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2. Khan pan ka mahilaon me galat bhrantiyan / खान पान का महिलाओं में गलत भ्रांतियाँ

2. Khan pan ka mahilaon me galat bhrantiyan

 (खान पान का महिलाओं में गलत भ्रांतियाँ)



Khan pan ka mahilaon me galat bhrantiyan
पौष्टिक भोजन लेते हुए

खान पान का महिलाओं में गलत भ्रांतियाँ⇒

         भारत सहित विश्व के अनेक भागों में महिलाओं के लिए भोजन के विषय में कुछ गलत परम्परायें व विचार प्रचलित है जो काफी हानिकारक है। उदाहरण के लिए-आमतौर पर लोगों में यह भ्रांतियाँ है कि लड़कियों से लड़को को अधिक भोजन चाहिए परन्तु ये सोच गलत है। वास्तव में महिलाएँ व लड़कियाँ उतना ही (कहीं कहीं तो अधिक) कठोर परिश्रम करती है जितना की पुरुष व लड़के करते हैं।

      अतः उन्हें भी उतना ही स्वस्थ रहने की जरूरत होती है, जिन लड़कियों को बचपन में भली-भांति खिलाया पिलाया जाता है तो वे स्वस्थ रहती हैं। परिणामस्वरूप बड़े होकर उन्हें पढ़ाई या काम करने में कम समस्यायें होती है और वे स्वास्थ्य स्त्रियाँ बनती हैं।

         देश में कुछ समुदायों में ऐसा विश्वास है कि महिला को अपने जीवन के कुछ खास समय में कुछ विशेष खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए। इन खास समय से तात्पर्य माहवारी का समय गर्भावस्था प्रसव के तुरंत पश्चात् का समय स्तनपान कराने का समय या सोनिवृत के समय होता है लेकिन वास्तविकता यह है कि महिलाओं को हर अवस्था में हमेशा पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है विशेषकर गर्भावस्था तथा स्तनपान की अवस्था में तो उन्हें पोषणीय भोजन की आवश्यकता में किसी भी तरह की कमी का दुष्प्रभाव माँ एवं उनके शिशु दोनों को भुगतना पड़ सकता है। भोजन के कुछ खाद्य पदार्थों के परहेज करने से कमजोरी, बीमारी और मृत्यु भी हो सकती है।

       हमारे समाज में लड़कियों को बचपन से ही यह बात दिमाग में डाल दी जाती है कि महिलाओं को पहले अपने परिवार के अन्य सदस्यों को भोजन कराना चाहिए तत्पश्चात् ही स्वयं भोजन करना चाहिए, ऐसी स्थिति में महिलायें केवल बचा खुचा भोजन ही खा पाती है। भारत सहित विश्व के अनेक भागों में महिलाओं के लिए भोजन के विषय में कुछ गलत परम्परायें व विचार प्रचलित है जो काफी हानिकारक है। अन्य सदस्यों के बराबर भोजन उसे नहीं मिलता है। यह महिलाओं के स्वास्थ पर काफी कुप्रभाव डालता है। 

          प्रसव के तुरन्त बाद तो यह खतरनाक भी हो सकता है। खान-पान से संबंधित लोगों में एक भ्रांति यह भी है कि रोगी व्यक्ति को स्वस्थ की तुलना में कम भोजन की आवश्यकता होती है। वास्तविकता तो यह है कि पौष्टिक भोजन न केवल बिमारियों की रोकथाम करता है बल्कि बीमार व्यक्ति को फिर से जल्दी स्वस्थ होने में सहायक होता है। एक सामान्य नियम यह है कि जो खाद्य पदार्थ सामान्य व्यक्ति के लिए अच्छे होते हैं वे रोगी व्यक्तियों के लिए भी उतने ही लाभदायक होते हैं।

         हमारे देश में कुछ प्रान्तों में एक बहुत ही हानिकारक विश्वास प्रचलित हैं कि जिस महिला को अभी हाल में ही बच्चा हुआ है उसे कुछ तरह के खाद्य पदार्थ से परहेज करना चाहिए। ऐसी अवस्था में उसे न्यूनतम आवश्यक पोषक मूल्य खाद्य वस्तुएँ खाने को दिए जाते हैं। परिणामस्वरूप उसे आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं और वह कमजोर एवं एनीमिया का शिकार हो जाती हैं। यह स्थिति कभी-कभी गंभीर बीमारी या फिर मौत का कारण भी बन जाती है।

         प्रसवोपरान्त महिलाओं को स्वस्थ रहने एवं स्तनपान प्रदान करने वाले खाद्य पदार्थों की आपूर्ति अत्यंत आवश्यक होता है। पौष्टिक तत्वों से युक्त आहार से उसे कोई हानि नहीं बल्कि अत्यधिक लाभ होगा जिसमें माँ और बच्चा दोनों स्वस्थ रहेगा।
जुकाम ग्रस्त व्यक्ति के लिए संतरे, नींबू, अमरूद एवं अन्य फल को नहीं खाने की धारणायें लोगों में व्याप्त है जो कि बिल्कुल गलत धारणा है। वास्तव मे तो विटामिन सी युक्त फल के सेवन से संक्रमण पर काबू पाने में अत्यंत सहायता मिलती है।

       हमारे देश में कुपोषण की समस्या अत्यंत दयनीय है जिसका मुख्य कारणों में से एक मांसाहार का नहीं करना होता है। हमारे देश में एक बहुत बड़ा वर्ग मांसाहारी से परहेज करता है जो कि उच्च गुणवत्तापूर्ण प्रोटीन की आपूर्ति का मुख्य स्त्रोत है। मांसाहारी नहीं करने वाले को दुध, सोयाबीन इत्यादि का भरपूर मात्रा में सेवन आवश्यक हो जाता है परन्तु गरीबी की वजह से इन पदार्थों का सेवन नहीं कर पाना कुपोषण की स्थिति को विकट करता है।

खराब पोषण से बीमारियाँ

          गलत भ्रांतियों या धारणाओं की वजह से हमारे देश में लड़कियों को आवश्यकता से कम भोजन या यूँ कहें कि पौष्टिक भोजन नही मिलता है। अतः उनके बीमार पड़ने की संभावना अधिक होती है। खराब पोषण के दुष्परिणामस्वरूप होने वाली कुछ बीमारियाँ निम्नलिखित है:-

एनीमिया (खून की कमी)-

       एनीमियाग्रस्त व्यक्ति अर्थात् शरीर में खून की कमी का होना यह तब होता है। जब शरीर में रक्त के लाल कणों या कोशिकाओं के नष्ट होने की दर उनके निर्माण की दर से अधिक होती है। चूँकि महिलायें हर महिने अपनी माहवारी के माध्यम से खून गंवाती है, इसलिए किशोरावस्था तथा रजोनिवृति के बीच की आयु की महिलाओं को एनीमिया सबसे अधिक होता है।

        संसार की गर्भवती महिलाओं में 50 से अधिक महिलाएँ एनीमिया से पीड़ित होती है। क्योंकि उन्हें अपने गर्भ में पल रहे शिशु के लिए भी रक्त निर्माण करना पड़ता है। एनीमिया एक गंभीर बीमारी हैं, जिसके कारण महिलाओं को अन्य बीमारियाँ भी होने की संभावना बढ़ जाती है। यह महिलाओं की कार्य क्षमता को प्रभावित करती है। एनीमिया से ग्रस्त महिलाओं की प्रसव के दौरान मृत्यु की संभावना काफी अधिक होती हैं।

लक्षण- एनीमियाग्रस्त रोगियों में निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं-
⇒ त्वचा का सफेद दिखना
⇒ वेहोश होना
⇒ सांस फूलना
⇒ हृदय गति का तेज होना
⇒ जीभ, नाखूनों एवं पलकों के अंदर सफेदी का आभास होना इत्यादि।

बेरी-बेरी

      यह रोग विटामीन बी समूह के एक विटामिन थायमिन की कमी के कारण होता है। थायमिन एक विटामिन है जो भोजन को उर्जा में परिवर्तित करने में सहायक होता है। एनीमिया की तरह यह रोग भी महिलाओं में किशोर अवस्था से लेकर रजोनिवृति के बीच की उम्र में अधिक होता है।

       बेरी-बेरी हाने की संभावना तब होती है जब भोजन में मुख्य खाद्य की बाहरी सतह निकाल ली गई हो अर्थात पोलिश किया हुआ चावल इत्यादि या ऐसा कन्दमूल जिसमें स्टार्च की मात्रा अधिक हो।

लक्षण- बेरी-बेरी रोगियों में निम्नलिखित लक्षण दिखाई देता है-

⇒ भूख नहीं लगना, खाने से अनिच्छा

⇒ भंयकर कमजोरी, विशेषकर पैरों में

⇒ शरीर पर सूजन आ जाना

⇒ समुचित इलाज के अभाव में दिल काम करना बंद कर देता है जिससे रोगी की मृत्यु भी हो सकती है।

रतौंधी-

       यह आँखों की एक बीमारी है जो मुख्य रूप से दो से पाँच वर्ष की आयु के बच्चों में सर्वाधिक होती है लेकिन व्यस्कों में भी यह बीमारी हो सकती है। यह विटामिन ए की कमी से होती हैं, गहरे पीले एवं गहरे हरे रंग की पत्तेदार सब्जियाँ फलों एवं अन्य ऐसे पदार्थों के पर्याप्त मात्रा में सेवन नहीं करने के कारण विटामिन ए की कमी हो जाती है। समय पर इलाज नहीं होने से अंधापन भी हो सकता है।

अत्यधिक मात्रा में या गलत तरह का भोजन खाने से होने वाली समस्याएँ-

      जिस प्रकार आवश्यकता से कम मात्रा में लिया गया भोजन शरीर की आवश्यकता को पूरा करने में अक्षम होता है जिससे अनेकानेक पोषणहीनता सम्बन्धी रोग हो जाता है ठीक उसी तरह आवश्यकता से अधिक मात्रा में पौष्टिक तत्व भी शरीर में जाकर संग्रहीत होने लगता है जिससे अनेक प्रकार की बीमारी के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। आवश्यकता से अधिक कार्बोहाइड्रेट का सेवन करने से शरीर में ग्लूकोज बढ़ने से मोटापा, मधुमेह आदि रोग होता है।

         आगे चलकर हृदय संबंधी रोग अनियमित ब्लड प्रेशर बीमारी की समस्या भी बढ़ती है। यहाँ तक की किडनी से संबंधित बीमारी भी अत्यधिक पोषण के कारण देखा जाता है। मानव की पोषण संबंधी आवश्यकता का विस्तृत अध्ययन से हमें यह जानकारी मिलती है कि आवश्यकता से अधिक या कम दोनों ही पोषण की स्थिति अच्छी नहीं होती है।

       अतः हमें संतुलित भोजन की महत्ता को समझते हुए संतुलित आहार ग्रहण करने की आदत विकसित कना चाहिए।

डॉ अनीता सिंह (आहार एवं पोषण विशेषज्ञ)
डॉ नितीश कुमार चौरसिया

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I ‘Dr. Amar Kumar’ am working as an Assistant Professor in The Department Of Geography in PPU, Patna (Bihar) India. I want to help the students and study lovers across the world who face difficulties to gather the information and knowledge about Geography. I think my latest UNIQUE GEOGRAPHY NOTES are more useful for them and I publish all types of notes regularly.

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