Category CLIMATOLOGY(जलवायु विज्ञान)

26. Climatology and its Relation with Other Sciences (जलवायुविज्ञान तथा अन्य विज्ञानों से इसका संबंध)

Climatology and its Relation with Other Sciences

(जलवायु विज्ञान तथा अन्य विज्ञानों से इसका संबंध)



परिचय

      भूगोल एक समन्वित एवं अंतर्विषयक (interdisciplinary) विज्ञान है, जो पृथ्वी की सतह, उसके प्राकृतिक एवं मानवीय तत्वों तथा उनके परस्पर संबंधों का अध्ययन करता है। इन प्राकृतिक तत्वों में जलवायु सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल भौतिक परिदृश्य को प्रभावित करती है, बल्कि मानव जीवन, कृषि, उद्योग, परिवहन, बस्तियों तथा सांस्कृतिक गतिविधियों को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करती है।

     भौगोलिक अध्ययन में जलवायु विज्ञान (Climatology) का विशिष्ट स्थान है। यह वायुमंडल, उसके संघटन, क्रियाविधि तथा दीर्घकालिक मौसम की स्थितियों के अध्ययन से संबंधित शाखा है। जलवायु का ज्ञान केवल भूगोल तक सीमित नहीं है बल्कि मौसम विज्ञान, जीवविज्ञान, पर्यावरण विज्ञान, भूविज्ञान, समुद्र विज्ञान, कृषि विज्ञान, गणित, सांख्यिकी, सूचना प्रौद्योगिकी और सामाजिक विज्ञान तक विस्तृत है।

     अतः कहा जा सकता है कि जलवायु विज्ञान बहुविषयक स्वरूप वाला विज्ञान है, जो विभिन्न विषयों से अंतःक्रिया कर अपना स्वरूप विस्तारित करता है और समाज व पर्यावरण दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण बन जाता है।

परिभाषा

    वायुमंडल की उन दीर्घकालिक परिस्थितियों, औसतों और प्रवृत्तियों का अध्ययन जो किसी क्षेत्र की विशिष्ट जलवायु को निर्मित करती हैं, उसे जलवायु विज्ञान कहा जाता है।

W. Koppen के अनुसार– “Climatology is the science which deals with the study of average weather conditions over a long period of time.”

     सरल शब्दों में कहा जाए तो मौसम की दीर्घकालिक औसत स्थिति = जलवायु और उसके वैज्ञानिक अध्ययन को जलवायु विज्ञान कहा जाता है।

अध्ययन क्षेत्र

⇒ वायुमंडल की संरचना व संघटन।

⇒ सौर विकिरण एवं ऊर्जा संतुलन।

⇒ तापमान, दाब, पवन, आर्द्रता एवं वर्षा के वितरण।

⇒ वैश्विक जलवायु क्षेत्र (Climate regions)।

⇒ जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापन, ग्रीनहाउस प्रभाव।

⇒ मानव-पर्यावरण अंतःक्रिया और आपदा प्रबंधन।

महत्व

    भूगोल में जलवायु का अध्ययन केवल प्राकृतिक पर्यावरण को समझने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक क्रिया-कलापों, कृषि-पैटर्न, परिवहन मार्गों, बस्तियों के स्वरूप और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन पर भी गहरा प्रभाव डालता है। जैसे-

⇒ मानसून एशिया में कृषि एवं जन-जीवन का निर्धारक तत्व है।

⇒ सहारा जैसे शुष्क प्रदेशों की जलवायु मानव जीवन की कठिनाइयों को दर्शाती है।

⇒ शीतोष्ण कटिबंध के देश उद्योग और शहरीकरण में अग्रणी हैं, जिसका एक कारण वहाँ की अनुकूल जलवायु भी है।

   इस प्रकार भूगोल में जलवायु विज्ञान का अध्ययन पृथ्वी के परिदृश्य और मानव सभ्यता की दिशा को समझने के लिए अनिवार्य है।

अन्य विज्ञानों से संबंध

    जलवायु विज्ञान अन्य विज्ञानों से जुड़ा हुआ है और भूगोल के अध्ययन को समृद्ध करता है।

जलवायु विज्ञान और मौसम विज्ञान (Meteorology)

⇒ मौसम विज्ञान वायुमंडल की अल्पकालिक घटनाओं जैसे- वर्षा, तूफान, पवन की गति, तापमान के दैनिक परिवर्तन आदि का अध्ययन करता है।

⇒ जलवायु विज्ञान इन्हीं घटनाओं के दीर्घकालिक औसत एवं प्रवृत्तियों का अध्ययन करता है।

⇒ दोनों में परस्पर गहरा संबंध है।

⇒ मौसम विभाग (IMD) से प्राप्त आँकड़े ही जलवायु वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार बनते हैं।

जैसे- मानसून की भविष्यवाणी मौसम विज्ञान का कार्य है, जबकि उसका ऐतिहासिक पैटर्न और दीर्घकालिक परिवर्तन जलवायु विज्ञान का क्षेत्र है।

जलवायु विज्ञान और भौतिक भूगोल

     भौतिक भूगोल (Physical Geography) पृथ्वी की सतह के प्राकृतिक घटकों-भू-आकृतियाँ, जल, मृदा, वनस्पति, जलवायु का अध्ययन करता है। इनमें से जलवायु एक प्रमुख अंग है।

(i) भू-आकृतियों पर प्रभाव- वर्षा, पवन और हिमनद जैसे जलवायुगत कारक अपक्षय, अपरदन और निक्षेपण की प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। उदाहरण: शुष्क मरुस्थलों में पवन का कार्य और आर्द्र क्षेत्रों में वर्षा से अपक्षय।

(ii) मृदा निर्माण- मृदा की प्रकृति, उर्वरता और प्रोफ़ाइल जलवायु पर निर्भर करती है।

(iii) वनस्पति का वितरण- उष्णकटिबंधीय वर्षावन, मरुस्थलीय झाड़-झंखाड़, शीतोष्ण शंकुधारी वनों का स्वरूप उनकी जलवायु से जुड़ा है।

(iv) जल चक्र- भौतिक भूगोल में जल चक्र की क्रियाविधि भी तापमान और वर्षा से नियंत्रित होती है।

      अतः जलवायुविज्ञान भौतिक भूगोल की रीढ़ है।

जलवायु विज्ञान और जीव-विज्ञान/पर्यावरण विज्ञान

(i) जीव-जगत का वितरण- पृथ्वी पर जीव-जंतुओं और पौधों का विस्तार उनके आवास की जलवायु से जुड़ा है। जैसे- ऊँट मरुस्थल का प्रतीक है, जबकि ध्रुवीय भालू ठंडे क्षेत्रों का।

(ii) पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem)- ऊर्जा प्रवाह, खाद्य श्रृंखला और पोषण चक्र में जलवायु की प्रमुख भूमिका होती है।

(iii) जैव विविधता- उष्णकटिबंधीय वर्षावनों में विविधता का अधिक होना और मरुस्थलों में कम होना जलवायु का ही परिणाम है।

(iv) पर्यावरणीय संकट- जलवायु परिवर्तन से विलुप्ति का खतरा, प्रजातियों का पलायन और पारिस्थितिक असंतुलन उत्पन्न होता है।

   इस प्रकार जलवायु विज्ञान जीव-विज्ञान और पर्यावरण अध्ययन के लिए आधार प्रदान करता है।

जलवायु विज्ञान और समुद्र विज्ञान (Oceanography)

(i) महासागरीय धाराएँ- गर्म और ठंडी धाराओं की उत्पत्ति में पवन और तापमान की भूमिका होती है।

(ii) एल-नीनो और ला-नीना- यह समुद्र-वायुमंडल की परस्पर क्रियाओं से उत्पन्न वैश्विक जलवायु घटनाएँ हैं।

(iii) समुद्री जलवायु- तटीय क्षेत्रों की आर्द्र जलवायु महासागर से प्रभावित होती है।

(iv) मछली पालन और समुद्री पारिस्थितिकी- समुद्र की सतही परतों का तापमान और ऑक्सीजन स्तर समुद्री जीवों के जीवन को नियंत्रित करते हैं।

    अतः समुद्र विज्ञान और जलवायुविज्ञान दोनों परस्पर पूरक हैं।

जलवायु विज्ञान और भूविज्ञान

(i) जलवायु और चट्टानों का अपक्षय- उष्ण कटिबंधीय आर्द्र क्षेत्रों में रासायनिक अपक्षय अधिक होता है, जबकि शुष्क क्षेत्रों में यांत्रिक अपक्षय।

(ii) हिमयुग और जलवायु परिवर्तन- भूवैज्ञानिक इतिहास में हिमनदों के विस्तार और संकुचन का कारण जलवायु परिवर्तन ही रहा है।

(iii) जीवाश्म और अवसादन- चट्टानों की परतें हमें पुरानी जलवायु की जानकारी देती हैं।

(iv) भूकंप और ज्वालामुखी पर प्रभाव- भूकंप और ज्वालामुखी सीधे तौर पर जलवायु नहीं बनाते, लेकिन इनके परिणाम (जैसे राख, गैस) जलवायु पर असर डालते हैं।

    इस प्रकार भूविज्ञान और जलवायुविज्ञान मिलकर “पैलियोक्लाइमेटोलॉजी” (पुरा-जलवायुविज्ञान) का निर्माण करते हैं।

जलवायु विज्ञान और कृषि विज्ञान

(i) फसलों का चयन- धान, गेहूँ, मक्का, कपास जैसी फसलों का वितरण पूरी तरह से जलवायु पर निर्भर है।

(ii) कृषि कैलेंडर- बोआई, सिंचाई, कटाई आदि की समय-सीमा मानसून से निर्धारित होती है।

(iii) कृषि उत्पादकता– वर्षा की मात्रा, तापमान, आर्द्रता और धूप की अवधि उपज को नियंत्रित करती है।

(iv) कृषि संकट और आपदा- सूखा, बाढ़ और ओलावृष्टि जैसी जलवायु घटनाएँ कृषि को प्रभावित करती हैं।

    अतः कृषि विज्ञान और जलवायु विज्ञान का संबंध अत्यंत निकट है।

जलवायु विज्ञान और जलविज्ञान (Hydrology)

     जलविज्ञान पृथ्वी पर जल के वितरण, संचलन और गुणों का अध्ययन करता है। इसमें वर्षा, भूजल, सतही प्रवाह, नदियाँ, झीलें आदि सम्मिलित हैं।

(i) वर्षा और नदी प्रवाह- किसी नदी के जलस्रोत का आकार और प्रवाह सीधे वर्षा की मात्रा और वितरण पर निर्भर करता है।

(ii) बाढ़ और सूखा- ये दोनों जलवायुगत घटनाएँ जलविज्ञान के अध्ययन का मूल विषय हैं।

(iii) भूजल पुनर्भरण- आर्द्र और शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में भूजल स्तर में बहुत अंतर पाया जाता है।

(iv) जल चक्र (Hydrological Cycle)- वाष्पीकरण, संघनन, वर्षा और प्रवाह ये सभी प्रक्रियाएँ जलवायु के नियंत्रण में होती हैं।

       इस प्रकार जलविज्ञान और जलवायुविज्ञान का संबंध अत्यंत गहरा और पारस्परिक है।

जलवायु विज्ञान और मानव भूगोल/अर्थशास्त्र

     जलवायु केवल प्राकृतिक घटनाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह मानव समाज और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव डालती है।

(i) बस्तियों का वितरण- मानव बस्तियाँ प्रायः अनुकूल जलवायु वाले क्षेत्रों में विकसित होती हैं।

(ii) कृषि और अर्थव्यवस्था- मानसून-आधारित कृषि अर्थव्यवस्था भारत जैसे देशों में जलवायु पर निर्भर है।

(iii) उद्योग और ऊर्जा- हाइड्रो पावर, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा सीधे जलवायुगत परिस्थितियों पर आधारित हैं।

(iv) परिवहन और व्यापार- समुद्री मार्गों, हवाई मार्गों और स्थल परिवहन की सुगमता जलवायु से प्रभावित होती है।

(v) स्वास्थ्य और जीवनशैली- रोगों का प्रसार, पोशाक, भोजन और आवास की शैली जलवायु के अनुसार ढलती है।

     इस प्रकार जलवायुविज्ञान मानव भूगोल और अर्थशास्त्र दोनों के अध्ययन में केंद्रीय स्थान रखता है।

जलवायु विज्ञान और गणितीय/सांख्यिकीय विज्ञान

    आधुनिक युग में जलवायुविज्ञान के अध्ययन में गणित और सांख्यिकी का विशेष योगदान है।

(i) डेटा विश्लेषण- तापमान, वर्षा, आर्द्रता, वायुदाब आदि के आँकड़ों को सांख्यिकीय तकनीकों से विश्लेषित किया जाता है।

(ii) मॉडल निर्माण- भविष्यवाणी हेतु गणितीय समीकरणों और मॉडलों का उपयोग किया जाता है।

(iii) संभाव्यता अध्ययन- बाढ़, सूखा या तूफ़ान जैसी घटनाओं की संभावना सांख्यिकी के आधार पर आंकी जाती है।

(iv) स्थानिक आँकड़ा विश्लेषण (Spatial Statistics)- GIS और Remote Sensing से प्राप्त आँकड़ों का गणितीय प्रसंस्करण।

    इससे जलवायुविज्ञान अधिक वैज्ञानिक और सटीक बन पाया है।

जलवायु विज्ञान और कंप्यूटर विज्ञान (Remote Sensing एवं GIS)

      आधुनिक तकनीक ने जलवायु विज्ञान के अध्ययन को नई दिशा दी है।

(i) Remote Sensing (दूरसंवेदी तकनीक)- उपग्रहों से प्राप्त आँकड़े वायुमंडल और सतह की स्थितियों को मापने में मदद करते हैं।

(ii) GIS (भौगोलिक सूचना प्रणाली)- जलवायु से संबंधित स्थानिक आँकड़ों को संग्रहित, विश्लेषित और मानचित्रित करने में GIS का उपयोग होता है।

(iii) Climate Models- सुपर कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर की मदद से भविष्य की जलवायु परिवर्तन प्रवृत्तियों का आकलन किया जाता है।

(iv) Artificial Intelligence और Machine Learning- अब जलवायु की भविष्यवाणी और जोखिम आकलन में इन तकनीकों का भी प्रयोग किया जा रहा है।

जलवायु विज्ञान का बहुविषयक स्वरूप

  उपरोक्त सभी संबंधों से स्पष्ट है कि जलवायुविज्ञान एक बहुविषयक (Interdisciplinary) विज्ञान है।

⇒ यह भौतिक विज्ञान (भौतिकी, गणित, रसायन) पर आधारित है।

⇒ यह जीव विज्ञान और पारिस्थितिकी से जुड़ा है।

⇒ यह सामाजिक और आर्थिक विज्ञान से भी संबंधित है।

⇒ यह तकनीकी विज्ञान (कंप्यूटर, GIS, Remote Sensing) का उपयोग करता है।

    इस प्रकार जलवायुविज्ञान केवल भूगोल की शाखा नहीं है बल्कि अनेक विज्ञानों का संगम है।

समकालीन चुनौतियाँ और जलवायु विज्ञान

     21वीं शताब्दी में जलवायु से संबंधित समस्याएँ वैश्विक स्तर पर मानव सभ्यता के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आई हैं।

(i) जलवायु परिवर्तन (Climate Change)

⇒ औद्योगिक क्रांति के बाद से ग्रीनहाउस गैसों (CO₂, CH₄, N₂O) का उत्सर्जन बढ़ा।

⇒ इसके कारण औसत वैश्विक तापमान निरंतर बढ़ रहा है।

⇒ ध्रुवीय हिमनद पिघल रहे हैं और समुद्र का स्तर बढ़ रहा है।

(ii) वैश्विक तापन (Global Warming)

⇒ IPCC (Intergovernmental Panel on Climate Change) की रिपोर्टों के अनुसार 2100 तक वैश्विक तापमान 1.5°C से 3°C तक बढ़ सकता है।

⇒ इसका असर कृषि, स्वास्थ्य, जल संसाधन और पारिस्थितिकी पर पड़ेगा।

(iii) चरम जलवायु घटनाएँ (Extreme Climate Events)

⇒ चक्रवात, बाढ़, सूखा, हीट वेव और कोल्ड वेव जैसी घटनाएँ बार-बार घट रही हैं।

⇒ भारत में 2015 की चेन्नई बाढ़, 2020 का अम्फान चक्रवात और 2023 की हीट वेव इसके उदाहरण हैं।

(iv) आपदा प्रबंधन (Disaster Management)

⇒ जलवायुविज्ञान आज आपदा प्रबंधन योजनाओं के निर्माण में अहम भूमिका निभा रहा है।

⇒ मौसम पूर्वानुमान और जलवायु मॉडलिंग से जान-माल की क्षति कम करने में मदद मिलती है।

भौगोलिक अध्ययनों में जलवायु विज्ञान का महत्व

     भूगोल का उद्देश्य पृथ्वी और मानव के पारस्परिक संबंध को समझना है। इस संदर्भ में जलवायु विज्ञान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

(i) मानव-पर्यावरण संबंध- भूगोल में मनुष्य और पर्यावरण की अंतःक्रिया को जलवायु के आधार पर समझा जाता है।

(ii) क्षेत्रीय अध्ययन- किसी भी क्षेत्र की विशेषताओं (जैसे कृषि, बस्तियाँ, जीवनशैली) के निर्धारण में जलवायु प्रमुख कारक है।

(iii) नक्शा-निर्माण और वर्गीकरण- Koppen और Thornthwaite जैसे जलवायु वर्गीकरण भूगोल को वैज्ञानिक आधार देते हैं।

(iv) अनुसंधान और नीति-निर्माण- जलवायुविज्ञान जलवायु परिवर्तन, सतत विकास और आपदा प्रबंधन संबंधी नीतियों के लिए आवश्यक आँकड़े और विश्लेषण उपलब्ध कराता है।

निष्कर्ष

      जलवायु विज्ञान भूगोल की एक केंद्रीय शाखा है, जो पृथ्वी के वायुमंडलीय घटनाओं और उनके दीर्घ कालिक स्वरूप का अध्ययन करती है। यह केवल मौसम के औसत की गणना भर नहीं है, बल्कि भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक, जैविक और तकनीकी सभी पहलुओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।

⇒ मौसम विज्ञान, भूगोल, जीवविज्ञान, पर्यावरण विज्ञान, भूविज्ञान, समुद्र विज्ञान, कृषि विज्ञान, जलविज्ञान, अर्थशास्त्र, गणित और कंप्यूटर विज्ञान- इन सभी से इसका गहरा संबंध है।

⇒ समकालीन युग में जब जलवायु परिवर्तन मानवता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है, तब जलवायुविज्ञान का महत्त्व और भी बढ़ जाता है।

⇒ यह न केवल हमें भौगोलिक परिदृश्य और मानव समाज की समझ प्रदान करता है, बल्कि भविष्य की नीतियों और विकास की दिशा भी निर्धारित करता है।

    अतः जलवायु विज्ञान एक ऐसा अंतर्विषयक विज्ञान है जो भूगोल को बहुआयामी दृष्टिकोण प्रदान करता है और मानवता को पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने में मार्गदर्शन करता है।

25. सूर्यातप (Insolation)

25. सूर्यातप (Insolation)


 सूर्यातप

        वायुमण्डल तथा पृथ्वी की ऊष्मा (Heat) का प्रधान स्रोत (सूर्य) है। सौर्यिक ऊर्जा को ही ‘सूर्यातप’ कहते हैं।

          दूसरे शब्दों में “लघु तरंगों के रूप में संचालित लगभग 3 लाख किमी० प्रति सेकेण्ड की गति से भ्रमण करती हुई प्राप्त सौर्यिक ऊर्जा को ‘सौर्य विकिरण’ या ‘सूर्यातप’ कहते हैं”। सूर्य धधकता हुआ गैस का वृहद् गोला है, जिसकी व्यास पृथ्वी से 100 गुना तथा उसके आयतन से 100,000 गुना अधिक है। सूर्य के धरातल जिसे फोटोस्फेयर कहते है, का तापक्रम 6000 डिग्री सेल्सियस तथा केन्द्रीय भाग का 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस बताया जाता है। पृथ्वी के वायुमण्डल का औसत तापक्रम 15.2°C होता है।

       सूर्य की ऊर्जा का प्रधान स्रोत उसका आन्तरिक भाग जहाँ पर अत्यधिक दबाव तथा उच्च तापमान के कारण नाभिकीय संलयन के कारण हाइड्रोजन का हीलियम में रूपान्तर होने से ऊष्मा का उत्सर्जन होता है। यह ऊष्मा परिचालन तथा संवहन द्वारा सूर्य की बाहरी सतह तक पहुँचती है। सूर्य की वाह्य सतह से निकलने वाली ऊर्जा को फोटान कहते हैं। इसी तरह सूर्य की वाह्य सतह को फोटोस्फीयर कहते हैं। इस सतह से ऊर्जा का विद्युत् चुम्बकीय तरंग द्वारा विकिरण होता है।

        सूर्य के धरातल के प्रत्येक वर्ग इंच से विकीर्ण ऊर्जा 100,000 अश्व शक्ति के बराबर होती है, सूर्य की वह्य सतह (फोटोस्फीयर) से निकलने वाली ऊर्जा प्रायः स्थिर रहती है। इस तरह पृथ्वी की सतह के प्रति इकाई क्षेत्र पर सूर्य से प्राप्त ऊर्जा प्राय: स्थिर रहती है। इसे सौर्यिक स्थिरांक (Solar constant) कहते हैं।

      इस तरह सौर्यिक स्थिरांक सूर्य के विकिरण की दर को प्रदर्शित करता है जो प्रति वर्ग सेण्टीमीटर प्रति मिनट 2 ग्राम कैलरी है। सूर्य से लगभग 15 करोड़ किमी० दूर स्थित पृथ्वी सौर्यिक ऊर्जा का केवल 1/2×109 भाग ही प्राप्त कर पाती है। परन्तु यह स्वल्प मात्रा भी 23×1012 अश्व शक्ति के बराबर हो जाती है। सूर्य से प्राप्त इस न्यून ऊर्जा के कारण ही भूतल पर सभी प्रकार के जीवों का अस्तित्व सम्भव हो सका है। इसी कारण धरातल पर पवन संचार, सागरीय धाराओं का प्रवाह तथा मौसम एवं जलवायु का आविर्भाव होता है।

         प्रत्येक वस्तु, जिसमें ऊष्मा होती है, विकिरण करती है। नियमानुसार जो वस्तु जितनी अधिक गर्म होती है, उसकी तरंगें उतनी ही छोटी होती हैं। इसी कारण से सूर्य विकिरण द्वारा निकली ऊष्मा लघु तरंगों के रूप में होती है तथा प्रति सेकेण्ड 300000 किमी० की गति से भ्रमण करती है। इसके विपरीत अपेक्षाकृत कम तापक्रम वाली वस्तु से विकिरण तो कम होता है, परन्तु दीर्घ तरंग के रूप में होता है। उदाहरण के लिए पृथ्वी से विकीर्ण ऊर्जा दीर्घ तरंगों के रूप में होती है।

धरातल पर सूर्यातप का वितरण

         सूर्यातप की सर्वाधिक मात्रा विषुवत रेखा के पास होती है क्योंकि यहाँ पर दिन-रात की लम्बाई बराबर होती है तथा सूर्य की किरणें लगभग लम्बवत् होती हैं। परन्तु सूर्य के दक्षिणायन तथा उत्तरायण की स्थितियों के कारण अत्यधिक सूर्यताप मण्डल विषुवत रेखा के दोनों ओर सरकता रहता है। विषुवत रेखा से सूर्यातप ध्रुवों की ओर कम होता जाता है। ध्रुवों पर यह ताप इतना कम हो जाता है कि विषुवत रेखा का केवल 40 प्रतिशत ही प्राप्त हो पाता है।

        इस तरह ध्रुवीय क्षेत्र न्यूनतम सूर्यातप प्राप्त करते हैं। ‘इक्वीनाक्स (Equinox-विषुव) के समय दोनों गोलाद्धों में सूर्यातप का वितरण प्राय: समान रहता है। इसके विपरीत कर्क तथा मकर संक्रांति (Solstices) के समय दोनों गोलार्द्ध में ध्रुवों के बीच सूर्यातप के वितरण में पर्याप्त असमानता होती है।

         यहाँ पर यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि सूर्यातप के वितरण पर वायुमण्डल के परावर्तन, शोषण तथा प्रकीर्णन आदि प्रभावों का पर्याप्त असर होता है। इसी कारण से कर्क संक्रान्ति के समय सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में कर्क रेखा पर लम्बवत् होता है, ध्रुवों पर दिन की अवधि सर्वाधिक लम्बी होने पर भी सूर्यातप सर्वाधिक नहीं हो पाता है, अपितु अधिकतम सूर्यातप 40° अक्षांश के आस-पास ही प्राप्त होता है। धरातलीय तापक्रम निम्न मध्य अक्षांश वाले भागों में सर्वाधिक होता है, न कि भूमध्य रेखा के पास।

सूर्यातप के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक

         सूर्यातप के उपर्युक्त वितरण से स्पष्ट हो गया है कि भूतल के विभिन्न भागों पर सूर्यातप की मात्रा समान नहीं हुआ करती है, सूर्य की किरणों को वायुमण्डल की एक मोटी परत से होकर गुजरना पड़ता है, अत: वायुमण्डल का प्रभाव सूर्यातप की मात्रा पर पड़ना स्वाभाविक ही है। इसके अलावा सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य तिरछापन, दिन की अवधि, पृथ्वी से सूर्य की दूरी, सौर कलंक इत्यादि कारक किसी भी स्थान पर (वायुमण्डल की अनुपस्थिति में) सूर्यातप की मात्रा को प्रभावित करते हैं।

(i) सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य तिरछापन:-

           पृथ्वी के गोलाकार रूप के कारण सूर्य की किरणें सर्वत्र समान कोण पर नहीं पड़ती हैं। भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें लम्बवत् होती हैं क्योंकि सूर्य सर्वाधिक ऊँचाई पर होता है, परन्तु ध्रुवों की ओर किरणों का कोण कम होता जाता है अर्थात् वे तिरछी होती जाती हैं। यद्यपि किरणों के सापेक्ष्य तिरछापन में कुछ परिवर्तन होता रहता है, उदाहरण के लिए 21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर तथा 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर लम्बवत् चमकता है, जिस कारण पहली स्थिति में दक्षिणी गोलार्द्ध में किरणें अधिक तिरछी होती हैं, तथापि साधारण रूप में भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर किरणों का तिरछापन बढ़ता जाता है।

(ii) दिन की अवधि

          यदि अन्य दशाएं समान हों तो दिन की अवधि जितनी अधिक होगी, सूर्यातप की मात्रा उतनी ही अधिक होगी। पृथ्वी अपनी कक्षा पर 66.5° का कोण बनाती हुई लगभग 24 घण्टे में अपनी धुरी पर एक परिक्रमा पूरा करती है तथा साथ ही सूर्य के चारों तरफ भी वर्ष में एक बार चक्कर लगाती है।

        यदि पृथ्वी भी अपनी जगह पर स्थिर होती तो वर्तमान स्थिति के विपरीत दशा होती, परन्तु पृथ्वी की दैनिक तथा वार्षिक गति के कारण भूमध्य रेखा को छोड़कर शेष भागों पर दिन की अवधि में अन्तर आता रहता है। भूमध्य रेखा पर दिन सदैव 12 घण्टे का इसलिए होता है कि प्रकाश वृत्त भूमध्य रेखा को दो बराबर भागों में काटता है।

        सूर्य की उत्तरायण स्थिति के समय (जब सूर्य कर्क रेखा पर होता है) भूमध्य-रेखा से उत्तर की ओर दिन की अवधि बढ़ती जाती है तथा उत्तरी ध्रुव पर 6 मास का दिन होता है। इसके विपरीत भूमध्य रेखा से दक्षिण जाने पर दिन की अवधि कम हो जाती है, जबकि द० ध्रुव पर केवल रात (6 मास) ही होती है।

        सूर्य की दक्षिणायन स्थिति में (जबकि सूर्य मकर रेखा पर होता है) भूमध्य रेखा से दक्षिण की ओर दिन की अवधि बढ़ती जाती है और उत्तर की ओर घटती जाती है। केवल 21 मार्च तथा 23 सितम्बर को, जबकि सूर्य की स्थिति भूमध्य रेखा पर होती है, सर्वत्र दिन-रात बराबर होते हैं। स्मरणीय है कि किरणों के तिरछेपन तथा दिन की अवधि के प्रभाव सापेक्ष्य हुआ करते हैं। उच्च अक्षांशों में (21 जून, उत्तरी गोलार्द्ध) दिन की अवधि 6 मास होने पर भी सूर्यातप न्यूनतम इसलिए होता है कि सूर्य की किरणें सर्वाधिक तिछी होती हैं। जहाँ पर दिन की अवधि अधिक होती है तथा साथ ही साथ किरणें सीधी पड़ती हैं वहाँ पर निश्चित रूप से ताप अधिक प्राप्त होता है। 

(iii) पृथ्वी से सूर्य की दूरी

     पृथ्वी अण्डाकार कक्ष के सहारे सूर्य की परिक्रमा करती है, जिस कारण उसकी सूर्य से दूरी में परिवर्तन होता रहता है। औसत रूप में पृथ्वी सूर्य से लगभग 15 करोड़ किमी० दूर है, परन्तु निकटतम दूरी 14.70 करोड़ किमी० है। इस स्थिति को उपसौर (Perihelion) कहते हैं। यह स्थिति 3 जनवरी को होती है। इसके विपरीत 4 जुलाई को अपसौर (Aphelion) की स्थिति होती है, जबकि पृथ्वी सूर्य से 15.20 करोड़ किमी० दूर होती है। साधारण नियम के अनुसार जब पृथ्वी सूर्य से निकटतम दूरी पर होती है, उस समय अधिकतम ताप तथा अधिकतम दूरी पर होने पर न्यूनतम ताप मिलना चाहिए। परन्तु वास्तविकता ठीक उसके विपरीत होती है।

       जनवरी के महीने में जबकि पृथ्वी सूर्य से निकटतम दूरी पर होती है, उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्म काल होने के बजाय शीत काल होता है। इसी तरह 4 जुलाई के समय शीत काल के बजाय ग्रीष्मकाल होता है। वास्तव में दिन की अवधि तथा सूर्य की किरणों के तिरछेपन के प्रभाव के आगे यह कारक नगण्य हो जाता है। हाँ, इतना अवश्य होता है कि जनवरी में उ० गोलार्द्ध में जितनी सर्दी होनी चाहिए, उसकी अपेक्षा 7 प्रतिशत कम होती है तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में गर्मियां 7 प्रतिशत अधिक तीव्र होती हैं। अपसौर की स्थिति में उत्तरी गोलार्द्ध में (4 जुलाई) गर्मियां 7 प्रतिशत कम तीव्र तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में शीतकाल 7 प्रतिशत अधिक तीव्र हो जाता है।  

सूर्यातप

 

(iv) सौर कलंक

       चन्द्रमा के समान सूर्य-तल पर कलंक या धब्बे मिलते हैं। इनका कोई स्थायी रूप नहीं होता है, वरन् ये बनते-बिगड़ते रहते हैं तथा इनकी संख्या घटती-बढ़ती रहती है। यह अन्तर चक्रीय रूप में सम्पन्न होता है। औसत रूप में एक चक्र ग्यारह वर्ष में पूरा होता है।

        जब सौर कलंकों की संख्या अधिक हो जाती है तो सूर्यातप की मात्रा भी अधिक हो जाती है, परन्तु इनकी मात्रा में कमी हो जाने के कारण प्राप्त होने वाला सूर्यातप कम हो जाता है। इस कारण की सत्यता अभी तक संदिग्ध है। सौर कलंकों के कारण सूर्य विकिरण में अन्तर आता रहता है। विश्व स्तर पर मौसम तथा जलवायु में कभी-कभी विश्वव्यापी अनियमितता होती हती है। सौर कलंकों के कारण होने वाला अनियमित सूर्यातप इस विश्वव्यापी मौसम सम्बन्धी अनियमितता का कारण हो सकता है, परन्तु इसे निश्चितता के साथ स्वीकार नहीं किया जा सका है।

(v) वायुमण्डल का प्रभाव

         सूर्यातप वितरण को प्रभावित करने वाले उपर्युक्त कारकों की विवेचना के समय वायुमण्डल के प्रभाव को ध्यान में नहीं रखा गया था, वास्तव में (सूर्य की) प्रकाश किरणों को वायुमण्डल की पारदर्शक मोटी परत से होकर गुजरना पड़ता है, जिस कारण उसका प्रकीर्णन (Scattering), परावर्तन (Reflection) तथा अवशोषण (Absorption) होता रहता है। प्रकीर्णन के अन्तर्गत सौर्यिक शक्ति का कुछ भाग पारदर्शक वायुमण्डल में स्थित अदृश्य कणों तथा अणुओं के कारण बिखर कर फैल जाता है।

       प्रकीर्णन मुख्य रूप से वरणात्मक (Selective) होता है, अर्थात् यह उस समय होता है जबकि अदृश्य कणों (धूलकण आदि) की व्यास विकिरण तरंग से छोटी होती है। इस तरह लघु तरंगों का प्रकीर्णन सर्वाधिक होता है, जिस कारण विभिन्न प्रकार के रंगों का आविर्भाव होता है। उदाहरण के लिए आकाश का नीला रंग, सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य की लालिमा आदि प्रकीर्णन के कारण ही सम्भव हो पाती है।

      जब वायुमण्डल में अदृश्य कणों की व्यास विकिरण तरंग से बड़ी होती है तो विसरित परावर्तन (diffuse reflection) की क्रिया होती है। इस क्रिया के कारण सौर्यिक शक्ति का कुछ भाग परावर्तित होकर वापस लौट जाता है, जबकि कुछ भाग वायुमण्डल में चारों तरफ छिटक जाता है। पृथ्वी की सतह से भी कुछ ताप शक्ति का परावर्तन आकाश में हो जाता है। पृथ्वी के इस परावर्तन के कारण ही चन्द्रमा का अंधेरा भाग भी आसानी से दृष्टिगत हो जाता है।

           प्रकीर्णन तथा परावर्तन के कारण वायुमण्डल से कुछ सौर्यिक ऊर्जा पृथ्वी की सतह पर पहुँच जाती है। इसे आकाश का विसरित नीला प्रकाश (diffuse blue light of sky) कहते हैं अथवा विसरित दिवा प्रकाश (diffuse day light) की संज्ञा प्रदान की जाती है। इसी प्रकाश के कारण पूर्ण बदली के दिन अथवा किसी भी स्थान के वे भाग जहाँ पर सूर्य की किरणें नहीं पहुँच पाती हैं, आसानी से देखें जा सकते हैं।

         अवशोषण की क्रिया मुख्य रूप में जलवाष्प तथा गौण रूप में आक्सीजन एवं ओजोन गैसों द्वारा सम्पादित होती है। अवशोषण भी वरणात्मक होता है अर्थात् सभी विकिरण तरंगों का अवशोषण न होकर केवल दीर्घ तरंगों का ही हो पाता है। प्रकीर्णन, परावर्तन तथा अवशोषण द्वारा सूर्यातप की नष्ट होने वाली मात्रा मुख्य मुख्य रूप से सूर्य की किरणों के कोण तथा वायुमण्डल के पारदर्शक तत्व पर आधारित होती है।

         सूर्य से विकीर्ण समस्त सूर्यातप का लगभग 35 प्रतिशत भाग परावर्तन तथा प्रकीर्णन द्वारा आकाश में वापस लौट जाता है तथा इसका उपयोग न ही वायुमण्डल को गर्म करने में हो पाता है और न ही पृथ्वी को सूर्यातप के 14 प्रतिशत भाग का वायुमण्डल द्वारा अवशोषण हो जाता है।

       इस तरह सूर्यातप का केवल 51 प्रतिशत भाग पृथ्वी को प्राप्त हो पाता है, जिससे वायुमण्डल का निचला भाग गर्म होता है। किसी भी सतह से विकिरण ऊर्जा के परावर्तित भाग को अलबिडो (Albedo) कहा जाता है। पृथ्वी की सतह का औसत अलबिडो 24 से 34 प्रतिशत के बीच बताया जाता है।


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24. वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली के एक-कोशिकीय एवं त्रि-कोशिकीय मॉडल

      24. वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली के एक-कोशिकीय एवं त्रि-कोशिकीय मॉडल


वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का एक-कोशिकीय मॉडल

           वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का एक-कोशिकीय मॉडल निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है:-

1. अन्तरिक्ष में पृथ्वी घूर्णन नहीं कर रही है।

2. पृथ्वी सतह का निर्माण एक समान पदार्थों से हुआ है।

3. पृथ्वी सतह द्वारा प्राप्त सौर विकिरण और बहिर्गामी दीर्घ तरंगी विकिरण में अक्षांशों के अनुसार विद्यमान भिन्नता के कारण उत्पन्न तापमान प्रवणता के कारण भूमध्य रेखा पर गर्म हवा और ध्रुवों पर ठण्डी हवा प्रवाहित होती है।

        उपरोक्त पूर्व मान्यताओं के आधार पर दोनों ही गोलाद्धों में वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का प्रतिरूप एक-कोशिकीय रूप में पाया जाता है। ध्रुवों पर उच्च वायुदाब एवं भूमध्यरेखा पर न्यून वायुदाब होने के कारण हवाओं का धरातलीय प्रवाह ध्रुवों से भूमध्यरेखा की ओर होता है।

         ध्रुवों से चलने वाली ये हवाएं जब भूमध्यरेखा पर पहुंचती हैं तो अभिसरण और संवहन के द्वारा ऊपर उठती हैं। ऊपर उठकर ये हवाएं क्षोभ सीमा के समीप पहुंचकर पुनः क्षैतिज रूप में ध्रुवों की ओर प्रवाहित होती हैं। ऊपरी वायुमण्डल में चलने वाली ये हवाएं ध्रुवों पर पहुंचकर नीचे उतरती हैं। नीचे उतरकर ये हवाएं पुनः भूमध्यरेखा की तरफ प्रवाहित होती हैं। इस प्रकार वायुमंडल की सामान्य संचार प्रणाली का एक-कोशिकीय संचार पूर्ण होता है।

वायुमण्डलीय सामान्य

चित्र: वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का एक-कोशिकीय मॉडल

वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का त्रि-कोशिकीय मॉडल

         एक कोशिकीय मॉडल की पहली मान्यता को यदि हटा दें तो वायुमण्डलीय प्रणाली का संचार प्रतिरूप बिल्कुल ही बदल जाएगा। वास्तव में पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण दोनों ही गोलाद्धों में वायुमण्डलीय संचार प्रणाली का त्रिकोशिकीय प्रतिरूप देखने को मिलता है। इन तीन संचार कोशिकाओं के नाम- हैडले कोशिका, फैरेल कोशिका तथा ध्रुवीय कोशिका हैं।

          इस त्रि-कोशिकीय मॉडल में भी भूमध्यरेखीय क्षेत्र पृथ्वी का सबसे गर्म क्षेत्र है। सर्वाधिक ऊष्मा से युक्त यह तापीय न्यून (वायुमण्डल में उच्च वायुदाब वाला वह क्षेत्र जो सतही तापमान के कारण उत्पन्न होता है) क्षेत्र अन्तर उष्ण कटिबन्धीय अभिसरण क्षेत्र (Inter Tropical Convergence Zone) कहलाता है। इस क्षेत्र में दोनों ही गोलाद्धों के उपोष्ण कटिबन्ध से आने वाली हवाओं का अभिसरण होता है।

           अभिसरण और संवहन के कारण ये हवाएं भूमध्य रेखा पर ऊपर की ओर उठती है और 14 किमी० की ऊंचाई अर्थात् क्षोभ सीमा के समीप ये हवाएं क्षैतिज रूप में ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने लगती है। ऊपरी वायुमण्डल में प्रवाहित होने वाली इन हवाओं पर कोरिआलिस प्रभाव के कारण विक्षेपण उत्पन्न होता है और 30° अक्षांशों के समीप ये हवाएं अक्षांश रेखाओं के समानान्तर पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होने लगती है। यह अक्षांशीय प्रवाह उपोष्ण कटिबन्धीय जेट धारा (Subtropical Jet Stream) के नाम से जाना जाता है।

        इस अक्षांशीय प्रवाह के कारण ऊपरी वायुमण्डल में हवा का एकत्रीकरण होने लगता है। फलतः कुछ हवा अवतलित होकर धरातल पर उपोष्ण कटिबन्धीय उच्च वायुदाब क्षेत्र को जन्म देती है। इस उच्च वायुदाब कटिबन्ध से हवा अपसरित होकर भूमध्यरेखा एवं ध्रुवों की और प्रवाहित होने लगती है। भूमध्य रेखा की ओर प्रवाहित होने वाली हवाएं भूमध्य रेखा पर पहुंच कर हैडले कोशिका को पूर्ण रूप प्रदान करती हैं।

          भूमध्य रेखा की ओर प्रवाहित होने वाली यह हवा कोरिऑलिस प्रभाव के कारण विक्षेपित होकर उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवने (दायीं ओर विक्षेपण) तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण पूर्वी व्यापारिक पवनें (बायीं और विक्षेपण) कहलाती है। उपोष्ण कटिबन्धीय उच्च वायुदाब क्षेत्र से ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने वाली धरातलीय पवनें भी कॉरिआलिस प्रभाव के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में दक्षिण-पश्चिमी पछुआ हवाएं (दायीं ओर विक्षेपण) तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर-पश्चिमी पछुआ पवने (बायीं ओर विक्षेपण) कहलाती हैं।

चित्र: वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का त्रि-कोशिकीय मॉडल

       दोनों ही गोलार्द्ध में 30 से 60° अक्षाशों के बीच ऊपरी वायुमण्डल में हवा सामान्यत ध्रुवों की ओर प्रवाहित होती है। एक बार फिर कॉरिऑलिस प्रभाव के कारण इन हवाओं में विक्षेपण उत्पन्न होता है। फलतः ये हवाएं पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होने लगती हैं और दोनों ही गोलार्द्धों में 60º अक्षांश के समीप ध्रुवीय जेट धारा (Polar Jet Stream) का निर्माण करती हैं।

         पृथ्वी सतह पर 60° उत्तरी और दक्षिणी अक्षांशों के समीप उपोष्ण कटिबन्ध से प्रवाहित होने वाली पछुआ हवाएं ध्रुवों से आने वाली ठण्डी हवाओं से टकराती हैं। इस टकराव से वाताग्र के संक्रमण क्षेत्र में ठण्डी और घनी वायु गर्म एवं हल्की वायु को ऊपर की ओर उठा देती है। फलस्वरूप उपोष्ण कटिबन्धीय न्यून वायुदाब क्षेत्र की उत्पत्ति होती है। ऊपर उठती हुई यह वायु क्षोभ सीमा के समीप जब पहुंचती है तो इसमें से कुछ वायु पुनः फैरेल कोशिका में प्रवेश कर फैरेल कोशिका को पूर्ण करती है।

          ऊपर उठी हुई इस वायु का अधिकांश भाग ध्रुवीय आवर्त (Polar Vortex) (ध्रुवीय क्षेत्रों में ऊपरी वायुमण्डल में स्थित उच्च वायुदाब क्षेत्र। इस क्षेत्र में ऊपरी क्षोभमण्डल में प्रवाहित होने वाली वायु आवर्त के केन्द्र में प्रवेश करके अवरोहित होकर धरातल पर उच्च वायु दाब क्षेत्र को जन्म देती है।) में पहुंच जाता है जहां से वायु के अवरोहण से धरातल प ध्रुवीय उच्च वायुदाब क्षेत्र का जन्म होता है और इस प्रकार ध्रुवीय कोशिका पूर्ण होती है।


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23. एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina) क्या है?

23. एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina) क्या है?


एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina)

एलनिनो

          एल निनो एक स्पेनिश शब्द है जिसका अर्थ है नवजात ईसा मसीह (Child Christ)। यह नाम इसको इसलिए दिया गया है, क्योंकि इस घटना का आगमन क्रिसमस के समय होता है।

       यह एक जलवायु सम्बन्धी (Weather phenomena) प्रक्रिया है, जिसके फलस्वरूप हवा उल्टी दिशा में बहने लगती है। ऐसा प्रत्येक दो से सात वर्ष बाद होता है। इसके अन्तर्गत दक्षिण अमेरीका से एशिया की ओर प्रशान्त महासागर के ऊपर से बहने वाली हवाएं उलटकर एशिया से दक्षिण अमेरीका की ओर बहने लगती हैं।

         इस प्रकार एशिया में वर्षा पहुंचाने के बजाय ये हवाएं इस वर्षा को दक्षिण अमेरीका की ओर ले जाती हैं जिससे दक्षिण अमेरीका और उसके आस-पास के प्रशान्त महासागर में घनघोर वर्षा होने लगती है और वहां बाढ़ आ जाती है और दूसरी ओर एशिया के विभिन्न देश जैसे भारत, इण्डोनेशिया और यहां तक कि ऑस्ट्रेलिया में भी वर्षा न होने के कारण सूखा पड़ जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि एल निनो के कारण दक्षिण एशिया का मानसून बुरी तरह प्रभावित होता है।

        एल निनो का कारण है, दक्षिण अमेरीका के पूर्वी प्रशान्त महासागर से लगे किनारों पर पानी का ठण्डे होने के स्थान पर गर्म हो जाना, जो मुख्यतः पेरू के किनारे समुद्र में होता है। यह गर्म जल धीरे-धीरे पश्चिम की ओर प्रशान्त महासागर में फैल जाता है।

        इस प्रकार जल के गर्म हो जाने के कारण दक्षिण प्रशान्त महासागर के ऊपर एक कम दबाव का क्षेत्र बन जाता है। (जहां पर अन्यथा जल के ठण्डे होने के कारण अधिक दबाव का क्षेत्र होना चाहिए था।) तथा इस कम दबाव के क्षेत्र को सन्तुलित करने के लिए इण्डोनेशिया के पास एक अधिक दबाव का क्षेत्र (जहां पर अन्यथा एक कम दबाव का क्षेत्र होना चाहिए था।) बन जाता है। इस प्रकार दबाव क्षेत्रों की अदला-बदली के कारण प्रशान्त महासागर के ऊपर बहने वाली हवाओं की दिशा उलट जाती है।

      मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल निनो की घटना इस दशक में पहले की तुलना में अधिक हो रही है और साथ ही इसकी तीव्रता भी पहले से अधिक है। इसका कारण वे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को मानते हैं। विश्व भर में बढ़ते प्रदूषण, ग्रीन हाउस प्रभाव और ओजोन परत की क्षति के कारण पृथ्वी की जलवायु में भारी परिवर्तन हो रहे हैं।

     एल निनो का एक चक्र समाप्त होने पर इसमें होने वाली घटनाओं के ठीक विपरीत एक और घटना होती है जिसेला निना’ (La Nina) कहा जाता है। ‘ला निना’ के समय प्रशान्त महासागर का जल पुनः ठण्डा हो जाता है। इस प्रका ‘ला निना’, एल निनो के जलवायु पर होने वाले प्रभावों को विपरीत दिशा में मोड़ देता है और वातावरण में पुनः स्थिरता को स्थापित करता है।


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22. वाताग्र किसे कहते है? / वाताग्रों का वर्गीकरण

22. वाताग्र किसे कहते है? / वाताग्रों का वर्गीकरण


वाताग्र किसे कहते है?

        जब दो अलग-अलग स्वभाव अर्थात तापमान और आर्द्रता में भिन्न वाली वायुराशियाँ दो विपरीत दिशाओं से आकर अभिसरण करने का प्रयास करती हैं, तब वे पूर्ण रूप से मिश्रित नहीं हो पाती एवं उनके सीमांत प्रदेश में ढलुआं सीमा सतह का निर्माण होता है, जिसे ही वाताग्र कहा जाता हैं।

       इस प्रकार वाताग्र से आशय उस ढलुआं सीमा से है जिसके सहारे दो विपरीत स्वभाव वाली वायु-राशियाँ आकर मिलती है। जहाँ कहीं दो भिन्न वायु-राशियों का अभिसरण होता है वहाँ उनके बीच एक विस्तृत संक्रमणीय प्रदेश स्थापित हो जाता है। इस संक्रमणीय प्रदेश को ही वाताग्र प्रदेश अथवा वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र कहा जाता है।

        वाताग्र तथा वाताग्र उत्पत्ति के संबंध में कई विद्वानों ने अपने मत प्रकट किये है। प्रसिद्ध विद्वान पीटरसन के अनुसार, “वाताग्री सतह एवं धरातलीय सतह को अलग करने वाली रेखा को वाताग्र कहते हैं तथा जिस प्रक्रिया द्वारा वाताग्र की उत्पत्ति होती है उसे वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र कहा जाता है।”

       ट्रिवार्था के अनुसार “वाताग्र कोई रेखा नहीं अपितु वे पर्याप्त चौड़ाई वाले ऐसे क्षेत्र होते है जो 3 से 50 मील तक चौड़े होते है। इसके साथ ही वे क्षेत्र जहाँ दो भिन्न स्वभाव वाली वायु राशियाँ आमने-सामने से आकर अभिसरण करती है तो उस अभिसरण क्षेत्र को वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र कहा जाता है।”

    अतः स्पष्ट है कि वाताग्र न तो धरातल के ऊपर लम्बवत् रूप में होता है और न धरातलीय सतह के समान्तर ही पाया जाता है। इसके विपरीत वह कुछ कोण पर झुका हुआ होता है। वाताग्र का ढाल पृथ्वी की घूर्णन गति पर आधारित होता है जो ध्रुवों की ओर बढ़ता जाता है। इस प्रकार वाताग्र विपरीत स्वभाव वाली वायु-राशियों को अलग करने वाली ढलुआं सीमा सतह का ही दूसरा नाम है।

   ट्रिवार्था के अनुसार “The sloping Boundary surfaces separating contrusting air-masses are called surfaces of discontinuity of front.” वाताग्र अपनी उत्पत्ति के बाद कुछ विशिष्ट अवस्थाओं में नष्ट हो जाते हैं।

            वाताग्रों के इस प्रकार लोप होने की प्रक्रिया को वाताग्र-क्षय कहते है। किसी क्षेत्र-विशेष की जलवायु तथा मौसम को समझने के लिए आजकल जलवायु विज्ञान में वाताग्र का अध्ययन महत्वपूर्ण स्थान रखता है क्योंकि ये मौसम संबंधी विशिष्ट अवस्थाओं को जन्म देते हैं जिन्हें चक्रवातीय अथवा प्रतिचक्रवातीय अवस्थायें कहा जाता है। इस प्रकार वाताग्र चक्रवातों और प्रतिचक्रवाती के पालने कहे जाते हैं।

वाताग्र उत्पत्ति (Frontogenesis)

         वाताग्रों के बनने की क्रिया को वाताग्र उत्पत्ति कहा जाता है। मुख्य रूप से वाताग्रों की उत्पत्ति निम्नलिखित दो बातो पर आधारित होती हैं:-

1. भौगोलिक कारक (Geographical Factor):-

      जब दो भिन्न स्वभाव वाली वायुराशियों एक-दूसरे के समीप आती हैं तो वाताग्रों की उत्पत्ति होती है। दूसरे शब्दों में वाताग्रों की उत्पत्ति के लिए तापमान और आर्द्रता की दृष्टि से वायु राशियों में भिन्नता होना आवश्यक है।

2. गतिक कारक (Dynamic Factor ):-

      वाताग्रों की उत्पत्ति के लिए वायु राशियों में प्रवाह अर्थात् गति होना आवश्यक है। पीटरसन एवं बर्गरान नामक विद्वानों ने अपने अध्ययन के द्वारा इस बात को प्रमाणित किया है कि वायुराशियों की गति वाताग्रों को तीव्र बना देती है। इस प्रकार वाताग्र बनने के लिए अभिसरण की स्थिति का होना परम आवश्यक है।

वाताग्र-उत्पत्ति एवं वाताग्र-क्षय क्षेत्र (Areas of Frontogenesis and Frontolysis)

1. उत्पत्ति क्षेत्र:-

        जिन क्षेत्रों में दो भिन्न गुण वाली वायु-राशियाँ आकर परस्पर मिलती हैं अर्थात् अभिसरण करती हैं उन क्षेत्रों को वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र कहते हैं। उदाहरण के लिए जाड़े की ऋतु में पूर्वी एशिया, उत्तरी अमेरीका का पूर्वी तट एवं ग्रीनलैंड आदि वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र हैं।

2. क्षय क्षेत्र:-

          जिन क्षेत्रों में वायुराशियाँ अपसरित होती हैं उन क्षेत्रों में वाताग्रों का क्षय होने लगता है। अतः ऐसे क्षेत्रों को वाताग्र-क्षय क्षेत्र कहा जाता है। उदाहरण के लिए साइबेरिया तथा उत्तरी कनाडा आदि वाताग्र-क्षय क्षेत्र हैं।

वाताग्र

वाताग्र उत्पत्ति के लिए आवश्यक दशाएँ

     धरातल पर वाताग्रों की उत्पत्ति कुछ विशिष्ट दशाओं में ही होती हैं। प्रमुख रूप से इन दशाओं का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है-

1. तापमान की भिन्नता:-

       वाताग्र की उत्पत्ति के लिए दो विपरीत तापमान वाली वायु-राशियों का होना आवश्यक है। इसमें एक वायु-राशि ठण्डी और शुष्क तथा दूसरी वायु-राशि का गर्म तथा आर्द्र होना आवश्यक है। ये वायु-राशियाँ जब परस्पर मिलती हैं जो ठण्डी वायु-राशि गर्म तथा हल्की वायु-राशि को ऊपर उठा देती है जिससे वहाँ वाताग्र का निर्माण हो जाता है।

2. वायु-राशियों की विपरीत दिशा:-

      जब कभी वितरित तापमान वाली दो वायुराशियाँ विपरीत दिशाओं से आकर आमने-सामने मिलती है तो एक-दूसरे के क्षेत्र में घुसने की चेष्टा करती हैं। परिणामस्वरूप उनके मिलने के क्षेत्र में एक लहरनुमा वाताग्र बन जाता है। इसके विपरीत जब कभी दो भिन्न तापमान वाली वायु-राशियाँ आमने-सामने न मिलकर विपरीत दिशाओं की ओर चलने लगती हैं तो उस अवस्था में वहाँ वाताग्र का निर्माण नहीं हो सकता।

       प्रसिद्ध विद्वान पीटरसन ने विभिन्न पवन क्रमों को स्पष्ट कर यह बताने का प्रयास किया है कि किन अवस्थाओं में वाताग्र के निर्माण की संभावनायें होती हैं। वाताग्र निर्माण की सम्भावनाओं का विवेचन निम्नलिखित बिंदुओं के अन्तर्गत किया गया है-

(i) स्थानान्तरणी प्रवाह:-

        इस प्रकार के पवन प्रवाह में हवायें क्षैतिज रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान को एक ही दिशा में चलती है। इस दशा में तापमान की विपरीत अवस्था पैदा नहीं हो पाती। फलस्वरूप इस प्रकार के पवन प्रवाह से वाताग्र की उत्पत्ति नहीं होती।

(ii) घूर्णन प्रवाह:-

       इसमें हवायें चक्रवातीय और प्रतिचक्रवातीय रूप में प्रवाहित होती हैं। यद्यपि इस प्रकार के पवन प्रवाह में विपरीत तापमान की अवस्थायें होती हैं लेकिन फिर भी वाताग्र की उत्पत्ति नहीं हो पाती। क्योंकि इसमें हवायें विपरीत दिशाओं से आकर आमने-सामने नहीं मिलती।

(iii) अभिसरण तथा अपसरण:-

      जब हवायें चारों ओर से आकर एक ही बिन्दू पर मिलती हैं तो वह अभिसरण की स्थिति होती है। इस स्थिति में यद्यपि विपरीत तापमान की अवस्था रहती है फिर भी वाताग्र का निर्माण नहीं हो पाता है क्योंकि इस दशा में विपरीत तापक्रम एक रेखा के सहारे न होकर एक केन्द्र पर होता है जहाँ चारों ओर की हवायें आकर तापमान और आर्द्रता की आदर्श दशाओं को भंग कर देती हैं।

     इसके विपरीत जब हवायें एक बिन्दु से चारों ओर चलती हैं तो वे परस्पर कभी नहीं मिल पाती जिससे वहाँ वाताग्र का निर्माण कदापि सम्भव नहीं होता। हवाओं की इस स्थिति को अपसरण कहते हैं।

(iv) विरूपणी प्रवाह:-

      इस प्रकार के पवन प्रवाह में दो विपरीत तापमान वाली हवायें एक-दूसरे से क्षैतिज रेखा के सहारे आकर मिलती हैं। इस प्रकार की हवायें दो प्रकार की बाह्य प्रवाह अक्ष और अन्त प्रवाह अक्ष रेखायें बनाती हैं। वाताग्र निर्माण की दृष्टि से पवन-प्रवाह का यह क्रम सर्वाधिक अनुकूल होता है। फिर भी वाताग्र का बनना न बनना स्थान विशेष की प्राकृतिक स्थिति तथा अक्षांशों पर निर्भर करता है।

वाताग्रों का वर्गीकरण

वाताग्रों के प्रमुख लक्षण

     वाताग्र प्रदेशों में पाये जाने वाले वाताग्रों के मुख्य लक्षणों का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है-

1. वाताग्रों की गति:-

      यद्यपि मानचित्रों पर वाताग्र स्थिर दिखलाई देते है, किन्तु वस्तुतः वाताग्रों में गति होती है। ये प्रायः 50 से 80 किलोमीटर प्रति घण्टे की गति से चलते है। इस प्रकार वाताग्र एक दिन-रात अथवा 25 घण्टे में एक विस्तृत क्षेत्र को पार कर जाते है।

2. वाताग्रों की ऊर्ध्व गति:-

       वाताग्र क्षेत्र में वायु सदैव नीचे से ऊपर उठती रहती है। इस प्रकार ऊर्ध्व गति वाताग्रों का एक प्रमुख लक्षण है। इस गति के कारण वाताग्र क्षेत्र में ऊष्ण वायु शीतल वायु के ऊपर चढ़ती है क्योंकि उष्ण वायु हल्की एवं शीतल वायु भारी होती है। उष्ण व आर्द्र वायु के ऊपर उठने से मेघ बनते हैं और वर्षा होती है।

3. वाताग्रों की गहराई:-

      वाताग्रों की रचना करने वाली वायुराशियों में ऊपरी तलों की अपेक्षा निम्न तलों अर्थात् धरातल के समीप गति अधिक होती है। इसलिए वाताग्रों की रचना ऊपरी भागों में नहीं होती। सामान्यतः वाताग्रों की रचना 3,000 मीटर के ऊपर बहुत कम और 5,000 मीटर के ऊपर तो बिल्कुल ही नहीं होती।

4. वाताग्रों की चौड़ाई:-

         यद्यपि वाताग्रों की कोई निश्चित चौड़ाई नहीं होती। ये प्राय: 5 से 80 किलोमीटर तक चौड़े होते हैं।

5. वाताग्रों का भंग होना:-

       वाताग्र में दोनों ओर की वायु-राशियों के गुण भिन्न होते हैं। जब वायु-राशियों के अपने गुणों का फैलाव बहुत विस्तृत क्षेत्र में हो जाता है तो वाताग्र भंग हो जाते हैं। वायु-राशियों के गुणों में तापमान, वायुदाब, पवन-दिशा, प्रवणता आदि मुख्य हैं। वायु-राशियों के इन गुणों में परिवर्तन के साथ ही वाताग्र की समाप्ति हो जाती है।

वाताग्रों के प्रकार (Types of Fronts)

     तापमान और आर्द्रता की भिन्नता के आधार पर वाताग्रों को निम्नलिखित बिन्दुओं के अर्न्तगत विभाजित किया गया है:-

1. उष्ण वाताग्र (Warm Front):-

      जब आगे बढ़ती हुई उष्ण वायु-राशि किसी ठण्डा वायु-राशि के ऊपर चढ़ती है तो उसे उष्ण वाताग्र कहते हैं। उष्ण वाताग्र सदैव दायीं तरफ से बायीं तरफ आगे बढ़ता है। इसका ढाल मध्य अक्षांशों में प्राय: 1:100 से 1:400 अनुपात में पाया जाता है।

2. शीत वाताग्र (Cold Front ):-

         एक ही दिशा से आती हुई ठण्डी एवं उष्ण वायु-राशियाँ जब आपस में मिलती हैं और ठण्डी वायु-राशि आक्रामक होती हैं तो वह उष्ण वायु-राशि को ऊपर धकेल देती है। इसी को शीत वाताग्र कहा जाता है। इनका ढाल 1:25 से 1:100 तक होता है। इसमें वाताग्र शीतल से ऊष्ण भाग की ओर अर्थात् बायीं ओर से दायीं ओर बढ़ता है।

3. अवशिष्ट वाताग्र (Oecluded Front):-

       जब कभी शीत वाताग्र तीव्र गति से चलकर ऊष्ण वाताग्र से मिल जाता है तो ऊष्ण वायु ऊपर उठ जाती है और धरातल से उसका सम्पर्क समाप्त हो जाता है। इसी अवस्था को अवशिष्ट वाताग्र कहते हैं।

4. स्थायी वाताग्र (Stationary Front):-

      जब कभी दो विपरीत स्वभाव वाली वायु-राशियाँ एक-दूसरे के समान्तर चलकर एक वाताग्र के रूप में अलग हो जाती है तो ऐसी दशा में वायु ऊपर नहीं उठ पाती जिसे स्थायी वाताग्र कहते हैं।

वाताग्र प्रदेश (Frontal Zones)

     पृथ्वी तल पर उन प्रदेशों में वाताग्रों की उत्पत्ति होती है जहाँ वायु-राशियों के तापमान में अधिक अन्तर पाया जाता है और जहाँ वायु-राशियाँ अभिसरित होती हैं। पृथ्वी के धरातल पर चलने वाली वायु-राशियों और उनके मिलने के क्षेत्रों का वर्णन निम्नलिखित दिन्दुओ के अन्तर्गत किया गया है-

1. ध्रुवीय वाताग्र प्रदेश (Polar Frontal Zone):-

      यह प्रदेश दोनों गोलार्द्ध में 30° से 45° अक्षांशों के मध्य स्थित है। इस प्रदेश में ध्रुवीय ठण्डी वायु-राशि तथा ऊष्ण कटिबंधीय गर्म वायु-राशि के मिलने से ध्रुवीय वाताग्र का निर्माण होता है। इनका विस्तार उत्तरी अटलांटिक महासागर तथा उत्तरी प्रशान्त महासागर में अधिक पाया जाता है। ये वाताग्र जाड़ों में अत्यधिक सक्रिय होते हैं किन्तु गर्मियों में शिथिल हो जाते हैं।

2. आर्कटिक वाताग्र प्रदेश (Arctic Frontal Zone):-

        ध्रुव वृत्तीय क्षेत्रों में महाद्वीपीय ध्रुवीय हवायें तथा सागरीय ध्रुवीय हवायें परस्पर मिलती है। इसी से यहाँ वाताग्रों का निर्माण होता है। इन दोनों वायु-राशियों के तापमान में विशेष अन्तर नहीं पाया जाता। परिणामस्वरूप यहाँ वाताग्र अधिक सक्रिय नहीं होते। इन वाताग्रों का विस्तार मुख्यतः यूरेशिया तथा उत्तरी अमेरीका के उत्तरी भागों में पाया जाता है।

3. आन्तरिक उष्ण कटिबंधीय वाताग्र प्रदेश (Inter Tropical Frontal Zone):-

     यह प्रदेश विषुवतीय रेखीय न्यून वायुदाब की पेटी में फैला हुआ है। यहाँ जब कभी उत्तरी-पूर्वी तथा दक्षिणी-पूर्वी व्यापारिक हवायें मिलती हैं तो वाताग्र का निर्माण हो जाता है। इस प्रकार यहाँ व्यापारिक हवाओं के अभिसरण के कारण वाताग्रों का निर्माण होता है। ये वाताग्र प्रदेश के मौसम के अनुसार ऊपर-नीचे सरकते रहते है।

निष्कर्ष:

     उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि वाताग्रों की उत्पत्ति कुछ निर्दिष्ट दशाओं के सम्यक रूप से अनुकूल होने पर ही होती है। इनमें विभिन्न विपरीत तापमान वाली दो वायु-राशियों की उपस्थिति तथा उनकी विपरीत प्रवाह दिशा मुख्य है। अन्यथा किसी एक के अनुपस्थित होने पर उनका बनना असंभव हो जाता है।

प्रश्न प्रारूप

प्रश्न 1. सीमाग्र क्या है? स्पष्ट कीजिए। (What do you mean by Front ? Explain.)

Or वाताग्र किसे कहते हैं? प्रत्येक की उत्पत्ति एवं लक्षणों की व्याख्या कीजिए। (What is Fronts? Describe the origin and characteristics of each.)

Or वाताग्र से आप क्या समझते हो? प्रमुख वाताग्र प्रदेशों का वर्णन कीजिए। (What do you understand by Fronts? Describe main Frontal Zones.)

Or, वाताग्रों का वर्गीकण कीजिए एवं उनकी विशेषताओं की विवेचना करें।


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 (Evidences of Climatic Change)


जलवायु परिवर्तन के विभिन्न प्रमाण

         यह सनातन सत्य है कि अनुकूल जलवायु के कारण ही पृथ्वी पर जीवन संभव हो पाया है, लेकिन मानवीय और कुछ प्राकृतिक गतिविधियों के कारण जलवायु की दशा बदल रही है। इस स्थिति को जलवायु परिवर्तन (Climate change) की संज्ञा दी जाती है। हाल के वर्षों और दशकों में गर्मी के कई रिकॉर्ड टूट गए हैं: यूएन जलवायु रिपोर्ट 2019 इस बात की पुष्टि करती है कि रिकॉर्ड में साल 2019 दूसरा सबसे गर्म वर्ष था, और 2010-2019 सबसे गर्म दशक। वर्ष 2019 में वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) तथा अन्य ग्रीनहाउस गैसें नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थी। जलवायु में परिवर्तन के कारण ही विशालकाय जीव जैसे डायनासोर आदि जिनकी इस पृथ्वी पर बहुलता थी आज उपलब्ध नहीं है। इसी प्रकार राजस्थान के मरु प्रदेश में किसी समय हिमाच्छादन था। वातावरण की गैसों, धूलकणों तथा जलवाष्प की मात्रा में आये परिवर्तन और रूप में धरातलीय भौतिक दशाओं के परिवर्तन के परिणाम है। धरातलीय दशाओं के अतिरिक्त पृथ्वी के आन्तरिक भागों में होने वाला समस्थिति असंतुलन भी इसके लिए कुछ सीमा तक जिम्मेदार हैं। तारों, ग्रहों तथा उपग्रहों की स्थितियों में परिवर्तन भी पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करता है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन को प्रमुख रूप से तीन कारक प्रभावित करते हैं।

1. धरातलीय भौतिक दशाओं में परिवर्तन

2. सौर मण्डलीय स्थितियों में परिवर्तन

3. भूर्भिक दशाओं में परिवर्तन 

          उपरोक्त प्रभावी कारको का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

1. धरातलीय भौतिक दशाओं में परिवर्तन:-

      पृथ्वी के धरातल पर भौतिक दशाओं में परिवर्तन के प्रमुख कारण धरातल पर बनने वाली विशालकाय नदी जल परियोजनायें, राजमार्ग तथा रेलमार्ग, विशाल औद्योगिक संस्थान, वनों का समाप्त होना, प्रदूषण की वृद्धि, अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि, नगरीकरण व औद्योगीकरण, जलचक्र एवं नाइट्रोजन चक्रों का विनाश आदि है।

       मनुष्य अपनी क्रियाओं से वातावरण को प्रभावित करता है। मनुष्य प्रकृति का अंग है और प्राकृतिक संतुलन के बिना मानव अस्तित्व खतरे में है। यही कारण है कि पृथ्वी में अनियंत्रित वनों की कटाई से उष्ण कटिबंधीय वर्षा में परिवर्तन हुये है। नगरीकरण व औद्योगीकरण ने हरित पेटी संकल्पना प्रायः समाप्त कर दी है। अतः इन क्षेत्रों में ध्वनि, वायु तथा जल प्रदूषणों ने वायुमण्डलीय गैसों में ऑक्सीजन की कमी तथा कार्बन डाईआक्साइड की अधिकता कर दी है।

      इसी प्रकार पृथ्वी की आन्तरिक सतह से सिंचाई हेतु अत्यधिक जल निकास से तथा वर्षा द्वारा जल के पुनः सतह पर एकत्र न होने से जल चक्र विनष्ट हो जाता है और जल का स्तर लगातार गिरता जाता है। बड़े पैमाने पर कीटनाशकों के प्रयोग से वायुमण्डलीय दशाओं में परिवर्तन आता है। पृथ्वी में इनका निर्धारित प्रयोग वायु संतुलन ही स्थापित कर सकता है। चरनोबिल तथा भोपाल दुर्घटनायें विकिरण के प्रभाव को स्पष्ट करती है। इन से स्पष्ट हो चुका है कि गैस तथा परमाणु संयंत्रों से कितना विनाश हो सकता है। पृथ्वी से प्रेरित परीक्षण हेतु उपग्रहों, रॉकेटों तथा वायुयानों के बढ़ते दबाव से भी वायुमण्डलीय दशाओं में अन्तर आता है।

      ये सभी धरातलीय परिवर्तन कम या अधिक मात्रा में जलवायु के विभिन्न कारकों को प्रभावित करते हैं।

जलवायु परिवर्तन2. भूगर्भिक दशाओं में परिवर्तन:-

        पृथ्वी की सतह तथा वायु मण्डलीय परिवर्तनों का प्रभाव आन्तरिक भागों में पड़ता है। ज्वालामुखी तथा भूकम्पों की संख्या में लगातार वृद्धि पृथ्वी के अन्दर होने वाले परिवर्तनों को सिद्ध करती है। अब तक प्राप्त ज्ञान के अनुसार ज्वालामुखी तथा भूकम्पीय दशाओं का प्रभाव प्रायः पृथ्वी की कमजोर पर्त वाले भागों में होता था। परन्तु अब अत्यन्त ठोस तथा स्थिर भूभागों में भी भूकम्प तथा ज्वालामुखी उद्गार देखने को मिलते हैं। जर्जिया का भूकम्प इसका नवीनतम उदाहरण है। पृथ्वी में होने वाली अपरदन निक्षेपण तथा समस्थिति परिवर्तन आदि कारकों के साथ-साथ विशाल जल परियोजनायें, परमाणु परीक्षणों तथा बड़े पैमाने पर होने वाली उत्खनन क्रियाओं के फलस्वरूप पृथ्वी के बाह्य तथा आन्तरिक भागों में संबंध परिवर्तित हो रहे हैं। इन परिवर्तनों से आन्तरिक क्रियायें तीव्र हो जाती है। आन्तरिक क्रियाओं से होने वाले उद्गार एवं झटके पृथ्वी की सतह पर वायु-ताप तथा जलवायु आदि दशाओं में परिवर्तन करते हैं।

जलवायु परिवर्तन

3. सौर मण्डलीय स्थिति में परिवर्तन:-

        तारों, ग्रहों, उपग्रहों, नीहारिकाओं, उल्काओं आदि के मध्य प्राकृतिक संतुलन पाया जाता है। इस संतुलन के पीछे सौरमण्डलीय निरक्षेप तथा सापेक्षिक गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। सौर परिवार के अन्तर्गत सूर्य धब्बों के प्रभाव से पृथ्वी पर औसत ताप बढ़ जाता है। इसी प्रकार ग्रहों के परिभ्रमण मार्ग में आने से सापेक्षिक आकर्षण बढ़ता है, इससे भी वायुदाब कम तथा तापीय असंतुलन बढ़ जाता है। चन्द्रमा में पाये जाने वाले धब्बों का प्रभाव भी पृथ्वी पर पड़ता है। वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हुआ है कि पृथ्वी की सूर्य तथा चन्द्रमा के सन्दर्भ में स्थिति से पृथ्वी पर तापीय असंतुलन बढ़ता है। खगोलशास्त्रीय अध्ययनों से सिद्ध हो चुका है कि सौर मण्डलीय प्रभावों से वायुमण्डलीय परतों में गैसीय अनुपात असंतुलित हो रहा है।

जलवायु परिवर्तन

निष्कर्ष:-

      निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि ओजोन परतों का पतला पड़ना, पृथ्वी में औसत तापमान का बढ़ना, हरित गृह प्रभाव में अनवरत वृद्धि, उष्णकटिबन्धीय वर्षा की मात्रा में स्थानिक एवं कालिक अन्तर, नगरीय तथा वनों की स्थितियों में परिवर्तन आदि पृथ्वी में जलवायु परिवर्तन के स्पष्ट संके है।

प्रश्न प्रारूप

1. जलवायु परिवर्तन के विभिन्न प्रमाणों का उल्लेख करें।


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14. Thermal Inversion / तापीय विलोमता

14. Thermal Inversion / तापीय विलोमता


तापीय विलोमता / प्रतिलोमन ⇒

       सामान्य तौर पर क्षोभमंडल मे नीचे से ऊपर की ओर जाने पर सामान्य ताप ह्रास का नियम लागू होता है। लेकिन जब सामान्य ताप ह्रास के बदले तापमान में वृद्धि होने लगती हो तो उसे तापीय विलोमलता (Thermal Inversion) कहते हैं। जलवायुवेताओं के अनुसार तापीय विलोमता क्षोभमंडल से सम्बंधित है। ये विलोमताएँ मौसमी परिस्थितियों को प्रभावित करते हैं।

Thermal Inversion

तापमान की विलोमता के लिए आदर्श दशाएँ:-

(i) शीतकालीन लम्बी रातें

(ii) स्वच्छ एवं मेघ रहित आकाश

(iii) शुष्क पवन

(iv) शान्त एवं स्थिर वायुमण्डल

(v) हिमाच्छादित धरातल

तापीय विलोमता (Thermal Inversion) का प्रकार

          तापीय विलोमता 5 प्रकार के होते हैं:-

(1) सतही तापीय विलोमता

        पर्वत और सँकरे घाटी प्रदेश में सतही तापीय विलोमाता पायी जाती है। स्वीटजरलैण्ड इसके लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसके अंतर्गत पर्वतीय चोटी सबसे पहले सूर्याताप प्राप्त करते हैं जिसके कारण उपरी भाग गरम हो जाता है जबकि घटियाँ 2½-3 घंटे बाद सूर्याताप प्राप्त करती है। यही कारण है कि चोटी पर तापमान अधिक और घाटियों का तापमान न्यून बना रह जाता है। फलतः सुबह में नीचे से ऊपर जाने पर तापमान घटने के बजाय तापमान बढ़ता चला जाता है।

(2) ऊपरी वायु की तापीय विलोमता

         ऊपरी वायु की तापीय विलोमता की स्थिति पछुवा वायु से संबंधित है। पछुवा वायु का उद्गगम उपोष्ण उच्च वायु क्षेत्र से होता है। पछुआ हवा एक गर्म वायु है जो निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर चलती है। उपध्रुवीय क्षेत्र में कोरियालिस प्रभाव के कारण पछुआ वायु को ऊप वायुमण्डल में प्रक्षेपित कर दिया जाता है। जबकि निचले घरातल पर ठंडे वायु का साम्राज्य बना रहता है। फलत: इन क्षेत्रों में बढ़ते हुए ऊँचाई के साथ तापमान में कमी आने के बजाय तापमान बढ़ने लगती है।

(3) नीचे गिरती हुई वायु से उत्पन्न विलोमता

            उपोषण उच्च भार वाले प्रदेश में कभी-2 गिरती हुई वायु के कारण तापीय विलोमता की स्थिति उत्पन्न होती है। उपोषण कटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र में वायु के आंतरिक दबाव के कारण हवा गर्म होकर ऊपर उठ जाती है। जिसके ऊपरी भाग में गर्म वायु का सम्राज्य हो जाता है जबकि ठीक उसके नीचे आंतरिक वायुदाब कम होने के कारण तापमान निम्न रह जाता है। फलत: तापीय विलोमता की स्थिति उत्पन्न होती है। सामान्य रूप से ये घटनायें 400-600 मी. की ऊँचाई पर सम्पन्न होता है।

(4) वाताग्र तापीय विलोमता

         मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में पछुआ हवा तथा ध्रुवीय हवा के मिलने से वाताग्र का निर्माण होता है। ध्रुवीय वायु ठंडी एवं भारी होती है जिसके कारण वायुमंडल के निचले सतह पर ध्रुवीय वायु होती है। जबकि पछुवा हवा गर्म एवं हल्की होती है जिसके कारण यह ध्रुवीय हवा के ऊपर चढ़ने की प्रवृत्ति रखती है। यही कारण है कि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (वाताग्र) वाले क्षेत्र के ऊपरी भाग में तापमान अधिक एवं निचले भाग में तापमान कम हो जाता है।

(5) विकिरण से उत्पन्न तापीय विलोमता

       पार्थिव विकिरण से भी विलोमता की स्थिति उत्पन्न होती है। पार्थिव विकिरण के कारण प्राय: सूर्यास्त के बाद पृथ्वी की सतह से तापीय विकिरण तेजी से होता है। सामान्यतः 90मी०-300मी० की ऊँचाई के बीच तापीय विकिरण से प्राप्त ऊष्मा का संग्रहण होता है। इस परिस्थितियों में सतह की तुलना में 90मी०-300मी० ऊँचाई के बीच अधिक तापमान होता है जबकि सतह का तापमान कम रहता है। इस तरह से उत्पन्न तापीय विलोमता को विकिरण तापीय विलोमता कहते हैं।

निष्कर्ष

            उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि तापीय विलोमता क्षोभमंडल की एक विशिष्ट विशेषता है। जिसके काण स्थानीय मौसमी वातावरण प्रभावित होते रहती है।


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15. वायुमण्डल का संगठन / Composition of The Atmosphere

15. वायुमण्डल का संगठन

(Composition of The Atmosphere)


वायुमण्डल⇒

वायुमण्डल का संगठन

         ठोस पृथ्वी के चारों ओर गैंसों का एक आवरण मिलता है जिसे वायुमण्डल (Atmosphere) कहते हैं। इसकी कई विशेषताएँ है। जैसे:-

(i) वायुमण्डल के ही अंतर्गत कई प्रकार के मौसमी एवं जलवायु सबंधित घटनाएं घटित होती है। हमारा वायुमण्डल गैस, जलवाष्प और धुलकण से निर्मित है। जलवाष्प की उपस्थिति के कारण मौसमी घटनायें घटित होती है।

(ii) हमारा वायुमंडल कई उपपेटियों में विभक्त है।

(iii) वायुमण्डल में प्रतिरोधात्मक क्षमता है।

(iv) गुरुत्वाकर्षण बल के कारण वायुमंडल पृथ्वी से चिपका हुआ है।

(v) वायुमण्डल में वायुदाब, वायुसंचरण, जलवायु परिवर्तन जैसे गुण पाये जाते हैं।

(vi) वायुमण्डल अपने आपको लगातार स्वच्छ बनाए रखता है।

वायुमण्डल का संगठन (Composition of the Atmosphere)

      हमारा वायुमण्डल मुख्यत: गैस, जलवाष्प और धुलकण से निर्मित है। वायुमण्डल को निर्मित करने वाले संघटन की चर्चा नीचे कर रहे हैं-

(1) गैस (Gases)- हमारा वायुमंडल कई प्रकार के गैसों से निर्मित हैं।

क्रम गैस सूत्र आयतन (% में)
1. नाइट्रोजन N2 78.03
2. ऑक्सीजन O2 20.95
3. आर्गन Ar 0.93
4. कार्बन डाई ऑक्साइड CO2 0.036
5. नियॉन Ne 0.002
6. हीलियम He 0.0005
7. क्रिप्टन Kr 0.001
8. जेनन Xe 0.00009
9. हाइड्रोजन H2 0.00005

       उपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि वायुमण्डल में नाइट्रोजन की मात्रा सर्वाधिक है। वायुमण्डल में यह दो कार्यों को सम्पन्न करता है-

(i) ऑक्सीकरण की क्रिया को मंद करता है या रोकता है।

(ii) नाइट्रोजन चक्र को संचालित करता है।

       हमारे वायुमण्डल में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण गैस ऑक्सीजन है जो ऑक्सीकरण तथा प्रज्वलन की क्रिया में मदद करता है। साथ ही जैविक श्वसन क्रिया का प्रमुख आधार है।

हमारे वायुमण्डल में तीसरा सबसे महत्वपूर्ण गैस अक्रिय गैसे हैं। जैसे- आर्गन, नियॉन

      सभी अक्रिय गैसों को मिलाने पर वायुमण्डल में इनकी मात्रा 1% है। इनमें भी सर्वाधिक आर्गन (0.93%) है। ये वायुमण्डल में अति अल्प मात्रा में मौजूद है। वायुमण्डल में रहकर यह कई प्रकार के रासायनिक पदार्थ को निष्क्रिय करती है।

      हमारे वायुमण्डल में ऑक्सीजन का एक अपरूप ओजोन (O3) के रूप में मौजूद है। यह गैस समताप मण्डल के ओजोन परत में पायी जाती है। यह सूर्य से आने वाली हानिकारक किरणों को शोखकर पृथ्वी को सुरक्षित करती है। इसलिए ओजन परत को “वायुमण्डल का छतरी” कहा जाता है।

      हमारे वायुमण्डल का अगला महत्वपूर्ण गैस ग्रीनहाउस गैसें हैं। इसके अंतर्गत CO2, CO, CFC, CH4 मिथेन जैसे गैसों को शामिल करते हैं। इनमें सिर्फ CO2 को छोड़कर शेष सभी गैस वायुमण्डल में प्रदूषक के रूप में मौजूद रहते हैं। CO2 गैस प्राकृतिक रुप से वायुमण्डल में मौजूद रहता है। CO2 गैस ही पार्थिव विकिरण को अवशोषित कर वायुमण्डल को गर्म बनाये रखता है। CO2 को “वायुमण्डल का कम्बल” भी कहा जाता है।

      अंतिम महत्वपूर्ण गैस हाइड्रोजन है जो जलवाष्प एवं जल के निर्माण में मदद करता है।

     सामान्यतः समुद्रतल से 80 Km की ऊँचाई तक गैस समान अनुपात में पाये जाते हैं लेकिन उसके बाद गैंसों का भिन्न-2 स्तर पाया जाता है। जैसे:-

      ऊँचाई               गैसों का स्तर

(i) 80 – 200 किमी०- N2 गैस के अणुओं का स्तर

(ii) 200 – 1100 किमी०- O2 गैस के परमाणु का स्तर

(iii) 1100 – 3500 किमी०- He गैस का स्तर

(iv) 3500 – 10000 किमी०- H2 परमाणु का स्तर

(2) जलवाष्प (Water Vapour)-

      जलवाष्प हमारे वायुमण्डल का दूसरा प्रमुख संघटक है। यह वायुमण्डल में 12 किमी० की ऊँचाई तक पायी जाती है। लेकिन 90% हिस्सा 8 किमी० की ऊँचाई तक ही मिलती है। कभी-2 वायु में चलने वाले संवहन तरंगों के कारण जलवाष्प को 50 किमी० की ऊँचाई तक पहुँचा दी जाती है।

    ये जलवाष्प ब्रह्माण्डीय धुल-कणों के साथ मिलकर विश्व में सबसे ऊँचाई पर मिलने वाले बादल निशा दीप्ति बादल का निर्माण करती है। वायुमण्डलीय जलवाष्प के कारण ही वर्षण क्रिया, बादल निर्माण क्रिया, कुहरा, कुहासा, ओस और आर्द्रण की क्रिया होती है। वायुमण्डल में जलवाष्प की आपूर्ति पृथ्वी के धरातल से ही वाष्पोत्सर्जन, वाष्पीकरण, उर्ध्वपातन (ठोस से गैस) की क्रिया द्वारा होता है।

(3) धुलकण (Dust Particle)-

       वायुमण्डल का तीसरा सबसे प्रमुख संघटक धूलकण है। वायुमण्डल में इसकी आपूर्ति दो स्थानों से होती है- ब्रह्माण्ड और पृथ्वी के धरातल से। ब्रह्मण्ड से मिलने वाले धुलकण को ब्रह्मण्डलीय धूलकण कहते हैं। ये धुलकण दूसरे ग्रह, उपग्रह से विखण्डित होकर पृथ्वी पर गिरने वाला पदार्थ है। कभी-2 इनके आकार इतनी बड़ी होती है कि पृथ्वी पर उल्का वृष्टि की घटना घटती है।

      पार्थिव धूलकण का मुख्य स्रोत धरातल है। ये परागण एवं हाइग्रोस्कोपिक (आर्द्रताग्राही) कण के रूप में मौजूद रहते हैं। वायुमण्डल में सर्वाधिक धुलकण की आपूर्ति समुद्र तटीय भागों से होती है। ये धूलकण वायुमंडल में जाकर जल की तुलना में पहले ठण्डी होने की प्रवृत्ति रखते हैं।

    इस कणों के इर्द-गिर्द आर्द्रता या जलवाष्प का संघनन होने लगता है जिससे जलबून्दों का निर्माण होने लगता है। सामान्य तौर पर वायुमण्डल में 12 Km की ऊँचाई तक धूलकण पाये जाते हैं लेकिन इसका अधिकांश भाग 5 किमी० की ऊँचाई तक मिलते हैं।

निष्कर्ष:

        सैद्धांतिक रूप से हमारा वायुमण्डल गैस, जलवाष्प और धूलकण से निर्मित है। लेकिन तीव्र औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, बढ़ती जनसंख्या इत्यादि के कारण कई प्रदूषक तत्व वायुमण्डल में छोड़े जा रहे हैं जिसके कारण वायु प्रदूषण, ओजोन क्षरण, ग्लोबल वार्मिंग, अम्ल वर्षा जैसी घटनायें घटित हो ही हैं। अत: आवश्यकता इस बात का है कि वायुमण्डल में मौजूद गैस, जलवाष्प एवं धुलकण के अनुपात को नियत बनाकर रखा जाय।



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3. कोपेन और थार्न्थवेट के जलवायु वर्गीकरण का तुलनात्मक अध्ययन

3. कोपेन और थार्न्थवेट के जलवायु वर्गीकरण का तुलनात्मक अध्ययन


कोपेन और थार्न्थवेट के जलवायु वर्गीकरण का तुलनात्मक अध्ययन⇒

समानताएँ:- 

(i) दोनों योजनाएँ अनुभवात्मक परीक्षण पर आधारित है।

(ii) दोनों ने तापमान और वर्षा को वायुमंडल की मूलभूत तत्व माना है जो जलवायु को नियंत्रित करती है। 

(iii) दोनों ने जलवायु-वनस्पति संबंध को महत्व दिया है।

(iv) दोनों ने जलवायु प्रदेश को दिखाने के लिए अंग्रेजी अक्षर का प्रयोग किया है।

(v) दोनों वर्गीकरण में उष्ण क्षेत्र की सीमाएँ समान होती हैं।

(vi) दोनों ने वर्गीकरण को कई बार प्रस्तुत किया।

जैसे- कोपेन ने 1900, 1918, 1931, 1936, 1953 में

थार्न्थवेट ने 1931, 1936, 1948, 1955 में

विषमताएँ:-

(i) कोपेन ने वनस्पति को जलवायु का समग्र रूप से व्यक्त करने वाला प्रत्यक्ष सूचक माना। यही कारण है कि कोपेन के वर्गीकरण में जलवायु प्रकारों की सीमाएँ एवं वनस्पति प्रकारों की सीमाएँ लगभग एक है। वहीं थार्न्थवेट ने वाष्पीकरण-वाष्पोत्सर्जन प्रभाविता को प्रत्यक्ष और वनस्पति को अप्रत्यक्ष रूप से वर्गीकरण का आधार माना।

(ii) कोपेन ने जहाँ किसी स्थान के तापमान और वर्षा के आंकिक मानों को लेकर वहाँ के जलवायु का निर्धारण किया है: वहीं थार्न्थवेट ने जटिल सूत्रों के माध्यम से वर्षा प्रभाविता तथा तापीय दक्षता का मान निकालकर किसी स्थान की जलवायु का निर्धारण किया।

(ii) जहाँ कोपेन ने मुख्य 6 जलवायु समूह को निर्धारित किया है, वहीं थार्न्थवेट ने 8 जलवायु समूह का निर्धारण किया है-

जैसे-

कोपेन का जलवायु समूह   थार्नथ्वेट का जलवायु समूह  
1. उष्ण   

2. उपोष्ण 

3. मध्य तापीय

4. सूक्ष्म तापीय 

5. ध्रुवीय

6. पर्वतीय 

1. अति आर्द्र

2. आर्द्र 

3. तर आर्द्र 

4. शुष्क उपार्द्र

5. अर्द्ध शुष्क 

6. शुष्क 

7. उप ध्रुवीय

8. ध्रुवीय 

(iv) कोपेन ने जहाँ जलवायु पर ऊँचाई के कारण पड़ने वाले प्रभाव को महत्व देते हुए उच्च भूमि की जलवायु को एक समूह माना वहीं थार्न्थवेट ने इस पर ध्यान नहीं दिया है।

(v) थार्न्थवेट ने एक मॉडल दिया जो कि उनके योजना द्वारा जलवायु प्रकारों में वर्गीकृत कर की गई। कोपेन ने ऐसा कोई मॉडल नहीं दिया।

(vi) कोपेन ने शुष्क क्षेत्र और शुष्क ध्रुवीय क्षेत्रों में स्पष्ट अंतर किया लेकिन थार्न्थवेट ने ऐसा नहीं किया लोकेन 1955 में इन्होंने भी इस कमी को दूर किया। 

(vii) कोपेन 1936 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “टैण्डबुक डर क्लाइमेटोलॉजी” के माध्यम से अपना वर्गीकण प्रस्तुत किया जबकि थार्न्थवेट एक अनुसंधान प्रपत्र के में अपनी योजना 1948 में “ज्योग्राफिकल रिव्यू” नामक पत्रिका में “एन एप्रोच टोवार्डस ए रेशनल क्लासीफिकेशन ऑफ क्लाइमेंट” में प्रस्तुत किया।

कोपेन और थार्न्थवेट के जल


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11. उष्ण एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का तुलनात्मक अध्ययन

11. उष्ण एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का तुलनात्मक अध्ययन


उष्ण एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का तुलनात्मक अध्ययन⇒

समानताएँ

(i) उष्ण कटिबंधीय एवं शीतोष्ण कटिबंधीय दोनों चक्रवातों में निम्न वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है।

(ii) दोनों चक्रवातों में हवा बाहर से केन्द्र की ओर आने की प्रवृत्ति रखती हैं।

(iii) दोनों चक्रवातों की स्थिति में परिवर्तन के फलस्वरूप बादल, वर्षण, आँधी-तूफान जैसी मौसमी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है।

(iv) दोनों चक्रवातों के केन्द्र में हवाएँ नीचे से ऊपर उठने की प्रवृति रखती है।

(V) दोनों चक्रवातो उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सुई के विपरीत दिशा (Anticlockwise) चलती है।

(vi) दोनों चक्रवात दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुई की दिशा के अनुरूप चलती है।

असमानताएँ

(i) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति दोनों गोलार्द्धों में 8º-20º अक्षांशों के बीच या उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में होती है, जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति दोनों गोलार्द्धों में मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों (30º-60° अक्षांश) में होती है।

(ii) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति हेतु सागर एवं स्थल का मिलन बिन्दु आदर्श परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है, जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति का मुख्य आधार उपध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र होता है, जहाँ ध्रुवीय एवं पछुवा वायु मिलने की प्रवृत्ति रखती हैं।

(iii) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति शीत ऋतु की अपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में अधिक होती है, जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति ग्रीष्म ऋतु की अपेक्षा शीत ऋतु में अधिक होती है।

(iv) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात का विस्तार अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र पर होता है जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात विस्तृ‌त क्षेत्र पर होता है।

(v) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात काफी विनाशकारी होती है क्योंकि इसमें काफी तेज हवा चलती है तथा मूसलाधार वर्षा होती है, जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात विनाशकारी नहीं होती है।

(vi) उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की संख्या तथा प्रभावित क्षेत्र शीतोष्ण चक्रवातों की तुलना में कम होते हैं।

(vii) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात में समदाब रेखाएँ गोलाकार, चक्राकार या अण्डाकार होती हैं, जबकि शीतोष्ण चक्रवात में समदाब रेखाएँ  प्राय: V आकार की होती है।

उष्ण एवं शीतोष्ण कटिबंधी

शीतोष्ण चक्रवात की विभिन्न अवस्थाओं का प्रतिरूप

(viii) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात में अति अल्प समय में तीव्र गति से वर्षा होती है, जबकि शीतोष्ण चक्रवात में अपेक्षाकृत अधिक समय तक धीरे-धीरे वर्षा होती है।

(ix) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के केन्द्र में चक्रवात का आँख बनता है, जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात में ऐसा नहीं होता।

(x) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात उष्ण होती है, जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात शीतोष्ण होती है।

(xi) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के दौरान वाताग्र का निर्माण नहीं  या नगण्य होता है, जबकि शीतोष्ण चक्रवात के दौरा वाताग्र का निर्माण होता है।

(xii) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात उत्तरी गोलार्द्ध में पूर्व से पश्चिम की ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ते हैं, जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात उत्तरी गोलार्द्ध में पश्चिम से पूर्व की ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ते हैं।

 


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10. शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात / Temperate Cyclone

10. शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात

(Temperate Cyclone)


शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात

         चक्रवात को आँग्ल भाषा में Cyclone कहते है। “Cyclone” शब्द यूनानी भाषा से लिया जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ है- सर्प की अँगूली। इस शब्द का प्रयोग जलवायु विज्ञान में प्रथम बार पिडिंगटन महोदय ने किया था। चक्रवात उस वायुमंडलीय परिस्थिति को कहते हैं जिनमें हवाएँ एक निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर घूमने की प्रवृति रखती है।

      चक्रवात में ज्यों ही किसी स्थान पर निम्न वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है त्यों ही उच्च वायुदाब केन्द्र से हवाएँ निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने लगती है। उच्च वायुदाब केन्द्र से आने वाली हवाओं का मुख्य उद्देश्य निम्न वायुदाब को समाप्त करना होता है। लेकिन निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने वाली हवाएँ पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आकार उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सुई के विपरीत दिशा (Anti Clock Wise) में और दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सूई की दिशा में घूमने लगती है।

प्रतिचक्रवात (Anti Cyclone)     

     चक्रवात का उल्टा प्रतिचक्रवात होता है। प्रतिचक्रवात के केन्द्र में एक उच्च दाब केन्द्र का निर्माण होता है और हवाएँ केन्द्र से बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। उत्तरी गोलार्द्ध में प्रतिचक्रवात (Clock wise) और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anti Clock wise घुमने की प्रवृति रखती हैं।

चक्रवात और प्रतिचक्रवात में अन्तर

(1) चक्रवात की स्थिति में निम्न वायुदाब केन्द्र और प्रतिचक्रवात की स्थिति में उच्च वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है।

(2) चक्रवात में हवा बाहर से केन्द्र की ओर आने की प्रवृति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में केन्द्र से बाहर की ओर जाने की प्रवृति रखती है।

(3) चक्रवात की स्थिति में परिवर्तन के फलस्वरूप बादल, वर्षण एवं तेज हवाएँ जैसी मौसमी परिस्थितियां उत्पन्न होती है। वहीं प्रतिचक्रवात की स्थिति में मौसम साफ होने की प्रवृति रखती है।

(4) चक्रवात के केन्द्र से हवाएँ नीचे से ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में हवाएँ ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृत्ति रखती है।

(5) जिस स्थान पर चक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। ठीक उसके ऊपर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है।         

  अतः स्पष्ट है कि चक्रवात एवं प्रतिचक्रवात जलवायु विज्ञान की दो अलग-2 धारणाएँ है।

चक्रवात का वर्गीकरण
       विशेषताओं एवं भौगोलिक स्थिति के आधार पर चक्रवात को दो भागों में बाँटते है-

(1) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात

(2) शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात

        मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले चक्रवात को शीतोष्ण चक्रवात कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति का मुख्य आधार उपध्रुवीय निम्न वायु भार का क्षेत्र होता है क्योंकि इस निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर ध्रुवीय वायु और पछुवा वायु चलने की प्रवृति रखती है। ध्रुवों की ओर से आने वाली वायु प्राय: ठण्डी, भारी, और शुष्क होती है। जबकि पछुआ हवा गर्म, हल्की और आर्द्रता से युक्त होती है। विपरीत दिशाओं से आने वाली तथा अलग-2 भौतिक विशेषता रखने वाली वायु जब आपस में मिलने का प्रयास करती है तो मिश्रण शीघ्र संभव नहीं हो पाता है। इन दो वायु के अग्र भाग मिलकर एक संक्रमण की स्थिति उत्पन्न करते हैं। संक्रमण का यह क्षेत्र ही वाताग्र (Front) कहलाता है।

    दूसरे शब्दों में ध्रुवीय हवा और पछुआ हवा के अग्र भाग आपस में मिलकर जिस संक्रमण पेटी का निर्माण करते हैं, उस पेटी को वाताग्र कहते है। इसकी चौड़ाई सामान्यतः 5-7 Km तक होती है। कभी-2 इसकी चौड़ाई 2-75 Km तक होती है। धरातल से इसकी ऊँचाई 1½- 2 Km तक होती है और लम्बाई 750 Km तक हो सकती हैं। वाताग्र धरातल के साथ एक निश्चित कोण पर झुका होता है।

ध्रुवीय हवा (ठंडी, शुष्क, भारी)

शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात

पछुआ हवा (गर्म, आर्द्र, हल्की)

वाताग्र (ल०- 750 किमी०, ऊँ०-1.5 किमी०, चौ०-5-7 किमी०)

           शीतोष्ण चक्रवात की उत्पत्ति प्रारंभ होना Fronto-genesis (वाताग्र जनन की अवस्था) कहलाता है। जबकि चक्रवात का अन्त/ विनाश Frontolisis (वाताग्र समापन की अवस्था) कहलाता है।

        वाताग्र निर्माण के बाद या संक्रमण स्थिति बनने के बाद वायु में चक्रीय प्रवाह की प्रक्रिया प्रारंभ होती हैं। इसका मुख्य कारण ठण्डी वायु का गर्म वायु राशि क्षेत्र में प्रवेश करना है। जब ठण्डी वायुराशि, गर्म वायुराशि के क्षेत्र में प्रवेश करती है तो ग्रहीय नियमों के अनुरूप प्रवाहित नहीं हो पाती हैं क्योंकि प्रवाहित वायु का लक्ष्य कोई अक्षांशीय निम्न बायुदाब की पेटी न होकर आस-पास की गर्म वायु का केन्द्र होता है।

     अत: प्रविष्ट करने वाली वायु गर्म वायु की दिशा में प्रवाहित होने लगती है और ठण्डी वायु अपना ग्रहीय प्रवाह को छोड़ देती है। प्रवाह का यह विचलन अंततः चक्रीय रूप धारण कर लेती है। इसे चित्र के माध्यम से भी समझा जा सकता है।

      कई मौसम वैज्ञानिकों ने शीतोष्ण चक्रवात की उत्पत्ति का अध्ययन किया है। इस संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य स्वीडीश मौसम वैज्ञानिक जैकोट्स और जर्केंस का है। इन्होंने चक्रवात उत्पत्ति के संबंध में ध्रुवीय वाताग्र सिद्धांत प्रस्तुत किया है। इस सिद्धांत के अनुसार शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति 6 अवस्थाओं में होती है:-

प्रथम अवस्था – प्रारंभिक अवस्था/ वाताग्र जनन की अवस्था

द्वितीय अवस्था – चक्रीय परिसंचरण की प्रारंभ की अवस्था

तृतीय अवस्था – उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था

चतुर्थ अवस्था – शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी होने की अवस्था

पाँचवा अवस्था – संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

छठा अवस्था – समापन की अवस्था

(1) प्रारंभिक अवस्था (Fronto genesis)/ वाताग्र जनन की अवस्था

       प्रारंभिक अवस्था में ध्रुवीय और पछुआ वायु का अग्र भाग मिलकर एक संक्रमण पेटी या स्थिर वाताग्र का निर्माण करती है जिसकी चौड़ाई 5-7 किमी०, ऊँचाई 1.5-2 किमी० और लम्बाई 750 किमी० या उससे अधिक होती है।

        स्थिर वाताग्र के निर्माण के लिए अति अनुकूल क्षेत्र उत्तरी अटलांटिक महासागर का मध्य अक्षांशीय क्षेत्र है। सामान्यत: वाताग्र का निर्माण उपध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र के सहारे होता है। लेकिन, स्थल और समुद्र के असमान वितरण के कारण वाताग्र सीधा न होकर लहरदार होता है या थोड़ा सा मुड़ा होता है। जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में समुद्री सतह के अधिकता के कारण लहरदार स्थिर वाताग्र का निर्माण नहीं होता।

(2) चक्रीय परिसंचरण की प्रारंभिक अवस्था

       इस अवस्था में ग्रहीय वायु (ध्रुवीय वायु) अपने मार्ग से विचलित होती है जिसके परिणामस्वरूप स्थिर वाताग्र का कुछ भाग दक्षिण की ओर अग्रसारित हो जाती है। जिस स्थान पर स्थिर वाताग्र ठण्डी / ध्रुवीय वायु के कारण जुड़ जाती है। उस भाग को शीत वाताग्र और शेष भाग को उष्ण वाताग्र कहते हैं। गर्म वाताग्र के सहारे मंद ढाल बनाते हुए गर्म वायु स्वतः ठंडी वायु के ऊपर उठने की प्रवृति रखती है। जबकि शीत वाताग्र में तीव्र ढाल के सहारे शीत वायु चक्रीय प्रवाह की प्रवृति खती है।

चित्र: शीत और उष्ण वाताग्र के निर्माण की अवस्था या चक्रीय परिसंचरण की अवस्था

(3) उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था
        इस अवस्था में ठण्डी वायु और भी अधिक निम्न अक्षांश की ओर खिसकते हुए चक्रीय प्रवाह लेने की प्रवृति रखती है जिसके कारण शीत वायु गर्म वायु के वृहत क्षेत्र में अपना प्रभाव स्थापित कर लेती है। इतना ही नहीं शीत वाताग्र के अग्रसारित हो जाने से पछुवा हवा का सम्पर्क अपने स्रोत क्षेत्र से खत्म हो जाता है जिसके कारण गर्म वायु एक खण्ड के रूप से बचा रह जाता है जिसे उष्ण खण्ड के नाम से जानते हैं।

चित्र: उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था

(4) शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी होने की अवस्था

       इस अवस्था में शीत वाताग्र और आगे बढ़ता है। इस अवस्था में शीत वाताग्र के लगातार आगे बढ़ने के कारण पछुवा हवा का सम्पर्क अपने स्रोत्र क्षेत्र से पूर्णतः कट जाता है। इतना ही नहीं बल्कि गर्म हवा एक संकरे प्रदेश में सिकुड़‌कर रह जाता है तथा शीत वाताग्र को पछुआ हवा और ठण्डी ध्रुवीय हवा दोनों मिलकर दबाव लगाना प्रारंभ कर देती है जिसके कारण शीत वाताग्र तेजी से अग्रसारित होने लगता है।

     दूसरी ओर जिस स्थान पर स्थिर वाताग्र मुड़ा था उस स्थान पर शीत सीमाग्र और गर्म सीमाग्र के मिलने से आवर्त की स्थिति उत्पन्न होती है। इस अपर्त के चारों ओर गर्म एवं ठण्डी वायु का मिश्रित चक्रीय प्रवाह देखने को मिलता है।

चित्र: शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी की अवस्था

(5) संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

            इस अवस्था में शीत वाताग्र और उष्ण वाताग्र आपस में मिलने की प्रवृति रखती है। लेकिन मिलने की प्रक्रिया वाताग्र के केन्द्र से शुरू होती है। गर्म वाताग्र और शीत वाताग्र मिलकर संरोध वाताग्र (Occluded front) का निर्माण करती है। संरोध वाताग्र एक ऐसा वाताग्र है जिसमें उष्ण एवं शीत दोनों प्रकार की वायु पायी जाती हैं। संरोध वाताग्र दो प्रकार का होता है:-

(i) शीत संरोध वाताग्र

(ii) गर्म संरोध वाताग्र

        शीत संरोध वाताग्र वह स्थिति है जिसमें गर्म वाताग्र समाप्त हो जाता है और शीत वाताग्र गर्म वाताग्र के आगे अवस्थित ठण्डी वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट कर जाती है।

चित्र: संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

उष्ण संरोध वाताग्र वह हैं जहाँ पर वाताग्र का प्रभाव क्षेत्र वाताग्र के केन्द्र प्रभाव में एक छोटे से केन्द्र में रह जाता है।

(6) समापन की अवस्था (Frontolisis)

         समापन की अवस्था को Frontolisis की अवस्था भी कहते हैं। इस अवस्था में उष्ण वाताग्र एवं शीत वाताग्र आपस में पूर्णतः मिल जाते हैं। ध्रुवीय वायु और पछुवा हवा पृथ्वी की घुर्णन गति के प्रभाव में आकर ग्रहीय मार्ग अपना लेती है और चक्रवात की समाप्ति हो जाती है।

 

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की मौसमी दशाएँ एवं वाताग्र के प्रकार

       शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात में विभिन्न प्रकार के मौसमी दशाओं का विवेचना निर्मित होने वाले चारों वाताग्र के आधार पर करते हैं। प्रत्येक वाताग्र की अलग-2 विशेषताएँ होती हैं। मौसमी विशेषताओं के आधार पर ही वाताग्र को चार भागों में बाँटते हैं।

(1) स्थिर वाताग्र (Stationary Front)

(2) उष्ण वाताग्र (Warm Front)

(3) शीत वाताग्र (Cold Front)

(4) संरोध/अधिविष्ट वाताग्र (Occluded Front)

(1) स्थिर वाताग्र

      शीतोष्ण चक्रवात उत्पन्न होने के पहले आसमान साफ होता है। ध्रुवीय और पछुआ वायु अपने-2 प्रचलित मार्ग से चलने की प्रवृति रखते हैं। ज्यों ही पछुआ वायु और ध्रुवीय वायु एक-दूसरे के विपरीत दिशाओं से आकर मिलती है तो स्थिर वाताग्र का निर्माण करती है। स्थिर वाताग्र में वायु स्थिर रहती है। वर्षा नहीं होती है। लेकिन आसमान धुंधला होने लगता है।

(2) उष्ण वाताग्र

        उष्ण वाताग्र की स्थिति में भी वायु स्थिर बनी रहती है क्योंकि गर्म पछुवा वायु ठण्डी ध्रुवीय वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट करने का प्रयास करती है। लेकिन गर्म वायु प्रविष्ट नहीं कर पाती है। फलत: गर्म वायु मंद ढाल के सहारे ठण्डी वायु के ऊपर धीरे-2 चढ़ने की प्रवृ‌त्ति रखती है जिससे बहुस्तरीय बादलों का निर्माण होता है। जैसे:- उपर से नीचे आने पर क्रमशः Cirrus, Cirro stratus, Alto stratus और Cumulus नामक बादल का निर्माण करती है। इस प्रकार के बादलों से धीरे-धीरे लम्बी अवधि तक वर्षण का कार्य होती है। वर्षा का प्रभाव क्षेत्र भी विस्तृत होता है।

(3) शीत वाताग्र (Cold front)

         शीत वाताग्र की स्थिति में ठण्डी वायुराशि गर्म वायुराशि के क्षेत्र में प्रविष्ट करती है जिसके कारण वाताग्र तीव्र ढाल का निर्माण करती है। तीव्र ढाल के सहारे गर्म वायु राशि उपर उठकर संतृप्त हो जाती है और ऊपर से नीचे क्रमशः तीन प्रकार के बादलों का निर्माण करती है। जैसे-

(i) स्तरी बादल (Cirro Stratus)

(ii) कपासी वर्षी बादल (Cumulo Nimbus)

(iii) वर्षा स्तरी बादल (Nimbo Stratus)

         शीत वाताग्र वाले क्षेत्र में अति अल्प समय में भारी वर्षा रिकॉर्ड किया जाता है। शीत वाताग्र का प्रभाव क्षेत्र काफी छोटे क्षेत्रों में होता है। जबकि उस स्थान से शीत वाताग्र गुजर जाता है तो अचानक वर्षा रुक जाती है। शीतलहरी चलने लगती है। तापमान में भारी गिरावट आती है। वायुदाब बढ़ जाती है औ मौसम कष्टकर हो जाता है।

(4) संरोध/अधिविष्ट वाताग्र (Occluded Front)

      संरोध वाताग्र में कई प्रकार के बादलों का निर्माण होता है। लेकिन इसमें वर्षा तीव्र होती है। संरोध के कारण शीतोष्ण चक्रवात में अंतिम रूप से वर्षा होती है। जब उष्ण वाताग्र और शीत वाताग्र पूर्णतः आपस में मिलते हैं तो उष्ण खण्ड भी समाप्त हो जाता है। ध्रुवीय वायु और पछुआ वायु पुन: ग्रहीय मार्ग को अपना लेते हैं। आकाश साफ हो जाता है।

      ध्रुवीय वायु और पछुआ वायु अपने-2 क्षेत्र में रहकर उप-ध्रुवीय भागों में कोरियालिस प्रभाव के कारण ऊपर उठने लगती है। जिससे मौसम पूर्णतः सामान्य हो जाता है। पुनः जब ध्रुवीय वायु पछुवा वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट होने का प्रयास करती है तो पुन: नई चक्रवात का निर्माण प्रारंभ होता है।

शीतोष्ण चक्रवात का वितरण

              शीतोष्ण चक्रवात का प्रभाव क्षेत्र सामन्यत: 45º से 65° अक्षांश के बीच दोनों गोलार्द्धों में होता है। शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का प्रभाव क्षेत्र हजारों किमी० तक हो सकता है।:-

(1) उत्तरी अटलांटिक महासागर और पश्चिमी यूरोप शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात के सबसे अनुकूल क्षेत्र हैं। प० यूरोप में शीतोष्ण चक्रवात के कारण ही सालों भर वर्षा होती है।

(2) शीतोष्ण चक्रवात का दूसरा सबसे प्रमुख क्षेत्र उत्तरी प्रशान्त महासागर में स्थित है। इस क्षेत्र में चक्रवात का प्रभाव क्षेत्र बेरिंग सागर, ओखोटस्क सागर से लेकर कनाडा के प० तट तक होता है।

(3) शीतोष्ण चक्रवात का तीसरा प्रमुख क्षेत्र न्यू फाउंडलैण्ड (कनाडा) और उसके आसपास का क्षेत्र होता है।

(4) भूमध्य सागर के ऊपर भी शीत ऋतु में शीतोष्ण चक्रवात का निर्माण होता है। इसके कारण तुर्की, ईरान, इराक, अफगानिस्तान और उ०-प० भारत में चक्रवातीय वर्षा होती है।

       दक्षिणी गोलार्द्ध में सागरीय स्थिति अधिक होने के कारण शीतोष्ण चक्रवात का निर्माण लगभग नगण्य होता है। द० गोलार्द्ध में मात्र चिली के दक्षिणी भाग में छोटी शीतोष्ण चक्रवात उत्पन्न होता है जिससे वर्षण का कार्य होता है।


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9. चक्रवात, प्रतिचक्रवात और उष्ण कटिबंधीय चक्रवात

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चक्रवात (Cyclone)

      चक्रवात को आँग्ल भाषा में Cyclone कहते है। “Cyclone” शब्द यूनानी भाषा से लिया गया है। जिसका शाब्दिक अर्थ है- सर्प की कुंडली। इस शब्द का प्रयोग जलवायु विज्ञान में प्रथम बार पिडिंगटन महोदय ने किया था।

      चक्रवात उस वायुमण्डलीय परिस्थिति को कहते हैं जिसमें हवाएँ एक निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर घूमने की प्रवृत्ति रखती है। चक्रवात में ज्यों ही किसी स्थान पर निम्न वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है त्यों ही उच्च वायुदाब केन्द्र से हवाएँ निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने लगती है। उच्च वायुदाब केन्द्र से आने वाली हवाओं का मुख्य उद्देश्य निम्न वायुदाब केन्द्र को समाप्त करना होता है। लेकिन निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने वाली हवाएँ पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आकार उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सूई के विपरीत (Anticlock wise) और दक्षिण गोलार्द्ध में घड़ी की सुई की दिशा (Clock wise) में घुमने लगती हैं।

प्रतिचक्रवात (Anti Cyclone)

     चक्रवात का उल्टा प्रतिचक्रवात होता है। प्रतिचक्रवात के केन्द्र में एक अपना वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता और हवाएँ केन्द्र से बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। उत्तरी गोलार्द्ध में प्रतिचक्रवात Clock wise और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anticlock wise घुमने की प्रवृति रखती है।

चक्रवात और प्रतिचक्रवात में अंतर

1. चक्रवात की स्थिति में निम्न वायुदाब केन्द्र और प्रतिचक्रवात की स्थिति में उच्च वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है।

2. चक्रवात में हवा बाहर से केन्द्र की ओर आने की प्रवृत्ति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में केन्द्र से बाहर की ओर जाने की प्रवृत्ति रखती है।

3. चक्रवात की स्थिति में परिवर्तन के फलस्वरूप बादल, वर्षण एवं तेज हवाएं जैसी मौसमी परिस्थतियाँ उत्पन्न होती हैं। वहीं प्रतिचक्रवात की स्थिति में मौसम साफ होने की प्रवृति रखती है।

4. चक्रवात के केन्द्र में हवाएँ नीचे से ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में हवाएँ ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृति रखती है।

5. जिस स्थान पर चक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। ठीक उसके ऊपर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। अत: स्पष्ट है कि चक्रवात और प्रतिचक्रवात जलवायु विज्ञान की दो अलग-2 धारणाएँ है।

चक्रवात का वर्गीकरण

     विशेषताओं एवं भौगोलिक स्थिति के आधार प चक्रवात को दो भागों में बाँटते हैं:-

(1) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclone)

(2) शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cylone)

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclone)- 

     पृथ्वी के दोनों गोलार्द्धों में 8º से 20° अक्षांशों के बीच या उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में किसी निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर तेज गति से घुमते हुए वायु से उत्पन्न मौसमी परिस्थितियों को उष्ण कटिबंधीय चक्रवात कहते हैं।

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात की विशेषताएँ

(1) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति तथा विकास सागरीय सतह से प्राय: प्रारंभ होती है। इसकी उत्पत्ति हेतु सागर एवं स्थल का मिलन बिन्दु आदर्श परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं।

(2) इसमें एक निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर हवाएँ घूमती है।

(3) इसमें वायु की औसत गति 100 Km/h होती है।

(4) इसमें समदाब रेखाएँ प्रायः गोलाकार होती है।

(5) इसमें दाब प्रवणता तीव्र होती है।

(6) चक्रवात की तीव्रता दाब प्रवणता पर निर्भर करती है। जब दाब प्रवणता कम होती है तो वायुमण्डलीय अवदाब का निर्माण होता है।

(7) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात का विस्तार अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र पर होता है।

(8) प्राय: उष्ण कटिबंधीय चक्रवात पूरब से पश्चिम दिशा की ओर गमन करता है।

(9) इसमें अति अल्प समय में तीव्र गति से एवं अधिक मात्रा में वर्षा होती है।

(10) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के केन्द्र को चक्रवात का आँख (चक्षु) कहा जाता है।

(11) यह शीत ऋतु की उपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में अधिक उत्पन्न होता है।

(12) चक्रवात में गर्म एवं आर्द्र हवाएँ ऊपर की ओर उठकर संघनन क्रिया के माध्यम से बादल का निर्माण करती है। संघनन क्रिया के द्वारा परित्यक्त गुप्त उष्मा के द्वारा चक्रवात शक्ति ग्रहण करता है।

(13) यह समुद्र से आर्द्रता को स्थल की ओर लाने में मदद करता है।

(14) चक्रवात के कारण बड़े पैमाने पर जान एवं माल की हानि होती है।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति

    उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्नि दोनों गोलार्द्ध में 8º से 20° अक्षांश के बीच होता है। लेकिन इन्हीं अक्षांशों के बीच द० अटलांटिक महासागर में चक्रवात उत्पन्न नहीं होता है क्योंकि इस क्षेत्र में चक्रवात उत्पन्न करने हेतु स्थलीय भूभाग का अभाव है।

          8º से 20° अक्षांश के बीच दोनों गोलार्द्धों में तापीय विषुवत रेखा के सहारे दोनों गोलार्द्धों से आने वाली वाणिज्यिक हवा आपस में मिलती है। जब दोनों गोलार्द्धों से आने वाली वाणिज्यिक हवा का तापमान एक समान होता है तो वैसी परिस्थिति में आपस में केवल मिलने की प्रवृति रखते हैं अर्थात् चक्रवात की आँख का विकास नहीं होता है।

         8º से 20° अक्षांश के बीच जल एवं स्थल का वितरण काफी अनियमित है। वाणिज्यिक हवाएँ जब स्थलीय भाग से गुजरती हैं तो उसे स्थलीय वायु राशि और समुद्र के ऊपर से गुजरने वाली हवा को समुद्री वायुराशि कहते हैं। जिन स्थानों पर स्थलीय वायुराशि और समुद्री वायुराशि मिलती है वहाँ पर बला आघूर्ण के कारण हवाएँ घुमने लगती हैं और चक्रवात को जन्म देती हैं।

     समुद्री वायुराशि काफी गर्म एवं आर्द्रता से युक्त होती है। जिससे स्वत: समुद्री सतह पर निम्न वायुदाब केन्द्र का विकास होता है। जबकि इसके तुलना में स्थलीय भाग पर उच्च वायुदाब केन्द्र का विकास होता है।

    तटीय भागों में स्थलीय एवं समुद्री वायुराशि प्राय: मिलने की प्रवृत्ति रखते हैं। प्रारंभ में वाताग्र की स्थिति उत्पन्न करते हैं। लेकिन बला आघुर्ण के कारण वाताग्र ही चक्रवात के आँख के रूप में तब्दील कर जाता है। फलत: उच्च वायुदाब क्षेत्र से आने वाली हवाएँ आँख को समाप्त करने के लिए दौड़ पड़ती है। लेकिन आँख के केंद्र में पहुँचने के पहले ही हवाएं पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आ जाती है और ऊपर की ओर प्रक्षेपित कर दिए जाते है।

     उष्ण एवं आर्द्र हवाएँ उपर जाकर संघनित होती है। जिससे वर्षण का कार्य प्रारंभ हो जाता है। सम्पूर्ण उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति को नीचे के मानचित्र से समझा जा सकता है।

प्रतिचक्रवात

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की लम्बवत संरचना

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात की संरचना

      उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की संरचना चक्रीय होती है। जववायु विज्ञानवेताओं ने इसकी संरचना का अध्ययन क्षैतिज एवं लम्बवत रूप से करते हैं।

(A) क्षैतिज अध्ययन/ संरचना

      क्षैतिज रूप से उष्ण कटिबंधीय चक्रवात कई वलय में विभक्त होता है। सामान्य रूप से एक विकसित उष्ण कटिबंधीय चक्रवात में कुल 6 रिंग होते हैं। जैसे-

प्रथम रिंग (वलय)⇒

    यह चक्रवात का केन्द्र बिन्दु होता है। इसे चक्रवात की आँख कहते हैं। इसका व्यास 5 से 50 Km तक हो सकता है। आकार में यह लगभग वृत के समान होता है। वायुदाब अति न्यून होता है। वायु गर्म होकर ऊपर जाने की प्रवृत्ति रखती है। ठीक इसके ऊपर बादल का निर्माण नहीं होता है क्योंकि उष्ण एवं आर्द्र वायु जब गर्म होकर ऊपर उठती है तो केन्द्र के मध्य भाग में ठंडी एवं शुष्क व नीचे की ओर बैठने की प्रवृत्ति रखती है।

द्वितीय रिंग⇒

      यह चक्रवात के चारों ओर स्थित होता है। इसे आँख की दीवाल (Eye Wal) कहते हैं। इसकी चौड़ाई 10 से 20 Km तक होता है। इस रिंग में हवा तेजी से ऊपर की ओर उठती है और आकाश में Cumulo nimbus cloud का निर्माण करती है और इस द्वितीय रिंग में भारी वर्षा होती है।

तृतीय रिंग⇒

    इसे स्पाइरल बैण्ड या वर्षा बैण्ड कहा जाता है। द्वतीय रिंग में गरज के साथ भारी वर्षा होती है।

चौथा रिंग⇒

     इसे Annular Band कहते हैं। चौथा रिंग में सघन बादल छाये रहते हैं। लेकिन वर्षा बहुत कम होती है। इस रिंग में तापमान उच्च और आर्द्रता निम्न होती है।

पांचवां रिंग⇒

     इसे Outer Convective Band कहते हैं। इसमें बादल बहुत कम पाये जाते है। वर्षा नगण्य होती है।

छठा रिंग⇒

     यह उष्ण चक्रवात का सबसे बाहरी हिस्सा है। इस रिंग में ह‌वाएँ क्षैतिज रूप से केन्द्र की ओर चलती है। लेकिन इसमें अन्य मौसमी परिस्थितियाँ सामान्य रहती है। छठा रिंग को Outer Band कहते हैं।

1. चक्रवात का आंख (Eye of Cyclone) – अति न्यून वायुदाब

2. चक्रवात का दीवाल (Eye Wall)- क्यूम्लो निम्बस बादल का निर्माण तथा भारी वर्षा

3. वर्षा बैण्ड (Rain Band)- गरज के साथ भारी वर्षा

4. एनुलर बैण्ड (Annular Band)- सघन बादल

5. Outer Convective Band- बहुत कम बादल, नगण्य वर्षा

6. Outer Band- उष्ण चक्रवात का बाहरी हिस्सा

(B) लम्बवत संरचना

    मौसम वैज्ञानिकों ने लम्बवत रूप से उष्ण कटिबंधीय चक्रवात को तीन परत में विभक्त करते हैं-

I. In-flow layer⇒

    यह चक्रवात का सबसे निचली परत है। इसकी मोटाई घरातल से 3Km ऊँचाई तक होता है। इसमें हवाएँ क्षैतिज रूप से चक्रवात के आँख की ओर अग्रसारित होती है।

II. Middle layer⇒

     यह चक्रवात का सबसे प्रमुख हिस्सा है। इसकी मोटाई 3 से 7 Km तक होती है। इसमें हवाएँ ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है। साथ ही चक्रीय रूप से घुमते हुए चक्रवात के केन्द्र तक पहुँचने का प्रयास करती है।

III. Out flow layer⇒

    यह चक्रवात का सबसे ऊपरी परत है। इसका विस्तार 7 km से ऊपर होता है। इस Layer के मध्य में उच्च वायुदाब केन्द्र होता है तथा हवाएं बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। दूसरे शब्दों में इस Layer में प्रतिचक्रवात की स्थिति होती है।

प्रतिचक्रवात

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की लम्बवत संरचना

उष्णकटिबंधीय चक्रवात का वर्गीकरण एवं वितरण

   चक्रवात में चलने वाले वायु की गति या चक्रवात की तीव्रता के आधार पर उष्ण कटिबंधीय चक्रवात को तीन वर्गो में बाँटते हैं:-

(1) चक्रवाती अवसाद या चक्रवाती विमोक्ष (Tropical Dipression)

     इसमें चलने वाली वायु की गति 17 m/s या 62 km/h होती है। इसमें निम्न वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है। लेकिन पूर्ण रूप से चक्रवात की आँख तथा Eye Wall (आँख की दीवाल) का विकास नहीं होता।

(2) विकसित चक्रवात-

     वैसी चक्रवात जिसमें घूमने वाले वायु की गति 17 m/s से 33 m/s (62 km/h-117 km/h) तक होती है। इसमें निम्न वायुदाब केन्द्र के साथ-2 चक्रवात की आँख का भी विकास होता है। लेकिन, Eye Wall का निर्माण नहीं होता।

(3) क्षेत्रीय चक्रवात/ अति विकसित चक्रवात-

     ऐसे चक्रवात में वायु की गति 33 m/s या 117 km/h से अधिक होता है। हरिकेन, टोरनेडो, जल स्तम्भ (water spont), विली बिली आदि इसके उदाहरण है। साफिर एवं सिम्पसन महोदय ने विध्वंस को आधार मानते हुए इस चक्रवात को 5 श्रेणियों में विभक्त किया है-

श्रेणी   हवा की गति

श्रेणी-I 74 से 95 mile/h

श्रेणी -II 96 से 110 mile/h

श्रेणी -III 111 से 130 mile/h

श्रेणी -IV 131 से 155 mile/h

श्रेणी -V 155 mile/h से अधिक

      साफिर एवं सिम्पसन ने बताया कि श्रेणी-III से ऊपर वाले चक्रवात विध्वंसक होना प्रारंभ हो जाते हैं। इसलिए अलग-2 श्रेणियों के चक्रवातों का नामांकरण अलग-2 किया जाता है। जैसे:- 2005 ई० में USA में आया हरिकेन श्रेणी-IV के समतुल्य चक्रवात था इसलिए उसका नाम डेनिश रखा गया था। अमेरिका में ही 2006 ई० में आया चक्रवात श्रेणी-V के समतुल्य था जिसका नाम कैटरीना रखा गया था। बंगाल की खाड़ी में 2007 में आया चक्रवात श्रेणी-III का था जिसका नाम सिद्ध रखा गया था।

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात का वितरण

     उष्ण कटिबंधीय चक्रवात दोनों गोलार्द्धों में 8º से 20º अक्षांशों के बीच उत्पन्न होते हैं। लेकिन इन्हीं अक्षांशों के मध्य दक्षिणी अटलांटिक महासागर में चक्रवात उत्पन्न नहीं होता। पूरे विश्व में उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के 6 प्रमुख और दो विशिष्ट क्षेत्र हैं-

(A) प्रमुख क्षेत्र

(1) मैक्सिको की खाड़ी और उसके तटवर्ती क्षेत्र-

    यहाँ उष्ण कटिबंधीय चक्रवात को हरिकेन से सम्बोधित करते हैं। जून से अक्टूबर के मध्य उत्पन्न होता है। यह कैरेबियाई द्वीप एवं सागरीय क्षेत्र से उत्पन्न होकर मैक्सिको और दक्षिणी USA की ओर अग्रसारित होता है।

(2) दक्षिणी चीन सागर-

     जापान के तटीय क्षेत्र और फिलिपीन्स के आसपास भी उष्ण कटिबंधीय चक्रवात उत्पन्न होता है। जापान में इसे टाइ‌कून और फिलिपीन्स में बाग्यो कहते हैं। जुलाई से अक्टूबर के बीच चक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है।

(3) फिजी द्वीप के आस-पास-

     इसे यहाँ चक्रवात कहा जाता है जो मार्च के महीने में उत्पन्न होता है।

(4) मध्यवर्ती अमेरिका के पश्चिमी तटीय क्षेत्र-

   यहाँ भी इसे हरिकेन ही कहते हैं लेकिन मैक्सिकों की खाड़ी में उत्पन्न होने वाली हरिकेन की तुलना में इसकी तीव्रता कम होती है।

(5) दक्षिण हिन्द महासागर में ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी-पश्चिमी भाग-

     यहाँ उष्ण कटिबंधीय चक्रवात को बिली-विली कहते हैं।

(6) बंगाल की खाड़ी और अब सागर-

   इन दोनों सागरों के बीच भारतीय उपमहाद्वीप स्थित है। यहाँ उष्ण कटिबंधीय चक्रवात एक वर्ष में तीन बार आती है।

     प्रथम मानसून प्रारंभ होने के पूर्व आती है जिसे बंगाल में काल वैशाखी, बिहार में अंधड़ और उत्तर पश्चिम भारत में (पंजाब-हरियाणा) तूफान कहा जाता है।

      दूसरा चक्रवात मानसून के दौरान उत्पन्न होती है। इसी चक्रवात के कारण भारत के आंतरिक भागों में मानसूनी वर्षा होती है।

      तीसरा चक्रवात मानसून के बाद उत्पन्न होती है। इन चक्रवात का सर्वाधिक प्रभाव कोरोमण्डल तटवर्ती क्षेत्रों (तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश) में अधिक होती है।

(B) विशिष्ट क्षेत्र

(1) USA के दक्षिणी भाग⇒

     यहाँ उत्पन्न होने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवात को टॉरनेडो कहते हैं। इसका आकार कीप के समान होता है। इसमें चलने वाली वायु की गति 180 Km/h तक होती है। इसके नीचे में व्यास कम और ऊपरी भाग में व्यास अधिक होता है। यह एक ऐसा उष्ण कटिबंधीय चक्रवात् है जिसका आँख का विकास महाद्वीपों के ऊपर होता है।

    यह चक्रवात इतना शक्तिशाली होता है कि वाणिज्यिक हवा और पछुवा हवा की दिशा को मोड़ देता है। यह टॉरनेडो विश्व का सबसे विध्वंसक चक्रवात है। यह मिसीसीपी, मिसौरी घाटी या अमेरिका के महान मैदान में उत्पन्न होने वाला चक्रवात है।

(2) दक्षिणी जापान सागर⇒

       इस सागर के ऊपर भी एक विशिष्ट उष्ण कटिबंधीय चक्रवात उत्पन्न होता है जिसे Water Spont (जल स्तम्भ) कहते हैं। इसका केन्द्र का विकास सागरीय सतह पर होता है क्योंकि क्यूरोशियो गर्म जलधारा का तापमान 28 से 29ºC तक पहुँच जाता है। इसमें वायु इतनी तीव्र गति से घूमती है कि समुद्री जल भी चक्रवात के साथ घुमने लगते हैं और आसमान में जल प्रक्षेपित कर दिये जाते हैं। जल के साथ-2 समुद्री जीव-जन्तु छोटे मछली इत्यादि भी आसमान में प्रक्षेपित हो जाते हैं। कालान्तर में यही जीव-जन्तु एवं छोटी मछलियाँ वर्षा के साथ धरातल पर गिर पड़ते हैं।

निष्कर्ष:

      इस तरह उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार के चक्रवात उत्पन्न होते है जिसके कारण मौसमी परिस्थियाँ प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाती है।


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