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ECONOMIC GEOGRAPHY(आर्थिक भूगोल)

5.The Importance of Water Resources, Sources, Uses and Conservation (जल संसाधन के महत्त्व, वितरण, उपयोगिता एवं संरक्षण)

5. The Importance of Water Resources, Sources, Uses and Conservation

(जल संसाधन के महत्त्व, स्रोत, उपयोगिता एवं संरक्षण)



Importance of Water

जल संसाधन के महत्त्व

          प्राकृतिक संसाधनों में जल एक ऐसा आधारभूत संसाधन है, जिसके बिना पृथ्वी तल पर जीवन की कल्पना ही असंभव है। मनुष्य, पेड़-पौधे और जीव-जन्तु सभी के लिए जल जीवन का आधार है। पृथ्वी तल पर जल की उपस्थिति के बाद ही जीवन की कल्पना की गई है। जल की उपलब्धता और उसके उपयोग की सुविधा मानव के सांस्कृतिक विकास में सहायक तत्व रहे हैं।

       जल की अधिकता या न्यूनता की तुलना में उसकी सामान्यता और सहज उपलब्धता अधिक आकर्षक रहे हैं। यही कारण है कि नदियों की घाटियों में जहाँ सहजता के साथ जल उपलब्ध था और प्राकृतिक सुविधाएँ प्राप्त थीं, आदि मानव बसने हेतु आकर्षित हुआ, जिससे कुछ घाटियाँ सांस्कृतिक क्रोड़ बन गई। यहाँ सिंचाई, पेय, आखेट और परिवहन के लिए जल संसाधन का प्रथम उपयोग हुआ।

      स्पष्ट है कि जल संसाधन के कारण कृषि, व्यापार और बड़े अधिवासों का विकास सबसे पहले नदी घाटियों में प्रारंभ हुआ। जल संसाधन की सुलभता के कारण समुद्र तटीय क्षेत्र भी आकर्षक रहे। नौका परिवहन का विकास वृहद् व्यापारिक शृंखला का कारण बना। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक जल परिवहन सबसे सस्ता साधन है। समुद्री मार्गों की सुलभता अनेक यूरोपीय देशों की महानता का कारण बताया जाता है।

     नीदरलैण्ड, पुर्तगाल, ब्रिटेन जैसे छोटे देशों के नाविक जल यातायात के माध्यम से विश्व के बड़े और शक्तिशाली देशों पर कब्जा जमाने में सफल हो गये, जबकि स्थल मार्ग से चलने के कारण सिकन्दर अपनी विशाल सेना के बावजूद ऐसी विजय पाने में असफल रहा। आज जल यातायात की सुविधा वाले देश विश्व व्यापार में अग्रणी बन गये हैं, क्योंकि जिस मात्रा में आज का जलयान माल की ढुलाई करता है वैसा किसी अन्य साधन से संभव नहीं है।

            जल संसाधन का उपयोग मत्स्य उत्पादन के दृष्टिकोण से भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जल स्रोतों का उपयोग सिंचाई एवं विद्युत उत्पादन के लिए करके मानव समुदाय ने क्रान्तिकारी कृषि और औद्योगिक विकास किया है। इन सभी लाभों की गिनती में जलीय वनस्पतियों द्वारा अपार ऑक्सीजन गैस का उत्पादन शायद सबसे महत्वपूर्ण है। पारिस्थितिकी के निर्माण में जल की भूमिका का अनुमान मात्र इस बात से लगाया जा सकता है कि मध्य एशिया में जलाभाव के कारण अदिमानव को बाध्य होकर प्रव्रजित होना पड़ा जो मानव प्रजातियों के उद्भव का कारण बना। आज भी जलाभाव के कारण पृथ्वी का आधे से अधिक भाग मानव के लिए अनाकर्षक है।

        आधुनिक मानव समाज अपने अनेक क्रियाकलापों के लिए जल संसाधन का उपयोग पहले से कहीं अधिक करने लगा है और कुछ देशों में तो जल प्रबंधन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है, और कुछ क्षेत्रों में जल दोहन को लेकर तनाव पैदा हो गया है।

           आधुनिक समाज में तकनीकी विकास के कारण जल संसाधन का प्रचुर उपयोग सिंचाई, जल-विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन, जल यातायात आदि के लिए किया जा रहा है। जिन क्षेत्रों में वर्षा जल की कमी है, वहाँ धरातलीय और भूमिगत जल के उपयोग से कृषि का अभूतपूर्व विकास किया गया है। पंजाब एवं हरियाणा अपने सिंचित क्षेत्रों के कारण सबसे सम्पन्न राज्य बन गये हैं, जबकि पड़ोसी राजस्थान जलाभाव के कारण अब भी विपन्न बना हुआ है।

       इसी प्रकार दक्षिणी साइबेरिया में सिंचित क्षमता के विकास के कारण उस क्षेत्र का काया पलट हो गया है। अनेक नगरीय और औद्योगिक केन्द्र जल संसाधन की कमी के कारण समस्याग्रस्त हो गये हैं। स्पष्ट है कि जल संसाधन का समुचित उपयोग मानव समाज की प्रगति का महत्त्वपूर्ण कारक रहा है।

          इस प्रकार कहा जा सकता है कि जल संसाधन मानव जीवन के लिए एक आधारभूत संसाधन है। जहाँ इसकी कमी है वहाँ मानव जीवन संकटमय बनता जा रहा है। कुछ क्षेत्रों में पेय जल के संकट को हल करने के लिए समुद्र के खारे जल को साफ करने की तकनीक अपनाई जा रही है।

जल संसाधन के स्रोत एवं उपयोग (The Sources and Uses of  Water Resources)

       एक आंकलन के अनुसार पृथ्वी के समस्त जल भण्डार का 97.2 प्रतिशत समुद्रों, 2.15 प्रतिशत हिम सरिताओं, 0.62 प्रतिशत भूमिगत भण्डारों, 0.02 प्रतिशत धरातलीय स्रोतों और अवशेष नमी और आर्द्रता के रूप में पाया जाता है। प्राकृतिक संसाधन के रूप में धरातलीय जल भण्डार, भूमिगत जल भंडार और सागरीय जल का अधिक महत्व है। आर्थिक और मानवीय महत्त्व के दृष्टिकोण से धरातलीय और भूमिगत जल सर्वोपरि है।

         धरातलीय जल और भूमिगत जल वर्षा पर आधारित होता है। जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है वहाँ इसका कुप्रभाव देखा जाता है जिसके कारण जल प्रबंधन की नितान्त आवश्यकता पड़ती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल निरर्थक प्रवाहित होता है। जल का सबसे बड़ा भंडार समुद्रों में है लेकिन उसका जल खारा होने के कारण मानव के कुछ ही कामों के लिए प्रयुक्त हो पाता है। फिर भी इस भंडार से बनने वाली वाष्प और बादल धरातलीय जल को जन्म देते हैं, जो वर्षा तथा हिमपात के रूप में उसकी प्राप्ति होती है।

        पृथ्वी का लगभग दो तिहाई क्षेत्र समुद्री जल से घिरा है जबकि विश्व के विशाल मरूस्थल जल के अभाव में प्रायः मानव विहीन है। सउदी अरब, कुवैत, ईरान, इराक, जैसे देश हिमशिलाओं को पिघला कर पेय जल प्राप्त कर रहे हैं। इस प्रकार जल संसाधन का क्षेत्रीय स्वरूप बिल्कुल असमान है। विषुवत रेखीय क्षेत्रों में जल की प्रचुरता है तो मरुस्थलीय प्रदेशों में जलाभाव है। वर्षा जल का ठहराव भी जल संसाधन की उपलब्धता का एक प्रमुख पक्ष है। तीव्र ढाल वाले धरातल पर वर्षा होते ही जल बहकर अन्यत्र चला जाता है।

           वर्षा जल का ह्यास, वाष्पीकरण और जल के भूमिगत होने के कारण जल संसाधन की क्षेत्रीय विभिन्नता स्वाभाविक है। विश्व के लगभग एक चौथाई क्षेत्रफल पर न्यूनतम वर्षा होती है जिसका वार्षिक औसत 20 से.मी. से कम है, जैसे- उष्ण मरुस्थलों में पृथ्वी के धरातल के लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्र पर 25-50 से.मी. वर्षा होती है जिसे अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश कहते है।

      इस प्रकार पृथ्वी के धरातल के आधे से अधिक क्षेत्रफल पर औसत वर्षा होती है (50- 150से.मी.) जबकि शेष 15 प्रतिशत क्षेत्रफल अधिक वर्षा प्राप्त करता है। उपरोक्त सर्वेक्षण से स्पष्ट है कि पृथ्वी का अधिकांश धरातल वर्षा की कमी अथवा अधिकता के कारण जल संसाधन के दृष्टिकोण से असंतुलित है।

          जल संसाधन का उपयोग जल संसाधन का उपयोग मानव समाज विविध कार्यों क लिए करता है। धरातलीय जल नदियों, झीलों और तालाबों में संचित होता है जो प्रधानत: सिंचाई जल विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन, परिवहन, उद्योग, पेय और मनोरंजन के लिए, उपयोग किया जाता हैं। मानव के सांस्कृतिक विकास को धरातलीय जल ने सबसे अधिक प्रभावित किया है। आज भी इसकी महत्ता बनी हुई है।

         भूमिगत जल का उपयोग मुख्यत: पेय, सिंचाई और औद्योगिक कार्यों के लिए किया जाता है। सागरीय जल का उपयोग प्रधानतः परिवहन, मत्स्य पालन और नमक प्राप्ति के लिये किया जाता है। नये खोजों से समुद्री जल के विविध उपयोग बढ़ने की संभावना है।

         वैज्ञानिकों का अनुमान है कि समुद्र से भविष्य में मैगनीज, कोबाल्ट, ताँबा, ब्रोमाइड, मैगनीशियम, आयोडीन आदि की प्राप्ति की जा सकती है। इसमें सन्देह नहीं कि नयी तकनीकों के विकास के बल पर मानव सामुद्रिक जल का और अधिक उपयोग कर सकता है।

जल संसाधन के संरक्षण (The Conservation of  Water Resources)

जल अत्याधिक उपयोगी संसाधन है। इसके विविध उपयोग हैं, परन्तु यह सर्वत्र सुलभ या प्रचुर नहीं है। फलतः जल संसाधन संरक्षण की अनिवार्य आवश्यकता है। जिस तरह इसके विभिन्न उपयोग हैं उसी तरह इसका संरक्षण भी विविध रूपों में किया जाना चाहिए।

(i) धरातलीय जल मानव जीवन के लिए अधिक महत्वपूर्ण है, जो वर्षा द्वारा प्राप्त होता है। अतः वर्षा जल को उचित रूप में संग्रह करना और इस जल का अधिकतम उपयोग संरक्षण का मूल मंत्र है। उपयोग में आने वाला जल सदैव समुद्र की ओर जाने को उन्मुख रहता है, अतएव जल के अपवाह को नियमित करना, उसको संचय करना, सतह का निश्चित भंडार बनाना, नदियों पर बाँध बनाकर प्रवाह को नियमित करना, बाढ़ रोकना आदि कार्यों से इसकी उपयोगिता में वृद्धि होती है।

(ii) जल का सदुपयोग भी जल संरक्षण का प्रमुख पक्ष है। अतः घरेलू औद्योगिक तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जल का सदुपयोग करके, दुरुपयोग को कम किया जा सकता है।

(iii) भूमिगत जल जो कि प्रधानतः संरक्षित जल है, का अत्यधिक शोषण भूमिगत जल के स्तर को नीचा कर देता है। भूमिगत जल की मात्रा क्षेत्र विशेष में सीमित होती है, इसलिये अत्यधिक दोहन से यह भी समाप्त हो सकता है।

         अतः कुओं तथा नलरूपों में जितनी मात्रा भूमिगत जल की बाहर निकलती है, उतनी मात्रा भूमिगत जल की बाहर निकलती है, उतनी आपूर्ति भी होती रहनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि भूमिगत जल के अत्यधिक शोषण को रोकने की व्यवस्था की जाये तथा जमीन के अंदर अत्यधिक जल प्रवेश हेतु वन तथा मिट्टी से संबंधित तत्त्वों की सुरक्षा की जाये। इसके अतिरिक्त भूगर्भ जलाशयों के निर्माण की नव तकनीक का विकास करके प्रेरित अन्तः स्रवण द्वारा भूमि जल संचय को बढ़ाया जा सकता है।

(iv) जल को शुद्ध रखना भी जल संरक्षण की प्राथमिक आवश्यकता है। दीर्घकाल से सीवर, उद्योगों, गैस प्लांटों, शोधन शालाओं तथा खानों आदि के विषैले रसायन, हानिकारक पदार्थ और गन्दा जल नदियों और झीलों में गिराये जाने से स्वच्छ जल की प्राप्ति कठिन हो गयी है तथा प्रदूषित जल से मानव एवं पौधों सहित समस्त जन्तु समुदाय को अकथनीय और असाध्य क्षति का सामना करना पड़ता है।

      अतएव सभी प्रकार की औद्योगिक इकाइयों को इस बात के लिए मजबूर किया जाना चाहिए कि वे कारखानों एवं खदानों से निकलने वाले अपशिष्टों एवं मल-जल को बिना शोधित किए नदियों, झीलों या तालाबों में विसर्जित न करें।

      नगरपालिकाओं द्वारा सीवर शोधन संयन्त्रों की व्यवथा की जाये तथा इस प्रकार की तकनीक का विकास किया जाये कि उत्पादकता को प्रभावित किए बिना जल के उपयोग को कम किया जा सके। इससे गन्दे पानी के बहाव की समस्या अवश्य कम होगी। जिससे प्रदूषित जल का प्रयोग कम मात्रा में संभव हो सकेगा।

(v) भू-तापीय जल (एक प्रकार का भूमिगत जल जो काफी गहराई में होता है) का भी प्रयोग किया जाये।

(vi) जिन क्षेत्रों में मीठे जल का अभाव है, वहाँ समुद्री जल के निर्लवणीयकरण की तकनीक विकसित करके मीठे जल की कमी दूर की जा सकती है। कुवैत ने इस दिशा में एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है।

(vii) जल संरक्षण के लिये जनजागरुकता सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है। समाज को सचेत करने के लिये जनजागरण अभियान चलाना सामयिक आवश्यकता है। इससे जहाँ एक ओर जल के संतुलित उपयोग की आदत विकसित होगी, वहीं दूसरी ओ जल के दुरुपयोग की आदत में सुधा होगा।

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I ‘Dr. Amar Kumar’ am working as an Assistant Professor in The Department Of Geography in PPU, Patna (Bihar) India. I want to help the students and study lovers across the world who face difficulties to gather the information and knowledge about Geography. I think my latest UNIQUE GEOGRAPHY NOTES are more useful for them and I publish all types of notes regularly.

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