Unique Geography Notes हिंदी में

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Solved Exam Paper For UG

2. Minor Course / Geomorphology (Theory) Solved Questions Paper 2023

(Minor Course or MIC-1)

Geomorphology (Theory)

Solved Questions Paper 2023


(Patliputra University Patna)

Minor Course

Part A / भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: All questions are compulsory. Select the correct answer from the alternatives given below [2×10-20]

सभी प्रश्न अनिवार्य हैं। निम्नलिखित विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:

1. (i) Which one of the following figures represents the age of the earth?

(a) 4.54 billion years

(b) 4.54 million years

(c) 13.7 billion years

(d) 13.7 trillion years

निम्नलिखित अंकों में से कौन पृथ्वी की आयु को प्रदर्शित करता है?

(a) 4.54 अरब वर्ष

(b) 4.54 मिलियन वर्ष

(c) 13.7 अरब वर्ष

(d) 13.7 खरब वर्ष

उत्तर- (a) 4.54 अरब वर्ष

(ii) The Gaseous Hypothesis regarding the origin of the earth is given by:

(a) Immanuel Kant

(b) Laplace

(c) Chamberlin and Moulton

(d) Jeans and Jefferys

पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धी वायव्य-राशि परिकल्पना दी गई है :

(a) इमैनुएल काण्ट

(b) लाप्लास

(c) चेम्बलिन तथा मोल्टन

(d) जीन्स तथा जैफीस

उत्तर- (a) इमैनुएल काण्ट

(iii) What is the average density of the Earth?

(a) 3.5 gm/cm³

(b) 4.5 gm/cm³

(c) 5.5 gm/cm³

(d) 6.5 gm/cm³

पृथ्वी का औसत घनत्व कितना है?

(a) 3.5 gm/cm³

(b) 4.5 gm/cm³

(c) 5.5 gm/cm³

(d) 6.5 gm/cm³

उत्तर – (c) 5.5 gm/cm³

(iv) Physical weathering is also known as

(a) Mass weathering

(b) Material weathering

(c) Mechanical weathering

(d) Monitor weathering

भौतिक अपक्षय को के रूप में भी जाना जाता है।

(a) बृहत् अपक्षय

(b) प्रदार्थ अपक्षय

(c) यांत्रिक अपक्षय

(d) निगरानी अपक्षय

उत्तर – (c) यांत्रिक अपक्षय

(v) Which of the following is not a Metamorphic rock?

(a) Marble

(b) Sand stone

(c) Quartzite

(d) Slate

निम्नलिखित में से कौन कायान्तरित चट्टान नहीं है?

(a) संगमरमर

(b) बलुआ पत्थर

(c) क्वार्ट्जाइट

(d) स्लेट

उत्तर- (b) बलुआ पत्थर 

(vi) Which of the following is the hardest mineral?

(a) Topaz

(b) Quartz

(c) Diamond

(d) Feldspar

निम्नलिखित में से कौन-सा कठोरतम खनिज है?

(a) टोपाज

(b) क्वार्ट्ज

(c) हीरा

(d) फेल्सपार

उत्तर – (c) हीरा

(vii) Laurasia and Gondwana land were separated by:

(a) Black sea

(b) Red sea

(c) Pacific Ocean

(d) Tethys sea

लॉरेशिया और गोंडवाना भूमि अलग कर दिए गए थे।

(a) काला सागर के द्वारा

(b) लालसागर के द्वारा

(c) प्रशान्त महासागर के द्वारा-

(d) टेथिस सागर के द्वारा

उत्तर- (d) टेथिस सागर के द्वारा

(viii) Most earthquakes happen along the:

(a) Fault

(b) Volcanic mountain

(c) Mid-oceanic ridge

(d) Pacific ring of fire

ज्यादातर भूकम्प इसी के सहारे आते हैं

(a) भ्रंश

(b) ज्वालामुखी पर्वत

(c) मध्य महासागरीय कटक

(d) प्रशान्त अग्नि- मेखला

उत्तर- (d) प्रशान्त अग्नि- मेखला

(ix) What is the name of the largest active volcano on earth?

(a) Mauna Loa

(b) Kilauea

(c) Mount Etna

(d) Stromboli

पृथ्वी पर सबसे बड़े सक्रिय ज्वालामुखी का क्या नाम

(a) मौना लोआ

(b) किलाउआ

(c) माउंट एटना

(d) स्ट्राम्बोली

उत्तर- (a) मौना लोआ

(x) Where do Earthquakes occur most frequently?

(a) Along the plate boundaries

(b) Uppermost layers

(c) Core

(d) Mantle

भूकम्प अधिकांशतः बार-बार कहाँ घटित होते हैं?

(a) प्लेट सीमाओं के सहारे

(b) सबसे ऊपरी सतहों पर

(c) केन्द्र

(d) मेंटल

उत्तर- (a) प्लेट सीमाओं के सहारे

Part-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following:

[4×5-20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए

2. Write a short note on Gaseous Hypothesis of Kant.

काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना पर एक लघु नोट लिखिए।

3. What is the internal structure of the earth according to Suess?

स्वेस के अनुसार पृथ्वी की आंतरिक संरचना क्या है?

4. Name the four processes involved in chemical weathering.

रासायनिक अपक्षय में संलग्न चार प्रक्रियाओं के नाम लिखिए।

5. What are rocks and state its types?

चट्टानें क्या हैं? इसके प्रकारों का वर्णन कीजिए।

6. What are primary Earthquake waves?

प्राथमिक भूकम्पीय तरंगें क्या हैं?

7. Differentiate between rocks and minerals.

चट्टानों और खनिजों के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए ।

Part-C / भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following:

[3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

8. What is Weathering? Explain its types with examples.

अपक्षय क्या है? इसके प्रकारों का उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।

9. Compare the views of Davis and Penck about the cycle of erosion.

अपरदन चक्र के बारे में डेविस तथा फेंक के विचारों की तुलना कीजिए।

10. What is Earthquake? Discuss causes, types and consequences of earthquakes.

भूकम्प क्या है? भूकम्पों के कारण, प्रकार और परिणामों की चर्चा कीजिए।

11. Write a note on different types of Landforms resulting from volcanic activities.

ज्वालामुखी क्रियाओं के परिणामस्वरूप विकसित होने वाली स्थलाकृतियों पर एक नोट लिखिए।

12. Give a reasoned account of the constitution of the interior of the earth.

पृथ्वी की आंतरिक संचना का सकारण विवरण दीजिए।


सभी लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का उत्तर सरल एवं आसान शब्दों में देना यहाँ सीखें


Part-B / भाग-ब
(Short Answer Type Questions)
(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following:

[4×5-20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए

2. Write a short note on Gaseous Hypothesis of Kant.

काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना पर एक लघु नोट लिखिए।

उत्तर- पृथ्वी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जर्मन दार्शनिक काण्ट ने सन् 1755 ई० में अपनी ”वायव्य राशि परिकल्पना” का प्रतिपादन किया जो कि न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियमों पर आधारित थी। प्रारम्भ में इस मत की सराहना हुई, परन्तु बाद में इसे तर्कहीन प्रमाणित कर दिया गया, क्योंकि यह मत गणित के गलत नियमों पर कल्पित किया गया था।

       प्रस्तुत परिकल्पना काण्ट द्वारा कल्पित अनेक तथ्यों पर आधारित है। सर्वप्रथम काण्ट ने यह मान लिया कि प्राचीन काल में (अतीत काल में) ब्रह्माण्ड में दैवनिर्मित आद्य पदार्थ (Premordial matter) बिखरे हुए थे। प्रारम्भ में ये पदार्थ अत्यन्त कठोर, शीतल तथा गतिहीन थे।

       पुनः काण्ट ने यह मान लिया कि आपसी आकर्षण के कारण ये कण (आद्य पदार्थ) एक-दूसरे से टकराने लगे। इस आपसी टकराव के कारण ताप तथा भ्रमण गति का आविर्भाव हुआ। ताप में निरन्तर वृद्धि होती गयीं, जिस कारण आद्य पदार्थ एक वायव्य राशि में परिवर्तित होने लगे। ताप तथा भ्रमण गति (Rotation) के परिणामस्वरूप प्रारम्भिक शीतल तथा गतिहीन वायव्य पदार्थ एक तप्त तथा गतिशील निहारिका (Nebula) में परिवर्तित हो गया। निहारिका ताप के आविर्भाव के साथ ही घूमने लगी, उसके आकार में वृद्धि होने लगी, जिस कारण ताप में वृद्धि से निहारिका की परिभ्रमण गति में भी वृद्धि होने लगी।

       इस प्रकार निहारिका इतनी तीव्र गति से घूमने लगी कि केन्द्रापसारित बल (केन्द्र से बाहर की ओर जाने वाला बल-Centrifugal force) के प्रभाव से निहारिका के मध्य भाग में उभार आने लगा तथा इस क्रिया की तीव्रता के कारण (अर्थात् केन्द्रापसारितल की तीव्रता के कारण) पदार्थ का एक छल्ला निहारिका से बाहर निकल गया।

      इसी क्रिया की पुनरावृत्ति (Repetition) के कारण पदार्थ के नौ (9) गोल छल्ले निहारिका से अलग हो गये। धीरे-धीरे एक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर एकत्रित होकर एक गाँठ के रूप में शीतल होकर जमकर ठोस हो गये। इस तरह नौ छल्लों से (गाँठ के रूप में) नौ ठोस पदार्थों का निर्माण हुआ, जो कि आगे चलकर नौ ग्रह के रूप में बदल गये।

काण्ट की वायव्य राशि

            इस प्रकार काण्ट के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति, केन्द्रापसारित बल द्वारा निहारिका से अलग हुये छल्ले के पदार्थों के एक स्थान पर गाँठ के रूप में जमकर ठोस होने से हुई। मौलिक निहारिका का जो भाग अवशिष्ट रह गया, वह सूर्य के रूप में परिवर्तित हो गया।

         उपर्युक्त प्रक्रिया की पुनरावृत्ति के कारण ग्रहों से उनके उपग्रहों का निर्माण हुआ अर्थात् नव-निर्मित गतिशील ग्रहों से केन्द्रापसारित बल के प्रभाव से पदार्थों के वलयाकार छल्ले अलग हो गये, जिनमें से प्रत्येक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर घनीभूत होकर उपग्रह (Satellite) बन गये। इस तरह सम्पूर्ण सौर्य-मंडल का आविर्भाव हुआ।

आलोचना (Criticism):-

           यद्यपि काण्ट महोदय ने पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या के समाधान के लिए विज्ञान के तथ्यों का सहारा लिया था तथापि इनका मत वर्तमान समय में आधारहीन प्रमाणित कर दिया गया है, क्योंकि इस पकिल्पना के निम्नलिखित कई तथ्य गणित के नियमों के विपरीत हैं:-

(1) सर्वप्रथम यह आरोप लगाया जाता है कि कणों के आपसी टकराव से भ्रमण गति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस प्रकार निहारिका की निरन्तर गति-वृद्धि त्रुटिपूर्ण है।

(2) काण्ट की यह परिकल्पना कि आद्य पदार्थ में गति कणों के आपसी टकराव से हुई, जो कि ”कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त” (Laws of conservation of angular momentum) के विपरीत है, क्योंकि आपसी टकराव से गति नहीं उत्पन्न हो सकती है।

(3) काण्ट की यह धारणा कि निहारिका के आकार में वृद्धि के साथ गति भी बढ़ती गयी जो कि इस सिद्धान्त के विपरीत है, क्योंकि ‘कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त’ के अनुसार यदि किसी पिंड का आकार बढ़ता है तो गति घटती है और यदि आकार बढ़ता है तब गति घटती है।

निष्कर्ष:

          निष्कर्षत: कहा जा सकता है की वह मूल आधार ही, जिस पर काण्ट की परिकल्पना आधारित है, गलत प्रमाणित किया जाता है। काण्ट की परिकल्पना का महत्व इस बात में है कि उन्होंने इस क्षेत्र में प्रयास करके आगे आने वाले विद्वानों के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया। यह परिकल्पना आगे चलकर लाप्लास की निहारिका परिकल्पना की आधारशिला बनी।

3. What is the internal structure of the earth according to Suess?

स्वेस के अनुसार पृथ्वी की आंतरिक संरचना क्या है?

उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवम भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

⇒ सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः प्रत्येक 32 मी० की गहराई पर 1℃  तापमान में बढ़ोतरी होती है।

      स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

Internal Structure of The Earth

(1) सियाल (SIAL) 

            पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SIMA)

     स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NIFE)

          पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

4. Name the four processes involved in chemical weathering.

रासायनिक अपक्षय में संलग्न चार प्रक्रियाओं के नाम लिखिए।

उत्तर- जब रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों का विखंडन (Disintegration) होता है तो उसे रासायनिक अपक्षयण कहा जाता है। जब विभिन्न कारणों से चट्टानों के अवयवों में रासायनिक परिवर्तन होता है तो उनका बंधन ढीला हो जाता है तो रासायनिक अपक्षयण की क्रिया होती है।

       तापमान एवं आर्द्रता अधिक रहने पर रासायनिक अपक्षयण की क्रिया तीव्र गति से होती है। यही कारण है कि विश्व के उष्ण एवं आर्द्र प्रदेशों में यह क्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। शुष्क अवस्था में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाईऑक्साइड का चट्टानों पर कोई रासायनिक प्रभाव नहीं पड़ता है, परंतु नमी की उपस्थिति में ये सक्रिय रासायनिक कारक (Active chemical Agent) बन जाते हैं।

(i) विलयन (Solution):-

        चट्टानों में उपस्थित विभिन्न खनिजों के जल में घुलने की क्रिया को विलयन कहा जाता है। उदाहरण के लिए सेंधा नमक (Rock Salt) एवं जिप्सम वर्षा के जल में आसानी से घुल जाते हैं।

(ii) ऑक्सीकरण (Oxidation):-

      ऑक्सीकरण की क्रिया विशेष रूप से लौह युक्त चट्टानों पर होती है। आर्द्रता बढ़ने पर लौह खनिज ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं, जिसके कारण चट्टान अथवा खनिज कमजोर हो जाते हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है। वर्षा ऋतु में लोहे में जंग लगना ऑक्सीकरण का ही परिणाम है।

(iii) जलयोजन (Hydration):-

       जलयोजन की प्रक्रिया में चट्टानों में उपस्थित खनिज जल को सोख लेता है। इसके कारण उनमें रासायनिक परिवर्तन होने लगता है एवं नये खनिजों का निर्माण होता है। इन नये खनिजों में जल का कुछ अंश रह जाता है। ये नये खनिज पुराने खनिजों की अपेक्षा मुलायम होते हैं। उदाहरण के लिए जलयोजन के फलस्वरूप ग्रेनाइट चट्टानों का फेल्डस्पार खनिज कायोलिन (Kaolin) मिट्टी में परिवर्तित हो जाता है।

(iv) कार्बोनेटीकरण (Carbonation):-

             जल एवं कार्बन डाई ऑक्साइड मिलकर हल्का कार्बोनिक अम्ल बनाते हैं। इस अम्ल का प्रभाव विशेष रूप से उन चट्टानों पर पड़ता है, जिनमें कैल्सियम, मैग्नेशियम, सोडियम, पोटेशियम एवं लोहे जैसे तत्त्व पाये जाते हैं। ये तत्त्व कार्बोनिक अम्ल में घुल जाते हैं, फलस्वरूप इन खनिजों से निर्मित चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है।

              बलुआ पत्थरों (Sand Stone) में सामान्यतः कैल्सियम कार्बोनेट (Lime) ही संयोजक पदार्थ (Cementing Material) का कार्य करता है, जो कार्बोनिक अम्ल में शीघ्रता से घुल जाता है, फलस्वरूप बलुआ पत्थर का विखंडन होने लगता है।

⇒ कभी-कभी जलयोजन के कारण चट्टानों की ऊपरी सतह फूलकर निचली सतह से अलग हो जाती है। इसे गोलाभ अपक्षय (Spheroidal Weathering) कहा जाता है। इस प्रकार रासायनिक अपक्षयण की यह क्रिया अपदलन से काफी मिलती-जुलती है।

5. What are rocks and state its types?

चट्टानें क्या हैं? इसके प्रकारों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- भू-पटल निर्माण करने वाले पदार्थों को चट्टान कहते है अर्थात भू-पटल का निर्माण चट्टानों से हुआ है। चट्टानें मुख्यतः खनिजों के संयोग से बनती हैं, अर्थात् चट्टानें खनिजों का समुच्चय हैं।

      पृथ्वी पर लगभग 200 प्रकार के खनिज पाये जाते हैं। इनमें 24 ऐसे हैं, जो मुख्यतः भू-पृष्ठ की चट्टानों का निर्माण करते हैं। अत: इन्हें चट्टान निर्माणक खनिज कहा जाता है। ये खनिज मुख्यतः सिलिकेट, ऑक्साइड एवं कार्बोनेट के रूप में पाये जाते हैं। इन चट्टान निर्माणकारी खनिजों में सिलिकेट सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है एवं इसके बाद ऑक्साइड का स्थान आता है। जैव पदार्थों से निर्मित चट्टानों में खनिज नहीं मिलता है, जैसे- कोयला। चट्टानें पत्थर की तरह कड़ी एवं पंक की तरह मुलायम हो सकती हैं।

चट्टानों के प्रकार (Types of Rocks)

         उत्पत्ति के आधार पर चट्टानों को तीन भागों में बांटा गया है-

1. आग्नेय (Igneous) 

2. अवसादी (Sedimentary) 

3. कायांतरित (Metamorphic)

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks):-

     आग्नेय चट्टानों का निर्माण मैग्मा के ठंडा होकर जमने एवं ठोस होने से होता है। चूंकि सर्वप्रथम इसी चट्टान का निर्माण हुआ, अतः इसे प्राथमिक चट्टान (Primary Rock) भी कहा जाता है। ये आधारभूत चट्टानें हैं, जिनसे परतदार एवं रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है।

चट्टानें
आग्नेय चट्टान
आग्नेय चट्टान

ये चट्टानें रवेदार (Crystalline) होती हैं। जब मैग्मा धरातल पर आकर ठंडा होता है, तब तीव्र गति से ठंडा होने के कारण चट्टानों के रवे बहुत बारीक होते हैं, जैसे- बेसाल्ट। इसके विपरीत जब मैग्मा धरातल के नीचे ठंडा होता है, तब धीरे-धीरे जमने के कारण रवे बड़े-बड़े होते हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

⇒ ये चट्टानें तुलनात्मक रूप से कठोर होती हैं, इनमें जल काफी कठिनाई से जोड़ों के सहारे ही अंदर प्रविष्ट हो पाता है।

⇒ इनमें परत का अभाव होता है, परंतु जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ आग्नेय चट्टानों में जीवों के अवशेष (Fossils) का अभाव होता है।

⇒ ज्वालामुखी चट्टानों में रवों का विकास नहीं होने पर उनका गठन कांच की तरह (Glassy) होता है, जैसे ऑब्सीडियन।

⇒ आग्नेय चट्टानों के उदाहरण- ग्रेनाइट, रायोलाइट, बेसाल्ट, पेग्माटाइट (Pegmatite), साइनाइट (Syenite), डायोराइट (Diorite), एण्डेसाइट (Andesite), गैब्रो (Gabro), डोलेराइट (Dolerite), पेरिडोटाइट (Peridotite) आदि हैं।

आग्नेय चट्टान के प्रकार

        स्थिति एवं संरचना के अनुसार आग्नेय चट्टानें दो प्रकार की होती हैं-

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)-

          वह आग्नेय चट्टानें जिनका निर्माण सतह के ऊपर लावा के ठंडा होने और जमने से होता है, बहिर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं। इनमें क्रिस्टल बहुत छोटे होते हैं क्योंकि लावा तेजी से जम जाता है। बेसाल्ट एवं रायोलाइट इसका अच्छा उदाहरण है। इस चट्टान की क्षरण से ही काली मिट्टी का निर्माण होता है जिसे रेगुड़ (Regur) कहते हैं।

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)-

        वह आग्नेय चट्टानें जो सतह के नीचे लावा के ठंडे और ठोस होने से निर्मित होती है,अंतर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती है।

      इसके दो पुन: उपवर्ग हैं-

(a) पातालिय चट्टान (Plutonic Rock)

         इसका निर्माण पृथ्वी के अंदर काफी अधिक गहराई पर होता है। इसका नामकरण प्लूटो (यूनानी देवता) के नाम पर किया गया है। जो पाताल के देवता माने जाते हैं।अत्यधिक धीमी गति से ठंडा होने के कारण इसके क्रिस्टल बड़े बड़े होते हैं। ग्रेनाइट चट्टान इसका उदाहरण है।

(b) मध्यवर्ती चट्टान (Hypobyssal Rock)

        ज्वालामुखी के उदगार के समय धरातलीय अवरोध के कारण लावा दरारों, छिद्रों एवं नली में ही जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है, बाद में अपरदन की क्रिया के बाद यह चट्टाने धरातल पर नजर आने लगती है। डोलेराइट, मैग्नेटाइट इन चट्टानों के महत्वपूर्ण उदाहरण है।
मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानों के विभिन्न रूप

            जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर भूपटल के नीचे ही ठंडा होने की प्रवृति रखता है। तब आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति का निर्माण होता है। जैसे–Volcano

जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तो डाइक, क्षैतिज ठोस होता है तो सिल, जब उत्तल दर्पण के समान ठोस होता है तो लैकोलिथ, जब अवतल दर्पण के समान ठोस होता है तो लोपोलिथ, जब तरंग के समान ठोस होता है तो फैकोलिथ स्थलाकृति का निर्माण होता है। इसी तरह जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससे बैथोलिथ का निर्माण होता है।

⇒ रासायनिक संरचना की दृष्टि से आग्नेय चट्टानों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) अम्लीय चट्टानें (Acid Rocks)-

         इनमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। इनका रंग हल्का होता है। ये चट्टानें अपेक्षाकृत हल्की होती हैं, जैसे-ग्रेनाइट।

(ii) क्षारीय चट्टानें (Basic Rocks)-

       इनमें सिलिका की मात्रा कम होती है। इनमें फेरो-मैग्नेशियम की प्रधानता होती है। लोहे की अधिकता के कारण इन चट्टानों का रंग गहरा होता है। इनका घनत्व भी अधिक होता है, जैसे-गैब्रो, बेसाल्ट, रायोलाइट आदि।

⇒ पूर्व की चट्टानों के ऊपर स्थित बेसाल्ट चट्टान टोपी (Caps) के समान दिखाई पड़ता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को ‘मेसा’ (Mesa) कहा जाता है।

⇒ अपरदन के कारण मेसा का अधिकांश भाग कट जाता है एवं उसका आकार छोटा होने लगता है। अत्यंत छोटी आकार वाली ‘मेसा’ को ‘बुटी’ (Butte) कहा जाता है।

⇒ धरातल के नीचे परतदार चट्टानों के बीच स्थित लावा गुम्बद (जैसे लैकोलिथ) के ऊपर की मुलायम चट्टानें अपरदन द्वारा नष्ट होती जाती हैं। इस प्रकार लावा गुम्बद धरातल पर दिखने लगता है एवं यह अवरोधक (Resistant) चट्टान संकरी एवं लंबी कटक में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को “होगबैक’ (Hogback) कहा जाता है।

⇒ हौगबैक से मिलती-जुलती एक स्थलाकृति, जिसका ढाल एवं डिप (Dip) झुका हुआ हो ‘कवेस्टा’ (Questa) कहलाती है।

2. अवसादी/तलछटी/परतदार चट्टानें (Sedimentary or Stratified Rocks):-

         ये वे चट्टानें हैं जिनका निर्माण विखण्डित ठोस पदार्थों, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों के जमाव से होता है।

अवसादी चट्टान

⇒ इन चट्टानों में अवसादों की विभिन्न परतें पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जीवावशेष (Fossils) पाये जाते हैं।

⇒ धरातल का 75% भाग अवसादी चट्टानों से ढका हुआ है एवं शेष 25% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से आवृत्त है।
⇒ यद्यपि अवसादी चट्टानें धरातल का अधिकांश भाग आवृत्त किये हुए हैं, फिर भी भूपटल के निर्माण में इनका योगदान 5% ही है, शेष 95% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से निर्मित है। इस प्रकार परतदार चट्टानों का महत्त्व क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से है, भू-पृष्ठ में गहराई की दृष्टि से नहीं।

⇒ ये चट्टानें रवेदार नहीं होती हैं।

⇒ ये चट्टानें क्षैतिज रूप में बहुत कम पाई जाती हैं। पार्श्ववर्ती दबाव के कारण परतों में मोड़ पड़ जाता है अतएव ये चट्टानें सामूहिक रूप से अपनति एवं अभिनति के रूप में पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ ये चट्टानें प्रायः मुलायम होती हैं (जैसे- चीका मिट्टी, पंक आदि), परन्तु ये कड़ी भी हो सकती हैं (जैसे- बलुआ पत्थर)।

⇒ ये शैलें अधिकांशतः प्रवेश्य (Porous) होती हैं, परंतु चीका मिट्टी जैसी परतदार चट्टानें अप्रवेश्य भी हो सकती हैं।

⇒ इनका निर्माण अधिकांशतः जल में होता है। परंतु लोएस जैसी परतदार चट्टानों का निर्माण पवन द्वारा जल के बाहर भी होता है। बोल्डर क्ले (Boulder Clay) या टिल (Till) हिमानी द्वारा निक्षेपित परतदार चट्टानों के उदाहरण हैं, जिसमें विभिन्न आकार के चट्टानी टुकड़े मौजूद रहते हैं।

3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks):-

          जब ताप, दबाव, रासायनिक क्रियाओं आदि के प्रभाव से आग्नेय एवं परतदार चट्टानों का रूप परिवर्तित हो जाता है, तो रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है। कभी-कभी रूपांतरित चट्टानों का भी रूपांतरण हो जाता है। इस क्रिया को पुनःरूपान्तरण कहा जाता है। रूपांतरण के फलस्वरूप चट्टानों की मूलभूत विशेषताएं जैसे- घनत्व, रंग, कठोरता, बनावट, खनिजों का संघटन आदि आंशिक या पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती हैं।

कायांतरित चट्टान

कायांतरित चट्टानों के उदाहरण

⇒ आग्नेय से कायांतरित चट्टान-

ग्रेनाइट- नीस,

बेसाल्ट- एम्फी बोलाइट

ग्रेबो- सर्पेन्टइन

⇒ अवसादी से कायांतरित चट्टानें-

बालुवा पत्थर- क्वार्टजाइट,

चूना पत्थ– संगमरमर,

शेल- स्लेट,

कोयला-  ग्रेफाइट, हीरा,

⇒ रूपांतरित चट्टान से पुन: रूपांतरित चट्टान

स्लेट- शिष्ट

शिष्ट- फायलाइट

6. What are primary Earthquake waves?

प्राथमिक भूकम्पीय तरंगें क्या हैं?

उत्तर- P तरंग को कई नामों से जानते है। जैसे: प्राथमिक तरंग, Pull & Push तरंग या अनुधैर्य तरंग। इसे ध्वनि तरंग से तुलना की जा सकती है क्योंकि यह ठोस,द्रव्य & गैस तीनों प्रकार के माध्यम से संचारित हो सकती है। इसकी गति 7.8 Km/Sec होती है। P तरंग भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे पहले पहुँचती है या अनुभव किया जाता है। इसकी उत्पत्ति भूकम्पीय केंद्र/फोकस से होती है। 

7. Differentiate between rocks and minerals.

चट्टानों और खनिजों के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- चट्टानों और खनिजों के बीच निम्नलिखित अंतर है-

क्र.सं. चट्टानों खनिजों
1. चट्टानों को उस ठोस द्रव्यमान के रूप में परिभाषित किया जाता है जो भौगोलिक सामग्रियों से बना होता है। दूसरी ओर, खनिजों को अकार्बनिक रासायनिक यौगिकों के रूप में परिभाषित किया जाता है जो प्राकृतिक रूप से बनते हैं।
2. चट्टानें खनिजों से बनी होती हैं। खनिज चट्टानों से नहीं बनते।
3. चट्टानें अपनी बनावट में एक समान नहीं होती हैं। खनिज अपनी बनावट में एक समान होते हैं।
4. जेडाइट, रेड बेरिल, ब्लैक ओपल, मसग्रेवाइट आदि चट्टानें कुछ दुर्लभ चट्टानें हैं। पेनाइट एक दुर्लभ खनिज है।
5. चट्टानें सूक्ष्म अर्थात् प्रकृति में छोटी होती हैं। खनिज सूक्ष्मदर्शी नहीं होते और इन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है।
6. पृथ्वी पर चट्टानें ठोस रूप में मौजूद हैं। खनिज पदार्थ पृथ्वी पर खनिज भंडार के रूप में मौजूद हैं।
7. चट्टानों की एक परमाणु संरचना होती है। खनिजों में क्रिस्टलीय और रासायनिक संरचना होती है।
8. चट्टानों का उपयोग सड़क, भवन आदि निर्माण कार्यों के लिए किया जाता है। खनिजों का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों जैसे प्रौद्योगिकी, फैशन, निर्माण आदि के लिए किया जाता है।
9. चट्टानों के मौलिक गुण हैं:-

⇒ चट्टानों

⇒ आकार

⇒ रंग

⇒ आभा

⇒ नमूना

⇒ बनावट

खनिजों के मौलिक गुण हैं:-

⇒ रंग

⇒ क्रिस्टल

⇒ कठोरता

⇒ भंग

⇒ तप

⇒ गुरुत्वाकर्षण

10. चट्टानों का कोई निश्चित आकार या रंग नहीं होता है। खनिजों का एक निश्चित रंग और आकार होता है।
11. उदाहरण:-

⇒ रेत

⇒ कंकड़

⇒ टुकड़े टुकड़े

⇒ गोले

उदाहरण:-

⇒ जीवाश्म ईंधन

⇒ कोयला

⇒ पेट्रोलियम

Part-C / भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following:

[3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

8. What is Weathering? Explain its types with examples.

अपक्षय क्या है? इसके प्रकारों का उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।

उत्तर- अपक्षय के अन्तर्गत चट्टानों के अपने स्थान पर टूटने-फूटने की क्रिया तथा उससे उस चट्टान विशेष या स्थान विशेष के अनावरण की क्रिया को सम्मिलित किया जाता है। इसमें चट्टान-चूर्ण के परिवहन को सम्मिलित नहीं किया जाता है

अपक्षयण के प्रकार (Types of Weathering)

1. भौतिक अपक्षयण (Physical or Mechanical Weathering):-

           बिना किसी रासायनिक परिवर्तन के चट्टानों के टूट-फूट कर टुकड़े-टुकड़े होने की प्रक्रिया को भौतिक या यांत्रिक ऋतुक्षरण कहा जाता है।

⇒ भौतिक ऋतुक्षरण, मरुस्थलों में अधिक दैनिक तापांतर के कारण एवं ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों में पाले (Frost) के कारण होता है।

⇒ गर्म मरुस्थलों में स्वच्छ आकाश एवं वायु की शुष्कता के कारण दिन एवं रात के तापमान में काफी अंतर पाया जाता है। दिन के समय तेज धूप के कारण चट्टानों का ऊपरी आवरण तप्त होकर फैल जाता है। किन्तु रात के समय प्रायः तापमान गिरकर हिमांक (Freezing Point) तक पहुंच जाता है एवं चट्टानें सिकुड़ जाती हैं। इन क्रियाओं की पुनरावृति के कारण चट्टानों में दरार पड़ने लगता है एवं चट्टानें बड़े बड़े खंडों में टूट जाती हैं। इस प्रक्रिया को खंड विच्छेदन (Block Disintegration) कहा जाता है।

⇒ उष्ण मरुस्थलीय, अर्द्ध मरुस्थलीय एवं मानसूनी जलवायु प्रदेशों में अधिक तापांतर के कारण कभी-कभी चट्टानों की ऊपरी सतह गर्म होकर अन्दर की अपेक्षाकृत ठंडी सतह से अलग हो जाती है एवं ऊपर का भाग प्याज के छिलके की तरह अलग हो जाता है। इसे अपदलन, अपशल्कन या अपपत्रण (Exfoliation) कहा जाता है। यह क्रिया मुख्यतः ग्रेनाइट जैसी रवेदार चट्टानों में होती है।

⇒ चट्टानें विभिन्न खनिजों का समुच्चय होती हैं एवं विभिन्न खनिजों के फैलाव एवं सिकुड़ने की दर अलग-अलग होती हैं। इसके कारण चट्टानों के विभिन्न खनिज कण टूट-टूटकर अनेक खनिज कणों में विभाजित हो जाते हैं। चट्टानों का इस प्रकार खनिज कणों में टूटना कणिकामय विखंडन (Granular Disintegration) कहलाता है। खंड विखंडन एवं कणिकामय विखंडन के कारण ही गर्म मरुस्थलों में विस्तृत क्षेत्रों में बालू पाये जाते हैं।

⇒ शीत कटिबंधीय क्षेत्रों एवं उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में चट्टानों की छिद्रों एवं दरारों में जल के जमने एवं पिघलने की क्रिया क्रमिक रूप से होती है। इससे चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं बड़े-बड़े खंडों में टूटने लगती हैं अर्थात् खंड-विखंडन (Block Disintegration) होने लगता है। यह क्रिया तुषार क्रिया (Frost Action) कहलाती है।

           खड़ी पहाड़ी ढालों पर इस प्रकार का विघटन अधिक देखने को मिलता है। विघटित चट्टानें गुरुत्व बल के कारण नीचे की ओर सरककर जमा होने लगती हैं। ये विखंडित चट्टानें खुरदरी एवं नुकीली होती हैं। इस प्रकार के कोणीय चट्टानी खंडों (Angular Rock Fragments) के ढेर को भग्नाश्म राशि (Scree) अथवा टैलस (Talus) कहा जाता है। इस प्रकार स्क्री या टैलस का निर्माण मुख्यतः तुषार क्रिया एवं गुरुत्वाकर्षण का परिणाम है।

2. रासायनिक अपक्षयण (Chemical weathering):-

     जब रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों का विखंडन (Disintegration) होता है तो उसे रासायनिक अपक्षयण कहा जाता है। जब विभिन्न कारणों से चट्टानों के अवयवों में रासायनिक परिवर्तन होता है तो उनका बंधन ढीला हो जाता है तो रासायनिक अपक्षयण की क्रिया होती है।

       तापमान एवं आर्द्रता अधिक रहने पर रासायनिक अपक्षयण की क्रिया तीव्र गति से होती है। यही कारण है कि विश्व के उष्ण एवं आर्द्र प्रदेशों में यह क्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। शुष्क अवस्था में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाईऑक्साइड का चट्टानों पर कोई रासायनिक प्रभाव नहीं पड़ता है, परंतु नमी की उपस्थिति में ये सक्रिय रासायनिक कारक (Active chemical Agent) बन जाते हैं।

(i) विलयन (Solution):-

        चट्टानों में उपस्थित विभिन्न खनिजों के जल में घुलने की क्रिया को विलयन कहा जाता है। उदाहरण के लिए सेंधा नमक (Rock Salt) एवं जिप्सम वर्षा के जल में आसानी से घुल जाते हैं।

(ii) ऑक्सीकरण (Oxidation):-

      ऑक्सीकरण की क्रिया विशेष रूप से लौह युक्त चट्टानों पर होती है। आर्द्रता बढ़ने पर लौह खनिज ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं, जिसके कारण चट्टान अथवा खनिज कमजोर हो जाते हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है। वर्षा ऋतु में लोहे में जंग लगना ऑक्सीकरण का ही परिणाम है।

(iii) जलयोजन (Hydration):-

       जलयोजन की प्रक्रिया में चट्टानों में उपस्थित खनिज जल को सोख लेता है। इसके कारण उनमें रासायनिक परिवर्तन होने लगता है एवं नये खनिजों का निर्माण होता है। इन नये खनिजों में जल का कुछ अंश रह जाता है। ये नये खनिज पुराने खनिजों की अपेक्षा मुलायम होते हैं। उदाहरण के लिए जलयोजन के फलस्वरूप ग्रेनाइट चट्टानों का फेल्डस्पार खनिज कायोलिन (Kaolin) मिट्टी में परिवर्तित हो जाता है।

(iv) कार्बोनेटीकरण (Carbonation):-

             जल एवं कार्बन डाई ऑक्साइड मिलकर हल्का कार्बोनिक अम्ल बनाते हैं। इस अम्ल का प्रभाव विशेष रूप से उन चट्टानों पर पड़ता है, जिनमें कैल्सियम, मैग्नेशियम, सोडियम, पोटेशियम एवं लोहे जैसे तत्त्व पाये जाते हैं। ये तत्त्व कार्बोनिक अम्ल में घुल जाते हैं, फलस्वरूप इन खनिजों से निर्मित चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है।

              बलुआ पत्थरों (Sand Stone) में सामान्यतः कैल्सियम कार्बोनेट (Lime) ही संयोजक पदार्थ (Cementing Material) का कार्य करता है, जो कार्बोनिक अम्ल में शीघ्रता से घुल जाता है, फलस्वरूप बलुआ पत्थर का विखंडन होने लगता है।

⇒ कभी-कभी जलयोजन के कारण चट्टानों की ऊपरी सतह फूलकर निचली सतह से अलग हो जाती है। इसे गोलाभ अपक्षय (Spheroidal Weathering) कहा जाता है। इस प्रकार रासायनिक अपक्षयण की यह क्रिया अपदलन से काफी मिलती-जुलती है।

9. Compare the views of Davis and Penck about the cycle of erosion.

अपरदन चक्र के बारे में डेविस तथा फेंक के विचारों की तुलना कीजिए।

उत्तर- डेविस और पेंक के अपरदन चक्र सिद्धांत का तुलनात्मक अध्ययन

      अमेरिकी भूगोलवेता डेविस की और जर्मन भूगोलवेता बाल्टर पेंक को “आधुनिक स्थलाकृति विज्ञान” का जन्मदाता माना जाता है। 1889 ई० में डेविस ने ‘ज्योग्राफिकल एसेज’ नामक पुस्तक में जबकि बाल्टर पेंक ने 1924 ई० में अनुसंधान प्रपत्र में “मॉरफोलोजिकल एनालिसिस ऑफ लैण्डफॉर्म” नामक शीर्षक से अपरदन चक्र का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इन दोनों के विचारों का तुलनात्मक अध्ययन दो शीर्षकों में बाँटकर करते हैं। जैसे- समानता और असमानता

समानताएँ

(i) दोनों ने अपना अपरदन चक्र का सिद्धांत आर्द्र प्रदेश के संदर्भ में प्रस्तुत किया।

(2) दोनों के अनुसार अपरदन चक्र के प्रारंभ में अपरदन का कार्य तेजी से और बाद में निक्षेपण का कार्य तेजी से होता है।

(3) दोनों ने अपरदन चक्र की तुलना मानव के जीवन चक्र से किया। जैसे- जिस प्रकार से मानव जीवनचक्र का 5 अंत होता है और पुनर्जन्म के बाद नयी जीवन चक्र प्रारंभ होता है। ठीक उसी तरह एक अपरदन चक्र समाप्त होता है और पुनरुत्थान के बाद दूसरा अपरदन चक्र प्रारंभ होता है।

(4) दोनों विद्वानों ने बताया कि अपरदन चक्र प्रारंभ होने के लिए उत्थान अति आवश्यक है।

(5) दोनों ने बताया कि बहते हुए जल के द्वारा अपरदन का कार्य आधारतल (S.L.) तक होता है।

(6) दोनों वैज्ञानिकों ने यह प्रकट किया कि अपरदन चक्र के अन्त में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है।

असमानताएँ:-

           वास्तव में डेविस एवं पेंक का विचार समानता के लिए नहीं बल्कि असमानता के लिए जानी जाती है। दोनों के विचारों को चार आधार पर अन्तर स्थापित किया जा सकता है-

(1) उत्थान के संदर्भ में

(2) समय के संदर्भ में

(3) ढाल विकास के संदर्भ में

(क) समप्राय मैदान के संदर्भ में

(1) उत्थान के संदर्भ में

          दोनों विद्वानों ने अपरदन चक्र की शुरूआत के लिए उत्थान को अनिवार्य माना है। लेकिन उत्थान की प्रक्रिया और स्थलाकृति पर उसके प्रभाव के संदर्भ में अलग-2 विचार है। जैसे- डेविस ने कहा कि उत्थान के बाद अपरदन होती है, जबकि पेंक के अनुसार उत्थान के साथ-2 अपरदन का कार्य चलता है। डेविस के अनुसार उत्थान में समय बहुत कम लगता है। इसलिए यह कार्य तीव्र गति से सम्पन्न होती है जबकि पेंक के अनुसार उत्थान में समय बहुत अधिक लगता है। इसलिए उत्थान का कार्य मंद गति से होती है। डेविस के अनुसार उत्थान का कार्य एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। जबकि पेंक के अनुसार एक अनियमित प्रक्रिया है।

परीक्षण

       डेविस और पेंक के उत्थान के संबंध में व्यक्त किये गए विचारों का अगर परीक्षण किया जाय तो स्पष्ट होता है कि पेंक का विचार अधिक वैज्ञानिक है। होम्स के द्वारा प्रस्तुत संवहन तरंग सिद्धांत और प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत पेंक के विचारों को समर्थन करते हैं।

          डेविस और पेंक ने उत्थान और अपरदन के संदर्भ में जो मॉडल प्रस्तुत किया है उसमें भी स्पष्ट रूप से अन्तर दिखाई देता है।

डेविस और पेंक

नोट:

⇒ युवावस्था- केवल अपरदन का कार्य होता है।

⇒ प्रौढावस्था- अपरदन + निक्षेपण दोनों का कार्य होता है।

⇒ वृद्धावस्था- केवल निक्षेपण का कार्य होता है।

(2) समय के संदर्भ में:-

          दोनों विद्वानों ने अपना अपरदन चक्र का सिद्धांत समय के संदर्भ में प्रस्तुत किया है। लेकिन डेविस ने अपरदन चक्र तीन अवस्थाओं में और पेंक पाँच दशाओं (Phases) में वर्गीकृत किया है।

        डेविस ने बताया कि अपरदन चक्र के दौरान स्थलाकृतियों के निर्माण में 5 अपरदन दूत (नदी, शुष्क पवन, हिमानी, समुद्री तरंग, भूमिगत जल) का प्रभाव पड़ता है। जबकि पेंक के अनुसार अपरदन चक्र बाह्य अपरदन दूत के अतिरिक्त आन्तरिक कारक के सहभागिता से संचालित होती है।

          डेविस के अनुसार युवास्था में तलीय अपरदन अधिक होती है। जिसके कारण उच्चावच में तेजी से वृद्धि होती है। जलविभाजक रेखा चौड़ा होता है। प्रौढ़ावस्था में क्षैतिज अपरदन अधिक होती है। जिससे V-आकार की घाटी विकसित होती है। जलविभाजक की चौड़ाई कम होने लगती है। फलतः उच्चावच में भी कमी आने लगती है। वृद्धावस्था में अपरदन का कार्य समाप्त हो जाता है जिसके कारण इस अवस्था में केवल निक्षेपण का कार्य होता है। उच्चावच और जल-विभाजक अति न्यून रह जाती है। पेंक के अनुसार स्थलाकृतियों का विकास 5 दशाओं में सम्पन्न होता है। प्रत्येक दशा के विशेषताओं का उल्लेख नीचे के तालिका में किया गया है-

दशा/अवस्था उत्थान सापेक्षिक ऊँचाई उच्चावच
प्रथम सक्रिय वृद्धि वृद्धि
द्वितीय सक्रिय ह्रास स्थिर
तृतीय सक्रिय स्थिर स्थिर
चतुर्थ स्थिर या समाप्त स्थिर स्थिर
पंचम निष्क्रिय तीव्र ह्रास  ह्रास

        उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि समय के संदर्भ में दोनों के विचार में कई मौलिक अन्तर हैं।

(3) ढाल के संदर्भ में:-

         डेविस का सिद्धांत ढाल ह्रास का सिद्धांत कहलाता है जबकि पेंक का सिद्धांत ढाल प्रतिस्थापना का सिद्धांत कहलाता है। डेविस ने बताया कि उत्थान के बाद ढाल अति तीव्र होती है जिसके कारण I-आकार की घाटी विकसित होती है। उसके बाद नदी घाटी के दीवारों का क्रमिक ह्रास होता है।

        प्रौढ़ावस्था में क्षैतिज अपरदन के कारण नदी घाटी के दीवारों का तेजी से कटाव होता है जिसके कारण ढाल में पुनः कमी आती है और V- आकार की घाटी विकसित होती है। वृद्धावस्था में क्षैतिज अपरदन और अधिक हो जाने पर  खुली V- आकार की घाटी विकसित होती है जिसके कारण जल-विभाजक रेखा उत्तल ढाल के समान और नदी घाटी अवतल ढाल के समान दिखाई पड़ती है।

       पेंक के अनुसार ढाल प्रतिस्थापन होता है न कि क्रमिक ह्रास होता है। उन्होंने बताया कि अपरदन चक्र के दौरान तीन प्रकार के ढाल विकसित होते हैं-

(i) उत्तल ढाल- इसे उन्होंने आफस्टीजेंड इन्टवकलुंग से संबोधित किया।

(ii) समढाल- इसे उन्होंने ग्लीचफोर्मिंग इन्टवकलुंग से सम्बोधित किया।

(iii) अवतल ढाल- इसे उन्होंने अबस्टीजेंड इन्टवकलुंग से सम्बोधित किया।

         उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि ढाल के संदर्भ में व्यक्त किये गये विचार में सबसे ज्यादा वैज्ञानिक पेंक का विचार है।

नोट :

आफस्टीजेंड इन्टवकलुंग का अर्थ है- बढ़ती दर से विकास।
ग्लीचफोर्मिंगे इन्टवकलुंग का अर्थ है- समान दर से विकास।
अबस्टीजेंड इन्टवकलुंग का अर्थ है- घटती द से विकास।

(4) समप्राय मैदान के संदर्भ में:-

           दोनों ने अपरदन चक्र के अन्त में लगभग समतल मैदान विकसित होने की संकल्पना प्रस्तुत की है। इसे डेविस ने समप्राय मैदान से सम्बोधित किया है। जबकि पेंक ने लगभग समतल मैदान को Endrumpf (इन्ड्रम्प) और Primarumpf (प्राइमारम्प) से सम्बोधित किया है। पेंक ने बताया कि एक अपरदन चक्र के अन्त में विकसित होने वाला लगभग समतल मैदान (Endrumpf) कहलाता है। लेकिन जब दूसरा अपरदन चक्र प्रारम्भ होता है तो अपरदन चक्र के पूर्व विकसित समताय मैदान को Primarumpf (प्राइमारम्प) कहते हैं। 

          डेविस ने बताया कि समप्राय मैदान में कहीं-कहीं कठोर चट्टानें दिखाई देती हैं। उसे मोनाडनॉक कहा जाना चाहिए। जबकि पेंक ऐसे कठोर चट्टानों को इन्सेलवर्ग से सम्बोधित किया है।

निष्कर्ष:

       उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि कुछ समानताओं के बावजूद उनके चिन्तन में कई मौलिक विषमताएँ है। ये विषम‌ताएँ ही आधुनिक भू-आकृतिक विज्ञान के आधार का कार्य किया है

10. What is Earthquake? Discuss causes, types and consequences of earthquakes.

भूकम्प क्या है? भूकम्पों के कारण, प्रकार और परिणामों की चर्चा कीजिए।

उत्तर- भूकम्प दो शब्दों के मिलने से बना है- भू + कम्प

भू=भूपटल 

 कम्प=कम्पन

          इस प्रकार भूपटल में उत्पन्न होने वाला किसी भी प्रकार के कम्पन को भूकम्प कहते है। 

★समुद्र के अंदर उत्पन्न होने वाले भूकंप को सूनामी (Tsunami) कहते है।

★ सूनामी जापानी शब्द है जिसका अर्थ समुद्री तरंग होता है।

★विज्ञान की वह शाखा जिसमें भूकम्प का अध्ययन किया जाता है उसे सिस्मोलोजी (Seismology) कहते है। 

★ भूपटल के जिस बिंदु से भूकम्प प्रारंभ होती है। उसे भूकम्प केंद्र (Focus) कहते है।

अधिकेंद्र-
      भूपटल के जिस बिंदु पर भूकम्प का झटका सबसे पहले अनुभव होता है उसे अधिकेंद्र कहते है।

प्रघात (Shocks)–

     अधिकेंद्र पर भूकम्पीय तरंग के द्वारा अनुभव किया गया पहला भूकम्पीय झटका को प्रघात कहते है। जब भूकंप समाप्त हो जाता है तो कई दिनों तक हल्के भूकम्प के झटके महसूस किए जाते है उसे After Shock कहा जाता है।

 भूकम्प के प्रकार

    भूकम्प का वर्गीकरण दो आधार पर किया जाता है:-

(A) गहराई के आधार पर

(B) समय के आधार पर

      गहराई के आधार पर भूकम्प तीन प्रकार के होते है–

I. छिछला भूकम्प– फोकस 70 KM से ऊपर होता है।

II. मध्यम भूकम्प– फोकस 70-300 KM के बीच

III. गहरा भूकम्प– फोकस 300-700 KM के बीच

(C) समय के आधार पर

     समय के आधार पर भूकम्प तीन प्रकार के होते है:-

I. धीमा भूकम्प

II. अचानक भूकम्प

      धीमा भूकम्प की तीव्रता कम होती है लेकिन इसके झटके लम्बे समय तक अनुभव किये जाते है। ऐसे भूकम्प से ही वलित पर्वत तथा पठारों का निर्माण होता है।

     अचानक भूकम्प की तीव्रता अधिक होती है। इसके झटके अति उच्च समय तक अनुभव किये जाते है। इसके चलते इससे ज्वालामुखी पर्वत तथा ब्लॉक पर्वतका निर्माण होता है।

★ विश्व में सर्वाधिक छिछले उदगम वाले भूकम्प होते हैं जिसका प्रभाव लम्बे समय तक होता है।

 भूकम्प के कारण

        भूकम्प क्यों आते है उन कारणों को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

(A) मानवीय कारण

(B) प्राकृतिक कारण

(A) मानवीय कारण :-

I. परमाणु विस्फोट

II. मानव के द्वारा किया जा रहा खनन कार्य

III. बड़े-बड़े बाँधों का निर्माणEarthquake

IV. पर्वतीय क्षेत्रों में किया जा रहा विकास कार्यक्रम जैसे- सड़क निर्माण, वन ह्रास इत्यादि।

(B) प्राकृतिक कारक:-

       ज्वालामुखी उदगार, मोड़दार एवं ब्लॉक पर्वत का निर्माण जब कभी होता है। भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या होती है। भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या करने हेतु दो सिद्धान्त प्रस्तुत किये गए है:-

1) प्रत्यास्य पुनश्चलन का सिद्धान्त (Elastic Rebond Theory)

       इस सिद्धांत को अमेरिकी वैज्ञानिक H.F. रीड ने दिया था। इनके अनुसार भुपटल प्रत्यास्य चट्टानों से निर्मित है। जब इन चट्टानों पर बाहरी दबाव बल कार्य करता है तो चट्टानें फैलती है और जब दबाव हटता है तो चट्टानें सिकुड़ने के क्रम में ही भूकम्प उत्पन्न होता है।

2) प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त (Plate Tectonic Theory)

      इस सिद्धान्त के प्रतिपादक हैरीहेस महोदय है। इन्होंने बताया कि पृथ्वी का भूपटल कई प्लेटों से निर्मित है। यही प्लेट जब क्षैतिज या उदग्र रूप से गति करते है तो भूकम्प उत्पन्न होते है। प्लेटों में सर्वाधिक भूकम्प प्लेट के किनारे अनुभव किये जाते है। भूकम्प के आधार पर प्लेट के किनारों को तीन भागों में बांटा गया है–

I. अपसरण सीमा

II. अभिसरण सीमा

III. संरक्षी सीमाEarthquake

       प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में यह बताया गया है कि प्लेटों में गति चार कारणों से उत्पन्न होती है:-

जैसे:-

I. चन्द्रमा एवं ब्रहाण्डीय पिण्डों का आकर्षण बल

II. एक प्लेट के सापेक्ष में दूसरे प्लेट का 45° कोण पर झुका हुआ होना

III. पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल

IV. दुर्बलमण्डल में उत्पन्न होने वाला संवहन तरंग

        प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में उपरोक्त सभी कारणों को भूकम्प के लिए जिम्मेवार बताये गये है लेकिन इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण संवहन तरंग है। जिन किनारों पर संवहन तरंग ऊपर की ओर उठकर फैलने की प्रवृति रखती है वहाँ पर अपसरण सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को अपसरण गति कहते है।

जैसे- अटलांटिक कटक के सहारेEarthquake

          जब किसी प्लेट के नीचे संवहन तरंग बैठने की पवृति रखती है वहाँ पर अभिसरण सीमा (किनारा) का निर्माण होता है। अभिसरण किनारों के सहारे प्लेटों में अभिसरण गति उत्पन्न होती है। 
Earthquake
         जब दो प्लेट आपस में समांतर रूप से रगड़ खाते है तो वैसे स्थानों पर संरक्षी सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को संरक्षी गति कहते है। जापान, फिलीपींस, इंडोनेशिया जैसे द्वीप समूह संरक्षी सीमा पर अवस्थित है। यही कारण है कि यहां सबसे अधिक भूकम्प रिकॉर्ड किया जाता है।
Earthquake
      इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के कारणों का सर्वाधिक वैज्ञानिक व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त द्वारा किया जाता है।

भूकम्प का वितरण

       विश्व में मुख्यतः भूकम्प के तीन क्षेत्र है:-

(i) प्रशांत महासागर के चारों ओर– विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में ही आती है। यहाँ अधिकांश गहरे केंद्र वाले भूकम्प आते है।

(ii) मध्य महाद्विपीय क्षेत्र– यह क्षेत्र यूरेनियम प्लेट और इसके दक्षिण में स्थित भारतीय प्लेट तथा अफ्रीकन प्लेट के मध्य स्थित है। यहाँ मध्यम एवं छिछले किस्म के भूकम्प आते है।

(iii) मध्य अटलांटिक कटक एवं पूर्वी अफ्रीका के भ्रंश घाटी क्षेत्र- अटलांटिक महासागर में अपसरण सीमा के सहारे भूकम्प आती है जिसका विस्तार आइसलैंड से अंटार्कटिका तक हुआ है।

भूकम्पीय तीव्रता एवं इसका मापन

       भूकम्प के आगमन के दौरान बड़ी मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। इसी ऊर्जा का मापन भूकम्पीय तीव्रता कहलाता है। वैज्ञानिकों ने भूकम्पीय तीव्रता की मापन हेतु दो प्रकार के पैमाने का विकास किया है–

1. मार्सेली पैमाना

2. रिचर पैमाना

मार्सेली पैमाना

       मार्सेली पैमाना का विकास फ्रांस के मार्सेली महोदय द्वारा किया गया था। इन्होंने इसे ज्ञानेन्द्रियों के अनुभव एवं विनाशकारी प्रभाव पर विकसित किया। इस पैमाने से न्यूनतम 1 और अधिकतम 12 इकाई तक भूकम्पीय तीव्रता का मापन किया जाता है।

रिचर पैमाना

        रिचर पैमाना का विकास 1835 ई० में सी.एफ. रिचर महोदय ने किया था। इसके अंतर्गत भूकम्पीय तीव्रता मापन 1 से 9 इकाई तक किया जाता है। रिचर पैमाना में भूकम्पीय तीव्रता का मापन 10 के घात के रूप में होता है।

रिचर पैमाना पर तीव्रता प्रभाव
1 केवल यंत्रों द्वारा अनुभव किया जाता है।
2 केवल अधिकेन्द्र के पास हल्का कम्पन होता है।
3 चट्टानों में सामान्य कम्पन होती है
4 केन्द्र से 32 किमी० की त्रिज्या में भूकम्प अनुभव की जाती है
5 अधिकेन्द्र से 5 हजार किमी० की दूरी तक भूकम्प अनुभव किया जाता है और पेड़-पौधे हिलने लगते हैं
6 विनाश प्रारंभ हो जाता है और दीवारों में दरारें पड़ने लगती हैं।
7 दीवारें ध्वस्त हो जाती है, वृहत भूकम्प की स्थिति उत्पन्न होती है।
8 इसका प्रभाव विश्वव्यापी होती है, नदियाँ अपना मार्ग बदल लेती है।
9 सम्पूर्ण सर्वनाश (नदी, नाला, मकान स्थिति उत्पन्न हो जायेगी।
       
     अगर रिचर स्केल पर भूकम्प तीव्रता 6.5 हो तो यह मानव के लिए विनाशात्मक साबित होता है। 

भूकम्पीय तरंग एवं इसकी विशेषता

       भूकम्प के दौरान कई प्रकार के प्रमुख एवं गौण तरंगों की उत्पति होती है:-

(A) प्रमुख तरंग 

I. P तरंग

II. S तरंग

III. L तरंग

(B) गौण तरंग

I. P* & S*

II. Pg & Sg

P तरंग 

   P तरंग को कई नामों से जानते है। जैसे: प्राथमिक तरंग, Pull & Push तरंग या अनुधैर्य तरंग। इसे ध्वनि तरंग से तुलना की जा सकती है क्योंकि यह ठोस, द्रव्य और गैस तीनों प्रकार के माध्यम से संचारित हो सकती है। इसकी गति 7.8 Km/Sec होती है। P तरंग भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे पहले पहुँचती है या अनुभव किया जाता है। इसकी उत्पत्ति भूकम्पीय केंद्र/फोकस से होती है। 

S तरंग

      S तरंग को द्वितीयक तरंग या अनुप्रस्थ तरंग कहते है। इसकी तुलना प्रकाश तरंग से की जा सकती है। यह तरंग तरल भाग में विलुप्त हो जाती है। भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर P तरंग की तुलना में S तरंग देरी से पहुंचती है। S तरंग की भी उत्पति भूकम्पीय केंद्र/फोकस से होती है।

★ P तरंग अपने संचरण अक्ष के क्षैतिज जबकि S तरंग अपने संचरण मार्ग के लम्बवत गमन करती है। S तरंग की औसत गति 4.5 Km/Sec होता है।

L तरंग 

      L तरंग को सतही तरंग भी कहा जाता है। L तरंग की उत्पति अधिकेंद्र (Epicentre) से होती है। L तरंग रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे देर से पहुँचती है। इसी तरंग के कारण सर्वाधिक क्षति होती है। L तरंग की गति काफी अनियमित होती है। 

Earthquake
P* & S* तरंग 

         पृथ्वी  का भुपटल मुख्यत: दो प्रकार के चट्टानों से निर्मित है:- (1) ग्रेनाइट  &  (2) बैसाल्ट चट्टान

P* & S* ऐसा तरंग है जो केवल बैसाल्टिक चट्टानों से होकर गुजरती है।

 P* की गति=6-7 Km/Sec

S* की गति=3-4 Km/Sec

          ये तरंग समुद्री भूपटल और महाद्वीपों के आंतरिक भागों में चलती है। इस तरंगों की खोज 1923 ई० में कोनार्ड महोदय के द्वारा किया गया था। इस तरंगों की खोज कोनार्ड ने टायर्न में आये भूकम्प के दौरान किया गया था।

Pg & Sg तरंग 

        ये दोनों तरंगे ग्रेनाइट चट्टानों से होकर गुजरती है। इसका खोज जेफरीज महोदय ने 1909 ई० में क्रोएशिया (Croatia) के कुपा घाटी में आये भूकम्प के दौरान किया था।

Pg तरंग की औसत गति =5.4 Km/Sec

Sg तरंग की औसत गति =3.3 Km/Sec

         Pg & Sg एक ऐसी तरंग है जो केवल महाद्वीपीय भागों से होकर गुजरती है। 

निष्कर्ष:-

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के दौरान अलग-अलग प्रकार के तरंगों की उत्पत्ति होती है जिनकी अपनी विषिष्टता होती है। इन्हीं विशिष्टताओं के आधार पर पृथ्वी के आंतरिक भागों के अध्ययन वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है।

11. Write a note on different types of Landforms resulting from volcanic activities.

ज्वालामुखी क्रियाओं के परिणामस्वरूप विकसित होने वाली स्थलाकृतियों पर एक नोट लिखिए।

उत्तर- ज्वालामुखी वह क्रिया है जिसके अंतर्गत पृथ्वी के भीतर गैस एवं लावा की उत्पति से लेकर उनके पृथ्वी के भीतर या बाहर प्रकट होने की सभी क्रियाएं सम्मिलित होती है। ज्वालामुखी द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृति का निर्माण होता है– 

1. केंद्रीय विस्फोटक द्वारा निर्मित स्थलाकृति, बाह्य स्थलाकृति 

I. सिंडर शंकु:- ये प्रायः ज्वालामुखी धूल तथा राख से निर्मित होते है तथा कम ऊँचाई के होते है। जैसे– मेक्सिको का जोरल्लो, फिलीपाइन का कैमिग्विन इत्यादि।

II. कम्पोजिट शंकु:- इसका निर्माण लावा के तह के रूप में जमा होने से होता है। विश्व के अधिकांश बड़े ज्वालामुखी इसी प्रकार के है। जैसे:- फ्यूजियामा, मेयोन(फिलीपाइन), शस्त(USA) इत्यादि।
 
III. परिपोषित शंकु:- इसका निर्माण मुख्य नदी के अलावे छोटी-छोटी उपशाखाओं के द्वारा लावा उदगार के द्वारा होता है।
 

IV. एसिड लावा शंकु:- अधिक सिलिकायुक्त गाढ़ा एवं चिपचिपा लावा के उदगार से यह शंकु निर्मित होता है। इसकी ढाल तीव्र होती है।

V. पैठिक लावा शंकु:- कम सिलिका युक्त पतले लावा से इस शंकु का निर्माण होता है। यह कम ऊँचा शंकु होता है।

VI. क्रैटर:-  ज्वालामुखी के छिद्र के ऊपर स्थित किपाकार गर्त को क्रैटर कहते है। चारों तरफ इसकी ढाल तीव्र होती है।

VII. काल्डेरा:- एक बड़े क्रैटर को काल्डेरा कहते है।

2. दरारी उद्गार द्वारा निर्मित स्थलाकृति

I. लावा पठार:-  दरारी उद्गार से निकले बेसाल्ट लावा के जमा होने से निर्मित पठार लावा पठार कहलाता है। जैसे- दक्कन पठार, कोलम्बिया पठार

II. लावा मैदान:- लावा के पतली थ के रूप में जमा होने से इसका निर्माण होता है। जो फ्रांस, न्यूजीलैंड, आइसलैंड आदि देशों में मिलते है।

अभ्यान्तरिक स्थलाकृति

Volcano

 ज्वालामुखी क्रिया द्वारा उत्पन्न स्थरूपों का प्रदर्शन

    अभ्यान्तरिक स्थलाकृति के अंतर्गत बैथोलिथ, लैकोलिथ, फैकोलिथ, लोपोलिथ, सिल, डाइक, स्टॉक इत्यादि स्थरूपों का निर्माण भुपटल के सतह के नीचे होता है जो अपरदन द्वारा दृश्य हो पाते है।

अन्य स्थलाकृति

गेसर:- यह एक गर्म जल का स्रोत है जिससे समय-समय पर गर्मजल या वाष्प निकला करती है।

              उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अंतर्जात बल द्वारा विभिन्न प्रका के स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

12. Give a reasoned account of the constitution of the interior of the earth.

पृथ्वी की आंतरिक संचना का सकारण विवरण दीजिए।

उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवम भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

⇒ सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः प्रत्येक 32 मी० की गहराई पर 1℃  तापमान में बढ़ोतरी होती है।

      स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

Internal Structure of The Earth

(1) सियाल (SIAL) 

            पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SIMA)

       स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NIFE)

          पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

         भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सबसे अधिक वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। जिसके अनुसार पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा गया है –

1. भूपर्पटी (Crust)

2. भूप्रावर (Mantle)

3. क्रोड (Core)

(1) भूपर्पटी (Crust):-

          यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% Crust में शामिल है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है। महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है। इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

★ भूपर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है। यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग, द्वितीयक तरंग, सतही तरंग, P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:- 

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

       महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला/खुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है। महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टाने पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

(2) भुप्रावार (Mantle):-

        भूप्रावार की मोटाई मोहो असम्बद्धता से 2900 KM तक है। पृथ्वी के कुल आयतन का 83% और कुल द्रव्यमान का 68% भाग भूप्रावार में शामिल है। यह अधिक तापमान के कारण पिघली हुई अवस्था (द्रव) के समान है। भूप्रावार पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग  तो संचरित होती है लेकिन द्वितीयक तरंग विलुप्त हो जाती है। इसका निर्माण सिलिकन & मैग्नेशियम जैसे तत्वों से हुआ है। भूप्रावार का घनत्व 3 से 5.5 तक मानी जाती है । 

★ भूपर्पटी और भूप्रावार के बीच एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे मोहोअसम्बद्धता (Moho Discontinuty) कहते है।

★ क्रस्ट और मेंटल के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमण्डल/लिथोस्फेयर कहा जाता है।

★ स्थलमण्डल के नीचे वाले मण्डल को दुर्बलमण्डल (Aestheno Sphere) कहते है। होम्स ने बताया कि दुर्बलमण्डल में ही संवहन तरंगे चलती है। ये तरंगे इतनी शक्तिशाली होती है जो स्थलमण्डल को तोड़ने एवं मोड़ने की क्षमता रखती है।

Internal Structure of The Earth
चित्र: पृथ्वी की आतंरिक संरचना

(3) क्रोड(Core)/अंतरतम:-   

         यह पृथ्वी का केंद्रीय भाग है। इसका घनत्व -10 से 13.6 g/cm3 है। पृथ्वी के कुल आयतन का 16% एवं द्रव्यमान का 32% भाग क्रोड में शामिल है। क्रोड पृथ्वी का वह मण्डल है जसमें केवल प्राथमिक तरंगे गुजरती है। यह मण्डल निकेल & लोहा से निर्मित है। इसी कारण से पृथ्वी में चुम्बकीय गुण है। क्रोड अत्याधिक दबाव के कारण ठोस भाग के रूप में परिणत हो चुका है। क्रोड की औसत मोटाई 3471 KM है। Mantle और Core के बीच में एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे गुटेनबर्ग असम्बद्धता कहते हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को नीचे के चित्रों में भी देखा जा सकता है।

निष्कर्ष:-

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संबंध में भूकम्पीय तरंग सबसे अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।


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Questions Bank

2023 में पाटलिपुत्र विश्विधालय द्वारा आयोजित सेमेस्टर-1 की वार्षिक परीक्षाओं का प्रश्न-पत्र यहाँ उपलब्ध है।
     Geomorphology (Theory) First Semester का Solved Exam Paper देखने के लिए नीचे क्लिक करें-

1. Major Course (MJC-1)

2. Minor Course (MIC-1)

3. Multidisciplinary Course (MDC-1) For Humanities

4. Multidisciplinary Course (MDC-1) For Science

5. Multidisciplinary Course (MDC-1) For B.Com

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I ‘Dr. Amar Kumar’ am working as an Assistant Professor in The Department Of Geography in PPU, Patna (Bihar) India. I want to help the students and study lovers across the world who face difficulties to gather the information and knowledge about Geography. I think my latest UNIQUE GEOGRAPHY NOTES are more useful for them and I publish all types of notes regularly.

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