Unique Geography Notes हिंदी में

Unique Geography Notes in Hindi (भूगोल नोट्स) वेबसाइट के माध्यम से दुनिया भर के उन छात्रों और अध्ययन प्रेमियों को काफी मदद मिलेगी, जिन्हें भूगोल के बारे में जानकारी और ज्ञान इकट्ठा करने में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस वेबसाइट पर नियमित रूप से सभी प्रकार के नोट्स लगातार विषय विशेषज्ञों द्वारा प्रकाशित करने का काम जारी है।

BA Geography All PracticalBA SEMESTER-IICARTOGRAPHY(मानचित्र कला)

33. Interpretation of Weather Map (मौसम मानचित्रों का विश्लेषण)

33. Interpretation of Weather Map

(मौसम मानचित्रों का विश्लेषण)



मौसम सम्बन्धी तत्व और उनके निरूपण (Weather Phenomena and their Representation)

संघनन- जल के गैसीय अवस्था से तरल या ठोस अवस्था में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को संघनन कहा जाता है। यदि हवा का तापमान ओसांक बिन्दु से नीचे पहुंच जाये तो संघनन की क्रिया प्रारंभ होती है। संघनन की प्रक्रिया पर वायु के आयतन, तापमान, वायुदाब एवं आर्द्रता का प्रभाव पड़ता है।

यदि संघनन हिमांक (Freezing Point) से नीचे होता है, तो तुषार (Frost), हिम (Snow) एवं पक्षाभ मेघ (Cirrus Cloud) का निर्माण होता है।

यदि संघनन हिमांक से ऊपर होता है तो ओस, कुहरा, कुहासा एवं बादलों का निर्माण होता है।

 यदि संघनन पृथ्वी के धरातल के समीप होता है तो ओस (Dew), पाला (Frost), कुहरा एवं कुहासे का निर्माण होता है।

 जब संघनन की क्रिया अधिक ऊँचाई पर होती है तो बादलों का निर्माण होता है।

ओस (Dew)- हवा का जलवाष्प जब संघनित होकर छोटी-छोटी बूंदों के रूप में धरातल पर पड़ी वस्तुओं (घास पत्तियों आदि) पर जमा हो जाता है, तो इसे ओस कहा जाता है। ओस के निर्माण के लिए साफ आकाश, लगभग शांत वायुमंडल, उच्च सापेक्षिक आर्द्रता एवं ठंडी तथा लंबी रात का होना आवश्यक है।
ओस के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि तापमान हिमांक से ऊपर हो।

तुषार या पाला (Frost)- जब संघनन की क्रिया हिमांक से नीचे होती है (0°C या उससे कम पर) तो जलवाष्प जल कणों के बदले हिम कणों में परिवर्तित हो जाता है। इसे ही तुषार या पाला कहा जाता है। पाला के निर्माण के लिए उन सभी अन्य परिस्थितियों का होना आवश्यक है, जो ओस के निर्माण के लिए हैं।

नोट :- ओस या पाला ऊपर से नहीं गिरता है, बल्कि यह वहीं बनता है जहां हम इसे देखते हैं।

कुहरा (Fog)- कुहरा एक प्रकार का बादल है। जब जलवाष्प का संघनन धरातल के बिल्कुल समीप होता है तो कुहरे का निर्माण होता है। कुहरे में कुहासे की तुलना में जल के कण अधिक छोटे एवं सघन होते हैं।

कुहासा (Mist)- कुहासा भी एक प्रकार का कुहरा है, जिसमें कुहरे की अपेक्षा दृश्यता (Visibility) दूर तक रहती है। इसमें दृश्यता एक किलोमीटर से अधिक, परंतु दो किलोमीटर से कम होती है।

धुआंसा (Smog)- बड़े-बड़े शहरों में फैक्टरियों के निकट जब कुहरे में धुएं के कण मिल जाते हैं तो उसे धुआंसा (Smoke+Fog = Smog) कहा जाता है। धुआंसा कुहरे की तुलना में और अधिक सघन होता है एवं इसमें दृश्यता और भी कम होती है।

बादल (Clouds):-

    जब वायु का तापमान ओसांक (Dew-point) से नीचे गिर जाता है, तो जलवाष्प धूल तथा धुँए के कणों पर केन्द्रित होकर बादल का रूप धारण कर लेती है। बादलों को निम्नलिखित चार प्रमुख प्रकारों में विभक्त किया जाता है:-

1. वर्षा-मेघ (Nimbus):-

    काले-काले मेघ जब आकाश घेर लेते हैं तथा पृथ्वी के निकट होते हैं, तो इन्हें वर्षा-मेघ कहते हैं। इनसे काफी वर्षा होती है।

2. स्तरी मेघ (Stratus):-

   ये पृथ्वी से 300-2500 मीटर की ऊँचाई पर होते हैं तथा आकाश पर पूर्णतया छा जाते हैं। इनका निर्माण दो भिन्न पवनों के मिलने से होता है।

3. कपासी पेघ (Cumulus):-

   इनकी आकृति, रूई के ढेर जैसी होती है। इन बादलों में गड़गड़ाहट होती है।

4. पक्षाभ मेघ (Circus):-

   ये बहुत अधिक ऊँचाई (5-13 किमी) पर होते हैं। प्राय: ये घुँघराले बालों जैसे दिखाई पड़ते हैं। इनके द्वारा वर्षा नहीं होती।

समवायु-दाब रेखाओं का अध्ययन

    मौसम-मानचित्रों में समवायु-दाब रेखाएँ खींची जाती हैं। किसी भी मौसम-मानचित्र का अध्ययन इन रेखाओं के अध्ययन पर ही अधिकतर अवलम्बित होता है। समभार रेखाओं के अनेक आकार होते हैं, परन्तु इसके निम्न तीन मुख्य आकार हैं:

(क) चक्रवात (Cyclone),

(ख) प्रतिचक्रवात (Anti-Cyclone),

(ग) कोल (Coal)।

चक्रवात (Cyclones):-

    इसमें समदाब-रेखाओं का आकार वृत्ताकार होता है तथा रेखाएँ मिली होती हैं और वायु-दाब भीतर की ओर कम होता जाता है। सबसे कम वायु-दाब रेखा के भीतर ‘Low’ लिखा रहता है। प्रत्येक चक्रवात एक निश्चित दिशा की ओर चलने लगता है। उत्तरी गोलार्द्ध के चक्रवात में पवनें अन्दर की ओर घड़ी की सुइयों के विपरीत दिशा में चलती हैं।

प्रतिचक्रवात (Anti Cyclone)

     चक्रवात का उल्टा प्रतिचक्रवात होता है। प्रतिचक्रवात के केन्द्र में एक अपना वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता और हवाएँ केन्द्र से बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। उत्तरी गोलार्द्ध में प्रतिचक्रवात Clock wise और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anticlock wise घुमने की प्रवृति रखती है।

चक्रवात और प्रतिचक्रवात में अंतर

1. चक्रवात की स्थिति में निम्न वायुदाब केन्द्र और प्रतिचक्रवात की स्थिति में उच्च वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है।

2. चक्रवात में हवा बाहर से केन्द्र की ओर आने की प्रवृत्ति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में केन्द्र से बाहर की ओर जाने की प्रवृत्ति रखती है।

3. चक्रवात की स्थिति में परिवर्तन के फलस्वरूप बादल, वर्षण एवं तेज हवाएं जैसी मौसमी परिस्थतियाँ उत्पन्न होती हैं। वहीं प्रतिचक्रवात की स्थिति में मौसम साफ होने की प्रवृति रखती है।

4. चक्रवात के केन्द्र में हवाएँ नीचे से ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में हवाएँ ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृति रखती है।

5. जिस स्थान पर चक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। ठीक उसके ऊपर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। अत: स्पष्ट है कि चक्रवात और प्रतिचक्रवात जलवायु विज्ञान की दो अलग-2 धारणाएँ है।

ब्यूफोर्ट संकेत (Beaufort Notation)

b नीला आकाश

h ओले (Hail)

bc आकाश कुछ साफ (Sky partly clean)

p वर्षा के मेघ गुजर रहते हैं (Passing Shower)

e आकाश अधिकतर बादलों से घिरा हुआ (Generally cloudy sky)

f धुन्ध (Fog)

m कुहरा (Mist)

o आकाश बादलों से सम्पूर्ण घिरा हुआ (Over-cast sky)

x पाला (Frost)

w ओस (Dew)

d फुहार (Drizzle), वर्षा (Rain), हिम (Snowfall)

q अल्पकालिक झंझा (Squall)

t गरज (Thunder)

I बिजली (Lighting)

s सहिम वृष्टि (Sleet)

i कभी चमक कभी गरज (Intermittent)

Interpretation of Weatherकोल (Col):-

    दो चक्रवातों अथवा दो प्रति चक्रवातों से थिरे मध्यस्थ क्षेत्र को हम ‘कोल’ कहते हैं। यहाँ पर पवन शांत रहती है। ग्रीष्म ऋतु में गरज तथा विद्युत की कड़क सुनाई देती है।

गौण अपदान (Secondary Depresion):-

     जब विशाल चक्रवात में छोटा वायु-दाब क्षेत्र (Low Pressure Area) बन जाता है, तो उसे गौण अपदाब कहते हैं। इसमें मौसम अस्थायी (Varaible) होता है, कभी शांत होता है, कभी विद्युत की गरज होती है। गौण अवदाब मुख्य चक्रवात के साथ ही आगे बढ़ता है।

‘V’ आकार का चक्रवात:-

    जब चक्रवात का न्यून वायु-दाब क्षेत्र ‘V’ के आकार का हो जाता है, तो से Trough of Low Pressure कहते हैं। इसके अगवाड़े में गर्मी तथा वर्षा होती है। यदि वह उष्ण वाताग्र (Warm Front) प्रकार का होता है तो धूप तथा ठंड होती है। इसमें वायु-दाब बाहर की ओर बढ़ता जाता है।

फान (Wedge):-

    अनेक बार दो चक्रवातों के बीच समदाब रेखाओं का आकार उल्टे ‘V’ की भाँति हो जाता है तथा भीतरी वायु-दाब अधिक होता जाता है। इसके अग्रभाग (Front Part) में मौसम शांत तथा सुहावना होता है, ज्योंहि पिछला भाग (Rear Part) आता है, मौसम बादलों से घिरा तथा खराब हो जाता है।

भारत का सामान्य मौसम मानचित्र

    भारतीय मौसम मानचित्रों के अध्ययन में देश में पाई जाने वाली विभिन्न मौसमों की जानकारी की अधिक आवश्यकता पड़ती है। परम्परानुसार भारत में एक वर्ष की अवधि को तीन ऋतुओं में विभक्त किया जाता है:

(i) जाड़े की ऋतु (नवम्बर से फरवरी के अन्त तक)

(ii) गर्मी की ऋतु (प्रारम्भिक मार्च से मध्य जून तक)

(iii) वर्षा ऋतु (मध्य जून से अक्टूबर के अन्त तक)

    मौसम की दृष्टि से वर्षा का महत्व अधिक होता है इस मौसम के मानचित्रों पर अनेक संश्लिष्ट दृश्य भी उभरते है।

दक्षिणी-पश्चिमी मानसून की ऋतु (मध्य जून से मध्य सितम्बर या अक्टूबर तक):-

     इस मौसम के मानचित्र की प्रमुख विशेषता यह है कि उत्तरी-पश्चिमी पाकिस्तान के ऊपर निम्न वायु दाब केन्द्र तथा हिन्द महासागर में प्रायः श्रीलंका के पश्चिम उच्च वायु दाब पाया जाता है। इसके फलस्वरूप उच्च दाब का एक उभार या गर्त बना जाता है और पश्चिमी तट पर विशेष रूप से उसके दक्षिणी भाग में समदाब रेखाएँ कुछ उत्तर की ओर मुड़ जाती है। प्रायद्वीप के दक्षिणी अर्द्धभाग में ये रेखाएँ दक्षिण की ओर मुड़ जाती है।

    पश्चिम के आधे भाग पर ये प्रायः पश्चिम दिशा में फैली होती है। पूर्व में समदाब रेखाओं की आकृति चक्रवात की उपस्थिति पर निर्भर करती है। उत्तरी प्रायद्वीप को पार करने वाली समदाब रेखाएँ प्रायः चक्रवात को दक्षिण भाग में घेरने की कोशिश करती है। यदि चक्रवात नहीं है तो ये प्राय: उत्तर की ओर से बंगाल की खाड़ी के ऊपर मुड़ जाती है और हिमालये से 60° के कोण पर मिलती है।

लौटती मानसून की ऋतु (मध्य सितम्बर से दिसम्बर)-

    मानसून के समाप्त होते ही पश्चिमोत्तर भारत का निम्न दाब क्षेत्र धीरे-धीरे उच्च दाब में बदल जाता है। पश्चिमी पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम में एक उच्च दाब का क्षेत्र उपस्थित रहता है। इस केन्द्र से गंगा के मैदान में उच्च दाब का एक कटक (Wedge) फैला रहता है फिर भी यहाँ दाब प्रवणता बहुत कम रहता है। समदाब रेखाएँ पहले उत्तरी पश्चिमी पाकिस्तान के ऊपर पश्चिम से उत्तर-पूरब की ओर चलती है और फिर गुजरात तथा काठियावाड़ा से पूर्व पश्चिम हो जाती है।

    श्रीलंका के पूर्व में बंगाल की खाड़ी पर एक निम्न दाब का क्षेत्र उपस्थित रहता है। जब गंगा के मैदान पर उच्च दाब क्षेत्र रहता है, पश्चिमी पाकिस्तान तथा पश्चिमी भारत पर फैली समभार रेखाएँ उच्च दाब के पश्चिम किनारे के समान्तर हो जाती है और उनकी दिशा उत्तर-दक्षिण हो जाती है।

शीत ऋतु या जाड़े का मौसम (जनवरी से मार्च के मध्य तक)-

     इस समय के मौसम मानचित्र पर उत्तरी-पश्चिमी उच्च दाब के स्थान पर एक हल्का निम्न दाब क्षेत्र बन जाता है। क्षेत्र की वास्तविक स्थिति चक्रवात पर निर्भर करती है।

ग्रीष्म ऋतु (मार्च से जून तक)-

    इस समय गर्मी अधिक बढ़ जाने से भारत के उत्तरी-पश्चिम भाग और पाकिस्तान के ऊपर निम्न दाब का क्षेत्र बनना प्रारम्भ हो जाता है। बाद में वह गंगा के मैदान में फैलता है। उच्च दाब क्षेत्र अरब सागर पर स्थित रहता है। अतः समभार रेखाएँ पश्चिमी घाट पर उत्तर से दक्षिण मुँह की हो जाती हैं। मध्य प्रायद्वीप के उत्तरी भाग में समदाब रेखाएँ अपनी दिशा को बदल उत्त-पूर्वी दिशा में मुड़ जाती हैं। वायुदाब रेखाओं के कम होने के कारण दाब प्रवणता अल्प तथा इस प्रकार वायुगति अधिक तेज नहीं होती।

भारतीय मौसम मानचित्रों की व्याख्या

     किसी दैनिक मौसम मानचित्र का अध्ययन निम्न शीर्षकों में किया जाता है:-

1. भूमिका- दिन, मानचित्र की तिथि तथा समय, ऋतु आदि।

2. आकाश की दशा (Sky Conditions)

(i) मेघ आवरण की मात्रा (Amount of Cloudiness)

(ii) मेघों के प्रकार या प्रकृति

(iii) अन्य घटनाएँ-कोहरा, बिजली, तुषार आदि वायुमण्डलीय तत्व

3. वायुदाब का वितरण:

(i) मौसमी निम्न वायुदाब (Low) क्षेत्र की स्थिति

(ii) मौसमी उच्च वायुदाब (High) को स्थिति

(iii) समदाब रेखाओं की प्रवृत्ति (Trends of isobars)

(iv) वायुदाब को प्रवणता (Pressure Gradient)

(v) चक्रवात को उपस्थिति और मौसम पर उसका प्रभाव

4. वायु (Wind)

(1) पवन की दिशा और

(ii) पवन की गति

5. सामान्य वायुदाब से विचलन

6. वर्षा का वितरण (Precipitation)

(i) सामान्य वितरण, साधारण, अधिक, कम आदि

(ii) भारी वर्षा के प्रमुख क्षेत्र

7. सामान्य तापमान से विचलन (Departure from normal Temp.)

8. समुद्र की दशा (Sea Condition)

   उपर्युक्त शीर्षकों के अन्तर्गत सामान्यतः प्रातः कालीन (08.30) मुख्य मानचित्र का सविस्तार वर्णन मानचित्र पर उद्धत कुछ प्रमुख संकेतों की सहायता से करते हैं। छोटे मानचित्र भी उपरोक्त समय की दशा को ही दर्शाते हैं जिनका उपयोग पठन में किया जाता है।

शीतकाल का ऋतु मानचित्र (बुधवार 31 जनवरी, सन् 1973 शक्, 11 माघ 1894):-

(a) प्रारम्भिक सूचना-

    शीतकाल के इस मुख्य ऋतु मानचित्र में बुधवार दिनांक 31 जनवरी, सन् 1973, भारतीय समयानुसार प्रातः 8.30 बजे की मौसम की वास्तविक दशाओं का चित्रण किया गया है। ऋतु मानचित्र के ऊपरी भाग में दिनांक, दिन एवं भारतीय समय के अतिरिक्त ग्रीनविच समय (0300 GMT) दिया है। यहाँ ई० सन् के साथ-साथ शक् संवत् भी दिया रहता है। ऋतु मानचित्र में मंगलवार दिनांक 30 जनवरी, सन् 1973, भारतीय समयानुसार सायं 5.30 17.30) की मौसम की वास्तविक दशाओं का वर्णन किया गया है। मौसम की वास्तविक दशाओं का वर्णन करते समय दोनों पृष्ठों के मुख्य एवं सहायक मानचित्रों की भी आवश्यकतानुसार सर्वत्र सहायता ली गयी है।

(b) वायुदाब व्यवस्था-

    मानचित्र में वायुदाब व्यवस्था अधिक सरल है। इसमें वायुदाब की सामान्य प्रवणता हिन्द महासागर से उ०-५० भारत की ओर है। सम्पूर्ण मानचित्र में समदाब रेखाएँ दूर- दूर फैली हुई हैं। हिन्द महासागर एवं केरल तट के सहारे 1014 मिलीबार की समदाब रेखा अण्डाकार स्वरूप बनाती हुई सर्पिल मार्ग से पूर्व की ओर चली गयी है। अधिकांश दक्षिण का पठार 1014 और 1016 मिलीबार समभार रेखा की सीमा में आ जाता है।

निम्न वायुदाब के क्षेत्र-

    ऋतु मानचित्र में स्पष्टत: उ० प० भारत और संलग्न पाकिस्तान में निम्न वायुदाब का विकास हुआ है। यहाँ पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में 1018 मिलीबार समभार रेखा अण्डाक्ति बनाती है। इसी भाँति दक्षिणी पठार के पश्चिमी भाग को 1010 मिलीबार समभार रेखा घेरे हुए हैं। यह दोनों ही निम्न भार के केन्द्र हैं।

उच्च वायुदाब के क्षेत्र-

    सर्वाधिक वायुदाब पृष्ठ छः के मुख्य ऋतु मानचित्र में उत्तरी-पश्चिमी भारत एवं पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में विकसित हुआ है। यहाँ 1022 मिलीबार वायुदाब पाया जाता है। यह वायुदाब उत्तरी राजस्थान और उत्तरी-पूर्वी भारत में उपूसी और सलंग्न वर्मा में विकसित हुआ है। सामान्यतः सारे ही उत्तरी भारत में 1020 से 1022 मिलीबार के बीच उच्च वायुदाब की दिशा पायी जाती है। यहाँ की समभार रेखाएँ उत्तर प्रदेश के पश्चिम में पश्चिमोत्तर दिशा में और पूर्व में पूर्वोत्तर दिशा में मुड़ गयी हैं।

     दक्षिणी भारत में 1014, 16 और मिलोबार की तीन समभार रेखाएँ अरब सागर से भूमि की ओर तेजी से मुड़कर एवं पुनः सागर की ओर झुककर पूर्व की ओर चली गयी हैं। उत्तरी भारत में इनका वितरण अधिक व्यवस्थित एवं दो उपखण्डों पूर्वोत्तर और पश्चिमोत्तर में बँट गया है। समदाब रेखाओं की उपयुक्त व्यवस्था से तो यही आभास होता है कि स्थानीय अपवादों को छोड़ कुछ घण्टों तक सर्वत्र मौसम खुला एवं स्वच्छ रहना चाहिए।

सामान्य वायुदाब के विचलन (प्रातः 8.30 बजे)-

    दक्षिणी-पूर्वी कोने में दिये गये लघु मानचित्र को ध्यान से देखने से स्पष्ट हो जाता है कि प्रायः सारे ही देश में औसत से अधिक वायुदाब की दशा का विकास हुआ है। केवल मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र के कुछ ही भागों में औसत वायुदाब मिलता है। सामान्यतः ज्यों-ज्यों हम उत्तर की ओर जाते हैं वायुदाब उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। सर्वाधिक विचलन पश्चिमोत्तर एवं पूर्वोत्तर भारत +4 मिलीबार और दक्षिण भारत में +2 मिलीबार से कम पाया गया है।

वायु दिशा एवं वायुवेग-

    ऋतु मानचित्र के उत्तरी-पश्चिमी भाग में वायु प्रायः शान्त है। उत्तरी भारत के अधिकांश भागों में वायु धीमी गति (5 नॉट या कम) से बह रही है। कंवल बारीसाल (बंगला देश) के निकट इसकी सर्वाधिक गति 20 नॉट प्रति घण्टा कित की गई है। इस ऋतु मानचित्र में कंवल उत्तरी भारत में ही ‘अ’ श्रेणी के बीस ऐसे केन्द्र बनाए गए हैं जहाँ कि वायु शान्त है। दक्षिणी भारत के अधिकांश केन्द्रों पर वायु प्रवाह की गति 5 से 15 नॉट के बीच है। इस भाग में वायु प्रवाह की सामान्य दिशा अरब सागर की ओर है। निकोबार के दक्षिण-पश्चिमी सागर में वायु गति 20 नॉट प्रति घण्टा अंकित की गई है। यहाँ पश्चिम की ओर प्रवाहित हो रही है।

1.5 किमी0 ऊँचाई पर वायु की स्थिति-

    दक्षिण-पूर्व कोने में ऑकत लघु मानचित्र में 1.5 किमी० की ऊँचाई पर देश के विभिन्न स्टेशनों से लिये गये प्रेक्षण के आधार पर वायु की दिशा एवं गति दर्शायी गई है। मानचित्र के अध्ययन से स्पष्ट है कि उपर्युक्त ऊँचाई पर वायु की गति 5 से 20 नॉट के बीच है। पश्चिमी तट एवं हिमालय के ढालों के निकट वायु प्रवाह अपेक्षाकृत तेज है। सम्पूर्ण उत्तरी भारत में वायु की दिशा भूमि की भाँति ही है। दक्षिणी भारत के विक्षोभ मण्डल में पवन धीमी गति से पश्चिम से पूर्व, उत्तर-पूर्व से पश्चिम की ओर बह रही है।आकाशीय दशा एवं मेघाच्छन्नता-

    शीत ऋतु होने से देश के अधिकांश मौसम केंन्द्र मेघ रहित है। पूर्ण मेघाच्छन्नता श्रीनगर, शिमला, चांदा और देहरादून में पायी जाती है। खण्डित मेघाच्छन्नता कहीं-कहीं उत्तरी मध्य और दक्षिण-पश्चिमी भारत एवं दोनों सागरों में एक-चौथाई से तीन-नौथाई तक पायी जाती है। सर्वत्र निम्न मेघों का ही वितरण दर्शाया गया है। आधे से अधिक मेघान्छन्नता भारत में जबलपुर और दक्षिणी भारत में औरंगाबाद व बंगलौर और मिनिकोय, कोलम्बो एवं वर्मा के दक्षिण में मिलती है। आकार में मेघों के अतिरिक्त जबलपुर के निकट तड़ित (lightning) अंकित की गयी है। मानचित्र में पूर्ण मेघाच्छन्नता पश्चिमी उत्तर प्रदेश, नई दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में अंकित की गई है।

वर्षा और भूतल पर आर्द्रता के विभिन्न रूप-

     उच्च भार एवं प्रायः मेघरहित आकाश होने से देश के अधिकांश भाग में वर्षा रहित मौसम अंकित किया गया है। ऋतु मानचित्र में शिमला और श्रीनगर के निकट हिमपात होता हुआ बताया गया है। दिल्ली और इलाहाबाद में हल्का कुहरा एवं कहीं-कहीं धुंध (Haze) भी फैली हुई है। पिछले 24 घण्टों में कहीं भी जलवृष्टि, हिमपात या ओलावृष्टि अंकित नहीं की गयी है।

समुद्र की दशा-

    बंगाल की खाड़ी और अरब सागर की दशा प्रायः शान्त बतायी गयी है। बंगाल की खाड़ी में गंगा के डेल्टा के मुहाने, मद्रास और खाड़ी के दीपों के निकट कहीं भी दशा विशेष को उल्लिखित नहीं किया गया है। मद्रास व म्यांसार के बीच सागर मध्य तरंगित (moderate) बताया गया है। इसी भाँति अरब सागर में द्वीपों के निकट सागर कुछ अशान्त है, शेष भागों में यह प्रायः शान्त है।

न्यूनतम तापमान का औसत दशा से विचलन (सायं 8.30 बजे):-

    पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार सम्पूर्ण उत्तरी-पश्चिमी भारत में औसत न्यूनतम तापमान से वास्तविक न्यूनतम तापमान 2° स 4°C कम रहे हैं। गुजरात, दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान और उत्तर प्रदेश में 4°C या अधिक नीचे तापमान रहे हैं। दूसरी ओर सम्पूर्ण दक्षिणी-पूर्वी और पूर्वी भारत के तापमान औसत से 2°C तक ऊँचे अंकित किये गये हैं। कर्नाटक, महाराष्ट्र एवं आंध्र के संलग्न भागों में वृद्धि 4°C तक अंकित की गई है। औसत तापमान रेखा या 0°C विचलन रेखा मार्मा गोआ एवं भारत के मध्यवर्ती भागों से होकर सुदूर पूर्वी भारत में पूर्वी हिमालय की ओर मुड़ गई है।

अधिकतम तापमान का औसत दशा से विचलन (सांय 5.30 बजे):-

    दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार देश के सारे उत्तर और मध्य भाग में अधिकतम तापमान औसत से 2° से 4°C तक कम अंकित किये गये हैं। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश के वास्तविक तापमान 4°C से भी कम अंकित किये गये हैं। देश के शेष भागों में अधिकतम तापमान प्राय: औसत के निकट रहे। केवल महाराष्ट्र में कहीं-कहीं औसत से 2°C अधिक तापमान अंकित किये गये। औसत समताप रेखा अत्यधिक बल खाती हुई भूमि की ओर मुड़कर पूर्व एवं पूर्वोत्तर भारत में पूर्वी हिमालय की ओर मुड़ गयी है।

ग्रीष्मकाल का ऋतु मानचित्र (बुधवार 16 मई सन् 1973, शक 26 वैशाख 1895)

(i) प्रारंभिक सूचना:-

    ग्रीष्मकाल के इस मुख्य ऋतु मानचित्र में बुधवार दिनांक 16 मई, सन् 1973, भारतीय समयानुसार प्रातः 8.30 की मौसम की वास्तविक दशा का चित्रण किया गया है। मानचित्र के ऊपरी भाग में भारतीय समय के साथ-साथ ग्रीनविच समय (3.00 बजे) एवं ईसवी सन् के साथ-साथ शक् सम्वत् भी दिया गया है। मानचित्र में मंगलवार 15 मई, सन् 1973 भारतीय समयानुसार सायं 5.30 बजे की मौसम की वास्तविक दशा का चित्रण किया गया है। मौसम की वास्तविक दशा का वर्णन करते समय दोनों ही मुख्य मानचित्रों एवं उनके नीचे के चारों लघु मानचित्रों की भी आवश्यकतानुसार सहायता ली गयी है।

(ii) वायुदिशा एवं वायुवेग:-

    मुख्य ऋतु मानचित्र के अधिकांश भाग में पवन धीमी गति से बह रही है। उत्तरी भाग में वायु की गति 10 से 5 नॉट के बीच और मध्यवर्ती भाग में 5 से 15 नॉट के बीच ऑकत की गई है। देश में सबसे तेज पवन नागपुर के निकट 25 नॉट प्रति घण्टा की गति से चल रही है। उत्तरी भारत में वायु के प्रायः शान्त रहने का मुख्य कारण वहाँ पायी जाने वाली वायुदाब और समदाब रेखाओं का दूर-दूर होना है।

   दक्षिणी-पश्चिमी भारत एवं तटवर्ती भाग में वायु प्रायः पश्चिमी एवं उत्तर-पश्चिमी दिशा में प्रवाहित हो रही है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी तट पर इसकी दिशा अनिश्चित है। पूर्वी तट पर हवा एक-दूसरे से विपरीत दिशा में प्रवाहित होती हुई दर्शायी गयी है। मध्यवर्ती भारत में हवाएँ उत्तर-पश्चिम और पश्चिम दिशा से और पूर्व में दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व से प्रवाहित हो रही है। देश के शेष भागों में पवन प्रायः शान्त है। मानचित्र में वायुदाब की भाँति ही वायु प्रवाह की दिशा भी अधिक व्यवस्थित है, यहाँ पश्चिमी भारत एवं पश्चिमी तट पर हवा पश्चिम या उत्तर-पश्चिम से एवं मध्यवर्ती भारत में उत्तर-पश्चिम से प्रवाहित हो रही है। शेष भागों में पवन प्रायः शान्त है।

(iii) आकाशीय दशा एवं मेघाच्छन्नता:-

     ग्रीष्म ऋतु के कारण मुख्य मानचित्र के अधिकांश मौसम केन्द्रों पर आकाश मेघरहित बताया गया है। परन्तु तटवर्ती मौसम केन्द्रों की स्थिति इससे कुछ भिन्न है। यहाँ पर कच्छ से कोचीन तक न्यूनाधिक मेघाच्छन्नता पायी जाती है। कोचीन, कालीकट और त्रिवेन्द्रम के निकट 7/8 से लेकर पूर्ण आकाश मेघाच्छादित है। इसी भाँति पूर्वी भारत में पूर्ण मेघाच्छन्नता कटक, बालासोर और गौहाटी में, पश्चिम भारत में चण्डीगढ़ में पूर्ण, दिल्ली व देहरादून में 7/8, अण्डमान निकोबार में 5/8 और बीकानेर में 1/2 भाग मेघाच्छादित है। मानचित्र के दक्षिण और पूर्वी तट, द्वीप समूहों और पूर्वी भारत में अधिक मेघाच्छन्नता पायी जाती है।

     दोनों ही मुख्य ऋतु मानचित्रों में उत्तरी और मध्यवर्ती भारत में कई स्थानों पर धूल भरी आँधियाँ चलती हुई बतायी गयी हैं। इसके अतिरिक्त, मद्रास के निकट तड़ित (lightning) चमकते हुए भी बताया गया है।

(iv) सामान्य वायुदाब से विचलन (प्रातः 8.30 बजे):-

    दक्षिणी-पूर्वी कोने के लघु मानचित्र से स्पष्ट है कि इस समय देश के अधिकांश भाग में लगभग औसत बायुदाब की दशा ही पायी जाती है। मध्यवर्ती व उत्तरी भारत में कहीं-कहीं औसत से 2 मिलीबार अधिक एवं मद्रास के निकट 2 मिलीबार कम वायुदाब दर्शाया गया है। सम्पूर्ण पूर्वी व दक्षिणी-पूर्वी भाग में औसत से कम और शेष भागों से औसत से अधिक वायुदाब पाये जाते हैं। (५०-५० मानचित्र देखें)

(v) 1.5 किमी० की ऊँचाई पर वायु की स्थिति:-

    दक्षिण-पूर्व के लघु मानचित्र में 1.5 किमी० की ऊंचाई पर प्रवाहित हवाओं को देखने से स्पष्ट है कि यहाँ की वायु गति अधिक तीव्र है, और इसकी दिशा में भी अव्यवस्था है। सम्पूर्ण पश्चिमी भारत में उत्तर से दक्षिण तक वायु गति से 10 से 40 नॉट के बीच है। सर्वाधिक गति 40 नॉट भुज के निकट ऑकत की गई है। देश के मध्यवर्ती भागों में हवाएँ उत्तर-पश्चिम एवं उत्तर की ओर से और पूर्वी भारत में अनिश्चित दिशा में प्रवाहित हो रही है। यहाँ इनकी गति धीमी है।

(vi) वायुदाब व्याख्या:-

    मानचित्र की वायुदाब व्याख्या विषम है। इस समय देश के उत्तरी और दक्षिण दोनों भागों में वायुदाब वितरण भिन्न प्रकार का है। दक्षिणी प्रायद्वीप के पश्चिमी एवं मध्यवर्ती भाग और सौराष्ट्र में समदाब रेखाएँ अपेक्षाकृत अधिक निकट हैं। मध्यवर्ती एवं सम्पूर्ण उत्तरी-पश्चिमी एवं अधिकांश उत्तरी भारत को केवल 1002 और 1004 मिलीबार की दो समभार रेखाएँ घेरे हुए हैं। देश के इस भाग से बाहर की ओर सर्वत्र वायुदाब बढ़ता हुआ है। मानचित्रों की समभार रेखाएँ अधिक स्पष्ट विकसित हैं। इस पर निम्न एवं उच्च भार केन्द्रों का अधिक व्यवस्थित विकास हुआ है। यहाँ भी पश्चिम घाट के सहारे समभार रेखाएँ तेजी से निकट होती हुई चली गई हैं।

निम्न वायुदाब के क्षेत्र-

    मानचित्र में तीन भार के केन्द्र बने हुए हैं। इनमें से दो केन्द्रों का न्यूनतम वायुभार 1001 मिलीबार है। पहला वृत्ताकार केन्द्र द० पू० मध्य प्रदेश और उत्तरी-पश्चिमी उड़ीसा की सीमा पर दूसरे विषम आकृक्ति के केन्द्र का वायु भार भी 1001 मिलीबार है, यह पूर्वी राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विकसित हुआ है। अर्द्ध-विकसित निम्न भार की दशा हिमाचल प्रदेश, जम्मू और संलग्न पाकिस्तान में दर्शायी गई है।

    मानचित्र में भी सुस्पष्ट दो निम्न वायुदाब के केन्द्र विकसित हुए हैं। पहला अण्डाकार केन्द्र उत्तर-पश्चिमी राजस्थान एवं संलग्न पाकिस्तान की सीमा पर 996 मिलीबार वायुदाब दर्शाता है। इतने ही निम्न वायुदाब का दूसरा केन्द्र पूर्वी मध्य प्रदेश की सीमा पर विकसित हुआ है।

उच्च वायुदाब क्षेत्र-

     ऋतु मानचित्रों में भारतवर्ष के बाहर निकटवर्ती सागरों के सुदूर क्षेत्र में उच्च भार की दशा दर्शायी गई है। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की बाहरी सीमा पर 1008 मिलीबार एवं मानचित्र में लगभग इन्हीं स्थानों पर 1010 मिलीबार समभार रेखाएँ गुजरती हैं। यहीं पर ‘H’ (उच्च भार) लिखा है। इस भाँति मानचित्र में पूर्वांचल अरब सागर में सहायक उच्च भार के क्षेत्र दर्शाये गये हैं।

    उत्तरी एवं मध्य भारत में सामान्यतः निम्नदाब की दशा ग्रीष्म के लक्षणों को ही सुस्पष्ट करते हैं।

(vii) वर्षा और भूतल पर आर्द्रता के विभिन्न रूप:-

     ग्रीष्म ऋतु होने से बहुत ही कम स्थानों पर पिछले 24 घण्टों में वर्षा अंकित की गई है। सर्वाधिक वर्षा निकोबार द्वीपसमूह के दोनों केन्द्रों पर क्रमश: 8 और 7 सेमी०, नेपाल में काठमाण्डू में । सेमी० वर्षा व माण्डले में 2 सेमी० वर्षा अंकित की गई है। केवल मेघालय और निकोबार में ही प्रेक्षण के समय वर्षा हो रही थी। अहमदाबाद केन्द्र पर हल्का कुहरा (Haze) छाया हुआ है। शेष भागों में वायुमण्डल स्वच्छ और मौसम शुष्क बताया गया है।

(viii) समुद्र की दशा:-

     मानचित्र में अधिकांश अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की दशा को नहीं बताया गया है जो कि सम्भवतः सामान्य मानी गयी है। विशाखापतनम से श्रीलंका से बीच का सागर सरल एवं मन्द तरंगित (Smooth & Slight) और दक्षिण में मध्य तराँगत (mod) बताया गया है। पश्चिमी अरब सागर की दशा को भी कहीं-कहीं सरल एवं मन्द तरंगित (Slight & smooth) बताया गया है।

(ix) अधिकतम तापमान का औसत दशा में विचलन (सायं 5.30 बजे):-

      दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार सारे उत्तर-पश्चिम और पूर्वी मध्यवर्ती भारत में अधिकतम ताप का औसत से विचलन 0° से 8°C तक रहा। सबसे कम 8°C (या -8°C) दिल्ली, निकटवर्ती राजस्थान और हरियाणा की सीमा पर अंकित किये गये। दूसरी ओर सारे दक्षिणी भारत और पूर्वांचल के तापमान का विचलन 0° से 6°C के बीच अधिक (+) रहा। दक्षिणी-पूर्वी भारत में यह विचलन 2° से 4° के बीच और मद्रास एवं उसके उत्तरी तट पर 6°C (या +6°C) तक अधिक रहा। औसत समताप रेखा गुजरात से बांग्लादेश की ओर लहरदार मार्ग से चली गयी है। बर्मा के अधिकांश भाग में औसत से 0° से 6°C के बीच कम तापामन अंकित किया गया है।

(x) न्यूनतम तापमान का औसत दशा से विचलन (प्रात: 8.30 बजे):-

     दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार औसत न्यूनतम तापमान से विचलन की दशा अधिक विषम है। उत्तरी-पश्चिमी भारत में औसत 0° से 6°C (या -6°C) के बीच तापमान अंकित किये गये, जबकि निकट ही उत्तर, प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं विहार की सीमा पर तापमान औसत से 0° से 4°C (या +4°C) के बीच अधिक अंकित किये गये। देश के शेष भागों में तापमान औसत या औसत से कुछ अधिक अंकित किये गये।

    पहली औसत समताप रेखा उत्तरी-पश्चिमी भारत में कच्छ के तट से महाराष्ट्र की ओर मुड़कर पुनः कर्नाटक से उत्तर की ओर घूमती हुई पश्चिमी एवं मध्य उत्तर प्रदेश होकर जम्मू-कश्मीर तक चली गयी है। दूसरी औसत समताप रेखा मध्य नेपाल से पश्चिमी बिहार के दक्षिण से उड़ीसा होकर वहाँ से पुनः उ०-पु० बंगाल की ओर घूमती हुई हिमाचल की ओर चली गयी है। वर्मा के अधिकांश भाग और खाड़ी के द्वीपों में तापमान औसत के निकट अंकित किये गये हैं। (चित्र द०पू० लघु मानचित्र देखें)

वर्षा काल का ऋतु मानचित्र (शुक्रवार 6 जुलाई, सन् 1973; शक 15 आषाढ़ 1895)

(i) प्रारम्भिक सूचना:-

    वर्षाकाल के इस मुख्य मानचित्र पें शुक्रवार दिनांक 6 जुलाई, सन् 1973 भारतीय समयानुसार प्रातः 8.30 बजै की मौसम की वास्तविक दशा का चित्रण किया गया है। मानचित्र में गुरुवार दिनांक 5 जुलाई, सन् 1973 भारतीय समयानुसार सायं 5.30 बजे की मौसम की वास्तविक दशा को दर्शाया गया है। आगे के वर्णन एवं विश्लेषण में दोनों बड़े व चार लघु मानचित्रों के मौसम के विभिन्न तत्वों की विकसित एवं परिवर्तनशील दशाओं का भी सर्वत्र ध्यान रखा गया है।

(ii) वायुदाब व्यवस्था:-

     मुख्य मानचित्र की वायुदाब व्यवस्था वर्षा काल होने से विशेष प्रकार से विकसित है। सारे भारतीय उपमहाद्वीप की समभार रेखाएँ विकसित चक्रवातों का अनुसरण करती हैं। दक्षिणी भारत और निकटवर्ती सागरों पर समभार रेखाएँ रेखाओं 998, 996 और 994 मिलीबार का ही विस्तार है। समभार रेखाओं की सामान्य व्यवस्था भी इससे मिलती-जुलती है।

निम्न वायुदाब के केन्द्र और गर्त चक्र-

     मानचित्र में भारतीय उप-महाद्वीप में तीन वायुदाब के केन्द्र बताये गये हैं इनमें से सबसे महत्वपूर्ण पूर्वी भारत का विकसित चक्रवात (Depresion) है। यहाँ मानचित्र में D लिखा है। वृत्ताकार आकृक्ति के इस चक्रवात को 922 और 994 दो समभार रेखाएँ सभी ओर से एवं अगली चार समभार रेखा तीन ओर से घेरे हुए हैं। उपर्युक्त सभी सम्भार रेखाएँ एक-दूसरे से प्रायः समानान्तर हैं। इनकी प्रवणता पूर्व एवं दक्षिण-पूर्व की ओर अधिक तीव्र है। मानचित्र में अंकित इसी चक्रवात के अध्ययन से स्पष्ट है कि यह धीमी गति से भीतर की ओर बढ़ रहा है। इसमें गर्त चक्र या चक्रवात की भीतरी समभार रेखा 900 मिलीबर है। यह वायुदाब सामान्य से बहुत निम्न है।

    दूसरे निम्न वायुदाब केन्द्र का विकास सौराष्ट्र के निकट हुआ है, जहाँ कि 995 मिलीबार के घेरे में L (निम्न भार) लिख है। इसे एवं पूर्व के चक्रवात दोनों को ही वृहद अण्डाकार में 994 मिलीबार समभार रेखा घेरे हुए हैं। ये समतल भाग में दो गर्ती जैसी प्रतीत होती है, क्योंकि दोनों ही निम्न भार के बीच कोई भी समभार रेखा नहीं गुजरती है। इस वृहद व्यवस्था के उत्तर और दक्षिण की ओर वायुदाब बराबर बढ़ता जाता है। तीसरे निम्न वायुदाब के केन्द्र का विकास पाकिस्तान के सुदूर पश्चिम में एवं ईरान की सीमा पर हुआ है।

     ऋतु मानचित्र में कटक के निकट के चक्रवात या गर्त चक्र के अतिरिक्त राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी निम्न वायुदाब केन्द्रों का विकास हुआ है। इनमें से पूर्वी निम्न भार स्फान (wedge) की भाँति फैला हुआ है। सभी को 990 मिलीबार समभार रेखा प्रायः वृत्ताकार घेरे हुए हैं।

उच्च वायुदाब के केन्द्र:-

   ग्रीष्मकालीन वर्षाकाल के इस ऋतु मानचित्र के हिन्द महासागर या मानचित्र के सुदूर दक्षिण-पश्चिम एवं दक्षिण-पूर्व और उत्तर में कश्मीर के उत्तरी भाग में उच्च वायुदाब की दिशा का विकास बताया गया है। इसमें हिन्द महासागर में 1006 मिलीबार रेखा और कश्मीर में 1002 मिलीबार रेखा पूर्व-पश्चिम दिशा में गयी है। इस प्रकार दक्षिणी उच्च वायुदाब अधिक गहन और विकसित है। इस कारणं भी 8.30 बजे वाले ऋतु मानचित्र में दक्षिणी भारत में समभार रेखाएँ अधिक निकट हैं।

     सामान्यतः समभार रेखाओं की दिशा पूर्व-पश्चिम है, और सागर पर यह अधिक नियमित है। मध्यवर्ती और पूर्वी भारत में यह निम्न वायुदाब के केन्द्रों की ओर मुड़ गयी है। इसी कारण सुदूर पूर्व की समभार रेखाओं की दिशा उत्तर-दक्षिण हो गयी है।(iii) सामान्य वायुदाब से विचलन:-

     प्रातः 8.30 बजे के सम्बन्धित मानचित्र के अध्ययन से स्पष्ट है कि देश के उत्तरी-पश्चिमी भाग को छोड़ सर्वत्र औसत से कम वायुदाब पाया जाता है। यही नहीं कर्क रेखा में दक्षिण में यह औसत से 4 से 8 मिलीबार तक कम है। सबसे कम वायुदाब-8 मिलीबार दक्षिणी सौराष्ट्र, कोंकण के तट और निकटवर्ती सागर एवं पूर्वी भारत में उड़ीसा के तट व निकटवर्ती सागर पर पाया जाता है।

    स्पष्टतः इसका सीधा सम्बन्ध उस निम्न वायुदाब व्यवस्था से है जो कि इन केन्द्रों के निकट ही विकसित हुए हैं। औसत से 6 मिलीचार समदाब रेखा उपर्युक्त दोनों केन्द्रों पर, 8 मिलीबार समुदाब रेखा को घेरे हुए हैं। औसत वायुदाब की 0 समभार रेखा पाकिस्तान से उत्तरी राजस्थान होकर पश्चिमी भारत को घेरते हुए कश्मीर की ओर मुड़ गयी है। पूर्वी भारत में यद्यपि औसत से कुछ कम वायुदाब (-2 से 4 तक) पाया जाता है परन्तु यहाँ इसकी प्रवणता धीमी है।

(iv) वायु दिशा एवं वायु वेग:-

      सारे भारतीय उप महाद्वीप में इस समय स्पष्टतः दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी हवाएँ चल रही हैं। ये हवाएँ दक्षिणी भारत में दक्षिण-पश्चिम, उत्तरी बंगाल की खाड़ी में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व और देश के शेष भागों में पूर्व दिशा से चल रही है। पश्चिमी तट एवं बंगाल की खाड़ी के तट पर इन हवाओं का वेग देश के अन्य भागों की तुलना में अधिक है।

    यहाँ हवा की गति 10 से 30 नॉट के बीच है। 30 नॉट की गति मार्मा गोआ और पूना के निकट अंकित की गयी है। देश के शेष भागों में वायु वेग सामान्यतः 0 से 10 नॉट प्रति घण्टा के बीच है। अधिकांश भागों में वायु वेग 5 नॉट से भी कम अंकित किया गया है। ऋतु मानचित्र में सर्वाधिक वायु वेग उत्तरी लक्षद्वीप में 40 नॉट प्रति घण्टा विशेष उल्लेखनीय है।

    पूर्वी भारत के चक्रवात के कारण यहाँ वायु दिशा औसत दिशा से भिन्न है और स्थानीय रूप से प्रभवित हुई है।

(v) 1.5 कि० मी० की ऊँचाई पर वायु की स्थिति:-

    इस ऊँचाई पर देश के अधिकांश विक्षोभ मण्डल में वायु तीव्र गति से चल रही है। दक्षिणी भारत में इसकी गति 30 से 70 नॉट है जबकि पूर्वी भारत में 10 से 30 नॉट एवं सबसे धीमी गति उत्तरी-पश्चिमी भारत में 5 से 15 नॉट के बीच है।

    सबसे तेज गति से वायु मछलीपट्टनम (आंध्र प्रदेश) में 70 नॉट एवं दक्षिणी लक्षद्वीप में 65 नॉट प्रति घण्टा अंकित की गयी है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस ऊँचाई पर भी वायु की दशा सर्वत्र दक्षिण-पश्चिमी मानसून हवाओं के अनुसार ही है।

(vi) आकाशीय दशा एवं मेघाच्छन्नता:-

    वर्षाकाल होने से देश के सभी भागों में मेघ छाये हुए हैं। कोटा, डाल्टेनगंज, लखनऊ और तेजपुर ही अपवाद स्वरूप ऐसे मौसम केन्द्र हैं, जहाँ कि मेघाच्छन्न 1/8 से कम है। सर्वाधिक मेघाच्छन्नता दक्षिणी भारत में पायी जाती है।

    यहाँ के अधिकांश केन्द्र पूर्ण मेघाच्छादित बताये गये हैं। इनमें से अधिकांश केन्द्रों पर या तो वर्षा हो रही है या पिछले 24 घण्टों में वर्षा हुई है। शेष भारत में मेघाच्छन्नता अनिश्चित है। 7/8 या अधिक मेघाच्छन्नता पश्चिमी भारत में उदयपुर, जोधपुर, बाड़मेर, जयपुर, देहरादून, शिमला एवं गंगा के डेल्टा, उड़ीसा और खाड़ी के द्वीपों में दर्शायी गयी है।

    सारे ऋतु मानचित्र में एक भी केन्द्र ऐसा नहीं है जहाँ कि आकाशीय दशा अनिश्चित बतायी गयी हो। पूर्व दिन की संध्या के मानचित्र में भी मेघाच्छन्नता प्रायः इसी भाँति ही है।

(vii) वर्षा और भूतल पर आर्द्रता के विभिन्न रूप:-

     वर्षा काल, अधिक मेघाच्छन्नता और चक्रवात सभी व्यापक वर्षा के लिए अनुकूल दशाएँ उत्पन्न करते हैं। ऋतु मानचित्र में पिछले 24 घण्टों में दूर-दूर तक वर्षा हुई भी है। वर्षा की मात्रा प्रत्येक केन्द्र के वृत्त के दक्षिण-पूर्व दिशा में अंकित की गई है। सर्वाधिक वर्षा पश्चिमी तट पर हुई है। यहाँ पिछले 24 घण्टों में पूना में 18, कोलावा में 16, होनावर में 14, रत्नागिरी और कोल्हापुर में 11-11, मंगलौर एवं मुम्बई में 9.9 और शेष स्थानों पर 3 से 8 सें० मी० के बीच वर्षा ऑकत की गयी है।

    मुख्य पठार पर नागपुर में 9 से० मी० और शेष भागों में 25 से 3 से० मी० के बीच, बंगाल की खाड़ी के उत्तरी तट पर 1 से 3 से० मी० के बीच, खाड़ी के द्वीपों में क्रमशः 7 से 11 से० मी० और उत्तरी लक्षद्वीप में 3 से० मी० वर्षा अंकित की गयी। इस मानचित्र में उत्तरी एवं उत्तरी-पश्चिमी भारत में वर्षा प्रायः नहीं के बराबर हुई है। यहाँ सबसे अधिक वर्षा झालावाड़ में 3 से० मी०, उदयपुर और जोधपुर में 1-1 से० मी० अंकित की गयी।

    वर्तमान में (6 जुलाई, 1973) को प्रातः 8.30 बजे) सारे पश्चिमी तट पर एवं खाड़ी द्वीपों में दूर-दूर तक वर्षा हो रही है। मुख्य पठार और उत्तरी बंगाल की खाड़ी में कहीं-कहीं वर्षा और बौछारें हो रही हैं, देश के शेष भागों में इस समय वर्षा प्रायः नहीं हो रही है।

(viii) समुद्र की दशा:-

     बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में समभार रेखाएँ पास-पास होने से यहाँ तेज पवन चल रही है। सागर में सभी स्थानों पर 20 से 25 नॉट के बीच पवन बह रहा है अतः सामान्य सागर की दशा भी प्रतिकूल है।

    अरब सागर में अशान्त (Rough) और बंगाल की खाड़ी में अति अशान्त (V. Rough) से उत्तंग तगत (V. High) के बीच सागर दशा अंकित की गयी है। यद्यपि अरब सागर में केवल एक स्थान पर और बंगाल की खाड़ी में दो स्थानों पर ही सागर की दशा अंकित की गयी है। परन्तु इसमें ही सागर की दशा का स्पष्ट आभास हो जाता है।

(ix) अधिकतम तापमान का सामान्य दशा से विचलन (सायं 5.30 बजे):-

     दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार अधिकांश दक्षिणी और उत्तरी-पश्चिमी भारत में अधिकतम तापमान औसत से कम अंकित किये गये। सबसे कम -4°C उत्तरी आन्ध्र प्रदेश, पश्चिमी कश्मीर और निकटवर्ती पाकिस्तान में अंकित किये गये। औसत से अधिक तापमान +4°C हाड़ौती (राजस्थान) और मालवा (मध्य प्रदेश) एवं उत्तरी-पूर्वी उत्तर प्रदेश में अंकित किये गये।

    अधिकतम औसत या 0°C विचलन वाली समताप रेखा देश की तीन स्थानों से होकर गुजरती है। पहली दक्षिणी-पश्चिमी कर्नाटक से केरल होती हुई श्रीलंका की तरफ चली गयी है। दूसरी सौराष्ट्र, पूर्वी गुजरात, उत्तरी महाराष्ट्र, उत्तरी-पूर्वी मध्य प्रदेश, उड़ीसा और दक्षिणी-पश्चिमी बंगाल होती हुई खाड़ी की ओर मुड़ गयी है और तीसरी पाकिस्तान से पश्चिमी व उत्तरी राजस्थान की सीमा से पूर्व की ओर मुड़कर पश्चिम उत्तर प्रदेश से हिमालय की ओर मुड़ गयी है। इस प्रकार औसत अधिकतम तापमान की दशा इस समय प्रायः विषम है।

(x) न्यूनतम तापमान का औसत दशा से विचलन (प्राय: 8.30 बजे):-

     दक्षिण-पश्चिम के लघु मानचित्र के अनुसार देश के अधिकांश मध्यवर्ती, उत्तरी-पूर्वी और सुदूर पूर्वी भागों में न्यूनतम तापमान औसत से अधिक से अधिक और शेष दक्षिण पठार और उत्तरी-पश्चिम भारत में औसत से कम तापमान अंकित किये गये हैं।

     औसत दशा से कहीं भी +2°℃ या -2°C से अधिक का विचलन नहीं पाया जाता। अधिकांश दक्षिणी पठार और मध्यवर्ती भारत में यह विचलन इससे भी कम है। औसत तापमान रेखा पूर्ण रुप से मार्ग से प्रथम उत्तर से दक्षिण की ओर जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र होकर पुनः उत्तर-पूर्व की ओर कर्नाटक, महाराष्ट्र, पूर्वी मध्य प्रदेश, उड़ीसा, उत्तरी बंगाल व बंग्लादेश होती हुई सुदू पूर्व की ओ चली गयी है।

I ‘Dr. Amar Kumar’ am working as an Assistant Professor in The Department Of Geography in PPU, Patna (Bihar) India. I want to help the students and study lovers across the world who face difficulties to gather the information and knowledge about Geography. I think my latest UNIQUE GEOGRAPHY NOTES are more useful for them and I publish all types of notes regularly.

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