Unique Geography Notes हिंदी में

Unique Geography Notes in Hindi (भूगोल नोट्स) वेबसाइट के माध्यम से दुनिया भर के उन छात्रों और अध्ययन प्रेमियों को काफी मदद मिलेगी, जिन्हें भूगोल के बारे में जानकारी और ज्ञान इकट्ठा करने में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस वेबसाइट पर नियमित रूप से सभी प्रकार के नोट्स लगातार विषय विशेषज्ञों द्वारा प्रकाशित करने का काम जारी है।

Remote Sensing and GIS

15. डिजिटल मानचित्रकला

15. डिजिटल मानचित्रकला

(Digital Cartography)



डिजिटल मानचित्रकला ⇒

          “कम्प्यूटर पर मानचित्र निर्माण या कम्प्यूटर की सहायता से मानचित्रों के निर्माण डिजिटल मानचित्रकला कहलाती है।”

          पहले तकनीकी रूप से सदृश्य मानचित्रण तकनीकि की मांग अधिक थी लेकिन यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थी। वर्तमान समय में डिजिटल मानचित्रकला के प्रकाश में आने से ऐसा नहीं है। कोई भी व्यक्ति जो मानचित्रण कार्यों से जुड़ा हुआ है वह थोड़े से प्रशिक्षण के पश्चात् कम्प्यूटर पर मानचित्रों का निर्माण कर सकता है तथा मानचित्रों की रूप रेखा, सांकेतिक चिह्नों, रंगों इत्यादि को सुगमता से परिवर्तित कर सकता है। इसलिए यह अति आवश्यक है कि कोई भी व्यक्ति जो मानचित्रों को संचालित करता है। उसको मानचित्रकला (Catrography) का आधारभूत ज्ञान होना अति आवश्यक है।

          पिछले एक या दो दशक में विद्युत तकनीकि के विकास ने वैज्ञानिक क्रियाकलापों तक की मनुष्य के प्रतिदिन के कार्यों को भी प्रभावित किया है। भूमि सर्वेक्षण जैसे व्यवसाय में तो मानचित्रकला का कोई विकल्प नहीं है। सुदूर संवेदन तथा वायुयान निर्मित संवेदकों से उपलब्ध आँकड़े डिजिटल आकार में होते हैं। तीव्रगति वाले विद्युत कम्प्यूटरों का विकास, इनकी पर्याप्त संग्रहण क्षमता, आसानी से इनका देश में उपलब्ध होना, ऑन लाइन पर अतिरिक्त सुविधायें प्राप्त होना तथा कीमत में निरन्तर ह्रास होना इत्यादि कई ऐसे कारक है जिसे कम्प्यूटर पर डिजिटल प्रणाली का प्रयोग निरन्तर बढ़ा है।

            जैसा कि स्पष्ट है कि कम्प्यूटर पर कोई मानचित्र या प्रतिबिम्ब उसी रूप में संग्रह नहीं किया जा सकता है। प्रत्येक आकृति को अंकों में कम्प्यूटर पर संग्रहीत किया जाता है तथा इच्छानुसार इनके द्वारा प्रतिबिम्ब या दृश्य तैयार किये जा सकते हैं। किसी मानचित्र को अंकों में संग्रह करने को भौगोलिक आँकड़े कहा जाता है। भौगोलिक आँकड़े दो प्रकार के होते धरातलीय तथा अधरातलीय। प्रायः धरातलीय आँकड़ों को बिन्दु रेखा तथा क्षेत्र के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

            अधरातलीय आँकड़े किसी बिन्दु, रेखा अथवा क्षेत्र विशेष की सूचनाओं को दर्शाते हैं। ये धरातलीय आँकड़े की विशेषताओं को बताते हैं जैसे कि किसी शहर का नाम, नदी या सड़क का नाम या किसी क्षेत्र विशेष का नाम इत्यादि। इस प्रकार धरातलीय तथा अधरातलीय आँकड़ों या सूचनाओं को कम्प्यूटर पर संग्रह किया जाता है। धरातलीय आँकड़ों को कम्प्यूटर पर प्रदर्शित करने के लिए निम्नलिखित दो कर्टोग्राफिक मॉडलों का उपयोग किया जाता है।

कार्टोग्राफिक मॉडल (Cartographic Models)

(1.) कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल (The Cartographic Map Model)

(2.) भू-सम्बन्धीय मॉडल (The Geo Relational Model)

(1.) कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल:-

            कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल में कम्प्यूटर का स्क्रीन आकार लघु वर्गाकार आकृतियों में विभाजित होता है जिसका प्रत्येक ग्रिड सेल एरी (Array) या पिक्सल (Pixal) कहलाता है। एरी अथवा पिक्सल जितना क्षेत्रफल तय करता है वह उस मानचित्र का विभेदन (Resolution) कहलाता है। प्रत्येक ग्रिडसेल पंक्ति व कॉलम द्वारा सन्दर्भित होता है जो संख्याओं में ऑकत होता है। प्रत्येक ग्रिडसेल का अपना काम होता है जिसे आँकड़ा कहते हैं। आँकड़ों का यह रूप रास्टर संरचना (Raster Structure) कहलाता है। रास्टर संरचना में बिन्दु आकृति को एक ग्रिडरौल से, रेखीय आकृति को आस-पास के ग्रिड सेलों के अंकीय मान के क्रम द्वारा तथा क्षेत्र आकृति को आस-पास के समान या मान वाले ग्रिड सेलों के समूहों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। 

डिजिटल मानचित्रकला

डिजिटल मानचित्रकला

 

               रास्टर प्रणाली में आँकड़ों की संग्रह क्षमता बहुत कम होती है। यही कारण है कि इस संरचना के अन्तर्गत कई प्रक्रियायें एक साथ सम्भव नहीं हो सकती है।

(2.) भू-सम्बन्धीय मॉडल:-

             भू-सम्बन्धी मॉडल आँकड़ों के संग्रहण तथा सूचनाओं के एकीकरण की ऐसी पद्धति है जो विभिन्न (बिन्दु, रेखीय तथा क्षेत्रीय) आकृतियों को अधरातलीय सूचनाओं से जोड़ता है। उदाहरण के लिए नगर, गाँव अथवा घर की बिन्दु आकृति को उसके नाम तथा जनसंख्या के साथ दर्शाया जा सकता है। इसी प्रकार रेखीय आकृतियों में किसी सड़क को उसके नाम से तथा नदी को उसके नाम के साथ जल निस्तारण क्षमता द्वारा दर्शाया जा सकता है। अलग-अलग क्षेत्रीय आकृतियाँ को उनके नाम एवं विशेषताओं के आधार पर दर्शाया जा सकता है। उदाहरण के लिए भूमि उपयोग, शैल इकाईयाँ, मिट्टी के प्रकार तथा सिंचित असिंचित भूमि इत्यादि। भू-सम्बन्धीय आँकड़ों के लिए विक्टर आँकड़ा संरचना पद्धति सबसे प्रमुख है।

          विक्टर प्रणाली को सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें किसी वस्तु अथवा आकृति की सापेक्षिक दूरी तथा विस्तार मापक के अनुसार दुरुस्त तरीके से दर्शाया जाता है। प्रत्येक भौगोलिक आकृति को X एवं Y निर्देशांकों के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

             किसी बिन्दु आकृति को एकल XY निर्देशांक के जोड़े द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जबकि रेखीय आकृतियों को दो या दो से अधिक XY निर्देशांकों के समूहों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। क्षेत्रीय आकृतियों को प्रदर्शित करने के लिए विक्टर संरचना में कई प्रणालियाँ प्रयोग की जाती हैं। इनमें सबसे अधिक प्रयोग किया जाने वाला तरीका स्थान (Spagetti Representation) है जिसमें प्रत्येक क्षेत्रीय आकृतियों की सीमाओं को XY निर्देशांकों के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। प्रारम्भ से लेकर अन्त तक केवल एक ही विक्टर रेखा प्रदर्शित की जाती है। क्षेत्रीय आकृति को किसी सांकेतिक चिह्न अथवा नाम से प्रदर्शित किया जाता है।

डिजिटल मानचित्रकला के तत्व (Elements of Digital Cartography):-

            सदृश्य मानचित्रकला के (Analog Cartography) प्रमुख तत्व निम्न हैं-

1. मानचित्र का मापक एवं प्रमाणिकता (Scale of Map of Accuracy)

2. मानचित्र की विषय सामग्री (Content of Map)

3. मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)

4. मानचित्र की रूपरेखा (Map Layout)

5. मानचित्र सांकेतिक चिह्न (Map Symbols)

6. रंगों एवं प्रतिरूपों का प्रयोग (Use of Colours and Pattem)

7. टाइप की गई सामग्री (Typography- Lattering)

8. मानचित्रों का सामान्यीकरण (Generalization of Map)

9. मानचित्रों का संकलन (Compilation of Map)

             अब डिजिटल मानचित्रकला में निम्न तत्वों को भी सम्मिलित किया जाने लगा है-

1. आँकड़ा मॉडल (Data Model)

2. आकृतिक विशेषतायें (Features Attributes)

3. आँकड़ा सेट अनुक्रम (Data Set Lineage)

4. दृश्यिकरण (Visulization)

           मानचित्र कला के इस अनुभाग में धरातलीय सूचनाओं को कम्प्यूटर पर डिजिटल प्रारूप में प्रदर्शित करने के तरीकों तथा मानचित्रों डिजाइन पर अधिक बल दिया जाता है। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं-

1. सबसे पहला उद्देश्य यह समझना है कि डिजिटल धरातलीय आँकड़ों को किस प्रकार डिजाइन किया जाता है।

2. दूसरा यह समझना है कि विभिन्न तत्वों से मानचित्रों का निर्माण कैसे किया जाय जैसा कि ये क्रम से लगे होते हैं।

3. तीसरा यह जानकारी रखना है कि मानचित्र पर प्राथमिकता के आधार पर किन तत्वों को स्थान दिया जाना चाहिए। 4. चौथा आकृतियों को शुद्धता से प्रदर्शित करने के लिए किन उपयुक्त चिह्नों का प्रयोग करना चाहिए।

मानचित्र एवं डिजिटल धरातलीय आँकड़ा आधार (Mapand Digital Spatial Data Base)

             जहाँ तक मानचित्र का सम्बन्ध है, मानचित्र धरातलीय सूचनाओं का एक दस्तावेज है। मानचित्रों को अंकीय आकार (Digital Form) में लाने के लिए इन्हें सबसे पहले डिजिटाइज करना पड़ता है तथा सूचना तत्वों के आधार पर अलग-अलग खण्डों में विभाजित किया जाता है।

Preparation of Data Design

           इस प्रक्रिया में कुछ कार्टोग्राफिक सूचनाओं को जिन्हें मनुष्य अपने दिमाग से समझता है उन्हें छोड़ दिया जाता है लेकिन कुछ आवश्यक सूचनाओं का शक्तिशाली आँकड़ा आधार तैयार किया जाता है।

        धरातलीय आँकड़ों के निर्माण की सबसे सरल विधि उपलब्ध मानचित्रों को डिजीटाईज करना है। इसके अलावा फोटोग्रामेटी, सुदूर संवेदन तथा धरातलीय अवलोकन विधि जिनके आधार पर आँकड़ा आधार तैयार किया जाता है। डिजिटल आँकड़े सापेक्ष रूप से बिना मापक के होते हैं। प्रायः इन्हें 1:1 मापक पर रखा जाता है।

धरातलीय सूचनाओं का अंकीय आंकड़ा आधार (Digital Data Base):-

            जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है कि जी.आई.एस. में आँकड़ों को तीन रूपों में दर्शाया जाता है। ये तीन रूप बिन्दु रेखा तथा क्षेत्र आकृतियाँ हैं। प्रत्येक आकृति XY को निर्देशांक की सहायता से डिजिटाइज किया जाता है।

भू-धरातलीय आँकड़ा आधार का डिजाइन (Geo-Spatial Data Base Design):-

           एक बार यदि हम आँकड़ा आधार, प्रक्षेप, विषय सामग्री तथा शुद्ध स्तर का उद्देश्य समझ जाते हैं तब निम्न दो कार्यों को सम्पन्न करने के लिए धरातलीय आँकड़ों का डिजाइन तैयार किया जाता है।

(a) जी.आई.एस. विश्लेषण के लिए भू-धरातलीय आँकड़ों को प्राकृतिक संरचना के अनुसार तैयार किया जा सकता है। (b) मानचित्रों के निर्माण तथा प्रदर्शन के लिए आँकड़ों का उपयोग अति सरल करना होता है।

डिजिटल धरातलीय आँकड़ों के निर्माण के लिए आंकड़ा मॉडलिंग (Data Modelling for Creating Digital Spatial Data):-

        डिजिटल धरातलीय आँकड़ों का ऐसा आँकड़ा मॉडल तैयार किया जाता है जो उच्च स्तर के मानचित्रों का उत्पादन कर सके तथा प्रत्येक के उपयोगकर्ता के लिए उपयोगी बन सके। जैसा कि पूर्व में समझाया गया है कि आँकड़ा मॉडलिंग का अर्थ आँकड़ों के संरचना की रूपरेखा तैयार करना है जिसे इन्हें सुगमता से प्रयोग किया जाए। धरातलीय आँकड़ों के निर्माण की यह एक महत्त्वपूर्ण अवस्था है।

आँकड़ों के मॉडलिंग डिजाइन को निम्न तीन रूपों में तैयार किया जा सकता है-

1. संकल्पनात्मक डिजाइन

2. तार्किक डिजाइन

3. भौतिक डिजाइन

1. संकल्पनात्मक डिजाइन (Conceptual Design):-

       मॉडलिंग ऐसा होना चाहिए जो धरातलीय आँकड़ों को अत्यधिक सिद्ध-परस्त बना सकें तथा जो अनुप्रयोग की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें। आँकड़ों को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि उनसे सरलतापूर्वक मानचित्रों का निर्माण किया जा सके।

          मानचित्रकला के आँकडे स्थान विज्ञान की दृष्टि से ढांचागत नहीं होते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जिस रूप में हमें मानचित्र और उसमें निहित सूचनाएँ प्राप्त होती है उसी रूप में इन्हें जी.आई.एस. में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। इन्हें कम्प्यूटर वातावरण में ढालने की आवश्यकता होती है। यदि मानचित्र के प्रतिरूप को डिजिटाईज किया जाए तो इसके लिए कई प्रयास करने पड़ते हैं तब यह जी.आई.एस. के अनुरूप कार्य कर सकता है। जी.आई.एस. निर्माण हेतु आँकड़ों का डिजिटाइजेशन करने के पश्चात इनसे मानचित्र तैयार करना अति सरल हो जाता है।

        इस प्रकार स्थान विज्ञान ढाँचे के लिए संकल्पनात्मक आँकड़ा मॉडल तैयार करना आवश्यक होता है। प्रत्येक आकृति को बिन्दु (Point), रेखा (Line) या घिरे हुए क्षेत्र (Polygon) के रूप में डिजिटाईज किया जाता है।

2. तार्किक डिजाइन (Logical Design):-

         आँकड़ों का मॉडलिंग  तर्पूकर्ण तरीके से तैयार किया जाता है। इसको इतना सरल बनाया जाता है कि कोई भी मानचित्रकार या उपयोगकर्ता उसे भली-भाँति समझ सके तथा उसका उपयोग कर सके। डिजिटल आँकड़े में जी.आई.एस. में धरातलीय विश्लेषण के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। इनकी संरचना इस प्रकार तैयार की जाती है कि प्रत्येक आकृति की पहचान की जा सके। इसकी बसाव-स्थिति इस प्रकार हो कि डिजिटल आँकड़ों में उसे पृथक किया जा सके। आँकड़ों को तार्किक क्रम में संगठित किया जाता है। इसी प्रकार आँकड़ों का ढाँचा सरल एवं समझ के योग्य बनाया जाता है।

          बिन्दु, रेखा तथा आकृतियों के ज्यामितीय लक्ष्यों को निर्देशांक या निर्देशांकों (X,Y) के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यदि प्रत्येक ज्यामितीय वस्तु को किसी कोड से सम्बन्धि किया जाय तब वह उस आकृति के सम्बन्ध में जानकारी देता है जो एक ज्यामितीय आकृति है। उदाहरण के लिए कोई झील या कृषि भूमि या वन क्षेत्र किसी भी आकृति को वर्गीकृत कर कोडिंग किया जाता है।

3. भौतिक डिजाइन (Physical Design):-

         आँकड़ा संरचना का भौतिक डिजाइन कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर पर निर्भर करता है।

      कुछ कम्प्यूटर प्रणाली में आकृतियाँ प्रायः स्थानविज्ञान से जुड़ी हुई होती है। उदाहरण के लिए रंग, दबाव, स्टाइल तथा विभिन्न तल इत्यादि या आँकड़े अलग-अलग फाइलों में पृथक-पृथक किये जाते हैं जैसे कि एक सड़क के लिए, एक जंगल के लिए इत्यादि।

       आँकड़ों का दूसरा भौतिक डिजाइन आँकड़ा आधार की कड़ियाँ या कोड से सम्बंधित होते हैं। भौतिक आँकड़ा संरचना मॉडल का आधारभूत सिद्धान्त वही है जो कि डिजाइन के अन्तर्गत था। इसमें डिजिटाइजेशन इस प्रका किया जाता है कि एक आकृति को दूसरे आकृति से पृथक किया जा सके तथा सरलतापूर्वक स्वतः ही तार्किक डिजाइन में परिवर्तित हो सकें।

प्रश्न प्रारूप

Q. डिजिटल मानचित्रकला पर निबंध लिखें।

(Write on essay on digital Cartography.)



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I ‘Dr. Amar Kumar’ am working as an Assistant Professor in The Department Of Geography in PPU, Patna (Bihar) India. I want to help the students and study lovers across the world who face difficulties to gather the information and knowledge about Geography. I think my latest UNIQUE GEOGRAPHY NOTES are more useful for them and I publish all types of notes regularly.

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