Chapter 7 Landforms and their Evolution (भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास)

Chapter 7 Landforms and their Evolution

(भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) स्थलरूप विकास की किस अवस्था में अधोमुख कटाव प्रमुख होता है?

(क) तरुणावस्था

(ख) प्रथम प्रौढ़ावस्था

(ग) अन्तिम प्रौढ़ावस्था

(घ) वृद्धावस्था

उत्तर- (क) तरुणावस्था

(ii) एक गहरी घाटी जिसकी विशेषता सीढ़ीनुमा खड़े ढाल होते हैं; किस नाम से जानी जाती है?

(क) U- आकार की घाटी

(ख) अन्धी घाटी

(ग) गॉर्ज

(घ) कैनियन

उत्तर- (घ) कैनियन

(iii) निम्न में से किन प्रदेशों में रसायनिक अपक्षय प्रक्रिया यान्त्रिक अपक्षय प्रक्रिया की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होती है?

(क) आर्द्र प्रदेश

(ख) शुष्क प्रदेश

(ग) चूना-पत्थर प्रदेश

(घ) हिमनद प्रदेश

उत्तर- (ग) चूना-पत्थर प्रदेश

(iv) निम्न में से कौन-सा वक्तव्य लेपीज (Lapies) शब्द को परिभाषित करता है?

(क) छोटे से मध्यम आकार के उथले गर्त।

(ख) ऐसे स्थलरूप जिनके ऊपरी मुख वृत्ताकार व नीचे से कीप के आकार के होते हैं।

(ग) ऐसे स्थलरूप जो धरातल से जल के टपकने से बनते हैं।

(घ) अनियमित धरातल जिनके तीखे कटक व खाँच हों।

उत्तर- (क) छोटे से मध्यम आकार के उथले गर्त।

लेपीज (Lapies) का सही अर्थ है – चूना पत्थर वाले क्षेत्रों में पाई जाने वाली अनियमित सतह, जिन पर तीखे कटक (ridges) और खांचे (grooves) बने होते हैं।

(v) गहरे, लम्बे व विस्तृत गर्त या बेसिन जिनके शीर्ष दीवार खड़े ढाल वाले व किनारे खड़े व अवतल होते हैं, उन्हें क्या कहते हैं?

(क) सर्क

(ख) पाश्विक हिमोढ़

(ग) घाटी हिमनद

(घ) एस्कर

उत्तर- (क) सर्क

(vi) यू-आकार की घाटी बनती है

(क) बाढ़ क्षेत्र में

(ख) चूना क्षेत्र में

(ग) प्रौढ़ नदी क्षेत्र

(घ) हिमानी नदी क्षेत्र में

उत्तर- (घ) हिमानी नदी क्षेत्र में

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) चट्टानों में अध: कर्तित विसर्प और मैदानी भागों में जलोढ़ के सामान्य विसर्प क्या बताते हैं?

उत्तर- चट्टानों में अध:कर्तित विसर्प (inverted relief) दर्शाते हैं कि कठोर शिलाओं पर कटाव कम हुआ है और वे ऊँचे बने रहते हैं। जबकि मैदानी भागों में जलोढ़ के सामान्य विसर्प यह बताते हैं कि अवसादों पर अधिक क्षरण-संवहन होता है, जिससे निचले, समतल और व्यापक भू-आकृतियाँ बनती हैं।

(ii) घाटी रंध्र अथवा युवाला का विकास कैसे होता है?

उत्तर- डोलाइन घोलरन्ध्र का ही विकसित रूप है। डोलाइन एक अस्थायी झील के समान होता है। कुछ समय के बाद इसके जल संरोध के सहारे भूमिगत हो जाते हैं और झील सूख जाती है।

     जब दो डोलाइन आसपास होते हैं तो बढ़ते-बढ़ते उनके बीच की दीवार टूट कर गिर जाती है और वे आपस में मिल जाते हैं। इससे एक वृहद् गड्ढे का निर्माण होता है, जो युवाला (Uvalas) कहलाता है।

Chapter 7 Landforms and their Evolution

(iii) चूनायुक्त चट्टानी प्रदेशों में धरातलीय जल प्रवाह की अपेक्षा भौमजल प्रवाह अधिक पाया जाता है, क्यों?

उत्तर- चूनायुक्त (Limestone) चट्टानी प्रदेशों में चट्टानें अधिक दरारदार तथा भंगुर होती हैं, जिनमें जल शीघ्रता से नीचे समा जाता है। सतह पर जल लंबे समय तक ठहर नहीं पाता, इसलिए धरातलीय जल प्रवाह कम और भूमिगत जल प्रवाह अधिक विकसित होता है। इसी कारण कार्स्ट स्थलरूप भी बनते हैं।

(iv) हिमनद घाटियों में कई रैखिक निक्षेपण स्थलरूप मिलते हैं। इनकी अवस्थिति व नाम बताएं।

उत्तर- हिमनद घाटियों में आगे बढ़ते और पिघलते ग्लेशियर रैखिक निक्षेपण स्थलरूप बनाते हैं। इनमें मोराइन (लैटरल, मेडियल, टर्मिनल), एस्कर, ड्रमलिन और आउटवॉश प्लेन प्रमुख हैं। ये इसलिए बनते हैं क्योंकि बर्फ के साथ खिंचती चट्टानें घाटी की दिशा में लंबवत रूप से निक्षेपित होती रहती हैं।

(v) मरुस्थलीय क्षेत्रों में पवन कैसे अपना कार्य करती है? क्या मरुस्थलों में यही एक कारक अपरनदित स्थलरूपों का निर्माण करता है?

उत्तर- मरुस्थलीय क्षेत्रों में पवन मुख्य रूप से अपवाहन (Deflation), अपघर्षण (Abrasion), सन्निघर्षण (Attrition) और परिवहन-निक्षेपण के माध्यम से कार्य करती है, जिससे बालू के टीले, ज्यूगेन, यार्डांग, गारा, छत्रक शिला,  बालूस्तूप, लोएस मैदान आदि बनते हैं।

    परंतु केवल पवन ही नहीं तापीय विस्तार-संकुचन, आकस्मिक व भारी वर्षा, और यांत्रिक अपक्षय भी मरुस्थलों में अपरदित स्थलरूपों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) आर्द्र व शुष्क जलवायु प्रदेशों में प्रवाहित जल ही सबसे महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक है। विस्तार से वर्णन करें।

उत्तर- आर्द्र एवं शुष्क जलवायु प्रदेशों में प्रवाहित जल (Running Water) सबसे महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक माना जाता है, क्योंकि यही भूमि के अपरदन, परिवहन एवं निक्षेपण की प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है।

   आर्द्र जलवायु प्रदेशों में वर्षा की मात्रा अधिक होती है। यहाँ नदियाँ, झरने एवं सतही जल निरंतर प्रवाहित होते रहते हैं। अधिक वर्षा के कारण रासायनिक अपक्षय तीव्र होता है तथा नदियाँ भूमि को काटकर V-आकार की घाटियाँ, घुमावदार नदियाँ (मेन्डर), बाढ़ मैदान, जलप्रपात एवं डेल्टा जैसी भू-आकृतियों का निर्माण करती हैं। इन क्षेत्रों में प्रवाहित जल का कार्य दीर्घकालिक एवं निरंतर होता है, जिससे परिदृश्य में व्यापक परिवर्तन दिखाई देता है।

     शुष्क जलवायु प्रदेशों में वर्षा बहुत कम होती है, परंतु जब अल्पकालिक एवं तीव्र वर्षा होती है, तब प्रवाहित जल अचानक शक्तिशाली रूप धारण कर लेता है। यहाँ अस्थायी नदियाँ (वाडी/अरॉय) बनती हैं, जो तीव्र अपरदन करती हैं। इनके द्वारा गॉर्ज, कैनियन, अल्यूवियल फैन एवं पेडीमेंट जैसी भू-आकृतियाँ विकसित होती हैं। यद्यपि जल का प्रवाह अल्पकालिक होता है, फिर भी उसका प्रभाव अत्यंत प्रभावशाली होता है।

  इस प्रकार स्पष्ट है कि आर्द्र और शुष्क दोनों जलवायु प्रदेशों में प्रवाहित जल भू-आकृतिक विकास का प्रमुख कारक है, जो विभिन्न स्थलरूपों के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाता है।

(ii) चूना चट्टानें आर्द्र व शुष्क जलवायु में भिन्न व्यवहार करती हैं क्यों? चूना प्रदेश में प्रमुख व मुख्य भू-आकृतिक प्रक्रिया कौन-सी हैं और इसके क्या परिणाम हैं।

उत्तर- चूना चट्टानें (Limestone Rocks) आर्द्र एवं शुष्क जलवायु में भिन्न व्यवहार करती हैं, क्योंकि दोनों जलवायुओं में जल की उपलब्धता, तापमान, वर्षा की मात्रा तथा रासायनिक क्रियाओं की तीव्रता अलग-अलग होती है।

   आर्द्र जलवायु में वर्षा अधिक होती है तथा वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा भी अपेक्षाकृत अधिक होती है। वर्षा जल CO के साथ मिलकर कार्बोनिक अम्ल बनाता है, जो चूना पत्थर को घोल देता है। इस कारण यहाँ रासायनिक अपक्षय (Dissolution / Solution) प्रमुख होता है। इसके परिणामस्वरूप कार्स्ट स्थलाकृतियाँ विकसित होती हैं, जैसे-डोलाइन, यूवाला, पोल्जे, गुफाएँ, स्टैलेक्टाइट और स्टैलेग्माइट।

   इसके विपरीत शुष्क जलवायु में वर्षा अत्यंत कम होती है, जिससे रासायनिक क्रियाएँ सीमित रहती हैं। यहाँ यांत्रिक अपक्षय, तापीय विस्तार-संकुचन तथा पवन क्रिया प्रमुख होती है। चूना चट्टानों का घुलन कम होता है और सतह अपेक्षाकृत कठोर बनी रहती है।

    चूना प्रदेश में प्रमुख भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ हैं-

(i) रासायनिक अपक्षय (घुलन क्रिया)

(ii) भूमिगत जल क्रिया

(iii) अपरदन एवं निक्षेपण

   परिणामस्वरूप अनियमित स्थलरूप, भूमिगत नदियाँ, जल का तीव्र अपवाह, सतही नदियों का अभाव तथा कृषि के लिए सीमित उपयुक्तता देखने को मिलती है।

(iii) हिमनद ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों को निम्न पहाड़ियों व मैदानों में कैसे परिवर्तित करते हैं या किस प्रक्रिया से यह सम्पन्न होता है बताएँ?

उत्तर- हिमनद (Glaciers) ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों को धीरे-धीरे निम्न पहाड़ियों और विस्तृत मैदानों में परिवर्तित कर देते हैं। यह परिवर्तन मुख्यतः हिमानी अपरदन, परिवहन और निक्षेपण की प्रक्रियाओं के द्वारा सम्पन्न होता है।

    सबसे पहले, पर्वतीय क्षेत्रों में जमा भारी हिमराशि अपने भार के कारण ढलान की ओर खिसकती है। इस गति के दौरान हिमनद अपने साथ चट्टानों, पत्थरों और मलबे को लेकर चलता है। हिमनद की निचली सतह और किनारों में फँसे शैल-खंड भूमि को घिसते रहते हैं, जिसे हिमानी अपरदन कहा जाता है। इससे तीखे पर्वत शिखर घिसकर गोल हो जाते हैं और गहरी V-आकार की घाटियाँ चौड़ी होकर U-आकार की घाटियों में बदल जाती हैं।

    दूसरे चरण में, हिमनद अपरदित पदार्थों को दूर-दूर तक ले जाकर ढलानों से नीचे की ओर परिवहन करता है। जब हिमनद का वेग कम हो जाता है या वह पिघलने लगता है, तब ये शैल-खंड और मलबा वहीं जमा हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को हिमानी निक्षेपण कहते हैं। इससे मोरैन, आउटवॉश मैदान तथा समतल भूमि का निर्माण होता है।

   इस प्रकार, लंबे समय तक चलने वाली हिमानी क्रियाएँ ऊँचे और खुरदरे पर्वतीय क्षेत्रों को घिस-घिसकर निम्न पहाड़ियों और समतल मैदानों में परिवर्तित कर देती हैं।

Chapter 8 Composition and Structure of Atmosphere (वायुमंडल का संघटन तथा संरचना)

Chapter 8 Composition and Structure of Atmosphere

(वायुमंडल का संघटन तथा संरचना)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 8 Composition and Structure

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्नलिखित में से कौन-सी गैस वायुमण्डल में सबसे अधिक मात्रा में मौजूद है?

(क) ऑक्सीजन

(ख) आर्गन

(ग) नाइट्रोजन

(घ) कार्बन डाइऑक्साइड

उत्तर- (ग) नाइट्रोजन

(ii) वह वायुमण्डलीय परत जो मानव जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है-

(क) समताप मण्डल

(ख) क्षोभमण्डल

(ग) मध्य मण्डल

(घ) आयनमण्डल

उत्तर- (ख) क्षोभमण्डल

कारण: क्षोभमण्डल (Troposphere) पृथ्वी की सबसे निचली वायुमंडलीय परत है, जहाँ मानव जीवन, मौसम, वर्षा, हवा, बादल और जलवाष्प सभी मौजूद होते हैं। इसी परत में हम सांस लेने योग्य अधिकांश ऑक्सीजन और नाइट्रोजन भी पाते हैं। इसलिए यह मानव जीवन के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण परत है।

(iii) समुद्री नमक, पराग, राख, धुएँ की कालिमा, महीन मिट्टी-किससे सम्बन्धित हैं?

(क) गैस

(ख) जलवाष्प

(ग) धूलकण

(घ) उल्कापात

उत्तर- (ग) धूलकण

व्याख्या: समुद्री नमक, पराग, राख, धुएँ की कालिमा और महीन मिट्टी सभी वायुमंडलीय धूलकण (Aerosols) के उदाहरण हैं। ये वायुमंडल में तैरने वाले ठोस तथा तरल कण होते हैं जो बादल गठन, वर्षण एवं दृश्यता को प्रभावित करते हैं।

(iv) निलिखित में से कितनी ऊँचाई पर ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य हो जाती है?

(क) 90 किमी

(ख) 100 किमी

(ग) 120 किमी

(घ) 150 किमी

उत्तर- (ग) 120 किमी

व्याख्या: पृथ्वी के वायुमंडल में ऊँचाई बढ़ने के साथ गैसों की घनत्व बहुत तेजी से कम होती है। लगभग 120 किमी की ऊँचाई तक पहुँचते-पहुँचते वायुमंडल इतना विरल हो जाता है कि ऑक्सीजन की मात्रा लगभग नगण्य मानी जाती है।

(v) निम्नलिखित में से कौन-सी गैस सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है तथा पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शी?

(क) ऑक्सीजन

(ख) नाइट्रोजन

(ग) हिलीयम

(घ) कार्बन डाइऑक्साइड

उत्तर- (घ) कार्बन डाइऑक्साइड

(vi) वायुमण्डल की कौन-सी परत पृथ्वी से प्रेषित रेडियो तरंगों को परावर्तित कर पुनः वापस कर पृथ्वी तल पर भेज देती है?

(क) समताप मण्डल

(ख) मध्य मण्डल

(ग) आयन मण्डल

(घ) बर्हिमण्डल

उत्तर- (ग) आयन मण्डल

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) वायुमण्डल से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- वायुमण्डल विभिन्न प्रकार की गैसों का मिश्रण है और यह पृथ्वी को सभी ओर से ढके हुए है। इसमें मनुष्यों एवं जन्तुओं के जीवन के लिए आवश्यक गैसों जैसे ऑक्सीजन तथा पौधों के लिए कार्बन डाईऑक्साइड पाई जाती हैं।

(ii) मौसम और जववायु के कौन-कौन से तत्त्व हैं?

उत्तर- तापमान, वायुदाब, हवा, आर्द्रता, बादल और वर्षण ये मौसम और जलवायु के महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं, जो पृथ्वी पर मुनष्य के जीवन को प्रभावित करते हैं।

(iii) वायुमण्डल की संरचना के बारे में लिखिए।

उत्तर- वायुमण्डल का निर्माण लगभग एक अरब वर्ष पूर्व हुआ। यह अनेक गैसों का मिश्रण है। नाइट्रोजन 78.8% तथा ऑक्सीजन 20.95% मुख्य गैसें हैं। इनके अतिरिक्त आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, नीऑन, हीलियम, क्रेप्टोन, जेनन तथा हाइड्रोजन भी कुछ मात्रा में है।

     वायुमण्डल में पाँच मुख्य संस्तर हैं- क्षोभमण्डल, समतापमण्डल, मध्यमण्डल, आयनमण्डल, बाह्ममण्डल। कुल वायुमण्डल का 99% भाग भूपृष्ठ से 32 कि.मी. की ऊँचाई तक सीमित हैं और गुरुत्वाकर्षक बल द्वारा पृथ्वी से सटा हुआ है। वायुमण्डल को ऊर्जा सूर्य से मिलती है।

(iv) वायुमण्डल के सभी संस्तरों से क्षोभमण्डल सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों हैं?

उत्तर- क्षोभमण्डल सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी में पृथ्वी का अधिकांश मौसमीय क्रियाएँ- बादल, वर्षा, आँधी, तूफान हुआ करती हैं। वायु दाब, तापमान तथा जलवाष्प की अधिकता इसे जीवन के लिए अनिवार्य बनाती है।

   अधिकांश जैविक एवं मानव गतिविधियाँ इसी संस्तर में संचरित होती हैं। क्षोभमण्डल वायुमण्डल का सबसे नीचे का संस्तर है। इसकी ऊंचाई 13 किमी है तथा यह ध्रुव के निकट 8 किमी तथा विषुवत् रेखा पर 18 किमी की ऊँचाई तक है। 

(v) ग्रीन हाऊस प्रभाव से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- वायु प्रदूषण से सम्बन्धित एक बड़ी समस्या विश्व के तापमान में वृद्धि (Global Warming) या हरित गृह प्रभाव (Green House effect) है। मानवीय स्त्रोतों से उत्पन्न कुछ गैस कार्बन डायऑक्साइड, ओजोन, नाइट्रस ऑक्साइड और मीथेन है, जो हरित गृह प्रभाव में वृद्धि करतें हैं।

    इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण कार्बन डाइऑक्साइड है, जो सौर ऊर्जा को पृथ्वी की ओर आने तो देता है, किन्तु पृथ्वी से जो धरातलीय विकरण होता है, उसे बाहर जाने से रोकती है और उसका अवशोषण करता है। अतः वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड के वृद्धि होने से पृथ्वी की सतह और वायुमण्डल के निचले भाग में तापमान की वृद्धि होती है जिसे हरित गृह प्रभाव कहा जाता है।

(vi) वायुमण्डल के मुख्य संघटनों का संक्षिप्त विवरण दें।

उत्तर- वायुमण्डल के मुख्य संघटन:

     वायुमण्डल मुख्यतः नाइट्रोजन (78%), ऑक्सीजन (21%), आर्गन (0.93%) और कार्बन डाइऑक्साइड (0.04%) से बना है। इसके अलावा नीयॉन, हीलियम, हाइड्रोजन, जलवाष्प, धूलकण तथा ओजोन अल्प मात्रा में पाए जाते हैं, जो जलवायु व मौसम को प्रभावित करते हैं।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) वायुमण्डल की संरचना की व्याख्या करें।

उत्तर- वायुमण्डल की संरचना:

      पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए गैसों के विशाल आवरण को वायुमण्डल कहते हैं। इसका मुख्यतः गठन नाइट्रोजन (78%), ऑक्सीजन (21%) तथा अन्य गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, हीलियम, हाइड्रोजन, आर्गन आदि से होता है। वायुमण्डल को ऊँचाई के आधार पर पाँच मुख्य परतों में बाँटा गया है- क्षोभ मण्डल, समताप मण्डल, मध्य मण्डल, आयन मण्डल और बाह्य मण्डल।

1. क्षोभ मण्डल (Troposphere):

    यह पृथ्वी की सतह से लगभग 8-18 किमी तक विस्तृत सबसे निचली परत है। सभी मौसमीय घटनाएँ- बादल, वर्षा, तूफान आदि इसी परत में होते हैं। ऊँचाई के साथ तापमान कम होता जाता है।

2. समताप मण्डल (Stratosphere):

    क्षोभमण्डल के ऊपर 50 किमी तक फैली यह परत उड़ान विमानों के लिए उपयुक्त है। इसमें ओजोन परत स्थित है, जो हानिकारक पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करती है।

3. मध्य मण्डल (Mesosphere):

    यह 50-80 किमी तक फैला होता है। यहाँ तापमान पुनः घटता है और उल्का पिंड अक्सर इसी में जलकर नष्ट हो जाते हैं।

4. आयन मण्डल (Thermosphere):

    80-500 किमी तक विस्तृत, यहाँ गैसें आयनित रहती हैं। रेडियो तरंगों का परावर्तन भी यहीं होता है।

5. बाह्य मण्डल (Exosphere):

   यह सबसे बाहरी परत है जहाँ गैसों का घनत्व अत्यंत कम होता है और यहीं से अंतरिक्ष की शुरुआत मानी जाती है।

    इस प्रकार वायुमण्डल पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करता है और जलवायु व ताप संतुलन बनाए रखता है।

(ii) वायुमण्डल की संरचना का चित्र खींचे और व्याख्या करें।

उत्तर- वायुमण्डल की संरचना का चित्र

वायुमण्डल की संरचना

   

    वायुमण्डल को ऊँचाई के आधार पर पाँच मुख्य परतों में बाँटा गया है- क्षोभ मण्डल, समताप मण्डल, मध्य मण्डल, आयन मण्डल और बाह्य मण्डल।

1. क्षो भमण्डल (Troposphere):

    यह पृथ्वी की सतह से लगभग 8–18 किमी तक विस्तृत सबसे निचली परत है। सभी मौसमीय घटनाएँ- बादल, वर्षा, तूफान आदि इसी परत में होते हैं। ऊँचाई के साथ तापमान कम होता जाता है।

2. समताप मण्डल (Stratosphere):

    क्षोभमण्डल के ऊपर 50 किमी तक फैली यह परत उड़ान विमानों के लिए उपयुक्त है। इसमें ओज़ोन परत स्थित है, जो हानिकारक पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करती है।

3. मध्य मण्डल (Mesosphere):

    यह 50–80 किमी तक फैला होता है। यहाँ तापमान पुनः घटता है और उल्का पिंड अक्सर इसी में जलकर नष्ट हो जाते हैं।

4. आयन मण्डल (Thermosphere):

    80-500 किमी तक विस्तृत, यहाँ गैसें आयनित रहती हैं। रेडियो तरंगों का परावर्तन भी यहीं होता है।

5. बाह्य मण्डल (Exosphere):

    यह सबसे बाहरी परत है जहाँ गैसों का घनत्व अत्यंत कम होता है और यहीं से अंतरिक्ष की शुरुआत मानी जाती है।

    इस प्रकार वायुमण्डल पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करता है और जलवायु व ताप संतुलन बनाए रखता है।

Chapter 9 Solar Radiation, Heat Balance and Temperature (सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान)

Chapter 9 Solar Radiation, Heat Balance and Temperature

(सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 9 Solar Radiation

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्न में से किस अक्षांश पर 21 जून की दोपहर में सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं?

(क) विषुवत वृत पर

(ख) 23.5° उ०

(ग) 66.5° द०

(घ) 66.5° उ०

उत्तर- (ख) 23.5° उ०

(ii) निम्न में से किन शहरों में दिन ज्यादा लंबा होता है?

(क) तिरुवनंतपुरम्

(ख) हैदराबाद

(ग) चंडीगढ़

(घ) नागपुर

उत्तर- (ग) चंडीगढ़

व्याख्या: दिन की लम्बाई अक्षांश पर निर्भर करती है, जितना उत्तर की ओर कोई स्थान होगा, उतना ही वहाँ ग्रीष्म ऋतु में दिन लंबा होता है।

(iii) निम्नलिखित में से किस प्रक्रिया द्वारा वायुमण्डल मुख्यतः गर्म होता है?

(क) लघु तरंगदैर्ध्य वाले सौर विकिरण से

(ख) लंबी तरंगदैर्ध्य वाले स्थलीय विकिरण से

(ग) परावर्तित सौर विकिरण से

(घ) प्रकीर्णित सौर विकिरण से

उत्तर- (ख) लंबी तरंगदैर्ध्य वाले स्थलीय विकिरण से

(iv) निम्न पदों को उसके उचित विवरण के साथ मिलाएँ-

(i) सूर्यताप    (क) सबसे कोष्ण और सबसे शीत महीनों के मध्य तापमान का अंतर।

(ii) समताप रेखा  (ख) समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा।

(iii) एल्बिडो   (ग) आने वाला सौर विकिरण।

(iv) वार्षिक तापांतर   (घ) किसी वस्तु के द्वारा परावर्तित दृश्य प्रकाश का प्रतिशत।

उत्तर-

(i) (ग)

(ii) (ख)

(iii) (घ)

(iv) (क)

(v) पृथ्वी के विषुवत् क्षेत्रों की अपेक्षा उत्तरी गोलार्द्ध के उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों का तापमान अधिकतम होता है, इसका मुख्य कारण है, क्या है?

(क) विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में कम बादल होती है।

(ख) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में गर्मी के दिनों की लंबाई विषुवतीय क्षेत्रों से ज्यादा होती है।

(ग) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ‘ग्रीनहाउस प्रभाव’ विषुवतीय क्षेत्रो की अपेक्षा ज्यादा होती है।

(घ) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा महासागरीय क्षेत्र के ज्यादा करीब है।

उत्तर- (क) विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में कम बादल होती है।

व्याख्या:

विषुवत् (Equatorial) क्षेत्रों में वर्षभर अत्यधिक बादल, नमी और घने वर्षावन पाए जाते हैं।

→ बादल सूर्य के विकिरण का एक बड़ा भाग परावर्तित कर देते हैं, जिससे सतह का तापमान बहुत अधिक नहीं बढ़ पाता।

इसके विपरीत, उत्तरी गोलार्द्ध के उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों (Subtropical High Pressure Belt) में

→ आसमान अधिकतर निर्मल और शुष्क होता है,

→ बादल कम होते हैं,

→ और इस कारण धरातल पर अधिक मात्रा में सौर विकिरण पहुंचता है, जिससे तापमान अधिकतम हो जाता है।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) पृथ्वी पर तापमान का असमान वितरण किस प्रकार जलवायु और मौसम को प्रभावित करता है?

उत्तर- पृथ्वी पर तापमान का असमान वितरण वायुदाब, पवन प्रणाली, वर्षा, मानसून, महासागरीय धाराओं तथा मौसमी परिवर्तनों को प्रभावित करता है। गर्म क्षेत्रों में वायुदाब कम और ठंडे क्षेत्रों में अधिक बनता है, जिससे हवा का संचलन होता है। यही असमानता वैश्विक जलवायु पैटर्न निर्धारित करती है।

(ii) वे कौन-से कारक हैं जो पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करते हैं।

उत्तर- पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक-

⇒ अक्षांश

⇒ ऊँचाई

⇒ स्थल एवं जल का वितरण

⇒ समुद्री धाराएँ

⇒ पृथ्वी का झुकाव व सूर्य की किरणों का कोण

⇒ बादल व वर्षा

⇒ पवन प्रणाली

⇒ वनस्पति 

⇒ मानवीय गतिविधियाँ (शहरीकरण, प्रदूषण)

(iii) भारत में मई में तापमान सर्वाधिक होता है, लेकिन उत्तर अयनांत के बाद तापमान अधिकतम नहीं होता। क्यों?

उत्तर- भारत में मई में तापमान सर्वाधिक होता है, लेकिन उत्तर अयनांत के बाद तापमान अधिकतम नहीं होता जिसके निम्नलिखित कारण है-

⇒ मई में भूमि का अत्यधिक तापीय अपवर्तन तापमान को अधिकतम करता है।

⇒ जून-जुलाई में उत्तर अयनांत के बाद बादल, वर्षा और आर्द्रता बढ़ने से तापमान घटता है।

⇒ मानसूनी पवनें सतह को ठंडा कर देती हैं।

⇒ दिन लंबा होने पर भी बादलों के कारण सौर ऊष्मा कम मिलती है।

(iii) साइबेरिया के मैदान में वार्षिक तापांतर सर्वाधिक होता है क्यों?

उत्तर- साइबेरिया के मैदान में वार्षिक तापांतर सर्वाधिक होने के कारण-

⇒ कोष्ण महासागरीय धाराएँ गल्फ स्ट्रीम तथा उत्तरी अंधमहासागरीय ड्रिफ्ट की उपस्थिति से उत्तरी अंधमहासागर अधिक गर्म होना तथा समताप रेखाएँ उत्तर की तरफ मुड़ जाना।

⇒ महाद्वीपीय जलवायु का प्रभाव – समुद्र से दूर होने के कारण ताप नियंत्रित नहीं होता।

⇒ सर्दियों में अत्यधिक ठंड व ग्रीष्म में गर्मी।

⇒ बर्फ से ढकी सतह सर्दियों में ताप तेजी से घटाती है।

⇒ वायुमंडलीय परिसंचरण का कम प्रभाव।

(iv) सूर्यताप क्या है? इसे प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन करें।

उत्तर- सूर्यताप- सौर्यिक ऊर्जा को ही ‘सूर्यातप’ कहते हैं। सूर्यताप को प्रभावित करने वाले कारक इस प्रकार है-

प्रभावित करने वाले कारक:

⇒ अक्षांश

⇒ ऊँचाई

⇒ स्थल-जल का अनुपात

⇒ बादल व वर्षा

⇒ वायुमंडलीय धूल व आर्द्रता

⇒ ढाल की दिशा

⇒ दिन की लंबाई

(v) महासागरों के तापमान को प्रभावित करनेवाले किन्हीं तीन कारकों का परीक्षण करें।

उत्तर- महासागरीय जल के तापमान को प्रभावित करने वाले कारकों में तीन प्रमख हैं जो निम्नलिखित हैं-

अक्षांश – महासागरीय जल का तापमान भूमध्य रेखा पर अधिकतम तथा ध्रुवों पर न्युनतम होता है।

प्रचलित पवनें – ये हवायें अपने साथ समुद्र तल के जल को बहा ले जाती है, जिसकी पूर्ति हेतु समुद्र के निचले भाग से ठण्डा जल उपर आ जाता है। इस प्रकार जिस ओर से वायु चलती है वहाँ समुद्र जल का तापमान कम तथा जिस ओर वायु चलती है वहाँ तापमान अधिक होता है।

लवणता – अधिक लवणता वाला जल अधिक उष्मा ग्रहण कर सकता है। अत: उसका तापमान भी अधिक होता है।

3. निम्नलिखिल प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) अक्षांश और पृथ्वी के अक्ष का झुकाव किस प्रकार पृथ्वी की सतह पर प्राप्त होने वाली विकिरण की मात्रा को प्रभावित करते हैं?

उत्तर- अक्षांश और पृथ्वी के अक्ष का झुकाव, दोनों ही पृथ्वी की सतह पर प्राप्त होने वाली सौर विकिरण (Insolation) की मात्रा को मूल रूप से नियंत्रित करते हैं।

      पहला कारक अक्षांश है। भूमध्य रेखा के निकट सूर्य की किरणें लगभग लंबवत गिरती हैं, इसलिए प्रति इकाई क्षेत्र पर अधिक ऊर्जा मिलती है। ऊँचे अक्षांशों यानी ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर बढ़ने पर किरणों का आपतन कोण क्षैतिज होता जाता है, जिससे वही ऊर्जा बड़े क्षेत्र में फैलती है और प्रति इकाई क्षेत्र पर कम विकिरण प्राप्त होता है। इसी कारण भूमध्यीय क्षेत्र अधिक गर्म और ध्रुवीय क्षेत्र अधिक ठंडे होते हैं।

     दूसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण कारक है पृथ्वी के अक्ष का 23.5° का झुकाव। इसी झुकाव के कारण वर्ष भर सूर्य का आपतन कोण और दिन की लंबाई बदलती रहती है। जब कोई गोलार्द्ध सूर्य की ओर झुका होता है, तो वहाँ दिन बड़े, सूर्य किरणें अधिक सीधी, और विकिरण अधिक मिलता है, इसे ग्रीष्म ऋतु कहते हैं। विपरीत स्थिति में वहाँ दिन छोटे, सूर्य कोण तिरछा होता है और विकिरण कम मिलता है, यही शीत ऋतु है।

    इस प्रकार अक्षांश पृथ्वी पर ऊर्जा वितरण का स्थानिक (Spatial) अंतर तय करता है, जबकि अक्ष का झुकाव समयगत (Seasonal) अंतर पैदा करता है। दोनों मिलकर पृथ्वी की जलवायु और मौसम के मूल ढाँचे को निर्धारित करते हैं।

(ii) पृथ्वी और वायुमण्डल किस प्रकार ताप को संतुलित करते हैं? इसकी व्याख्या करें?

उत्तर- पृथ्वी और वायुमंडल द्वारा ताप संतुलन की प्रक्रिया:

     पृथ्वी और वायुमंडल मिलकर एक प्राकृतिक ऊष्मा संतुलन स्थापित करते हैं, जिससे पृथ्वी पर जीवन के लिए उपयुक्त तापमान बना रहता है। सूर्य से आने वाली ऊर्जा का कुछ भाग पृथ्वी की सतह द्वारा अवशोषित हो जाता है और सतह गर्म होती है। यह गर्म सतह पुनः अवरक्त विकिरण (infrared radiation) के रूप में ऊर्जा का उत्सर्जन करती है।

    वायुमंडल में मौजूद गैसें जैसे- कार्बन डाइऑक्साइड, जलवाष्प, मीथेन आदि इन अवरक्त किरणों का आंशिक अवशोषण करके उन्हें पुनः पृथ्वी की ओर लौटाती हैं। इस प्रक्रिया को हरितगृह प्रभाव (Greenhouse Effect) कहा जाता है, जो पृथ्वी के औसत तापमान को स्थिर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    साथ ही, बादल और वायुमंडलीय कण सूर्य के कुछ विकिरणों को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देते हैं, जिससे अत्यधिक गर्मी पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाती। महासागर भी ताप को अवशोषित करके लंबे समय तक संचित रखते हैं और धीरे-धीरे उसे वातावरण में छोड़ते हैं। पवन प्रणाली और महासागरीय धाराएं इस ऊष्मा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाकर तापमान का समान वितरण करती हैं।

    इस प्रकार, सूर्य से प्राप्त ऊर्जा, पृथ्वी का विकिरण, बादलों का परावर्तन और हरितगृह गैसों का अवशोषण इन सभी की संयुक्त क्रिया से पृथ्वी वायुमंडलीय ताप का संतुलन बनाए रखता है।

(iii) जनवरी में पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के बीच तापमान के विश्वव्यापी वितरण की तुलना करें।

उत्तर- जनवरी माह में पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के तापमान वितरण में स्पष्ट वैश्विक अंतर दिखता है। इस समय सूर्य की सीधी किरणें दक्षिणी गोलार्द्ध पर पड़ती हैं, क्योंकि वह सूर्य की ओर झुका होता है। इसलिए दक्षिणी गोलार्द्ध में ग्रीष्म ऋतु होती है और तापमान सामान्यतः अधिक पाया जाता है। ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी भाग तथा दक्षिणी महासागर क्षेत्रों में उच्च तापमान और गर्म हवाएँ प्रमुख होती हैं।

   ठीक इसके विपरीत, जनवरी में उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य से थोड़ा झुका हुआ रहता है, जिसके कारण यहाँ शीत ऋतु चलती है। यूरोप, एशिया, उत्तरी अमेरिका तथा उत्तरी अटलांटिक और उत्तरी प्रशांत महासागरीय क्षेत्रों में अत्यधिक ठंड, हिमपात और कम तापमान पाया जाता है। सर्द हवाएँ, ध्रुवीय क्षेत्रों से विस्तारित होकर मध्य अक्षांशों तक पहुँचती हैं, जिससे तापमान और गिर जाता है।

     दक्षिणी गोलार्द्ध में भूमि क्षेत्र कम और महासागर अधिक होने के कारण तापमान अपेक्षाकृत संतुलित रहता है तथा चरम ठंड या गर्मी कम मिलती है। वहीं उत्तरी गोलार्द्ध में बड़े भूभाग के कारण तापमान में अधिक भिन्नता देखी जाती है। कुल मिलाकर, जनवरी में दक्षिणी गोलार्द्ध गर्म तथा उत्तरी गोलार्द्ध ठंडा रहता है, जिससे तापमान का वैश्विक वितरण असमान तथा ऋतुजन्य होता है।

Chapter 10 Atmospheric Circulation and Weather Systems (वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ)

Chapter 10 Atmospheric Circulation and Weather Systems

(वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) यदि धरातल पर वायुदाब 1000 मिलीबार है तो घरातल से 1 किमी की ऊँचाई पर वायुदाब कितना होगा?

(क) 700 मिलीबार

(ख) 900 मिलीबार

(ग) 1100 मिलीबार

(घ) 1300 मिलीबार

उत्तर- (ख) 900 मिलीबार

व्याख्या:

     सामान्यतः धरातल से ऊँचाई बढ़ने पर वायुदाब घटता है। औसत रूप से हर 1 किलोमीटर ऊँचाई पर वायुदाब लगभग 100 मिलीबार कम हो जाता है। यदि धरातल पर वायुदाब = 1000 मिलीबार है, तो 1 किमी ऊँचाई पर वायुदाब लगभग = 1000 – 100 = 900 मिलीबार होगा।

(ii) अंतर ऊष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र प्रायः कहाँ होता है?

(क) भूमध्य रेखा के निकट

(ख) कर्क रेखा के निकट

(ग) मकर रेखा के निकट

(घ) आर्कटिक वृत्त के निकट

उत्तर- (क) भूमध्य रेखा के निकट

व्याख्या:

   अंतर ऊष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (Inter Tropical Convergence Zone – ITCZ) वह क्षेत्र है जहाँ उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक पवनें (Trade Winds) आपस में मिलती हैं।

    यह क्षेत्र सामान्यतः भूमध्य रेखा के आसपास पाया जाता है, हालांकि यह सूर्य के वार्षिक गमन के अनुसार कर्क और मकर रेखा के बीच थोड़ा-बहुत उत्तर-दक्षिण की ओर खिसकता रहता है।

(iii) उत्तरी गोलार्द्ध में निम्न वायुदाब के चारों तरफ पवनों की दिशा क्या होगी?

(क) घड़ी की सुईयों के चलने की दिशा के अनुरूप

(ख) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत

(ग) समदाब रेखाओं के समकोण पर

(घ) समदाब रेखाओं के सामानंतर

उत्तर- (ख) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत

व्याख्या:

   उत्तरी गोलार्द्ध में निम्न वायुदाब (Low Pressure) क्षेत्र के चारों तरफ पवनें कोरिऑलिस बल के प्रभाव से घड़ी की सुइयों के विपरीत दिशा में घूमती हैं। इसे साइक्लोनिक परिसंचरण भी कहा जाता है—यह भीतर की ओर और वामावर्त (Anticlockwise) दिशा में होता है।

(iv) वायुराशियों के निर्माण के उद्गम क्षेत्र निम्नलिखित में से कौन-सा है?

(क) विषुवतीय वन

(ख) साइबेरिया का मैदानी भाग

(ग) हिमालय पर्वत

(घ) दक्कन पठार न पठार

उत्तर- (ख) साइबेरिया का मैदानी भाग

व्याख्या :

   वायुराशियों (Air Masses) के निर्माण के लिए ऐसे क्षेत्र चाहिए होते हैं जहाँ-

विशाल भूभाग या महासागर हों,

सतह समान प्रकृति की हो,

मौसम लम्बे समय तक स्थिर रहे (High Pressure / Anticyclonic conditions)।

   साइबेरिया का मैदानी भाग एक विशाल, ठंडा, स्थिर उच्च दाब वाला क्षेत्र है, जहाँ शुष्क एवं ठंडी महाद्वीपीय वायु राशियाँ आसानी से बनती हैं।

बाकी विकल्प वायुराशियों के उद्गम क्षेत्र नहीं माने जाते-

विषुवतीय वन- यहाँ तीव्र संवहन होता है, वायुराशि स्थिर नहीं रहती।

हिमालय पर्वत- पर्वतीय क्षेत्र वायुराशियों के उद्गम के लिए उपयुक्त नहीं।

दक्कन पठार- अपेक्षाकृत छोटा व विविध तापमान वाला क्षेत्र, स्थिर वायुराशियाँ नहीं बनतीं।

अतः सही विकल्प- (ख)

(v) निम्नलिखित में कौन सा बल अथवा प्रभाव भूमंडलीय पवनों को विक्षेपित करता है?

(क) दाब प्रवलता

(ख) अभिकेंद्रीय लक्षण

(ग) कोरियोलीसि

(घ) भू-घर्षण

उत्तर- (ग) कोरियोलीसि

व्याख्या:

   भूमंडलीय पवनों को विक्षेपित (deflect) करने वाला प्रमुख बल कोरिओलिस प्रभाव (Coriolis Effect) है, जो पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न होता है। यह उत्तरी गोलार्ध में पवनों को दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मोड़ देता है।

(vi) सामान्यतः कितनी ऊंचाई पर 1°C तापमान घट जाता है?

(क) 65 मी०

(ख) 165 मी०

(ग) 500 मी०

(घ) 1000 मी०

उत्तर- (ख) 165 मी०

व्याख्या:

    वायुमंडल में सामान्य lapse rate के अनुसार हर 165 मीटर ऊपर जाने पर तापमान लगभग 1°C घट जाता है। इसे सामान्य अवरोही ताप प्रवणता (Normal Lapse Rate) कहा जाता है, जो लगभग 6.5°C प्रति 1000 मीटर के बराबर होती है।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) वायुदाब मापने की इकाई क्या है? मौसम मानचित्र बनाते समय किसी स्थान के वायुदाब को समुद्र तल तक क्यों घटाया जाता है?

उत्तर- वायुदाब की माप की इकाई मिलीबार (mb) या हेक्टोपास्कल (hPa) है। मौसम मानचित्र बनाते समय विभिन्न स्थानों की ऊँचाई अलग-अलग होती है, इसलिए तुलना को समान आधार पर लाने हेतु वायुदाब को समुद्र तल के दबाव तक घटाकर दिखाया जाता है।

(ii) जब दाब प्रवणता बल उत्तर से दक्षिण दिशा की तरफ हो अर्थात् उपोष्ण उच्च दाब से विषुवत् वृत की ओर हो तो उत्तरी गोलार्द्ध में उष्णकटिबंध में पवनें उत्तरी-पूर्वी क्यों होती हैं?

उत्तर- उत्तरी गोलार्द्ध में दाब प्रवणता बल उपोष्ण उच्च दाब से विषुवत् रेखा की ओर पवनों को दक्षिण की ओर धकेलता है, लेकिन कोरियोलिस बल उन्हें दाईं ओर मोड़ देता है। परिणामस्वरूप पवनों की दिशा पूर्व की ओर मुड़ जाती है और वे उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनों के रूप में प्रवाहित होती हैं।

(iii) भूविक्षेपी पवनें (Geotrophic winds) क्या हैं?

उत्तर- भूविक्षेपी पवनें वे हवाएँ हैं जो वायुदाब-ढाल बल और कोरिओलिस बल के संतुलन में उच्च दाब से निम्न दाब की दिशा में समोच्च दबाव रेखाओं (Isobars) के समानांतर बहती हैं। ये ऊपरी वायुमंडल में पाई जाती हैं और इन पर घर्षण का प्रभाव बहुत कम होता है।

(iv) समुद्र व स्थल समीर का वर्णन करें।

उत्तर- स्थल समीर और समुद्र समीर (Land Breeze and Sea Breeze)

➤ दिन के समय समुद्र के निकटवर्ती क्षेत्र, समुद्र की तुलना में जल्दी गर्म हो जाते हैं जिससे स्थल पर LP का और समुद्र पर HP का निर्माण हो जाता है जिससे हवा समुद्र से स्थल की ओर प्रवाहित होने लगती है, इसे सागरीय या समुद्री समीर कहते हैं। 

➤ इसके विपरीत रात के समय पार्थिव विकिरण के कारण स्थलीय भाग सागरीय भाग की तुलना में शीघ्रता से ठंडी हो जाती है जिससे स्थल पर HP एवं समुद्र पर LP का निर्माण होता है, जिसके कारण हवा स्थल से समुद्र की ओर चलने लगती है, इसे स्थलीय समीर कहते हैं।

Chapter 10 Atmospheric Circulation

हवाएँ

(v) पवनों की दिशा एवं गति को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- पवनों की दिशा एवं गति को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक हैं-

➤ तापीय एवं दाब भिन्नता

➤ पृथ्वी का घूर्णन (कोरिओलिस बल)

➤ घर्षण बल (स्थल एवं जल सतह)

➤ भू-आकृति (पहाड़, घाटियाँ)

➤ ऋतु एवं मौसम संबंधी परिस्थितियाँ

      ये सभी मिलकर पवनों की दिशा व गति निर्धारित करते हैं।

(vi) पवन के अपरदन कार्य से उत्पन्न स्थलाकतियों का वर्णन करें?

उत्तर- पवन के अपरदन कार्य से निम्नलिखित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

    शुष्क वायु द्वारा निर्मित अपरदित स्थलाकृति:-

1. वात गर्त/अपवाहन बेसिन

2. ज्यूगेन

3. यारडांग

4. गारा

5. छत्रक शिला

6. भूस्तंभ

7. मरुस्थलीय खिड़की

8. मरुस्थलीय पूल या मेहराव

9. ड्राई कान्टर

10. मरुस्थलीय बेसिन/अपवाह बेसिन

11. पेडीप्लेन एवं इंसेलवर्ग

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) पवन की दिशा व वेग को प्रभावित करने वाले कारक बताएँ।

उत्तर- पवन की दिशा एवं वेग को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं-

1.  दाब प्रवणता बल (Pressure Gradient Force):-

    वायुदाब के अंतर से पवन का निर्माण होता है। दो स्थानों के बीच दाब का अंतर जितना अधिक होगा, पवन की गति उतनी ही तेज होगी। दाब प्रवणता बल पवन को उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर प्रवाहित करता है।

2. कोरिओलिस बल (Coriolis Force):-

    पृथ्वी के घूर्णन के कारण पवन की दिशा विक्षेपित होती है। उत्तरी गोलार्ध में पवन दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मुड़ता है। यह बल पवन की दिशा को प्रभावित करता है, लेकिन वेग को सीधे प्रभावित नहीं करता।

3. घर्षण बल (Frictional Force):-

    पृथ्वी की सतह के नज़दीक पवन को भूमि सतह, पर्वत, वनस्पति और भवनों से घर्षण मिलता है, जिससे उसकी गति कम हो जाती है। ऊँचाई बढ़ने पर घर्षण कम हो जाता है और पवन का वेग बढ़ जाता है।

4. पृथ्वी का घूर्णन:-

    पृथ्वी का घूमना पवनों की समग्र दिशा पर प्रभाव डालता है और वैश्विक पवन प्रणालियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

5. तापमान का वितरण:-

    असमान तापमान वितरण के कारण विभिन्न क्षेत्रों में दाब भिन्नता उत्पन्न होती है, जिससे पवन की दिशा व गति प्रभावित होती है।

6. स्थानीय स्थलाकृति (Relief Features):-

   पर्वतमाला, घाटियाँ, समुद्र–तट आदि पवन को मोड़ते हैं, बाधित करते हैं या उसकी गति बढ़ा देते हैं।

(ii) पथ्वी पर वायुमण्डलीय सामान्य परिसंचरण का वर्णन करते हए चित्र बनाएँ। 30 उत्तरी व दक्षिण अक्षांशों पर उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब के सम्भव कारण बताएँ।

उत्तर- पृथ्वी पर वायुमण्डलीय सामान्य परिसंचरण (General Circulation of the Atmosphere) को तीन प्रमुख कोशिकाओं- हैडली, फेरल और ध्रुवीय कोशिकाओं-में विभाजित किया जाता है। यह परिसंचरण मुख्यतः पृथ्वी के असमान तापण, दाब-ढाल बल, कोरिओलिस प्रभाव तथा ऊर्ध्वनताप के अंतर के कारण विकसित होता है।

    भूमध्यरेखा पर तीव्र तापण के कारण गर्म वायु ऊपर उठती है और निम्न दाब बनाती है। यह वायु ऊँचाई पर जाकर 30° उत्तरी तथा दक्षिणी अक्षांशों की ओर प्रवाहित होती है।

     वहाँ पहुँचकर वायु ठंडी होकर नीचे उतरती है, जिससे उपोष्ण कटिबंधीय उच्च दाब (Subtropical High Pressure) का निर्माण होता है। इसके बाद सतह के निकट यह वायु भूमध्यरेखा और मध्य अक्षांशों की ओर लौटती है, जिससे व्यापारिक पवनें और पश्चिमी पवनें बनती हैं।

30° अक्षांशों पर उच्च दाब बनने के कारण

1. ठंडी होकर अवरोही गति- भूमध्यरेखा से उठी गर्म वायु ऊँचाई पर जाकर 30° अक्षांशों के पास ठंडी होकर नीचे आने लगती है।

2. कोरिओलिस प्रभाव- वायु के विस्तार को सीमित करता है, जिससे वायु एकत्र होकर उच्च दाब क्षेत्र बनाती है।

3. ऊर्जा संतुलन- इस क्षेत्र में अवरोही वायु से आकाश साफ और शुष्क रहता है, जिससे उच्च दाब स्थिर रहता है।

(iii) उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति केवल समुद्रों पर ही क्यों होती है? उष्ण कटिबंधीय चक्रवात से किस भाग में मूसलाधार वर्षा होती है और उच्च वेग की पवनें चलती हैं, क्यों?

उत्तर- उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति केवल समुद्रों पर इसलिए होती है क्योंकि इनके बनने के लिए अत्यधिक ऊष्मा एवं नमी की आवश्यकता होती है। समुद्र की सतह का तापमान लगभग 26.5°C या उससे अधिक होने पर जल का तीव्र वाष्पीकरण होता है, जिससे वातावरण में भारी मात्रा में जलवाष्प एकत्रित हो जाती है।

    यह जलवाष्प ऊपर उठकर संघनित होती है और अंततः गुप्त ऊष्मा (latent heat) के रूप में ऊर्जा मुक्त करती है। यही ऊर्जा चक्रवात को शक्ति प्रदान करती है।

   ठीक इसके विपरीत स्थलीय भागों पर इतनी नमी और ऊष्मा उपलब्ध नहीं हो पाती, इसलिए चक्रवातों की उत्पत्ति वहाँ नहीं होती।

    उष्ण कटिबंधीय चक्रवात में मूसलाधार वर्षा और उच्च वेग की पवनें मुख्यतः आई-वॉल (Eye Wall) क्षेत्र में होती हैं। आई-वॉल चक्रवात का सबसे सक्रिय, ऊर्जावान और खतरनाक भाग होता है, जहाँ तीव्र ऊपर उठती वायु धाराएँ, अत्यधिक संघनन तथा भारी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होने से अत्यधिक वर्षा होती है।

   इस क्षेत्र में दाब अत्यंत कम और दाब प्रवणता अत्यधिक तीव्र होने के कारण पवनें अत्यधिक वेग से बहने लगती हैं। इसके विपरीत, चक्रवात के केंद्र में स्थित आई (Eye) में मौसम अपेक्षाकृत शांत तथा वर्षा कम होती है।

    इस प्रकार, समुद्री ऊष्मा, नमी और वायुदाब की भिन्नताएँ चक्रवात को जन्म देती हैं तथा आई-वॉल क्षेत्र को सबसे अधिक विनाशकारी बनाती हैं।

Chapter 11 Water in the Atmosphere (वायुमंडल में जल)

Chapter 11 Water in the Atmosphere

(वायुमंडल में जल)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 11 Water in the Atmosphere

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) मानव के लिए वायुमण्डल का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक निम्नलिखित में से कौन-सा है-

(क) जलवाष्प

(ख) धूल कण

(ग) नाइट्रोजन

(घ) ऑक्सीजन

उत्तर- (घ) ऑक्सीजन

व्याख्या:

     मनुष्य के जीवन के लिए वायुमंडल का सबसे महत्वपूर्ण घटक ऑक्सीजन है, क्योंकि इसका उपयोग श्वसन प्रक्रिया (respiration) में होता है। मनुष्य एवं अन्य प्राणियों को जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन आवश्यक है। हालाँकि नाइट्रोजन वायुमंडल में सबसे अधिक मात्रा में पाई जाती है, लेकिन यह मानव शरीर के लिए सीधे उपयोगी नहीं होती।

(ii) निम्नलिखित में से वह प्रक्रिया कौन सी है जिसके द्वारा जल द्रव से गैस में बदल जाता है-

(क) संघनन

(ख) वाष्पीकरण

(ग) वाष्पोत्सर्जन

(घ) अवक्षेपण

उत्तर- (ख) वाष्पीकरण

व्याख्या:

   वाष्पीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें द्रव अवस्था का जल गर्मी प्राप्त करके गैस (जलवाष्प) में परिवर्तित हो जाता है। यह जल चक्र की एक प्रमुख प्रक्रिया है।

(iii) निम्नलिखित में से कौन-सा वायु की उस दशा को दर्शाता है जिसमें नमी उसकी पूरी क्षमता के अनुरूप होती है?

(क) सापेक्ष आर्द्रता

(ख) निरपेक्ष आर्द्रता

(ग) विशिष्ट आर्द्रता

(घ) संतृप्त हवा

उत्तर- (घ) संतृप्त हवा

व्याख्या:

   जब वायु में मौजूद नमी (जलवाष्प) उसकी अधिकतम धारण क्षमता के बराबर हो जाती है, तब उस वायु को संतृप्त हवा (Saturated Air) कहा जाता है। इस अवस्था में वायु और अधिक नमी धारण नहीं कर सकती, और तापमान कम होने पर संघनन शुरू हो जाता है।

(iv) निम्नलिखित प्रकार के बादलों में से आकाश में सबसे ऊँचा बादल कौन-सा है?

(क) पक्षाभ

(ख) वर्षा मेघ

(ग) स्तरी

(घ) कपासी

उत्तर- (क) पक्षाभ

व्याख्या:

    पक्षाभ बादल (Cirrus Clouds) आकाश में सबसे ऊँचाई पर पाए जाते हैं। ये लगभग 8–12 किमी (कुछ मामलों में 13 किमी तक) की ऊँचाई पर बनते हैं और बहुत पतले, रेशेदार तथा सफेद दिखाई देते हैं। अन्य बादल इससे नीचे की ऊँचाइयों पर पाए जाते हैं।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) वषर्ण के तीन प्रकारों के नाम लिखें।

उत्तर- उत्पत्ति के आधार पर वर्षा के तीन प्रमुख प्रकारों में बाँटा जा सकता है-

1. संवहनीय वर्षण (Convectional Rainfall)

2. वर्षा-छाया या पर्वतीय/औरोgraphic वर्षण (Orographic Rainfall)

3. चक्रवाती या मौसमी/फ्रंटल वर्षण (Cyclonic or Frontal Rainfall)

     ये तीनों प्रकार ताप, स्थलरूप और वायु दाब की भिन्न स्थितियों के कारण उत्पन्न होते हैं।

(ii) सापेक्ष आर्द्रता की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- सापेक्ष आर्द्रता वह अनुपात है जिसमें वायु में विद्यमान वास्तविक जलवाष्प की मात्रा को उसी तापमान पर वायु द्वारा धारण की जा सकने वाली अधिकतम जलवाष्प की मात्रा से तुलना की जाती है। इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है और यह वायु की नमी की स्थिति बताती है।

(iii)  ऊँचाई के साथ जलवाष्प की मात्रा तेजी से क्यों बढ़ती है?

उत्तर- ऊँचाई बढ़ने पर जलवाष्प की मात्रा तेजी से नहीं बढ़ती, बल्कि तेजी से घटती है क्योंकि ऊँचाई पर वायुदाब कम हो जाता है और तापमान घटने से वायु की नमी धारण करने की क्षमता कम हो जाती है। इसलिए ऊँचाई बढ़ने पर जलवाष्प की मात्रा घटती जाती है।

(iv) बादल कैसे बनते हैं? बादलों का वर्गीकरण कीजिए।

उत्तर- बादल तब बनते हैं जब जलवाष्प ठंडी हवा में पहुँचकर सूक्ष्म कणों पर संघनित होकर अत्यंत छोटे जलकणों या बर्फ कणों में बदल जाती है।

    बादलों का वर्गीकरण ऊँचाई के आधार पर होता है- उच्च (सिरस), मध्य (ऑल्टो), निम्न (स्ट्रेटस), ऊर्ध्वमुखी विकास वाले (क्यूम्यलस/क्यूम्यलोनीम्बस)।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) विश्व के वर्षण वितरण के प्रमुख लक्षणों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- विश्व में वर्षण (Precipitation) का वितरण अत्यंत असमान और विविध है, जो भौगोलिक अक्षांश, स्थलाकृति, महासागरीय धाराओं तथा वायु दाब प्रणालियों से प्रभावित होता है।

    भूमध्यरेखा के निकट (0°- 10° अक्षांश) सर्वाधिक वर्षण पाया जाता है, क्योंकि यहाँ वर्षभर तीव्र संवहन के कारण उष्णकटिबंधीय वर्षा होती रहती है। इसके विपरीत, 20°- 30° अक्षांश वाले उपोष्णकटिबंधीय उच्च दाब क्षेत्रों में बहुत कम वर्षण होता है; सहारा, अरब तथा ऑस्ट्रेलिया के रेगिस्तान इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

     पर्वतीय क्षेत्रों में ओरोग्राफिक प्रभाव के कारण पवनाभिमुख ढालों पर अधिक वर्षा तथा पवनछाया में कम वर्षण होता है। तापमान में कमी के कारण ध्रुवीय क्षेत्रों में वर्षण अत्यंत कम होता है, जिसे शीत मरुस्थल कहा जाता है।

    गर्म महासागरीय धाराएँ तटीय क्षेत्रों में वर्षण बढ़ाती हैं जबकि ठंडी धाराएँ इसे घटाती हैं। इस प्रकार, विश्व में वर्षण का वितरण जलवायु, स्थलरूप और वायुमंडलीय प्रवाह पर आधारित स्पष्ट भौगोलिक पैटर्न प्रस्तुत करता है।

(ii) संघनन के कौन-कौन से प्रकार हैं? ओस एवं तुषार के बनने के प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- संघनन के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं-

1. ओस (Dew)

2. तुषार/पाला (Frost)

3. कुहासा (Fog)

4. धुंध (Mist)

5. बादल (Clouds)

6. कोहरा (Haze)

ओस बनने की प्रक्रिया:

     रात्रि में जब पृथ्वी की सतह और उसके निकट की वस्तुएँ विकिरण के कारण अत्यधिक ठंडी हो जाती हैं, तो उनके संपर्क में आने वाली वायु का तापमान ओसांक (Dew Point) तक पहुँच जाता है।

     इससे वायु में उपस्थित जलवाष्प तरल रूप में परिवर्तित होकर घास, पत्तियों और धातु की सतहों पर छोटे-छोटे कणों के रूप में जम जाती है, जिसे ओस कहते हैं। यह आमतौर पर साफ, शांत और शुष्क रातों में बनती है।

तुषार (Frost) बनने की प्रक्रिया:

      जब सतह का तापमान ओसांक से भी नीचे गिरकर हिमांक बिंदु (0°C) से कम हो जाता है, तब जलवाष्प सीधे ठोस बर्फ क्रिस्टलों के रूप में जम जाती है। इस प्रक्रिया को अवक्षेपण (Deposition) कहते हैं। इस प्रकार बनने वाले बर्फ के स्फटिकों को तुषार/पाला कहा जाता है।

Chapter 12 World Climate and Climate Change (विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन)

Chapter 12 World Climate and Climate Change

(विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 12 World Climate

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्नलिखित में से कौन-सा साल विश्व का सबसे गर्म साल माना गया है।

(क) 1990

(ख) 1998

(ग) 1885

(घ) 1950

उत्तर- (ख) 1998

व्याख्या:

    1998 में बहुत मजबूत एल नीनो घटना हुई थी, और उस समय इसे अब तक का सबसे गर्म वर्ष माना जाता था।

(ii) नीचे लिखे गए चार जलवायु के समूहों में से कौन-सा समूह आर्द्र दशाओं को प्रदर्शित करता है।

(क) A-B-C-D

(ख) A-C-D-E

(ग) B-C-D-E

(घ) A-C-D-F

उत्तर- (ख) A-C-D-E

व्याख्या:

   कोपेन (Köppen) जलवायु वर्गीकरण में-

⇒ A = उष्ण आर्द्र जलवायु (Humid Tropical)

⇒ C = समशीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Humid Temperate)

⇒ D = शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Humid Continental)

⇒ E = ध्रुवीय जलवायु (Polar) – यह शुष्क नहीं मानी जाती, बल्कि ठंडी एवं सामान्यतः आर्द्र श्रेणी में रखी जाती है।

   इसलिए A, C, D, E जलवायु समूह आर्द्र दशाओं को प्रदर्शित करते हैं।

अतः सही विकल्प है (ख) A–C–D–E।

(iii) निम्नलिखित में किस प्रकार के क्षेत्र में कोपेन की H जलवायु पायी जाती है?

(क) उच्च अक्षांश

(ख) उच्च पर्वतीय क्षेत्र

(ग) उच्च तापमान

(घ) अधिक वर्षा

उत्तर- (ख) उच्च पर्वतीय क्षेत्र

व्याख्या:

     कोपेन की H जलवायु Highland Climate (उच्च पर्वतीय जलवायु) को दर्शाती है। यह उन क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ ऊँचाई अधिक होती है और तापमान ऊँचाई के साथ कम हो जाता है। इसलिए इसका संबंध अक्षांश या सामान्य तापमान से नहीं, बल्कि ऊँचाई (Altitude) से होता है।

इसलिए सही विकल्प है → (ख) उच्च पर्वतीय क्षेत्र

(iv) कोपेन द्वारा जलवायु वर्गीकरण के क्या आधार हैं?

(क) तापमान एवं वृष्टि के मासिक मान

(ख) वृष्टि एवं वाष्पीकरण के मासिक मान

(ग) निरपेक्ष एवं सापेक्ष आर्द्रता के मासिक मान

(घ) वाष्पोत्सर्जन के मासिक मान

उत्तर- (क) तापमान एवं वृष्टि के मासिक मान

व्याख्या:

   कोपेन (Köppen) का जलवायु वर्गीकरण मुख्यतः दो प्रमुख तत्वों पर आधारित है-

1. तापमान के मासिक औसत

2. वृष्टि (Rainfall) के मासिक औसत

   इन्हीं दोनों के आधार पर विश्व की जलवायु को विभिन्न प्रमुख व उप-प्रकारों में बाँटा गया है। इसलिए विकल्प (क) सही है।

(v) कोपेन के A प्रकार की जलवायु के लिए निम्न में से कौन-सी दशा अर्हक हैं?

(क) सभी महीनों में उच्च वर्षा

(ख) सबसे ठंडे महीने का औसत मासिक तापमान हिमांक बिंदु से अधिक

(ग) सभी महीनों का औसत मासिक तापमान 18° सेल्सियस से अधिक

(घ) सभी महीनों का औसत तापमान 10° सेल्सियस से नीचे

उत्तर- (क) सभी महीनों में उच्च वर्षा

कारण (Köppen A-type Climate – Tropical Climate):

Köppen की जलवायु वर्गीकरण में A प्रकार (Tropical Climate) की मुख्य अर्हक (criterion) है- सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान भी 18°C से अधिक होना चाहिए।

यही कथन विकल्प (ग) में दिया गया है (सभी महीनों का तापमान 18°C से अधिक)।

(vi) जलवायु के वर्गीकरण से संबंधित कोपेन की पद्धति को व्यक्त किया जा सकता है-

(क) अनुप्रयुक्त

(ख) व्यवस्थित

(ग) जननिक

(घ) आनुभविक

उत्तर- (घ) आनुभविक

व्याख्या:

     कोपेन की जलवायु वर्गीकरण पद्धति आनुभविक (Empirical) है, क्योंकि यह तापमान और वर्षा के वास्तविक (observed) मासिक आँकड़ों पर आधारित होती है।

(vii) भारतीय प्रायद्वीप के अधिकतर भागों को कोपेन की पद्धति के अनुसार वर्गीकृत किया जायेगा-

(क) “Af”

(ख) “BSh”

(ग) “Cfb”

(घ) “Am”

उत्तर- (ख) “BSh”

व्याख्या:

   भारतीय प्रायद्वीप का अधिकांश भाग (विशेषकर दक्कन पठार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना आदि) अर्ध-शुष्क और उष्णकटिबंधीय स्टेपीय (Semi-arid) स्थितियों वाला है, जिसे कोपेन के “BSh” जलवायु प्रकार में रखा जाता है।

अन्य विकल्प क्यों नहीं:

  • Af – भूमध्यरेखीय सदाबहार वर्षावन जलवायु → भारत में केवल अंडमान-निकोबार व पश्चिमी घाट के कुछ भाग।
  • Cfb – सागरीय/नम-समशीतोष्ण जलवायु → भारत में शिलांग तथा ऊँचे पहाड़ी भागों में सीमित।
  • Am – मानसूनी जलवायु → केवल पश्चिमी घाट और तटीय क्षेत्रों में प्रमुख, प्रायद्वीप के “अधिकांश” भाग में नहीं।

   इसलिए सही विकल्प BSh है।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) जलवायु के वर्गीकरण के लिए कोपेन के द्वारा किन दो जलवायविक चरों का प्रयोग किया गया है?

उत्तर- कोपेन ने जलवायु के वर्गीकरण के लिए मुख्यतः दो जलवायविक चरों का प्रयोग किया है-

1. तापमान (Temperature)

2. वर्षा/वृष्टि (Precipitation) 

    इन्हीं दोनों के मासिक मानों के आधार पर विश्व की विभिन्न जलवायु प्रकार निर्धारित किए गए हैं।

(ii) वर्गीकरण की जननिक प्रणाली आनुभाविक प्रणाली से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तर- जननिक प्रणाली (Genetic classification) जलवायु को नियंत्रित करने वाले कारणों जैसे वायुमंडलीय परिसंचरण, दाब पद्धतियाँ और ऊष्मा कारक के आधार पर वर्गीकृत करती है। जबकि आनुभाविक (Empirical) प्रणाली वास्तविक अवलोकित आँकड़ों- तापमान, वर्षा, आर्द्रता आदि पर आधारित होती है। इसलिए एक कारण आधारित है, दूसरी आँकड़ा आधारित।

(iii) किस प्रकार की जलवायुओं में तापांतर बहुत कम होता है?

उत्तर- उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु में वार्षिक तापांतर बहुत कम तथा वर्षा अधिक होती है। इस प्रकार की जलवायु मकर रेखा और कर्क रेखा के बीच पाई जाती है।

(iv) सौर कलंकों में वृद्धि होने पर किस प्रकार की जलवायविक दशाएँ प्रभावित होंगी?
उत्तर- सौर कलंकों में वृद्धि होने पर सूर्य से आने वाला विकिरण थोड़ा बढ़ जाता है, जिससे पृथ्वी पर तापमान में हल्की वृद्धि हो सकती है। इससे मौसमी पैटर्न, मानसूनी वर्षा, समुद्री धाराएँ और वायुमंडलीय परिसंचरण जैसे जलवायविक तत्व प्रभावित होते हैं, जिससे जलवायु में अल्पकालिक परिवर्तन दिखाई देते हैं।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) A एवं B प्रकार की जलवायुओं की जलवायविक दशाओं की तुलना करें।

उत्तर- A तथा B प्रकार की जलवायुओं की तुलना

       कोपेन के जलवायु वर्गीकरण में A-प्रकार (उष्णकटिबंधीय जलवायु) तथा B-प्रकार (शुष्क जलवायु) दो अत्यंत भिन्न जलवायविक क्षेत्र हैं।
A-प्रकार जलवायु में पूरे वर्ष उच्च तापमान पाया जाता है तथा सभी महीनों में औसत तापमान 18°C से अधिक रहता है। यहाँ वर्षा प्रचुर मात्रा में होती है, विशेषकर भूमध्य रेखा के निकट इन क्षेत्रों में 150–300 सेमी तक वार्षिक वर्षा मिलती है। नमी अधिक होने के कारण वनस्पति सघन होती है और वर्षा व तापमान दोनों का मौसमी अंतर कम होता है।

    इसके विपरीत B-प्रकार जलवायु को शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों की जलवायु कहा जाता है। यहाँ वर्षा बहुत कम (25–50 सेमी या उससे भी कम) होती है और वाष्पीकरण की दर वर्षा से बहुत अधिक रहती है। तापमान का दैनिक तथा वार्षिक अंतर काफी बड़ा पाया जाता है। वनस्पति विरल होती है और मरुस्थलीय परिस्थितियाँ प्रमुख रहती हैं।

     इस प्रकार, A-प्रकार गर्म-नम और B-प्रकार गर्म-शुष्क जलवायु का प्रतिनिधित्व करते हैं।

(ii) C एवं A प्रकार की जलवायु में आप किस प्रकार की वनस्पति पाएंगे?

उत्तर- कोपेन के A (उष्णकटिबंधीय) तथा C (समशीतोष्ण) प्रकार की जलवायु में पाई जाने वाली वनस्पति उनके तापमान और वर्षा के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है।

     A प्रकार (उष्णकटिबंधीय जलवायु) में वर्ष भर उच्च तापमान (18°C से अधिक) तथा प्रचुर वर्षा होती है। यहाँ घने उष्णकटिबंधीय वर्षावन, सदाबहार वृक्ष, महोगनी, आबनूस, रबर, नारियल, बांस, पाम आदि प्रमुख हैं। कुछ क्षेत्रों में मानसूनी प्रभाव के कारण उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन भी मिलते हैं, जिनमें साल, सागौन, बबूल, जामुन आदि पाए जाते हैं।

    C प्रकार (समशीतोष्ण मृदु जलवायु) में तापमान मध्यम होता है और वर्षा पूरे वर्ष या मुख्यतः सर्दियों में होती है। यहाँ समशीतोष्ण मिश्रित वन, पर्णपाती वृक्ष, ओक, बीच, मेपल, पॉपलर जैसे वृक्ष प्रमुख होते हैं। भूमध्यसागरीय क्षेत्रों (Csa/Csb) में कठोर पत्तों वाले सख्त-पर्णी झाड़ीदार वन (स्क्लेरोफिलस वन) और ऑलिव, पाइंस जैसी प्रजातियाँ मिलती हैं।

    इस प्रकार, A जलवायु में घने उष्णकटिबंधीय वन जबकि C जलवायु में मिश्रित और पर्णपाती समशीतोष्ण वनस्पति पाई जाती है।

(iii) ग्रीन हाउस गैसों से आप क्या समझते हैं? ग्रीन हाउस गैसों की एक सूची तैयार करें।

उत्तर- ग्रीन हाउस गैसें (Greenhouse Gases) वे गैसें हैं जो पृथ्वी के वायुमंडल में उपस्थित होकर सूर्य से आने वाली ऊष्मा को अवशोषित करती हैं और पुनः विकिरित करती हैं। इससे पृथ्वी का तापमान बढ़ा रहता है, जिसे ग्रीनहाउस प्रभाव कहा जाता है।

    ये गैसें प्राकृतिक रूप से भी बनती हैं और मानव गतिविधियों जैसे जीवाश्म ईंधन का दहन, कृषि, उद्योग और वनों की कटाई से अत्यधिक मात्रा में बढ़ जाती हैं। ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि वैश्विक तापन (Global Warming) और जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण है, जिसके परिणामस्वरूप समुद्र स्तर में वृद्धि, सूखा, बाढ़ और मौसम की चरम घटनाएँ बढ़ रही हैं।

ग्रीन हाउस गैसों की सूची:

1. कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)

2. मीथेन (CH₄)

3. नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O)

4. ओजोन (O₃)

5. क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs)

6. जलवाष्प (H₂O)   

    ये सभी गैसें पृथ्वी के ऊष्मा संतुलन को प्रभावित करती हैं।

Chapter 13 Oceanic Water (महासागरीय जल)

Chapter 13 Oceanic Water

(महासागरीय जल)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 13 Oceanic Water

 

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) उस तत्त्व की पहचान करें जो जलीय चक्र का भाग नहीं है

(क) वाष्पीकरण

(ख) वर्षण

(ग) जलयोजन

(घ) संघनन

उत्तर- (ग) जलयोजन

व्याख्या-

जलीय चक्र (Water Cycle) के मुख्य तत्व हैं-

⇒ वाष्पीकरण (Evaporation)

⇒ संघनन (Condensation)

⇒ वर्षन (Precipitation)

  लेकिन जलयोजन (Hydration) जल चक्र की प्रक्रिया का भाग नहीं है। यह एक रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें कोई पदार्थ पानी के साथ मिलकर हाइड्रेट बनाता है। इसलिए (ग) सही विकल्प है।

(ii) महाद्वीपीय ढाल की औसत गहराई निम्नलिखित के बीच होती है-

(क) 2-20 मीटर

(ख) 20-200 मीटर

(ग) 200-2,000 मीटर

(घ) 2,000-20,000 मीटर

उत्तर- (ख) 20-200 मीटर

व्याख्या:

   महाद्वीपीय ढाल (Continental Shelf) समुद्री तल का वह भाग है जो महाद्वीप के किनारे से धीरे-धीरे ढलान बनाते हुए समुद्र की ओर बढ़ता है। इसकी औसत गहराई सामान्यतः 20 से 200 मीटर के बीच होती है। इसके बाद ढाल अचानक अधिक ढलान वाली बनकर महाद्वीपीय ढालान (Continental Slope) में परिवर्तित हो जाती है।

(iii) निम्नलिखित में से कौन की लघु उच्चावच आकृति महासागरों में नहीं पाई जाती है?

(क) समुद्री टीला

(ख) महासागरीय गंभीर

(ग) प्रवाल द्वीप

(घ) निमग्न द्वीप

उत्तर- (ग) प्रवाल द्वीप

व्याख्या:

   प्रश्न में पूछा गया है कि कौन-सी “लघु उच्चावच आकृति” महासागरों में नहीं पाई जाती है?

⇒ महासागरीय गंभीर (Ocean Trench) बहुत बड़ी एवं विशाल आकृति होती है, न कि लघु उच्चावच।

⇒ शेष तीन (समुद्री टीला, प्रवाल द्वीप, निमग्न द्वीप) अपेक्षाकृत छोटे समुद्री भू-आकृतियों में गिने जाते हैं।

    इसलिए महासागरीय गंभीर यहाँ उपयुक्त उत्तर है।

(iv) निम्न में से कौन-सा सबसे छोटा महासागर है?

(क) हिंद महासागर

(ख) अटलांटिक महासागर

(ग) आर्कटिक महासागर

(घ) प्रशांत महासागर

उत्तर- (ग) आर्कटिक महासागर

व्याख्या:

    आर्कटिक महासागर पृथ्वी का सबसे छोटा और सबसे उथला महासागर है। यह उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र में स्थित है और अन्य सभी महासागरों की तुलना में आकार में सबसे छोटा होता है।

(v) लवणता को प्रति समुद्री जल में घुले हुए नमक (ग्राम) की मात्रा से व्यक्त किया जाता है-

(क) 10 ग्राम

(ख) 100 ग्राम

(ग) 1,000 ग्राम

(घ) 10,000 ग्राम

उत्तर- (ग) 1,000 ग्राम

व्याख्या:

    लवणता (Salinity) को प्रति 1,000 ग्राम (अर्थात् 1 किलोग्राम) समुद्री जल में घुले हुए कुल नमक की मात्रा के रूप में व्यक्त किया जाता है।

   इसे “Parts per thousand (‰)” में भी मापा जाता है। सामान्य समुद्री जल की लवणता लगभग 35‰ होती है, जिसका अर्थ है — 1,000 ग्राम समुद्री जल में लगभग 35 ग्राम नमक।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) हम पृथ्वी को नीला ग्रह क्यों कहते हैं?

उत्तर- पृथ्वी को नीला ग्रह इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी सतह का लगभग 71% भाग जल से ढका है। अंतरिक्ष से देखने पर महासागरों का नीला रंग स्पष्ट दिखाई देता है, जिससे पृथ्वी अन्य ग्रहों की तुलना में नीली चमकती हुई दिखती है।

(ii) महाद्वीपीय सीमांत क्या होता है?

उत्तर- महाद्वीपीय सीमांत वह भाग है जहाँ महाद्वीप समुद्र में धीरे-धीरे ढलान के रूप में समाप्त होता है। इसमें महाद्वीपीय शेल्फ, महाद्वीपीय ढाल और महाद्वीपीय उठान शामिल होते हैं। यह क्षेत्र जैव विविधता, खनिज संसाधनों और समुद्री जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

(iii) विभिन्न महासागरों के सबसे गहरे गर्तों की सूची बनाइए।

उत्तर- ये महासागरों के सबसे गहरे भाग होते हैं। अभी तक लगभग 57 गर्तों को खोजा गया है, जिसमें से 32 प्रशांत महासागर में, 19 अटलांटिक महासागर में एवं 6 हिंद महासागर में हैं।

     विभिन्न महासागरों के सबसे गहरे गर्त इस प्रकार हैं-

⇒ प्रशांत महासागर: मैरियाना गर्त (चैलेंजर डीप) – लगभग 11,000 मीटर

⇒ अटलांटिक महासागर: प्यूर्टो रिको गर्त – लगभग 8,376 मीटर

⇒ हिंद महासागर: जावा या सुंडा गर्त  – लगभग 7,725 मीटर

⇒ आर्कटिक महासागर: मोलॉय डीप – लगभग 5,550 मीटर

(iv) ताप प्रवणता क्या है?

उत्तर- समुद्र में ताप प्रवणता (Thermocline) वह परत होती है जिसमें गहराई बढ़ने के साथ तापमान तेजी से घटता है। यह सतह के गर्म जल और नीचे के ठंडे जल के बीच स्थित संक्रमण क्षेत्र है। यहाँ तापमान में तेज गिरावट समुद्री जल के घनत्व और धाराओं को प्रभावित करती है।

(v) समुद्र में नीचे जाने पर आप ताप की किन परतों का सामना करेंगे? गहराई के साथ तापमान में भिन्नता क्यों आती है?

उत्तर- समुद्र में नीचे जाने पर तीन ताप-परतें मिलती हैं- ऊपरी ऊष्मीय परत, थर्मोक्लाइन, और गहरी शीतल परत। गहराई बढ़ने पर सूर्य का प्रकाश कम पहुँचता है, ऊष्मा अवशोषण घटता है तथा दाब बढ़ता है, इसलिए तापमान क्रमशः घटता जाता है और गहरे जल में स्थायी ठंडक रहती है।

(vi) समुद्री जल की लवणता क्या है?

उत्तर- समुद्री जल की लवणता से तात्पर्य प्रति किलोग्राम समुद्री जल में घुले हुए नमक की मात्रा से है। सामान्यतः समुद्री जल की औसत लवणता लगभग 35‰ (35 ग्राम प्रति किलोग्राम) होती है। यह वाष्पीकरण, वर्षा, नदी-जल प्रवाह तथा तापमान के अनुसार स्थान-स्थान पर बदलती रहती है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) जलीय चक्र के विभिन्न तत्त्व किस प्रकार अंतर-संबंधित हैं?

उत्तर- जलीय चक्र, जिसे जल चक्र भी कहा जाता है, पृथ्वी पर जल के निरंतर संचरण की प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसके विभिन्न तत्त्व- वाष्पीकरण, संघनन, वर्षण, अवक्षण, प्रवाह, भू-जल पुनर्भरण तथा वाष्पोत्सर्जन आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।

    सबसे पहले सूर्य की ऊर्जा महासागरों, नदियों और झीलों के जल को गरम करती है, जिससे वाष्पीकरण होता है। पौधों द्वारा पत्तियों से जल का उत्सर्जन वाष्पोत्सर्जन कहलाता है। वायुमंडल में उठी जल-वाष्प ठंडी होकर संघनन के रूप में बादलों का निर्माण करती है। बादलों में नमी की अधिकता होने पर वर्षण (बारिश, हिमपात या ओलावृष्टि) पृथ्वी की सतह पर गिरता है।

     वर्षा का जल दो मार्गों से आगे बढ़ता है-  कुछ भाग सतह से बहते हुए नदियों, झीलों और समुद्रों में पहुँच जाता है, जिसे सतही प्रवाह कहा जाता है। शेष जल भूमि में समा कर भू-जल पुनर्भरण करता है, जो बाद में सोतों, कुओं और नदियों के माध्यम से सतह पर वापस आता है।

      ये सभी तत्त्व एक निरंतर चक्र बनाते हैं जिसमें किसी एक प्रक्रिया में परिवर्तन अन्य प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है। इस प्रकार जलीय चक्र पृथ्वी के जल-संतुलन, जल उपलब्धता, जलवायु नियंत्रण और जीवन के संरक्षण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(ii) महासागरों के तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों का निरीक्षण कीजिए।

उत्तर- महासागरों के तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारक

1. अक्षांश (Latitude):-

    भूमध्य रेखा के निकट सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, जिससे तापमान अधिक होता है, जबकि ध्रुवों की ओर तापमान घटता जाता है। इसलिए तापमान का सबसे प्रमुख नियंत्रक अक्षांश है।

2. समुद्री धाराएँ (Ocean Currents):-

    गर्म धाराएँ (जैसे गल्फ स्ट्रीम) तटीय क्षेत्रों का तापमान बढ़ाती हैं, जबकि ठंडी धाराएँ (जैसे लैब्रेडोर करंट) तापमान कम कर देती हैं। इससे महासागर का क्षैतिज तापमान वितरण बदल जाता है।

3. वायु की दिशा एवं पवन प्रणाली (Wind System):-

    पवनें गर्म या ठंडी सतही जलराशि को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती हैं, जिससे सतही तापमान में परिवर्तन होता है।

4. गहराई (Depth):-

    गहराई बढ़ने पर सूर्य का प्रकाश कम मिलता है, इसलिए तापमान तेजी से घटता है। सतह पर तापमान सर्वाधिक तथा 1,000 मीटर से नीचे लगभग स्थिर रहता है।

5. भूमि-महासागर वितरण (Distribution of Land & Water):-

    भूमि के असमान वितरण के कारण उत्तरी गोलार्ध में तापमान असंतुलन अधिक पाया जाता है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में महासागरीय विस्तार अधिक होने से तापमान अपेक्षाकृत संतुलित रहता है।

6. लवणता (Salinity):-

     अधिक लवणता वाली जलराशि घनी होती है और ताप को तेजी से अवशोषित करती है, जिससे तापमान में अंतर देखा जाता है।

7. सौर ऊष्मा का मौसमी परिवर्तन (Seasonal Changes):-

    ग्रीष्म में तापमान बढ़ता है और शीत ऋतु में घटता है, जिससे सतही तापमान में क्षेत्रीय भिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं।

Chapter 14 Movements of Oceanic Water (महासागरीय जल संचलन)

Chapter 14 Movements of Oceanic Water

(महासागरीय जल संचलन)

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Chapter 14 Movements of Oceanic Water

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) महासागरीय जल की ऊपर एवं नीचे गति किससे संबंधित है

(क) ज्वार

(ख) तरंग

(ग) धाराएँ

(घ) ऊपर में से कोई नहीं

उत्तर- (ख) तरंग

व्याख्या:

     महासागरीय जल की ऊपर-नीचे (up and down) गति मुख्य रूप से तरंगों (Waves) से संबंधित होती है। तरंगें हवा के प्रभाव से समुद्र की सतह पर बनती हैं और ये जल को ऊपर-नीचे चलाती हैं।

⇒ ज्वार (Tides) – समुद्र जल का नियमित ऊपर-नीचे उठना-गिरना है, लेकिन यह पूरे समुद्र स्तर पर होता है।

⇒ धाराएँ (Currents) – समुद्र जल का क्षैतिज दिशा में बहाव दर्शाती हैं।

    इसलिए, प्रश्न में “ऊपर एवं नीचे गति” विशेष रूप से तरंगों द्वारा होती है।

(ii) वृहत् ज्वार आने का क्या कारण है?

(क) सूर्य और चन्द्रमा का पृथ्वी पर एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल

(ख) सूर्य और चन्द्रमा द्वारा एक-दूसरे की विपरीत दिशा से पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बल

(ग) तटरेखा का दंतुरित होना

(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (क) सूर्य और चन्द्रमा का पृथ्वी पर एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल

व्याख्या:

     वृहत् ज्वार (Spring Tide) आने का कारण है-

सूर्य और चन्द्रमा का पृथ्वी पर एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल लगाना।

⇒ जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में होते हैं (अमावस्या और पूर्णिमा के समय), तब दोनों का गुरुत्वाकर्षण बल मिलकर ज्वार की ऊँचाई को बहुत बढ़ा देता है। इसी को वृहत् ज्वार कहा जाता है।

(iii) पृथ्वी और चन्द्रमा की न्यूनतम दूरी कब होती है?

(क) अपसौर

(ख) उपसौर

(ग) उपभू

(घ) अपभू

उत्तर- (ग) उपभू

व्याख्या:

     जब चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है, उस अवस्था को उपभू (Perigee) कहा जाता है।

⇒ उपभू = पृथ्वी और चन्द्रमा की न्यूनतम दूरी

⇒ अपभू (Apogee) = पृथ्वी और चन्द्रमा की अधिकतम दूरी

⇒ उपसौर/अपसौर सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी के लिए उपयोग किए जाते हैं।

(iv) पृथ्वी और चन्द्रमा की न्यूनतम दूरी कब होती है?

(क) अक्टूबर

(ख) जुलाई

(ग) सितम्बर

(घ) जनवरी

उत्तर- (घ) जनवरी

व्याख्या:

    सही उत्तर इनमें से कोई भी विकल्प शत-प्रतिशत सही नहीं है, क्योंकि पृथ्वी और चन्द्रमा की न्यूनतम दूरी “उपभू (Perigee)” पर होती है, और उपभू हर 27.3 दिन (एक चन्द्र मास) में आता है, किसी एक निर्धारित महीने में नहीं।

      लेकिन यदि यह प्रश्न महीने के आधार पर एक उत्तर चुनने के लिए दिया गया है, तो परीक्षा में सामान्यतः माना जाता है कि:

➡ जनवरी (घ)
    क्योंकि जनवरी में पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट (उपसौर) होती है, जिससे पृथ्वी-चन्द्रमा दूरी कई वर्षों में औसतन थोड़ी कम पाई जाती है।

अतः परीक्षा-उन्मुख उत्तर: (घ) जनवरी

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) तरंगें क्या हैं?

उत्तर- तरंगें वास्तव में ऊर्जा हैं। तरंगों में जल का कण छोटे वृत्ताकार रूप में गति करते हैं। वायु जल को ऊर्जा प्रदान करती है जिससे तरंगें उत्पन्न होती हैं। वायु के कारण तरंगें महासागर में गति करती हैं तथा ऊर्जा तटरेखा पर निर्मुक्त होती हैं।

    दूसरे शब्दों में तरंगें जल की वह गति हैं जिसमें जल के कण ऊपर-नीचे दोलन करते हैं, परंतु वे आगे नहीं बढ़ते। केवल तरंग का रूप आगे बढ़ता है। यह मुख्यतः हवा के दबाव और वेग से उत्पन्न होती हैं। समुद्र की सतह पर दिखाई देने वाली ऊँच-नीच यही तरंगें कहलाती हैं।

(ii) महासागरीय तरंगें ऊर्जा कहाँ से प्राप्त करती हैं?

उत्तर- वायु के कारण तरंगें महासागर में गति करती हैं तथा ऊर्जा तटरेखा पर निर्मुक्त होती हैं। बड़ी तरंगें खुले महासागरों में पायी जाती हैं। तरंगें जैसे ही आगे की ओर बढ़ती हैं बड़ी होती जाती हैं तथा वायु से ऊर्जा को अवशोषित करती हैं।

        दूसरे शब्दों में महासागरीय तरंगें मुख्य रूप से वायु (हवा) के प्रवाह से ऊर्जा प्राप्त करती हैं। जब तेज हवा समुद्र की सतह पर बहती है तो वह घर्षण पैदा करती है, जिससे पानी की सतह पर तरंगें बनती हैं। इसके अलावा भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट और चन्द्रमा-सूर्य के गुरुत्वाकर्षण भी कुछ तरंगों को ऊर्जा प्रदान करते हैं।

(iii) ज्वार-भाटा क्या है?

उत्तर- ज्वारभाटा समुद्र के जलस्तर का नियमित रूप से ऊपर उठना और नीचे गिरना है। यह मुख्यतः चन्द्रमा तथा कुछ हद तक सूर्य के गुरुत्वाकर्षण आकर्षण के कारण होता है। जलस्तर का बढ़ना ज्वार तथा घटकर न्यूनतम स्तर पर पहुँच जाना भाटा कहलाता है। यह प्रक्रिया प्रतिदिन दो बार होती है।

(iv) ज्वार-भाटा उत्पन्न होने के क्या कारण हैं?

उत्तर- ज्वार-भाटा उत्पन्न होने के मुख्य कारण निम्नलिखित है-

1. चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण – ज्वार-भाटा का सबसे बड़ा कारण चन्द्रमा का पृथ्वी के महासागरों पर आकर्षण बल है।

2. सूर्य का गुरुत्वाकर्षण – सूर्य भी ज्वार-भाटा को प्रभावित करता है, हालांकि इसका प्रभाव चन्द्रमा से कम होता है।

3. पृथ्वी का घूर्णन – पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है, जिससे जलस्तर में नियमित उतार-चढ़ाव होता है।

4. सूर्य-चन्द्रमा-पृथ्वी की स्थिति – जब सूर्य और चन्द्रमा एक सीध में होते हैं, तो वृहत् ज्वार (Spring tide) बनती है; विपरीत स्थिति में क्षीण ज्वार (Neap tide)।

5. समुद्री तटरेखा का आकार – खाड़ी, मुहाना या संकरी तटीय संरचना में ज्वार की ऊँचाई बढ़ जाती है।

(v) ज्वार-भाटा नौका संचालन से कैसे संबंधित हैं?

उत्तर- ज्वार-भाटा नौका संचालन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऊँचा ज्वार (High Tide) होने पर समुद्र का जल स्तर बढ़ जाता है, जिससे जहाज और नौकाएँ आसानी से तट पर आ-जा सकती हैं तथा उथले स्थानों में भी संचरण सम्भव हो जाता है।

    कम ज्वार (Low Tide) के समय जल स्तर घटने से कई तटीय क्षेत्र उथले हो जाते हैं, जिससे नौकाओं के फँसने या टकराने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए बंदरगाहों में जहाजों की आवाजाही, माल लोडिंग-अनलोडिंग तथा नौकायन का समय प्रायः ज्वार-भाटा तालिकाओं के आधार पर निर्धारित किया जाता है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) जलधाराएँ तापमान को कैसे प्रभावित करती हैं ? उत्तर पश्चिम यूरोप के तटीय क्षेत्रों के तापमान को ये कैसे प्रभावित करते हैं?

उत्तर- जलधाराएँ (Ocean Currents) और तापमान पर उनका प्रभाव:

    जलधाराएँ महासागरों में बहने वाली विशिष्ट दिशा वाली गर्म तथा शीतल धाराएँ होती हैं, जो अपने साथ ताप ऊर्जा (Heat Energy) का स्थानांतरण करती हैं। गर्म जलधाराएँ जिन क्षेत्रों से गुजरती हैं, वहाँ का तापमान बढ़ा देती हैं, क्योंकि वे उष्ण कटिबंध से अधिक गर्म पानी को उच्च अक्षांशों की ओर ले जाती हैं।

    इसके विपरीत, शीत जलधाराएँ ध्रुवीय या शीत क्षेत्रों का ठंडा पानी भूमध्य रेखा की ओर ले जाती हैं और जिन तटों के पास बहती हैं, वहाँ तापमान घटा देती हैं। इस प्रकार जलधाराएँ किसी क्षेत्र के जलवायु नियंत्रण (Climate Regulation) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

उत्तर-पश्चिम यूरोप पर प्रभाव:

     उत्तर-पश्चिम यूरोप के तटीय क्षेत्रों के तापमान को मुख्य रूप से गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream) तथा उसकी शाखा नॉर्थ अटलांटिक ड्रिफ्ट प्रभावित करती है। ये गर्म जलधाराएँ मैक्सिको की खाड़ी से अत्यधिक गर्म पानी को यूरोप की ओर लेकर जाती हैं। परिणामस्वरूप-

⇒ ब्रिटेन, आयरलैंड, नॉर्वे व आस-पास के तटीय क्षेत्रों का सर्दी का तापमान अपेक्षाकृत अधिक रहता है।

⇒ समान अक्षांशों वाले कनाडा या रूस की तुलना में यहाँ ठंड कम पड़ती है।

⇒ बंदरगाह सालभर बर्फमुक्त रहते हैं, जिससे व्यापार व नौपरिवहन सुगम होता है।

    इस प्रकार जलधाराएँ उत्तर-पश्चिम यूरोप को अपेक्षाकृत मृदु तथा संतुलित जलवायु प्रदान करती हैं।

(ii) जलधाराएं कैसे उत्पन्न होती हैं?

उत्तर- जलधाराएँ (Ocean Currents) महासागरों में बहने वाली विशाल जल-धाराएँ हैं, जो पृथ्वी की जलवायु, तापमान और देशों के समुद्री व्यापार को प्रभावित करती हैं। इनका निर्माण कई भौतिक कारणों से होता है। जलधाराओं के उत्पन्न होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

जलधाराओं के उत्पन्न होने के कारण:

1. पवन (Wind):-

    समुद्री पवनें जैसे ट्रेड विंड्स और वेस्टरलीज सतही जल को धकेलती हैं, जिससे सतही जलधाराएँ बनती हैं।

2. तापमान का अंतर (Temperature Difference):-

       भूमध्य रेखा पर गर्म जल ऊपर उठता है और ध्रुवों की ओर बहता है, जबकि ठंडा जल नीचे की ओर डूबकर भूमध्य रेखा की ओर आता है। इस तापमान अंतर से जलधाराएँ उत्पन्न होती हैं।

3. लवणता (Salinity Difference):-

     अधिक लवणता वाला जल भारी होता है और नीचे की ओर जाता है, जबकि कम लवणता वाला जल ऊपर रहता है। इस घनत्व के अंतर से गहरी जलधाराएँ बनती हैं।

4. पृथ्वी का घूर्णन (Coriolis Force):-

    पृथ्वी के घूमने से जलधाराओं की दिशा मुड़ जाती है—उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर और दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर।

5. समुद्री तल का ढाल और आकार (Ocean Basin Relief):-

     समुद्र के तल पर पहाड़, घाटियाँ, ढलान और तटरेखाओं का आकार जलधाराओं की दिशा और गति को प्रभावित करते हैं।

6. ज्वार-भाटा (Tides):-

    चन्द्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से ज्वार-भाटा उत्पन्न होते हैं, जो तटीय क्षेत्रों में स्थानीय जलधाराएँ बनाते हैं।

निष्कर्ष:-

    जलधाराएँ कई प्राकृतिक कारकों के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती हैं और पृथ्वी की जलवायु प्रणाली का महत्वपूर्ण भाग हैं।

Chapter 15 Life on the Earth (पृथ्वी पर जीवन)

Chapter 15 Life on the Earth

(पृथ्वी पर जीवन)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 15 Life on the Earth

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्नलिखित में से कौन जैवमंडल में सम्मिलित हैं

(क) केवल पौधे

(ख) केवल प्राणी

(ग) सभी जैव व अजैव जीव

(घ) सभी जीवित जीव

उत्तर- (ग) सभी जैव व अजैव जीव

व्याख्या:

     जैवमंडल (Biosphere) में पृथ्वी के वे सभी भाग सम्मिलित होते हैं जहाँ जीवन पाया जाता है, और इसमें जैव घटक (जीवित – पौधे, प्राणी, सूक्ष्मजीव) तथा अजैव घटक (निर्जीव — वायु, जल, मृदा आदि) दोनों शामिल होते हैं।

(ii) उष्णकटिबंधीय घास के मैदान निम्न में से किस नाम से जाने जाते हैं

(क) प्रेयरी

(ख) स्टेपी

(ग) सवाना

(घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (ग) सवाना

व्याख्या:

       उष्णकटिबंधीय घास के मैदानों को सवाना (Savanna) कहा जाता है। ये क्षेत्र मुख्यतः अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में पाए जाते हैं, जहाँ वर्षा सीमित और मौसमी होती है।

(iii) चट्टानों में पाए जाने वाले लोहांश के साथ ऑक्सीजन मिलकर निम्नलिखित में से क्या बनाती है

(क) आयरन कार्बोनेट

(ख) आयरन ऑक्सइड

(ग) आयरन नाइट्राइट

(घ) आयरन सल्फेट

उत्तर- (ख) आयरन ऑक्सइड

व्याख्या:

     चट्टानों में मौजूद लोहा (Iron) जब ऑक्सीजन के संपर्क में आता है तो वह ऑक्सीकरण (oxidation) क्रिया द्वारा आयरन ऑक्साइड (Iron Oxide) बनाता है। यह प्रक्रिया “जंग लगना (rusting)” कहलाती है और चट्टानों के लाल या भूरे रंग का कारण भी यही है।

(iv) प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के दौरान, प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड जल के साथ मिलकर क्या बनाती है

(क) प्रोटीन

(ख) कार्बोहाइड्रेट्स

(ग) एमिनोएसिड

(घ) विटामिन

उत्तर- (ख) कार्बोहाइड्रेट्स

व्याख्या:

      प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया में पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और जल (H₂O) को मिलाकर कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज़ – C₆H₁₂O₆) और ऑक्सीजन (O₂) बनाते हैं।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।

(i) पारिस्थितिकी से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- पारिस्थितिकी (Ecology) वह विज्ञान है जिसमें जीवों और उनके परिवेश के बीच पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है। यह बताती है कि जीव अपने वातावरण में कैसे रहते हैं, एक-दूसरे पर कैसे निर्भर करते हैं तथा पर्यावरणीय कारकों जैसे जल, वायु, मिट्टी और प्रकाश से उनका क्या संबंध होता है।

(ii) पारितंत्र (Ecological System) क्या है? संसार के प्रमुख पारितंत्र प्रकारों को बताएँ।

उत्तर- पारितंत्र (Ecological System) जीवित (जैव) और निर्जीव (अजैव) तत्वों का ऐसा तंत्र है जो आपस में परस्पर क्रिया करके जीवन को बनाए रखता है। प्रमुख पारितंत्र प्रकार हैं- स्थलीय पारितंत्र (जैसे वन, मरुस्थल, घासभूमि) और जलीय पारितंत्र (जैसे मीठे जल और समुद्री पारितंत्र)।

(iii) खाद्य श्रृंखला क्या है? चराई खाद्य श्रृंखला का एक उदाहरण देते हुए उसके अनेक स्तर बताएं?

उत्तर- खाद्य श्रृंखला वह क्रम है जिसमें एक जीव दूसरे जीव को भोजन के रूप में खाता है और ऊर्जा एक स्तर से दूसरे स्तर तक प्रवाहित होती है।
उदाहरण (चराई खाद्य श्रृंखला):
घास → हिरण → बाघ।
      इसमें घास उत्पादक, हिरण प्राथमिक उपभोक्ता और बाघ द्वितीयक उपभोक्ता होता है।

अन्य उदाहरण –

♣ घास → हिरण → शेर।

♣ घास → कीट → मेढ़क → पक्षी।

(iv) खाद्य जाल (food wed) से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित बताएँ।

उत्तर- खाद्य जाल (Food Web) से तात्पर्य उस जटिल तंत्र से है जिसमें एक पारितंत्र (ecosystem) के अनेक खाद्य श्रृंखलाएँ (food chains) आपस में जुड़ी होती हैं। इसमें विभिन्न जीव एक-दूसरे पर भोजन के लिए निर्भर रहते हैं।
उदाहरण: घास → हिरण → बाघ तथा घास → खरगोश → लोमड़ी — ये मिलकर खाद्य जाल बनाते हैं।

(v) बायोम (Biome) क्या है?

उत्तर- बायोम (Biome) पृथ्वी की सतह पर पाया जाने वाला एक बड़ा भौगोलिक क्षेत्र होता है, जहाँ जलवायु, मिट्टी, वनस्पति और प्राणी एक समान प्रकार के होते हैं। उदाहरण के लिए – उष्णकटिबंधीय वर्षावन, मरुस्थल, घास के मैदान और टुंड्रा बायोम कहलाते हैं।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए।

(i) संसार के विभिन्न वन बायोम (Forest biomes) की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ का वर्णन करें।

उत्तर- संसार के विभिन्न वन बायोम की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ

     वन बायोम पृथ्वी के उन प्रमुख पारिस्थितिक तंत्रों को कहते हैं जहाँ वनस्पतियाँ और प्राणी विशिष्ट जलवायु एवं भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित होते हैं। इनकी प्रमुख किस्में हैं – उष्णकटिबंधीय वर्षावन, समशीतोष्ण वन, और शीतोष्ण (टैगा) वन।

(1) उष्णकटिबंधीय वर्षावन (Tropical Rain Forests):-

     ये भूमध्य रेखा के समीप स्थित क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जैसे अमेज़न बेसिन, कांगो, वेस्टर्न घाट आदि। यहाँ वर्षभर उच्च तापमान (25–30°C) और भारी वर्षा (200–400 से.मी.) होती है। पेड़ घने और ऊँचे होते हैं तथा जैव विविधता अत्यधिक होती है।

(2) समशीतोष्ण वन (Temperate Forests):-

    ये मध्यम अक्षांशों में पाए जाते हैं, जैसे यूरोप, उत्तर अमेरिका, चीन आदि। यहाँ चारों ऋतुएँ स्पष्ट होती हैं और पर्णपाती वृक्ष जैसे ओक, मेपल, बर्च प्रमुख हैं।

(3) शीतोष्ण या टाइगा वन (Taiga Forests):

     ये उच्च अक्षांशों में, जैसे कनाडा, रूस, और स्कैंडिनेविया में पाए जाते हैं। यहाँ सर्दी लंबी और कठोर होती है तथा वृक्षों में अधिकांश शंकुधारी प्रजातियाँ (जैसे पाइन्स, स्प्रूस, फ़र) होती हैं।

निष्कर्षतः, प्रत्येक वन बायोम पृथ्वी के जलवायु संतुलन, ऑक्सीजन उत्पादन और जैव विविधता संरक्षण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(ii) जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical cycle) क्या है? वायुमंडल में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण (Fixation) कैसे होता है, वर्णन करें?

उत्तर- जैव-भूरासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle) वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से पृथ्वी के विभिन्न घटकों जैवमंडल (जीव), वायुमंडल (हवा), जलमंडल (पानी) और स्थलमंडल (भूमि)  के बीच पोषक तत्वों और रासायनिक तत्वों का निरंतर चक्रण होता है।

    यह चक्र पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रमुख जैव-भूरासायनिक चक्रों में कार्बन, नाइट्रोजन, जल, ऑक्सीजन और फॉस्फोरस चक्र शामिल हैं। इन चक्रों से पौधों और प्राणियों को आवश्यक तत्व बार-बार उपलब्ध होते रहते हैं।

नाइट्रोजन का यौगिकीकरण (Nitrogen Fixation) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा वायुमंडल में उपस्थित निष्क्रिय नाइट्रोजन गैस (N₂) को जीवित प्राणी उपयोग के योग्य यौगिकों – जैसे अमोनिया (NH₃) या नाइट्रेट (NO₃⁻) – में बदला जाता है। यह प्रक्रिया तीन मुख्य तरीकों से होती है:

1. जैविक यौगिकीकरण (Biological fixation): Rhizobium, Azotobacter जैसे सूक्ष्मजीव नाइट्रोजन को अमोनिया में परिवर्तित करते हैं।

2. वायुमंडलीय यौगिकीकरण (Atmospheric fixation): बिजली (Lightning) की क्रिया से नाइट्रोजन और ऑक्सीजन मिलकर नाइट्रिक ऑक्साइड बनाते हैं, जो वर्षा के साथ धरती पर आता है।

3. औद्योगिक यौगिकीकरण (Industrial fixation): हैबर-बॉश (Haber-Bosch) विधि द्वारा नाइट्रोजन और हाइड्रोजन से अमोनिया का निर्माण किया जाता है।

    इस प्रकार, नाइट्रोजन यौगिकीकरण प्रक्रिया पृथ्वी पर नाइट्रोजन चक्र को संतुलित रखती है और पौधों को नाइट्रोजन उपलब्ध कराती है।

(iii) पारिस्थितिक संतुलन (Ecological balance) क्या है? इसके असंतुलन को रोकने के महत्त्वपूर्ण उपायों की चर्चा करें।

उत्तर- पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) से तात्पर्य उस स्थिर स्थिति से है जिसमें जीव-जंतु, पौधे, सूक्ष्मजीव और उनका भौतिक परिवेश (जैसे जल, वायु, मिट्टी आदि) परस्पर सहयोग और सामंजस्य के साथ कार्य करते हैं। जब प्रत्येक घटक अपनी भूमिका सही प्रकार से निभाता है, तब प्रकृति में ऊर्जा, पोषक तत्वों और गैसों का संतुलित चक्र बना रहता है, जिससे पृथ्वी पर जीवन संभव होता है।

    जब मानव गतिविधियाँ जैसे- वनों की कटाई, प्रदूषण, औद्योगीकरण, शिकार, भूमि क्षरण, तथा जनसंख्या वृद्धि अत्यधिक बढ़ जाती हैं, तब यह संतुलन बिगड़ जाता है। इसके परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता में कमी, मृदा अपरदन, और प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

पारिस्थितिक असंतुलन को रोकने के उपाय:

⇒ वनों का संरक्षण एवं वृक्षारोपण को बढ़ावा देना।

⇒ जल, मृदा और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना।

⇒ नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (जैसे सौर और पवन ऊर्जा) का प्रयोग बढ़ाना।

⇒ वन्यजीवों और जैव विविधता की रक्षा करना।

⇒ पर्यावरण शिक्षा और जन-जागरूकता को प्रोत्साहित करना।

     इस प्रकार, पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना न केवल मानव अस्तित्व के लिए आवश्यक है, बल्कि पृथ्वी पर समस्त जीव-जगत के सतत् विकास के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Chapter 16 Biodiversity and Conversation (जैव विविधता एवं संरक्षण)

Chapter 16 Biodiversity and Conversation

(जैव विविधता एवं संरक्षण)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 16 Biodiversity and Conversation

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) जैव-विविधता का संरक्षण निम्न में किसके लिए महत्वपूर्ण है

(क) जन्तु

(ख) पौधे

(ग) पौधे और प्राणी

(घ) सभी जीवधारी

उत्तर- (घ) सभी जीवधारी

व्याख्या:

     जैव-विविधता (Biodiversity) का संरक्षण सभी जीवधारियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पृथ्वी पर जीवन के संतुलन, पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता, भोजन, औषधि, जलवायु नियंत्रण और प्राकृतिक संसाधनों की निरंतरता को बनाए रखता है।

(ii) असुरक्षित प्रजातियाँ कौन-सी हैं

(क) जो दूसरों को असुरक्षा दें

(ख) बाघ व शेर

(ग) जिनकी संख्या अत्याधिक हों

(घ) जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है

उत्तर- (घ) जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है

(iii) राष्ट्रीय पार्क (National Parks) और अभ्यारण (Sanctuaries) किस उद्देश्य के लिए बनाये गए हैं

(क) मनोरंजन के लिए

(ख) पालतू जीवों के लिए

(ग) शिकार के लिए

(घ) संरक्षण के लिए

उत्तर- (घ) संरक्षण के लिए

व्याख्या:

     राष्ट्रीय उद्यान (National Parks) और अभ्यारण्य (Sanctuaries) वन्य जीवों, वनस्पतियों तथा उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से बनाए जाते हैं, ताकि जैव विविधता बनी रहे और लुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा की जा सके।

(iv) जैव-विविधता समृद्ध क्षेत्र हैं

(क) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र

(ख) शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र

(ग) ध्रुवीय क्षेत्र

(घ) महासागरीय क्षेत्र

उत्तर- (क) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र

व्याख्या:

     उष्णकटिबंधीय क्षेत्र (Tropical regions) में तापमान अधिक, वर्षा प्रचुर मात्रा में तथा अनुकूल जलवायु पाई जाती है, जिसके कारण यहाँ पौधों और जीवों की विविधता सबसे अधिक होती है। इसलिए ये क्षेत्र जैव-विविधता के समृद्ध क्षेत्र कहलाते हैं।

(v) निम्न में से किस देश में अर्थ सम्मेलन (Earth summit) हुआ था

(क) यू. के. (U.K.)

(ख) ब्राजील

(ग) मैक्सिको

(घ) चीन

उत्तर- (ख) ब्राजील

व्याख्या:

     अर्थ सम्मलेन (Earth Summit) 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो (Rio de Janeiro) में आयोजित किया गया था। इसे “रियो सम्मेलन” या “United Nations Conference on Environment and Development (UNCED)” भी कहा जाता है।

(vi) प्रोजेक्ट टाईगर निम्नलिखित में से किस उद्देश्य से शुरू किया गया है।

(क) बाघ मारने के लिये

(ख) बाघ को शिकार से बचाने हेतु

(ग) बाघ को चिड़ियाघर में डालने हेतु

(घ) बाघ पर फिल्म बनाने हेतु

उत्तर- (घ) बाघ पर फिल्म बनाने हेतु

व्याख्या:

    “प्रोजेक्ट टाइगर” (Project Tiger) भारत सरकार द्वारा 1973 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य देश में तेजी से घटती हुई बाघों की संख्या की रक्षा करना और उनके प्राकृतिक आवास का संरक्षण करना है।

(vii) प्रोजेक्ट एलिफेन्ट (Project Elephent) किस वर्ष लागू किया गया?

(क) 1992

(ख) 1993

(ग) 1994

(घ) 1995

उत्तर:- (क) 1992

व्याख्या:

    प्रोजेक्ट एलिफेंट (Project Elephant) भारत सरकार द्वारा 1992 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य जंगली हाथियों का संरक्षण, उनके आवास (habitat) की रक्षा, और मानव-हाथी संघर्ष को कम करना है।

(viii) होमो-सेपियंश (Homo-Speiens) प्रजाति किस से संबंधित है?

(क) पौधे

(ख) शाकाहारी जीव

(ग) मांशहारी जीव

(घ) मानव

उत्तर- (घ) मानव

व्याख्या:

     होमो-सेपियन्स (Homo sapiens) आधुनिक मनुष्य की वैज्ञानिक प्रजाति का नाम है। यह होमो वंश (Genus) की एकमात्र जीवित प्रजाति है, जो लगभग 3 लाख वर्ष पहले अफ्रीका में उत्पन्न हुई थी।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।

(i) जैव-विविधता क्या है?

उत्तर- किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में पाये जाने वाले जीवों की संख्या और उनकी विविधता को जैव-विविधता कहते हैं। इसका संबंध पौधों के प्रकार, प्राणियों तथा सूक्ष्म जीवाणुओं से है, उनकी आनुवंशिकी और उनके द्वारा निर्मित पारितंत्र से है। जैव-विविधता सजीव सम्पदा है। 

   अर्थात इसमें सूक्ष्मजीवों से लेकर बड़े जीवों तक सभी शामिल होते हैं। यह पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और जीवन को स्थिरता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

(ii) जैव-विविधता के विभिन्न स्तर क्या हैं?

उत्तर- जैव-विविधता को तीन मुख्य स्तरों पर समझा जा सकता है-

(1) आनुवंशिक विविधता (Genetic diversity): एक ही प्रजाति के जीवों में जीन का अंतर।

(2) प्रजातीय विविधता (Species diversity): किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न प्रजातियों की संख्या।

(3) पारिस्थितिकी तंत्र विविधता (Ecosystem diversity): यह विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिक तंत्रों की विविधता को दर्शाती है, जैसे – वन, मरुस्थल, पर्वतीय क्षेत्र, नदी, झील, समुद्र आदि।

(iii) हॉट-स्पॉट (Hot spots) से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- हॉट-स्पॉट (Hot Spots) वे क्षेत्र होते हैं जहाँ जैव विविधता अत्यधिक होती है, परंतु यह क्षेत्र मनुष्य की गतिविधियों से गंभीर खतरे में हैं। इन क्षेत्रों में बहुत-सी दुर्लभ एवं स्थानिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।  उनमें संसाधनों को उपलब्ध कराने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण संघ (IUCN) ने जैव-विविधता हॉट-स्पॉट (Hot spots) क्षेत्र के रूप में निर्धारि किया गया है।

    हॉट-स्पॉट उनकी वनस्पति के आधार पर परिभाषित किये गए हैं। भारत में पश्चिमी घाट, पूर्वी हिमालय आदि प्रमुख जैव विविधता हॉट-स्पॉट हैं।

(iv) मानव जाति के लिए जंतुओं के महत्त्व का वर्णन संक्षेप में करें।

उत्तर- जंतुओं का मानव जाति के जीवन में अत्यंत महत्त्व है। वे भोजन (दूध, मांस, अंडे), वस्त्र (ऊन, रेशम, चमड़ा) और श्रम (बैल, घोड़े) प्रदान करते हैं। अनेक जंतु औषधियों के निर्माण में उपयोगी होते हैं तथा पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

(v) विदेशज प्रजातियों (Exotic species) से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- वे प्रजातियाँ जो स्थानीय आवास की मूल जैव प्रजाति नहीं हैं, लेकिन उस तंत्र में स्थापित की गई हैं, उन्हें ‘विदेशज प्रजातियाँ’ कहा जाता है।

    अर्थात विदेशज प्रजातियाँ (Exotic species) वे जीव हैं जिन्हें किसी अन्य देश या क्षेत्र से लाकर नए स्थान पर बसाया जाता है। ये वहाँ की प्राकृतिक प्रजातियों के साथ प्रतिस्पर्धा कर पारिस्थितिक संतुलन बिगाड़ सकती हैं। उदाहरण- भारत में जलकुंभी (Water Hyacinth) और नीलगिरी (Eucalyptus) पेड़।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) प्रकृति को बनाए रखने में जैव-विविधता की भूमिका का वर्णन करें

उत्तर- प्रकृति के संतुलन और स्थायित्व को बनाए रखने में जैव-विविधता (Biodiversity) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैव-विविधता का अर्थ है- पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी प्रकार के जीवों की विविधता, जिसमें पौधे, जन्तु, सूक्ष्मजीव तथा उनके पारस्परिक संबंध शामिल हैं। यह प्रकृति की स्थिरता, पारिस्थितिक संतुलन तथा मानव जीवन के अस्तित्व की आधारशिला है।

     प्रकृति में प्रत्येक जीव का अपना विशिष्ट स्थान और कार्य होता है। उदाहरण के लिए, पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, जिससे वातावरण शुद्ध रहता है। शाकाहारी और मांसाहारी जीव एक-दूसरे पर निर्भर रहते हुए भोजन श्रृंखला और जाल (food chain and web) का निर्माण करते हैं। यदि किसी एक प्रजाति का विनाश हो जाए, तो पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।

    जैव-विविधता मिट्टी की उर्वरता, परागण, जल चक्र और अपघटन जैसी प्रक्रियाओं को भी बनाए रखती है। यह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद करती है और प्राकृतिक आपदाओं से पारिस्थितिक तंत्र की पुनर्बहाली में सहायक होती है। इसके अतिरिक्त, जैव-विविधता मानव को औषधि, भोजन, ईंधन और वस्त्र जैसे अनेक संसाधन उपलब्ध कराती है।

    इस प्रकार, जैव-विविधता न केवल पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में सहायक है, बल्कि यह पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता और मानव सभ्यता के विकास की आधारशिला भी है। इसलिए, जैव-विविधता का संरक्षण हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी है, ताकि भविष्य की पीढ़ियाँ भी स्वस्थ और संतुलित प्रकृति का आनंद ले सकें।

(ii) जैव-विविधता के विनाश के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारकों का वर्णन करें। इसे रोकने के उपाय भी बताएँ।

उत्तर- जैव-विविधता (Biodiversity) का अर्थ है- पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के पौधों, प्राणियों और सूक्ष्मजीवों की विविधता। वर्तमान समय में मानव गतिविधियों के कारण जैव-विविधता में तीव्र गति से कमी आ रही है।

जैव-विविधता के विनाश के प्रमुख कारक:

1. वनों की कटाई:-

     कृषि विस्तार, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के कारण वनों का नाश हो रहा है।

2. प्रदूषण:-

      जल, वायु और भूमि प्रदूषण से अनेक जीव प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं।

3. जनसंख्या वृद्धि:-

    बढ़ती जनसंख्या संसाधनों पर अत्यधिक दबाव डाल रही है।

4. अवैध शिकार और व्यापार:-

     बाघ, हाथी, गैंडा जैसी प्रजातियाँ शिकार और अवैध व्यापार से प्रभावित हैं।

5. विदेशी (Exotic) प्रजातियाँ:-

     बाहरी प्रजातियों के आगमन से स्थानीय प्रजातियाँ प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रही हैं।

6. जलवायु परिवर्तन:-

     तापमान वृद्धि और वर्षा पैटर्न में बदलाव से प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं।

रोकथाम के उपाय:

⇒ वनों की सुरक्षा और वृक्षारोपण को बढ़ावा देना।

⇒ प्रदूषण नियंत्रण और स्वच्छ तकनीकों का उपयोग।

⇒ वन्यजीव संरक्षण कानूनों का कठोर पालन।

⇒ राष्ट्रीय उद्यान और अभ्यारणों का विस्तार।

⇒ जनजागरूकता और पर्यावरण शिक्षा को प्रोत्साहन देना।

⇒ जैव-विविधता संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष:

    जैव-विविधता का संरक्षण पृथ्वी पर जीवन के संतुलन और मानव अस्तित्व के लिए अत्यंत आवश्यक है।

Chapter 1 India Location (भारत-स्थिति)

Chapter 1 India Location

(भारत-स्थिति)

(भाग – 2 : भारत- भौतिक पर्यावरण)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) भारत के विस्तार के संबंध कौन-सा कथन सही है

(क) 8°41’N-35°5’N

(ख) 8°4’N-35°6’N

(ग) 8°4’N-37°6’N

(घ) 6°45″N-35°6’N

उत्तर- (ग) 8°41’N-37°6’N

व्याख्या:

   भारत 8°4′ उत्तरी अक्षांश से 37°6′ उत्तरी अक्षांश तथा 68°7′ पूर्वी देशांतर से 97°25′ पूर्वी देशांतर तक फैला है।

⇒ भारत का अक्षांशीय विस्तार लगभग 29° है।

⇒ भारत का देशांतरिक विस्तार लगभग 30° है।

⇒ भारत का कुल क्षेत्रफल लगभग 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर है।

⇒ 82°30′ पूर्व देशांतर को भारतीय मानक समय (IST) के रूप में अपनाया गया है।

(ii) भारत के साथ किस देश की स्थल सीमा सबसे लम्बी है

(क) बंग्लादेश

(ख) पाकिस्तान

(ग) चीन

(घ) म्यांमार

उत्तर- (क) बंग्लादेश

  भारत की सबसे लंबी स्थल सीमा बांग्लादेश के साथ है, जिसकी लंबाई लगभग 4096 किलोमीटर है।

(iii) कौन-सा देश क्षेत्रफल में भारत से अधिक बड़ा है

(क) चीन

(ख) फ्रांस

(ग) मिस्र

(घ) ईरान

उत्तर- (क) चीन

(iv) निम्नलिखित याम्योत्तर में से कौन-सा भारत का मानक याम्योत्तर है?

(क) 69°30’E

(ख) 75°30’E

(ग) 82°30’E

(घ) 90°30’E

उत्तर- (ग) 82°30’E

(v) यदि आप एक सीधी रेखा में राजस्थान से नागालैंड की यात्रा करें तो निम्नलिखित नदियों में से किसको आर-पार नहीं करेंगे?

(क) यमुना

(ख) सिंधु

(ग) ब्रह्मपुत्र

(घ) गंगा

उत्तर- (ख) सिंधु

(vi) क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में भारत का स्थान है।

(क) तीसरा

(ख) चौथा

(ग) पांचवाँ

(घ) सातवाँ

उत्तर- (घ) सातवाँ

   भारत का क्षेत्रफल लगभग 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर है, और क्षेत्रफल की दृष्टि से यह विश्व में सातवाँ सबसे बड़ा देश है।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) क्या भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता है? यदि हाँ, तो आप ऐसा क्यों सोचते हैं?

उत्तर- हाँ, भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता है क्योंकि देशांतर रेखाओं के मानों से स्पष्ट होता है कि इनमें लगभग 30 डिग्री का अंतर है जो हमारे देश के सबसे पूर्वी व सबसे पश्चिमी भागों के समय में लगभग 2 घंटों का अंतर पैदा करता है। कुछ ऐसे देश हैं जिनमें अधिक पूर्व-पश्चिम विस्तार के कारण एक से अधिक मानक देशांतर रेखाएँ हैं। उदाहरण : संयुक्त राज्य अमेरिका में छह समय कटिबंध हैं।

(ii) भारत की लम्बी तटरेखा के क्या प्रभाव है?

उत्तर- भारत की लंबी तटरेखा के कारण देश को अनेक लाभ प्राप्त हैं, जैसे- समुद्री व्यापार और मत्स्य पालन का विकास, बंदरगाहों की स्थापना, पर्यटन उद्योग का विस्तार, तटीय कृषि व खनिज संपदा का उपयोग, तथा विदेशी देशों से सांस्कृतिक और आर्थिक संपर्क सुदृढ़ होना।

(iii) भारत का देशंतारीय फैलाव इसके लिए किस प्रकार लाभप्रद है?

उत्तर- भारत का देशांतरिक फैलाव लगभग 30° है, जो देश के पूर्व से पश्चिम तक समय, जलवायु और कृषि विविधता प्रदान करता है। यह फैलाव विभिन्न फसलों की खेती, विविध उद्योगों के विकास और सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देने में लाभप्रद है। इससे क्षेत्रीय संतुलित विकास संभव होता है।

(iv) जबकि पूर्व में उदाहरणत: नागालैंड में सूर्य पहले उदय होता है और पहले ही अस्त होता है, फिर कोहिमा और नई दिल्ली में घड़ियाँ एक ही समय क्यों दिखाती है?

उत्तर- भारत में संपूर्ण देश के लिए एक ही समय निर्धारित है, जिसे भारतीय मानक समय (IST) कहते हैं। यह समय रेखा प्रयागराज के निकट 82°30′ पू. देशांतर से गुजरती है। इसलिए नागालैंड (कोहिमा) और नई दिल्ली, दोनों जगहों पर घड़ियाँ एक ही समय दिखाती हैं, भले ही सूर्य उदय-अस्त का समय अलग हो।

Chapter 1 India Location

Chapter 2 Structure and Physiography (संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान)

Chapter 2 Structure and Physiography

(संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान)

(भाग – 2 : भारत- भौतिक पर्यावरण)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 2 Structure and Physiography

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) हिमालय के किस भाग में करेवा मिलते हैं

(क) उत्तर-पूर्वी हिमालय

(ख) पूर्वी हिमालय

(ग) हिमाचल-उत्तरांचल हिमालय

(घ) कश्मीर हिमालय

उत्तर- (घ) कश्मीर हिमालय

व्याख्या:

   करेवा (Karewas) कश्मीर घाटी में पाए जाने वाले मोटे झील- अवसाद (lake deposits) हैं। ये उपजाऊ मिट्टी से बने होते हैं और इनमें केसर की खेती प्रसिद्ध है। करेवा हिमालय के कश्मीर भाग की एक विशिष्ट भौगोलिक विशेषता है।

(ii) लोटक झील किस राज्य में स्थित है

(क) केरल

(ख) मनीपुर

(ग) उत्तरांचल

(घ) राजस्थान

उत्तर- (ख) मनीपुर

व्याख्या:

     लोटक झील (Loktak Lake) मणिपुर राज्य में स्थित है। यह उत्तर-पूर्व भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है, जो अपने तैरते द्वीपों (फुमदी) के लिए प्रसिद्ध है।

(iii) अंडमान द्वीप तथा निकोबार द्वीप को कौन-सी रेखा पृथक् करती है

(क) 11° चैनल

(ख) 10° चैनल

(ग) मन्नार की खाड़ी

(घ) अंडमान सागर

उत्तर- (ख) 10° चैनल

व्याख्या:

      10° चैनल अंडमान द्वीप समूह और निकोबार द्वीप समूह को एक-दूसरे से पृथक् करता है। यह रेखा लगभग 10 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर स्थित है।

(iv) डोडावेटा चोटी निम्नलिखित में से कौन-सी पहाड़ी शृखंला में स्थित है?

(क) नीलगिरी

(ख) कार्डामम

(ग) अनामलाई

(घ) नल्लामाला

उत्तर- (क) नीलगिरी

व्याख्या:

      डोडाबेट्टा (Doddabetta) चोटी नीलगिरी पर्वत शृंखला में स्थित है। यह तमिलनाडु राज्य में ऊटी (उधगमंडलम) के पास स्थित है और नीलगिरी की सबसे ऊँची चोटी है, जिसकी ऊँचाई लगभग 2637 मीटर है।

(v) हिमालय किस प्रकार का पर्वत है?

(क) ज्वालामुखी

(ख) मोड़दार

(ग) अविशष्ट

(घ) भ्रन्शोथ

उत्तर- (ख) मोड़दार

व्याख्या:

     हिमालय पर्वत का निर्माण भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के आपस में टकराने से हुआ है। इस टकराव से टेथिस सागर की मलवा मुड़कर ऊपर उठीं, जिससे हिमालय जैसे मोड़दार पर्वत (Fold Mountains) बने।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30 शब्दों में दीजिए

(i) यदि एक व्यक्ति को लक्षद्वीप जाना हो तो वह कौन-से तटीय मैदान होकर जायेगा और क्यों?

उत्तर- लक्षद्वीप जाने वाला व्यक्ति केरल के मालाबार तटीय मैदान होकर जाएगा, क्योंकि यह तट अरब सागर के किनारे स्थित है और यहीं से लक्षद्वीप द्वीपसमूह (280 किलोमीटर से 480 किलोमीटर) के लिए मार्ग मिलता है।

(ii) भारत में ठण्डा मरुस्थल कहाँ स्थित है ? इस क्षेत्र की मख्य श्रेणियों के नाम बताएँ।

उत्तर- भारत में ठण्डा मरुस्थल लद्दाख क्षेत्र में स्थित है, जो केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख (पूर्व में जम्मू-कश्मीर का भाग) का हिस्सा है।

इस क्षेत्र की मुख्य पर्वत श्रेणियाँ हैं –

⇒ कराकोरम पर्वत श्रेणी

⇒ लद्दाख पर्वत श्रेणी

⇒ जास्कर पर्वत श्रेणी

    यह क्षेत्र ऊँचाई, अत्यधिक ठंड और कम वर्षा के कारण “ठण्डा मरुस्थल” कहलाता है।

(iii) पश्चिमी तटीय मैदान पर कोई डेल्टा क्यों नहीं है?

उत्तर- पश्चिमी तटीय मैदान पर कोई डेल्टा नहीं है क्योंकि यहाँ नदियाँ छोटी, तीव्र ढाल वाली हैं और सीधे अरब सागर में गिरती हैं, जिससे गाद जमने का अवसर नहीं मिलता।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दीजिए

(i) अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूहों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत करें।

उत्तर- अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूह भौगोलिक, संरचनात्मक तथा उत्पत्ति की दृष्टि से भिन्न हैं।

    अरब सागर में स्थित लक्षद्वीप द्वीप समूह प्रवाल (Coral) उत्पत्ति के हैं। ये छोटे, समतल एवं लैगूनयुक्त द्वीप हैं, जो मुख्यतः प्रवाल भित्तियों से बने हैं। इनकी संख्या लगभग 36 है और ये केरल तट के समीप स्थित हैं। यहाँ जलवायु उष्णकटिबंधीय तथा आर्द्र है।

    बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान-निकोबार द्वीप समूह ज्वालामुखीय और पर्वतीय उत्पत्ति के हैं। ये द्वीप ऊँचे, वनाच्छादित तथा श्रृंखलाबद्ध हैं। इनकी संख्या 572 के लगभग है। यहाँ सक्रिय ज्वालामुखी बैरन द्वीप भी स्थित है।

    इस प्रकार, लक्षद्वीप प्रवाल उत्पत्ति के निम्न द्वीप हैं, जबकि अंडमान-निकोबार ज्वालामुखीय उत्पत्ति के ऊँचे द्वीप हैं।

(ii) नदी घाटी मैदान में पाए जाने वाली महत्त्वपूर्ण स्थालाकृतियाँ कौन-सी हैं? इनका विवरण दें।

उत्तर- नदी घाटी मैदानों में कई प्रकार की स्थलाकृतियाँ पाई जाती हैं, जो नदी के अपरदन, परिवहन और निक्षेपण क्रियाओं से निर्मित होती हैं। प्रमुख स्थलाकृतियों में बालू के टीले (Natural levees), बाढ़ का मैदान (Flood plains), गोखुर झीलें (Oxbow lakes), मोड़दार धाराएँ (Meanders) और डेल्टा प्रमुख हैं।

    नदी अपने प्रवाह के दौरान किनारों को काटती और तलछट जमा करती है, जिससे मोड़दार धाराएँ बनती हैं। जब नदी का मोड़ टूट जाता है तो वहाँ अर्द्धचंद्राकार झीलें बनती हैं जिन्हें गोखुर झीलें कहते हैं।

    बाढ़ के समय जमा तलछट से बाढ़ का मैदान बनते हैं जो अत्यंत उपजाऊ होते हैं। नदी के मुहाने पर निक्षेपण से डेल्टा बनता है। इन स्थलाकृतियों के कारण नदी घाटी मैदान कृषि, बसावट और मानव विकास के लिए अत्यंत उपयुक्त बनते हैं।

(iii) यदि आप बद्रीनाथ से संदर वन डेल्टा तक गंगा नदी के साथ-साथ चलते हैं तो आपके रास्ते में कौन-सी स्थलाकृतियाँ आएंगी?

उत्तर- यदि हम बद्रीनाथ से सुंदरवन डेल्टा तक गंगा नदी के साथ-साथ यात्रा करें, तो हमारे मार्ग में विभिन्न प्रकार की स्थलाकृतियाँ दिखाई देंगी। बद्रीनाथ हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित है, जहाँ से गंगा की सहायक धाराएँ जैसे अलकनंदा उत्पन्न होती हैं। अलकनंदा और भागीरथी देवप्रयाग में मिलकर गंगा नदी के नाम से जानी जाती है।

     यहाँ स्थलाकृति पर्वतीय और दुर्गम होती है, जहाँ गहरी घाटियाँ और जलप्रपात मिलते हैं। आगे बढ़ने पर नदी तराई क्षेत्र में प्रवेश करती है, जहाँ भूमि अपेक्षाकृत समतल होती है और जलोढ़ मिट्टी से भरपूर होती है। इसके बाद गंगा गंगा मैदान में प्रवेश करती है। यह उपजाऊ जलोढ़ मैदान भारत का सबसे बड़ा समतल क्षेत्र है।

     यहाँ अनेक सहायक नदियाँ जैसे घाघरा, गंडक, यमुना इत्यादि मिलती हैं। अंततः गंगा दक्षिण-पूर्व दिशा में बहते हुए पश्चिम बंगाल के सुंदरवन क्षेत्र में पहुँचती है, जहाँ यह अनेक शाखाओं में बँटकर विस्तृत सुंदरवन डेल्टा का निर्माण करती है। यह विश्व का सबसे बड़ा नदी डेल्टा है।

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