Category भारतीय संसाधन

3. Water use, Problems and Conservation in India (भारत में जल उपयोग, समस्या तथा संरक्षण)

Water use, Problems and Conservation in India

(भारत में जल उपयोग, समस्या तथा संरक्षण)



Q. भारत में जल संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता एवं उपयोगिता पर चर्चा कीजिए। 

       जल प्राकृ‌तिक संसाधन है। मानव सहित जैविक संसार के जीव-जंतुओं के लिए जल अनिवार्य है। यही कारण है कि जल को जीवन से तुलना की जाती है। जल को लेकर यहाँ तक कहा जाने लगा है कि अगला विश्वयुद्ध जल के कारण ही लड़ा जायेगा। पूरे विश्व के 71% भाग पर समुद्री जल का विस्तार हुआ है। कुल स्वच्छ जल की 97% भाग अण्टार्कटिका या ध्रुवीय क्षेत्र में अवस्थित है। शेष तीन 3% जल स्थल पर जलाशयों और भूमिगत जल के रूप में अवस्थित है।

Water use

      हमारी पृथ्वी के ऊपर 480 लाख घन किमी० जल उपलब्ध है। उनमें से कुछ जल वायुमण्डल में कुछ जल भूमिगत जल के रूप में और शेष जल महाद्वीप और महासागर के रूप में अवस्थित है। भारत जल संसाधन के मामले में एक धनी राष्ट्र है। जल रूपी प्राकृतिक संसाधन का भारत में कई तरह से उपयोग में लाये जाते हैं। जैसे:-

(1) सिंचाई के रूप में:-

     जल का उपयोग किसानों के द्वारा कसल के उत्पादन हेतु सदियों से किया जाता रहा है। इसके लिए किसान नहर, नलकूप, कुंआ, तालाब और परम्परागत संसाधनों का उपयोग करते हैं। किसान इन जलाशयों से जल का दोहन कर फसल को शुष्क मौसम में सिंचाई कर बचाने का प्रयास करते हैं। हरित क्रांति ने यह साबित कर दिया है कि सिंचाई, फसलों के उत्पादन और उत्पादकता के बीच सह संबंध पायी जाती है अर्थात् जितना अधिक सिंचाई होगा उतना ही अधिक फसल उत्पादन होने की संभावना होती है।

(2) जलविद्युत के उत्पादन में:-

      तापीय ऊर्जा के उत्पादन से कई पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न होने लगी है। अत: इसके विकल्प के रूप में नदियों पर बड़े-2 बाँधों का निर्माण कर जलविद्युत का उत्पादन किया जा रहा है। भारत का पहला जलविद्युत केन्द्र शिवसमुद्रम (1902 ई०) है। भारत में सबसे बड़ा जल-विद्युत केन्द्र भाखड़ा-नांगल टेहरी है।

       भारत जलविद्युत उत्पादन हेतु लगभग सभी बड़े-बड़े नदियों पर बाँधों का निर्माण कर चुका है और जिन पर नहीं हुआ है उस पर बाँध बनाने की योजना प्रस्तावित है। भारत की नदियों से 8400 मेगावाट, जलविद्युत का उत्पादन किया जा सकता है। वर्तमान समय में भारत के कुल विद्युत उत्पादन में 24-27% योगदान जलविद्युत का है।

(3) पेयजल के रूप में:-

      प्रत्येक जीव अपना प्यास जल का सेवन कर बुझाते हैं। इस तरह जल प्रमुख पोषक तत्त्व के रूप में शामिल हो जाता है। पेयजल की आवश्यकता ग्रामीण एवं नगरीय दोनों क्षेत्रों में है। एक अनुमानित आंकड़ा के अनुसार भारत के मात्र 63% घरों में ही पेयजल की सुविधा उपलब्ध है। इनमें भी मात्र 56% ग्रामीण क्षेत्र में 81.5% नगरी क्षेत्र में पेयजल की सुविधा उपलब्ध है।

    ग्रामीण क्षेत्र में पेयजल भूमिगत जल से पूर्ति की जाती है। वहीं नगरीय क्षेत्रों में पास में अवस्थित जलशयों से की जाती है।

(4) घरेलू कार्य के रूप में:-

       भारत में जल का प्रयोग घरेलू कार्यों के रूप में भी बड़े पैमाने पर की जाती है। जैसे- स्नान करने में, सफाई कार्य में, खाना बनाने में इत्यादि में।

(5) सौद्योगिक उपयोग में:-

      औद्योगिक विकास के लिए पर्याप्त जल की आपूर्ति आवश्यक है। 1972 ई० में स्थापित “सिंचाई आयोग” के अनुसार 50 अरब घन मी० उद्योगों के लिए आवश्यक है लेकिन मात्र 30 अरब घन मी० जल 2000 ई० में उपलब्ध था। 2025 ई0 तक 120 अरब घन मी० औद्योगिक जल की माँग बढ़ने की संभावना है।

(6) परिवहन के रूप में:-

     जल का प्रयोग समुद्री एवं आन्तरिक जल परिवहन के रूप में किया जाता है। आज भारत के 95% अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार समुद्र के माध्यम से होता है। भारत में आन्तरिक परिवहन का विकास पर्याप्त मात्रा में नहीं हुआ है फिर भी हल्दिया से प्रयागराज तक गंगा नदी को राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या-1, सदया से दुबरी तक ब्रह्मपुत्र नदी में राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या WNH-2, तथा केरल के पास कोवलम को WNH-3 घोषित किया गया है। भारत के डेल्टाई क्षेत्रों में स्थानीय लोग जल का प्रयोग परिवहन के रूप में करते हैं।

(7) जलचक्र के रूप में:-

      जलचक्र हमारे पारिस्थैतिक तंत्र का एक प्रमुख प्रक्रिया है जिसके तहत समुद्री जल वाष्पीकृत होकर आकाश में पहुंचता है जिससे वायुमंडल की आर्द्रता बनी रहती है। पुनः ऊँचाई पर जाकर जलवाष्प संघनित होकर बादलों का निर्माण करती है जिससे वर्षण का कार्य होता है।

      वर्षा जल भारत के विभिन्न जलाशयों में जल की आपूर्ति करती हैं। जलाधिक्य वाले क्षेत्रों से जल नदियों के माध्यम से समुद्र तक पुनः पहुँच जाते हैं। इस संपूर्ण जलचक्र के दौरान अनेक जीव-जन्तु जल ग्रहण करते हैं जिससे हमारे देश की जैविक विविधता और पर्यावरण सुरक्षित रहती है।

(8) पर्यटन के विकास में:-

      जल संघनित होकर बर्फ का निर्माण करती है। पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ-बारी के कारण पर्यटन उद्योग का विकास बड़े पैमाने पर होता है। बड़े-2 बहुद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ इंदिरा गाँधी कमांड कैनाल क्षेत्र भाखड़ा-नांगल बहुद्देशीय नदी घाटी परियोजना की ओर जल के कारण ही आकर्षित होते हैं। वर्तमान समय में हाइड्रोनिकल पार्क जल की महता को और रेखांकित किया है।

(9) मत्स्य पालन के रूप में:-

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में जल का प्रयोग कई प्रकार से किया जा रहा है। जब संसाधनों के अत्याधिक दोहन के कारण यह एक विरल प्राकृतिक संसाधन बन चुका है। अतः जल से संबंधित समस्याओं की पहचान कर उनका संरक्षण आवश्यक है।

जल संसाधन से संबंधित समस्याएँ

       भारत में जल संसाधनों से संबंधित समस्याओं को चार शीर्षकों में बाँटकर अध्ययन कर सकते हैं:-

(1) जल उपलब्धता की समस्या:-

     भारत में सतही जल का अनुमानित भण्डार 1869 अरब घन मी० है। इनमें से मात्र 690 अरब घन मी० जल उपयोग के लिए उपलब्ध है। भारत के कुल भूमिगत जल का मात्र 450 अरब घन मी० जल उपयोग के लिए उपलब्ध है। 2025 ई० तक भारत में 1050 अरब घन मी० जल की आवश्यकता होगी। ये आँकड़े बताते हैं कि 2025 ई० तक जल की कमी नहीं होगी, लेकिन उसके बाद जल की जबड़दस्त कमी की समस्या उत्पन्न होगी।

     भारत में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता में कमी आ रही है। 1951 ई० में प्रति व्यक्ति 5514 घन मी० जल उपलब्ध था जो 2001 ई० में घटकर 1869 घन मी० जल रह गई जो घटते हुए जल उपलब्धता स्पष्ट संकेत है।

    प्रादेशिक स्तर पर भी जल संसाधन के वितरण में काफी विषमता है। जैसे-सम्पूर्ण उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में भूमिगत जल उपलब्ध है। वहीं दक्षिण भारत में भूमिगत जल का घोर अभाव है। भारत का उ०-पूर्वी क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में वर्षा (2000 सेमी० से अधिक) होती है। जबकि उ०-प० भारत और वृष्टिछाया प्रदेशों में 100 सेमी० से भी कम वर्षा होती है।

     भारत में जल की उपलब्धता में मौसम के अनुसार भी विविधता देखी जाती है। जैसे- वर्षा ऋतु में भारत की 90% वर्षा हो जाती है। जबकि शेष ऋतुएं जलाभाव की समस्या से जुझते रहती है।

(2) उपयोग से संबंधित समस्याएँ:-

     सभी के लिए स्वास्थ की सुविधा उपलब्ध करवाना भारत सरकार एवं राज्य सरकारों का मौलिक कर्तव्य है लेकिन लोगों को जो जल पीने के लिए मिल रहा है। वह जल 90% तक प्रदू‌षित हो चुका है। राजस्थान, गुजरात, प० मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में पेयजल की गंभीर समस्या है। “राष्ट्रीय प्रायोगिक आर्थिक शोध परिषद” के रिपोर्टानुसार भारत के आधे से अधिक ग्रामीण घरों में पेयजल का कोई भी साधन मौजूद नहीं है।

     भारत में सिंचाई साधनों का विकास बड़े पैमाने पर हुआ है, लेकिन इसके बावजूद भारत के 2/3 कृषि भूमि वर्षा पर ही निर्भर है। पुनः इसमें क्षेत्रीय विषमताएँ भी देखी जा सकती है।

      भूमिगत जल संसाधन के अत्याधिक दोहन के कारण भूमिगत जल स्तर में भारी गिरावट आ रही है। भारत के 10 राज्यों के 114 जिलों में मई-जून में जिलाधिकारियों को सिंचाई कार्य पर रोक लगानी पड़ती है।

      भारत में सिंचाई के लिए जो जल उपलब्ध है उसका भी मात्र 40% जल का ही प्रयोग हो पाता है। शेष जल बेकार चले जाते हैं। नदियों पर छोटे-2 बाँध के अभाव में वर्षा जल प्रवाहित होकर समुद्र तक पहुंच जाते हैं।

(3) गुणवता की समस्या:-

      भारत में जल प्रदूषण की गंभीर समस्या है। इसका प्रमुख कारण उद्योगों, नगरो, घरेलू अवशिष्ट पदार्थों को जल में प्रवाहित किया जाना है। इसके अलावे कृषि कार्यों में प्रयोग किये जाने वाले रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक है। लोगों की गलत जीवन शैली और धार्मिक रुढ़ि‌वादिता भी जल के प्रदूषित कर रही है।

      जिन क्षेत्रों में बड़े-2 बांधों के निर्माण किया गया है उन क्षेत्रों में नीचले स्तर के घुलनशील रासायनिक पदार्थ के ऊपर आ जाने से जल की गुणवत्ता में कमी आ रही है।

(4) प्रबंधन से संबंधित समस्या:-

        भारत में पर्याप्त मात्रा में जल की मात्रा उपलब्ध है लेकिन उचित प्रबंधन के अभाव में जल बेकार हो रहे हैं। राजनैतिक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता में कमी आम व्यक्ति में जागरूकता के अभाव जल संसाधन के समक्ष और जटिल समस्याएं उत्पन्न कर रही है। अत: इनका संरक्षण अति आवश्यक है।

जल संरक्षण के उपाय

     जल एक बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन है जिसका संरक्षण अति आवश्यक है। भारत में जल संरक्षण के लिए जा रहे उपायों को चार शीर्षकों में बाँटकर अध्ययन करते हैं।

(1) वर्षा जल संग्रहण:-

    भारत में पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती है, लेकिन नदियों के माध्यम से जल प्रवाहित होकर समुद्र में चले जाते हैं। अतः वर्षा जल का संग्रहण अनिवार्य है। इसके लिए कई कार्य अपेक्षित है। जैसे- ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिगत जल स्तर से बनाये रखने के परम्परागत सिंचाई साधनों को विकसित किया जा रहा है। जैसे- आहर, तालाब, जोहर इत्यादि का पुनर्निर्माण करवाया जा रहा है।

       नगरीय क्षेत्रों में लोगों को नवीन तकनीक पर आधारित जल संग्रहण की हारवेस्टिंग (कटाई/दोहन) के लिए प्रेरित किया जा रहा है। जैसे- नगरीय लोगों के लिए वाटर प्रूफ छत का निर्माण करना अनिवार्य बनाया जा रहा है। इसके तहत छत पर इकट्टा किये गये वर्षा जल को बोरिंग के माध्यम से भूमिगत करने की सलाह दी जाती है। घरों से निकलने वाले अपशिष्ट जल को घर के बाहर गड्डा/गर्त का निर्माण कर जल संग्रहण निर्माण करने की सलाह दी जाती है।

    पर्वतीय एवं पठारीय क्षेत्रों में वर्षा जल का संग्रहण तालाबों एवं झीलों में किया जाता रहा है। उसे पुर्नुद्धार की योजना सरकार की है। भारत के उन जिलों में जहाँ पेय जल की गंभीर समस्या मौजूद है उन जिलों में भूमिगत जल दोहन करने के लिए किसानों को लाइसेन्स दिया जा रहा है ताकि मनमानी तरीके से का दोहन आप नहीं कर सके। मनमाने जल दोहन पर रोक लगाने के लिए सरकार नगरीय क्षेत्रों में टैक्स (कर) वसूला करती है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के किसान आज भी इस दायरे से बाहर है। सरकार की योजना है कि भूमिगत जल दोहन करने वाले किसान से टैक्स वसूला जाय।

      वर्षा जल के संग्रहण हेतु नदियों पर छोटे-2 बाँधों का निर्माण किया जा रहा है तथा उत्तर भारत की नदियों को दक्षिण भारत की नदियों से जोड़ने की एक योजना चल रही है जिसे “राष्ट्रीय जल ग्रीड योजना” के नाम से भी जानते हैं। इसके द्वारा उतर भारत के बाढ़‌ वालें पानी को द० भारत के शुष्क प्रदेश में पहुंचाया जा सकेगा।

(2) जल संभर प्रबंधन / जल संभर विकास योजना:-

    भारत में जल के संरक्षण हेतु जल संभर प्रबंधन योजना (Water Shade Management Porogramme) चलाया जा रहा है। जल विभाजक एक ऐसा उत्थित भूभाग है जहाँ से वर्षा जल दो विपरीत दिशाओं में बहना प्रारंभ करता है। इसके तहत योजना निर्माणकर्ताओं ने कृषि विकास, वन प्रबंधन और जल संरक्षण का उद्देश्य रखा है। हरियाणा के चंडीगढ़ के पास सूखा माजरी गाँव तथा MP के मकगाँवा गाँव के लोगों ने जल सम्भर विकास योजना का लाभ उठाते हुए जल संरक्षण का अभूतपूर्व प्रयास किया है।

(3) जल को अप्रदूषित रखना:-

     जल प्रदूषण का सबसे प्रमुख कारण औद्योगिक कचड़े, नालियों के पानी लौर शौच की जलशयों के किनारे किया जाना इत्यादि है। औद्योगिक इकाईयों को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय सख्त निर्देश दे चुका है कि आप जल को उपचारित करने के बाद ही जल को जलाशयों में छोड़े। नगरों से निकलने वाले जल को उपचारित करने के लिए मैला टंकी की स्थापना की गई है। किसानों को रासायनिक उर्वरक के स्थान पर जैव उर्वरक प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। 

    जल को सुरक्षित रखने के लिए “विद्युत शवदाह गृह” का निर्माण किया जा रहा है। लोग खुले में शौच परित्याग न कर सके, इसलिए जगह पर “सामुदायिक शौचालय” का निर्माण किया जा रहा है। इस क्षेत्र में विन्देश्वरी पाठक की संस्था “सुलभ इंटरनेशनल” सराहनीय कार्य कर रही है।

अन्य उपाय:-

     जल संसाधन के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में आधुनिक तकनीक भी कारगर साबित हो रही है। जैसे- वाशिंग मशीन के प्रयोग को बढ़ावा देकर जल की खपत को कम किया जा सकता है। जल संरक्षण पर आधारित विज्ञापन का प्रसारण कर जन जागृति लायी जा सकती है। बढ़ती हुई जनसंख्या और पशुओं की संख्या के कारण जल का निरंतर माँग बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में इनकी संख्या को रोकने वाले कार्यक्रम को त्वरित लागू किया जा रहा है। वन प्रबंधन कर वनों का विस्तार किया जा रहा है ताकि जलचक्र सुचारू रूप से संचालित हो सहे।

निष्कर्ष

       इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में जल संसाधन के संरक्षण एवं संवर्द्धन की दिशा में कई महत्वपूर्ण कार्य किये जा रहे हैं, लेकिन पूर्ण राजनैतिक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता के अभाव में ये सभी कार्यक्रम अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं।

    अतः इस क्षेत्र में जन जागृति प्रशासनिक एवं राजनैतिक प्रतिबद्धता, जल संरक्षण कार्यक्रम को रोजगार से जोड़‌कर इस कार्यक्रम को त्वरित किया जा सकता है। राजस्थान के अल्वर क्षेत्र में राजेन्द्र सिंह के द्वारा जल संरक्षण का कार्य बड़े पैमाने प किया जा रहा है। अतः उनके ही समान बुद्धिजीवी वर्ग को आगे आकर कार्य कने की आवश्यकता है तभी जल संरक्षण के पूरे लक्ष्य को प्राप्त किया जा सका है।

2. Distribution, use, related prmobles and conservation of land resources in India. (भारत में भूमि संसाधन के वितरण, उपयोग, संबंधित समस्या तथा संरक्षण)

 Distribution, use, related problems and conservation of land resources in India.

(भारत में भूमि संसाधन के वितरण, उपयोग, संबंधित समस्या तथा संरक्षण)



             भूमि एक प्राकृतिक संसाधन है। धरातल के सबसे ऊपरी सतह में मिलने वाला असंगठित पदार्थ को मृदा कहते हैं। चूंकि मृदा में आर्थिक लगान देने की क्षमता होती है। इसलिए इसे संसाधन की श्रेणी में रखते हैं।

     भारत मृदा संसाधन के मामले में एक समृद्ध राष्ट्र है। क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भारत विश्व का 7वाँ सबसे बड़ा देश है। विश्व के कुल क्षेत्रफल का 2.4% भूभाग भारत के पास उपलब्ध है। इसका क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किमी० है।

     मुख्य भूमि का विस्तार 8°4′ N से 37°6’N अक्षांश है। जबकि देशान्तरीय विस्तार 687′ से 97°25′ तक है। इसके सीमा का विस्तार 15200 किमी० है। भारत के कुल क्षेत्रफल का 58% भूभाग कृषि योग्य भूमि के अन्तर्गत आता है। यह विश्व के कुल कृषि योग्य भूमि का 11% है।

Distribution

     विशालकाय भूभाग होने के कारण मृदा के ऊपर अनेक प्रकार के भौतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक कारकों का प्रभाव पड़ता है। इन कारकों के कारण ही अलग-2 क्षेत्र में अलग-2 प्रकार से भूमिका उपयोग किया जाता है।

     भारतीय मृदा संसाधन उपयोग को चार शीर्षकों में बाँटकर अध्ययन करते हैं:-

(1) वनीय भूमि के रूप में

(2) कृषि कार्य के रूप में

(3) निर्मित भूमि के रूप में

(4) अप्रत्यक्ष एवं प्रत्यक्ष आर्थिक लगान न देने वाली भूमि।

(1) वनीय भूमि के रूप में:-

     पर्यावरण के दृष्टिकोण से भारत में कम से कम 33% भूभाग पर वन होना चाहिए। इसमें भी मैदानी भारत में 20% और पठारी भाग में 60% भूभाग पर वन होना चाहिए। लेकिन भारत के कुल क्षेत्र के मात्र 22.1% भारत पर वन उपलब्ध है। इसमें पंजाब एवं हरियाणा ऐसे राज्य हैं जो वन विहीन है। पूर्वोत्तर, छतीसगढ़, MP, ओडिशा इत्यादि ऐसे राज्य है जहाँ के भूमि पर वन का विस्तार अधिक है।

(2) कृषि वर्ष के रूप में:-

     कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार किसी भी देश के कुल क्षेत्रफल का 40% भूभाग को ही कृषि कार्य में लगाया जाना चाहिए। लेकिन भारत अपने कुल क्षेत्रफल का 58% भूमि का प्रयोग कृषि क्षेत्र में कर रहा है। इसमें 47% भूभाग प्रत्यक्ष कृषि के रूप में, 7.5% परती भूमि के रूप में, 25% चारे भूमि के रूप में उपयोग किया जा रहा है।

      भारत में सर्वाधिक कृषि योग्य भूमि मैदानी क्षेत्र में उपलब्ध है। भारतीय मृदा पर अनेक प्रकार के फसलों की कृषि की जाती है जिनमें खाद्यान्न फसल, तेलहन, दलहन एवं नगदी फसल प्रमुख है।

(3) निर्मित क्षेत्र के रूप में:-

      इसके अन्तर्गत भूमि का प्रयोग अधिवासीय माकान के रूप में परिवहन मार्ग में खनन भूमि के रूप में, नगर एवं औद्योगिक क्षेत्रों के विकास में किया जा रहा है। भूगोलवेत्ताओं के अनुसार किसी भी देश के कुल क्षेत्रफल का 14% भूभाग का प्रयोग निर्मित क्षेत्र के रूप में किया जाना चाहिए। लेकिन वर्तमान समय में 13.5% भूमि प्रयोग इस रूप में कर रहा है।

(4) प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लगान न देने वाली भूमि के रूप में:-

      इसके अन्तर्गत हिमाच्छादित भूमि, चट्टानी भूमि, मरुस्थलीय भूमि, दलदली भूमि में शामिल करते है। पर्यावरणवादियों के अनुसार किसी भी देश में 13% भूभाग पर ऐसी भूमि होनी चाहिए। वर्तमान समय में भारत के पास 13% ऐसे भूमि उपलब्ध है।

     भारत के भूमि प्रयोग प्रतिरूप से स्पष्ट है कि भारत में भू-उपयोग काफी असंतुलित है जिसके कई कारण है। जैसे-

(i) भारत की लगातार बढ़ती हुई जनसंख्या,

(ii) प्रति इकाई भूमि पर बढ़ता हुआ जनसंख्या दबाव,

(iii) कृषि योग्य भूमि में लगातार कमी,

(iv) प्रति वर्ष बड़े पैमाने पर वनों की कटाई,

(v) अवैज्ञानिक कृषि पद्धति, जैस- झूम कृषि, सीढ़ीनुमा कृषि।

(vi) अत्याधिक पशुचारण,

(vii) बड़े पैमाने पर रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग,

(viii) किसानों के द्वारा फसल चक्र को अपनाया नहीं जाना,

(ix) तीव्र औद्योगिकीकरण एवं नगरीकरण,

(x) बाढ़, सूखाड़, मरुस्थलीकरण, हिमस्खलन, भूस्खलन जैसे प्राकृतिक कारण।

भारतीय मृदाओं की समस्याएँ

      भारतीय मृदा कई मानवीय कारक प्राकृतिक कारक से प्रभावित होती रही है जिसके कारण भारतीय मृदा के समक्ष निम्नलिखित समस्याएं उत्पन्न हुई है-

(1) मृदा अपरदन की समस्या,

(2) घटती मृदा उर्वरता,

(3) जल जमाव की समस्या

(4) भूमि लवणीकरण की समस्या

(5) मरुस्थलीयकरण की समस्या

(1) मृदा अपरदन की समस्या:-

     मृदा के ऊपरी सतह के हटने की क्रिया ‘मृदा अपरदन’ कहलाता है। जब मृदा का ऊपरी भाग एक चादर रूप में फटता है तो उसे ‘परत अपरदन’ या ‘चादर अपरदन’ कहते हैं। अगर जल बहाव के कारण छोटे-बड़े नाली के रूप में मृदा अपरदन होता है, तो उसे गली एवं अवनालिका अपरदन कहते है। चम्बल नदी घाटी क्षेत्र इसके लिए विश्व प्रसिद्ध है।

        भारत में मृदा अपरदन के कई कारक सक्रिय है। जैसे- मरुस्थलीय क्षेत्र में शुष्क वायु और आकस्मिक वर्षा, तटीय क्षेत्र में समुद्री तरंग पर्वतीय क्षेत्र में हिमानी और झूम कृषि मैदानी क्षेत्र में बाढ़ एवं अवैज्ञानिक कृषि पद्धति, पठारी क्षेत्र में खनन कार्य इत्यादि प्रमुख है। अत्याधिक चराई के कारण भारत में सबसे अधिक मृदा का अपरदन शिवालिक क्षेत्र में उत्पन्न हुआ है।

(2) घटती मृदा उर्वरता:-

      भारतीय भूमि पर सैकड़ों वर्षों से कृषि कार्य किया जा रहा है। पुन: हरित क्रांति के दौरान बड़े पैमाने पर रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किये जाने के  कारण एवं वनीय ह्रास के कारण मृदा के उर्वरता में लगातार कमी आ रही है। किसानों के द्वारा अवैज्ञानिक कृषि पद्धति अपनाये जाने के कारण भी यह समस्या गंभीर होती जा रही है।

      रासायनिक उर्वरक के  प्रयोग किये जाने से मृदा के उर्वरता में सर्वाधिक कमी पंजाब, हरियाणा, प० उत्तर प्रदेश तथा कमाण्ड एरिया प्रोजेक्ट वाले क्षेत्र में उत्पन्न हुई है। अत्यधिक भूमिगत जल संसाधन के दोहन से मृदा में नमी की कमी होने लगती है। कृषि अर्थ में पशुओं के स्थान पर यंत्रों के प्रयोग से भूमि तथा पशु के बीच के सहचर्य में कमी आयी है जिसके चलते भूमि की उर्वरता में लगातार कमी हो रही है।

नोट: भारत में कमांड एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम (सीएडीपी) 1974 में भूमि और जल प्रबंधन में सुधार के लिए व्यापक कार्यक्रम के हिस्से के रूप में शुरू किया गया था। इसका प्राथमिक उद्देश्य प्रमुख और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं के कमांड क्षेत्रों में पानी के उपयोग की दक्षता में सुधार करके कृषि उत्पादकता को बढ़ाना था।

(3) जल जमाव के समस्या:-

         भारत में कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ पर जल जमाव की गंभीर समस्या उत्पन्न हुई है। जैसे- इंदिरा गाँधी नहर के अतिरिक्त जल को जैसलमेर और बाडमेर को छोड़ दिया जाता है जिसके कारण वहाँ जल जमाव की समस्या उत्पन्न हो गई है। इसी तरह से बहुदेशीय नदी घाटी परियोजना के तहत बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण किया जाता है और बाँधों के पीछे बड़ी मात्रा में जल का भण्डारण किया जाता है जिसके कारण उसके इर्द-गिर्द के क्षेत्र में भूमिगत जल ऊपर उठ जाते हैं और जल-जमाव की समस्या उत्पन्न करते है।

(4) भूमि लवणीकरण के समस्या:-

     मृदा में लवण बढ़ने की क्रिया को लवणीकरण कहते हैं। भारत में यह समस्या उन क्षेत्रों में उत्पन्न हुई है जहाँ वर्षा कम और वाष्पीकरण अधिक होती है। पुनः नहरी जल से सिंचाई का कार्य होता है। हरित क्रांति वाले क्षेत्रों में यह एक गंभीर समस्या है।

(5) मरुस्थलीकाण की समस्या:-

      मरुस्थल का विस्तार मरुस्थलीकरण कहलाता है। थार मरुस्थल के पूर्वी उतरी सीमावर्ती क्षेत्रों में यह एक गंभीर समस्या है।

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत की मृदा कई समस्याओं से ग्रसित है। 

मृदा संरक्षण

     भारत की एक अरब से भी अधिक जनसँख्या के सुपोषण को ध्यान में रखते हुए मृदा संसाधनों के उचित उपयोग तथा संरक्षण पर ध्यान देने की आवश्यक है। मृदा संरक्षण के दिशा में कई उपाय किये जा रहे हैं। जैसे-

(1) वृक्षों  के कटाई पर प्रतिबंध:-

      वृक्षों की कटाई रोकने हेतु कई प्रकार के कानून का निर्माण किया गया है। इस कानून उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को दण्ड देने के प्रावधान है। ‘चिपको आंदोलन’ इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रहा।

(2) वृक्षारोपण:-

     गुजरात, हरियाणा, राजस्थान, प० मध्य प्रदेश के किसानों के द्वारा तेज हवाओं से होने वाला मृदा अपरदन को रोकने के लिए मेढ़ वानिकी, कृषि वानिकी का सफल प्रयोग किया गया है। मृदा अपरदन को रोकने हेतु वृक्षारोपण सबसे उपयुक्त उपाय है। अतः इस कार्य के लिए सामजिक वानिकी कार्क्रम को चलाकर वनीय भूमि को बढ़ाया जा रहा है।

(3) स्थानान्तरित कृषि पर प्रतिबंध:-

     इस कृषि के अन्तर्गत नाजूक पर्यावरण में निवास करने वाले आदिवासी समाज जंगलों को काटकर जलाता है और उस पर कृषि का कार्य करता है जिसके कारण बड़े पैमाने पर भूमि की सक्षमता में कमी आती है। अत: भारत सरकार ने 1976 ई० में ही झूम कृषि निषेध कानून बनाकर इस पर निषेध लगाती है।

(4) समोच्च रेखीय जुलाई:-

     पर्वतीय क्षेत्रों में किसानों को समोच्च के अनुरूप हल जुताई के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

(5) बाढ़ नियंत्रण:-

     मृदा ह्रास तथा बाढ़ के बीच में गहरा सह-संबंध है। अतः बाढ़ नियंत्रण हेतु बहुद्देश्यीय नदी घाटी परियोजना, उचित जल प्रबंधन, नदी जोड़ों कार्यक्रम को लागू किया जा रहा है।

(6) परती भूमि पुर्नोद्वार:-

     भारत में लगभग 96 लाख हेक्टेयर भूमि परती भूमि के अन्तर्गत आता है। भारत में सबसे ज्यादा परती भूमि आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक में उपलब्ध है। परती भूमि पर चारागाह फलोद्यान में विकास दर उसे उपयोग में लाया जा सकता है। बंजर भूमि पर जल भण्डारण कर उर्वर भूमि के रूप में रखा जा सकता है। चम्बल नदी घाटी क्षेत्र में भूमि के समतलीकरण कर अवनलिका अपरदन से निपटा जा रहा है।

(7) लवणीय मृदा उद्धार:-

      भारत में सर्वाधिक लवणीय मृदा UP, पंजाब तथा पश्चिम बंगाल में है। भारत में 80 लाख हेक्टेयर भूमि पर लवणीय मिट्टी के विस्तार हुआ है। लवणीय भूमि पर जिप्सम का प्रयोग कर, गोबर एवं जैविक उर्वरक प्रयोग कर उर्वर भूमि बदला जा सकता है।

(8) अन्य उपाय:-

    मृदा संरक्षण के कई अन्य उपाय भी लाये जा रहे है या लाये जा सकते हैं। जैसे- 

(i) सहायक नदियों पर छोटे-2 बाँधों का निर्माण करना।

(ii) मरुस्थलीय क्षेत्रों में ग्रीन बोल्ट तथा बाड़ का निर्माण करना।

(iii) पशुओं तथा मृदा के बीच में सहचर्य को बढ़ाना।

(iv) जैविक उर्वरक का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करना।

(v) फसल चक्र के उपयोग को बढ़ावा देना।

(vi) सतत् कृषि विकास को बढ़ावा देना।

(vii) Soil Clinic का निर्माण करना।

(viii) USA के तर्ज पर भारत में भी मृदा सेवा केन्द्र तथा मृदा सेवा आन्दोलन को चालाया जाना।

निष्कर्ष:

    इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट‌ है कि भात में मृदा से संबंधित जहाँ कई समस्याएँ उत्पन्न हुई है वहीं उससे निपटने के दिशा में कई संस्थागत एवं संरचनात्मक प्रयास भी किये जा रहे है।

1. Land Resources (भूमि संसाधन)

Land Resources

(भूमि संसाधन)



Q1. भारत में भूमि संसाधन के उपयोग एवं संरक्षण का वर्णन कीजिए।

Q2. भारत में बंजर भूमि प्रबंधन

       भारत प्राकृतिक संसाधनों के मामले में एक धनी राष्ट्र है। भूगोलवेताओं ने संसाधन को परिभाषित करते हुए कहा है कि वह कोई भी वस्तु जो मानव में संतुष्टि प्रदान करता है, उसे संसाधन कहते हैं।” इस परिभाषा के मद्देनजर भूमि भी एक प्राकृतिक संसाधन का ही उदा० बन जाता है। मृदा या भूमि धरातल के सबसे ऊपरी भाग में पायी जाती है जिसका निर्माण जैविक एवं अजैविक तत्वों के ऋतुक्षरण से होता है। मृदा एक प्राकृतिक संसाधन है क्योंकि यह न केवल मानव को संतुष्टि प्रदान करता है बल्कि इससे आर्थिक लगान भी प्राप्त होती है तथा यह अन्य सभी प्राकृतिक संसाधनों का आधार होता है।

Land Resources

     भारत भूमि संसाधन के मामले में एक समृद्ध राष्ट्र है। जैसे क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भारत विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा देश है जिसका क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किमी० है। पूरे विश्व के क्षेत्रफल का 2.4% भूभाग हमोर देश के पास है। पूरे विश्व के 11% कृषि योग्य भूमि भारत के पास है। भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 58% भूभाग कृषि कार्य के अंतर्गत आते हैं। भारत के पास जितनी भूमि उपलब्ध है उसका उपयोग भिन्न-2 प्रकार से किया जाता है। मोटे तौर पर भारतीय भूमि संसाधन के उपयोग को चार शीर्षकों में बाँटकर अध्ययन करते हैं:-

(1) वनीय क्षेत्र के रूप में:

     पर्यावरण के दृष्टिकोण से भारत के कुल क्षेत्रफल का 33% भूभाग पर वन होना चाहिए था लेकिन भारत के मात्र 22.1% भूभाग पर ही वन उपलब्ध है। इसमें भी मैदानी क्षेत्र में 20% भूभाग पर और पठारी क्षेत्र में 60% भूभाग पर वन होना चाहिए था। लेकिन पंजाब, हरियाणा, दिल्ली इत्यादि ऐसे क्षेत्र हैं जो पूर्णतः वन विहीन हो चुके हैं। भारत में जो वन बचे हुए हैं वो द० भारत, मध्य भारत तथा पर्वतीय ढलानों पर उलब्ध है। बढ़ती हुई जनसंख्या, जनजातीय क्रियाविधि और विभिन्न प्रकार के निर्माण कार्य के कारण वनों का तेजी से ह्रास हो रहा है। वनीय ह्रास के कारण मृदा में भूमि तापन, आर्द्रता ह्रास एवं अपरदन की समस्या उत्पन्न हो रही है।

(2) कृषि के रूप में:-

     कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार किसी भी देश के कुल क्षेत्रफल का 40% भूभाग पर ही कृषि कार्य किए जाना चाहिए लेकिन वर्तमान समय में इससे अधिक भूमि पर कृषि कार्य किया जा रहा है। जैसे- 47% भूभाग पर प्रत्यक्ष रूप से कृषि किया जा रहा है। 7.5% परती भूमि के अन्तर्गत शामिल है। 2.5% भूभाग पर पशुचारण किया जा रहा है। इस तरह स्पष्ट है कि अत्याधिक कृषि कार्य एवं पशुपालन के कारण भूमि उपयोग का प्रारूप असंतुलित हो चुका है।

(3) निर्मित क्षेत्र के रूप में:-

     इसके अन्तर्गत अधिवासीय क्षेत्र, परिवहन मार्ग, खनन भूमि, औद्योगिक क्षेत्र, नगरीय क्षेत्र इत्यादि को शामिल करते हैं। भूगोलवेताओं के अनुसार 14% भूभाग पर ही निर्माण का कार्य होना चाहिए लेकिन वर्तमान समय में 13.5% भूभाग पर निर्माण का कार्य हो रहा है।

(4) प्रत्यक्ष आर्थिक लगान न देने वाले भूमि के रूप में:-

     इसके अंतर्गत हिमाच्छादित भूमि, दलदली क्षेत्र, मरुस्थलीय क्षेत्र एवं चट्टानी भूमि को शामिल करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार किसी भी देश में 13% भूभाग ऐसे उपयोग के क्षेत्र में होना चाहिए। हलांकि वर्तमान समय में भारत के पास 13% ऐसे भूमि उपलब्ध है। लेकिन भारत में अप्रत्यक्ष आर्थिक लगान देने वाले भूमि को धीरे-2 प्रत्यक्ष आर्थिक लगान वाले क्षेत्र में शामिल किया जा रहा है।

       इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में मृदा संसाधन का उपयोग कई प्रकार से किया जा रहा है।

मृदा की समस्यायें

     मृदा संसाधन के अत्याधिक दोहन के कारण कई प्रकार के समस्याओं का अभ्युदय हुआ है। जैसे-

(i) बंजर भूमि का तेजी से विकास हो रहा है। “राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड के अनुसार 175 मिलियन हेक्टयर भूमि बंजर भूमि के रूप में बदल चुका है।

(ii) “भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद” के अनुसार भारत के 60% भूमि के स्वास्थ्य में तेजी से गिरावट आयी है। स्वास्थ्य में गिरावट का तात्पर्य मृदा में उपस्थित सूक्ष्म जीवाणु तथा ह्यूमस में तेजी से ह्रास है। मृदा में उपस्थित आर्द्रता ह्रास की समस्या उत्पन्न हो रही है। भूमि के नंगा होने के कारण मिट्टी का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। उपरोक्त स्वास्थ्य में गिरावट का प्रमुख कारण अवैज्ञानिक कृषि पद्धति है। पुनः वैज्ञानिक कृषि पद्धति के तहत उर्वरक, कीटनाशक, ट्रैक्टर इत्यादि का प्रयोग किया जाना है।

(iii) भूमि अपरदन की समस्या-

     अपरदन के मूलतः 5 दूत होते हैं जिसके कारण अलग-2 क्षेत्रों में मृदा अपरदन की समस्या उत्पन्न हुई है। जैसे- बढ़ता हुआ जल के कारण नदी घाटी क्षेत्र में, हिमानी के कारण पर्वतीय क्षेत्र में, शुष्क वालु के कारण थार मरुस्थलीय क्षेत्र में, समुद्री तरंग के कारण तटवर्ती क्षेत्र में, भूमिगत जल के कारण मेघालय के गारों-खासी क्षेत्र, बिहार कैमूर क्षेत्र तथा उत्तराखण्ड के देहरादून क्षेत्र में यह समस्या उत्पन्न हो रही है।

(iv) मृदा प्रदूषण

    उर्वरकों, कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग तथा औद्योगिक कचड़ों को खुले क्षेत्र में फैला दिये जाने के कारण यह समस्या उत्पन्न हो रही है।

(v) खनन एवं परित्यक्त भूमि के विस्तार की समस्या-

      जिन क्षेत्रों में खनन के कार्य सम्पन्न हो जाता है। उन खनन क्षेत्रों को परित्यक्त भूमि के रूप में छोड़ दिया जाता है। ऐसे भूमि का भारत में लगातार विस्तार हो रहा है।

      उपरोक्त समस्याओं को देखते हुए मृदा संरक्षण का कार्य अनिवार्य है। मृदा के संरक्षण हेतु 6वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान केन्द्र सरकार ने तीन बोर्ड का गठन किया था-

1. राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड

2. राष्ट्रीय भूमि उपयोग एवं संरक्षण बोर्ड

3. राष्ट्रीय बंजर भूमि एवं भू उपयोग परिषद

      प्रथम बोर्ड के गठन का मुख्य उद्देश्य संसाधनात्मक दृष्टि से जिस भूमि का पतन हो चुका है उनके संरक्षण एवं विकास हेतु कार्यक्रम का निर्माण करना है। दूसरे बोर्ड के गठन के मुख्य उद्देश्य प्रत्येक राज्यों में भूमि उपयोग प्रतिरूप का निर्धारण करना है। तीसरे बोर्ड के गठन के मुख्य उद्देश्य “मृदा संरक्षण के संबंध में विभिन्न प्रकार के नीतियों का निर्धारण करना है।”

     भारत में भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) को विकसित किया गया है जो कृत्रिम उपग्रह इंटरनेट तथा कम्प्यूटर के माध्यम से सूखा, बाढ़, बंजर भूमि इत्यादि के संबंध में विभिन्न प्रकार के आँकड़ों को इकठ्ठा करता है तथा उनके संरक्षण हेतु तार्किक उपाय भी बताता है। भारतीय GIS को ऊपर में बताये गये तीनों बोर्ड से जोड़ दिया गया है।

     भारत में भूमि विकास कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है। जैसे- 8वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान भारतीय बंजर भूमि को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया गया है-

(i) वनीय बंजर भूमि

(ii) गैर वनीय बंजर भूमि-

      वनीय बंजर भूमि पर सामाजिक वानिकी कार्यक्रम चलाकर बनीय बंजर भूमि विकास किया जा रहा है। दूसरी ओर गैर वनीय बंजर भूमि को कृषि क्षेत्र में लाने के प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए किसानों को खेती में जिप्सम का प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। इस तकनीक का प्रयोग प्राय: उन क्षेत्रों में किया जाता है जहाँ पर अत्यधिक सिंचाई के कारण लवणीय मृदा का विकास हुआ है। पुन: कंकड-पत्थर से युक्त बंजर भूमि की जलग्रहण विधि के द्वारा मिट्टी के उर्वर बनाने प्रयास किया जाता है।

     उपरोक्त कार्यक्रमों के अलावे योजना आयोग ने भारत को 15 कृषि जलवायु क्षेत्र में विभक्त कर कृषि कार्य करने की सलाह दिया है ताकि किसान मृदा की क्षमता या पर्यावरण के अनुकूल कृषि कार्य कर सके।

     केन्द्र सरकार ने राज्यों को यह सलाह दिया है कि आप समन्वय के आधार पर मृदा संरक्षण का उपाय करें। इसके तहत छोटे क्षेत्र बंधों का निर्माण कर मरुस्थलीय क्षेत्र में बाड़ों का विकास कर यह कार्य करने की सलाह दी गई है।

      चम्बल नदी घाटी क्षेत्र में उबड़-खाबड़ भूमि क्षेत्र को समतल भूमि के क्षेत्र में बदला जा रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में मृदा अपरदन नहीं हो इसके लिए 1976 ई० में झूम कृषि पर रोक लगा दी गई थी और उसके स्थान पर कंटूर फार्मिंग या “सीढ़ीनुमा कृषि” करने की सलाह दी गई है।

     किसानों को फसल चक्र अपनाने की सलाह दी गई है। रासायनिक उर्वरक की जगह पर जैविक उर्वरक प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। भू-उपयोग के प्रतिरूप में आये परिवर्तन को पुनर्स्थापित किया जा रहा है। मिट्टी की स्वास्थ्य की जाँच हेतु “Soil Clinic” की स्थापना की जा रही है।

निष्कर्ष:

     उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में मृदा सरक्षण हेतु कई प्रकार के उपाय किये जा रहे हैं। इन उपायों के बावजूद USA के तर्ज पर “एकीकृत मृदा सेवा केन्द्र” की स्थापना किया जाय तथा गंभीर मृदा अपरदन एवं मृदा स्वास्थ ह्रास वाले क्षेत्रों में त्वरित कार्यवाही कने हेतु उचित संस्थागत एवं संचनात्मक सुविधाओं का विकास किया जाय।

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