13. ज्योति मौर्या और अलोक मौर्या से सम्बंधित कविता 

 ज्योति मौर्या और अलोक मौर्या से सम्बंधित कविता


ज्योति मौर्या और अलोक मौर्या से सम्बंधित कविता 

सुनो प्रिय ! तुम बेफिक्र होकर, पढ़ो लिखो और अधिकारी बनो।

मैं तुम्हें बिना अधिकारी बने, पटना से वापस नहीं बुलाऊँगा।।

मुझे यह पता है कि, बरेली की अफेयर वाली घटना।

तुम्हारे करेंट अफेयर्स के, नोट्स का हिस्सा नहीं है।।

मुझे बरेली की अधिकारी वाली घटना, बिल्कुल भी परेशान नहीं करती।

हाँ, इलाहाबाद से महिलाओं की वापसी की खबर, मुझे जरूर परेशान कर देती हैं।।

मुझे ‘बेटी पढ़ाओ, बीबी नहीं’ वाले, महिला विरोधी ट्विट या पोस्ट से।

या फिर ‘हीरा ठाकुर’ वाले मिम्स से, मेरा तुम पर भरोसा कम नहीं होगा।।

ज्यादा पढ़ा-लिखा न होने के वाबजूद, इतनी तो मुझमें समझ है हर किसी की पत्नी।

अधिकारी बनकर ज्योति मौर्या नहीं हो जाएगी, उन्हीं में से कई राधा ठाकुर भी होंगी।।

यदि तुम अधिकारी बनने के बाद, ज्योति मौर्या भी बन गई।

तब भी आलोक मौर्या की तरह, मैं रोना नहीं रोऊँगा।।

मैं यह नहीं कहूँगा कि, मैं तुम्हें अधिकारी बनाया।

अपने सहयोग के लिए किसी के श्रम का, अतिक्रमण कना मुझे नहीं आता।।

By RS


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11. सकारात्मक विचारों का प्रभाव

11. सकारात्मक विचारों का प्रभाव


सकारात्मक विचारों का प्रभाव⇒

           सकारात्मक विचारों का भी मन, मस्तिष्क, शरीर तथा समस्याओं के हल की दिशा में इतना अनुकूल प्रभाव पडता है कि वह चमत्कार जैसा ही लगता है। विधेयक विचार यदि ईश प्रार्थना से संयुक्त हो जाए तो यह दैवी शक्ति का प्रवाह बन जाता है, जिसमें चिंताएं, व्याकुलताएं, रोग, शोक, आधि- व्याधि सभी प्रवाहित हो जाते हैं।

              सकारात्मक विचार ईश प्रार्थना से संयुक्त हो या दृढ़ मनोबल से- दोनों का शुभ फल अवश्य मिलता है। प्राकृतिक चिकित्सा के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. हेनरी लिट्ठर ने भी अपनी पुस्तक ‘प्रैक्टिस ऑफ थेराप्यूटिक्स’ में लिखा है-‘मनोभावों में इतना सामर्थ्य है कि उनके द्वारा कोई रोगी स्वयं को पूर्ण स्वस्थ और कोई स्वस्थ व्यक्ति विकृत विचार आरोपण व निषेधात्मक चिंतन द्वारा अपने को अशक्त, असमर्थ तथा रुग्ण बना सकता है।

सकारात्मक विचारों का प्र

             श्रीमती मर्टिल फिल्मोर प्रायः बीमार रहा करती थी। दवा खाते-खाते टूट चुकी थी। डॉक्टर भी अब और कुछ कर सकने में अपने को असक्षम समझ रहे थे। एक बार श्रीमती मर्टिल अपने पति चार्ल्स फिल्मोर के साथ एक आध्यात्मिक भाषण सुनने गई।

          भाषण के एक वाक्य को उसके मन ने दृढ़ता से पकड़ लिया ‘I am child of God and therefore I do not inherit sickness.’ ‘मैं ईश्वर की संतान हूं, अतः मुझमें कोई रोग नहीं।’ मन हमेशा इस बात की आवृत्ति करता रहता। इस बात पर उसे इतना अधिक विश्वास हो गया कि उसका जीवन बदल गया। वह स्वास्थ्य के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती और पोषक (Positive) विचारों के द्वारा अपने में शक्ति भी भरती रहती। फलतः वह पूर्ण स्वस्थ हो गई।

             श्री कैस्के जन्म से पंगु था। वह चल नहीं सकता था। श्रीमती मर्टिल फिल्मोर से प्रेरित होकर वह ईश्वर विश्वास से अभिभूत हो पोषक विचारों को पोषित करने लगा। वह बारंबार इस विचार की आवृत्ति करता कि उस पर परमात्मा की असीम कृपा बरस रही है। प्रभु कृपा से अब वह स्वस्थ होता जा रहा है, उसके पैर अच्छे होते जा रहे हैं। उसके पैर सभी कार्य करने में सक्षम हो गए हैं, वह चल सकता है, दौड़ सकता है इत्यादि। फलतः वह भी स्वस्थ हुआ।

         प्रसिद्ध चिकित्सक हीलर अलबई क्लिक की पुरानी पेट पीड़ा मन की शुभ भावनाओं ने शांत कर दी।

        प्रसिद्ध चिकित्सक रिबेका ने मधुमेह (डायबिटिज) रोग को निर्मूल करने की दवा बताई ‘सकारात्मक विचार।’ रिबेका के शब्दों में, ‘इस रोग को निर्मूल करने की एकमात्र दवा है प्रेम और मन का सदा निश्चित और प्रसन्न रहना।’

      एलिस न्यूटन नाम की स्त्री पेट के कैंसर से बुरी तरह पीड़ित थी, उसका उदर फूला हुआ था। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। वह ईश प्रार्थना के साथ पोषक विचारों में जुट गई और अंततः रोगमुक्त हुई। भारत में तो ऐसे उदाहरण आए दिन देखने को मिलते हैं।

        अब तो यह स्पष्ट परिलक्षित हो गया कि शुभ औ विधेयक विचारों की शुभ परिणति एवं अशुभ और निषेधात्मक विचारों के घातक परिणाम होते हैं।

        आप चिंतन की प्रक्रिया द्वारा प्रभु की शांति, निर्विकारिता, प्रज्ञावानतादि को निश्चय ही अपने में उभार सकते हैं। व्यक्ति का चिंतन उसके शरी, स्वास्थ्य और क्रियाशक्ति पर आश्चर्यजनक ढंग से प्रभाव डालता है। चिंतन से अंतर्मन के साथ-साथ बाह्य जगत भी प्रभावित और परिवर्तित होता है। अतएव स्वसंकेत (ओटो सजेशन) द्वारा अपने भीतर स्थित ईश्वरीय गुणों को उभारें, प्रकट करें।

स्रोत: चिंता क्यों?

10. नकारात्मक विचारों से कैसे उबरें?

10. नकारात्मक विचारों से कैसे उबरें?


नकारात्मक विचारों से कैसे उबरें?

                यह तो नकारात्मक विचारों का प्रभाव हुआ। अतः आप नकारात्मक विचारों को अपने पर हावी न होने दें। जब कभी आपको लगे कि आप पर नकारात्मक विचारों का आक्रमण हो रहा है, तब आप तत्काल सावधान हो जाएं। नकारात्मक विचारों को हटाने के एक-दो सुझाव प्रस्तुत हैं-

1. आप दो-चार गहरा श्वास लें और छोड़ें। इन श्वासों का अनुभव करें। तदुपरांत आंखें बंद कर लें और आते-जाते श्वासों को गहराई से अनुभव करें। श्वासों से भली प्रकार जुड़ जाएं। आपके मन की आंखों को धोखा देकर एक भी श्वास आने-जाने न पाए। आप सावधानीपूर्वक हर आते-जाते श्वास का अनुभव और आनंद लें। यदि कोई विचार आपको परेशान कर रहा हो तो आत्मविश्वास के साथ मन को आदेश दे, ऐ मन! चुप हो जाओ। शांत हो जाओ। अभी मैं आनन्द सरोवर में तैराकी कर रहा हूं। ॐ शांति! ॐ आनंद! ॐ प्रसन्नता! ॐ आह्लाद !

2. नकारात्मक भाव संवेग यथा-क्रोध, चिढ़, द्वेष, नफरत, क्षोभ, आक्रोश आदि पर नियंत्रण भी जरूरी है। आप सावधान रहें कि ये दुष्ट संवेग आपके भीतर प्रवेश न कर पाएं और यदि प्रवेश कर भी जाएं तो ठहर न पाएं। इसके लिए एक दो पहलू पर ध्यान दें। याद रखें, सभी व्यक्तियों की सोच, रूचि व आदतें भिन्न-भिन्न होती है। अतः जो जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार करें। यदि आप उसकी सोच या आदतों पर अपने विचार थोपने का प्रयत्न करेंगे तो वह कुछ ऐसा कह सकता है, जिससे आप क्षुब्ध हो जाएं। अतः शांति और रिश्तों में मधुरता के लिए शांत मौन ही बेहतर है।

नकारात्मक विचारों से

3. दूसरों के अपशब्दों को नजर अंदाज करना सीखे, इससे व्यर्थ के कलह-अशांति से सहज ही बच जाएंगे।

4. जहां तर्क-वितर्क में बहसा-बहसी की संभावना हो रही हो तो वहां से कुछ समय के लिए हट जाएं, इससे नकारात्मक भाव-संवेगों से आपका बचाव हो सकेगा।

5. नकारात्मक भाव-संवेगों के उभार पर भी आप हिम्मत न हारें, इससे मुक्त होने के लिए आप अपने ध्यान को अन्यत्र लगाने का प्रयास करें। नाक से लम्बा श्वास लेकर झटके के साथ मुंह से श्वास फेंक दें। ऐसा आठ-दस बार करें।

6. जहां जाने से, जिसके साथ रहने से, जिसकी बात सुनने से तनाव बढ़ता हो, वहां से नम्रतापूर्वक दूरी बनाए रखना ही बुद्धिमत्ता है।

7. याद रखें, दुख – तनाव अभाव में कम और स्वभाव में अधिक होता है। स्वभाव को विधेयक बनाएं और दुख-तनाव से मुक्ति पाएँ।

8. चिंता या तनाव के उद्रेक में किसी पुरानी और आनंददायक घटना या बात याद करें। ऐसा अनुभव करें, जैसे वह वर्तमान में ही घटित हो रही है। घटना इस तरह सिलसिलेवार याद करें कि चिंता-तनाव का मन में प्रवेश पाना असम्भव हो जाए।

9. तनाव का अहसास होते ही श्वासों के साथ प्रभु सुमिरण में लग जाएं। प्रभु की स्नेहिल छत्रछाया सदैव आपके सिर पर है, इसे बार-बार बोलें और इसका अनुभव करें। जैसे प्रह्लाद के सिर पर नरसिंह भगवान बड़े ही प्रेम और ममता से अपना हाथ फेरे थे, उसी तरह दयालु प्रेमिल प्रभु बड़े ही लाड़-दुलार से आपके सिर पर हाथ फेर रहे हैं, इसे अनुभव कर भावविभोर हो जाएं। ज्ञान, वैराग्य, भक्ति भरा कोई भजन गुनगुनाने लगें।

कहा भी गया है-

महाविपत्तौ संसारे यः स्मरन्मधुसूदनम्।

विपत्तौ तस्य सम्पत्तिर्भवेदित्याह शंकरः।।     देवी भा. पु. ९/४०/४१

             अर्थात् ‘जो पुरुष महाविपत्ति के अवसर पर भगवान का स्मरण करता है, उसके लिए वह विपत्ति संपत्ति हो जाती है, ऐसा शंकर जी का वचन है।’

स्रोत: चिंता क्यों ?

9. नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव

9. नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव


नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव⇒

            नकारात्मक विचारों का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका स्पष्ट रूप उजागर हुआ फ्रांस में मृत्युदंड पाए एक व्यक्ति पर इसका परीक्षण किया गया। उसे एक स्थान पर लिटाकर उसकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई। उसे सुनाकर कहा गया, तुम्हारे शरीर की नसों को काटकर इतना अधिक रक्तस्राव कराया। जाएगा कि स्वतः तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।

नकारात्मक विचारों

            किसी नुकीली वस्तु को हाथ की नसों पर इस तरह फेरा गया की लगे नसें काट डाली गई हैं, साथ ही शीतोष्ण जल की धारा को धीरे-धीरे हाथ के पास इस प्रकार गिराया जाने लगा कि लगे कि सारा शरीर खून से भींगकर लथ-पथ हो रहा हो। कहा जाने लगा-‘ओह! कितना अधिक रक्त स्राव हो रहा है। लग रहा है जैसे शरीर खून के ही सैलाब में पड़ा हुआ हो। संपूर्ण शरीर रक्त से लाल होता जा रहा है। हाय-हाय ! शरीर के चारों ओर खून ही खून दीख रहा है।’

            जैसे-जैसे इन बातों को दुहराया जाता, तदनुरूप चिंतन करते हुए कैदी की छटपटाहट भी बढ़ती जाती। कुछ देर बाद पुनः कहा गया, ‘ओह! शरीर का तो लगभग सारा खून निकल चुका है। चेहरा स्याह पड़ता जा रहा है। अब यह नहीं बच सकता। किसी हालत में नहीं बच सकता।’ इतना सुनना था कि सचमुच कैदी तड़पकर मर गया।

         आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि न व्यक्ति की नसें काटी गई थी, न खून बहा था। निषेधात्मक विचारों का मानव पर प्रभाव जानने के लिए बिना कुछ हुए ही उसे अहसास कराने का प्रयत्न किया गया था कि नसें काट डाली गई हैं और काफी मात्रा में खून बह रहा है। इसके लिए व्यक्ति को बार-बार झूठ ही कहा जा रहा था कि अत्यधिक खून बह जाने के कारण वह मरणासन्न होता जा रहा है। व्यक्ति ने इसे सत्य समझा औ असका अंतस् निषेधात्मक विचारों से भता गया। फलतः उसने दम तोड़ दिया।

स्रोत: चिंता क्यों

8. चिंतन का चमत्कार

8. चिंतन का चमत्कार


चिंतन का चमत्कार⇒

             चितन में इतनी अद्भुत क्षमता है कि इसके द्वारा व्यक्ति अपने-आपको आसमान से धरती पर, धरती से पाताल तक तथा पाताल से धरती पर एवं धरती से आसमान की अगम ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है। इस रहस्य को जानकर उत्कृष्ट एवं विधेयक चिंतन को ही प्रश्रय दें।

चिंतन का चमत्कार

              चिंतन मस्तिष्क, मन और शरीर सभी को प्रभावित करता है। अगर तीन व्यक्तियों, जिसमें एक क्रोध से थर-थर कांप रहा हो या किसी चिंता से हाल-बेहाल हो, दूसरा शांत और प्रसन्न हो तथा तीसरा परमात्मा के गंभीर ध्यान में मग्न हो, के मस्तिष्क का E.E.G. लिया जाए तो तीनों के मस्तिष्क में उठने-गिरने वाली तरंगों में स्पष्ट विभिन्नता परिलक्षित होगी।

शरीर के विभिन्न अंगों की भिन्न-भिन्न अंतःस्त्रावी ग्रंथियां- चिंता, क्रोध, घृणा, लोभ, कामुकता, द्वेष, तनाव आदि के समय एक विशेष प्रकार के जहर का स्राव करने लग जाती हैं। यह स्राव स्वस्थ शरीर और स्वस्थ चिंतन दोनों के लिए घातक है।

             इस पर वैज्ञानिकों ने खोज किया। प्रसन्नता की अधिकता में गिरे हुए अश्रुओं तथा दुख तनाव में बहे अश्रुओं, दोनों का निरीक्षण किया गया तो पाया गया कि दुख एवं तनाव में बहे अश्रु गर्म थे तथा उसमें शरीर के लिए हानिकाक तत्त्व भारी मात्रा में विद्यमान थे। सके विपरीत प्रसन्नता में गिरे अश्रु अपेक्षाकृत ठंढे थे तथा उसमें शरीर एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी तत्त्वों का समावेश था।

स्रोत: चिंता क्यों

7. परिस्थितियां परिवर्तनशील

7. परिस्थितियां परिवर्तनशील


परिस्थितियां परिवर्तनशील

      याद रखें, परिस्थितियां परिवर्तनशील हैं। भगवान राम को देखें, जब उन्हें वनवास मिला तो संपूर्ण अयोध्यावासी रो उठे। सीता और लक्ष्मण के साथ राम वन की ओर प्रस्थान कर रहे हैं, यह सुनकर संपूर्ण अयोध्या में हाहाकार मच गया। सब-के-सब उनके रथ के पीछे रोते-कलपते चलने लगे। शोकविह्वल प्यारे प्रजावासियों को जब राम ने काफी समझाया बुझाया, तब कहीं सब वापस लौटे।

परिस्थितियां परिवर्तनशी

         परिस्थितियां बदलीं। राम जानकी जी को रावण से छुड़ाकर लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौट आए हैं। कल जिस अयोध्यावासियों के लिए भगवान राम, सीता और लक्ष्मण प्राण थे-आज निंदनीय हैं। एक धोबी मां जानकी पर आक्षेप लगा रहा है, यह सुनकर मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने गुप्तचरों को ज्ञात करने भेजा, ‘इस संबंध में अन्य प्रजाजनों की क्या प्रतिक्रिया है?’ गुप्तचरों ने सूचना दी- ‘बहुसंख्यक जनता धोबी की बातों से सहमत है।’

          देखिए, वह मान जो वन जाते समय था, आज नहीं है। पुनः दृश्य बदला। मां जानकी धर्म और सत्य के प्रताप से भूगर्भ में समा गईं। अयोध्यावासी पश्चात्ताप और ग्लानि से भर उठे। अंततः उन्होंने सीताजी को देवी समझ अपने हृदयासीन किया। जो अपमान था, वह भी गुजर गया।

दुःख लेने जावै नहीं, आवा आचाबूच।

सुख का पहरा होयगा, दुःख करेगा कूच।।     (कबीर साखी दर्पण, भाग-२)

         अर्थात् ‘दुख लेने कोई जाता नहीं। वह अचानक ही आता है, किंतु वह स्थायी नहीं है। जब सुख का पहरा आएगा, तब दुख स्वतः चला जाएगा।’

महाभारत के शांति पर्व १७४/१९ में भी कहा गया है-

सुखस्यानन्तरं दुख दुखस्यानन्तरं सुखम्।

सुखदुखं मनुष्याणां चक्रवत् परिवर्तते ।।

         अर्थात् ‘सुख के पश्चात् दुख औ दुख के पश्चात् सुख होता है। यह शाश्वत नियम है। मनुष्यों के सुख-दुख पहिये की भांति घूमते रहते हैं।

     इस रहस्य को जानकर अहंकार और तनाव दोनों से ऊपर उठकर शांत और आनंदमग्न जीवन जीने की कला सीख लें। याद रखें, समस्या का समाधन चिंता नहीं है। जिंदगी के किसी मोड़ पर यदि आप किसी समस्या से घिर गए हों, विकट परिस्थितियां सामने खड़ी हो, अपमान, गरीबी, दुख, रोग, कष्ट से आप परेशान हों, फिर भी न घबराएं। पुनः याद रखें, ‘यह भी गुजर जाएगा।’

         व्यावहारिक दृष्टि से भी सोचें तो किसी समस्या का समाधान चिंता नहीं है। चिंता से समस्याएं बढ़ती हैं, घटती नहीं। यदि आप चिंताग्रस्त रहते हों तो न आप सही तरीके से कुछ सोच सकते हैं, न अच्छी योजना बना सकते हैं, न ही अपनी कार्यशक्ति को समस्याओं से उबरने के मार्ग में सही ढंग से नियोजित कर सकते हैं । इतनी हानि उठाने के बाद भी तो समस्याएं ज्यों-की -त्यों बनी रहती है।

          जैसे मान लिया किसी प्रतिकूल व्यक्ति, वस्तु परिस्थिति से आपको सामना करना पड़ रहा हो और आप काफी परेशान हों, चिंतित हों, व्यथित हों, उद्विग्न हों, रोते-रोते आंखें सूजा ली हों, रात की नींद उड़ा ली हों, भोजन न रुचता हो, किसी काम में मन न लगता हो, मन-मस्तिष्क चिड़चिड़ा सा हो गया हो, थकावट और सुस्ती ने आ घेरा हो तो आप ही बताइए इससे फायदा क्या हुआ?

        क्या परिस्थितियां बदल गई? ऋण चुक गया? समस्याएं मिट गई? कुछ भी तो नहीं हुआ। यदि ऐसा हो तो खूब चिंतित होइए, खूब परेशान होइए, रात-रात भर जागिए, खाना-पीना छोड़ दीजिए, खूब रोइए, सिर पटक-पटक कर फोड़ डालिए, दो-चार टांके भी लगेगें तो क्या हर्ज है शायद परिस्थितियां बदल जाएं, समस्याएं टल जाएं।

            सोचिए, सिर फोड़ लेने से, रोने से, चिंतित होने से न तो परिस्थितियां बदलती हैं और न ही समस्यों का समाधान ही होता है तो फिर चिंता क्यों? तनाव क्यों, परेशानी क्यों? लाभ क्या? कुछ भी नहीं बस हानि-ही-हानि । एक तो बाहर चिंता का कारण ज्यों-का-त्यों बना रहा और दूसरा अंदर से अशांत, विक्षिप्त, दुखी हुआ गया सो अलग।

             ठीक ही कहा गया है- ‘मनुष्य के जीवन में अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियां आती रहती हैं। इसके लिए शोक या चिंता करना उचित नहीं, क्योंकि परिस्थितियों को अनुकूल करने की शक्ति न शोक में है न चिंता में है, यह युक्तियुक्त उद्योग से ही अनुकूल होती है।’-शातातप

          वणिकों से शिक्षा लें। एक चीज में घाटा होने पर वे सभी चीजों को घाटा में नहीं बेच देते। मान लिया जाय, किसी दुकानदार को गेहूँ में घाटा लग रहा है तो वह दाल, मसाला, चावल, चीनी इत्यादि को शौक से घाटा में नहीं बेच देता। उसी तरह अगर बाहर प्रतिकूल परिस्थितियों से सामना करना पड़ रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं कि अंदर की शांति को भी खोकर दुगुनी क्षति उठाने की मूर्खता की जाय। आप कम-से-कम अंदर की क्षति को तो रोकने में पूर्ण समर्थ हैं।

            बाहर के सुख-दुख, लाभ-हानि, अनुकूलता-प्रतिकूलता भले ही भाग्य के खेल हों, परंतु अंदर की अशांति, चिंता-तनाव आदि आपकी नासमझी है। आप इससे उबरकर हर परिस्थिति में शांत और प्रसन्न रहकर मुस्करा सकते हैं।

              जो व्यक्ति समस्याओं के सामने आने पर भी मुस्कराता रहता है और अपना साहस नहीं छोड़ता, उसे छोड़कर समस्याएं भाग खड़ी होती हैं। इसके विपरीत जो समस्याओं के समक्ष हिम्मत हार बैठता है और अपनी सूरत रोनी-सी बना लेता है, समस्याएं उस पर चारों तरफ से आक्रमण करती रहती है।

             किसी ने ठीक ही कहा है, ‘तुम उदास रहते हो तो दुख तुम्हें चारो तरफ से घेर कर तुम पर टूट पड़ता है। तुम मुस्करा देते हो तो दुख तुम्हें छोड़कर कमरे से बाहर दरवाजे के पास ठिठक कर खड़ा हो जाता है। अगर तुम खिलखिला कर हंस पड़ते हो तो दुख तुम्हें छोड़कर दूर भाग जाता है। अतः दुखमुक्त होना चाहो तो प्रसन्न हने की कला सीखो।

स्रोत: चिंता क्यों

6. यह भी गुजर जाएगा

6. यह भी गुजर जाएगा


यह भी गुजर जाएगा

              एक राजा था। उसने अपने राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि कोई ऐसा सूत्र बतलावे जो दुःख-सुख, लाभ-हानि, जीवन-मरण, आया, जीत-हार, अपने-पराये सभी परिस्थितियों में समान लाभदायी हो। महीनों बीत गए। किसी के दिमाग में ऐसा सूत्र नहीं जो सभी परिस्थितियों में समान लाभदायी हो। राजा जंगल की ओर बढ़ गया। कुछ दूर जाने पर एक संत एक पेड़ के नीचे बैठे दिखाई दिए। राजा की आंखों में आशा की ज्योति चमकी। उन्होंने संत के चरणों में नतमस्तक हो नम्रतापूर्वक अपने प्रश्न को श्रीचरणों में निवेदन किया।

यह भी गुजर जाएगा

            महात्मा हंसे। एक कागज पर कुछ लिखकर उसे एक ताबीज में बंद कर राजा के गले में पहनाते हुए बोले-‘वत्स! यह सूत्र सभी अवसरों में समान लाभदायी है। जब कभी अवसर आए, इससे लाभ ले लेना। ‘

          संतचरणों में नतमस्तक हो राजा अपने राज्य लौट आया। ताबीज गले में लटकती रही और राजा राज्यकार्य में व्यस्त रहा। समय व्यतीत होता गया। दो वर्ष बीत गए। एक बार पड़ोसी देश के राजा ने उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया। सेनाएं तैयार न थीं, अतः घबराए हुए उसके सैनिकों को रौंदती हुई पड़ोसी देश की सेना राजमहल में प्रवेश कर गई। परेशान राजा भयभीत हो प्राण रक्षा के उद्देश्य से भाग निकला। पीछे-पीछे शत्रु सेना और आगे-आगे घोड़े पर सवार राजा।

           किंकर्तव्यविमूढ राजा बेतहाशा घोड़े को दौडाए जा रहा था। अचानक घोड़ा बिदका और ठिठककर रूक गया। सामने एक गहरा खड्ड था। खड्ड लांघना कठिन था। भयभीत राजा शीघ्रता से पास की झाड़ी में जा छुपा। पसीने से लथपथ वह थर-थर कांप रहा था कि सहसा उसे ताबीज का ख्याल आया। ताबीज खोला तो उसमें रखे पूर्जे में एक छोटा सा वाक्य लिखा था-‘यह भी गुजर जाएगा।’

            पढ़कर राजा सोचने लगा- ‘सचमुच आज तक न जाने जीवन में क्या-क्या आया, क्या-क्या देखा, क्या-क्या पाया- लेकिन कुछ भी ठहरा नहीं, गुजरते चला गया। मान-अपमान, सुख-दुख, अच्छा-बुरा कितना कुछ आया, किंतु सब-के-सब गुजरते चला गया। घबराहट कुछ कम हुई। उसे विश्वास हो गया, निश्चय ही ‘यह भी गुजर जाएगा।’

             अब तक वह परेशान था, भयभीत था, घटना का नायक भोक्ता था, अब वह द्रष्टा है, शांत, निश्चित, प्रसन्न। सचमुच कुछ ही देर बाद दुश्मन के घोड़ों की टापों की आवाज कम होने लगी। शायद दुश्मन रास्ता भटक गए थे। राजा श्रद्धा-भक्तिपूर्वक ताबीज पहना और वहाँ से निकल पड़ा। कुछ दिन बाद पुनः सैन्य संगठन कर वह शत्रुओं पर धावा बोल दिया और अंततः विजयी हुआ।

दृश्य का परिवर्तन

           अब उसके राज्य में चारों ओर खुशियाँ मनाई जा रही है। दीपमालाएँ सजाई गई हैं। राजमहल सजाया गया है। चारो ओर उत्सव का-सा वातावरण है। विजयी राजा अपने महल की ओर लौट रहा है। सभी उनपर फूलों की वर्षा कर रहे है। महल के पास आकर राजा सहसा रुक गया। ताबीज निकाला और पढ़ा-‘यह भी गुजर जाएगा।’ राजा हंसने लगा।

लोग पूछे-‘आप हंस क्यों रहे हैं?”

राजा ने कहा-‘हंसने की ही तो बात है। यहाँ कुछ भी नहीं ठहरता, सभी गुजर जाते हैं। काल की वेगवती धारा में सब बहे जा रहे हैं लेकिन… !” सहसा राजा कुछ गंभीर हो गया और सोचने लगा-‘क्या इस गुजरने वाली भीड़ में न गुजरने वाला कोई स्थायी तत्त्व नहीं है? और यदि है तो उसे ढूंढना चाहिए।’

         राजा पुनः संत के पास गया और अपनी जिज्ञासा को संत चरणों में निवेदित किया।

संत बोले, ‘न गुजरने वाला स्थायी तत्त्व कहीं खो नहीं गया है, जो उसे ढूंढोगे। वह तो नित्य प्राप्त है। गुजरने वाली वस्तु से संबंध न जोड़, इसका भोक्ता न बन, द्रष्टा बन जा, स्वयं अविनाशी तत्त्व का बोध हो जाएगा। वह अविनाशी न गुजरने वाला तत्त्व तू ही है।’

          राजा सुखी हो गया। राज्य किया पर द्रष्टा बनकर। ‘यह भी गुजर जाएगा’– इस बोध को पाकर वह सुख में ‘अहंकार और राग’ तथा दुख में ‘तनाव और द्वेष’ दोनों से ऊपर उठकर ‘स्व’ में स्थित हो आनंदमग्न हो गया।

        ठीक ही कहा गया है, ‘यदि जीवन है तो सुख एवं दुख, उन्नति या विपत्ति का क्रम बना ही रहता है। इस विश्व में कोई ऐसा नहीं हुआ, जिस पर विपत्ति नहीं आई हो। अतः इस पर चिंता करना व्यर्थ है विपत्ति का निस्ताण धैर्य एवं युक्तिपूर्ण पौरुष से होता है, चिंता से नहीं।’– महात्मा विदूर

         इसलिए सद्गुरु कबीर साहब कहते हैं-

कबीर मैं तबही डरूँ, जो मुझ ही में होय।

मीच बुढ़ापा आपदा, सब काहु को जोय।।       – (कबीर साखी दर्पण, भाग-२)

         अर्थात् ‘ कबीर साहब कहते हैं, मैं तब डरूं जब केवल मुझमें ही होता हो, परंतु मृत्यु, बुढ़ापा, आपदा तो सब किसी में देखा जाता है। फिर दुख और डर कैसा?”

स्रोत:चिंता क्यों

5. आपका मददगार आप स्वयं हैं

5. आपका मददगार आप स्वयं हैं


आपका मददगार आप स्वयं हैं⇒

             आप सोचते हैं, कोई दृश्य-अदृश्य मददगार आवे जो आपको संकट से मुक्त करे। आप मददगार दूर कहां ढूंढते हैं? मददगार तो आपके पास है। आप ही अपने मददगार हैं। आपकी जीवटता, साहस, धैर्य और किसी भी पहलू को विधेयक रूप में देखने- विचारने की प्रवृत्ति ही आपका सच्चा मददगार है।

          निराशा के स्थान पर आशा, भय के स्थान में निर्भयता, हतोत्साह के स्थान पर उमंग और विश्वास, अकर्मण्यता के स्थान पर कर्मठता, भूत-भविष्य के व्यर्थ की चिंताओं में सिर खपाने के स्थान पर वर्तमान को सुनहला बनाने के संकल्प को अपनाइए। यह आपके जीवन को आनंद और सफलताओं से साराबोर कर देगा। विधेयक विचारों के अंतर्गत पुनः रामबाण चार सूत्र दिए जाते हैं, जिसे अपनाने पर निश्चय ही आप आशातीत शांति पाएंगे-

आपका मददगार आप स्वयं हैं

1. चिंताजन्य परिस्थिति का ईमानदारीपूर्वक विश्लेषण कीजिए और पता लगाइए कि यदि आप असफल हुए तो कौन-सा अनिष्ट घटित हो सकता है।

2. संभावित अनिष्ट को निर्भयतापूर्वक स्वीकार कर लीजिए। अपनी परिस्थति को यथावत स्वीकार कर लेने की हिम्मत रखना किसी भी दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम प विजय पाने का पहला चमत्कारिक कदम है।

3. तदुपरांत शांतिपूर्वक विचार करें कि स्वीकृत अनिष्ट से उबरने के कौन-कौन से उपाय हो सकते हैं। गहन चिंतन-मनन से जो उपाय आपको दिखते हैं, उन्हें किसी पन्ने पर नोट करें।

4. उन लिखे उपायों में से मंथन करके सर्वश्रेष्ठ उपाय को ढूंढ निकालिए और अपने समस्त सामर्थ्य के साथ; आत्मविश्वास, उत्साह, कर्मठता के साथ उसमें जुट जाइए। मन में संकल्प लाइए कि जो होगा उसे सहर्ष झेल लेंगे, पर बिना युद्ध किए (अनिष्ट, असफलता पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न किए बिना) हार नहीं मानेंगे।

            उपरोक्त सूत्रों को अपनाते के साथ आप तत्काल शांति, उत्साह और जोश का अनुभव करेंगे। किसी अनिष्ट की आशंका से कांपते रहने की अपेक्षा डटकर उसका सामना करना श्रेष्ठ है।

स्रोत: चिंता क्यों

4. जो बांटोगे वही पाओगे

4. जो बांटोगे वही पाओगे


जो बांटोगे वही पाओगे

जो बांटोगे वही पाओगे

             जो पाना चाहते हैं, उसे बांटना शुरू कर दें। एक दोहा है-

सब सन्तन के एक मत, बात कही है दोय।

सुख देवे सुख होत है, दुख देवे दुख होय।।

              अर्थात् दूसरों को सुख देने पर स्वयं सुख मिलता है और दूसरों को दुख देने पर दुख। अतएव सुख चाहते हैं तो सुख बांटना शुरू कर दें, दुखियों की मदद करें, गिरते को सहारा दें। धन चाहते हैं तो इसे मिथ्या भोग-विलास से बचाकर धर्मार्थ, लोकहितार्थ उत्सर्ग करना सीखें। मान चाहते हैं तो मान देना सीखें। आपत्ति-विपत्ति में दूसरों की मदद चाहते हैं तो आपत्ति-विपत्ति में पड़े लोगों की यथाशक्ति मदद करना सीखे। विवेक-बुद्धि का विकास चाहते हैं तो प्राप्त बुद्धि से लोगों को ज्ञान और सहारा देना सीखें। क्षमा चाहते हों तो क्षमा करना सीखें। नित्य जीवन की इच्छा है तो प्राप्त जीवन को सद्प्रयोजनों में सन्नद्ध करना सीखें।

             अधिकारों को गौण एवं कर्तव्यों को प्रधान जाने। माता-पिता, परिवार, बच्चे, समाज, राष्ट्र, स्वधर्म के प्रति निर्धारित अपने कर्तव्यों को स्वार्थ तले कुचल न डालें। अपने कर्तव्यों-दायित्वों को सभी के प्रति ठीक-ठीक निर्वहण करें।

             विवेक को विकसित करें। अमूल्य मानव तन का उद्देश्य परिवार बढ़ाने, भोग भोगने और शरीर पोषण तक सीमित नहीं है। ऐसा तो सभी पशु-पक्षी, कीट-पतंगे भी करते हैं। यदि इतना ही कर्तव्य होता तो भगवान मानव को पशुओं से विलक्षण विवेक बुद्धि, अगणित प्रतिभासम्पन्न एवं सत्यासत्य निर्णय की क्षमता से युक्त क्यों बनाते?

              इस विलक्षण बुद्धि और प्रतिभा का दुरुपयोग पशुवत् जीवन जीकर न करें। आप स्वतंत्र हैं कि प्राप्त जीवन सम्पदा का दुरुपयोग कर नर से नरपशु बन जाएं या इसका सदुपयोग कर नर से नारायण; जीवत्व से शिवत्व की ओर अग्रसर हों या जीवत्व से शवत्व की ओर।

               याद रखें-जो चिंतन और चरित्र मानवीय गरिमा के अनुरूप हो और नर से नारायण बनने के क्रम में प्रेरित करता हो, वही धर्मसम्मत एवं सुखदायी है तथा जो नर से नारायण की दिशा में न ले जाकर नर से नरपिशाच, नरपशु बनाता हो, वह अधर्म और दुखदायी है, चाहे शास्त्रसम्मत ही क्यों न दिखता हो।

             अतएव विवेक बुद्धि के द्वारा मानव से महामानव तथा नर से नारायण बनने के क्रम में ही अपने चिंतन और आचरण का विकास करें। रात्रिशयन के पूर्व एक बार मनोविश्लेषण अवश्य कर लें कि आज आपके चिंतन और चरित्र से किसका पोषण हुआ असुरत्व-पशुत्व का या देवत्व-मनुजत्व का। चुन-चुन कर अपने दुर्गुणों-दुष्प्रवृत्तियों का मूलोच्छेद करें औ संपूर्ण सद्गुणों को अपने में अभिवर्धन।

स्रोत : चिंता क्यों करें 

 3.आपका कर्तव्य

 3.आपका कर्तव्य


आपका कर्तव्य

आपका कर्तव्य

               नाममात्र का मानव अगर सच में मानव बनना चाहता है तो उसका अनिवार्य कर्तव्य है कि उसके सभी कर्म और विचार आदर्श उज्ज्वल और पावन परिष्कृत हों, जिससे उससे शुभ-मंगल ही निःसृत होकर संसार को प्राप्त हो। संसार पोषित शरीर से लोकमंगल की दिशा में ही चरित्र-चिंतन का विकास हो।
          जिस भारतीय संस्कृति के ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ से सुसंस्कृत हो गया, उस देवसंस्कृति के प्रचार-प्रसार में सभी का योगदान हो। मानवमात्र के त्राता (रक्षा करने वाला) इस अलौकिक, वैज्ञानिक संस्कृति की रक्षा और प्रचार में यदि तन- मन-धन से जुटा जाता है तो निश्चय ही ऋण और बंधन से मुक्त हो मोक्ष और परम शांति की दिशा में अग्रसर हो जाया जाएगा।

          तन-मन-धन से संसार, राष्ट्र और देवसंस्कृति की सेवा करें, मान- बड़प्पन के लिए नहीं, सुख-स्पृहा के लिए नहीं, प्रत्युत परमात्म की प्रसन्नता और कर्तव्यपालन के लिए। निष्कामतापूर्वक किया गया कर्म साधन बन जाता है, जो पापों से बचाता है, पापों को काटता है एवं अंतःकरण की शुद्धिकर साध्य ईश्वर की अनुभूति कराता है। परम सद्गुरु कबीर साहब अपनी एक साखी में कहते हैं-

हाड़ बड़ा सेवा किये, धन बड़ा कछु देय।

अक्ल बड़ी उपकार कर, जीवन का फल येह ।। (कबी साखी दर्पण, भाग-२)

      ‘हाड़ (शरीर) का सदुपयोग दूसरों की सेवा करने में है, धन का सदुपयोग अपनी आवश्यकताओं की न्यूनतम पूर्ति कर अधिक-से-अधिक सद्कार्यों में नियोजित करने में है और बुद्धि का सदुपयोग दूसरों के हित-संपादन में है-इसी में मानव-जीवन की सार्थकता है।’

स्रोत: चिंता क्यों


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2. Khan pan ka mahilaon me galat bhrantiyan

 (खान पान का महिलाओं में गलत भ्रांतियाँ)



Khan pan ka mahilaon me galat bhrantiyan

पौष्टिक भोजन लेते हुए

खान पान का महिलाओं में गलत भ्रांतियाँ⇒

         भारत सहित विश्व के अनेक भागों में महिलाओं के लिए भोजन के विषय में कुछ गलत परम्परायें व विचार प्रचलित है जो काफी हानिकारक है। उदाहरण के लिए-आमतौर पर लोगों में यह भ्रांतियाँ है कि लड़कियों से लड़को को अधिक भोजन चाहिए परन्तु ये सोच गलत है। वास्तव में महिलाएँ व लड़कियाँ उतना ही (कहीं कहीं तो अधिक) कठोर परिश्रम करती है जितना की पुरुष व लड़के करते हैं।

      अतः उन्हें भी उतना ही स्वस्थ रहने की जरूरत होती है, जिन लड़कियों को बचपन में भली-भांति खिलाया पिलाया जाता है तो वे स्वस्थ रहती हैं। परिणामस्वरूप बड़े होकर उन्हें पढ़ाई या काम करने में कम समस्यायें होती है और वे स्वास्थ्य स्त्रियाँ बनती हैं।

         देश में कुछ समुदायों में ऐसा विश्वास है कि महिला को अपने जीवन के कुछ खास समय में कुछ विशेष खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए। इन खास समय से तात्पर्य माहवारी का समय गर्भावस्था प्रसव के तुरंत पश्चात् का समय स्तनपान कराने का समय या सोनिवृत के समय होता है लेकिन वास्तविकता यह है कि महिलाओं को हर अवस्था में हमेशा पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है विशेषकर गर्भावस्था तथा स्तनपान की अवस्था में तो उन्हें पोषणीय भोजन की आवश्यकता में किसी भी तरह की कमी का दुष्प्रभाव माँ एवं उनके शिशु दोनों को भुगतना पड़ सकता है। भोजन के कुछ खाद्य पदार्थों के परहेज करने से कमजोरी, बीमारी और मृत्यु भी हो सकती है।

       हमारे समाज में लड़कियों को बचपन से ही यह बात दिमाग में डाल दी जाती है कि महिलाओं को पहले अपने परिवार के अन्य सदस्यों को भोजन कराना चाहिए तत्पश्चात् ही स्वयं भोजन करना चाहिए, ऐसी स्थिति में महिलायें केवल बचा खुचा भोजन ही खा पाती है। भारत सहित विश्व के अनेक भागों में महिलाओं के लिए भोजन के विषय में कुछ गलत परम्परायें व विचार प्रचलित है जो काफी हानिकारक है। अन्य सदस्यों के बराबर भोजन उसे नहीं मिलता है। यह महिलाओं के स्वास्थ पर काफी कुप्रभाव डालता है। 

          प्रसव के तुरन्त बाद तो यह खतरनाक भी हो सकता है। खान-पान से संबंधित लोगों में एक भ्रांति यह भी है कि रोगी व्यक्ति को स्वस्थ की तुलना में कम भोजन की आवश्यकता होती है। वास्तविकता तो यह है कि पौष्टिक भोजन न केवल बिमारियों की रोकथाम करता है बल्कि बीमार व्यक्ति को फिर से जल्दी स्वस्थ होने में सहायक होता है। एक सामान्य नियम यह है कि जो खाद्य पदार्थ सामान्य व्यक्ति के लिए अच्छे होते हैं वे रोगी व्यक्तियों के लिए भी उतने ही लाभदायक होते हैं।

         हमारे देश में कुछ प्रान्तों में एक बहुत ही हानिकारक विश्वास प्रचलित हैं कि जिस महिला को अभी हाल में ही बच्चा हुआ है उसे कुछ तरह के खाद्य पदार्थ से परहेज करना चाहिए। ऐसी अवस्था में उसे न्यूनतम आवश्यक पोषक मूल्य खाद्य वस्तुएँ खाने को दिए जाते हैं। परिणामस्वरूप उसे आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं और वह कमजोर एवं एनीमिया का शिकार हो जाती हैं। यह स्थिति कभी-कभी गंभीर बीमारी या फिर मौत का कारण भी बन जाती है।

         प्रसवोपरान्त महिलाओं को स्वस्थ रहने एवं स्तनपान प्रदान करने वाले खाद्य पदार्थों की आपूर्ति अत्यंत आवश्यक होता है। पौष्टिक तत्वों से युक्त आहार से उसे कोई हानि नहीं बल्कि अत्यधिक लाभ होगा जिसमें माँ और बच्चा दोनों स्वस्थ रहेगा।
जुकाम ग्रस्त व्यक्ति के लिए संतरे, नींबू, अमरूद एवं अन्य फल को नहीं खाने की धारणायें लोगों में व्याप्त है जो कि बिल्कुल गलत धारणा है। वास्तव मे तो विटामिन सी युक्त फल के सेवन से संक्रमण पर काबू पाने में अत्यंत सहायता मिलती है।

       हमारे देश में कुपोषण की समस्या अत्यंत दयनीय है जिसका मुख्य कारणों में से एक मांसाहार का नहीं करना होता है। हमारे देश में एक बहुत बड़ा वर्ग मांसाहारी से परहेज करता है जो कि उच्च गुणवत्तापूर्ण प्रोटीन की आपूर्ति का मुख्य स्त्रोत है। मांसाहारी नहीं करने वाले को दुध, सोयाबीन इत्यादि का भरपूर मात्रा में सेवन आवश्यक हो जाता है परन्तु गरीबी की वजह से इन पदार्थों का सेवन नहीं कर पाना कुपोषण की स्थिति को विकट करता है।

खराब पोषण से बीमारियाँ

          गलत भ्रांतियों या धारणाओं की वजह से हमारे देश में लड़कियों को आवश्यकता से कम भोजन या यूँ कहें कि पौष्टिक भोजन नही मिलता है। अतः उनके बीमार पड़ने की संभावना अधिक होती है। खराब पोषण के दुष्परिणामस्वरूप होने वाली कुछ बीमारियाँ निम्नलिखित है:-

एनीमिया (खून की कमी)-

       एनीमियाग्रस्त व्यक्ति अर्थात् शरीर में खून की कमी का होना यह तब होता है। जब शरीर में रक्त के लाल कणों या कोशिकाओं के नष्ट होने की दर उनके निर्माण की दर से अधिक होती है। चूँकि महिलायें हर महिने अपनी माहवारी के माध्यम से खून गंवाती है, इसलिए किशोरावस्था तथा रजोनिवृति के बीच की आयु की महिलाओं को एनीमिया सबसे अधिक होता है।

        संसार की गर्भवती महिलाओं में 50 से अधिक महिलाएँ एनीमिया से पीड़ित होती है। क्योंकि उन्हें अपने गर्भ में पल रहे शिशु के लिए भी रक्त निर्माण करना पड़ता है। एनीमिया एक गंभीर बीमारी हैं, जिसके कारण महिलाओं को अन्य बीमारियाँ भी होने की संभावना बढ़ जाती है। यह महिलाओं की कार्य क्षमता को प्रभावित करती है। एनीमिया से ग्रस्त महिलाओं की प्रसव के दौरान मृत्यु की संभावना काफी अधिक होती हैं।

लक्षण- एनीमियाग्रस्त रोगियों में निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं-
⇒ त्वचा का सफेद दिखना
⇒ वेहोश होना
⇒ सांस फूलना
⇒ हृदय गति का तेज होना
⇒ जीभ, नाखूनों एवं पलकों के अंदर सफेदी का आभास होना इत्यादि।

बेरी-बेरी

      यह रोग विटामीन बी समूह के एक विटामिन थायमिन की कमी के कारण होता है। थायमिन एक विटामिन है जो भोजन को उर्जा में परिवर्तित करने में सहायक होता है। एनीमिया की तरह यह रोग भी महिलाओं में किशोर अवस्था से लेकर रजोनिवृति के बीच की उम्र में अधिक होता है।

       बेरी-बेरी हाने की संभावना तब होती है जब भोजन में मुख्य खाद्य की बाहरी सतह निकाल ली गई हो अर्थात पोलिश किया हुआ चावल इत्यादि या ऐसा कन्दमूल जिसमें स्टार्च की मात्रा अधिक हो।

लक्षण- बेरी-बेरी रोगियों में निम्नलिखित लक्षण दिखाई देता है-

⇒ भूख नहीं लगना, खाने से अनिच्छा

⇒ भंयकर कमजोरी, विशेषकर पैरों में

⇒ शरीर पर सूजन आ जाना

⇒ समुचित इलाज के अभाव में दिल काम करना बंद कर देता है जिससे रोगी की मृत्यु भी हो सकती है।

रतौंधी-

       यह आँखों की एक बीमारी है जो मुख्य रूप से दो से पाँच वर्ष की आयु के बच्चों में सर्वाधिक होती है लेकिन व्यस्कों में भी यह बीमारी हो सकती है। यह विटामिन ए की कमी से होती हैं, गहरे पीले एवं गहरे हरे रंग की पत्तेदार सब्जियाँ फलों एवं अन्य ऐसे पदार्थों के पर्याप्त मात्रा में सेवन नहीं करने के कारण विटामिन ए की कमी हो जाती है। समय पर इलाज नहीं होने से अंधापन भी हो सकता है।

अत्यधिक मात्रा में या गलत तरह का भोजन खाने से होने वाली समस्याएँ-

      जिस प्रकार आवश्यकता से कम मात्रा में लिया गया भोजन शरीर की आवश्यकता को पूरा करने में अक्षम होता है जिससे अनेकानेक पोषणहीनता सम्बन्धी रोग हो जाता है ठीक उसी तरह आवश्यकता से अधिक मात्रा में पौष्टिक तत्व भी शरीर में जाकर संग्रहीत होने लगता है जिससे अनेक प्रकार की बीमारी के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। आवश्यकता से अधिक कार्बोहाइड्रेट का सेवन करने से शरीर में ग्लूकोज बढ़ने से मोटापा, मधुमेह आदि रोग होता है।

         आगे चलकर हृदय संबंधी रोग अनियमित ब्लड प्रेशर बीमारी की समस्या भी बढ़ती है। यहाँ तक की किडनी से संबंधित बीमारी भी अत्यधिक पोषण के कारण देखा जाता है। मानव की पोषण संबंधी आवश्यकता का विस्तृत अध्ययन से हमें यह जानकारी मिलती है कि आवश्यकता से अधिक या कम दोनों ही पोषण की स्थिति अच्छी नहीं होती है।

       अतः हमें संतुलित भोजन की महत्ता को समझते हुए संतुलित आहार ग्रहण करने की आदत विकसित कना चाहिए।

डॉ अनीता सिंह (आहार एवं पोषण विशेषज्ञ)
डॉ नितीश कुमार चौरसिया

1. Mobile ka nasha / मोबाइल का नशा

1. Mobile ka nasha 

(मोबाइल का नशा)

https://www.geographynotespdf.com/mobile-ka-nasha/


Mobile ka nasha 

मोबाइल का नशा के बारे में सुनिए डाक्टर क्या कहते हैं?

     जो माता-पिता छोटे मासूम बच्चों को थोड़ा सा भी रोने पर उनके हाथ में बार-बार मोबाइल देकर शांत कराते हैं, वह बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं। वे अपने बच्चों के जीवन के साथ बहुत ज्यादा खिलवाड़ कर रहे हैं। यह कहना है शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ नीतीश कुमार चौरसिया PMCH पटना का।

        उन्होंने यहाँ तक भी कहा कि 15 वर्ष तक के उम्र के च्चों के लिए मोबाइल का उपयोग करना बहुत ही घातक होता है। इससे बच्चों में चिड़चिड़ापन व स्वभाव में जिद्दीपन आता है। वे माता-पिता को ब्लैक मेलिंग करने लगते हैं तथा लत लग जाने पर जब उन्हें मोबाइल से दूर खा जाता है तो वे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं।

       यहाँ तक उस तरह के बच्चों में मानसिक विकृति भी उत्पन्न हो सकता है। अतः लोगों को अर्थात माता-पिता को अपने बच्चों का यदि जीवन मे सफल बनाना है तब मोबाइल से दूर हीखना चाहिए।

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