19. Classification of Aerial Photograps (वायु फोटोचित्रों का वर्गीकरण)

19. Classification of Aerial Photograps

(वायु फोटोचित्रों का वर्गीकरण)



Classification of Aerial

वायु फोटोचित्रों का वर्गीकरण

      वायु फोटोचित्रों का वर्गीकरण कई मापदण्डों के आधार पर किया गया है। इनमें प्रमुख मानदण्ड मापनी, झुकाव, क्षेत्र विस्तार, फिल्म तथा स्पेक्ट्रम क्षेत्र विस्तार इत्यादि हैं।

A. मापनी के आधार पर (On the Basis of Scale):-

      मापनी के आधार पर वायु फोटोचित्रों को निम्न वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(i) वृहत मापनी पर निर्मित फोटोचित्र (1/5000 एवं 1/20000)

(ii) मध्यम मापनी पर निर्मित फोटोचित्र (1/20000 एवं 1/50000)

(iii) लघु मापनी पर निर्मित फोटोचित्र (1/50000 से अधिक)

     आवश्यकतानुसार मापनी को परिवर्तित भी किया जा सकता है।

B. झुकाव के आधार पर (Based on Tilt):-

     जिन फोटोचित्रों को फोटो विश्लेषण तथा मानचित्रण के लिये उपयोग किया जाता है। उन्हें कैमरा अक्ष की दिशा के अनुसार तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।

(i) ऊर्ध्वाधर फोटोचित्र (Vertical Photograph):-

      वायुयान द्वारा उड़ान दिशा में कैमरे सिद्धान्त लम्बवत् रखकर लिये गये वायु फोटोचित्रों को ऊर्ध्वाधर फोटोचित्र कहते है। यद्यपि सिद्धान्त रूप में ऐसे वायु फोटोचित्र खींचते समय कैमरे का अक्ष धरातल पर ठीक लम्बवत् होना चाहिए परन्तु व्यवहार में सदैव ऐसा कर पाना संभव नहीं होता है। अतः यदि कैमरे का अक्ष दशा से 2-3 अंश कम या अधिक हो तो भी प्राप्त फोटोचित्रों को ऊर्ध्वाधर मान लिया जाता है। इस प्रकार के फोटोचित्रों में धरातल की योजना (Plan), दृश्य ऊपर से देखे गये दृश्य के समान होता है। वायु फोटोचित्रों से मानचित्रण करने के लिए इसी प्रकार के फोटोचित्रों का उपयोग करते हैं।

(ii) तिर्यक फोटोचित्र (Oblique Photographs):-

      तिर्यक फोटोचित्र खींचने के लिए वायुयान में कैमरे के अक्ष को धरातल की दिशा की ओर नत दिशा में झुका दिया जाता है। इस प्रकार के फोटोचित्रों में धरातलीय विवरणों के पार्श्व-दृश्य दिखाई देते हैं। वायु कैमरे के अक्ष झुकाव से लिये गये फोटोचित्रों को तिर्यक फोटोचित्र कहते हैं। इस प्रकार के फोटोचित्र भूमि पर बहुत बड़े क्षेत्र को तय करते हैं परन्तु विवरणों की शुद्धता एवं स्पष्टता केंद्र से दूर जाने पर कम होती जाती है।

(iii) क्षितिज अथवा धरातलीय फोटोचित्र (Horizontal for Terrestrial Photograph):-

             क्षितिज अथवा घरातलीय वायु फोटोचित्रों को लेने के लिए कैमरे के अक्ष को सीधे क्षितिज तल के समान लाया जाता है। इनके द्वारा केवल ऊँचाई दृश्य प्रस्तुत किया जाता है। क्षितिज फोटोचित्र सामान्य अच्छे कैमरे से भी लिये जा सकते हैं जिनका उपयोग सहायक रूप से उर्ध्वाधर फोटोचित्रों के विश्लेषण के लिए किया जाता है। क्षेत्रीय अध्ययनों में इनका भी विशेष महत्व है। विशेष रूप से भूगर्भिक, वानिकी तथा भूआकृतिक अध्ययनों में परिच्छेदिकाओं के लिये इनकी आवश्यकता होती है।

C. कैमरा इकाई के आधार पर (On the Basis of Camera Unit):-

     दो या तीन कैमरों को एक कैमरा इकाई बनाया जाता है तथा उपरोक्त सभी प्रकार की वायु फोटोग्राफी एक साथ की जाती है। इस आधार पर वायु फोटोग्राफी के निम्न दो प्रकार हैं-

(i) अभिसारी फोटोचित्र (Convergent Photogrphy):-

     अभिसारी चित्र लेने एके लिये वायुयान में दो कैमरे प्रयोग किये जाते हैं जो एक ही क्षेत्र अथवा दृश्य के दो अलग तिर्यक फोटोचित्र एक साथ खींचते हैं। इस प्रकार एक ही समय व एक ही मिशन में अलग-अलग कैमरों के द्वारा दो फोटोचित्र लिये जाते हैं। उड़ान की दिशा में स्थित अगले कैमरे का फोटोचित्र पिछला तथा पिछले कैमरे का फोटोचित्र अगला (Forward) कहलाता है।

(ii) त्रिपदीय फोटोचित्र (Trimetrogon Photograph):-

      ट्रिमेट्रोगन का अर्थ है त्रिपदीय अर्थात् तीन रूप से कार्य होना। इसमें कैमरा इकाई में तीन कैमरे एक साथ प्रयोग किये जाते हैं। केंद्र में स्थित कैमरा धरातल के ऊर्ध्वाधर चित्रों को लेता है जबकि अलग-बगल के कैमरे क्षितिज तक के तिर्यक वायु फोटोचित्र खींचते हैं। इस प्रकार त्रिपदीय प्रणाली में दायें क्षितिज से बायें क्षितिज तक का समस्त क्षेत्र अंकित हो जाता है। यद्यपि मानचित्रण के दृष्टिकोण से तिर्यक फोटोचित्रों को अनुस्थापन (Orientation) करने में बहुत सहायता मिलती है। इस प्रकार का उपयोग लघु मापनियों पर निर्मित टोह (Reconnaissance) लेने वाले मानचित्रों का तुरंत निर्माण करना होता है।

D. कोणीय विस्तार के आधार पर (On the Basis of Angular Coverage):-

     वायु फोटोचित्रों का अगला वर्गीकरण कोणीय विस्तार के आधार पर किया गया है। कोणीय विस्तार को एक कोण के रूप में परिभाषित किया गया है। यह लेंस के अग्र नोडल (Nodal) बिन्दु से होकर गुजरने वाले किरणों के शंकु का शीर्ष कोण है।

      निगेटिव चौखट का विकर्ण, लेंस के पृष्ठ नोड़ पर अंतरित करता है। इस प्रकार निगेटिव तल तथा लेंस के मध्य के सम्बन्ध को कोणीय विस्तार कहा जाता है। कोणीय विस्तार को निम्न रूप से वर्गीकृत किया गया है-
(i) संकीर्ण कोण (Narrow Angle)-

        संकीर्ण कोण का विस्तार 50° से कम होता है।

(ii) सामान्य कोण (Normal Angle)-

        इसका कोणीय विस्तार 60° होता है। इनका आकार 18×18 सेमी व 23×23 सेमी. तथा फोकल दूरी क्रमशः 31 व 30 मिमी. होती है।

(iii) वृहत कोण (Wide Angle)-

        वृहत कोण का विस्तार 90° होता है। इसका आकार क्रमशः 18×18 सेमी. व 23 × 23 संमी. तथा फोकल दूरी 11.5 व 15 मिमी. है।

(iv) अति वृहत कोण (Super Wide or Ultra Wide Angle)-

       इसका कोणीय विस्तार 120° होता है जिसके फोटोचित्र का आकार क्रमशः 18×18 सेमी. व 23×23 सेमी. तथा फोकल दूरी 70 मिमी. व 88 मिमी. होती है।

E. फिल्म के आधार पर (On the Basis of Film):-

        वायु फोटोग्राफी में प्रयोग की जाने वाली फिल्मों के आधार पर वायु फोटोग्राफ निम्न प्रकार के होते हैं-

(1) श्याम एवं श्वेत पेंक्रोमेटिक फोटोग्राफी

(ii) श्याम एवं श्वेत अवरक्त फोटोग्राफी

(iii) रंगीन फोटोग्राफी

(iv) रंगीन अवरक्त/आभासी रंगी फोटोग्राफी


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8. The Aerial Photography (वायु फोटोग्राफी)

8. The Aerial Photography

(वायु फोटोग्राफी)



    The Aerial Photography 

      वायु फोटोग्राफी एक ऐसा विज्ञान है जिसके अंतर्गत पृथ्वी के धरातल का अध्ययन करने के लिए वायु फोटोचित्रों को प्राप्त किया जाता है। इसके लिए कई प्लेटफार्म उपयोग किये जाते हैं। इनमें वायुयान प्लेटफार्म प्रमुख है। जैसा कि स्पष्ट है सूर्य ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। पृथ्वी सूर्य से विकिरण ऊर्जा प्राप्त करती है। विद्युत चुम्बकीय विकिरण (EMR) पृथ्वी के घरातल के साथ अन्योन्यक्रिया करता है। इस दौरान इसमें कई परिवर्तन अनुभव किये जाते हैं। विद्युत-चुम्बकीय विकिरण को संवेदक अथवा फोटो संवेदन फिल्म के द्वारा संसूचन किया जाता है। फोटो फिल्म पर यह बिम्बों को दर्शाता है। फोटोचित्र में विभिन्न बिम्बों के अलग-अलग ग्रे-टोन, वस्तुओं से परावर्तित ऊर्जा के अलग-अलग मानों की ओर इशारा करते हैं।

        वायुमण्डल में कई प्रकार की गैसें, धूल के कण, जल वाष्प कण इत्यादि विद्यमान होते हैं। इनके द्वारा सूर्य से आती हुई विकिरण ऊर्जा में कमी आ जाती है। इसी प्रकार किसी वस्तु के साथ अन्योन्यक्रिया (परावर्तन, संचारण तथा अवशोषण) के पश्चात् परावर्तित ऊर्जा में भी कमी आ जाती है। वायुमण्डलीय प्रभावों के द्वारा, फोटोग्राफिक प्रतिबिम्बों पर विपर्यास (Contrast) को कम कर दिया जाता है। यही कारण है कि वायुफोटोग्राफी की गुणवत्ता अधिकतर वायुमण्डलीय दशाओं पर निर्भर करती है। यद्यपि श्याम श्वेत फोटोग्राफी के लिए कई प्रकार के फिल्टर अथवा लेंस इत्यादि के सामूहिक उपयोग से धुंध के प्रभाव को कम किया जा सकता है। रंगीन फोटोग्राफी की दशा में यह समस्या अत्यंत जटिल है। यहाँ पर वायु फोटोग्राफी से सम्बन्धित तथ्यों का अध्ययन किया गया है।

वायु फोटोग्राफी के कारक:-

        वायु फोटोग्राफी करने के प्रमुख कारक निम्न हैं-

1. फोटोग्राफी क्षेत्र का निर्धारण

2. फोटोग्राफी का उद्देश्य

3. मापक का चयन

4. फोटोग्राफी के प्रकार

5. वायु कैमरे व लैंस का चयन

6. वायु फिल्म निगेटिव

7. उड़ान दिशा का निर्धारण

8. फोटोग्राफी का समय

9. फोटोग्राफी का मौसम

1. फोटोग्राफी किये जाने वाला क्षेत्र (Area to be Photography):-

      जिस क्षेत्र की फोटोग्राफी की जानी होती है उसका चारों दिशाओं में 1/250000 मापक बने मानचित्र की सहायता से सीमांकन किया जाता है तथा उसे रेखाओं द्वारा बन्द किया जाता है। यदि क्षेत्र अधिक बड़ा हो तो उसे छोटे-छोटे खण्डों में बांटकर इन्हें A, B, C इत्यादि नाम दिये जाते हैं। वायु फोटोग्राफी करने की दो विधियाँ हैं-

(i) पिन-पाइंट फोटोग्राफी (Pin-Point Photography)

(ii) ब्लॉक फोटोग्राफी (Block Photography)

        वायुयान से धरातल के किसी लघु क्षेत्र या वस्तु विशेष की फोटोग्राफी करना पिन-प्वाइंट फोटोग्राफी कहलाती है। पिन प्वाइंट फोटोग्राफी उर्ध्वाधर या त्रियक दोनों ही प्रकार की हो सकती है तथा एक या दो फोटो चित्र खींचे जाते हैं।

     वृहत क्षेत्रों की फोटोग्राफी के लिए सर्वप्रथम सम्पूर्ण क्षेत्र को अलग-अलग खण्डों या ब्लॉक में विभाजित किया जाता है। तत्पश्चात् प्रत्येक खण्ड को समान्तर पट्टियों (Strips) में बाँटा जाता है। प्रत्येक स्ट्रिप की सर्पित प्रतिरूप में अतिव्यापन (Overlap) फोटोग्राफी की जाती है। स्टीरियोस्कोप से देखने पर इस प्रकार के फोटोचित्रों के त्रिविम दृश्य दिखाई देते हैं।

2. फोटोग्राफी का उद्देश्य (Purpose of Photography)

      वायु फोटोग्राफी करने से पूर्व यह स्पष्ट किया जाता है कि फोटोग्राफी का उद्देश्य क्या है? इससे फोटोग्राफिक विनिर्देशन के सही डिजाइन में सहायता मिलती है।

3. मापक का चयन (Selection of Scale)

         वायु फोटोग्राफी में मापक एक प्रमुख कारक है। वायु फोटोचित्रों में प्रदर्शित किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की दूरी तथा उन्हीं दो बिन्दुओं की घरातल पर वास्तविक दूरी के आनुपातिक सम्बन्ध को उस फोटोचित्र का मापक कहते है। उदाहरण के लिए फोटोचित्र में किन्हीं दो बिन्दुओं अथवा दो स्थानों के मध्य की दूरी एक सेमी. तथा उन्हीं स्थानों की धरातल पर मापी गई वास्तविक दूरी एक किमी. है। इसका अर्थ यह है कि फोटोचित्र की दूरी एवं भूमि की दूरियों में 1 व 100000 का अनुपात है। यही आनुपातिक सम्बन्ध अर्थात् 1/100000 उस फोटोचित्र का मापक कहलाता है। वायु फोटोचित्र में मापक को दूसरे ढंग से भी समझाया जा सकता है।

     “कैमरा लेन्स की फोकल दूरी (F) तथा धरातल से उड़ान (वायुयान) की  (H) अनुपात को मापनी कहते हैं।”

अर्थात्

मापक =F (फोकल दूरी)/H (ऊँचाई)

      सामान्यतः वायु फोटोचित्रों के अलग-अलग भागों में मापनी शुद्ध नहीं होती है। सम्पूर्ण वायु फोटोचित्र पर एक समान मापनी केवल उसी दशा में मिल सकती है जब घरातल समतल हो एवं कैमरा ठीक लम्बवत अवस्था में हो। इस तरह की आदर्श स्थिति का मिलना अति कठिन होता है। इसलिए मापनी में अंतर आना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए पहाड़ी पर घाटी की तुलना में मापक में अंतर होता है क्योंकि शिखर भाग कैमरे के अधिक समीप होता है। यदि उड़ान की ऊँचाई अधिक या कम होती है तो फोटोचित्र का मापक भी तदनुरूप भिन्न-भिन्न होता है। उच्चावचन विकृति तथा उड़ान झुकाव (Tilt) के कारण भी भा की भिन्नता पाई जाती है।

वायु फोटोचित्रों पर मापनी ज्ञात करने की विधियाँ:-

     वायु फोटोचित्रों से मापनी ज्ञात करने की प्रमुख निम्न विधियाँ हैं-

(i) फोटोचित्र तथा धरातल के परस्पर सम्बन्ध स्थापन द्वारा मापनी ज्ञात करना।

(ii) मानचित्र की सहायता से मापनी ज्ञात करना।

(iii) फोटोचित्रों की सहायता से मापनी ज्ञात करना-

(a) कैमरे की फोकल दूरी एवं

(b) उड़ान ऊँचाई के आपसी सम्बन्ध द्वारा।

4. वायु फोटोचित्रों का वर्गीकरण (Classification of Aerial Photograps):-     

        वायु फोटोचित्रों का वर्गीकरण कई मापदण्डों के आधार पर किया गया है। इनमें प्रमुख मानदण्ड मापनी, झुकाव, क्षेत्र विस्तार, फिल्म तथा स्पेक्ट्रम क्षेत्र विस्तार इत्यादि हैं।

A. मापनी के आधार पर (On the Basis of Scale):-

      मापनी के आधार पर वायु फोटोचित्रों को निम्न वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(i) वृहत मापनी पर निर्मित फोटोचित्र (1/5000 एवं 1/20000)

(ii) मध्यम मापनी पर निर्मित फोटोचित्र (1/20000 एवं 1/50000)

(iii) लघु मापनी पर निर्मित फोटोचित्र (1/50000 से अधिक)

     आवश्यकतानुसार मापनी को परिवर्तित भी किया जा सकता है।

B. झुकाव के आधार पर (Based on Tilt):-

      जिन फोटोचित्रों को फोटो विश्लेषण तथा मानचित्रण के लिये उपयोग किया जाता है। उन्हें कैमरा अक्ष की दिशा के अनुसार तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।

(i) ऊर्ध्वाधर फोटोचित्र (Vertical Photograph):-

        वायुयान द्वारा उड़ान दिशा में कैमरे सिद्धान्त लम्बवत् रखकर लिये गये वायु फोटोचित्रों को ऊर्ध्वाधर फोटोचित्र कहते है। यद्यपि सिद्धान्त रूप में ऐसे वायु फोटोचित्र खींचते समय कैमरे का अक्ष धरातल पर ठीक लम्बवत् होना चाहिए परन्तु व्यवहार में सदैव ऐसा कर पाना संभव नहीं होता है। अतः यदि कैमरे का अक्ष दशा से 2-3 अंश कम या अधिक हो तो भी प्राप्त फोटोचित्रों को ऊर्ध्वाधर मान लिया जाता है। इस प्रकार के फोटोचित्रों में धरातल की योजना (Plan), दृश्य ऊपर से देखे गये दृश्य के समान होता है। वायु फोटोचित्रों से मानचित्रण करने के लिए इसी प्रकार के फोटोचित्रों का उपयोग करते हैं।

(ii) तिर्यक फोटोचित्र (Oblique Photographs):-

         तिर्यक फोटोचित्र खींचने के लिए वायुयान में कैमरे के अक्ष को धरातल की दिशा की ओर नत दिशा में झुका दिया जाता है। इस प्रकार के फोटोचित्रों में धरातलीय विवरणों के पार्श्व-दृश्य दिखाई देते हैं। वायु कैमरे के अक्ष झुकाव से लिये गये फोटोचित्रों को तिर्यक फोटोचित्र कहते हैं। इस प्रकार के फोटोचित्र भूमि पर बहुत बड़े क्षेत्र को तय करते हैं परन्तु विवरणों की शुद्धता एवं स्पष्टता केंद्र से दूर जाने पर कम होती जाती है।

(iii) क्षितिज अथवा धरातलीय फोटोचित्र (Horizontal for Terrestrial Photograph):-

            क्षितिज अथवा घरातलीय वायु फोटोचित्रों को लेने के लिए कैमरे के अक्ष को सीधे क्षितिज तल के समान लाया जाता है। इनके द्वारा केवल ऊँचाई दृश्य प्रस्तुत किया जाता है। क्षितिज फोटोचित्र सामान्य अच्छे कैमरे से भी लिये जा सकते हैं जिनका उपयोग सहायक रूप से उर्ध्वाधर फोटोचित्रों के विश्लेषण के लिए किया जाता है। क्षेत्रीय अध्ययनों में इनका भी विशेष महत्व है। विशेष रूप से भूगर्भिक, वानिकी तथा भूआकृतिक अध्ययनों में परिच्छेदिकाओं के लिये इनकी आवश्यकता होती है।

C. कैमरा इकाई के आधार पर (On the Basis of Camera Unit):-

     दो या तीन कैमरों को एक कैमरा इकाई बनाया जाता है तथा उपरोक्त सभी प्रकार की वायु फोटोग्राफी एक साथ की जाती है। इस आधार पर वायु फोटोग्राफी के निम्न दो प्रकार हैं-

(i) अभिसारी फोटोचित्र (Convergent Photogrphy):-

     अभिसारी चित्र लेने एके लिये वायुयान में दो कैमरे प्रयोग किये जाते हैं जो एक ही क्षेत्र अथवा दृश्य के दो अलग तिर्यक फोटोचित्र एक साथ खींचते हैं। इस प्रकार एक ही समय व एक ही मिशन में अलग-अलग कैमरों के द्वारा दो फोटोचित्र लिये जाते हैं। उड़ान की दिशा में स्थित अगले कैमरे का फोटोचित्र पिछला तथा पिछले कैमरे का फोटोचित्र अगला (Forward) कहलाता है ।

(ii) त्रिपदीय फोटोचित्र (Trimetrogon Photograph):-

        ट्रिमेट्रोगन का अर्थ है त्रिपदीय अर्थात् तीन रूप से कार्य होना। इसमें कैमरा इकाई में तीन कैमरे एक साथ प्रयोग किये जाते हैं। केंद्र में स्थित कैमरा धरातल के ऊर्ध्वाधर चित्रों को लेता है जबकि अलग-बगल के कैमरे क्षितिज तक के तिर्यक वायु फोटोचित्र खींचते हैं। इस प्रकार त्रिपदीय प्रणाली में दायें क्षितिज से बायें क्षितिज तक का समस्त क्षेत्र अंकित हो जाता है। यद्यपि मानचित्रण के दृष्टिकोण से तिर्यक फोटोचित्रों को अनुस्थापन (Orientation) करने में बहुत सहायता मिलती है। इस प्रकार का उपयोग लघु मापनियों पर निर्मित टोह (Reconnaissance) लेने वाले मानचित्रों का तुरंत निर्माण करना होता है।

D. कोणीय विस्तार के आधार पर (On the Basis of Angular Coverage):-

     वायु फोटोचित्रों का अगला वर्गीकरण कोणीय विस्तार के आधार पर किया गया है। कोणीय विस्तार को एक कोण के रूप में परिभाषित किया गया है। यह लेंस के अग्र नोडल (Nodal) बिन्दु से होकर गुजरने वाले किरणों के शंकु का शीर्ष कोण है।

      निगेटिव चौखट का विकर्ण, लेंस के पृष्ठ नोड़ पर अंतरित करता है। इस प्रकार निगेटिव तल तथा लेंस के मध्य के सम्बन्ध को कोणीय विस्तार कहा जाता है। कोणीय विस्तार को निम्न रूप से वर्गीकृत किया गया है-
(i) संकीर्ण कोण (Narrow Angle)-

        संकीर्ण कोण का विस्तार 50° से कम होता है।

(ii) सामान्य कोण (Normal Angle)-

        इसका कोणीय विस्तार 60° होता है। इनका आकार 18×18 सेमी व 23×23 सेमी. तथा फोकल दूरी क्रमशः 31 व 30 मिमी. होती है।

(iii) बृहत कोण (Wide Angle)-

        वृहत कोण का विस्तार 90° होता है। इसका आकार क्रमशः 18×18 सेमी. व 23 × 23 संमी. तथा फोकल दूरी 11.5 व 15 मिमी. है।

(iv) अति वृहत कोण (Super Wide or Ultra Wide Angle)-

       इसका कोणीय विस्तार 120° होता है जिसके फोटोचित्र का आकार क्रमशः 18×18 सेमी. व 23×23 सेमी. तथा फोकल दूरी 70 मिमी. व 88 मिमी. होती है।

E. फिल्म के आधार पर (On the Basis of Film):-

        वायु फोटोग्राफी में प्रयोग की जाने वाली फिल्मों के आधार पर वायु फोटोग्राफ निम्न प्रकार के होते हैं-

(1) श्याम एवं श्वेत पेंक्रोमेटिक फोटोग्राफी

(ii) श्याम एवं श्वेत अवरक्त फोटोग्राफी

(111) रंगीन फोटोग्राफी

(iv) रंगीन अवरक्त/आभासी रंगीन फोटोग्राफी

5. वायव कैमरे (Aerial Camera):-

     वायु फोटोग्राफी का कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उपयोग किया जाता है। इनमें प्रमुख मानचित्रों का निर्माण, फोटो व्याख्या, प्राकृतिक संसाधन सर्वेक्षण, भूगर्भिक एवं मृदा सर्वेक्षण, भूमि उपयोग इत्यादि हैं। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वायु फोटोग्राफी विश्वसनीय एवं सूक्ष्मतम प्रतिबिम्बों की पूर्ति करता है जो विकार रहित तथा क्रमिक भूभाग बिम्बों को दर्शाते हैं। वायु फोटोग्राफी के लिये जिस साज-सामान की आवश्यकता होती है उनमें कैमरा प्रमुख है।

   उत्तम वायु फोटोग्राफी करने के लिए यह अति आवश्यक है कि वायु कैमरा उच्च कोटि का होना चाहिए। फोटोग्रामिति की दृष्टि से उपयोगी, उच्च विभेदन (High Resolution के लक्षण वाले वायु फोटोचित्र प्राप्त करने के लिए ऐसे स्वचालित कैमरे प्रयोग में लाये जाते हैं जो किसी गतिमान प्लेटफार्म से तेजी के साथ एक के बाद एक करके अनेक फोटोचित्र ले सके। इनकी याँत्रिक प्रणाली सामान्य कैमरों की तुलना में भिन्न होती है। इनक ऑप्टिकल इकाइयाँ (लेंस, फिडूसियल मार्क, किनारे इत्यादि) जटिल याँत्रिक ढाँचा तैयार करती है।

6. वायु फिल्म निगेटिव (Aerial Film Negative):-

वायु फिल्म का चुनाव (Choice of Aerial Films):

      वायु फोटोग्राफी में सूक्ष्म विवरणों तथा लघु प्रकाशकरण (Exposure) के लिए महीन कणों युक्त व उच्च गति मिश्रण (Emulsion) फिल्म का प्रयोग किया जाता है जो बिम्ब गतिशीलता को दूर करता है। वायु फिल्म की विभेदन शक्ति 50 रेखायें प्रति मिलीमीटर होती है। यह सिकुड़न रहित (पोलिस्टर आधारित) होती है जिस पर वायुमण्डल या घरातलीय तत्वों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। वायु फिल्म कई प्रकार की होती है जैसे पैक्रोमेटिक, इन्फ्रारेड, एरोग्राफिक सुपर XX, एरोग्राफिक ट्राई-X, एरोग्राफिक इन्फ्रारेड, इक्टराक्रोम, कोडेक ऐरोपैन, एवियोफोटो पैन, इलफोर्ड इत्यादि। वायु फिल्म निगेटिव की लम्बाई अलग-अलग 100, 200, 500 तथा 5000 फीट तक होती है। टोही सर्वेक्षणों में 5000 फीट लम्बी फिल्म का उपयोग किया जाता है।

7. उड़ान दिशा (Flight Direction):-

     वायु फोटोग्राफी एक निर्धारित क्षेत्र को तय करती है जिसे कई पट्टियों में तय किया जाता है। संचालन की सुविधानुसार यह परामर्श किया जाता है कि पट्टिकाओं अथवा स्ट्रीप की संख्या कम से कम हो। इस प्रकार उड़ान दिशा की पट्टियों को क्षेत्र की लम्बाई के अनुरूप तय किया जाता है। दिशा निर्धारण प्राकृतिक अथवा सांस्कृतिक लक्षणों के अनुरूप किया जाता है।

8. फोटोग्राफी का समय (Time of Photography):-

        वायु फोटोग्राफी खींचने का समय अति महत्वपूर्ण होता है। जैसा कि स्पष्ट है कि लम्बी एवं घनी छाँव विवरणों को ढक लेती है तथा फोटोग्राफ में अनावश्यक काले धब्बे दृष्टिगोचर होते हैं। दूसरी ओर लघु छाया, विवरणों को प्रभावशाली ढंग से निर्धारित करती है जिससे वायु फोटो चित्रों के विश्लेषण करने में सहायता मिलती है। स्वच्छ साफ व प्रकाशयुक्त फोटोचित्र विश्लेषण में विशेष महत्व रखते हैं। अनुभव के आधार पर वायु फोटोग्राफी के समय की संस्तुतियाँ निम्न प्रकार से की गई हैं-

(i) वायु फोटोग्राफी उन समयों में की जानी चाहिए जब क्षितिज से सूर्य की ऊँचाई 30° से अधिक होती है।

(ii) अर्थात् वायु फोटोग्राफी का उपयुक्त समय सुबह 9 बजे से सायं 3 बजे के मध्य होना चाहिए।

(iii) यद्यपि फोटोग्राफी का समय माँगकर्ता द्वारा निश्चित किया जाता है लेकिन वायु फोटोग्राफी सुबह 8 बजे से 10 बजे के मध्य तथा सायं को 2 बजे से 4 बजे के मध्य नहीं की जानी चाहिए।

       पर्वतीय भूभागों में धरातलीय विषमतायें होती हैं। धरातलीय उच्चावचन में अधिक अंतर होता है। इसलिए सूर्य की ऊँचाई क्षितिज से 30° के दौरान छाया लम्बी एवं घनी होती है जो कि महत्वपूर्ण धरातलीय विवरणों को छुपा देती है। यही कारण है कि पर्वतीय भूभागों के लिए उपयुक्त फोटोग्राफी का समय 11 बजे से लेकर 2 बजे के मध्य उपयुक्त समझा गया है। मैदानी समतल भूभागों में छाया बहुत महत्व नहीं रखती है, यही कारण है कि फोटोग्राफी के समय में कुछ शिथिलता बरती जाती है। जैसे कि सूर्य की ऊँचाई क्षितिज से 20° से ऊपर होने पर भी वायु फोटोग्राफी की जा सकती है।

      इसी प्रकार उष्ण भू-भागों में मुख्य कठिनाई यह है कि जैसे ही तापमान बढ़ता है वैसे-वैसे वायुमण्डल में धुंध होने लगती है। ऐसी परिस्थितियों में वायु फोटोग्राफी का समय, सूर्योदय से आधा घंटा बाद निश्चित की जाती है।

9. वायु फोटोग्राफी का मौसम (Season of Photography):-

          वायु फोटोग्राफी करने के लिए उपयुक्त मौसम के चुनाव को निम्न कारक प्रभावित करते है-

(i) प्रकाश परावर्तन में मौसमी परिवर्तन

(ii) प्राकृतिक वनस्पति के आवरण में मौसमी परिवर्तन

(iii) जलवायु कारकों में मौसमी परिवर्तन

     वायु फोटोग्राफी के उद्देश्य के आधार पर भी मौसम का चुनाव किया जाता है। उदाहरण के लिए फोटोग्राफिक मानचित्रण, भूगर्भिक या मृदा सर्वेक्षण इत्यादि के लिए धरातल जितना सम्भव हो उतना साफ होना चाहिए। वनस्पति आवरण प्रदेशों में, भूगर्भिक सर्वेक्षण उद्देश्व हेतु फोटोग्राफी उस वक्त उपयुक्त होती है जबकि वनस्पति पर पतझड़ रहता है तथा धरातल स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार बर्फ से आच्छादित उच्च आक्षांशों या अधिक ऊँचाई वाले स्थानों पर फोटोग्राफी का उपयुक्त समय तब होता है जबकि हिम पिघल जाता है तथा धरातल दिखाई देने लगता है। इसी प्रकार मिट्टी सर्वेक्षण हेतु फोटोग्राफी के लिये फसल कटन के बाद का समय उपयुक्त होता है।

       यदि वनस्पति सर्वेक्षण के उद्देश्य हेतु फोटोग्राफी करनी हो तो इसके लिये वृक्षों का घना छत्रीनुमा होना तथा पेड़ों के ताज का पूर्ण पर्णसमूह (Foliage) बहुत महत्व रखता है। भूमि उपयोग व फसल प्रतिरूपों के अध्ययन के लिए वायु फोटोग्राफी उस समय निर्धारित की जाती है जब खेतों में फसल रहती है। सभी उद्देश्यों के लिए वर्षाकाल के पश्चात् (अक्टूबर व नवम्बर) जव आसमान स्वच्छ साफ हता है। फोटोग्राफी की जानी उचित होती है।

प्रश्न प्रारूप

Q. वायु फोटोग्राफी पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Aerial Photography.)


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9. The Digital Image

(डिजिटल इमेज)



      सूचनाओं को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाने या एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिये चित्र या तस्वीर (Picture) सबसे सरल सुविधाजनक तथा सर्वमान्य साधन है। लगभग 75% सूचनाओं को मनुष्य के द्वारा देखकर जानकारी ली जाती है। उपग्रह हमें जो आँकड़े भेजता है उन्हें हम कम्प्यूटर की सहायता से चित्र आकृति में प्रस्तुत कर सकते हैं। किसी भी सचित्र प्रदर्शन के लिये इमेज अथवा बिम्ब एक सामान्य शब्द है। विभिन्न भूभागीय विशेषताओं को विद्युत-चुम्बकीय विकिरण (EMR) की गहनाता (Intensity) के आधार पर अलग-अलग श्वेत एवं श्याम बिम्बों में प्रदर्शित किया जा सकता है जिनमें अलग-अलग चमक होती है।

       संवेदक किसी भी दृश्य के अलग-अलग तरंग-दैर्ध्य (Wave Length) बैंडों पर विभिन्न सूचनाओं को उपलब्ध कराता है जिनका उपयोग बिम्बों की रचना के लिये किया जाता है।
      जब अध्ययनकर्ता द्वारा किसी दृश्य अथवा घटना को देखकर विश्लेषण किया जाता है तो उसे अवलोकन, प्रत्यक्ष ज्ञान या समझ कहते हैं। उपग्रह से प्राप्त सूचनाओं को भी बिम्बों (Images) में परिवर्तित कर विश्लेषण किया जाता है। उपग्रह के आँकड़ों को कम्प्यूटर पर संसाधित कर बिम्ब तैयार किये जाते हैं। इस प्रक्रिया को कम्प्यूटर इमेज प्रक्रमण (Computer Image Processing), कम्प्यूटर विजन (Computer Vision), सुदूर संवेदन आँकड़ों का मशीन द्वारा प्रक्रमण (Machine Processing of Remote Sensing Data) इत्यादि कई नामों से पुकारा जाता है।

इमेज के प्रकार (Types of Image)

        स्रोत के आधार पर इमेज दो प्रकार की होती है।

1. फोटोग्राफिक फिल्म आकार (Photographic Film Form)

2. डिजिटल आकार (Digital Form)

1. फोटोग्राफिक फिल्म आकार (Photographic Film Form):-

       फोटोग्राफिक संवेदक, फोटोग्राफिक फिल्म पर इमेज को दर्शाता है। विभिन्न धरातलीय दृश्य विशेषताओं को सुदूर संवेदन तकनीक की सहायता से फोटोग्राफिक फिल्म पर धरातलीय विवरणों की चमक के आधार पर बिम्बों को प्रदर्शित किया जाता है। जैसा कि स्पष्ट है कि किसी दृश्य के जिस भाग या वस्तु से परावर्तित ऊर्जा अधिक मात्रा में संवेदक तक पहुँचेगी उस भाग का बिम्ब अधिक चमकीला या श्वेत दृष्टिगोचर होगा। चमक के आधार पर फोटोग्राफिक फिल्म पर प्रकाश की गहनता अंकित होती है जो दृश्य निर्माण एवं विश्लेषण में सहायक होते हैं।

2. डिजिटल आकार (Digital Form):-

        डिजिटल इमेज विद्युत-चुम्बकीय ऑप्टीकल संवेदक द्वारा निर्मित की जाती है। उदाहरण के लिए बहुस्पैक्ट्रल संवेदक (Multispectral Sensor) धरातलीय विकिरित ऊर्जा (Radient Energy) की मात्रा को संख्याओं में व्यक्त करता है जिन्हें डिजिटल नवम्बर (DN) कहते हैं। बड़ी डिजिटल संख्या (जैसे कि 150) अधिक मात्रा में विकिरण ऊर्जा को दर्शाती है जबकि छोटी डिजिटल संख्या (जैसे कि दस) ऊर्जा की कम मात्रा को दर्शाता है।

डिजिटल इमेज:-

         डिजिटल इमेज लघु आकार के समक्षेत्र पिक्चर तत्वों के क्रम में व्यवस्थित की जाती है। डिजिटल इमेज में प्रत्येक छोटे से छोटे तत्व (Element) को पिक्सल (Pixel) कहते हैं। पेल (Pel) इसका संक्षिप्त नाम है। प्रत्येक पिक्सल का मान संख्याओं में होता है जिन्हें डिजिटल नम्बर (DN) कहते हैं। पिक्सल धरातल की दूरियों को मीटर अथवा किलोमीटर में प्रदर्शित करते हैं। पिक्सल का आकार संवेदक के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है जिसे विभेदक (Resolution) कहते हैं। पिक्सल का आकार तथा धरातलीय दूरी के आनुपातिक सम्बन्ध को ही विभेदन कहते हैं।

        डिजिटलों मानों को पंक्तियों (Rows) तथा कॉलम (Columns) में व्यवस्थित किया जाता है प्रत्येक पिक्चर तत्व अथवा पिक्सल की स्थिति को XY निर्देशांक के द्वारा निर्धारित किया जाता है। इस प्रकार सामान्यतः डिजिटल संख्याओं को निम्न में से किसी एक प्रारूप में संग्रह किया जाता है।

डिजिटल बिम्ब आँकड़ों का प्रारूप (Data Formats of Digital Image):-

    किसी बिम्ब में बहु स्पैक्ट्रल चैनल होते हैं जो बहु आयामी बिम्ब प्रदर्शित करते हैं। डिजिटल सुदूर संवेदन आँकड़े अक्सर निम्न प्रारूपों में से किसी एक प्रारूप में रखे जा सकते हैं। निम्न प्रारूप प्रायः अधिक प्रचलित माने जाते हैं।

The Digital Image

(i) बिप (BIP-Band Interleaved by Pixel):-

         बिप फारमेट के अन्तर्गत सभी बैंड के आँकड़ों को एक-एक पिक्सल क्रम के अनुसार लिखा जाता है।

(ii) बिल (BIL-Band Interleaved by Line):-

        बिल फारमेट में सभी बैंडों के आँकड़ों को एक-एक लाइन क्रम में लिखा जाता है। (चित्र 1)

(iii) बी. एस. क्यू. (BSQ-Band Sequential):-

          बैंड अनुक्रमत्व फारमेट में प्रत्येक बैंड के आँकड़ों को एक फाइल पर लिखा जाता है तथा क्रम से संग्रह किया जाता है। (चित्र 2)

        उपरोक्त प्रारूपों को इस प्रकार भी समझाया गया है। कल्पना कीजिए कि हमारे पास 6 पिक्सल (तीन कॉलम एवं दो पंक्तियाँ) अलग-अलग तीन बैंडों के आँकड़े निम्न प्रकार से है-

Table-1

       इस इमेज डाटा को BSQ, BIL या BIP में से किसी भी एक प्रारूप में सघन कर रखा जा सकता है।

दृश्य विश्लेषण (Visual Interpretation):-

       फोटोग्राफिक हार्ड प्रतियों के लक्ष्यों की पहचान तथा उनका वर्गीकरण करना दृश्य विश्लेषण कहलाता है जो कि इमेज विशेषताओं जैसे कि आकार, आभा, प्रतिरूप, आकृति, संगठन, स्थिति, सहसम्बन्ध, छाया तथा पहलू पर आधारित होते हैं।

डिजिटल बिम्ब का मेटाडाटा (Metadata of Digital Image):-

      मेटा डाटा का अभिप्राय है डाटा से डाटा का निर्माण करना। डिजिटल बिम्ब हमेशा मेटाडाटा रखते हैं जिन्हें शीर्ष सूचनायें भी (Header Information) कहते हैं। बिम्ब के शीर्ष पर उद्धरित सूचनायें अति महत्वपूर्ण होती हैं। इस प्रकार की सूचनायें किसी बिम्ब के पंक्तियों, कॉलम, स्पैक्ट्रल बैंड का नम्बर, संवेदक सूचनायें, प्राप्त किये गये आंकड़ों की तिथि व समय, सूर्य की ऊँचाई व कोण, पाथ व रो नम्बर, प्रक्षेप, बिम्ब का विस्तार, उत्पाद के प्रकार, विभेदन, आँकड़ा फाइल का प्रारूप, भौगोलिक निर्देशांक इत्यादि सूचनायें उपलब्ध होती हैं। कुछ बिम्बों में प्रक्रियन प्रणाली का भी उल्लेख होता है।

डिजिटल इमेज प्रक्रमण (Digital Image Processing):-

   डिजिटल इमेज प्रक्रमण, कम्प्यूटर की सहायता से किसी प्राप्त इमेज का विश्लेषण तथापरिचालन करना होता है। धरातलीय आकृतियों के उपयुक्त अन्तर विश्लेषण तथा व्याख्या के लिये डिजिटल आँकड़ों को विभिन्न एलगोरिथम पर रखा जाता है। इससे इमेज का उच्चीकरण किया जाता है। वास्तव में उपग्रह से प्राप्त इमेज आँकड़ों को समझने के लिए कम्प्यूटर मॉनीटर पर प्रदर्शित किया जाता है। कभी इन आँकड़ों को तीन स्पैक्ट्रल बैंडों के संयुक्त रूप से जैसे कि FCC (False Colour Composit) तथा कभी अलग-अलग स्पैक्ट्रल बैंड इमेज द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रक्रिया के लिये विभिन्न तकनीकियों का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न प्रारूप

Q. इमेज से क्या आशय है? डिजिटल इमेज की विवेचना करें।


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17. The application of G.P.S. (जी.पी.एस. के उपयोग)

The application of G.P.S.

(जी.पी.एस. के उपयोग)


The application of G.P.S.

(जी.पी.एस. के उपयोग)⇒

      विश्व स्थिति प्रणाली एक बहु-उद्देश्यीय प्रणाली है। यह तकनीक आर्थिक रूप से मितव्ययी तथा स्थिति निर्धारण में दुरुस्त है। इसमें अन्य विषय को विचारने की क्षमता है। जी.पी.एस. का उपयोग प्रत्येक मौसम में किसी भी समय निरन्तर रूप से किया जा सकता है। ज्योडेसी (Geodesy), सर्वेक्षण (Surveying), नौसंचालन (Navigation) तथा कई अन्य क्षेत्रों में जी.पी.एस. अपार सम्भावनाओं का पता लगाता है।

            विभिन्न सर्वेक्षण की विधियों का अलग-अलग उद्देश्यों के लिये इसमें प्रयोग किया जाता है। इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह विभिन्न सूचनाओं एवं अनेक प्रकार की जानकारियों को एक प्रणाली में संगठित करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है जिसे संगठित प्रणाली (Integrated System) कहते हैं। जी.पी.एस. की विभिन्न अवलोकन विधियाँ वास्तविक स्थिति (Absolute Positioning), सापेक्षिक स्थिति (Relative Positioning) इत्यादि हैं।

        जी.पी.एस. निर्देशांक प्रणाली एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) दोनों मानचित्रों की सहायता से नौसंचालन सुविधायें प्राप्त की जा सकती हैं। वर्तमान समय में तेजी से भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) एवं सुदूर संवेदनअध्ययनों में जी.पी.एस. साधन के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। विस्तृत गुणात्मक सूचनाओं को एकत्र करने सुदूर संवेदन से प्राप्त आँकड़ों के भू-सत्यापन के लिये जी.पी.एस. रिसीवर का उपयोग अति तेजी से बढ़ रहा है।

         विभिन्न उद्देश्यों के लिये सर्वेक्षण की अलग-अलग विधियाँ प्रयोग की जाती है। अवलोकन विधि के दौरान जी.पी.एस. रिसीवर को स्टेटिक, आभासी-काइनेमेटिक तथा काइनेमेटिक मोड में प्रयोग किया जाता है। इन अलग-अलग मोड के विवरण तथा परिणाम का जी.पी.एस. सर्वेक्षण, भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा सम्पन्न किया गया है जिनको तिन रूप में समझाया जा सकता है-

स्टेटिक मोड (Static Mode):-

          स्टेटिक मोड को स्थिर विधि कहते हैं। इसे सापेक्षिक स्टेटिक मोड भी कहते हैं। इसके अन्तर्गत दो या दो से अधिक स्थानों पर एक साथ निरन्तर 3 से 4 घंटे से अवलोकन किया जाता है तथा आँकड़ों की प्रक्रिया के पश्चात् निर्देशांक ज्ञात किये जाते हैं। भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने देश के विभिन्न भागों में जी.पी.एस. तकनीक से सर्वेक्षण कर ज्योडेटिक नियंत्रण बिन्दुओं को स्थापित किया है। अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान, पंजाब तथा अण्डमान निकोबार द्वीप में नियंत्रण बिन्दु स्थापित किये गये हैं। पुन: IRS-IC उपग्रह को इस तकनीक से जोड़ने के लिये हरियाणा, दिल्ली, उत्तरांचल तथा महाराष्ट्र में भू-नियंत्रण बिन्दुओं को निर्धारित किया गया है।

          अवलोकन से प्राप्त परिणामों को स्टेटिक मोड में लिया गया है तथा परिणाम शुद्ध पाये गये हैं। इन परिणामों की शुद्धता 5PPm या इससे भी ऊपर है। इससे यह भी प्रमाणित होता है कि जी.पी.एस. आर्थिक दृष्टि से भी काफी उपयुक्त है तथा साधाण विधियों से 3 गुना तीव्र है।

The application of G

आभासी काईनेमेटिक मोड (Pseudo Kinematic Mode):-

        आभासी काइनेटिक मोड के अन्तर्गत रौवर रिसीवर का प्रयोग किया जाता है। इसके प्रत्येक स्टेशन पर अवलोकन करने में कम से कम समय 4 से 8 मिनट लगता है। इस क्रिया को लगभग एक घंटे से भी अधिक समय तक लगातार करते रहते हैं।

        ठीक इसके विपरीत एक दूसरा रिसीवर भी किसी अन्य सेवक स्टेशन पर प्रयोग किया जाता है जिसको पूर्व से ही ज्ञात स्टेशन पर निश्चित कर दिया जाता है। फिल्ड स्टेशन में गणनाओं का अवलोकन बार-बार करने से उपग्रह ज्यामिति परिवर्तन स्वरूप को भी ज्ञात किया जा सकता है। इस प्रकार से अनिश्चित अवस्था (Amleiguity) परिणामों का समाधान होता है। आभासी-काइनेमिटिक सर्वेक्षण से पूर्व निश्चित स्टेशन (Fixed Station) से एक आधार रेखा की आवश्यकता होती है जिससे उस क्षेत्र की स्थिति निर्धारण किया जा सके। स्थिर सापेक्षिक मोड से एक घंटे का जी.पी.एस. अवलोकन करना आवश्यक है।

काइनेमेटिक मोड (Kinematic Mode):-

        सर्वेक्षण कार्य में इस विधि का स्वतंत्र रूप से प्रयोग किया जाता है। किसी ज्ञात स्टेशन या आधार स्टेशन पर स्टेशनरी रिसीवर का प्रयोग किया जाता है। घुमाने वाले रिसीवरों द्वारा 4 से अधिक उपग्रहों से निरन्तर सिंगनल लॉक (Signal Lock) होता रहता है। कुछ रिसीवर अवलोकन बिन्दुओं के मध्य घूमते रहते हैं।

            भू-मापन की प्रक्रिया के बाद एकल आवृत्ति (Single Frequency) जी. पी. एस. में एक अवलोकन का उपयोग किया जाता है। X, Y Z प्रणाली के निर्देशांक व अक्षांश, देशान्तर तथा ऊँचाइयों की गणना की जाती है जो किसी भी स्टेशन के स्थिर निर्देशांक होते हैं। अक्षांश तथा देशान्तर को समतल आयताकार प्रणाली में परिवर्तित किया जाता है जो कि ट्रैवर्स मर्केटर प्रक्षेप (Traverse Marcater Projection-TMP) में निर्मित होते हैं।

1. जी. पी. एस. का विश्व व्यापी उपयोग (Global Use of G.P.S)

(i) नौसंचालन (Navigation):-

      सभी के वायुयानों तथा पानी के जहाजों में मार्ग नौसंचालन के लिये जी.पी.एस. का उपयोग किया जा सकता है। इसमें शुद्धता का विशेष महत्व नहीं है। लगभग 100 मी० तक की शुद्धता भी इस प्रयोग को प्रभावित नहीं करती है।

(ii) सर्वेक्षण (Surveying):-

         जी.पी.एस. विश्व स्तरीय उपयोग के ज्योडेसी के लिये एक शक्तिशाली साधन है। पृथ्वी के परिभ्रमण तथा प्लेट विवर्तन जैसे ग्लोबल भू-गतिशील घटनाओं से प्रबोधन के लिये अति दूर आधार रेखा इन्टरफरोमेटरी (Very Long Baselining Interferomatry-VLBI) तथा उपग्रह लेजर रेन्डिंग (Satellite Laser Ranging-SLR) तकनीकियों का उपयोग किया जाता है। जी.पी.एस इन तकनीकियों का स्थान ले रहा है तथा इनको बदलने का भी कार्य कर रहा है। इसका उपयोग भी प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है तथा परम्परागत तकनीक धीरे-धीरे सिमट रही हैं ज्योडेटिक समस्याओं के लिये जी.पी.एस. अति प्रभावशाली समाधान प्रस्तुत करता है।

(iii) समय तथा दूर संचार (Timing and Communication):-

        उपग्रह प्रणाली के एक अन्तर्गत सही समय को दर्शाने वाली घड़ी जी.पी.एस. के विश्व स्तर पर प्रयोग को दर्शाता है। पूरे विश्व में समय को शुद्ध रूप से निर्धारित किया जा सकता है। उच्च शुद्ध समय के कई उपयोग हैं जैसे कि भूकम्प तरंगों का प्रबोधन (Monitoring) तथा अन्य भू-भौतिकीय मापन। किसी ज्ञात स्टेशन पर केवल एक उपग्रह से ही जी. पी. एस. रिसीवर 0.1 माइक्रोसेकंड तक शुद्ध समय को प्रदर्शित करता है। कई अन्य परिष्कृत तकनीकियों के आ जाने से अब मोनोसेकंड के गुना शुद्ध समय को दर्शाया जा सकता है।

2. जी.पी.एस. का क्षेत्रीय उपयोग (Regional Uses of GPS):-

          संसाधनों के प्रबोधन, यातायात प्रबन्धन, संरचनात्मक प्रबोधन तथा कई प्रकार के स्वचलन कार्यों में जी.पी.एस. का उपयोग सफलता पूर्वक किया जा सकता है। नौसंचालन में एस.ए. (SA) का उपयोग किया जा सकता है। यह तकनीक हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण के लिये भी उपयोग हो रही है।

प्रश्न प्रारूप

Q. जी.पी.एस. के उपयोग प प्रकाश डालें।

(Throw light on the application of G.P.S.)



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10. Projection / प्रक्षेप

10. Projection / प्रक्षेप



Projection / प्रक्षेप

             गोलाकार पृथ्वी (Spherical Earth) के किसी भूभाग को समतल सतह पर ज्यामितीय विधियों के द्वारा प्रदर्शित करने की विधि को प्रक्षेप कहते हैं। वृहत मापनी पर बने मानचित्र, यथाआकृतिक प्रक्षे (Orthographic Projection) पर निर्मित होते हैं जबकि प्रायः वायु फोटोचित्र केंद्रीय प्रक्षेप (Central Projection) पर निर्मित होते हैं।

           यथाआकृतिक प्रक्षेप में किसी भी भाग की वही आकृति आती है जो उस क्षेत्र की ग्लोब पर है परन्तु केंद्रीय प्र में ऐसा प्रत्येक भाग में संभव नहीं है। ऊर्ध्वाधर वायु फोटोग्राममिति की आदर्श दशा यह हो सकती है यदि वायु फोटोग्राफी किया जाने वाला धरातल समतल तथा क्षैतिज रूप से समतल हो तो वायु फोटोचित्र ज्यामितीय रूप से वैसे ही होते हैं जैसे कि उस क्षेत्र के मानचित्र परन्तु प्रत्येक भूभाग में ऐसा संभव नहीं है। इसलिए कैमरा अक्ष के झुकाव (Tilt) तथा की धरातल की उच्चावचन विभिन्नताओं के कारण वायु फोटोचित्र ज्यामितीय रूप से उस क्षेत्र के मानचित्रों की तुलना में भिन्न होते हैं।

             वायु फोटोबिम्ब निर्वचन में प्रयोग की जाने वाली ज्यामितीय विधियों के आधार पर वायु फोटोबिम्ब के प्रक्षेपों के निम्न तीन प्रकार हैं-

प्रक्षेपों के प्रकार (Types of Projection)

1. समानान्तर प्रक्षेप (Parallel Projection)

2. लम्बकोणीय प्रक्षेप (Orthographic Projection)

3. प्रक्षेप (Central Projection)

1. समानान्तर प्रक्षेप (Parallel Projection):-

       इस प्रक्षेप में प्रक्षेपित किरणें, समानान्तर होती हैं। निम्न दिये गये उदाहरण में ABC त्रिभुज को LL रेखा पर प्रक्षेपित किया है जिसका प्रक्षेपण त्रिभुज abc है। चित्र से स्पष्ट है कि प्रक्षेपित किरण Aa Bb, Cc एक दूसरे के समानान्तर हैं।

Projection

Geometry of Photograph

2. लम्बकोणीय प्रक्षेप (Orthographic Projection):-

        इस दिशा में त्रिभुज ABC की किरणों को LL रेखा पर प्रक्षेपित किया गया है। (चित्र B) त्रिभुज की सभी किरणें LL रेखा पर समकोण बनाती हैं। यह समानान्तर प्रक्षेप की एक दशा है। एक निश्चित मापक पर बने मानचित्र लम्बकोणीय प्रक्षेप पर होते हैं।

           इस प्रक्षेप का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें दूरियाँ, कोण तथा क्षेत्र सभी किसी लक्ष्य के उच्चावचन अंतरों से स्वतंत्र होते हैं।

3. केंद्रीय प्रक्षेप (Central Projection):-

              उपर के चित्र C में केंद्रीय प्रक्षेप को दर्शाया गया है। इस प्रक्षेप में त्रिभुज ABC की सभी प्रक्षेपित किरणें Aa, Bb तथा Cc एक बिन्दु 0 से गुजरती है जिसको प्रक्षेप केंद्र (Projection Centre) या संदर्श केंद्र (Perspective Centre) कहते हैं। लेंस प्रणाली द्वारा (जिसे O बिन्दु माना गया है) प्रक्षेपित बिम्ब को केंद्रीय प्रक्षेप के रूप में पेश किया गया है। संदर्श केंद्र एवं लक्ष्य (Object) के मध्य का तल (Plane) पोजिटिव तल (Positive Plane) है। लेंस को एक संदर्श केंद्र के रूप में लिया गया है। सामान्यतः वायु कैमरों में दो संदर्श केंद्र होते हैं-

(i) बाह्य (External) संदर्श केंद्र तथा

(ii) आन्तरिक (Internal) संदर्श केंद्र

प्रधान दूरी (Principal Distance)-

         आंतरिक संदर्श केंद्र (Internal Perspective Centre) से फोटो तल की लम्बवत दूरी को प्रधान दूरी कहते हैं। फोटोतल पर लम्बवत दूरी का आधार प्रधान बिन्दु (Principal point) कहलाता है।

फिडूसियल निशान (Fiducial Mark)-

         उत्तम श्रेणी के समायोजित कैमरे द्वारा खींचे गये फोटोचित्रों के चारों किनारों के मध्य या विकर्ण रूप में चारों किनारों पर ‘V’ आकार के निशान लगे होते हैं जिन्हें फिडूसियल निशान (Fiducial Marks) कहते हैं। इनको सूचक चिह्न (Index Mark) भी कहते हैं। इनकी संख्या 4 होती है। ये कैमरे लेंस के साथ स्थाई रूप से कटे रहते हैं जो निगेटिव पर विम्ब बनाते हैं। ये बिम्ब फोटोग्राफ पर अंकित हो जाते हैं। इनके द्वारा प्रधान बिन्दु का निर्धारण किया जाता है।

प्रधान बिन्दु (Principal Point)-

          फोटोचित्र पर चारों फिडूसियल निशानों के प्रतिच्छेदन (Intersection) बिन्दु को प्रधान बिन्दु कहते हैं। इनके द्वारा फोटोचित्र आन्तरिक दिविन्यास (Orientation) आवश्यकता की पूर्ति की जाती है।

साहुल बिन्दु (Plumb Point)-

        संदर्श केंद्र से सीधे नीचे की ओर खड़ी उर्ध्वाधर रेखा जब फोटो तल पर मिलती है तो इस बिन्दु को साहुल बिन्दु कहते हैं।

टिल्ट (झुकाव/Tilt)- टिल्ट का अर्थ है झुकाव। कैमरे के ऑप्टिकल (Optical Axis) तथा साहुल रेखा (Plumb Line) के मध्य जो कोण बनता है उसे झुकाव अथवा झुकाव कोण कहते हैं।

        इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि यह धरातल तल (Ground Plane) तथा फोटो तल (Photo Plane) के मध्य का कोण झुकाव कोण है। इसे निम्न चित्र में समझाया गया है। खड़े रूप में कैमरा अक्ष के विचलन कोण को कोण कहते हैं।

टिल्ट (झुकाव

Tilt

           इस प्रकार झुकाव के दो प्रमुख घटक (Components) है। पहला उड़ान दिशा X अक्ष की तथा दूसरा उड़ान दिशा के खड़े रूप में Y की ओर। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि झुकाव को दो दिशाओं की ओर निर्धारित किया जाता है।

(i) पहला घटक ‘Y’ अक्ष के बारे में है। जब झुकाव उड़ान दिशा (X अक्ष) की ओर है तो इसे अनुदैर्ध्य (Lontigudinal) या ‘X’ झुकाव या अग्र (Fore) या प्रवण (Apt) टिप (Tip) झुकाव कहा जाता है। इसे  Φ(फाई Phi) के द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है।

(ii) दूसरा घटक ‘X’ अक्ष के बारे में है। जब झुकाव ‘Y’ दिशा की ओर खड़े रूप में होता है तो उसे पार्श्विक झुकाव (Lateral Tilt) या ‘Y’ झुकाव या साधारण कहा जाता है। इसे ω (ओमेगा Omega) के द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है।

नादिर बिन्दु (Nadir Point)-

           नीचे के चित्रों में संदर्श विन्दु 0 से एक खड़ी रेखा ON पर बिन्दु ‘n’ पर मिलती है जिसे फोटो अधोबिन्दु (Nadir Point) कहते हैं तथा भूमि पर बिन्दु ‘N’ भूमि अधोबिन्दु (Nadir Point) कहलाता है।

नादिर बिन्दु

Photo Nadir Point

फिडूसियल केंद्र (Fiducial Centre)-

      फोटो तल पर संदर्श बिन्दु (O) से साहुल रेखा का पाद या आधार (p) प्रधान बिन्दु (Principal Point) कहलाता है। इस प्रकार संदर्श बिन्दु (O) तथा प्रधान बिन्दु (p) के मध्य की खड़ी दूरी प्रधान दूरी (Principal Distance) कहलाती है।

प्रधान दूरी (Principal Distance)-

         जैसा कि पहले स्पष्ट किया जा चुका है कि फोटोग्राफ में प्रधान बिन्दु की स्थिति का निर्धारण फिडूसियल चिह्नों के प्रतिच्छेदन बिन्दु से की जाती है। फिडूसियल अक्ष के प्रतिच्छेदन बिन्दु को फिडूसियल केंद्र भी कहते हैं।

फोटो झुकाव के कारण (Reasons for Photo Tilt)

        विभिन्न दिशाओं में झुकाव होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

1. वायुमण्डलीय दशा (Atmoshperic Conditions)

2. पायलेट की गलती के कारण (Human Error of the Pilot)

3. कैमरे की त्रुटि के कारण (Imperfection of Camera)

           टिल्ट अथवा झुकाव के प्रभाव से फोटो बिम्ब विकृत हो जाता है।

दोलन (Swing)-

       दोलन फोटोतल पर मापा जाने वाला एक कोण है जो कि उड़ान दिशा की ओर फिडूशियल अक्ष तथा वास्तविक उड़ान रेखा के मध्य में बनता है। इस कोण को λ(कापा Kappa) द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है।

प्रक्षेप

Swing

समकेंद्र (Isocentre)-

      झुकाव के कोण का अर्द्ध विभाजन फोटो तल के समकेंद्र पर प्रतिच्छेदन करता है जिसे फोटो समकेंद्र (Photo Isocentre) कहते हैं। जब यह अर्द्ध विभाजक भूमि तल पर मिलता है तो इसे भूमि समकेंद्र (Ground Isocentre) कहते हैं। इन बिन्दुओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यदि धरातल समतल होता है तो इन बिन्दुओं पर कोण शुद्ध होते हैं।

प्रश्न प्रारूप

Q. प्रक्षेप से क्या आशय है? इसके प्रकार की विवेचना करें।

(What do you mean Projection? Discuss its types.)



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14. भू-सन्दर्भ / The Geo-Referencing System

14. भू-सन्दर्भ

(The Geo-Referencing System)


भू-सन्दर्भ⇒

          धरातलीय सूचनाओं को नियंत्रित रूप से संचालित करने की नितान्त आवश्यकत होती है जिससे धरातलीय दूरियाँ, बसाव स्थिति एवं दिशा एक-दूसरे से सम्बन्धित रह सके। इसके लिए धरातलीय सन्दर्भ प्रणाली (Geo-Reference System) को स्थापित करने की आवश्यकता होती है। जैसा कि ज्ञात है कि सभी धरातलीय सूचनायें मानचित्रों में दर्शाई जाती हैं। मानचित्र का मुख्य कार्य वास्तविक संसार की आकृतियों को उनकी बसाव स्थिति के अनुरूप दर्शाना होता है। भौगोलिक बसाव स्थिति को ही भू-सन्दर्भित (Geo-Referencing System) प्रणाली कहते हैं। मानचित्र ज्यामितीय विशेषतायें लिए हुये होते हैं।

           सुदूर संवेदन से प्राप्त घरातलीय सूचनाओं के प्रतिविम्ब बिना प्रक्षेपों के होते हैं। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता है कि सुदूर संवेदन से प्राप्त प्रतिविम्बों में मानचित्र जैसी ज्यामितीय विशेषतायें होती हैं। सभी सुदूर संवेदन उत्पादों को धरातलीय बसाव स्थितियों के अनुरूप व्यवस्थित करना अति आवश्यक होता है। भौगोलिक बसाव स्थिति को निर्देशांकों Coordinated) की सहायता से प्रदर्शित किया जाता है।

       “किसी निश्चित निर्देशांक प्रणाली की रूपरेखा के अनुरूप वास्तविक संसार की आकृतियों को दर्शाना भू-सन्दर्भ प्रणाली कहलाती है।”

         दूसरे शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है कि- “अव्यवस्थित सुदूर संवेदन आँकड़ों को भू-धरातलीय (Geo-Spatial) आँकड़ों में परिवर्तन करना ही भू-सन्दर्भ प्रणाली कहलाती है।”

         यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि धरातलीय सन्दर्भ प्रणाली (Spatial Reference System) एवं भौगोलिक सन्दर्भ प्रणाली (Geo-graphical Reference System) दोनों एक ही हैं जिन्हें साधारण रूप से Geo-Referencing कहा जाता है। ये दोनों ही धरातलीय मापन से सम्बन्धित हैं।

भू-सन्दर्भ प्रणाली के उद्देश्य

           सुदूर संवेदन द्वारा ली गई इमेज में किसी पिक्सल की स्थिति तथा उसी पिक्सल तत्व की धरातल पर वास्तविक स्थिति के अनुपातिक सम्बन्ध को स्थापित करना ही भू-सन्दर्भ प्रणाली का प्रमुख उद्देश्य है।

          दूसरे शब्दों में भू-सन्दर्भ का उद्देश्य धरातलीय आकृतियों को उनकी बसाव स्थिति के अनुरूप दर्शाने के लिए एक ऐसी रूप रेखा तैयार की जाती है जिस प्रारूप के अन्तर्गत वास्तविक संसार की आकृतियों का उचित मापन (Measurement), संग्रहण (Recording), परिकलन (Computition), तथा विश्लेषण (Analysis) किया जा सके।

भू-सन्दर्भ की संकल्पना (Concept of Geo-Referencing)

           वास्तव में यदि व्यवहारिक रूप से देखा जाय तो भू-सन्दर्भ एक ऐसी संकल्पना एवं तकनीकि है जो पृथ्वी के गोलाकार असमतल धरातल को समतल मानचित्र पर सफलतापूर्वक मापन कर परिवर्तित करता है। यह निर्देशांक प्रणाली के द्वारा ही सम्भव है। इसके द्वारा आकृतियों का उचित मापन एवं दृश्याँकन अति सुगम हो जाता है।

             यद्यपि मानचित्र भी धरातलीय सूचनाओं का आधार है परन्तु मानचित्र आँकड़ों की अपेक्षा भिन्न सूचनायें रखते है। भू-सन्दर्भ की विशेषताओं के कारण ही यह अन्य सूचना एकत्र करने वाली प्रणालियों से भिन्न है। पृथ्वी की भौतिक आकृति को गणितीय विधियों के द्वारा समतल सतह पर प्रदर्शित करने की संकल्पना का अनुमान ज्योड़ (Geiod) एवं गोलाभ (Ellipsoid) परिभाषा से लगाया जा सकता है जो कि भू-सन्दर्भ प्रणाली की संकल्पना का मूलाधार है।

              प्रायः सुदूर संवेदन आँकड़ों से तैयार की गई इमेज की DN मानों में लिया जाता है। DN मान बिना किसी सूचना या नाम चिप्पी के होते हैं जो धरातल के विभेदन (Resolution) का एक लघु रूप होता है। प्रत्येक DN मान की एक ज्यामितीय स्थिति होती है। ज्यामिमितय सम्बन्ध से अभिप्राय है कि घरातल के बिन्दुओं तथा इमेज बिन्दुओं के मध्य समानुपातिक सम्बन्ध होना। किसी पिक्सल की स्थिति को धरातल की स्थिति में परिवर्तित किया जा सकता है। धरातल की स्थिति को 3D निर्देशांक प्रणाली (3D Co-ordinate system) में या मानचित्र प्रक्षेप में 2D निर्देशांक प्रणाली (2D Co-ordinate System) के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।

          इस प्रकार किसी भी बिम्ब (Image) को भू-सन्दर्भित करने से दो समस्याओं का हल एक साथ निकाला जा सकता है-

(i) जिस आकृति की विम्ब (Image) में पहचान की जानी है उसके मानचित्र के निर्देशांक प्राप्त किये जा सकते हैं।

(ii) सुदूर संवेदन बिम्बों के ज्यामितीय विकारों (Distortions) को तभी शुद्ध किया जा सकता है जब उसके किसी पिक्सल को मानचित्र के निर्देशांकों के अनुरूप ढाल दें। इस प्रकार के निर्देशांक रुपान्तरण को भू-सन्दर्भित (Geo-Referencing) कहा जाता है। सुदूर संवेदन एवं जी.आई.एस. में किसी भी रास्टर आधारित भौगोलिक डाटा प्रक्रिया का यह सबसे पहला कदम होता है, तभी डाटा शुद्ध सन्दर्भित माना जाता है।

भू-सन्दर्भ के उपागम (Approaches of Geo-Referencing)

          रास्टर आधारित आँकड़ों के प्रक्रियन (Process) में निम्न दो प्रमुख उपागमों के द्वारा किसी बिम्ब को भू-सन्दर्भित किया जाता है-

(i) बिम्ब का मानचित्र में शुद्धीकरण (Image to Map Rectification)

(ii) बिम्ब से बिम्ब में पंजीकरण (Image to Image Rectification)

(i) बिम्ब का मानचित्र में शुद्धीकरण-

            किसी बिम्ब को, मानचित्र निर्देशांक प्रणाली में परिवर्तित करने या शुद्ध करने की प्रक्रिया को बिम्ब का मानचित्र में शुद्धीकरण कहलाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि रास्टर बिम्ब में पंक्ति व कॉलम निर्देशांकों को मानचित्र के X व Y निर्देशांकों में रूपान्तरण किया जाता है। बिम्ब को निम्न दो अन्तर सम्बन्धित परिचालन प्रक्रिया के अन्तर्गत शुद्ध किया जाता है-

(a) Spatial Interpolation by Co-ordinate Transformation

(b) Attribute Interpolation by Resampling

(ii) बिम्ब का विम्ब से पंजीकरण-

         इसका अभिप्राय यह है कि शुद्ध किये गये बिम्ब से किसी नये विम्ब को शुद्ध करना है। पूर्व में जो बिम्ब मानचित्र निर्देशांक की सहायता से शुद्ध किया गया है उसकी सहायता से अशुद्ध बिम्ब को शुद्ध की जाने वाली प्रक्रिया बिम्ब में पंजीकरण कहलाता है। जी.आई.एस. में सामान्यतः एक रास्टर बिम्ब से दूसरे रास्टर बिम्ब में पंजीकरण किया जाता है।

भू-सन्दर्भ की प्रक्रिया (Process of Geo-Referencing)

              सुदूर संवेदन एवं जी.आई.एस. में रास्ट डाटा को किसी निश्चित मानचित्र निर्देशांक प्रणाली में भू- सन्दर्भित करना अति आवश्यक होता है। मूलरुप से रास्टर डाटा का भू-सन्दर्भित करना रास्टर सतह (layer) की संकल्पना है। रास्टर बिम्ब को X (Horizental) एवं Y (Vertical) लघु ग्रीड सेलों के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। किसी भी डाटा सेल की स्थिति पंक्ति एवं कॉलम के द्वारा सन्दर्भित होती है। सेल का न्यूनतम आकार मापन की सूक्ष्म इकाई होती है। किसी भी सेल की स्थिति उसकी पंक्ति संख्या एवं कॉलम संख्या से पहचानी जा सकती है। पंक्ति का प्रारम्भ धनात्मक दिशा नीचे की ओर एवं कॉलम दाहिने ओर को इशारा करते हैं

भू-सन्दर्भ

प्रश्न प्रारूप

Q. भू-सन्दर्भ प्रणाली पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Geo-referencing System.)



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18. सुदूर संवेदन के उपयोग

18. सुदूर संवेदन के उपयोग

(The Applications of Remote Sensing)


सुदूर संवेदन के उपयोग

               धरातलीय सूचनाओं को प्राप्त करने के परम्परागत विधियाँ अधिक समय व्यय करने वाली होती है तथा इन पर मानव शक्ति की अधिक आवश्यकता होती है। इसलिये सुदूर संवेदन तकनीक की तुलना में परम्परागत विधियों का उपयोग समय की दृष्टि से त्वरित नहीं लगता है। मानचित्र समय के साथ पुराने हो रहे हैं परन्तु बिना मानचित्र के सुदूर संवेदन अध्ययन का आधार तैयार नहीं किया जा सकता है। सुदूर संवेदन के कई उपयोग है। प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक तत्वों के अलग-अलग अध्ययनों में इसकी अग्रणी भूमिका रही है।

      प्राकृतिक तत्वों में सबसे प्रमुख मौसम दशाओं का विश्लेषण तथा भविष्यवाणी (Weather Analysis and Forcasting), हिम जल प्रवाह (Snow Melt Run off), बाढ़ (Floods), भू-स्खलन (Landslides), प्राकृतिक आपदायें (Natural Disasters), भू-आकृतिक तथा भूवैज्ञानिक मानचित्रण (Geomorphological and Geological Mapping), प्राकृतिक वनस्पति मानचित्रण (Natural Vegetation Mapping), मृदा वर्गीकरण (Soil Classification), बेकार भूमि का सीमांकन (Waste Land Delineation), महासागर उत्पादकता (Ocean Productivity), जैव विविधता (Biodiversity), संसाधनों का सर्वेक्षण (Resource Surveys) इत्यादि है।

      इसी प्रकार सांस्कृतिक तत्वों में भूमि उपयोग (Land Use), दावानल पहचान (Forest Fire Detection), कृषि प्रकार (Types of Agriculture), फसल तालिका (Crop Inventory), सिंचाई जल प्रबन्ध (Irrigation Water management), बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना (Multi-Purpose River Vally Projects), नगर स्व-प्रसार (Urban Sprow), प्रदूषण की समस्या (Pollution Problems), खनिजों की खोज (Mineral Exploration) इत्यादि कई अध्ययनों में सुदूर संवेदन का उपयोग किया जाता है।

          प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक तत्वों के अध्ययन के अलावा आजकल अनेक देशों में राष्ट्रीय प्रतिरक्षा (National Defence) के क्षेत्र में दूरदर्शन का प्रयोग किया जा रहा है। उपग्रहीय प्रतिबिम्बों एवं वायु फोटोग्राफ की सहायता से शत्रु की सेना की गतिविधियों को पहचाना जा सकता है। इस तकनीक के द्वारा सेना के जमाव, शस्त्रशाला, सैनिक किलाबन्दी एवं मार्गों के निर्माण आदि का सरलतापूर्वक प्रबोधन हो सकता है।

भूविज्ञान (Geology)

         भूविज्ञान के अन्तर्गत शैल प्रकारों, संरचनाओं, भूआकृतियों तथा अन्तःस्थलीय भाग का अध्ययन किया जाता है जिनका सम्बन्ध, प्राकृतिक प्रक्रियाओं एवं शक्तियों से रहा है तथा जो पृथ्वी के धरातल पर आवश्यक परिवर्तन करने में अपनी अग्रणी भूमिका निभाते हैं। यह सभी जानते हैं कि खनिजों एवं हाइड्रोकार्बन संसाधनों की खोज एवं विदोहन ने समाज में लोगों के जीवन स्तर को उठाया है। पेट्रोलियम से यातायात साधनों के संचालन के लिये गैस एवं तेल की पूर्ति होती है। चूने का पत्थर सीमेंट एवं चूने के भट्टों को कच्चे माल की पूर्ति करता है।

        संगमरमर तथा ग्रेनाईट की खानों से भवन निर्माण की सामग्री उपलब्ध होती है। इसी प्रकार पोटाश से खाद, कोयले से ऊर्जा, बहुमूल्य धातुओं एवं रत्नों से जेवरात, तथा तांबा, जिंक तथा कई प्रकार के खनिज विभिन्न उपयोगों में काम आते हैं। केवल पृथ्वी के सुदूर संवेदन तकनीक भूगर्भिक अध्ययन तक ही सीमित नहीं है बल्कि दूसरे ग्रहों एवं चंद्रमा की बनावट व संरचनाओं के परीक्षण में भी इसका सफलतापूर्वक प्रयोग किया जा रहा है।

        सम्भावित आपदाओं जैसे कि ज्वालामुखी, भूकम्प, भूस्खलन आदि अध्ययनों में भूविज्ञान को सम्मिलित किया जाता है। इसी प्रकार निर्माण एवं इन्जीनिरिंग से सम्बन्धित भू-तकनीक अध्ययनों में भूविज्ञान एक महत्त्वपूर्ण कारक है। यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि अन्य प्राकृतिक तत्वों का अध्ययन करने से पूर्व सुदूर संवेदन से भूगर्भिक संरचनाओं का अध्ययन किया जा सकता है।

         सुदूर संवेदन, धरातलीय संरचनाओं चट्टानों की बनावटों के बारे में सूचनाओं को एकत्र करने के साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। बहु-स्पैक्ट्रल आँकड़े, चट्टानों की बनावट, शैल विन्यास आदि के बारे में विश्वसनीय सूचनायें प्रदान कर सकते हैं जो स्पैक्ट्रल परावर्तन पर आधारित है। रडार, धरातलीय उच्चावचन तथा ऊबड़-खाबड़ घरातल की जानकारी प्रस्तुत करता है जो कि अत्यधिक उपयुक्त है।

      सुदूर संवेदन केवल भूविज्ञान के उपयोगों तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका उपयोग खदान क्षेत्रों में पहुंचने के लिये मार्ग योजना बनाने, भू-सुधार प्रबोधन (Monitoring) तथा आधार मानचित्रों के निर्माण जिन पर भूगर्भिक आँकड़ों को अध्यारोपित किया जाता है। संक्षेप में भूविज्ञान में सुदूर संवेदन के उपयोगों का प्रकार निम्न है:-

(i) भूगर्भिक मानचित्रण (Geological Mapping) करना

(ii) धरातलीय निक्षेपणों (Surficial Deposits) का अध्ययन करना

(iii) रेत एवं कंकड़-पत्थरों का विदोहन (Sand and Gravel Exploitation) करना

(iv) खनिजों के विदोहन (Mineral Exploitation) में सहायक

(v) हाइड्रोकार्बन की खोज करना

(vi) पर्यावरणीय भूविज्ञान का अध्ययन

(vii) अवसाद मानचित्रण एवं प्रबोधन करना

(viii) प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक घटनाओं का मानचित्रण एवं प्रबोधन करना

(ix) भू-आपदाओं का मानचित्रण करना

भूगर्भिक मानचित्रण:-

            वायु फोटो विश्लेषण तथा उपग्रहीय आँकड़ों एवं विम्बों की सहायता से भूगर्भिक एवं धरातलीय पदार्थों की पहचान का मूल्यांकन किया जा सकता है। यहाँ पर संक्षिप्त में सुदूर संवेदन का भूगर्भिक मानचित्रण में उपयोग को समझाया गया है। 1940 के पश्चात् वायु फोटोग्राफ का उपयोग भूगर्भिक मानचित्र के क्षेत्र में विस्तृत रूप से बढ़ा है तथा 1960 के पश्चात् उपग्रहीय आँकड़ों एवं बिम्बों की उपलब्धता से क्षेत्रीय विश्लेषण में सुदूर संवेदन की राहनीय भूमिका है। आज कोई भी भूगर्भिक अध्ययन ऐसा नहीं है जिसमें सुदूर संवेदन उत्पादों का उपयोग न किया जा रहा हो।

         भूगर्भिक मानचित्रों के अन्तर्गत भूआकारों, शैल प्रकारों तथा शैल संरचनाओं (वलन, भ्रंश, विभंग व रेखीय आकृतियाँ) का विश्लेषण एवं मानचित्रण किया जाता है जिनका एक से उपयुक्त धरातलीय सम्बन्ध होता है। भूगर्भिक मानचित्रण क्रियायें खनिज संसाधनों विदोहन में अहं भूमिका निभाते हैं। वायु फोटोचित्रों एवं सुदूर संवेदन प्रतिबिम्बों में धरातलीय आकृतियों की व्याख्या खनिज संसाधनों के सम्भावित क्षेत्रों का पता लगाने में सूचनायें प्रदान करते हैं।

       भूगर्भिक अध्ययनों के लिये प्रायः बहुअवस्था युक्त प्रतिविम्ब विश्लेषण की आवश्यकता है। इसके लिये 1:250,000 से 1:1,000,000 मापक पर बने उपग्रहीय प्रतिबिम्बों का विश्लेषण किया जाता है। तत्पश्चात् उच्च ऊँचाई वाले वायु 1:60,000 से 1:30,000 वायु फोटोचित्रों की व्याख्या की जाती है। विस्तृत सूक्ष्म स्तर पर अध्ययन के लिए 1:20,000 मापक पर निर्मित वायु फोटो चित्रों का स्टीरियोस्कोप पर विश्लेषण कर मानचित्रण किया जाता है।

लघुमापक मानचित्रण (Small Scale Mapping):-

        लघु मापक मानचित्रण का उपयोग मुख्यतः रेखीय आकृतियों के विश्लेषण के लिये जाता है। इसके अन्तर्गत लिनियामेंट (Lineament) क्षेत्रीय रेखीय आकृतियाँ (भ्रंश) जो क्षेत्रीय आकार की आकृतियों के कारण होती है जैसे कि कोई नदी, कगार, पर्वत श्रृंखला, भ्रंश, विभंग इत्यादि। इन रेखीय आकृतियों को धरातलीय आकृतियों के विन्यास क्रम से पहचाना जाता है। प्रमुख रेखीय आकृतियाँ कुछ किमी० से कई सौ किमी० तक लम्बी होती है।

      उदाहारण के लिये अमेरिका में सान एनड्रीयस भ्रंश की लम्बाई 1000 किमी० तक है। आकृतियों के विश्लेषण एवं मानचित्रण में खनिज संसाधनों एवं भू-जलीय संसाधनों की भी खोज की जा सकती है। अधिकतर खनिज संसाधन रेखीय आकृतियों के साथ-साथ पायी है।

         रेखीय आकृतियों को कई कारक प्रभावित करते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कारक रेखीय आकृति एवं प्रदीप्त स्रोत (Illumination Source) में आपसी कोणीय सम्बन्ध है। सामान्यत: वे रेखीय आकृतियाँ जो प्रदीप्त स्रोत के समानान्तर क्रम में होती हैं, उन्हें पहचाना नहीं जा सकता है। जिन आकृतियों का क्रम प्रदीप्त स्रोत के विपरीत होता है उसको पहचानना एवं मानचित्रण करना सरल होता है। सामान्यतः मध्यम निम्न प्रदीप्त कोण सूक्ष्म धरातलीय रेखीय आकृतियों के संसूचन के लिये अधिक उपयुक्त होता है। प्रायः निम्न सूर्य कोणीय फोटोग्राफी शीतकाल में की जाती है।

           अधिकतर भूगर्भशास्त्रियों का मत है कि खनिज संसाधनों के विदोहन तथा भूगर्भिक शैलों के मानचित्रण के लिये 1.6 तथा 2.2 माईक्रोमीटर स्पेक्ट्रल बैंड पर परावर्तन बहुत महत्वपूर्ण होता है। इन बैंडों को फोटोग्राफ नहीं किया सकता है लेकिन लेंण्डसैट थिमेटिक पेपर तथा वायुआधारित इमेजिंग स्पैक्ट्रोमीटर के संवेदक द्वारा संसूचित किया जा सकता है। इसी प्रकार तापीय अवरक्त स्पेक्ट्रल भाग का बहु-संकीर्ण बैंड, शैल, एवं खनिज प्रकारों में कई भिन्नतायें दर्शाता है।

      तेल एवं खनिज संसाधनों की खोज में भूगर्भिक मानचित्रण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संरचनात्मक तथा शैल ईकाइयों का निर्धारण एवं मानचित्रण कर भूगर्भशास्त्री इन संसाधनों की सही स्थिति व उपयुक्तता बता सकते हैं जिससे उनके विदोहन का लक्ष्य रखा जाता है। इसी प्रकार शैल इकाइयों का मानचित्रण, इन्जीनियरिंग, निर्माण, खनन कार्यों, अन्य तकनीक कार्यों, भूमि उपयोग तथा अधिवासीय योजनाओ में यह तकनीकि अति सहायक होती है।

मृदा मानचित्रण (Soil Mapping):-

           किसी क्षेत्र का विस्तृत मृदा सर्वेक्षण उस क्षेत्र के संसाधन सूचनाओं का प्रारम्भ स्रोत होता है। भूमि उपयोग योजनाओं में इनका बहुतायत में प्रयोग किया जाता है। विभिन्न भूमि उपयोगों में मिट्टी की उपयुक्तता की जानकारी भूमि के गलत उपयोग तथा पर्यावरण ह्रास को रोकने में सहायता करता है। भूमि योजनाओं में यह एक प्रभावशाली यंत्र की भाँति कार्य करता है। इसके लिये मिट्टी संसाधनों से सम्बन्धित आवश्यक तथ्यों के आँकड़े उपलब्ध किये जाते हैं। सर्वप्रथम मिट्टी के प्रकारों की एक सूची तैयार की जाती है तथा उनका मानचित्रण करना आवश्यक होता है।

          अनुभवी वैज्ञानिकों एवं कार्यकर्ताओं द्वारा विस्तृत मृदा सर्वेक्षण किया जाता है। वायु फोटोचित्रों की सहायता से क्षेत्र परिभ्रमण किया जाता है तथा अलग-अलग मृदा इकाईयों का सीमांकन किया जाता है। मिट्टी की अलग-अलग इकाईयों के निर्धारण के लिये कई मिट्टी परिच्छेदिकाओं का निरीक्षण एवं परीक्षण किया जाता है। प्रारम्भ में मृदा मानचित्रण के लिये 1/15,000 से 1/40,000 मापक का प्रयोग किया जाता था परन्तु वर्तमान समय में सुदूर संवेदन आँकड़ों की उपलब्धता से मिट्टियों के सम्बन्ध में कई प्रकार की जानकारी प्राप्त की जाती है।

       फसलों की उत्पादक सम्भावना के निर्धारण के लिये मिट्टी की आर्द्रता का प्रयोग किया जाता है। मिट्टी की ऊपरी परत (1-2 मी०) में जल कणों की उपलब्धता आर्द्रता को दर्शाती है जो प्रायः वायुमण्डल में जलवाष्प बनकर उड़ जाती है। यदि मिट्टी की आर्द्रता का सर्वेक्षण समय रहते करा दिया जाय तो फसलों को सूखे की स्थिति से बचाने का प्रयास किया जा सकता है तथा किसानों को सतर्क किया जा सकता है।

       इतना ही नहीं मिट्टी की आर्द्रता की जानकारी से बाढ़ की जानकारी भी दी जा सकती है। अलग-अलग प्रकार की मिट्टी की पानी सोखने की मात्रा अलग-अलग होती है। मिट्टी की संतृप्तता के आधार पर जलस्राव का अनुमान लगाकर बाढ़ से पूर्व अगाह किया जा सकता है। जहाँ भी वन कटान, खनन, कृषि या मानवीय क्रिया-कलाप हैं वहां पर जल के तीव्र बहाव, वाष्पीकरण दर तथा मिट्टी अपरदन को रोकने के लिये भविष्यवाणी की जा सकती है।

          सुदूर संवेदन विस्तृत भू-भाग के मृदा आर्द्रता की माप कर सकता है। रडार एक ऐसा प्रभावशाली संवेदक है जो धरातलीय आर्द्रता का गुणात्मक तथा मात्रात्मक मापन करता है। मृदा आर्द्रता के द्वारा रडार पृष्ठ प्रकीर्णन प्रभावित होता है। बहुकालिक रडार बिम्ब लम्बे समय के आर्द्रता अन्तर को दर्शाते हैं। इस प्रकार रडार ही एक ऐसा सुदूर संवेदन संवेदक है जो मृदा की डाईलैक्ट्रिक नियतांक को बताता है। यह नियतांक मिट्टी में पानी की मात्रा की परिवर्तनशीलता को दर्शाता है।

जलविज्ञान

           जलविज्ञान पृथ्वी के धरातलीय जल का अध्ययन है चाहे यह जल धरातल पर बह रहा हो, बर्फ व हिम के रूप में जमा हो या मिट्टी के द्वारा धारण किया हो। जलविज्ञान सुदूर संवेदन के कई अन्य उपयोगों से सम्बन्धित है। उदाहरण के लिये वनीकरण, कृषि तथा भूमि आवरण इत्यादि। इन उपयोगों में जलविज्ञान एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। अधिकतर जलविज्ञान प्रक्रियायें गतिशील हैं। यह गतिशीलता केवल वर्ष के अन्तराल पर ही नहीं बल्कि मौसम के अनुरूप भी है जिसको स्वतंन्त्र रूप से अवलोकन करने की आवश्यकता होती है।

         सुदूर संवेदन एक ऐसी तकनीक है जो जलविज्ञान के तथ्यों की गतिशलता एवं धरातलीय वितरण का सहदर्शी (Synoptic) दृश्य प्रस्तुत करता है। सक्रिय संवेदक क्षमताओं के द्वारा रडार ने जलविज्ञान के अध्ययनों में नये आयाम प्रस्तुत किये हैं। रडार के द्वारा बादलों युक्त दशाओं या मौसम तथा रात के अंधेरे में भी धरातलीय संसाधनों का संसूचन किया जा सकता है। सुदूर संवेदन द्वारा जलविज्ञान के उपयोगों के कुछ उदाहरण निम्न रूप से सम्मिलित किये गये हैं—

(i) जल प्लवित भूमि का मानचित्रण एवं प्रबोधन (Wetland Mapping and Monitoring)

(ii) हिमाच्छादित क्षेत्रों का प्रबोधन (Snow Cover Monitering)

(iii) हिम की मोटाई का मापन (Measuring Snow Thickness)

(iv) हिम-जल समविस्तार का निर्धारण (Determining Snow-Water Equivalent)

(v) नदी तथा झील, बर्फ का प्रबोधन (River, lake & Monitering)

(vi) बाढ़ मानचित्रण तथा प्रशोधन (Flood mapping and Snow Monitering)

(vii) हिमानी गतिशीलता का प्रबोधन (Glacial Dynamics Monitering)

(viii) नदी/डेल्टा परिवर्तनशीलता का संसूचन (River/Delta Change Detection)

(ix) अपवाह तन्त्र मानचित्रण तथा जलगाम मॉडलिंग (Drainage Basin Mapping and Watershed modelling)

(x) सिंचित नहर रिसाव का संसूचन (Irrigation Canal Leakage Detection)

(xi) सिंचित कार्यक्रम (Irrigation Scheduling)

बाढ़ क्षेत्रों का निर्धारण एवं मानचित्रण (Flood Zone Delineation and Mapping)

           बाढ़ जलीय चक्र का एक प्राकृतिक तथ्य है। बाढ़ का सम्बन्ध मौसम दशाओं पर निर्भर करता है। अत्यधिक वर्षा के कारण अत्यधिक धरातलीय जल प्रवाह से नदियों का जल स्तर बढ़ जाता है जिसके परिणामस्वरूप बाद का जल तटबंधों को तोड़कर आस-पास के क्षेत्र में फैल जाता है। इसके कारण धन-जन की हानि, पशुओं की हानि, अधिवासों का ध्वस्त होना, मिट्टी कटाव, भूमि क्षरण इत्यादि कई नुकसान उठाने पड़ते हैं। इतना ही नहीं नदियों में बाढ़ के कारण कई बाँध प्राकृतिक रूप से बनते एवं टूटते हैं। कई मनुष्य निर्मित बांध टूट जाते हैं तथा हिमानी क्षेत्रों में हिम तथा बर्फ के पिघलने से पुनः बाढ़ की समस्या उत्पन्न होती है। बाढ़ एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जो तुरन्त निदान चाहती है।

       सुदूर संवेदन तकनीक का उपयोग क्षेत्रों के प्रबोधन तथा विस्तार जानकारी के लिये किया जाता है। यह एक ऐसा साधन है जो अतिशीघ्र बाढ़ क्षेत्रों का निर्धारण, बाढ़ की बढ़ती व घटती प्रवृत्ति, नुकसान, प्रभावित क्षेत्र इत्यादि की जानकारी में प्रभावी भूमिका निभाता है। भौगोलिक सूचना प्रणाली में उपग्रहीय आँकड़ों का विश्लेषण कर जल प्लावित क्षेत्र की गणना, नुकसान, बाढ़ सम्भावित क्षेत्र तथा बाढ़ आने की पूर्व सूचना दी जा सकती है।

      इस प्रकार हम देखते हैं कि कई उपयोगकर्ताओं जैसे कि बाढ़ नियंत्रक संस्था, जल-विद्युत कम्पनी, संरक्षण संस्था, नगर नियोजक, आपतकालीन आधारित विभाग तथा जीवन बीमा विभाग द्वारा सुदूर संवेदन आँकड़ों का उपयोग किया जाता है। बाढ़ युक्त मैदान के मानचित्रण करने में पूर्व सरिता मार्गों तथा नदी विसर्प अति महत्वपूर्ण होते हैं। इनका निर्धारण सुदूर संवेदन उत्पादों के अवलोकन एवं विश्लेषण से लगाया जाता है जो बाद नियंत्रण योजना में अति सहायक होते हैं।

भूमि उपयोग मानचित्रण

          प्राकृतिक रूप से भूमि अलग-अलग तत्वों के अन्तर्गत होती है जैसे कि प्राकृतिक इनस्पति, जल, मरुस्थल, घास के मैदान, दलदल इत्यादि प्राकृतिक विशेषताओं के अनुरूप मनुष्य ने इसे आर्थिक क्रियाओं के अनुसार अलग-अलग उपयोगों में प्रयोग किया है। जैसे कि कृषि, वनीकरण, आवास, उद्योग, सड़क इत्यादि। प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक उपयोगों में लाई गई भूमि को सुदूर संवेदन तकनीक के द्वारा संसूचन किया जाता है। वे किसी भी उपयोग की मात्रा, विस्तार तथा वृद्धि एवं ह्रास क्रम को बहुत आसानी से अंकित कर सकते हैं। भूमि उपयोग या भूमि आवरण अध्ययन प्रायः बहु अन्तरविषयी होते हैं। सुदूर संवेदन का उपयोग निम्न विषयों में सफलतापूर्वक किया जाता है-

(i) प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्ध (Natural Resource Management)

(ii) प्राकृतिक वनस्पती प्रकारों के सर्वेक्षण (Surveys for Types of Natural Vegetation)

(iii) जंगली जानवरों के निवास संरक्षण (Wildlife Habital Protection)

(iv) नगरीय विस्तार अनाधिकृति कब्जा (Urban Expention/Encroachment)

(v) आपदा प्रबन्धन तथा मानचित्रण (Disaster Management and Mapping)

नगरों का अव्यवस्थित प्रसार (Urban Sprawl)

        जैसा कि सभी जानते हैं कि संसार की जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। नगरों का तेजी से वृद्धि एवं प्रसार हो रहा है तथा अर्थव्यवस्था कृषि आधारित प्रणली से दूर हट है। नगरों के अव्यवस्थित विकास तथा अनियंत्रित प्रसार ने उपजाऊ कृषि भूमि एवं वन भूमियों पर अनाधिकृत कब्जा बढ़ा दिया है। नगरों की वृद्धि का प्रमुख कारण औद्योगिक विकास है जिसका किसी भी क्षेत्र के पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इस प्रकार सुदूर संवेदन अध्ययनों से ग्रामीणों से नगरों में भूमि उपयोग परिवर्तनों के प्रबोधन से जनसंख्या का अनुमान लगाया जा सकता है। योजनाकार नगरों के अनियंत्रित प्रसार की दिशा का अनुमान लगा सकता है। पर्यावरण की दृष्टि से सबसे संवेदनशील आपदा क्षेत्रों का अनुमान लगाया जाता है।

         सुदूर संवेदन के द्वारा अलग-अलग कालों के अलग-अलग प्रकार के आँकड़े उपलब्ध होते हैं जिनके द्वारा नगरीय क्षेत्रों का तथा इनके खण्डों का मानचित्रण किया जा सकता है। बहु-कालिक आँकड़ों के विश्लेषण से नगरीय भूमि उपयोग परिवर्तन का अनुमान लगाया जा सकता है। वायुफोटोचित्रों के द्वारा नगरीय क्षेत्रों का मानचित्रण किया जाता है। इस प्रकार के मानचित्र नगर नियोजकों की सहायता प्रदान करते हैं।

समुद्री अनुप्रयोग (Ocean Application)

            समुद्रों से हमें कई तरह के लाभ प्राप्त होते हैं। समुद्र महत्वपूर्ण भोजन एवं जीव-भौतिक संसाधनों की पूर्ति करते हैं। इनसे समुद्रीय यातायात किया जाता है जो सबसे सरल एवं सुविधाजनक है। मौसम प्रणाली के निर्माण तथा कार्बनडाई ऑक्साईड संग्रह में समुद्रों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। इस प्रकार मछलियों के भण्डार केन्द्रों का अनुमान लगाने, जहाजों के मार्गों की जानकारी, मौसम तथा जलवायु दशाओं के परिवर्तनशीलता, तूफान की जानकारी इत्यादि के लिये समुद्री गतियों का अध्ययन करना अति आवश्यक है। तूफानों की पूर्व जानकारी से समुद्रतटीय क्षेत्रों में अधिवासों को बचाया जा सकता है।

           समुद्र तटीय क्षेत्र पर्यावरण की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। समुद्री तट रेखा के आर्थिक विकास तथा बदलते भूमि उपयोग के लिये उत्तरदायी होती है। यद्यपि समुद्री तट अलग-अलग स्थानों पर भिन्न-भिन्न होते हैं। उपयुक्त समुद्र तटों के पास संसार की 600 जनसंख्या निवास करती है। समुद्री तट मानवीय क्रियाकलापों के लिये अति महत्वपूर्ण है। कई सरकारी संस्थायें जो यहाँ मानवीय क्रियाकलापों के प्रमाण से सम्बन्धित है उनको विचित्र परिवर्तनों जैसे कि तटीय अपरदन, प्राकृतिक जन्तुओं का ह्रास, नगरीकरण, प्रवाही तथा समुद्र की ओर प्रदूषण इत्यादि को नये रूप में प्रबोधन (Moniter) करने की आवश्यकता है।

            अधिकतर समुद्री गतिशीलता तथा उनके प्रभावों का मानचित्रण एवं प्रबोधन सुदूर तकनीक के द्वारा आसानी से किया जा सकता है। सुदूर संवेदन आँकड़ों का प्रयोग कर समुद्र के सतह का तापमान तथा मछलियों के सम्भावित बाहुल्य क्षेत्रों की नित्य रूप से सूचनायें प्राप्त हो सकती है। नोवा- ए.वी.एच.आर. इस प्रकार के अनुप्रयोग कर रहा है। इसी प्रकार आई.आर.एस.पी.3 मॉस वी आँकड़ों की सहायता से समुद्र में निलंबित अवसाद, पीले वर्णक (Yellow Pegment) और क्लोरोफिल की मात्रा का निर्धारण, समुद्रतटीय क्षेत्र विशेषकर छोटे बन्दरगाहों का प्रबन्ध और आई. आर.एस.(सी.) के आँकड़ों से तटीय क्षेत्रों के विकास का अध्ययन किया जा रहा है।

             सुदूर संवेदन के विभिन्न वर्तमान समुद्रीय अनुप्रयोग निम्न रूप में दिये गये हैं-

1. समुद्रीय प्रतिरूपों की पहचान (Ocean Pattern Identification)

2. धारायें एवं प्रादेशिक संचारण प्रतिरूप (Currents and Regional Circulation Pattern) का अध्ययन

3. लहरें, भंवर, उथला जल भाग (Waves, Eddies, Shallow Water) की गतियों का अवलोकन

4. तूफान की भविष्यवाणी ( Storm Forecasting) करना

5. हवा तथा लहरों की जानकारी देना

6. मछलियों के भण्डार तथा समुद्री जीवों का मूल्यांकन करना

7. जल के तापमान का प्रबोधन (Water Temperature Monitoring) करना

8. जल-विशेषताओं (Water Quality) का अवलोकन करना

9. समुद्रीय उत्पादकता (Ocean Productivity) का अनुमान लगाना

10. तेल प्रसार (Oil Spill) की जानकारी प्राप्त करना

11. जहाजरानी (Shipping) के क्षेत्र में प्रयोग

12. समुद्री परिवहन (Ocean Transport) में सहायक

13. ज्वारीय प्रभाव (Tidal Effects) का अवलोकन

14. समुद्र तटीय आकृतियों का मानचित्रण (Mapping of Shoreline Features)

15. समुद्रीय वनस्पति मानचित्रण (Coastal Vegetation Mapping)

वानिकी (Forestry)

          वन सबसे महत्वपूर्ण संसाधन है जो भोजन, निवास, जंगली जीव, ईंधन तथा कई वन उत्पाद प्रदान करते हैं। वनों के संरक्षण का मुख्य मुद्दा यह है कि प्राकृतिक एवं मानवीय क्रियाओं के कारण प्राकृतिक वनस्पति आवरण में बहुत कमी आ रही है। आग तथा बीमारी प्राकृतिक कारणों में प्रमुख है। इसी प्रकार कटान, जलाना, अनाधिकृत कब्जा तथा भूमि उपयोग परिवर्तन आदि कई मानवीय कारक है जो जंगलों के ह्रास के लिये उत्तरदायी है।

          प्रायः यह देखा जाता है कि मनुष्य जंगलों को केवल उत्पादन के लिये समझता है न कि स्वयं जंगलों के लिये। व्यापारिक विदोहन से अधिक वनों के क्षेत्रफल एवं आवरण में कमी की समस्या कई व्यापारिक कारणों से भी पैदा हुई है। इनमें सबसे प्रमुख हैं वनों को काट कर कृषि भूमि तथा चरागाहों में परिवर्तित कर देना तथा नगरीयकरण के कारण भूमि उपयोग में भारी परिवर्तन होना। दून घाटी में इस प्रकार के उदाहरण देखने को मिलते हैं।

       सूखा पड़ना भी एक कारण है जो लोगों को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये वनों का रास्ता दिखाता है । इनके अतिरिक्त मरुस्थलीय अतिक्रमण, भूमिगत जल में कमी, आग लगना तथा प्राकृतिक आपदायें (जैसे तूफान, लू, भूकम्प) इत्यादि कई ऐसे कारण हैं जो सीधे वनों के ह्रास के लिये जिम्मेदार है। प्रश्न यह उठता है कि इन विनाशकारी तत्वों की जानकारी व प्रबोधन कैसे किया जाय जिससे इन समस्याओं का तुरन्त समाधान किया जा सके। वनों के ह्रास से कई पर्यावरणीय समस्यायें भी उत्पन्न हुई हैं। जंगलों के धुँए से पूरा वायुमण्डल प्रदूषित होता है और वायुमण्डल में कार्बनडाई आक्साइड गैस की मात्रा बढ़ती है।

         सर्वप्रथम आवश्यकता इन समस्याओं के प्रबोधन की है तत्पश्चात् उनके प्रबन्धन की योजना बनाने की। ऐसी स्थिति के लिये त्वरित एवं उपयुक्त साधन सुदूर संवेदन है जो इस प्रकार के परिवर्तनों की जानकारी हमें देता है। वानिकी के अन्तर्गत सुदूर संवेदन के प्रमुख उपयोग निम्न है-

1. वन आवरण का मानचित्रण (Forest Cover Mapping)

2. वनस्पति घनत्व का मानचित्रण (Forest Density Mapping)

3. वन विभाग का मानचित्रण (Deforestation Mapping)

4. आग का निर्धारण तथा मानचित्रण (Forest Fire Identification Maping)

5. बायोमास आकलन (Biomass Estimation)

6. प्रजातियों का आकलन (Species Estimation)

7. वृद्धि स्टाक आकलन (Growing Stock Estimation)

वन विनाश एवं वनीकरण का मानचित्रण (Deforestion and Aforestation Mapping)

              बहुकालिक सुदूर संवेदन आँकड़े प्राकृतिक वनस्पति की परिवर्तनशीलता को दर्शाते हैं। पूर्व वर्षों के बिम्बों की तुलना वर्तमान बिम्बों से करने पर वनों के आकार एवं ह्रास के विस्तार को मापा जा सकता है। उच्च विभेदन वाले आँकड़े वनों के विलुप्त होने के विस्तृत दृश्य प्रस्तुत करते हैं। सुदूर संवेदन युक्तियों ऐसे क्षेत्रों की भी सूचनायें प्रदान करते हैं जो प्रायः मनुष्य की पहुँच से बाहर होते हैं। कभी-कभी ऐसे क्षेत्र जहाँ पर अवैधानिक कटान निरन्तर जारी हो और उसकी कोई जानकारी न हो तो ऐसे क्षेत्रों के लिए सुदूर संवेदन आँकड़े प्रयोग किये जा सकते हैं।

प्रजातियों की पहचान एवं मानचित्रण (Species Identification and Mapping)

          सुदूर संवेदन एक ऐसा साधन है जो विभिन्न वन प्रकारों की पहचान एवं सीमांकन तीव्रता से कम समय में करता है। यद्यपि यही कार्य परम्परागत साधन से बहुत लम्बे समय में अपूर्ण रूप से किया जाता है। सुदूर संवेदन में आँकड़े अलग-अलग मापक पर उपलब्ध होते हैं जो स्थानीय एवं क्षेत्रीय माँग की पूर्ति करते हैं। वृहत मापनी पर प्रजातियों की पहचान बहुस्पेक्ट्रल हाईपरस्पैक्ट्ल या वायु फोटो आँकड़ों से की जा सकती है जबकि लघु मापनी पर प्रजातियों के आवरण एवं सीमांकन, रडार या बहुस्पैक्ट्रल आंकड़ा विश्लेषण से ज्ञात किया जा सकता है।

      इमेजरी एवं प्राप्त सूचनाओं को पुनः जी.आई.एस. में एकीकृत कर कई अन्य सूचनायें प्रजातियों के विषय में प्राप्त की जा सकती है। जी.आई.एस. पुनः कई प्रकार की सूचनायें भी प्रस्तुत करता है जैसे कि ढाल, सीमायें, सड़क, अधिवास इत्यादि। भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग प्रति दो वर्ष के अन्तराल पर सम्पूर्ण भारत के लिये सुदूर संवेदन आँकड़ों की सहायता से वानिकी मानचित्र तैयार करता है।

वनों में आग का मानचित्रण (Forest Fire Mapping)

          जंगलों में आग बड़ी तीव्रता से फैलती है तथा अधिवासों, जंगली जीवों, लकड़ी पूर्ति कम करने तथा संरक्षित क्षेत्रों के विनाश के लिये उत्तरदायी है। आग के प्रसार के नियंत्रण की आवश्यकता के लिये पर्याप्त सूचनाओं की आवश्यकता होती है। किस प्रकार बचे हुये जंगलों को आ से बचाया जाय इसके लिये निदान ढूँढने की आवश्यकता होती है।

सुदूर संवेदन के उपयोग

वनों में आग का मानचित्रण

       सुदूर संवेदन का उपयोग वन क्षेत्रों के अग्नि के प्रबोधन तथा संसूचना के लिये किया जा सकता है। आगे लगने के बाद प्रजातियों में पुनः पुर्नवृद्धि होती है। इस तरह के अध्ययनों में सुदूर संवेदन एक निगरानी करने वाले की भाँति कार्य करता है तथा निरन्तर संवेदन सुविधायें प्रदान करता है। कभी-कभी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जो मनुष्य की पहुँच से बाहर होते हैं। सुदूर संवेदन ऐसे क्षेत्रों की आग की जानकारी व प्रसार की सूचना सम्बन्धित लोगों तक पहुँचाता है। NOAA, AVHRR तापीय आँकड़े तथा GOES के जलवायु सम्बन्धी आँकड़े की सहायता से सक्रीय अग्नि प्रसार का निर्धारण किया जा सकता है जबकि ऑप्टीकल संवेदन, धुँए, धुन्ध या अँधेरे से छुप जाता है।

          सुदूर संवेदन आँकड़ों से जले भाग व जल रहे भाग के सम्बन्ध में अलग-अलग जानकारी प्राप्त होती है जिससे आग की दिशा व गति का पता लगाया जा सकता है। इस तकनीक से आग के बचाव तथा पहुँच वाले क्षेत्रों में निचले स्तर से योजना बनाने के लिये पर्याप्त सूचनायें प्राप्त होती हैं। इसे आग से लड़ने के लिये तार्किक सहायता प्राप्त होती है। आग लगने के एक वर्ष बाद किसी एकल विम्ब द्वारा प्रजातियों के पुनर्उत्पादन स्तर की जानकारी ली जा सकती है। इसी प्रकार बहुकालिक संवेदक द्वारा वनस्पति की वृद्धि का आकलन किया जा सकता है।

प्रश्न प्रारूप

Q. सुदूर संवेदन के उपयोग पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the applications of remote sensing.)


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11. अंकीय उच्चता मॉडल 

11. अंकीय उच्चता मॉडल 

(The Digital Elevation Model)


अंकीय उच्चता मॉडल (DEM) 

            “किसी भी धरातल के उच्चावचों की भिन्नताओं की निरन्तरता का अंकीय प्रदर्शन अंकीय च्चता मॉडल कहलाता है।” अर्थात यह उच्चावच को दर्शाने का एक कम्प्यूटर आधारित महत्वपूर्ण मॉडल है। पृथ्वी की सतह दिखाने के अलावा यह मॉडल ग्रहों एवं उपग्रहों के लिए भी प्रयोग किया जा रहा है। सामान्यतः धरातलीय विषमताओं को समोच्च रेखाओं द्वारा मानचित्र पर प्रदर्शित किया जाता है।

मूरे (Moore) तथा अन्य के अनुसार:-

        अंकीय उच्चता मॉडल संख्याओं का क्रमिक विन्यास है जो समुद्र तल से ऊँचाई के धरातलीय वितरण को प्रदर्शित करता है।

        अंकीय उच्चता मॉडल किसी दिये गये क्षेत्र के किसी बिन्दु की ऊँचाई का चित्रण अंकीय आकार में रखता है तथा सूचनाओं को किन्हीं कंकाल (Skeleton) रेखाओं के द्वारा एकत्र करता है। कंकाल रेखायें वे रेखायें होती हैं जो किसी ऊँचे-नीचे ढाल तथा ढाल परिवर्तन बिन्दुओं को दर्शाती है।

अंकीय भूभाग मॉडल (Digital Terrian Model)

            उच्चावच को प्रदर्शित करने के लिए DTM शब्द का भी सामान्यतः उपयोग किया जाता है। अंकीय भूभाग मॉडल (DTM) धरातलीय लक्षणों के सतही वितरण को प्रदर्शित करता है।

      अंकीय- भूभाग मॉडल (DTM), अंकीय आकार में भू-धरातलीय मानचित्र है जो केवल अंकीय उच्चता मॉडल को ही नहीं दर्शाता बल्कि भूमि उपयोग के प्रकारों, अधिवासों, सरिता रेखाओं के प्रकारों, ढालों इत्यादि को भी मॉडल के साथ दर्शाता है।

       DEM शब्द उच्चता सम्बन्धी आँकड़ों को रखने के मॉडल के रूप में प्रयोग किया जाता है जबकि भूभाग (Terrain) शब्द अक्सर भूमि सतही ऊँचाई के अतिरिक्त स्थलरूपों के लक्षणों को भी प्रदर्शित करने के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। यद्यपि DEM शब्द ही सबसे पहले उच्चता मॉडल के लिए प्रयोग किया गया था तब से लगातार द्विविम सतह के ऊपर Z लक्षणों के परिवर्तनों के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

अंकीय उच्चता मॉडल की आवश्यकता (Need of Digital Elevation Model)

       अंकीय उच्चता मॉडल के कई उपयोग है। इनमें प्रमुख निम्न प्रकार से हैं:-

1. राष्ट्रीय आँकड़ा आधार प्रणाली में अंकीय भूपत्रक मानचित्रों के ऊँचाई सम्बन्धी आँकड़ों का संग्रह करने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

2. यह सांख्यिकीय विश्लेषण तथा अलग-अलग भूभागों में तुलना करने में सहायक है।

3. DEM के द्वारा किसी भी क्षेत्र का ढाल मानचित्र, ढाल पहलू मानचित्र, भूआकृतिक विश्लेषण तथा अपरदन तथा बाह्य जल का अनुमान लगाया जा सकता हैं।

4. सामरिक उद्देश्यों के लिये भूआकृतियों का त्रिविम प्रदर्शन से किसी भूभाग का ज्ञान, हथियारों का संचालन तथा पाइलट परिशिक्षण जैसे कार्यों में DEM से सहायता मिलती है।

5. किसी भी भूभाग की डिजाइन तथा योजना तैयार करने के लिये DEM का उपयोग जाता है।

6.. इसके द्वारा विकट धरातल पर सड़क के डिजाइन में कटान तथा भरण (Cut and (Fill) जैसी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है

7. कई इन्जिनिरिंग परियोजनाओं जैसे कि बाँध, नगर, पावर लाइन तथा तकनीकि कार्यों में DEM का उपयोग सहायक होता है।

8. इनके द्वारा किसी देश के सीमा पार की दृश्यता का भी विश्लेषण किया जा सकता है।

9. DEM के साथ कई विषयी मानचित्रों जैसे कि भूमि उपयोग, मिट्टी, शैल विन्यास, भूस्खलन इत्यादि को इसके ऊपर डालकर प्रदर्शित किया जा सकता है।

10. यह किसी भूआकृति तथा भूआकृतिक प्रक्रियाओं के निम्न अनुरूपता मॉडल के लिये आँकड़े उपलब्ध कराता है।

11. इसमें किसी भी प्रदर्शित स्तर के ऊँचाई परिवर्तित करने की सुविधा उपलब्ध होती है जिससे कई तथ्यों का अनुमान लगाया जा सकता है।

अंकीय उच्चता मॉडल के विभिन्न संरचनायें (Various Structure of DEM)

         वर्तमान समय में DEM की कई प्रकार की संरचनायें प्रयोग की जाती हैं। इनमें से कोई भी पूर्ण रूप से किसी आँकड़ा संरचना की पूर्ति नहीं करते हैं। उद्देश्यों एवं कम्प्यूटर पर उपलब्धता के आधार पर निम्न उपयुक्त मॉडल प्रयोग किये जाते हैं-

1. रेखीय मॉडल (Linear Model)

2. असतत त्रिभुजीकृत जाल (Traingulated Irregular Network)

3. ग्रिड जाल (Grid Network)/वर्ग संरचना (Grid Structure)

1. रेखीय मॉडल (Linear Model):-

           रेखीय मॉडल समोच्च रेखाओं के द्वारा किसी भू-भाग की ऊँचाई को प्रदर्शित करता है तथा प्रत्येक सम्मोच्च रेखा के X एवं Y निर्देशांकों के जोड़े ऊँचाई को व्यक्त करते हैं। सम्मोच्च रेखाओं से त्रिविम्ब प्रदर्शन तैयार किया जा सकता है तथा धरातलीय विशेषताओं को तब इसके ऊपर विश्लेषण किया जा सकता है।

       इन रेखाओं के द्वारा निष्कोण (Smooth) दूरी के साथ सम्मोच्च रेखाओं की अनुपातिक दूरी को सम्मिलित जाता है जो किसी भी ढाल के निष्कोणता को दर्शाता है। सम्मोच्च रेखाओं के अनुरूप एक विशेष प्रकार का दूसरा रेखीय मॉडल भी है जो सरिताओं की व्याख्या करता है तथा जिसे जल प्रवाह मॉडल में भी प्रयोग किया जाता है। जैसा कि स्पष्ट है कि किसी भी रेखीय अंकीय ग्राफ को तैयार करने के लिये भूपत्रक मानचित्रों से सम्मोच्च रेखाओं को डिजिटाइज किया जाता है। ये मानचित्र ही आँकड़ों के ऐसे स्रोत हैं जो वर्गाकार खानों के द्वारा ऊँचाई मॉडल का निर्माण करते हैं।

2. असतत त्रिभुजीकृत जाल (Traingulated Irregular Network-TIN):-

         असतत त्रिभुजीकृत जाल, अंकीय उच्चता मॉडल के लिये एक प्रणाली है जिसे पीउकेर तथा अन्य (1978) के द्वारा डिजाइन किया गया है। यह प्रणाली उच्चावच मैट्रिक्स के बहुलता (Redundancies) को दूर करता है। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे टिन मॉडल कहते हैं।

        टिन एक विक्टर स्थानविज्ञान संरचना के समान है। इसके अन्तर्गत पोलीगन जाल की स्थान विज्ञान संरचना के अनुरूप प्रदर्शित किया जाता है। टिन मॉडल आँकड़ा आधार के प्रारम्भिक प्रविष्टियों के जाल का नोड (Note) बनाने में सहायक होते हैं। आँकड़ा आधार में स्थान विज्ञान के सम्बन्ध एक-दूसरे से बनाये जाते हैं। प्रत्येक नोड को प्रत्येक निकट के नोड से किसी निशान के द्वारा निर्मित किया जाता है।

         टिन मॉडल घरातल को त्रिभुजाकार समतल तत्वों में विभाजित करता है। भूभाग धरातल किसी जोड़ (नोड) द्वारा प्रतिदर्श होता है। ये धरातलीय बिन्दु भूभाग की विशेषताओं को स्थिति को दर्शाते हैं। त्रिभुजाकार आवृत्ति के तीन नोड सन्दर्भ बिन्दु होते है। इन बिन्दुओं को अन्तर्वेशन (Interpolation) विधि द्वारा बदला नहीं जा सकता है। धरातलीय प्रतिदर्श (Sampling) के अनतर्गत विशेष बिन्दुओं एवं रेखाओं को सम्मिलित किया जाता है जो कोई चोटी, गहरा भाग, ढाल रेखा जैसे कि जल विभाजक या सरिता रेखा तथा ढाल परिवर्तन रेखा को दर्शाया जाता है। ये कंकाल (Skeleton) रेखायें टिन संरचना पर किसी चाप की भाँति प्रतीत होती हैं। प्रतिचयन घनत्व भूभाग की जटिलता पर निर्भर करती है। नोड जाल के घनत्व की वृद्धि से धरातल की सही तस्वीर प्रस्तुत की जा सकती है परन्तु इसमें आँकड़ की अधिकता तथा परिकलन समय अधिक लगता है।

टिन संरचना के लाभ (Advantages of the Tin Structure)

1. टिन आँकड़ा संरचना एक संरचना है।

2. स्थानीय भूभाग की दशाओं के आवश्यकतानुसार त्रिभुजों की आकृति एवं आकार भिन्न-भिन्न होते हैं।

3. त्रिभुज के किनारों पर ढाल परिवर्तनशीलता की समाविष्टि करने में यह मॉडल सक्षम होता है।

4. टिन संरचना से कई भूभाग विशेषताओं जैसे कि ढाल, ढाल पहलू, इत्यादि का परिकलन किया जा सकता है।

टिन संरचना (TIN Structure ):-

            सबसे महत्वपूर्ण कार्य संरचना की रूप-रेखा का है। प्रश्न यह है कि किस प्रकार सम्मोच्च रेखाओं के जाल को अंकों में परिवर्तित कर आँकड़ा आधार पर रखा जाता है। यहाँ पर आँकड़ा को आँकड़ा आधार पर रखने की विधियों को प्रदर्शित किया जा रहा है। टिन को आँकड़ों आधार (Data Base) में संग्रह करने के कई तरीके हैं। गुडचाइल्ड तथा केम्प (Goodchild and Kemp, 1990) ने दो संरचनाओं को प्रस्तावित किया है जो मुख्यतः त्रिभुजों तथा नोड़ों पर आधारित है । त्रिभुज संरचना ढाल विश्लेषण के लिये दण्ड विधि है जबकि नोड संरचना सम्मोच्च रेखाओं को निर्मित करने तथा आड़ा-तिरछा करने में सरल होती है।

अंकीय उच्चता मॉडल 

अलकनंदा क्षेत्र

त्रिभुजीकरण (Traingulation):-

        टिन के निर्माण के लिये त्रिभुजाकार विधि का भी उपयोग जाता है। ग्राफ संरचना के साथ चापों एवं शीर्ष बिन्दुओं (Vertices) के उपयोग से क्षेत्र त्रिभुजों में उपविभाजित हो जाता है जिससे

(a) प्रत्येक मापन बिन्दु पर एक नोड निर्मित होता है तथा

(b) प्रत्येक त्रिभुज के अन्तर्गत तीन नोड होते हैं।

          यह विधि आन्तरिक कोण को अधिकतम बनाती है तथा त्रिभुज की लम्बी भुजा को कम से कम करती है। इसी तरीके से भिन्नतायें प्राप्त की जाती है। इस विधि में सबसे पहले थिसेन (Thiessen) पोलीगॉन की रचना की जाती है। कृत्रिम त्रिभुजीकरण, अन्तरर्वेशन रेखाओं (Interpolation Lines) जैसे कि सम्मोच्य रेखायें त्रिभुज के किनारों पर एक दूसरे से आर-पार होती हैं। यह डेलाउनाइ (Delaunay) त्रिभुजीकरण पर आधारित है।

3. वर्ग संरचना (Grid Structure):-

          वर्ग आधारित विधियाँ भी समान फैले त्रिभुजों या वर्गों के लिये प्रयोग हो सकते हैं। क्षेत्रीय तत्व तीन या चार पड़ोसी वर्ग बिन्दुओं से घिरा हुआ सेल (Cell) होता है। रास्टर आधारित जी.आई.एस. के अन्तर्गत वर्ग ग्रिड जाल का प्रयोग किया जाता है।

          ग्रिड घनत्व या सेल का आकार क्षेत्रीय विषमताओं से आवश्यक रूप से समायोजित होता है। जहाँ पर भूभाग अत्यधिक कटाफटा है वहाँ पर ग्रिड घनत्व अधिक होता है। इस प्रकार के विषय क्षेत्रों में यह अतिरिक्त पुनरावृत्ति को बढ़ाता है। एक बात विशेषकर दिमाग में यह रखनी चाहिए कि जब सेल का सापेक्षिक आकार बड़ा होता है तो भूभाग तीव्र ढाल वाला होता है। इसके लिये अधिक आँकड़ों की आवश्यकता की पूर्ति होती है।

             इस विधि का लाभ यह हैं कि इसमें आँकड़ों का संग्रह अतिसरल होता है। दूसरा इसके द्वारा DEM से कई परिकलन का निर्माण किया जा सकता है।

निष्कर्ष:

       उपरोक्त तीनों विधियों में सबसे सरल एवं प्रचलित टिन संरचना प्रमुख है। टिन संरचना पर आधारित यहाँ पर हिमालय भूभाग (अलकनंदा क्षेत्र) का एक उच्चता मॉडल तैयार किया गया है। इसमें धरातलीय विषमताओं को उजागर किया गया है। इस प्रकार के धरातलीय मॉडल किसी भूभाग के मॉडलिंग कने में सहायक होते हैं।

प्रश्न प्रारूप

Q. अंकीय उच्चता मॉडल पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the digital elevation model.)



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15. डिजिटल मानचित्रकला

15. डिजिटल मानचित्रकला

(Digital Cartography)



डिजिटल मानचित्रकला ⇒

          “कम्प्यूटर पर मानचित्र निर्माण या कम्प्यूटर की सहायता से मानचित्रों के निर्माण डिजिटल मानचित्रकला कहलाती है।”

          पहले तकनीकी रूप से सदृश्य मानचित्रण तकनीकि की मांग अधिक थी लेकिन यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थी। वर्तमान समय में डिजिटल मानचित्रकला के प्रकाश में आने से ऐसा नहीं है। कोई भी व्यक्ति जो मानचित्रण कार्यों से जुड़ा हुआ है वह थोड़े से प्रशिक्षण के पश्चात् कम्प्यूटर पर मानचित्रों का निर्माण कर सकता है तथा मानचित्रों की रूप रेखा, सांकेतिक चिह्नों, रंगों इत्यादि को सुगमता से परिवर्तित कर सकता है। इसलिए यह अति आवश्यक है कि कोई भी व्यक्ति जो मानचित्रों को संचालित करता है। उसको मानचित्रकला (Catrography) का आधारभूत ज्ञान होना अति आवश्यक है।

          पिछले एक या दो दशक में विद्युत तकनीकि के विकास ने वैज्ञानिक क्रियाकलापों तक की मनुष्य के प्रतिदिन के कार्यों को भी प्रभावित किया है। भूमि सर्वेक्षण जैसे व्यवसाय में तो मानचित्रकला का कोई विकल्प नहीं है। सुदूर संवेदन तथा वायुयान निर्मित संवेदकों से उपलब्ध आँकड़े डिजिटल आकार में होते हैं। तीव्रगति वाले विद्युत कम्प्यूटरों का विकास, इनकी पर्याप्त संग्रहण क्षमता, आसानी से इनका देश में उपलब्ध होना, ऑन लाइन पर अतिरिक्त सुविधायें प्राप्त होना तथा कीमत में निरन्तर ह्रास होना इत्यादि कई ऐसे कारक है जिसे कम्प्यूटर पर डिजिटल प्रणाली का प्रयोग निरन्तर बढ़ा है।

            जैसा कि स्पष्ट है कि कम्प्यूटर पर कोई मानचित्र या प्रतिबिम्ब उसी रूप में संग्रह नहीं किया जा सकता है। प्रत्येक आकृति को अंकों में कम्प्यूटर पर संग्रहीत किया जाता है तथा इच्छानुसार इनके द्वारा प्रतिबिम्ब या दृश्य तैयार किये जा सकते हैं। किसी मानचित्र को अंकों में संग्रह करने को भौगोलिक आँकड़े कहा जाता है। भौगोलिक आँकड़े दो प्रकार के होते धरातलीय तथा अधरातलीय। प्रायः धरातलीय आँकड़ों को बिन्दु रेखा तथा क्षेत्र के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

            अधरातलीय आँकड़े किसी बिन्दु, रेखा अथवा क्षेत्र विशेष की सूचनाओं को दर्शाते हैं। ये धरातलीय आँकड़े की विशेषताओं को बताते हैं जैसे कि किसी शहर का नाम, नदी या सड़क का नाम या किसी क्षेत्र विशेष का नाम इत्यादि। इस प्रकार धरातलीय तथा अधरातलीय आँकड़ों या सूचनाओं को कम्प्यूटर पर संग्रह किया जाता है। धरातलीय आँकड़ों को कम्प्यूटर पर प्रदर्शित करने के लिए निम्नलिखित दो कर्टोग्राफिक मॉडलों का उपयोग किया जाता है।

कार्टोग्राफिक मॉडल (Cartographic Models)

(1.) कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल (The Cartographic Map Model)

(2.) भू-सम्बन्धीय मॉडल (The Geo Relational Model)

(1.) कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल:-

            कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल में कम्प्यूटर का स्क्रीन आकार लघु वर्गाकार आकृतियों में विभाजित होता है जिसका प्रत्येक ग्रिड सेल एरी (Array) या पिक्सल (Pixal) कहलाता है। एरी अथवा पिक्सल जितना क्षेत्रफल तय करता है वह उस मानचित्र का विभेदन (Resolution) कहलाता है। प्रत्येक ग्रिडसेल पंक्ति व कॉलम द्वारा सन्दर्भित होता है जो संख्याओं में ऑकत होता है। प्रत्येक ग्रिडसेल का अपना काम होता है जिसे आँकड़ा कहते हैं। आँकड़ों का यह रूप रास्टर संरचना (Raster Structure) कहलाता है। रास्टर संरचना में बिन्दु आकृति को एक ग्रिडरौल से, रेखीय आकृति को आस-पास के ग्रिड सेलों के अंकीय मान के क्रम द्वारा तथा क्षेत्र आकृति को आस-पास के समान या मान वाले ग्रिड सेलों के समूहों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। 

डिजिटल मानचित्रकला

डिजिटल मानचित्रकला

 

               रास्टर प्रणाली में आँकड़ों की संग्रह क्षमता बहुत कम होती है। यही कारण है कि इस संरचना के अन्तर्गत कई प्रक्रियायें एक साथ सम्भव नहीं हो सकती है।

(2.) भू-सम्बन्धीय मॉडल:-

             भू-सम्बन्धी मॉडल आँकड़ों के संग्रहण तथा सूचनाओं के एकीकरण की ऐसी पद्धति है जो विभिन्न (बिन्दु, रेखीय तथा क्षेत्रीय) आकृतियों को अधरातलीय सूचनाओं से जोड़ता है। उदाहरण के लिए नगर, गाँव अथवा घर की बिन्दु आकृति को उसके नाम तथा जनसंख्या के साथ दर्शाया जा सकता है। इसी प्रकार रेखीय आकृतियों में किसी सड़क को उसके नाम से तथा नदी को उसके नाम के साथ जल निस्तारण क्षमता द्वारा दर्शाया जा सकता है। अलग-अलग क्षेत्रीय आकृतियाँ को उनके नाम एवं विशेषताओं के आधार पर दर्शाया जा सकता है। उदाहरण के लिए भूमि उपयोग, शैल इकाईयाँ, मिट्टी के प्रकार तथा सिंचित असिंचित भूमि इत्यादि। भू-सम्बन्धीय आँकड़ों के लिए विक्टर आँकड़ा संरचना पद्धति सबसे प्रमुख है।

          विक्टर प्रणाली को सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें किसी वस्तु अथवा आकृति की सापेक्षिक दूरी तथा विस्तार मापक के अनुसार दुरुस्त तरीके से दर्शाया जाता है। प्रत्येक भौगोलिक आकृति को X एवं Y निर्देशांकों के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

             किसी बिन्दु आकृति को एकल XY निर्देशांक के जोड़े द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जबकि रेखीय आकृतियों को दो या दो से अधिक XY निर्देशांकों के समूहों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। क्षेत्रीय आकृतियों को प्रदर्शित करने के लिए विक्टर संरचना में कई प्रणालियाँ प्रयोग की जाती हैं। इनमें सबसे अधिक प्रयोग किया जाने वाला तरीका स्थान (Spagetti Representation) है जिसमें प्रत्येक क्षेत्रीय आकृतियों की सीमाओं को XY निर्देशांकों के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। प्रारम्भ से लेकर अन्त तक केवल एक ही विक्टर रेखा प्रदर्शित की जाती है। क्षेत्रीय आकृति को किसी सांकेतिक चिह्न अथवा नाम से प्रदर्शित किया जाता है।

डिजिटल मानचित्रकला के तत्व (Elements of Digital Cartography):-

            सदृश्य मानचित्रकला के (Analog Cartography) प्रमुख तत्व निम्न हैं-

1. मानचित्र का मापक एवं प्रमाणिकता (Scale of Map of Accuracy)

2. मानचित्र की विषय सामग्री (Content of Map)

3. मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)

4. मानचित्र की रूपरेखा (Map Layout)

5. मानचित्र सांकेतिक चिह्न (Map Symbols)

6. रंगों एवं प्रतिरूपों का प्रयोग (Use of Colours and Pattem)

7. टाइप की गई सामग्री (Typography- Lattering)

8. मानचित्रों का सामान्यीकरण (Generalization of Map)

9. मानचित्रों का संकलन (Compilation of Map)

             अब डिजिटल मानचित्रकला में निम्न तत्वों को भी सम्मिलित किया जाने लगा है-

1. आँकड़ा मॉडल (Data Model)

2. आकृतिक विशेषतायें (Features Attributes)

3. आँकड़ा सेट अनुक्रम (Data Set Lineage)

4. दृश्यिकरण (Visulization)

           मानचित्र कला के इस अनुभाग में धरातलीय सूचनाओं को कम्प्यूटर पर डिजिटल प्रारूप में प्रदर्शित करने के तरीकों तथा मानचित्रों डिजाइन पर अधिक बल दिया जाता है। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं-

1. सबसे पहला उद्देश्य यह समझना है कि डिजिटल धरातलीय आँकड़ों को किस प्रकार डिजाइन किया जाता है।

2. दूसरा यह समझना है कि विभिन्न तत्वों से मानचित्रों का निर्माण कैसे किया जाय जैसा कि ये क्रम से लगे होते हैं।

3. तीसरा यह जानकारी रखना है कि मानचित्र पर प्राथमिकता के आधार पर किन तत्वों को स्थान दिया जाना चाहिए। 4. चौथा आकृतियों को शुद्धता से प्रदर्शित करने के लिए किन उपयुक्त चिह्नों का प्रयोग करना चाहिए।

मानचित्र एवं डिजिटल धरातलीय आँकड़ा आधार (Mapand Digital Spatial Data Base)

             जहाँ तक मानचित्र का सम्बन्ध है, मानचित्र धरातलीय सूचनाओं का एक दस्तावेज है। मानचित्रों को अंकीय आकार (Digital Form) में लाने के लिए इन्हें सबसे पहले डिजिटाइज करना पड़ता है तथा सूचना तत्वों के आधार पर अलग-अलग खण्डों में विभाजित किया जाता है।

Preparation of Data Design

           इस प्रक्रिया में कुछ कार्टोग्राफिक सूचनाओं को जिन्हें मनुष्य अपने दिमाग से समझता है उन्हें छोड़ दिया जाता है लेकिन कुछ आवश्यक सूचनाओं का शक्तिशाली आँकड़ा आधार तैयार किया जाता है।

        धरातलीय आँकड़ों के निर्माण की सबसे सरल विधि उपलब्ध मानचित्रों को डिजीटाईज करना है। इसके अलावा फोटोग्रामेटी, सुदूर संवेदन तथा धरातलीय अवलोकन विधि जिनके आधार पर आँकड़ा आधार तैयार किया जाता है। डिजिटल आँकड़े सापेक्ष रूप से बिना मापक के होते हैं। प्रायः इन्हें 1:1 मापक पर रखा जाता है।

धरातलीय सूचनाओं का अंकीय आंकड़ा आधार (Digital Data Base):-

            जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है कि जी.आई.एस. में आँकड़ों को तीन रूपों में दर्शाया जाता है। ये तीन रूप बिन्दु रेखा तथा क्षेत्र आकृतियाँ हैं। प्रत्येक आकृति XY को निर्देशांक की सहायता से डिजिटाइज किया जाता है।

भू-धरातलीय आँकड़ा आधार का डिजाइन (Geo-Spatial Data Base Design):-

           एक बार यदि हम आँकड़ा आधार, प्रक्षेप, विषय सामग्री तथा शुद्ध स्तर का उद्देश्य समझ जाते हैं तब निम्न दो कार्यों को सम्पन्न करने के लिए धरातलीय आँकड़ों का डिजाइन तैयार किया जाता है।

(a) जी.आई.एस. विश्लेषण के लिए भू-धरातलीय आँकड़ों को प्राकृतिक संरचना के अनुसार तैयार किया जा सकता है। (b) मानचित्रों के निर्माण तथा प्रदर्शन के लिए आँकड़ों का उपयोग अति सरल करना होता है।

डिजिटल धरातलीय आँकड़ों के निर्माण के लिए आंकड़ा मॉडलिंग (Data Modelling for Creating Digital Spatial Data):-

        डिजिटल धरातलीय आँकड़ों का ऐसा आँकड़ा मॉडल तैयार किया जाता है जो उच्च स्तर के मानचित्रों का उत्पादन कर सके तथा प्रत्येक के उपयोगकर्ता के लिए उपयोगी बन सके। जैसा कि पूर्व में समझाया गया है कि आँकड़ा मॉडलिंग का अर्थ आँकड़ों के संरचना की रूपरेखा तैयार करना है जिसे इन्हें सुगमता से प्रयोग किया जाए। धरातलीय आँकड़ों के निर्माण की यह एक महत्त्वपूर्ण अवस्था है।

आँकड़ों के मॉडलिंग डिजाइन को निम्न तीन रूपों में तैयार किया जा सकता है-

1. संकल्पनात्मक डिजाइन

2. तार्किक डिजाइन

3. भौतिक डिजाइन

1. संकल्पनात्मक डिजाइन (Conceptual Design):-

       मॉडलिंग ऐसा होना चाहिए जो धरातलीय आँकड़ों को अत्यधिक सिद्ध-परस्त बना सकें तथा जो अनुप्रयोग की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें। आँकड़ों को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि उनसे सरलतापूर्वक मानचित्रों का निर्माण किया जा सके।

          मानचित्रकला के आँकडे स्थान विज्ञान की दृष्टि से ढांचागत नहीं होते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जिस रूप में हमें मानचित्र और उसमें निहित सूचनाएँ प्राप्त होती है उसी रूप में इन्हें जी.आई.एस. में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। इन्हें कम्प्यूटर वातावरण में ढालने की आवश्यकता होती है। यदि मानचित्र के प्रतिरूप को डिजिटाईज किया जाए तो इसके लिए कई प्रयास करने पड़ते हैं तब यह जी.आई.एस. के अनुरूप कार्य कर सकता है। जी.आई.एस. निर्माण हेतु आँकड़ों का डिजिटाइजेशन करने के पश्चात इनसे मानचित्र तैयार करना अति सरल हो जाता है।

        इस प्रकार स्थान विज्ञान ढाँचे के लिए संकल्पनात्मक आँकड़ा मॉडल तैयार करना आवश्यक होता है। प्रत्येक आकृति को बिन्दु (Point), रेखा (Line) या घिरे हुए क्षेत्र (Polygon) के रूप में डिजिटाईज किया जाता है।

2. तार्किक डिजाइन (Logical Design):-

         आँकड़ों का मॉडलिंग  तर्पूकर्ण तरीके से तैयार किया जाता है। इसको इतना सरल बनाया जाता है कि कोई भी मानचित्रकार या उपयोगकर्ता उसे भली-भाँति समझ सके तथा उसका उपयोग कर सके। डिजिटल आँकड़े में जी.आई.एस. में धरातलीय विश्लेषण के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। इनकी संरचना इस प्रकार तैयार की जाती है कि प्रत्येक आकृति की पहचान की जा सके। इसकी बसाव-स्थिति इस प्रकार हो कि डिजिटल आँकड़ों में उसे पृथक किया जा सके। आँकड़ों को तार्किक क्रम में संगठित किया जाता है। इसी प्रकार आँकड़ों का ढाँचा सरल एवं समझ के योग्य बनाया जाता है।

          बिन्दु, रेखा तथा आकृतियों के ज्यामितीय लक्ष्यों को निर्देशांक या निर्देशांकों (X,Y) के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यदि प्रत्येक ज्यामितीय वस्तु को किसी कोड से सम्बन्धि किया जाय तब वह उस आकृति के सम्बन्ध में जानकारी देता है जो एक ज्यामितीय आकृति है। उदाहरण के लिए कोई झील या कृषि भूमि या वन क्षेत्र किसी भी आकृति को वर्गीकृत कर कोडिंग किया जाता है।

3. भौतिक डिजाइन (Physical Design):-

         आँकड़ा संरचना का भौतिक डिजाइन कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर पर निर्भर करता है।

      कुछ कम्प्यूटर प्रणाली में आकृतियाँ प्रायः स्थानविज्ञान से जुड़ी हुई होती है। उदाहरण के लिए रंग, दबाव, स्टाइल तथा विभिन्न तल इत्यादि या आँकड़े अलग-अलग फाइलों में पृथक-पृथक किये जाते हैं जैसे कि एक सड़क के लिए, एक जंगल के लिए इत्यादि।

       आँकड़ों का दूसरा भौतिक डिजाइन आँकड़ा आधार की कड़ियाँ या कोड से सम्बंधित होते हैं। भौतिक आँकड़ा संरचना मॉडल का आधारभूत सिद्धान्त वही है जो कि डिजाइन के अन्तर्गत था। इसमें डिजिटाइजेशन इस प्रका किया जाता है कि एक आकृति को दूसरे आकृति से पृथक किया जा सके तथा सरलतापूर्वक स्वतः ही तार्किक डिजाइन में परिवर्तित हो सकें।

प्रश्न प्रारूप

Q. डिजिटल मानचित्रकला पर निबंध लिखें।

(Write on essay on digital Cartography.)



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16. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर

16. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर

(Difference between Raster and Vector Model)


रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर ⇒

            भौगोलिक सूचनाओं के प्रतिरूपण (Modeling) में धरातलीय आँकड़ा संरचना के लिए रास्टर तथा विक्टर विधियाँ स्पष्ट रूप से अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक यह माना जाता था कि रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा सूचनायें एक-दूसरे के विरोधी हैं। ऐसा इसलिये समझा गया क्योंकि रास्टर विधि में संग्रहण तथा प्रतिविम्ब प्रक्रिया के लिये अत्यधिक कम्प्यूटर स्पेस तथा स्मृति की आवश्यकता होती थी जबकि विक्टर विधि में कम स्थान की आवश्यकता होती थी।

         रास्टर विधि में कई धरातलीय विश्लेषण अति सरल होते हैं। आँकड़ों के परिचालन में इसमें कई प्रकार की समस्यायें उत्पन्न होती हैं जैसे कि पोलीगन प्रतिच्छेदन या धरातलीय सामान्यीकरण से उत्पन्न समस्या इत्यादि। रास्टर विधि द्वारा निर्मित मानचित्र अच्छे व साफ नहीं होते हैं।

           इसके विपरीत विक्टर विधि में आँकड़ा आधार बहुत उत्तम तरीके से प्रबन्धित होता है। इसके द्वारा निर्मित मानचित्र अत्यधिक परिष्कृत होते हैं। इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें धरातलीय विश्लेषण नितान्त कठिन होते हैं।

रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा मॉडल में अंतर

रास्टर आँकड़ा मॉडल

1. रास्टर आँकड़ा मॉडल एक सरल (Simple) डाटा मॉडल है।

2. रास्टर मॉडल मुख्य रूप से बसाव स्थिति (Location) को केन्द्रित करता है। 

3. रास्टर आधारित जी.आई.एस. में उपग्रही सूचनाओं को सरलतापूर्वक कम्प्यूटर पर डाला जा सकता है।

4. रास्टर मॉडल धरातलीय शुद्धता को कम करता है। इसका अर्थ है कि रास्टर मॉडल अत्यन्त सामान्यीकरण दृश्य को प्रस्तुत करता।

5. रास्टर मॉडल आकृतियों एवं धरातल के मध्य Gradual Transition दर्शाता है। उदाहरण के लिये उच्चावन्वन के साथ मिट्टियों का वर्गीकरण।

6. रास्टर मॉडल बसाव स्थिति को कार्टेशन निर्देशांक प्रणाली में प्रदर्शित करता है।

7. रास्टर मॉडल में आँकड़ों को पंक्ति एवं कालम में संग्रह किया जाता है। लेकिन टोपोलोजीकल प्रक्रिया नहीं अपनायी जाती है।

8. इसमें प्रत्येक तत्व एक लक्ष्य (Object) के रूप में प्रदर्शित करता है।

9. रास्टर मॉडल में क्षेत्र या दूरियों की माप करना सरल होता है परन्तु किसी चर की माप करना अत्यन्त कठिन होता है।

10. रास्टर आँकड़ा मॉडल किसी प्रश्न का उत्तर आसानी से देता है जैसे कि भौगोलिक आकृति की बसाव स्थिति क्या है?

11. रास्टर मॉडल अत्यन्त जगह घेरता है, इसलिए आँकड़ों को सघन करके प्रयोग किया जाता है।

12. रास्टर आँकड़ा मॉडल एक विक्टर की तुलना में तीव्र है।

13. रास्टर मॉडल का उपयोग धरातलीय विश्लेषण में बहुतायत में किया जाता है।

रास्टर एवं विक्टर मॉडल

रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा मॉडल

विक्टर आँकड़ा मॉडल

1. विक्टर मॉडल अत्यधिक जटिल आँकड़ा संरचनायुक्त मॉडल है।

2. विक्टर मॉडल भौगोलिक आकृतियों (Features) को केन्द्रित करता है?

3. विक्टर मॉडल में उपग्रह से उपलब्ध आँकड़ों को सरलता से कम्प्यूटर पर नहीं डाला जा सकता है।

4. विक्टर मॉडल किसी वस्तु या लक्ष्य की आकृति को अति शुद्धता से प्रदर्शित करता है।

5. विक्टर मॉडल में किसी वस्तु आकृति की सीमाओं को अति शुद्धता के साथ दर्शाया जाता है।

6. विक्टर मॉडल में बसाव स्थितियों को ‘x’ एवं ‘y’ निर्देशांकों प्रणाली की सहायता से दर्शाया जाता है।

7. इसमें टोपोलाजीकल प्रक्रिया अपनाई जाती है।

8. वास्तविक सांसारिक घटनाओं को जिनकी एक विशिष्ट बसाव स्थिति होती है को स्थैतिक बिन्दु, रेखा, सीमाओं एवं घिरे हुये क्षेत्र का शुद्ध अवलोकन करता है। अधिकतर लक्ष्यों के लिए विक्टर मॉडल अत्यधिक उपयुक्त है।

9. किसी भी क्षेत्र की दूरी एवं क्षेत्रफल ज्ञात करना आसान होता है।

10. विक्टर मॉडल में किसी भौगोलिक आकृति के बारे में क्या करना है। इस प्रका के प्रश्नों का स्वयं हल निकाल लेता है।

11. विक्टर मॉडल में धरातलीय आँकड़ों के संग्रह के लिये अत्यन्त कम स्थान होता है।

12. विक्टर मॉडल तीव्रता के साथ शुद्धता को भी दर्शाता है।

13. विक्टर मॉडल का उपयोग अति उच्च श्रेणी के कार्टोग्राफी प्रदर्शन के लिए किया है जिसमें शुद्धता एवं स्पष्टता महत्त्वपूर्ण होती है।

प्रश्न प्रारूप 

Q. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में क्या अंतर है?

(What is difference between Raster and Vector model.)



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13. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना

13. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना

(Discuss the Objective, Nature and Elements of GIS)


भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्य (Objectives of GIS)

              भौगोलिक सूचना प्रणाली के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित प्रकार हैं-

1. योजना तथा निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाना।

2. आंकड़ों के वितरण तथा संचालन के लिए सफल साधनों की पूर्ति करना।

 3. आँकड़ा भण्डार से अनावश्यक आंकड़ों को हटाना तथा पुनरावृत्ति को करना।

4. विभिन्न स्रोतों से एकत्रित सूचनाओं को संगठित करने की क्षमता रखना।

5. अति जटिल विश्लेषण करना।

6. भौगोलिक आँकड़ों के जटिल विश्लेषणों से नई-नई सूचनाओं करना।

              जब किसी भी योजना में भौगोलिक सूचना प्रणाली का उपयोग किया जाता है तो यह हमें निम्नलिखित जातीय प्रश्नों का उत्तर देता है।

बसाव स्थिति (Location):-

          कोई भी स्थान या वस्तु कहाँ स्थित है इसका जी.आई.एस. के विश्लेषण से आसानी से प्राप्त हो जाता है। चूंकि जी.आई.एस. में उपयोग किये गये आँकड़े भौगोलिक रूप से संदर्भित होते है इसलिए किसी भी लक्ष्य की उपयुक्त बसाव स्थिति का ज्ञान इसके द्वारा किया जा सकता है। यदि कहीं पर भी यह जानना चाहे कि यहाँ क्या है तो इसका भी उत्तर शीघ्र एवं सरलता से जी.आई.एस. से प्राप्त हो जाता है।

दशा (Condition):-

         दशा से अभिप्राय यह है कि कोई वस्तु कहीं पर किन कारणों से तथा किन दशाओं में स्थित है। यहाँ पर कार्य एवं कारण का सम्बन्ध स्पष्ट होता है। किसी भी लक्ष्य या वस्तु के बसाव की स्थिति की पहचान जी.आई.एस. प्रक्रिया से की जा सकती है।

प्रवृत्ति (Trend):-

           प्रवृत्ति का अर्थ है चरों का परिवर्तन। कोई भी मानचित्र तत्व घटते हुए क्रम में है या बढ़ते हुए क्रम में, इसको पुष्टि जी.आई.एस. आसानी से देता है। यहाँ तक कि क्या परिवर्तन हो रहा है इसका भी उत्तर प्राप्त हो जाता है। कोई भी चर निम्न रूपों में परिवर्तन को प्रदर्शित करते हैं-

(i) आकार में वृद्धि (Increase Size)

(ii) आकार में कमी तथा स्थान में परिवर्तन (Decreased size and changged position)

(iii) आकृति परिवर्तन (Change Shape)

प्रतिरूप (Pattern):-

           जी.आई.एस. के कार्यों में धरातलीय प्रतिरूप तथा अंतरसम्बन्ध महत्वपूर्ण विशेषतायें हैं। सभी मानचित्र आकृतियों में विभिन्न प्रकार के धरातलीय सम्बन्ध होते हैं। इनमें से कुछ सम्बन्धों को आँखों से आसनी से देखा जा सकता है जबकि अन्य को जानने के लिए जी.आई.एस. की आवश्यकता होती है। यहाँ समझने के लिए तीन प्रकार के सम्बन्धों को समझाया गया है-

(i) क्या किसी X आकृति में कोई प्रतिरूप है? आकृति X कुछ भी हो सकती है जैसे कि भूमि उपयोग, वनस्पति प्रकार, आवासीय विस्तार आदि। किसी साधारण मानचित्र में इनका प्रतिरूप देखा जा सकता है।

(ii) क्या X एवं Y में कोई सम्बन्ध है? हमारी आँखों यह बताने में सक्षम होती हैं कि X व Y में निकट का सम्बन्ध है या Y, X के अति निकट है। यह भी हो सकता है कि एक X से दूसरे X में Y की स्थिति में परिवर्तन एक प्रतिरूप में होता है। इन धरातलीय सम्बन्धों को समझने के लिए कार्य करने वाले व्यक्ति के कार्यात्मक साहचर्य (Functional Association) को जानना अति आवश्यक है। उदाहरण के लिए यदि X व Y हमेशा साथ है तो इसका अर्थ है कि इनकी निकटता का कोई महत्वपूर्ण कारण है। इस प्रकार की जानकारियों का ज्ञान जी.आई.एस. में ढूँढा जा सकता है।

(iii) क्या अन्य धरातलीय अथवा कार्यात्मक प्रतिरूप भी अस्तित्व में है? माना कोई Z प्रकार की आकृति सीमाओं की ओर स्थित है तथा पश्चिम से पूर्व की ओर आकार में बहती है। इसका बसाव प्रतिरूप टेढ़ा-मेढ़ा है। इसका कोई कार्यात्मक कारण होता है। जी.आई.एस. इसका उत्तर ढूंढ़ने में सहायता करता है।

मॉडलिंग (Modeling):-

         ‘मॉडल’ संसार तथा इसकी प्रक्रियाओं का प्रदर्शित रुपान्तरण है। मॉडल किसी सामान्य कथन बनाने के लिए आँकड़ों या विश्लेषण का सारांश प्रस्तुत करता है। ये मॉडल ऑकड़ों के कालोहाल को कम करने तथा सामान्यीकरण को बनाने में सहायता करते हैं। आज उच्च क्षमता वाले कम्प्यूटर विश्लेषण को आगे बढ़ाते हैं। इस प्रकार के नवीन विश्लेषण को मॉडलिंग कहते हैं।

          यहाँ पर प्रश्न किया जा सकता है कि जी.आई.एस. में ऐसा क्या है जिससे यह तकनीक अत्यधिक प्रचलित हो रही है। इसका उत्तर सक्षिप्त में इस प्रकार दिया जा सकता है।

जी.आई.एस. के विशिष्ट तथ्य

                        ⇓⇓⇓⇓

⇒ सूचनाओं की पुनर्प्राप्ति (Retrevel of Information)

⇒ टोपोलोजिकल मॉडल (Topological Model)

⇒ नेटवर्क (Network)

⇒ अंशछादन(Overlay)

⇒ आँकड़ों का निर्गमन (Data Output)  

जी.आई.एस. कैसे कार्य करता है?

(How does GIS work?)

               यहाँ पर संक्षेप में उन बिन्दुओं को उद्धरित किया गया है जिनके अंतर्गत जी.आई.एस. कार्य करता है:-

1. विभिन्न स्रोतों से सूचनाओं को सम्बद्ध करना। 

2. आँकड़ों का अभिग्रहण (Capture) करना

3. ऑकड़ों को एकीकृत (Integration) करना

4. प्रक्षेपण तथा पंजीकरण (Projection and Registration) करना

5. आँकड़ों को ढाँचा (Data Structure) तैयार करना।

आँकड़ों का विश्लेषण (Data Analysis)

            इसके अंतर्गत मुख्यतः निम्न प्रकार से आँकड़ों का विश्लेषण किया जाता है:-

1. साधारण जाँच (Simple Query)

2. विशेष जाँच (Spacial Query)

3. एक परतीय संचालन (Single Layer Operation)

4. जोनिंग करना (Zoning)

         यहाँ जाँच शब्द से अभिप्राय है पूछताछ करना। इस प्रणाली में हम पूछताछ के माध्यम से सूचनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त कते हैं। विशेष पूछताछ निम्न प्रकार से की जाती है-

1. बहुपरतीय संचालन (Multi Layer Operation)

2. विशेष मॉडलिंग (Spacial Modeling)

3. धरातलीय विश्लेषण (Surfacial Analysis)

4. जाल विश्लेषण (Network Analysis)

5. बिन्दु प्रतिरूप विश्लेषण (Point Partem Analysis)

6. ग्रिड विश्लेषण (Grid Analysis)

भौगोलिक सूचना प्रणाली के तत्व (Elements or Components of GIS):-

             जी.आई.एस. के प्रमुख तत्वों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है:-

1. हार्डवेयर (Hardware)

2. सॉफ्टवेयर (Software)

3. आँकड़े (Data)

4. लाइफवेयर (Lifewate)

5. साँचागत संगठन (Infrastructural Organisation)

भौगोलिक सूचना प्रणाली

भौगोलिक सूचना प्रणाली के तत्त्व

प्रश्न प्रारूप

Q. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना करें।

(Discuss the Objective, Nature and Elements of GIS.)



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12. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम

12. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम

(The Concept and Approaches of GIS)


जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम⇒

      जी.आई.एस. की प्रमुख संकल्पनायें इस प्रकार हैं:-

सी.पी.लो. एवं बलबर्ट के. (2005) ने जी.आई.एस. के निम्नलिखित संकल्पनायें एवं तकनीकी प्रस्तुत की हैं-

(i) आँकड़ों को उपार्जित एवं मॉडलिंग करना (Data Acquisition and Modeling)

(ii) भू-सन्दर्भित करना (Georeferencing)

(iii) आँकड़ा स्तर (Data Standard)

(iv) आँकड़ों का प्रक्रियन एवं विश्लेषण करना ( Data Processing / Analysis)

(v) कम्प्यूटर हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर (Computer Hardware and Software)

(vi) व्यवहारिक उपयोग (Application)

(vii) जी.आई.एस. प्रणाली का विकास (G.I.S. System Development)

(viii) समस्या एवं समाधान (Problem and Solution)

             इसी प्रकार कई अन्य लेखकों ने जी.आई.एस. की संकल्पनायें निम्नलिखित रूप से दी है-

(i) आँकड़ा प्राप्त करना एवं उनको प्रस्तुत करना (Data Capture and Presentation

(ii) आँकड़ा प्रबन्धन जिसके अन्तर्गत संग्रहण एवं रख-रखाव सम्मिलित है। (Data Management)

(iii) आँकड़ों का विश्लेषण एवं परिचालन करना ( Data Analysis and Manipulation)

(iv) आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण (Data Presentation)

(v) मॉडलिंग करना (Modeling)

            कुछ अन्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

1. स्थान एवं घटना विशेष की संकल्पना:-

           जैसा कि पूर्व में समझाया गया है कि जी.आई.एस. भौगोलिक सूचनाओं को कम्प्यूटर पर एकीकृत करता है। प्रश्न उठता है कि ये भौगोलिक घटनायें कहाँ घटित हुई हैं? इनका धरातलीय प्रतिरूप किस प्रकार प्रतीत होता है? स्थान विशेष की संकल्पना इससे सम्बन्धित है। भूगोल एक वितरण का विज्ञान है। सूचनाओं व घटनाओं का घरातलीय वितरण प्रतिरूप प्रदर्शन करने में जी.आई.एस. सबसे अधिक उपयोगी तकनीक है। किसी वस्तु अथवा घटना का धरातलीय वितरण मानचित्र के द्वारा, जी.आई.एस. के अंतर्गत सरलतापूर्वक किया जा सकता है।

2. मानचित्र बाहुलता (Map Quantities)

3. घनत्व विश्लेषण (Density Analysis)

4. सूचना से सूचना संकल्पना (Concept of Data in Data)

5. सहसम्बन्ध की संकल्पना (Concept of Relationship)

6. परिवर्तनशीलता की संकल्पना (Concept of Change)

7. प्रतिरूपों की संकल्पना (Concept of Pattern)

8. प्रवृत्तियों की संकल्पना (Concept of Trend)

जी.आई.एस. के भौगोलिक उपागम

(Geographical Approach of GIS)

            भूगोल एक सांसारिक विज्ञान है तथा जी.आई.एस. एक सांसारिक विज्ञान के विश्लेषण की आधुनिकतम तकनीकी है। भूगोल एवं जी.आई.एस. दोनों ही पृथ्वी के धरातल की सूचनाओं के सम्बन्ध में उपयुक्त समझ उत्पन्न करते हैं। भौगोलिक ज्ञान का उपयोग मानव क्रियाकलापों को संचालित करने में सहायक होते हैं। यहीं से भौगोलिक उपागम का आरम्भ होता है। यहाँ भौगोलिक उपागम का आशय किसी भी समस्या के समाधान के लिए एक नये तरीके की सोच विकसित करना है जो भौगोलिक सूचनाओं को एकीकृत एवं संगठित करती है जिससे पृथ्वी जैसे ग्रह के बारे में अधिकतम जानकारी प्राप्त की जा सके।

            भौगोलिक उपागम भौगोलिक ज्ञान को जागृत (Create) कर हमारी जिज्ञासा को बढ़ाता है। पृथ्वी का मापन (Measurement of Earth), आँकड़ों या सूचनाओं का व्यवस्थीकरण एवं विश्लेषण, विभिन्न प्रक्रियाओं का मॉडलिंग, अवयवों (Elements) में आपसी सम्बन्ध इत्यादि भौगोलिक ज्ञान के प्रमुख बिन्दु हैं जिनका अध्ययन भौगोलिक विश्लेषण के अंतर्गत कया जाता है। इतना ही नहीं भौगोलिक उपागम की विधियों हमें यह भी अनुमति प्रदान करती है कि किस प्रकार सांसारिक घटनाओं का डिजाइन योजनाबद्ध किया जा सकता है। भौगोलिक उपागम के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं-

भौगोलिक उपागम के प्रमुख चरण

(Steps of Geographical Approach)

1. Step 1- प्रश्न करना (Ask)

2. Step 2- उपार्जन करना (Acquire)

3. Step 3- परीक्षण करना (Examine)

4. Step 4- विश्लेषण करना (Analysis)

5. Step 5- कार्यान्वयन (Action)

Step 1 प्रश्न करना (Ask):-

              किसी भी भौगोलिक समस्या को उजागर करने से पूर्व प्रश्न उठता है कि जिस समस्या के समाधान या विश्लेषण किया जाना है या किया जा रहा है वह समस्या क्या है तथा वह भौगोलिक दृष्टि से कहाँ स्थित है? इस प्रकार के प्रश्न करने से सम्भवतः उसके उत्तर प्राप्त करने में सहायता मिल सके। यह भौगोलिक उपागम का प्रमुख कदम है। समस्या के बसाव स्थिति के अनुरूप विश्लेषण विधियों की रूपरेखा तैयार की जाती है।

Step 2-उपार्जन करना (Acquire):-

               समस्या या घटना के स्पष्टीकरण के पश्चात उसे सम्बन्धित उपयुक्त सूचनाओं की सूची निर्धारित की जाती है जिनकी विश्लेषणकर्ता को नितान्त आवश्यकता होती है। यह भी निश्चित किया जाता है कि अमुक सूचना प्राप्त की जा सकती है या जी.आई.एस. के अंतर्गत तैयार की जा सकती है। वास्तव में आंकड़ों के प्रकार एवं उनका भौगोलिक महत्त्व किसी समस्या के मूल में पहुँचने की कला व विधियों को भी स्पष्ट करने में सहायता करते हैं। यदि अध्ययन की विश्लेषण विधियाँ उच्च स्तर की हों तो वे समस्या के निदान में प्रयोग किये जाने वाले आंकड़ों की प्राप्ति में भी सहायक होते है।

             उत्कृष्ट अध्ययन विधियों के उपयोग के लिए आवश्यक है कि नये प्रकार के आकड़ों को उत्पन्न किया जाय। नये प्रकार की सूचनाओं को सूचीबद्ध करने के लिए भौगोलिक धरातलीय (Spatial) तथा अधरातलीय (Aspatial or Attribute) सूचनाओं की आवश्यकता होती है। इन सूचनाओं एवं आँकड़ों को तालिकाओं, नये प्रकार के मानचित्रों की परतों इत्यादि तरीकों से जीआईएस द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

Step3-परीक्षण करना (Examine):-

              आँकड़ों की प्राप्ति के पश्चात् अगला कदम है कि सूचनाओं या आँकड़े की उत्तमता को परखना। यह प्रयास किया जाता है कि प्राप्त किये गये आँकड़े हमारे अध्ययन के लिए अनुकूल है या नहीं। यदि उपयुक्त है तो उन्हें किस रूप में उपयोग किया जा सकता है।

           परीक्षण के अंतर्गत प्रत्यक्ष निरीक्षण, अन्वेषण (संगठित करने के तरीके), एक आँकड़ा सेट से दूसरे आँकड़ा सेट से सम्बन्ध, आँकड़ों को व्यवस्थित करने के विज्ञान के नियम (Topology) तथा आँकड़ों के प्राप्ति का स्रोत (Meta Data) इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है।

            कहने का अर्थ यह है कि सभी प्रकार के आँकड़ों की पुष्टि होने के पश्चात् उन्हें अध्ययन के अनुरूप व्यवस्थित किया जाता है।

Step 4- विश्लेषण करना (Analysis):-

              जीआईएस का अगला कदम, आँकड़ों अथवा सूचनाओं का परीक्षण या विश्लेषण की विधियों के आधार पर प्रक्रियन (Process) तथा व्याख्या (Analysis) करना होता है। परिणामों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है तथा परिणामों को देखकर यह तय किया जाता है कि सूचनायें जिनका प्रयोग किया गया है उपयोगी या वैधानिक है या नहीं। विभिन्न अवयवों (Parameters) के विश्लेषण करने में उपयोग की गई विधियाँ कितनी कारगर सिद्ध हुई हैं?

            इस प्रकार जी.आई.एस. मॉडलिंग की जाती है जिसके माध्यम से परिणामों के परिवर्तन सरल, शुद्ध एवं आसान बनाया जाता है, जो नये परिणाम प्रस्तुत करने में सहायक होते है कि रास्टर एवं विक्टर ऑकड़ा मॉडल इसी कदम के प्रतिफल हैं।

Step 5 कार्यान्वयन (Action):-

             भौगोलिक उपागम के विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा परिणामों का प्रस्तुतीकरण एवं कार्यान्वयन करना होता है। किसी भी समस्या के परिणामों की रिपोर्ट, मानचित्रों, तालिकाओं, चारों या इन्टरनेट या वेब अथवा अन्य मुद्रित माध्यमों से प्रयोगकर्ताओं के मध्य आदान-प्रदान की जा सकती हैं। किसी भी विश्लेषण के परिणामों की प्रस्तुतीकरण के उपयुक्त साधनों की नितान्त आवश्यकता होती है। यह देखा आता है कि कौन विधि परिणामों को उपयोगकर्ता तक पहुँचाने में अति सहयोगी हो सकती है। इसके लिए सभी तरह के Audio Visual विद्युतीकरण यंत्रों से समस्या के परिणामों को आंशिक एवं पूर्ण रूप से प्रस्तुत कर उस पर कार्यान्वयन किया जाता है। कार्यान्वयन करना तथा उपयोगकर्ता द्वारा परिणामों को उपयोग में लाना ही भौगोलिक उपागम की महत्वपूर्ण कड़ी है। परिणामों के द्वारा समस्या के निदान करना ही किसी योजना की सफलता मानी जाती है।

जी. आई. एस. की संकल्पना

            उपरोक्त परिभाषायें भौगोलिक सूचना प्रणाली के विषय वस्तु तथा क्रियाकलापों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हैं। कभी-कभी इसे धरातलीय सूचना प्रणाली (Spatial Information System) भी कहते हैं जो किसी भी स्थान विशेष पर स्थित आँकड़ों का संचालन करती है। इसी प्रकार का शब्द ‘अधरातलीय आँकड़ा’ (Aspatial Data) है। इसकी भी समान्तर रूप से लाक्षणिक आँकड़ों (Attribute Data) के लिए प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए वर्षा, तापमान, मिट्टी के रासायनिक गुण, जनसंख्या आँकड़ा इत्यादि। यहाँ पर यह समझना आवश्यक है कि धरातलीय आँकड़ों के संचालन के लिए कई प्रकार के तकनीक शब्द प्रयोग किये जाते हैं जिनमें कुछ इस प्रकार हैं-

(a) भू-सूचना प्रणाली (Geo-Information System-GIS)

(b) धरातलीय सूचना प्रणाली (Spatial Information System-SIS)

(c) भूमि सूचना प्रणाली (Land Information System-LIS)

(d) बहु-उद्देशीय भू-आधारित प्रणाली (Multi-Purpose Cadastre-MPC)

       अंत में निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि “भौगोलिक सूचना प्रणाली एक कम्प्यूटर सहायता प्राप्त तंत्र है जो भौगोलिक संसार के विभिन्न पहलुओं से संबंधित आँकड़ों को एकत्र, संग्रह, विश्लेषण, परिचालन, प्रस्तुतीकरण तथा पुनर्प्रसाण करता है। यह किसी निर्णय पर पहुँचने का शक्तिशाली साधन या प्रणाली है।”

प्रश्न प्रारूप

Q. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम की विवेचना को

(Discuss the Concept and approaches of GIS.)



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