Category GEOMORPHOLOGY (भू-आकृति विज्ञान)

42. Balanced Landform Description of Chhotanagpur Plateau (छोटानागपुर पठार का सन्तुलित भूआकृति विवरण)

Balanced Landform Description of Chhotanagpur Plateau

(छोटानागपुर पठार का सन्तुलित भूआकृति विवरण)



Description of Chhotanagpur Plateauपरिचय

     छोटानागपुर पठार भारत के पूर्वी भाग में स्थित एक अत्यंत प्राचीन भू-आकृतिक इकाई है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के भूगर्भीय विकास का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती है।

    यह पठार न केवल अपने खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसकी स्थलाकृति, संरचना, नदियों की व्यवस्था, और मानव-भू-संबंधों के कारण यह भारत के भौतिक भूगोल में विशेष स्थान रखता है। छोटानागपुर पठार को भारतीय भू-रचना का “खनिज हृदय” (Mineral Heart of India) भी कहा जाता है।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार

     छोटानागपुर पठार का विस्तार मुख्यतः झारखंड राज्य में है, जबकि इसके कुछ भाग छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश तक फैले हुए हैं।

⇒ इसका भौगोलिक विस्तार लगभग 22° से 25° उत्तर अक्षांश तथा 83° से 87° पूर्व देशांतर तक है।

⇒ पठार का औसत ऊँचाई स्तर 700 मीटर से 1100 मीटर के बीच है।

⇒ इसके उत्तर में गंगा समतलभूमि, दक्षिण में महानदी बेसिन, पूर्व में संथाल परगना की पहाड़ियाँ और पश्चिम में बघेलखंड पठार स्थित है।

भूगर्भीय संरचना

     छोटानागपुर पठार भारतीय भू-गर्भ के अरावली-धारवाड़ प्रणाली का हिस्सा है। यह क्षेत्र अत्यंत प्राचीन प्री-कैम्ब्रियन शैलों (Pre-Cambrian rocks) से निर्मित है।

⇒ यहाँ नीश, ग्रेनाइट, शिस्ट, क्वार्ट्जाइट, बेसाल्ट और ट्रैप जैसी रूपांतरित शिलाएँ प्रमुख हैं।

⇒ पठार की चट्टानें कठोर और अग्निय प्रकृति की हैं, जिनके बार-बार अपक्षय और अपरदन से वर्तमान स्थलाकृति बनी है।

⇒ भूगर्भीय दृष्टि से यह क्षेत्र स्थिर शील्ड क्षेत्र (Stable Shield Area) है, जहाँ भूकंपीय गतिविधियाँ सीमित हैं।

स्थलाकृति (Relief Features)

    छोटानागपुर पठार की स्थलरूप विशेषताएँ अत्यंत विविध हैं। इसे मोटे तौर पर तीन भागों में बाँटा जा सकता है—

(i) उत्तर छोटानागपुर पठार

⇒ यहाँ की ऊँचाई लगभग 300-700 मीटर तक है।

⇒ प्रमुख पहाड़ियाँ हैं- हजारीबाग, गिरिडीह, कोडरमा आदि।

⇒ इस भाग में नदियों द्वारा गहरी घाटियाँ काटी गई हैं।

(ii) मध्य छोटानागपुर पठार

⇒ यह पठार का सबसे विस्तृत क्षेत्र है।

⇒ राँची, लोहरदगा, गुमला और खूंटी जिले इसी भाग में हैं।

⇒ औसत ऊँचाई 700-900 मीटर है।

⇒ यहाँ की सबसे ऊँची चोटी पारसनाथ (1366 मीटर) है।

(iii) दक्षिण छोटानागपुर पठार

⇒ यह पठार का उच्चतम भाग है, जहाँ ऊँचाई 900-1100 मीटर तक पहुँचती है।

⇒ नेतरहाट, लुपुंग, टोटो और रायरंग जैसे पठारी क्षेत्र इसी भाग में हैं।

⇒ इसे “छोटानागपुर का पठारी प्रांगण” भी कहा जाता है।

नदी तंत्र (River System)

    छोटानागपुर पठार से अनेक प्रमुख नदियाँ निकलती हैं जो भारत की पूर्वी दिशा की ओर बहती हैं।
मुख्य नदियाँ –

(i) दामोदर नदी – “बंगाल का शोक” कही जाती है, क्योंकि यह बार-बार बाढ़ लाती थी।

(ii) सुवर्णरेखा नदी – राँची से निकलकर ओडिशा और पश्चिम बंगाल से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है।

(iii) कोएल, बराकर, शंख, दक्षिण कोएल, ब्रह्मणी और बैतरणी ये सभी पठार की जल निकासी में सहायक हैं।

       नदियाँ प्रायः पूर्ववाहिनी (East-flowing) हैं। जल निकासी का स्वरूप डेंड्राइटिक पैटर्न (Dendritic Pattern) का है। नदियों ने घाटियाँ काटकर कई जगह गॉर्ज और जलप्रपात बनाए हैं –

जैसे – हुंडरू फॉल्स, दशम फॉल्स, जोंरी फॉल्स, हिरनी फॉल्स आदि।

जलवायु (Climate)

     पठार की जलवायु उष्ण कटिबंधीय मानसूनी प्रकार की है, परन्तु ऊँचाई के कारण यहाँ तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है।

ग्रीष्म ऋतु: अप्रैल से जून तक, तापमान 35°C–40°C तक जाता है।

⇒ वर्षा ऋतु: जून से सितंबर तक, औसत वार्षिक वर्षा 1200–1500 मिमी।

⇒ शीत ऋतु: नवम्बर से फरवरी तक, तापमान 10°C–15°C तक गिर जाता है।

    राँची और नेतरहाट जैसे स्थानों में जलवायु अत्यंत सुखद है, इसलिए इन्हें “भारत के छोटे शिमला” कहा जाता है।

मृदा (Soil)

    पठार की मृदाएँ मुख्यतः अपक्षय से बनी हैं-

⇒ लाल और पीली मृदा (Red and Yellow Soil) – सबसे अधिक क्षेत्र में पाई जाती हैं।

⇒ लेटराइट मृदा (Laterite Soil) – उच्च पठारी भागों में, लौह ऑक्साइड से युक्त।

⇒ काली मृदा – कुछ दक्षिणी क्षेत्रों में, ज्वालामुखीय चट्टानों के कारण।

⇒ ये मृदाएँ पोषक तत्वों में गरीब हैं, इसलिए कृषि उत्पादकता कम है।

वनस्पति और जीव-जंतु

    छोटानागपुर पठार में घने वन पाए जाते हैं, जो मुख्यतः उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों (Tropical Deciduous Forests) के रूप में हैं।

मुख्य वृक्ष- साल, सागौन, बांस, अर्जुन, बेल, महुआ, तेंदू, और पलाश।

वन्यजीव- हाथी, बाघ, भालू, लोमड़ी, और कई प्रकार के पक्षी।

      यह क्षेत्र भारत का एक जैव-विविधता हॉटस्पॉट माना जाता है।

खनिज संपदा (Mineral Resources)

    छोटानागपुर पठार को भारत का “खनिज भंडार गृह” कहा जाता है। यहाँ से भारत के कुल खनिज उत्पादन का लगभग 40% प्राप्त होता है।

मुख्य खनिज-

⇒ लौह अयस्क (सिंहभूम, चिरिया, गोवा)

⇒ कोयला (दामोदर घाटी, गिरिडीह, झरिया, बोकारो)

⇒ अभ्रक (गया, हजारीबाग, कोडरमा)

⇒ बॉक्साइट, तांबा, मैंगनीज, क्रोमाइट आदि।

    खनिज संसाधनों ने यहाँ के औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित किया है।

मानव बसावट एवं आर्थिक गतिविधियाँ

    पठार की आबादी अपेक्षाकृत विरल है, किन्तु संसाधनों की प्रचुरता ने यहाँ उद्योगों और नगरों के विकास को बढ़ावा दिया है।

मुख्य नगर- राँची, जमशेदपुर, धनबाद, बोकारो, गिरिडीह, हजारीबाग।

मुख्य उद्योग-

⇒ इस्पात उद्योग (जमशेदपुर, बोकारो, रौरकेला)

⇒ कोयला और बिजली उद्योग

⇒ खनन और परिवहन

⇒ कुटीर उद्योग और वन आधारित उद्योग।

    कृषि की दृष्टि से यह क्षेत्र अपेक्षाकृत पिछड़ा है, क्योंकि मृदा उर्वरता कम और वर्षा अस्थिर है।

भू-आकृतिक विकास की प्रक्रिया

       छोटानागपुर पठार की भू-आकृति का निर्माण दीर्घकालिक अपक्षय, अपरदन और उत्थान की प्रक्रियाओं से हुआ है।

⇒ प्रारंभिक काल में यह एक विशाल पेनिप्लेन (Peneplain) था।

⇒ बाद में टेक्टोनिक उत्थान के कारण इसमें दरारें (faults) बनीं, जिससे पठारी रूप प्राप्त हुआ।

⇒ नदियों ने समय के साथ घाटियाँ और जलप्रपात बनाए।

⇒ वर्तमान में यह अपक्षय की परिपक्व अवस्था में है।

संतुलित भूआकृतिक दृष्टि से विश्लेषण

      “संतुलित भूआकृतिक विवरण” का अर्थ है- क्षेत्र की प्राकृतिक संरचना, स्थलरूप, जलवायु, जैविक तत्वों और मानव क्रियाओं के बीच संतुलन की व्याख्या।

(क) भौतिक संतुलन

    पठार की ऊँचाई, ढाल और नदियों की दिशा में प्राकृतिक संतुलन दिखाई देता है। नदियाँ पूर्व की ओर प्रवाहित होकर जल निकासी संतुलित करती हैं।

(ख) जैविक संतुलन

   वनस्पति और मृदा का पारस्परिक संबंध क्षेत्रीय पारिस्थितिकी को संतुलित बनाए रखता है। जहाँ वन नष्ट हुए हैं, वहाँ मृदा अपरदन बढ़ा है।

(ग) मानव-प्राकृतिक संतुलन

     खनन, उद्योग और शहरीकरण के बढ़ते प्रभाव से यह संतुलन कुछ हद तक बिगड़ा है, किंतु वन संरक्षण, पुनर्वनीकरण और पर्यावरणीय योजनाओं से संतुलन पुनः स्थापित करने के प्रयास जारी हैं।

पर्यावरणीय समस्याएँ

⇒ खनन और औद्योगीकरण से मृदा एवं जल प्रदूषण।

⇒ वनक्षेत्र में कमी और जैव विविधता का ह्रास।

⇒ जल स्रोतों का क्षरण एवं नदियों में गाद जमाव।

⇒ आदिवासी समुदायों का विस्थापन।

भूमि अपरदन और मरुस्थलीकरण की प्रवृत्ति।

संरक्षण और विकास के उपाय

⇒ सतत खनन नीति अपनाना।

⇒ वन पुनर्जीवन और वृक्षारोपण कार्यक्रम।

⇒ मृदा संरक्षण तकनीकें – सीढ़ीदार खेती, कंटूर बंडिंग।

⇒ जल निकासी का नियोजन।

⇒ पर्यावरण-अनुकूल औद्योगिक नीति।

⇒ स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष

    इस प्रकार छोटानागपुर पठार भारतीय भू-आकृति का एक जीवंत उदाहरण है, जहाँ प्रकृति और मानव दोनों ने मिलकर भू-दृश्य को आकार दिया है। इसकी कठोर चट्टानें, जलप्रपात, खनिज संपदा, और वन इसे विशेष पहचान देते हैं।

     यह पठार न केवल भारत की औद्योगिक शक्ति का आधार है, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन का भी महत्वपूर्ण क्षेत्र है। अतः आवश्यक है कि इसके संसाधनों का दोहन संतुलित एवं सतत विकास के सिद्धांतों पर आधारित हो, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस भू-आकृतिक धरोहर का लाभ उठा सकें।

प्रश्न प्रारूप

1. छोटानागपुर पठार का सन्तुलित भूआकृति विवरण प्रस्तुत करें।

नोट: डेंड्राइटिक पैटर्न– डेंड्राइटिक पैटर्न वह जल निकासी आकृति है जो किसी पेड़ की शाखाओं जैसी दिखती है और समान रूप से अपक्षयित भू-भाग पर विकसित होती है।

41. Morphometric Analysis of Drainage basin- Stream Order, Sinuosity Index and Drainage Density (अपवाह द्रोणी का आकारमिति विश्लेषण- धारा क्रम, सिनुओसिटी इंडेक्स एवं अपवाह घनत्व)

Morphometric Analysis of Drainage basin- Stream Order, Sinuosity Index and Drainage Density

(अपवाह द्रोणी का आकारमिति विश्लेषण- धारा क्रम, सिनुओसिटी इंडेक्स एवं अपवाह घनत्व)



Stream Order (धारा क्रम)

परिचय

   भू-आकृतिक (Geomorphic) अध्ययन में किसी क्षेत्र की सतही जल निकासी प्रणाली (Drainage System) का विश्लेषण अत्यंत महत्वपूर्ण है। जलधारा या नदी का विकास भू-आकृति विज्ञान का मूल आधार है, क्योंकि यह न केवल स्थलाकृति को आकार देती है बल्कि भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करती है।

   किसी भी नदी या जलधारा का संगठन, संरचना और स्वरूप, उसके ड्रैनेज बेसिन तथा उसके अंतर्गत आने वाले स्ट्रीम ऑर्डर पर निर्भर करता है।

⇒ मोर्फोमेट्रिक विश्लेषण का आशय है- ड्रैनेज बेसिन और उसकी धाराओं की आकृति, आयाम एवं मापन संबंधी पहलुओं का अध्ययन।

इसमें प्रमुख मापदंडों में-

(i) स्ट्रीम ऑर्डर (Stream Order),

(ii) स्ट्रीम संख्या (Stream Number),

(iii) स्ट्रीम लंबाई (Stream Length),

(iv) ड्रैनेज घनत्व (Drainage Density),

(v) सिनुओसिटी इंडेक्स (Sinuosity Index),

(vi) सर्कुलैरिटी रेशियो (Circulatory Ratio),

(vii) एलॉन्गेशन रेशियो (Elongation Ratio),

(viii) बिफरकेशन रेशियो (Bifurcation Ratio) आदि शामिल हैं।

       इनमें से स्ट्रीम ऑर्डर को मूल आधार माना जाता है, क्योंकि यह किसी भी नदी तंत्र की संरचना और विकास को समझने का पहला कदम है।

परिभाषा-

    ड्रैनेज बेसिन को सामान्यतः जलागम क्षेत्र कहा जाता है। यह स्थल की वह इकाई है जहाँ गिरने वाली समस्त वर्षा किसी न किसी नदी, धारा या झील के माध्यम से एक ही निकासी बिंदु की ओर प्रवाहित होती है। अर्थात् “किसी विशेष नदी या धारा को पोषित करने वाला सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्र, जिसमें वर्षा जल का संग्रहण और निकास एक ही आउटलेट से होता है, ड्रैनेज बेसिन कहलाता है।”

स्ट्रीम ऑर्डर निर्धारित करने की विधियाँ

1. हॉर्टन विधि (Horton’s Method, 1945)

      हॉर्टन की धारा क्रम (Stream Order) विधियाँ धारा नेटवर्क का विश्लेषण करने के तरीके हैं, जिनमें धाराओं को उनके आकार के अनुसार क्रमबद्ध किया जाता है, हालाँकि इस विधि को स्ट्राहलर विधि ने संशोधित किया है जो धारा क्रम निर्धारण का सबसे आम तरीका है।

     हॉर्टन की विधि का उपयोग करने के लिए, सबसे छोटी और सबसे बाहरी धाराओं को प्रथम-क्रम (Order 1) माना जाता है। जैसे-जैसे ये धाराएँ मिलती हैं, उनका क्रम बढ़ता है। जब दो प्रथम-क्रम की धाराएँ मिलती हैं, तो वे एक द्वितीय-क्रम की धारा बनाती हैं; और जब दो द्वितीय-क्रम की धाराएँ मिलती हैं, तो वे एक तृतीय-क्रम की धारा बनाती हैं। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक उच्चतम क्रम वाली धारा तक नहीं पहुँच जाते।

⇒ सबसे छोटी और उद्गम पर स्थित धाराओं को पहले क्रम (1st Order) की धारा माना।

⇒ दो पहले क्रम की धाराओं के मिलने पर दूसरे क्रम (2nd Order) की धारा बनती है।

⇒ इसी प्रकार क्रम बढ़ते जाते हैं।

2. स्ट्राहलर विधि (Strahler Method, 1952-57)

      स्ट्रीम ऑर्डर निर्धारित करने की सबसे आम और उपयोगी विधि स्ट्राहलर विधि है, जिसमें सबसे छोटी, बिना सहायक नदियों वाली धाराओं को प्रथम-क्रम की धारा माना जाता है, जब दो प्रथम-क्रम की धाराएँ मिलती हैं, तो वे एक द्वितीय-क्रम की धारा बनाती हैं, और इसी तरह समान क्रम की धाराओं के मिलने पर क्रम बढ़ता रहता है। यदि अलग-अलग क्रम की धाराएँ मिलती हैं, तो उच्चतम क्रम वाली धारा का ही क्रम बना रहता है। इसके नियम इस प्रकार हैं-

⇒ सभी सबसे छोटी और उद्गम धाराओं को पहला क्रम (1st Order) माना जाता है।

⇒ जब दो समान क्रम की धाराएँ मिलती हैं तो उनका क्रम एक बढ़ जाता है

उदाहरण:- 1st + 1st → 2nd Order

⇒ यदि असमान क्रम की धाराएँ मिलती हैं, तो उच्च क्रम को ही बरकरार रखा जाता है।

उदाहरण:- 2nd + 1st → 2nd Order

⇒ मुख्य धारा का क्रम उसके अंतिम संगम तक बढ़ता जाता है।

3. श्रेव  विधि (Shreve Method, 1966)

     श्रेव प्रणाली भी सबसे बाहरी सहायक नदियों को “1” संख्या देती है। स्ट्राहलर विधि के विपरीत, संगम पर दोनों संख्याओं को जोड़ दिया जाता है।

⇒ इसमें सभी उद्गम धाराओं को मान 1 दिया जाता है।

⇒ जैसे-जैसे धाराएँ मिलती हैं, उनके मान जोड़ दिए जाते हैं

⇒ इससे स्ट्रीम ऑर्डर का आकलन अधिक संख्यात्मक और सटीक माना जाता है।

स्ट्रीम ऑर्डर का महत्व

(i) नदी तंत्र का संगठन- यह बताता है कि किसी ड्रैनेज बेसिन में कितनी श्रेणियों की धाराएँ हैं और उनका आपसी संबंध कैसा है।

(ii) हाइड्रोलॉजी और प्रवाह विश्लेषण- जल प्रवाह, बाढ़ की तीव्रता और अवसादन (Sedimentation) के आकलन में सहायक।

(iii) जियोमॉर्फिक अध्ययन- स्थलाकृति के विकास, अपरदन चक्र, भू-आकृतिक चरण की पहचान में सहायक।

(iv) प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन- जल संसाधन योजना, सिंचाई, बांध निर्माण और वाटरशेड प्रबंधन में आवश्यक।

(v) पर्यावरणीय अध्ययन- भूमि उपयोग, मृदा संरक्षण और पारिस्थितिकी में ड्रैनेज पैटर्न की समझ आवश्यक है।

स्ट्रीम ऑर्डर और अन्य मोर्फोमेट्रिक पैरामीटर

1. स्ट्रीम संख्या (Stream Number, Nu)

⇒ किसी बेसिन में प्रत्येक क्रम की धाराओं की कुल संख्या को दर्शाता है।

⇒ Horton (1945) ने बताया कि जैसे-जैसे क्रम बढ़ता है, धाराओं की संख्या घटती जाती है।

2. स्ट्रीम लंबाई (Stream Length, Lu)

⇒ प्रत्येक क्रम की धाराओं की औसत लंबाई मापी जाती है।

  • Strahler (1964) ने पाया कि उच्च क्रम की धाराएँ लंबी होती हैं।

3. बिफरकेशन रेशियो (Bifurcation Ratio, Rb)

⇒ यह अनुपात दर्शाता है कि एक क्रम की धाराएँ अगले क्रम में कितनी बार विभाजित होती हैं।

⇒ यह बेसिन की संरचना और भूगर्भीय नियंत्रण को प्रदर्शित करता है।

4. ड्रैनेज डेंसिटी (Drainage Density, Dd)

⇒ कुल धारा की लंबाई को बेसिन क्षेत्रफल से विभाजित करने पर प्राप्त मान।

⇒ यह बेसिन की जल निकासी क्षमता और भूपर्पटी की पारगम्यता दर्शाता है।

5. स्ट्रीम फ्रीक्वेंसी (Stream Frequency, Fs)

⇒ प्रति इकाई क्षेत्र में धाराओं की संख्या।

⇒ अधिक मान होने का अर्थ है- अधिक अपवाह, कम अवशोषण।

स्ट्रीम ऑर्डर का व्यावहारिक अनुप्रयोग

(i) बाढ़ क्षेत्रों की पहचान:

⇒  स्ट्रीम ऑर्डर का उपयोग करके, वैज्ञानिक संभावित बाढ़ वाले क्षेत्रों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

(ii) तलछट अध्ययन: 

⇒ स्ट्रीम नेटवर्क का विश्लेषण करके, वैज्ञानिक किसी क्षेत्र में तलछट की मात्रा का अधिक आसानी से अध्ययन कर सकते हैं। 

(iii) मछली आवास का मूल्यांकन: 

स्ट्रीम वर्गीकरण मछली आवास की क्षमता को दर्शाता है, जो जलीय जीवन के लिए महत्वपूर्ण है।

(iv) पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का आकलन:

 वैज्ञानिक नदी के व्यवहार और समग्र पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को समझने के लिए स्ट्रीम ऑर्डर का उपयोग करते हैं।

(v) कार्बनिक पदार्थों की गतिशीलता: 

⇒ स्ट्रीम ऑर्डर कार्बनिक पदार्थों और ऊर्जा स्रोतों की गतिशीलता को समझने में मदद करता है, जो पारिस्थितिकी तंत्र की निरंतरता के लिए महत्वपूर्ण हैं। 

(vi) संसाधन योजना:

स्ट्रीम ऑर्डर प्राकृतिक संसाधनों के रूप में जलमार्गों का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग करने में मदद करता है।

(vii) जल प्रबंधन में सुधार: 

⇒ यह जल प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण घटक है, जिससे वैज्ञानिक और जल प्रबंधक नेटवर्क के भीतर विशिष्ट जलमार्गों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 

(viii) भू-आकृतियों का विश्लेषण: 

यह नदी नेटवर्क की संरचना और आकार में बदलाव को समझने में भी सहायता करता है, जो भूगोलविदों के लिए उपयोगी है।

(ix) डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) का उपयोग:

स्ट्रीम ऑर्डर टूल का उपयोग डिजिटल एलिवेशन मॉडल से चैनल नेटवर्क निकालने के लिए किया जाता है, जो भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं को समझने में सहायक होता है। 

(x) मृदा एवं जल संरक्षण

⇒ प्रथम और द्वितीय क्रम की धाराएँ अधिक अपरदन करती हैं, अतः मृदा संरक्षण के लिए इन क्षेत्रों की पहचान आवश्यक है।

केस स्टडी (Case Study Example)

    मान लीजिए किसी बेसिन का आँकड़ा इस प्रकार है-

क्रम धाराओं की संख्या औसत लंबाई (किमी)
1st 120 0.9
2nd 60 2.0
3rd 25 4.5
4th 10 8.2
5th 2 15.0

⇒ इससे स्पष्ट है कि जैसे-जैसे क्रम बढ़ा, संख्या घटी और लंबाई बढ़ी।
⇒ Horton’s Law की पुष्टि होती है।

निष्कर्ष:

   स्ट्रीम ऑर्डर ड्रैनेज बेसिन के मोर्फोमेट्रिक विश्लेषण का मूलभूत आधार है। यह न केवल किसी नदी तंत्र के संगठन एवं विकास को समझने में सहायक है, बल्कि जल संसाधन प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण, मृदा संरक्षण और पर्यावरणीय योजना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    Horton और Strahler द्वारा दी गई पद्धतियाँ आज भी सर्वाधिक प्रचलित हैं और इनके माध्यम से भू-आकृतिक अध्ययन अधिक वैज्ञानिक एवं सटीक बनते हैं।



Sinuosity Index (सिनुओसिटी इंडेक्स)

परिचय

        सिनुओसिटी इंडेक्स (Sinuosity Index) एक अनुपात है जो नदी के वास्तविक घुमावदार मार्ग की लंबाई और उसके शुरुआती और अंतिम बिंदुओं के बीच सीधी रेखा की दूरी की तुलना करता है। यह दर्शाता है कि नदी अपने सीधे मार्ग से कितनी दूर भटकती है और नदी के प्रवाह के घुमावदारपन (घुमावदार) की डिग्री को मापता है।

      सिनुओसिटी इंडेक्स का मान 1 से शुरू होकर अनंत तक जा सकता है; 1 का मान एक बिल्कुल सीधी नदी को दर्शाता है, जबकि एक उच्च मान अत्यधिक घुमावदार प्रवाह को इंगित करता है।

    अर्थात सिनुओसिटी इंडेक्स (Sinuosity Index) किसी नदी की वास्तविक लंबाई (Channel Length) और उसके स्रोत से मुहाने तक खींची गई सीधी रेखा (Valley Length ) के अनुपात को दर्शाता है। इस सूचकांक से यह मापा जाता है कि नदी कितनी वक्राकार है या कितनी सीधी है।

परिभाषा (Definition)

    सिनुओसिटी इंडेक्स वह मानक है जिसके द्वारा नदी चैनल की वास्तविक लंबाई को उसकी घाटी लंबाई से विभाजित करके निकाला जाता है।

सूत्र (Formula):

जहाँ –

= Sinuosity Index

Lc = Channel Length (नदी की वास्तविक लंबाई)

Lv = Valley Length या Air Length (स्रोत से मुहाने तक सीधी रेखा की दूरी)

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)

⇒ सबसे पहले Leopold और Wolman (1957) ने नदियों के मेअंडर और वक्रता का वैज्ञानिक अध्ययन किया।

⇒ Schumm (1963) ने नदियों के प्रकार (Straight, Sinuous, Meandering, Braided) को वर्गीकृत करने के लिए Sinuosity Index का उपयोग किया।

⇒ इसके बाद से यह सूचकांक जलोढ़ मैदानों, पथरीली घाटियों और तटीय क्षेत्रों की नदियों के अध्ययन में व्यापक रूप से अपनाया जाने लगा।

सिनुओसिटी के प्रकार (Types of Sinuosity)

        सिनुओसिटी इंडेक्स के मान के आधार पर नदियों को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जाता है- 

(i) सीधी नदियाँ (Straight Rivers):

  • S ≤ 1.05
  • नदी लगभग सीधी रेखा में बहती है।
  • प्रायः तीव्र ढाल वाले पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं।

(ii) सिनुअस नदियाँ (Sinuous Rivers):

  • 1.05 < S < 1.50
  • इनमें हल्की वक्रता होती है।
  • प्रायः मध्य प्रवाह क्षेत्रों (middle course) में विकसित।

मियंडरिंग नदियाँ (Meandering Rivers):

  • S ≥ 1.50
  • इनमें बड़े-बड़े मोड़ और घुमाव पाए जाते हैं।
  • प्रायः मैदान क्षेत्रों (lower course) में मिलती हैं।

गणना विधि (Method of Calculation)

  1. नदी का मानचित्र (टोपोशीट, सैटेलाइट इमेज या GIS डाटा) लिया जाता है।
  2. नदी के स्रोत से मुहाने तक की वास्तविक लंबाई Lc मापी जाती है।

  3. उसी स्रोत और मुहाने के बीच सीधी रेखा खींची जाती है।

  4. उपरोक्त सूत्र के आधार पर S का मान निकाला जाता है।

  5. परिणाम को तालिका एवं ग्राफ में प्रदर्शित कर नदी की प्रवृत्ति का विश्लेषण किया जाता है।

सिनुओसिटी को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Influencing Sinuosity)

(i) भूगर्भीय संरचना (Geological Structure):

⇒ कठोर चट्टानों वाली घाटियों में नदियाँ अपेक्षाकृत सीधी रहती हैं।

⇒ शैल संरचना में भंगाल और भ्रंश (faults) होने पर मोड़ अधिक आते हैं।

(ii) ढाल (Gradient):

⇒ तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों में नदी सीधी रहती है।

⇒ कम ढाल वाले मैदान क्षेत्रों में नदी अधिक मेअंडर करती है।

(iii) जलविज्ञान (Hydrology):

⇒ प्रवाह की गति और जल की मात्रा भी वक्रता को प्रभावित करती है।

(iv) अवसादन (Sedimentation):

⇒ अधिक अवसादन वाली नदियाँ नए-नए चैनल बनाकर अधिक घुमावदार हो जाती हैं।

(v) वनस्पति एवं जलवायु (Vegetation & Climate):

⇒ अधिक वर्षा और सघन वनस्पति वाले क्षेत्रों में नदी का मार्ग अधिक नियंत्रित रहता है।

सिनुओसिटी इंडेक्स का महत्व (Significance of Sinuosity Index)

(i) नदी वर्गीकरण (River Classification): इससे नदियों को सीधी, सिनुअस और मेअंडरिंग में बाँटा जा सकता है।

(ii) बाढ़ अध्ययन (Flood Analysis): अधिक सिनुओस नदियाँ बाढ़ प्रवण होती हैं।

(iii) अपक्षय और निक्षेपण (Erosion & Deposition): मोड़दार नदियों में अपरदन और निक्षेपण की दर अधिक रहती है।

(iv) भू-आकृतिक विकास (Geomorphic Evolution): किसी क्षेत्र की भू-आकृति के विकास क्रम को समझने में सहायक।

(v) इंजीनियरिंग परियोजनाएँ (Engineering Projects): बाँध, पुल और नहर योजना बनाने में आवश्यक।

(vi) पर्यावरणीय अध्ययन (Environmental Studies): नदी पारिस्थितिकी तंत्र पर मानवीय गतिविधियों के प्रभाव का विश्लेषण।

अनुप्रयोग (Applications in Geomorphology and Hydrology)

(i) Geomorphic Mapping: GIS और Remote Sensing तकनीकों से नदियों के मेअंडरिंग पैटर्न का अध्ययन।

(ii) River Basin Management: सिंचाई, जल प्रबंधन और हाइड्रोपावर परियोजनाओं में योजना निर्माण।

(iii) Climate Change Studies: समय के साथ सिनुओसिटी इंडेक्स में परिवर्तन जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को दर्शाता है।

(iv) Hazard Mitigation: बाढ़ एवं तटीय कटाव के प्रबंधन में उपयोगी।

(v) Historical River Courses: प्राचीन नदी पथों की पहचान करने में सहायक।

अध्ययन क्षेत्र उदाहरण (Case Studies)

1. गंगा नदी (Gangetic Plains):

⇒ गंगा मैदान में सिनुओसिटी इंडेक्स 1.5 से अधिक पाया गया है।

⇒ यहाँ बड़े पैमाने पर मेअंडर और ऑक्स-बो झीलें मिलती हैं।

2. ब्रहमपुत्र नदी (Brahmaputra):

⇒ उच्च अवसादन और चौड़े मैदान के कारण इसकी सिनुओसिटी उच्च है।

3. नर्मदा और ताप्ती नदियाँ:

⇒ भ्रंश रेखाओं के कारण सीधी प्रवृत्ति अधिक।

⇒ सिनुओसिटी इंडेक्स अपेक्षाकृत कम।

सीमाएँ (Limitations of Sinuosity Index)

⇒ केवल लंबाई माप पर आधारित होने से यह सूचकांक नदी की त्रि-आयामी जटिलताओं को नहीं दर्शा पाता।

⇒ मौसमी और बाढ़जन्य परिवर्तनों से इंडेक्स में समय-समय पर अंतर आ सकता है।

⇒ मानवीय हस्तक्षेप (जैसे तटबंध, नहरें) नदी की प्राकृतिक सिनुओसिटी को प्रभावित करते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)

    सिनुओसिटी इंडेक्स नदी विज्ञान (Fluvial Geomorphology) का एक महत्वपूर्ण मात्रात्मक सूचकांक है जो नदी की वक्रता अथवा मेअंडरिंग की प्रवृत्ति को मापने में सहायक है।

    इसके माध्यम से किसी नदी की प्रवाह गतिशीलता, अवसादन की स्थिति, बाढ़ की प्रवृत्ति और भू-आकृतिक विकास की दिशा का आकलन किया जा सकता है। यद्यपि इसमें कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी यह भूगोल, पर्यावरण विज्ञान, जल संसाधन प्रबंधन और इंजीनियरिंग के लिए एक अनिवार्य उपकरण है।



Drainage Density (अपवाह घनत्व)

परिचय

      अपवाह घनत्व (Drainage Density) एक मापक है जो किसी जल निकासी बेसिन (drainage basin) के कुल क्षेत्रफल में सभी धाराओं और नदियों की कुल लंबाई के अनुपात को दर्शाता है। इसकी गणना करने के लिए, बेसिन में सभी धाराओं की कुल लंबाई को बेसिन के कुल क्षेत्रफल से विभाजित किया जाता है। उच्च अपवाह घनत्व का अर्थ है अधिक धाराएँ जो तेज़ी से वर्षा जल को बाहर निकालती हैं, जिससे उच्च शिखर प्रवाह होता है। 

    जल-अपवाह प्रणाली (Drainage System) किसी भी भू-भाग के भौतिक स्वरूप, जलवायु, शैल संरचना तथा समय के सामूहिक प्रभाव का परिणाम होती है। किसी नदी-घाटी या जलागम क्षेत्र (Drainage Basin) का वैज्ञानिक अध्ययन मॉर्फोमेट्रिक विश्लेषण कहलाता है। इसमें नदी नेटवर्क के स्वरूप, संरचना और मापदंडों को संख्यात्मक रूप से परखा जाता है।

      इनमें से अपवाह घनत्व (Drainage Density- Dd) एक प्रमुख मानक है, जो किसी जलागम क्षेत्र की सतह पर उपस्थित नदियों एवं नालों की लम्बाई और उनके क्षेत्रफल के अनुपात को दर्शाता है। यह सूचकांक भूमि की अपवाह प्रवृत्ति, सतही जल प्रवाह, अपरदन क्षमता तथा भू-आकृतिक विकास की दिशा को स्पष्ट करता है।

परिभाषा-

⇒ अपवाह घनत्व को सबसे पहले Horton (1945) ने परिभाषित किया।

“किसी जलागम क्षेत्र में उपस्थित सभी धाराओं (streams) की कुल लम्बाई और उस जलागम क्षेत्र के कुल क्षेत्रफल का अनुपात ही अपवाह घनत्व कहलाता है।”

सूत्र:

जहाँ- 

⇒ Dd = अपवाह घनत्व

⇒ Lu = क्षेत्र में सभी धाराओं की कुल लम्बाई

⇒ A = जलागम क्षेत्र का क्षेत्रफल

माप की इकाई – km/km² या m/m²

अपवाह घनत्व की अवधारणा

⇒ यदि किसी क्षेत्र में धाराओं का जाल अधिक सघन है, तो वहाँ अपवाह घनत्व अधिक होगा।

⇒ यदि धाराएँ विरल हैं, तो अपवाह घनत्व कम होगा।

⇒ यह न केवल धाराओं की संख्या पर निर्भर करता है बल्कि उनकी औसत लम्बाई और भू-आकृतिक परिस्थिति पर भी आधारित है।

अपवाह घनत्व को प्रभावित करने वाले कारक

अपवाह घनत्व अनेक प्राकृतिक और मानव-निर्मित कारकों पर निर्भर करता है। प्रमुख कारक निम्न हैं –

(i) जलवायु (Climate)

⇒ शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में वर्षा कम होने से अपवाह घनत्व अधिक होता है क्योंकि जल सतह पर अधिक समय नहीं टिकता।

⇒ आर्द्र क्षेत्रों में अधिक वर्षा और वनस्पति आवरण के कारण जल का भूमिगत रिसाव अधिक होता है, जिससे अपवाह घनत्व अपेक्षाकृत कम होता है।

(ii) शैल संरचना (Rock Structure)

⇒ अभेद्य शैलों (impermeable rocks) जैसे ग्रेनाइट, बेसाल्ट आदि क्षेत्रों में अपवाह घनत्व उच्च होता है।

⇒ जबकि छिद्रयुक्त और भंगुर शैलों (permeable rocks) जैसे बलुआ पत्थर, चूना पत्थर में जल का अवशोषण अधिक होने से अपवाह घनत्व कम होता है।

(iii) स्थलाकृति (Relief)

⇒ उच्च ढाल (high relief) वाले क्षेत्रों में जल तीव्र गति से बहता है, जिससे नदियों का नेटवर्क घना होता है और Dd अधिक होता है।

⇒ समतल क्षेत्रों में ढाल कम होने से नदियों का विकास धीमा होता है, जिससे Dd कम होता है।

(iv) मृदा एवं वनस्पति आवरण (Soil & Vegetation)

⇒ रेतीली व भुरभुरी मिट्टी में जल अवशोषण अधिक होने से अपवाह घनत्व कम।

⇒ चिकनी मिट्टी या शिल्ट वाले क्षेत्रों में अपवाह घनत्व अधिक।

⇒ घने वनस्पति आवरण वाले क्षेत्र में जल भूमिगत चला जाता है, जिससे अपवाह घनत्व घटता है।

(v) समय (Time Factor)

⇒ नवनिर्मित पर्वतीय क्षेत्रों (Youth stage) में अपवाह घनत्व अधिक।

⇒ प्रौढ़ और वृद्धावस्था वाली नदियों के मैदान क्षेत्रों में अपवाह घनत्व कम।

अपवाह घनत्व के मापन की विधि

(i) स्थलाकृतिक मानचित्र पर आधारित मापन

⇒ संबंधित जलागम क्षेत्र की सीमा निर्धारण।

⇒ सभी धाराओं की पहचान कर उनकी लम्बाई मापना।

⇒ कुल क्षेत्रफल निकालना।

⇒ सूत्र का प्रयोग कर अपवाह घनत्व ज्ञात करना।

(ii) जीआईएस एवं रिमोट सेंसिंग आधारित तकनीक

आज के समय में उपग्रह चित्रों, DEM (Digital Elevation Model) तथा GIS सॉफ्टवेयर के प्रयोग से Drainage Density का सटीक मापन किया जाता है।

अपवाह घनत्व का वर्गीकरण

        हॉर्टन एवं स्ट्राहलर के आधार पर 

⇒ अल्प अपवाह घनत्व (Low Dd): 2 km/km² से कम

⇒ मध्यम अपवाह घनत्व (Moderate Dd): 2 – 5 km/km²

⇒ उच्च अपवाह घनत्व (High Dd): 5 km/km² से अधिक

अपवाह घनत्व का महत्व

(i) जलविज्ञानिक महत्व

⇒ सतही अपवाह की दर ज्ञात होती है।

⇒ बाढ़ की संभावना का आकलन किया जा सकता है।

⇒ जल संसाधन प्रबंधन की योजना में सहायक।

(ii) भू-आकृतिक महत्व

⇒ स्थलाकृति विकास की अवस्था का अनुमान।

⇒ अपरदन एवं निक्षेपण की दर का पता चलता है।

⇒ शैल संरचना एवं ढाल का प्रभाव ज्ञात होता है।

(iii) पर्यावरणीय महत्व

⇒ मृदा अपरदन व भूमि अवनयन का अध्ययन।

⇒ वनस्पति संरक्षण और भूमि उपयोग की योजना।

विश्व एवं भारत के संदर्भ में

⇒ रेगिस्तानी क्षेत्र (राजस्थान, सहारा, अटाकामा): शुष्कता व अभेद्य सतह के कारण उच्च अपवाह घनत्व।

हिमालयी क्षेत्र: तीव्र ढाल एवं अपरदन के कारण उच्च Dd।

⇒ गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान: समतल स्थलाकृति व छिद्रयुक्त निक्षेप के कारण निम्न Dd।

⇒ दक्षिण भारत का दक्कन ट्रैप: बेसाल्टिक संरचना के कारण मध्यम से उच्च Dd।

अपवाह घनत्व और जलागम प्रबंधन

⇒ उच्च Dd वाले क्षेत्रों में वर्षा का जल शीघ्र बह जाता है, अतः वहाँ जल-संरक्षण तकनीक आवश्यक।

⇒ निम्न Dd वाले क्षेत्रों में भू-जल पुनर्भरण संरचनाएँ उपयुक्त।

⇒ यह सूचकांक सिंचाई, जलविद्युत एवं बाढ़ नियंत्रण परियोजनाओं के लिए आधार बनता है।

आलोचनात्मक मूल्यांकन

⇒ अपवाह घनत्व एक मात्रात्मक सूचकांक है, परंतु यह अकेले किसी क्षेत्र की सम्पूर्ण जलविज्ञानिक स्थिति नहीं बताता।

⇒ इसे अन्य मॉर्फोमेट्रिक मानकों (जैसे Stream Frequency, Bifurcation Ratio, Elongation Ratio) के साथ मिलाकर देखना आवश्यक है।

⇒ आधुनिक युग में GIS आधारित अध्ययन इसे अधिक सटीक एवं व्यावहारिक बनाते हैं।

निष्कर्ष

   अपवाह घनत्व किसी भी जलागम क्षेत्र के भौतिक-भूगर्भिक स्वरूप, वर्षा, शैल संरचना एवं अपरदन क्षमता का दर्पण है। यह नदी-तंत्र की प्रकृति और क्षेत्र की जलविज्ञानिक विशेषताओं को मापने का सर्वाधिक सरल एवं प्रभावी साधन है। 

    उच्च और निम्न अपवाह घनत्व का तुलनात्मक अध्ययन हमें न केवल क्षेत्रीय भू-आकृतिक विकास की जानकारी देता है, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में भी सहायक होता है।

39. Geomorphic Evolution of Kashmir Himalayas (कश्मीर हिमालय का भू-आकृतिक विकास)

Geomorphic Evolution of Kashmir Himalayas

(कश्मीर हिमालय का भू-आकृतिक विकास)



परिचय

     कश्मीर हिमालय भारतीय हिमालय का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है, जो अपनी विशिष्ट भू-संरचना, स्थलाकृति, नदियों की व्यवस्था, हिमानी-परिहिमानी प्रक्रियाओं तथा भूकंपीय गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध है।

   यह क्षेत्र भू-आकृतिक दृष्टि से न केवल भारतीय उपमहाद्वीप का बल्कि सम्पूर्ण एशिया का एक अद्वितीय प्राकृतिक प्रयोगशाला है। कश्मीर की भौगोलिक स्थिति, स्थलाकृतिक विशेषताएँ और भूगर्भीय संरचना इसके दीर्घकालीन भू-आकृतिक विकास की गवाही देती हैं।

भौगोलिक स्थिति और विस्तार

कश्मीर हिमालय भारतीय हिमालय का पश्चिमोत्तर भाग है।

यह क्षेत्र 33° से 36° उत्तरी अक्षांश तथा 73° से 80° पूर्वी देशांतरों के बीच फैला है।

इसके उत्तर में काराकोरम पर्वत तथा अक्साई चिन, दक्षिण में पीरपंजाल, पूर्व में लद्दाख श्रेणियाँ और पश्चिम में पाकिस्तान नियंत्रित क्षेत्र स्थित हैं।

प्रमुख स्थलरूप: कश्मीर घाटी, जो हिमालयी पर्वतमालाओं से घिरी हुई है और एक अर्ध-तलछटी अवसाद (intermontane basin) का रूप प्रस्तुत करती है।

भूवैज्ञानिक पृष्ठभूमि

   कश्मीर हिमालय का भू-आकृतिक विकास भारतीय प्लेट और यूरेशियाई प्लेट के परस्पर संयोग एवं टकराव का प्रत्यक्ष परिणाम है।

(i) प्राकैम्ब्रियन चट्टानें- क्षेत्र में प्राचीन कायांतरित चट्टानें (शिस्ट, निस, क्वार्टजाइट) पाई जाती हैं।

(ii) पैलियोजोइक काल- इस काल में कार्बोनीफेरस व पर्मियन युग की चूना पत्थरी व बलुआ पत्थरी परतें जमीं।

(iii) मेसोजोइक काल- समुद्री निक्षेप (limestones, shales) का प्रभुत्व रहा।

(iv) टर्शियरी काल- भारतीय प्लेट की यूरेशियन प्लेट से टक्कर के कारण  शिवालिक, पीरपंजाल तथा महान हिमालय का उत्थान हुआ। इसी समय कश्मीर घाटी का निर्माण हुआ।

(v) क्वाटर्नरी काल- हिमानी व परिहिमानी प्रक्रियाओं का प्रभाव, झेलम बेसिन में झीलों का निर्माण, हंगाम वुल्कैनिक गतिविधियाँ तथा जलोढ़ निक्षेपों का जमाव हुआ।

संरचनात्मक विशेषताएँ

     कश्मीर हिमालय में तीन प्रमुख भू-आकृतिक इकाइयाँ मिलती हैं –

1. काराकोरम एवं जास्कार क्षेत्र- उच्च हिमालयी भाग।

2. कश्मीर घाटी- अर्ध-संरचनात्मक अवसाद (trough) जो चारों ओर पर्वतों से घिरी है।

3. पीरपंजाल- दक्षिणी सीमा पर फैली पर्वतश्रेणी।

    इन संरचनात्मक इकाइयों के कारण यहाँ विविध स्थलरूप एवं भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ पाई जाती हैं।

प्रमुख स्थलरूप एवं भू-आकृतिक विशेषताएँ

(i) पर्वतीय स्थलाकृतियाँ

नुंगी पर्वत, हर्मुख, त्रिशूल जैसी चोटियाँ।

उच्च हिमालयी क्षेत्र में तीव्र ढाल, गहरी घाटियाँ तथा नुकीली चोटियाँ (Horn, Aretes) विकसित हैं।

भ्रंश रेखाओं एवं भ्रंश घाटियों की प्रचुरता।

(ii) कश्मीर घाटी

⇒  यह लगभग 135 किमी लंबी और 32 किमी चौड़ी।

झेलम नदी द्वारा निकासी।

घाटी मूलतः एक झील अवसाद थी (प्लीस्टोसीन कालीन Karewa Lake)।

करेवा निक्षेप विश्व प्रसिद्ध हैं। ये निक्षेप झील अवसादों में जमा अवसाद (silt, clay, sand, lignite) हैं।

(iii) नदी एवं झील स्थलरूप

झेलम नदी- मुख्य निकासी प्रणाली, वुलर झील से निकलती है।

डल झील, नागिन झील, मानसर व सुरिनसर झील – सुंदर झील स्थलरूप।

वुलर झील – एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झीलों में से एक।

(iv) हिमानी एवं परिहिमानी स्थलरूप

ग्लेशियर घाटियाँ – सिंध, लिद्दर, किशनगंगा।

सर्क, मोरेन, यू-आकार की घाटियाँ, हंगिंग वैलीज।

क्वाटर्नरी हिमनियों ने कश्मीर की स्थलाकृति पर गहरा प्रभाव डाला।

भू-आकृतिक विकास की प्रक्रियाएँ

(i) प्लेट विवर्तनिकी एवं भ्रंश

भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट से टकराव।

मेजर थ्रस्ट: मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT), मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT), हजारा-कश्मीर सिंटैक्सिस।

इन भ्रंशों के कारण भूकंपीय गतिविधियाँ अत्यधिक हैं।

(ii) नदी प्रक्रियाएँ

झेलम एवं उसकी सहायक नदियाँ (लिद्दर, किशनगंगा, सिंध)।

कटाव, निक्षेपण एवं तलछटी मैदान का विकास।

Karewa निक्षेपों पर जलोढ़ क्रियाएँ।

(iii) हिमानी प्रक्रियाएँ

हिमयुगों में विशाल ग्लेशियरों ने घाटियों को यू-आकार का बनाया।

मोरेन व बहाव द्वारा जलोढ़ का जमाव।

(iv) परिहिमानी प्रक्रियाएँ

फ्रीज-थॉ चक्र, पाला-कटाव, शैल-खंडन।

स्क्री ढालों, टैलस ढेरों का निर्माण।

करेवा निक्षेपों का महत्व

कश्मीर की भू-आकृतिक विकास गाथा का मुख्य आधार।

झील अवसादों से बने।

इनमें जीवाश्म अवशेष (हाथी, घोड़ा, गैंडा) पाए गए हैं।

यह क्षेत्र की पुराजीविकी, पुरा-जलवायु एवं पुरा-भू-आकृतिक अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भूकंपीय गतिविधि एवं भू-आकृतिक प्रभाव

कश्मीर हिमालय विश्व के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में से एक है।

2005 का कश्मीर भूकंप (Muzaffarabad Earthquake) इसका उदाहरण है।

भ्रंश रेखाएँ, भूमि धंसाव, भूस्खलन एवं नदी मार्ग परिवर्तन इस क्षेत्र की प्रमुख भू-आकृतिक समस्याएँ हैं।

मानव एवं भू-आकृतिक अंतःक्रिया

करेवा निक्षेप कृषि (केसर उत्पादन) के लिए उपयुक्त।

झीलों का पर्यटन और मत्स्य पालन में महत्व।

लेकिन शहरीकरण, वनों की कटाई और अवैज्ञानिक भूमि उपयोग से भूमि धंसाव, झील सिकुड़न और भूस्खलन की समस्याएँ।

भू-आकृतिक महत्व

 हिमालय के उद्भव और विकास को समझने में सहायक।

क्वाटर्नरी हिमानी अध्ययन की प्रयोगशाला।

करेवा निक्षेप पुराजीविकी के प्रमाण।

भूकंपीय सक्रियता का अध्ययन स्थल।

मानव-भू-आकृतिक संबंधों का जीवंत उदाहरण।

निष्कर्ष

      कश्मीर हिमालय का भू-आकृतिक विकास एक जटिल किंतु अत्यंत रोचक गाथा है, जिसमें प्लेट विवर्तनिकी, पर्वत निर्माण, भ्रंश, हिमानी-परिहिमानी क्रियाएँ, नदी प्रक्रियाएँ और मानव हस्तक्षेप सभी ने योगदान दिया है।

    कश्मीर घाटी के करेवा निक्षेप, झीलें, हिमानी घाटियाँ और भूकंपीय गतिविधियाँ इस क्षेत्र को विशेष बनाती हैं। यह क्षेत्र भूगर्भशास्त्रियों और भू-आकृतिविदों के लिए एक जीवंत प्रयोगशाला है, जो न केवल अतीत की भूवैज्ञानिक घटनाओं का अध्ययन कराता है, बल्कि वर्तमान और भविष्य के पर्यावरणीय व भू-आकृतिक परिवर्तनों के संकेत भी देता है।

38. Geomorphic Evolution of Peninsular India (भारतीय प्रायद्वीप का भू-आकृतिक विकास)

Geomorphic Evolution of Peninsular India

(भारतीय प्रायद्वीप का भू-आकृतिक विकास)



परिचय

       भारतीय उपमहाद्वीप का प्रायद्वीपीय भाग भू-वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत प्राचीन, स्थिर एवं जटिल भू-आकृतिक विकास का उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह भाग आर्कियन काल (Archaean Era) से अस्तित्व में है और इसे विश्व के प्राचीनतम भू-भागों में गिना जाता है। यहाँ की स्थलाकृति मुख्यतः पठार, अवशेष पर्वत, भ्रंश घाटियाँ, लावा प्रवाह क्षेत्र, तटीय मैदान और डेल्टा के रूप में विकसित हुई है।

      प्रायद्वीप का भू-आकृतिक विकास केवल भू-आंतरिक शक्तियों (जैसे प्लेट विवर्तनिकी, ज्वालामुखीय गतिविधि, भ्रंश) से ही नहीं बल्कि बाह्य शक्तियों (जैसे नदियाँ, हवाएँ, समुद्री क्रिया, अपक्षय एवं अपरदन) से भी प्रभावित हुआ है।

भूवैज्ञानिक पृष्ठभूमि (Geological Background)

(i) आर्कियन युग (2500–3500 मिलियन वर्ष पूर्व)

⇒ भारतीय प्रायद्वीप का आधारभूत शिल्ड इसी काल में बना।

⇒ प्रमुख चट्टानें – ग्रेनाइट, निस, बेसाल्ट, चार्नोकाइट

⇒ प्रमुख क्रेटॉन: बुंदेलखंड, धारवाड़, सिंहभूम, अरावली

नोट: भूविज्ञान में क्रेटॉन एक प्राचीन, स्थिर महाद्वीपीय क्रस्ट का हिस्सा होता है।

(ii) प्रोटेरोजोइक युग

⇒ अरावली पर्वतमाला का निर्माण (विश्व की प्राचीनतम मुड़ी पर्वतमाला)।

⇒ विंध्यन और सतपुड़ा शृंखलाओं का विकास।

⇒ लौह, ताँबा, मैंगनीज, बॉक्साइट जैसे खनिज उत्पन्न हुए।

(iii) पेलियोजोइक व मेसोजोइक काल

⇒ गोंडवाना अवसाद (कोयला क्षेत्र – झरिया, रानीगंज, सोहागपुर)।

⇒ डेक्कन ट्रैप (65 मिलियन वर्ष पूर्व): विशाल ज्वालामुखीय लावा प्रवाह।

⇒ नर्मदा-ताप्ती भ्रंश घाटियों का निर्माण।

(iv) सिनोजोइक काल

⇒ भारतीय प्लेट के यूरेशियन प्लेट से टकराने पर हिमालय का निर्माण।

⇒ प्रायद्वीप का पुनरुत्थान और नदियों में पुनर्यौवन (Rejuvenation)

स्थलरूपीय विकास (Geomorphic Evolution)

(i) प्रायद्वीपीय पठार

⇒ “ब्लॉक पठार” के रूप में प्राचीनतम स्थलरूप।

⇒ मुख्य विभाजन:-

1. मध्य भारत पठार विन्ध्य, सतपुड़ा, महादेव, मैकाल।

2. दक्षिण भारत पठार नीलगिरी, पश्चिमी एवं पूर्वी घाट।

3. छोटा नागपुर पठार – कोयला व लौह अयस्क से समृद्ध।

(ii) पर्वतमालाएँ

⇒ अरावली शृंखला अवशेष पर्वत, अपक्षयित।

⇒ विन्ध्य पर्वत क्षैतिज अवसादी शृंखला।

⇒ सतपुड़ा-मैकाल भ्रंशजन्य उत्थान से निर्मित।

(iii) नदियाँ

1. पश्चिमवाहिनी नदियाँ नर्मदा, ताप्ती (भ्रंश गर्त में प्रवाहित)।

2. पूर्ववाहिनी नदियाँ गोदावरी, कृष्णा, कावेरी (डेल्टा निर्मित करती हैं)।

3. नदी घाटी विकास

⇒ युवावस्था: गहरी घाटियाँ।

⇒ प्रौढ़ावस्था: उपजाऊ मैदान।

⇒ वृद्धावस्था: डेल्टा व बाढ़मैदान।

(iv) तटीय मैदान

⇒ पश्चिमी तट: संकीर्ण, ऊँचा, एस्च्युरिन (Estuarine)।

⇒ पूर्वी तट: विस्तृत, डेल्टाई, निक्षेपण प्रधान।

(v) डेक्कन ट्रैप

⇒ ज्वालामुखीय लावा प्रवाह से बना।

⇒ सीढ़ीनुमा स्थलाकृति (Step-like Topography)।

भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

(i) अंतर्जात प्रक्रियाएँ

⇒ प्लेट विवर्तनिकी, भ्रंश, ज्वालामुखीय गतिविधि।

⇒ नर्मदा-ताप्ती गर्त, डेक्कन ट्रैप।

(ii) बहिर्जात प्रक्रियाएँ

⇒ अपक्षय – टोर, इंसेल्बर्ग।

⇒ अपरदन नदियों द्वारा गहरी घाटियाँ।

⇒ समुद्री क्रियातटीय खड़ी चट्टानें, लैगून, डेल्टा।

प्रमुख भू-आकृतिक इकाइयाँ (Major Geomorphic Units)

(i) अरावली पर्वतमाला अपक्षयित अवशेष पर्वत।

(ii) विन्ध्यन श्रेणी क्षैतिज संरचना वाली पठारी श्रेणी।

(iii) सतपुड़ा-मैकाल श्रेणी भ्रंश व उत्थान से निर्मित।

(iv) छोटा नागपुर पठार खनिज संपन्न क्षेत्र।

(v) डेक्कन ट्रैप ज्वालामुखीय शृंखला, basalt plateau।

(vi) पश्चिमी घाट तीव्र ढाल, कोंकण, मालाबार तट।

(vii) पूर्वी घाट अवशेष रूप में, नदियों द्वारा खंडित।

आधुनिक भू-आकृतिक स्वरूप (Present-Day Landforms)

    भारतीय प्रायद्वीप पृथ्वी के सबसे प्राचीन स्थलों में से एक है, जिसका निर्माण आर्कियन युग में हुआ। यह भू-भाग गोंडवाना भूमि का हिस्सा रहा है। भूगर्भीय दृष्टि से प्रायद्वीपीय भारत अत्यंत स्थिर है, किन्तु विभिन्न कालों में हुए उत्थान, अपक्षय तथा अपरदन ने इसके भू-आकृतिक स्वरूप को विविध बना दिया है।

⇒ पेडीप्लेन और पेनिप्लेन स्थलाकृति।

⇒ इंसेल्बर्ग (Monadnocks), टोर।

⇒ नदियों की गहरी घाटियाँ (गोदावरी, नर्मदा)।

⇒ तटीय क्षेत्र में लैगून, डेल्टा, एस्च्युरिन।

⇒ पठारी क्षेत्र में लावा सीढ़ियाँ।

निष्कर्ष (Conclusion)

      भारतीय प्रायद्वीप का भू-आकृतिक विकास बहुस्तरीय और जटिल प्रक्रिया है, जिसमें प्राचीनतम आर्कियन शैलों से लेकर आधुनिक नदियों द्वारा निर्मित मैदान तक सभी तत्व शामिल हैं। इसकी भू-आकृतिक विकास हमें यह बताती है कि यह क्षेत्र एक स्थिर प्राचीन भूखंड होने के बावजूद समय-समय पर ज्वालामुखीय गतिविधियों, विवर्तनिक टक्करों और अपरदन प्रक्रियाओं से प्रभावित रहा है।

     इस प्रकार प्रायद्वीपीय भारत का भू-आकृतिक विकास भारतीय भूगोल के अध्ययन में न केवल अकादमिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि कृषि, खनिज संसाधन, जलविद्युत और मानव बसावट की दृष्टि से भी अत्यंत प्रासंगिक है।

37. Geomorphic Evolution of Shillong Plateau (शिलांग पठार का भू-आकृतिक विकास)

Geomorphic Evolution of Shillong Plateau

(शिलांग पठार का भू-आकृतिक विकास)



परिचय

    भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में अवस्थित शिलांग पठार (Shillong Plateau) भू-आकृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। यह पठार मेघालय राज्य का प्रमुख भाग बनाता है तथा भौगोलिक, भूवैज्ञानिक एवं स्थलाकृतिक दृष्टि से अद्वितीय विशेषताएँ प्रस्तुत करता है। इसे भारत के प्राचीनतम भूखंडों में गिना जाता है जो अर्ध-गोलाकार रूप में उत्तर में ब्रह्मपुत्र घाटी, दक्षिण में बांग्लादेश का मैदान, पश्चिम में गारो के पहाड़ी तथा पूर्व में नगालैंड-मणिपुर के पहाड़ी प्रदेशों से घिरा हुआ है।

    भू-आकृतिक विकास के अध्ययन से ज्ञात होता है कि शिलांग पठार भारतीय प्रायद्वीप के पूर्वोत्तर विस्तार का भाग है जो विवर्तनिक गतिविधियों के कारण ब्रह्मपुत्र घाटी और बंगाल बेसिन से पृथक हुआ। इसकी संरचना मुख्यतः प्राचीन आर्कियन चट्टानों, ग्रेनाइट-निस और कार्बोनेट शैलों से बनी है। मानसूनी वर्षा और तीव्र अपरदन प्रक्रियाओं ने इसे विशिष्ट स्वरूप प्रदान किया है।

      इस पठार का भू-आकृतिक विकास केवल स्थानीय प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है बल्कि इसका सीधा संबंध हिमालय के उत्थान, इंडो-बर्मा शृंखला तथा ब्रह्मपुत्र-गंगा-बांग्लादेश डेल्टा के निर्माण से भी है।

भौगोलिक स्थिति

    शिलांग पठार मेघालय राज्य का केंद्रीय भाग है।

⇒ अक्षांशीय विस्तार – 25°00′ से 26°15′ उत्तरी अक्षांश

⇒ देशांतरीय विस्तार – 90°45′ से 92°15′ पूर्वी देशांतर

⇒ ऊँचाई – औसतन 1500 मीटर से 1961 मीटर (शिलांग पीक)

⇒ क्षेत्रफल – लगभग 8,500 वर्ग किमी०

स्थलाकृतिक स्वरूप

   स्थलाकृतिक दृष्टि से यह पठार खंडित एवं असमान है। इसकी सतह पर अनेक ऊँची-नीची पहाड़ियाँ, संकरी घाटियाँ, गहरी खाइयाँ तथा जलप्रपात पाए जाते हैं। दक्षिणी भाग तीव्र ढाल लिए हुए बांग्लादेश मैदान की ओर गिरता है। इस कारण यहाँ अनेक झरने जैसे- नोहकलिकाई फॉल्स, एलिफेंट फॉल्स, सेवन सिस्टर्स फॉल्स इत्यादि विकसित हुए हैं।

    पठार का पश्चिमी भाग गारो पहाड़ी, मध्य भाग खासी पहाड़ी तथा पूर्वी भाग जयंतिया पहाड़ी कहलाता है। इन तीनों क्षेत्रों में स्थलरूपों की विविधता स्पष्ट देखी जा सकती है।

भूगर्भीय संरचना (Geological Structure)

     शिलांग पठार की भूगर्भीय संरचना अत्यंत प्राचीन एवं जटिल है।

1. प्राचीन चट्टानें (Archaean Complex):-

⇒ मुख्यतः निस, ग्रेनाइट, शिस्ट और क्वार्टजाइट।

⇒ इनका निर्माण लगभग 2500-3000 मिलियन वर्ष पूर्व हुआ।

2. विवर्तनिकी ढाँचा (Tectonic Framework):

⇒ यह पठार शिलांग मासिफ (Shillong Massif) के रूप में जाना जाता है।

⇒ उत्तरी भाग में ब्रह्मपुत्र घाटी इसे हिमालय से अलग करती है।

⇒ दक्षिण में डौकी भ्रंश (Dauki Fault) इसे बंगाल बेसिन से अलग करता है।

3. भ्रंश एवं भ्रंशन:

⇒ डौकी भ्रंश (Dauki Fault): सबसे महत्त्वपूर्ण, जिसने पठार को अचानक उठाकर बांग्लादेश मैदान से अलग किया।

⇒ शिलांग भ्रंश (Shillong Fault) एवं बारपानी भ्रंश (Barapani Fault): आंतरिक उत्थान एवं भूकंपीय गतिविधि के लिए उत्तरदायी।

    इन भूगर्भीय प्रक्रियाओं ने पठार को स्थिर नहीं रहने दिया बल्कि निरंतर उत्थान, झुकाव एवं भूकंप जैसी घटनाओं से प्रभावित किया।

शिलांग पठार का भू-आकृतिक विकास

    शिलांग पठार का विकास कई चरणों में हुआ-

(i) प्राचीन काल (Precambrian to Gondwana)

⇒ यहाँ की आधारभूत चट्टानें प्रीकैम्ब्रियन युग की हैं।

⇒ प्रारंभिक काल में यह क्षेत्र समुद्री अवसाद था।

⇒ गोंडवाना काल (लगभग 250 मिलियन वर्ष पूर्व) में यहाँ कोयला एवं बलुआ पत्थर के निक्षेप बने।

(ii) विवर्तनिक उत्थान (Tectonic Uplift)

⇒ प्लेट विवर्तनिकी के परिणामस्वरूप हिमालय के उत्थान के साथ-साथ शिलांग पठार भी ऊँचा उठा।

⇒ डौकी भ्रंश ने इसे दक्षिण की ओर तीव्र ढाल प्रदान की।

⇒ ब्रह्मपुत्र घाटी का निर्माण इसी उत्थान के कारण हुआ।

(iii) अपरदन एवं अपक्षय

⇒ भारी मानसूनी वर्षा (12,000 मिमी से अधिक) के कारण तीव्र अपक्षय और अपरदन हुआ।

⇒ नदियों ने गहरी घाटियाँ काटीं।

⇒ दक्षिणी भाग में तीव्र ढाल से जलप्रपात बने।

(iv) नदी अपरदन और घाटी निर्माण

⇒ उम्गोट, बारापानी, उमियम और कपिली नदियों ने गहरी घाटियाँ निर्मित कीं।

⇒ कुछ घाटियाँ V-आकार की हैं जो नदी अपरदन की तीव्रता को दर्शाती हैं।

(v) करस्ट एवं चूना पत्थरीय रूपरेखाएँ

⇒ जयंतिया पहाड़ी में चूना पत्थर की प्रचुरता है।

⇒ यहाँ गुफाएँ (मावसमाई गुफा, सिजू गुफा) एवं स्टैलेग्माइट-स्टैलेक्टाइट रूप रेखाएँ पाई जाती हैं।

(vi) झरने एवं जलप्रपात

⇒ दक्षिणी ढाल पर अनेक भव्य जलप्रपात विकसित हैं।

⇒ इनमें नोहकलिकाई फॉल्स (1115 फीट) भारत का सबसे ऊँचा जलप्रपात है।

शिलांग पठार एवं हिमालय-ब्रह्मपुत्र-गंगा जियोडायनामिक्स

⇒ शिलांग पठार का भू-आकृतिक विकास केवल स्थानीय नहीं है।

⇒ हिमालय के उत्थान और ब्रह्मपुत्र घाटी के निर्माण से इसका सीधा संबंध है।

⇒ इंडो-बर्मा पर्वत शृंखला से भी इसका जियो-टेक्टोनिक संबंध है।

⇒ ब्रह्मपुत्र घाटी का अवसादन और डौकी भ्रंश से बंगाल बेसिन की रचना, पठार की आकृति निर्धारण में निर्णायक रहे।

⇒ भारतीय प्लेट का उत्तर की ओर बढ़ना (लगभग 5 सेमी/वर्ष) हिमालय को निरंतर ऊँचा कर रहा है।

⇒ शिलांग पठार इसका क्रस्टल ब्लॉक है, जो भ्रंशों के बीच फँसकर ऊपर उठा है।

⇒ गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन इन उत्थानों से निकले अवसादों का विशाल भंडार है।

⇒ पूरा क्षेत्र विश्व के सबसे सक्रिय टेक्टोनिक एवं सेस्मिक जोन में आता है।

जलवायु का प्रभाव

⇒ शिलांग पठार विश्व के सर्वाधिक वर्षावन क्षेत्रों में आता है।

⇒ मासिनराम और चेरापूंजी में 12,000 मिमी से अधिक वर्षा होती है।

⇒ भारी वर्षा के कारण तीव्र अपरदन, गहरी घाटियाँ और उर्वर मिट्टी का क्षरण हुआ।

⇒ मानसूनी जलप्रपात इस क्षेत्र की विशिष्ट पहचान हैं।

भू-आकृतिक विशेषताएँ (Major Landforms)

1. घाटियाँ और नदी नेटवर्क- उम्गोट, कपिली, उमियम जैसी नदियों की गहरी घाटियाँ।

2. जलोढ़ मैदान- नदी घाटियों में सीमित जलोढ़ निक्षेप।

3. कार्स्ट स्थलरूप- जयंतिया हिल्स में गुफाएँ और कार्स्ट क्षेत्र।

4. झरने एवं जलप्रपात- Nohkalikai, Seven Sisters, Elephant Falls।

5. टेबललैंड और पहाड़ी ढाल- गारो, खासी और जयंतिया की पहाड़ियों का विभाजन।

मानव-भू-आकृतिक अंतःक्रिया

⇒ यहाँ के खासी, गारो एवं जयंतिया जनजातियों ने सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming) विकसित की।

⇒ कोयला, चूना पत्थर, यूरेनियम जैसी खनिज संपदा का खनन भू-आकृतिक असंतुलन पैदा कर रहा है।

⇒ पर्यटन (झरने, गुफाएँ) स्थानीय अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण है।

वर्तमान समस्याएँ और भू-आकृतिक संकट

⇒ भूमि कटाव और मिट्टी का क्षरण

⇒ भूस्खलन और बाढ़

⇒ खनन से स्थलरूपों का विनाश

⇒ जलवायु परिवर्तन का प्रभाव- झरनों के जल प्रवाह में कमी

निष्कर्ष

    शिलांग पठार का भू-आकृतिक विकास प्राचीन आर्कियन काल से आरंभ होकर आज तक चलता आ रहा है। विवर्तनिक उत्थान, भ्रंश गतिविधि, भारी वर्षा और अपरदन प्रक्रियाओं ने इसे विशिष्ट स्वरूप प्रदान किया। इसका भू-आकृतिक महत्व केवल स्थानीय नहीं बल्कि हिमालय, ब्रह्मपुत्र घाटी और बंगाल बेसिन के जियोडायनामिक्स से जुड़ा है।

   मानव गतिविधियाँ (खनन, भूमि उपयोग परिवर्तन) इसके प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर रही हैं। भविष्य में यहाँ सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण की नीतियों की आवश्यकता है ताकि इस भू-आकृतिक धरोहर को संरक्षित रखा जा सके।

36. Geomorphic Evolution of Chotanagpur Highlands (छोटानागपुर उच्चभूमि का भू-आकृतिक विकास)

Geomorphic Evolution of  Chotanagpur Highlands

(छोटानागपुर उच्चभूमि का भू-आकृतिक विकास)



परिचय

    भारत के पूर्वी भाग में स्थित छोटानागपुर का पठार (Chotanagpur Plateau) भू-आकृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। छोटानागपुर उच्चभूमि भारत के झारखण्ड राज्य तथा पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और छत्तीसगढ़ के कुछ भागों में फैली हुई है। इसे “भारत का रूहा” (Roorh of India) भी कहा जाता है।

स्थिति एव विस्तार-

⇒ अक्षांश: 22° से 25° 30′ उत्तर अक्षांश तक।

⇒ देशान्तर: 83° 47′ से 87° 50′ पूर्वी देशान्तर तक।

⇒ राज्य: यह पठार झारखंड राज्य के अधिकांश हिस्से को कवर करता है और बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के निकटवर्ती भागों में भी फैला हुआ है। 

 छोटानागपुर पठार बिहार प्रांत से दक्षिण में 21°58′ से 24°50′ उत्तरी अक्षांश और 83°20′ से 86°58′ पूर्वी देशान्तर के बीच अवस्थित है।

इसका विस्तार लगभग 65,000 वर्ग किलोमीटर (25,000 वर्ग मील) क्षेत्रफल पर है तथा यह पठारी भाग गंगा के मैदान में अवस्थित है।

यह बिहार के औरंगाबाद, गया, नवादा, शेखपुरा, जमुई एवं भागलपुर तथा पश्चिम बंगाल के पुरूलिया आदि जिलों में भी इसका विस्तार है।

छोटानागपुर पठार के 90% से भी ज्यादा भू-भाग आर्कियन युग की चट्टानों से बनीं है बाकी 10% गोंडवाना तथा विन्ध्यन निक्षेपों तथा राजमहल और दक्कन में लावा प्रवाहों से निर्मित है।

प्र कैम्बियन युग से पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ-साथ ही इस पठार की भौगलिक संरचना प्रारंभ होती है। ठंढी एवं ठोस होती हुई पृथ्वी पर पड़ी झुर्रीयों के हजारों फिट उपर उठे भाग पर्वतों में एवं नीचे धँसे भाग गढ़े के रूप में तब्दील हो गए। फलतः प्रारम्भिक चट्टानों का निर्माण हुआ।

छोटानागपुर पठार की संरचना, विकास, स्थलाकृति और प्राकृतिक संसाधनों ने न केवल भौगोलिक परिदृश्य को प्रभावित किया है, बल्कि यहाँ की संस्कृति, अर्थव्यवस्था और मानव जीवन पर भी गहरा असर डाला है।

भूवैज्ञानिक संरचना और उत्पत्ति (Geological Structure and origin)

      छोटानागपुर पठार की नींव आर्कियन युग (Archaean Eon) की प्राचीन चट्टानों से बनी है, जो 2.5 अरब वर्ष से भी अधिक पुरानी हैं। इन चट्टानों में निस (gneiss) और शिस्ट प्रकार की कायांतरित (Metamorphic) संरचनाएँ शामिल हैं, जो इसकी खनिज संपदा का मुख्य आधार हैं। यह पठार मूल रूप से गोंडवाना भूभाग का हिस्सा था, जो लगभग 12 करोड़ साल पहले टूटकर अलग हो गया और धीरे-धीरे उत्तर की ओर सरकने लगा।

     दामोदर घाटी इस पठार के बीच से होकर गुजरती है, जो एक भ्रंश घाटी (Rift Valley) है। यह भ्रंश ऊपरी कार्बोनिफेरस से पर्मियन कल्प में भूगर्भीय हलचलों के कारण बना था। इस घाटी में गोंडवाना क्रम की अवसादी चट्टानें (Sedimentary rocks) पाई जाती हैं, जिनमें भारत का सबसे महत्वपूर्ण कोयला भंडार मौजूद है।

      छोटानागपुर पठार भूगर्भीय दृष्टि से प्राचीनतम संरचनाओं में से एक है।

आधार चट्टानें- यहाँ मुख्यतः निस (Gneiss), ग्रेनाइट (Granite), शिस्ट (Schist) तथा क्वार्टजाइट (Quartzite) पाई जाती हैं। ये सभी आर्कियन युग (Archaean Era) की हैं।

कोयला क्षेत्र- दामोदर, स्वर्णरेखा और कोएल नदियों की घाटियों में गोंडवाना शैलें (Gondwana Rocks) पाई जाती हैं, जिनमें कोयले के भंडार हैं।

खनिज संसाधन- लौह अयस्क, बॉक्साइट, मैंगनीज़, ताँबा, यूरेनियम और सोना यहाँ की प्रमुख विशेषता है।

भू-आकृतिक विकास की अवस्थाएँ (Stages of Geomorphic Evolution)

1. प्राचीन पर्वत निर्माण (Archaean Orogeny)

⇒ छोटानागपुर क्षेत्र की उत्पत्ति लगभग अरबों वर्ष पूर्व प्राचीन भूगर्भीय हलचलों से हुई।

⇒ निस, ग्रेनाइट तथा रूपांतरित शैलों ने यहाँ के आधार को निर्मित किया।

⇒ यह क्षेत्र मूलतः पर्वतीय क्षेत्र था, जो समय के साथ अपक्षय और अपरदन से पठार में परिवर्तित हो गया।

2. गोंडवाना काल (Paleozoic- Mesozoic Era)

⇒ लगभग 250 मिलियन वर्ष पूर्व यह क्षेत्र गोंडवाना भूभाग का हिस्सा था।

⇒ दामोदर और स्वर्णरेखा घाटियों में तलछटी शैलों का निर्माण हुआ।

⇒ इस काल में कोयला, बलुआ पत्थर और शेल का निक्षेपण हुआ।

3. अपरदन एवं पेडीप्लेन निर्माण (Erosion and Peneplanation)

⇒ लंबे समय तक अपरदन की प्रक्रिया के कारण यहाँ समतल सतह बनी।

⇒ बाद में नदियों ने गहरी घाटियाँ काटीं और पुनः स्थलरूपों में विविधता आई।

⇒ परिणामस्वरूप यहाँ पठारी भू-आकृति (Plateau Topography) और खंडित पर्वतीय स्थलरूप विकसित हुए।

4. टेक्टोनिक हलचलें (Tectonic Movements)

⇒ नियो-टेक्टोनिक गतिविधियों के कारण दामोदर, स्वर्णरेखा, कोएल और शंख जैसी नदियाँ भ्रंश (Faults) रेखाओं के साथ बहती हैं।

⇒ इससे यहाँ ग्राबेन घाटियाँ (Rift Valleys) बनीं, जैसे- दामोदर घाटी।

5. वर्तमान स्थलरूप विकास (Present Landform Development)

⇒ आज छोटानागपुर पठार में विविध स्थलरूप पाए जाते हैं, जैसे-

एकाश्मक पर्वत (Monadnocks/Inselsberg)- जैसे पारसनाथ, नेतरहाट हिल्स।

घाटियाँ- दामोदर, स्वर्णरेखा

झरने- हुंडरु, दशम, रजरप्पा

पठार सतह- रांची, हजारीबाग, पलामू

स्थलरूपों की विशेषताएँ (Landform Characteristics)

पठारी क्षेत्र- रांची पठार सबसे प्रमुख है जिसकी ऊँचाई लगभग 600 मीटर है।

नदी घाटियाँ- दामोदर और स्वर्णरेखा नदियाँ भ्रंश घाटियों में बहती हैं।

झरने और जलप्रपात- अपरदन और भ्रंश क्रियाओं के कारण अनेक जलप्रपात बने हैं।

हुंडरु जलप्रपात (98 मी.)

दशम जलप्रपात (44 मी.)

जोन्हा जलप्रपात

जलवायु प्रभाव एवं अपक्षय

⇒ यहाँ की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी है।

⇒ वर्षा ऋतु में तीव्र अपरदन होता है, जिससे मिट्टी का क्षरण और गहरी घाटियाँ निर्मित होती हैं।

⇒ शुष्क ऋतु में यांत्रिक अपक्षय (Mechanical Weathering) महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

खनिज संपदा और आर्थिक महत्व

    छोटानागपुर पठार को भारत का खनिज हृदय (Mineral Heartland) कहा जाता है।

⇒ लौह अयस्क- सिंहभूम, सरायकेला

⇒ कोयला- दामोदर घाटी

⇒ यूरेनियम- जादूगोड़ा

⇒ ताँबा- घाटशिला

⇒ बॉक्साइट- लोहरदगा

⇒ सोना- सिंहभूम
     खनिज संपदा के कारण यहाँ लौह एवं इस्पात उद्योग, विद्युत उत्पादन तथा अनेक खनिज-आधारित उद्योग विकसित हुए।

मानव-भौगोलिक विकास

⇒ यहाँ की जनसंख्या में आदिवासी समुदाय (मुंडा, संथाल, उरांव, हो आदि) प्रमुख हैं।

⇒ कृषि की अपेक्षा खनन और औद्योगिक गतिविधियाँ अधिक प्रभावी हैं।

⇒ रांची, जमशेदपुर, बोकारो, धनबाद आदि औद्योगिक नगर इसी क्षेत्र में विकसित हुए।

पर्यावरणीय चुनौतियाँ

⇒ खनन और औद्योगीकरण के कारण वनों की कटाई एवं मृदा अपरदन बढ़ा है।

⇒ जलप्रदूषण, वायु प्रदूषण और भूमि क्षरण गंभीर समस्या बन गए हैं।

⇒ आदिवासी समाज के विस्थापन और आजीविका संकट भी भू-आकृतिक विकास से जुड़ी चुनौतियाँ हैं।

निष्कर्ष

     छोटानागपुर पठार भारत का एक प्राचीन भू-भाग है जिसने अनेक भूगर्भीय और भू-आकृतिक परिवर्तनों का सामना किया है। प्राचीन पर्वत निर्माण से लेकर वर्तमान खंडित पठारी स्वरूप तक इसकी यात्रा भूगर्भ विज्ञानियों के लिए अत्यंत रोचक अध्ययन का विषय है।

     खनिज संपदा और विविध स्थलरूपों के कारण यह क्षेत्र भारत की आर्थिक धुरी भी है। किंतु अनियंत्रित खनन और औद्योगिकरण से उत्पन्न पर्यावरणीय समस्याओं पर ध्यान देना आवश्यक है, ताकि यहाँ का प्राकृतिक संतुलन बना रहे और सतत विकास संभव हो सके।

35. Channel Morphology (चैनल मॉर्फोलॉजी)

Channel Morphology

(चैनल मॉर्फोलॉजी)



      पृथ्वी पर नदियाँ प्राकृतिक जीवनधारा के रूप में प्रवाहित होती हैं। वे न केवल जल की आपूर्ति का साधन हैं बल्कि भू-आकृतिक संरचना, मृदा की उर्वरता, पारिस्थितिकी तंत्र और मानव सभ्यता के विकास में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। नदियों का आकार, प्रवाह और उनकी धारा के भीतर तथा किनारों पर बनने वाले स्थलरूप, वैज्ञानिक भाषा में चैनल मॉर्फोलॉजी (Channel Morphology) कहलाते हैं। चैनल मॉर्फोलॉजी नदियों की भौतिक संरचना, प्रवाह की प्रकृति, कटाव और निक्षेपण की प्रक्रिया, तलछट परिवहन तथा नदी तंत्र के विकास को समझने का आधार है।

Channel Morphology

चैनल मॉर्फोलॉजी की परिभाषा

   चैनल मॉर्फोलॉजी (Channel+Morpho+Logy) से आशय नदी की धारा या प्रवाह पथ की आकृति, संरचना और रूपात्मक विशेषताओं से है। यह बताती है कि नदी किस प्रकार प्रवाहित होती है, उसका मार्ग कैसा है, उसमें किस प्रकार के मोड़, मोराइन, द्वीप, मेन्डर, ब्रेडिंग या डेल्टा जैसी संरचनाएँ बनती हैं।

नोट- चैनल मॉर्फोलॉजी का मुख्य शब्द: Channel Gradient, Valley THALWAGE, Under Bank, Full Bnak, Over Bank, Channel Width, Channel Depth, Channel Bed, Haria Bhanga River, Sir Creek.

चैनल मॉर्फोलॉजी का महत्व

1. भू-आकृतिक अध्ययन में योगदान- इससे भूगोलवेत्ता और भू-आकृति वैज्ञानिक नदियों के दीर्घकालिक विकास को समझते हैं। यह नदी के प्राकृतिक स्वरूप को बहाल करने के लिए महत्वपूर्ण है, खासकर उन नदियों में जहां मानव हस्तक्षेप के कारण नुकसान हुआ है।

2. जल प्रबंधन (Water Management)- नदी तटबंध, सिंचाई परियोजनाओं तथा जलविद्युत उत्पादन हेतु चैनल की जानकारी आवश्यक है।

3. पर्यावरणीय अध्ययन- पारिस्थितिक तंत्र, आर्द्रभूमि और जैव विविधता को संरक्षित करने में चैनल मॉर्फोलॉजी का अध्ययन सहायक है।

4. आपदा प्रबंधन- बाढ़ और नदी तट कटाव जैसी प्राकृतिक आपदाओं को समझने और नियंत्रित करने के लिए यह आवश्यक है।

5. इंजीनियरिंग परियोजनाएँ (Engineering Projects)- पुलों, सड़कों और पाइपलाइनों जैसी संरचनाओं के निर्माण के लिए नदी के व्यवहार को समझना आवश्यक है।

चैनल मॉर्फोलॉजी को प्रभावित करने वाले कारक

      नदी के चैनल की आकृति अनेक प्राकृतिक और मानवजन्य कारकों से प्रभावित होती है:-

1. जल प्रवाह (Discharge)- नदी में जल की मात्रा और प्रवाह की गति चैनल की चौड़ाई, गहराई और ढाल को प्रभावित करती है।

2. तलछट का प्रकार और मात्रा (Sediment Type and Load)- नदी द्वारा ले जाए जाने वाले तलछट का प्रकार (जैसे रेत, बजरी, गाद) और उसकी मात्रा चैनल के प्रकार को निर्धारित करती है। अधिक तलछट से गुम्फित चैनल बनते हैं, जबकि कम तलछट से विसर्पी चैनल बनते हैं।

3. ढाल (Slope)- नदी के मार्ग का ढलान चैनल के प्रकार को निर्धारित करता है। ढलान जितना अधिक होगा, नदी की गति उतनी ही तेज होगी और चैनल अधिक सीधा होगा। कम ढलान पर विसर्प और गुम्फित चैनल बनने की संभावना अधिक होती है।

4. चट्टान एवं मिट्टी का प्रकार- कठोर चट्टान चैनल को स्थिर बनाए रखती है जबकि मुलायम मिट्टी में मेन्डर और ब्रेडिंग की प्रवृत्ति अधिक होती है।

5. वनस्पति आवरण- वनस्पति नदी तट को स्थिर रखने और कटाव को रोकने में सहायक होती है।

6. मानव गतिविधियाँ- बाँध निर्माण, नदी जोड़ परियोजना, खनन, रेत दोहन और शहरीकरण चैनल मॉर्फोलॉजी को गहराई से प्रभावित करते हैं।

नदी चैनलों के प्रकार

   नदियों के चैनल को उनकी संरचना, प्रवाह और स्वरूप के आधार पर विभिन्न प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:

1. सीधे चैनल (Straight Channels)

⇒ ये चैनल बहुत कम पाए जाते हैं और अक्सर मानव निर्मित या अत्यधिक ढलान वाले क्षेत्रों में होते हैं। हालांकि, इनमें भी छोटी-छोटी लहरें या विसर्प (meanders) विकसित हो सकते हैं।

⇒ यह चैनल कम दूरी के लिए सीधे प्रवाहित होते हैं।

⇒ प्रायः कृत्रिम नहरों या कठोर चट्टानों वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

2. मेन्डरिंग चैनल (Meandering Channels)

⇒ ये चैनल सबसे सामान्य प्रकार हैं, जहां नदी S-आकार के मोड़ या लूप बनाती है। ये मोड़ नदी के बाहरी किनारे पर कटाव (erosion) और अंदरूनी किनारे पर निक्षेपण (deposition) के कारण बनते हैं।

⇒ जब नदी घुमावदार रूप में बहती है तो उसे मेन्डरिंग कहते हैं।

⇒ इसमें नदी एक ओर से कटाव करती है और दूसरी ओर निक्षेपण करती है।

⇒ उदाहरण: गंगा, यमुना आदि मैदानों की नदियाँ।

3. ब्रेडेड चैनल (Braided Channels)

⇒ ये चैनल तब बनते हैं जब नदी बहुत अधिक तलछट (sediment) ले जाती है और ढलान कम होती है। इस स्थिति में, नदी कई छोटे-छोटे चैनलों में बँट जाती है, जिनके बीच में तलछट के द्वीप (bars) होते हैं।

⇒ जब नदी में तलछट की मात्रा अत्यधिक होती है और जलधारा कई भागों में बँट जाती है, तब यह चैनल बनते हैं।

⇒ चैनल के बीच छोटे-छोटे द्वीप (बार) बनते हैं।

⇒ उदाहरण: हिमालयी नदियाँ जैसे कोसी।

4. एनास्टोमोज्ड चैनल (Anastomosed Channels)

⇒ यह ब्रेडेड (Braided) नदियों के समान लग सकता है, लेकिन इन दोनों में कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं।

एनास्टोमोज्ड चैनल की मुख्य विशेषताएं:

⇒ कई चैनल: इस प्रणाली में एक मुख्य चैनल के बजाय कई चैनल होते हैं जो एक दूसरे से जुड़ते और अलग होते रहते हैं।

⇒ स्थिरता: ये चैनल ब्रेडेड नदियों की तुलना में अधिक स्थिर होते हैं। ब्रेडेड नदियाँ लगातार अपना रास्ता बदलती रहती हैं, जबकि एनास्टोमोज्ड चैनल अधिक स्थायी होते हैं।

⇒ आंतरिक द्वीप: इन चैनलों के बीच में बड़े और स्थिर द्वीप या “बाढ़-बेसिन” (flood-basins) होते हैं। ये द्वीप अक्सर वनस्पति से ढके होते हैं।

⇒ कम ढलान: ये नदियाँ अक्सर कम ढलान वाले क्षेत्रों में पाई जाती हैं, जहाँ पानी का प्रवाह धीरे-धीरे होता है।

⇒ जलोढ़ मैदान: एनास्टोमोज्ड चैनल अक्सर जलोढ़ मैदानों (alluvial plains) पर बनते हैं, जहाँ नदी द्वारा लाए गए अवसाद (sediment) जमा होते हैं।

5. डेल्टा चैनल (Deltaic Channels)

     डेल्टा चैनल उन छोटी-छोटी धाराओं या चैनलों को कहते हैं जिनमें मुख्य नदी, समुद्र या झील में मिलने से पहले, कई भागों में बंट जाती है। यह विभाजन तब होता है जब नदी का प्रवाह धीमा हो जाता है और वह अपने साथ लाई हुई मिट्टी, रेत, और गाद (sediment) को जमा करने लगती है। यह जमाव नदी के रास्ते में बाधा उत्पन्न करता है, जिसके कारण नदी अलग-अलग दिशाओं में बहने लगती है और एक जाल जैसी संरचना बनाती है। यही छोटी धाराएं डेल्टा चैनल कहलाती हैं।

⇒ उदाहरण: गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा।

चैनल की संरचनात्मक विशेषताएँ

⇒ चौड़ाई और गहराई- प्रवाह और तलछट पर निर्भर।

⇒ किनारे (Banks)- स्थिर या अस्थिर हो सकते हैं।

⇒ तल (Bed)- रेतीला, चिकना या कंकरीला हो सकता है।

⇒ ढाल (Gradient)- ऊपरी धारा में तीव्र और निचली धारा में मंद।

⇒ काट-खंड (Cross Section) – “V” आकार का, “U” आकार का या असममित हो सकता है।

चैनल मॉर्फोलॉजी और नदी के चरण

    नदियों के विकास के विभिन्न चरणों में चैनल की आकृति बदलती रहती है:

⇒  युवावस्था (Youth Stage)- तीव्र ढाल, संकीर्ण “V” आकार की घाटी।

⇒ प्रौढ़ावस्था (Mature Stage)- ढाल कम, मेन्डर बनने लगते हैं।

⇒ वृद्धावस्था (Old Stage)- विस्तृत बाढ़भूमि, ऑक्सबो झीलें, डेल्टा निर्माण।

चैनल मॉर्फोलॉजी से बनने वाले स्थलरूप

⇒ ऑक्सबो झील (Oxbow Lake)

⇒ कटाव तट (Cut Bank)

⇒ निक्षेप तट (Point Bar)

⇒ बाढ़ मैदान (Flood Plain)

⇒ नदी द्वीप (River Island)

 चैनल मॉर्फोलॉजी और मानव हस्तक्षेप

⇒ मानव ने नदी चैनलों को अनेक तरीकों से बदला है:

⇒ बाँध और बैराज निर्माण से प्रवाह प्रभावित होता है।

⇒ रेत खनन से नदी तल अस्थिर होता है।

⇒ शहरीकरण और औद्योगिक गतिविधियाँ जल प्रवाह को प्रदूषित करती हैं।

⇒ नदी जोड़ परियोजनाएँ चैनल की प्राकृतिक दिशा बदल सकती हैं।

भारत में चैनल मॉर्फोलॉजी का अध्ययन

    भारतीय नदियों में विविध चैनल रूप मिलते हैं:

⇒ हिमालयी नदियाँ (गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र)- ब्रेडेड और मेन्डरिंग।

⇒ प्रायद्वीपीय नदियाँ (गोदावरी, कृष्णा, कावेरी)- अपेक्षाकृत सीधे और स्थिर चैनल।

⇒ रेगिस्तानी नदियाँ (लूणी, घग्घर)- अस्थायी और बदलते चैनल।

निष्कर्ष

    चैनल मॉर्फोलॉजी न केवल नदियों के भौतिक स्वरूप का अध्ययन है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाती है कि नदियाँ समय के साथ किस प्रकार परिवर्तित होती हैं और हमारे पर्यावरण, समाज एवं अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करती हैं। इसका वैज्ञानिक अध्ययन जल प्रबंधन, आपदा नियंत्रण, पारिस्थितिक संतुलन और सतत विकास के लिए अनिवार्य है। इस प्रकार बदलते पर्यावरण और बढ़ते मानव हस्तक्षेप के कारण, चैनल मॉर्फोलॉजी का अध्ययन और भी महत्वपूर्ण हो गया है ताकि हम नदियों को स्वस्थ और टिकाऊ बनाए रख सकें।

35. Zealandia / जीलैंडिया विश्व का आठवां संभावित महाद्वीप

35. Zealandia

जीलैंडिया विश्व का आठवां संभावित महाद्वीप



     हम सभी विश्व में सात महाद्वीपों के अस्तित्व से परिचित हैं, परंतु अब संभव है कि लोगों को आठवें महाद्वीप के बारे में पढ़ने और जानने का मौका मिले। भूगर्भशास्त्रियों ने यह दावा किया है कि 49 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का यह जीलैंडिया महाद्वीप दक्षिण पश्चिम प्रशांत महासागर में ऑस्ट्रेलिया के पूर्व स्थित है। इसका आकार ऑस्ट्रेलिया का दो तिहाई है और 93% भाग जल में डूबा हुआ है। अर्थात इसका मात्र 7% भाग ही जलीय सतह से ऊपर है और शेष भाग लगभग पूरी तरह से 1 से 2 किमी० जल के नीचे डूबा हुआ है। 

Zealandia

       जीलैंडिया के उच्चतम बिंदु न्यूजीलैंड तथा न्यू कैलीडोनिया ही जलीय सतह के ऊपर हैं। इससे संबंधित लेख ‘जीलैंडियाः पृथ्वी का छुपा हुआ महाद्वीप’ (Zealandia: Earth’s Hidden Continent) अमेरिकी जर्नल जीएसए टुडे (जीएसए-जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ अमेरिका) में मार्च/अप्रैल 2017 के अंक में प्रकाशित हुआ। भू-गर्भशास्त्री निक मॉर्टिमर इस अध्ययन लेख के मुख्य लेखक थे। भू-गर्भशास्त्रियों के अनुसार एक विशिष्ट भूगर्भिक संरचना, एक निश्चित क्षेत्रफल, समुद्र तल से मोटी भूपर्पटी व इसके भू-क्षेत्र का ऊंचा होना आदि ऐसे पर्याप्त आधार हैं जिनके आधार पर जीलैंडिया को आठवें महाद्वीप के रूप में आधिकारिक स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए।

      उल्लेखनीय है कि दो दशकों से भू-गर्भ विज्ञानी जीलैंडिया को महाद्वीपों की श्रेणी में रखने हेतु प्रमाण जुटाने में प्रयासरत हैं और उनका मानना है कि इसे आठवें महाद्वीप के रूप में मान्यता मिल जाने से महाद्वीपीय सतह की संरचना को समझने में सहायता होगी। चूंकि शोधकर्ताओं का यह मानना है कि न्यूजीलैंड इसी महाद्वीप का एक भाग है इसलिए इसकी भौगोलिक तथा भू-आकृतिक संरचना भी न्यूजीलैंड के समान ही है।

    यह ज्ञात हो कि 80 मिलियन वर्ष पहले जीलैंडिया विशाल महाद्वीप गोंडवानालैंड के विभाजन के पश्चात ऑस्ट्रेलिया से टूटकर अलग हुआ था जिसके बाद यह सागरीय जल सतह के नीचे जलमग्न हो गया। जीलैंडिया शब्दावली 1995 में भू-भौतिकीविद ब्रुस लुएन्डिक द्वारा दी गई थी। उस समय यह माना गया था कि महाद्वीप होने के लिए आवश्यक 4 गुणों में से 3 गुण इस महाद्वीप में विद्यमान थे।

    अब उपग्रह प्रौद्योगिकी तथा समुद्री सतह के गुरुत्वीय मैप के उपयोग द्वारा की गई नई खोज ने यह स्पष्ट किया है कि जीलैंडिया जिसके पास एक व्यापक व निश्चित क्षेत्रफल है, महाद्वीप होने की सभी 4 विशेषताओं को धारित कता है। जीलैंडिया के अपतटीय क्षेत्रों में खरबों डॉलर कीमत के जीवाश्म ईंधन भी भंडारित होने के अनुमान हैं।



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(पृथ्वी का भूगर्भिक इतिहास)



पृथ्वी का भूगर्भिक इतिहास

      यदि पृथ्वी की विभिन्न परतों, उनमें पायी जाने वाली चट्टानों, जीव-विकास आदि का अध्ययन किया जाय तो यह निष्कर्ष निकलता है कि पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद विशेष प्रकार के कई युग हुये हैं जिनमें विशेष प्रकार की शैलों का जमाव तथा जीवों का विकास हुआ है। इस क्षेत्र में सर्वप्रथम प्रयास फ्रान्सीसी वैज्ञानिक कास्ते-द-बफन का माना जाता है। बफन ने पृथ्वी के इतिहास को सात विभिन्न युगों में प्रस्तुत किया, परन्तु प्रथम युग आज से कितने वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुआ, इसके विषय में बफन ने प्रयास नहीं किया। उन्होंने केवल प्रत्येक युग का कार्य-काल ही बताया है।

     वर्तमान समय में पृथ्वी के इतिहास को निम्न रूप में व्यक्त किया जाता है। सर्वप्रथम पृथ्वी के इतिहास को बड़े भागों में विभाजित किया गया है। इस बड़े विभाग को महाकल्प (Era) कहते हैं।

     प्रत्येक महाकल्प को पुनः क्रमिक रूप में व्यवस्थित किया गया है तथा इस प्रकार के भाग को कल्प (Period) कहते हैं।

      प्रत्येक कल्प को पुनः छोटे-छोटे उपविभागों में रखा गया है, जिन्हें युग (Epoch) कहा गया है। प्रत्येक युग का कुल समय भी निर्धारित किया गया है तथा यह भी बताया जाता है कि अमुक युग कब प्रारम्भ हुआ तथा कब तक चलता रहा। इन विभिन्न युगों के जीव तथा वनस्पतियों के विकास पर भी प्रकाश डाला गया है। नीचे की तालिका में पृथ्वी का भूगर्भिक इतिहास स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।


पृथ्वी का भूगर्भिक इतिहास

(Geological History of Earth)

महाकल्प (Era) कल्प (Period) युग (Epoch) प्रारंभ होने का समय

(मिलियन वर्ष पूर्व)

1. पूर्व-पैल्योजोइक (Pre-Palaeozoic)

या, आद्यकल्प (Azoic)

1.आर्कियन

2.पूर्व-कैम्ब्रियन

3500
2. पैल्योजोइक (Palaeozoic) प्रथम कल्प (Primary) 1. कैम्ब्रियन

2.आर्डोविसियन

3.सिल्यूरियन

4.डिवोनियन

5.कार्बोनिफेरस

6.पर्मियन

600
3. मेसोजोइक (Mesozoic) द्वितीय कल्प (Secondary) 1.ट्रियासिक

2.जुरैसिक

3.क्रीटैसियस

225
4. सेनोजोइक (Cenozoic) तृतीय कल्प (Tertiary) 1.इओसीन

2.ओलिगोसीन

3.मायोसीन

4.प्लायोसीन

70
5. नियोजोइक (Neozoic) चतुर्थ कल्प (Quaternary) 1.प्लीस्टोसीन

2.होलोसीन (आधुनिक युग)

1


1. पूर्व-पैल्योजोइक (Pre-Palaeozoic)

1. आर्कियन- संभवतः इसी कल्प में जीवन की उत्पत्ति महासागरों में हुई थी। इस समय नील- हरित शैवाल, छोटे समुद्री घास आदि का उद्भव महासागरों में हुआ।

2. पूर्व-कैम्ब्रियन- प्री-कैम्ब्रियन चट्टानें धात्विक खनिजों की दृष्टि से धनी हैं। अधिकतर लौह-अयस्क, ताँबा, मैंगनीज, यूरेनियम, जिंक, सोना, चाँदी आदि धात्विक खनिज इन्हीं चट्टानों से प्राप्त किए जाते हैं।



2. पैल्योजोइक (Palaeozoic)

1. कैम्ब्रियन- कैम्ब्रियन युग में सागरों में पादप (Plants) के अलावा लगभग सभी महत्वपूर्ण बिना रीढ़ वाले जन्तुओं (invertebrates) की उत्पत्ति होती है। इस काल में स्थल-खंड पर जीवन का कोई चिह्न नहीं मिला है।   

2. आर्डोविसियन- आर्डोविसियन काल में भी स्थल-खंड पर जीवन के प्रमाण नहीं मिले हैं। जलीय क्षेत्र में प्रथम रीढ़ वाले जंतु (vertebrates) की उपस्थिति दर्ज की गई। पहली रीढ़ वाली मछली की उत्पत्ति इसी काल में मानी जाती है। कैम्ब्रियन काल में बिना रीढ़ वाली मछली की उत्पत्ति हुई थी, जिसे अगनाथा (Agnatha) कहा गया है।

3. सिल्यूरियन- सिल्यूरियन काल में पत्तारहित पौधे के रूप में जीवन के प्रथम चिह्न स्थल-खण्ड पर मिलते हैं। समुद्री क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्रवालों (Corals) का विकास हुआ। कैलिडोनियन पर्वतों (स्कैण्डिनेविया एवं स्कॉटलैण्ड के पर्वत) का निर्माण इस काल में हुआ।

4. डिवोनियन- डिवोनियन काल को ‘मछलियों का काल’ के रूप में जाना जाता है। आज उपलब्ध लगभग सभी प्रकार की मछलियों की उत्पत्ति इस काल में हो चुकी थी। स्थलखण्ड पर जड़, तना एवं पत्तीयुक्त पौधों का विकास हुआ। इस काल के अंत में प्रथम उभयचर प्राणी (amphibians) की उत्पत्ति होती है।

5. कार्बोनिफेरस- कार्बोनिफेरस काल में पेंजिया का विखण्डन अंगारा एवं गोंडवाना भूखंड में होता है, जिसका प्रभाव स्थलखण्ड के कई हिस्सों पर पड़ता है। असंख्य वनस्पतियाँ चट्टानों के नीचे दब जाती हैं तथा बाद में कोयले का निर्माण करती हैं। इस काल को ‘कोयला युग’ (coal age) कहा जाता है।

6. पर्मियन- पर्मियन काल में हर्सीनियन पर्वतों (अप्लेशियन पर्वत, USA) का निर्माण होता है तथा कोयले की निर्माण-प्रक्रिया घटती दर से जारी रहती है।



3. मेसोजोइक (Mesozoic)

1. ट्रियासिक- ट्रियासिक काल में डाइनासोर की उत्पत्ति होती है, लेकिन उनकी संख्या सीमित थी।

2. जुरैसिक- जुरैसिक काल में गोंडवाना लैण्ड का विखण्डन कई भागों में होता है। अत्यधिक डाइनासोर की उपस्थिति के कारण इस काल को ‘डाइनासोर युग’ भी कहा जाता है। मेसोजोइक महाकल्प को ‘सरीसृप युग’ (Age) of Reptiles) कहा जाता है। यह महाकल्प पक्षियों की उत्पत्ति का भी काल है।

3. क्रीटैसियस- क्रीटैसियस युग में भारत के दक्षिणी प्रायद्वीप के ऊपर दरारी उद्भेदन द्वारा बेसाल्टिक लावा प्रवाह से दक्कन लावा पठार का निर्माण होता है। डाइनासोर इस काल में विलुप्त हो जाते हैं।



4. सेनोजोइक (Cenozoic)

1. इओसीन- आधुनिक स्तनधारियों की प्रचुरता रही।

2. ओलिगोसीन- पर्वत निर्माणकारी प्रक्रिया तीव्र रही।

3. मायोसीन- पर्वत निर्माण की क्रिया बड़े पैमाने पर हुई। मानव एवं कपि के पूर्वजों अर्थात ड्रायोपिथिकस एवं शिवापिथिकस का उद्द्विकास हुआ।

4. प्लायोसीन- इस काल में पर्वत प्रक्रिया में कमी आई। आस्ट्रेलोपिथिकस का उद्द्विकास हुआ।



5. नियोजोइक (Neozoic)

1. प्लीस्टोसीन- प्लीस्टोसीन युग को ‘हिम युग’ भी कहा जाता है। इस काल में जलवायु परिवर्तन हुआ तथा बड़े पैमाने पर हिमावरण की घटना घटी। प्राचीन मानव (Primitive Man) की उत्पत्ति इसी काल में हुई।

2. होलोसीन (आधुनिक युग)- 10 हजा वर्ष पूर्व होलोसीन युग की शुरुआत होती है तथा आधुनिक मेधावी मानव (Homosapians) का उदय होता है। वर्तमान काल होमोसेपियन्स के उत्कर्ष का काल है। नियोजोइक महाकल्प को ‘मानव युग’ (Age of Man) कहा जाता है।



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34. The Theory of Morphogenic Evolution Propunded By L. C. King (एल. सी. किंग द्वारा प्रतिपादित भ्वाकृतिक उद्भव के सिद्धान्त)

34. The Theory of Morphogenic Evolution Propunded By L.C. King

(एल.सी. किंग द्वारा प्रतिपादित भ्वाकृतिक उद्भव के सिद्धान्त)

या

भौगोलिक अपरदन चक्र के एल.सी. किंग मॉडल



    एल.सी. किंग का स्थलरूपों के विकास से सम्बन्धित सिद्धान्त उनके द्वारा दक्षिणी अफ्रीका की शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों के  स्थलाकृतियों के अध्ययन से सम्बन्धित तथ्यों के अवलोकन पर आधारित है।

       यद्यपि किंग ने डेविस के भ्वाकृतिक सिद्धान्त (भौगोलिक चक्र) का जोरदार खण्डन किया है, परन्तु इनके सिद्धान्त का भी मुख्य आधार चक्रीय संकल्पना की ही मान्यता है। इस प्रकार किंग का भ्वाकृतिक सिस्टम भी मूलरूप में विकासीय एवं चक्रीय ही है जैसा कि इनके ‘स्थलाकृति चक्र’ (The Landscape Cycle), ‘अपरदन का भूतलज चक्र’ (the epigene cycle of erosion), ‘पेडीप्लनेशन चक्र’ (the pediplantion cycle), एवं ‘पहाड़ी ढाल चक्र’ (Hillslope cycle) से प्रकट होता है।

       यद्यपि किंग ने डेविस से अलग तथा फेंक की कुछ मान्यताओं पर अपने भ्वाकृतिक सिस्टम को विकसित करने का प्रयास किया है, परन्तु इनका मॉडल पेंक की तुलना में डेविस के अधिक करीब है।

      किंग के सिद्धान्त की प्रमुख मान्यता यह है कि स्थलरूपों का विकास विभिन्न पर्यावरण अवस्थाओं में समान होता है, जल अपरदित स्थलरूपों के विकास में जलवायु परिवर्तनों का महत्त्व नगण्य होता है। सभी महाद्वीपों में प्रमुख स्थलाकृतियों का विकास लयात्मक व्यापक विवर्तनिक (rhythemic global tectonies) घटनाओं से नियंत्रित हुआ है।

      ढालों में सतत खिसकाव (migration) होता है तथा इस तरह का निवर्तन (retreat) समानान्तर होता है तथा इस तरह का निवर्तन (retreat) समानान्तर होता है। यह निवर्तन ढाल पर क्रियाशील प्रक्रमों द्वारा नियंत्रित होता है तथा उसी के अनुरूप (निवर्तन की प्रक्रिया) ढालों का रूप बनता है।

      किंग की मान्यता है कि पहाड़ी ढाल में चार तत्त्व होते हैं- शिखर, कगार, मलवा ढाल तथा पेडोमेण्ट। किंग ने अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन दक्षिणी अफ्रीका के अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में स्थलाकृतिक विशेषताओं के आधार पर किया है तथा बाद में अपने सिद्धान्त को अन्य प्रदेशों में भी प्रयोज्य (practicable) बताया है। इनकी मान्यता है कि चार तत्वों (उपर्युक्त) से युक्त पहाड़ी ढाल आधारभूत स्थलरूप होता है जो उन सभी प्रदेशों में तथा सभी प्रकार के जलवायु में विकसित होता है जहाँ पर पर्याप्त उच्चावच्च होते हैं तथा जल-प्रवाह अनाच्छादन का प्रमुख प्रक्रम होता है।

      किंग के अनुसार प्रत्येक चक्र त्वरित उत्थान के साथ प्रारम्भ होता है तथा उत्थान के बाद दीर्घकाल तक विवर्तनिक स्थिरता होती है (स्थलखण्ड स्थिर रहते हैं)। किंग की यह मान्यता डेविस की मान्यता के अनुरूप है। इस त्वरित उत्थान के कारण नदियों द्वारा निम्नवर्ती अपरदन तेज हो जाता है तथा नदी के मार्ग में निकप्वाइण्ट बन जाते हैं जो नदी के ऊपरी मार्ग की ओर खिसकते जाते हैं। स्थलाकृतिक चक्र की तरुणावस्था में नदी द्वारा तीव्र निम्नवर्ती अपरदन के कारण गॉर्ज का निर्माण होता है।

        जब निम्नवर्ती अपरदन शिथिल हो जाता है तो घाटी-पार्श्वढाल (valley side slopes) स्थिर कोण वाले हो जाते हैं तथा ढाल का यह रूप उस पर (ढाल पर) क्रियाशील भौतिक कारकों एवं शैलिकी (lithology) द्वारा निर्धारित होता है। प्रौढ़ावस्था के समय निम्नवर्ती अपरदन समाप्त हो जाता है। घाटी-पार्श्व ढाल का नदी से खिसकाव निवर्तन (अर्थात् घाटी चौड़ी होती जाती है एवं घाटी पार्श्वढाल नदी के जलमार्ग channel से दूर हटता जाता है) होता है, परन्तु इस प्रक्रिया के दौरान घाटी पार्श्व ढाल के कोण में कोई महत्त्वपूर्ण अन्तर नहीं होता है।

        इन घाटी पार्श्व ढाल के आधार (base, पदस्थली) पर अपेक्षाकृत समतल एवं सपाट स्थलरूप का निर्माण होता है जिसका ढाल अधिकतम रूप में 10° होता है, परन्तु सामान्य रूप में यह 5° से अधिक नहीं हो पाता है। इस स्थलरूप को किंग ने पेडीमेण्ट नामावली दी है। इनकी परिच्छेदिका अवतल होती है। इस पेडीमेण्ट का धीरे-धीरे विस्तार होता है (घाटी पार्श्व के कगार के समानान्तर निवर्तन द्वारा) तथा अन्त में कई पेडीमेण्ट मिल जाते हैं और विस्तृत पेडोप्लेन का निर्माण होता है। इस तरह निर्मित पेडीप्लेन की सामान्य सतह निम्न उच्चावच्च वाली होती है तथा इसकी रचना कई निम्न प्रतिच्छेदी अवतल सतहों (subdued intersecting concavities) द्वारा होती है।

       इस सतह के ऊपर कुछ छिटपुट तीव्र ढाल वाले अवशिष्ट टीले मौजूद रहते हैं। चक्र की अन्तिम अवस्था में दीर्घकाल तक अपक्षय के कारण जलविभाजकों का विस्तृत उत्तलता में परिवर्तन हो जाता है।

Theory of Morphogenic

           किंग की मान्यता है कि निवर्तमान ढाल (migrating or retreating slope) का रूप उस पर क्रियाशील प्रक्रमों द्वारा निर्धारित होता है। पहाड़ी ढाल का शीर्ष (सबसे ऊपर का भाग) उत्तल होता है जो मृदा-सर्पण (soil creep) द्वारा निर्मित होता है कगार शैल दृश्यांग (rock outcrops) का बना होता है तथा उसमें निवर्तन होता है। यह निवर्तन चट्टान के टूट कर अध: पतन (नीचे की ओर गिरना), भूस्खलन (Inandslide) तथा अबनलिका अपर (gullying) द्वारा होता है। मलवा ढाल का सबसे सक्रिय तत्त्व कगार ही होता है।

      मलवा ढाल (debris slope) का निर्माण ऊपर से आने वाले मलवा के द्वारा होता है तथा इसकी प्रवणता (gradient) मलवा / पदार्थों के ठहराव (repose) के कोण द्वारा नियंत्रित होती है। पेडीमेण्ट पहाड़ी ढाल की परिच्छेदिका की सबसे निचली इकाई होती है तथा इसका निर्माण ठोस चट्टान के तीव्र चादरी बाढ़ (turbulent sheet flood) द्वारा अपरदन के कारण होता है।

      यदि डेविस एवं किंग के प्रतिरूपों की तुलनात्मक व्याख्या की जाए तो स्पष्ट होता है कि दोनों प्रतिरूपों में कुछ हद तक अनुरूपता अवश्य है। दोनों स्थलाकृति के चक्रीय विकास में विश्वास करते हैं जिसके अन्तर्गत अपरदन-चक्र स्थलखण्ड में तीव्र उत्थान के साथ प्रारम्भ होता है तथा उत्थान के बाद दीर्घकालिक विवर्तनिक निष्क्रियता (विवर्तनिक स्थिरता) होती है। इस अवधि के दौरान पेनीप्लेन (डेविस) या पेडीप्लेन (किंग) का निर्माण होता है। दोनों स्थलरूपों में सामान्य अनुरूपता होता है क्योंकि ये प्राचीन होते हैं। उच्चावच्च निम्न होते हैं एवं विस्तृत क्षेत्र को प्रदर्शित करते हैं। दोनों प्रतिरूप अपरदन चक्र के पूर्णकाल की तरुण, प्रौढ़ तथा जीर्ण अवस्थाओं की मान्यता पर आधारित हैं। इन दोनों प्रतिरूपों में अन्तर भी है।

           डेविस के पेनीप्लेन का निर्माण अधःक्षय (down wasting) द्वारा होता है जबकि किंग का पेडीप्लेन कई पेडीमेण्ट के समेकन एवं सम्बर्द्धन से निर्मित होता है। इन पेडीमेण्ट में शीर्षवर्ती निवर्तन द्वारा विस्तार होता है। डेविस का पेनीप्लेन जब निर्मित हो जाता है तो उसमें पुनः विकास नहीं होता है तथा जब नवीन उत्थान होने से नया चक्र प्रारम्भ होता है तो उसमें नवोन्मेष हो जाता है। इसके विपरीत किंग का पेडीप्लेन अपने निर्माण के बाद भी शीर्ष की ओर बढ़ता जाता है।

         यद्यपि इस पेडीप्लेन के दूरस्थ छोर पर नए कगार का निर्माण हो जाता है। इस नए कगार के निवर्तन द्वारा दूसरे पेडीमेण्ट (पूर्व निर्मित पेडीप्लेन के दूरस्थ भाग पर) का निर्माण होता है, जिसमें निवर्तन के कारण प्रारम्भिक पेडीप्लेन के विस्तार में ह्रास होता है। स्पष्ट है कि उत्पन्न स्थलाकृति ऐसी होती है कि उस पर कई पेडीप्लेन होते हैं जो शीर्ष की ओर बढ़ते जाते हैं। किंग का इस तरह का पेडीप्लेन फेंक के गिरिपद ट्रेपन (piedmont treppen) के अनुरूप होता है।

आलोचनाएँ

          किंग के भ्वाकृतिक मॉडल की निम्नलिखित मान्यताएँ विवादास्पद हैं।

(i) किंग के भ्वाकृतिक मॉडल की रचना दक्षिणी अफ्रीका के अर्द्ध-शुष्क प्रदेशों की स्थलाकृतिक विशेषताओं के आधार पर की गई है, परन्तु किंग ने अपने विचारों को अन्य क्षेत्रों के स्थलरूपों की व्याख्या के लिए भी प्रयुक्त किया है। यह मान्यता सन्तोषजनक नहीं है।

(ii) किंग की मान्यता है कि स्थलरूपों का विकास विभिन्न पर्यावरण दशाओं समान रूप से होता है, सन्देहास्पद है। ज्ञातव्य है कि किंग के भ्वाकृतिक सिस्टम को उतनी मान्यता एवं समर्थन नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था। इसका प्रमुख कारण यह है कि किंग का सिद्धांत उस समय (1953, Canons of landscape evolution) आया जब लोगों की दिलचस्पी भ्वाकृतिक सिद्धान्तों की आवश्यकता, वांछनीयता एवं उपादेयता से उठ चुकी थी।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रो. एल. सी. किंग द्वारा प्रतिपादि भ्वाकृतिक उद्भव के सिद्धान्त की विवेचना करें।


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33. अन्तर्जात एवं बहिर्जात बल (Endogenetic and Exogenetic Forces)

33. भू-आकृति विज्ञान में अन्तर्जात एवं बहिर्जात बल

(Endogenetic and Exogenetic Forces)



अन्तर्जात बल (Endogenetic Forces):-

     पृथ्वी के आन्तरिक भाग अथवा भूगर्भ में सक्रिय बलों को अन्तर्जात बल कहते हैं। इन्हें निर्माणकारी शक्तियाँ (Constructional Forces) भी कहा जाता है। ये बल पृथ्वी में गुप्त रूप से कार्य करते हैं। इनकी उत्पत्ति पृथ्वी के आन्तरिक भाग में होने के कारण इनके विषय में बहुत कम ज्ञान प्राप्त है।

       सम्भवतः इन बलों की उत्पत्ति उष्ण पृथ्वी के क्रमशः शीतल होकर संकुचन, परिभ्रमण गति से ह्रास, रेडियो ऐक्टिव पदार्थों के विघटन से उत्पन्न ताप, संवाहनिक धाराओं, आदि के कारण होती है। पृथ्वी के भीतर उच्च तापमान ही कदाचित भू-पटल में उत्पन्न परिवर्तनों के लिए उत्तरदायी है। तापीय अन्तर के कारण शैलों में प्रसार एवं संकुचन होता है, इससे शैलें स्थानान्तरित होती हैं। परिणामतः अनेक स्थलरूप उत्पन्न होते हैं।

     अन्तर्जात बल दो प्रकार के होते हैं-

(i) क्षैतिज (Horizontal) अन्तर्जात बल तथा

(ii) ऊर्ध्वाधर/लम्बवत (Vertical) अन्तर्जात बल।

        इनके कारण दो प्रकार की संचलन (Movements) या घटनाएँ होती हैं-

(i) आकस्मिक घटनाएँ या ज्वालामुखी एवं भूकम्प (Volcanism and Earthquakes)

       इस बल से भूपटल पर ऐसी आकस्मिक घटनाओं का आगमन होता है जो विनाशकारी परिणाम वाली होती हैं। इसके प्रमुख उदाहरण हैं- भूकम्प, भूस्खलन, एवलांश तथा ज्वालामुखी।

(ii) पटलविरूपणकारी घटनाएँ (Diastrophism)            

       ये बल पृथ्वी के आन्तरिक भाग में अत्यन्त धीमी गति से क्षैतिज तथा लम्बवत दोनों रूपों में क्रियाशील होते हैं जिससे धरातल पर हजारों वर्षों बाद किसी बड़े स्थलरूप का निर्माण हो जाता है। क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से ये पुन: दो प्रकार के होते हैं-

(अ) महादेशीय संचलन (Epierogenetic Movement)-

        यह संलचन भू-गर्भ में लम्बवत दिशा में क्रियाशील रहता है। इस लम्बवत् संचलन को उत्पन्न करने वाले बल को अरीय बल (Radial Force) कहते हैं, क्योंकि यह पृथ्वी की त्रिज्या की दिशा में ही कार्य करता है। इस संचलन से महाद्वीपीय भागों का निर्माण एवं उसमें उत्थान, निर्गमन तथा निमज्जन की क्रियाएं घटित होती हैं।

        जब महाद्वीपीय भाग या उसका कोई क्षेत्र अपनी सतह से ऊपर उठ जाता है तब उस पर लगने बाले बल को उपरिमुखी संचलन (Upward movement) कहते हैं तथा ऊपर उठने की क्रिया, उभार (Upliftment) के नाम से जानी जाती है।

        इसके विपरीत, जब महाद्वीपीय भागों में धंसाव हो जाता है तो उस पर क्रियाशील बल को अधोमुखी संचलन (Downward Movement) तथा धंसाव की क्रिया को अवतलन (Subsidence) कहा जाता है। धंसाव के दूसरे रूप में स्थलखण्डों का सागरीय जल के नीचे निमज्जन (Submergence) हो जाता है। यह क्रिया तटीय या सागरीय भागों में ही घटित होती है।

(ब) पर्वतीय संचलन (Orogenetic Movement)-

       पृथ्वी के आन्तरिक भाग से क्षैतिज रूप में पर्वतों के निर्माण में सहायक संचलन बल को पर्वतीय संचलन के नाम से जाना जाता है। इस बल को स्पर्शरेखीय बल (Tangential Force) भी कहते हैं। यह बल प्रायः दो रूपों में क्रियाशील होता है-

(i) जब यह बल दो विपरीत दिशाओं में क्रियाशील होता है तो तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसे तनावमूलक बल कहा जाता है। इस बल के परिणामस्वरूप धरातल में भ्रंश (Fault), दरार (Fracture), चटकनें (Cracks), आदि का निर्माण होता है।

(ii) जब पर्वतीय संचलन बल आमने-सामने क्रियाशील होता है तो उससे चट्टानें संपीडित हो जाती हैं। इस बल को संपीडनात्मक बल (Compressional Forces) कहा जाता है। इसके कारण धरातल पर संवलन (Wrap) तथा वलन (Fold) पड़ जाते है।

बहिर्जात बल (Exogenetic Forces):-

        भू-पटल पर अन्तर्जात बलों के सक्रिय होने से अनेक विषमताएँ पैदा हो जाती हैं। इन विषमताओं को दूर करके धरातल को सपाट बनाने की क्रिया भी प्रकृति में सम्पन्न होती रहती है। यह कार्य बहिर्जात बलों द्वारा किया जाता है जिन्हें विध्वंसकारी बल (Destructional Forces) भी कहते हैं। धरातल पर मौजूद स्थलरूपों को काट छांट तथा घिसकर क्षीण बनाने के कारण इन बलों को विनाशकारी बल कहा गया है।

      प्रवाही जल, पवन एवं हिम इसके प्रमुख कारक या साधन (Agents) हैं। इन साधनों को सक्रिय बनाने में तीन प्रमुख कारकों का योगदान हैं-

(i) सूर्यातप (Insolation),

(ii) गुरुत्वाकर्षण (Gravitation) एवं

(iii) पृथ्वी का घूर्णन (Earth’s Rotation)।

      सूर्यातप ही धरातल पर तापमानों के विषम वितरण का कारण है। तापीय भिन्नताओं से वायुदाब में अन्तर आता है तथा वायु विक्षोभ, पवन, आदि उत्पन्न होते हैं। यही नहीं, शैलों के अपक्षय में भी सूर्यातप प्रभावकारी होता है। गुरुत्व तथा पृथ्वी का घूर्णन पवन तथा हिम के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं।

          बहिर्जात बलों को सक्रिय बनाने में किसी न किसी गतिशील साधन का योगदान अवश्य होता है। प्रवाही जल, हिम, पवन, आदि गतिशील साधन ही धरातल पर काट-छांट का कार्य करते हैं। शैलों की काट-छांट, घिसने तथा क्षीण बनाने की क्रिया को अनाच्छादन (Denudation) कहते हैं।

मोन्कहाउस (Monkhouse) के अनुसार- “अनाच्छादन में उन सभी साधनों के कार्य सम्मिलित हैं जिनसे भू-पटल के किसी भाग का पर्याप्त विनाश, अपव्यय तथा हानि होती है। इस उपलब्ध पदार्थ का अन्यत्र निक्षेप होता है तथा इनसे अवसादी शैलों का निर्माण होता है।”

    भूपटल के अनाच्छादन में दो प्रक्रम अथवा शक्तियां मुख्य हैं-

(i) स्थैतिक प्रक्रम एवं

(ii) गतिशील प्रक्रम।

1. स्थैतिक प्रक्रम (Static processes):-

       स्थैतिक प्रक्रिया से अभिप्राय शैलों की अपने ही स्थान पर (in situ) टूट-फूट से है। इसके द्वारा शैलें ढीली पड़ती हैं तथा चट्टानों का चूर्ण बनता है। इस क्रिया को अपक्षय (Weathering) कहते हैं। अपक्षय भी दो प्रकार होता है-

         यांत्रिक अपक्षय में चट्टानों के स्वरूप में विघटन होता है और रासायनिक अपक्षय में चट्टानें वियोजन द्वारा परिवर्तित होती हैं।

2. गतिशील प्रक्रम (Mobile Processes):-

      गुरुत्व प्रवाही जल (वर्षा जल, नदी, भूमिगत जल), पवन, हिमानी, लहरें, आदि साधन शैल पदार्थों को तोड़ते-फोड़ते हैं तथा अपक्षयित पदार्थ उठाकर अन्यत्र ले जाकर निक्षेपित कर देते हैं। इस क्रिया के अन्तर्गत वृहत् क्षरण (Mass Movement) तथा अपरदन (Erosion) सम्मिलित हैं। परिवहन एवं निक्षेप भी अपदन से सम्बद्ध हैं।


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32. चट्टानें एवं चट्टानों का प्रकार (Rocks and its Types)

32. चट्टानें एवं चट्टानों का प्रकार

(Rocks and its Types)



चट्टानें

           भू-पटल निर्माण करने वाले पदार्थों को चट्टान कहते है अर्थात भू-पटल का निर्माण चट्टानों से हुआ है। चट्टानें मुख्यतः खनिजों के संयोग से बनती हैं, अर्थात् चट्टानें खनिजों का समुच्चय हैं। पृथ्वी पर लगभग 200 प्रकार के खनिज पाये जाते हैं। इनमें 24 ऐसे हैं, जो मुख्यतः भू-पृष्ठ की चट्टानों का निर्माण करते हैं। अत: इन्हें चट्टान निर्माणक खनिज कहा जाता है। ये खनिज मुख्यतः सिलिकेट, ऑक्साइड एवं कार्बोनेट के रूप में पाये जाते हैं। इन चट्टान निर्माणकारी खनिजों में सिलिकेट सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है एवं इसके बाद ऑक्साइड का स्थान आता है। जैव पदार्थों से निर्मित चट्टानों में खनिज नहीं मिलता है, जैसे- कोयला। चट्टानें पत्थर की तरह कड़ी एवं पंक की तरह मुलायम हो सकती हैं।

चट्टानों के प्रकार (Types of Rocks)

             उत्पत्ति के आधार पर चट्टानों को तीन भागों में बांटा गया है-

1. आग्नेय (Igneous) 

2. अवसादी (Sedimentary) 

3. कायांतरित (Metamorphic)

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks):-

        आग्नेय चट्टानों का निर्माण मैग्मा के ठंडा होकर जमने एवं ठोस होने से होता है। चूंकि सर्वप्रथम इसी चट्टान का निर्माण हुआ, अतः इसे प्राथमिक चट्टान (Primary Rock) भी कहा जाता है। ये आधारभूत चट्टानें हैं, जिनसे परतदार एवं रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है।

चट्टानें

आग्नेय चट्टान

आग्नेय चट्टान

⇒ ये चट्टानें रवेदार (Crystalline) होती हैं। जब मैग्मा धरातल पर आकर ठंडा होता है, तब तीव्र गति से ठंडा होने के कारण चट्टानों के रवे बहुत बारीक होते हैं, जैसे- बेसाल्ट। इसके विपरीत जब मैग्मा धरातल के नीचे ठंडा होता है, तब धीरे-धीरे जमने के कारण रवे बड़े-बड़े होते हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

⇒ ये चट्टानें तुलनात्मक रूप से कठोर होती हैं, इनमें जल काफी कठिनाई से जोड़ों के सहारे ही अंदर प्रविष्ट हो पाता है।

⇒ इनमें परत का अभाव होता है, परंतु जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ आग्नेय चट्टानों में जीवों के अवशेष (Fossils) का अभाव होता है।

⇒ ज्वालामुखी चट्टानों में रवों का विकास नहीं होने पर उनका गठन कांच की तरह (Glassy) होता है, जैसे ऑब्सीडियन।

⇒ आग्नेय चट्टानों के उदाहरण- ग्रेनाइट, रायोलाइट, बेसाल्ट, पेग्माटाइट (Pegmatite), साइनाइट (Syenite), डायोराइट (Diorite), एण्डेसाइट (Andesite), गैब्रो (Gabro), डोलेराइट (Dolerite), पेरिडोटाइट (Peridotite) आदि हैं।

आग्नेय चट्टान के प्रकार

          स्थिति एवं संरचना के अनुसार आग्नेय चट्टानें दो प्रकार की होती हैं-

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)-

           वह आग्नेय चट्टानें जिनका निर्माण सतह के ऊपर लावा के ठंडा होने और जमने से होता है, बहिर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं। इनमें क्रिस्टल बहुत छोटे होते हैं क्योंकि लावा तेजी से जम जाता है। बेसाल्ट एवं रायोलाइट इसका अच्छा उदाहरण है। इस चट्टान की क्षरण से ही काली मिट्टी का निर्माण होता है जिसे रेगुड़ (Regur) कहते हैं।

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)-

         वह आग्नेय चट्टानें जो सतह के नीचे लावा के ठंडे और ठोस होने से निर्मित होती है, अंतर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती है।

      इसके दो पुन: उपवर्ग हैं-

(a) पातालीय चट्टान (Plutonic Rock)

            इसका निर्माण पृथ्वी के अंदर काफी अधिक गहराई पर होता है। इसका नामकरण प्लूटो (यूनानी देवता) के नाम पर किया गया है। जो पाताल के देवता माने जाते हैं। अत्यधिक धीमी गति से ठंडा होने के कारण इसके क्रिस्टल बड़े बड़े होते हैं। ग्रेनाइट चट्टान इसका उदाहरण है।

(b) मध्यवर्ती चट्टान (Hypobyssal Rock)

        ज्वालामुखी के उदगार के समय धरातलीय अवरोध के कारण लावा दरारों, छिद्रों एवं नली में ही जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है, बाद में अपरदन की क्रिया के बाद यह चट्टाने धरातल पर नजर आने लगती है। डोलेराइट, मैग्नेटाइट इन चट्टानों के महत्वपूर्ण उदाहरण है।

मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानों के विभिन्न रूप

            जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर भूपटल के नीचे ही ठंडा होने की प्रवृति रखता है। तब आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति का निर्माण होता है। जैसे–Volcano

⇒ जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तो डाइक, क्षैतिज ठोस होता है तो सिल, जब उत्तल दर्पण के समान ठोस होता है तो लैकोलिथ, जब अवतल दर्पण के समान ठोस होता है तो लोपोलिथ, जब तरंग के समान ठोस होता है तो फैकोलिथ स्थलाकृति का निर्माण होता है। इसी तरह जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससे बैथोलिथ का निर्माण होता है।

⇒ रासायनिक संरचना की दृष्टि से आग्नेय चट्टानों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) अम्लीय चट्टानें (Acid Rocks)-

        इनमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। इनका रंग हल्का होता है। ये चट्टानें अपेक्षाकृत हल्की होती हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

(ii) क्षारीय चट्टानें (Basic Rocks)-

        इनमें सिलिका की मात्रा कम होती है। इनमें फेरो-मैग्नेशियम की प्रधानता होती है। लोहे की अधिकता के कारण इन चट्टानों का रंग गहरा होता है। इनका घनत्व भी अधिक होता है, जैसे- गैब्रो, बेसाल्ट, रायोलाइट आदि।

⇒ पूर्व की चट्टानों के ऊपर स्थित बेसाल्ट चट्टान टोपी (Caps) के समान दिखाई पड़ता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को ‘मेसा’ (Mesa) कहा जाता है।

⇒ अपरदन के कारण मेसा का अधिकांश भाग कट जाता है एवं उसका आकार छोटा होने लगता है। अत्यंत छोटी आकार वाली मेसा को ‘बुटी’ (Butte) कहा जाता है।

⇒ धरातल के नीचे परतदार चट्टानों के बीच स्थित लावा गुम्बद (जैसे बैथोलिथ) के ऊपर की मुलायम चट्टानें अपरदन द्वारा नष्ट होती जाती हैं। इस प्रकार लावा गुम्बद धरातल पर दिखने लगता है एवं यह अवरोधक (Resistant) चट्टान संकरी एवं लंबी कटक में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को “होगबैक’ (Hogback) कहा जाता है।

⇒ हौगबैक से मिलती-जुलती एक स्थलाकृति, जिसका ढाल एवं डिप (Dip) झुका हुआ हो ‘कवेस्टा’ (Questa) कहलाती है।

2. अवसादी या तलछटी या परतदार चट्टानें (Sedimentary or Stratified Rocks):-

      ये वे चट्टानें हैं जिनका निर्माण विखण्डित ठोस पदार्थों, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों के जमाव से होता है।

अवसादी चट्टान

⇒ इन चट्टानों में अवसादों की विभिन्न परतें पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जीवावशेष (Fossils) पाये जाते हैं।

⇒ धरातल का 75% भाग अवसादी चट्टानों से ढका हुआ है एवं शेष 25% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से आवृत्त है।

⇒ यद्यपि अवसादी चट्टानें धरातल का अधिकांश भाग आवृत्त किये हुए हैं, फिर भी भूपटल के निर्माण में इनका योगदान 5% ही है, शेष 95% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से निर्मित है। इस प्रकार परतदार चट्टानों का महत्त्व क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से है, भू-पृष्ठ में गहराई की दृष्टि से नहीं।

⇒ ये चट्टानें रवेदार नहीं होती हैं।

⇒ ये चट्टानें क्षैतिज रूप में बहुत कम पाई जाती हैं। पार्श्ववर्ती दबाव के कारण परतों में मोड़ पड़ जाता है, अतएव ये चट्टानें सामूहिक रूप से अपनति एवं अभिनति के रूप में पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ ये चट्टानें प्रायः मुलायम होती हैं (जैसे- चीका मिट्टी, पंक आदि), परन्तु ये कड़ी भी हो सकती हैं (जैसे- बलुआ पत्थर)।

⇒ ये शैलें अधिकांशतः प्रवेश्य (Porous) होती हैं, परंतु चीका मिट्टी जैसी परतदार चट्टानें अप्रवेश्य भी हो सकती हैं।

⇒ इनका निर्माण अधिकांशतः जल में होता है। परंतु लोएस जैसी परतदार चट्टानों का निर्माण पवन द्वारा जल के बाहर भी होता है। बोल्डर क्ले (Boulder Clay) या टिल (Till) हिमानी द्वारा निक्षेपित परतदार चट्टानों के उदाहरण हैं, जिसमें विभिन्न आकार के चट्टानी टुकड़े मौजूद रहते हैं।

3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks):-

       जब ताप, दबाव, रासायनिक क्रियाओं आदि के प्रभाव से आग्नेय एवं परतदार चट्टानों का रूप परिवर्तित हो जाता है, तो रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है। कभी-कभी रूपांतरित चट्टानों का भी रूपांतरण हो जाता है। इस क्रिया को पुनः रूपान्तरण कहा जाता है। रूपांतरण के फलस्वरूप चट्टानों की मूलभूत विशेषताएं जैसे- घनत्व, रंग, कठोरता, बनावट, खनिजों का संघटन आदि आंशिक या पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती हैं।

कायांतरित चट्टान

           कायांतरित चट्टानों के उदाहरण

⇒ आग्नेय से कायांतरित चट्टान-

ग्रेनाइट- नीस,

बेसाल्ट- एम्फी बोलाइट

ग्रेबो- सर्पेन्टइन

⇒ अवसादी से कायांतरित चट्टानें-

बालुवा पत्थर- क्वार्टजाइट,

चूना पत्थ– संगमरम,

शेल- स्लेट,

कोयला-  ग्रेफाइट, हीरा,

⇒ रूपांतरित चट्टान से पुन: रूपांतरित चट्टान

स्लेट- शिष्ट

शिष्ट- फायलाइट



 

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