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10. शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात / Temperate Cyclone

10. शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात

(Temperate Cyclone)


शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात

         चक्रवात को आँग्ल भाषा में Cyclone कहते है। “Cyclone” शब्द यूनानी भाषा से लिया जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ है- सर्प की अँगूली। इस शब्द का प्रयोग जलवायु विज्ञान में प्रथम बार पिडिंगटन महोदय ने किया था। चक्रवात उस वायुमंडलीय परिस्थिति को कहते हैं जिनमें हवाएँ एक निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर घूमने की प्रवृति रखती है।

      चक्रवात में ज्यों ही किसी स्थान पर निम्न वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है त्यों ही उच्च वायुदाब केन्द्र से हवाएँ निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने लगती है। उच्च वायुदाब केन्द्र से आने वाली हवाओं का मुख्य उद्देश्य निम्न वायुदाब को समाप्त करना होता है। लेकिन निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने वाली हवाएँ पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आकार उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सुई के विपरीत दिशा (Anti Clock Wise) में और दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सूई की दिशा में घूमने लगती है।

प्रतिचक्रवात (Anti Cyclone)     

     चक्रवात का उल्टा प्रतिचक्रवात होता है। प्रतिचक्रवात के केन्द्र में एक उच्च दाब केन्द्र का निर्माण होता है और हवाएँ केन्द्र से बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। उत्तरी गोलार्द्ध में प्रतिचक्रवात (Clock wise) और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anti Clock wise घुमने की प्रवृति रखती हैं।

चक्रवात और प्रतिचक्रवात में अन्तर

(1) चक्रवात की स्थिति में निम्न वायुदाब केन्द्र और प्रतिचक्रवात की स्थिति में उच्च वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है।

(2) चक्रवात में हवा बाहर से केन्द्र की ओर आने की प्रवृति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में केन्द्र से बाहर की ओर जाने की प्रवृति रखती है।

(3) चक्रवात की स्थिति में परिवर्तन के फलस्वरूप बादल, वर्षण एवं तेज हवाएँ जैसी मौसमी परिस्थितियां उत्पन्न होती है। वहीं प्रतिचक्रवात की स्थिति में मौसम साफ होने की प्रवृति रखती है।

(4) चक्रवात के केन्द्र से हवाएँ नीचे से ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में हवाएँ ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृत्ति रखती है।

(5) जिस स्थान पर चक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। ठीक उसके ऊपर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है।         

  अतः स्पष्ट है कि चक्रवात एवं प्रतिचक्रवात जलवायु विज्ञान की दो अलग-2 धारणाएँ है।

चक्रवात का वर्गीकरण
       विशेषताओं एवं भौगोलिक स्थिति के आधार पर चक्रवात को दो भागों में बाँटते है-

(1) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात

(2) शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात

        मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले चक्रवात को शीतोष्ण चक्रवात कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति का मुख्य आधार उपध्रुवीय निम्न वायु भार का क्षेत्र होता है क्योंकि इस निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर ध्रुवीय वायु और पछुवा वायु चलने की प्रवृति रखती है। ध्रुवों की ओर से आने वाली वायु प्राय: ठण्डी, भारी, और शुष्क होती है। जबकि पछुआ हवा गर्म, हल्की और आर्द्रता से युक्त होती है। विपरीत दिशाओं से आने वाली तथा अलग-2 भौतिक विशेषता रखने वाली वायु जब आपस में मिलने का प्रयास करती है तो मिश्रण शीघ्र संभव नहीं हो पाता है। इन दो वायु के अग्र भाग मिलकर एक संक्रमण की स्थिति उत्पन्न करते हैं। संक्रमण का यह क्षेत्र ही वाताग्र (Front) कहलाता है।

    दूसरे शब्दों में ध्रुवीय हवा और पछुआ हवा के अग्र भाग आपस में मिलकर जिस संक्रमण पेटी का निर्माण करते हैं, उस पेटी को वाताग्र कहते है। इसकी चौड़ाई सामान्यतः 5-7 Km तक होती है। कभी-2 इसकी चौड़ाई 2-75 Km तक होती है। धरातल से इसकी ऊँचाई 1½- 2 Km तक होती है और लम्बाई 750 Km तक हो सकती हैं। वाताग्र धरातल के साथ एक निश्चित कोण पर झुका होता है।

ध्रुवीय हवा (ठंडी, शुष्क, भारी)

शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात

पछुआ हवा (गर्म, आर्द्र, हल्की)

वाताग्र (ल०- 750 किमी०, ऊँ०-1.5 किमी०, चौ०-5-7 किमी०)

           शीतोष्ण चक्रवात की उत्पत्ति प्रारंभ होना Fronto-genesis (वाताग्र जनन की अवस्था) कहलाता है। जबकि चक्रवात का अन्त/ विनाश Frontolisis (वाताग्र समापन की अवस्था) कहलाता है।

        वाताग्र निर्माण के बाद या संक्रमण स्थिति बनने के बाद वायु में चक्रीय प्रवाह की प्रक्रिया प्रारंभ होती हैं। इसका मुख्य कारण ठण्डी वायु का गर्म वायु राशि क्षेत्र में प्रवेश करना है। जब ठण्डी वायुराशि, गर्म वायुराशि के क्षेत्र में प्रवेश करती है तो ग्रहीय नियमों के अनुरूप प्रवाहित नहीं हो पाती हैं क्योंकि प्रवाहित वायु का लक्ष्य कोई अक्षांशीय निम्न बायुदाब की पेटी न होकर आस-पास की गर्म वायु का केन्द्र होता है।

     अत: प्रविष्ट करने वाली वायु गर्म वायु की दिशा में प्रवाहित होने लगती है और ठण्डी वायु अपना ग्रहीय प्रवाह को छोड़ देती है। प्रवाह का यह विचलन अंततः चक्रीय रूप धारण कर लेती है। इसे चित्र के माध्यम से भी समझा जा सकता है।

      कई मौसम वैज्ञानिकों ने शीतोष्ण चक्रवात की उत्पत्ति का अध्ययन किया है। इस संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य स्वीडीश मौसम वैज्ञानिक जैकोट्स और जर्केंस का है। इन्होंने चक्रवात उत्पत्ति के संबंध में ध्रुवीय वाताग्र सिद्धांत प्रस्तुत किया है। इस सिद्धांत के अनुसार शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति 6 अवस्थाओं में होती है:-

प्रथम अवस्था – प्रारंभिक अवस्था/ वाताग्र जनन की अवस्था

द्वितीय अवस्था – चक्रीय परिसंचरण की प्रारंभ की अवस्था

तृतीय अवस्था – उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था

चतुर्थ अवस्था – शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी होने की अवस्था

पाँचवा अवस्था – संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

छठा अवस्था – समापन की अवस्था

(1) प्रारंभिक अवस्था (Fronto genesis)/ वाताग्र जनन की अवस्था

       प्रारंभिक अवस्था में ध्रुवीय और पछुआ वायु का अग्र भाग मिलकर एक संक्रमण पेटी या स्थिर वाताग्र का निर्माण करती है जिसकी चौड़ाई 5-7 किमी०, ऊँचाई 1.5-2 किमी० और लम्बाई 750 किमी० या उससे अधिक होती है।

        स्थिर वाताग्र के निर्माण के लिए अति अनुकूल क्षेत्र उत्तरी अटलांटिक महासागर का मध्य अक्षांशीय क्षेत्र है। सामान्यत: वाताग्र का निर्माण उपध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र के सहारे होता है। लेकिन, स्थल और समुद्र के असमान वितरण के कारण वाताग्र सीधा न होकर लहरदार होता है या थोड़ा सा मुड़ा होता है। जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में समुद्री सतह के अधिकता के कारण लहरदार स्थिर वाताग्र का निर्माण नहीं होता।

(2) चक्रीय परिसंचरण की प्रारंभिक अवस्था

       इस अवस्था में ग्रहीय वायु (ध्रुवीय वायु) अपने मार्ग से विचलित होती है जिसके परिणामस्वरूप स्थिर वाताग्र का कुछ भाग दक्षिण की ओर अग्रसारित हो जाती है। जिस स्थान पर स्थिर वाताग्र ठण्डी / ध्रुवीय वायु के कारण जुड़ जाती है। उस भाग को शीत वाताग्र और शेष भाग को उष्ण वाताग्र कहते हैं। गर्म वाताग्र के सहारे मंद ढाल बनाते हुए गर्म वायु स्वतः ठंडी वायु के ऊपर उठने की प्रवृति रखती है। जबकि शीत वाताग्र में तीव्र ढाल के सहारे शीत वायु चक्रीय प्रवाह की प्रवृति खती है।

चित्र: शीत और उष्ण वाताग्र के निर्माण की अवस्था या चक्रीय परिसंचरण की अवस्था

(3) उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था
        इस अवस्था में ठण्डी वायु और भी अधिक निम्न अक्षांश की ओर खिसकते हुए चक्रीय प्रवाह लेने की प्रवृति रखती है जिसके कारण शीत वायु गर्म वायु के वृहत क्षेत्र में अपना प्रभाव स्थापित कर लेती है। इतना ही नहीं शीत वाताग्र के अग्रसारित हो जाने से पछुवा हवा का सम्पर्क अपने स्रोत क्षेत्र से खत्म हो जाता है जिसके कारण गर्म वायु एक खण्ड के रूप से बचा रह जाता है जिसे उष्ण खण्ड के नाम से जानते हैं।

चित्र: उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था

(4) शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी होने की अवस्था

       इस अवस्था में शीत वाताग्र और आगे बढ़ता है। इस अवस्था में शीत वाताग्र के लगातार आगे बढ़ने के कारण पछुवा हवा का सम्पर्क अपने स्रोत्र क्षेत्र से पूर्णतः कट जाता है। इतना ही नहीं बल्कि गर्म हवा एक संकरे प्रदेश में सिकुड़‌कर रह जाता है तथा शीत वाताग्र को पछुआ हवा और ठण्डी ध्रुवीय हवा दोनों मिलकर दबाव लगाना प्रारंभ कर देती है जिसके कारण शीत वाताग्र तेजी से अग्रसारित होने लगता है।

     दूसरी ओर जिस स्थान पर स्थिर वाताग्र मुड़ा था उस स्थान पर शीत सीमाग्र और गर्म सीमाग्र के मिलने से आवर्त की स्थिति उत्पन्न होती है। इस अपर्त के चारों ओर गर्म एवं ठण्डी वायु का मिश्रित चक्रीय प्रवाह देखने को मिलता है।

चित्र: शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी की अवस्था

(5) संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

            इस अवस्था में शीत वाताग्र और उष्ण वाताग्र आपस में मिलने की प्रवृति रखती है। लेकिन मिलने की प्रक्रिया वाताग्र के केन्द्र से शुरू होती है। गर्म वाताग्र और शीत वाताग्र मिलकर संरोध वाताग्र (Occluded front) का निर्माण करती है। संरोध वाताग्र एक ऐसा वाताग्र है जिसमें उष्ण एवं शीत दोनों प्रकार की वायु पायी जाती हैं। संरोध वाताग्र दो प्रकार का होता है:-

(i) शीत संरोध वाताग्र

(ii) गर्म संरोध वाताग्र

        शीत संरोध वाताग्र वह स्थिति है जिसमें गर्म वाताग्र समाप्त हो जाता है और शीत वाताग्र गर्म वाताग्र के आगे अवस्थित ठण्डी वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट कर जाती है।

चित्र: संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

उष्ण संरोध वाताग्र वह हैं जहाँ पर वाताग्र का प्रभाव क्षेत्र वाताग्र के केन्द्र प्रभाव में एक छोटे से केन्द्र में रह जाता है।

(6) समापन की अवस्था (Frontolisis)

         समापन की अवस्था को Frontolisis की अवस्था भी कहते हैं। इस अवस्था में उष्ण वाताग्र एवं शीत वाताग्र आपस में पूर्णतः मिल जाते हैं। ध्रुवीय वायु और पछुवा हवा पृथ्वी की घुर्णन गति के प्रभाव में आकर ग्रहीय मार्ग अपना लेती है और चक्रवात की समाप्ति हो जाती है।

 

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की मौसमी दशाएँ एवं वाताग्र के प्रकार

       शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात में विभिन्न प्रकार के मौसमी दशाओं का विवेचना निर्मित होने वाले चारों वाताग्र के आधार पर करते हैं। प्रत्येक वाताग्र की अलग-2 विशेषताएँ होती हैं। मौसमी विशेषताओं के आधार पर ही वाताग्र को चार भागों में बाँटते हैं।

(1) स्थिर वाताग्र (Stationary Front)

(2) उष्ण वाताग्र (Warm Front)

(3) शीत वाताग्र (Cold Front)

(4) संरोध/अधिविष्ट वाताग्र (Occluded Front)

(1) स्थिर वाताग्र

      शीतोष्ण चक्रवात उत्पन्न होने के पहले आसमान साफ होता है। ध्रुवीय और पछुआ वायु अपने-2 प्रचलित मार्ग से चलने की प्रवृति रखते हैं। ज्यों ही पछुआ वायु और ध्रुवीय वायु एक-दूसरे के विपरीत दिशाओं से आकर मिलती है तो स्थिर वाताग्र का निर्माण करती है। स्थिर वाताग्र में वायु स्थिर रहती है। वर्षा नहीं होती है। लेकिन आसमान धुंधला होने लगता है।

(2) उष्ण वाताग्र

        उष्ण वाताग्र की स्थिति में भी वायु स्थिर बनी रहती है क्योंकि गर्म पछुवा वायु ठण्डी ध्रुवीय वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट करने का प्रयास करती है। लेकिन गर्म वायु प्रविष्ट नहीं कर पाती है। फलत: गर्म वायु मंद ढाल के सहारे ठण्डी वायु के ऊपर धीरे-2 चढ़ने की प्रवृ‌त्ति रखती है जिससे बहुस्तरीय बादलों का निर्माण होता है। जैसे:- उपर से नीचे आने पर क्रमशः Cirrus, Cirro stratus, Alto stratus और Cumulus नामक बादल का निर्माण करती है। इस प्रकार के बादलों से धीरे-धीरे लम्बी अवधि तक वर्षण का कार्य होती है। वर्षा का प्रभाव क्षेत्र भी विस्तृत होता है।

(3) शीत वाताग्र (Cold front)

         शीत वाताग्र की स्थिति में ठण्डी वायुराशि गर्म वायुराशि के क्षेत्र में प्रविष्ट करती है जिसके कारण वाताग्र तीव्र ढाल का निर्माण करती है। तीव्र ढाल के सहारे गर्म वायु राशि उपर उठकर संतृप्त हो जाती है और ऊपर से नीचे क्रमशः तीन प्रकार के बादलों का निर्माण करती है। जैसे-

(i) स्तरी बादल (Cirro Stratus)

(ii) कपासी वर्षी बादल (Cumulo Nimbus)

(iii) वर्षा स्तरी बादल (Nimbo Stratus)

         शीत वाताग्र वाले क्षेत्र में अति अल्प समय में भारी वर्षा रिकॉर्ड किया जाता है। शीत वाताग्र का प्रभाव क्षेत्र काफी छोटे क्षेत्रों में होता है। जबकि उस स्थान से शीत वाताग्र गुजर जाता है तो अचानक वर्षा रुक जाती है। शीतलहरी चलने लगती है। तापमान में भारी गिरावट आती है। वायुदाब बढ़ जाती है औ मौसम कष्टकर हो जाता है।

(4) संरोध/अधिविष्ट वाताग्र (Occluded Front)

      संरोध वाताग्र में कई प्रकार के बादलों का निर्माण होता है। लेकिन इसमें वर्षा तीव्र होती है। संरोध के कारण शीतोष्ण चक्रवात में अंतिम रूप से वर्षा होती है। जब उष्ण वाताग्र और शीत वाताग्र पूर्णतः आपस में मिलते हैं तो उष्ण खण्ड भी समाप्त हो जाता है। ध्रुवीय वायु और पछुआ वायु पुन: ग्रहीय मार्ग को अपना लेते हैं। आकाश साफ हो जाता है।

      ध्रुवीय वायु और पछुआ वायु अपने-2 क्षेत्र में रहकर उप-ध्रुवीय भागों में कोरियालिस प्रभाव के कारण ऊपर उठने लगती है। जिससे मौसम पूर्णतः सामान्य हो जाता है। पुनः जब ध्रुवीय वायु पछुवा वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट होने का प्रयास करती है तो पुन: नई चक्रवात का निर्माण प्रारंभ होता है।

शीतोष्ण चक्रवात का वितरण

              शीतोष्ण चक्रवात का प्रभाव क्षेत्र सामन्यत: 45º से 65° अक्षांश के बीच दोनों गोलार्द्धों में होता है। शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का प्रभाव क्षेत्र हजारों किमी० तक हो सकता है।:-

(1) उत्तरी अटलांटिक महासागर और पश्चिमी यूरोप शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात के सबसे अनुकूल क्षेत्र हैं। प० यूरोप में शीतोष्ण चक्रवात के कारण ही सालों भर वर्षा होती है।

(2) शीतोष्ण चक्रवात का दूसरा सबसे प्रमुख क्षेत्र उत्तरी प्रशान्त महासागर में स्थित है। इस क्षेत्र में चक्रवात का प्रभाव क्षेत्र बेरिंग सागर, ओखोटस्क सागर से लेकर कनाडा के प० तट तक होता है।

(3) शीतोष्ण चक्रवात का तीसरा प्रमुख क्षेत्र न्यू फाउंडलैण्ड (कनाडा) और उसके आसपास का क्षेत्र होता है।

(4) भूमध्य सागर के ऊपर भी शीत ऋतु में शीतोष्ण चक्रवात का निर्माण होता है। इसके कारण तुर्की, ईरान, इराक, अफगानिस्तान और उ०-प० भारत में चक्रवातीय वर्षा होती है।

       दक्षिणी गोलार्द्ध में सागरीय स्थिति अधिक होने के कारण शीतोष्ण चक्रवात का निर्माण लगभग नगण्य होता है। द० गोलार्द्ध में मात्र चिली के दक्षिणी भाग में छोटी शीतोष्ण चक्रवात उत्पन्न होता है जिससे वर्षण का कार्य होता है।


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9. चक्रवात, प्रतिचक्रवात और उष्ण कटिबंधीय चक्रवात

9. चक्रवात, प्रतिचक्रवात और उष्ण कटिबंधीय चक्रवात



चक्रवात (Cyclone)

      चक्रवात को आँग्ल भाषा में Cyclone कहते है। “Cyclone” शब्द यूनानी भाषा से लिया गया है। जिसका शाब्दिक अर्थ है- सर्प की कुंडली। इस शब्द का प्रयोग जलवायु विज्ञान में प्रथम बार पिडिंगटन महोदय ने किया था।

      चक्रवात उस वायुमण्डलीय परिस्थिति को कहते हैं जिसमें हवाएँ एक निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर घूमने की प्रवृत्ति रखती है। चक्रवात में ज्यों ही किसी स्थान पर निम्न वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है त्यों ही उच्च वायुदाब केन्द्र से हवाएँ निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने लगती है। उच्च वायुदाब केन्द्र से आने वाली हवाओं का मुख्य उद्देश्य निम्न वायुदाब केन्द्र को समाप्त करना होता है। लेकिन निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने वाली हवाएँ पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आकार उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सूई के विपरीत (Anticlock wise) और दक्षिण गोलार्द्ध में घड़ी की सुई की दिशा (Clock wise) में घुमने लगती हैं।

प्रतिचक्रवात (Anti Cyclone)

     चक्रवात का उल्टा प्रतिचक्रवात होता है। प्रतिचक्रवात के केन्द्र में एक अपना वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता और हवाएँ केन्द्र से बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। उत्तरी गोलार्द्ध में प्रतिचक्रवात Clock wise और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anticlock wise घुमने की प्रवृति रखती है।

चक्रवात और प्रतिचक्रवात में अंतर

1. चक्रवात की स्थिति में निम्न वायुदाब केन्द्र और प्रतिचक्रवात की स्थिति में उच्च वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है।

2. चक्रवात में हवा बाहर से केन्द्र की ओर आने की प्रवृत्ति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में केन्द्र से बाहर की ओर जाने की प्रवृत्ति रखती है।

3. चक्रवात की स्थिति में परिवर्तन के फलस्वरूप बादल, वर्षण एवं तेज हवाएं जैसी मौसमी परिस्थतियाँ उत्पन्न होती हैं। वहीं प्रतिचक्रवात की स्थिति में मौसम साफ होने की प्रवृति रखती है।

4. चक्रवात के केन्द्र में हवाएँ नीचे से ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में हवाएँ ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृति रखती है।

5. जिस स्थान पर चक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। ठीक उसके ऊपर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। अत: स्पष्ट है कि चक्रवात और प्रतिचक्रवात जलवायु विज्ञान की दो अलग-2 धारणाएँ है।

चक्रवात का वर्गीकरण

     विशेषताओं एवं भौगोलिक स्थिति के आधार प चक्रवात को दो भागों में बाँटते हैं:-

(1) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclone)

(2) शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cylone)

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclone)- 

     पृथ्वी के दोनों गोलार्द्धों में 8º से 20° अक्षांशों के बीच या उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में किसी निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर तेज गति से घुमते हुए वायु से उत्पन्न मौसमी परिस्थितियों को उष्ण कटिबंधीय चक्रवात कहते हैं।

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात की विशेषताएँ

(1) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति तथा विकास सागरीय सतह से प्राय: प्रारंभ होती है। इसकी उत्पत्ति हेतु सागर एवं स्थल का मिलन बिन्दु आदर्श परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं।

(2) इसमें एक निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर हवाएँ घूमती है।

(3) इसमें वायु की औसत गति 100 Km/h होती है।

(4) इसमें समदाब रेखाएँ प्रायः गोलाकार होती है।

(5) इसमें दाब प्रवणता तीव्र होती है।

(6) चक्रवात की तीव्रता दाब प्रवणता पर निर्भर करती है। जब दाब प्रवणता कम होती है तो वायुमण्डलीय अवदाब का निर्माण होता है।

(7) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात का विस्तार अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र पर होता है।

(8) प्राय: उष्ण कटिबंधीय चक्रवात पूरब से पश्चिम दिशा की ओर गमन करता है।

(9) इसमें अति अल्प समय में तीव्र गति से एवं अधिक मात्रा में वर्षा होती है।

(10) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के केन्द्र को चक्रवात का आँख (चक्षु) कहा जाता है।

(11) यह शीत ऋतु की उपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में अधिक उत्पन्न होता है।

(12) चक्रवात में गर्म एवं आर्द्र हवाएँ ऊपर की ओर उठकर संघनन क्रिया के माध्यम से बादल का निर्माण करती है। संघनन क्रिया के द्वारा परित्यक्त गुप्त उष्मा के द्वारा चक्रवात शक्ति ग्रहण करता है।

(13) यह समुद्र से आर्द्रता को स्थल की ओर लाने में मदद करता है।

(14) चक्रवात के कारण बड़े पैमाने पर जान एवं माल की हानि होती है।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति

    उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्नि दोनों गोलार्द्ध में 8º से 20° अक्षांश के बीच होता है। लेकिन इन्हीं अक्षांशों के बीच द० अटलांटिक महासागर में चक्रवात उत्पन्न नहीं होता है क्योंकि इस क्षेत्र में चक्रवात उत्पन्न करने हेतु स्थलीय भूभाग का अभाव है।

          8º से 20° अक्षांश के बीच दोनों गोलार्द्धों में तापीय विषुवत रेखा के सहारे दोनों गोलार्द्धों से आने वाली वाणिज्यिक हवा आपस में मिलती है। जब दोनों गोलार्द्धों से आने वाली वाणिज्यिक हवा का तापमान एक समान होता है तो वैसी परिस्थिति में आपस में केवल मिलने की प्रवृति रखते हैं अर्थात् चक्रवात की आँख का विकास नहीं होता है।

         8º से 20° अक्षांश के बीच जल एवं स्थल का वितरण काफी अनियमित है। वाणिज्यिक हवाएँ जब स्थलीय भाग से गुजरती हैं तो उसे स्थलीय वायु राशि और समुद्र के ऊपर से गुजरने वाली हवा को समुद्री वायुराशि कहते हैं। जिन स्थानों पर स्थलीय वायुराशि और समुद्री वायुराशि मिलती है वहाँ पर बला आघूर्ण के कारण हवाएँ घुमने लगती हैं और चक्रवात को जन्म देती हैं।

     समुद्री वायुराशि काफी गर्म एवं आर्द्रता से युक्त होती है। जिससे स्वत: समुद्री सतह पर निम्न वायुदाब केन्द्र का विकास होता है। जबकि इसके तुलना में स्थलीय भाग पर उच्च वायुदाब केन्द्र का विकास होता है।

    तटीय भागों में स्थलीय एवं समुद्री वायुराशि प्राय: मिलने की प्रवृत्ति रखते हैं। प्रारंभ में वाताग्र की स्थिति उत्पन्न करते हैं। लेकिन बला आघुर्ण के कारण वाताग्र ही चक्रवात के आँख के रूप में तब्दील कर जाता है। फलत: उच्च वायुदाब क्षेत्र से आने वाली हवाएँ आँख को समाप्त करने के लिए दौड़ पड़ती है। लेकिन आँख के केंद्र में पहुँचने के पहले ही हवाएं पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आ जाती है और ऊपर की ओर प्रक्षेपित कर दिए जाते है।

     उष्ण एवं आर्द्र हवाएँ उपर जाकर संघनित होती है। जिससे वर्षण का कार्य प्रारंभ हो जाता है। सम्पूर्ण उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति को नीचे के मानचित्र से समझा जा सकता है।

प्रतिचक्रवात

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की लम्बवत संरचना

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात की संरचना

      उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की संरचना चक्रीय होती है। जववायु विज्ञानवेताओं ने इसकी संरचना का अध्ययन क्षैतिज एवं लम्बवत रूप से करते हैं।

(A) क्षैतिज अध्ययन/ संरचना

      क्षैतिज रूप से उष्ण कटिबंधीय चक्रवात कई वलय में विभक्त होता है। सामान्य रूप से एक विकसित उष्ण कटिबंधीय चक्रवात में कुल 6 रिंग होते हैं। जैसे-

प्रथम रिंग (वलय)⇒

    यह चक्रवात का केन्द्र बिन्दु होता है। इसे चक्रवात की आँख कहते हैं। इसका व्यास 5 से 50 Km तक हो सकता है। आकार में यह लगभग वृत के समान होता है। वायुदाब अति न्यून होता है। वायु गर्म होकर ऊपर जाने की प्रवृत्ति रखती है। ठीक इसके ऊपर बादल का निर्माण नहीं होता है क्योंकि उष्ण एवं आर्द्र वायु जब गर्म होकर ऊपर उठती है तो केन्द्र के मध्य भाग में ठंडी एवं शुष्क व नीचे की ओर बैठने की प्रवृत्ति रखती है।

द्वितीय रिंग⇒

      यह चक्रवात के चारों ओर स्थित होता है। इसे आँख की दीवाल (Eye Wal) कहते हैं। इसकी चौड़ाई 10 से 20 Km तक होता है। इस रिंग में हवा तेजी से ऊपर की ओर उठती है और आकाश में Cumulo nimbus cloud का निर्माण करती है और इस द्वितीय रिंग में भारी वर्षा होती है।

तृतीय रिंग⇒

    इसे स्पाइरल बैण्ड या वर्षा बैण्ड कहा जाता है। द्वतीय रिंग में गरज के साथ भारी वर्षा होती है।

चौथा रिंग⇒

     इसे Annular Band कहते हैं। चौथा रिंग में सघन बादल छाये रहते हैं। लेकिन वर्षा बहुत कम होती है। इस रिंग में तापमान उच्च और आर्द्रता निम्न होती है।

पांचवां रिंग⇒

     इसे Outer Convective Band कहते हैं। इसमें बादल बहुत कम पाये जाते है। वर्षा नगण्य होती है।

छठा रिंग⇒

     यह उष्ण चक्रवात का सबसे बाहरी हिस्सा है। इस रिंग में ह‌वाएँ क्षैतिज रूप से केन्द्र की ओर चलती है। लेकिन इसमें अन्य मौसमी परिस्थितियाँ सामान्य रहती है। छठा रिंग को Outer Band कहते हैं।

1. चक्रवात का आंख (Eye of Cyclone) – अति न्यून वायुदाब

2. चक्रवात का दीवाल (Eye Wall)- क्यूम्लो निम्बस बादल का निर्माण तथा भारी वर्षा

3. वर्षा बैण्ड (Rain Band)- गरज के साथ भारी वर्षा

4. एनुलर बैण्ड (Annular Band)- सघन बादल

5. Outer Convective Band- बहुत कम बादल, नगण्य वर्षा

6. Outer Band- उष्ण चक्रवात का बाहरी हिस्सा

(B) लम्बवत संरचना

    मौसम वैज्ञानिकों ने लम्बवत रूप से उष्ण कटिबंधीय चक्रवात को तीन परत में विभक्त करते हैं-

I. In-flow layer⇒

    यह चक्रवात का सबसे निचली परत है। इसकी मोटाई घरातल से 3Km ऊँचाई तक होता है। इसमें हवाएँ क्षैतिज रूप से चक्रवात के आँख की ओर अग्रसारित होती है।

II. Middle layer⇒

     यह चक्रवात का सबसे प्रमुख हिस्सा है। इसकी मोटाई 3 से 7 Km तक होती है। इसमें हवाएँ ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है। साथ ही चक्रीय रूप से घुमते हुए चक्रवात के केन्द्र तक पहुँचने का प्रयास करती है।

III. Out flow layer⇒

    यह चक्रवात का सबसे ऊपरी परत है। इसका विस्तार 7 km से ऊपर होता है। इस Layer के मध्य में उच्च वायुदाब केन्द्र होता है तथा हवाएं बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। दूसरे शब्दों में इस Layer में प्रतिचक्रवात की स्थिति होती है।

प्रतिचक्रवात

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की लम्बवत संरचना

उष्णकटिबंधीय चक्रवात का वर्गीकरण एवं वितरण

   चक्रवात में चलने वाले वायु की गति या चक्रवात की तीव्रता के आधार पर उष्ण कटिबंधीय चक्रवात को तीन वर्गो में बाँटते हैं:-

(1) चक्रवाती अवसाद या चक्रवाती विमोक्ष (Tropical Dipression)

     इसमें चलने वाली वायु की गति 17 m/s या 62 km/h होती है। इसमें निम्न वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है। लेकिन पूर्ण रूप से चक्रवात की आँख तथा Eye Wall (आँख की दीवाल) का विकास नहीं होता।

(2) विकसित चक्रवात-

     वैसी चक्रवात जिसमें घूमने वाले वायु की गति 17 m/s से 33 m/s (62 km/h-117 km/h) तक होती है। इसमें निम्न वायुदाब केन्द्र के साथ-2 चक्रवात की आँख का भी विकास होता है। लेकिन, Eye Wall का निर्माण नहीं होता।

(3) क्षेत्रीय चक्रवात/ अति विकसित चक्रवात-

     ऐसे चक्रवात में वायु की गति 33 m/s या 117 km/h से अधिक होता है। हरिकेन, टोरनेडो, जल स्तम्भ (water spont), विली बिली आदि इसके उदाहरण है। साफिर एवं सिम्पसन महोदय ने विध्वंस को आधार मानते हुए इस चक्रवात को 5 श्रेणियों में विभक्त किया है-

श्रेणी   हवा की गति

श्रेणी-I 74 से 95 mile/h

श्रेणी -II 96 से 110 mile/h

श्रेणी -III 111 से 130 mile/h

श्रेणी -IV 131 से 155 mile/h

श्रेणी -V 155 mile/h से अधिक

      साफिर एवं सिम्पसन ने बताया कि श्रेणी-III से ऊपर वाले चक्रवात विध्वंसक होना प्रारंभ हो जाते हैं। इसलिए अलग-2 श्रेणियों के चक्रवातों का नामांकरण अलग-2 किया जाता है। जैसे:- 2005 ई० में USA में आया हरिकेन श्रेणी-IV के समतुल्य चक्रवात था इसलिए उसका नाम डेनिश रखा गया था। अमेरिका में ही 2006 ई० में आया चक्रवात श्रेणी-V के समतुल्य था जिसका नाम कैटरीना रखा गया था। बंगाल की खाड़ी में 2007 में आया चक्रवात श्रेणी-III का था जिसका नाम सिद्ध रखा गया था।

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात का वितरण

     उष्ण कटिबंधीय चक्रवात दोनों गोलार्द्धों में 8º से 20º अक्षांशों के बीच उत्पन्न होते हैं। लेकिन इन्हीं अक्षांशों के मध्य दक्षिणी अटलांटिक महासागर में चक्रवात उत्पन्न नहीं होता। पूरे विश्व में उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के 6 प्रमुख और दो विशिष्ट क्षेत्र हैं-

(A) प्रमुख क्षेत्र

(1) मैक्सिको की खाड़ी और उसके तटवर्ती क्षेत्र-

    यहाँ उष्ण कटिबंधीय चक्रवात को हरिकेन से सम्बोधित करते हैं। जून से अक्टूबर के मध्य उत्पन्न होता है। यह कैरेबियाई द्वीप एवं सागरीय क्षेत्र से उत्पन्न होकर मैक्सिको और दक्षिणी USA की ओर अग्रसारित होता है।

(2) दक्षिणी चीन सागर-

     जापान के तटीय क्षेत्र और फिलिपीन्स के आसपास भी उष्ण कटिबंधीय चक्रवात उत्पन्न होता है। जापान में इसे टाइ‌कून और फिलिपीन्स में बाग्यो कहते हैं। जुलाई से अक्टूबर के बीच चक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है।

(3) फिजी द्वीप के आस-पास-

     इसे यहाँ चक्रवात कहा जाता है जो मार्च के महीने में उत्पन्न होता है।

(4) मध्यवर्ती अमेरिका के पश्चिमी तटीय क्षेत्र-

   यहाँ भी इसे हरिकेन ही कहते हैं लेकिन मैक्सिकों की खाड़ी में उत्पन्न होने वाली हरिकेन की तुलना में इसकी तीव्रता कम होती है।

(5) दक्षिण हिन्द महासागर में ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी-पश्चिमी भाग-

     यहाँ उष्ण कटिबंधीय चक्रवात को बिली-विली कहते हैं।

(6) बंगाल की खाड़ी और अब सागर-

   इन दोनों सागरों के बीच भारतीय उपमहाद्वीप स्थित है। यहाँ उष्ण कटिबंधीय चक्रवात एक वर्ष में तीन बार आती है।

     प्रथम मानसून प्रारंभ होने के पूर्व आती है जिसे बंगाल में काल वैशाखी, बिहार में अंधड़ और उत्तर पश्चिम भारत में (पंजाब-हरियाणा) तूफान कहा जाता है।

      दूसरा चक्रवात मानसून के दौरान उत्पन्न होती है। इसी चक्रवात के कारण भारत के आंतरिक भागों में मानसूनी वर्षा होती है।

      तीसरा चक्रवात मानसून के बाद उत्पन्न होती है। इन चक्रवात का सर्वाधिक प्रभाव कोरोमण्डल तटवर्ती क्षेत्रों (तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश) में अधिक होती है।

(B) विशिष्ट क्षेत्र

(1) USA के दक्षिणी भाग⇒

     यहाँ उत्पन्न होने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवात को टॉरनेडो कहते हैं। इसका आकार कीप के समान होता है। इसमें चलने वाली वायु की गति 180 Km/h तक होती है। इसके नीचे में व्यास कम और ऊपरी भाग में व्यास अधिक होता है। यह एक ऐसा उष्ण कटिबंधीय चक्रवात् है जिसका आँख का विकास महाद्वीपों के ऊपर होता है।

    यह चक्रवात इतना शक्तिशाली होता है कि वाणिज्यिक हवा और पछुवा हवा की दिशा को मोड़ देता है। यह टॉरनेडो विश्व का सबसे विध्वंसक चक्रवात है। यह मिसीसीपी, मिसौरी घाटी या अमेरिका के महान मैदान में उत्पन्न होने वाला चक्रवात है।

(2) दक्षिणी जापान सागर⇒

       इस सागर के ऊपर भी एक विशिष्ट उष्ण कटिबंधीय चक्रवात उत्पन्न होता है जिसे Water Spont (जल स्तम्भ) कहते हैं। इसका केन्द्र का विकास सागरीय सतह पर होता है क्योंकि क्यूरोशियो गर्म जलधारा का तापमान 28 से 29ºC तक पहुँच जाता है। इसमें वायु इतनी तीव्र गति से घूमती है कि समुद्री जल भी चक्रवात के साथ घुमने लगते हैं और आसमान में जल प्रक्षेपित कर दिये जाते हैं। जल के साथ-2 समुद्री जीव-जन्तु छोटे मछली इत्यादि भी आसमान में प्रक्षेपित हो जाते हैं। कालान्तर में यही जीव-जन्तु एवं छोटी मछलियाँ वर्षा के साथ धरातल पर गिर पड़ते हैं।

निष्कर्ष:

      इस तरह उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार के चक्रवात उत्पन्न होते है जिसके कारण मौसमी परिस्थियाँ प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाती है।


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 15. वायुमण्डल की संरचना (Structure of The Atmosphere)

15. वायुमण्डल की संरचना

(Structure of The Atmosphere)




वायुमण्डल की संरचना-

          ठोस पृथ्वी के चारों ओर गैंसों का एक आवरण मिलता है जिसे वायुमण्डल (Atmosphere) कहते हैं।

        हमारे वायुमंडल की उत्पत्ति लगभग 1 अरब वर्ष पहले हुआ। लेकिन वर्तमान स्वरूप में 58 करोड़ वर्ष पूर्व में आया। अमेरिकी भूगोलवेता स्ट्रॉलर के अनुसार धरातल से 80 हजार किमी० की ऊँचाई तक वायुमंडल मौजूद है। लेकिन आयतन के दृष्टिकोण से 97% हिस्सा 29 किमी० की ऊँचाई तक और द्रव्यमान के दृष्टिकोण से 50% हिस्सा 5.6 किमी० की ऊँचाई तक मौजूद है। हमारे वायुमंडल में 95% हिस्सा गैसों का और 5% जलवाष्प एवं धूलकणों का है। वायुमण्डल की संरचना का अध्ययन कई विधियों से सम्पन्न किया गया है जिससे ज्ञात होता है कि हमारा वायुमण्डल कई सकेन्द्रीय पेटियों में विभक्त है। जैसे:-

(A) प्रमुख मण्डल

(1) क्षोभ मण्डल / परिवर्तन मण्डल

(2) समताप मण्डल

(3) मध्य मण्डल

(4) ताप या आयन मण्डल

(5) बर्हिमण्डल

(6) चुम्बकीय मण्डल

(B) गौण मण्डल

(i) क्षोभ सीमा

(ii) समताप सीमा

(iii) मध्य सीमा

वायुमण्डल की संरचना

(1) क्षोभ मण्डल / परिवर्तन मण्डल (Troposphere):-             

       यह वायुमण्डल का सबसे नीचला परत है जो धरातल से 8 से 18 किमी० की ऊँचाई तक पायी जाती है। सूर्य के तापीय प्रभाव के कारण विषुवत रेखा पर इसकी ऊँचाई अधिक 18 किमी० और ध्रुवों पर 8 किमी० है। इसमें सम्पूर्ण वायुमंडल का 75% भार पाया जाता है। सभी प्रकार की मौसमी घटनाएँ इसी मण्डल में घटित होती हैं। जैसे:- बादल का फटना, वर्षण, कुहरा, कुहासा आदि।      

      क्षोभमण्डल के ऊपरी भाग में तेज गति से चलने वाली वायु को जेटस्ट्रीम कहते है। क्षोभमण्डल में नीचे से ऊपर जाने पर तापमान में कमी प्रति 165 मी. की ऊँचाई पर 1ºC और प्रत्येक 1,000 मी० पर 6.5ºC या प्रति 1 हजार फीट की ऊँचाई पर 3.6ºF की कमी आती है। क्षोभमण्डल के ऊपरी भाग में तापमान घटकर -45°C से -80°C तक पहुँच जाता है। अत्याधिक मौसमी घटनायें घटित होने के कारण इसे परिवर्तन मंडल भी कहते हैं।

(2) समताप मण्डल (Stratosphere):-

        यह मण्डल क्षोभमण्डल के ऊपरी भाग में पायी जाती है। इसका अधिकतम ऊपरी विस्तार धरातल से 50 km तक है। इस मण्डल में ओजोन गैस की उपस्थिति के कारण बढ़ते हुए ऊँचाई के साथ तापमान में बढ़ोतरी होती है। इस मण्डल के ऊपरी भाग में तापमान बढ़‌कर 0°C तक पहुँच जाता है।

       समताप मण्डल में 25-35 km के बीच ओजोन गैस की एक घना परत पायी जाती है जो सूर्य से आने वाली पराबैगनी किरणों को अवशोषित कर धरातल को सुरक्षित रखती है। ओजोन परत का सर्वप्रथम खोज रामसन महोदय ने किया था।         

      समताप मंडल प्राय: जलवाष्प, धूलकण से रहित होता है लेकिन कभी-2 इस मण्डल में हल्के मेघ का निर्माण होता है जिसे ‘मोती का माता बादल’ (Mother of Pearl Cloud) कहते हैं।

(3) मध्यमण्डल (Mesosphere):-

       मध्यमण्डल धरातल से 80 किमी० की ऊँचाई तक पायी जाती है। इस मंडल में बढ़ते हुए ऊँचाई के साथ तापमान में कमी आती है। मध्यमण्डल के ऊपरी भाग में तापमान घटकर -80°C से -100°C तक पहुँच जाता है। इस मण्डल में ब्रह्माण्डलीय धूल कण के कारण Noctilucent Cloud “निशादीप्ति बादल” का निर्माण होता है। उल्का पिंड (Meteors) मध्य मंडल में प्रवेश करते समय जल उठते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि यहाँ पहली बार उसे सघन वायुमंडल मिलता है, इससे ऊपर के मंडलों (तापमंडल एवं बाह्यमंडल) में वायु अत्यंत विरल होते हैं, जो ज्वलन हेतु पर्याप्त घर्षण नहीं पैदा कर पाते हैं।” लोग इस घटना को ‘टूटते तारे’ या shooting stars कहकर बुलाते हैं।

टूटते तारे

(4) तापमंडल (Thermosphere) / आयनमंडल (Inosphere):-

        ताप या आयनमण्डल मध्यमंडल के ऊपरी भाग में पायी जाती है। इसकी ऊपरी सीमा धरातल से 500 किमी० की ऊँचाई तक पायी जाती है। इस मंडल में तापमान बढ़‌कर 25°C तक पहुँच जाता है। इसमें आयनीकृत गैस पाये जाते हैं, इसलिए इसे आयनमंडल भी कहते हैं। इसमें ध्रुवीय ज्योति की घटना घटती है जिसे उत्तरी गोलार्द्ध में “अरोरा बोरियालेसिस” और दक्षिणी गोलार्द्ध में अरोरा ऑस्ट्रेलेसिते हैं।

⇒ तापमंडल को पुन: कई परतों में बांटा जाता है। जैसेः-

क्रम उप परत मोटाई विशेषता
1  D परत 80-90 किमी० ⇒ सूर्यास्त के समय समाप्त हो जाता है।

⇒ यह लघु रेडियों तरंगों को परावर्तित करता है।

2 E परत 90-130 किमी० ⇒ इसे क्रनेली हेवीसाइट परत भी कहते है।

⇒ इसमें मध्यम एवं दीर्घ रेडियों तरंगों का परावर्तन होता है।

3 विशिष्ट E परत 110 किमी० ⇒ उल्का पिंड घुसने के दौरान बनता है।
4 E परत 150 किमी० ⇒ इसे एफलिटन परत भी कहते है।
5 F1 तथा F2 परत 150-380 किमी० ⇒ इसे Appleton परत भी कहते है।

⇒ यह परत सूर्य धब्बा दिखाई देने के दौरान बनता है।

6 G परत 400-500 किमी०

⇒यह सभी प्रकार के रेडियों तरंगों का परावर्तन करता है।

 

(5) बर्हिमण्डल / आयतन मण्डल (Exosphere):-

      धरातल से बर्हिमण्डल की ऊँचाई 2000 किमी० तक है। इसकी ऊपरी सीमा पर तापमान बढ़कर 1000ºC तक पहुँच जाता है। इस मंडल में गैसों का इतना आयनीकरण हो जाता है कि गैस के अणु परमाणु के रूप में मिलने लगते है। इसी मण्डल में गैसों के अलग-अलग परत पाये जाते हैं।

(6) चुम्बकीय मण्डल:-

        यह वायुमंडल का सबसे उपरी परत है। इसकी ऊपरी सीमा 80 हजार किमी० तक संभावित है। इस मंडल को कुछ विद्वान वायुमण्डल का हिस्सा नहीं मानते हैं। इस मंडल में गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव नगण्य हो जाता है। गैस के अणु इलेक्ट्रॉन एवं प्रोटोन में टूट जाते हैं। इस मंडल में विभिन्न प्रकार के कॉस्मिक किरणों का प्रभाव होता है। इस मंडल में सौर लपट का प्रभाव पड़ता है।

(B) गौण मण्डल- उपरोक्त प्रमुख मंडलों के अलावे भी तीन गौण मंडल भी पाये जाते हैं। जैसे:-

(i) क्षोभ सीमा

स्थिति- क्षोभ मंडल और समताप मंडल के बीच की संक्रमण की पेटी

⇒ मोटाई-1.5 किमी०

(ii) समताप सीमा

समताप मंडल और मध्यमंडल के बीच की संक्रमण की पेटी

⇒ मोटाई-5 किमी०

(iii) मध्य सीमा

मध्यमंडल और तापमंडल के बीच की संक्रमण की पेटी

⇒ मोटाई-10 किमी०           

       ये तीनों पेटियाँ एक संक्रमण पेटी के समान है जिसमें किसी भी प्रकार की मौसमी घटनाएँ नहीं घटती है।

       रासायनिक संघटन के दृष्टिकोण से वायुमण्डल को दो भागों में बाँटते है :-

(1) सममण्डल:-

           इसके अंतर्गत क्षोभ मंडल, समताप मंडल और मध्यमंडल को शामिल किया जाता है। इसमें गैसों का अनुपात एक समान रहता है।

(2) विषममण्डल:-

         इसके अंतर्गत तापमंडल, बर्हिमण्डल एवं चुम्बकीय मण्डल को शामिल करते हैं। इसमें बढ़ते हुए ऊँचाई के साथ गैसों के अनुपात में परिवर्तन होते रहता है। वायुमण्डल के विभिन्न पेटियों में होने वाले परिवर्तन को नीचे के ग्राफ में देखा जा सकता है।

निष्कर्ष

       उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि वायुमंडल की संरचना एवं संगठन के दृष्टिकोण से एक जटिल तंत्र है। इसके नीचले मण्डल का अध्ययन पर्याप्त हो चुका है। लेकिन इसके ऊपरी मण्डल का पर्याप्त अध्ययन होना अभी शेष है।




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12. उष्मा बजट (Heat Budget)

12. उष्मा बजट

(Heat Budget)



 उष्मा बजट

          ऊष्मा बजट वायुमण्डलीय तापमान के अध्ययन हेतु एक अनिवार्य विषयवस्तु है। वायुमण्डल में ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है। सूर्य में संलयन क्रिया के फलस्वरूप ऊर्जा का बड़े पैमाने पर उत्सर्जन हो रहा है। ये ऊर्जा हमारी पृथ्वी तक सौर विकिरण के रूप में पहुँचती है। पृथ्वी का धरातल सौर विकिरण से पार्थिव विकिरण के रूप में पुन: अंतरिक्ष को लौटा देती है। इस तरह हमारे वायुमण्डल में आने वाले सौर विकिरण और लौटायी जानेवाली पार्थिव विकरण के लेखा-जोखा को उष्मा बाजट कहते हैं।

            सूर्य से उत्पन्न ऊर्जा का मात्र 0.0005% भाग ही वायुमण्डल तक पहुँच पाता है। यही ऊर्जा पृथ्वी के धरातल पर तापीय वितरण एवं खाद्य ऊर्जा के विकास का आधार होता है। यह सौर ऊर्जा भी सालों भर एक समान प्राप्त नहीं होता है। इसका प्रमुख कारण पृथ्वी की परिभ्रमण गति है।

         सामान्यत: 3 जनवरी को उपसौर (Perihelion) की स्थिति रहती है। उस दिन सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी न्यूनतम होती है। इस दिन सामान्य दिनों की अपेक्षा 7% अधिक ऊर्जा की प्राप्ति हमारी वायुमण्डल करती है। इसी तरह 4 जुलाई को सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी अधिकतम होती है। जिसे अपसौर (Aphelion) कहते हैं। इस दिन सामान्य दिनों की अपेक्षा 7% कम ऊर्जा प्राप्त होती है।

        पुन: सौर ऊर्जा की प्राप्ति अन्तर सूर्य के किरणों के लम्बवत स्थिति में परिवर्तन तथा दिन और रात की लम्बाई में परिवर्तन पर भी निर्भर करता है। सामान्यत: जब सूर्य उतरायण की स्थिति में होता है तो दक्षिणी गोलार्द्ध की तुलना में उतरी गोलार्द्ध अधिक सौर ऊर्जा की प्राप्ति करती है। इसी तरह जब सूर्य दक्षिणायण होता है तो उतरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी गोलार्द्ध अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त करती है।

       ग्रीष्म ऋतु में दिन की लम्बाई अधिक और रात की लम्बाई कम होती है। इसी तरह शीत ऋतु में दिन की लम्बाई कम और रात की लम्बाई अधिक होती है। इसके अलावे ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणें लम्बवत होती है, जबकि शीत ऋतु में सूर्य की किरणें तिरछी हो जाती है। यही कारण है कि शीत ऋतु की तुलना में ग्रीष्म ऋतु में सौर विकिरण अधिक प्राप्त होता है।  इसी तरह रात की तुलना में दिन में अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त होती है।

              सामान्यतः ऊष्मा बजट का अध्ययन दो आधार पर किया जाता है:-

(1) अक्षांशीय ऊष्मा बजट

(2) सौर एवं पार्थिव विकिरण उष्मा बजट

(1) अक्षांशीय ऊष्मा बजट-

        सामान्यतः 37º उत्तरी अक्षांश से 37º दक्षिणी अक्षांश के बीच धरातल अतिरिक्त ऊष्मा प्राप्त करती है। अर्थात् इन क्षेत्रों में सौर विकिरण अधिक और पार्थिव विकिरण कम होता है। इसके विपरीत 37°N तथा  37ºS अक्षांशों से ध्रुवों तक वाला क्षेत्र ऊष्मा घाटे का क्षेत्र है अर्थात सौर ऊर्जा कम प्राप्त होती है और पार्थिव विकिरण अधिक होता है।

        उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अक्षांशीय ऊष्मा बजट में असंतुलन की स्थिति है। लेकिन वास्तव में अक्षांशीय उष्मा बजट भी संतुलित होती है क्योंकि निम्न अक्षांश से ऊच्च अक्षांश की ओर जाने वाली प्रचलित वायु समुद्री जलधाराएँ अतिरिक्त ऊर्जा को उष्मा घाटे वाले प्रदेश को स्थानांतरित कर देती है। इसी तरह उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर आने वाली समुद्री जलधारा एवं वायु वातावरण को अतिरिक्त ऊर्जा वाले क्षेत्रों में स्थानांतरित कर देती है। इसी तरह धरातल पर अक्षांशीय उष्मा बजट के बीच संतुलन कायम रहता है।

(2) सौर एवं पार्थिव विकिरण उष्मा बजट-

          जलवायुवेताओं ने अपने अध्ययन में बताया है कि पृथ्वी सूर्य से जितना उष्मा सौर विकिरण के रूप में प्राप्त करता है उतना ही उष्मा पार्थिव विकिरण के रूप में पुन: अंतरिक्ष में लौटा दिया जाता है। धरातल पर सौर ऊर्जा या विकिरण लघु तरंगों के रूप में प्राप्त होती है। जबकि पार्थिव विकिरण दीर्घ तरंगों के रूप में अन्तरिक्ष में लौटती है। वायुमण्डल में उपस्थित धुलकण, जलवाष्प और CO2 गैसे दीर्घ एवं लघु तरंगों को अवशोषित करने की प्रवृति रखते हैं। वास्तव में हमारा वायुमंडल सौर विकिरण से गर्म नहीं होता बल्कि पार्थिव विकिरण से गर्म होता है क्योंकि हमारा वायुमंडल सौविकिरण के लिए पारदर्शक जबकि पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शक है।

        सौर विकिरण के द्वारा प्राप्त ऊर्जा और पार्थिव विकिरण द्वारा परित्याग किया गया ऊर्जा के बीच भी अभूतपूर्व संतुलन पाया जाता है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे: हमारा वायुमण्डल जितना सूर्यातप प्राप्त करता है उसे अगर 100 इकाई माना जाय तो उसका मात्र 65% इकाई ही वायुमण्डल में प्रविष्ट कर पाता है।

उष्मा बजट

       लेकिन वास्तव में 47% उष्मा धरातल को प्राप्त होती है और शेष 18% को वायुमण्डल अवशोषित कर लेती है। सौर विकिरण का वितरण निम्न प्रकार से बताया गया है। जैसे:-

⇒ 25% इकाई बादल के द्वारा सौर विकिरण का परावर्तन कर दिया जाता है।

⇒ 7% इकाई सौर ऊर्जा वायु से टकराकर सौर विकिरण का परावर्तन हो जाता है।

⇒ 19% इकाई क्षोभमंडल में उपस्थित वायु द्वारा अवशोषित कर ली जाती है।

⇒ 2% इकाई उष्मा पृथ्वी के भूतल के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से परावर्तन कर दिया जाता है।

        उपरोक्त आँकड़े से स्पष्ट है कि 53% इकाई सौर विकिरण को वायुमण्डल के विभिन्न स्तर से परावर्तित कर दिए जाते हैं। शेष 47% सौर विकिरण को धरातल ग्रहण करता है जिसे कालान्तर में पार्थिव विकिरण के रूप में अन्तरिक्ष में पुन: लौटा दी जाती है।

निष्कर्ष:-

      इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि सौर विकिरण और पार्थिव विकिरण के बीच पूर्णरूपेण संतुलन कायम रहता है। यही कारण है कि वायुमंडल का तापमान औसत रूप से नियत बना रहता है।

नोट : उपसौर की स्थिति में सूर्य और पृथ्वी के बीच की दुरी 14.7 किमी० रहती है तथा अपसौर की स्थिति में सूर्य और पृथ्वी के बीच की दुरी 15.2 किमी० रहती है।


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19. बहुस्तरीय नियोजन

19. बहुस्तरीय नियोजन



बहुस्तरीय नियोजनबहुस्तरीय नियोजन

          भारत भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से विविधताओं वाला देश है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए संविधान निर्माताओं ने भारत को एक संघीय राष्ट्र के रूप में स्थापित किये। भारत जैसे विविधता वाले देश में संविधान निर्माताओं ने बहुस्तरीय नियोजन की आवश्यकता महसूस किया। प्रो० R.P. मिश्रा, L.S. भट्ट और L.K. सेन जैसे भूगोलवेताओं ने भी बहुस्तरीय नियोजन को भारत के संदर्भ में उपयुक्त माना है।

     बहुस्तरीय नियोजन का तात्पर्य वैसी व्यवस्था से है जिसके तहत कई स्तर पर योजनाओं एवं विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का निर्माण, क्रियान्वयन और मूल्यांकन किया जाता है। बहुस्तरीय नियोजन कई स्तरीय राजनैतिक एवं प्रशासनिक तंत्र से मिला जुला एक तंत्र होता है जिसके ऊपर विभिन्न प्रकार कार्यक्रमों का निर्माण करने और उसे क्रियान्वयन करने का उत्तरदायित्त्व होता है।

           विश्व के कई बड़े-2 देश बहुस्तरीय नियोजन के माध्यम से ही सामाजिक-आर्थिक एवं प्रादेशिक विषमताओं को दूर करने के लिए विकास कार्यों को अंजाम दे रहे हैं।

       भारत में नियोजन का कार्य छः स्तरीय प्रदानुक्रमिक स्तर के द्वारा संचालित किया जा रहा है। जैसे-

(1) केन्द्र स्तरीय नियोजन

(2) राज्य स्तरीय नियोजन

(3) जिला स्तरीय नियोजन

(4) प्रखण्ड स्तरीय नियोजन

(5) ग्राम पंचायत स्तरीय नियोजन

(6) ग्राम सभा स्तरीय नियोजन

(1) केन्द्र स्तरीय नियोजन-

       भारत में संघीय प्रशासनिक व्यवस्था होने के कारण भारत में सामाजिक, आर्थिक नियोजन और विकास का दायित्व केन्द्र सरकार पर होता है। केन्द्र में इसका सर्वोच्च अधिकारी राष्ट्रपति होता है लेकिन वास्तविक कार्यकारिणी प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद होता है।

        केन्द्र स्तर पर योजना आयोग का गठन किया गया है। जो विभिन्न एजेन्सियों की सहायता से देश के विभिन्न संसाधनों का मूल्यांकन कर योजनाओं का निर्माण करता है। योजना आयोग के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। इसलिए इनका निर्णय राष्ट्रीय महत्त्व का होता है हालाँकि इस संस्था का गठन संविधान के तहत नहीं किया गया है।

       योजना आयोग योजनाओं का निर्माण कर राष्ट्रीय विकास परिषद के समक्ष रखता है। NDC की इच्छा पर यह निर्भर करता है कि योजना आयोग के द्वारा लाया गया कार्यक्रम को लागू किया जाए या नहीं। जब किसी योजना का NDC स्वीकार्य कर लेता है तो वित आयोग की अनुसंशा के आधार पर केन्द्र एवं राज्यों के बीच आवंटन एवं धन राशि बँटवारा किया जाता है।

     संघ स्तर पर धन-राशि की संग्रह और उसके वितरण संघसूची में उल्लेखित विषय से इकट्टा किये गये धन का होता है। केन्द्र सरकार सुरक्षा ,परिवहन, संचार विकास, वन विकास, बाद एवं सूखा जैसे विषयों पर ध्यान केन्द्रित करती है।

       केन्द्र सरकार अपना धन विभिन्न मंत्रालयों के माध्यम से खर्च करती हैं। मन्त्रिपरिषद संसद के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इन्हें प्रतिवर्ष अपना वित्तीय लेखा-जोखा संसद के समक्ष रखना पड़ता है। संसद कटौती प्रस्ताव एवं टोकेन प्रस्ताव के द्वारा खर्च पर नियंत्रण रखती है।
नोट : अब योजना आयोग का कार्य नीति आयोग द्वारा किया जाने लगा है।

(2) राज्य स्तरीय नियोजन-

        भारत में राज्यों के नियोजन प्रदेश के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। हालांकि भारत में राज्यों का गठन विशुद्ध रूप में भौगोलिक एवं आर्थिक कारकों के आधार पर नहीं किया गया है। बल्कि राज्यों के गठन में भाषा को अधिक महत्व दिया गया है। राज्य स्तर पर कई ऐसे नियोजन के कार्य किये गए है जो राजनीतिक सीमाओं का उल्लंघन करते हैं। जैसे कृषि-जलवायु प्रदेश का नियोजन।

               राज्य स्तर पर नियोजन का कार्य राज्य नियोजन बोर्ड के द्वारा किया जाता है। यह योजना आयोग के समान सशक्त और सक्षम नहीं है क्योंकि किसी भी योजना या कार्यक्रम को मॉडल का निर्धारण योजना आयोग ही कर देती है। ऐसे में राज्य नियोजन बोर्ड का प्रमुख कार्य विभागीय खर्च का लेखा-जोखा रखने के अलावे कोई कार्य नहीं रह जाता है।

       दूसरा इसके महत्व में कमी आने का कारण यह है कि राज्य मंत्रिमण्डल के सदस्य लघु स्तर पर अपने क्षेत्र के लोगों से सीधे जुड़े होते हैं। ऐसे में मंत्रिमण्डल के सदस्य विकास के लिए अपनी बात राज्य वियोजन बोर्ड में नहीं रखते हैं बल्कि मंत्रिमंडल की बैठक में रखते है।

               राज्य नियोजन बोर्ड और राज्य सरकार राज्य सूची के आधार पर विकास कार्यों को अंजाम देती है। इसके अलावे केन्द्र सरकार के द्वारा जो कार्यक्रम लागू किये जाते हैं। उसे राज्य में क्रियान्वित करने का उत्तरदायित्व होता है।

           राज्य सूची के विषय पर नियोजन का कार्य करने का अधिकार राज्य सरकार को सौपा गया है। केन्द्र सरकार के तर्ज पर ही राज्य व संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल होते हैं जो मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हैं। राज्यपाल राज्य एवं केन्द्र के बीच कड़ी का कार्य करते हैं।

       राज्य विधानसभा में भी प्रत्येक वर्ष राज्य सरकार को वित्तीय लेखा-जोखा रखना पड़ता है। विधानसभा यहाँ भी कटौती प्रस्ताव, टोकन प्रस्ताव के माध्यम से खर्च पर नियंत्रण रखती है। राज्य सरकार मूलतः राजमार्गो के निर्माण, सिंचाई, वन और विद्युत से संबंधित नियोजन कार्यों को अंजाम देती है।

(3) जिला स्तरीय नियोजन- बहुस्तरीय नियोजन की सबसे प्रमुख इकाई जिला नियोजन को माना गया है। इसे नीचे के मॉडल से समझा जा सकता है-

केन्द्र

राज्य

जिला

प्रखण्ड

पंचायत

           जिला स्तरीय नियोजन ऊपरी स्तरीय केन्द्र एवं राज्य और निचली स्तरीय प्रखण्ड एवं पंचायत के बीच योजक कड़ी का कार्य करता है। पुन: संवैधानिक एवं प्रशासनिक महत्व के साथ-2 यह एक ऐसी लघु स्तरीय इ‌काई हैं जहाँ पर प्रशासक एवं नियोजक आम जनता के संपर्क में रहती है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए चौथी पंचवर्षीय योजना में केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को यह सलाह दिया था कि आप प्रत्येक जिला में जिला नियोजन बोर्ड का गठन करें।

       पुनः छठी पंचवर्षीय योजना के दौरान केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार को सलाह दिया कि आप जिला नियोजन सृजित करें ताकि जिला अधिकारियों के ऊपर जो कार्य का दबाव बना रहता है उस दबाव को कम किया जा सके।

            नवीन पंचायती राज व्यवस्था के तहत लघु स्तरीय विकास के लिये प्रत्येक जिला में जिला परिषद के गठन का प्रावधान किया गया है। इस परिषद में तीन प्रकार के सदस्य शामिल होते हैं।

प्रथम- जिला के निर्वाचित सभा सदस्य जैसे- लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधान परिषद के सदस्य,

दूसरा- प्रत्येक जिला के प्रखण्ड स्तरीप प्रमुख नगर निगम एवं नगरपालिका के निर्वाचित सदस्य,

तीसरा- प्रत्येक जिला के जिला स्तरीय पदाधिकारी, इंजीनियर तथा कुछ विशेषज्ञ लोग इसमें शामिल होते हैं।      

     जिला परिषद के तीन प्रमुख कार्य होते है-

(i) लघु स्तर पर नियोजन के नीतियों का निर्धारण करना और पंचायत स्तरीय नियोजन के बीच समन्वय स्थापित करना।

(ii) प्राथमिकता के आधार पर धन राशि का आवंटन करना।

(iii) विकास कार्यों का मूल्यांकन खर्च किये धन राशि का Audit तथा केन्द्र एवं राज्य से जरूरत के अनुसार धन राशि की माँग करना तथा पंचायतों को यह सलाह देना, इनका कार्य सांवैधानिक प्रावधानों के अनुसार Tax लगा सकते है।

     जिला परिषद निर्वाचित सदस्यों एवं पदेन पदाधिकारियों का परिषद होता है जिसके कारण राजनीतिक हितों के टकराव की संभावना बनी रहती है। ऐसे में नियोजन कार्य प्रभावित होने की संभावना बनी रहती है।

(4) प्रखण्ड स्तरीय नियोजन-

          प्रथम पंचवर्षीय योजना के दौरान ही 1952 ई० में सामुदायिक विकास प्रखंडों की स्थापना की गई थी जिसका मुख्य उद्देश्य था- ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक विकास करना।

             भारत एक कृषि प्रधान देश है। इसलिए कृषि आधारित नियोजन पर बल दिया गया। कुछ राज्यों में प्रखण्ड स्तर पर B.A.O. (Block Agriculture Officer) की नियुक्ति की। लेकिन कुछ ऐसा नहीं कर पाये। कुछ राज्य सामुदायिक स्तर पर नियोजन अथवा कृषि पदाधिकारी की नियुक्त न कर B.D.O. की नियुक्ति कर संतुष्ट हो गये। लेकिन BDO के उपर अनेक प्रकार के प्रशासनिक जबावदेही होने के कारण विकास कार्यों को इन लोगों ने गौण कर दिया। पुनः 1976 ई0 के बाद पंचायतों का चुनाव न करवाये जाने के कारण सामुदायिक प्रखण्ड की अवधारणा असफल हो गई।

          समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) छठी पंचवर्षीय योजना के दौरान जब IRDP लागू किया जाने लगा तो इसके लिए सामुदायिक विकास प्रखण्ड को ही एक इकाई के रूप में चुना गया। 1977 ई० में गठित दाँतावाला कमिटि ने यह विचार प्रकट किया कि IRDP को न केवल प्रखण्ड स्तर पर लागू किया जाय, बल्कि निम्नलिखित 13 कार्यों को संपादित करने हेतु जबावदेही को भी सुनिश्चित जाय। ये 13 कार्य निम्नलिखित थे-

(1) कृषि और उससे संबंधित विकास कार्य

(2) लघु सिंचाई की व्यवस्था करना।

(3) मृदा संरक्षण की दिशा में कार्य करना

(4) पशुपालन एवं मुर्गीपालन की व्यवस्था करना।

(5) मत्स्य पालन

(6) वानिकी कार्यक्रम

(7) कृषि परिसंस्करण

(8) बाजार का प्रबंधन

(9) कुटीर एवं लघु उद्योग का विकास

(10) प्रशिक्षण कार्यक्रम

(11) कल्याणकारी कार्यक्रम

(12) चिकित्सा, शिक्षा, पेयजल, पोषण, आवास जैसे सामाजिक सेवाओं का विकास।

(13) स्थानीय आधारभूत संरचनाओं का विकास।

         स्पष्ट है कि दातावाला कमिटि की अनुशंसा के आधार पर उपरोक्त कार्यों को संचालित करने हेतु प्रखण्ड स्तरीय नियोजन की नींव रखी गयी। नवीन पंचायती राज व्यवस्था के तहत पंचायत समीति का गठन कर इस संस्था को लोकतांत्रिक बनाने का प्रयास किया है ताकि नियोजन के कार्यों को और त्वरित किया जाय।

ग्राम पंचायत एवं ग्रामसभा        

     73 वें संविधान संशोधन के तहत नियोजन हेतु सबसे निचले स्तर पर पंचायती राज व्यवस्था का गठन किया गया है। भारत में इसका गठन बलवन्त राय मेहता समिति की अनुसंशा पर किया गया था। 73वें संविधान संशोधन के तहत इसे संवैधानिक दर्जा दिया गया तथा 11वीं अनुसूची में पंचायतों को 29 कार्य सौपे गये। इनमें से कुछ प्रमुख कार्य निम्नलिखित है:-
(1) कृषि विकास

(2) भूमि सुधार,

(3) लघु सिंचाई विकास,

(4) पशुपालन, दुग्ध कृषि, कुक्कुट पालन

(5) मत्स्यपालन

(6) सामाजिक वानिकी

(7) लघु एवं कुटीर उद्योग

(8) कृषि प्रसंस्करण उद्योग

(10) आवास, ईंधन, चारा

(11) पेयजल सुविधा का विकास।

(12) सार्वजनिक वितरण प्रणाली

(13) प्राथमिक शिक्षा एवं चिकित्सा

(14) गरीबी निवारक कार्यक्रम

(15) विद्युतीकरण

(16) गैर परम्परागत ऊर्जा स्रोतों का विकास

(17) ग्रामीण परिवहन का विकास           

     इत्यादि का उत्तरदायित्व सौंपा गया। यह व्यवस्था किया गया है कि ग्राम पंचायतों के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक वित्तीय वर्ष में दिये गये उनके कार्यों के प्राथमिकता का निर्धारण करें और ग्रामसभा से अनुमति लेकर पंचायत समीति के पास भेजती है। पंचायत समीति ग्राम पंचायत के द्वारा भेजती है।

       पंचायत समिति ग्राम पंचायत के द्वारा भेजे गये प्रस्ताव की जाँच करती है और पुनः प्राथमिकता के आधार पर ही लागू करने के लिए जिला परिषद के पास अनुसंशा करती है। जिला परिषद से जब अनुमति मिल जाती है तो ग्राम पंचायत इसे लागू करती है और पंचायत समीति उस‌ पर निगरानी रखती है। स्वर्ण जयन्ती स्वरोजगार योजना, नरेगा जैसे कार्यक्रम पंचायत स्तर पर ही संचालित किये जा रहे हैं।

निष्कर्ष :

       अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में बहुस्तरीय नियोजन की व्यवस्था की गई है जो लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है। लेकिन राज्यों के द्वारा पंचायतों से पूरा अधिकार नहीं दिये जाने के कारण सुचारू रूप से पंचायतें कार्य नहीं कर पा रही हैं। ऐसे में जल्द-से-जल्द राज्यों को पदानुक्रमिक नियोजन में विश्वास करते हुए नीचले स्तर के संस्थाओं को और मजबूत करना चाहिए। केंद्र को चाहिए कि गाँव के विकास हेतु सीधे पंचायतों को धन उपलब्ध करवाये और बहुस्तरीय नियोजन प्रणाली के तहत उस प निगरानी रखा जाय।


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2. Khan pan ka mahilaon me galat bhrantiyan / खान पान का महिलाओं में गलत भ्रांतियाँ

2. Khan pan ka mahilaon me galat bhrantiyan

 (खान पान का महिलाओं में गलत भ्रांतियाँ)



Khan pan ka mahilaon me galat bhrantiyan

पौष्टिक भोजन लेते हुए

खान पान का महिलाओं में गलत भ्रांतियाँ⇒

         भारत सहित विश्व के अनेक भागों में महिलाओं के लिए भोजन के विषय में कुछ गलत परम्परायें व विचार प्रचलित है जो काफी हानिकारक है। उदाहरण के लिए-आमतौर पर लोगों में यह भ्रांतियाँ है कि लड़कियों से लड़को को अधिक भोजन चाहिए परन्तु ये सोच गलत है। वास्तव में महिलाएँ व लड़कियाँ उतना ही (कहीं कहीं तो अधिक) कठोर परिश्रम करती है जितना की पुरुष व लड़के करते हैं।

      अतः उन्हें भी उतना ही स्वस्थ रहने की जरूरत होती है, जिन लड़कियों को बचपन में भली-भांति खिलाया पिलाया जाता है तो वे स्वस्थ रहती हैं। परिणामस्वरूप बड़े होकर उन्हें पढ़ाई या काम करने में कम समस्यायें होती है और वे स्वास्थ्य स्त्रियाँ बनती हैं।

         देश में कुछ समुदायों में ऐसा विश्वास है कि महिला को अपने जीवन के कुछ खास समय में कुछ विशेष खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए। इन खास समय से तात्पर्य माहवारी का समय गर्भावस्था प्रसव के तुरंत पश्चात् का समय स्तनपान कराने का समय या सोनिवृत के समय होता है लेकिन वास्तविकता यह है कि महिलाओं को हर अवस्था में हमेशा पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है विशेषकर गर्भावस्था तथा स्तनपान की अवस्था में तो उन्हें पोषणीय भोजन की आवश्यकता में किसी भी तरह की कमी का दुष्प्रभाव माँ एवं उनके शिशु दोनों को भुगतना पड़ सकता है। भोजन के कुछ खाद्य पदार्थों के परहेज करने से कमजोरी, बीमारी और मृत्यु भी हो सकती है।

       हमारे समाज में लड़कियों को बचपन से ही यह बात दिमाग में डाल दी जाती है कि महिलाओं को पहले अपने परिवार के अन्य सदस्यों को भोजन कराना चाहिए तत्पश्चात् ही स्वयं भोजन करना चाहिए, ऐसी स्थिति में महिलायें केवल बचा खुचा भोजन ही खा पाती है। भारत सहित विश्व के अनेक भागों में महिलाओं के लिए भोजन के विषय में कुछ गलत परम्परायें व विचार प्रचलित है जो काफी हानिकारक है। अन्य सदस्यों के बराबर भोजन उसे नहीं मिलता है। यह महिलाओं के स्वास्थ पर काफी कुप्रभाव डालता है। 

          प्रसव के तुरन्त बाद तो यह खतरनाक भी हो सकता है। खान-पान से संबंधित लोगों में एक भ्रांति यह भी है कि रोगी व्यक्ति को स्वस्थ की तुलना में कम भोजन की आवश्यकता होती है। वास्तविकता तो यह है कि पौष्टिक भोजन न केवल बिमारियों की रोकथाम करता है बल्कि बीमार व्यक्ति को फिर से जल्दी स्वस्थ होने में सहायक होता है। एक सामान्य नियम यह है कि जो खाद्य पदार्थ सामान्य व्यक्ति के लिए अच्छे होते हैं वे रोगी व्यक्तियों के लिए भी उतने ही लाभदायक होते हैं।

         हमारे देश में कुछ प्रान्तों में एक बहुत ही हानिकारक विश्वास प्रचलित हैं कि जिस महिला को अभी हाल में ही बच्चा हुआ है उसे कुछ तरह के खाद्य पदार्थ से परहेज करना चाहिए। ऐसी अवस्था में उसे न्यूनतम आवश्यक पोषक मूल्य खाद्य वस्तुएँ खाने को दिए जाते हैं। परिणामस्वरूप उसे आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं और वह कमजोर एवं एनीमिया का शिकार हो जाती हैं। यह स्थिति कभी-कभी गंभीर बीमारी या फिर मौत का कारण भी बन जाती है।

         प्रसवोपरान्त महिलाओं को स्वस्थ रहने एवं स्तनपान प्रदान करने वाले खाद्य पदार्थों की आपूर्ति अत्यंत आवश्यक होता है। पौष्टिक तत्वों से युक्त आहार से उसे कोई हानि नहीं बल्कि अत्यधिक लाभ होगा जिसमें माँ और बच्चा दोनों स्वस्थ रहेगा।
जुकाम ग्रस्त व्यक्ति के लिए संतरे, नींबू, अमरूद एवं अन्य फल को नहीं खाने की धारणायें लोगों में व्याप्त है जो कि बिल्कुल गलत धारणा है। वास्तव मे तो विटामिन सी युक्त फल के सेवन से संक्रमण पर काबू पाने में अत्यंत सहायता मिलती है।

       हमारे देश में कुपोषण की समस्या अत्यंत दयनीय है जिसका मुख्य कारणों में से एक मांसाहार का नहीं करना होता है। हमारे देश में एक बहुत बड़ा वर्ग मांसाहारी से परहेज करता है जो कि उच्च गुणवत्तापूर्ण प्रोटीन की आपूर्ति का मुख्य स्त्रोत है। मांसाहारी नहीं करने वाले को दुध, सोयाबीन इत्यादि का भरपूर मात्रा में सेवन आवश्यक हो जाता है परन्तु गरीबी की वजह से इन पदार्थों का सेवन नहीं कर पाना कुपोषण की स्थिति को विकट करता है।

खराब पोषण से बीमारियाँ

          गलत भ्रांतियों या धारणाओं की वजह से हमारे देश में लड़कियों को आवश्यकता से कम भोजन या यूँ कहें कि पौष्टिक भोजन नही मिलता है। अतः उनके बीमार पड़ने की संभावना अधिक होती है। खराब पोषण के दुष्परिणामस्वरूप होने वाली कुछ बीमारियाँ निम्नलिखित है:-

एनीमिया (खून की कमी)-

       एनीमियाग्रस्त व्यक्ति अर्थात् शरीर में खून की कमी का होना यह तब होता है। जब शरीर में रक्त के लाल कणों या कोशिकाओं के नष्ट होने की दर उनके निर्माण की दर से अधिक होती है। चूँकि महिलायें हर महिने अपनी माहवारी के माध्यम से खून गंवाती है, इसलिए किशोरावस्था तथा रजोनिवृति के बीच की आयु की महिलाओं को एनीमिया सबसे अधिक होता है।

        संसार की गर्भवती महिलाओं में 50 से अधिक महिलाएँ एनीमिया से पीड़ित होती है। क्योंकि उन्हें अपने गर्भ में पल रहे शिशु के लिए भी रक्त निर्माण करना पड़ता है। एनीमिया एक गंभीर बीमारी हैं, जिसके कारण महिलाओं को अन्य बीमारियाँ भी होने की संभावना बढ़ जाती है। यह महिलाओं की कार्य क्षमता को प्रभावित करती है। एनीमिया से ग्रस्त महिलाओं की प्रसव के दौरान मृत्यु की संभावना काफी अधिक होती हैं।

लक्षण- एनीमियाग्रस्त रोगियों में निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं-
⇒ त्वचा का सफेद दिखना
⇒ वेहोश होना
⇒ सांस फूलना
⇒ हृदय गति का तेज होना
⇒ जीभ, नाखूनों एवं पलकों के अंदर सफेदी का आभास होना इत्यादि।

बेरी-बेरी

      यह रोग विटामीन बी समूह के एक विटामिन थायमिन की कमी के कारण होता है। थायमिन एक विटामिन है जो भोजन को उर्जा में परिवर्तित करने में सहायक होता है। एनीमिया की तरह यह रोग भी महिलाओं में किशोर अवस्था से लेकर रजोनिवृति के बीच की उम्र में अधिक होता है।

       बेरी-बेरी हाने की संभावना तब होती है जब भोजन में मुख्य खाद्य की बाहरी सतह निकाल ली गई हो अर्थात पोलिश किया हुआ चावल इत्यादि या ऐसा कन्दमूल जिसमें स्टार्च की मात्रा अधिक हो।

लक्षण- बेरी-बेरी रोगियों में निम्नलिखित लक्षण दिखाई देता है-

⇒ भूख नहीं लगना, खाने से अनिच्छा

⇒ भंयकर कमजोरी, विशेषकर पैरों में

⇒ शरीर पर सूजन आ जाना

⇒ समुचित इलाज के अभाव में दिल काम करना बंद कर देता है जिससे रोगी की मृत्यु भी हो सकती है।

रतौंधी-

       यह आँखों की एक बीमारी है जो मुख्य रूप से दो से पाँच वर्ष की आयु के बच्चों में सर्वाधिक होती है लेकिन व्यस्कों में भी यह बीमारी हो सकती है। यह विटामिन ए की कमी से होती हैं, गहरे पीले एवं गहरे हरे रंग की पत्तेदार सब्जियाँ फलों एवं अन्य ऐसे पदार्थों के पर्याप्त मात्रा में सेवन नहीं करने के कारण विटामिन ए की कमी हो जाती है। समय पर इलाज नहीं होने से अंधापन भी हो सकता है।

अत्यधिक मात्रा में या गलत तरह का भोजन खाने से होने वाली समस्याएँ-

      जिस प्रकार आवश्यकता से कम मात्रा में लिया गया भोजन शरीर की आवश्यकता को पूरा करने में अक्षम होता है जिससे अनेकानेक पोषणहीनता सम्बन्धी रोग हो जाता है ठीक उसी तरह आवश्यकता से अधिक मात्रा में पौष्टिक तत्व भी शरीर में जाकर संग्रहीत होने लगता है जिससे अनेक प्रकार की बीमारी के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। आवश्यकता से अधिक कार्बोहाइड्रेट का सेवन करने से शरीर में ग्लूकोज बढ़ने से मोटापा, मधुमेह आदि रोग होता है।

         आगे चलकर हृदय संबंधी रोग अनियमित ब्लड प्रेशर बीमारी की समस्या भी बढ़ती है। यहाँ तक की किडनी से संबंधित बीमारी भी अत्यधिक पोषण के कारण देखा जाता है। मानव की पोषण संबंधी आवश्यकता का विस्तृत अध्ययन से हमें यह जानकारी मिलती है कि आवश्यकता से अधिक या कम दोनों ही पोषण की स्थिति अच्छी नहीं होती है।

       अतः हमें संतुलित भोजन की महत्ता को समझते हुए संतुलित आहार ग्रहण करने की आदत विकसित कना चाहिए।

डॉ अनीता सिंह (आहार एवं पोषण विशेषज्ञ)
डॉ नितीश कुमार चौरसिया

1. Mobile ka nasha / मोबाइल का नशा

1. Mobile ka nasha 

(मोबाइल का नशा)

https://www.geographynotespdf.com/mobile-ka-nasha/


Mobile ka nasha 

मोबाइल का नशा के बारे में सुनिए डाक्टर क्या कहते हैं?

     जो माता-पिता छोटे मासूम बच्चों को थोड़ा सा भी रोने पर उनके हाथ में बार-बार मोबाइल देकर शांत कराते हैं, वह बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं। वे अपने बच्चों के जीवन के साथ बहुत ज्यादा खिलवाड़ कर रहे हैं। यह कहना है शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ नीतीश कुमार चौरसिया PMCH पटना का।

        उन्होंने यहाँ तक भी कहा कि 15 वर्ष तक के उम्र के च्चों के लिए मोबाइल का उपयोग करना बहुत ही घातक होता है। इससे बच्चों में चिड़चिड़ापन व स्वभाव में जिद्दीपन आता है। वे माता-पिता को ब्लैक मेलिंग करने लगते हैं तथा लत लग जाने पर जब उन्हें मोबाइल से दूर खा जाता है तो वे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं।

       यहाँ तक उस तरह के बच्चों में मानसिक विकृति भी उत्पन्न हो सकता है। अतः लोगों को अर्थात माता-पिता को अपने बच्चों का यदि जीवन मे सफल बनाना है तब मोबाइल से दूर हीखना चाहिए।

 14. उपनगर या अनुषंगीनगर की सकल्पना

 14. उपनगर या अनुषंगीनगर की सकल्पना


 उपनगर या अनुषंगीनगर की सकल्पना ⇒ 

              अनुषंगीनगर का तात्पर्य उस नगरीय बस्ती से है जो किसी वृहद नगर अथवा महानगर के आसपास उसके प्रभाव से विकसित होता है। यह जनसंख्या आकार तथा कार्यिक संरचना के दृष्टि से मुख्य नगर की तुलना में छोटा होता है। यह नगर आर्थिक तथा सामाजिक कार्यों के लिए मुख्य नगर पर निर्भर करता है। ऐसे नगरों को कोई एकाकी अस्तित्व नहीं होता है। 20वीं शताब्दी के दौरान और मुख्यतः द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उपनगरों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। इसके दो प्रमुख कारण हैं-
1. जैविक कारक
2. मानवीय कारक

            जैविक कारक के अंतर्गत यह माना जाता है कि नगर एक जीवित प्राणी के समान है जैसे आयु वृद्धि के साथ परिवार के सदस्यों की संख्या में वृद्धि होती है उसी प्रकार नगरीय अकार और आयु में वृद्धि होती है तो अनुषंगीनगर विकसित होते है। मुख्य नगर में जब जनसंख्या घनत्व में भारी वृद्धि हो जाती है तथा भूमि के मूल्य और किराये के मूल्य में अप्रत्याशित वृद्धि होने लगती है तो लोग स्वत: मुख्य नगर छोडकर नगर के नजदीक अनुकूल जगह पर बसने लगते है जो अंतत: अनुषंगीनगर का रूप ले लेता है।

        मानवीय कारक के अंतर्गत नगरीय पारिस्थैतिकी को संतुलित होने के लिए नियोजित उपनगर विकसित किये जाते है। पश्चिमी देशों के अधिकतर अनुषंगीनगर नियोजित है जबकि विकासशील देशों में अनियोजित उपनगरों का भी विकास हुआ है। सामान्यतः उपनगरों का विकास विशिष्ट कार्यों के आधार पर होता है। आर्थिक विशेषताओं के आधार पर अनुषंगीनगर छ: प्रकार के होते है जो निम्नलिखित है-

अनुषंगीनगर के प्रकार  अनुषंगीनगर का उदाहरण (मुख्य नगर का नाम)
1. रिहायशी उपनगर लोनी (दिल्ली), येलाहंका (बैंगलोर), साऊथ हॉल (लंदन), पाटलीपुत्र कॉलोनी (पटना)
2. औद्योगिक उपनगर गाजियाबाद, फरीदाबाद, नोएडा, बहादुरगढ़, बलभगढ़ (दिल्ली के उपनगर)
3. प्रशासनिक उपनगर गांधीनगर (अहमदाबार) दिसपुर (गुआहाटी)
4. परिवहन उपनगर  जसीडीह (देवघर), वाल्टेयर (विशाखापतनम)
5. शिक्षा उपनगर Cambridge (लंदन का उपनगर), शांति निकेतन (ढोलपुर का उपनगर)
6. मिश्रित उपनगर  फूलवारी शरीफ (पटना), चास (बोकारो)

           ऊपर के तालिका से स्पष्ट है कि अनुषंगीनगर महानगर अथवा बड़े नगर के कुछ विशिष्ट कार्यों को करता है। इससे बड़े नगर पर जनसंख्या दबाव में कमी आती है तथा ग्रामीण तथा ग्रामीण-नगरीय स्थानांतरण की प्रवृत्ति में परिवर्तन होता है। दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई जैसे महानगर के उपनगर भी जनसंख्या दबाव के अंतर्गत आ गए है।

        प्रारंभ में ये आकर्षण शक्ति के रूप में कार्य करते है लेकिन विकासशील देशों में ग्रामीण जनसंख्या दबाव और बेरोजगारी के कारण आकर्षण शक्ति दबाव शक्ति में बदल जाती है और यही कारण है कि पूर्णतः नियिजित होने के बावजूद गाजियाबाद और फरीदाबाद जैसे अनुषंगीनगरों में मलिन बस्तियों का तेजी से विकास हुआ है। अतः यह आवश्यक है कि अनुषंगीनगरों के नगरीय पारिस्थैतिकी को संतुलित रखने के लिए या तो उसका विस्तार किए जाय या फिर जनसंख्या और कार्य की सीमा निर्धारित की जाए; अन्यथा ये नगर भी पूर्णतः मलिन बस्तियों में बदल सकते है।

अनुषंगीनगर का उदाहरण-

         कलकत्ता का अनुषंगीनगर– बजबज (औद्योगिक अनुषंगीनगर), दमदम (Residential अनुषंगीनगर), उत्तर पाड़ा (औद्योगिक अनुषंगीनगर) मुंबई का थाने जो मिश्रित अनुषंगीनगर और चेन्नई का पेराम्बु औद्योगिक अनुषंगीनगर है।

उपनगर

  कलकत्ता का अनुषंगीनगर

उपनगर

उपनगर


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3. जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत

3. जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत


जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत⇒ 

            जनसंख्या वृद्धि एक जैविक प्रक्रिया है जो समय और स्थान के संदर्भ में प्रभावित होता है। जनसंख्या वृद्धि का संबंध जन्म दर और मृत्यु दर से है। जन्म दर और मृत्यु दर का संबंध किसी भी देश के सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से जुड़ा हुआ है। जन्म दर एवं मृत्यु दर का सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के बीच मिलने वाला सह-संबंध का अध्ययन “जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत” कहलाता है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन अमेरिकी समाजशास्त्री के विलियम थॉम्पसन ने 1929 ई० में और 1945 ई० में नोटेस्टीन ने इसमें संशोधित किया। जबकि 1975 ई० में क्लार्क महोदय ने और 1978 ई0 में हेगेट महोदय ने इस सिद्धांत को जनसंख्या वृद्धि का विश्लेषण करने वाला एक यथार्थवादी सिद्धांत बताया।

                थाम्पसन और नोटेस्टीन ने बताया कि जनसंख्या वृद्धि तथा किसी भी देश का सामाजिक आर्थिक दर एक ही सिक्के के दो पहलू है। जैसे-अगर किसी देश के जनसंख्या वृद्धि दर उच्च है तो इसका तात्पर्य है कि वहाँ का आर्थिक-सामाजिक स्तर विकासशील या अति पिछड़े दौड़ से गुजर रहा है। दूसरी ओर यदि जनसंख्या वृद्धि दर अति न्यून है तो इसका तात्पर्य है कि उस देश का आर्थिक सामाजिक स्तर काफी विकसित अवस्था में है। 

              थॉम्पसन और नोटेस्टीन ने बताया कि जनसंख्या वृद्धि एक गत्यात्मक पहलू है जो कि समय और स्थान के संदर्भ में परिवर्तित होते रहता है।
      उपरोक्त मान्यताओं को तार्किक ढंग से प्रस्तुत करते हुए इन्होंने समय और स्थान के संदर्भ में चार अवस्थाओं का उल्लेख किया है-

(i) प्रथम अवस्था⇒ इस अवस्था में उच्च विलचन की प्रवृति पायी जाती है। जन्म दर 40-50 व्यक्ति/हजार, मृत्यु दर 40-50 व्यक्ति / हजार और प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि दर -10 से +10 तक हो सकता है।

       प्रथम अवस्था से गुजरने वाले देश की आर्थिक-सामाजिक स्थिति काफी पिछड़ी होती है। ऐसे देशों में निरक्षरता, गरीबी, बेरोजगारी, रुढ़िवादी धर्म, परम्परागत सामाजिक विशेषता का बोलवाला होता है।

            अधिकतर देश वर्तमान समय में प्रथम अवस्था से मुक्त हो चुके हैं। फिर भी मध्य अफ्रीकी देश रुवान्डा, बुरुण्डी, युगाण्डा, द०-पूर्व एशिया के कम्बोडिया एवं लाओस में यह अवस्था पायी जाती है। यद्यपि भारत इस अवस्था में शामिल नहीं है तथापि भारत के कई क्षेत्र आज भी इस अवस्था के दौर से गुजर रहे हैं। जैसे- भारत के कई जनजातीय समूह, इसी अवस्था से गुजर रहे हैं।

(ii) दूसरा अवस्था⇒ दूसरा अवस्था को जनसंख्या विस्फोट की अवस्था भी कहते है। इस अवस्था में जन्म दर 30-40 व्यक्ति प्रति हजार, मृत्यु दर 15-20 व्यक्ति/हजार और जनसंख्या वृद्धि दर 15 से 25 व्यक्ति प्रति हजार प्रतिवर्ष होता है।

         दूसरा अवस्था विकासशील देशों के आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों का उल्लेख करता है। ये वे देश हैं जिन्होंने मृत्यु दर पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है लेकिन सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के कारण जन्मदर पर संतोषजनक नियंत्रण स्थापित नहीं किया है।

        अधिकतर द० एशियाई देश, द०-पूर्वी एशिया के देश, लेटिन अमेरिका और अधिकतर अफ्रीकी देश इसके उदाहरण है। थॉम्पसन ने यह भी बताया था कि इस अवस्था में वैसे देशों को रखा जाना चाहिए जिनका जनसंख्या वृद्धि दर 2% से अधिक है। अगर भारत के सन्दर्भ में विश्लेषण किया जाय तो स्पष्ट होता है कि भारत में जन्म दर और मृत्यु दर दूसरी अवस्था के अनुकूल है। जबकि वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर 1.64% हो गया है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत के तीसरी अवस्था के चौखट पर खड़ा है।

(iii) तीसरी अवस्था⇒ तीसरी अवस्था को जनसंख्या वृद्धि में क्रमिक परिवर्तन की अवस्था कहते है। तीसरा अवस्था में जन्मदर 16-20 व्यक्ति / हजार, मृत्युदर 10-15 व्यक्ति/हजार, जनसंख्या वृद्धि दर 1-10 व्यक्ति प्रति हजार प्रतिवर्ष होता है।

            तीसरी अवस्था में वैसे देशों को शामिल किया जाता है जिन्होंने जन्म दर और मृत्यु दर पर संतोषजनक नियंत्रण स्थापित कर लिया है तथा हाल के वर्षों में तीव्र गति से आर्थिक विकास का कार्य किया है। तीसरी अवस्था में पूर्वी यूरोपीय देश, मध्य एशियाई देशों को शामिल करते हैं। इसके अलावे ताईवान, द. अफ्रीका, पूर्तगाल, क्यूबा, द. कोरिया इत्यादि इसी अवस्था के उदहारण है। कुछ विद्वान भारत और श्रीलंका को भी इसी अवस्था में शामिल करते हैं।

(iv) चौथी अवस्था⇒ चौथी अवस्था को निम्न विचलन की अवस्था कहते हैं। चौथी अवस्था में जन्म दर 6-8, मृत्यु दर से 6 से 8 और प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि दर 0-2 व्यक्ति / हजार प्रतिवर्ष होता है।
                चौथी अवस्था में उन देशों को शामिल करते हैं जहाँ सामाजिक-आर्थिक अवस्था काकी उन्नत है, साक्षरता 100% पहुंच चुका है। औद्योगिकीकाण तथा नगरीकरण बड़े पैमाने पर हुआ है। इस अवस्था में पश्चिमी यूरोप, पुर्तगाल को छोड़कर आंग्ल अमेरिका, USA और कनाडा, अस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापूर, जापान को शामिल करते हैं। अर्थात ये विकसित होते हैं।

             जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत का प्रशंसा करते हुए क्लार्क महोदय ने एक पाँचवी अवस्था का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार पाँचवी अवस्था अति विकसित देशों की अवस्था है। इस अवस्था में वैसे देशों को शामिल करते हैं जहाँ जन्म दर की तुलना में मृत्यु दर अधिक है तथा जन्म दर और मृत्यु दर अति न्यून है। वैसे सामाजों में परिवार एवं विवाह, जैसी संस्थाएँ कमजोर हो चुकी है।

            समाज पूर्ण रूप से भौतिकतावादी बन चुका है। जनसंख्या वृद्धि दर ऋणात्मक हो चुका है। इस अवस्था को क्लार्क महोदय ने प्रजातीय संहार की अवस्था से सम्बोधित किया है। पश्चिमी जर्मनी, स्वीडेन, नार्वे, आइसलैण्ड, स्वीटजरलैण्ड इसी अवस्था से गुजर रहे हैं। क्लार्क ने ऐसे देशों को चेतावनी देते हुए कहा कि आप जल्द से जल्द जनसंख्या वृद्धि के लिए अनुकूल कार्यक्रम चलाये।
                हेगेट महोदय ने जनसांख्यिकीय संक्रमण सिद्धांत को एक मॉडल से समझाने का प्रयास किया है।

जनसांख्यिकीय संक्रमण का

जनसांख्यिकी मॉडल (हेगेट)

 BR- जन्म दर, DR- मृत्यु दर

अवस्था- समय का द्योतक है।

       ऊपर के तथ्यों एवं मॉडल के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि जनसांख्यिकी संक्रमण का सिद्धांत स्थान और समय के संदर्भ में दिया गया है और बताया गया है कि जन्म दर, मृत्यु दर और जनसंख्या वृद्धि दर सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से संबंधित है। इसे कुछ उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे-1750-1760 ई० तक ब्रिटेन प्रथम अवस्था से, 1760-1850 ई० तक द्वितीय अवस्था से 1850-1900 ईo तक तृतीय अवस्था से और 1900 ई० के बाद यह चौथी अवस्था के दौर से गुजर रहा है।

                 भारत के संदर्भ में अशोक मिश्रा ने विश्लेषण करते हुए कहा है कि भारत 1931 ई० तक प्रथम अवस्था में, 1931 से 1991 ई० तक द्वितीय अवस्था में और 1991 के बाद तृतीय अवस्था से गुजार रहा है।

जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत की अलोचना

             जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत की कई आधार पर आलोचना की गई है। जैसे-

(1) अगर चीन के सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति को देखा जाय तो वह अभी भी दूसरी अवस्था के दौर से गुजर रहा है। लेकिन प्रशासनिक प्रतिबद्धता को दिखाते हुए जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण कर तृतीय अवस्था में पहुँच चुका है। इसका तात्पर्य है कि जन्म दर और मृत्यु दर एवं जनसंख्या वृद्धि दर का संबंध न केवल आर्थिक सामाजिक परिस्थितियों से है बल्कि अन्य कारकों से भी है।

(2) मध्य-पूर्व के पेट्रोलियम उत्पादक देश के संदर्भ में अगर इस सिद्धांत की विवेचना की जाय तो पाते है कि ये देश सामाजिक दृष्टिकोण से अभी भी मध्ययुगीन, रुढ़िवादी एवं बर्बर की अवस्था से गुजर रहे हैं। लेकिन पेट्रो डॉलर के कारण आर्थिक स्थिति विकसित देशों से कम नहीं है। अत: ऐसे देशों को किस अवस्था में रखा जाय स्पष्ट रूप से व्याख्या नहीं किया जा सकता।

(3) पूर्वी यूरोपीय जैसे देशों में भी यह मॉडल सही ढंग से लागू नहीं हो पाया क्योंकि यहाँ की आर्थिक स्थिति तीसरा अवस्था का घोत्तक और जनसंख्या वृद्धि चौथी अवस्था का घोत्तक है।

(4) इसकी आलोचना इस आधार पर भी की जाती है कि वर्तमान समय मे विश्व का कोई भी देश नहीं है जो प्रथम अवस्था की दौर से गुजर रहा है।

निष्कर्ष:

    उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि इस सिद्धांत की आलोचना कई आधारों प की गई है। इसके बावजूद यह सिद्धांत विश्व के अधिकतर देशों प लागू होता है। इस तरह इस सिद्धांत की मौलिकता आज भी बनी हुई है।

 

2. मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत (Marx’s population theory)

2. मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत

(Marx’s population theory)


मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत ⇒मार्क्स का जनसंख्या सिद्

                मार्क्स को साम्यवादी चिन्तन का जन्मदाता माना जाता है। इन्होंने 1867 ई० में जनसंख्या पर अपना विचार प्रकट किया था। मार्क्स के पहले जितने भी विद्वान थे उन्होंने जनसंख्या वृद्धि को जैविक प्रक्रिया मानते थे। जबकि मार्क्स ने पहली बार जनसंख्या वृद्धि को सामाजिक संकल्पना पर आधारित माना।

             कार्ल मार्क्स अपने साम्यवादी चिन्तन में कहा था कि पूरी दुनिया दो वर्गों में विभाजित है- “एक अमीर वर्ग और दूसरा गरीब वर्ग”। उनके अनुसार अमीरों का वर्ग हमेशा सम्पति एकत्रित में लगा रहता है। अमीर वर्ग कम से कम श्रमिक का उपयोग कर अधिक से अधिक उत्पादन करना चाहता है। तकनीक के प्रयोग पर अधिक से अधिक जोर देता है। वह श्रमिकों को कम-से-कम मजदूरी देकर अधिक औद्योगिक उत्पादन कर अधिक से अधिक लाभ कमाना चाहता है। इस तरह उसके पास समय अभाव के कारण जनसंख्या वृद्धि का मौका नहीं मिल पाता है।

            दूसरी तरफ समाज का वह वर्ग जो गरीबी से गुजर रहा है। उनमें निराशा का वातावरण होता है। जीविका उपार्जन हेतु श्रम के अलावे कोई दूसरा उपाय नहीं दिखता है। अत: गरीब वर्ग ज्यादा से ज्यादा धन एकत्रित करने हेतु श्रम का एकत्रीकरण शुरू कर देता है। फलतः जनसंख्या वृद्धि स्वाभाविक रूप से बढ़ते रहती है।
                मार्क्स ने मजदूरी और जन्म दर एवं मृत्यु दर के बीच प्रतिकूल सह सम्बन्ध पाया है।

मजदूरी ∝ 1 ⁄  जन्म एवं मृत्यु दर
                 उपरोक्त सूत्र के आधार पर उन्होंने बताया कि कम मजदूरी भी जनसंख्या विस्फोट की स्थिति उत्पन्न करती है। जब जनसंख्या का विस्फोट हो जाता है तो उस विस्फोटित जनसंख्या के सामने चार प्रकार की समस्या उत्पन्न होती है-
(1) बेरोजगारी
(2) कुपोषण
(3) गरीबी और
(4) कष्टकर जीवन

                   उपरोक्त समस्याएँ गरीब एवं श्रमिक वर्ग को बेचैन कर देती है, जिसके कारण वर्ग संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। मार्क्स ने बताया कि वर्ग संघर्ष से ही सभी आर्थिक, सामाजिक समस्याओं का समाधान होता है। धन सही रूप से समाज में वितरण हो जाता है। वर्ग संघर्ष में कई लोग मारे जाते हैं जिससे जनसंख्या में कमी आती है।

मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत का आलोचना

                   मार्क्स के द्वारा प्रस्तुत जनसंख्या वृद्धि सिद्धांत की कई आधारों पर आलोचना की गई है। जैसे:-

(1) मार्क्स ने धर्म, विश्वास एवं जैविक प्रक्रिया को जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण नही माना है। जबकि क्लार्क महोदय के अनुसार जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण धर्म है, जबकि जननांकी संक्रमण सिद्धांत के अनुसार जनसंख्या वृद्धि का मूल कारण जैविक प्रक्रिया है।

(2) मार्क्स के अनुसार बढ़ती जनसंख्या से मजदूरी में सापेक्षिक कमी आती है। जबकि वास्तव में यह एक गलत अवधारणा है, क्योंकि लोक कल्याणी राज्यों में मजदूरी का निर्धारण लोग स्वयं नहीं करते हैं, यह सरकार के द्वारा किया जाता है।

(3) मार्क्स के अनुसार निजी सम्पत्ति और पूँजीपति समाज का विकास ही अप्रत्यक्ष रूप से जनसंख्या विस्फोट का कारण है लेकिन पश्चिमी यूरोप के संदर्भ में यह अवधारणा गलत साबित होती है।

(4) ड्यू मॉन्ट (फांसीजी)⇒

        द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में अभिवृद्धि हुई है। इसके साथ ही साक्षरता में भी वृद्धि हुई है। समाज में चाहे अमीर हो या गरीब यह भावना पनपी है कि नियोजित और छोटा जीवन अधिक से अधिक खुशहाली ला सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि जनसंख्या वृद्धि अमीरी & गरीबी से जुड़ी हुई नहीं है।

(5) अधिकतर विकासशील देशों में ऐसा देखने से लगता है कि अप्रत्याशित जनसंख्या वृद्धि का संबंध निम्न मजदूरी है। लेकिन यह वास्तव में यह निम्न मजदूरी से जुड़ा हुआ नहीं है बल्कि निम्न स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा हुआ है अर्थात् निम्न स्वास्थ्य का स्तर होने के कारण बच्चों के जीवित रहने की गारंटी नहीं होती है। फलत:, सामान्य व्यक्ति अधिक से अधिक बच्चा चाहता है।

निष्कर्ष :

           उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद इनकी अवधारणा उचित जान पड़ती है क्योंकि कहीं न कहीं गरीबी, बेरोजगारी और जनसंख्या में सह-संबंध है। एडम स्मिथ ने कहा है कि गरीबी जनसंख्या वृद्धि के लिए उपयुक्त वातावरण निर्माण करती है। मार्क्स के द्वारा व्यक्त यह विचार व्यक्त किया गया कि बढ़ती हुई जनसंख्या राष्ट्र की संपत्ति होती है। यह भी सापेक्षिक रूप से सही प्रतीत होता है। जैसे -भात में ही कुछ समय पहले तक जनसंख्या वृद्धि को एक अभिशाप के रूप में माना जाता था। जबकि Out Soursing, BPO, सूचना क्रांति के आगमन ने भातीय जनसंख्या को संसाधन के रूप में बदल दिया है।

 

6. संघवाद

6. संघवाद या संघवाद का भौगोलिक आधार


संघवाद ⇒ 

            संघवाद दो शब्दों के मिलने से बना है प्रथम-संघ और दूसरा- वाद। संघ का तात्पर्य एकजूट होने से है। जबकि वाद का तात्पर्य विचारधारा से है। जब राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में व्यक्ति, समूह या राज्य आपस में एकजूट होकर विचारधारा को जन्म देते हैं, तो उसे संघवाद कहा जाता है।

विशेषता
             संघवाद एक नाजुक समझौता है जो किसी भौगोलिक प्रदेश में निवास करने वाले जनसंख्या की भावनाओं को ध्यान में रखकर राष्ट्र आधारित राज्य की संकल्पना विकसित की जाती है।

संघीय व्यवस्था को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारक:

(1) प्राकृतिक –

(i) उच्चावच

(ii) पर्वत

(iii) जलवायु

(iv) मृदा

(2) मानवीय कारक –

(i) प्रजातीय विविधता

(ii) भाषाई विविधता

(iii) सामाजिक, धार्मिक एवं ऐतिहासिक विविधता

उत्पत्ति

              भौगोलिक विविधताओं के चलते ही कुछ राज्य आपस में समझौता कर संघीय व्यवस्था को जन्म देते हैं। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते है तो वे अस्थिर, कमजोर राष्ट्र बन जाते हैं। अगर कोई राज्य का भाग अलग-2 भौगोलिक क्षेत्रों में स्थित हो तो वहाँ संघीय व्यवस्था को बनाये रखना मुश्किल हो जाता है। जैसे- 1947 ई० में भारतीय उपमहाद्वीप पर भारत एवं पाकिस्तान नामक दो देशों का जन्म हुआ। लेकिन पाकिस्तान दो भागों में विभक्त था। एक पूर्वी पाकिस्तान और दूसरा पश्चिमी पाकिस्तान कहलाता था। भौगोलिक दूरियों के कारण ही पूर्वी पाकिस्तान पश्चिमी पाकिस्तान के साथ एकीकृत नहीं रह सका। फलत: 1971 ई० में ही वह टूट गया।

अध्ययन

                राजनीतिक भूगोल में संघवाद का अध्ययन कई भूगोलवेताओं ने किया है। इनमें O.H. स्पेट, प्रेसकॉट, ब्लिज, पाण्ड्स, R.D. दीक्षित इत्यादि का नाम उल्लेखनीय है।

संघवाद के विकास की अवस्था

                  संघवाद अचानक विकसित होने वाली राजनैतिक घटना नहीं है। बल्कि संघवाद का विकास कई अवस्थाओं से गुजने के बाद होता है। इसे नीचे के फ्लो चार्ट में देखा जा सकता है।

एलायंस
   ⇓
लीग
   ⇓
कानफेडरेशन
   
फेडरेशन (संघीय व्यवस्था)
   
एकात्मक राज्य

संघवाद के प्रकार

           संघवाद दो प्रकार के होता है-

(1) एकात्मक राज्य 

(2) संघात्मक राज्य

संघवाद के विशेषताएँ

(1) एकात्मक राज्यों का विकास छोटे राज्यों में होता है। जबकि संघात्मक राज्यों का विकास बड़े राज्यों में होता है।

(2) एकात्मक राज्य में प्रशासन का एक केन्द्र बिन्दु होता है। जबकि संघात्मक राज्य में प्रशासन पदानुक्रमित होता है।

(3) एकात्मक राज्य में राज्य की सीमा अत्यंत ही कमजोर होती है। जबकि राज्य में राज्य की सीमाएँ स्पष्ट और मजबूत होती है।

(4) संघीय व्यवस्था में सरकार का गठन दो स्तर पर होता है-

(i) केन्द्र सरकार और

(ii) राज्य सरकार

                   जबकि एकात्मक राज्य में सरकार का गठन एक स्तर पर होता है।

छोटे देशों में मात्र स्वीटजरलैण्ड ऐसा देश है जहाँ पर संघीय व्यवस्था का विकास हुआ है क्योंकि यह देश सात पहाड़ियों के कारण सात भाग में विभक्त है और प्रत्येक भाग की निवासियों की अलग-2 पहचान और अभिव्यक्ति है। दूसरी ओर बड़े-2 देशों में संघीय व्यवस्था का ही विकास हुआ है। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में वृहत क्षेत्रफल के कारण, जर्मनी और नाइजीरिया में वृहत जनसंख्या के कारण, भारत और USA में वृहत जनसंख्या एवं वृहत क्षेत्रफल के कारण संघीय व्यवस्था का विकास हुआ।

                       किसी भी देश में संघीय व्यवस्था निम्न तथ्यों पर भी निर्भर करती है:-

(i) केन्द्रीय सरकार कितना दूरदर्शी है।

(ii) प्रादेशिक भावना का स्तर क्या है?

(iii) केन्द्र सरकार कितना कठोर या लचीला है?

(iv) आम जनता के द्वारा उठायी गई माँगों को सरकार कितना तरजीह देते है।

निष्कर्ष

          इस तह उपरोक तथ्यों से स्पष्ट है कि भौगोलिक दृष्टिकोण से विविधता रखने वाले राष्ट्रों में संघवाद का विकास हुआ है।

(नोट – संघ = किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति हेतु एकजुट होना
वाद = विचारधारा)

संघवाद या संघवाद का भौगोलिक आधार

5. राष्ट्र एवं राज्य की संकल्पना / Concept of nation and state

5. राष्ट्र एवं राज्य की संकल्पना

(Concept of nation and state)


राष्ट्र एवं राज्य की संकल्पना⇒

               राष्ट्र एवं राज्य राजनीतिक भूगोल का दो अलग-2 संकल्पनाएँ हैं। लेकिन कई तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि राष्ट्र एवं राज्य एकीकृत संकल्पनाएँ भी है। राष्ट्र और राज्य के बीच में भूगोलवेताओं ने निम्नलिखित अन्तर बताया है:-

(1) राज्य एक ऐसी संकल्पना है जिसके पास एक निश्चित भूभाग होता है, जिसकी सीमाएँ निर्धारित होती हैं। जबकि राष्ट्र एक ऐसी संकल्पना जिसके पास न अपना कोई भी भूभाग होता और न ही सीमा निर्धारित होती है। एक राष्ट्र से संबंधित लोग कई राज्यों में बिखरे होते हैं। जैसे-1948 ई० के पहले यहूदियों का कोई राज्य नहीं था। वे पश्चिमी यूरोपीय देश एवं मध्य एशिया के कई देशों में बिखरे हुए थे। अमेरिका की सहायता से फिलीस्तीन को विभाजित कर जब इजराइल रूपी राज्य का निर्माण किया गया तो यहूदियों को एक राज्य मिला।

              इसी तरह भारत के सिख समाज एक राष्ट्र के रूप में संगठित है। लेकिन उनके पास अभी कोई राज्य नहीं है।
(2) राज्य के चार प्रमुख तत्व माने जाते- (i)भूभाग (ii) जनसंख्या (iii) सरकार और (iv) संप्रभुता। जबकि राष्ट्र के पास न कोई भूभाग होता है और न ही कोई संप्रभु सरकार होती है।
(3) राज्य के पास निश्चित संसाधन होते हैं और उस पर उसका कानूनी अधिकार होता है। जबकि राष्ट्र के पास कोई संसाधन नहीं होता है।
(4) राज्य एक समझौते के तहत विकसित होते हैं, जबकि राष्ट्र स्वतः विकसित होते हैं।
(5) राज्य के विकास के लिए एक निश्चित जनसंख्या आवश्यक है, जबकि राष्ट्र का विकास एक व्यक्ति से भी हो सकता है।
(6) एक राज्य एक पूर्णतः राजनैतिक संकल्पना है जबकि राष्ट्र भावनात्मक एवं सांस्कृतिक संकल्पना है।
(7) एक राष्ट्र के लोग एक-दूसरे पर गर्भ महसूस करते हैं।

         इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट होता है कि राष्ट्र एवं राज्य दोनों अलग-2 संकल्पनाएँ हैं। वर्तमान समय में अगर राष्ट्र आधारित राज्य का विकास किया जाता है तो वह सर्वोत्तम भूराजनैतिक संकल्पना मानी जाती है। राष्ट्र आधारित राज्य बनाने हेतु निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं।

राष्ट्र आधारित राज्य बनाने के उपाय:-
(i) औद्योगिकीकरण और नगरीकण को बढ़ावा दिया जाए।
(2) पर्यटन, संचार माध्यम एवं परिवहन साधनों का विकास बड़े पैमाने पर किया जाय।
(3) सामाजिक संचार का विकास किया जाय।
(4) “हम सब एक हैं।” की भावना का प्रचार-प्रसार किया जाय।
(5) आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक अंतर-निर्भरता को बढ़ायी जाय।
(6) शिक्षा के स्तर को बढ़ाया जाय।
(7) अन्तरजातीय और अन्तरधार्मिक विवाह का प्रचलन बढ़ाया जाय।
(8) साम्प्रदायिक संगठनों को समाप्त कर दिया जाय।
(9) प्राचीन एवं विवाद‌ग्रस्त धार्मिक स्थलों को राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित कर दिया जाय।
(10) एकल सरकार, एकल संविधान, समान नागरिक संहिता, विधि का कानून लागू किया जाय।

राष्ट्र एवं राज्य की संकल

समस्याएँ
             राष्ट्र आधारित राज्य के विकास के दिशा में कई समस्याएँ अवरोधक के रूप में कार्य करती हैं। जैसे-
(i) जातिवाद
(ii) प्रजातिवाद
(iii) सम्प्रदायवाद
(iv) रंगभेद
(v) भाषाई विविधता
(vi) सांस्कृतिक विविधता
(v) विदेशी घुसपैठ
(vi) गरीबी एवं बेरोजगारी
(vii) निरक्षरता एवं चेतना का अभाव
(viii) क्षेत्रवाद
(ix) आतंकवाद

विशेषताएँ
             राष्ट्र आधारित राज्य का निर्माण करना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसकी निम्नलिखित विशेषताएँ होती है:-
(i) यह धीमी गति से चलने वाली प्रक्रिया है।
(ii) इसका विकास राजनीतिक चेतनाओं द्वारा किया जा सकता है। इसमें समाज के नेताओं की भूमिका अधिक होती है।
(iii) इसे सुनियोजित तरीके से विकसित किया जा सकता है।
(iv) इसमें भौगोलिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।
(v) सामाजिक सुरक्षा, विकास की संभावना, पारस्पारिक निर्भरता इत्यादि इस प्रक्रिया को समुचित तरीके से आगे बढ़ाते हैं।

निष्कर्ष
            इस तरह उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि राष्ट्र एवं राज्य दो अलग-2 संकल्पा होने के बावजूद एक-दुसरे से अन्तरसंबंधित है। वर्तमान समय में प्रत्येक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में संलग्न है। राजनीतिक भूगोल में यह संकल्पना व्यक्त की जा रही है कि सभी राष्ट्र आपस में मिलकर विश्वगृह्यता (Cosmopolitant) के रूप में विकसित हो रहे हैं।

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