Category POPULATION GEOGRAPHY (जनसंख्या भूगोल)

1. Population Distribution, Growth, and Determinants: Prehistoric Period, Ancient Period, Modern Period / जनसंख्या वितरण, वृद्धि और निर्धारक कारक: प्रागैतिहासिक काल, प्राचीन काल, आधुनिक काल

Population Distribution, Growth, and Determinants: Prehistoric Period, Ancient Period, Modern Period

Population Distribution

परिचय

    जनसंख्या वितरण से तात्पर्य पृथ्वी की सतह पर मानव जनसंख्या के स्थानिक फैलाव से है। यह वितरण समान नहीं है, बल्कि कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक सघनता और कुछ में विरलता पाई जाती है।

    जनसंख्या वितरण और वृद्धि को समझने के लिए इसे ऐतिहासिक कालों में विभाजित किया जाता है:-

1. प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Period)- लगभग 10,000 ईसा पूर्व तक।

2. प्राचीन काल (Ancient Period)- लगभग 10,000 ईसा पूर्व से 1700 ई. तक।

3. आधुनिक काल (Modern Period)- लगभग 1700 ई. से वर्तमान तक।

1. प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Period):-

   प्रागैतिहासिक काल मानव इतिहास का प्रारंभिक चरण है, जो लगभग 10,000 ईसा पूर्व तक माना जाता है। इस काल में मानव ने लेखन, कृषि एवं स्थायी सभ्यता का विकास नहीं किया था और उसका जीवन पूर्णतः प्रकृति पर निर्भर था।

     इस समय जनसंख्या का वितरण अत्यंत असमान एवं विरल था। लोग भोजन की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। जनसंख्या वृद्धि लगभग स्थिर थी क्योंकि उच्च मृत्यु दर, रोगों का अभावपूर्ण उपचार, प्राकृतिक आपदाएँ तथा अल्प जीवन प्रत्याशा प्रमुख बाधक थे। प्राकृतिक वातावरण इस काल का सबसे बड़ा निर्धारक था। 

(i) जनसंख्या वितरण की विशेषताएँ:

          प्रागैतिहासिक काल में जनसंख्या अत्यंत विरल और असमान रूप से वितरित थी। मानव शिकारी एवं संग्रहकर्ता था तथा नदी घाटियों, जंगलों और जल स्रोतों के निकट अस्थायी बसाव करता था। घुमंतू जीवन शैली इस काल की प्रमुख विशेषता थी। अर्थात संक्षेप में

✍️ जनसंख्या अत्यंत विरल थी

✍️ मानव शिकारी एवं संग्रहकर्ता (Hunting–Gathering Stage) था

✍️ नदी घाटियों, वन क्षेत्रों और जल स्रोतों के समीप अस्थायी बसाव

✍️ घुमंतू जीवन शैली

(ii) जनसंख्या वृद्धि की स्थिति:

    इस काल में जनसंख्या वृद्धि दर अत्यंत धीमी थी। उच्च मृत्यु दर, सीमित जन्म दर, रोगों और प्राकृतिक आपदाओं के कारण जनसंख्या में स्थायित्व बना रहा। जीवन प्रत्याशा बहुत कम होने से जनसंख्या वृद्धि लगभग नगण्य थी। अर्थात संक्षेप में

✍️ जनसंख्या वृद्धि दर अत्यंत धीमी

✍️ उच्च मृत्यु दर

✍️ जन्म दर भी सीमित

(iii) जनसंख्या वृद्धि के निर्धारक (Determinants)

(क) प्राकृतिक कारक:-

       जलवायु की अनिश्चितता, कठोर मौसम तथा प्राकृतिक आपदाएँ जैसे बाढ़, सूखा और भूकंप मानव जीवन को प्रभावित करते थे। इन कारणों से मृत्यु दर अधिक थी और जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित बनी रही।

(ख) जैविक कारक:-

    इस काल में रोगों के उपचार का अभाव था। संक्रामक बीमारियाँ तेजी से फैलती थीं और औसत जीवन प्रत्याशा बहुत कम थी। इन जैविक कारणों ने जनसंख्या वृद्धि को गंभीर रूप से सीमित किया।

(ग) आर्थिक कारक:-

      भोजन उत्पादन का अभाव प्रागैतिहासिक काल की प्रमुख आर्थिक विशेषता थी। मानव शिकार और कंद-मूल पर निर्भर था, जिससे भोजन की अनिश्चितता बनी रहती थी और जनसंख्या के विस्तार की संभावना कम थी।

(घ) सामाजिक कारक:-

     प्रागैतिहासिक समाज असंगठित था। स्थायी परिवार, सामाजिक संस्थाएँ और राज्य व्यवस्था का अभाव था। सामाजिक अस्थिरता और सुरक्षा की कमी के कारण जनसंख्या वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उपलब्ध नहीं थीं।

निष्कर्ष:

     प्रागैतिहासिक काल में मानव जनसंख्या स्थिरता के बजाय संघर्ष आधारित अस्तित्व पर निर्भर थी।

2. प्राचीन काल (Ancient Period):-

    प्राचीन काल का समय लगभग 10,000 ईसा पूर्व से 1700 ई. तक माना जाता है। इस अवधि में मानव समाज ने शिकारी अवस्था से निकलकर कृषि आधारित स्थायी जीवन अपनाया, जिससे जनसंख्या वितरण एवं वृद्धि में महत्वपूर्ण परिवर्तन आए।

    प्राचीन काल में कृषि की खोज मानव इतिहास की निर्णायक घटना सिद्ध हुई। स्थायी बस्तियाँ विकसित हुईं और नदी घाटी क्षेत्रों में जनसंख्या सघन होने लगी। इस काल में जन्म दर ऊँची थी, किंतु मृत्यु दर भी अधिक होने के कारण जनसंख्या वृद्धि सीमित रही। कृषि विकास, पशुपालन, सामाजिक संगठन और राज्य व्यवस्था सकारात्मक निर्धारक थे, जबकि युद्ध, अकाल और महामारियाँ नकारात्मक कारक रहीं।

(i) जनसंख्या वितरण की विशेषताएँ:

कृषि की शुरुआत-   

    नवपाषाण क्रांति (Neolithic Revolution) के अंतर्गत कृषि की शुरुआत हुई, जिससे मानव भोजन उत्पादन करने लगा। इससे स्थायी निवास संभव हुआ और जनसंख्या का संकेन्द्रण उपजाऊ क्षेत्रों में बढ़ने लगा।

स्थायी बस्तियों का विकास-

      कृषि पर आधारित जीवन ने घुमंतू जीवन को समाप्त किया और गाँवों व कस्बों का विकास हुआ। स्थायी बस्तियों ने सामाजिक संगठन को मजबूत किया और जनसंख्या को एक स्थान पर टिकने में सहायता की।

नदी घाटियों में जनसंख्या सघनता-

     नदियों के किनारे उपजाऊ मिट्टी, जल उपलब्धता और परिवहन सुविधा के कारण जनसंख्या अधिक सघन हुई। नदी घाटियाँ प्राचीन काल की प्रमुख मानव बसावट क्षेत्र रहीं।

सिंधु, नील, दजला-फरात, ह्वांग-हो-

      इन नदी घाटियों में विकसित सभ्यताओं ने कृषि, व्यापार और नगरीय जीवन को बढ़ावा दिया। परिणामस्वरूप यहाँ जनसंख्या घनत्व अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक पाया गया।

नगरों एवं सभ्यताओं का उदय

    कृषि अधिशेष के कारण नगरों का विकास हुआ। नगर सभ्यताओं ने प्रशासन, व्यापार और संस्कृति को संगठित किया, जिससे जनसंख्या वितरण अधिक केंद्रित एवं संरचित हुआ।

(ii) जनसंख्या वृद्धि की स्थिति:

धीमी लेकिन स्थिर वृद्धि-

     प्रागैतिहासिक काल की तुलना में जनसंख्या वृद्धि अधिक थी, परंतु तकनीकी सीमाओं और स्वास्थ्य समस्याओं के कारण यह वृद्धि धीमी और नियंत्रित बनी रही।

जन्म दर अधिक, मृत्यु दर भी ऊँची-

    इस काल में सामाजिक कारणों से जन्म दर अधिक थी, किंतु रोग, अकाल और चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में मृत्यु दर भी ऊँची बनी रही।

महामारी और युद्ध वृद्धि में बाधक-

   लगातार युद्धों और महामारियों ने बड़े पैमाने पर जनहानि की, जिससे जनसंख्या वृद्धि बार-बार बाधित होती रही।

(iii) जनसंख्या वृद्धि के निर्धारक-

कृषि विकास-

    कृषि विकास ने खाद्य सुरक्षा प्रदान की और स्थायी जीवन को संभव बनाया, जिससे जनसंख्या वृद्धि को आधार मिला।

खाद्य उत्पादन में वृद्धि-

    खाद्य उत्पादन बढ़ने से भुखमरी कम हुई और जीवन प्रत्याशा में वृद्धि हुई, जिससे जनसंख्या धीरे-धीरे बढ़ी।

सामाजिक संगठन-

     परिवार, विवाह व्यवस्था और सामाजिक नियमों ने जनसंख्या वृद्धि को सामाजिक स्वीकृति प्रदान की और समाज को स्थिरता दी।

परिवार एवं राज्य व्यवस्था-

   संयुक्त परिवार प्रणाली और संगठित राज्य व्यवस्था ने सुरक्षा, कानून और संसाधनों का प्रबंधन किया, जिससे जनसंख्या वृद्धि के अनुकूल वातावरण बना।

तकनीकी कारक-

    कृषि उपकरणों, भंडारण और परिवहन तकनीकों ने उत्पादन क्षमता बढ़ाई, जिससे जीवन स्तर में सुधार और जनसंख्या वृद्धि संभव हुई।

सिंचाई एवं पशुपालन-

    सिंचाई से कृषि को स्थिरता मिली और पशुपालन से पोषण एवं श्रम शक्ति बढ़ी, जिसने जनसंख्या विस्तार में योगदान दिया।

युद्ध-

   लगातार युद्धों ने जनसंख्या को नष्ट किया और आर्थिक संसाधनों को क्षति पहुँचाई, जिससे जनसंख्या वृद्धि बाधित हुई।

अकाल-

  अकाल के समय खाद्य संकट से मृत्यु दर बढ़ी और जनसंख्या में गिरावट देखी गई।

महामारी (Plague, Smallpox)-

   प्लेग और चेचक जैसी महामारियों ने बड़े पैमाने पर जनसंख्या को प्रभावित किया और कई क्षेत्रों में जनसंख्या ह्रास का कारण बनीं।

निष्कर्ष:

   प्राचीन काल में जनसंख्या वितरण नदी आधारित सभ्यताओं तक सीमित रहा और वृद्धि नियंत्रित रही।

3. आधुनिक काल (Modern Period):-

    आधुनिक काल का आरंभ लगभग 1700 ई. से माना जाता है, जो औद्योगिक क्रांति के साथ जुड़ा हुआ है। यह काल वर्तमान समय तक विस्तृत है और इसे जनसंख्या इतिहास का सबसे गतिशील एवं परिवर्तनशील चरण माना जाता है।

     आधुनिक काल में औद्योगिक क्रांति, वैज्ञानिक आविष्कार और चिकित्सा सुविधाओं ने मृत्यु दर को अत्यंत कम कर दिया। परिणामस्वरूप 19वीं एवं 20वीं सदी में तीव्र जनसंख्या वृद्धि हुई।

      शिक्षा, परिवार नियोजन, शहरीकरण और सरकारी नीतियाँ आधुनिक काल के प्रमुख निर्धारक हैं। आज विकसित देशों में निम्न जन्म-मृत्यु दर के कारण जनसंख्या स्थिर है, जबकि विकासशील देशों में वृद्धि अभी भी अधिक है।

(i) जनसंख्या वितरण की विशेषताएँ

   आधुनिक काल में जनसंख्या वितरण में व्यापक स्थानिक परिवर्तन देखने को मिलता है-

औद्योगीकरण एवं शहरीकरण

✍️ उद्योगों के विकास से नगरों का तीव्र विस्तार हुआ

✍️ ग्रामीण से शहरी प्रवास में वृद्धि

✍️ महानगरों में अत्यधिक जनसंख्या संकेंद्रण

जनसंख्या का तीव्र विस्तार

✍️ विश्व जनसंख्या में अभूतपूर्व वृद्धि

✍️ 1800 में लगभग 1 अरब से बढ़कर आज 8 अरब से अधिक

विकसित क्षेत्रों में अधिक घनत्व

✍️ पश्चिमी यूरोप, जापान, पूर्वी एशिया एवं उत्तरी अमेरिका

✍️ उद्योग, परिवहन एवं सेवाओं की सघनता

वैश्विक असमान वितरण

✍️ कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक जनसंख्या दबाव

✍️ मरुस्थल, ध्रुवीय प्रदेश एवं पर्वतीय क्षेत्रों में विरल जनसंख्या

(ii) जनसंख्या वृद्धि की स्थिति

18वीं-20वीं सदी में जनसंख्या विस्फोट

✍️ औद्योगिक एवं चिकित्सा प्रगति के कारण मृत्यु दर में तीव्र कमी

✍️ जन्म दर लंबे समय तक ऊँची बनी रही

मृत्यु दर में तीव्र गिरावट

✍️महामारी नियंत्रण

✍️स्वच्छता, शुद्ध पेयजल और बेहतर आवास

चिकित्सा एवं पोषण में सुधार

✍️टीकाकरण कार्यक्रम

✍️संतुलित आहार एवं खाद्य सुरक्षा

✍️जीवन प्रत्याशा में वृद्धि

(iii) जनसंख्या वृद्धि के निर्धारक (Determinants)

वैज्ञानिक एवं तकनीकी कारक

✍️आधुनिक चिकित्सा विज्ञान

✍️एंटीबायोटिक्स एवं टीकाकरण

✍️शिशु एवं मातृ मृत्यु दर में कमी

आर्थिक कारक

✍️औद्योगिक रोजगार के अवसर

✍️आय में वृद्धि

✍️जीवन स्तर में सुधार

✍️परिवहन एवं संचार साधनों का विकास

सामाजिक कारक

✍️शिक्षा का प्रसार (विशेषकर महिला शिक्षा)

✍️सामाजिक जागरूकता

✍️परिवार नियोजन कार्यक्रम

✍️विवाह की आयु में वृद्धि

राजनीतिक कारक

✍️राष्ट्रीय जनसंख्या नीतियाँ

✍️स्वास्थ्य एवं कल्याण योजनाएँ

✍️सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम

जनसांख्यिकीय संक्रमण सिद्धांत

✍️आधुनिक काल में अधिकांश देश

✍️उच्च जन्म–मृत्यु दर से

✍️निम्न जन्म–मृत्यु दर की अवस्था की ओर बढ़े

✍️यह परिवर्तन आर्थिक विकास एवं सामाजिक परिवर्तन से जुड़ा है

(iv) वर्तमान स्थिति

विकसित देशों में

✍️जन्म दर अत्यंत कम

✍️वृद्ध जनसंख्या का अनुपात अधिक

✍️कुछ देशों में जनसंख्या घट रही है

विकासशील देशों में

✍️जन्म दर अपेक्षाकृत अधिक

✍️युवा जनसंख्या का प्रभुत्व

✍️तीव्र जनसंख्या वृद्धि एवं संसाधनों पर दबाव

निष्कर्ष:

   आधुनिक काल में जनसंख्या वितरण एवं वृद्धि प्राकृतिक नियंत्रण से मुक्त होकर मानव-निर्मित सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कारकों पर आधारित हो गई है। यह काल मानव इतिहास में जनसंख्या परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण चरण है, जिसने वर्तमान वैश्विक जनसंख्या संरचना को आकार दिया है।

तुलनात्मक अध्ययन (संक्षेप में)

काल वितरण वृद्धि दर प्रमुख निर्धारक
प्रागैतिहासिक विरल अत्यंत धीमी प्रकृति, रोग
प्राचीन नदी घाटियाँ धीमी कृषि, युद्ध
आधुनिक असमान, शहरी तीव्र (पूर्व में) विज्ञान, नीति

समग्र निष्कर्ष

      जनसंख्या वितरण और वृद्धि मानव सभ्यता के विकास का दर्पण है। जहाँ प्रागैतिहासिक काल में जनसंख्या प्राकृतिक सीमाओं से नियंत्रित थी, वहीं आधुनिक काल में मानव स्वयं जनसंख्या परिवर्तन का प्रमुख निर्धारक बन चुका है।

10. Population Composition, Growth, Density and Distribution (World) / जनसंख्या संरचना, वृद्धि, घनत्व और वितरण (विश्व)

Population Composition, Growth, Density and Distribution (World)

जनसंख्या संरचना, वृद्धि, घनत्व और वितरण (विश्व)



       विश्व की जनसंख्या संरचना, वृद्धि, घनत्व और वितरण एक जटिल विषय है जो भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कारकों से प्रभावित होता है। जनसंख्या संरचना में उम्र, लिंग, जातीयता और सामाजिक-आर्थिक स्थिति जैसे कारक शामिल हैं। जनसंख्या वृद्धि जन्म दर, मृत्यु दर और प्रवास जैसे कारकों से प्रभावित होती है। जनसंख्या घनत्व प्रति इकाई क्षेत्र में लोगों की संख्या को दर्शाता है जबकि जनसंख्या वितरण से तात्पर्य है कि पृथ्वी की सतह पर लोग कैसे फैले हुए हैं।

Population Composition

जनसंख्या संरचना

    जनसंख्या संरचना से तात्पर्य जनसंख्या के विभिन्न घटकों जैसे आयु, लिंग, जातीयता, शिक्षा, व्यवसाय, आदि के आधार पर जनसंख्या का विभाजन है। यह जनसंख्या की गुणात्मक विशेषताओं को दर्शाता है और इससे किसी क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिशीलता को समझने में काफी मदद होती है।
     विश्व की जनसंख्या संरचना के कुछ प्रमुख तत्व इस प्रकार हैं:-
1. आयु संरचना:
किसी जनसंख्या में विभिन्न आयु समूहों के लोगों का अनुपात को आयु संरचना कहा जाता है।

⇒ यह जनसंख्या की वृद्धि दर, विकास दर और भविष्य की संभावनाओं को समझने में मदद करता है।

⇒ उदाहरण के लिए, युवा जनसंख्या वाले देशों में उच्च जन्म दर और तीव्र जनसंख्या वृद्धि की संभावना होती है, जबकि वृद्ध जनसंख्या वाले देशों में धीमी वृद्धि या जनसंख्या में कमी हो सकती है। 

2. लिंग संरचना:
⇒ किसी जनसंख्या में पुरुषों और महिलाओं का अनुपात को लिंग संरचना कहा जाता है।

⇒ यह सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारकों से प्रभावित होता है।

⇒ उदाहरण के लिए, कुछ देशों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में अधिक हो सकती है, जबकि अन्य में इसके विपरीत हो सकता है। 

3. जातीय संरचना:
⇒ किसी जनसंख्या में विभिन्न जातीय समूहों का अनुपात को जातीय संरचना कहा जाता है।

⇒ यह सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है।

⇒ उदाहरण के लिए, कुछ देशों में एक ही जातीय समूह के लोग अधिक संख्या में हो सकते हैं, जबकि अन्य में कई जातीय समूहों का मिश्रण हो सकता है।

4. शिक्षा:

⇒ किसी जनसंख्या में शिक्षित और अशिक्षित लोगों का अनुपात।

⇒ यह जनसंख्या की साक्षरता दर, कौशल स्तर और आर्थिक विकास को दर्शाता है।

⇒ उदाहरण के लिए, उच्च साक्षरता दर वाले देशों में बेहतर स्वास्थ्य, आर्थिक विकास और सामाजिक प्रगति की संभावना होती है।

5. व्यवसाय:

⇒ किसी जनसंख्या में विभिन्न व्यवसायों में लगे लोगों का अनुपात।

⇒ यह जनसंख्या की आर्थिक गतिविधियों, कौशल स्तर और जीवन स्तर को दर्शाता है।

⇒ उदाहरण के लिए, कृषि प्रधान देशों में अधिकांश लोग कृषि कार्यों में लगे हो सकते हैं, जबकि औद्योगिक देशों में औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में अधिक लोग काम करते हैं। 

जनसंख्या संरचना का महत्व:

⇒ यह किसी देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

⇒ यह सरकारों और नीति निर्माताओं को जनसंख्या से संबंधित नीतियों और कार्यक्रमों को बनाने में मदद करती है।

⇒ यह जनसंख्या की वृद्धि दर, विकास दर और भविष्य की संभावनाओं का अनुमान लगाने में मदद करती है।

⇒ यह व्यवसायों को अपने उत्पादों और सेवाओं को लक्षित करने में मदद करता है।

जनसंख्या वृद्धि

    जनसंख्या वृद्धि का अर्थ है किसी क्षेत्र में लोगों की संख्या में समय के साथ होने वाली वृद्धि। यह वृद्धि जन्म दर, मृत्यु दर और प्रवास जैसे कारकों से प्रभावित होती है। 

     कृषि की शुरुआत के पूर्व जन्म दर एवं मृत्यु दर में लगभग संतुलन था, फलस्वरूप जनसंख्या लगभग स्थिर थी। कृषि के विकास के साथ खाद्य पदार्थों की आपूर्ति बढ़ने पर जन्म दर मृत्यु दर की तुलना में अधिक होने लगी, फलस्वरूप लम्बे समय तक जनसंख्या में धीरे-धीरे वृद्धि होती रही। परन्तु औद्योगिक क्रांति के पश्चात खाद्यान्न उत्पादन में तीव्र वृद्धि एवं चिकित्सा सुविधाओं के प्रसार के साथ जनसंख्या में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि होने लगी। पिछले कुछ दशकों में यह वृद्धि विस्फोटक रूप धारण कर चुकी है।

विश्व जनसँख्या में वृद्धि
वर्ष जनसँख्या
1 ई० 2 करोड़
1000 30 करोड़
1650 50 करोड़
1850 100 करोड़
1930 200 करोड़
1960 300 करोड़
1975 400 करोड़
1987 500 करोड़
1999 600 करोड़
2011 700 करोड़
2022 800 करोड़

⇒ पिछली एक शताब्दी में U.S.A की जनसंख्या में 350 प्रतिशत वृद्धि हुई है जबकि भारत में यह वृद्धि 257 प्रतिशत है।

⇒ पिछले 37 वर्षों में विश्व की जनसंख्या दुगुनी हो गई है।

⇒ वर्तमान जनसंख्या वृद्धि दर के अनुसार फ्रांस, जापान, अमेरिका, भारत एवं कीनिया की जनसंख्या क्रमशः 178, 124, 102, 33 एवं 18 वर्षों में दुगुनी हो जाएगी।

⇒ 1950 ई. के पूर्व विकसित देशों की जनसंख्या वृद्धि दर विकासशील देशों की जनसंख्या वृद्धि दर की तुलना में अधिक थी, परन्तु 1950 के पश्चात् विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों की जनसंख्या वृद्धि दर अधिक हो गई है।

⇒ इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में विश्व की कुल जनसंख्या 6 अरब हो गई। मात्र एक शताब्दी में ही यह 1.6 अरब से चार गुनी बढ़ गई। हम प्रतिवर्ष आठ करोड़ व्यक्ति जोड़ रहे हैं। वास्वत में गत 500 वर्षों में मानव जनसंख्या में दस गुने से अधिक की वृद्धि हुई है।

⇒ आज जनसंख्या की सर्वाधिक वृद्धि अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के कुछ भागों में हो रही है, जहां मृत्यु दर तेजी से घटी है जबकि जन्म दर काफी ऊंची है।

⇒ विश्व के दस सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में संसार की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या रहती है। इन दस देशों में से छः देश एशिया महाद्वीप में स्थित हैं। विश्व के प्रत्येक पांच व्यक्तियों में से एक व्यक्ति चीन में निवास करता है तथा प्रत्येक छः में से एक भारत में। भारत में एक हेक्टेयर कृषि भूमि पर 5 व्यक्ति, चीन में 12 व्यक्ति और संयुक्त राज्य अमेरिका में 1.5 व्यक्ति आश्रित हैं।

⇒ वास्तविक अर्थों में, विश्व की लगभग आधी जनसंख्या मात्र 5 प्रतिशत क्षेत्र पर ही संकेंद्रित है, जबकि कुल क्षेत्रफल का 33 प्रतिशत भाग लगभग निर्जन है।

⇒ वर्तमान समय में विश्व में जनसंख्या वृद्धि दर 1% है। विकसित देशों में से विकासशील देशों में भी वृद्धि दर कम हो रही है। अनुमान है कि विश्व की जनसंख्या 2022 में 8 अरब तथा वर्ष 2037 में 9 अरब तक पहुंच जाएगी। 

⇒ अफ्रीका की वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर (2.5 प्रतिशत) आज विश्व के प्रमुख देशों में सबसे अधिक है। अफ्रीका की सबसे अधिक आबादी वाले देश नाइजीरिया में जनसंख्या वृद्धि की वार्षिक दर 2.4 प्रतिशत है।

⇒ नाइजीरिया की वर्तमान जनसंख्या 22 करोड़ है जो इस दर से अगले 25 वर्षों से कम समय में ही दोगुनी हो जायेगी।

⇒ दक्षिण अमेरिका, एशिया, ओशिनिया और उत्तरी अमेरिका में औसत वार्षिक वृद्धि दर 1 से 2 प्रतिशत के बीच है। इसके विपरीत यूरोप में वृद्धि दर न्यूनतम अर्थात 0.2 प्रतिशत ही है।

⇒ रूस और यूक्रेन, दोनों ही सीआईएस (स्वतंत्र राज्यों का राष्ट्रमंडल) के सदस्य हैं, प्राकृतिक जनसंख्या परिवर्तन के मामले में चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। दोनों देशों में जन्म दर कम है और मृत्यु दर अधिक है, जिसके परिणामस्वरूप जनसंख्या वृद्धि धीमी है या नकारात्मक है। इसके अतिरिक्त, यूक्रेन में रूस के साथ युद्ध के कारण जनसंख्या में भारी गिरावट आई है, जिसमें शरणार्थी संकट और मृत्यु दर शामिल है। 

      जनसंख्या वृद्धि दर की दृष्टि से संपूर्ण विश्व को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:-

(i) अत्यधिक वृद्धि दर:-

     इसके अंतर्गत वे देश आते है, जहां वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर 3% से भी अधिक है। विश्व में अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि दर वाले देशों में, कुछ अफ्रीकी देश सबसे आगे हैं, जैसे कि नाइजर, अंगोला, बेनिन और युगांडा इसके अलावा, सीरिया भी इस सूची में शामिल है। इन देशों में जन्म दर मृत्यु दर से काफी अधिक है, और मृत्यु दर में भी कमी आई है, जिससे जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। 2100 तक, दुनिया की एक तिहाई आबादी अफ्रीकी हो सकती है।

(ii) अधिक वृद्धि दर:-

    इस वर्ग के देशों में जनसंख्या वृद्धि की वार्षिक गति 2% से 3% के बीच है। इसके अंतर्गत मध्य अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, द. पू. एशिया सहित एशिया के अनेक देश आते हैं, जैसे: बांग्लादेश

(iii) मध्यम वृद्धि दर:-

    विश्व के मध्यम जनसंख्या वृद्धि दर वाले देशों में मुख्य रूप से वे देश शामिल हैं जिनकी जनसंख्या वृद्धि दर 1% से 2% के बीच है। इन देशों में आमतौर पर विकासशील देश शामिल होते हैं, जहाँ जन्म दर अधिक होती है, लेकिन मृत्यु दर में भी सुधार हो रहा है, जिससे जनसंख्या में वृद्धि होती है।, जैसे:

उदाहरण के लिए, कुछ मध्यम जनसंख्या वृद्धि दर वाले देश हैं: 

⇒ अफ्रीका: नाइजीरिया, इथियोपिया, तंजानिया।

⇒ एशिया: भारत, पाकिस्तान, इंडोनेशिया।

⇒ मध्य पूर्व: सऊदी अरब, ईरान।

⇒ लैटिन अमेरिका: मेक्सिको, ब्राजील।

(iv) न्यून वृद्धि दर:-

     इस वर्ग के देशों में जनसंख्या वृद्धि दर 1% से भी कम है। इसके अंतर्गत अधिकांश विकसित देश आते हैं। कुछ विकसित देशों में जनसंख्या में स्थायित्व आ चुका है एवं जनसंख्या ह्रास की प्रवृत्ति है, जैसे: अमेरिका- 0.5%, जापान- (-०.4%)।

जनसंख्या घनत्व

⇒ जनसंख्या घनत्व का अर्थ सामान्यतः किसी क्षेत्र में प्रति वर्ग किलोमीटर या प्रति मील अथवा प्रति हेक्टेयर में निवास करने वाली जनसंख्या से लगाया जाता है।

⇒ जनसंख्या घनत्व एक निश्चित भू-भाग के संपूर्ण क्षेत्र एवं कुल जनसंख्या का अनुपात है।

⇒ जनसंख्या घनत्व के अध्ययन से हमे यह किसी क्षेत्र विशेष जनसंख्या भार, जनाधिक्य एवं जनाभाव, अनुकूलतम जनसंख्या आदि की जानकारी प्राप्त होती है।

⇒ जनसंख्या घनत्व की संकल्पना का उपयोग 1837 में हेनरी ड्यूटी द्वारा आयरलैंड में किया गया था।

⇒ जनसँख्या घनत्व से मनुष्य एवं भूमि के निरन्तर बदलते सम्बन्धों को बताया जा सकता है किन्तु कम बसे एवं अधिक संसाधन वाले रूस, संयुक्त राज्य, ब्राजील जैसे देशों में यह वृद्धि उत्साहजनक मानी जाती है, जबकि चीन, भारत, जापान, बांग्लादेश, इण्डोनेशिया जैसे सीमित संसाधनों वाले एवं अत्यधिक जनसंख्या वाले देशों में यह वृद्धि निराशाजनक एवं अभिशाप भी मानी जाती है।

      जनसंख्या घनत्व निम्नलिखित प्रकार का होता है:-

(1) गणितीय घनत्व:-

     यह वास्तविक घनत्व भी कहलाता है। किसी क्षेत्र की जनसंख्या और वहाँ के क्षेत्रफल के अनुपात को गणितीय घनत्व कहा जाता है। यह मानव एवं भूमि अनुपात भी कहलाता है। इसे निम्नांकित सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है-

गणितीय घनत्व = कुल जनसंख्या / कुल क्षेत्रफल

(2) कृषि घनत्व:-

     यह घनत्व किसी प्रदेश की कृषिगत भूमि एवं उस क्षेत्र में निवास करने वाली कृषि जनसंख्या के अनुपात से प्राप्त होता है। इसका सूत्र निम्न है-

कृषि घनत्व = कृषक जनसंख्या / कृषिगत भूमि का क्षेत्रफल

   कृषि जनसंख्या में वयस्क कृषक तथा कृषि श्रमिक तथा उनके परिवार सम्मिलित होते हैं।
(3) आर्थिक घनत्व:-

    यह घनत्व किसी प्रदेश के आर्थिक संसाधनों की उत्पादन क्षमता एवं वहाँ की जनसंख्या अनुपात से प्राप्त होता है, जैसे-

आर्थिक घनत्व = प्रदेश की जनसंख्या / प्रदेश के संसाधनों की उत्पादन क्षमता

  आर्थिक घनत्व निकालना थोड़ा जटिल होता है क्योंकि आर्थिक संसाधनों का मूल्यांकन करना आसान कार्य नहीं है।

(4) कायिकी घनत्व:-

    इसे कुल क्षेत्रफल के स्थान पर कुल कृषि भूमि से जनसंख्या को विभाजित करके प्राप्त किया जाता है।

कायिकी घनत्व = देश की कुल जनसंख्या/देश की कुल कृषि योग्य भूमि

(5) पौष्टिक घनत्व:-

    इस घनत्व से कृषि भूमि की भार वहन क्षमता ज्ञात होती है। इस घनत्व को भोज्य फसलों के उत्पादक क्षेत्र के क्षेत्रफल तथा उस क्षेत्र में पायी जाने वाली समस्त जनसंख्या के अनुपात से ज्ञात किया जाता है।

पौष्टिक घनत्व = कुल जनसंख्या / खाद्यान्न फसलों के अन्तर्गत क्षेत्र

(6) अधिवासीय घनत्व:-

    यदि कुल क्षेत्रफल के स्थान पर कुल मानव अधिवासीय क्षेत्र जनसंख्या को विभाजित किया जाय तो इसे अधिवासीय घनत्व कहा जाता है।

(7) नगरीय तथा ग्रामीण घनत्व:-

      नगरीय क्षेत्र की प्रति इकाई और ग्रामीण प्रति इकाई में जितने व्यक्ति निवास करते हैं, इसे नगरीय एवं ग्रामीण जनसंख्या घनत्व कहते है।

विश्व की जनसंख्या का घनत्व (Density of Population of the World):-
     विश्व में जिस प्रकार अधिकांश देशों की कुल जनसंख्या में बहुत अधिक अन्तर है, उसी भाँति देशो के जनसंख्या घनत्व में जमीन-आसमान का अन्तर पाया जाता है।

       जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से विश्व को पाँच भागों में विभाजित किया जा सकता है:-

(1) सबसे अधिक घनत्व वाले देश (प्रदेश):-

     जहाँ का घनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से अधिक है, ऐसे देश इसके अन्तर्गत आते है। विकासशील देशों के कृषि, औद्योगिक एवं नगरीय क्षेत्रों में एवं विकसित देशों में औद्योगिक एवं व्यापारिक केन्द्रों (नगर) में सभी स्थानों पर आबादी घनी पायी जाती है। दक्षिणी व द.-पू. एशिया की नदी घाटियों एवं उपजाऊ मैदानों में तथा पश्चिमी यूरोप की औद्योगिक पेटी में एवं संयुक्त राज्य का मध्यवर्ती व पूर्वी औद्योगिक प्रदेश सभी में जनसंख्या का घनत्व बहुत ही अधिक है।

(2) घने बसे प्रदेश:-

     इनका घनत्व 200 से 400 मनुष्य प्रति वर्ग किमी० है। इस भाग में भारत, यूरोप और चीन के कृषि-प्रधान क्षेत्र है जिनके बीच-बीच में औद्योगिक क्षेत्रों की पेटियाँ मिलती है, अतः कई भागो में स्थानीय घनत्व 400 मनुष्य से भी अधिक का हो जाता है। उपयुक्त जलवायु, पर्याप्त जलवृष्टि तथा उपजाऊ भूमि के कारण घनत्व अधिक मिलता है।

(3) मध्यम घनत्व वाले प्रदेश:-

     इनमें प्रति वर्ग किमी 50 से 250 मनुष्य तक पाये जाते है। ऐसे भागो में मिसीसिपी नदी का मैदान और उसके संलग्न उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र, अधिकांश पूर्वी यूरोप के देश, मुख्य चीन के उत्तरी-पश्चिमी तथा हिन्दचीन के पूर्वी और भारत के उत्तरी-पश्चिमी भाग विशेष रूप से सम्मिलित किये जाते है। इनमे वर्षा की मात्रा कम होने पर सिचाई की जाती है और उपयुक्त क्षेत्रों में खेती की जाती है।

(4) कम घनत्व वाले प्रदेश:-

     इनका प्रति वर्ग किमी घनत्व 5 से 50 होता है। जिन क्षेत्रों में घास के मैदान पाये जाते है, वहाँ पशुपालन अथवा अनुकूल स्थिति में सिंचित कृषि की जाती है। एशिया, अफ्रीका एवं उत्तरी व दक्षिणी घास के मैदानों में ऐसी ही स्थिति है।

(5) जनविहीन प्रदेश:-

     अत्यधिक ठण्डे एवं बर्फ से ढंके ध्रुवीय व उपधुवीय प्रदेश, घने वनों से ढंके प्रदेश, ऊँचे पर्वत, पठारी भाग, उष्ण व शीतोष्ण मरुस्थल विश्व के प्रायः जनशून्य प्रदेश है। यहाँ पर दूर-दूर इनी-गिनी झोपड़ियाँ पायी जाती है। यहाँ जनसंख्या का घनत्व 2 से भी कम पाया जाता है।

विश्व में जनसंख्या वितरण

    विश्व में जनसंख्या के वितरण पर भौतिक (जलवायु, स्थलाकृति, मिट्टी, खनिज आदि), सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं जनसांख्यिकीय कारकों का प्रभाव पड़ा है।

⇒ विश्व की 60 प्रतिशत जनसंख्या 200 मीटर से कम एवं 80 प्रतिशत जनसंख्या 500 मीटर से कम ऊँचाई वाले भागों में निवास करती है।

⇒ उष्ण मरुस्थलों में विरल जनसंख्या का प्रमुख कारण निम्न वर्षा है न कि उच्च तापमान।

⇒ विश्व की कुल जनसंख्या का 90 प्रतिशत भाग उत्तरी गोलार्द्ध में एवं 10% दक्षिणी गोलार्द्ध में निवास करता है।
⇒ एशिया में 20° से 40° उत्तरी अक्षांश के बीच विश्व की 50% से भी अधिक जनसंख्या निवास करती है। इसी प्रकार यूरोप में 40° से 60° अक्षांश के बीच विश्व की 30% जनसंख्या निवास करती है।

⇒  60° अक्षांश के उत्तर विश्व की मात्र 1 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।

⇒ विश्व की लगभग 50 प्रतिशत जनसंख्या 5 प्रतिशत से भी कम भू-भाग पर निवास करती है।

⇒ विश्व की 75 प्रतिशत जनसंख्या समुद्री तट से 1000 कि.मी. से कम दूरी पर एवं 66 प्रतिशत जनसंख्या समुदी तट से 500 कि.मी. से कम दूरी पर बसी हुई है।

⇒ विश्व का लगभग एक-तिहाई भाग शीत एवं शुष्कता के कारण मानव अधिवास के अनुपयुक्त है। इस प्रकार महाद्वीपों के कुल क्षेत्रफल का 55 से 60 प्रतिशत भाग अधिवास योग्य या एक्यूमीन (Ecumene) है।

⇒ कठोर जलवायु के कारण अंटार्कटिका महाद्वीप जनशून्य है एवं ग्रीनलैंड में जनसंख्या का घनत्व 1 व्यक्ति प्रति 50 वर्ग कि.मी. है।

⇒ इसी प्रकार अलास्का, आस्ट्रेलियाई मरुस्थल एवं अमेजन बेसिन में जनसंख्या का घनत्व क्रमशः 1 व्यक्ति प्रति 3 वर्ग कि.मी., 2.5 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. एवं 2 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. है।

⇒ दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया में उपयुक्त जलवायु एवं उपजाऊ मिट्टी के कारण सघन जनसंख्या पाई जाती है।

⇒ चीन की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या समुद्र तटीय क्षेत्रों एवं निम्न नदी घाटियों में निवास करती है, क्योंकि इन क्षेत्रों की जलवायु एवं मृदा कृषि कार्य के लिए उपयुक्त है। ⇒ मरुस्थलीय जलवायु के बावजूद नील घाटी एवं राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में काफी सघन जनसंख्या पाई जाती है।

⇒ जावा द्वीप पर ज्वालामखी लावा द्वारा निर्मित उपजाऊ मिट्टी के कारण सघन जनसंख्या पाई जाती है, जबकि सुमात्रा द्वीप पर अपक्षयण (Leached) एवं अनुपजाऊ मिट्टी के कारण जनसंख्या की सघनता कम है।

⇒ अनुपयुक्त भौतिक परिस्थितियों के बावजूद एण्डीज पर्वत के चुकाईकामाटा (तांबा खनन), कनाडा के यूरेनियम सिटी (यूरेनियम खनन); पश्चिमी आस्ट्रेलिया एवं दक्षिण अफ्रीका के मरुस्थलीय क्षेत्र (स्वर्ण खनन) के कुछ भागों में सघन जनसंख्या पाई जाती है।

      जनसंख्या वितरण की दृष्टि से विश्व को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:

1. सघन जनसंख्या के प्रदेश (Densly Populated Region):-

      इसके अंतर्गत विश्व के 5 प्रदेश आते हैं, जिनमें जनसंख्या का औसत घनत्त्व 100 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. से भी अधिक है:

(i) पूर्वी एशियाः चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, हांगकांग।

(ii) दक्षिणी एशियाः भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश नेपाल।

(iii) दक्षिण-पूर्वी एशिया

(iv) उत्तर-पश्चिमी यूरोपः ब्रिटेन, जर्मनी, हालैंड, बेल्जियम, लक्समबर्ग, फ्रांस, आयरलैंड, डेनमार्क, स्पेन, इटली।

(v) पूर्वी-उत्तर अमेरिकाः उत्तर-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिण-पूर्वी कनाडा।

     उपरोक्त क्षेत्रों के अलावा मिस्त्र में नील नदी की घाटी में भी जनसंख्या का घनत्व अधिक है।

⇒ प्रथम तीन क्षेत्रों में विश्व की 58 प्रतिशत जनसंख्या पाई जाती है।

⇒ जावा, ह्वांगहो का मैदान, चीन के पूर्वी तट, सिंगापुर, हांगकांग जैसे क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व 1000 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. से भी अधिक है।

⇒ जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से मकाओ का विश्व में प्रथम स्थान है।

2. विरल जनसंख्या के प्रदेश (Sparsely Populated Region):-

     विश्व के 5 प्रदेश ऐसे हैं, जहाँ जनसंख्या का घनत्व 10 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. से भी कम है। वास्तविकता यह है कि विश्व के 55 प्रतिशत भू-भाग पर मात्र 5 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।

(i) उच्च अक्षांशीय क्षेत्रः 60° अक्षांश से ऊपर विश्व की मात्र 1% जनसंख्या निवास करती है। आर्कटिक एवं अंटार्कटिक के अलावा उत्तरी अमेरिका के उत्तरी भाग, ग्रीनलैंड एवं साइबेरिया इसके अंतर्गत आते हैं।

(ii) मरुस्थलीय क्षेत्रः विश्व के सभी मरुस्थलों (उष्ण एवं शीतोष्ण) में जनसंख्या का घनत्व काफी कम है।

(iii) महाद्वीपीय जलवायु वाले आंतरिक प्रदेशः शुष्कता के कारण मध्य एशिया में जनसंख्या का घनत्व काफी कम है।

(iv) विषुवत रेखीय घने वनः इसके अंतर्गत अफ्रीका का कांगो बेसिन एवं द. अमेरिका का अमेजन बेसिन तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया के द्वीपीय क्षेत्र सम्मिलित हैं। इस प्रदेश की उष्ण एवं आर्द्र जलवायु, घने जंगल, मच्छर एवं सीसी-सीसी (Tsi-Tsi) मक्खी का प्रकोप जनसंख्या के विकास में बाधक है।

(v) उच्च पर्वतीय क्षेत्रः पर्वतों पर ऊँचाई के अनुसार जनसंख्या विरल होती जाती है। हिमालय, आल्पस, रॉकी एवं एण्डीज के पर्वतीय भागों में 2500 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले भाग निर्जन हैं।

3. सामान्य जनसंख्या के प्रदेशः-

     ये प्रदेश उपरोक्त दोनों प्रदेशों के मध्य स्थित हैं, जहां भौगोलिक परिस्थितियाँ न ही अधिक अनुकूल हैं और न ही प्रतिकूल।

     खनिजों के विदोहन के लिए विश्व के कई प्रतिकूल जलवायु वाले क्षेत्रों में बस्तियों का विकास किया गया है। उदाहरण के लिए स्वीडन के गैलीवारा (लौह अयस्क), कनाडा के यूकन घाना (सोना), अलास्का के यूकनपोर्ट (सोना), साइबेरिया (सोना, तेल, प्राकृतिक गैस) आदि।

    उष्ण कटिबंध के प्रतिकूल जलवायु के कारण अनेक बस्तियां समुद्र तल से 2000 मीटर से अधिक ऊँचाई पर बसी हुई हैं। जैसे अदीस अबाबा (इथियोपिया), कम्पाला (युगांडा), क्योटो (इक्वेडोर), नैरोबी (कीनिया), ऊटी (भारत) एवं कैण्डी (श्रीलंका)।

बोलीविया की राजधानी ला-पाज (La Paz): विश्व में सर्वाधिक ऊंचाई पर बसा हुआ नगर है। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई 3640 मीटर है।

निष्कर्ष:

    निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि जनसंख्या वितरण, घनत्व, वृद्धि और संरचना का अध्ययन महत्वपूर्ण है ताकि हम जनसंख्या के रुझानों को समझ सकें और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए योजना बना सकें। यह समझना कि जनसंख्या कैसे वितरित की जाती है और कैसे बदलती है, नीति निर्माताओं को संसाधनों का आवंटन करने और स्थायी विकास को बढ़ावा देने में मदद कर सकती है।

9. Theory of Optimum Population (अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धांत)

9. Theory of Optimum Population

(अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धांत)



अनुकूलतम जनसंख्या का अर्थ एवं परिभाषा 

    “अनुकूलतम जनसंख्या, उस सर्वोत्तम जनसंख्या को कहते हैं, जो किसी देश में एक निश्चित समय पर उपलब्ध साधनों का अधिकतम उपयोग करने अथवा अधिकतम उत्पादन करने के लिए आवश्यक होती है।” 

     इस कथन से स्पष्ट है कि जनसंख्या का आकार तभी अनुकूलतम माना जायेगा, जब प्रति व्यक्ति आय अधिकतम हो। इसका कारण यह है कि साधनों का सर्वोत्तम उपयोग होने पर अथवा उत्पादन के अधिकतम होने की दशा में ही प्रति व्यक्ति आय अधिकतम होती है।

प्रमुख परिभाषा

1. प्रो. रॉबिन्स के अनुसार, “अनुकूलतम जनसंख्या वह जनसंख्या है, जो अधिकतम उत्पादन को सम्भव बनाती है। 

2. प्रो. डॉल्टन के अनुसार, “अनुकूलतम जनसंख्या वह है जो अधिकतम प्रति व्यक्ति आय प्रदान करती है।

3. प्रो. बोल्डिंग के अनुसार, “वह जनसंख्या जिस पर जीवन स्तर अधिकतम होता है, अनुकूलतम जनसंख्या कहलाती है।”  

4. प्रो. हिक्स के अनुसार, “अनुकूलतम जनसंख्या, जनसंख्या का वह रूप है जिस पर प्रति व्यक्ति उत्पादन अधिकतम होता है। 

5. प्रो. कार सौण्डर्स के अनुसार, “अनुकूलतम जनसंख्या, वह जनसंख्या है जो अधिकतम आर्थिक कल्याण उत्पन्न करती हो। अधिकतम आर्थिक कल्याण का अधिकतम प्रति व्यक्ति आप के समान होना आवश्यक नहीं है, लेकिन व्यवहार में उन्हें उसके बराबर समझा जा सकता है। 

अनुकूलतम जनसंख्या के सिद्धान्त का उद्देश्य:-

      अनुकूलतम जनसंख्या के सिद्धान्त का उद्देश्य यह बताता है कि एक देश के लिए आर्थिक दृष्टि से जनसंख्या का कौन-सा आकार, अनुकूलतम है अर्थात् जनसंख्या का कौन-सा आकार अनुकूलतम होगा, जिसमें प्रति व्यक्ति आय अधिकतम होगी।

अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त की व्याख्या

      अनुकूलतम जनसंख्या का अभिप्राय जनसंख्या की उस आदर्श मात्रा से है जो किसी देश-काल (Space & Time) में उपलब्ध संसाधनों के अधिकतम उपयोग और अधिकतम उत्पादन के लिये आवश्यक होती है।

     किसी निश्चित समय पर उपलब्ध संसाधनों तथा ज्ञात प्रौद्योगिकी की दशा में वह जनसंख्या अनुकूलतम मानी जाती है जिसमें प्रति व्यक्ति आय अथवा प्रति व्यक्ति उत्पादन या अधिकतम प्रतिफल अथवा अधिकतम कल्याण होता है।

      किसी देश की वास्तविक जनसंख्या अनुकूलतम जनसंख्या से अधिक होने पर अति जनसंख्या और इससे कम होने पर अल्प जनसंख्या कहलाती है। अनुकूलतम जनसंख्या से देश की वास्तविक जनसंख्या कम होने पर उसके संपूर्ण संसाधनों का समुचित प्रयोग तथा विकास नहीं हो पाने से प्रति व्यक्ति उत्पादन अधिकतम उत्पादन से कम प्राप्त होता है।

    इसके विपरीत जनसंख्या अनुकूलतम जनसंख्या से अधिक होने पर प्रति व्यक्ति संसाधनों की कमी पड़ने लगती है, जिसमें प्रति व्यक्ति उत्पादन कम होता है। इसका परिणाम यह होता है कि प्रति व्यक्ति आय में कमी आ जाती है।

      विदित हो कि अनुकूलतम जनसंख्या कभी स्थिर नहीं होती बल्कि गतिशील होती है। इसका आशय यह हुआ कि किसी देश के उत्पादन संसाधनों में परिवर्तन होने से अनुकूलतम जनसंख्या भी परिवर्तित हो जाएगी। यह एक आदर्श की स्थिति है। इसका व्यवहार में प्रयोग संभव नहीं हो सकता क्योंकि इस बात का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि अनुकूलतम जनसंख्या कितनी उचित रहेगी और आने वाले समय में वही जनसंख्या भी चाहिये होगी।

   अर्थात अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत, जनसंख्या के उस स्तर को बताता है, जिस पर प्रति व्यक्ति आय अधिकतम होती है। यह सिद्धांत ब्रिटिश अर्थशास्त्री हेनरी सिजेविक ने दिया था। 

    दूसरे शब्दों में, प्रारम्भ में उत्पत्ति वृद्धि नियम लागू होता है, लेकिन कुछ समय में एक ऐसा बिन्दु आ जायेगा, जिस पर जनसंख्या का अनुकूलतम अनुपात स्थापित हो जायेगा। इस पर प्रति व्यक्ति आय अधिकतम एवं जनसंख्या अनुकूलतम होगी, लेकिन यदि जनसंख्या इस बिन्दु अनुकूलतम अनुपात समाप्त हो जायेगा और उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होने लगेगा।

Theory of Optimum Population

अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत की मुख्य विशेषताएँ:

(i) अनुकूलतम जनसंख्या, अंडरपॉपुलेशन और ओवरपॉपुलेशन के बीच संतुलन/बैलेंस वाली स्थिति होती है।

(ii) अनुकूलतम जनसंख्या में, जनसंख्या और संसाधनों के बीच संतुलन/बैलेंस वाली स्थिति होती है।

(iii) अनुकूलतम जनसंख्या में, प्रति व्यक्ति आय अधिकतम होती है।

(iv) अनुकूलतम जनसंख्या में, पर्यावरण और समाज को नुकसान नहीं पहुंचता।

(v) अनुकूलतम जनसंख्या में, व्यक्ति के स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुंचता।

अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत के कुछ मापदंड निम्नलिखित है: 

(i) किसी देश के प्राकृतिक संसाधनों का एक समय पर इस्तेमाल होता है।

(ii) उत्पादन की तकनीक में कोई बदलाव नहीं होता है।

(iii) पूंजी का भंडार स्थिर रहता है।

(iv) लोगों की पसंद और स्वाद अपरिवर्तित रहते हैं।

(v) कार्यशील जनसंख्या का कुल जनसंख्या से अनुपात स्थिर रहता है।

अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत की आलोचनाएँ (Criticism of the Optimum Theory of Population):-

      यद्यपि यह सिद्धांत माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण एवं तार्किक है। परन्तु कुछ बिन्दुओं पर इसकी भी आलोचना हुई है जो निम्नलिखित है-

1. यह सिद्धान्त वास्तविक मान्यताओं पर आधारित नहीं है:-

     अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त की यह मान्यता है कि जनसंख्या में होने वाली वृद्धि के साथ-साथ कार्यशील जनसंख्या अर्थात् श्रम शक्ति में वृद्धि भी उसी अनुपात में होती है, जबकि वास्तव में यह अनुपात बदलता रहता है। 

    दूसरा, इस सिद्धान्त की यह मान्यता है कि किसी देश में एक समयावधि में प्राकृतिक साधन, तकनीकी स्तर इत्यादि में कोई परिवर्तन नहीं होता, यह पूर्णतया गलत है। किसी देश के लिए अनुकूलतम जनसंख्या का अनुमान लगाना पूर्ण रूप से काल्पनिक जान पड़ता है। 

2. अनुकूलतम बिन्दु ज्ञात करना कठिन है:-

      अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त के प्रतिपादकों ने जनसंख्या के अनुकूलतम बिन्दु का निर्धारण जितना सरल माना है, वास्तव में वह उतना ही कठिन है। अर्थव्यवस्था में होने वाले निरन्तर परिवर्तनों के कारण जनसंख्या के आकार में भी परिवर्तन होता रहता है, जिससे अनुकूलतम आकार का निर्धारण करना सम्भव नहीं हो पाता।

3. यह जनसंख्या का सिद्धान्त न होकर मात्र एक दृष्टिकोण है:-

    आलोचकों के अनुसार, अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त को जनसंख्या का सिद्धान्त कहना ही गलत है, क्योंकि यह इस प्रश्न का उत्तर नहीं देता कि जनसंख्या किस प्रकार और क्यों बढ़ती है या उसके बढ़ने का क्या नियम है? यह सिद्धान्त तो जनसंख्या के अनुकूलतम बिन्दु की मात्र कल्पना करता है।

4. यह सिद्धान्त राष्ट्रीय आय के वितरण पक्ष पर कोई ध्यान नहीं देता है:-

     अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त राष्ट्रीय आय के केवल उत्पादन पक्ष पर ध्यान देता है, वितरण पक्ष पर कोई ध्यान नहीं देता। आर्थिक कल्याण का प्रश्न वितरण से सम्बन्ध माना जाता है, जिसकी इस सिद्धान्त ने पूरी तरह से उपेक्षा की है, जो कि आपत्तिजनक है।

5. यह सिद्धान्त जनसंख्या की समस्या का अध्ययन केवल आर्थिक दृष्टिकोण से करता है:-

     आलोचकों का विचार है कि अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धान्त एक भौतिकवादी सिद्धान्त हैं और इसका दृष्टिकोण अत्यन्त संकुचित है। अनुकूलतम जनसंख्या का आकार केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक एवं सैनिक परिस्थितियों को दृष्टि में रखकर ही निश्चित किया जाना चाहिए।

6. यह सिद्धान्त सामाजिक मूल्यों के प्रति संकुचित दृष्टिकोण अपनाता है:- 

      अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धान्त आर्थिक विकास के लिए प्रति व्यक्ति आय को अधिकतम करने की बात तो करता है, लेकिन जनसंख्या के स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल निर्माण, उच्च बौद्धिक स्तर तथा चरित्र निर्माण पर कोई ध्यान नहीं देता। 

7. इस सिद्धान्त का कोई व्यावहारिक महत्व नहीं है:- 

      अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धान्त, अनुकूलतम जनसंख्या का एक निरपेक्ष कथन मात्र है, जो हमारे लिए जनसंख्या सम्बन्धी नीति के निर्धारण में सहायक सिद्ध नहीं होता, यह सिद्धान्त हमारे सामने जिस ‘आदर्श’ को प्रस्तुत करता है, उस आदर्श को प्राप्त करने में हमारी सहायता नहीं कर पाता। इसलिए अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त का व्यावहारिक महत्व नहीं के बराबर है।

निष्कर्ष:-

     यह अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत की आलोचना की गयी है क्योंकि इसके मापन में अनेक कठिनाईयाँ हैं, जिसके कारण इसका व्यवहारिक महत्व कम है। तथापि जनसंख्या और संसाधनों के अंतर्सम्बन्ध की व्याख्या हेतु यह एक महत्वपूर्ण संकल्पना है जिसके संदर्भ में ही अन्य कई संकल्पनाओं की व्याख्या की जा सकती है।

     अनुकूलत जनसंख्या का विचार सरकार द्वारा अपनायी जाने वाली जनसंख्या-नीति के लिए ठोस वस्तुगत आधार प्रदान करता है। यदि देश में जनाधिक्य की स्थिति मौजूद है, तब सरकार को जनसंख्या नियंत्रण के उपाय लागू करना चाहिए एवं उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम विदोहन की योजनाएँ क्रियान्वित करनी चाहिए।

8. Population problems and government policies in India (भारत में जनसंख्या की समस्याएँ एवं सरकारी नीतियाँ)

8. Population problems and government policies in India

(भारत में जनसंख्या की समस्याएँ एवं सरकारी नीतियाँ)



    Population problems

      वस्तुतः किसी, देश की जनसंख्या उसका एक संसाधन होती है, लेकिन विपरीत परिस्थिति में वह समस्या का कारण भी बन जाती है, स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत की बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने का प्रयास तब शुरू किया गया जब इसका भार असहज होने लगा।

    जनसंख्या को समस्या के रूप में तब देखा जाता है जब उपलब्ध भौतिक संसाधनों की तुलना में जनसंख्या ही अधिक हो जाता है। भारत की स्थिति ऐसी ही हो गई है। फलतः अधिक जनसंख्या के कारण देश में न्यूनतम प्रति व्यक्ति आय, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, बेरोजगारी, निराशा और क्षेत्रीय अलगाव जैसे कठिनाइयों के कारण भारत की प्रगति धीमी हो गई है।

     50 वर्षों के प्रयास के बावजूद जनसंख्या सम्बन्धी समस्याएँ सुलझने के स्थान पर उलझती ही जा रही हैं। भारत कहने के लिए कृषि उत्पादों में आत्मनिर्भर हो गया है फिर भी एक विशाल जनसंख्या कुपोषण से ग्रसित है।

    कुपोषण बीमारियों का कारण बन गया है, भारत की आधी से कुछ कम या लगभग 37% जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे है। गरीबी भारत की जनसंख्या की सबसे बड़ी समस्या है, क्योंकि गरीब व्यक्ति जानवरों से भी बदतर जीवन जीने के लिए बाध्य है।

     भारत की जनसंख्या संबंधी समस्याओं को सुविधा के लिए निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किया जा सकता है।

(1) तीव्र जनसंख्या वृद्धि:-

      भारत की जनसंख्या में औसतन 1.6 करोड़ से अधिक व्यक्ति प्रतिवर्ष जुड़ जाते हैं। 1901 में जहां देश की जनसंख्या केवल 23.83 करोड़ थी वहीं 1951 में बढ़कर 36.10 करोड़ हो गई तथा 60 वर्षों के बाद 2021 को 1.21 अरब से ऊपर हो गई। यह वृद्धि दर विकसित देशों की अपेक्षा बहुत अधिक है। भारत कृषि प्रधान देश होने के कारण यह जन भार कृषिगत भूमि की वहन क्षमता से अधिक है। भारत अपनी अधिकतम भूमि का उपयोग करने के लिए वनों का विनाश भी कर चुका है जो एक अलग समस्या है।

     स्पष्ट है कि संसाधनों के विकास के लिए भूमि के गहन उपयोग के साथ अन्य संसाधनों के विकास के भी प्रयास करने होंगे, लेकिन अनेकानेक कारणों से संसाधनों का विकास मन्द गति से हो रहा है, जबकि जनसंख्या वृद्धि सतत् बनी हुई है।

     अतः इस तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या का यथा सम्भव नियंत्रण करना समस्या समाधान के लिए एक आवश्यकता है। विगत दशकों के सरकारी प्रयास निराशाजनक रहे हैं।

     भारत में जनसंख्या विस्फोट की गूंज अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होने लगी है और इसके समाधान के लिए अनेक उपाय सुझाए जा रहे हैं। जैसे स्त्री शिक्षा, रोगों की रोकथाम, जन्म-नियंत्रण, जन-चेतना का प्रचार-प्रसार, स्वयंसेवी संस्थाओं की सहभागिता आदि, लेकिन भारत जैसे जनसंख्या बोझिल देश में कठोर कदम उठाए बिना इसका समाधान कठिन है। ऐसे उपायों में से निम्न उपाय विशेष उल्लेखनीय हैं- दो से अधिक बच्चा पैदा करने पर दण्ड की व्यवस्था, शादी की वैधानिक आयु का कठोरता से पालन, संतति सुधार कार्यक्रम, स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम, आर्थिक विकास, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, अन्धविश्वासों एवं भ्रान्तियों से निजात, मनोरंजन के साधनों का विस्तार, परिवार नियोजन कार्यक्रम एवं प्रवास इत्यादि।

(2) जनसंख्या का असमान वितरण:-

      अनेकानेक प्राकृतिक, आर्थिक, सामाजिक और ऐतिहासिक कारणों से भारत की जनसंख्या के क्षेत्रीय वितरण में अत्यधिक विषमता है जिसके कारण संसाधनों के उपयोग में अतिशयता पायी जाती है। अधिकांश जनसंख्या कृषि पर आधारित होने के कारण उपजाऊ मृदा और अनुकूल जलवायु क्षेत्रों पर ही केन्द्रित हैं।

     उत्तरी भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र, तटीय मैदान और दक्षिण के पठार का कृषिगत क्षेत्र ऐसे ही जनाधिक्य के क्षेत्र हैं, यदि कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में परिवहन के साधनों, सिंचाई, उद्योग-धन्धों आदि की सुविधा प्राप्त हो जाए तो इस विषमता को कम किया जा सकता है।

      भारत में जनसंख्या के क्षेत्रीय स्थानान्तरण की कोई नीति न होने के कारण इस दिशा में अब तक कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ है। पश्चिमी बंगाल, केरल, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में घनत्व अत्यधिक है।

    यदि राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, छोटा नागपुर पठार जैसे इलाकों में जीविका के साधनों के लिए उचित प्रबन्ध किया जाए तो सघन बसे इलाकों के लोगों को वहां स्थाई रूप से बसाया जा सकता है। सरकार को इस दिशा में गम्भीरता से पहल करनी चाहिए, क्योंकि क्षेत्रवाद से जनसंख्या के स्थानान्तरण पर प्रश्न-चिन्ह लगता दिखाई दे रहा है।

(3) प्रति व्यक्ति कम आय:-

     सरकार द्वारा चलाए जा रहे विकास कार्यों एवं विविध प्रयासों के बावजूद भी हमारे देश के लोगों की आय इतनी कम है कि उससे जीवन स्तर में सुधार लाना कठिन है। यहां मात्र 39.26% जनसंख्या कार्यशील है और उनमें से भी कम पारिश्रमिक पाने वालों की संख्या सर्वाधिक है। यही कारण है कि सामान्यतः आधी कार्यशील जनसंख्या अपने परिवार के लिए मात्र जीने का साधन जुटा ले, यही बहुत बड़ी उपलब्धि है। कम आय का मुख्य कारण विकास कार्यों में शिथिलता है।

     पिछले 50 वर्षों के नियोजित विकास कार्यक्रमों के बावजूद भारत का एक विस्तृत क्षेत्र जहां देश की आधी से अधिक जनसंख्या निवासित है, निम्न स्तर का ही विकास हो पाया है।

(4) अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी और बीमारी:-

    अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी और बीमारी ये सभी समस्याएँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। अशिक्षा धनोपार्जन में बाधक है और कम आय से गरीबी पनपती है। गरीबी कुपोषण को प्राश्रय देती है। भारत की बढ़ती बेरोजगारी, विशेषकर पढ़े-लिखे लोगों में कुण्ठा को जन्म दे रही है, इससे न केवल उत्पादकता का ह्रास होता है, अपितु सामाजिक तनाव को भी बढ़ावा मिल रहा है।

     सम्प्रति भारत सरकार की सूचना के अनुसार 2005-06 में 942 रोजगार कार्यालयों में 7,289.5 हजार व्यक्तियों का पंजीकरण हुआ था, जिसमें केवल 177.0 हजार व्यक्तियों को रोजगार मिल सका था। स्पष्ट है कि जनसंख्या वृद्धि दर की अपेक्षा रोजगार के अवसरों में बहुत धीमी वृद्धि हो रही है।

      सरकार के अथक प्रयास के बावजूद भी गरीबी और बेकारी बढ़ती जा रही है। कुछ विशेष राज्यों में यह समस्या और अधिक विकट है जैसे-बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, त्रिपुरा, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों की आधे-से-अधिक जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है।

(5) सीमित भूखण्ड:-

     देश में विश्व की 16.87 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, जबकि विश्व क्षेत्रफल का केवल 2.4% भाग ही भारत में उपलब्ध है। स्पष्ट है कि सीमित भू-खण्ड पर जनसंख्या का भारी दबाव है। कृषि देश की अर्थव्यवस्था और अधिकांश लोगों की जीविका का प्रमुख साधन है, लेकिन यहाँ प्रति व्यक्ति कृषि उपयुक्त भूमि की उपलब्धता केवल 0.3 हेक्टेयर या उससे भी कम है।

    इसी तरह देश में प्रतिवर्ग किलोमीटर के पीछे 324 व्यक्ति निवास करते हैं। जबकि विश्व का औसत घनत्व 44 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी ही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भूखण्ड पर बढ़ते दबाव के कारण, कृषि भूमि की अनुपलब्धता, आवास एवं पर्यावरण असन्तुलन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही है।

(6) अन्य प्राकृतिक विपदाएँ:-

     विशाल जनसंख्या के लिए कृषि भूमि की आवश्यकताओं की पूर्ति एवं अन्य कारणों से वनों के अत्यधिक ह्रास से पर्यावरण प्रदूषण जैसे अनेक कारणों से पारिस्थितिकी सन्तुलन तेजी से बिगड़ा है, फलस्वरूप देश में अकाल, सूखा, महामारी, भुखमरी जैसी अनेक आपदाएं उत्पन्न हो गई हैं।

(7) असमान आर्थिक विकास से उत्पन्न समस्याएँ:-

     आधुनिक काल में आर्थिक विकास का स्वरूप बदल गया है। संसाधन दोहन, पूंजी, प्रबन्ध और व्यवसायीकरण आदि क्षेत्रों में धन एकत्र हो गया है। इस प्रकार आर्थिक स्तर के अनुसार देश की जनसंख्या उच्च आय वर्ग, औसत आय वर्ग और निम्न आय वर्ग में बंटी हुई है। स्पष्ट है कि आर्थिक असमानता देश की जनसंख्या की सबसे बड़ी समस्या बन गई है।

(8) पर्यावरणीय समस्याएँ:-

     आज भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में विकास की अंधी दौड़ में संसाधनों का निर्ममता पूर्ण दोहन होने लगा है। वहीं पर्यावरण प्रदूषण जैसी भीषण समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं। अनेक बीमारियाँ, बाढ़, सूखा, मृदा क्षरण, संसाधनों की कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं। अनेक महानगरों में तो ये समस्याएँ अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी हैं।

(9) सामाजिक-धार्मिक दुःख से उपजी समस्याएँ:-

      आज जनसंख्या वृद्धि के साथ ही भौतिकवादिता, स्वच्छन्दता, कट्टता, आतंकवाद, साम्प्रदायिकता जैसी समस्याएं बढ़ी हैं। चोरी, हत्या, बलात्कार जैसी समस्याएं निरन्तर बढ़ती जा ही हैं। आज मानव मूल्य, प्रेम, दया, करुणा, सहिष्णुता, भाईचारा जैसी भावनाएं विलुप्त होती जा रही हैं। वहीं उद्दण्डता, घृणा, दुराचार, नैतिक पतन जैसे दुर्गुणों को बढ़ावा मिला है। आज देश की अधिकांश जनसंख्या अनेक सामाजिक, धार्मिक, दैहिक व मानसिक समस्याओं से घिरी हुई है। इन समस्याओं का निराकरण ढूंढ़ना हम सबके लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है।

भारत में जनसंख्या नीति

स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक बाद से ही भारत सरकार भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या को लेकर चिंतित थी। पहली पंचवर्षीय योजना के समय से ही भारत सरकार ने भारत की बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने के प्रयास किए हैं। इसी कड़ी में परिवार नियोजन कार्यक्रम को अपनाने वाला भारत विश्व का पहला देश बना था।

सर्वप्रथम वर्ष 1960 में एक विशेषज्ञ समूह ने भारत में एक जनसंख्या नीति बनाने का सुझाव दिया था। इसके बाद वर्ष 1976 में भारत ने पहली जनसंख्या नीति अपनाई थी।

भारत सरकार ने एम. एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ दल गठित किया था। इसकी सिफारिश के आधार पर वर्ष 2000 में भारत ने राष्ट्रीय जनसंख्या नीति अपनाई थी। भारत की इस नवीनतम जनसंख्या नीति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(i) प्रति 1000 जीवित बच्चों पर शिशु मृत्यु दर 30 से कम करना।

(ii) प्रति 1 लाख बच्चों के जन्म पर मातृ मृत्यु 100 से कम करना।

(iii) प्रजनन और शिशु स्वास्थ्य की देखभाल के लिए एक समुचित सेवा प्रणाली विकसित करना।

(iv) गर्भ निरोधक एवं स्वास्थ्य सुविधाओं से संबंधित बुनियादी ढांचा सुदृढ़ करना।

(v) वर्ष 2010 तक 2.1 की ‘सकल प्रजनन दर’ (TFR) प्राप्त करना तथा वर्ष 2045 तक जनसंख्या स्थायित्व प्राप्त करना।

(vi) लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु में वृद्धि करना।

(vii) एड्स का प्रसार रोकना और प्रजनन अंग संबंधी रोगों के प्रबंधन व ‘राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन’ (NACO) के बीच समन्वय स्थापित करना।

(vii) 80% प्रसव अस्पतालों, नर्सिंग होम इत्यादि में संपन्न कराना तथा इस कार्य हेतु प्रशिक्षित लोगों को नियुक्त करना।

(ix) प्रत्येक व्यक्ति को सूचना व परामर्श देना तथा गर्भ निरोधक संबंधित अनेक विकल्प उपलब्ध कराना।

(x) चौदह वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिए स्कूली शिक्षा को नि:शुल्क और अनिवार्य बनाना।

(xi) बीच में ही स्कूली पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की संख्या 20% से कम करना।

(xii) सभी बच्चों को टीका जनित प्रतिरक्षित उपलब्ध करना।

(xiii) जन्म, मरण, विवाह और गर्भ का 100% पंजीकरण सुनिश्चित करना।

(xiv) संक्रामक रोगों को नियंत्रित करना तथा प्रजनन और शिशु स्वास्थ्य सुविधाओं को घर-घर तक पहुंचाना।

(xv) एक ‘राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग’ गठित करना।

राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग

     ‘राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000’ के अंतर्गत मई 2000 में एक ‘राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग’ गठित किया गया था। इस आयोग के अंतर्गत एक ‘राष्ट्रीय जनसंख्या स्थिरता कोष’ की स्थापना भी की गई थी, लेकिन आगे इसे ‘स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग’ को हस्तांतरित कर दिया गया था। इस आयोग की अध्यक्षता भारत के प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है। इस आयोग के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के क्रियान्वयन की समीक्षा करना।

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की निगरानी करना तथा इससे संबंधित दिशा-निर्देश देना।

इस जनसंख्या नीति हेतु स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण व अन्य विकास कार्यक्रमों में समन्वय स्थापित करना।

इससे संबंधित कार्यक्रमों की योजना बनाने व उन्हें क्रियान्वित करते समय अंतर क्षेत्रीय समन्वय को बढ़ावा देना।

7. आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक एवं इसके प्रकारों का वर्णन

7. आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक एवं इसके प्रकारों का वर्णन



      आन्तरिक प्रवास 

      आन्तरिक प्रवास एक राष्ट्र के भीतर स्थान परिवर्तन करने को कहते हैं। इसमें जनसंख्या अपने राष्ट्र की राजनीतिक सीमा को पार नहीं करती है, बल्कि वह अपने मूल स्थान से अन्य सुविधाजनक या इच्छित स्थान पर रहने लगती है, तो ऐसा प्रवास आन्तरिक प्रवास कहलाता है।

प्रो. डोनाल्ड बोग के अनुसार, “जब कोई व्यक्ति राष्ट्रीय सीमाओं के अन्तर्गत अपने मूल निवास को छोड़कर दूसरे स्थान पर रहने लगता है, तो ऐसे प्रवास को आन्तरिक प्रवास कहते हैं। यह अन्तर्गमन अन्तर्प्रवास या अन्तर-देशान्तरण (In-migration) कहलाता है।

आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक (FACTORS AFFECTING THE INTERNAL MIGRATION)

        आन्तरिक प्रवास प्रमुखतया आन्तरिक विषमताओं का परिणाम होता है। जब किसी राष्ट्र में आर्थिक स्तर पर असमानताएँ, भौगोलिक व सामाजिक परिस्थितियों में भिन्नता स्थापित हो जाती हैं, तो आन्तरिक प्रवास को प्रोत्साहन मिलने लगता है। लोगों की आर्थिक व सामाजिक दशा प्रवास की यात्रा व दिशा को प्रभावित करती है। आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक महत्वपूर्ण है:

1. भूमि पर जनसंख्या का असामान्य दबाव (Abnormal pressure of population on land):-

       देश के जिन भागों में जनसंख्या का अत्यधिक दबाव होता है, तो उन क्षेत्रों के निवासी ऐसे क्षेत्रों में जाकर बसना पसन्द करते हैं, जहाँ जनसंख्या का कम दबाव हो तथा भूमि उत्पादन के लिए सुलभ हो। जहाँ भूमि सुधार की सम्भावना हो, लोग वहाँ जाकर रहने लगते हैं।

2. भूमि मूल्य (Land value):-

       जिन भागों में भूमि का मूल्य इतना अधिक हो जाए, कि वह लोगों की वहन शक्ति से अधिक हो जाए तो ऐसी दशा में लोग सस्ती भूमि वाले भू-भागों की ओर प्रवास कर जाते हैं। नगर के भीतरी भाग में जब रिहाइशी भूमि का मूल्य लोगों की क्रय शक्ति के बाहर हो जाता है, तो लोग नगर के बाहरी क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं।

3. सामाजिक परिस्थितियां एवं जाति, धर्म संपर्क (Social conditions and caste, religion conflict):-

       देश के वह भाग जहाँ छुआछूत, वर्ग संघर्ष, जाति संघर्ष, धार्मिक भिन्नता, व्यक्तिगत दुश्मनी, आदि बुराइयों के कारण लोगों का रहना कठिन हो जाता है तो यहाँ से लोग उन क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं जहाँ यह नफरत करने वाली सामाजिक बुराइयाँ नही होती अथवा इन सामाजिक बुराइयों का प्रभाव बहुत कम होता है। ग्रामीण क्षेत्रों से लोग ग्रामीण रूढ़िवादिता के कारण नगरों में जाकर बस जाते हैं।

4. पारिवारिक व्यवस्था (Family system):-

        जब परिवार बड़े-बड़े हो जाते हैं तथा उनका एक स्थान पर मिलकर रहना सम्भव नहीं होता है, तब परिवार के कुछ लोग अन्य स्थानों पर रहना प्रारम्भ कर देते हैं। वर्तमान समय में बड़े ग्रामीण परिवारों के वह लोग जो शिक्षा प्राप्त करने, नौकरी करने के लिए नगरों में जाते हैं, वहीं जाकर बस जाते हैं। पारिवारिक कलह के कारण भी बड़े-बड़े परिवार टुकड़ों में बंट जाते हैं तथा परिवार के कुछ लोग अन्यत्र जाकर बस जाते हैं।

5. विवाह (Marriage):-

        भारतीय समाज में विवाह आन्तरिक प्रवास का एक प्रबल कारक है। विवाह के बाद लड़की को लड़के के पैतृक निवास स्थान पर रहना पड़ता है, अतः लड़कियाँ निश्चित तौर पर विवाह के बाद पैतृक निवास स्थान को छोड़कर अपने पति के घर पर जाकर रहने लगती हैं, तो ऐसा प्रवास भी आन्तरिक प्रवास कहलाता है।

6. ऋणग्रस्तता एवं निम्न आर्थिक स्तर (Indebtness and low economic standard):-

       जिन ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास की सम्भावनाएँ कम होती हैं, लोगों पर ऋण काफी अधिक हो जाता है, रोजगार में स्थायित्व नहीं होता है, तो ऐसे लोग आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न क्षेत्रों में जाकर बस जाते हैं। ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों से नगरों की ओर पलायन इसी प्रवास का परिणाम है।

7. औद्योगिक नगरों का स्थापन (Establishment of industrial towns):-

        नई-नई औद्योगिक इकाइयों के स्थापन के कारण, जहाँ एक ओर नगरों का विस्तार होने लगता है वहीं दूसरी ओर नए-नए नगर व उपनगर बस जाते हैं और लोग ऐसे स्थानों पर अन्य क्षेत्रों से आकर बसने लगते हैं। मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता के उपनगरों तथा नए-नए औद्योगिक नगरों के स्थापन जैसे मोदीपुरम्, रानीपुर के कारण लोग अन्यत्र स्थानों से आकर वहाँ रहने लगते हैं।

8. प्राकृतिक आपदाएं, मानव निवास की विपरीत परिस्थितियां बन जाना:-

      आँधी, तूफान, भूकम्प, ज्वालामुखी का फटना, सूखा पड़ जाना, अति वृष्टि के कारण बाढ़ आ जाना, आदि प्राकृतिक आपदाएँ लोगों को अन्यत्र बसने को मजबूर कर देती है। यह स्थान मानव निवास के अनुकूल नहीं रह पाते है और लोग सुरक्षित स्थानों में जाकर बसना पसन्द करते हैं। मई 2000 में गुजरात में सूखे के प्रभाव से लोगों को अपने स्थानों को छोड़ना पड़ा।

आन्तरिक प्रवास के प्रकार (TYPES OF INTERNAL MIGRATION)

       भारत में होने वाले आन्तरिक प्रवास को आधार मानकर इसको छः प्रकारों में रखा जा सकता है:-

1. अन्तर्राज्यीय प्रवास (Inter state migration)

2. ग्राम से ग्राम को प्रवास (Migration from rural to rural)

3. ग्राम से नगर को प्रवास (Migration from rural to urban)

4. नगर से नगर को प्रवास (Migration from urban to urban)

5. नगर से समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों को प्रवास (Migration from urban to adjoining rural areas)

6. सम्बद्धताजन्य प्रवास (Interrelated migration)

1. अन्तर्राज्यीय प्रवास:-

        जब एक देश की सीमाओं के भीतर उस देश के नागरिक अपना राज्य छोड़कर अन्य किसी राज्य में रोजगार, सुरक्षा या विवाद सम्बन्धी कारणों से जाकर बस जाते हैं तो ऐसा प्रवास अन्तर्राज्यीय प्रवास कहलाता है। राजस्थान से अनेक मारवाड़ी परिवार व्यापार के कारण पश्चिम बंगाल और असम में जाकर बस गए। यह इस प्रवास का एक उदाहरण है।

2. ग्राम से ग्राम को प्रवास:-

        ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रवास वर्तमान में काफी महत्व रखता है। छोटे-छोटे गांवों से लोग अपने निकट के उन गांवों, जो केन्द्रीय सुविधाजनक स्थिति होने के कारण अनेक प्रकार की सेवाएँ व सुविधाएँ एकत्रित कर लेते हैं, आकर रहने लग जाते हैं। धीरे-धीरे यह गाँव ग्रामीण सेवा केन्द्र का रूप ले लेते हैं। भारत के ग्रामीण भूदृश्य पर ऐसे केन्द्रों का तेजी से विकास हो रहा है।

3. ग्राम से नगर को प्रवास:-

      वर्तमान समय की एक महत्वपूर्ण घटना नगरीकरण है, जिसका एक कारण ग्रामीण जनसंख्या का रोजगार की सुविधा तथा जीवनोपयोगी सेवाओं का लाभ मिलने की वजह से नगरों में आकर बसना है। वर्तमान में देश के बड़े-बड़े बृहत् महानगरों में जनसंख्या की आकार वृद्धि में इस तरह के प्रवास का महत्वपूर्ण योगदान है।

4. नगर से नगर को प्रवास:-

        भारत के कुल आन्तरिक प्रवास में नगर से नगर की ओर प्रवास का योगदान लगभग 12% रहता है। इस प्रकार का प्रवास प्रायः छोटे नगरों से बड़े नगरों की ओर होता है। लोग बड़े-बड़े नगरों में नौकरी, व्यापार, प्रशासकीय कार्यालयों की सुविधा, आदि के कारण, वहाँ आकर बस जाते हैं। दिल्ली, मुम्बई, बंगलौर, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई जैसे महानगरों में लोग अनेक छोटे-छोटे नगरों से आकर बस गए हैं। चण्डीगढ़ नगर इसी प्रकार के प्रवास का उदाहरण है। यहाँ की सारी जनसंख्या आन्तरिक प्रवास के फलस्वरूप बसी है। अनेक समीपवर्ती नगरों से लोग यहाँ आकर बस गए।

5. नगर से समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों को प्रवास:-

     नगरों में जब जनसंख्या इतनी बढ़ जाती है कि लोगों का वहाँ रहना दूभर हो जाता है, क्योंकि वहाँ पर्यावरण का प्रदूषित होना, भूमि व मकानों की कीमतों में भारी वृद्धि होना, आदि समस्याएँ पनप जाती हैं। जिनके कारण नगर के लोग नगर की बाहरी सीमा पर स्थित ग्रामीण क्षेत्र के खुले वातावरण में रहना पसन्द करते हैं। यह क्षेत्र नगर के समीप भी होते हैं तथा समस्या रहित होते हैं। लोग यहाँ भूमि सस्ती होने के कारण मकान बनाकर रहने लगते हैं। धीरे-धीरे ऐसे मकानों का समूह एक उपनगर का रूप ले लेता है और समय के साथ नगर का अंग बन जाता है।

6. सम्बद्धताजन्य प्रवास:-

        जब एक व्यक्ति ग्रामीण क्षेत्र से नगर में जाकर बस जाता है तो वह अपने आश्रितों को अपने पास बुला लेता है। यह आश्रित तथा उसके परिवार से सम्बन्धित सभी सदस्य नगर में शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, परिवहन, मनोरंजन, आदि की सुविधा के कारण वहाँ रहने लगते हैं, तो ऐसे प्रवास को सम्बद्धताजन्य प्रवास कहते हैं।

      भारत में कृषि के विकास ने कृषक परिवारों में इस प्रकार की भावना उत्पन्न कर दी है कि उनके एक परिवार का मुखिया नगर में मकान बनाकर रहने लगता है तथा अन्य मुखिए गाँव में खेती का कार्य देखते हैं। इन सब मुखियों के आश्रित नगर में उपरोक्त आकर्षण के कारण रहने लगते हैं। इस प्रका के प्रवास का प्रचलन वर्तमान में तीव्र गति के साथ बढ़ हा है।

6. प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारक

6. प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारक

प्रवास अथवा प्रव्रजन

     प्रवास को प्रभावित करने वाले अनेक कारक हैं। इनमें समय, स्थान व परिस्थितियों के अनुसार कभी कोई तत्व प्रभावशाली रहता है, तो कभी कोई दूसरा। वास्तव में प्रवास को प्रभावित करने में आकर्षण व प्रत्याकर्षण का महत्व होता है। एक स्थान से लोग दूसरे स्थान को तभी प्रवास करते हैं, जब उनके अपने स्थान में कोई आकर्षण नहीं होता है। इस प्रकार प्रवास को प्रभावित करने वाले कारकों को मुख्य रूप से निम्नलिखित दो श्रेणियों में रखा जा सकता है-

(1) आकर्षक कारक (Pull factors)

(2) प्रत्याकर्षण कारक (Push factors)

(1) आकर्षक कारक

       लोगों का कम विकसित क्षेत्रों, ग्रामों, आदि से ऐसे क्षेत्रों में जाना, जहाँ उनको उन्नति के अधिक अवसर मिलते हैं। ऐसे अवसरों को आकर्षक कारक के रूप में रखा जाता है। यह अवसर निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

(i) आर्थिक प्रगति के अधिक अवसर,

(ii) रोजगार के अवसर,

(iii) उच्च शिक्षा प्राप्ति का अवसर,

(iv) वैज्ञानिक व सांस्कृतिक परम्पराओं के अवसर,

(v) सुरक्षा व न्याय के अवसर,

(vi) जीवन स्तर सुधारने के अवसर,

(vii) राजनीतिक स्थायित्व होना,

(viii) स्वास्थ्यप्रद वातावरण में रहने के अवसर।

       प्रवास को आकर्षित करने वाले कारकों में प्रवाहित क्षेत्र की विकसित होती हुई अर्थव्यवस्था, अनुकूल आवास कानून, कृषि भूमि की उपलब्धता, आदि महत्वपूर्ण हैं। जापान में श्रमिकों की कमी ने बड़ी संख्या में प्रवासियों को अपने यहाँ आवासित होने के लिए आकर्षित किया है। इन आवासियों में अधिकांश लोग कम वेतन पर ऐसे खतरे वाले काम करते हैं जिन कामों को जापान के मूल निवासी नहीं करते हैं।

(2) प्रत्याकर्षण कारक

    जब लोग अपने निवास स्थान में रहना नहीं चाहते। वहाँ उन्हें अपना जीवन निराशाजनक लगता है। ऐसा निम्नलिखित परिस्थितियों में सम्भव होता है।
(i) रोजगार सुविधाओं का अभाव,

(ii) स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव,

(iii) गरीबी, निम्न जीवन स्तर का होना,

(iv) सुरक्षा व न्याय की कम सुविधाएं,

(v) राजनीतिक अलगाववाद का प्रभाव और गृह भूमि पर युद्ध की आशंका,

(vi) उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा सुविधा का अभाव,

(vii) परम्परावादी व रूढ़िवादी संस्कृति का प्रभाव,

(vii) रोजगार की कठिन परिस्थितियों का होना,

(viii) प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव (सूखा एवं अकाल)।

     1929-1939 की अवधि में संयुक्त राज्य अमेरिका में आया महान मंदी का दौर (Great Depression) प्रत्याकर्षण का सर्वोत्तम उदाहरण है। इस दौर में संयुक्त राज्य अमेरिका में आवासन की अपेक्षा प्रवसन अधिक हुआ। इसी प्रकार 1980-90 के दशक में अकाल एवं युद्ध के कारण हजारों अफ्रीकन लोग अपने मूल स्थान से प्रवासित होकर पड़ोसी देशों में आवासित होने को मजबूर हुए।

     सामान्य तौर पर प्रवास को प्रभावित करने वाले कारकों में निम्नलिखित महत्व होते है:-

1. प्राकृतिक कारक (Natural Factors)-

       प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूकम्प, ज्वालामुखी, बाड़, सूखा, तूफान, भूस्खलन, जलवायु की कठोरता, आदि के कारण लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को प्रवास कर जाते हैं। विश्व के विभिन्न भागों में मौसमीय प्रवास (Transhumance) मानवीय समूहों द्वारा जलवायु की कठोरता के दुष्प्रभाव से बचने तथा रोजगार जुटाने के उद्देश्य से किया जाता है। समुद्रतटीय भागों में तूफान से प्रभावित क्षेत्रों तथा नदियों के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से लोग सुरक्षित स्थलों पर प्रवास कर जाते हैं। वास्तव में वह क्षेत्र जो किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा की आशंका से ग्रस्त होते हैं, लोग सुरक्षित क्षेत्रों पर प्रवास कर जाते हैं।

2. आर्थिक कारक (Economic Factors)-

      विश्व के अधिकांश प्रवासों को प्रभावित करने में आर्थिक कारकों का योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा है। नए-नए क्षेत्रों में कृषि का विस्तार, नई-नई खानों का पता लगना, उद्योग धन्धों का विस्तार होना, यातायात सुविधाओं में सुधार होना, आदि विशेषताएं रोजगार के नए-नए अवसर प्रदान करने में महत्वपूर्ण सिद्ध होती हैं। इसी कारण लोग रोजगार के नए क्षेत्रों में आकर बस जाते हैं। पिछली तीन शताब्दियों में यूरोपीय लोगों का विश्व के विभिन्न भागों में रोजगार की तलाश में वहाँ जाकर बसना, वर्तमान में अनेक भारतीयों का अमेरीका तथा विश्व के अन्य भागों में रोजगार के कारण बस जाना, बिहार के श्रमिकों का पंजाब, पश्चिम उत्तर प्रदेश में मजदूरी कार्यों के लिए प्रवास करना, आर्थिक कारकों का ही परिणाम है।

3. सामाजिक व सांस्कृतिक कारक (Social and Cultural Factors)-

      सामाजिक रीति-रिवाज, धार्मिक व सामाजिक स्वतंत्रता, सामाजिक व सांस्कृतिक सम्पर्क, धर्म प्रचार, आदि ऐसे सामाजिक कारक हैं, जिनके कारण लोग अपना जन्म स्थान छोड़ने को बाध्य हो जाते हैं। धार्मिक श्रद्धा लोगों को धर्म स्थल पर बसने के लिए प्रेरित करती है। धार्मिक आयोजन मेले व विशेष पर्व पर लोग प्रवास करते हैं।

       लाखों हज यात्री प्रतिवर्ष मक्का व मदीना धार्मिक स्थलों की यात्रा करते हैं। उच्च व तकनीकी शिक्षा की प्राप्ति, उच्च चिकित्सा हेतु भी लोग प्रवास करते हैं। खेलों का आयोजन, जैसे क्रिकेट, हॉकी टूर्नामेन्ट, कुम्भ मेला, विशेष तिथि पर लगने वाले बड़े-बड़े मेले, नौचन्दी मेला, वैष्णो देवी के दर्शनों के लिए प्रतिवर्ष लाखों भक्तजनों का जाना, आदि ऐसे कारक हैं, जो किसी न किसी रूप में अस्थायी प्रवास के साथ-साथ स्थायी प्रवास को बढ़ावा देते हैं।

4. राजनीतिक कारक (Political Factors)-

      इतिहास इस बात का गवाह है कि राजनीतिक कारकों ने प्रवास को सबसे अधिक प्रभावित किया है तथा प्रवास की आवश्यक मजबूरी बनाया है। भारत-पाक विभाजन, दो देशों के बीच युद्ध की स्थिति, पड़ोसी देश से राजनीतिक सम्बन्धों में बिगाड़ के कारण सीमा क्षेत्र पर युद्ध स्थिति बने रहना, आदि तत्व जनसंख्या प्रवास को प्रभावित कर रहे हैं।

       वर्तमान में लंका में जातीय संघर्ष के कारण श्रीलंकाई तमिल भारत के तमिलनाडु तट में आकर बस रहे हैं। तिब्बत से बौद्ध लोगों का भारत आकर बसना भी राजनीतिक प्रवास का उदाहरण है। 18वीं व 19वीं शताब्दी में संयुक्त राज्य अमेरीका व ब्रिटेन के लोगों ने दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैण्ड, आदि देशों के मूल निवासियों को बलपूर्वक वहाँ से खदेड़ दिया तथा वहाँ पर नए राष्ट्रों की स्थापना की।

     कई बार सरकारी नीतियाँ भी प्रवास को आकर्षित करती हैं। उदाहरण के लिए मध्य-पूर्व के देशों ने आवास को प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की है। इसी प्रकार आस्ट्रेलिया में आवासीय लोगों को मुफ्त में कृषि योग्य भूमि प्रदान की गई है। 1990 में जापान ने लेटिन अमेरिका से आए लोगों को रोजगार के अधिकार एवं आवासीय सुविधाएं प्रदान की।

5. जनांकिकी कारक (Demographic Factors)-

      इसके अन्तर्गत कृषि भूमि पर बढ़ता हुआ जनसंख्या का दबाव, कृषि क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों की कमी के कारण बेरोजगारी की समस्या, नगर के भीतरी भाग से नगर के बाहरी छोरों पर लोगों का बसना, उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों से कम घनत्व वाले क्षेत्रों की ओर लोगों का जाकर बसना, आदि तत्व शामिल हैं। इनके अलावा साक्षरता की दर, विशेष जाति या धर्म के लोगों को कहीं अधिक प्रोत्साहन मिलना, असन्तुलित लिंग अनुपात, आदि बातें भी प्रवास को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से प्रभावित करती हैं। आस्ट्रेलिया व दक्षिण अफ्रीका की रंग भेदी नीतियों ने काले लोगों के प्रवास पर रोक लगा दी थी।

       वर्तमान में रूस व यूक्रेन के बीच युद्ध, इजराइल व फिलीस्तीन के बीच मतभेद, आदि जनांकिकी प्रवास को किसी न किसी रूप में प्रभावित कर रहे हैं। एक राज्य का दूसरे राज्य के लोगों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार भी जनसंख्या प्रवास को प्रभावित कता है।

प्रश्न प्रारूप

1.  प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना कीजिये।



5. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration)

5. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration)



प्रव्रजन

         मानव का वह कार्यकलाप, जिसके द्वारा वह अपने निवास स्थान से कहीं अन्यत्र स्थान पर एक निश्चित लम्बी अवधि लिए कुछ विशेष उद्देश्य के साथ बस जाता है, तो उसे स्थानान्तरण कहते हैं।

     इसमें मानव का अस्थायी रूप से अन्य स्थान पर जाना, मौसम के अनुसार स्थान परिवर्तन करना, नगर में रोजाना अन्य नगरों व उपान्त क्षेत्रों से आना जाना, श्रमिकों का फसल मौसम में एक स्थान से दूसरे स्थानों पर जाना, नगर के भीतर निवास परिवर्तन, आदि को स्थानान्तरण की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। यह सभी अस्थाई प्रवास संचरण (Circulation) की श्रेणी में शामिल किए जाते हैं।

     जनसंख्या स्थानान्तरण की विशेषताओं को इस प्रकार रखा जा सकता है:

(1) निवास स्थान व नवीन स्थान के बीच समुचित दूरी होना।

(2) नवीन स्थान पर रुकने की अवधि दीर्घकालिक होना।

(3) नवीन स्थान पर किसी विशेष उद्देश्य से जाकर बसना।

(4) नवीन बसे स्थान के कार्यकलापों का निवास-स्थान के कार्यकलापों से भिन्न होना।

(5) नवीन स्थान पर बसने वाले लोगों का अपने आपको बेहतर स्थिति में अनुभव करना।

प्रवास के प्रकार (TYPES OF MIGRATION)

     प्रवास को वर्गीकृत करने के अनेक आधार हैं। इन आधारों में समय, दूरी, स्थान, उद्देश्य उल्लेखनीय हैं।

(1) दूरी के आधार पर

⇒ जब स्थानान्तरण थोड़ी-सी दूरी के लिए होता है, तो उसे छोटी दूरी (short distance) स्थानान्तरण कहते हैं।

⇒ जब स्थानान्तरण लम्बी दूरी के प्रवास से जुड़ता है तो उसे लम्बी दूरी (long distance) स्थानान्तरण कहते है।

(2) क्षेत्र के आधार पर

1. राष्ट्रीय प्रवास:-

       इसे आन्तरिक प्रवास भी कहते हैं। यह प्रवास एक राष्ट्र के भीतर किसी भी स्थान के लिए बिना किसी रोकटोक के होता है। यह आन्तरिक प्रवास चार वर्गों में बांटा जा सकता है-

(i) गांवों से नगरों की ओर प्रवास,

(ii) नगरों से गांवों की ओर प्रवास,

(iii) गांवों से गांवों की ओर प्रवास,

(iv) नगरों से नगरों की ओर प्रवास।

        इनमें गांवों से नगरों की ओर तथा छोटे नगरों से महानगरों की ओर लोगों का प्रवास अधिक संख्या में होता है।

2. अन्तर्राष्ट्रीय प्रवास:-

      इसे बाह्य प्रवास भी कहते हैं। इसमें प्रवास एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र के लिए होता है। यह प्रवास स्थानान्तरण किए जाने वाले राष्ट्र की प्रवास नीतियों पर निर्भर करता है।

(3) समय या काल के आधार पर

       प्रवास अध्ययन के काल पक्ष के अन्तर्गत प्रवासन या आवासन समय को महत्वपूर्ण माना गया है। इस दृष्टि से इसका अध्ययन निम्नांकित रूप में किया जा सकता है।

(i) दीर्घकालीन प्रवास:-

      इसमें प्रव्रजन की कालिक प्रवृत्ति दीर्घकालीन होती है। ऐसे प्रव्रजन प्रायः अन्तर्महाद्वीपीय व अन्तर्राष्ट्रीय हुआ करते हैं। 18-19वीं शताब्दी में यूरोप महाद्वीप से उत्तरी अमेरिका व दक्षिणी अमेरिका, आदि महाद्वीपों में जाकर बसे एवं विकास कार्य किए। कुछ देशों में भी लोग राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक, आदि कारणों से दीर्घकालीन प्रवास व आवासन करते रहते हैं।

(ii) अस्थायी या मौसमी प्रवास:-

      अस्थायी प्रव्रजन अल्पकालिक होता है इसके अन्तर्गत जनसंख्या किसी देश अथवा स्थान में स्थायी रूप से बसती नहीं है। बल्कि अपने उद्देश्यों की पूर्ति के पश्चात् पुनः अपने मूल स्थान को प्रत्यावर्तित हो जाती है। इसी के अन्तर्गत एक अन्य तरह का प्रवास होता है जिसे मौसमी प्रवास (Transhumance) की संज्ञा दी जाती है। ऐसे प्रवास क्षेत्रीय उच्चावच व जलवायु से प्रभावित होते हैं।

       इस प्रकार के प्रवास का सुन्दर उदाहरण भारत के पर्वतीय क्षेत्रों के बकरवाल, भोटिया, बछी आदि पशुचारकों से लिया जा सकता है जो ग्रीष्म ऋतु में पर्वतों पर जाकर पशुचारण करते हैं तथा शीत ऋतु में मैदानी भागों की ओर वापस आ जाते हैं। ऐसे उदाहरण विश्व के अनेक क्षेत्रीय पशुचारक जन-जातियों से ग्रहण किए जा सकते हैं।

(iii) दैनिक प्रवास:-

      इस प्रकार का प्रव्रजन पूर्णरूपेण अस्थायी होता है। ऐसे प्रव्रजन के अन्तर्गत बड़े-बड़े नगरों, कस्बों, आदि में ग्रामीण क्षेत्रों से मजदूरी करने, दूध, शाक-सब्जी बेचने एवं अध्ययन अध्यापन व अन्य कार्यों से आना जाना होता है जिसकी अवधि मात्र दिनभर की होती है।

(4) उद्देश्य के आधार पर

       स्थानान्तरण जिस उद्देश्य से किया जाता है, वह निम्न चार प्रकार का होता है-

(i) आर्थिक प्रवास,

(ii) सामाजिक प्रवास,

(iii) धार्मिक प्रवास,

(iv) राजनीतिक प्रवास।

       एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र में जाने वाले व्यक्ति को आप्रवासी या आगन्तुक (Immigrants) कहते हैं। जिस राष्ट्र से वह व्यक्ति दूसरे राष्ट्र को जाता है, उस राष्ट्र की दृष्टि से यह बहिर्गन्तुक (Emmigrants) या प्रवासी कहलाता है।

       ब्राइडे ने अपनी पुस्तक ‘Human Geography : Principles, Processes and Pattern’ में प्रवास को दो प्रमुख वर्गों में रखा है:

1. अन्तर्महाद्वीपीय प्रवास (Inter-continental migra tion)-

      विश्व में एक देश से दूसरे देश अथवा एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप के देशों की प्रवास अन्तर्महाद्वीपीय प्रवास कहलाता है।

2. आन्तरिक प्रवास (Internal migration)-

      यह चार प्रकार के होते हैं:

(a) अन्तप्रदेशीय प्रवास (Inter-regional migration)-

      जब किसी देश के एक भाग से दूसरे भाग में लोग काम की तलाश में जाकर बस जाते हैं, तो ऐसे प्रवास को अन्तप्रदेशीय प्रवास कहते हैं। सामान्यतया कम विकसित क्षेत्रों से लोग विकसित क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं।

(b) सामयिक या मौसमी प्रवास (Periodic or seasonal migration)-

     जब प्रवास किसी समय विशेष पर आधारित हो। जैसे शीतकाल में चरवाहे लोग ऊंचे पहाड़ी भागों से निम्न भू-भागों में चले जाते हैं और ग्रीष्मकाल में पुनः वापस पहाड़ी भागों में आ जाते हैं।
(c) ग्रामीण-नगरीय प्रवास (Rural-urbanmigration)-

      वह प्रवास जिसमें लोग रोजगार की तलाश में ग्रामीण क्षेत्र से नगरों में जाकर बस जाते हैं।

(d) कार्य-यात्रा प्रवास (Work-travel migration)-

       जब लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को काम कने के लिए रोजाना इधर से उधर आते जाते हैं, तो इसे कार्य यात्रा प्रवास कहते हैं। सैकड़ों कार्यकर्ता रोजाना सुबह बड़े महानगरों में विभिन्न साधनों से जाते हैं औ शाम वापिस अपने घरों को लौट जाते हैं।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration) किसे कहते है? प्रवास के प्रमुख प्रकारों की विवेचना कीजिये।



4. जनसंख्या भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र

जनसंख्या भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र


प्रश्न प्रारूप

1. जनसंख्या भूगोल को परिभाषित करते हुए इसके विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिये।

जनसंख्या भूगोल की

       जनसंख्या भूगोल मानव भूगोल की एक शाखा है, जिसमें मानव संख्या के मात्रात्मक एवं गुणात्मक पहलुओं का और इनके वितरण से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों का अध्ययन किया जाता है। वस्तुतः जनसंख्या भूगोल मानव का अध्ययन है, चूंकि मानव ही किसी क्षेत्र की विशेषताएँ एवं विभिन्नताएँ प्रदान करता है, अतः जनसंख्या भूगोल में मानव संख्या के वितरण में व्याप्त क्षेत्रीय असमानताओं का अध्ययन एवं समीक्षा कारण सहित की जाती है।

⇒ जे. आई. क्लार्क के अनुसार जनसंख्या भूगोल में जनसंख्या के वितरण, संघटन, प्रवास और वृद्धि में पायी जाने वाली स्थानिक भिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है। साथ ही ये स्थानिक भिन्नताएं क्षेत्र विशेष की प्रकृति में पायी जाने वाली स्थानिक भिन्नताओं से किस प्रकार से सम्बन्धित होती हैं, का भी अध्ययन किया जाता है।

       इस प्रकार जनसंख्या भूगोल का सम्बन्ध स्थानिक भिन्नताओं के साथ-साथ क्षेत्र के भौतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक घटकों से है। क्लार्क के अनुसार जनसंख्या भूगोल जनसंख्या में प्रादेशिक अन्तरों को उसके भौतिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक सन्दर्भ में समझने का प्रयास करता है।

⇒ विल्वर जेलिंस्की के अनुसार जनसंख्या भूगोल एक ऐसा विज्ञान है जो किसी क्षेत्र की जनसंख्या के विविध पहलुओं का अध्ययन उस क्षेत्र की प्राकृतिक परिस्थितियों के संदर्भ में करता है। इनके अनुसार जनसंख्या के विभिन्न लक्षणों के क्षेत्रीय वितरण का जनसंख्या के क्षेत्रीय वितरण में पायी जाने वाली समानताओं एवं असमानताओं हेतु उत्तरदायी कारकों का और जनसंख्या की दृष्टि से क्षेत्रों का वर्तमान भौगोलिक स्वरूप कैसे बना है, इन सभी का अध्ययन जनसंख्या भूगोल में किया जाता है।

⇒ जे. व्युजे गारनियर ने फ्रांसीसी भाषा में लिखी गई अपनी पुस्तक जिसका अनुवाद बीवर ने Geography of Population के नाम से किया है, में लिखा है कि जनसंख्या भूगोल वर्तमान वातावरण के सन्दर्भ में जनांकिकी तथ्यों का वर्णन है। साथ ही जनांकिकी तथ्यों के कारणों, मूलभूत विशेषताओं और संभावित परिणामों का अध्ययन भी जनसंख्या भूगोल में किया जाता है।

⇒ जी. जे. डैम्को ने अपने द्वारा सम्पादित पुस्तक Population Geography : A Reader में लिखा है कि जनसंख्या भूगोल, भूगोल की वह शाखा है जिसमें किसी क्षेत्र के जनांकिकी लक्षणों के क्षेत्रीय वितरण का विश्लेषण किया जाता है। इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय दशाओं की आपसी क्रिया-प्रतिक्रिया से उत्पन्न सामाजिक और आर्थिक प्रतिफलों का अध्ययन भी किया जाता है। इन सभी पक्षों पर चूंकि समय का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है इसलिए समयानुसार जनसंख्या वितरण के क्षेत्रीय प्रारूप को प्रभावित करने वाली प्रक्रियाओं का भी अध्ययन किया जाता है। डैम्को ने ऐसे मॉडल विकसित करने पर भी जोर दिया। जिनके द्वारा किसी क्षेत्र के समस्त जनसंख्या लक्षणों को निर्धारित करने वाली प्रक्रियाओं को भली-भांति समझा जा सके।

      निष्कर्षतः जनसंख्या का अध्ययन भौगोलिक अध्ययन का मुख्य केन्द्र बिन्दु है। वस्तुतः मानव (जनसंख्या) वह संदर्भ बिन्दु अथवा केन्द्र बिन्दु है जिसको केन्द्र में रखते हुए क्षेत्रीय लक्षणों का अवलोकन और निर्धारण किया जाता है। ज्ञातव्य है। कि मानव (जनसंख्या) से ही अन्य भौगोलिक तत्वों को अर्थ एवं महत्व मिलता है।

       उदाहरण के लिए मानव के संदर्भ में ही किसी स्थान विशेष की जलवायु को अर्थपूर्ण नाम एवं महत्व मिल पाता है। इसी प्रकार से किसी भी प्राकृतिक पदार्थ की संसाधनता भी मानव उपयोगिता के संदर्भ में ही अस्तित्व में आ पाती है। जनसंख्या भूगोल में जनांकिकी प्रक्रियाओं और इन प्रक्रियाओं के परिणामों का अध्ययन पर्यावरणीय संदर्भ में किया जाता है।

     स्पष्टतः जनसंख्या भूगोल में जनसंख्या की संरचना, वृद्धि और स्थानान्तरण में मिलने वाली स्थानिक विभिन्नताओं (Spatial Variation) का अध्ययन और इन स्थानिक विभिन्नताओं के सामाजिक एवं आर्थिक प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।

जनसंख्या भूगोल का अध्ययन क्षेत्र (Scope of Population Geography)

       जनसंख्या भूगोल के अध्ययन क्षेत्र को निम्न वर्गों में रखा जा सकता है:

⇒ भूतकाल की जनसंख्या सम्बन्धी विशेषताओं का अध्ययन।
⇒ जनसंख्या के वितरण के अध्ययन के अन्तर्गत महाद्वीपों तथा उसके विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या वितरण प्रतिरूप, विश्व में बसे हुए और बिना बसे हुए क्षेत्रों का वितरण, जनसंख्या का अन्तर्प्रदेशीय और अन्तर्सामयिक वितरण, बस्तियों का आकार, वितरण एवं उनमें परस्पर दूरियों का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के घनत्व के अध्ययन में विभिन्न प्रकार के घनत्व, स्थानीय स्तर से लेकर विश्व स्तर तक जनघनत्व की विशेषताएं, घनत्व वितरण का स्थानिक प्रतिरूप तथा उनको प्रभावित करने वाले कारक, प्रवास के नियम एवं परिणाम तथा शिक्षित एवं योग्य मानव श्रम का कम विकसित देशों से अधिक विकसित देशों को स्थानान्तरण आदि का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या वृद्धि के अन्तर्गत जनसंख्या वृद्धि का मापन, जन्म-दर, मृत्यु-दर, जनसंख्या वृद्धि पर प्रभाव डालने वाले कारक, वृद्धि प्रतिरूप का वितरण, जनसंख्या वृद्धि के सिद्धान्त तथा जनसंख्या वृद्धि भावी अनुमान आदि का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के संघटन के अन्तर्गत जाति, धर्म, भाषा, आयु, लिंग, कार्यकर्ता-आश्रित तथा कार्यशील जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के लक्षणों के अन्तर्गत जनसंख्या की साक्षरता एवं साक्षरता के स्तर को प्रभावित करने वाले कारकों तथा विश्व में साक्षरता का प्रतिरूप आदि का अध्ययन।

⇒ ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या की सभी प्रकार की विशेषताएँ एवं लक्षण, नगरीकरण की प्रक्रिया एवं उस पर प्रभाव डालने वाले कारक तथा विश्व एवं उसके राष्ट्रों में नगरीकरण का प्रतिरूप का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या संसाधन अनुपात में जनसंख्या वृद्धि तथा संसाधन विकास, जनसंख्या का बढ़ता दबाव, संसाधन एवं जनसंख्या अनुपात, संसाधनों पर आधारित जनसंख्या के सिद्धान्त, संसाधन एवं जनसंख्या प्रतिरूप, जनसंख्या क्षमता, अधिकतम जनसंख्या, अल्प जनसंख्या, अनुकूलतम जनसंख्या आदि का अध्यय


3. जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत

3. जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत


जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत⇒ 

            जनसंख्या वृद्धि एक जैविक प्रक्रिया है जो समय और स्थान के संदर्भ में प्रभावित होता है। जनसंख्या वृद्धि का संबंध जन्म दर और मृत्यु दर से है। जन्म दर और मृत्यु दर का संबंध किसी भी देश के सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से जुड़ा हुआ है। जन्म दर एवं मृत्यु दर का सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के बीच मिलने वाला सह-संबंध का अध्ययन “जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत” कहलाता है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन अमेरिकी समाजशास्त्री के विलियम थॉम्पसन ने 1929 ई० में और 1945 ई० में नोटेस्टीन ने इसमें संशोधित किया। जबकि 1975 ई० में क्लार्क महोदय ने और 1978 ई0 में हेगेट महोदय ने इस सिद्धांत को जनसंख्या वृद्धि का विश्लेषण करने वाला एक यथार्थवादी सिद्धांत बताया।

                थाम्पसन और नोटेस्टीन ने बताया कि जनसंख्या वृद्धि तथा किसी भी देश का सामाजिक आर्थिक दर एक ही सिक्के के दो पहलू है। जैसे-अगर किसी देश के जनसंख्या वृद्धि दर उच्च है तो इसका तात्पर्य है कि वहाँ का आर्थिक-सामाजिक स्तर विकासशील या अति पिछड़े दौड़ से गुजर रहा है। दूसरी ओर यदि जनसंख्या वृद्धि दर अति न्यून है तो इसका तात्पर्य है कि उस देश का आर्थिक सामाजिक स्तर काफी विकसित अवस्था में है। 

              थॉम्पसन और नोटेस्टीन ने बताया कि जनसंख्या वृद्धि एक गत्यात्मक पहलू है जो कि समय और स्थान के संदर्भ में परिवर्तित होते रहता है।
      उपरोक्त मान्यताओं को तार्किक ढंग से प्रस्तुत करते हुए इन्होंने समय और स्थान के संदर्भ में चार अवस्थाओं का उल्लेख किया है-

(i) प्रथम अवस्था⇒ इस अवस्था में उच्च विलचन की प्रवृति पायी जाती है। जन्म दर 40-50 व्यक्ति/हजार, मृत्यु दर 40-50 व्यक्ति / हजार और प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि दर -10 से +10 तक हो सकता है।

       प्रथम अवस्था से गुजरने वाले देश की आर्थिक-सामाजिक स्थिति काफी पिछड़ी होती है। ऐसे देशों में निरक्षरता, गरीबी, बेरोजगारी, रुढ़िवादी धर्म, परम्परागत सामाजिक विशेषता का बोलवाला होता है।

            अधिकतर देश वर्तमान समय में प्रथम अवस्था से मुक्त हो चुके हैं। फिर भी मध्य अफ्रीकी देश रुवान्डा, बुरुण्डी, युगाण्डा, द०-पूर्व एशिया के कम्बोडिया एवं लाओस में यह अवस्था पायी जाती है। यद्यपि भारत इस अवस्था में शामिल नहीं है तथापि भारत के कई क्षेत्र आज भी इस अवस्था के दौर से गुजर रहे हैं। जैसे- भारत के कई जनजातीय समूह, इसी अवस्था से गुजर रहे हैं।

(ii) दूसरा अवस्था⇒ दूसरा अवस्था को जनसंख्या विस्फोट की अवस्था भी कहते है। इस अवस्था में जन्म दर 30-40 व्यक्ति प्रति हजार, मृत्यु दर 15-20 व्यक्ति/हजार और जनसंख्या वृद्धि दर 15 से 25 व्यक्ति प्रति हजार प्रतिवर्ष होता है।

         दूसरा अवस्था विकासशील देशों के आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों का उल्लेख करता है। ये वे देश हैं जिन्होंने मृत्यु दर पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है लेकिन सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के कारण जन्मदर पर संतोषजनक नियंत्रण स्थापित नहीं किया है।

        अधिकतर द० एशियाई देश, द०-पूर्वी एशिया के देश, लेटिन अमेरिका और अधिकतर अफ्रीकी देश इसके उदाहरण है। थॉम्पसन ने यह भी बताया था कि इस अवस्था में वैसे देशों को रखा जाना चाहिए जिनका जनसंख्या वृद्धि दर 2% से अधिक है। अगर भारत के सन्दर्भ में विश्लेषण किया जाय तो स्पष्ट होता है कि भारत में जन्म दर और मृत्यु दर दूसरी अवस्था के अनुकूल है। जबकि वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर 1.64% हो गया है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत के तीसरी अवस्था के चौखट पर खड़ा है।

(iii) तीसरी अवस्था⇒ तीसरी अवस्था को जनसंख्या वृद्धि में क्रमिक परिवर्तन की अवस्था कहते है। तीसरा अवस्था में जन्मदर 16-20 व्यक्ति / हजार, मृत्युदर 10-15 व्यक्ति/हजार, जनसंख्या वृद्धि दर 1-10 व्यक्ति प्रति हजार प्रतिवर्ष होता है।

            तीसरी अवस्था में वैसे देशों को शामिल किया जाता है जिन्होंने जन्म दर और मृत्यु दर पर संतोषजनक नियंत्रण स्थापित कर लिया है तथा हाल के वर्षों में तीव्र गति से आर्थिक विकास का कार्य किया है। तीसरी अवस्था में पूर्वी यूरोपीय देश, मध्य एशियाई देशों को शामिल करते हैं। इसके अलावे ताईवान, द. अफ्रीका, पूर्तगाल, क्यूबा, द. कोरिया इत्यादि इसी अवस्था के उदहारण है। कुछ विद्वान भारत और श्रीलंका को भी इसी अवस्था में शामिल करते हैं।

(iv) चौथी अवस्था⇒ चौथी अवस्था को निम्न विचलन की अवस्था कहते हैं। चौथी अवस्था में जन्म दर 6-8, मृत्यु दर से 6 से 8 और प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि दर 0-2 व्यक्ति / हजार प्रतिवर्ष होता है।
                चौथी अवस्था में उन देशों को शामिल करते हैं जहाँ सामाजिक-आर्थिक अवस्था काकी उन्नत है, साक्षरता 100% पहुंच चुका है। औद्योगिकीकाण तथा नगरीकरण बड़े पैमाने पर हुआ है। इस अवस्था में पश्चिमी यूरोप, पुर्तगाल को छोड़कर आंग्ल अमेरिका, USA और कनाडा, अस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापूर, जापान को शामिल करते हैं। अर्थात ये विकसित होते हैं।

             जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत का प्रशंसा करते हुए क्लार्क महोदय ने एक पाँचवी अवस्था का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार पाँचवी अवस्था अति विकसित देशों की अवस्था है। इस अवस्था में वैसे देशों को शामिल करते हैं जहाँ जन्म दर की तुलना में मृत्यु दर अधिक है तथा जन्म दर और मृत्यु दर अति न्यून है। वैसे सामाजों में परिवार एवं विवाह, जैसी संस्थाएँ कमजोर हो चुकी है।

            समाज पूर्ण रूप से भौतिकतावादी बन चुका है। जनसंख्या वृद्धि दर ऋणात्मक हो चुका है। इस अवस्था को क्लार्क महोदय ने प्रजातीय संहार की अवस्था से सम्बोधित किया है। पश्चिमी जर्मनी, स्वीडेन, नार्वे, आइसलैण्ड, स्वीटजरलैण्ड इसी अवस्था से गुजर रहे हैं। क्लार्क ने ऐसे देशों को चेतावनी देते हुए कहा कि आप जल्द से जल्द जनसंख्या वृद्धि के लिए अनुकूल कार्यक्रम चलाये।
                हेगेट महोदय ने जनसांख्यिकीय संक्रमण सिद्धांत को एक मॉडल से समझाने का प्रयास किया है।

जनसांख्यिकीय संक्रमण का

जनसांख्यिकी मॉडल (हेगेट)

 BR- जन्म दर, DR- मृत्यु दर

अवस्था- समय का द्योतक है।

       ऊपर के तथ्यों एवं मॉडल के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि जनसांख्यिकी संक्रमण का सिद्धांत स्थान और समय के संदर्भ में दिया गया है और बताया गया है कि जन्म दर, मृत्यु दर और जनसंख्या वृद्धि दर सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से संबंधित है। इसे कुछ उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे-1750-1760 ई० तक ब्रिटेन प्रथम अवस्था से, 1760-1850 ई० तक द्वितीय अवस्था से 1850-1900 ईo तक तृतीय अवस्था से और 1900 ई० के बाद यह चौथी अवस्था के दौर से गुजर रहा है।

                 भारत के संदर्भ में अशोक मिश्रा ने विश्लेषण करते हुए कहा है कि भारत 1931 ई० तक प्रथम अवस्था में, 1931 से 1991 ई० तक द्वितीय अवस्था में और 1991 के बाद तृतीय अवस्था से गुजार रहा है।

जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत की अलोचना

             जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत की कई आधार पर आलोचना की गई है। जैसे-

(1) अगर चीन के सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति को देखा जाय तो वह अभी भी दूसरी अवस्था के दौर से गुजर रहा है। लेकिन प्रशासनिक प्रतिबद्धता को दिखाते हुए जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण कर तृतीय अवस्था में पहुँच चुका है। इसका तात्पर्य है कि जन्म दर और मृत्यु दर एवं जनसंख्या वृद्धि दर का संबंध न केवल आर्थिक सामाजिक परिस्थितियों से है बल्कि अन्य कारकों से भी है।

(2) मध्य-पूर्व के पेट्रोलियम उत्पादक देश के संदर्भ में अगर इस सिद्धांत की विवेचना की जाय तो पाते है कि ये देश सामाजिक दृष्टिकोण से अभी भी मध्ययुगीन, रुढ़िवादी एवं बर्बर की अवस्था से गुजर रहे हैं। लेकिन पेट्रो डॉलर के कारण आर्थिक स्थिति विकसित देशों से कम नहीं है। अत: ऐसे देशों को किस अवस्था में रखा जाय स्पष्ट रूप से व्याख्या नहीं किया जा सकता।

(3) पूर्वी यूरोपीय जैसे देशों में भी यह मॉडल सही ढंग से लागू नहीं हो पाया क्योंकि यहाँ की आर्थिक स्थिति तीसरा अवस्था का घोत्तक और जनसंख्या वृद्धि चौथी अवस्था का घोत्तक है।

(4) इसकी आलोचना इस आधार पर भी की जाती है कि वर्तमान समय मे विश्व का कोई भी देश नहीं है जो प्रथम अवस्था की दौर से गुजर रहा है।

निष्कर्ष:

    उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि इस सिद्धांत की आलोचना कई आधारों प की गई है। इसके बावजूद यह सिद्धांत विश्व के अधिकतर देशों प लागू होता है। इस तरह इस सिद्धांत की मौलिकता आज भी बनी हुई है।

 

2. मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत (Marx’s population theory)

2. मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत

(Marx’s population theory)


मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत ⇒मार्क्स का जनसंख्या सिद्

                मार्क्स को साम्यवादी चिन्तन का जन्मदाता माना जाता है। इन्होंने 1867 ई० में जनसंख्या पर अपना विचार प्रकट किया था। मार्क्स के पहले जितने भी विद्वान थे उन्होंने जनसंख्या वृद्धि को जैविक प्रक्रिया मानते थे। जबकि मार्क्स ने पहली बार जनसंख्या वृद्धि को सामाजिक संकल्पना पर आधारित माना।

             कार्ल मार्क्स अपने साम्यवादी चिन्तन में कहा था कि पूरी दुनिया दो वर्गों में विभाजित है- “एक अमीर वर्ग और दूसरा गरीब वर्ग”। उनके अनुसार अमीरों का वर्ग हमेशा सम्पति एकत्रित में लगा रहता है। अमीर वर्ग कम से कम श्रमिक का उपयोग कर अधिक से अधिक उत्पादन करना चाहता है। तकनीक के प्रयोग पर अधिक से अधिक जोर देता है। वह श्रमिकों को कम-से-कम मजदूरी देकर अधिक औद्योगिक उत्पादन कर अधिक से अधिक लाभ कमाना चाहता है। इस तरह उसके पास समय अभाव के कारण जनसंख्या वृद्धि का मौका नहीं मिल पाता है।

            दूसरी तरफ समाज का वह वर्ग जो गरीबी से गुजर रहा है। उनमें निराशा का वातावरण होता है। जीविका उपार्जन हेतु श्रम के अलावे कोई दूसरा उपाय नहीं दिखता है। अत: गरीब वर्ग ज्यादा से ज्यादा धन एकत्रित करने हेतु श्रम का एकत्रीकरण शुरू कर देता है। फलतः जनसंख्या वृद्धि स्वाभाविक रूप से बढ़ते रहती है।
                मार्क्स ने मजदूरी और जन्म दर एवं मृत्यु दर के बीच प्रतिकूल सह सम्बन्ध पाया है।

मजदूरी ∝ 1 ⁄  जन्म एवं मृत्यु दर
                 उपरोक्त सूत्र के आधार पर उन्होंने बताया कि कम मजदूरी भी जनसंख्या विस्फोट की स्थिति उत्पन्न करती है। जब जनसंख्या का विस्फोट हो जाता है तो उस विस्फोटित जनसंख्या के सामने चार प्रकार की समस्या उत्पन्न होती है-
(1) बेरोजगारी
(2) कुपोषण
(3) गरीबी और
(4) कष्टकर जीवन

                   उपरोक्त समस्याएँ गरीब एवं श्रमिक वर्ग को बेचैन कर देती है, जिसके कारण वर्ग संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। मार्क्स ने बताया कि वर्ग संघर्ष से ही सभी आर्थिक, सामाजिक समस्याओं का समाधान होता है। धन सही रूप से समाज में वितरण हो जाता है। वर्ग संघर्ष में कई लोग मारे जाते हैं जिससे जनसंख्या में कमी आती है।

मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत का आलोचना

                   मार्क्स के द्वारा प्रस्तुत जनसंख्या वृद्धि सिद्धांत की कई आधारों पर आलोचना की गई है। जैसे:-

(1) मार्क्स ने धर्म, विश्वास एवं जैविक प्रक्रिया को जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण नही माना है। जबकि क्लार्क महोदय के अनुसार जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण धर्म है, जबकि जननांकी संक्रमण सिद्धांत के अनुसार जनसंख्या वृद्धि का मूल कारण जैविक प्रक्रिया है।

(2) मार्क्स के अनुसार बढ़ती जनसंख्या से मजदूरी में सापेक्षिक कमी आती है। जबकि वास्तव में यह एक गलत अवधारणा है, क्योंकि लोक कल्याणी राज्यों में मजदूरी का निर्धारण लोग स्वयं नहीं करते हैं, यह सरकार के द्वारा किया जाता है।

(3) मार्क्स के अनुसार निजी सम्पत्ति और पूँजीपति समाज का विकास ही अप्रत्यक्ष रूप से जनसंख्या विस्फोट का कारण है लेकिन पश्चिमी यूरोप के संदर्भ में यह अवधारणा गलत साबित होती है।

(4) ड्यू मॉन्ट (फांसीजी)⇒

        द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में अभिवृद्धि हुई है। इसके साथ ही साक्षरता में भी वृद्धि हुई है। समाज में चाहे अमीर हो या गरीब यह भावना पनपी है कि नियोजित और छोटा जीवन अधिक से अधिक खुशहाली ला सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि जनसंख्या वृद्धि अमीरी & गरीबी से जुड़ी हुई नहीं है।

(5) अधिकतर विकासशील देशों में ऐसा देखने से लगता है कि अप्रत्याशित जनसंख्या वृद्धि का संबंध निम्न मजदूरी है। लेकिन यह वास्तव में यह निम्न मजदूरी से जुड़ा हुआ नहीं है बल्कि निम्न स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा हुआ है अर्थात् निम्न स्वास्थ्य का स्तर होने के कारण बच्चों के जीवित रहने की गारंटी नहीं होती है। फलत:, सामान्य व्यक्ति अधिक से अधिक बच्चा चाहता है।

निष्कर्ष :

           उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद इनकी अवधारणा उचित जान पड़ती है क्योंकि कहीं न कहीं गरीबी, बेरोजगारी और जनसंख्या में सह-संबंध है। एडम स्मिथ ने कहा है कि गरीबी जनसंख्या वृद्धि के लिए उपयुक्त वातावरण निर्माण करती है। मार्क्स के द्वारा व्यक्त यह विचार व्यक्त किया गया कि बढ़ती हुई जनसंख्या राष्ट्र की संपत्ति होती है। यह भी सापेक्षिक रूप से सही प्रतीत होता है। जैसे -भात में ही कुछ समय पहले तक जनसंख्या वृद्धि को एक अभिशाप के रूप में माना जाता था। जबकि Out Soursing, BPO, सूचना क्रांति के आगमन ने भातीय जनसंख्या को संसाधन के रूप में बदल दिया है।

 

1. माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत (Malthusian Population Theory) 

1. माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत

(Malthusian Population Theory)



माल्थस का जनसंख्याप्रश्न प्रारूप 

1. जनसंख्या वृद्धि से संबंधित सिद्धांतों का आलोचनात्मक व्याख्या करें। वर्तमान समय में उनकी उपयोगिता को भी स्पष्ट करें।

         जनसंख्या वृद्धि एक जैविक प्रक्रिया है, जो समय और स्थान के संदर्भ में अलग-2 प्रवृत्ति रखता है। बदलते हुए इन प्रवृतियों को ध्यान  में रखकर कई भूगोलवेत्ताओं एवं अर्थशास्त्रियों ने जनसंख्या वृद्धि से संबंधित सिद्धांत प्रस्तुत किया।  इनमें से चार सिद्धांत प्रमुख है।:-

(i) माल्थस का जनसँख्या सिद्धांत 

(ii) मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत 

(iii) जननांकी संक्रमण का सिद्धांत

(iv) अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धांत

माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत   

      माल्थस एक ब्रिटिश अर्थशास्त्री और जननांकी विशेषज्ञ थे। उन्होंने 1798 ई० में लिखित पुस्तक “An Esay On Priciple of Population” नामक पुस्तक में जनसंख्या का सिद्धांत प्रस्तुत किया

मन्यताएँ

       माल्थस का सिद्धांत दो आधारभूत मान्यताओं पर आधारित है।

(i) जनसंख्या वृद्धि सदैव ज्यामितीय रीति से होती है। जैसे- 1, 2, 4, 8, 16, 32, . . . . . . . . . . . . . .।

(ii) खाद्यान्न पदार्थों की वृद्धि अंक गणितीय विधि से होती है। जैसे:- 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, . . . . .।

      माल्थस के अनुसार जनसंख्या वृद्धि और खाद्यान्न उत्पादन की वृद्धि की अलग-अलग प्रवृत्ति होती है। अर्थात् जनसंख्या की बढ़ोतरी तेजी से होती है, उसके अनुपात में खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि मंद गति से होती है।

       अगर किसी देश की जनसंख्या वृद्धि अधिक हो और खाद्यान्न का उत्पादन दर निम्न हो तो वह देश खाद्यान्न की समस्या से ग्रसित होगा।

      माल्थस के अनुसार जनसंख्या वृद्धि की दर अगर उच्च हो तो किसी भी जनसंख्या आकार को दोगुना बना देती है। 

विश्लेषण:

      माल्थस के अनुसार जनसंख्या का आकार 25 वर्ष में दुगुना हो जाता है। माल्थस का सिद्धांत उस समय आया जब औद्योगिक क्रांति के प्रभाव से अनेक बीमारियों तथा महामारियों पर नियंत्रण स्थापित किया जा रहा था। इसके कारण मृत्युदर में तो कमी आ रही थी लेकिन जनसंख्या वृद्धि में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आ रही थी जिसके परिणामस्वरूप लगभग सम्पूर्ण यूरोप में जनसंख्या वृद्धि तीव्र गति से हो रही थी।

      अत: उन्होंने बताया कि आनेवाले समय में पूरे विश्व को खाद्य संकट और जनसंख्या दबाव जैसी गंभीर समस्या का सामना करना होगा। माल्थस ने खाद्यान्न संकट से निपटने हेतु जनसंख्या नियंत्रण अनिवार्य बताया। इसके लिए उन्होंने दो उपाय बताये। जैसे:-

(i) साकारात्मक उपाय

(ii) नाकारात्मक उपाय

       साकारात्मक उपाय के अन्तर्गत उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी समाज के ऊपर डाला। उन्होंने कहा कि युद्ध, गरीबी, महामारी, खाद्यान्न पदार्थों की कमी जैसे कारक स्वतः प्राकृतिक रूप से जनसंख्या पर नियंत्रण स्थापित करते हैं।

        दूसरे शब्दों में प्रकृति और समाज जनसंख्या का स्वयं नियंत्रक होता है। लेकिन यह विधि काफी कष्टकर होता है। अत: उन्होंने ये सलाह दिया कि आप जनसंख्या का नियंत्रण निषेधात्मक विधि से करे

निषेधात्मक उपाय के अन्तर्गत उन्होंने नैतिक आचरण की चर्चा की है। उनके अनुसार:-

(i) मनुष्य को विवाह स्वयं देरी से करनी चाहिए।

(ii) प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में कार्यों का महात्व देना चाहिए।

(ii) युवावस्था में ब्रह्मचर्य जीवन का पालन करना चाहिए। इससे उनकी आर्थिक आय सुनिश्चित होगी।

      माल्थस का यह विचार प० यूरोप के लिए एक नवीन चिंतन था जिस चिन्तन को अधिकतर देश के सरकारों ने पसन्द किया। यहाँ तक कि ब्रिटिश सरकार ने उनके पुस्तकों का सस्ते दर में प्रकाशित कर वितरण किया तथा राजनीतिक क्षेत्रों में उनके पुस्तकों एवं सिद्धांतों का हवाला दिया गया।

आलोचना

      माल्थस का सिद्धांत जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में एक चिरसम्मतकालीन सिद्धांत हैं। इसके बावजूद भी इनकी आलोचना कई आधारों पर की गई है। जैसे:-

(i) किसी भी परिवार में एक शिशु का आगमन होना एक जैविक प्रक्रिया मात्र है (माल्थस के अनुसार), लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह जैविक प्रक्रिया के साथ-2 सामाजिक प्रक्रिया भी है।

(ii) जनसंख्या और खाद्य वृद्धि के संबंध में माल्थस जो मत प्रतिपादित किया है, वह भी गलत है क्योंकि जहाँ एक ओर राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता के आधार पर जनसंख्या वृद्धि दर को नियंत्रित किया जा रहा वहीं जैव तकनीक एवं विभिन्न प्रकार के कृषि क्रांतियों के द्वारा खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ाया जा रहा है।

(iii) माल्थस के अनुसार कोई भी जनसंख्या का आकार 25 वर्षों में दुगुना हो जाता है, लेकिन यूनाइटेड किंगडम में 280 वर्ष में, जापान 270 वर्ष में, USA में 99 वर्ष में, रूस, जर्मनी, स्वीडन में 300 वर्ष में, इसी तरह भारत में स्वतंत्रता के बाद 35 वर्ष में जनसंख्या का आकार दुगुना हुआ जो स्पष्ट है कि माल्थस के विचार के प्रतिकूल है।

(iv) माल्थस के द्वारा जनसंख्या नियंत्रण के उपायों में नकारात्मक उपाय को अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया और निषेधात्मक उपाय व्यावहारिक कम काल्पनिक अधिक लगती है। वस्तुतः कोई भी समाज जनसँख्या नियंत्रण के लिए नियोजित तरीके से निषेधात्मक उपाय का पालन नहीं कर सकती है।

(v) क्लार्क महोदय माल्थस  का आलोचना करते हुए कहा है कि उन्होंने जनसंख्या के नियंत्रण में गर्भ निरोधकों की भूमिका को नजर अंदाज किया है।

(vi) माल्थस का सिद्धांत मूलतः प० यूरोप के संदर्भ में दिया गया था न कि पूरे विश्व के संदर्भ में।

       यद्यपि माल्थस के विचारों की आलोचाना कई आधारों पर की जाती है, फिर भी इनके दो विचारों की अवहेलना नहीं की जा सकती हैं-

(i) यद्यपि अधिकतर विकासशील देशों मे जनसंख्या वृद्धि ज्यामितीय तरीके से नहीं हो रहा है लेकिन यह भी स्पष्ट हो रहा है कि अंकगणितीय विधि से नहीं हो रहा है लेकिन विकासशील देशों के जनसंख्या वृद्धि की प्रवृति देखते हुए ज्यामीतीय प्रकृति का आभाव होता है।

(ii) नवीन आलोचना में कहा गया है कि जनसंख्या नियंत्रण के साकारात्मक उपाय कम महत्वपूर्ण है। लेकिन विकासशील देशों में जनसंख्या वृद्धि वाले क्षेत्रों में अधिकतर आकाल, महामारी, जातीय एवं प्रजातीय दंगे एवं प्राकृतिक विपदाएँ आती हैं। इससे जनसंख्या नियंत्रण के कार्यों की पुष्टि होती है।

निष्कर्ष:

     अतः स्पष्ट है कि माल्थस का विचार एक ऐतिहासिक अवधारणा है। वर्तमान समय में यह सिद्धांत विकसित एवं साक्षर देशों प भले ही लागू नहीं होता हो परन्तु विकासशील देशों प स्पष्ट रूप से लागू होता है।

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