Unique Geography Notes हिंदी में

Unique Geography Notes in Hindi (भूगोल नोट्स) वेबसाइट के माध्यम से दुनिया भर के उन छात्रों और अध्ययन प्रेमियों को काफी मदद मिलेगी, जिन्हें भूगोल के बारे में जानकारी और ज्ञान इकट्ठा करने में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस वेबसाइट पर नियमित रूप से सभी प्रकार के नोट्स लगातार विषय विशेषज्ञों द्वारा प्रकाशित करने का काम जारी है।

Solved Exam Paper For UG

4. Multidisciplinary Course (MDC-1) For Science and Commerce

(Multidisciplinary Course (MDC-1) For Science and Commerce)

Geomorphology (Theory)

Solved Questions Paper 2023



(Patliputra University Patna)

Multidisciplinary Course

GROUP-A / समूह-अ

(Objective Type Questions)

( वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Attempt all MCQ from this section. Each question carries 2 marks.

[2×10=20]

इस खण्ड से सभी बहुविकल्पीय प्रश्नों को हल कीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. (i) Russel and Lyttleton gave following hypothesis:

(a) Binary star hypothesis

(b) Nova star hypothesis

(c) Planetesimal hypothesis

(d) Tidal hypothesis

रसेल एवं लिटिलटन द्वारा दी गयी परिकल्पना है:

(a) द्वैतारक परिकल्पना

(b) नवतारा परिकल्पना
(c) ग्रहाणु परिकल्पना

(d) ज्वारीय परिकल्पना

उत्तर- (a) द्वैतारक परिकल्पना-रसेल

(b) नवतारा परिकल्पना-लिटिलटन

(ii) Moon is a:

(a) Planet

(b) Satellite

(c) Asteroid

(d) Nebula

चन्द्रमा एक है:

(a) ग्रह

(b) उपग्रह

(c) क्षुद्र ग्रह

(d) निहारिका

उत्तर- (b) उपग्रह

(iii) The crust contains:

(a) Sial + Sima

(b) Sima + Nife

(c) Sima

(d) Sial + Upper limit

क्रस्ट में सम्मिलित है:

(a) सियाल + सिमा

(b) सिमा + निफे

(c) सिमा

(d) सियाल + ऊपरी सिमा

उत्तर- (d) सियाल + ऊपरी सिमा

(iv) The innermost layer of the earth is:

(a) Core

(b) Crust

(c) Mantle

(d) Substratum

पृथ्वी की सबसे आंतरिक परत है:

(a) कोर

(b) क्रस्ट

(c) मैन्टल

(d) अधःस्तर

उत्तर- (a) कोर

(v) The breaking down or dissolving of rocks and minerals on Earth surface is known as:

(a) Mass wasting

(b) Weathering

(c) Denudation

(d) Decomposition

पृथ्वी की सतह पर चट्टानों के टूटने अथवा घुलने की प्रक्रिया को कहते है:

(a) वृहद क्षरण

(b) अपरदन

(c) अनाच्छादन

(d) अपघटन

उत्तर- (b) Weathering (अपक्षयण)

(vi) Marble is a a type of.. ……. rock.

(a) Sedimentary

(b) Metamorphic

(c) Igneous

(d) Residual

संगमरमर एक तरह की चट्टान है।

(a) अवसादी

(b) कायान्तरित

(c) आग्नेय

(d) अवशिष्ट

उत्तर- (b) कायान्तरित

(vii) An example of Igneous rocks is:

(a) Granite

(b) Slate

(c) Coal

(d) Gniess

आग्नेय चट्टान का एक उदाहरण है:

(a) ग्रेनाइट

(b) स्लेट

(c) कोयला

(d) नाइस

उत्तर- (a) ग्रेनाइट

(viii) India is part of which Plate?

(a) Eurasia

(b) Indo-Australia

(c) China

(d) Pacific

भारत किस प्लेट के अन्तर्गत आता है?

(a) यूरेशिया

(b) इण्डो-आस्ट्रेलिया

(c) चीन

(d) प्रशान्त

उत्तर- (b) इण्डो-आस्ट्रेलिया

(ix) Which scale is used to measure the intensity of Earthquake?

(a) Read scale

(b) Richter scale

(c) Holmes scale

(d) Vernier scale

भूकंप की तीव्रता मापने के लिए किस मापक का प्रयोग करते हैं?

(a) रीड स्केल

(b) रिक्टर स्केल

(c) होम्स स्केल

(d) वर्नियर स्केल

उत्तर- (b) रिक्टर स्केल

(x) Which is the landforms formed by volcano :

(a) Fujiyama

(b) Aravali
(c) Alps

(d) Rockies

ज्वालामुखी से बनी भू-आकृति कौन-सी है?

(a) फूजीयामा

(b) अरावली

(c) आल्पस

(d) रॉकीज

उत्तर- (a) फूजीयामा

GROUP-B / समूह-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. Each question carries 5 marks.

[5×4=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।
2. Discuss the binary star hypothesis given by Russel and Lyttleton,

रसेल एवं लिटिलटन द्वारा दी गयी द्वैतारिक परिकल्पना की चर्चा कीजिए।

3. Describe the importance of Crust on Earth.

पृथ्वी पर क्रस्ट के महत्त्व की व्याख्या कीजिए।

4. Explain the process of physical weathering.

भौतिक अपरदन की प्रक्रिया को समझाइए |

5. State the different types of rocks with example.

चट्टानों के विभिन्न प्रकार उदाहरण के साथ बताइए।

6. Explain the different types of plate in plate tectonic theory.

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत में बताए गए विभिन्न प्लेटों की व्याख्या कीजिए।

7. What is Tsunami?

सुनामी किसे कहते हैं?

GROUP-C/ समूह-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marksk. [10×3=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए । प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

8. Discuss the internal structure of the Earth with suitable diagrams.

पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सचित्र चर्चा कीजिए।

9. What is weathering and its different types?

अपरदन एवं उसके विभिन्न प्रकार क्या हैं?

10. Explain the different tyeps of rocks and its importance.

चट्टानों के विभिन्न प्रकार तथा उनके महत्त्व के बारे में व्याख्या कीजिए।
11. Discuss the plate tectonic theory with suitable diagrams.

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का सचित्र विवरण प्रस्तुत कीजिए।

12. State the different types of Earthquake and its distribution around the world.

भूकंप के प्रकार बताते हुए, उनके विश्व वितरण को समझाइए।

13. Define Volcano and explain the different landforms formed by volcanic activities.

ज्वालामुखी की परिभाषा देते हुए, ज्वालामुखी क्रिया से संबंधित भूदृश्यों का वर्णन कीजिए।


सभी लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का उत्तर सरल एवं आसान शब्दों में देना यहाँ सीखें


GROUP-B / समूह-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. Each question carries 5 marks.

[5×4=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।
2. Discuss the binary star hypothesis given by Russel and Lyttleton,

रसेल एवं लिटिलटन द्वारा दी गयी द्वैतारिक परिकल्पना की चर्चा कीजिए।

उत्तर- जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना से निम्नलिखित दो बातें प्रमाणित नहीं हो पा रहीं थीं-

(i) सूर्य तथा ग्रहों के बीच की वर्तमान दूरी और

(ii) ग्रहों के वर्तमान कोणीय आवेग (Angular momentum) की अधिकता।

       इन दो समस्याओं के समाधान हेतु रसेल ने द्वैतारक परिकल्पना का प्रतिपादन किया।

      आदिकाल में सूर्य के पास ही दो तारे थे। सर्वप्रथम सूर्य का एक साथी तारा था जो सूर्य के चारों ओर परिक्रमा कर रहा था। आगे चलकर एक विशालकाय तारा साथी तारे के समीप आया, किन्तु इसकी परिक्रमा की दिशा साथी तारे के विपरीत थी।

       इन दो तारों के बीच की दूरी सम्भवतः 48 से 64 लाख किमी० के बीच रही होगी। इस तरह विशालकाय तारा सूर्य से और अधिक दूर (साथी तारा तथा विशालकाय तारा के बीच की दूरी का कई गुना) रहा होगा जिस कारण विशालकाय तारे के ज्वारीय बल का प्रभाव सूर्य पर नहीं पड़ा, परन्तु साथी तारे पर ज्वारीय बल के कारण पदार्थ विशालकाय तारे की ओर आकर्षित होने (उभार) लगा। जैसे-जैसे विशालकाय तारा साथी तारे के करीब आता गया, आकर्षण बल बढ़ता गया और उभार अधिक होने लगा।

        जब विशालकाय तारा साथी तारे की निकटतम दूरी पर आ गया तो अधिकतम आकर्षण के कारण कुछ पदार्थ साथी तारे से अलग होकर विशालकाय तारे की दिशा में घूमने (साथी तारे की विपरीत दिशा) लगे। आगे चलकर इन पदार्थों से ग्रहों का निर्माण हुआ। प्रारम्भ में ग्रह करीब रहे होंगे तथा आपसी आकर्षण के कारण ग्रहों से पदार्थ निकलकर उनके उपग्रह बन गये होंगे जिसे निम्नांकित चित्रों में देखा जा सकता है-

रसेल की द्वैतारक
रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

         इस तरह युग्म तारे की कल्पना करके तथा सूर्य के स्थान पर साथी तारे से पदार्थ निस्सृत कराके ग्रहों तथा पृथ्वी की उत्पत्ति मानकर रसेल ने सूर्य तथा ग्रहों के बीच की वर्तमान दूरी तथा उनके कोणीय आवेग की समस्या का वैज्ञानिक स्तर पर समाधान कर दिखाया है।

आलोचना

(i) रसेल ने साथी तारे से निकले पदार्थ से ग्रहों की उत्पत्ति को समझाया है, परन्तु साथी तारे के अवशिष्ट भाग पर प्रकाश नहीं डाला है। अवशिष्ट भाग का क्या हुआ? कोई संतोषजनक हल नहीं दिया गया है।

(ii) निर्माण के समय ग्रह सूर्य से दू थे तथा एक-दूसरे दूर फैले थे, परन्तु विशालकाय तारे के भ्रमण पथ पर से आगे निकल जाने पर सभी ग्रह सूर्य की आकर्षण परिधि में आ गये, जबकि उसके सबसे करीब साथी तारे का अवशिष्ट भाग सूर्य के आकर्षण में नहीं आ सका। इस तरह विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रसेल ने इस समस्या का समाधान नहीं किया है।

(iii) यदि यह मान भी लिया जाय कि सभी ग्रह सूर्य की आकर्षण परिधि में आ गये, तो भी सेल विशद रूप में यह नहीं समझा पाते हैं कि किस प्रक्रिया द्वारा यह सम्भव हुआ।

3. Describe the importance of Crust on Earth.

पृथ्वी पर क्रस्ट के महत्त्व की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- भूपर्पटी (Crust):-

        यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% Crust में शामिल है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है। महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है। इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

★ भूपर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है। यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग, द्वितीयक तरंग, सतही तरंग, P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:- 

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

      महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला/खुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है। महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टाने पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

महत्त्व

        पृथ्वी की पपड़ी और अंतर्निहित कठोर आवरण स्थलमंडल का निर्माण करते हैं, जिसमें तेल और गैस सहित विभिन्न प्रकार के खनिज और चट्टानें शामिल हैं। अर्थव्यवस्था, समाज और पर्यावरण के विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग किए जाने वाले सभी कच्चे माल का 80% से अधिक खनिज इसी स्थलमंडल में पाए जाते है। उका उपयोग सड़कों, रेलवे ट्रैक, हवाई अड्डों, सुरंगों, नहरों, बांध स्थलों, ऊंची इमारतों, औद्योगिक बस्तियों, कृषि, आभूषण, चिकित्सा और कई अन्य प्रमुख निर्माण परियोजनाओं में होता है। इनकी मांग हर दिन अधिक होती जा रही है।

4. Explain the process of physical weathering.

भौतिक अपरदन की प्रक्रिया को समझाइए।

उत्तर- भौतिक ऋतुक्षरण में चट्टानें टूटती तो जरूर है साथ ही उनका भौतिक स्वरूप भी बदल जाता है, लेकिन उसमें रासायनिक परिवर्तन नहीं होता है। भौतिक ऋतुक्षरण तीन क्रियाओं से होता है

A. तुषार प्रक्रिया द्वारा

B. तापीय प्रक्रिया द्वारा

C. अपदलन प्रक्रिया द्वारा

A. तुषार प्रक्रिया द्वारा:-
     तुषार क्रिया में क्रमिक रूप से जल जमता और पिघलता रहता है। जब तापमान हिमांक से नीचे चला जाता है तब जल बर्फ में बदल जाता है और उसका आयतन बढ़ जाता है। एक घन सेंटीमीटर जब जल जमता है तो डेढ़ सौ किलोग्राम के बराबर चट्टानों पर प्रहार करता है। इससे स्पष्ट होता है कि तुषार की क्रिया चट्टानों को तोड़ने में सक्षम है। उच्च अक्षांशीय प्रदेश में और पर्वतीय भाग के ऊंचे क्षेत्रों में इस प्रकार की घटनाएं देखी जा सकती है।

B. तापीय प्रक्रिया द्वारा:-

     यह क्रिया मुख्यत: उष्ण एवं शीतोष्ण मरुस्थलीय क्षेत्र में सक्रिय रहती है। तापीय प्रभाव के कारण चट्टानें फैलती और सिकुड़ती है। अधिक तापमान पर चट्टानें फैलती है और निम्न तापमान पर सिकुड़ती है।

     मरुस्थलीय क्षेत्रों में तापमान दिन में अधिक हो जाता है और रात में अत्यधिक कम हो जाता है जिसके चलते चट्टानें टूटकर बालू का निर्माण करते हैं।

C. अपदलन प्रक्रिया द्वारा:-

     यह क्रिया ग्रेनाइट चट्टानों वाले क्षेत्र में होता है। ग्रेनाइट चट्टानी अगर बड़ी एवं मोटी हो तो तापीय प्रभाव के कारण चट्टान का ऊपरी भाग गर्म होकर फैल जाता है जबकि उसे चट्टान के आंतरिक भाग में तापमान कम रहने के कारण फैल नहीं पता है जिसके परिणामस्वरुप चट्टान का ऊपरी परत प्याज के छिलके की भांति टूटती रहती है। इसी प्रक्रिया को अपदलन कहते हैं। इसे प्याज ऋतुक्षरण भी कहा जाता है।

5. State the different types of rocks with example.

चट्टानों के विभिन्न प्रकार उदाहरण के साथ बताइए।

उत्तर-

     चट्टानों के प्रकार (Types of Rocks)

         उत्पत्ति के आधार पर चट्टानों को तीन भागों में बांटा गया है-

1. आग्नेय (Igneous) 

2. अवसादी (Sedimentary) 

3. कायांतरित (Metamorphic)

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks):-

     आग्नेय चट्टानों का निर्माण मैग्मा के ठंडा होकर जमने एवं ठोस होने से होता है। चूंकि सर्वप्रथम इसी चट्टान का निर्माण हुआ, अतः इसे प्राथमिक चट्टान (Primary Rock) भी कहा जाता है। ये आधारभूत चट्टानें हैं, जिनसे परतदार एवं रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है।

चट्टानें
आग्नेय चट्टान
आग्नेय चट्टान

ये चट्टानें रवेदार (Crystalline) होती हैं। जब मैग्मा धरातल पर आकर ठंडा होता है, तब तीव्र गति से ठंडा होने के कारण चट्टानों के रवे बहुत बारीक होते हैं, जैसे- बेसाल्ट। इसके विपरीत जब मैग्मा धरातल के नीचे ठंडा होता है, तब धीरे-धीरे जमने के कारण रवे बड़े-बड़े होते हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

⇒ ये चट्टानें तुलनात्मक रूप से कठोर होती हैं, इनमें जल काफी कठिनाई से जोड़ों के सहारे ही अंदर प्रविष्ट हो पाता है।

⇒ इनमें परत का अभाव होता है, परंतु जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ आग्नेय चट्टानों में जीवों के अवशेष (Fossils) का अभाव होता है।

⇒ ज्वालामुखी चट्टानों में रवों का विकास नहीं होने पर उनका गठन कांच की तरह (Glassy) होता है, जैसे ऑब्सीडियन।

⇒ आग्नेय चट्टानों के उदाहरण- ग्रेनाइट, रायोलाइट, बेसाल्ट, पेग्माटाइट (Pegmatite), साइनाइट (Syenite), डायोराइट (Diorite), एण्डेसाइट (Andesite), गैब्रो (Gabro), डोलेराइट (Dolerite), पेरिडोटाइट (Peridotite) आदि हैं।

2. अवसादी/तलछटी/परतदार चट्टानें (Sedimentary or Stratified Rocks):-

         ये वे चट्टानें हैं जिनका निर्माण विखण्डित ठोस पदार्थों, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों के जमाव से होता है।

अवसादी चट्टान

⇒ इन चट्टानों में अवसादों की विभिन्न परतें पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जीवावशेष (Fossils) पाये जाते हैं।

⇒ धरातल का 75% भाग अवसादी चट्टानों से ढका हुआ है एवं शेष 25% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से आवृत्त है।
⇒ यद्यपि अवसादी चट्टानें धरातल का अधिकांश भाग आवृत्त किये हुए हैं, फिर भी भूपटल के निर्माण में इनका योगदान 5% ही है, शेष 95% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से निर्मित है। इस प्रकार परतदार चट्टानों का महत्त्व क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से है, भू-पृष्ठ में गहराई की दृष्टि से नहीं।

⇒ ये चट्टानें रवेदार नहीं होती हैं।

⇒ ये चट्टानें क्षैतिज रूप में बहुत कम पाई जाती हैं। पार्श्ववर्ती दबाव के कारण परतों में मोड़ पड़ जाता है अतएव ये चट्टानें सामूहिक रूप से अपनति एवं अभिनति के रूप में पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ ये चट्टानें प्रायः मुलायम होती हैं (जैसे- चीका मिट्टी, पंक आदि), परन्तु ये कड़ी भी हो सकती हैं (जैसे- बलुआ पत्थर)।

⇒ ये शैलें अधिकांशतः प्रवेश्य (Porous) होती हैं, परंतु चीका मिट्टी जैसी परतदार चट्टानें अप्रवेश्य भी हो सकती हैं।

⇒ इनका निर्माण अधिकांशतः जल में होता है। परंतु लोएस जैसी परतदार चट्टानों का निर्माण पवन द्वारा जल के बाहर भी होता है। बोल्डर क्ले (Boulder Clay) या टिल (Till) हिमानी द्वारा निक्षेपित परतदार चट्टानों के उदाहरण हैं, जिसमें विभिन्न आकार के चट्टानी टुकड़े मौजूद रहते हैं।

3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks):-

          जब ताप, दबाव, रासायनिक क्रियाओं आदि के प्रभाव से आग्नेय एवं परतदार चट्टानों का रूप परिवर्तित हो जाता है, तो रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है। कभी-कभी रूपांतरित चट्टानों का भी रूपांतरण हो जाता है। इस क्रिया को पुनःरूपान्तरण कहा जाता है। रूपांतरण के फलस्वरूप चट्टानों की मूलभूत विशेषताएं जैसे- घनत्व, रंग, कठोरता, बनावट, खनिजों का संघटन आदि आंशिक या पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती हैं।

कायांतरित चट्टान

कायांतरित चट्टानों के उदाहरण

⇒ आग्नेय से कायांतरित चट्टान-

ग्रेनाइट- नीस,

बेसाल्ट- एम्फी बोलाइट

ग्रेबो- सर्पेन्टइन

⇒ अवसादी से कायांतरित चट्टानें-

बालुवा पत्थर- क्वार्टजाइट,

चूना पत्थ– संगमरमर,

शेल- स्लेट,

कोयला-  ग्रेफाइट, हीरा,

⇒ रूपांतरित चट्टान से पुन: रूपांतरित चट्टान

स्लेट- शिष्ट

शिष्ट- फायलाइट

6. Explain the different types of plate in plate tectonic theory.

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत में बताए गए विभिन्न प्लेटों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- प्लेटों का स्वभाव:-
      इस परिकल्पना के अनुसार प्लेटों की अधिकतम मोटाई 100 KM और न्यूनतम मोटाई 5 KM तथा औसत मोटाई 70 KM है। अमेरिकी अर्थ साइंस के अनुसार पृथ्वी 7 बड़े और 6 छोटे प्लेट निम्नलिखित है-
प्रमुख प्लेट- 7
1. प्रशांत महासागरीय प्लेट
2. उ० अमेरिकी प्लेट
3. द० अमेरिकी प्लेट
4. अफ्रीकन प्लेट
5. युरेशियन प्लेट
6. इण्डियन प्लेट
7. अंटार्कटिका प्लेट
गौण प्लेट- 6
(a) अरेबियन प्लेट
(b) फिलीपींस /फिलीपाइन प्लेट
(c) कोकस प्लेट
(d) नास्का प्लेट
(e) स्कोशिया प्लेट
(f) कैरेबियन प्लेट
Plate Tectonic Theory
     इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों को दो भागों में बांटा जाता है–
1. स्थिर प्लेट
2. गतिशील प्लेट 
       
            स्थिर प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे नहीं चल रही है जबकि गतिशील प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे चल रही है। 
       संरचना के दृष्टिकोण से प्लेट दो प्रकार के होते है- 
1. महासागरीय प्लेट
2. महाद्वीपीय  प्लेट
         
        महासागरीय प्लेट बैसाल्ट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व अधिक है जबकि महाद्वीपीय प्लेट ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व कम है
सीमा या सीमांत
        इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों के मिलन स्थल को प्लेट के सीमा या सीमांत कहते है। इसके अनुसार प्लेट में 3 प्रकार की सीमाएं बांटी जाती है। इसे  निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-

7. What is Tsunami?

सुनामी किसे कहते हैं?

       भूकंप और ज्वालामुखी से महासागरीय धरातल मे अचानक हलचल पैदा होती है और महासागरीय जल का अचानक विस्थापन होता है। परिणामस्वरूप समुद्री जल में उर्ध्वाधर ऊँची तरंगे पैदा होती है, इन्हें ही सुनामी या भूकम्पीय समुद्री लहरें कहा जाता है।  अर्थात समुद्र के अंदर उत्पन्न होने वाले भूकंप को सूनामी (Tsunami) कहते है।

★ सूनामी जापानी शब्द है जिसका अर्थ समुद्री तरंग होता है।      

सुनामी का कारण

        समुद्र जल कभी भी शांत नही रहता है। समुद्री जल मे हलचल होना स्वाभाविक है। भूकंप और ज्वालामुखी का समुद्री क्षेत्रों मे आना ही सुनामी आपदा का प्रमुख कारण है। जब समुद्री क्षेत्रों के धरातल मे अचानक ज्वालामुखी या भूकम्प के उदभेदन की क्रिया होती है तो समुद्र जल मे गतिशीलता बढ़ती है जिसके कारण समुद्री जल में ऊँची तरंगे उत्पन्न होती है जो तटीय क्षेत्रों में विनाश का कारण बनती है।

GROUP-C/ समूह-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marksk. [10×3=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए । प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

8. Discuss the internal structure of the Earth with suitable diagrams.

पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सचित्र चर्चा कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवम भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

⇒ सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः प्रत्येक 32 मी० की गहराई पर 1℃  तापमान में बढ़ोतरी होती है।

      स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

Internal Structure of The Earth

(1) सियाल (SIAL) 

            पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SIMA)

     स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NIFE)

          पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

         भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सबसे अधिक वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। जिसके अनुसार पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा गया है –

1. भूपर्पटी (Crust)

2. भूप्रावर (Mantle)

3. क्रोड (Core)

(1) भूपर्पटी (Crust):-

          यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% Crust में शामिल है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है। महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है। इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

★ भूपर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है। यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग, द्वितीयक तरंग, सतही तरंग, P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:- 

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

       महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला/खुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है। महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टाने पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

(2) भुप्रावार (Mantle):-

        भूप्रावार की मोटाई मोहो असम्बद्धता से 2900 KM तक है। पृथ्वी के कुल आयतन का 83% और कुल द्रव्यमान का 68% भाग भूप्रावार में शामिल है। यह अधिक तापमान के कारण पिघली हुई अवस्था (द्रव) के समान है। भूप्रावार पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग  तो संचरित होती है लेकिन द्वितीयक तरंग विलुप्त हो जाती है। इसका निर्माण सिलिकन & मैग्नेशियम जैसे तत्वों से हुआ है। भूप्रावार का घनत्व 3 से 5.5 तक मानी जाती है । 

★ भूपर्पटी और भूप्रावार के बीच एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे मोहोअसम्बद्धता (Moho Discontinuty) कहते है।

★ क्रस्ट और मेंटल के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमण्डल/लिथोस्फेयर कहा जाता है।

★ स्थलमण्डल के नीचे वाले मण्डल को दुर्बलमण्डल (Aestheno Sphere) कहते है। होम्स ने बताया कि दुर्बलमण्डल में ही संवहन तरंगे चलती है। ये तरंगे इतनी शक्तिशाली होती है जो स्थलमण्डल को तोड़ने एवं मोड़ने की क्षमता रखती है।

Internal Structure of The Earth
चित्र: पृथ्वी की आतंरिक संरचना

(3) क्रोड(Core)/अंतरतम:-   

         यह पृथ्वी का केंद्रीय भाग है। इसका घनत्व -10 से 13.6 g/cm3 है। पृथ्वी के कुल आयतन का 16% एवं द्रव्यमान का 32% भाग क्रोड में शामिल है। क्रोड पृथ्वी का वह मण्डल है जसमें केवल प्राथमिक तरंगे गुजरती है। यह मण्डल निकेल & लोहा से निर्मित है। इसी कारण से पृथ्वी में चुम्बकीय गुण है। क्रोड अत्याधिक दबाव के कारण ठोस भाग के रूप में परिणत हो चुका है। क्रोड की औसत मोटाई 3471 KM है। Mantle और Core के बीच में एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे गुटेनबर्ग असम्बद्धता कहते हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को नीचे के चित्रों में भी देखा जा सकता है।

निष्कर्ष:-

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संबंध में भूकम्पीय तरंग सबसे अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।

9. What is weathering and its different types?

अपरदन एवं उसके विभिन्न प्रकार क्या हैं?

उत्तर– अपरदन वह क्रिया है जिसमें गतिशील अभिकरणों (Mobile Agencies) द्वारा शिलाखंडों का स्थानांतरण होता है। अपरदन के अंतर्गत तीन क्रियाएं सन्निहित हैं।

(क) परिवहन या अपनयन (Transportation):-

        इसमें ऋतुक्षरित चट्टानें कमजोर होकर अपरदन के दूतों के द्वारा बहाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है और निम्न भागों में निक्षेपण का कार्य किया जाता है स्रोत क्षेत्र से चट्टानों को उठाकर दूसरे स्थान पर पहुंचा देने वाले कारकों को अपरदन का दूत (बहता हुआ जल, भूमिगत जल, हिमानी, शुष्क वायु, समुद्री तरंग) कहा जाता है।    

(ख) अपघर्षण (Corrasion):-

     जब चट्टानों के टुकड़े अपरदन की शक्तियों (बहता जल, हिमानी, पवन आदि) द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाये जाते हैं तो वे धरातल की सतह को घिसते एवं काटते रहते हैं, इसे ही अपघर्षण कहा जाता है।

(ग) निक्षेपण (Deposition):-

        अपरदन के विभिन्न कारक परिवहन कार्य करने के बाद अपने साथ लाये गये मलबे को अपनी वाहन शक्ति के अनुसार जगह-जगह छोड़ते जाते हैं, जिसे निक्षेपण कहते हैं। निक्षेपण क्रिया से धरातल ऊंचा-नीचा हो जाता है। इस कार्य को बहता हुआ नदी, भूमिगत जल, हिमानी, वायु तथा सागरीय लहरें सम्पन्न करती हैं। निक्षेपण की इस अवस्था में धरातल पर विभिन्न भू-आकृतियों का जन्म एवं विकास होता है। 

अपरदन के प्रकार

    अपरदन के विभिन्न रूप अपरदन की भिन्न-भिन्न क्रियाओं में सम्पन्न होते हैं, जिसका विवरण निम्नलिखित है:-

(i) सन्नीघर्षण (Attrition):-

        एक ही प्रकार के चट्टानों का आपस में टकराना और टूटना सन्नीघर्षण कहलाता है।

(ii) अपघर्षण (Abrasion or corrasion):-

       जब दो विभिन्न प्रकार के चट्टान आपस में टकराकर टूटते हैं तो अपघर्षण कहलाता है।

(iii) उत्पाटन (Plucking):-

      अपरदन के दूतों के द्वारा चट्टानों को उखाड़ कर फेंकना उत्पाटन कहलाता है।

(iv) अपवाहन (Deflation):-

         वायु के द्वारा चट्टानों का उड़ा कर ले जाना अपवाहन कहलाता है।  यह क्रिया शुष्क मरुस्थलीय भागों में अधिक होती है। 

(v) स्थानांतरण या भूस्खलन (Landslide):-

          गुरुत्वाकर्षण बल के कारण चट्टानों का ऊपर से नीचे गिरना या खिसकना स्थानांतरण कहलाता है। 

(vi) अपक्षालन (Leaching):-

        अपरदन के दूतों के द्वारा छोटे एवं महीन चट्टानी कणों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाना अपक्षालन कहलाता है।

(vii) संक्षारण (corrosion):-

       रासायनिक प्रतिक्रिया के द्वारा चट्टानों का टूटना और दूसरे स्थान पर जमा करना संक्षारण कहलाता है। इस प्रकार संक्षारण रासायनिक क्षरण की एक प्रक्रिया है।

(viii) जलगति क्रिया (Hydraulic Action):-

            यह एक यान्त्रिक क्रिया है। इसमें बहता हुआ जल अपने वेग तथा दबाव के कारण मार्ग में स्थित चट्टानी कणों को अपने साथ बहाकर ले जाता है।   

10. Explain the different tyeps of rocks and its importance.

चट्टानों के विभिन्न प्रकार तथा उनके महत्त्व के बारे में व्याख्या कीजिए।

उत्तर- भू-पटल निर्माण करने वाले पदार्थों को चट्टान कहते है अर्थात भू-पटल का निर्माण चट्टानों से हुआ है। चट्टानें मुख्यतः खनिजों के संयोग से बनती हैं, अर्थात् चट्टानें खनिजों का समुच्चय हैं।

      पृथ्वी पर लगभग 200 प्रकार के खनिज पाये जाते हैं। इनमें 24 ऐसे हैं, जो मुख्यतः भू-पृष्ठ की चट्टानों का निर्माण करते हैं। अत: इन्हें चट्टान निर्माणक खनिज कहा जाता है। ये खनिज मुख्यतः सिलिकेट, ऑक्साइड एवं कार्बोनेट के रूप में पाये जाते हैं। इन चट्टान निर्माणकारी खनिजों में सिलिकेट सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है एवं इसके बाद ऑक्साइड का स्थान आता है। जैव पदार्थों से निर्मित चट्टानों में खनिज नहीं मिलता है, जैसे- कोयला। चट्टानें पत्थर की तरह कड़ी एवं पंक की तरह मुलायम हो सकती हैं।

चट्टानों के प्रकार (Types of Rocks)

         उत्पत्ति के आधार पर चट्टानों को तीन भागों में बांटा गया है-

1. आग्नेय (Igneous) 

2. अवसादी (Sedimentary) 

3. कायांतरित (Metamorphic)

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks):-

     आग्नेय चट्टानों का निर्माण मैग्मा के ठंडा होकर जमने एवं ठोस होने से होता है। चूंकि सर्वप्रथम इसी चट्टान का निर्माण हुआ, अतः इसे प्राथमिक चट्टान (Primary Rock) भी कहा जाता है। ये आधारभूत चट्टानें हैं, जिनसे परतदार एवं रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है।

चट्टानें
आग्नेय चट्टान
आग्नेय चट्टान

ये चट्टानें रवेदार (Crystalline) होती हैं। जब मैग्मा धरातल पर आकर ठंडा होता है, तब तीव्र गति से ठंडा होने के कारण चट्टानों के रवे बहुत बारीक होते हैं, जैसे- बेसाल्ट। इसके विपरीत जब मैग्मा धरातल के नीचे ठंडा होता है, तब धीरे-धीरे जमने के कारण रवे बड़े-बड़े होते हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

⇒ ये चट्टानें तुलनात्मक रूप से कठोर होती हैं, इनमें जल काफी कठिनाई से जोड़ों के सहारे ही अंदर प्रविष्ट हो पाता है।

⇒ इनमें परत का अभाव होता है, परंतु जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ आग्नेय चट्टानों में जीवों के अवशेष (Fossils) का अभाव होता है।

⇒ ज्वालामुखी चट्टानों में रवों का विकास नहीं होने पर उनका गठन कांच की तरह (Glassy) होता है, जैसे ऑब्सीडियन।

⇒ आग्नेय चट्टानों के उदाहरण- ग्रेनाइट, रायोलाइट, बेसाल्ट, पेग्माटाइट (Pegmatite), साइनाइट (Syenite), डायोराइट (Diorite), एण्डेसाइट (Andesite), गैब्रो (Gabro), डोलेराइट (Dolerite), पेरिडोटाइट (Peridotite) आदि हैं।

आग्नेय चट्टान के प्रकार

        स्थिति एवं संरचना के अनुसार आग्नेय चट्टानें दो प्रकार की होती हैं-

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)-

          वह आग्नेय चट्टानें जिनका निर्माण सतह के ऊपर लावा के ठंडा होने और जमने से होता है, बहिर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं। इनमें क्रिस्टल बहुत छोटे होते हैं क्योंकि लावा तेजी से जम जाता है। बेसाल्ट एवं रायोलाइट इसका अच्छा उदाहरण है। इस चट्टान की क्षरण से ही काली मिट्टी का निर्माण होता है जिसे रेगुड़ (Regur) कहते हैं।

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)-

        वह आग्नेय चट्टानें जो सतह के नीचे लावा के ठंडे और ठोस होने से निर्मित होती है,अंतर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती है।

      इसके दो पुन: उपवर्ग हैं-

(a) पातालिय चट्टान (Plutonic Rock)

         इसका निर्माण पृथ्वी के अंदर काफी अधिक गहराई पर होता है। इसका नामकरण प्लूटो (यूनानी देवता) के नाम पर किया गया है। जो पाताल के देवता माने जाते हैं।अत्यधिक धीमी गति से ठंडा होने के कारण इसके क्रिस्टल बड़े बड़े होते हैं। ग्रेनाइट चट्टान इसका उदाहरण है।

(b) मध्यवर्ती चट्टान (Hypobyssal Rock)

        ज्वालामुखी के उदगार के समय धरातलीय अवरोध के कारण लावा दरारों, छिद्रों एवं नली में ही जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है, बाद में अपरदन की क्रिया के बाद यह चट्टाने धरातल पर नजर आने लगती है। डोलेराइट, मैग्नेटाइट इन चट्टानों के महत्वपूर्ण उदाहरण है।
मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानों के विभिन्न रूप

            जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर भूपटल के नीचे ही ठंडा होने की प्रवृति रखता है। तब आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति का निर्माण होता है। जैसे–Volcano

जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तो डाइक, क्षैतिज ठोस होता है तो सिल, जब उत्तल दर्पण के समान ठोस होता है तो लैकोलिथ, जब अवतल दर्पण के समान ठोस होता है तो लोपोलिथ, जब तरंग के समान ठोस होता है तो फैकोलिथ स्थलाकृति का निर्माण होता है। इसी तरह जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससे बैथोलिथ का निर्माण होता है।

⇒ रासायनिक संरचना की दृष्टि से आग्नेय चट्टानों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) अम्लीय चट्टानें (Acid Rocks)-

         इनमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। इनका रंग हल्का होता है। ये चट्टानें अपेक्षाकृत हल्की होती हैं, जैसे-ग्रेनाइट।

(ii) क्षारीय चट्टानें (Basic Rocks)-

       इनमें सिलिका की मात्रा कम होती है। इनमें फेरो-मैग्नेशियम की प्रधानता होती है। लोहे की अधिकता के कारण इन चट्टानों का रंग गहरा होता है। इनका घनत्व भी अधिक होता है, जैसे-गैब्रो, बेसाल्ट, रायोलाइट आदि।

⇒ पूर्व की चट्टानों के ऊपर स्थित बेसाल्ट चट्टान टोपी (Caps) के समान दिखाई पड़ता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को ‘मेसा’ (Mesa) कहा जाता है।

⇒ अपरदन के कारण मेसा का अधिकांश भाग कट जाता है एवं उसका आकार छोटा होने लगता है। अत्यंत छोटी आकार वाली ‘मेसा’ को ‘बुटी’ (Butte) कहा जाता है।

⇒ धरातल के नीचे परतदार चट्टानों के बीच स्थित लावा गुम्बद (जैसे लैकोलिथ) के ऊपर की मुलायम चट्टानें अपरदन द्वारा नष्ट होती जाती हैं। इस प्रकार लावा गुम्बद धरातल पर दिखने लगता है एवं यह अवरोधक (Resistant) चट्टान संकरी एवं लंबी कटक में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को “होगबैक’ (Hogback) कहा जाता है।

⇒ हौगबैक से मिलती-जुलती एक स्थलाकृति, जिसका ढाल एवं डिप (Dip) झुका हुआ हो ‘कवेस्टा’ (Questa) कहलाती है।

2. अवसादी/तलछटी/परतदार चट्टानें (Sedimentary or Stratified Rocks):-

         ये वे चट्टानें हैं जिनका निर्माण विखण्डित ठोस पदार्थों, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों के जमाव से होता है।

अवसादी चट्टान

⇒ इन चट्टानों में अवसादों की विभिन्न परतें पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जीवावशेष (Fossils) पाये जाते हैं।

⇒ धरातल का 75% भाग अवसादी चट्टानों से ढका हुआ है एवं शेष 25% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से आवृत्त है।
⇒ यद्यपि अवसादी चट्टानें धरातल का अधिकांश भाग आवृत्त किये हुए हैं, फिर भी भूपटल के निर्माण में इनका योगदान 5% ही है, शेष 95% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से निर्मित है। इस प्रकार परतदार चट्टानों का महत्त्व क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से है, भू-पृष्ठ में गहराई की दृष्टि से नहीं।

⇒ ये चट्टानें रवेदार नहीं होती हैं।

⇒ ये चट्टानें क्षैतिज रूप में बहुत कम पाई जाती हैं। पार्श्ववर्ती दबाव के कारण परतों में मोड़ पड़ जाता है अतएव ये चट्टानें सामूहिक रूप से अपनति एवं अभिनति के रूप में पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ ये चट्टानें प्रायः मुलायम होती हैं (जैसे- चीका मिट्टी, पंक आदि), परन्तु ये कड़ी भी हो सकती हैं (जैसे- बलुआ पत्थर)।

⇒ ये शैलें अधिकांशतः प्रवेश्य (Porous) होती हैं, परंतु चीका मिट्टी जैसी परतदार चट्टानें अप्रवेश्य भी हो सकती हैं।

⇒ इनका निर्माण अधिकांशतः जल में होता है। परंतु लोएस जैसी परतदार चट्टानों का निर्माण पवन द्वारा जल के बाहर भी होता है। बोल्डर क्ले (Boulder Clay) या टिल (Till) हिमानी द्वारा निक्षेपित परतदार चट्टानों के उदाहरण हैं, जिसमें विभिन्न आकार के चट्टानी टुकड़े मौजूद रहते हैं।

3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks):-

          जब ताप, दबाव, रासायनिक क्रियाओं आदि के प्रभाव से आग्नेय एवं परतदार चट्टानों का रूप परिवर्तित हो जाता है, तो रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है। कभी-कभी रूपांतरित चट्टानों का भी रूपांतरण हो जाता है। इस क्रिया को पुनःरूपान्तरण कहा जाता है। रूपांतरण के फलस्वरूप चट्टानों की मूलभूत विशेषताएं जैसे- घनत्व, रंग, कठोरता, बनावट, खनिजों का संघटन आदि आंशिक या पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती हैं।

कायांतरित चट्टान

कायांतरित चट्टानों के उदाहरण

⇒ आग्नेय से कायांतरित चट्टान-

ग्रेनाइट- नीस,

बेसाल्ट- एम्फी बोलाइट

ग्रेबो- सर्पेन्टइन

⇒ अवसादी से कायांतरित चट्टानें-

बालुवा पत्थर- क्वार्टजाइट,

चूना पत्थ– संगमरमर,

शेल- स्लेट,

कोयला-  ग्रेफाइट, हीरा,

⇒ रूपांतरित चट्टान से पुन: रूपांतरित चट्टान

स्लेट- शिष्ट

शिष्ट- फायलाइट

11. Discuss the plate tectonic theory with suitable diagrams.

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का सचित्र विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर- प्लेट विवर्तनिकी एक ऐसा सिद्धान्त है जो भू-भौतिकी से संबंधित अनेक घटनाओं जैसे-पर्वत निर्माण, ज्वालामुखी क्रिया इत्यादि के संबंध में व्यक्त किये गये सभी परम्परागत सिद्धान्तों का परित्याग कर नया विचार प्रस्तुत करता है।

      इस परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी का ऊपरी भाग दृढ़ भूखंडों से निर्मित है। ये भूखंड कई भागों में विभक्त है, इसके एक भाग को प्लेट से संबोधित करते है। सर्वप्रथम वर्ष 1955 में कनाडा के भू-वैज्ञानिक जे. टूजो विल्सन (J-Tuzo Wilson) ने ‘प्लेट’ शब्द का प्रयोग किया था। इन प्लेटों के  स्वभाव और प्रवाह से संबंधित अध्ययन को ही प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त  कहते है। यह सिद्धांत किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित नहीं है बल्कि इसमें कई विद्धानों का योगदान है। लेकिन हैरिहस महोदय ने इन सभी विचारों को संगठित कर एक सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत किया। 
प्लेटों का स्वभाव
       इस परिकल्पना के अनुसार प्लेटों की अधिकतम मोटाई 100 KM और न्यूनतम मोटाई 5 KM तथा औसत मोटाई 70 KM है। अमेरिकी अर्थ साइंस के अनुसार पृथ्वी 7 बड़े और 6 छोटे प्लेट निम्नलिखित है-
प्रमुख प्लेट- 7
1. प्रशांत महासागरीय प्लेट
2. उ० अमेरिकी प्लेट
3. द० अमेरिकी प्लेट
4. अफ्रीकन प्लेट
5. युरेशियन प्लेट
6. इण्डियन प्लेट
7. अंटार्कटिका प्लेट
गौण प्लेट- 6
(a) अरेबियन प्लेट
(b) फिलीपींस /फिलीपाइन प्लेट
(c) कोकस प्लेट
(d) नास्का प्लेट
(e) स्कोशिया प्लेट
(f) कैरेबियन प्लेट
Plate Tectonic Theory
      इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों को दो भागों में बांटा जाता है–
1. स्थिर प्लेट
2. गतिशील प्लेट 
       
        स्थिर प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे नहीं चल रही है जबकि गतिशील प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे चल रही है। 
       
संरचना के दृष्टिकोण से प्लेट दो प्रकार के होते है- 
1. महासागरीय प्लेट
2. महाद्वीपीय  प्लेट
            महासागरीय प्लेट बैसाल्ट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व अधिक है जबकि महाद्वीपीय प्लेट ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व कम है।
सीमा या सीमांत         
       
        इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों के मिलन स्थल को प्लेट के सीमा या सीमांत कहते है। इसके अनुसार प्लेट में 3 प्रकार की सीमाएं बांटी जाती है। इसे  निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-
 प्लेटों के संचालन शक्तियाँ
              इस सिद्धांत के अनुसार सभी प्लेट पृथ्वी के अक्ष का अनुसरण करते हुए पूरब से पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हो रही है। प्लेटों में गति हेतु कई कारक उत्तरदायी माना गया है। जैसे- पृथ्वी के घूर्णन गति, प्लवनशीलता बल, गुरुत्वाकर्षण बल और प्लेटों का 45° पर प्रत्यावर्तन, सूर्य एवं चन्द्रमा का ज्वारीय बल, संवहन तरंग आदि।
                  इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों में 3 प्रकार के गतियाँ पायी जाती है। जैसे – निर्माणकारी गति की उत्पत्ति अपसरण सीमा के सहारे होती है, विनाशकारी गति की उत्पति अभिसारी सीमा के सहारे तथा संरक्षी गति संरक्षी सीमा के सहारे उत्पन्न होता है।
प्लेटों का क्रियाविधि
         उठती हुई संवहन तरंगे अपसरण सीमा को जन्म देती है। इसी सीमा के सहारे दरार का निर्माण होता है। इन दरारों से ही दुर्बलमंडल से लावा/मैग्मा निकलती है, जिससे ज्वालामुखी क्रिया होती है। गिरती हुई संवहन तरंगे अभिसारी सीमा का निर्माण करती है। इस सीमा के सहारे अधिक घनत्व वाले प्लेट कम घनत्व वाले प्लेट में घुसने की प्रवृति रखती है। प्लेट अत्यधिक अंदर जाकर पिघलती है और “बेनी ऑफ जोन” निर्माण करती है तथा चट्टानों के वलन के साथ-साथ ज्वालामुखी का उदगार भी होता है। इसे निम्न चित्र से समझा जा सकता है-
इस सिद्धांत के पक्ष में प्रस्तुत किये गए प्रमाण 
           
         प्लेट विवर्तनिकी के समर्थन में निम्नलिखित प्रमाण प्रस्तुत किये गए है-
1. ज्वालामुखी विश्व के ज्वालामुखी वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी क्रियाएं अभिसारी प्लेट सीमा के सहारे होती है।
2. भूकम्प भूकम्पीय वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित क्षेत्रों में आती है। ये क्षेत्र संरक्षी प्लेट सीमा के सहारे स्थित है।
3. सागर नितल प्रसार और पुराचुमकत्व– सागर नितल प्रसार सिद्धान्त से स्पष्ट है कि सागर नितल प्रसार अपसारी सीमा के सहारे हो रही है तथा नवीन चट्टानों में पुराचुमकत्व का गुण कम तथा पुराने चाट्टानों में चुमकत्व का गुण अधिक पाया जाता है।
4. भूगर्भिक समस्याओं का समाधान  
           प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के माध्यम से कई भूगर्भिक समस्याओं का समाधान होता है। जैसे- पर्वतों के उत्त्पति, भूकंप, भूसंचालन, महाद्विपीय विखण्डन, समुद्री नितल प्रसार, पुराचुमकत्व, द्वीपीय चाप के निर्माण आदि।
आलोचना
        उपरोक्त विशेषताओं के वाबजूद इस सिद्धांत की कई खामियां है। जैसे –  प्लेटों की संख्या का स्पष्ट पता नहीं चल पाता है, प्लेटों में संवहन तरंगे क्यों उत्पन्न होती है?, हरसिनियन और कैलिडोनियन युग के पर्वतों की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं करता है, बेनी ऑफ जोन से निकलने वाला मैग्मा पदार्थ के परिणाम का वैज्ञानिक व्याख्या नहीं करता।   

         इन सीमाओं के वाबजूद भूगर्भ विज्ञान का एक क्रांतिकारी विचार है क्योंकि भूपटल से संबंधित सभी भूगर्भिक घटनाओं का एक बार में ही व्याख्या प्रस्तुत करता है।

12. State the different types of Earthquake and its distribution around the world.

भूकंप के प्रकार बताते हुए, उनके विश्व वितरण को समझाइए।

उत्तर- भूकम्प दो शब्दों के मिलने से बना है-भू + कम्प

भू=भूपटल 

 कम्प=कम्पन

          इस प्रकार भूपटल में उत्पन्न होने वाला किसी भी प्रकार के कम्पन को भूकम्प कहते है। 

★ समुद्र के अंदर उत्पन्न होने वाले भूकंप को सूनामी (Tsunami) कहते है।

★ सूनामी जापानी शब्द है जिसका अर्थ समुद्री तरंग होता है।

★ विज्ञान की वह शाखा जिसमें भूकम्प का अध्ययन किया जाता है उसे सिस्मोलोजी (Seismology) कहते है। 

★ भूपटल के जिस बिंदु से भूकम्प प्रारंभ होती है। उसे भूकम्प केंद्र (Focus) कहते है।

अधिकेंद्र- भूपटल के जिस बिंदु पर भूकम्प का झटका सबसे पहले अनुभव होता है उसे अधिकेंद्र कहते है।

प्रघात (Shocks)– अधिकेंद्र पर भूकम्पीय तरंग के द्वारा अनुभव किया गया पहला भूकम्पीय झटका को प्रघात कहते है । जब भूकंप समाप्त हो जाता है तो कई दिनों तक हल्के भूकम्प के झटके महसूस किए जाते है उसे After Shock कहा जाता है।

 भूकम्प के प्रकार

      भूकम्प का वर्गीकरण दो आधार पर किया जाता है:-

(A) गहराई के आधार पर

(B) समय के आधार पर

       गहराई के आधार पर भूकम्प तीन प्रकार के होते है–

I. छिछला भूकम्प– फोकस 70 KM से ऊपर होता है।

II. मध्यम भूकम्प– फोकस 70-300 KM के बीच

III. गहरा भूकम्प– फोकस 300-700 KM के बीच

(C) समय के आधार पर

        समय के आधार पर भूकम्प तीन प्रकार के होते है:-

I. धीमा भूकम्प

II. अचानक भूकम्प

   धीमा भूकम्प की तीव्रता कम होती है लेकिन इसके झटके लम्बे समय तक अनुभव किये जाते है। ऐसे भूकम्प से ही वलित पर्वत तथा पठारों का निर्माण होता है।

 अचानक भूकम्प की तीव्रता अधिक होती है। इसके झटके अति उच्च समय तक अनुभव किये जाते है। इसके चलते इससे ज्वालामुखी पर्वत तथा ब्लॉक पर्वत का निर्माण होता है।

★ विश्व में सर्वाधिक छिछले उदगम वाले भूकम्प होते हैं जिसका प्रभाव लम्बे समय तक होता है।

भूकम्प का वितरण

     विश्व में मुख्यतः भूकम्प के तीन क्षेत्र है:-

(i) प्रशांत महासागर के चारों ओर– विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में ही आती है। यहाँ अधिकांश गहरे केंद्र वाले भूकम्प आते है।

(ii) मध्य महाद्विपीय क्षेत्र– यह क्षेत्र यूरेनियम प्लेट और इसके दक्षिण में स्थित भारतीय प्लेट तथा अफ्रीकन प्लेट के मध्य स्थित है। यहाँ मध्यम एवं छिछले किस्म के भूकम्प आते है।

(iii) मध्य अटलांटिक कटक एवं पूर्वी अफ्रीका के भ्रंश घाटी क्षेत्र- अटलांटिक महासागर में अपसरण सीमा के सहारे भूकम्प आती है जिसका विस्तार आइसलैंड से अंटार्कटिका तक हुआ है।

13. Define Volcano and explain the different landforms formed by volcanic activities.

ज्वालामुखी की परिभाषा देते हुए, ज्वालामुखी क्रिया से संबंधित भूदृश्यों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- ज्वालामुखी क्रिया:- ज्वालामुखी क्रिया दो शब्दों सेे मिलकर बना है। प्रथम ज्वालामुखी, द्वितीय क्रिया। पुनः ज्वालामुखी शब्द को भी दो भागों में बांटा जा सकता है:- प्रथम ज्वाला द्वितीय मुखी।

            जब पृथ्वी के भूपटल में किसी भी प्रकार का छिद्र का निर्माण होता है तो उसे मुख कहते है, जब उस मुख से पृथ्वी के दुर्बल मण्डल का मैग्मा पदार्थ जल एवं बाष्प बाहर की ओर निकलता है तो उसे ज्वाला कहते है। ज्वाला और मुख को सम्मिलित रूप से ज्वालामुखी कहते है।

           क्रिया का तात्पर्य विभिन्न प्रकार के प्रक्रियाओं से है। ज्वालामुखी उदगार में निकलने वाला पदार्थ भुपटल के ऊपर निकलने का प्रयास करता है या निकल जाता है पुनः निकलकर अनेक प्रकार के स्थलाकृतियों को जन्म देता है। इस सम्पूर्ण परिघटना को ही ज्वालामुखी क्रिया (Volcanism) कहा जाता है।

       ज्वालामुखी क्रिया शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वारसेस्टर महोदय ने किया था। उन्होनें ज्वालामुखी क्रिया को परिभाषित करते हुए कहा कि “ज्वालामुखी क्रिया एक ऐसी प्रक्रिया है कि जिसमे गर्म पदार्थ की धरातल के तरफ या धरातल के ऊपर आने वाली सभी प्रक्रिया को शामिल किया जाता है।”

 ज्वालामुखी द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृति का निर्माण होता है– 

1. केंद्रीय विस्फोटक द्वारा निर्मित स्थलाकृति, बाह्य स्थलाकृति 

I. सिंडर शंकु:- ये प्रायः ज्वालामुखी धूल तथा राख से निर्मित होते है तथा कम ऊँचाई के होते है। जैसे– मेक्सिको का जोरल्लो, फिलीपाइन का कैमिग्विन इत्यादि।

II. कम्पोजिट शंकु:- इसका निर्माण लावा के तह के रूप में जमा होने से होता है। विश्व के अधिकांश बड़े ज्वालामुखी इसी प्रकार के है। जैसे:- फ्यूजियामा, मेयोन(फिलीपाइन), शस्त(USA) इत्यादि।
 
III. परिपोषित शंकु:- इसका निर्माण मुख्य नदी के अलावे छोटी-छोटी उपशाखाओं के द्वारा लावा उदगार के द्वारा होता है।
 

IV. एसिड लावा शंकु:- अधिक सिलिकायुक्त गाढ़ा एवं चिपचिपा लावा के उदगार से यह शंकु निर्मित होता है। इसकी ढाल तीव्र होती है।

V. पैठिक लावा शंकु:- कम सिलिका युक्त पतले लावा से इस शंकु का निर्माण होता है। यह कम ऊँचा शंकु होता है।

VI. क्रैटर:-  ज्वालामुखी के छिद्र के ऊपर स्थित किपाकार गर्त को क्रैटर कहते है। चारों तरफ इसकी ढाल तीव्र होती है।

VII. काल्डेरा:- एक बड़े क्रैटर को काल्डेरा कहते है।

2. दरारी उद्गार द्वारा निर्मित स्थलाकृति

I. लावा पठार:-  दरारी उद्गार से निकले बेसाल्ट लावा के जमा होने से निर्मित पठार लावा पठार कहलाता है। जैसे- दक्कन पठार, कोलम्बिया पठार

II. लावा मैदान:- लावा के पतली थ के रूप में जमा होने से इसका निर्माण होता है। जो फ्रांस, न्यूजीलैंड, आइसलैंड आदि देशों में मिलते है।

अभ्यान्तरिक स्थलाकृति

Volcano

 ज्वालामुखी क्रिया द्वारा उत्पन्न स्थरूपों का प्रदर्शन

    अभ्यान्तरिक स्थलाकृति के अंतर्गत बैथोलिथ, लैकोलिथ, फैकोलिथ, लोपोलिथ, सिल, डाइक, स्टॉक इत्यादि स्थरूपों का निर्माण भुपटल के सतह के नीचे होता है जो अपरदन द्वारा दृश्य हो पाते है।

अन्य स्थलाकृति

गेसर:- यह एक गर्म जल का स्रोत है जिससे समय-समय पर गर्मजल या वाष्प निकला करती है।

              उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अंतर्जात बल द्वारा विभिन्न प्रका के स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।


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I ‘Dr. Amar Kumar’ am working as an Assistant Professor in The Department Of Geography in PPU, Patna (Bihar) India. I want to help the students and study lovers across the world who face difficulties to gather the information and knowledge about Geography. I think my latest UNIQUE GEOGRAPHY NOTES are more useful for them and I publish all types of notes regularly.

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