15. Trend and Problems of Urbanization / नगरीकरण की प्रवृति एवं समस्याएँ
15. Trend and Problems of Urbanization
(नगरीकरण की प्रवृति एवं समस्याएँ)
Q. नगरीकरण से आप क्या समझते है? नगरीकरण से संबंधित समस्याओं की चर्चा करें।
नगरीकरण एक प्रक्रिया है जिसके तहत कोई भी ग्रामीण बस्ती धीरे-2 नगरीय बस्ती में बदलती हैं। दूसरे शब्दों में वह कोई भी अधिवासीय बस्ती जहाँ की जनसंख्या प्राथमिक कार्यों को छोड़ती है और लगातार द्वितीयक एवं तृतीयक गतिविधियों में संलग्न होने लगती है तो इस प्रक्रिया को भी नगरीकरण से संबोधित करने लगते हैं। कुछ भूगोलवेताओं का यह भी कहना है कि “नगरों के बढ़ रहे आकार या बढ़ रहे नगरीय जनसंख्या को भी नगरीकरण कहा जाता है। वर्तमान समय में यही परिभाषा सर्वाधिक मान्यता रखता है।
21वीं शताब्दी को नगरीकरण की शताब्दी कहा जाता है क्योंकि आज विश्व की आधी से अधिक जनसंख्या नगरों में निवास कर रही है। इस संदर्भ में विश्व की करीब 57% जनसंख्या नगरों में रहती है।
वैश्विक स्तर पर नगरीकरण की औसत वार्षिक वृद्धि दर लगभग 1.5-2% मानी जाती है जो नगरीय विस्फोट का प्रतीक है। विकसित देशों में नगरीकरण की प्रक्रिया लगभग शिथिल है। जबकि विकासशील देशों में नगरीकरण की प्रक्रिया दर तीव्र है।
विश्व में नगरीकरण की वर्तमान प्रवृत्ति
1. तीव्र शहरी वृद्धि:-
- संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट (World Urbanization Prospects, 2022) के अनुसार, वर्तमान में विश्व की लगभग 57% जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में निवास करती है।
- अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या 68% से अधिक हो जाएगी।
2. विकसित देशों में संतृप्ति:-
- यूरोप, उत्तर अमेरिका और जापान जैसे देशों में नगरीकरण का स्तर पहले से ही 75-85% तक पहुँच चुका है।
- यहाँ नगरीकरण स्थिर है, लेकिन शहरी जीवन-शैली में तकनीकी व सांस्कृतिक परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं।
3. विकासशील देशों में तीव्र नगरीकरण:-
- एशिया और अफ्रीका में नगरीकरण की गति अत्यधिक तेज है।
- भारत, चीन, नाइजीरिया और इंडोनेशिया जैसे देशों में प्रतिवर्ष करोड़ों लोग गाँवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
- 2050 तक केवल भारत और नाइजीरिया मिलकर विश्व की शहरी जनसंख्या वृद्धि का लगभग 35% योगदान देंगे।
4. मेगासिटीज़ का उभार:-
- विश्व में 10 मिलियन (एक करोड़) से अधिक जनसंख्या वाले नगरों की संख्या 2022 में लगभग 33 थी, जो 2035 तक 45 से अधिक हो जाएगी।
- टोक्यो, दिल्ली, शंघाई, साओ पाउलो, मेक्सिको सिटी जैसे नगर इस श्रेणी में आते हैं।
5. प्रवास (Migration) की भूमिका:-
- ग्रामीण-शहरी पलायन नगरीकरण का मुख्य आधार है।
- आर्थिक अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य व जीवन-स्तर की बेहतर संभावनाएँ लोगों को शहरों की ओर आकर्षित करती हैं।
इस प्रकार नगरीकरण की वर्तमान प्रवृति को विकसित और विकासशील देशों के संदर्भ में देखा जा सकता है। विकसित देशों में नगरीकरण की प्रवृति भले ही धीमी हैं लेकिन विकसित देशों की अधिकांश जनसंख्या नगरों में ही निवास करती है। इस प्रवृति से विकसित देशों में कई समस्याएँ उत्पन्न हुआ है। दूसरी ओर विकासशील देशों में तीव्र नरीकरण की प्रकृति के कारण गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो रही है। विकासशील देशों में नगरीकरण की एक यह भी प्रवृत्ति है कि देश की राजधानी नगर और बड़े-2 महानगरों की जनसंख्या बढ़ रही है। लेकिन छोटे नगरों की जनसंख्या यथावत है।
विकसित और विकासशील दोनों ही प्रदेशों में इस प्रवृति का विकास हुआ है कि अधिक से अधिक लोग राजधानी या बड़े नगर में निवास करना चाहते हैं क्योंकि इन नगरों में बसने वाले लोगों का यह मानना है कि राजधानी नगर और महानगर में किसी-न-किसी प्रकार का रोजगार मिल ही जाता है। यह अवधारणा आमतौर पर विकासशील देशों में प्रचलित है। दूसरी ओर विकसित देशों में अधिक सुरक्षा, अधिक सार्वजनिक सुविधाएँ और अधिक रोजगार क कारण इन नगरों में निवास करना चाहती है।
राजधानी एवं महानगरों की बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण मेट्रोपोलिटन नगर के स्थान पर मेगासिटी का विकास होने लगा है। अगर भारत को ही लिया जाय तो पाते हैं कि 1991 में यहाँ मात्र 23 महानगर थे जो 2001 में बढ़कर 35 और 2011 में बढ़कर 53 हो चुका है।
बड़े आकार के नगरों में जनसँख्या विस्फोट से सार्वजनिक सुविधाओं की कमी होने लगी है। पुराने बस्तियाँ मलीन/गंदी बस्ती के रूप में बदलने लगे हैं। प्रदूषण की वहाँ गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होने लगी है। प्रदूषण का आलम यह है कि नगरों में ऑक्सीजन बार खुलने लगे हैं। 1996 में UNICEF के एक अध्ययन के अनुसार विकासशील देशों में 170 करोड़ जनसंख्या नगरों में रहती है जिनमें से 160 करोड़ के पास आवास की कमी है। इसके अलावे स्वच्छ जल, प्राथमिक स्वास्थ्य की सुविधा नगण्य है।
विकसित एवं विकासशील दोनों ही प्रदेश के नगरों में परिवहन दुर्घटना तेजी से बढ़ी है। वर्ल्ड डिजास्टर रिपोर्ट 1998 में बताया गया कि सर्वाधिक परिवहन दुर्घटना से मृत्यु इथोपिया में होती है। इसके बाद नेपाल, बंगलादेश, चीन, स्वाजीलैण्ड और भारत का स्थान आता है।
भारत में नगरीकरण की प्रवृत्ति (Trend of Urbanization in India):-
भारत में नगरीकरण की प्रवृत्ति धीमी रही है। इसका प्रमुख कारण कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था तथा सुखद ग्रामीण अनुभूति रही है। सन् 1901 में भारत में केवल 11% जनसंख्या नगरीय थी जो सन् 1931 में बढ़कर 11.97%, 1941 में 13.9% तथा सन् 1951 में बढ़कर 17.9% हो गयी।
सन् 1961 के बाद देश में नगरीकरण की प्रवृत्ति में तेजी आयी, जब देश की अर्थव्यवस्था में सामाजिक मान्यता, प्राकृतिक प्रकोप पर नियन्त्रण और शिक्षा तथा परिवहन का नवीन दौर शुरू हुआ। सन् 1991 में देश की नगरीय जनसंख्या 25.72% हो गयी। इसके बाद सन् 2011 की जनगणना के अनुसार नगरीय जनसंख्या 31.2% हो गयी।
भारत में नगरीकरण की वर्तमान प्रवृत्ति | |
वर्ष | नगरीय जनसँख्या (%) |
1901 | 10.84 |
1911 | 10.29 |
1921 | 11.18 |
1931 | 11.97 |
1941 | 13.86 |
1951 | 17.29 |
1961 | 17.97 |
1971 | 19.91 |
1981 | 23.34 |
1991 | 25.72 |
2001 | 27.78 |
2011 | 31.20 |
नगरीकरण की समस्याएँ
उपरोक्त सामान्य समस्याओं के अलावे विकसित एवं विकासशील देशों में अलग-2 विशिष्ट समस्याएँ भी उत्पन्न हो रही है। जैसे:-
(A) विकसित देश की विशिष्ट नगरीय समस्याएँ:-
विकसित देशों में नगरीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भिक अवस्था में ही सम्पन्न हो चुकी है, इसलिए वहाँ की नगरीय समस्याएँ विकासशील देशों से कुछ भिन्न प्रकार की होती हैं। इन समस्याओं का स्वरूप अधिकतर अत्यधिक औद्योगीकरण, उपभोक्तावाद, जीवन-शैली और तकनीकी प्रगति से जुड़ा होता है। विकसित देशों की प्रमुख नगरीय समस्याएँ निम्नलिखित हैं –
(1) विकसित देशों के अधिकतर महानगरीय प्रशासन वितीय संकट के दौर से गुजर रही है। जैसे- माण्ट्रीयल, ओसलो, स्टॉकहोम में स्थित नगर प्रशासन को कोई ऋण देने के लिए तैयार नहीं है।
(2) खाली अधिवासों की समस्या:-
विकसित देशों में जनसंख्या नगर से ग्राम की ओर स्थानान्तरित हो रही है क्योंकि विकसित देशों के ग्रामीण क्षेत्र भी नगर के समान बिजली, परिवहन एवं अन्य संरचनात्मक सुविधाएँ उपलब्ध है। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्र भीड़-भाड़ और पर्यावरण प्रदूषण से मुक्त हैं। ऐसे में नगरीय जनसंख्या अधिक-से-अधिक ग्रामीण क्षेत्र में अधिवास करने की प्रवृति रखती है जिसके कारण विकसित देशों के नगरों में लाखों अधिवास खाली पड़े हैं।
(3) नवजनसंख्या का विस्फोट:-
60 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोगों को नवजनसंख्या के अन्तर्गत रखते हैं। विकसित देशों में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा और पर्याप्त पोषण उपलब्ध होने के कारण बूढ़ों की जनसंख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे लोग प्राय: निर्भर जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसे लोगों के बच्चे बूढ़े माता-पिता को बुजुर्ग आश्रम में ले जाकर छोड़ देते हैं। इससे पारिवारिक विखण्डन की भी गंभीर समस्या उत्पन्न हो रही है।
(4) प्रदूषण की समस्या:-
विकसित देशों के नगर वायु, जल और ध्वनि तीनों प्रकार के प्रदूषण ही समस्या से उलझ रहे हैं। शिकागों में 60% लोग बहरे हो चुके हैं। इसी तरह से USA के 70% नगरीय जनसंख्या प्रदूषित वायु लेने के लिए बाध्य है।
(5) जननांकीय समस्या:-
विकसित देशों में एकल परिवार के विकास तथा अपने स्वास्थ के प्रति अति जागरूकता के करण जहाँ एक ओर परिवारों का विखंडन हो रहा है। वहाँ विवाह एवं नातेदारी जैसी सामाजिक संस्थाओं का पत्तन हुआ है जिसके कारण वहां नाकारात्मक जनसंख्या वृद्धि की समस्या उत्पन्न हुई है।
(B) विकासशील देशों की विशिष्ट नगरीय समस्याएं:-
(1) विकासशील देशों में तीव्र ग्रामीण-नगरीय स्थानान्तरण के कारण नगरीय जनसंख्या विस्फोट की समस्या उत्पन्न हुई।
(2) विकासशील देशों के अधिकतर देशों में अधिवासीय मकान की कमी की समस्या है और जो मकान उपलब्ध है उनका स्तर काफी निम्न है।
(3) गंदी बस्तियों का विकास विकासशील देशों के नगरों की एक गंभीर समस्या है। मुंबई का धरावी क्षेत्र विश्व की सबसे बड़ी गंदी बस्ती क्षेत्र का उदा० है।
(4) विकासशील देशों के अधिकतर नगरों में नियोजित आन्तरिक संरचना का अभाव है। अनियोजित विकास के कारण नगरीय भूमि का न तो सही तरीके से प्रयोग हमें पता है और न ही उनका विकास हो पाता है। अनियोजित नगरों में परिवहन साधन धीमी गति से चलती है, वहीं दुर्घटना की भी संभावना अधिक होती है।
(5) विकासशील देशों में तीव्र नगरीकरण के कारण अनियोजित उपान्त क्षेत्रों से विकास बहुत तेजी से हो रहा है। उपान्त क्षेत्र से मुख नगर की ओर आने वाली परिवहन साधनों का घोर अभाव है वहीं दूसरी ओर वैसे सड़कों पर सड़क जाम एवं अति भीड़-भाड़ की समस्या देखा जा सकता है।
(6) विकसित देशों की भाँति ही विकासशील देशों के नगरों भी गंभीर प्रदूषण की समस्या से गुजर रहे है।
निष्कर्ष:-
अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि विकसित और विकासशील देशों की कुछ सामान्य समस्याएँ हैं वहीं अलग-2 भौगोलिक परिस्थितियों के कारण कुछ विशिष्ट समस्याएँ भी हैं। ऊपर बताये गये समस्याओं की विवेचना की जाए तो पाते हैं कि गुणवत्ता और गहनता की दृष्टि से विश्व के सभी नगरों पर लागू होता है। नगरीकरण एक वैश्विक वास्तविकता है, जो आर्थिक प्रगति और आधुनिक जीवन शैली का प्रतीक है। किंतु अनियंत्रित और अव्यवस्थित नगरीकरण अनेक गंभीर समस्याओं को जन्म देता है। अतः आवश्यक है कि नगरीकरण को सतत, समावेशी और पर्यावरण-सम्मत बनाया जाए, ताकि यह मानव जीवन के लिए अवसर का स्रोत बने, बोझ नहीं।
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