्षेत्र का अधिकांश भाग या तो पहाड़ी एवं पठारी है अथवा मरुस्थलीय है। एशिया के गर्म एवं शीत मरुस्थल इसी क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं। इस क्षेत्र में एशियाई रूस, मंगोलिया, अरब, ईरान, अफगानिस्तान, तिब्बत आदि सम्मिलित है। इस भाग की जलवायु एवं प्राकृतिक परिस्थितियाँ मानव आवास के अनुकूल नहीं है। इस भाग में एशिया महाद्वीप की लगभग 8% जनसंख्या निवास करती है जबकि यह भाग एशिया महाद्वीप के लगभग 1/2 भाग को घेरे हुए है। जनसंख्या की कमी के कारण यहां जनसंख्या का प्रति वर्ग किलोमीटर घनत्व भी बहुत कम है। इस भाग में कुछ स्थान तो ऐसे है जो मानव से शून्य है। इस क्षेत्र में आने वाली प्रमुख देशों की जनसंख्या घनत्व की स्थिति अग्र प्रकार है-     

एशिया के कम जनसंख्या वाले क्षेत्र
देश  जनसंख्या (लाख)  घनत्व (प्रति वर्ग किलोमीटर)
सऊदी अरब 26.25 12.6
जोर्डन 6.47 57.5
ईराक  31.47 72.0
ईरान 75.08 45.0
लाओस 6.44 24.0
अफगानिस्तान 29.19 45.0
मंगोलिया 2.70 1.5
कजाखस्तान 15.75 5.9

3. एशिया में जनसंख्या वृद्धि से कौन-कौन सी समस्यायें उत्पन्न हुई है? उसके हल करने के उपायों का वर्णन करें।

(What are the main problems which increases the population in Asia ? Discuss.)

उत्तर – एशिया महाद्वीप की जनसंख्या के वितरण का अध्ययन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि एशिया महाद्वीप में अधिक मानव निवास करते हैं अतएव एशिया अत्यधिक जनसंख्या (Over-population) वाला महाद्वीप है। एशिया की लगभग 70% जनसंख्या का प्रधान व्यवसाय कृषि करना है, लेकिन फिर भी एशिया महाद्वीप की 20% जनसंख्या अपनी उदर-पूर्ति के लिए अन्य महाद्वीपों से खाद्यान्न आयात करती है। एशिया में तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या एशिया के लिए एक समस्या बनती जा रही है।

          एशिया में प्रतिवर्ष औसतन 30% जनसंख्या बढ़ रही है। एक बात एशिया की जनसंख्या में आश्चर्यजनक है, वह यह है कि एशिया के जिन भागों में जनसंख्या की अधिकता है उन्हीं भागों में जनसंख्या तीव्रता से बढ़ रही है। जनसंख्या की निरन्तर वृद्धि का प्रभाव एशिया के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन पर पड़ रहा है। जनसंख्या का दबाव भूमि पर बढ़ता जा रहा है और जनसंख्या की वृद्धि की दर के साथ निर्वाह के साधनों में वृद्धि नहीं हो रही है। एशिया महाद्वीप में इस जनसंख्या की वृद्धि से निम्नलिखित इकाईयां उत्पन्न हो गई है-

1. अकालों का पड़ना: यद्यपि भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे कासशील देशों में 76 प्रतिशत जनता कृषि कार्य करती है। इसके अलावे यहाँ की कृषि पूर्णतया मौसमी तत्वों से प्रभावित होती है। यहाँ की जनसंख्या माल्थस महोदय के अनुसार 5 वर्ष में दुगुनी हो रही है। यहाँ व्यक्तियों की जन्म-दर, मृत्यु दर की अपेक्षा अधिक है। कृषि भूमि के स्थिर रहने के कारण बढ़ती हुई जनसंखय को अतिरिक्त संसाधन प्राप्त नहीं हो पाता है फलस्वरूप यहाँ प्रति दस वर्षों के अन्तराल पर बाढ़ तथा सूखे की स्थिति आती जिससे काफी अधिक जनसंख्या प्रभावित होती है। माल्थस महोदय ने इसे प्राकृतिक प्रकोप माना है। फोर्ड फाउन्डेसन टीम ने एशिया के अविकसित देशों का अध्ययन कर पाया है कि समस्या का हल एक पहेली है।

2. रहन-सहन के स्तर का गिरना : एशियाई देशों में मनुष्यों की संतुलित भोजन के अभाव के कारण रोगों से सामना करने की शक्ति कम है। अतः वे शीघ्र ही बीमार होकर मर जाते है। इन देशों में जन्म दर 41.7 प्रतिशत तथा मृत्यु दर 22.8 प्रतिशत है। ऊंची जन्म-दर होने के कारण प्राकृतिक वृद्धि दर 18.9 है। यहाँ के 90 प्रतिशत व्यक्ति भूख की सीमा के आस-पास जीवन व्यतीत करते हैं। यहाँ प्रति व्यक्ति उपलब्ध भूमि की संख्या 1.1 एकड़ है। इस प्रकार यहाँ की कृषि पर आधारित जीवन के कारण लोगों के रहन-सहन का स्तर काफी गिर गया है। अधिक जनसंख्या के विकास के कारण ही महानगरों में रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं का अभाव है। इन सब कारणों से यहाँ के लोगों का जीवन काफी निम्न हो गया है।

3. राजनीतिक अशांति का फैलना : विभिन्न संसाधनों के अभाव के कारण यहाँ के लोगों का मानसिक विकास अधिक नहीं हो पाता है फलस्वरूप यहाँ राजनीतिक अशांति फैलती है। सामाजिक सुविधाओं का अभाव, आर्थिक सुदृढ़ता का अभाव इत्यादि तत्व यहाँ के राजनीतिक स्थितियों को नियंत्रित करते हैं। इसके अलावे लोगों में सत्ता का मोह राजनीतिक अशांति फैलाते हैं।

4. कृषि पर निर्भरता: एशियाई देशो की 70 से 75 प्रतिशत जनता कृषि पर निर्भर करती है, जैसे—भारत में 70 प्रतिशत व्यक्ति, पाकिस्तान में 75 प्रतिशत, बांग्लादेश में 60 प्रतिशत व्यक्ति कृषि पर निर्भर करते हैं जबकि ब्रिटेन में केवल 5 प्रतिशत तथा अमेरिका में केवल 7 प्रतिशत व्यक्ति ही कृषि पर निर्भर करते हैं तभी तो बेन्जामिन हिगिन्स महोदय ने यह अनुमान लगाया है कि विश्व में कुल 1.3 बिलियन लोग कृषि पर निर्भर करते हैं। इनमें एक बिलियन लोग एशिया में है। जापान को छोड़कर सभी एशियाई देशों में कृषि पर निर्भरता अधिक है। 

5. बेरोजगारी तथा छिपी हुई बेरोजगारी: एशियाई देशों में जनसंख्या वृद्धि के कारण बेरोजगारी की समस्या काफी बढ़ गयी है। बौर एवं यामे के अनुसार इन देशों मे बेरोजगारी का मुख्य कारण उन्हें काम देने के लिए आवश्यक सहयोगी साधनों का अभाव है। यद्यपि बेरोजगारी का प्रधान कारण प्रभावपूर्ण माँग का अभाव है जबकि एशियाई देशों की बेरोजगारी संरचनात्मक होती है। इसका मुख्य कारण श्रम-शक्ति के प्रयोग के लिए आवश्यक पूँजी का अभाव है।

6. सामाजिक समस्याएँ: एशिया में जनसंख्या वृद्धि के फलस्वरूप अनेक सामाजिक समस्याओं का जन्म हुआ है। इन देशों में साक्षरता का प्रतिशत कम है। भारत में 29.5 प्रतिशत पाकिस्तान में 18 प्रतिशत, बांग्लादेश में 12 प्रतिशत है, जबकि जापान में 99 प्रतिशत है। सामाजिक रूढ़ियों के कारण यहाँ की सामाजिक व्यवस्था काफी पिछड़ी है। रूढ़ि तथा रीति-रिवाज काफी महंगे हैं। स्त्रियों की स्थिति काफी कमजोर है।

7. युद्ध शक्ति एवं युद्ध की सम्भावना में वृद्धि 

8. आर्थिक संकट की समस्या

9. विकास कार्यों का रूक जाना      

जनसंख्या की समस्या को हल करने के उपाय

             एशिया की जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न समस्याओं को संतान उत्पत्ति पर प्रतिबन्ध, विवाह की आयु में वृद्धि, सन्तति सुधार एवं स्वास्थ्य सेवायें, सामाजिक शिक्षा-प्रसार, भूमि का अधिकाधिक उपयोग, औद्योगिक विकास, खाद्य-सामग्री का आयात तथा मानव प्रवास आदि विधियों द्वारा समाधान कर सकते हैं। इन उपायों का गहनतम प्रयोग भारत, चीन, जापान आदि में किया जा रहा है। जापान में भूमि का अधिकाधिक उपयोग करने के दृष्टिकोण से गहरी खेती की जा रही है। भारत में शिक्षा-प्रसार तथा औद्योगिक विकास किया जा रहा है।

              एशिया की जनसंख्या का विस्तार में अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि  एशिया में बढ़ती हुई जनसंख्या से इस महाद्वीप में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गई है। कुछ समस्याएँ तो इतनी गम्भीर रूप धारण कर गई है कि इनका प्रभाव देश के राजनीतिक और सामाजिक जीवन पर पड़ता है। जनसंख्या की अत्यधिक वृद्धि ने अनेक बुराइयाँ उत्पन्न कर दी है, अतः हमें इन बुराइयों को दूर करने के लिए जनसंख्या की तीव्र वृद्धि को रोकना पड़ेगा। जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय प्रयोग में लाए जा सकते हैं-

1. सन्तान उत्पत्ति पर प्रतिबन्ध, 

(2) विवाह की आयु में वृद्धि, 

(3) सन्तति सुधार एवं स्वास्थ्य सेवाएँ 

(4) सामाजिक शिक्षा प्रसार, 

(5) भूमि का सर्वाधिक उपयोग, 

(6) औद्योगिक विकास 

(7) खाद्य सामग्री का आयात 

(8) मानव प्रवास। 

            एशिया महाद्वीप के कुछ देशों में उपर्युक्त उपायों में से कुछ उपायों को अमल में लाया जा रहा है। जनसंख्या की अधिक वृद्धि वाले देशी-भारत, चीन तथा जापान में सन्तान उत्पत्ति पर प्रतिबन्ध लगाया जा रहा है। जापान में भूमि का अधिक से अधिक उपयोग करने दृष्टिकोण से गहरी खेती की जा रही है। भात में शिक्षा का प्रसार तथा औद्योगिक विकास किया जा रहा है।

9. एशिया का लौह के उत्पादन एवं वितरण / Distribution and Production of Iron-Ore of Asia

9. एशिया का लौह के उत्पादन एवं वितरण 

(Distribution and Production of Iron-Ore of Asia)


एशिया का लौह के उत्पादन एवं वितरण

एशिया का लौह

              लौह विश्व की एक महत्वपूर्ण खनिज धातु है। यह पृथ्वी के अन्दर चट्टानों में कच्ची धातु के रूप में पाया जाता है जिसे अग्नि भट्टियों में डालकर उपयोगी बनाया जाता है। दैनिक प्रयोग में आने वाली अनेक मशीने, यातायात के साधन-रेल, मोटर, साइकिल, हवाई जहाज, जलयान, हथियार आदि वस्तुओं को तैयार करने के लिये लौह की ही आवश्यकता पड़ती है। लौह अयस्क निम्नलिखित प्रकार का होता है –

(i) हेमेटाइट: इसमें लौह का अंश 75 प्रतिशत तक होता है। यह आसानी से गल जाता है। यह कठोर तथा कम वजन का होता है। 

(ii) मैगनेटाइट: यह हरे भूरे काले रंग का लौह खनिज है। इसमें लोहे का अंश 72 प्रतिशत तक होता है। यह चुम्बक द्वारा सरलता से आकर्षित हो जाता है।

(iii) लिमोनाइट: इसमें लौह अयस्क अंश 60 प्रतिशत तक रहता है। इसकी खुदाई सरलता से हो जाती है। यह पीले व भूरे रंग में मिलता है। 

(iv) साइडेराइट: इसमें लौह अंश 20-30 प्रतिशत तक होता है। यह अशुद्ध मिश्रित लौह धातु है। यह भी भूरे रंग का होता है।

उत्पादन : 

          एशिया में विश्व का लगभग 14 प्रतिशत लौह उत्पन्न होता है। एशिया के प्रमुख लौह उत्पादक देश चीन, सोवियत एशिया, भारत, उत्तरी कोरिया, फिलीपाइन तथा मलेशिया है। जापान, बर्मा, थाइलैंड, टर्की, पाकिस्तान तथा दक्षिण कोरिया भी कुछ लौह का उत्पादन करते हैं।

चीन: चीन में लौह अयस्क के भण्डारों का अनुमान 46 बिलियन टन का है। अधिकांश लोहा उत्तर के कोयला क्षेत्रों के साथ ही निकाला जाता है। विश्व में लौह-अयस्क के उत्पादन में चीन का प्रथम स्थान है। यहाँ विश्व में लोह अयस्क के कुल उत्पादन का 28% होता है। चीन विश्व का अग्रणी लौह-अयस्क उत्पादक देश है। चीन में लौह अयस्क के भण्डार शन्सी कोयला क्षेत्र के पास हेबेई और शान्डोंग में पाया जाता है। हुपेड़ तथा चिनलिंग की खानों से भी लोहा निकाला जाता है। अन्य लोहे की खाने भीतरी मंगोलिया, आन्हेई, लिआओनिंग, चिघाई, आदि राज्यों में मिलती है।

एशिया में लौह उत्पादन

देश     उत्पादन (मिलियन टन)

चीन    – 610.0

भारत  -140.0

कजाखस्तान  -19.20

ईरान   -18.20

मलेशिया  -6.6

भारत: भारत एशिया का प्रमुख लोहा उत्पादक देश है। भारत का लगभग 50% लोहा झारखण्ड की सिंहभूम तथा ओडिशा की मयूरभंज एवं क्योंझर की खानों से प्राप्त होता है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र की खानों से भी लोहा निकाला जाता है। भारत लोहे का निर्यात करता है। यहाँ से निर्यात जापान, चैक, स्लोवाक, जर्मनी, रोमानिया, इटली, पोलैण्ड, बेल्जियम, हंगरी आदि देशों को होता है। 

कजाखस्तान: मध्य एशियाई देशों में कजाखस्तान लौह अयस्क का उल्लेखनीय उत्पादक देश है। यहाँ लौह अयस्क का खनन कारगाण्डा तथा कोस्तानाय क्षेत्रों में होता है। 

ईरान: यहाँ लौह अयस्क का खान रश्त् (गिलान) क्षेत्र में होता है।

जापान: जापान के मुरोरां जिला तथा कैमेशी क्षेत्र की खानों से भी उत्तम प्रकार की लौह धातु प्राप्त की जाती है। कैमेशी में मिलने वाली लौह धातु मैगनेटाइट श्रेणी की है। अन्य खानों में मोथाइशी तथा ओमोरी हैं। 

मलेशिया: मलेशिया संघ के मलाया प्रायद्वीप की जोहोर तथा ट्रैगानू राज्यों की लौह खानों से लोहा निकाला जाता है। ट्रैगानू राज्य की डुंगन तथा बुकिनवेसी लौह खाने प्रसिद्ध हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार  

          आज के इस्पात युग में लोहे का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मलाया प्रायद्वीप, उत्तरी कोरिया, भात तथा चीन देश लोहे का निर्यात करते हैं। जापान तथा फिलीपाइन प्रमुख आयात करने वाले देश है।

प्रश्न प्रारूप

1. एशिया में लौह अयस्क के उत्पादन और प्रमुख उत्पादक देशों प संक्षेप में प्रकाश डालें।

8. एशिया का पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरण / Distribution and Production of Petroleum of Asia

8. एशिया का पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरण 

(Distribution and Production of Petroleum of Asia)


एशिया का पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरणएशिया का पेट्रोलियम

        शक्ति के साधनों में कोयला के बाद पेट्रोलियम का दूसरा स्थान है। परिवहन सुविधा के कारण इसका खर्चा कम आता है। आधुनिक युग में संसार की बढ़ती हुई यातायात की मांग तथा तेज रफ्तार में चलने वाले यंत्रों की चालक शक्ति के कारण पेट्रोलियम की काफी अधिक मांग है। औद्योगिक युग का विस्तार तथा विकास प्रत्यक्ष रूप से पेट्रोलियम की प्राप्ति पर निर्भर करता है।

उत्पादन: 

          एशिया महाद्वीप विश्व का लगभग 40% खनिज तेल अथवा पेट्रोलियम का उत्पादन करता है। दक्षिणी-पश्चिमी एशिया के तेल उत्पादक देश ईरान, इराक, सऊदी अरब, कुवैत, कतार, बहरीन, टर्की, इजरायल, आदि है। दक्षिणी-पूर्वी एशिया तथा एशियाई रूस में भी तेल का उत्पादन किया जाता है। दक्षिणी-पूर्वी एशिया के पेट्रोलियम उत्पादक देश इण्डोनेशिया, चीन, ब्रूनी, मलेशिया, म्यांमार आदि हैं

पेट्रोलियम का वितरण (Distribution of Petroleum): 

           एशिया में खनिज तेल का वितरण निम्नलिखित है-

1. दक्षिणी-पश्चिमी एशिया (South-West Asia):

               दक्षिण-पश्चिम एशिया आज केवल एशिया का ही नहीं बल्कि विश्व को सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पादक क्षेत्र है। यहाँ पर पेट्रोलियम का काफी विशाल भण्डार है। यहाँ तेल के अनेक कुएँ हैं। इन तेल भण्डारो को पाइप लाइन से आपस में जोड़ दिया गया है। यह तेल पाइप भूमध्य सागर के पूर्वी किनारे के तट तक फैले हुए हैं।

             हैफा और त्रिपोली बन्दरगाह को इस तेल की बहुत मात्रा इन पाइप लाइन से पहुँचा दी जाती है जहाँ से तेल का निर्यात किया जाता है। ईरान का आबादान तेल शोधन करने का विश्व में सबसे बड़ा केन्द्र है। दक्षिण-पश्चिमी एशिया के प्रमुख तेल क्षेत्र निम्नलिखित हैं –

सऊदी अरब: 

       संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सोवियत रूस के बाद सऊदी अरब विश्व का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। यहाँ रासतबूरा पत्तन के समीप दाहरीन क्षेत्र में तेल कूपों का आविष्कार 1936 में हुआ। इसके बाद अबैक्वेक और घावर क्षेत्र की खोज हुई। इस क्षेत्र में पेट्रोलियम उत्पादन फार्म इतनी शीघ्र प्रगति कर गया कि इस देश में पेट्रोलियम उत्पादन मुख्य पेशा बन गया। यहाँ से लेवनान के सिदोन पत्तन तक पाइप लाईन है। यहाँ पेट्रोलियम की सुरक्षित सम्पत्ति अति विशाल है।

         यहाँ के प्रमुख तेल क्षेत्र अल खाबर, अवकेक, हाफर, शेदगम, दम्माम सफानिया, कानिफ खुरेस, आबू अली, आबू, हिरेन, फथीली आदि है। रासतनूरा यहाँ का तेल शोधन केन्द्र है। यहां जल की कमी, तापमान की अधिकता, बालू के स्तूपों की प्रचुरता तथा परिवहन सुविधाओं में कमी पेट्रोल के विकास में प्रधान बाधायें है।

ईरान: 

           सउदी अरब के बाद ईरान एशिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। लेकिन ईराक-ईरान युद्ध के कारण यहाँ खनिज तेल का उत्पादन काफी गिर गया है। यहाँ 1908 में मस्जिदे सुलेमान पेट्रोल क्षेत्रों के अन्तर्गत पेट्रोल उत्पादन कार्य आरम्भ किया। यहाँ का प्रमुख तेल क्षेत्र आगाजरी, मस्जिदे सुलमान, हफ्ते केल, गाकसरन, नपत खानाह, नपतेशाह, नपते सफीद, लाली, गुलखरी, मारून आदि है।

         आबादान और करमन शाह यहाँ के तेल शोधन केन्द्र है। इस देश में पेट्रोल उत्पादन कार्य एंग्लो ईरानी कम्पनी के द्वारा होता था। अंग्रेज और ईरानी सरकार के बीच मतभेद हो जाने पर 1951 में इस कम्पनी का राष्ट्रीयकरण कर लिया जिससे कुछ समय के लिए उत्पादन कार्य ठप्प हो गया। इस कारण 1953 में यहाँ से मात्र 90 लाख वैरल पेट्रोल प्राप्त हुआ। इसके पश्चात् पुन: समझौता हो जाने के बाद पेट्रोल उत्पादन की व्यवस्था पूर्ववत हो गयी।

इराक: 

          पेट्रोल उत्पादन में इसका स्थान छठा है। 1927 में किरकुक पेट्रोल क्षेत्र के अन्तर्गत बाबागुरगुर स्थान पर पेट्रोल का पता लगा और वहाँ तेल कूप बनाये गये। सन् 1934 तक पेट्रोल उत्पादन में विशेष प्रगति नहीं हो पायी। कुछ वर्ष पूर्व किरकुक से त्रिपोली तथा हैफा पत्तनी तक तेल की पाइप लाइन बिछाई गयी। 1952 में यहाँ से सीरिया के बनेस स्थान तक पाइप लाइन ले जाई गयी।

        पेट्रोल उत्पादन के लिए डच, फ्रांसीसी तथा अमेरिकन कम्पनियों को लाइसेंस प्राप्त हुए हैं। प्रतिवर्ष यहाँ लगभग 3.4 करोड़ मीट्रिक टन पेट्रोल उत्पन्न किया जाता है। यहां के प्रमुख तेल क्षेत्र ऐनजलेह, मौसल, केयारा, किरकुक, जाम्बुरी, नहर उमर, जुबैर, रूमैला, बसरा खानविवन आदि है। किरकुक यहाँ का सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है। दौरा तथा करमनशाह में तेलशोधक कारखाने हैं। इसक अपने कुल उत्पादन का 80 प्रतिशत तेल निर्यात कर देता है।

कुवैत: 

       सुरक्षित मात्रा के विचार से इसका संसार में तीसरा स्थान है परन्तु उत्पादन में इसका चौथा स्थान है। यहाँ वर्धन क्षेत्र से पेट्रोल प्राप्त होता है। इस क्षेत्र में पेट्रोल निकालने का लाइसेंस एंग्लो अमेरिकन कम्पनी को प्राप्त हुआ है। यहाँ तेल फारस की खाड़ी के तट के समीप फैला हुआ है। यहाँ के प्रमुख तेल क्षेत्र बरगन, अलजहरा, मगब इत्यादि हैं। बरगन सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है। मीना अल अहमदी तेल शोधन केन्द्र तथा निर्यात करने वाला बन्दरगाह है।

कतार:

       फारस की खाड़ी के पश्चिमी तट पर स्थित कतार दक्षिणी-पश्चिमी एशिया का महत्वपूर्ण तेल उत्पादक देश है। यहाँ तेल के 24 कुएँ हैं। दूखन तेल क्षेत्र यहाँ का सबसे बड़ा तेल उत्पादक क्षेत्र है। दोहा में तेल शोधक कारखाना है। 

बहरीन:

        कुवैत और कतार के मध्य स्थित बहरीन फारस की खाड़ी का एक महत्वपूर्ण द्वीप है। यहाँ तटीय क्षेत्र में तेल के अनेक क्षेत्र फैले हुए हैं। बहेसि यहाँ का सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है। बहरीन में तेल शोधक कारखाना भी है। 

सीरिया: 

        यहाँ तेल उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र बनियास है। यहाँ नये तेल क्षेत्रों का पता लगाने के लिए मनहल कम्पनी काफी प्रयत्न कर रही है। होम्स नगर में तेल शोधन कारखाना है।

टर्की: 

       यहाँ का तेल क्षेत्र 1,21,000 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है। यहाँ तेल उत्पादक दो क्षेत्र है- (i) रमन और (ii) बरजन इस क्षेत्र में तेल प्राप्त करने का कार्य सरकार की टर्किश पेट्रोलियम कम्पनी करती है। वरजन तेल क्षेत्र से सन् 1949 ई. में प्रथम बार तेल प्राप्त किया गया। इस क्षेत्र का सम्भावित तेल भण्डार लगभग 525 लाख बैरल है।

        विभिन्न योजनाओं में ईरान और तुर्की के बीच 985 कि.मी. लम्बी पाइप लाइन का निर्माण किया। यहाँ दो पम्पिंग स्टेशनों की स्थापना की गयी। इनकी क्षमता 9000 से 10,000 अश्व शक्ति है। यहाँ प्रतिवर्ष 3.56 करोड़ टन कच्चा तेल पम्प करने के लिए प्राप्त होता है। 

दक्षिणी-पूर्वी एशिया  के तेल:

           क्षेत्र दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में तेल के उत्पादन की बहुत कमी है। इसका कारण यहाँ के तेल भण्डारों में सुरक्षित तेल की मात्रा कम होना है। दक्षिणी-पूर्वी एशिया में इण्डोनेशिया सबसे अधिक तेल का उत्पादन करता है। इस क्षेत्र के प्रमुख देशों के तेल क्षेत्र निम्न प्रकार है – 

1. इण्डोनेशिया:

         इण्डोनेशिया दक्षिणी पूर्वी एशिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक राष्ट्र है। यहाँ तेल के प्रमुख क्षेत्र सुमात्रा, जावा तथा कालीमण्टन (बोर्नियों) में है। सुमात्रा से पैलेमबाग, मेदन व जाम्बी, कालीमण्टन (बोर्नियों) में बालिक, पापन व तराकन तथा जावा में रेमबाग तथा सुरखाया प्रमुख तेल क्षेत्र हैं। सुमात्रा में मेदन तथा साबाग तेलशोधक केन्द्र है।

2. चीन: 

        चीन के दक्षिणी भाग में अनेक तेल के क्षेत्र पाए जाते हैं, जिनमें से काराभाई, तुन्शाजे, सैदाम बेसिन, आदि प्रमुख है।

3. म्यांमार: 

         म्यांमार के प्रमुख तेल क्षेत्र येनाग, सिगू, डण्डो, यनान्मा आदि है। यंगून (रंगून) तथा बेनांगयांग तेल शोधन केन्द्र है। यहाँ से विश्व का लगभग 1% खनिज तेल प्राप्त किया जाता है। यहाँ इरावदी नदी घाटी में तेल के कुएँ खोदे गए है। 

4. मलेशिया: 

               मलेशिया के प्रमुख तेल क्षेत्र साबाह तथा साराबाक है। लुटांग तेल शोधन केन्द्र है।

5. भारत:

         यहाँ गुजरात तथा असम राज्य प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादक है। मुम्बई के निकट मुम्बई हाई से बड़ी मात्रा में खनिज तेल निकाला जाता है। अभी हाल में गोदावरी डेल्टा में, कावेरी डेल्टा में तथा पश्चिमी राजस्थान में भी खनिज तेल के पर्याप्त भण्डा पाए गये है।

प्रश्न प्रारूप 

1. एशिया में पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितण की विवेचना कीजिए।

(Discuss the production and distribution of petroleum in Asia.) 

7. एशिया का कोयले के उत्पादन एवं वितरण / Distribution and Production of Coal of Asia

7. एशिया का कोयले के उत्पादन एवं वितरण

(Distribution and Production of Coal of Asia)


एशिया का कोयले के उत्पादन एवं वितरण⇒एशिया का कोयले

            शक्ति के साधनों में कोयला संसार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण खनिज पदार्थ है। आज के औद्योगिक युग में कोयले का महत्व और बढ़ गया है क्योंकि अनेक विशाल उद्योग कोयले पर ही निर्भर है। कोयला पृथ्वी के अन्दर चट्टानों के रूप में अनेक पत में पाया जाता है। इसमें प्रमुख रूप से कार्बन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, राख आदि पदार्थ प्राप्त होते है। कार्बन की मात्रानुसार कोयले के निम्नलिखित भेद है-

1. एन्थेसाइट: यह अच्छी किस्म का कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 90% से 959 तक होती है। इसका सामान्य प्रयोग घरेलू ईंधन के रूप में किया जाता है। 

2. विटूमीनस: यह भी अच्छी किस्म का कोयला है। इसमें कार्बनिक मात्रा 75 से 90 प्रतिशत तक होती है। इसका सामान्य प्रयोग उद्योग में शक्ति के रूप में किया जाता है।

3. लिग्नाइट: इसे भूरे कोयले के नाम से जाना जाता है। यह घटिया किस्म का अशुद्ध कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 40 से 60% तक होती है। इसमें मोम व कृत्रिम पेट्रोल बनाया जाता है।

4. पीट: यह कच्चा कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 40 प्रतिशत होती है। यह कोलतार बनाने में प्रयोग किया जाता है। 

उत्पादन (Production)

          एशिया समस्त विश्व के कुल कोयला उत्पादन का लगभग 27% भाग उत्पादन करता है। एशिया के प्रमुख कोयला उत्पादक देश चीन, भारत, जापान, एशियाई रूस, दक्षिणी एवं उत्तरी कोरिया, टर्की, ताईवान आदि है।

भारत: भारत संसार का लगभग 7% तथा एशिया का 14% कोयला उत्पन्न करता है। यहाँ कोयला झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों से निकला जाता है। कुछ मात्रा में कोयला उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, असम, बिहार तथा जम्मू-कश्मीर में भी है। भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण के अनुसार देश में 23.411.4 करोड़ टन कोयला के भण्डार है।

जापान: देश का अधिकांश कोयला उत्तरी क्यूशू द्वीप की चिकूहो, सागा, होकुशू तथा मिको खानी से निकाला जाता है। थोड़ी मात्रा होकैडो द्वीप की इशीकारी व कुशिरों खानों से एवं होन्शू की जीवान एवं उबे खानों से निकाला जाता है। जापान अपनी अधिकांश आवश्यकता का कोयला आयात करता है। 

चीन: एशिया एवं विश्व में कोयला का सर्वाधिक उत्पादन चीन में होता है। यहाँ कोयला का खनन हेदी, हिलोगजिआग, हेनान, लिआओनिंग शानडॉग, शान्सी, सिचुआन, निगजिआ तथा नी मंगोल क्षेत्रों में होता है। यहाँ कोयले का उत्पादन विश्व उत्पादन का 35% है। 

कोरिया: उत्तरी कोरिया की एलांग खाड़ी के तट क्षेत्र तथा दक्षिणी कोरिया दक्षिणी पूर्वी क्षेत्र भी प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र है। उत्तरी कोरिया में दक्षिणी कोरिया की अपेक्षा अधिक कोयला मिलता है।

पाकिस्तान: पाकिस्तान में अच्छे किस्म के कोयले की कमी है परन्तु टर्शियरी किस्म का कोयला यहाँ अधिक पाया जाता है। यहाँ कोयले का उत्पादन 2140 हजार टन है। कोयला यहां रावलपिडी, मजराबल तथा हैदराबाद में पाया जाता है।

म्यांमार: कोयला यहाँ चिन्दविन घाटी तथा शान पठार पर निकाला जाता है। 

थाइलैण्ड: कोयला थाइलैण्ड में दक्षिणी थाइलैण्ड के क्रावी क्षेत्र में मायेमोह की खानों से निकाला जाता है। यह घटिया किस्म का कोयला है। आमफरली में भी लिग्नाइट कोयले के भण्डार मिले हैं। 

मलेशिया: यहाँ घटिया किस्म का कोयला मिलता है जो कुछ गहराई पर निकाला जाता है। इस कारण यह कम निकाला जाता है। मलाया में कोयला सेलांगोर, सारावाक, सिलाप्टेक एवं साबाह में पाया जाता है।

 इण्डोनेशिया: इन्डोनेशिया का सबसे अधिक कोयला सुमात्रा द्वीप में पाया जाता है। कोयले की मुख्य खाने दक्षिण सुमात्रा में बुकिन आसाम तथा मध्य सुमात्रा में ओमविलिन में है। कालीमण्टन की महाकाम क्षेत्र की खानों में भी कोयला का उत्पादन होता है।

ताइवान: कोयला यहाँ का प्रमुख खनिज है। यहाँ के सम्पूर्ण भण्डार का 80 प्रतिशत उत्तरी ताइवान में पाया जाता है। इस कोयले की प्रमुख खाने चिलाओ, नानचुआंग, हिब्रू, कीलंग आदि है। यहाँ का लगभग 75 प्रतिशत कोयला विटमिनस किस्म का है जो धरातल पर कम गहराई में मिलता है।

सोवियत एशिया: कोयला साइबेरिया का मुख्य खनिज है। कोयला के भण्डारों के दृष्टिकोण से यह विश्व का धनी देश है। अन्तर्राष्ट्रीय भू-वैज्ञानिक कांग्रेस के अनुसार साइबेरिया में 1,73,900 करोड़ मीट्रिक टन कोयले का भण्डार है। साइबेरिया में कोयला उत्पादन क्षेत्र हैं- कुण्नेटस्क बेसीन यनीसो, लीना बेसीन चिलियाविस्क, इर्कुटस्क मिनुसिक्स, कारागंडा, आमूर दी की घाटी, ट्रान्स बैकाल ।

बांग्लादेश: खनिज पदार्थ के दृष्टिकोण से यह काफी निर्धन राष्ट्र है। यहाँ घटिया कोयला पाया जाता है। यहाँ के प्रमुख कोयला क्षेत्र रंगपुर, फरीदपुर, खुलना, मैमन सिंह इत्यादि हैं।

अफगानिस्तान: अफगानिस्तान में सबसे अधिक मात्रा में हिन्दुकुश पर्वतीय क्षेत्र में काफी कोयला पाया जाता है। दरे साफ में कोयले का काफी भण्डार है। कोयला को वार्षिक उत्पादन लगभग 150 हजार मीट्रिक टन पाया जाता है। 

       इस प्रकार एशिया समस्त संसार के कुल कोयला उत्पादन का लगभग 27 प्रतिशत भाग उत्पन्न करता है। संचित भण्डार के दृष्टिकोण से चीन का स्थान प्रथम है। परन्तु अच्छी श्रेणी के कोयले के उत्पादन के दृष्टिकोण से भारत का स्थान प्रथम है। 

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार (International Trade):

             कोयला का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापा बहुत महत्वपूर्ण है तथा इसकी माँग भी काफी अधिक है। भारत तथा चीन एशिया के प्रमुख कोयला निर्यात करने वाले देश है। जापान, पाकिस्तान, श्रीलंका तथा बर्मा प्रमुख कोयला आयात करने वाले देश है। कोयले की माँग भी निरन्तर बढ़ ही है। 

प्रश्न प्रारूप

1. एशिया कोयले के उत्पादन एवं वितरण का वर्णन कीजिये। 

6. एशिया के प्राकृतिक वनस्पति / Natural Vegetation of Asiya

6. एशिया के प्राकृतिक वनस्पति

(Natural Vegetation of Asiya)


एशिया के प्राकृतिक वनस्पति⇒

                  प्राकृतिक वनस्पति मूलरूप से जलवायु की दशाओं पर निर्भर होती है। यही कारण है कि एशिया महाद्वीप में मिलने वाली भिन्न-भिन्न प्रकार की जलवायु भिन्न-भिन्न प्रकार की वनस्पति को जन्म देती है। इस विशाल भूखण्ड पर प्राकृतिक वनस्पति का विस्तृत आवरण है। एशिया को 12 वनस्पतिक प्रदेशों में विभक्त किया गया है, जिनका वर्णन इस प्रकार है –

(1) आर्द्र सदाबहार वन- ये वन एशिया महाद्वीप के विषुवत् रेखीय प्रदेशों एवं समीपवर्ती मानसूनी प्रदेशों में विस्तृत है। विषुवत् रेखीय प्रदेशों में जहाँ वर्षपर्यन्त वर्षा व उच्च तापमान रहता है वहीं दक्षिणी-पूर्वी एशिया के मानसूनी जलवायु वाले क्षेत्रों में 125 सेमी. से अधिक वर्षा होती है। विषुवत् रेखीय प्रदेशों में मलाया, फिलीपीन्स व इण्डोनेशिया के भाग सम्मिलित हैं।

         दक्षिणी-पूर्वी एशिया में भारत का पश्चिमी घाट, असम, म्यांमार, बांग्लादेश, थाइलैण्ड के वे भाग जहाँ 125 सेमी. से अधिक वर्षा पायी जाती है। उन भागों में ये वन विस्तृत हैं।

         इन वनों में पाये जाने वाले वृक्षों में महोगनी, गाटापार्चा, बाँस, बेंत, रबड़, सिनकोना आदि प्रमुख हैं। इन वृक्षों की लकड़ी अत्यधिक कठोर होती है। ये वृक्ष अत्यधिक पास-पास सघन रूप में पाये जाते हैं। इस क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के पेड़-पौधे एक साथ पाये जाते हैं। मुख्य वृक्षों के नीचे अन्य छोटे-छोटे पौधे तथा लताएँ पायी जाती हैं। अत्यधिक वर्षा व उच्च तापमान के कारण यहाँ वृक्ष 55 मीटर की ऊँचाई तक पाये जाते हैं।

          ये वृक्ष इतने सघन होते हैं कि सूर्य का प्रकाश तक धरातल पर नहीं पहुँच पाता। इन वनों में पाये जाने वाले कठोर लकड़ी के वृक्ष विविध कार्यों में प्रयोग किये जाते हैं। अत्यधिक मिश्रित होने तथा परिवहन की सुविधा नहीं होने के कारण इन वनों की आर्थिक उपयोगिता बहुत कम है।

एशिया के प्राकृतिक

एशिया के प्राकृतिक वनस्पति

(2) मानसूनी पतझड़ वन- मानसूनी वन क्षेत्र का विस्तार भारत के अनेक भागों तथा म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, कम्बोडिया, लाओस, वियतनाम, दक्षिणी चीन तथा जावा-सुमात्रा द्वीपों के कुछ भागों तक है।

        जहाँ वर्षा की मात्रा 200 सेमी. के लगभग होती है वहाँ सदाबहार वन पाये जाते हैं एवं 100 से 200 सेमी. के मध्य वर्षा वाले भागों में पतझड़ वन पाये जाते हैं। अधिक वर्षा वाले भागों में सागवान, सिनकोना, महोगनी एवं नारियल वृक्ष होते हैं एवं जहाँ वर्षा 100 सेमी. के लगभग होती है वहाँ शीशम, साल, आम, नीम, जामुन आदि वृक्षों की बहुतायत होती है।

          इन वनों में अधिकांश वृक्ष ग्रीष्मकाल में पत्तियाँ गिरा देते हैं। मानसूनी वनों से प्राप्त होने वाली लकड़ी बहुमूल्य होती है। यह लकड़ी इमारती सामान तथा फर्नीचर बनाने के काम आती है। ये वन सघन तथा लम्बे नहीं पाये जाते हैं। इन वनों की ऊँचाई लगभग 30 मीट तक पायी जाती है।

(3) शीतोष्ण मानसूनी वन प्रदेश- इन वनों का विस्तार जापान के दक्षिणी भाग, चीन के मध्यवर्ती भाग, मंचूरिया तथा ताइवान तक फैला हुआ है। इन वनों में पाये जाने वाले वृक्षों में ओक, मेपल, लारेल, वालनट, शहतूत आदि प्रमुख हैं। ये वृक्ष ग्रीष्म पत्तियाँ गिरा देते हैं। ये वन अधिक सघन नहीं होते हैं। इन वनों की लकड़ी बहुमूल्य होती ऋतु में अपनी है। जापान के पर्वतीय भागों में इन वनों को काटकर चाय के बागानों में परिवर्तित कर दिया है तथा चीन में इन वनों को काटकर कृषि भूमि बना ली गई है। इस प्रकार इन वनों का विस्तार कम होता जा रहा है।

(4) पर्वतीय वनस्पति- यह वनस्पति हिमालय से लेकर उत्तरी-पूर्वी साइबेरिया के पर्वतीय ढालों पर पायी जाती है जिसे अल्पाइन के नाम से भी जाना जाता है। ऊँचाई के साथ जैसे-जैसे जलवायु में परिवर्तन होता है वैसे ही प्राकृतिक वनस्पति का स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है। ऊँचाई के साथ वृक्षों को आकृति छोटी होती जाती है।

          इन वनों में चीड़-देवदार जैसे नरम वृक्ष पाये जाते हैं 1000 मीटर की ऊँचाई तक तो सघन वनस्पति पायी जाती है इसके पश्चात् 3000 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले भागों पर तो बहुत कम वनस्पति होती है। 4000 मीटर की ऊँचाई के बाद मात्र घास पायी जाती है।

(5) समशीतोष्ण घास के मैदान- समशीतोष्ण घास के मैदान मध्य एशिया में स्थित है। ये मंगोलिया, मध्य मंचूरिया तथा साइबेरिया के दक्षिणी भाग में फैले हुए हैं। मध्य शिया में स्थित इस वृक्षविहीन घास की पेटी को स्टेपी के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र में वर्षा बहुत कम होती है। इस कारण वृक्ष बहुत कम उगते हैं एवं घास बहुतायत में उगती है। ग्रीष्म ऋतु में यह स्टेपी घास झुलस जाती है। ग्रीष्म काल में उच्च ताप, न्यून वर्षा एवं शीत काल में न्यून तापमान व शुष्कता के कारण इस क्षेत्र में स्टेपी घास के अलावा अन्य वनस्पति उगने की सम्भावना नहीं है। इस क्षेत्र की घास गुच्छेदार होती है। जो पशुचारण के लिए उपयोगी होती है। इस क्षेत्र में पशुचारण का अधिक प्रचार है। 

(6) कोणधारी पतझड़ मिश्रित वन- इस प्रकार की वनस्पति मुख्यतः जापान, उत्तरी चीन, कोरिया, दक्षिणी-पूर्वी साइबेरिया तथा तुर्की के पठारी भागों एवं पर्वतीय दालो पर पायी जाती है। यहाँ पतझड़ तथा सदाबहार दोनों प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं। इन वृक्षों में नरम लकड़ी तथा कठोर लकड़ी दोनों प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं।

         नरम लकड़ी वाले वृक्षों में मेपल, बैतूल, चौड़ तथा हेमलाक प्रमुख है। जहाँ पर्याप्त वर्षा होती है वहाँ चौड़ी पत्ती वाले सदावहार वृक्ष पाये जाते हैं। चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वृक्षों में शहतूत, तुंग तथा कपूर आदि वृक्ष प्रमुख हैं।

(7) मिश्रित सदाबहार एवं पतझड़ वन- पूर्वी एशिया के सामान्य तापमान तथा पर्याप्त मानसूनी वर्षा वाले भागों में चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वन पाये जाते हैं। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पतझड़ वन के रूप में मिश्रित वन पाये जाते हैं।

        चीन तथा हिन्दचीन में इस प्रकार की वनस्पति पायी जाती है लेकिन जनाधिक्य के कारण इन देशों में अधिकांश वनस्पति का विनाश हो गया है। अब केवल उच्च भागों में इनके अवशेष हैं। चीन में ऐसे उच्च क्षेत्र नानशान तथा टिसिनलिंग है। यहाँ अनेक प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं। इनके मध्य में घास, बाँस आदि के भी विस्तार हैं।

(8) भूमध्यसागरीय वन प्रदेश- भूमध्यसागर के तटवर्ती देश इजरायल, लेबनान, सीरिया, टर्की के तटवर्ती भाग तथा उत्तरी ईराक, इरान आदि में इस वनस्पति का विस्तार पाया जाता है। वर्षा शीत ऋतु में होती है, ग्रीष्म ऋतु शुष्क होती है लेकिन इस वनस्पति क्षेत्र के वृक्षों को जड़ें लम्बी तथा पत्तियाँ मोटी व चिकनी होने के कारण ग्रीष्मकाल के तीव्र वाष्पीकरण को झेल लेती है। इस कारण वाष्पीकरण कम होता है तथा ये वृक्ष सदैव हरे-भरे रहते हैं।

           जैतून, ओक, अंगूर, अंजीर, नौबू, नारंगी, पाइन व फर इन वनों के मुख्य वृक्ष हैं। इन वनों में रसदार फल बहुतायत में उगते हैं। जैतून, अंगूर, नींबू आदि रसदार फल बहुतायत में पाये जाते हैं।

(9) शुष्क घास के मैदान- इस वनस्पति क्षेत्र का विस्तार ब्लूचिस्तान से लालसागर तक और साइबेरिया के कुछ भागों में फैला हुआ है। इस क्षेत्र में तीव्र गर्मी व वर्षा की मात्रा अति न्यून होती है जिसके कारण ग्रीष्मकाल में घासें सूख जाती हैं व धरातल वनस्पति विहीन हो जाता है। इस क्षेत्र में केवल वही वनस्पति जीवित रह सकती हैं जो गर्मी व वाष्पीकरण को सहन कर सके। खजूर, बबूल, झाड़ियाँ और ताड़ के वृक्ष यहाँ विकसित हो सकते हैं, क्योंकि इनमें शुष्कता सहन करने की क्षमता होती है।

(10) उष्ण मरुस्थलीय वनस्पति प्रदेश- एशिया महाद्वीप में उष्ण मरुस्थलीय वनस्पति का विस्तार भारत के थार के मरुस्थल, अरब, ईराक, इरान आदि के क्षेत्रों में है। इन क्षेत्रों में अल्प वर्षा व उच्च तापमान के कारण इस प्रकार की उष्ण मरुस्थलीय वनस्पति पायी जाती है। रेगिस्तानी भागों में उच्च तापमान व निम्न वर्षा के कारण काँटेदार वृक्ष तथा झाड़ियाँ पायी जाती हैं।

         कंटीली झाड़ियाँ, नागफनी, बबूल, खजूर आदि इस क्षेत्र में पाये जाने वाले प्रमुख वृक्ष हैं। रेगिस्तानी क्षेत्र में पौधों की जड़ें लम्बी, छाल मोटी तथा पत्तियाँ कम एवं काँटे अधिक पाये जाते हैं। यह वनस्पति ईंधन के अलावा और किसी उपयोग की नहीं होती हैं। 

(11) कोणधारी वन प्रदेश (टैगा)- सम्पूर्ण साइबेरिया के उत्तरी भाग में एक लम्बी-चौड़ी पेटी के रूप में पाये जाने वाले कोणधारी वन को टैगा वन कहा जाता है। टैगा वनों को बोरियल वन भी कहा जाता है। इन वनों में स्प्रूस, चीड़, लार्च, हेमलाक, फर, सीडार आदि वृक्ष प्रमुखता से मिलते हैं। टैगा वन प्रदेश में पाये जाने वाले वृक्षों की पत्तियाँ नुकीले आकार की होती हैं, जिनकी नोंक सुई की तरह होती है। अतः इसी कारण इन्हें कोणधारी वन कहते हैं।

          टैगा वन क्षेत्र में ग्रीष्मकाल में तापमान 6° सेल्सियस तक पाया जाता है एवं शीतकाल में तापमान हिमांक से नीचे चला जाता है। ग्रीष्मकालीन 3-4 महीनों में वर्षा होती है। अत: यहाँ ऐसी वनस्पति पायी जाती है जो लघु समय में विकसित हो सके।

(12) शीत टुण्ड्रा वनस्पति प्रदेश- यह वनस्पति प्रदेश एशिया महाद्वीप के उत्तरी भाग में उत्तरी ध्रुव महासागर के तट पर फैला हुआ है। यहाँ दस महीने तक कठोर सर्दी पड़ती है जिससे भूमि बर्फ से ढकी रहती है। वर्ष भर न्यूनतम तापमान रहता है। इसलिए यहाँ लम्बी शीत ऋतु के कारण मॉस, लाइकेन, काई आदि किस्म की छोटी घास पायी जाती हैं।

प्रश्न प्रारूप 

 Q.8. एशिया महाद्वीप को वनस्पतिक प्रदेशों में विभक्त कते हुये प्रत्येक की प्रमुख विशेषतायें बताइये।

(Divide Asia into the region of vegetation and explain the characteristics of each region.)

Or, एशिया के प्राकृतिक वनस्पति प्रदेशों के नाम बताइये तथा उनमें से किन्हीं दो की विवेचना कीजिए। 

(Name the natural vegetation region of Asia and discuss any two of them.)

Or, “वनस्पति जलवायु का सच्चा सूचक है।” एशिया के सन्दर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए।

(Natural vegetation is the true index of climate. Explain this statement in relation to Asia.) 

5. एशिया का कृषिगत जलवायु प्रदेश / Aagro-Climatic Region of Asia

5. एशिया का कृषिगत जलवायु प्रदेश

(Aagro-Climatic Region of Asia)


एशिया का कृषिगत जलवायु प्रदेश⇒

प्रश्न प्रारूप

1. एशिया को कृषि प्रदेशों में विभक्त कीजिए और उनकी विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन करें।

अथवा

एशिया को प्रमुख कृषिगत जलवायु का वर्णन करें। 

उत्तर-  किसी भी प्रदेश के जलवायु नियंत्रक तत्वों की भिन्नता के कारण वहाँ के धरातल की बनावट, प्राकृतिक वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मानव जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। विभिन्न जलवायुगत विशेषताओं से युक्त प्रदेश एक अलग इकाई का निर्माण करते हैं। एशिया को निम्नलिखित कृषिगत जलवायु प्रदेशों में बांटा जा सकता है-

1. भूमध्यवर्ती प्रदेश- इस प्रदेश में इण्डोनेशिया, मलेशिया तथा श्रीलंका शामिल किये जाते है। इसका विस्तार 10° उत्तर से 10° दक्षिण अक्षांश तक पाया जाता है। इस प्रदेश में वर्षभर सूर्य की किरणें लम्बवत पड़ती है, अत: सालभर अत्यधिक गर्मी पड़ती है। यहाँ वर्षा का औसत तापमान 26°C रहता है तथा यहाँ का ताप परिसर 1° रहता है। दैनिक ताप परिसर 9° तक रहता है। अत्यधिक गर्मी के कारण यहाँ पर अल्पवायु दाब अधिक विकसित होते हैं तथा संवहनीय वर्षा अधिक होती है। यहाँ वायु की आर्द्रता तथा बादल की मात्रा वर्षभर अधिक होती है।

           इस प्रदेश की असमान जलवायुगत विशेषतायें मानव विकास में बड़ी बाधक है। इसका आर्थिक विकास नहीं हो पाया है। कई भागों में जनसंख्या अधिक है। इस प्रदेश के भिन्न-भिन्न भागों के मानव-जीवन में बड़ा अन्तर है। जहाँ घने वन है वहाँ के निवासी असभ्य है और इनका मुख्य उद्यम जानवरों का शिकार, मछली पकड़ना तथा जंगलों से हाथी दाँत, फल तथा रबड़ आदि वस्तुओं को एकत्र करना है। परन्तु जिन भागों में जंगलों को काट दिया गया है वहाँ आधुनिक प्रकार की कृषि विकसित की गयी है।

2. मानसूनी प्रदेश- यह प्रदेश 7° उत्तर से 30° उत्तरी अक्षांश तक एशिया के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित है। इसके अन्तर्गत भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, वर्मा, थाईलैण्ड, कम्बोडिया, लाओस, वियतनाम, फिलिपाइन तथा चीन शामिल है। इस प्रदेश में ग्रीष्म ऋतु शुष्क और शीत ऋतु साधारण गर्म होती है। ग्रीष्म काल के आरम्भ में 37°C से भी अधिक तापमान होता है। किन्तु सभी स्थानों पर औसत तापमान 26°C रहता है। शीतऋतु का तापमान 18°C से 24°C रहता है। समुद्र से दूर के स्थानों पर तापमान काफी गिर जाता है।

      ग्रीष्मऋतु में यहाँ विशाल अल्पदाव क्षेत्र बन जाता है और समुद्र की ओर से वाप्पकृत हवायें चलने लगती है। यहाँ वर्षा मूसलाधार होती है। समय और स्थान के अनुसार वर्षा अनियमित तथा अनिश्चित होती है। प्रायः पर्वतीय तथा चक्रवातीय वर्षा होती है। भारत में दक्षिण-पश्चिमी मानसून से तथा फिलिपाइन और वियतनाम में दक्षिण-पूर्वी मानसून से वर्षा होती है। व्यापक वर्षा का औसत 100-200 से.मी. होता है। ग्रीष्मकाल में चलने वाले चक्रवातों को चीन में टाइफल, फिलिपाईन में बेग्यूस तथा भारत में लू कहते हैं।

             मानसूनी जलवायु के देश प्राचीन काल से कृषि के लिए प्रसिद्ध है। इस प्रदेश में धान, जूट, चाय, गन्ना, गेहूं, तम्बाकू, मक्का, ज्वार,बाजरा, तिलहन और कपास की खेती होती है। धान इस प्रदेश की मुख्य उपज है जो अधिक वर्षा वाले भागों में उपजायी जाती है। संसार का 90 प्रतिशत चावल एशियाई मानसूनी देशों में पैदा होता है, इसका सबसे प्रमुख उत्पादक चीन और भारत है। चाय इस प्रदेश की दूसरी मुख्य उपज है जो पहाड़ी ढालों पर पैदा की जाती है। संसार की 96 प्रतिशत उपज इसी प्रदेश में होती है।

       संसार के उत्पादकों में भारत प्रथम, श्रीलंक द्वितीय और चीन तृतीय स्थान पर है। संसार का सबसे अधिक जूट इस प्रदेश में नदी डेल्टाओं में पैदा होता है। संसार के सबसे बड़े जूट उत्पादक बांग्लादेश और भारत है। गन्ना के उत्पादन में भारत सबसे प्रथम है। इस प्रदेश में कृषि के प्रायः पुराने ढंग के औजार प्रायेग में आते हैं किन्तु भारत, पाकिस्तान तथा दक्षिणी चीन में नवीनतम ढंग के औजारों का तीव्रता से विकास हो रहा है। इस प्रदेश में आबादी काफी सघन है। उत्तम जलवायु तथा अन्य सुविधाओं के कारण यह प्रदेश उन्नति का प्रदेश कहा जाता है। इस प्रदेश में लोग आर्थिक तथा शैक्षणिक दृष्टिकोण से काफी उन्नत है।

एशिया का कृषिगत जलवायु

3. उष्ण मरुस्थलीय प्रदेश- यह प्रदेश 20° उत्तर अक्षाश से लेकर 30° उत्तर अक्षांश तक फैला हुआ है। इसके अन्तर्गत भारत में चार मरूस्थल, पाकिस्तान में सिन्धु नदी के निचले बेसीन का पूर्वी भाग और पश्चिम एशिया में अरब और सीरिया के मरुस्थल आते है। इस प्रदेश की जलवायु शुष्क एवं विषम है। ग्रीष्म ऋतु में काफी अधिक गर्मी पड़ती है। तापमान 32°C रहता है। परन्तु रात में तापमान में अन्तर पाया जाता है।

       दिन-रात का ताप परिसर 21°C तक पहुंच जाता है। शीतऋतु में कठोर सर्दी पड़ती है। इस प्रदेश में 25 से.मी. से अधिक वर्षा नहीं होती है। यह प्रदेश सन्मार्गी हवाओं की पेटी में स्थित है। इस प्रदेश में ग्रीष्मऋतु में धूलभरी आंधियाँ चलती है। शीतऋतु की वायु तीव्र होती है। इस प्रदेश में वर्षा अनिश्चित होती है।

        इस प्रदेश में कृषि का विकास नहीं हुआ है। केवल मरुधानों में खजूर, ज्वार, बाजरा तथा तम्बाकू की खेती होती है। जहाँ सिंचाई की सुविधा है, वहाँ खेती होती है। इराक तथा सिन्धु नदी की निचली घाटी में सिचाई की सहायता से खेती की जाती है। सिंचित क्षेत्रों में धान, कपास, गेहूं तथा फल की खेती होती है।

        इस प्रदेश की जनसंख्या कम है। केवल मरुधानों के समीप तथा खनिज उत्पादक स्थानों पर ही मानव बस्तियाँ पायी जाती है। यहाँ के निवासी लम्बे तथा गठीले शरीर वाले पाये जाते हैं। ये कृषक तथा पशुपालक होते हैं तथा ऊंट और भेड़-बकरी पालते हैं। अन्य मरुस्थलों के निवासी भ्रमणशील होते है। अरब के बहु इसी प्रकार के हैं। इनका भोजन ऊँट का दूध, खजूर, भेड़-बकरी का मांस इत्यादि है। इनका भोजन ऊंट का दूध, खजूर, भेड़-बकरी का मांस इत्यादि है।

4. भूमध्य सागरीय प्रदेश- पश्चिमी एशिया के 30° उत्तर से 42° उत्तरी अक्षाश के मध्य भूमध्य सागरीय तट पर स्थित तुर्की का पश्चिमी एवं दक्षिण-पश्चिम भाग, लेवनान तथा इजरायल देश इसमें शामिल किये जाते है। इस प्रदेश में ग्रीष्म ऋतु में साधारण गर्मी तथा शीतऋतु में हल्की ठण्ड पड़ती है। ग्रीष्म ऋतु का औसत तापमान 21°C तथा शीतऋतु का तापमान 10°C रहता है। वार्षिक ताप परिसर 17°C तक रहता है तथा दैनिक ताप परिसर 4°C रहता है। इस प्रदेश में शीतऋतु में वर्षा होती है। ग्रीष्मऋतु शुष्क होती है।

        ग्रीष्मकाल में यह प्रदेश सन्मार्गी हवाओं की पेटी में पड़ता है, अतः वर्षा नहीं होती है। शीतऋतु में यह प्रदेश पछुआ हवाओं की पेटी में रहता है। इस क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 50-100 से भी होती है। इस प्रदेश के निवासियों का मुख्य उद्यम फल उत्पादन करना तथा कृषि है। यहाँ की शुष्क ग्रीष्मऋतु तथा धूपदार मौसम फलों को पकाने तथा स्वादिष्ट बनाने में सहायक होती है। यहाँ के प्रमुख फल नारंगी, नीबू, अंजीर, सेव, अनार और बादाम है। कृषि क्षेत्र में गेहूँ, कपास तथा तम्बाकू पैदा होती है। यहाँ के निवासियों का मुख्य उद्यम कृषि और पशुपालन है। ये उन्नतिशील तथा सम्पन्न है।

5. शुष्क पठारी प्रदेश-  इस प्रदेश का विस्तार तुर्की, ईरान तथा अफगानिस्तान में है। अनातोलिया का पठार तथा ईरा-सीस्तान का पठार इस भाग में शामिल है। यह प्रदेश 26° उत्तरी अक्षांश से 45° उत्तरी अक्षांश तक विस्तृत है। इस प्रदेश की जलवायु काफी विषम है। ग्रीष्मऋतु का औसत तापमान 24°C हो जाता है। शीतऋतु का तापमान शून्य तक पहुँच जाता है। इस भाग में शीतऋतु मे वर्षा होती है। वर्षा का वार्षिक औसत 25 से.मी. तक होता है।

            यह प्रदेश अभी अविकसित है। मरुस्थलीय पठार तथा विषम जलवायु आर्थिक विकास के प्रतिकूल है। यहाँ के निवासियों का मुख्य उद्यम पशुपालन है। ये अधिकतर ऊंटो, घोड़ों तथा भेड़-बकरियों को लेकर इधर-उधर चराया करते हैं। वहाँ का प्रसिद्ध कृषि धान है। नदियों के सिचाई क्षेत्र में गेहूँ, कपास, तम्बाकू तथा फल पैदा होता है। इस प्रदेश में जनसंख्या बहुत कम है।

       पशुपालन यहाँ के लोगों का मुख्य उद्यम है। पशुपालक भ्रमणशील होते हैं। इनके भोजन में दूध और मांस प्रमुख हैं। जहाँ पानी तथा सिंचाई की सुविधा है वहाँ पर कृषि-कार्य होता है। यहाँ के लोगों का मुख्य उद्यम कम्बल और कालीन बुनना, फल सुखाना, शराब बनाना इत्यादि है। यहाँ के लोग काफिला जीवन व्यतीत करते हैं। अत्यधिक पूंजी और श्रम के उपयोग से इस प्रदेश का विस्तार हो रहा है। यद्यपि ईरान तथा अफगानिस्तान में शिक्षा का प्रचार काफी कम हुआ है।

6. तुरान प्रदेश- यह कैस्पियन सागर, अरब सागर तथा साइबेरिया के दक्षिण-पश्चिम की ओर विस्तृत एक प्रदेश है। इसका विस्तार 30° उत्तरी अक्षांश से 42° उत्तरी अक्षांश तक है। इस प्रदेश की जलवायु शुष्क, विषम तथा कठोर है। ग्रीष्मकाल का तापमान 27° से अधिक हो जाता है और जनवरी का तापमान हिमांक से भी नीचे गिरता है। यहाँ की नदियाँ तथा झीलें जम जाती है। उत्तर की सर्द हवा से जाड़े के दिनों हिमपात होता है। यहाँ का वार्षिक ताप परिसर अधिक रहता है।

        उत्तरी-पूर्वी तथा उत्तरी-पश्चिम वायु से वर्षा होती है। मैदानी भाग में 16 से.मी. से 40 से मी. तक वर्षा होती है। यह प्रदेश समुद्री प्रभाव से बाहर रहता है। इस प्रदेश का अधिकांश भाग मरुस्थल है। यहाँ वर्षा की कमी तथा सिंचाई का अभाव है। यहाँ के निवासियों का मुख्य उद्यम पशुपालन है। नदी की घाटियो, मरुधानों तथा नदियों की बेसिनों में सिचाई की व्यवस्था की सहायता से यहाँ गेहूँ, कपास, जौ, चुकन्दर तथा फल की खेती होती है। यहाँ मंगोल जाति के लोग रहते हैं।

         यहां की जनसंख्या काफी कम है। यहाँ का बहुत-सा क्षेत्र मानवहीन है। केवल कृषि क्षेत्र में ही स्थायी आबादी है। पशुपालक लोग स्थायी बस गये है। ये अधिकतर चारागाह तथा पानी की तलाश में घूमते है। गर्मियों में ये पहाड़ पर चले जाते हैं और शीतऋतु में मैदानों में उतर आते हैं।

7. स्टेपी प्रदेश-  एशिया में यह प्रदेश 45° उत्तर अक्षांश से 60° उत्तरी अक्षांश के मध्य स्थित है। इसमें साइबेरिया का दक्षिणी-पश्चिमी भाग, उत्तरी मंगोलिया तथा पूर्वोत्तर चीन के घास के मैदान शामिल किये जाते हैं। इस प्रदेश की जलवायु पर महाद्वीपीय प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। यहाँ ग्रीष्मकाल में कड़ी गर्मी तथा शीतकाल में कड़ाके की ठंड पड़ती है। ग्रीष्म काल का तापमान 21°C रहता है और शीतऋतु का तापमान 17°C रहता है। वार्षिक ताप परिसर काफी अधिक रहता है।

      इस प्रदेश में वर्षा कम अनियमित तथा अनिश्चित होती है। ग्रीष्मऋतु मे समुद्र से चलने वाली हवाओं से जलवृष्टि होती है। यहाँ वार्षिक वर्षा का औसत 25 से.मी. है। कभी-कभी दोपहर के समय अत्यधिक वर्षा होती है। साइबेरिया के स्टेप में जाड़े में शीत लहर चलती है जिसे तुरान कहते हैं। यहाँ के निवासियों का मुख्य उद्यम पशुपालन और पशुचारण है। जहाँ पानी एवं सिचाई की सुविधा है वहाँ कृषि द्वारा गेहूँ, जौ, कपास, तम्बाकू तथा तिलहन की कृषि होती है। पूर्वोत्तर चीन में गेहूं, जौ, राई, सोयाबीन और कोओलिआंग की फसलें उपजाई जाती है।

          विषम जलवायु के कारण यहाँ आबादी विरल है और अधिकांश निवासी बनजारे का जीवन व्यतीत करते हैं। ये काल्मुक जाति के होते हैं। एशियाई स्टेप के निवासी करिघिज कहलाते हैं। ये अधिकतर खेमों में निवास करते हैं।

8. चीन प्रदेश- एशिया में चीन प्रदेश 25° उत्तरी अक्षांश से 40° उत्तरी अक्षाश के मध्य विस्तृत है। इसमें मध्यचीन, दक्षिण-पूर्वी चीन, कोरिया तथा दक्षिण जापान को शामिल किया जाता है। इस प्रदेश की जलवायु ठण्डी मानसूनी है। यहाँ शीतऋतु में अधिक सर्दी और ग्रीष्मऋतु में अधिक गर्मी पड़ती है। शीतऋतु में पाला पड़ता है। यहाँ शीतकाल का तापमान 40°C से 13°C रहता है। ग्रीष्म काल का औसत तापमान 24°C-27°C रहता है। कभी-कभी तापमान 32°C तक पहुंच जाता है। यहाँ का वार्षिक ताप-परिसर अधिक होता है। दैनिक ताप-परिसर 11°C तक हो जाता है।

           वर्षा का वितरण वर्षभर रहता है किन्तु ग्रीष्मकाल में वर्षा का औसत अधिक रहता है क्योंकि ग्रीष्मकाल में समुद्र की ओर से दक्षिण-पूर्वी मानसूनी हवायें चलती है। जाड़े में हल्की वर्षा होती है। पतझड़ की ऋतु मे वर्षा कम होती है। कभी-कभी आंधी के साथ मूसलाधार वर्षा होती है। यहां के चक्रवातों को टाइफून कहा जाता है। यहाँ के लोगों का मुख्य उद्यम कृषि है। इसकी मुख्य उपज धान, गेहूँ, तम्बाकू, मक्का, चाय और रेशम है। नदियों के मैदानों में अनी का उत्पादन अधिक होता है। 

          पहाड़ी ढालों पर चाय के बगीचे लगाये जाते है। इस प्रदेश की आबादी काफी घनी है। भिन्न-भिन्न भागों में मानव जीवन में बड़ी विषमता है। यहाँ मंगोल जाति के लोग निवास करते हैं और कृषि कार्य कते हैं।


 

4. एशिया की जलवायु तथा जलवायु क्षेत्र / Climate and Climatic Region of Asia

4. एशिया की जलवायु तथा जलवायु क्षेत्र 

(Climate and Climatic Region of Asia)


एशिया की जलवायु तथा जलवायु क्षेत्र⇒

प्रश्न प्रारूप  

1. एशिया की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना कीजिये।

उत्तर- सभी भौतिक तत्वों में जलवायु सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है क्योंकि इसका प्रत्यक्ष प्रभाव मानव शरीर एवं कार्यों पर पड़ता है। भौतिक एवं सांस्कृतिक भूदृश्यों की विविधता का बहुत कुछ कारण जलवायुविक तत्व ही है। एशिया की संस्कृति एवं आर्थिक विविधता के लिए जलवायु सर्वाधिक उत्तरदायी कारक है।

        एशिया महाद्वीप विश्व का एक ऐसा महाद्वीप है जहाँ विश्व में पाई जाने वाले लगभग सभी प्रकार के मुख्य जलवायु कहीं न कहीं उपस्थित है। साथ ही साथ यहाँ विश्व जलवायु की अतिशय दशाएं जैसे सबसे गर्म स्थान जकोबाबाद, अति शीतल स्थान बर्खोयाँस्क, अतिवृष्टि का स्थान चेरापूंजी एवं अति शुष्क भाग अरब मरुस्थल भी उपस्थित है।

        इस महाद्वीप की जलवायु इस विविधता के लिए इन महाद्वीप की भौगोलिक दशाएं उत्तरदायी है जिनमें महाद्वीप की विशालता, मध्यवर्ती उच्च भूमि की उपस्थिति और अक्षांशीय विस्तार सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक है। 

         एशिया की जलवायु को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक है- 

(i) एशिया की विशालता- इस महाद्वीप की जलवायु को नियंत्रित करने में इसकी विशाल आकृति का प्रभाव सर्वाधिक है। जलवायु की दृष्टि से यूरोप एशिया का महाद्वीप है, अतः दोनों का सामूहिक प्रभाव इसकी जलवायु पर पड़ता है। इन दोनों महाद्वीपों का संयुक्त क्षेत्रफल संपूर्ण स्थलमंडल का लगभग आधा है। इस महाद्वीप की विशालता का प्रमाण इसके भाग से समुद्र तट की दूरी से लगाया जा सकता है। इसका कोई भी तक मध्यवर्ती भाग से 24000 किलोमीटर से अधिक दूर स्थित है। इस तथ्य ने एशिया महाद्वीप के विशाल भूखंड की जलवायु को महाद्वीपीय बना दिया है।

        विशाल स्थलीय प्रभाव के कारण वार्षिक तापांतर में भारी अंतर है (60° से 65° से०) और समुद्र की आर्द्र हवाएं आंतरिक भाग में पहुंचते-पहुंचते शुष्क हो जाती है जिससे न्यूनतम वर्षा होती है। इसके विस्तृत उत्तर भाग पर अति शीत, उष्ण और शुष्क जलवायु की उपस्थिति इसकी विशालता की देन है।

(ii) मध्यवर्ती उच्च भूमि- एशिया महाद्वीप की जलवायु पर, मध्य भाग में फैली हुई उच्च एवं विशाल पर्वत श्रेणियों का प्रभाव पड़ने के कारण महाद्वीप को दो भागों में बांटती है – उत्तरी एशिया एवं दक्षिण एशिया। ये विशाल पर्वत श्रेणियां हिन्द एवं प्रशांत महासागर की ओर से आने वाली जल से भरी हवाओं को उत्तर की ओर जाने से रोक देती है जिनके परिणामस्वरूप एशिया का मध्य एवं उत्तरी भाग वर्षा से वंचित रह जाता है। इसलिए ये भाग अत्यंत शुष्क रह जाते हैं। यही कारण है कि उच्च पर्वत श्रेणियों को विशाल पर्वतीय बाधा के नाम से पुकारा जाता है।

        एशिया की यह मानसूनी हवाएं इन विशाल पर्वतीय श्रेणियों से टकराकर एशिया के दक्षिण एवं दक्षिणी-पूर्वी भागों में वर्षा कर देती है और इस प्रकार एशिया का दक्षिणी तथा दक्षिणी-पूर्वी भाग संसार की सबसे अधिक वर्षा प्राप्त करता है।

                 एशिया महाद्वीप के मध्य भाग में स्थित पर्वत श्रेणीयां वर्षा के साथ-साथ इस क्षेत्र के तापमान के वितरण पर भी मुख्य रूप से प्रभाव डालती है। ये पर्वत श्रेणियां एशिया के उत्तरी तथा उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र से आने वाली बर्फीली हवाओं के लिए बाधक बन जाती है तथा इन हवाओं को दक्षिणी तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया में प्रवेश करने से रोकती है। फलस्वरुप दक्षिणी भागों में तापमान इतना अधिक गिरने नहीं पाता है जितना उत्तरी भाग में गिर जाता है। यही कारण है कि भारत और पाकिस्तान में सर्दियों में कुछ उत्तरी भागों में बर्फ नहीं जम जाती है जबकि एशिया के उत्तरी भागों में बर्फ जम जाती है। इस प्रकार ये पर्वत श्रेणियां दक्षिणी भागों में उच्च तापमान बनाए रखने में विशेष रूप से सहायक है तथा दूसरी ओर ये दक्षिण की से चलने वाली गर्म हवाओं को उत्तर की ओर आने से रोक देती है जिसके फलस्वरूप उत्तरी भाग सर्दियों में अधिक तापमान प्राप्त नहीं कर पाता है और अधिक ठंडा हो जाता है।

         अत्यधिक ठंड के कारण एशिया के उत्तर में स्थित आर्कटिक महासागर जम जाता है जिसके परिणामस्वरूप उत्तरी स्थलखंड  और भी अधिक ठंडे हो जाते हैं। यही कारण है कि उत्तरी एशिया का उत्तरी ध्रुवीय भाग अत्यधिक ठंडा होने के कारण विश्व का ‘शीत ध्रुव’ कहलाता है। स्पष्ट है कि ऊंची पर्वत श्रेणियों के कारण एशिया के जलवायु बहुत अधिक विषम हो गई है। पर्वतों के मध्य स्थित पठार वृष्टिछाया में पड़ने के कारण शीत एवं शुष्क है। तिब्बत का पठार, ईरान का पठार और अनातोलिया का पठार इसके अच्छे उदाहरण है।

(iii) अक्षांशीय विस्तार- एशिया की जलवायु को नियंत्रित करने में इसके अक्षांशीय विस्तार का प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। महाद्वीप का विस्तार 10° दक्षिणी अक्षांश से 80° उत्तरी अक्षांश तक है। इसका अधिकांश भाग उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। महाद्वीप का उष्णकटिबंधीय भाग, जो विषुवत रेखा के पास स्थित है, उच्च तापमान और संवहनीय वर्षा प्राप्त करता है। चूँकि इस सम्भाग में द्वीपों की प्रधानता है। इसीलिए यहाँ की जलवायु विषुवतीय होते हुए भी प्रतिकूल नहीं है।

       एशिया का अधिकांश भाग समशीतोष्ण कटिबंध में स्थित है जिसके फलस्वरूप लगभग तीन-चौथाई भूखंड पर शीतोष्ण जलवायु का विस्तार है। उत्तरी भाग में साईबेरिया के छोर पर शीत कटिबन्धीय जलवायु पाई जाती है। इस प्रकार एशिया में तीनों कटिबन्धों की जलवायु उपस्थित है।

(iv) अन्य प्रभावकारी कारक- एशिया की जलवायु को प्रभावित करने में अन्य कारकों जैसे चक्रवात और समुद्री धाराओं का उल्लेख भी आवश्यक है।पछुआ हवा के साथ चलने वाले समशीतोष्ण चक्रवात यूरोप पार कर दो शाखाओं में बँट जाते हैं, प्रथम शाखा में चक्रवात साइबेरिया में पहुंचकर हिमपात करते हैं और दूसरी शाखा में चक्रवात काला सागर होते हुए तुर्की, ईरान, इराक, अफगानिस्तान में वर्षा करते हुए भारत पहुंच जाता है।

             भारत के उत्तरी में सर्दियों में वर्षा इन्हीं के आने पर होती है। ग्रीष्म काल में हिंद महासागर, प्रशांत महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवात दक्षिणी तथा दक्षिणी-पूर्वी एशिया में वर्षा करते हैं और तूफान से भारी क्षति पहुंचाते हैं। चीन सागर में उठने वाला टाइफून भयंकर चक्रवात का उदाहरण है।

 निष्कर्ष-

         उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि एशिया महाद्वीप जलवायु के दृष्टिकोण से संपूर्ण विश्व का प्रतिनिधित्व करता है।

प्रश्न प्रारूप 

2.  एशिया महाद्वीप की जलवायु की विशेषताओं का वर्ण करें।

अथवा एशिया के शीत एवं ग्रीष्म ऋतु की दशाओं का वर्णन कीजिये।

उत्तर- एशिया महाद्वीप संसार का सबसे विशाल महाद्वीप है। इसमें जलवायु संबंधी अनेक विषमताएँ मिलती है। उदाहरण के लिए संसार का सबसे गर्म भाग जैकोबाबाद तथा संसार का सबसे ठण्डा भाग बर्खोयांस्क इसी महाद्वीप में स्थित है।

        एशिया का दक्षिणी-पश्चिमी एवं मध्य भाग सबसे अधिक तापमान (लगभग 50° सेण्टीग्रेड) प्राप्त करता है जबकि उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्रों में लगभग नौ माह तक कठोर सर्दियाँ पड़ती है और तापमान हिमांक से बहुत नीचे गिर जाता है जो लगभग -50° सेण्टीग्रेड तक पहुँच जाता है। जलवायु की यह विषमता वर्षा के वितरण में भी पाई जाती है।

        संसार की लगभग 50% वर्षा केवल भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैण्ड, लाओस, कम्बोडिया, वियतनाम, इण्डोनेशिया, मलेशिया तथा फिलीपाइन द्वीपसमूह में हो जाती है। इन भागों में वर्षा का सामान्य औसत 250 सेण्टीमीटर से भी अधिक है जबकि एशिया के मध्य एवं दक्षिणी-पश्चिमी भाग वर्षा की कमी के कारण शुष्क एवं मरुस्थलीय हैं। इन भागों में वर्षा का सामान्य औसत 25 सेण्टीमीटर से भी कम है। एशिया महाद्वीप में जलवायु की इस विषमता के मिलने के दो कारण है – 

1. एशिया महाद्वीप की विशालता, 

2. एशिया महाद्वीप के मध्य भाग में उठी हुई पर्वत श्रेणियाँ

               सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन होने के कारण कटिबन्धीय विस्तार में परिवर्तन के साथ वायुदाब, वायु दिशा एवं वर्षा की मात्रा में भी परिवर्तन हो जाता है। सामान्य तौर पर यहाँ दो ऋतुयें पाई जाती है – शीत ऋतु एवं ग्रीष्म ऋतु।

शीत ऋतु जलवायविक दशाएँ

        एशिया की जलवायु में शीत ऋतु की दशाएं अधिक प्रभावकारी हैं। शीत ऋतु में सूर्य की किरणें उत्तरी गोलार्द्ध में तिरछी होती हैं, जिसके परिणामस्वरूप एशिया के विस्तृत भाग में तापमान नीचे चला जाता है। इस अवधि में सम्पूर्ण उत्तरी भाग कम तापमान और ध्रुवीय हवाओं के प्रभाव के कारण शीत कटिबन्धीय हो जाता है।

          विस्तृत भाग का तापमान हिमांक के नीचे चला जाता है और सर्वत्र शुष्क प्रधान ध्रुवीय हवा का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। मध्य एशिया की उच्च भूमि अपनी विशेषता के अनुरूप इसमें सहयोग देती है। परिणामस्वरूप आर्कटिक सागर से लेकर तिब्बत के पठार तथा यूरॉल से लेकर प्रशान्त तट कर का सम्पूर्ण भाग शीतल एवं शुष्क हवा के चपेट में आने के कारण कष्टदाई जलवायु का क्षेत्र बन जाता है।

             ध्रुवीय हवाओं की सघनता एवं शीतलता के कारण वायुमण्डलीय दाब बढ़ जाता है।इसे ठण्डी वायुराशि (Cold Airmass) कहा जाता है। इस ऋतु में अधिकतम वायुदाब का केन्द्र मध्य एशिया में केन्द्रित होता है। ध्रुवीय हवाओं के अतिक्रमण के कारण एशिया महाद्वीप पर अयन रेखीय कम वायुदाब की पेटी विलुप्त हो जाती है। मध्यवर्ती भाग पर अधिक वायुदाब  होने के कारण बहिर्मुखी स्थलीय हवाएं चारों ओर चलने लगती हैं जो शुष्क एवं ठण्डी होती हैं। इनके प्रभाव के कारण सम्पूर्ण उत्तरी भाग में शीत-शुष्क जलवायु का विस्तार हो जाता है।

          दक्षिण में हिमालय के अवरोध के कारण भारत में इनका प्रभाव नहीं हो पाता है, जबकि पूरब में इनका प्रवेश चीन की जलवायु को अत्यधिक प्रभावित करता है। जब ये हवाएं तटीय क्षेत्रों के पास पहुँचती हैं तो वाष्प ग्रहण कर तट की ओर मुड़ जाती है, जिससे दक्षिणी कोरिया, मंचूरिया, जापान, फिलीपीन्स आदि में वर्षा प्राप्त होती है।

       इसी प्रकार की स्थलीय हवा उत्तर भारत के अधिक दबाव क्षेत्र से बंगाल की खाड़ी की ओर चलती और मुड़कर कोरोमण्डल तट एवं श्रीलंका में वर्षा करती है। इसे जाड़े की मानसून के नाम से भी पुकारा जाता है। इनका विस्तार दक्षिण-पूर्व एशिया तक हो जाता है, जहाँ संवाहनिक हवाओं के साथ मिलकर ये भारी वर्षा करती हैं। शीत ऋतु में यूरोप पछुवा हवाओं और संलग्न चक्रवातों के प्रभाव में रहता है।

          जब ये चक्रवात यूरोप को पार कर साइबेरिया में प्रवेश करते हैं तो अत्यधिक वायुदाब की पेटी के अवरोध के कारण दो शाखाओं में विभक्त हो जाते हैं। एक शाखा के चक्रवात साइबेरिया और दूसरी शाखा के चक्रवात एशिया माइनर की ओर मुड़ जाते हैं।

        साइबेरिया की ओर जाने वाले चक्रवातों से हिम वर्षा होती है, जबकि एशिया माइनर की ओर आने वाले चक्रवात भूमध्यसागरीय तट के देशों में शीतकालीन वर्षा करते हुए पश्चिम एशिया के देशों जैसे ईरान, अफगानिस्तान के रास्ते भारत तक पहुँच जाते हैं और जाड़े की ऋतु में वर्षा करते हैं। इनका आगमन भारत में पूर्णतः अनिश्चित रहता है। 

          इस प्रकार कुछ लघु क्षेत्रों को छोड़कर जाड़े की ऋतु में सम्पूर्ण एशिया शुष्क रहता है। जाड़े में एशिया के मात्र कुछ क्षेत्र ही वर्षा प्राप्त कर पाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में निम्नलिखित विशेष उल्लेखनीय हैं।

1. दक्षिणी-पूर्वी एशिया जहाँ संवाहनिक तरंगों के कारण वर्षा की प्राप्ति होती है। कुछ क्षेत्रों में तटवर्ती हवा के मुड़कर चलने के कारण भी वर्षा होती है जैसे – इण्डोचीन एवं मलाया में।

2. पूर्वी एशिया का तटीय भाग दक्षिणी कोरिया, जापान, पूर्वी चीन, फिलीपीन्स आदि जहाँ स्थलीय हवा के मुड़कर चलने के कारण जाड़े में वर्षा होती हैं। 

3. कोरोमण्डल तट एवं श्रीलंका में जाड़े की मानसून से वर्षा होती है। एशिया माइनर, पश्चिमी एशिया, दक्षिणी-पूर्वी एशिया एवं भारत में पश्चिमी चक्रवातों से वर्षा होती है।

ग्रीष्म कालीन दशाएं

       सूर्य के उत्तरायण होते ही ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है। तापमान में उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगती है, जिससे अनेक वायुमण्डलीय स्थितियां परिवर्तित होने लगती है। जाड़े में जो उत्तरी भाग शीत कटिबन्ध बना हुआ था वह गर्म होकर समशीतोष्ण हो जाता है। 100 सेण्टीग्रेड की समताप रेखा टैगा के समानान्तर गुजरती है। तापमान की वृद्धि के फलस्वरूप वायुमण्डली दाब घट जाता है और न्यूनतम वायुदाब का क्षेत्र मध्य एशिया में विकसित हो जाता है। इस समय समुद्रों पर अधिक वायुदाब होता है।

          इसी समय भारतीय उपमहाद्वीप पर एक अन्य कम वायुदाब कि का क्षेत्र विकसित हो जाता है। इससे प्रभावित होकर समुद्री हवाएं आन्तरिक भागों की ओर चलने लगती है, जिनसे वर्षा होती है। इन हवाओं के कारण जहाँ दक्षिणी एवं पूर्वी एशिया में वर्षा होती है, वहीं पश्चिमी एशिया शुष्क रह जाता है। पूरब से चलने वाली लम्बी दूरी तय करने के कारण मध्य एशिया अथवा साइबेरिया में पहुँचते-पहुँचते ये शुष्क हो जाती है, जिससे बहुत कम वर्षा की प्राप्ति हो पाती है।

          भारतीय उपमहाद्वीप की ओर चलने वाली समुद्री हवा मानसून के नाम से जानी जाती है जो एक लघु अवधि में अत्यधिक वर्षा करती है। लेकिन इस प्रकार की मानसूनी हवा से वर्षा की मात्रा और सामयिक वितरण हमेशा अनिश्चित रहता है। इनके साथ जब ऊष्ण चक्रवात मिल जाते हैं तो मूसलाधार वर्षा के कारण बाढ़ और जलप्लावन से अपार धन-जन की हानि होती है। मानसूनी क्षेत्रों में सूखा और बाढ़ सबसे बड़ी आपदा हैं। ऐसे क्षेत्र दक्षिणी, दक्षिणी-पूर्वी और पूर्वी एशिया में स्थित है।

         एशिया में ग्रीष्म कालीन वर्षा शरद कालीन वर्षा से अधिक होती है। यही नहीं औसत वर्षा के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि अधिक वर्षा या सामान्य वर्षा प्राप्त करने वाले भाग कम और कम वर्षा प्राप्त करने वाले क्षेत्र अधिक हैं। वर्षों की कमी के कारण यहाँ की जलवायु में बहुत अन्तर देखा जाता है। वर्षा की विषमता इस स्तर की है कि कहीं बाढ़ से लोग बह रहे होते हैं तो कहीं पानी के लिए तरसते है। 100 सेण्टीमीटर औसत वर्षा प्राप्त करने वाले क्षेत्रों का प्रतिशत सम्पूर्ण एशिया के क्षेत्रफल के संदर्भ में बहुत कम है।

           एशिया की जलवायु को चरितार्थ करने वाली ऋतुओं के विवेचन से स्पष्ट है कि कि दोनों ऋतुओं में अतिशयता (Extremes) की प्रधानता है। तापमान एवं वर्षा की इस अतिशयता ने यहाँ के निवासियों की कठिनाइयों को बढ़ा दिया है। वार्षिक वर्षा के विश्लेषण से प्रकट होता है कि बहुत लघु क्षेत्र पर आवश्यकता के लिए वर्षा हो पाती है।

         वर्षा के अभाव में पश्चिमी भाग मरुभूमि सदृश्य है तो मध्यवर्ती और उत्तरी भाग स्टेपी घास का मैदान है। सुविधा सम्पन्न वनस्पति पैदा करने वाली जलवायु एशिया के दक्षिणी, दक्षिणी-पूर्वी एवं पूर्वी छोरों पर पाई जाती है, जो पर्याप्त वर्षा के कारण विकसित क्षेत्र है।का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और यहां वर्षा सवहनीय होती है।।

निष्कर्ष:

        उपर्युक्त ऋतुओं के विवेचन से स्पष्ट है कि दोनों ऋतुओं में अतिशयता की प्रधानता है। तापमान एवं वर्षा की इस अतिशयता ने एशिया निवासियों की कठिनाइयों को और बढ़ा दिया है। वार्षिक वर्षा के विश्लेषण से प्रकट होता है कि बहुत कम क्षेत्र पर आवश्यकता के लिये वर्षा हो पाती है। वर्षा के अभाव में पश्चिमी भाग मरुस्थल  और मध्यवर्ती उत्तरी भाग स्टेपी घास का मैदान है।

प्रश्न प्रारूप 

3. एशिया के जलवायवीय प्रदेश का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

अथवा एशिया को जलवायु विभागों में विभक्त कीजिए और उनमें से किन्हीं दो की जलवायु की विशेषताओं का विवेचन कीजिए।

उत्तर- एशिया महाद्वीप ग्लोब के लगभग एक-तिहाई भाग पर फैला हुआ है, अतः इस विशाल महाद्वीप में जलवायु में विविधता पायी जाती है। प्रो. कैसी ने लिखा है कि- “प्रायः सभी प्रकार की जलवायु एशिया महाद्वीप में पायी जाती है।” इस प्रकार इस महाद्वीप की क्षेत्रीय विभिन्नताओं को ध्यान में रखकर यहाँ की जलवायु का वर्गीकरण अनेक जलवायुविदों ने किया है।

          विश्व स्तर पर जलवायु वर्गीकरण में इन विद्वानों ने अनेक प्रतीकों का प्रयोग किया है जिनके आधार पर ही एशिया की जलवायु का वर्गीकरण किया गया है। इनमें से कुछ मान्य वर्गीकरण निम्नलिखित हैं-

1. ब्लाडिमिर कोपेन का जलवायु वर्गीकरण

2. थर्नाथ्वेट का जलवायु वर्गीकरण

3. फिंच एवं ट्रिवार्था का जलवायु वर्गीकरण

 4. एल. डब्ल्यू. लायड का जलवायु वर्गीकरण

5. एल. डडले स्टाम्प का जलवायु वर्गीकरण 

6. सामान्य जलवायु वर्गीकरण

एशिया की जलवायु का सामान्य वर्गीकरण (General Climatic Division of Asia)

            उपर्युक्त विद्वानों का जलवायु वर्गीकरणों को ध्यान में रखते हुए एशिया की जलवायु का सामान्य परिचय प्राप्त करने के लिए हम एशिया को निम्नांकित जलवायु विभागों में बाँट सकते हैं :-

(1) भूमध्यरेखीय जलवायु- इस प्रकार की जलवायु मलाया, श्रीलंका और हिन्देशिया में पायी जाती है। यह प्रदेश भूमध्य रेखा के 5° उत्तर और 5° दक्षिण तक फैला हुआ है। इस जलवायु की सबसे बड़ी विशेषता वर्ष भर ऊँचा तापमान व प्रतिदिन वर्षा है।

        औसत वार्षिक तापमान 26° सेल्सियस रहता है। दैनिक तापमान अधिक-से-अधिक 30° सेल्सियस और कम-से-कम 25° सेल्सियस होता है। दैनिक तापान्तर न्यूनतम रहता है। यह प्रदेश उत्तरी-पूर्वी एवं दक्षिणी-पूर्वी व्यापारिक आर्द्र हवाओं के मार्ग में पड़ता है जिससे यहाँ वर्ष भर वर्षा होती है। वर्षा का वार्षिक औसत 200 सेमीo से अधिक है। उष्ण-आर्द्र जलवायु के कारण यहाँ चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वृक्ष पाये जाते हैं।

एशिया की जलवायु

(2) मानसूनी जलवायु- इस प्रकार की जलवायु पाकिस्तान, भारत, श्रीलंका, म्यांमार (बर्मा), थाइलैण्ड, हिन्दचीन, फिलीपाइन, फारमोसा और जापान आदि देशों में पायी जाती है। यहाँ गर्मी में तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है। कभी-कभी तापमान 40° सेल्सियस से भी ऊपर चला जाता है एवं वार्षिक व दैनिक तापान्तर अधिक होता है। सर्दी की ऋतु में कठोर सर्दी पड़ती है और उत्तरी भागों में तापमान 10° सेल्सियस एवं दक्षिणी भागों में तापमान 23° सेल्सियस के आसपास रहता है।

           ग्रीष्मकाल में यहाँ भयंकर गर्मी पड़ने के करण एशिया के मध्य से स्थल भाग काफी गरम हो जाते है, अत: वहाँ न्यून भार स्थापित हो जाता है। इस समय स्थल की अपेक्षा जल पर अधिक भार बना रहता है।

             अतः इस ऋतु के कारण एशिया के मध्य से स्थल भाग काफी गरम हो जाते हैं, अत: वहाँ न्यून भार स्थापित हो जाता है। इस समय स्थल की अपेक्षा जल पर अधिक भार बना रहता है। अत: इस ऋतु में हवायें जल से स्थलीय भाग की ओर चलती हैं एवं आर्द्र होती है जिससे इन आर्द्र हवाओं से वर्षा होती है। वर्षा की मात्रा एवं वितरण अनिश्चित होता है।

        दक्षिणी-पूर्वी चीन तट,भारत के पश्चिमी घाट एवं असम की पहाड़ियों पर वर्षा का औसत 500 सेमी. से अधिक है, वहीं उत्तरी-पश्चिमी भारत में 25 सेमी. से भी कम वर्षा होती है। यहाँ पतझड़ वनस्पतियाँ पायी जाती हैं।

(3) चीन तुल्य जलवायु- इस प्रकार की जलवायु का प्रमुख क्षेत्र उत्तरी चीन, दक्षिणी कोरिया एवं जापान द्वीप समूह है। यह भाग 30° उत्तरी अक्षांश से 45° उत्तरी अक्षांश के बीच मिलता है। गर्मियों में पर्याप्त गर्मी व सर्दियों में कठोर सर्दी इस जलवायु की मुख्य विशेषता है।

        गर्मियों में तापमान 28° सेल्सियस के लगभग रहता है। सर्दियों में मध्य एशिया से आने वाली बर्फीली हवाओं के कारण तापमान अत्यन्त कम हो जाता है जिससे बर्फ जम जाती है। ग्रीष्म काल में यहाँ मानसून हवाओं से बहुत वर्षा होती है। वर्षा का औसत 100 सेमी. तक होता है। ग्रीष्म ऋतु में उष्ण चक्रवात जिन्हें टाइफून कहते हैं, से घनघोर वर्षा होती है।

(4) उष्ण मरुस्थलीय जलवायु- इस प्रकार की जलवायु एशिया महाद्वीप के दक्षिणी-पश्चिमी भाग, सऊदी अरब, थार के मरुस्थलीय भागों, सीरिया एवं पश्चिमी इराक आदि क्षेत्रों में पायी जाती है। उच्च तापमान तथा शुष्कता यहाँ की जलवायु की प्रमुख विशेषता है। ग्रीष्म ऋतु में तापमान 50° सेल्सियस के आसपास रहता है तथा शीतकाल में तापमान 15° सेल्सियस तक पहुँचता है। शीतकाल की रात्रि में कभी-कभी तापमान हिमांक तक पहुँच जाता है। इस प्रकार की जलवायु में ग्रीष्मकाल में दिन गर्म एवं धूल भरी आँधियाँ एवं लू चलती है जबकि रात्रि के समय आकाश स्वच्छ रहता है एवं तापमान के गिर जाने के कारण रातें ठण्डी रहती हैं।

(5) भूमध्यसागरीय जलवायु- इस जलवायु को रूमसागरीय जलवायु के नाम से भी जाना जाता है। तुर्की, सीरिया, लेबनान, इजराइल, जार्डन, साइप्रस आदि भूमध्यसागरीय निकटवर्ती भागों में इस प्रकार की जलवायु पायी जाती है। ये देश एशिया महाद्वीप के पश्चिम में स्थित है।

         गर्मियों में बहुत गर्मी एवं सर्दियों में वर्षा इस जलवायु की सबसे बड़ी विशेषता है। ग्रीष्मकाल में वर्षा बहुत कम होती है। शीतकाल में चक्रवातों से वर्षा होती है, ग्रीष्मकाल में औसत तापमान 24° सेल्सियस एवं शीतकाल में 10° सेल्सियस रहता है। वर्षा का वार्षिक औसत 50 से 75 सेमी. तक रहता है।

(6) ईरान तुल्य जलवायु- ईरान, पूर्वी इराक एवं अफगानिस्तान में इस प्रकार की जलवायु पायी जाती है। गर्मियों में उच्च तापमान एवं शुष्कता तथा सर्दियों में कड़ी सर्दी इस ऋतु की मुख्य विशेषता है। गर्मियों में तापमान 45° सेल्सियस तक पहुँच जाता है और सर्दियों में तापमान 0° सेल्सियस से भी कम हो जाता है। रात्रि में ओस और कोहरा पड़ता है। औसत वार्षिक वर्षा 25 सेमी. है। वर्षा की कमी के कारण यह जलवायु प्रदेश शुष्क रह गया है।

(7) तूरान तुल्य जलवायु- इस प्रकार की जलवायु एशिया के आन्तरिक भाग में पायी जाती है। समुद्र से अधिक दूरी होने के कारण इस भाग पर सागरीय प्रभाव नगण्य है। अतः यह पूर्णतया महाद्वीपीय जलवायु है। तीव्र गर्मी, कड़ी सर्दी तथा अति न्यून वर्षा इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं। ग्रीष्मकाल में तापमान 40° सेल्सियस तक पहुँच जाता है एवं सर्दियों में तापमान हिमांक बिन्दु से नीचे गिर जाता है। वर्षा का वार्षिक औसत 20 सेमी. है। वर्षा केवल गर्मियों में होती है। शीत ऋतु में वर्षा बहुत कम होती है।

(8) मंचूरिया तुल्य जलवायु- मंचूरिया, उत्तरी जापान, उत्तरी कोरिया और सखालिन द्वीप में पायी जाने वाली जलवायु मंचूरिया तुल्य जलवायु कहलाती है। साधारण गर्मी, कठोर शीत एवं वार्षिक तापान्तर की अधिकता यहाँ की जलवायु की प्रमुख विशेषताएँ हैं। शीत ऋतु में साइबेरिया की ओर से आने वाली ठण्डी हवायें तापमान को गिरा देती हैं। ग्रीष्मकाल में औसत तापमान 22° सेल्सियस और औसत वार्षिक वर्षा 35 सेमी. प्राप्त होती है।

(9) तिब्बत तुल्य जलवायु- इस जलवायु प्रदेश का विस्तार तिब्बत व पामीर के पठारी भाग हैं। तिब्बत व पामीर के पठार समुद्र तल से 3500 मीटर से अधिक ऊँचे हैं। ये दोनों पठार चारों ओर से पर्वतों से घिरे हुए हैं। इस कारण यहाँ की जलवायु में अति विषमता पायी जाती है।

        गर्म व लघु ग्रीष्मकाल तथा कठोर व लम्बा शरदकाल इस जलवायु की प्रमुख विशेषता है। ग्रीष्मकाल में तापमान 20° सेल्सियस के निकट रहता है एवं शीतकाल में तापमान हिमांक बिन्दु से नीचे पहुँच जाता है। दैनिक तापान्तर बहुत अधिक पाया जाता है। सर्दियों में पाला पड़ता है। वर्षा गर्मियों में होती है। वर्षा का औसत 70 सेन्टीमीटर तक पाया जाता है।

(10) अल्टाई तुल्य जलवायु- एशिया महाद्वीप के मध्य भाग में अल्टाई पर्वतमाला के निकटवर्ती भागों में इस तरह की जलवायु पायी जाती है। सामान्य व लघु ग्रीष्मकाल तथा अति कठोर व लम्बा शीतकाल इस जलवायु की प्रमुख विशेषता है। ग्रीष्मकाल में तापमान 10° सेल्सियस के लगभग रहता है किन्तु शीतकाल में तापमान -25° तक पहुँच जाता है। सर्दियों में अत्यन्त शीतल व बर्फीली हवायें चलती जो चारों तरफ बर्फ जमा देती हैं। अधिकांश वर्षा ग्रीष्मकाल में होती है। वर्षा बर्फ व जल दोनों रूपों में होती है। वर्षा का वार्षिक औसत 100 सेमी. तक पाया जाता है।

(11) प्रेयरी तुल्य जलवायु- इस प्रकार की जलवायु को मध्य अक्षांशीय महाद्वीपीय या स्टेपी जलवायु के नाम से भी पुकारते हैं। यह जलवायु पश्चिमी साइबेरिया तथा मंगोलिया के घास के मैदानों में पायी जाती है। साधारण गर्मी तथा कठोर शीत इस ऋतु की प्रमुख विशेषता है।

         ग्रीष्मकाल में तापमान 24° सेल्सियस तक पाया जाता है। शीत ऋतु में बर्फीली तथा ठण्डी हवायें चलती हैं जिससे तापमान हिमांक बिन्दु से नीचे चला जाता है, कभी-कभी तापमान -50° सेल्सियस तक चला जाता है। विश्व का सबसे ठण्डा स्थान बर्खोयांस्क इसी जलवायु क्षेत्र में स्थित है। वर्षा ग्रीष्म ऋतु में होती है जिसका वार्षिक औसत 40 सेमी. है। वर्षा से घास उग जाती है जिसे स्टेपी घास के नाम से जाना जाता है।

(12) टैगा तुल्य जलवायु- एशिया महाद्वीप के अत्यन्त ठण्डे प्रदेश साइबेरिया के उत्तरी क्षेत्र में स्थित कोणधारी टैगा वन प्रदेश में यह जलवायु पायी जाती है। ग्रीष्मकाल 3 माह एवं शीतकाल 9 माह की अवधि का होता है। ग्रीष्मकाल 5° सेल्सियस तक सामान्य तापमान रहता है जबकि शीतकाल में तापमान -50° सेन्ट्रीग्रेड तक पहुँच जाता है।

        शीत ऋतु बड़ी कठोर व दीर्घ अवधि वाली होती है। कठोर सर्दी के कारण यहाँ अत्यधिक सहन शक्ति वाले कोणधारी वन पाये जाते हैं। ग्रीष्मकाल में हल्की वर्षा होती है एवं शीत ऋतु में वर्षा बर्फ के रूप में होती है। वर्षा का वार्षिक औसत 50 सेमी. पाया जाता है।

(13) टुण्ड्रा तुल्य जलवायु- आर्कटिक महासागर के किनारे पर हिममण्डित क्षेत्र में इस प्रकार की जलवायु पायी जाती है। यह क्षेत्र वर्ष भ हिम से आवृत्त रहता है।

3. एशिया की अपवाह प्रणाली / Drainage System of Asia

3. एशिया की अपवाह प्रणाली 

(Drainage System of Asia)


3. एशिया की अपवाह प्रणाली⇒

                  विश्व के सबसे विशाल एशिया महाद्वीप के विकास में वहाँ के अपवाह प्रणाली का विशेष महत्त्व होता है। नदियों तथा बहते हुए जल का अध्ययन अपवाह प्रणाली के अंतर्गत किया जाता है। किसी भी देश अथवा महाद्वीप के विकास में उस क्षेत्र की नदियाँ सर्वाधिक सहायक होती है। प्रोफेसर क्रैसी के अनुसार “एशिया में किसी बड़ी विशाल नदी का अभाव है जबकि अनेक छोटी नदियाँ एशिया के आंतरिक भागों से निकलती है।”
 
         एशिया महाद्वीप की अपवाह प्रणाली के अंतर्गत यहाँ की विशाल पर्वत श्रेणियों से निकलने वाली नदियों के मार्ग में ये पर्वत श्रेणियां बाधा उत्पन्न नहीं करती है। इन मध्यवर्ती पर्वत श्रेणियों से निकलने वाली सतत वाहिनी नदियाँ पर्वतीय ढालों के अनुसार बहती हुई पूरब, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण दिशाओं में अपने मार्ग का अनुसरण करती हुई आगे बढ़ जाती है।
          एशिया महाद्वीप को अफवाह के दृष्टिकोण से निम्न पॉंच क्षेत्रों में विभाजित किया गया है –
1. प्रशांत महासागर की अपवाह प्रणाली
2. हिंद महासागर की अपवाह प्रणाली
3. आर्कटिक महासागर की अपवाह प्रणाली
4. आंतरिक अपवाह प्रणाली
5. भूमध्यसागरीय अपवाह प्रणाली।
एशिया की अपवाह प्रणाली1. प्रशांत महासागर की अपवाह प्रणाली
                 मध्य एशिया की पर्वत श्रेणियों से निकलने वाली नदियाँ पूरब दिशा की ओर बहती हुई प्रशांत महासागर में गिर जाती है। प्रशांत महासागर अपवाह क्षेत्र का विस्तार कम है। इस अपवाह क्षेत्र में पाई जाने वाली नदियाँ आमूर, हांगहो, यांगटिसीक्यांग, सीक्यांग, मीकांग, मीनाम, लाल इत्यादि है। अन्य नदियों में आमूर की सहायक नदियाँ उसुरी तथा सुँगारी; हांगहो की सहायक नदियाँ  वी-हो तथा फेन-हो; यांगटिसीक्यांग की सहायक नदियाँ हान, मिन, कान, चार्लिंग, सियांग इत्यादि है।
            इस अपवाह क्षेत्र में अनेक प्रकार की अफवाह स्वरूप देखने को मिलते हैं, जैसे – हांगहो का अपवाह, ओरडोस पठार एवं सिनलिंग पर्वत श्रेणी के निकट भागों में आयताकार अपवाह प्रणाली के रूप में है जबकि  यांगटिसीक्यांग अपनी सहायक नदियों के साथ वृक्षीय अपवाह प्रणाली का विकास करती है। वृक्षीय अपवाह प्रणाली में पाए जाने वाले नदियाँ कृषि, परिवहन तथा सिंचाई में अपना विशेष महत्व रखती है। चीन का विशाल उत्तरी मैदान हांगहो की देन है। अपनी प्रतिवर्ष आने वाली भयंकर बाढ़ के कारण चीन का शोक कहलाती है।
2. हिंद महासागर की अपवाह प्रणाली
         पश्चिम दिशा में स्थित दजला-फरात नदियों के उद्गम स्थल से लेकर पूरब में मलेशिया तक का विस्तृत क्षेत्र हिंद महासागर अपवाह प्रणाली के अंतर्गत आता है। इस अफवाह क्षेत्र के मुख्य नदियाँ दजला, फरात, सिंधु, गंगा एवं ब्रह्मपुत्र है। अन्य नदियों  में इरावदी, सालवीन, चिंदविन, गोदावरी, नर्मदा, ताप्ती, कृष्णा, कावेरी, महानदी इत्यादि है। हिंद महासागर अपवाह क्षेत्र में नदी अपहरण के अनेक उदाहरण मिलते हैं। इरावदी और सिंधु नदियाँ इसके सबसे बड़े उदाहरण है।
         प्राचीन काल में उत्तर-दक्षिण घाटी में बहने वाली नदी का सिंधु नदी ने अपहरण किया था। इस प्रकार के नदी अपहरण के अनेक चिन्ह आज भी हिमालय पर्वत पर दिखाई देते हैं। भारत के दक्षिणी प्रायद्वीपीय पर बहने वाली नदियाँ मार्ग परिवर्तन की अपेक्षा अपनी घाटियों को गहरी करने में लगी हुई है। इस प्रकार की नदियों का अपवाह पुर्वोत्पन्न अपवाह प्रणाली के रूप में है। पुर्वोत्पन्न अपवाह प्रणाली में बहने वाली नदियाँ कृषि सिंचाई के दृष्टिकोण से अधिक महत्व रखती है।
        गंगा एवं सिन्धु का मैदान एशिया का प्रसिद्ध एवं सबसे अधिक उपजाऊ मैदान है। म्यांमार की इरावदी ने इस देश को एक सुचारू आर्थिक जीवन प्रदान किया है। इराक अपनी दोनों नदियों दजला एवं फरात की देन है। इस क्षेत्र में मिलने वाली नदियाँ इस क्षेत्र की जल की कमी की समस्या को बहुत कुछ अंश तक दूर करने में सहायक रही है। इस क्षेत्र में बहने वाली नदियों में वर्ष भर जला भरा रहता है।
एशिया की अपवाह प्रणाली3. आर्कटिक महासागर की अपवाह प्रणाली
           एशिया महाद्वीप की सबसे विशाल अपवाह प्रणाली एशिया के उत्तरी भाग में स्थित आर्थिक महासागरीय प्रवाह प्रणाली है। इस अपवाह प्रणाली में बहने वाली नदियाँ उच्च व गर्म प्रदेशों से निकलकर उत्तर के विशाल मैदान में बहती हुई आर्कटिक महासागर में जाकर गिरती है। आर्थिक सागर के अधिकांश भाग में वर्ष भर बर्फ के जमे रहने के कारण इस क्षेत्र के नदियाँ अपने मुहानों पर गिरने के पूर्व दोनों किनारों पर फैल जाती है जिससे नदियों के बेसिनों एवं समुद्र-तटीय भागों के निकट अनेक विस्तृत दलदल बन जाते हैं।
             दलदली भाग एवं शीत ऋतु में बर्फ जम जाने के कारण इस क्षेत्र की नदियों का कोई आर्थिक महत्व नहीं है। आर्कटिक महासागर में बर्ष के अधिकांश भाग में बर्फ जमी रहती है, इस कारण इस महासागर में किसी बंदरगाह का निर्माण नहीं हुआ है। इसलिए व्यापारिक दृष्टिकोण से इस क्षेत्र की नदियों का कोई महत्व नहीं है। इस क्षेत्र की  तीन विशाल नदियों ओब, यनीसी तथा लीना संसार की बड़ी नदियों में से है। इस क्षेत्र की नदियों में  इन्दिगिरिका,  कोलीमा, यना इत्यादि है। शीतकाल में कुछ नदियों का जल ऊपरी भाग में जम जाता है।
4. आंतरिक अपवाह प्रणाली
          आंतरिक अपवाह प्रणाली पश्चिम में आनातोलिया से लेकर पूरब में मंचूरिया तक विस्तृत है। इस अपवाह प्रणाली में पाई जाने वाली नदियाँ वर्षा तथा वर्ष के ऊपर निर्भर हैं। बर्फ पिघलने के कारण इन नदियों को पर्याप्त मात्रा में जल मिल जाता है। ये नदियाँ बहकर झीलों अथवा आन्तरिक  सागरों में गिर जाती है अन्यथा जल की मात्रा कम होने के कारण यह नदियाँ मध्य एशिया के शुष्क रेतीले भागों में सूखकर नदियाँ आमू दरिया और सर दरिया है जो अरल सागर में गिरती है।
           अन्य नदियों में इली, चू, तारिम, खोतान  इत्यादि है जो बालकश झील तथा लैपनौर झील में गिरती है। इस अफवाह क्षेत्र में नदियों की अपेक्षा झीलों का महत्व अधिक है। कैस्पियन, अरल तथा बालकश झीलें  उल्लेखनीय है। इस अपवाह क्षेत्र का विस्तार एशिया की लगभग 80 लाख पर किलोमीटर भूमि पर है लेकिन इनका कोई आर्थिक महत्व नहीं है।
5. भूमध्यसागरीय अपवाह प्रणाली
                एशिया महाद्वीप के पश्चिमी भाग में भूमध्य सागर विस्तृत है। एशिया के दक्षिणी-पश्चिमी भाग के देशों की नदियों का जल भूमध्य सागर में गिरता है। भूमध्य सागर अपवाह क्षेत्र का विस्तार बहुत कम है। टर्की, सीरिया, लेबनान, इजरायल, जॉर्डन तथा साइप्रस देशों तक ही सीमित है। इस जल-प्रवाह क्षेत्र का एशिया की जल-प्रवाह प्रणाली में विशेष महत्व है क्योंकि आरमीनिया की गाँठ ने  भूमध्य सागर का केवल थोड़े से ही क्षेत्र में संपर्क रहने दिया है। इस क्षेत्र में एशिया की कोई विशाल नदी भी नहीं है। केवल छोटी नदियाँ भूमध्य सागर में जाकर गिरती है जिनका कोई आर्थिक महत्व नहीं है। टर्की से निकलने वाली मनीसा तथा मैंडेरिस नदियाँ एवं सीरिया से निकलने वाली ओरोनटेस नदी ही इस जल प्रवाह क्षेत्र की मुख्य नदियाँ है जो भूमध्य साग में गिरती हैं।
प्रश्न प्रारूप 
Q1. एशिया की अपवाह प्रणाली का सविस्तार वर्णन कीजि
 अथवा
Q2. एशिया के जल-प्रवाह का वर्णन कीजिए 

2. एशिया का उच्चावच / Relief or Physiography of Asia

2. एशिया का उच्चावच 

(Relief or Physiography of Asia)


एशिया का उच्चावच⇒

                     विश्व का सबसे विशाल महाद्वीप एशिया पूर्वी गोलार्ध में स्थित है। भूमध्य रेखा से 10° दक्षिणी की ओर से लेकर 80° उत्तर की ओर स्थित होने के कारण यह दक्षिणी तथा उत्तरी दोनों गोलार्ध में अपनी भौगोलिक स्थिति लिए हुए है। एशिया महाद्वीप का अधिकांश भाग उत्तरी गोलार्ध में ही है। इस महाद्वीप की पूर्व से पश्चिम तक की स्थिति 25° पूर्वी देशांतर से लेकर 170° पश्चिमी देशांतर के बीच है। इस प्रकार एशिया महाद्वीप की स्थिति 90° अक्षांशों तथा 195° देशांतरों में है।
 
           इस महाद्वीप की उत्तर से दक्षिण की अधिकतम लंबाई 8580 किलोमीटर तथा पूरब से पश्चिम अधिकतम चौड़ाई 7720 किलोमीटर है। एशिया महाद्वीप का विस्तार 44030200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर है। यह विशाल महाद्वीप तीन ओर से समुद्र से तथा एक ओर से स्थलखंड (यूरोप महाद्वीप) से घिरा हुआ है।
           
            एशिया महाद्वीप के उच्चावच को निम्नलिखित पाँच भागों में बाँट सकते हैं-
 
1. मध्यवर्ती पर्वत-पठार-क्रम
2. नदियों के मैदान
3. दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार
4. उत्तर की निचली भूमि
5. द्वीप समूह मालाएँ
एशिया का उच्चावच

1. मध्यवर्ती पर्वत-पठार-क्रम

              विश्व का सबसे विशाल एशिया महाद्वीप अपनी धरातलीय विशेषताओं के कारण संसार के सभी महाद्वीपों से अलग है। एशिया के मध्य भाग में स्थित ये पर्वत श्रेणियाँ एशिया महाद्वीप के लगभग 20% भागों पर फैली हुई है। इसका विस्तार पश्चिम में टर्की से प्रारंभ होकर पूरब में चीन तथा उत्तर-पूर्व में बेरिंग सागर तक है। इसमें अनेक उच्च पर्वत एवं पठार सम्मिलित है। इस क्रम में पर्वत शिखरों की सामान्य ऊँचाई 1000 मीटर से लेकर 8848 मीटर तक है। एशिया के इस मध्यवर्ती पर्वत-पठार-क्रम का केंद्र पामीर की गाँठ है जो विश्व की छत कहलाती है।

  • पामीर की गाँठ से निकलने वाली पर्वत श्रेणियों का प्रथम क्रम पश्चिम की ओर फैली हुई है। इस क्रम के अंतर्गत निम्नलिखित पर्वत एवं पठार सम्मिलित है – हिंदुकुश, एल्बुर्ज, गिलगिट, सुलेमान, किरथर, जैग्रोस पर्वत श्रेणियाँ, ईरान का पठार, पौंटिक श्रेणी, टॉरस श्रेणी, एशिया माइनर का पठार।
  • पामीर की गाँठ से निकलने वाली पर्वत श्रेणियों का दूसरा क्रम दक्षिण-पूरब की ओर फैला हुआ है। इस क्रम के अंतर्गत निम्न पर्वत एवं पठार सम्मिलित है :
हिमालय पर्वत श्रेणी – हिमालय पर्वत श्रेणी पर संसार की सर्वोच्च पर्वत श्रेणी स्थित है। इसका सर्वोच्च पर्वत शिखर एवरेस्ट संसार का सबसे ऊँचा शिखर है जिसकी ऊँचाई 8848 मीटर है। हिमालय पर्वत श्रेणी की एक शाखा असम तथा म्यांमार होती हुई पूर्वी द्वीप समूह को चली गई है। असम में इसकी मुख्य पर्वत श्रेणियाँ नागा, गारो, खासी, जयंतिया तथा पटकोई है। म्यांमार में इसके मुख्य पर्वत श्रेणियाँ अराकानयोमा, पीगूयोमा और तनासरिमयोमा है।
  • पामीर की गाँठ से निकलने वाले पर्वत श्रेणियों का तीसरा क्रम पूरब की ओर फैला हुआ है। इस क्रम के अंतर्गत निम्न पर्वत एवं पठार सम्मिलित है – क्यूनलुन, बयानकारा, सिनलिंग, अलताइनतांग, नानशान, खिंगन, तिब्बत का पठार, काराकोरम।
  • पामीर की गाँठ से निकलने वाले पर्वत श्रेणियों का चौथा क्रम उत्तर-पूरब दिशा में फैला हुआ है। इस क्रम के अंतर्गत निम्न पर्वत एवं पठार सम्मिलित है – तियानशान, अल्टाई, यावलोनोय, स्टेनोवोय, बर्खोयानस्क, कोलिमा, अनादिर, कमचटका
एशिया का उच्चावच
2. नदियों के मैदान
                         विभिन्न नदियों के छोटे-बड़े मैदान मिलकर एशिया महाद्वीप के विशाल धरातल का निर्माण करते हैं। यह मैदान अत्यंत उपजाऊ मृदा द्वारा निर्मित है। अनेक महत्वपूर्ण सभ्यताओं का विकास इन मैदानों में हुआ है। सिंधु घाटी एवं दजला-फरात बेसिन की सभ्यता एशिया की प्राचीन सभ्यताओं में से है जहाँ से इसका प्रचार संसार के अनेक देशों में हुआ है। ये एशिया महाद्वीप के सांस्कृतिक विकास केंद्र है। आज भी एशिया महाद्वीप की जनसंख्या का सबसे अधिक घनत्व इन्हीं मैदानों में मिलता है। पश्चिम से पूरब की ओर ये मैदान क्रमशः निम्न प्रकार है-
(i) दजला-फरात का मैदान – इस मैदान का विस्तार इराक में है। दजला-फरात के मैदान को मेसोपोटामिया का मैदान भी कहा जाता है।
(ii) सिंधु-गंगा का मैदान – इसका विस्तार भारत तथा पाकिस्तान में है। सिंधु तथा गंगा और इन नदियों की अनेक सहायक नदियों की उपजाऊ कॉंप मिट्टी से यह मैदान निर्मित हुआ है। सिंधु घाटी की सभ्यता का विकास एशिया के सिंधु तथा गंगा के मैदान में ही हुआ।
(iii) इरावदी का मैदान – इस मैदान का विस्तार में म्यांमार में है। इरावती का उपजाऊ मैदान कॉंप मिट्टी की सैकड़ों मीटर गहरी परतों द्वारा निर्मित है जो चावल की कृषि के लिए विश्वविख्यात है।
(iv) मीनाम का मैदान – इस मैदान का विस्तार थाईलैंड में है। यह कॉंप उपजाऊ मिट्टी का मैदान है जिसका विस्तार दक्षिण की ओर अधिक है।
(v) मीकांग का मैदान – मीकांग नदी ने हिंदचीन प्रायद्वीप पर उपजाऊ मैदान का निर्माण किया है। इस मैदान में कॉंप मिट्टी की अनेक परतें बिछी हुई है।
(vi) सिक्यांग का मैदान – यह मैदान दक्षिणी चीन में विस्तृत है। इस मैदान का विस्तार अधिक नहीं है।
(vii) यांगटिसीक्यांग का मैदान – यह मैदान मध्य चीन में है जिसका निर्माण यांगटिसीक्यांग तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा हुआ है। यह उपजाऊ कॉंप मिट्टी का बना है। इसका रेड बेसिन प्रसिद्ध मैदानी भाग है।
(viii) ह्वांगहो का मैदान – इसका निर्माण ह्वांगहो अथवा पीली नदी द्वारा लोयस के पठार से बहाकर लाई गई पीली मिट्टी से हुआ है। इसलिए इसे उत्तरी चीन का विशाल पीला मैदान भी कहते हैं।
3. दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठा
                                      एशिया के दक्षिण-पश्चिमी, दक्षिणी एवं दक्षिणी-पूर्वी भाग में प्राचीन चट्टानों का विस्तार पाया जाता है। इन प्राचीन चट्टानों का उद्भव पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ हुआ। इन प्राचीन पठारों को तीन भागों में बांटा गया है-
(i) अरब का प्रायद्वीपीय पठार – यह पठार एशिया के दक्षिणी-पश्चिमी भाग अरब प्रायद्वीप में स्थित है। अरब का प्रायद्वीपीय पठार कठोर प्राचीन चट्टानों द्वारा निर्मित गोंडवाना भूमि का एक भाग है। इस पठार की सामान्य ऊँचाई 2000 मीटर है। यह एक शुष्क मरुस्थलीय भाग है। शुष्कता के कारण ही यह अत्यंत रेतीला हो गया है।
(ii) भारत का प्रायद्वीपीय पठार – यह पठार भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिणी भाग में स्थित है। अरब के प्रायद्वीपीय पठार की भांति यह भी प्राचीन चट्टानों से निर्मित गोंडवाना भूमि का अंश है जो कठोर रवेदार चट्टानों से बना है। इस पठार की सामान्य ऊँचाई 1400 मीटर है। पठार के उत्तरी भाग में विंध्याचल पर्वत, सतपुड़ा पर्वत तथा मालवा का पठार प्रमुख श्रेणियां है जबकि पठार के दक्षिणी भाग में नीलगिरी तथा इलायची की पहाड़ियां प्रमुख श्रेणियां है।
(iii) हिन्दचीन का पठार – यह दक्षिणी-पूर्वी एशिया में फैला हुआ प्रायद्वीपीय पठार है जिसका अधिकांश भाग हिन्दचीन में स्थित है। यह कठोर चट्टानों से निर्मित है। इस पठार की सामान्य ऊँचाई 1200 मीटर है। इस पठार पर नदियों द्वारा क्षरण कार्य बहुत कम हुआ है इसलिए यह कम कटा-फटा पठार है।
4. उत्तर की निचली भूमि
                साइबेरिया के उत्तर की निचली भूमि त्रिभुजाकार मैदान के रूप में विस्तृत है। इस मैदान के उत्तर में आर्कटिक महासागर, पश्चिम में यूराल पर्वत तथा दक्षिण एवं पूरब में मध्यवर्ती पर्वत-पठार क्रम फैला हुआ है। यह निचला मैदान ओबी तथा लीना नदियों के बेसिनों से बना है। इस विस्तृत मैदान को एशिया के धरातल में पड़ने वाले अनेक मोड़ों का सामना करना पड़ा है। इस मैदान का ढाल उत्तर में आर्कटिक सागर की ओर है। इसका ढाल अत्यंत मंद होने के कारण इसकी उत्तरी भाग में जल भर जाता है और अनेक दलदल बन जाते हैं। इस मैदान की नदियों के मुहाने तथा निचले भागों में बर्फ जम जाने के कारण इन नदियों का जल अपवाह रुक जाता है इससे अनेक दलदली क्षेत्र बन जाते हैं। यही कारण है कि इन क्षेत्रों की नदियों का कोई व्यापारिक महत्व नहीं है।
5. द्वीप समूह मालाएँ
               एशिया महाद्वीप के पूरब एवं दक्षिण-पूरब की ओर अनेक द्वीपसमूह एक विस्तृत पंक्ति में चाप की भांति फैले हुए हैं। ये द्वीप प्रशांत महासागर तथा हिंद महासागर में स्थित है जिसमें से प्रशांत महासागर में द्वीपों की बहुलता है। ये सभी पहाड़ी भाग के रूप में है जिनका निर्माण तृतीय कल्प की नवीन मोड़दर पर्वत श्रेणियों के साथ हुआ था। इन द्वीपों की चट्टानों में नवीन मोड़दार चट्टानें मिलती है।
             भूगर्भवेत्ताओं के अनुसार यह नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियों के उठे हुए भाग है जो समुद्र में डूबी हुई है। इन तीनों में पूर्वी एवं पश्चिमी समुद्र तटों पर संकरी मैदानी पट्टी मिलती है। इन द्वीपों की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ पर मिलने वाली ज्वालामुखी पर्वतों की अधिकता है। अनेक ज्वालामुखी पर्वत आज भी जागृत अवस्था में है। इस द्वीप समूह माला के प्रमुख द्वीप क्यूराइल, होकैडो, हांशू, क्यूशू, शिकोकू, ताइवान, लुजोन, मिडनाओ, समार, नेग्रोस, पलाबन, सैलीबीज, बोर्नियो, जावा, मदुरा, ईरियन, सिंगापु इत्यादि है।
प्रश्न प्रारूप 
Q1. एशिया को उच्चावच इकाईयों में विभक्त कीजिए और उनमें से किसी एक का विशद विवरण दीजिए
 अथवा
Q2.  एशिया को भौतिक  इकाईयों में विभाजित कीजिए तथा उनमें से किन्हीं दो की विवेचना  किजिए

1. एशिया की धरातल की संरचना (Asia : Surface Structure)

1. एशिया की धरातल की संरचना (Asia : Surface Structure)


एशिया की धरातल की संरचना⇒

For BA(Hons) Part-I, Paper-II 

                 धरातलीय संरचनाओं पर भू-गर्भ की प्राचीन चट्टानों के विशेष रूप से प्रभाव पड़ता है। प्राचीन चट्टानों की बनाबट का अध्ययन धरातलीय संरचना के आधार पर किया जाता है। एशिया महाद्वीप में धरातलीय संरचना के अंतर्गत भी अनेक विशेषताएँ मिलती है। इस महाद्वीप में उपकल्प(Eozoic Era) की पुरातन चट्टानें से लेकर टर्शियरी युग की नवीनतम चट्टानें मिलती है। चट्टानों की विविधता के साथ-साथ चट्टानों के धरातलीय स्वरूप में भी अनेक विविधताएँ पायी जाती है।
         एशिया महाद्वीप में अनेक ऐसे स्थलखंड विद्यमान है जिनमें धरातलीय परिवर्तन भूगर्भिक हलचलों के कारण उत्पन्न हुए हैं जबकि महाद्वीप पर कुछ स्थलखंड ऐसे भी है जो इन भूगर्भिक हलचलों से प्रभावित नहीं होते हैं। कुछ स्थान पर अयनवृत्तीकरण के कारण चट्टानों का बाहरी रूप अवश्य परिवर्तित हो गया है लेकिन चट्टानों की आंतरिक बनावट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। 
                  एशिया महाद्वीप की धरातलीय संरचना के बारे में विभिन्न भूतत्ववेताओं में मतभेद है फिर भी अधिकांश भूतत्ववेताओं ने एशिया को भूगर्भिक संरचना के आधार पर चार भागों में बाँटा है – 
(1) उत्तर के प्राचीन भूखंड 
(2) दक्षिण के प्राचीन भूखण्ड 
(3) नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियाँ 
(4) अवशेष भाग 
एशिया की धरातल की संरचना(1) उत्तर के प्राचीन भूखंड

                  उत्तर के प्राचीन भूखंडों का विस्तार एशिया महाद्वीप के उत्तरी भाग में हुआ है। इस प्राचीन भूखंड में कैंब्रियन युग से पहले की कठोर चट्टानों का विस्तार पाया जाता है। यह प्राचीन विशाल भूखंड पैंजिया स्थलखंड से अलग हुए विशाल भूखंड है। इन भूखंडों की चट्टानें बहुत कठोर है। इनमें से कुछ चट्टानों का रूप परिवर्तित भी हो गया है। इन भागों में आग्नेय चट्टानों की बहुलता है। मुख्य चट्टानें नाइस, शिष्ट, स्लेट तथा ग्रेनाइट है।

            उत्तर के प्राचीन भूखंड के अंतर्गत चार प्रमुख खंड आते हैं जिनमें एक भूखंड जिसका नाम रूसी चबूतरा है, एशिया महाद्वीप में न होकर यूरोप महाद्वीप में स्थित है लेकिन फिर भी इसका अध्ययन इसलिए आवश्यक हो जाता है क्योंकि इससे एशिया महाद्वीप की संरचना को समझने में सहायता मिलती है। यह एशिया की सीमा से लगा हुआ यूरोप के बाल्टिक सागर तक विस्तृत है, इसलिए इसे बाल्टिक शीट भी कहते हैं। उत्तर के प्राचीनतम भूखंडों के अंतर्गत निम्नलिखित भूखंड सम्मिलित किए जाते हैं –

(i) रुसी चबूतरा 
(ii) अंगारा भूमि 
(iii) चीनी मैसिफ
 (iv) सारडिनियन मैसिफ।
(2) दक्षिण के प्राचीन भूखण्ड
                 उत्तर के प्राचीन भूखंडों की भांति दक्षिण के प्राचीनतम भूखंड कठोर तथा प्राचीनतम चट्टानों द्वारा निर्मित है। यह प्राचीन भूखंड पैंजिया के टूटे हुए स्थल भूखंड है जिन्हें गोंडवाना भूमि के नाम से पुकारते हैं। विद्वानों के अनुसार यह गोंडवाना भूमि प्राचीन समय में दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, दक्षिण एशिया तथा आस्ट्रेलिया के कुछ भाग में फैली हुई थी। कालांतर में महाद्वीप की रचना के समय इसके टुकड़े हो गए। एशिया महाद्वीप में भी इस गोंडवाना भूमि के दो प्रमुख भूखंड मिलते हैं जो निम्नलिखित है-
1. अरब प्रायद्वीप 
2. प्रायद्वीपीय भारत
             
          कैंब्रियन युग से पहले की चट्टानों द्वारा इन दोनों प्राचीन भूखंडों का निर्माण हुआ है। इन दोनों भूखंडों में आग्नेय तथा रूपांतरित चट्टानों का विस्तार पाया जाता है जिनमें नाइस, शिस्ट तथा बैसाल्ट चट्टानों की प्रधानता है।
(3) नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियाँ
                नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियाँ एशिया महाद्वीप के मध्य भाग में पाई जाती है। पृथ्वी की हलचलों के परिणामस्वरुप टर्शियरी युग में इन पर्वत श्रेणियों का विस्तार हुआ। मध्य जीवकल्प(Mesozoic Era) के अंतिम समय में इन मोड़दार पर्वत श्रेणियों का निर्माण प्रारंभ हो गया तथा तृतीय युग में इन श्रेणियों का विकास पूर्ण रूप से हो पाया। यह पर्वत श्रेणियाँ अनेक मोड़ों द्वारा निर्मित हुई है। इन पर्वत श्रेणियों की चट्टानों में समुद्री मलवा तथा जीव-जंतुओं के अवशेष पाए जाते हैं।
           इनकी उत्पत्ति के बारे में विद्वानों का मत है कि अत्यंत प्राचीन काल में उत्तर-पूरब एवं दक्षिण के प्राचीन स्थित भूखंडों के बीच एक विशाल भू-अभिनति(Geosyncline) था जो जिब्राल्टर से लेकर पूर्वी एशिया तक फैला हुआ था जिसको विद्वानों ने तेथिस सागर के नाम से पुकारा। इस सागर के बचे हुए भाग आज भी एशिया महाद्वीप के पश्चिमी एवं मध्य भागों में भूमध्सायगर, कैस्पियन सागर, काला सागर, अरब सागर आदि के रूप में स्थित है। यह सागर कुछ स्थानों पर अत्यंत गहरा था। 
              टेथिस साग में उत्तर एवं दक्षिण के अनेक धरातलीय पदार्थ, मालवा तथा जीव-जन्तुओं के अवशेष करोड़ों वर्ष तक अपरदन द्वारा सागर की तलहटी में एकत्र होते रहे। इस जमाव क्रिया के फलस्वरुप समुद्र धरातल में अनेक परतें एक के ऊपर एक जमा होती रही। मुख्यतः परमियन काल से आदि नूतनकाल के पदार्थों की एक मोटी सागर की तली पर जमा हो गई। कालांतर में पृथ्वी की भूगतियों के कारण भूखंडों में हलचल उत्पन्न हो गई तथा उत्तर के प्राचीन भूखंड दक्षिण की ओर खिसके। दक्षिण का प्राचीन गोंडवाना भूखंड वह अपने ही स्थान पर स्थिर रहा। इससे दोनों भूखंडों के मध्य टेथिस सागर से जमा मलबे में अनेक मोड़ पड़ गए। जिन भागों में मलबे के परतें अधिक जमा थी और जहाँ भूखंडों का दबाव अधिक पड़ा,  उन क्षेत्रों में ऊँची पर्वत श्रेणियों की उत्पत्ति हुई।
               टेथिस सागर की इस क्रिया के फलस्वरुप इन नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियों की उत्पत्ति हुई। ये पर्वत श्रेणियां दक्षिण-पश्चिमी एशिया के पश्चिमी किनारे से लेकर दक्षिण-पूर्वी एशिया के पूर्वी किनारे तक विस्तृत है। इनमें मुख्य पर्वत श्रेणियां हिमालय, एशिया माइनर, आरमीनिया, काराकोरम, नानशान, आराकानयोमा इत्यादि है। अन्य पर्वतों में हिंदूकुश, एल्बुर्ज, जैग्रोस, टॉरस, पॉन्टिक, आनातोलिया का पठार, सुलेमान किरथर इत्यादि है। यूरोप का अल्पाइन पर्वत श्रेणियां का निर्माण भी इसी काल में हुआ। इसलिए इन नवीन मोड़दार पर्वत श्रृंखलाओं को अल्पाइन पर्वत श्रेणियों के नाम से पुकारा जाता है।
(4) अवशेष भाग
              एशिया महाद्वीप के इस भाग के अंतर्गत उन संपूर्ण क्षेत्रों का वर्णन किया जाता है जो नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियों के मध्य तथा उत्तर एवं दक्षिण की खंड के मध्य स्थित है। यह क्षेत्र अवशेषी भाग के रूप में जाना जाता है। इस अवशेषी भाग में पाए जाने वाले की चट्टानों का निर्माण पुराजीव कल्प(Paleozoic Era) और मध्य जीवकल्प(Mesozoic Era) में हुआ था ।विद्वानों का मत है कि इन युगों में संपूर्ण पृथ्वी पर विश्वव्यापी हलचलें हुई थी। इन हालचलों की क्रिया के फलस्वरुप पृथ्वी के समस्त धरातल का कुछ भाग ऊपर उठ गया था तथा कुछ भाग नीचे धँस गया था। 
           डिवोनियन युग के अंतर्गत होने वाली कैलीडोनियन हलचलों के अंतर्गत एशिया के इस मध्य धरातलीय भाग में अनेक मोड़दार पर्वतों का निर्माण हुआ। इसके बाद परमियन युग के अंतर्गत होने वाली हरसीनियन हलचलों के परिणामस्वरुप अनेक मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति हुई। इन पर्वतों पर बाद में अपदन क्रिया के फलस्वरूप इनका बाहरी रूप काफी घिस गया। इससे अनेक पर्वत अवशिष्ट पर्वत एवं पठारों का रूप ग्रहण कर गए। चीन का पठार भी इस प्रकार का रूपांतरित पठार है। अपनदन की क्रिया लंबे समय तक होने के कारण अधिकांश पर्वतों ने घिसकर समतल मैदान का रूप ले लिया।
 
निष्कर्ष  :
           निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि एशिया महाद्वीप में धरातलीय संरचना के अंतर्गत भी अनेक विशेषताएँ मिलती है। यहाँ पूरातन चट्टानों से लेकर टर्शियरी युग की चट्टानें पाई जाती है। उत्तर के प्राचीन भूखंड, दक्षिण के प्राचीन भूखंड के साथ-साथ महाद्वीपों के मध्य भाग में नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियाँ देखने को मिलता है। इसके अलावा यहाँ अवशेषी भाग भी पाए जाते हैं।
 
प्रश्न प्रारूप 
Q1. एशिया को संरचनात्मक इकाईयों में विभक्त कीजिए और उसमें से किसी एक का विशद विवरण दीजिए 
 अथवा 
Q2. एशिया की संचना के प्रमुख लक्षणों का वर्णन कीजिए 
अथवा  
Q3. एशिया की भू-रचना की विशेषताओं का वर्णन करें
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