22. Primary, Secondary, Tertiary and Quaternary Economic Activities of Humans (मानव के प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुर्थक व्यवसाय)

Primary, Secondary, Tertiary and Quaternary Economic Activities of Humans

(मानव के प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुर्थक आर्थिक गतिविधियाँ)



Q. मानव के प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुर्थक आर्थिक गतिविधियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- मानव अपनी मूलभूत और उच्चतर आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ करता है। इन क्रियाओं द्वारा मानव की आर्थिक प्रगति होती है। मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। चूंकि पृथ्वी सतह पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण में क्षेत्रीय विभिन्नता विद्यमान है, अतः मानव की आर्थिक क्रियाओं में भी क्षेत्रीय विभिन्नता पाई जाती है।

     उदाहरण के लिए वनों में मानव एकत्रीकरण या संग्रहण, आखेट एवं लकड़ी काटने जैसे आर्थिक क्रियाएँ सम्पन्न करता है तो घास के मैदानों में पशुचारण, उपजाऊ समतल मैदानी भागों में कृषि, खनिजों की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में खनन, जल की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में मत्स्याखेट जैसी आर्थिक क्रियाएँ करता है। साथ ही अनुकूल अवस्थिति वाले क्षेत्रों में विनिर्माण उद्योगों, परिवहन, व्यापार एवं सेवाओं से सम्बन्धित आर्थिक गतिविधियों में भी संलग्न रहता है।

     मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं या गतिविधियों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, यद्यपि ये चारों वर्ग एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं:

1. प्राथमिक व्यवसाय (Primary Occupation):-

       प्राथमिक व्यवसाय पूर्णतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं। प्राथमिक व्यवसायों के संचालन हेतु अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती है। वनों से संग्रहण, आखेट, लकड़ी काटना घास के मैदानों में पशु चराना, पशुओं से दूध, मांस, खालें, आदि प्राप्त करना, समुद्रों, नदियों एवं झीलों से मछली पकड़ना, कृषि तथा खानों से खनिज निकालना, आदि प्रमुख प्राथमिक व्यवसाय हैं।

     विश्व के विकासशील देशों में कार्यशील जनसंख्या का अधिकांश भाग प्राथमिक व्यवसायों में लगा हुआ है और विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग तृतीयक एवं चतुर्थक व्यवसायों में कार्यरत है।

  भारत में 60 प्रतिशत, चीन में 50 प्रतिशत, इथोपिया में 80 प्रतिशत, नाइजीरिया में 70 प्रतिशत जनसंख्या प्राथमिक व्यवसायों में लगी हुई है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 8 प्रतिशत, ग्रेट ब्रिटेन में 1 प्रतिशत, जापान में 5 प्रतिशत जनसंख्या ही प्राथमिक व्यवसायों में संलग्न है।

2. द्वितीयक व्यवसाय (Secondary Occupation):-

    द्वितीयक या गौण व्यवसाय में वे सभी प्रकार के विनिर्माण उद्योग सम्मिलित किए जाते हैं जो प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, पशुपालन, मत्स्य संग्रहण, लकड़ी काटना, आदि से प्राप्त उत्पादों को कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त कर मशीनी प्रक्रिया द्वारा उसे तैयार माल में बदलते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा गौण व्यवसाय कच्चे माल के स्वरूप में परिवर्तन करते हैं, उसके मूल्य में वृद्धि करते हैं और उसकी उपयोगिता को बढ़ा देते हैं।

     उदाहरण के लिए कृषि से प्राप्त गन्ना गौण व्यवसाय के लिए कच्चा माल है, मशीनी प्रक्रिया द्वारा गन्ने से चीनी बनाई जाती है। इस प्रकार गन्ने का स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है, गन्ने से शक्कर बनने पर उसके मूल्य और उपयोगिता में वृद्धि हो जाती है।

     इसी प्रकार लौह अयस्क का खनन प्राथमिक व्यवसाय है, लेकिन लोहा-इस्पात का निर्माण गौण व्यवसाय है। विभिन्न प्रकार के उद्योग एक-दूसरे के निकट स्थापित हो जाते हैं, क्योंकि एक उद्योग का तैयार माल दूसरे उद्योग के लिए कच्चा माल हो सकता है। उदाहरण के लिए लौह इस्पात उद्योग अनेक प्रकार के इंजीनियरिंग उद्योगों को विकसित कर सकता है।

     उद्योगों का विकास कच्चे माल, शक्ति, श्रमिक, पूंजी और तैयार माल के लिए बाजार की उपलब्धि पर निर्भर है। इन कारकों के अलावा परिवहन और संचार की सुविधाएं, कच्चे माल और शक्ति का लागत मूल्य, श्रमिकों का वेतन तथा तैयार माल का लागत मूल्य भी उद्योगों की स्थापना और विकास में महत्वपूर्ण आर्थिक कारक है।

     किसी देश में गौण व्यवसायों में कितनी विविधता है तथा उन व्यवसायों में कितने लोग काम करते हैं, यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश में औद्योगिक विकास कितना हुआ है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, जर्मनी, फ्रांस, इटली, ग्रेट ब्रिटेन, जापान, कनाडा, आस्ट्रेलिया, आदि देशों में प्राथमिक व्यवसायों की तुलना में गौण व्यवसायों में अधिक लोग काम करते हैं।

     उद्योगों में कार्यरत लोगों की संख्या, उपयोग में आने वाली यान्त्रिक शक्ति तथा निर्मित उत्पादों के मूल्य के आधार पर उद्योग तीन प्रकार के होते हैं यथा- वृहत् उद्योग, लघु उद्योग और कुटीर उद्योग।

     दस्तकार स्थानीय पदार्थों का उपयोग करके दस्तकारी की वस्तुएं बनाते हैं। हथकरघा, बुनकर, टोकरी बनाने वाले, कालीन बनाने वाले, आदि गौण व्यवसायों में लगे हैं। इन गौण व्यवसायों को कुटीर उद्योग कहते हैं। कुटीर उद्योग की प्रत्येक इकाई में लोग कम संख्या में काम करते हैं और इनमें यांत्रिक शक्ति का प्रयोग नहीं होता है।

    लघु उद्योग यांत्रिक शक्ति का उपयोग करते हैं। ये उद्योग बड़े उद्योगों के लिए पुर्जे भी बनाने हैं। इलेक्ट्रोनिक वस्तुएं बनाने वाली औद्योगिक इकाइयां जैसे- रेडियो, टी. वी. सेट, प्लास्टिक की वस्तुएं, सामान्यतः लघु उद्योगों की श्रेणी में आते हैं।

Tertiary and Quaternary Economic

प्लास्टिक की वस्तुएं

     वृहत् उद्योगों में सैकड़ों लोग काम करते हैं और इनमें करोड़ों रुपए की पूंजी लगी हुई होती है। इनमें से कुछ उद्योग जैसे मोटर कार उद्योग या दुपहिया वाहन उद्योग अधिक उत्पादन के लिए एसेम्बली लाइन तकनीक का उपयोग करते हैं। एसेम्बली लाइन में अलग-अलग स्थानों पर कच्चे पदार्थ तथा विविध पुर्जों को जोड़ने का कार्य होता है।

     एसेम्बली लाइन पर जैसे-जैसे निर्माणाधीन वस्तु आगे सरकती है, प्रत्येक श्रमिक कोई निश्चित काम करता है, फिर दूसरी निर्माणाधीन वस्तु में वह वही काम करता है। इस तरह अन्त तक पहुंचते-पहुंचते वस्तु का निर्माण पूरा हो जाता है और इस प्रकार एसेम्बली लाइन में से निर्मित वस्तु बाहर निकलती है। इस विधि में प्रत्येक श्रमिक किसी एक काम में विशेष दक्ष होता है, जिसे वह बार-बार दोहराता है। निर्माण उद्योगों के परिणामस्वरूप प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, मत्स्य ग्रहण, आदि में भी मशीनों का खूब प्रयोग होने लगा है।

3. तृतीयक व्यवसाय (Tertiary Occupation):-

      तृतीयक व्यवसायों में समाज को दी जाने वाली व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक सेवाएं सम्मिलित हैं। इस व्यवसाय को सेवा श्रेणी भी कहा जाता है। सामान्यतः विकास की प्रक्रिया का एक निश्चित क्रम होता है। प्रारम्भ में प्राथमिक व्यवसायों की प्रधानता होती है। इसके बाद गौण व्यवसायों का महत्व बढ़ता है तथा अन्त में तृतीयक और चतुर्थक व्यवसाय महत्वपूर्ण बन जाते हैं।

    तृतीयक व्यवसायों के अन्तर्गत समाज को प्रदान की जाने वाली सेवाओं में रेल, सडक, जहाज, वायुयान, सेवाएं, डाक-तार सेवाएं, दूरदर्शन, रेडियो, फिल्म, साहित्य, कानूनी सेवाएं, जनसम्पर्क और परामर्श, विज्ञापन, वित्त, बीमा, थोक और फुटकर व्यापार, मरम्मत के कार्य जैसी सेवाएं, स्थानीय, राज्यीय, राष्ट्रीय प्रशासन, पुलिस, सेना और अन्य जन सेवाएं तथा गैर सरकारी संगठनों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएं उल्लेखनीय हैं।

     उद्योगों के विकास के साथ-साथ नगरीय जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की सेवाओं की मांग में भी वृद्धि हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में नगरीय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक संख्या में लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं।

     विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग सेवाओं में लगा हुआ है। उदाहरण के लिए जापान में 70 प्रतिशत, आस्ट्रेलिया में 73 प्रतिशत, कनाडा में 74 प्रतिशत, जर्मनी में 64 प्रतिशत कार्यशील लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं जबकि भारत में 23 प्रतिशत और चीन में 28 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या ही तृतीयक व्यवसायों में लगी हुई है।

    विकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय के बढ़ने से विभिन्न प्रकार की सेवाओं विशेषकर मनोरंजन, परिवहन और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्राथमिक एवं गौण व्यवसायों में काम करने वाले लोगों की भांति तृतीयक व्यवसायों में सेवारत लोगों के कार्य भी महत्वपूर्ण हैं। प्राथमिक और गौण व्यवसायों में लगे लोग, समाज के लिए आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करते हैं और तृतीयक व्यवसायी समाज को विभिन्न सेवाएं प्रदान करते हैं।

4. चतुर्थक व्यवसाय (Quaternary Occupation):-

       वर्तमान समय में मानव के आर्थिक क्रियाकलाप दिनोंदिन बहुत ही विशिष्ट और जटिल होते जा रहे हैं। फलतः मानव की कानून, वित्त, शिक्षा, शोध और संचार से जुड़ी उन आर्थिक गतिविधियों को जो सूचना (information), सूचना के संग्रहण, (Acquisition), सूचना के संसाधन, (Manipulation) और सूचना के प्रसारण (Transmission) से सम्बन्धित है, को चतुर्थक व्यवसाय के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है।

    वर्तमान में विश्व के लगभग सभी देशों में और विशेषकर विकसित देशों में चतुर्थक व्यवसाय में संलग्न लोगों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। इस व्यवसाय के लोगों में उच्च वेतनमान और पदोन्नति की चाह में गतिशीलता अधिक पाई जाती है।

    कम्प्यूटर के बढ़ते प्रयोग और सूचना प्रौद्योगिकी ने इस व्यवसाय के महत्व को बहुत बढ़ा दिया है। परिणामस्वरूप औद्योगिक समाज के तकनीकी तत्वों में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ गया है और वर्तमान आर्थिक क्रियाकलाप मुख्य रूप से उन अप्रत्यक्ष उत्पादों से प्रभावित हो गए हैं जिनके उत्पादन में ज्ञान, सूचना और संचा अधिक महत्वपूर्ण है।

20. Meaning and Scope of Economic Geography (आर्थिक भूगोल का अर्थ एवं विषय-क्षेत्र)

Meaning and Scope of Economic Geography

(आर्थिक भूगोल का अर्थ एवं विषय-क्षेत्र)



प्रश्न प्रारूप

Q. आर्थिक भूगोल को परिभाषित करते हुए इसके विषय-क्षेत्र एवं नूतन प्रवृतियों की विवेचना कीजिए।

Meaning and Scope of Economic

उत्तर- पृथ्वी मानव का घर है और मानव व पृथ्वी तल दोनों ही तथ्य अस्थिर एवं परिवर्तनशील हैं। पृथ्वी की भौतिक परिस्थितियों और मानव के कार्य-कलापों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा के जन्मदाता गोट्ज (1882) थे। इसके अध्ययन में हम मानव की आर्थिक क्रियाओं का ही अध्ययन करते हैं। मानव की आकांक्षाएं एवं आवश्यकताएं अत्यधिक असीमित और विविध हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव अनेक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा जिन वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर सकता उनका क्रय करता है तथा अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं से उनका विनिमय करता है।

       प्रो. मेकफरलेन के अनुसार आर्थिक भूगोल के अध्ययन में हम मानव के आर्थिक प्रयत्नों पर भौगोलिक तथा भौतिक पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।

      प्रो. जी. चिशौल्म के अनुसार आर्थिक भूगोल में हम उन भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं जो वस्तुओं के उत्पादन, परिवहन तथा विनिमय को प्रभावित करती हैं।   

        इस अध्ययन के माध्यम से किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र के भावी आर्थिक और व्यापारिक क्रियाओं पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों के अध्ययन का सम्मिलित प्रभाव भी जाना जाता है।

      सुप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हंटिंगटन जीविकोपार्जन प्रदान करने वाले सभी प्रकार के पदार्थों, साधनों, क्रियाओं, रीति-रिवाजों तथा मानव शक्तियों का अध्ययन आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मानते हैं।

       प्रो. शॉ के अनुसार मानव की आर्थिक क्रियाएं विश्व के उद्योगो, संसाधनों तथा औद्योगिक उत्पादन के अनुरूप होती हैं।

       इसी प्रकार डॉ. एन. जी. जे. पाउण्ड्स के अनुसार आर्थिक भूगोल भू-पृष्ठ पर मानव की उत्पादन क्रियाओं के वितरण का अध्ययन है।

      प्रो. रैयन तथा बैगस्टन के शब्दों में आर्थिक भूगोल के अध्ययन में विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में मिलने वाले आधारभूत संसाधन एवं स्रोतों का अध्ययन किया जाता है। इन स्रोतों के शोषण पर पड़ने वाली भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव की विवेचना की जाती है। विभिन्न प्रदेशों के आर्थिक विकास के अन्तर की व्याख्या की जाती है।

       भूगोल की अन्य शाखाओं की भांति आर्थिक भूगोल की विषय-वस्तु एवं विषय-क्षेत्र पर भूगोलवेत्ताओं के विचारों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कुछ विद्वान मानव के भौतिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के अध्ययन को अधिक महत्व देते हैं, तो कुछ मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा जीविकोपार्जन के अनेकानेक साधनों के अध्ययन को मुख्य मानते हैं। संक्षेप में विश्व के विभिन्न भागों में मिलने वाले खनिज, कृषि, औद्योगिक साधनों का उत्पादन, उपभोग, वितरण, परिवहन तथा व्यापारिक अध्ययन आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

         वर्तमान में मानव ने विज्ञान और तकनीक की सहायता से आशानुरूप विकास कर लिया है। मानव ने अपने आर्थिक क्षेत्र का विस्तार, समुद्र, भू-गर्भ और अन्तरिक्ष तक कर लिया है। व्यावहारिक जगत में आर्थिक भूगोल के अध्ययन का अत्यधिक महत्व है; इसके अध्ययन के माध्यम से कृषक, श्रमिक, व्यापारी, उद्योगपति तथा राजनीतिज्ञ सव ही लाभान्वित होते हैं।

         विभिन्न देशों को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने तथा विकास की भावी योजनाओं के निर्माण में आर्थिक भूगोल के अध्ययन को आधार बनाना पड़ता है। किसी प्रदेश के आर्थिक साधनों का उच्चतम सीमा तक विकास कर वहां की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए जीविकोपार्जन के साधन सुलभ किए जा सकते हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सन्तुलित तथा मानव शक्ति को उत्पादन क्रिया से सम्बद्ध करने में आर्थिक भूगोल का योगदान बड़ा महत्वपूर्ण होता है।

        मानव की आधुनिक अनुसन्धान एवं अन्वेषण की प्रवृत्ति ने मानव के आर्थिक क्रिया-कलापों को और अधिक विस्तृत बना दिया है।

        इस विषय की मुख्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) आर्थिक भू-दृश्य:-

     इसमें किसी प्रदेश के आर्थिक व्यक्तित्व को अभिव्यक्त किया जाता है। मानव द्वारा प्राकृतिक साधनों के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया जाता है।

(2) गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य:-

     इस संकल्पना में सदैव परिवर्तन एवं विकास के तत्व को महत्व दिया गया है। जहां आर्थिक भू-दृश्य भूतकाल के आर्थिक कार्यों का परिणाम है, वहां गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य पुरोगामी और भावी विकास की सम्भावनाओं को व्यक्त करता है।

(3) वर्तमान आर्थिक भू-दृश्य:-

     ये संसाधन, संरचना, आर्थिक विकास एवं आर्थिक प्रक्रिया द्वारा उपलब्धि के परिचायक हैं। वहां की आर्थिक स्थिति को विकासावस्था स्तर भी प्रकट करते हैं। युवावस्था में संसाधनों के शोषण के अवसर उपलब्ध रहते हैं; चरमोत्कर्ष की परिपक्व अवस्था में संसाधनो के उच्चतम उपभोग एवं वृद्धावस्था में विकास की अवरुद्ध एवं धीमी प्रगति के आसार दृष्टिगोचर होते रहते हैं।

(4) आर्थिक क्रिया-कलापों की स्थिति में सिद्धान्तों और नियमों के आधार पर स्थिति-स्थापना तथा वितरण की व्याख्या की जाती है। इसमे विषय-वस्तु उपागम तथा प्रादेशिक उपागम को आधार बना कर अध्ययन किया जाता है।

(5) क्षेत्रीय आर्थिक भिन्नता के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं जैविक भिन्नता के अन्तर के परिणामस्वरूप उपलब्धि के स्तर में भी भिन्नता मिलती है।

(6) क्षेत्रीय क्रियात्मक अन्योन्यक्रिया में विभिन्न प्रदेशो में विचित्र-सा पारस्परिक क्रियात्मक अन्तर सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है। यह सम्बन्ध लम्बवत् और क्षैतिज दोनों प्रकार का होता है।

(7) भू-दृश्यों का क्षेत्रीय कार्यात्मक सगठन संकेन्द्रीय और समान दोनों प्रकार का होता है। इसमें पारस्परिक सम्बन्ध कहीं स्पष्ट तो कहीं अस्पष्ट होता है। अस्पष्ट सम्बन्धों को परिवहन और संचारवाहन से सम्बद्ध किया जाता है।

(8) क्षेत्रीय आर्थिक विकास संकल्पना में विकास की तुलना, अन्य प्रदेशों से सांस्कृतिक तथा तकनीकी प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर की जाती है। प्रगति के लिए क्षेत्र विशेष के आर्थिक संसाधनों के विकास पर अधिकाधिक बल दिया जाता है।

आर्थिक भूगोल के अध्ययन उपागम एवं विधियाँ

(APPROACHES AND METHODS OF ECONOMIC GEOGRAPHY)

     आर्थिक भूगोल के सन्तुलित अध्ययन के लिए कई उपागमों व अध्ययन विधियों का प्रयोग किया जाता है, जो कि एक-दूसरे की पूरक हैं। निम्नांकित चार उपागम अध्ययन दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

(1) वस्तुगत उपागम (Commodity Approach):-

     इस उपागम के अन्तर्गत विभिन्न वस्तुओं, जैसे- गेहूं, चावल, गन्ना, लोहा, पेट्रोलियम आदि के उत्पादन एवं वितरण का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। किन्तु कुछ विद्वान इस उपागम में वस्तुओं के उत्पादन एवं वितरण का विश्लेषण न करके व्यवसाय का वितरण और विश्लेषण करते हैं। जैसे- कृषि व्यवसाय, वस्तु संग्रह एवं आखेट व्यवसाय, खनन व्यवसाय, उद्योग आदि। इस कारण इस उपागम को ‘व्यवसाय उपागम’ (Occupational Approach) भी कहा जाता है।

(2) प्रादेशिक उपागम (Regional Approach):-

      इस उपागम के अन्तर्गत सर्वप्रथम विश्व को कुछ बृहत् प्राकृतिक प्रदेशों में विभक्त कर लिया जाता है और प्रत्येक प्रदेश के प्राकृतिक वातावरण तथा विभिन्न वस्तुओं के वितरण प्रतिरूप का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है।

(3) सैद्धान्तिक उपागम (Theoretical Approach):-

      इस उपागम के अन्तर्गत किसी भी वस्तु या प्रदेश की विशेषताओं एवं वितरण प्रतिरूप का अध्ययन पूर्व निर्धारित सिद्धान्तों के सन्दर्भ में किया जाता है। इस अध्ययन विधि से मुख्यतः सिद्धांतों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण माना जाता है, न कि वितरण प्रतिरूप का विश्लेषण करना।

(4) क्रमबद्ध उपागम (Systematic Approach):-

     इस उपागम के अन्तर्गत वस्तुओं के वितरण की सामान्य विशेषताओं का क्रमबद्ध विश्लेषण किया जाता है। यह क्रमबद्ध अध्ययन तीन चरणों में सम्पन्न किया जाता है:-

(1) प्रथम चरण में किसी भी वस्तु की स्थिति तथा वितरण के प्रतिरूप का अध्ययन किया जाता है।

(ii) द्वितीय चरण में उस वस्तु विशेष की विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।

(iii) तृतीय चण में उस वस्तु का अन्य प्राकृतिक एवं मानवीय तत्वों से सम्बन्ध का विश्लेषण किया जाता है। ये अन्तर्सम्बन्ध ‘कार्यकरण सम्बन्ध’ (Cause and Effect Relationship), ‘क्रियात्मक सम्बन्ध’ (Functional Relationship) तथा ‘क्षेत्रीय सम्बन्ध’ (Areal Relationship) के रूप व्यक्त किए जाते हैं।

19. The Chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world (विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताएँ तथा वितरण)

19. The Chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world

(विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताएँ तथा वितरण)



प्रश्न प्ररूप

Q. Discuss the chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world.

(विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताओं तथा वितरण का वर्णन करें।)

उत्तर- बगानी या बगाती या रोपण कृषि, कृषि का एक विशिष्टीकृत रूप है जो मुख्य रूप से उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ही की जाती है। इस प्रकार की कृषि में कोई एक ही फसल उत्पन्न की जाती है। यह फसल भी मुख्य रूप से बाजारों में बिक्री के लिए की जाती है। इन फसलों में रबड़, चाय, कहवा, गन्ना, केला, नारियल आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार की कृषि को एक फसली (One-crop Mono-Culture) की खेती कहते हैं। कुछ विद्वान गन्ने को भी बगानी फसल मानते हैं किन्तु वास्तव में गन्ना बगानी फसल नहीं है।

बगानी कृषि के क्षेत्र-

(i) पश्चिमी द्वीप समूह में क्यूबा, जमाइका, पोर्टिरिको, आदि

(ii) मध्य अमेरिका में होण्डुरस, ग्वाटेमाला त्तथा कोस्टारिका

(iii) पश्चिमी अफ्रिका के गिनीतट, घाना आदि।

(iv) दक्षिण अफ्रिका में नेटाल आदि

(व) दक्षिणी एशिया में द० भारत, श्रीलंका, मलेशिया, इन्डोनेशिया आदि।

(vi) आस्ट्रेलिया में क्वींसलैंड क्षेत्र।

       इस प्रकार की रोपण (Plantation) कृषि में मुख्य रूप से यूरोपीय लोगों की पूँजी तथा प्रबंध क्षमता लगी हुई है। इस प्रकार की कृषि में मूल निवासी लोग श्रमिकों का काम करते हैं। इस प्रकार की कृषि प्रणाली में फसलों के उत्पादन में बहुत से प्रक्रम (Processes) ऐसे होते हैं जिनके लिए बड़ी सावधानी की आवश्यकता होती है। इस कृषि की विधियाँ बहुत ही दक्षतापूर्ण और वैज्ञानिक होती हैं। इसकी फसलों के लिए वैज्ञानिक प्रणाली तथा सावधानी बरती जाती है। इसके पौधे काफी नाजुक होते हैं।

     रोपण (Plantation) कृषि में उन फसलों का उत्पादन होता है जिसके पदार्थों के माँग पिछले दो शताब्दियों में नगरीय संस्कृति के विकास के साथ-साथ बढ़ती गई है। आज की वर्तमान आधुनिक दुनिया में पेय पदार्थों का महत्व बहुत बढ़ गया है। इनमें चाय, कॉफी, कोको काफी लोकप्रिय हो गए हैं। विश्व के उन्नत देशों में इन पदार्थों की काफी माँग है।

रोपण कृषि की विशेषताएँ-

     रोपण कृषि की कुछ मूलभूत विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(i) यह एक फसली (Mono culture) कृषि है। इसमें एक ही फसल के उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

(ii) इसमें अधिक पूँजी, उच्च प्रबंध और वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाता है।

(iii) इसकी फसलें केवल बिक्री द्वारा मुद्रा प्राप्त करने के लिए उत्पन्न की जाती है।

(iv) अधिकतर उत्पादन व्यापार के लिए होता है। स्थानीय क्षेत्रों में इसका उपभोग बहुत ही, कम होता है।

(v) इसके अन्तर्गत खेत (Holdings) बहुत विस्तृत तथा खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।

(vi) इसमें मानव श्रम की अधिक आवश्यकता पड़ती है।

(vii) इस कृषि पर बाजार-माँग की घट-बढ़ का और मूल्य में उतार-चढ़ाव का गहरा प्रभाव पड़ता है।

(viii) इस प्रकार की कृषि के लिए भारी पूँजी की आवश्यकता होती है क्योंकि रख-रखावों,, प्रक्रिया तथा यातायात में काफी खर्च पड़ता है।

(ix) इस कृषि की फसलों में बीमारी लगने का काफी भय रहता है। अतः फसल के खराब होने से बहुत हानि होती है।

(x) इस कृषि का बाजार सम्पूर्ण विश्व के नगरों में फैला हुआ है। अतः ग्रह फसल नगरीय सभ्यता तथा संस्कृति का द्योतक है।

(xi) यह एक महत्त्वपूर्ण मुद्रादायिणी फसल है।

     इस प्रकार की फसलों का उत्पादन प्रायः विकासशील या अविकसित क्षेत्रों में होता है। जैसे दक्षिणी अमेरिका, मध्य अफ्रिका, तथा दक्षिणी एशिया के अधिकतर देश या तो विकासशील हैं या अविकसित हैं, परन्तु इसका बाजार अधिकतर विकसित देशों के महानगरों में से है।

      इसका मुख्य खरीददार U.S.A., कनाडा तथा यूरोपीय महादेश के देश हैं। आस्ट्रेलिया भी इसका अच्छा बाजार है। इस प्रकार इसका उत्पादन उष्ण कटिबंधीय देशों में तथा इनकी बिक्री समशीतोष्ण तथा शीत प्रदेशों में है। उदाहरणस्वरूप विश्व में चाय का सबसे बड़ा निर्यातक भारत, श्रीलंका है। कॉफी का सबसे बड़ा निर्यातक ब्राजील है। परन्तु सबसे बड़ा आयातक U.S.A. तथा यूरोप के देश हैं।

विश्व में बगानी कृषि की फसलें तथा उनके क्षेत्र-

(1) रबड़- मौनसून एशिया में मलेशिया, इन्डोनेशिया, थाइलैंड, श्रीलंका, भारत, हिन्दचीन के देश- सिंगापुर, फिलीपीन, अफ्रिका- गिनी तट के देश घाना, नाइजीरिया, आइवरी कोस्ट आदि तया दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील। 

(2) चाय- मौनसून एशिया में चीन, भारत, श्रीलंका, जापान, बंगलादेश, इन्डोनेशिया, मलेशिया आदि पश्चिमी एशिया में ईरान, दक्षिणी रूस आदि, अफ्रिका में केन्या, जायरे, जाम्बिया, तंजानियाँ आदि दक्षिणी अमेरिका में अर्जेन्टिना तथा ब्राजील।

(3) नारियल- दक्षिणी-पूर्वी एशिया के देश- इन देशों के समुद्र तटीय प्रदेश, भूमध्यरेखीय अफ्रिका तथा दक्षिणी अमेरिका के तटीय प्रदेश।

(4) कहवा- दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील, कोलम्बिया, इक्वेडोर, वेनेज्वेला तथा पेरू, अफ्रिका में गिनी तट के देश-आइवरी कोस्ट, घाना, अंगोला, उगाण्डा, एथियोपिया, जैसे आदि तथा मौनसून एशिया में भारत, हिन्दचीन आदि।

(5) केला- मौनसून एशिया में भारत, फिलीपिन, हिन्देशिया, मलेशिया, सिंगापुर और अफ्रिका तथा दक्षिणी अमेरिका के भूमध्यरेखीय प्रदेश शामिल है।

(6) मसालें- मौनसून एशिया में भारत, श्रीलंका, मलेशिया तथा तंजानियाँ आदि। तंजानियाँ में जंजीवार द्वीप लौंग के उत्पादन के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

(7) कोको- इसका सबसे बड़ा उत्पादक अफ्रिका महादेश है। इसमें अप वोल्टा, घाना, नाजीरिया आदि हैं। कोको का कुछ उत्पादन दक्षिणी अमेरिका के ब्राजील में भी होता है।

9. Rostow’s Economic Development Model (रोस्तोव के आर्थिक विकास मॉडल)

9. Rostow’s Economic Development Model

(रोस्तोव के आर्थिक विकास मॉडल)



    Rostow

       रोस्तोव मूलतः एक इतिहासकार थे जिन्होंने ऐतिहासिक अर्थशास्त्रों के रूप में आर्थिक-सामाजिक विकास से संबंधित एक बहुस्तरीय मॉडल प्रस्तुत किया। यह मॉडल 1971 ई० में रोस्तोव के द्वारा प्रस्तुत किया गया। यह मॉडल 5 चरणों में विभक्त है-

   रोस्तोव के द्वारा प्रस्तुत आर्थिक विकास के इस मॉडल के अनुसार सभी देश एक साथ और एक समान आर्थिक विकास नहीं कर पाते हैं अर्थात् यह मॉडल स्थान और समय के संदर्भ में विभिन्न देशों के सामाजिक-आर्थिक विकास की व्याख्या करता है। इसे एक उदाहरण से भी समझा जा सकता है। जैसे- भारत (1947) और द० कोरिया (1948) क्षेत्रों लगभग एक ही समय आजाद हुए। लेकिन विकास के दृष्टिकोण से द० कोरिया की अर्थव्यवस्था विकसित देशों के समतुल्य पहुँच गई। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी विकासशील अवस्था से गुजर रहा है।

      रोस्तोव ने सामाजिक आर्थिक विकास की व्याख्या करने हेतु 5 स्तरीय विकास का मॉडल निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया है।

आर्थिक विकास की अवस्था सामाजिक-आर्थिक स्थिति
(1) प्रथम अवस्था जीवन निर्वाह की अवस्था / अर्थव्यवस्था
(2) द्वितीय अवस्था विकास के पूर्व की अवस्था
(3) तृतीय अवस्था तीव्र विकास की अवस्था
(4) चतुर्थ अवस्था आर्थिक प्रौढ़ावस्था
(5) पंचम अवस्था उपभोक्ता वस्तुओं की तीव्र उपयोग की अवस्था

    रोस्तोव ने बताया कि कोई भी देश उपरोक्त 5 अवस्थाओं से गुजरकर ही विकास के चरम अवस्था को प्राप्त करते हैं।

    रोस्टोव ने प्रत्येक अवस्था की विशेषता निम्न प्रकार से बताया

(1) प्रथम अवस्था की विशेषता 

       यह परम्परागत समाज की विशेषता है। इस अवस्था से गुजरने वाले समाज अनुत्पादक कार्यों पर धन अधिक खर्च करहे हैं। अर्थव्यवस्था जीवन निर्वाह की होती है। कुल GDP का 1/3 भाग खाद्य पदार्थों पर खर्च किया जाता है। साक्षरता, स्वास्थ्य और नियोजित कार्यों का अभाव होता है। लोगों को राज्य के द्वारा चलाया जा रहा कार्यक्रम की जानकारी कम होती है। देश की सरकारें सुरक्षा और धार्मिक कार्यों पर अधिक खर्च करते हैं। राज्य में निराशा का वातावरण होता है। अनेक प्रकार के सामाजिक-धार्मिक तनाव व्याप्त होते है। भारत के पड़ोसी देश म्यानमार, अफगानिस्तान, मध्य अफ्रीकी देश और उप सहारा के देश की आर्थिक व्यवस्था इसी अवस्था से गुजर रही है।

(2) दूसरी की अवस्था की विशेषता

       रोस्तोव ने बताया कि जिस देश की अर्थव्यवस्था दूसरे चरण गुजर रही होती है। वैसे देशों में एक ऐसे अभिजात वर्ग का उदय होता है जो नवोत्पाद या नयी तकनीक को प्राश्रय देता है। इस अवस्था से गुजरने वाले देश की सरकार अधिकत्तर धन परिवहन, संचार और संरचनात्मक सुविधाओं पर खर्च करते हैं। एक देश के अन्दर विकास दृष्टिकोण से अन्तः और अन्तर प्रादेशिक विषमता दिखायी देती है अर्थात् कुछ क्षेत्र विकसित हो जाते है और कुछ क्षेत्र पिछड़े ही रह जाते है। भारत, चीन, मैक्सिको ब्राजील द० अफ्रीका जैसे देशों की अर्थव्यवस्था इसी चरण से गुजर रही है।

(3) तीसरा अवस्था की विशेषता

      तीसरा अवस्था से गुजरने वाले देशों में विकास का कार्य खण्डीय होता है। रोस्तोव ने पश्चिमी देशों का उदाहरण देते हुए बताया है कि आर्थिक विकास के तीसरे चरण में पहले वस्त्र उद्योग, उसके बाद रेलवे परिवहन अंतत: दुग्ध उद्योग का विकास हुआ है। ये ऐसे उद्योग है जिनके विकास के लिए न विशिष्ट तकनीक की आवश्यकता है और न ही विशेष निवेश की। लेकिन इन तीनों के विकास से समाज का विकास त्वरित गति से होता है। रोस्तोव ने बताया कि तीसरे अवस्था को जलविभाजक से तुलना की जा सकती है। इस अवस्था से कोई भी देश 20-30 वर्षों तक गुजरता है। तीसरे अवस्था से गुजरने के बाद राज्य के आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों का कायाकल्प हो जाता है।

       मलेशिया ने 2020 का नारा दिया। भारत ने “विजन 2020” का नारा दे रहा है ताकि एक नियत समय के बाद में देश विकसित देशों की कतार में खड़ा हो जायें। मध्य अमेरिकी देश, इजराइल, द. कोरिया जैसे देश इसी अवस्था से गुजर रहे हैं।

(4) चौथा अवस्था

     चौथा अवस्था को प्रौढ़ावस्था से सम्बोधित किया गया है। इस अवस्था से गुजरने वाले देशों की अर्थव्यवस्था पूर्णरूपेण विकसित होती है। देश में अकाल, भूखमरी इत्यादि की समस्या समाप्त हो जाती है। प्रति व्यक्ति आय अति उच्च होता है। आधुनिक तकनीक का बोलबाला होता है। प्रशिक्षित वर्ग का एक विशिष्ट श्रमिक समूह उभरकर सामने आता है। उत्पादन के कार्यों में निवेश अधिक से अधिक किया जाता है। उपभोक्ता वस्तुओं पर अधिक-से-अधिक खर्च किया जाता है। द० एवं पूर्वी यूरोप के अधिकतर देश इसी अवस्था से गुजर रहे हैं। 

(5) पाँचवाँ अवस्था की विशेषता

    पाँचवाँ अवस्था से गुजरने वाले देशों में उपभोक्ता वस्तुओं की माँग अधिक होती है। लोग नवीन उत्पाद को खरीदने के लिए बेचैन रहते है। प्रति व्यक्ति आप अधिक होती है। समाज का मशीनीकरण और वैज्ञानिकरण हो जाता है। सामूहिक भावना कमजोर पड़ने लगती है। व्यक्तिवादिता का विकास अधिक हो जाता है। विश्व के आज नगरीय समाज, जापान, अमेरिका सिंगापुर, फ्रांस, इंगलैण्ड, जर्मनी जैसे देशों की अर्थव्यवस्था इसी चरण से गुजर रही है।

    रोस्तोव ने बताया है कि सभी देशों की अर्थव्यवस्था इन 5 अवस्थाओं से होकर गुजरती है। इन्होंने USA के संदर्भ में उदाहरण देते हुए बताया है कि 1800 ई० के पहले प्रथम अवस्था से 1800- 50 ई० के बीच द्वितीय अवल्या से, 1850-75 to 1बीच तृतीय अवस्थत से, 1875 – 1925 के बीच चतुर्थ अवस्था से और 1925 के बाद पाँचवाँ अवस्था ये गुजर रही है।

आलोचना

      रोस्तोव के इस मॉडल की कई आधारों पर आलोचना भी की गई। जैसे:-

(1) अरब देशों पर यह मॉडल बिल्कुल लागू नहीं होती क्योंकि वहाँ प्रति व्यक्ति आय अधिक है लेकिन सरकार अधिकतर खर्च सुरक्षा और धार्मिक कार्य पर करती है।

(2) इस मॉडल में कहा गया है कि एक दीर्घ अवधि के बाद ही तीव्र विकास की अवस्था प्रारंभ होती है जो गलत है क्योंकि कई ऐसे देश हैं जो आधुनिक तकनीक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता के आधार पर विकास के कार्यों को तीव्र कर चुके है।

निष्कर्ष

       उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि इस मॉडल की अपवादवश कुछ सीमाएँ अवश्य है, इसके बावजूद यह मॉडल अधिकांश देशों के संदर्भ में उपयोगिता रखता है।

प्रश्न प्रारूप

Q. रोस्तोव के आर्थिक विकास अवस्था मॉडल का सामालोचनात्मक परीक्षण कीजिए तथा अपने उत्तर के पुष्टि में उपयुक्त उदाहरण प्रस्तु करें। (UPSC, 2003)

8. The Distribution & Production of Copper in World (विश्व में ताँबा के वितरण एवं उत्पादन)

8. The Distribution & Production of Copper in World

(विश्व में ताँबा के वितरण एवं उत्पादन)



    Production of Copper

       ताँबा एक ऐसी धातु है जिसका प्रयोग अति प्राचीन काल से मानव समाज करता आ रहा है। ईसा से हजारों वर्ष पूर्व मानव समाज को ताँबे का ज्ञान प्राप्त हो गया था जिसके आधार पर उस युग को ताँब युग के नाम से जाना जाता है। आज से 6000 वर्ष पूर्व ताँबे का प्रयोग बर्तन और हथियार बनाने के लिए मिस्र तथा मेसेपोटामिया में होने लगा था।

      आधुनिक युग में ताँबे का विभिन्न कार्यों में प्रयोग होता है। इसका सबसे गुणकारी प्रयोग बिजली के उपकरणों में होता है क्योंकि वह सबसे अच्छा जंग रहित विद्युत उपचालक धातु है। इसके अतिरिक्त मोटरगाड़ी, रेल इन्जन, वायुयान आदि में प्रयोग होता है। इसका प्रयोग अन्य धातुओं के साथ मिश्रण करके भी किया जाता है। औसतन 40 प्रतिशत ताँबा बिजली के सामान, 45 प्रतिशत मशीन और 4.5 प्रतिशत अन्य धातुओं के साथ मिश्रण कर प्रयोग किया जाता है।

         प्रधानतः शुद्ध रूप, ताँबा ऑक्साइड, सल्फाइड कार्बोनेट, क्लोराइड आदि रूपों में पाया जाता है। अब शुद्ध रूप में बहुत कम ताँबा प्राप्त होता है। अतः अनेक खनिजों और चट्टानों के साथ मिश्रित रूप में पाया जाता है। ताँबे के साथ सीसा, जस्ता, टिन, सोना, चाँदी और निकेल भी पाये जाते हैं।

विश्व वितरण एवं उत्पादन

        ताँबे के उत्पादन में बहुत अधिक क्षेत्रीय उतार-चढ़ाव होता रहता है, लेकिन विश्व स्तर पर इसका उत्पादन निरन्तर बढ़ता रहा है। 1957 में विश्व का उत्पादन मात्र 3412 हजार मीट्रिक टन था जो बढ़कर 1964-65 में 5400 और 1978 में 7890 मीट्रिक टन हो गया। 1986-87 में विश्व का उत्पादन बढ़कर 9223 हजार मीट्रिक टन था, जो 1990 में घटकर 8969 हजार मीट्रिक टन रह गया, परन्तु 2006 में पुनः उत्पादन बढ़कर 15100 हजार मीट्रिक टन हो गया।

         ताँबा के संचित भण्डार के दृष्टिकोण से चिली, संयुक्त राज्य अमेरिका, जाम्बिया, जायरे, पेरू, पूर्व सोवियत संघ और कनाडा अग्रणी देश हैं। उत्पादन में चिली, संयुक्त राज्य अमेरिका, इण्डोनेशिया, पेरू, आस्ट्रेलिया, रूस, चीन, कनाडा, पोलैण्ड और जाम्बिया अग्रणी देश हैं, जो विश्व का 83 प्रतिशत से अधिक ताँबा उत्पादित करते हैं।

अमेरिकी देश:

        तांबे के उत्पादन में संयुक्त राज्य अमेरिका हमेशा प्रथम स्थान पर रहा है। 1948 में यहाँ विश्व का 37 प्रतिशत ताँबा उत्पादन हुआ था लेकिन अन्य देशों में उत्पादन वृद्धि के कारण 1977 में उसकी विश्व में सापेक्षिक स्थिति घट कर 17 प्रतिशत पर पहुँच गयी। 2006 में यहाँ विश्व का 8.1 प्रतिशत उत्पादन हुआ था। यहाँ का प्रथम उत्पादन मिशिगन के केवीन अन्तरीप में शुरू हुआ। यद्यपि वहाँ का ताँबा निम्न कोटि का है।

        यहाँ का दूसरा महत्त्वपूर्ण उत्पादक क्षेत्र मोण्टाना राज्य का बुट्टा क्षेत्र है, जो न केवल संयुक्त राज्य अमेरिका अपितु विश्व में अग्रणी उत्पादक है। यहाँ ताँबे के साथ सोना, सीसा, मँगनीज और जस्ता भी निकाला जाता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र को सबसे अधिक ताँबा सम्पन्न क्षेत्र कहा जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के अन्य उत्पादक क्षेत्रों में एरिजोना राज्य का मोरेन्सी और सान मैनुअल क्षेत्र, नेवेदा राज्य का एली एवं एरेग्टन क्षेत्र तथा ऊटा का विघन क्षेत्र प्रमुख हैं।

कनाडा:-

     विश्व का लगभग 4.0 प्रतिशत ताँबा उत्पादित करता है। 2006 में यहाँ 607 हजार मीट्रिक टन ताँबा उत्पादित हुआ था। इसका अधिकांश उत्पादन चार क्षेत्रों से प्राप्त होता है, यथा- आन्टोरिया राज्य का साइबरी क्षेत्र जो देश के कुल उत्पादन का पचास प्रतिशत से अधिक ताँबा उत्पादित करता है। यहाँ देश का बीस प्रतिशत ताँबे के भण्डार है। इस क्षेत्र से ताँबे के साथ निकेल भी उत्खनित होता है।

       दूसरा महत्त्वपूर्ण क्षेत्र नोरन्दा रोना क्षेत्र है जो देश का बीस प्रतिशत से अधिक तांबा उत्पादित करता है। यहाँ ताँबा और सोना साथ-साथ प्राप्त किये जाते हैं। तीसरा क्षेत्र मैनीटोवा, सस्कैचवान है। फ्लिन-फ्लोन क्षेत्र तथा बैरोबर के उत्तर में स्थित ब्रिटेनिया में भी अच्छे किस्म का ताँबा उत्पादित होता है। यह विश्व का आठवाँ बड़ा ताँबा उत्पादक देश है।

मैक्सिको:-

      मैक्सिको विश्व का सोलहवाँ बड़ा ताँबा उत्पादक देश है। 2006 में इसका योगदान लगभग 1.0 प्रतिशत था।

चिली:-

      चिली तीव्र उत्पादन के कारण यह विश्व का प्रथम बड़ा ताँबा उत्पादक देश बन गया है। 2006 में यहाँ विश्व का 35.5 प्रतिशत ताँबा उत्पादित हुआ था। यहाँ की ताँबा की खानें चिक्वकामाटा एवं तेनियेन्स, एल सल्वाडोर एवं अफ्रीकाना से देश का नब्बे प्रतिशत से अधिक ताँबा उत्पादित होता है। चिक्वकामाटा की खान विश्व की बृहत्तम खानों में से एक है। यहाँ एक अरब मीट्रिक टन से अधिक ताँबा भण्डार है।

      मध्य चिली में स्थित एलतेनियेन्स की खान विश्व की सबसे गहरी खान है। चिली के अन्य उत्पादक क्षेत्रों में पोमेटिलोज का हनाम क्षेत्र भी विशेष उल्लेखनीय है। यहाँ का अधिकांश ताँबा निर्यात किया जाता है, जिससे देश को प्राप्त होने वाली आधी विदेशी मुद्रा ताँबे से प्राप्त होती है।

पेरु:-

       यह विश्व का तीसरा बड़ा उत्पादक देश है। यहाँ प्रति वर्ष 1050 हजार मीट्रिक टन से अधिक ताँबा उत्पादित होता है, जो विश्व का 7.0 प्रतिशत है। यहाँ का प्रमुख ताँबा उत्पादन क्षेत्र सेहों पास्को रहा है जहाँ का भण्डार अब समाप्त होने लगा है। दूसरा प्रमुख क्षेत्र टोक्वे माला के समीप स्थित है, जो एण्डीज पर्वत पर लगभग 3000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। अनुमानतः यहाँ पैंतालीस करोड़ मीट्रिक टन ताँबा का भण्डार है।

यूरोप के देश:-

      यूरोप के देशों में विश्व का लगभग दस प्रतिशत शुद्ध ताँबा उत्पादित होता है। यहाँ के प्रमुख उत्पादकों में पूर्व सोवियत संघ, पोलैण्ड, जर्मनी और बेल्जिम आणी हैं जो यूरोप का लगभग 60 प्रतिशत और विश्व का 10 प्रतिशत शुद्ध ताँबा उत्पादित करते हैं

पूर्व सोवियत संघ:-

       विश्व के ताँबा उत्पादकों में पूर्व सोवियत संघ का दूसरा स्थान रहा है। यहाँ प्रतिवर्ष विश्व का 15 प्रतिशत से अधिक ताँबा उत्पादित होता रहा है। सोवियत संघ का ताँबा उत्पादन बहुत तेजी से बढ़ा है क्योंकि 1948 में यहाँ का उत्पादन विश्व का मात्र 5.3 प्रतिशत था। यहाँ विश्व का केवल 2.4 प्रतिशत संचित भण्डार है जिसका तीन चौथाई कजाकिस्तान में बालकश झील के पास स्थित है।

       पूर्व सोवियत संघ का संचित भण्डार धातु सम्पन्नता के दृष्टिकोण से उतना अच्छा नहीं है। यह क्षेत्र देश के उत्पादन का आधा से अधिक ताँबा उत्पादित करता है। यहाँ की दो खाने झेज्कागान एवं केनराड विशेष उल्लेखनीय है। सोवियत रूस के अन्य उत्पादकों में दक्षिणी-पश्चिमी यूराल क्षेत्र, उत्तरी साइबेरिया का नोरिल्स्क क्षेत्र तथा आर्मेनिया में कदझरान है, जहाँ से देश का क्रमश: 15, 25 और 15 प्रतिशत ताँबा प्राप्त किया जाता है।

       सोवियत संघ के विघटन के बाद कजाकिस्तान अब विश्व का 3.0 प्रतिशत ताँबा उत्पादित करने लगा हैं। उज्बेकिस्तान का आल्मोलिक क्षेत्र महत्त्वपूर्ण उत्पादक बनता जा रहा है। रूस में अधिकांश ताँबा खानों के पास ताँबा साफ करने का कारखाने स्थापित किये गये हैं। अभी हाल में पूर्वी साइबेरिया के उडेनाक निक्षेपण का पता चला है। देश के विघटन से इसकी स्थिति बदल गयी है। रूस का ताँबा उत्पादन देश के विघटन के बाद घटकर 640 हजार मीटरी टन रह गया है।

अफ्रीका के प्रमुख उत्पादक देश:-

     ताँबा उत्पादन में अफ्रीका महाद्वीप में जिम्बावे, जायरे और दक्षिणी अफ्रीका संघ का योगदान मात्र 4 प्रतिशत के लगभग है, जबकि इनका संचित भण्डार ग्यारह प्रतिशत से अधिक है।

जाम्बिया:-

      विश्व का 9वाँ बड़ा उत्पादक है। यहाँ प्रतिवर्ष लगभग 503 हजार मीटरी टन ताँबा उत्पादित किया जाता है जो विश्व उत्पादन का लगभग 3.3 प्रतिशत है। यहाँ के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में मुफिल आरा अग्रणी है, जहाँ से देश का आधा से अधिक ताँबा प्राप्त किया जाता है। यहाँ ताँबे की धातु सम्पन्नता दो से पाँच प्रतिशत होती है।

        यहाँ के अन्य उत्पादकों में चिबुलुमा एवं रोकाना क्षेत्र विशेष उल्लेखनीय हैं। यहाँ की सबसे बड़ी खान रोना एण्टीलोप में है जहाँ ताँबा गलाने का विशाल कारखाना है। यहाँ का अधिकांश ताँबा जापान, भारत, चीन आदि देशों को निर्यात किया जाता है।

जायरे:-

      अफ्रीका का दूसरा और विश्व का सत्रहवीं उत्पादक देश है जहाँ प्रतिवर्ष 131 हजार मीट्रिक टन ताँबा उत्पादित होता है। यहाँ का विशाल ताँबा भण्डार कटांगा प्रदेश में है, जो विश्व प्रसिद्ध है। बेल्जियन इसी ताँबे के मोह में भौतिक विपत्तियों को झेलते रहते हैं।

        यहाँ 400 किमी० लम्बा और 80 किमी० चौड़ा भू-क्षेत्र है जिसमें ताँबा भण्डार सुरक्षित है, जो कटांग से जाम्बिया तक फैला है। यहाँ उत्खनन कार्य बहुत कठिन है क्योंकि परिवहन से लेकर जलवायविक कठिनाइयों तक ही बड़ी बाधाएँ हैं। यहाँ का अधिकांश उत्पादन निर्यात किया जाता है।

दक्षिणी अफ्रीका संघ:-

      अफ्रीका का तीसरा बड़ा उत्पादक देश है। यहाँ प्रतिवर्ष लगभग 90 हजार मीट्रिक टन से अधिक ताँबा उत्पादित होता है। यहाँ का अधिकांश तथा केपप्रान्त कान कोडिया एवं ओकोप क्षेत्र तथा केपप्रान्त के मेसिना क्षेत्र से प्राप्त किया जाता है। इस देश का अधिकांश उत्पादन निर्यात किया जा रहा है। बोत्सवाना, मारुतानिया, मोरक्को व जिम्बाबे, अफ्रीका के अन्य प्रमुख तांबा उत्पादक देश है।

एशिया के तांबा उत्पादक देश:-

         एशिया में विश्व का एक-चौथाई ताँबा उत्पाद होता है। यहाँ के प्रमुख तांबा उत्पादकों में चीन (4.3 प्रतिशत), इण्डोनेशिया (5.4 प्रतिशत), ईरान, जापान, दक्षिणी कोरिया और भारत विश्व के प्रमुख देश बने हुए हैं।

      जापान, दक्षिणी कोरिया और चीन अपनी पूरी आवश्यकता घरेलू उत्पादन से पूरा करते हैं, जबकि भारत ताँबे को आयात करना पड़ता है। भारत विश्व उत्पादकता का मुश्किल से 1 प्रतिशत ताँबा उत्पादित करता है। भारत में तांबे का उत्पादन झारखण्ड के सिंहभूमि एवं हजारीबाग क्षेत्रों में होता है। इ

         सके अतिरिक्त राजस्थान में खेतरी कर्नाटक में चित्तलदुर्ग एवं हासन, आंध्र प्रदेश में नेलोर, कुर्नूल, अनन्तपुर एवं गुन्दूर मध्य प्रदेश में जबलपुर, बालाघाट, होशंगाबाद, सागर एवं बस्तर और उत्तराचल में गढ़वाल, देहरादून एवं अल्मोड़ा जनपदों में ताँबा भण्डार मिला है। भारत का उत्पादन अपनी आवश्यकता से बहुत कम है, जिसके कारण विदेशों से आयात करना पड़ता है। फिलीपीन्स भी एक प्रमुख उत्पादक देश है जिसका अधिकांश उत्पादन अमेरिका एवं जापान को निर्यात किया जाता है। 

       ताँबा उत्पादन में आस्ट्रेलिया तेजी से आगे बढ़ रहा है। यहाँ क्वीन्सलैण्ड, न्यूसाउथवेल्स और पश्चिमी आस्ट्रेलिया में ताँबे का भण्डार मिला है। आस्ट्रेलिया एक महत्त्वपूर्ण निर्यातक बनता जा रहा है। 2006 में इसका उत्पादन 875 मीटरी टन था, जो विश्व उत्पादन का 5.8 प्रतिशत है।

विश्व व्यापार

       ताँबे का विश्व व्यापार बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि सभी देशों को इसकी आवश्यकता है। विकसित देशों में तो इसकी सबसे अधिक खपत है। विश्व के निर्यातकों में चिली, जिम्मबावे, कनाडा, जाम्बिया, जायरे, मैक्सिको विशेष उल्लेखनीय हैं। आयतकों में ब्रिटेन, जापान, जर्मनी, फ्रान्स, रूस, भात, आदि का नाम अग्रणी है।

प्रश्न प्रारूप

1. विश्व में ताँबा के वितरण एवं उत्पादन प प्रकाश डालें।

7. Distribution and Production of Iron ore in world (विश्व में लौह अयस्क के वितरण एवं उत्पादन)

7. Distribution and Production of Iron ore in world

(विश्व में लौह अयस्क के वितरण एवं उत्पादन)



Production of Iron     

           आज लोहा यांत्रिक युग की धुरी बन गया है क्योंकि अधिकांश यंत्र इसी से बनाये जा रहे हैं। इसकी कठोरता, टिकाऊपन और अन्य धातुओं के साथ मिलकर मजबूत बनने की क्षमता के कारण इसका उपयोग दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। लोहे का सक्षम विकल्प अभी तक सामने नहीं आया है।

       विश्व में अति प्राचीन काल से लौह खनिज का उपयोग मनुष्य करता रहा है। भारत में लौह खनिज के उपयोग का इतिहास लोहे की खोज के साथ जुड़ा है। दिल्ली में कुतुबमीनार के प्रांगण में स्थित लौह स्तम्भ विदेशी धातु विज्ञानियों के लिए एक आश्चर्यजनक निर्माण है। जंक रहित लोहा बनाने की कला का यह अनूठा प्रयोग है।

 लौह अयस्क के प्रकार-

        लौह अयस्क को लोहे के अंश के आधार पर चार वर्गों में विभाजित किया जाता है:

(i) मैग्नेटाइट (Magnetite) Fe3O4: यह सर्वोत्तम किस्म का लौह अयस्क होता है, जिसमें लोहे की मात्रा लगभग 72% होती है। इसमें वाष्प की मात्रा सबसे कम होती है एवं इसका रंग काला होता है।

(ii) हेमाटाइट (Hematite) Fe2O2: यह लोहे का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत है, जिसमें लोहे का अंश लगभग 70 प्रतिशत होता है। इसका रंग लाल एवं कत्थई होता है।

(iii) लिमोनाइट (Limonite) 3Fe2O3 3H2O: इसमें धातु का अंश 60 प्रतिशत तक रहता है। इसका रंग पीला होता है। इसका रंग पीला या भूरा होता है।

(iv) सिडेराइट (Siderite) FeCO3: यह सर्वाधिक निम्न कोटि का अयस्क है, जिसमें लोहे का अंश 48 प्रतिशत होता है। यह राख के रंग का होता है

विश्व में लौह अयस्क का संचित भण्डार-

          पृथ्वी के धरातल के निर्माण में लौह तत्त्व की मात्रा लगभग 5 प्रतिशत है। फलतः यह प्रायः सर्वत्र पाया जाने वाला खनिज है। वर्तमान अनुमानों के अनुसार 50 प्रतिशत से 70 प्रतिशत धात्विक सम्पन्नता का लौह खनिज भण्डार 3700 अरब मीटरी टन है। 

विश्व में  लौह अयस्क का संचित भंडार का प्रतिशत

देश  प्रतिशत
यूक्रेन 18.9
ब्राजील 16.5
रूस 15.1
चीन 12.4
आस्ट्रेलिया 10.8
कजाकिस्तान  5.1
संयुक्त राज्य अमेरिका 4.1
भारत 2.6
स्वीडेन 2.1
वेनेजुएला 1.6
अन्य 11.0

          इस प्रकार विश्व के दस देश 89 प्रतिशत से अधिक लौह अयस्क भण्डार संजोए हुए हैं। शेष 11 प्रतिशत बाकी विश्व के देशों में पाया जाता है।

लौह अयस्क का उत्पादन

     विश्व के 45 देशों में लौह अयस्क का उत्पादन होता है। प्रमुख उत्पादक देश रूस, चीन, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत तथा कनाडा हैं। अन्य उत्पादक देश दक्षिण अफ्रीका गणराज्य, लाइबेरिया, नाइजीरिया, फ्रांस, स्वीडन, स्पेन आदि हैं।

      लौह अयस्क का उत्पादन उपयोग पर आधारित होता है, फलत: विकसित देशों में इसकी माँग अधिक होने से उत्खन्न भी अधिक होता है। 1960 ई० तक विश्व का लौह अयस्क उत्पादन 2565 लाख मीट्रिक टन और 2006 में 18000 लाख मीट्रिक टन हो गया। इससे स्पष्ट है कि दिनोदिन लौह अयस्क की माँग बढ़ती जा रही है।

विश्व के प्रमुख देशों में लौह अयस्क उत्पादन (2021)
देश उत्पादन (मिलियन टन)
चीन 340
आस्ट्रेलिया 900
ब्राजील 490
भारत 250
रूस 95
दक्षिणीअफ्रीका 81
संयुक्त राज्य अमेरिका 60
कनाडा 49

1. चीन-

      यहाँ सामान्य स्तर के लौह अयस्क का विशाल भण्डार है जिसमें धातु सम्पन्नता चालीस प्रतिशत के आस-पास है। यहाँ का संचित भण्डार अभी परिवहन मार्गो की कमी के कारण उपयोग में नहीं लाया जा रहा है क्योंकि भण्डार दूर-दराज के इलाकों में स्थित है।

        चीन में लौह उत्खनन का तीव्र विकास 1950 के बाद शुरू हुआ जब घरेलु खपत के साथ निर्यात भी उत्पन्न हो गया। वर्तमान सूचनाओं के अनुसार चीन सर्वाधिक 58.8 करोड़ मीटरी टन से अधिक लौह-अयस्क स्थानान्तरित कर रहा है। हाल के वर्षों में तीव्र उत्पादन के कारण वह विश्व का प्रथम बड़ा लौह उत्पादक देश बन गया है। यहाँ का लगभग आधा संरक्षित भण्डार दक्षिणी मंचूरिया में है, जिसमें आशन-चांगलिंग एवं पेन्की क्षेत्र प्रमुख उत्पादक हैं।

2. ब्राजील-

        लौह अयस्क के उत्पादन में ब्राजील विश्व का दूसरा बड़ा उत्पादक देश बन गया है जो इसके उच्चकोटि के लौह अयस्क, विदेशी माँग और अनुकूल परिस्थिति में निक्षेपण के कारण सम्भव हुआ है। 1960 में यह विश्व का दसवाँ बड़ा उत्पादक था लेकिन इसके बाद उत्पादन तीव्र गति से बढ़ा और उछल कर यह दूसरे स्थान पर चला गया। यहाँ विश्व का 17.7 प्रतिशत लौह अयस्क भण्डार मिनास-गेरास राज्य के पठारी भाग में है। यही क्षेत्र उत्पादन में भी अग्रणी है।

3. आस्ट्रेलिया-

      आस्ट्रेलिया में लौह खनिज का उत्पादन उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है। 1960 की तुलना में यहाँ का उत्पादन लगभग डेढ़ गुना हो गया है। यह विश्व का लगभग 15.3 प्रतिशत लौह-अयस्क उत्पादित करता है और विश्व का तीसरा बड़ा उत्पादक देश है।

4. भारत-

       यह विश्व का चौथा बड़ा लौह अयस्क उत्पादक देश हो गया है, जो आन्तरिक खपत और विदेशी माँग के कारण अपने उत्पादन को निरन्तर बढ़ाता रहा है। भारत में चीन के बाद एशिया का सबसे बड़ा लौह अयस्क भण्डार उपलब्ध है। यहाँ का लौह-अयस्क उच्च कोटि का है, जिससे इसकी विदेशी माँग बढ़ती जा रही है। 2006 में भारत का उत्पादन 1600 लाख मीटरी टन से अधिक था, जो विश्व उत्पादन का 8.9 प्रतिशत है।

5. रूस-

        रूस विश्व का सबसे बड़ा लौह अयस्क उत्पादक रहा है, जो 1958 के बाद निरन्तर अपना प्रथम स्थान बनाये हुए था। यह अकेले विश्व का एक चौथाई से अधिक लोहा उत्खनित करता रहा है। रूस के विघटन के बाद यहाँ विश्व का 15.1 प्रतिशत लौह भण्डार सुरक्षित है। यहाँ 30 क्षेत्रों में उत्खनन कार्य किया जा रहा है।

6. यूक्रेन-

       दक्षिणी यूक्रेन में स्थित क्षेत्रों से उच्च कोटि का हेमाटाइट लौह अयस्क निकाला जाता है। इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और धात्विक सम्पन्नता के कारण यह पूर्व सोवियत संघ का सर्वश्रेष्ठ खनिज लौह उत्पादक क्षेत्र रहा है, हालांकि कोयले का क्षेत्र (डोनवास) इससे 400 किमी० की दूर है।

         यहाँ का अधिकांश उत्पादन यूक्रेन और मास्को-तुला क्षेत्र में प्रयुक्त होता है। यहाँ का कुछ उत्पादन पूर्वी यूरोप के इस्पात केन्द्रों को भी भेजा जाता रहा है। क्रिबोईराग यूक्रेन का सबसे बड़ा लौह-अयस्क उत्पादन क्षेत्र है। 2006 में यहाँ का उत्पादन विश्व का 4.1 प्रतिशत था।

7. संयुक्त राज्य अमेरिका-

         उच्च कोटि का लौह अयस्क, सुविधाजनक स्थिति, पर्याप्त रक्षित भण्डार, उन्नत प्रावधिकी और पर्याप्त माँग के कारण 1958 तक संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व का अग्रणी लौह अयस्क उत्पादक देश था। राष्ट्रीय संरक्षण नीति के कारण इसका उत्पादन नियंत्रित कर दिया गया है, जिसके फलस्वरूप अब यह विश्व का सातवाँ बड़ा उत्पादक हो गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में पाँच क्षेत्र रक्षित भण्डार और उत्पादन दोनों के दृष्टिकोण से अग्रणी हैं। 2006 में यहाँ विश्व का केवल 2.9 प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित हुआ था।

8. दक्षिणी अफ्रीका संघ-

        दक्षिणी अफ्रीका संघ में लौह धातु का उत्खनन अप्रत्याशित गति से बढ़ा है। 1960 में यह विश्व का मात्र एक प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित करता था लेकिन 2006 में इसका हिस्सा बढ़कर 2.3 प्रतिशत हो गया है। स्पष्ट है कि लौह अयस्क का उत्पादन व्यापारिक कारणों से अधिक बढ़ा है। यहाँ का अधिकांश लौह अयस्क निर्यात किया जाता है।

         यहाँ की लौह अयस्क की खानें ट्रांसवाल, आरेन्ज फ्री स्टेट और कपेटाउन प्रान्तों में स्थित हैं जो रेल मार्गों से सेवित हैं इन्हीं खानों के निकट मैगनीज और कोयले की खानें भी स्थित हैं।

9. कनाडा-

         कनाडा का लौह खनिज भण्डार उच्च कोटि का है। देश में सीमित माँग के बावजूद संयुक्त राज्य अमेरिका की बढ़ती माँग और जल यातायात की सुविधा के कारण यहाँ का उत्पादन तीव्र गति से बढ़ रहा है। 1948 में यहाँ मात्र चौदह लाख टन लौह खनिज का उत्पादन हुआ था, जो बढ़कर 2006 में 3.4 करोड़ मीटरी टन से अधिक हो गया है। कनाडा की प्रमुख खानें लेब्रोडोर (शेफलतिल) ओन्टोरिया, नेवस्का, क्यूवेक, ब्रिटिश कोलम्बिया तथा न्यूफाउण्डलैण्ड में हैं। यह विश्व का 9वाँ बड़ा उत्पादक है। 2006 में यहाँ विश्व का 1.9 प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित हुआ था।

10. स्वीडन-

         स्वीडेन तीव्र उत्पादन के कारण यूरोप का प्रमुख लौह उत्पादक देश बन गया है। 2006 में यहाँ का उत्पादन 236 लाख मीटरी टन था, जो विश्व उत्पादन का 1.3 प्रतिशत है। उच्चकोटि के लौह खनिज के कारण स्वीडेन के लौह खनिज की अधिक माँग है।

11. वेनेजुएला-

         यह विश्व का ग्यारहवाँ प्रमुख लौह अयस्क उत्पादक देश है, जो 1960 के बाद अपना उत्पादन तीव्र गति से बढ़ाने में सफलता प्राप्त कर सका है। यहाँ का लौह अयस्क उच्चकोटि का है, जिसकी माँग संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देशों में है। इस देश की आय का लगभग तीस प्रतिशत भाग अयस्क नियत से प्राप्त होता है। 2006 में यहाँ विश्व का 1.3 प्रतिशत लौह-अयस्क उत्पादित हुआ था। वेनेजुएला में अधिकांश उत्पादन सेन बोलिवार तथा एलपाओ की खानों से प्राप्त किया जाता है ,यहाँ की संचित राशि बहुत अधिक है।

लैटिन अमेरिका के अन्य देश-

         चिली और पेरू लैटिन अमेरिका के अन्य महत्त्वपूर्ण देश है जहाँ लौह अयस्क का उत्पादन तीव्र गति से बढ़ रहा है। इन देशों में कोयले की कमी के कारण अधिकांश उत्खनन निर्यात के लिए किया जाता है। चिली के तटीय भाग में वृन्तोको तथा रामेन्ल क्षेत्रों से अधिकांश लौह अयस्क प्राप्त किया जाता है। पेरू की खाने मारकोना एवं अकोर में हैं। जहाँ उच्चकोटि का लौह-अयस्क प्राप्त किया जाता है।

यूरोप के लौह-अयस्क उत्पादक देश-

         यूरोप के प्रमुख उत्पादकों में स्वीडेन के अतिरिक्त फ्रान्स, स्पेन, पूर्व यूगोस्लाविया और नार्वे विशेष उल्लेखनीय हैं। 1960 तक फ्रांस विश्व का चौथा बड़ा लौह उत्पादक देश रहा है, लेकिन अब यहाँ का उत्पादन बहुत तेजी से घटा है फलस्वरूप अब यह विश्व का सोलहवाँ उत्पादक बन गया है।

        फ्रांस के लौह-अयस्क में धातु की मात्रा चालीस प्रतिशत से कम है लेकिन रक्षित भण्डार बहुत अधिक है। लाँगवी, लान्द्रे, ओटाज ओर्न और नेन्सी प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं। इसके अतिरिक्त नारमण्डी, ब्रिटेन एवं मध्यवर्ती पठार में भी छिटपुट जमाव पाया जाता है। स्पेन में उच्चकोटि का अयस्क प्राप्त किया जाता है जिसमें धातु की मात्रा साठ प्रतिशत से अधिक है। यहाँ सबसे अधिक उत्पादन बिलिवाओं क्षेत्र से प्राप्त किया जाता है। इसके अतिरिक्त पिरेनीज एवं जिब्राल्टर क्षेत्रों में लौह अयस्क प्राप्त किया जाता है।

कजाकिस्तान-

      सोवियत संघ के विघटन के बाद कजाकिस्तान विश्व का तेरहवाँ प्रमुख लौह अयस्क उत्पादक देश बन गया है, जो 2006 में विश्व का 1.0 प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित किया था।

ईरान-

     ईरान विश्व का 1.1 प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित कर बारहवें स्थान पर आ गया है।

    विश्व के अन्य प्रमुख उत्पादकों में मैक्सिकों, मारुतानिया, जर्मनी, लाइबेरिया, स्पेन, ब्रिटेन, पेरू, चिली, अल्जीरिया, मोरक्को, ट्यूनिएिशया, मारुतानिया, गैबन, स्वाजीलैण्ड, अंगाला, तुर्की, फिलीपीन्स, मलेशिया एवं इण्डोनेशिया के नाम विशेष उल्लेखनीय है।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार-

         वर्ष 1999 में चीन संसार का सबसे बड़ा लौह-आयस्क उत्पादक देश था। इसके बाद ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, भारत तथा रूस का स्थान था। लोहे का विश्व व्यापार काफी बड़ी मात्रा में होता है। ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा एवं भारत लौह अयस्क के प्रमुख निर्यातक देश हैं, जिनका निर्यात व्यापार में हिस्सा 70 प्रतिशत है। अन्य निर्यातक देशों में स्वीडन, लाइबेरिया, अल्जीरिया, वेनेजुएला आदि का नाम आता है।

        जापान विश्व का सबसे बड़ा लौह अयस्क आयातक (45 प्रतिशत) देश है। अन्य आयातक देशों में जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, इटली एवं फ्रांस प्रमुख हैं।

प्रश्न प्रारूप

1. विश्व में लौह अयस्क के वितरण एवं उत्पाद की विवचेना करें।

6. Concept of Resources(संसाधनों की अवधारणा)

6. Concept of Resources

(संसाधनों की अवधारणा)



संसाधन का अर्थ

     प्रकृति के वे सभी पदार्थ या वस्तुएँ जो मानवजीवन की परिसंपत्ति (assets) बन जाएँ, संसाधन ( resources) कहलाती हैं। दूसरे शब्दों में, पर्यावरण के वे सारे पदार्थ जो मानवजीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा सुख-सुविधा प्रदान करने के लिए उपयोगी हों, संसाधन हैं। ये अवयव प्रकृति में विभिन्न रूपों में पाए जाते हैं।

मानव-एक संसाधन के रूप में

      मानव शरीर स्वयं भी सबसे बड़ा संसाधन है, क्योंकि इससे जीवन के अनेक कार्य किए जाते हैं; जैसे- बोझा ढोना, कार्यालय का काम आदि। मानव स्वयं ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने शरीर और अपनी विभिन्न तकनीकों का उपयोग करता है तथा प्रकृति की अन्य वस्तुओं का भी उपयोग करने के लिए अपनी कार्यात्मकता, अर्थात कार्य करने की योग्यता का विकास करता है।

        मानवीय क्रियाकलाप सर्वाधिक महत्त्व के हैं। मानव न रहे तो सारे पदार्थ या धन यों ही पड़े रह जाएँगे। अपने अनुपम साहस, अपितु दुःसाहस, पराक्रम, शौर्य, संघर्षशीलता, ज्ञान, विलक्षण प्रतिभा, जिज्ञासा और सूझ-बूझ, अन्वेषण करने की तीव्र उत्कंठा इत्यादि गुणों के कारण मनुष्य सभी प्रकार के संसाधनों में सर्वोच्च स्थान रखता है। यह स्वयं संसाधन होते हुए भी संसाधनों का उपभोक्ता भी है।

मानव-सभी प्रकार के संसाधनों के निर्माता के रूप में

        संसाधन के रूप में किसी पदार्थ का अस्तित्व उसकी उपयोगिता या उपयोगी कार्य/संक्रिया (function/operation) पर निर्भर करता है। कोई पदार्थ जब तक जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध नहीं होता तब तक वह संसाधन नहीं कहलाता।

       छोटानागपुर पठार के खनिज भंडार का युगों तक कोई महत्त्व न था, अतः वे खनिज पदार्थ संसाधन न बन पाए। किंतु, जब खनिजों का महत्त्व समझा जाने लगा और लोगों ने अपनी कुशलता का प्रदर्शन कर उनका निष्कासन आरंभ किया तथा उपयोग करने लगा तब वे खनिज संसाधन बन गए। इन खनिजों ने छोटानागपुर क्षेत्र को आर्थिक विकास का सुअवसर प्रदान किया।

Concept of Resources

       इसी तरह, पश्चिमी घाट के पश्चिमी भाग में जोग जलप्रपात (Jog Falls) युगों तक जल की धारा बहाता रहा, किंतु जब शक्ति के विकास में उसका उपयोग जलविद्युत उत्पादन के लिए किया जाने लगा तब वह संसाधन के रूप में उभर आया।

        नदियाँ तभी संसाधन बन पाती हैं जब मानव उनका उपयोग सिंचाई में, जलविद्युत उत्पादन में, मत्स्योद्यम में, जल यातायात में और ऐसी ही अनेक आर्थिक क्रियाओं में करने लगता है। भूगोलवेत्ता जिम्मरमैन ने ठीक ही कहा था कि- “संसाधन हुआ नहीं करते, बना करते हैं।”

संसाधनों का महत्त्व

         विश्व में अनेक पदार्थ बिखरे पड़े हैं। मानव पहले उनका पता लगाता है, फिर वह अपनी बुद्धि, प्रतिभा, क्षमता, तकनीकी ज्ञान और कुशलता अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, अपने आर्थिक विकास के लिए, उनके उपयोग की योजना बनाता है और उनका उपयोग करता है।

         उपयोग में लाकर ही वह उन्हें संसाधन बना पाता है। मनुष्य के आर्थिक विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धि अत्यावश्यक है। संसाधनों का महत्त्व इसी तथ्य से स्पष्ट होता है कि इनकी खोज और प्राप्ति के लिए ही मनुष्य कठिन से कठिन परिश्रम करता है। दुर्गम मार्गों पर चलकर दुःसाहसिक यात्राएँ करता है। विश्व के प्रायः सभी युद्ध इन्हीं संसाधनों को पाने या छीनने के लिए हुए हैं।

संसाधनों की परिभाषा

        संसाधन को कई रूपों में पारिभाषित किया जा सकता है। मनुष्य अपने जीवन को सुखद-समृद्ध बनाने तथा अपने आर्थिक विकास के लिए जिन वस्तुओं का उपयोग करता है, उनका निर्माण कुछ मूलभूत पदार्थों से होता है। इन मूलभूत पदार्थों को संसाधन कहते हैं।

        हमारे वातावरण में विद्यमान वे सभी पदार्थ जो हमें उपलब्ध हो तथा हमारे जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके, वे केवल उसी स्थिति में संसाधन कहे जा सकते हैं जब हमें उन तक पहुँचने की तकनीक ज्ञात हो साथ ही, उनके परिष्करण और परिवर्द्धन के विभिन्न स्तरों पर होनेवाले खर्चे के लिए हमारे पास पर्याप्त धन हो, श्रमशक्ति हो तथा उनके उपयोग करने पर भी हमारी संस्कृति और परंपरा अक्षुण्ण रह सके।

        वस्तुतः, व्यापक रूप से मनुष्य की इच्छाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति करनेवाले सभी पदार्थ संसाधन कहे जा सकते हैं। मनुष्य अपनी व्यापक समझ और सूझ-बूझ से अपने तथा विश्व के वातावरण को बिना प्रभावित किए जिन प्रकृतिप्रदत्त वस्तुओं का उपयोग और उपभोग करता है तथा प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखता है उन्हें ही मूलरूप से संसाधन कहा जाता है।

         कोई गायक, चित्रकार या साहित्यकार अपने क्रियाकलाप से धन कमाता है तो ये कार्य भी संसाधन कहलाते हैं।

संसाधनों का वर्गीकरण

         संसाधनों का वर्गीकरण विभिन्न दृष्टिकोणों से किया जाता है। कुछ वर्गीकरण निम्नलिखित हैं:-

(क) उपलब्धता के आधार पर प्रकृतिप्रदत्त और मानवकृत,

(ख) स्रोत या उत्पत्ति के आधार पर जैविक और अजैविक,

(ग) पुनः प्राप्ति के आधार पर नवीकरणीय और अनवीकरणीय,

(घ) स्वामित्व के आधार पर निजी, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय,

(ङ) विकास के स्तर के आधार पर- संभाव्य, ज्ञात, भंडारित और संचित,

(क) प्रकृतिप्रदत्त और मानवकृत संसाधन:-

       प्रकृति में उपस्थित पदार्थों के साथ ही जलवायु, उच्चावच जैसी भौगोलिक परिस्थितियाँ जो मनुष्य के क्रियाकलापों पर व्यापक प्रभाव डालती है, उन्हें प्रकृतिप्रदत्त या प्राकृतिक संसाधन कहा जाता है। परंतु, केवल उसी स्थिति में जब उन्हें प्राप्त करने और परिष्कृत एवं परिवर्द्धित करने की व्यापक तकनीक उपलब्ध हो तथा उन्हें उपयोगी बनाने हेतु की जानेवाली विभिन्न प्रक्रियाओं के अंतर्गत होनेवाले खर्च को वहन करने के लिए समुचित धन जुटाने की क्षमता हो।

       इसी प्रकार, भवन, सड़कें, रेल लाइनें, विभिन्न प्रकार के निर्मित सामान तथा शिक्षण-प्रशिक्षण, खोज और विकास की विभिन्न संस्थाएँ मानवकृत संसाधन कहलाते हैं।

        व्यावहारिक रूप में प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग मानवीय क्रियाकलापों के प्रथम चरण में किया जाता है, जिसके उपरांत द्वितीयक, तृतीयक और चतुर्थ कोटि के क्रियाकलापों में मुख्यतः मानवकृत संसाधनों का उपयोग किया जाता है।

(ख) जैविक और अजैविक संसाधन:-

        जीवमंडल में विद्यमान और उससे प्राप्त होनेवाले विभिन्न प्रकार के जीव जैसे पक्षी, मछलियाँ, पेड़-पौधे और स्वयं मानव भी जैविक संसाधन कहे जाते हैं। जीव जगत के जीवित सदस्यों में संतानोत्पत्ति की क्षमता होती है। अनुकूल प्राकृतिक परिस्थतियों में ये नई संतानों को उत्पन्न करते रहते हैं। अतः, सभी जैविक संसाधन नवीकरणीय संसाधन होते हैं।

      इसी प्रकार, वातावरण में उपस्थित सभी प्रकार के निर्जीव पदार्थ; जैसे- खनिज, चट्टानें, मिट्टी, नदियाँ, पर्वत इत्यादि अजैविक संसाधन कहे जाते हैं।

(ग) नवीकरणीय और अनवीकरणीय संसाधन:-

           वातावरण में उपलब्ध सूर्य का प्रकाश, हवा, तालाब, झीलें, नदियाँ और समुद्र, मछलियाँ, पेड़-पौधे, उनपर बसेरा लगाए हुए पक्षी एवं वन्य जीव सभी नवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं, क्योंकि या तो वे प्राकृतिक रूप से स्वतः उपलब्ध होते हैं या विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक, भौतिक, रासायनिक या जैविक प्रक्रियाओं द्वारा उत्पन्न होते रहते हैं। इनमें से वन और वन्य जीव-जंतु, तालाबों और समुद्रों में एकत्रित जल हमेशा उपलब्ध होते हैं। अतः, इन्हें सतत उपलब्ध संसाधन कहते हैं।

        सूर्य का प्रकाश वर्ष के कुछ दिनों में प्रचुर मात्रा में मिलता है जबकि वर्षाकाल या अन्य कारणों से कुछ दिनों तक या तो कम उपलब्ध होता है अथवा उसकी तीव्रता कम रहती है। इसी प्रकार, नदियों में बहता जल वर्षाऋतु में बाहर निकलकर बाढ़ के रूप में अभिशाप बन जाता है और संसाधन के रूप में नहीं रह पाता है। हवा भी समान गति से उपलब्ध नहीं रहती और आँधी-तूफान में यह लाभप्रद होने के स्थान पर हानिकारक हो जाती है। इन प्रकार के संसाधनों को प्रवहनीय संसाधन कहते हैं।

         कोयला और पेट्रोलियम लाखों वर्षों की जटिल जैव-रासायनिक तथा अन्य भौतिक-रासायनिक प्रक्रियाओं के फलस्वरूप बने है और पृथ्वी के अंदर उनका भंडार जहाँ-तहाँ जमा हो गया है।

         धात्विक खनिजों के साथ भी यही स्थिति है। इनका संचित भंडार सीमित है तथा इन्हें अल्पकाल में कृत्रिम रूप से पुनः बनाना प्रायः असंभव है, अर्थात एक बार इनके समाप्त हो जाने के बाद पुनः इन्हें प्राप्त करना संभव नहीं। ऐसे संसाधनों को अनवीकरणीय संसाधन कहा जाता है।

          कुछ धातुओं को बार-बार पिघलाकर शोधित करके प्रयोग किया जा सकता है, अर्थात इनका चक्रीकरण हो सकता है जबकि कोयले और तेल को जला देने पर प्राप्त राख से कोयला एवं तेल नहीं बन सकता। इनका उपयोग केवल पुनः एक ही बार हो सकता है। इन्हें अचक्रीय संसाधन कहते हैं।

(घ) निजी, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संसाधन:-

       स्वामित्व के आधार पर संसाधन निजी, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय होते हैं। इनका विवरण निम्नलिखित है-

(i) निजी संसाधन-

        उपयोग की अनेक वस्तुएँ; जैसे- कृषि भूमि, उद्यान, मकान, कार, मोटर साइकिल, मोबाइल फोन इत्यादि निजी संसाधन हैं। इनका स्वामी अपनी इच्छानुसार इनका किसी प्रकार से किसी भी समय उपयोग करने के लिए स्वतंत्र होता है।

(ii) सामुदायिक संसाधन-

       सामुदायिक संसाधन वे संसाधन हैं जिनका उपयोग समुदाय, गाँव और नगर के सभी लोगों के लिए सुलभ हो। गाँवों में चरागाह, खेल के मैदान, तालाब, श्मशान भूमि, साप्ताहिक बाजारों की भूमि, पंचायत भवन, विद्यालय, पर्यटन स्थल इत्यादि सामुदायिक संसाधन हैं।

(iii) राष्ट्रीय संसाधन-

        वैधानिक रूप से किसी राज्य या देश की सीमा के अंदर सभी प्रकार के संसाधनों पर उस राज्य या देश का स्वामित्व होता है। कृषि भूमि को निजी माना जा सकता है, क्योंकि सरकार के द्वारा इसपर खेती करने अथवा निजी उपयोग के लिए किसानों और उपभोक्ताओं को अधिकृत किया गया है जिसके बदले उनसे लगान अथवा अन्य कर लिए जाते हैं।

         प्राचीनकाल में राजाओं को राज्य की संपत्ति का स्वामी माना जाता था। वर्तमान काल में यह अधिकार सरकार के पास है, इसीलिए आवश्यकता पड़ने पर सरकार द्वारा सड़क या रेल लाइन बिछाने, नहरों और कारखानों के निर्माण इत्यादि कार्य के लिए किसी भी भूमि का अधिग्रहण कर लिया जाता है। इसके बदले सरकार कुछ मुआवजा राशि भी देती है तथा विस्थापितों के पुनर्वास का प्रबंध किया जाता है, क्योंकि नागरिकों को यह सुविधा प्रदान करना सरकार का प्रमुख उत्तरदायित्व भी है। सागरतटों के पास 12 समुद्री मील, अर्थात 19.2 किलोमीटर तक के महासागरीय क्षेत्र में पाए जानेवाले संसाधन भी देश की संपत्ति हैं।

(iv) अंतरराष्ट्रीय संसाधन-

       पृथ्वी के अधिकांश भाग में सागर और महासागर हैं। यथार्थ में मात्र 29 प्रतिशत भूतल ही विभिन्न राष्ट्रों की राष्ट्रीय संपत्ति है और शेष 71 प्रतिशत भाग किसी की अपनी संपत्ति नहीं है। ज्ञातव्य है कि जलीय जीवों के साथ ही विभिन्न संसाधनों का विपुल भंडार इन समुद्रों में विद्यमान है। इनके उपयोग के लिए कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ हैं। अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, सागरतट से 200 किलोमीटर तक के महासागरीय क्षेत्र को किसी देश का अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र माना जाता है जहाँ से मछलियाँ पकड़ने तथा भूतल से धातुएँ एवं अन्य वस्तुएँ प्राप्त करने का उसे अधिकार है, परंतु अन्य देशों के जहाजों के परिवहन अथवा अन्य उपयोगों की भी स्वतंत्रता रहती है।

(ङ) संभाव्य, ज्ञात, भंडारित और संचित संसाधन-

       विकास के स्तर के आधार पर संसाधनों की निम्नलिखित चार श्रेणियाँ होती हैं-

(i) संभाव्य संसाधन-

       ऐसे सभी संसाधन जिनका उपयोग किया जा सके, भले ही उचित तकनीक, अर्थाभाव या अन्य किसी कारण से उनका उपयोग नहीं होता हो, संभाव्य संसाधन कहे जाते हैं। उदाहरणस्वरूप, भारत में पेट्रोलियम मिलने की संभावना पूर्वी और पश्चिमी तटों के साथ ही असम, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान इत्यादि अनेक स्थानों पर है, परंतु केवल असम तथा पश्चिमी घाट के पास से लगभग 20 प्रतिशत पेट्रोलियम निकाला जा सका है।

        इसी प्रकार, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, सागरीय ज्वार ऊर्जा इत्यादि के लिए भारत में अपार संभावना है, परंतु कुछ ही स्थानों पर इनका उपयोग हो पाता है सस्ती, सुगम तकनीक के विकास से इनके उपयोग की बड़ी संभावना है अन्वेषण या सर्वे (survey) विभाग द्वारा इनकी खोज की जाती है।

(ii) ज्ञात संसाधन-

        जिन संसाधनों को ढूंढकर उनका उपयोग किया जाता हो उन्हें ज्ञात संसाधन कहते हैं, जैसे असम, बॉम्बे हाई. गुजरात के तेल कूपों से पेट्रोलियम निकाला जा रहा है। ज्ञात संसाधन वे संसाधन है जिनकी तकनीक विकसित हो चुकी हो तथा सार्थक उपयोग ज्ञात हो।

(iii) भंडारित संसाधन-

      विकसित देशों ने ऐसी तकनीकों की खोज की है जिनसे पृथ्वी के अंदर उपस्थित खनिजों की पहचान संभव हो सकी है। विकसित देश कई किलोमीटर गहराई तक भूतल को भेदकर खनिज निकालते हैं जबकि भारत जैसे विकासशील देश एक किलोमीटर से अधिक गहराई तक नहीं खोद पाते। अविकसित देशों में तो इतना भी उपयोग नहीं हो पाता।

      अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका की नदियों की विपुल जल राशि व्यर्थ बहकर समुद्र में गिरती है, परंतु अपार संभावनाओं के बाद भी तकनीक और धन के अभाव में जलविद्युत का उत्पादन नहीं हो पाता। यह संसाधन भंडारित नहीं हो पाता है। वस्तुतः इसके विकास से ही अर्थव्यवस्था में व्यापक परिवर्तन संभव है।

(iv) संचित संसाधन-

       कुछ संसाधन जिनके उपयोग करने की तकनीक ज्ञात हो, परंतु और सस्ती तकनीक के अभाव अथवा अन्य कारणों से उनका उपयोग वर्तमान में न होता हो तथा भविष्य में उपयोग करना संभव हो, उन्हें संचित संसाधन कहते हैं। अमेरिका के तटीय प्रदेशों में पेट्रोलियम का प्रचुर भंडार है, परंतु वह खाड़ी या अन्य देशों के पेट्रोलियम का उपयोग करता है। इन भंडारों के समाप्त होने पर ही अपने संचित भंडारों का उपयोग करेगा।

        इसी प्रकार, हाइड्रोजन गैस सर्वोत्तम ईंधन है और इसे पानी से प्राप्त किया जा सकता है। पानी नदी, तालाब और समुद्रों में आसानी से बड़ी मात्रा में उपलब्ध भी है। फिर भी, इसका उपयोग सीमित मात्रा में ही होता है, क्योंकि इसे पानी से अलग करना कुछ कठिन है। परंतु, पेट्रोलियम के सीमित भंडार के समाप्त होने पर एकमात्र हाइड्रोजन ईंधन ही ऊर्जा का प्रमुख साधन होगा। अभी इसे भंडारित संसाधन भी कहा जा सकता है और संचित भी।

         प्रायः, संचित भंडार के कुछ भाग को ज्ञात तकनीक द्वारा उपयोग में लाया जाता है और शेष भाग को भावी पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखा जाता है। सिंचाई के लिए नदियों से नहरें निकाली जाती है, परंतु बरसात के दिनों में इनका उपयोग नहीं होता। खेतो में वर्षा जल प्राप्त होता हता है। इस समय नहरों में जमा जल संचित भंडा है जिसका उपयोग वर्षा के बाद सिंचाई के लिए किया जाता है।

5.The Importance of Water Resources, Sources, Uses and Conservation (जल संसाधन के महत्त्व, वितरण, उपयोगिता एवं संरक्षण)

5. The Importance of Water Resources, Sources, Uses and Conservation

(जल संसाधन के महत्त्व, स्रोत, उपयोगिता एवं संरक्षण)



Importance of Water

जल संसाधन के महत्त्व

          प्राकृतिक संसाधनों में जल एक ऐसा आधारभूत संसाधन है, जिसके बिना पृथ्वी तल पर जीवन की कल्पना ही असंभव है। मनुष्य, पेड़-पौधे और जीव-जन्तु सभी के लिए जल जीवन का आधार है। पृथ्वी तल पर जल की उपस्थिति के बाद ही जीवन की कल्पना की गई है। जल की उपलब्धता और उसके उपयोग की सुविधा मानव के सांस्कृतिक विकास में सहायक तत्व रहे हैं।

       जल की अधिकता या न्यूनता की तुलना में उसकी सामान्यता और सहज उपलब्धता अधिक आकर्षक रहे हैं। यही कारण है कि नदियों की घाटियों में जहाँ सहजता के साथ जल उपलब्ध था और प्राकृतिक सुविधाएँ प्राप्त थीं, आदि मानव बसने हेतु आकर्षित हुआ, जिससे कुछ घाटियाँ सांस्कृतिक क्रोड़ बन गई। यहाँ सिंचाई, पेय, आखेट और परिवहन के लिए जल संसाधन का प्रथम उपयोग हुआ।

      स्पष्ट है कि जल संसाधन के कारण कृषि, व्यापार और बड़े अधिवासों का विकास सबसे पहले नदी घाटियों में प्रारंभ हुआ। जल संसाधन की सुलभता के कारण समुद्र तटीय क्षेत्र भी आकर्षक रहे। नौका परिवहन का विकास वृहद् व्यापारिक शृंखला का कारण बना। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक जल परिवहन सबसे सस्ता साधन है। समुद्री मार्गों की सुलभता अनेक यूरोपीय देशों की महानता का कारण बताया जाता है।

     नीदरलैण्ड, पुर्तगाल, ब्रिटेन जैसे छोटे देशों के नाविक जल यातायात के माध्यम से विश्व के बड़े और शक्तिशाली देशों पर कब्जा जमाने में सफल हो गये, जबकि स्थल मार्ग से चलने के कारण सिकन्दर अपनी विशाल सेना के बावजूद ऐसी विजय पाने में असफल रहा। आज जल यातायात की सुविधा वाले देश विश्व व्यापार में अग्रणी बन गये हैं, क्योंकि जिस मात्रा में आज का जलयान माल की ढुलाई करता है वैसा किसी अन्य साधन से संभव नहीं है।

            जल संसाधन का उपयोग मत्स्य उत्पादन के दृष्टिकोण से भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जल स्रोतों का उपयोग सिंचाई एवं विद्युत उत्पादन के लिए करके मानव समुदाय ने क्रान्तिकारी कृषि और औद्योगिक विकास किया है। इन सभी लाभों की गिनती में जलीय वनस्पतियों द्वारा अपार ऑक्सीजन गैस का उत्पादन शायद सबसे महत्वपूर्ण है। पारिस्थितिकी के निर्माण में जल की भूमिका का अनुमान मात्र इस बात से लगाया जा सकता है कि मध्य एशिया में जलाभाव के कारण अदिमानव को बाध्य होकर प्रव्रजित होना पड़ा जो मानव प्रजातियों के उद्भव का कारण बना। आज भी जलाभाव के कारण पृथ्वी का आधे से अधिक भाग मानव के लिए अनाकर्षक है।

        आधुनिक मानव समाज अपने अनेक क्रियाकलापों के लिए जल संसाधन का उपयोग पहले से कहीं अधिक करने लगा है और कुछ देशों में तो जल प्रबंधन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है, और कुछ क्षेत्रों में जल दोहन को लेकर तनाव पैदा हो गया है।

           आधुनिक समाज में तकनीकी विकास के कारण जल संसाधन का प्रचुर उपयोग सिंचाई, जल-विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन, जल यातायात आदि के लिए किया जा रहा है। जिन क्षेत्रों में वर्षा जल की कमी है, वहाँ धरातलीय और भूमिगत जल के उपयोग से कृषि का अभूतपूर्व विकास किया गया है। पंजाब एवं हरियाणा अपने सिंचित क्षेत्रों के कारण सबसे सम्पन्न राज्य बन गये हैं, जबकि पड़ोसी राजस्थान जलाभाव के कारण अब भी विपन्न बना हुआ है।

       इसी प्रकार दक्षिणी साइबेरिया में सिंचित क्षमता के विकास के कारण उस क्षेत्र का काया पलट हो गया है। अनेक नगरीय और औद्योगिक केन्द्र जल संसाधन की कमी के कारण समस्याग्रस्त हो गये हैं। स्पष्ट है कि जल संसाधन का समुचित उपयोग मानव समाज की प्रगति का महत्त्वपूर्ण कारक रहा है।

          इस प्रकार कहा जा सकता है कि जल संसाधन मानव जीवन के लिए एक आधारभूत संसाधन है। जहाँ इसकी कमी है वहाँ मानव जीवन संकटमय बनता जा रहा है। कुछ क्षेत्रों में पेय जल के संकट को हल करने के लिए समुद्र के खारे जल को साफ करने की तकनीक अपनाई जा रही है।

जल संसाधन के स्रोत एवं उपयोग (The Sources and Uses of  Water Resources)

       एक आंकलन के अनुसार पृथ्वी के समस्त जल भण्डार का 97.2 प्रतिशत समुद्रों, 2.15 प्रतिशत हिम सरिताओं, 0.62 प्रतिशत भूमिगत भण्डारों, 0.02 प्रतिशत धरातलीय स्रोतों और अवशेष नमी और आर्द्रता के रूप में पाया जाता है। प्राकृतिक संसाधन के रूप में धरातलीय जल भण्डार, भूमिगत जल भंडार और सागरीय जल का अधिक महत्व है। आर्थिक और मानवीय महत्त्व के दृष्टिकोण से धरातलीय और भूमिगत जल सर्वोपरि है।

         धरातलीय जल और भूमिगत जल वर्षा पर आधारित होता है। जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है वहाँ इसका कुप्रभाव देखा जाता है जिसके कारण जल प्रबंधन की नितान्त आवश्यकता पड़ती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल निरर्थक प्रवाहित होता है। जल का सबसे बड़ा भंडार समुद्रों में है लेकिन उसका जल खारा होने के कारण मानव के कुछ ही कामों के लिए प्रयुक्त हो पाता है। फिर भी इस भंडार से बनने वाली वाष्प और बादल धरातलीय जल को जन्म देते हैं, जो वर्षा तथा हिमपात के रूप में उसकी प्राप्ति होती है।

        पृथ्वी का लगभग दो तिहाई क्षेत्र समुद्री जल से घिरा है जबकि विश्व के विशाल मरूस्थल जल के अभाव में प्रायः मानव विहीन है। सउदी अरब, कुवैत, ईरान, इराक, जैसे देश हिमशिलाओं को पिघला कर पेय जल प्राप्त कर रहे हैं। इस प्रकार जल संसाधन का क्षेत्रीय स्वरूप बिल्कुल असमान है। विषुवत रेखीय क्षेत्रों में जल की प्रचुरता है तो मरुस्थलीय प्रदेशों में जलाभाव है। वर्षा जल का ठहराव भी जल संसाधन की उपलब्धता का एक प्रमुख पक्ष है। तीव्र ढाल वाले धरातल पर वर्षा होते ही जल बहकर अन्यत्र चला जाता है।

           वर्षा जल का ह्यास, वाष्पीकरण और जल के भूमिगत होने के कारण जल संसाधन की क्षेत्रीय विभिन्नता स्वाभाविक है। विश्व के लगभग एक चौथाई क्षेत्रफल पर न्यूनतम वर्षा होती है जिसका वार्षिक औसत 20 से.मी. से कम है, जैसे- उष्ण मरुस्थलों में पृथ्वी के धरातल के लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्र पर 25-50 से.मी. वर्षा होती है जिसे अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश कहते है।

      इस प्रकार पृथ्वी के धरातल के आधे से अधिक क्षेत्रफल पर औसत वर्षा होती है (50- 150से.मी.) जबकि शेष 15 प्रतिशत क्षेत्रफल अधिक वर्षा प्राप्त करता है। उपरोक्त सर्वेक्षण से स्पष्ट है कि पृथ्वी का अधिकांश धरातल वर्षा की कमी अथवा अधिकता के कारण जल संसाधन के दृष्टिकोण से असंतुलित है।

          जल संसाधन का उपयोग जल संसाधन का उपयोग मानव समाज विविध कार्यों क लिए करता है। धरातलीय जल नदियों, झीलों और तालाबों में संचित होता है जो प्रधानत: सिंचाई जल विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन, परिवहन, उद्योग, पेय और मनोरंजन के लिए, उपयोग किया जाता हैं। मानव के सांस्कृतिक विकास को धरातलीय जल ने सबसे अधिक प्रभावित किया है। आज भी इसकी महत्ता बनी हुई है।

         भूमिगत जल का उपयोग मुख्यत: पेय, सिंचाई और औद्योगिक कार्यों के लिए किया जाता है। सागरीय जल का उपयोग प्रधानतः परिवहन, मत्स्य पालन और नमक प्राप्ति के लिये किया जाता है। नये खोजों से समुद्री जल के विविध उपयोग बढ़ने की संभावना है।

         वैज्ञानिकों का अनुमान है कि समुद्र से भविष्य में मैगनीज, कोबाल्ट, ताँबा, ब्रोमाइड, मैगनीशियम, आयोडीन आदि की प्राप्ति की जा सकती है। इसमें सन्देह नहीं कि नयी तकनीकों के विकास के बल पर मानव सामुद्रिक जल का और अधिक उपयोग कर सकता है।

जल संसाधन के संरक्षण (The Conservation of  Water Resources)

जल अत्याधिक उपयोगी संसाधन है। इसके विविध उपयोग हैं, परन्तु यह सर्वत्र सुलभ या प्रचुर नहीं है। फलतः जल संसाधन संरक्षण की अनिवार्य आवश्यकता है। जिस तरह इसके विभिन्न उपयोग हैं उसी तरह इसका संरक्षण भी विविध रूपों में किया जाना चाहिए।

(i) धरातलीय जल मानव जीवन के लिए अधिक महत्वपूर्ण है, जो वर्षा द्वारा प्राप्त होता है। अतः वर्षा जल को उचित रूप में संग्रह करना और इस जल का अधिकतम उपयोग संरक्षण का मूल मंत्र है। उपयोग में आने वाला जल सदैव समुद्र की ओर जाने को उन्मुख रहता है, अतएव जल के अपवाह को नियमित करना, उसको संचय करना, सतह का निश्चित भंडार बनाना, नदियों पर बाँध बनाकर प्रवाह को नियमित करना, बाढ़ रोकना आदि कार्यों से इसकी उपयोगिता में वृद्धि होती है।

(ii) जल का सदुपयोग भी जल संरक्षण का प्रमुख पक्ष है। अतः घरेलू औद्योगिक तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जल का सदुपयोग करके, दुरुपयोग को कम किया जा सकता है।

(iii) भूमिगत जल जो कि प्रधानतः संरक्षित जल है, का अत्यधिक शोषण भूमिगत जल के स्तर को नीचा कर देता है। भूमिगत जल की मात्रा क्षेत्र विशेष में सीमित होती है, इसलिये अत्यधिक दोहन से यह भी समाप्त हो सकता है।

         अतः कुओं तथा नलरूपों में जितनी मात्रा भूमिगत जल की बाहर निकलती है, उतनी मात्रा भूमिगत जल की बाहर निकलती है, उतनी आपूर्ति भी होती रहनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि भूमिगत जल के अत्यधिक शोषण को रोकने की व्यवस्था की जाये तथा जमीन के अंदर अत्यधिक जल प्रवेश हेतु वन तथा मिट्टी से संबंधित तत्त्वों की सुरक्षा की जाये। इसके अतिरिक्त भूगर्भ जलाशयों के निर्माण की नव तकनीक का विकास करके प्रेरित अन्तः स्रवण द्वारा भूमि जल संचय को बढ़ाया जा सकता है।

(iv) जल को शुद्ध रखना भी जल संरक्षण की प्राथमिक आवश्यकता है। दीर्घकाल से सीवर, उद्योगों, गैस प्लांटों, शोधन शालाओं तथा खानों आदि के विषैले रसायन, हानिकारक पदार्थ और गन्दा जल नदियों और झीलों में गिराये जाने से स्वच्छ जल की प्राप्ति कठिन हो गयी है तथा प्रदूषित जल से मानव एवं पौधों सहित समस्त जन्तु समुदाय को अकथनीय और असाध्य क्षति का सामना करना पड़ता है।

      अतएव सभी प्रकार की औद्योगिक इकाइयों को इस बात के लिए मजबूर किया जाना चाहिए कि वे कारखानों एवं खदानों से निकलने वाले अपशिष्टों एवं मल-जल को बिना शोधित किए नदियों, झीलों या तालाबों में विसर्जित न करें।

      नगरपालिकाओं द्वारा सीवर शोधन संयन्त्रों की व्यवथा की जाये तथा इस प्रकार की तकनीक का विकास किया जाये कि उत्पादकता को प्रभावित किए बिना जल के उपयोग को कम किया जा सके। इससे गन्दे पानी के बहाव की समस्या अवश्य कम होगी। जिससे प्रदूषित जल का प्रयोग कम मात्रा में संभव हो सकेगा।

(v) भू-तापीय जल (एक प्रकार का भूमिगत जल जो काफी गहराई में होता है) का भी प्रयोग किया जाये।

(vi) जिन क्षेत्रों में मीठे जल का अभाव है, वहाँ समुद्री जल के निर्लवणीयकरण की तकनीक विकसित करके मीठे जल की कमी दूर की जा सकती है। कुवैत ने इस दिशा में एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है।

(vii) जल संरक्षण के लिये जनजागरुकता सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है। समाज को सचेत करने के लिये जनजागरण अभियान चलाना सामयिक आवश्यकता है। इससे जहाँ एक ओर जल के संतुलित उपयोग की आदत विकसित होगी, वहीं दूसरी ओ जल के दुरुपयोग की आदत में सुधा होगा।

4. Major Agriculture Systems in The World (विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियाँ)

4. Major Agriculture Systems in The World

(विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियाँ)



        Major Agriculture  

         मिट्टी को जोतने-गोड़ने तथा फसल उगाने एवं पशुपालन की कार्यप्रणाली, कला एवं विज्ञान को कृषि कहते हैं। कृषि मनुष्य का सबसे महत्वपूर्ण व्यवसाय है, क्योंकि इससे समस्त संसार के भोजन, वस्त्र तथा आवास की आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। विद्वानों का विचार है कि कृषि का आरम्भ दक्षिण-पश्चिमी एशिया में लगभग 4000 ईसा पूर्व हुआ।

          कुछ विद्वानों का मत है कि मनुष्य कृषि कार्य पाषाण युग से ही करता आया है।

         कृषि ने मनुष्य को स्थायी आवास की सुविधा दी। कृषि का मशीनीकरण हो जाने से उत्पादन में वृद्धि हुई और कृषि उत्पादों का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार शुरू हो गया। आज संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया तथा रूस बड़ी मात्रा में कृषि उत्पादों का निर्यात करते हैं जबकि ग्रेट ब्रिटेन, नीदरलैण्ड, डेनमार्क तथा जापान इन वस्तुओं का आयात करते हैं।

कृषि पद्धतियाँ (Agricultural Systems):-

          भूतल पर विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार की भौतिक, आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितियाँ पाई जाती हैं जिस कारण अलग-अलग भागों में अलग-अलग कृषि पद्धतियाँ अपनाई जाती हैं। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है:

1. जीविकोपार्जी अथवा जीविका कृषि

(Subsistence Agriculture)

2. आधुनिक कृषि

(Modern Agriculture)

3. विस्तृत कृषि

(Extensive Agriculture)

4. वाणिज्य कृषि

(Commercial Farming)

5. मिश्रित कृषि अथवा व्यापारिक फसल एवं पशुपालन

(Mixed Farming or Commercial Crops and Livestock)

6. डेरी फार्मिंग

(Dairy Farming)

7. ट्रक कृषि

(Truck Farming)

8. उद्यान कृषि

(Horticulture)

1. जीविकोपार्जी अथवा जीविका कृषि (Subsistence Agriculture):-

         इस कृषि में कृषक अपनी तथा अपने परिवार के सदस्यों की उदरपूर्ति के लिए फसलें उगाता है। कृषक अपने उपभोग के लिए वे सभी फसलें पैदा करता है जिनकी उसे आवश्यकता होती है। अतः इस कृषि में फसलों का विशिष्टीकरण नहीं होता। इनमें धान, गेहूँ, दलहन तथा तिलहन  सभी का समावेश होता है। विश्व में जीविकोपार्जी कृषि के दो रूप पाए जाते हैं:

(क) आदिम जीविकोपार्जी कृषि जो स्थानान्तरी कृषि के समरूप है।

(ख) गहन जीविकोपार्जी कृषि जो पूर्वी तथा मानसून एशिया में प्रचलित है।

      चावल सबसे महत्वपूर्ण फसल है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूँ, जौ, मक्का, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, दालें तथा तिलहन बोये जाते हैं। यह कृषि भारत, चीन, उत्तरी कोरिया तथा म्यांमार में की जाती है। इस कृषि के महत्वपूर्ण लक्षण निम्नलिखित हैं :

(i) जोत बहुत छोटे आकार की होती हैं।

(ii) कृषि भूमि पर जनसंख्या के अधिक दबाव के कारण भूमि का गहनतम उपयोग होता है।

(iii) कृषि की गहनता इतनी है कि वर्ष में दो, तीन तथा कहीं-कहीं चार फसलें भी ली जाती हैं।

(iv) मशीनीकरण के अभाव तथा अधिक जनसंख्या के कारण मानवीय श्रम का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है।

(v) कृषि के उपकरण बड़े साधारण तथा परम्परागत होते हैं, परन्तु पिछले कुछ वर्षों से जापान, चीन तथा उत्तरी कोरिया में मशीनों का प्रयोग भी होने लगा है।

(vi) अधिक जनसंख्या के कारण मुख्यतः खाद्य फसलें ही उगाई जाती हैं और चारे की फसलों तथा पशुओं को विशेष स्थान नहीं मिलता।

(vii) गहन कृषि के कारण मिट्टी की उर्वरता का ह्रास हो जाता है। मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए हरी खाद, गोबर, कम्पोस्ट तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। जापान में प्रति हेक्टेअर रासायनिक उर्वरकों की खपत सर्वाधिक है।

2. आधुनिक कृषि (Modern Agriculture):-

        इस कृषि में आधुनिक ढंग से फसलें उगाई जाती हैं। कृषि के विभिन्न कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न मशीनों का प्रयोग किया जाता है। अधिक उपज लेने के लिए उन्नत बीज, उर्वरक, कीटनाशक दवाइयाँ तथा सिंचाई की उत्तम सुविधा का प्रयोग किया जाता है। विस्तृत कृषि, वाणिज्य कृषि, मिश्रित कृषि, डेयरी फार्मिंग उद्यान कृषि,आदि आधुनिक ढंग से की जाती है। 

3. विस्तृत कृषि (Extensive Agriculture):-

      विस्तृत कृषि एक मशीनीकृत कृषि है जिसमें खेतों का आकार बड़ा, मानवीय श्रम कम, प्रति हेक्टेअर उपज कम और प्रति व्यक्ति तथा कुल उपज अधिक होती है। यह कृषि मुख्यतः शीतोष्ण कटिबन्धीय कम जनसंख्या वाले प्रदेशों में की जाती है। इन प्रदेशों में पहले चलवासी चरवाहे पशुचारण का कार्य करते थे और बाद में यहाँ स्थायी कृषि होने लगी। इन प्रदेशों में वार्षिक वर्षा 30 से 60 सेमी होती है। जिस वर्ष वर्षा कम होती है उस वर्ष फसल को हानि पहुँचती है। यह कृषि उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में शुरू हुई।

        इस कृषि का विकास कृषि-यन्त्रों तथा महाद्वीपीय रेलमार्गों के विकसित हो जाने से हुआ है। विस्तृत कृषि मुख्यतः रूस तथा यूक्रेन के स्टेपीज (Steppes), कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रेयरीज (Prairies), अर्जेण्टीना के पम्पास (Pampas of Argentina) तथा आस्ट्रेलिया के डाउन्स (Downs of Australia) में की जाती है।

       विस्तृत कृषि के मुख्य लक्षण निम्नलिखित है:

(i) खेत बहुत ही बड़े आकार के होते हैं। इनका क्षेत्रफल प्रायः 240 से 1600 हेक्टेअर तक होता है।

(ii) बस्तियाँ बहुत छोटी तथा एक-दूसरे से दूर स्थित होती हैं। 

(iii) खेत तैयार करने से फसल काटने तक का सारा काम मशीनों द्वारा किया जाता है। ट्रैक्टर, ड्रिल, कम्बाइन, हार्वेस्टर, थ्रेशर और विनोअर मुख्य कृषि यंत्र हैं।

(iv) मुख्य फसल गेहूँ हैं। अन्य फसलें हैं- जौ, जई, राई, फ्लैक्स तथा तिलहन।

(v) खाद्यान्नों को सुरक्षित रखने के लिए बड़े-बड़े गोदाम बनाए जाते हैं जिन्हें साइलो या एलीवेटर्स कहते हैं। 

(vi) यान्त्रिक कृषि होने के कारण श्रमिकों की संख्या कम होती है।

(vii) प्रति हेक्टेअर उपज कम तथा प्रति-व्यक्ति उपज अधिक होती है।

      जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि के कारण विस्तृत कृषि का क्षेत्र घटता जा रहा है। पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्यूनस आयर्स, आस्ट्रेलिया के तटीय भागों तथा यूक्रेन जैसे घनी जनसंख्या वाले क्षेत्रों से लोग विस्तृत कृषि के क्षेत्रों में आकर बसने लगे हैं जिससे कृषि का क्षेत्र कम होता जा रहा है। इस प्रकार 19वीं शताब्दी में शुरू हुई यह कृषि अब बहुत ही सीमित क्षेत्रों में की जाती है।

4. वाणिज्य कृषि (Commercial Farming):-

      इस कृषि में फसलों को बेचने के लिए पैदा किया जाता है। अतः उत्पादन में फसल विशिष्टीकरण इसकी मुख्य विशेषता है। विश्व में यह दो रूपों में पाई जाती है-

(i) मध्य अक्षांशों में वाणिज्य अन्न कृषि तथा

(ii) उष्ण कटिबन्ध में रोपण कृषि।

(i) मध्य अक्षांशों में वाणिज्य अन्न कृषि:-

        मध्य अक्षांशों में गेहूँ के उत्पादन में विशिष्टीकरण इस कृषि का मुख्य उदाहरण है। उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी क्षेत्र, यूक्रेन क्षेत्र, पश्चिमी यूरोप, अर्जेण्टीना, आस्ट्रेलिया के दक्षिणी भागों तथा भारत के पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस प्रकार की कृषि की जाती है।

      इस कृषि में अधिकांश कार्य मशीनों से किया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में गेहूँ के कृषि क्षेत्रों में कृषक बाहर से आते जाते हैं। इनके लिए साइडवाक कृषक तथा सूटकेस कृषक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। भारत में वाणिज्य कृषि बड़े पैमाने पर तो नहीं, परन्तु किसी हद तक की जाती है। यहाँ पर मशीनीकरण भी सीमित ही हुआ है।

(ii) उष्ण कटिबन्ध में रोपण कृषि:-

       रोपण कृषि का विकास उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में उपनिवेश काल में यूरोपीय देशों द्वारा किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य यूरोपीय देशों को वे कृषि उपजें उपलब्ध कराना था जो केवल उष्ण कटिबन्धीय जलवायु में ही होती हैं। अतः यह एक व्यापारिक कृषि बन गई जिसमें फसलों का विक्रय किया जाता है। भारत में असम व दार्जिलिंग तथा श्रीलंका के चाय बागान, मलेशिया के रवर बागान, ब्राजील के कॉफी बागान इस कृषि के मुख्य उदाहरण हैं।

       प्रारम्भ में पूँजी निवेश उपनिवेशी देशों द्वारा किया गया था। बागानों का प्रबन्ध भी उपनिवेशी देशों के हाथों में ही था, परन्तु बड़े पैमाने पर श्रम स्थानीय मजदूरों या बाहर से लाए गए भाड़े या बन्धुआ मजदूरों द्वारा उपलब्ध कराया गया। इस कृषि में उत्पाद को भी बागान पर ही संसाधित किया जाता है। क्योंकि रोपण कृषि की उपजें मुख्यतः निर्यात के लिए ही होती हैं इसलिए इस कृषि के विकास के लिए सस्ते परिवहन का होना अति आवश्यक है। यही कारण है कि विश्व की अधिकांश रोपण कृषि तटीय भागों में विकसित हुई है या वह सस्ते परिवहन द्वारा तट से जुड़ी हुई है।

      रोपण कृषि के बागान प्रायः बड़े आकार के होते हैं और कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में पनपते हैं। सामान्यतः इनका आकार 4 से 40 हेक्टेअर तक होता है, परन्तु कहीं-कहीं ये बागान बहुत बड़े होते हैं। उदाहरणतः लाइबेरिया में हरबल नामक स्थान पर फायस्टोन कम्पनी का रबर का बागान 54.4 हजार हेक्टेअर भूमि पर फैला हुआ है।

      उपनिवेशवाद की समाप्ति पर उपनिवेश स्वतन्त्र हो गए और रोपण कृषि की विशेषताओं में परिवर्तन आ गया। उदाहरणतः बागानों का स्वामित्व तथा प्रबन्ध उपनिवेशी देशों से हटकर स्थानीय अधिकारियों के हाथों में आ गया। अब ये बागान अपनी उपजों को निर्यात करने के साथ-साथ स्थानीय बाजारों में भी बेचते हैं।

5. मिश्रित कृषि अथवा व्यापारिक फसल एवं पशुपालन (Mixed Farming or Commercial Crops and Livestock):-

        इस कृषि में फसलें उगाने तथा पशुओं को पालने का कार्य एक साथ किया जाता है। यह मिश्रित बुआई से भिन्न है। मिश्रित बुआई में एक ही खेत में एक ही समय पर कई फसलें बोई जाती हैं जबकि मिश्रित कृषि में फसलें उगाने के साथ-साथ पशुपालन का कार्य भी किया जाता है। मिश्रित कृषि यूरोप में आयरलैण्ड से रूस तक, उत्तरी अमेरिका के पूर्वी भाग, अर्जेण्टीना के पम्पास, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका और न्यूजीलैण्ड में की जाती है।

      संयुक्त राज्य अमेरिका का मिश्रित कृषि क्षेत्र मक्के की पेटी है। मक्का खिलाकर पशुओं को मोटा किया जाता है। इसके अतिरिक्त जई, गेहूँ तथा घास भी पैदा की जाती है। अब यहाँ पर सोयाबीन की फसल भी पैदा की जाने लगी है। यह एक प्रोटीनयुक्त फसल है जिसका विस्तार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। यह कृषि अधिकतर बड़े-बड़े नगरों के आस-पास की जाती है जिससे इसकी उपजों की बिक्री में कोई कठिनाई नहीं होती। उत्तम कृषि विधियाँ, उत्तम परिवहन, शहरी बाजार की निकटता तथा विश्वसनीय वर्षा से इस कृषि को बड़ी सहायता मिलती है।

6. डेरी फार्मिंग (Dairy Farming):-

      डेरी फार्मिंग कृषि का वह विशिष्ट ढंग है जिसमें दूध देने वाले पशुओं के प्रजनन, पशुचारण और नस्ल सुधारने की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है। दुधारू पशुओं, विशेषतया गायों को पाला जाता है। दूध तथा दुग्ध पदार्थ, जैसे- मक्खन, पनीर, क्रीम, संघनित दूध और पाउडर दूध इस कृषि के मुख्य उत्पाद हैं।

डेरी फार्मिंग के क्षेत्र:-

     डेरी फार्मिंग यूरोप (ब्रिटेन, आयरलैण्ड, डेनमार्क, नीदरलैण्ड्स, बेल्जियम, नार्वे, स्वीडन, स्विटजरलैण्ड, फ्रांस, यूक्रेन, लाटविया, लिथुआनिया तथा एस्टोनिया), उत्तरी अमेरिका की विशाल झीलों का क्षेत्र, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड में विकसित है।

     भारत में डेरी कृषि का विकास सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है। | गुजरात की अमूल डेयरी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। अधिकांश राज्यों में डेयरी विकास बोर्ड बनाए गए हैं। झांसी में चारा शोध संस्थान तथा करनाल में डेरी शोध संस्थान का भी गठन किया गया है। भारत में अधिकांश दूध गायों से नहीं बल्कि भैंसों से प्राप्त किया जाता है।

डेरी फार्मिंग की विशेषताएँ

(i) दुधारू पशुओं को पालना डेरी फार्मिंग की सबसे बड़ी विशेषता है। पशुओं के स्वास्थ्य और उनकी नस्ल पर विशेष ध्यान दिया जाता है। होलिस्टीन, रेनडेन, जर्सी, गोर्नसे तथा आयर शायर जैसी उच्चकोटि की नस्लों वाली गायें पाली जाती हैं।

(ii) पशुओं की देखभाल वैज्ञानिक तरीकों से की जाती है।

(iii) दूध दोहने और उसे संसाधित करने की क्रियाओं को मशीनों द्वारा किया जाता है।

(iv) डेरी फार्मिंग घने औद्योगिक नगरों की मांग पर आश्रित है इसलिए अधिकांश डेरी फार्मिंग शहरी क्षेत्रों के निकट ही पनपा है।

(v) दूध और दुग्ध पदार्थों को मांग के क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए तीव्र यातायात का प्रयोग किया जाता है।

(vi) नियोजित आवास, मशीन, चारे की मिलों, प्रशीतन तथा संचयन के लिए अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है।

7. ट्रक कृषि (Truck Farming):-

     यह एक विशेष प्रकार की कृषि है जिसमें साग-सब्जियों की कृषि की जाती है। इन वस्तुओं को प्रतिदिन ट्रकों में भरकर निकटवर्ती नगरीय बाजारों में ले जाकर बेचा जाता है। बाजार से कृषि क्षेत्र की दूरी इस बात पर निर्भर करती है कि ट्रक द्वारा रात-भर चलने में कितनी दूरी तय होती है। इसीलिए इस कृषि का नाम ट्रक कृषि रखा गया है।

प्रदेश- ट्रक कृषि एवं उद्यान कृषि मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी यूरोप (ब्रिटेन, डेनमार्क, बेल्जियम, नीदरलैण्ड्स, जर्मनी और फ्रांस), संयुक्त राज्य अमेरिका (उत्तर-पूर्वी भाग, केलीफोर्निया, फ्लोरिडा प्रायद्वीप तथा पूर्वी तटीय भाग) एवं कनाडा के पूर्वी भाग में की जाती है। इन प्रदेशों के शहरी तथा औद्योगिक क्षेत्रों में ताजी सब्जियों की भारी मांग रहती है और ये वस्तुएँ इन प्रदेशों को ट्रक कृषि से ट्रकों द्वारा प्राप्त होती हैं। अतः इस कृषि का नगरीकरण से गहरा सम्बन्ध है।

      भारत में वातावरण अनुकूल तथा वर्धनकाल लम्बा होने के कारण लगभग सभी भागों में सब्जियाँ उगाई जाती हैं। यहां पर अधिकांश जनसंख्या शाकाहारी है और मांस का मूल्य अधिक होने के कारण सब्जियों की मांग अधिक रहती है। इसलिए इस कृषि पर अधिक बल दिया जाता है।

विशेषताएँ- ट्रक कृषि एवं उद्यान कृषि की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

(i) ट्रक एवं उद्यान कृषि के खेत छोटे होते हैं।

(ii) परिवहन की सुविधा अच्छी रहती है।

(iii) गहन कृषि की जाती है।

(iv) सिंचाई की अच्छी व्यवस्था होती है।

(v) खादों का प्रयोग बड़ी मात्रा में किया जाता है।

(vi) अधिकांश कार्य हाथों से किया जाता है।

(vii) पेड़ों तथा पौधों को बीमारियों से बचाने के लिए दवाइयों का प्रयोग बड़ी मात्रा में किया जाता है।

8. उद्यान कृषि (Horticulture):-

        यह लगभग ट्रक कृषि जैसी ही है, अन्तर केवल इतना है कि इसमें साग-सब्जी के स्थान पर फलों तथा फूलों की कृषि की जाती है। फलों और फूलों की मांग नगरों में बहुत होती है।

फल-

       नगरीय क्षेत्रों में फलों की मांग बहुत होती है जिससे कृषक को पर्याप्त आय हो जाती है। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के फल उगाए जाते हैं। उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में केला, आम, जामुन, नारियल, काजू, आदि। शीतोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में सेब, आडू, अखरोट, नाशपाती एवं रसबेरी, आदि तथा भूमध्यसागरीय देशों में खट्टे फल, जैसे- सन्तरा, मौसमी, नीबू, आदि मुख्य फल हैं।

फूल-

      फलों की भांति फूलों की भी नगरीय क्षेत्रों में काफी मांग रहती है और फूलों की बिक्री से कृषक को काफी धन प्राप्त होता है। फूलों का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार भी होता है। जार्जिया तथा आर्मीनिया में पैदा किए गए गुलाब के फूल मास्को तथा रूस के अन्य नगरों में भेजे जाते हैं।

        शीत ऋतु में इथोपिया प्याज के फूलों का निर्यात यूरोपीय देशों को करता है। नीदरलैण्ड्स में ट्यूलिप की कृषि विशेष रूप से की जाती है। यहाँ से इनका निर्यात वायुयानों द्वारा यूरोप तथा अमेरिका के बड़े-बड़े नगरों को किया जाता है। भारत में गुलाब तथा गेंदे के फूल अधिक पैदा किए जाते हैं।

       अजमेर के निकट पुष्कर घाटी गुलाब की कृषि के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। दिल्ली के आस-पास के क्षेत्रों में भी फूलों की खेती की जाती है। कश्मीर घाटी में विभिन्न प्रकार के फूल उगाए जाते हैं। यहाँ कटेवा भूमि पर केसर की खेती होती है। कन्नौज, जौनपु तथा लखनऊ में फूलों प आधारित सुगन्धित तेल बनाए जाते हैं।

प्रश्न प्रारूप

विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियों (Agriculture Systems) का वर्णन करें।

3. वॉन थ्यूनेन के कृषि स्थानीयकरण सिद्धान्त 

3. वॉन थ्यूनेन के कृषि स्थानीयकरण सिद्धान्त



        कृषि उत्पादन का कार्य विस्तृत क्षेत्र पर होता है, इसीलिए साधारणतया इसमें स्थानीयकरण सम्बन्धी कोई समस्या प्रथम दृष्टया नजर नहीं आती, किन्तु जिस तरह किसी उद्योग के किसी स्थान विशेष पर स्थानीयकरण की समस्या उत्पन्न होती है, उसी तरह यह समस्या कृषि उत्पादन में भी होती है। इस समस्या के समाधान हेतु 1826 में सर्वप्रथम वॉन थ्यूनेन ने प्रयास किया।

      जॉन हेनरिज वॉन थ्यूनेन (1783-1850) एक जर्मन विद्वान थे। सन् 1810 में वे रोस्टोक नगर के नजदीक मैकलनबर्ग में टेलो कृषि फार्म के मैनेजर बने। थ्यूनेन जीवनपर्यन्त 40 सालों तक बड़ी ही कुशलता एवं सफलता के साथ अपना पद सम्भाले रहे।

       अपने जीवन के अन्तिम 40 वर्षों में उन्होंने अपना फार्म चलाने के लिए लागत तथा उत्पादन की छोटी से छोटी जानकारी का अध्ययन किया। उन्होंने अपने कृषि अवलोकनों के माध्यम से एक विशेष तरह के परस्पर सम्बन्ध को ढूँढ निकाला, जो कि तुलनात्मक लाभ के सिद्धान्त पर आधारित था।

      वॉन व्यूनेन के उस कृषि स्थानीयकरण सिद्धान्त पर विचार करने से पहले उनके द्वारा प्रयुक्त कुछ शब्दाबलियों से परिचित होना आवश्यक है:

(अ) आर्थिक लगान (Economic Rent)- आर्थिक लगान वस्तुतः वह सापेक्षिक लाभ है, जो किसी फसल को बाजार के नजदीक की भूमि पर उपजाने से प्राप्त होता है।

(ब) लगान शून्य भूमि (No Rent Land)- ऐसी सीमान्त क्षेत्र की भूमि जहां फसल उत्पादन से कोई लाभ प्राप्त नहीं होता, लगान शून्य भूमि कहते हैं।

     वॉन थ्यूनेन ने अपने जटिल सिद्धान्त को सरल रूप देने के लिए कुछ मान्यताओं की एक सूची तैयार की, ताकि सम्बन्धित बाधाओं पर अंकुश रखा जा सके। इनकी मान्यताएँ निम्न प्रकार थीं:

1. सर्वप्रथम उन्होंने एक ऐसे विलग प्रदेश (Isolated (State) की कल्पना की, जिसके केन्द्र में एक ही नगर स्थित हो और उस नगर के चतुर्दिक विस्तृत क्षेत्र हो। वह नगर उस प्रदेश का एकमात्र क्रय-विक्रय स्थल (बाजार) हो। उस प्रदेश से न तो कृषि उत्पाद बाहर बेचा जाता हो और न ही वह नगर अन्य प्रदेश से आयात करता हो।

2. केन्द्रीय नगर को छोड़कर सम्पूर्ण क्षेत्र में ग्रामीण आबादी हो। ग्रामीण आबादी अधिकतम लाभ प्राप्ति की इच्छुक हो और नगर में मांग के अनुरूप फसलों की किस्मों में फेरबदल करने में सक्षम हो।

3. उस विलग प्रदेश में भूतल समान हो तथा सर्वत्र समान भौतिक दशाएँ हों, अर्थात् धरातल, जलवायु, मृदा की उत्पादन क्षमता, आदि सर्वत्र समान हो तथा फसलोत्पादन के अनुकूल हो।
4. सम्पूर्ण प्रदेश में उत्पादन एवं परिवहन की लागत समान हो। साथ ही कृषि उत्पादन में प्रदेश आत्मनिर्भर भी हो।

5. इस विलग प्रदेश में एक ही प्रकार का परिवहन साधन घोड़ा गाड़ी उपलब्ध हो।

6. परिवहन व्यय दूरी एवं भार के अनुपात में वृद्धिमान हो।

        इन मान्यताओं के पश्चात् थ्यूनेन ने कहा कि उक्त प्रकार अनुकूल दशाओं वाले विलग प्रदेश में केन्द्रीय नगर के चारों की तरफ नगर से बढ़ती दूरी के अनुरूप विभिन्न फसलों का उत्पादन पृथक्-पृथक् संकेन्द्रीय वृत्तखण्डों (Concentric Zones) में होगा।

      नगर के निकटतम प्रथम वृत्तखण्ड में फल, शाक-सब्जी व दूध का उत्पादन होगा, क्योंकि इन वस्तुओं की मांग नगर में अधिक रहती है और ये जल्दी खराब भी हो जाती हैं। इस पेटी का क्षेत्रीय विस्तार नगर की जरूरतों पर निर्भर करता है। अगर नगरीय जनसंख्या में इन चीजों की मांग अधिक होगी, तो यह पेटी अधिक दूरी तक विस्तृत होगी।

      द्वितीय वृत्तखण्ड में ईंधन के लिए लकड़ी का उत्पादन कार्य होगा। लकड़ी के भारी होने के कारण यद्यपि परिवहन व्यय अधिक होगा, परन्तु शाक-सब्जी व दूध के परिवहन व्यय से कम ही होगा, अतः इन्हें द्वितीय वृत्तखण्ड में ही स्थान दिया जाएगा।

     तृतीय वृत्तखण्ड की भूमि में गहन कृषि द्वारा अन्नोत्पादन किया जाएगा। गहन अन्नोत्पादन की वजह से पशुचारण के लिए परती जमीन नहीं छोड़ी जाएगी, किन्तु चतुर्थ वृत्तखण्ड में विस्तृत कृषि प्रणाली द्वारा अन्नोत्पादन होगा और साथ ही पशुपालन भी। परिवहन व्यय की सापेक्षिक दर के अनुसार ही पंचम वृत्तखण्ड में तीन खेत प्रणाली अपनाई जाएगी। अन्त में, षष्टम खण्ड में मांस तथा दूध प्राप्ति हेतु पशुपालन होगा। मांस वाले पशुओं को पैदल ही नगर को भेज दिया जाएगा, किन्तु दूध को परिवर्तित स्वरूप में अर्थात् मक्खन, पनीर, आदि के रूप में बाजार में भेजा जाएगा।

वॉन थ्यूनेन

चित्र-1

1. फल तथा सब्जी

2. ईंधन के लिए लकड़ी

3. गहन कृषि

4. कृषि और पशुपालन

5. तीन खेती प्रणाली

6. विस्तृत पशुपालन (मांस तथा दुग्ध प्राप्ति हेतु पशुपालन)  

       इस तरह, वॉन थ्यूनेन के अनुसार नगर के चारों तरफ छह संकेन्द्रीय वृत्तखण्डों में विभिन्न फसलों का उत्पादन होगा। उन वृत्तखण्डों अनुसार का सीमांकन अधिकतम लगान के सिद्धान्त के होगा। दूसरे शब्दों में, इस विलग प्रदेश में नगर से बढ़ती दूरी के अनुसार विभिन्न वृत्तखण्डों में विभिन्न फसलों का उत्पादन स्पष्टतः परिवहन व्यय के अनुरूप निर्धारित होगा, जिसे निम्न सूत्र से स्पष्ट किया जा सकता है:

P= S – (E+T)

जहाँ, P = किसान को फसल विक्रय से लाभ

S  = फसल का विक्रय मूल्य

E = उत्पादन लागत

T = परिवहन व्यय

      अर्थात् किसी फसल का उत्पादन नगर से उतनी दूरी तक ही हो सकेगा, जितनी दूरी तक उसके उत्पादन लागत और बाजार में पहुंचने तक के व्यय का योग उस फसल के प्रचलित मूल्य के बराबर हो। इस तरह अब तक हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि कृषि पेटी की बाह्य दूरी परिवहन लागत के कारण घटते हुए लाभ के द्वारा निर्धारित होती है, परन्तु सिर्फ ऐसा ही नहीं है, वॉन थ्यूनेन के विचार से परिवहन व्यय तो मुख्य निर्धारक घटक है ही, साथ ही विभिन्न फसलों से प्राप्त ‘सापेक्षिक लाभ’ भी प्रभाव डालता है।

      अतः उन्होंने कहा कि किसी कृषि वृत्तखण्ड में आन्तरिक क्षेत्र में उसी फसल का उत्पादन किया जाएगा, जिससे किसान को अपेक्षाकृत अधिक आर्थिक लगान प्राप्त हो। इस तथ्य को थ्यूनेन ने संलग्न चित्र 2 के माध्यम से समझाया है।

वॉन थ्यूनेन

चित्र 2

चित्र में ‘क’, ‘ख’, ‘ग’ तथा ‘घ’ फसलों हेतु आर्थिक लगान और बाजार से दूरी का सम्बन्ध प्रदर्शित है, जबकि अन्य तथ्य समान माने गए हैं। कोई फसल बाजार से जितनी दूर उत्पादित की जाएगी, स्पष्टतः उस पर परिवहन व्यय उसी अनुपात में बढ़ जाएगा और लगान घटता चला जाएगा। यही कारण है कि लगान व दूरी का सम्बन्ध प्रदर्शित करती सरल रेखाएं झुकती हुई दिखाई गई हैं। चूंकि सभी फसलों की परिवहन दशाएं समान नहीं हैं, अतः ढाल प्रवणता में भिन्नता दृष्टिगोचर होती है।

       ग्राफ में ‘क’ फसल का उत्पादन 4.5 मील तक हो सकता है। इसी प्रकार ‘ख’ फसल का 10 मील, ‘ग’ का 25 मील तथा ‘घ’ का 40 मील तक उत्पादन हो सकता है, क्योंकि क्रमशः इन्हीं दूरियों तक इन फसलों के उत्पादन से कुछ-न-कुछ आर्थिक लगान जरूर प्राप्त होगा, परन्तु सापेक्षिक लाभ के सिद्धान्त के आधार पर देंखे तो ‘क’ फसल (शाक-सब्जी-दूध) का उत्पादन विक्रय स्थल (नगर) से 1.7 मील की दूरी तक ही हो सकता है, क्योंकि उसके आगे इससे प्राप्त लगान ‘ख’ फसल से कम हो जाता है।

       इसी तरह ‘ख’ फसल (ईंधन हेतु लकड़ी) का उत्पादन 5 मील तक, ‘ग’ फसल (गहन कृषि) 19 मील तथा ‘घ’ फसलोत्पादन (विस्तृत कृषि) 40 मील की दूरी तक हो सकता है।

       इसके बाद की भूमि पर मांस व दूध के लिए पशुपालन होगा। अगर विक्रय स्थल (नगर) को केन्द्र मानकर इन्हीं दूरियों की त्रिज्या से वृत्त खींचे जाएं, तो नगर के चारों ओर इन विभिन्न फसलों के उत्पादन वाले संकेन्द्रीय वृत्तखण्ड बन जाते हैं।

वॉन थ्यूनेन

चित्र-3

      समय गुजरने के साथ-साथ वॉन थ्यूनेन द्वारा प्रतिपादित संकेन्द्रीय वृत्तखण्ड में फसल उत्पादन की आलोचना होने लगी। लोगों द्वारा यह प्रश्न उठाया जाने लगा कि यदि परिवहन के साधनों में बदलाव हो जाए, तो क्या संकेन्द्रीय वृत्तखण्ड का स्वरूप बरकरार रह सकेगा? थ्यूनेन को भी लगा कि उनके सिद्धान्त में कहीं कुछ कमी है।

       अतः सिद्धान्त को संशोधित करने के लिए उन्होंने एक नौ-परिवहन योग्य नदी को भी परिवहन के साधन के रूप में माना और कहा कि इससे माल ढुलाई तीव्र गति से होगी एवं धरातलीय परिवहन की तुलना में इस पर मात्र 10 प्रतिशत लागत आएगी।

      दूसरे, उन्होंने एक वैकल्पिक विक्रय स्थल को भी इस मॉडल में स्थान दिया, जिसमें प्रतियोगिता की पर्याप्त गुंजाइश हो। तीसरा परिवर्तन उन्होंने भूमि की समरूप उर्वरता शक्ति वाली मान्यता में किया। इन सब परिवर्तनों का प्रभाव यह हुआ कि आज के भूमि उपयोग विन्यास की भांति थ्यूनेन के संशोधित मॉडल का भी स्वरूप अनियमित दिखने लगा।

        वर्तमान में कृषि स्थानीयकरण सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप से चरितार्थ करने में थ्यूनेन की काल्पनिक मान्यताएं खरी नहीं उतरतीं। आज के युग में विविध प्रकार के तथा तीव्रगामी परिवहन के साधनों का विकास हो गया है। उत्तरोत्तर प्राविधिक विकास के फलस्वरूप परिवहन के साधनों के अलावा अन्य सामाजिक-आर्थिक कारक यथा- कृषि उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीक, आदि भी किसी प्रदेश के भूमि उपयोग को प्रभावित करने लगे हैं।

     19वीं सदी में, जब इस सिद्धान्त का जन्म हुआ था, नगरों में लकड़ी का महत्व अधिक था। खाना पकाने के अतिरिक्त घरों को गर्म रखने के लिए लकड़ी जलाई जाती थी, जबकि आज खाना पकाने हेतु रसोई गैस या मिट्टी के तेल का उपयोग होता है और घरों को गर्म रखने के लिए विद्युत् चालित रूम हीटर का।

      वायुयान, रेल जैसे तीव्रगामी एवं शीत-प्रशीतकों से परिवहन साधनों का विकास हो जाने के कारण फल, ‘युक्त शाक-सब्जी, दूध, आदि शीघ्र खराब होने वाले पदार्थों को बहुत दूर उत्पादित कर भी उन्हें शीघ्र शहर भेजना सम्भव है।

      अब किसी क्षेत्र में फसल के क्रय-विक्रय हेतु मात्र एक विक्रय स्थल (बाजार) न होकर कई विक्रय स्थल उपलब्ध हैं। तीव्रग्रामी परिवहन साधनों के विकसित हो जाने के कारण परिवहन व्यय दर भी भार तथा दूरी के अनुसार नहीं बढ़ती। थ्यूनेन ने विलग प्रदेश में एक समान प्राकृतिक वातावरण की कल्पना की थी, जो असम्भव है।

       अगर एकाकी प्रदेश में केन्द्रीय नगर के एक तरफ धरातल अधिक समतल व उपजाऊ है, तो स्वाभाविक सी बात है कि संकेन्द्रीय वृत्तखण्ड का एक ओर विस्तार अधिक होगा और दूसरी ओर कम, फलतः संकेन्द्रीय वृत्त का वास्तविक आकार नहीं बनेगा और उसका रूप विकृत हो जाएगा।

     इस तरह वर्तमान समय में विलग प्रदेश में पाई जाने वाली विभिन्नताएं कई नगर, उपनगर व केन्द्रीय नगरों की उपस्थिति, वैज्ञानिक व तकनीकी ढंग से कृषि का होना, परिवहन के विविध आधुनिक साधन, परिवहन व्यय में भिन्नता तथा प्राकृतिक वातावरण में विभिन्नता के फलस्वरूप कृषि के स्थानीयकरण में क्रमबद्धता का पाया जाना कठिन है। तथापि इस मॉडल का सारा कुछ अप्रासंगिक हो गया हो, ऐसा भी नहीं है। इसके ऐतिहासिक पक्ष को नजरअन्दाज कर इसकी आलोचना करना अवैज्ञानिक है।

        वॉन थ्यूनेन ने इस सिद्धान्त का विवेचन बड़े तार्किक व वैज्ञानिक ढंग से किया है। अनेक त्रुटियों के होते हुए भी उनके सिद्धान्त का विशेष महत्व है, क्योंकि इस सिद्धान्त ने कृषि भूगोल के अध्ययन में एक नवीन अध्याय का शुभारम्भ किया औ अनेक विद्वानों का ध्यान अपनी तफ आकर्षित किया।



उत्तर लिखने का दूसरा तरीका



वॉन थ्यूनेन के कृषि स्थानीयकरण सिद्धांत की आलोचनात्मक व्याख्या करें तथा वर्तमान में इसकी क्या प्रासंगिकता है। इसकी भी चर्चा करें।

        वॉन थ्यूनेन एक जर्मन अर्थशास्त्री थे जिन्होंने 1826 ई० में कृषि स्थानीयकरण का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इनका सिद्धांत “सकेन्द्रीय वलय सिद्धांत” के नाम से जाना जाता है। हालांकि यह सिद्धांत 198 वर्ष पूर्व दिया गया था, लेकिन इसकी चर्चा आज भी भूगोल में की जाती है। वर्तमान समय में कृषि का प्रारूप बदल गया है। इसके बावजूद भी इनका सिद्धांत आर्थिक भूगोल में मान्यता रखता है।

मान्यताएँ:-

        वॉन थ्यूनेन का कृषि स्थानीयकरण सिद्धांत एक चिर सम्मतकालीन सिद्धांत (Classical theory) है जो निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है।

(1) भौगोलिक प्रदेश एकाकी (पृथक) होना चाहिए।

(2) भौगोलिक प्रदेश के बीच में एक केन्द्रीय बाजार होना चाहिए।

(3) इसकी भौगोलिक प्रदेश में सभी भौतिक परिस्थितियाँ (जैसे – स्थलाकृति, जलवायु, मृदा और वनस्पति) एक समान हो।

(4) केन्द्रीय बाजार की एकाकी भौगोलिक प्रदेश में क्रय-विक्रय का केन्द्र हो।

(5) केन्द्रीय बाजार निश्चित बाजार मूल्य पर क्रय-विक्रय का कार्य करता हो।

(6) सम्पूर्ण एकाकी प्रदेश में कृषि उत्पादन लागत एक समान हो, लेकिन दूरी के अनुसार परिवहन मूल्य में परिवर्तन होता हो।

(7) कृषकों को बाजार का पूर्ण ज्ञान हो।

(8) एकाकी भौगोलिक प्रदेश में घोड़ागाड़ी और नौका का प्रयोग परिवहन के रूप में किया जाता हो।

(9) दूरी और भार में वास्तविक वृद्धि के अनुसार परिवहन मूल्य में वृद्धि होता हो।

        ऊपर वर्णित मान्यताएँ जिन भौगोलिक प्रदेशों में लागू होती है वहीं वॉन थ्यूनेन के कृषि अवस्थिति सिद्धांत लागू होता है।

परिकल्पनाएँ:-

        वॉन थ्यूनेन ने निम्नलिखित दो प्रमुख परिकल्पनाओं का निर्धारण किया है।

(1) केन्द्रीय नगर से ज्यों-2 दूर जाते हैं त्यों-2 फसल विशेष की गहनता में क्रमिक रूप से कमी आती है।

(2) केन्द्रीय नगर से दूरी में ज्यों-2 वृद्धि होती है त्यों-2 भू-उपयोग प्रारूप में संकेन्द्रीय पेटी के रूप में परिवर्तन होता है।

सकेन्द्रीय वलय सिद्धांत

       वॉन थ्यूनेन के अनुसार केन्द्रीय नगर के चारों तरफ कृषि भूमि उपयोग की 6 संकेन्द्रीय वलय पेटियों का विकास होता है। वॉन थ्यूनेन ने नगरों के चारों ओर विकसित सकेन्द्रीय वलय पेटियों को समझाने हेतु दो मॉडल प्रस्तुत किया है:-

(1) सैद्धांतिक मॉडल

(2) व्यवहारिक मॉडल

        सैद्धांतिक मॉडल पूर्णतः ज्यामितीय है जबकि व्यवहारिक मॉडल पूर्णतः संशोधित है। वॉन थ्यूनेन ने संशोधन के लिए दो करकों को जिम्मेदार ठहराया है।

(1) अधिकतर नगर नदी के किनारे होते हैं और नदी परिवहन प्रभाव के कारण सकेन्द्रीय वलय पेटियाँ पूर्णतः गोल न होकर नदी प्रवाह की तरफ प्रक्षेपित हो जाती है।

(2) बड़े नगरों के बाहरी क्षेत्रों में भी छोटे केन्द्रीय बस्तियों का विकास हो जाता है जिसके कारण भी सकेन्द्रीय वलय पेटियाँ निरूपित हो जाती है।

        वॉन थ्यूनेन के द्वारा प्रस्तुत सैद्धांतिक मॉडल एवं व्यवहारिक मॉडल नीचे के चित्र में देखा जा सकता है-

चित्र:- वॉन थ्यूनेन का सैद्धांतिक मॉडल

चित्र:- वॉन थ्यूनेन का व्यवहारिक मॉडल

         वॉन थ्यूनेन के अनुसार नगरों के चारों ओर निम्नलिखित सकेन्द्रीय वलय पेटी का विकास होता है:-

1. फल, सब्जी एवं दुग्ध 

2. ईंधन के लिए लकड़ी/वन

3. गहन खाद्यान कृषि

4. कृषि और पशुपालन

5. तीन खेती प्रणाली

6. पशुपालन (चारागाह)

        वॉन थ्यूनेन ने बताया कि नगर के तत्काल बाहर फल, सब्जी और दुग्ध की कृषि की जाती है क्योंकि ये दैनिक आवश्यकता की वस्तु है तथा शीघ्र विनष्ट होने की प्रवृ‌ति रखते हैं। अगर इसकी खेती नगरों से दूर किया जाता है तो वे बर्बाद हो सकते हैं।

      दूसरी पेटी में जलावन की लकड़ी या वन का विकास होता है क्योंकि यह कम मूल्य का भारी वस्तु है। अत: दूर से इसका परिवहन मंहगी होती है।

     तीसरी पेटी में खाद्यान्न फसल पेटी का विकास होता है क्योंकि फल, सब्जी, दुग्ध मिलने के बाद खाद्य फसल अनिवार्य वस्तु है। नगरों में खाद्यान्न की मांग बहुत अधिक होती है। इसलिए किसान तीसरी पेटी में खाद्यान्न फसल का विकास करते हैं।

       चौथी पेटी में खाद्यान्न फसल, परती भूमि और पशुचारण साथ-2 की जाती है। चौथी पेटी में खाद्यान्न फसल की खेती गहनता से नहीं की जाती है क्योंकि एक ओर बाजार से जहाँ दूरी बढ़ जाती है वहीं खाद्यान्न फसलों की माँग में कमी आने लगती है। चौथी पेटी में निवास करने वाले किसान समय-समय पर परती भूमि को छोड़‌ते रहते हैं तथा पशुचारे की कृषि भी करते हैं।

     पाँचवी पेटी में कृषि भूमि का तीन भागों में विभाजन होता है। इसलिए इस पेटी को तीन कृषि पद्धति वाली पेटी कहते हैं। 5वीं पेटी का किसान अपने कुल भूमि के 1/3 भाग पर खाद्यान्न के उत्पादन, 1/3 भूमि पर पशुपालन और शेष 1/3 भूमि परती भूमि के रूप में उपयोग करता है। कृषि भूमि का यह विभाजन फसल चक्र के नियम पर आधारित होता है अर्थात इस पेटी के किसान अपने भूमि पर लगातार 2-3 वर्षों तक कृषि करते है। उसके बाद उसे परती भूमि के रूप में छोड़ देते हैं।

       छठी पेटी में पशुपालन का कार्य बड़े पैमाने पर किया जाता है क्योंकि छठी पेटी में जनसंख्या का दबाव बहुत कम होता है और नगर से दूरी बहुत अधिक होती है। किसानों के पास अधिक भूमि रहने के कारण पशुपालन को प्रमुखता प्रदान करते हैं।

सकेन्द्रीय वलय पेटी के निर्धारण की विधि

      वॉन थ्यूनेन महोदय ने एक ग्राफ के माध्यम से सकेन्द्रीय वलय पेटियों का निर्धारण किया है। उन्होंने परिकल्पना में कहा है कि नगर से बढ़ती दूरी के साथ-साथ फसलों की गहनता में कमी आते-जाती है। अतः वह बिन्दु जहाँ आर्थिक लगान किसी भी अन्य फसल की तुलना में अधिक होता है वही बिन्दु उस सकेन्द्रीय वलय पेटी की अंतिम सीमा होती है। इसे नीचे के ग्राफ से समझा जा सकता है।

आलोचनात्मक मूल्यांकन

         वर्तमान समय में कृषि तकनीक का विकास नगरीकरण में वृद्धि और जनसंख्या में तेजी से वृद्धि होने के बावजूद वॉन थ्यूनेन के सिद्धांत में कोई आधारभूत परिवर्तन नहीं हुआ है।

        1925 में जॉनसन महोदय ने स्टॉकहोम (स्वीडेन) को केन्द्र मानकर और 1932 ई० में बाल्केनबर्ग महोदय ने नगर में उ०-पश्चिमी यूरोप को एक केन्द्र मानकर इनके सिद्धांत को पुष्ट किया। दोनों ने अपने अध्ययन में बताया है कि वॉन थ्यूनेन के मुताबिक ही यहाँ सकेन्द्रीय पेटियों का विकास हुआ है। इन पेटियों में थोड़ा बहुत परिवर्तन देखा जा सकता है। जैसे:- पहली पेटी में आज भी दुग्ध और सब्जी की खेती होती है। दूसरी पेटी में खाद्यान्न फसल, तीसरी पेटी में पशुपालन और चौथी पेटी में वानिकी का कार्य होता है। इस परिवर्तन का कारण बताते हुए कहा है कि जीवाश्म ऊर्जा के विकास के कारण ईंधन की लकड़ी का महत्त्व घट गया है, इसलिए यह पेटी अब खिसकर बाहरी क्षेत्र में चला गया है।

भारत के संदर्भ में वॉन थ्यूनेन की कृषि स्थानीयकरण सिद्धांत

        कई भारतीय भूगोलवेत्ताओं ने भी इनके मॉडल का अध्ययन किया है। 1972 ई० में भी प्रोमिला कुमार ने भोपाल नगर के संदर्भ में इसका अध्ययन किया और पाया कि वॉन थ्यूनेन सिद्धांत के अनुरूप ही सकेन्द्रीय वलय पेटियों का विकास हुआ है। अलीगढ़ विश्वविद्यालय के अली मुहम्मद सहित कई लोगों ने UP नगरों के संदर्भ में, जशबीर सिंह (हरियाणा) के संदर्भ में, BL शर्मा (राजस्थान) के संदर्भ में इस मॉडल का अध्ययन किया और पाया कि वॉन थ्यूनेन के सिद्धांत के अनुसार ही प्रथम पेटी और तीसरी पेटी का विकास हुआ है लेकिन दूसरी पेटी खिसककर बाहर चला गया है।

      सैद्धांतिक तौर पर इनका सिद्धांत एक आदर्शवादी सिद्धांत प्रतीत होता है। लेकिन इस सिद्धांत की आलोचना कई आधारों पर की जाती है।

आलोचना

(1) वॉन थ्यूनेन ने अपनी संकल्पना (मान्यता) में एकाकी प्रदेश की संकल्पना प्रस्तुत किया है जो गलत है क्योंकि कोई भी प्रदेश वर्तमान समय में एकाकी प्रदेश नहीं रह सकता।

(2) किसी भी प्रदेश में केन्द्रीय नगर ही खरीद-बिक्री का एकमात्र केन्द्र नहीं हो सकता।

(3) भौगोलिक कारकों में समरूपता असंभव है।

(4) बाजार से बढ़ती दूरी के अनुसार वस्तुओं का मूल्य एक समान वृद्धि होना असंभव है।

(5) वर्तमान समय में आधु‌निक परिवहन के साधन विकसित हो चुके हैं। इसलिए नाव एवं घोड़ागाड़ी अव्यवहारिक हो चुका है।

(6) वॉन थ्यूनेन ने कहा है कि फल एवं सब्जी पेटी का विकास नगर के ठीक बाहरी क्षेत्रों में होता है। लेकिन वर्तमान समय में नगर से हजारों किमी० दूर फल, सब्जी एवं दुग्ध की कृषि की जा रही है और नगरों में आपूर्ति की जाती है। जैसे:- अमेरिका के झील प्रदेश में कैलिफोर्निया तथा फ्लोरिडा राज्य से फल एवं सब्जी की आपूर्ति की जाती है।

(7) वॉन थ्यूनेन के अनुसार दूसरी पेटी में ईधन लकड़ी की खेती की जाती है। लेकिन व्यवहारिक रूप में यह पेटी कहीं नहीं पायी जाती।

(8) वॉन थ्यूनेन के अनुसार व्यवहारिक सिद्धांत मॉडल में दो कारणों से संसोधन होता है- (i) नदी एवं (ii) छोटे नगर के कारण। लेकिन वर्तमान समय में उपजाऊ भूमि, नवीन तकनीक, रेल एवं सड़‌क परिवहन इत्यादि भी सकेन्द्रीय वलय पेटी में संशोधन लाते हैं।

निष्कर्ष

    अतः उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि वर्तमान समय के संदर्भ में इस सिद्धांत में कई त्रुटियाँ है। इन त्रुटियों के बावजूद कृषि स्थानीयकरण के संबंध में प्रस्तुत किया गया यह पहला सिद्धांत था, इसीलिए यह आज भी मान्यता रखता है।

2. ह्विटलसी के कृषि प्रादेशीकरण तकनीक/ विश्व के प्रमुख कृषि प्रदेश/Major Agriculture Region of The World

2. ह्विटलसी के कृषि प्रादेशीकरण तकनीक

(विश्व के प्रमुख कृषि प्रदेश/Major Agriculture Region of The World)


      ह्विटलसी के कृषि

          कृषि अध्ययन में कृषि प्रदेश की संकल्पना का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। कृषि प्रदेश भूमि का एक विस्तृत क्षेत्र है, जिसमें कृषि करने की दशाओं तथा प्रतिरूप में व्यापक रूप से समानता मिलती है तथा जो समीपवर्ती क्षेत्रों से विशिष्ट रूप से भिन्न होता है। कृषि प्रदेशों का सीमांकन फसल-साहचर्य, फसल-पशुपालन साहचर्य तथा फार्म क्रिया प्राविधियों, आदि के मानदण्डों के आधार पर होता है। कृषि प्रदेशों का सीमांकन करने वाले विद्वानों में डी. ह्विटलसी का नाम उल्लेखनीय है।

        संक्षेप में कृषि प्रदेश ऐसे विस्तृत क्षेत्र होते है, जहां फसलों की किस्मों एवं उनकी उत्पादन विधि में समरूपता पाई जाती है। सर्वप्रथम 1939 में डी. ह्विटलसी ने विश्व को 13 कृषि प्रदेशों में विभाजित किया, जिसमें उन्होंने निम्नलिखित आधार तत्वों को प्रदेशों के सीमांकन का मानक आधार (Criterion) माना था।

(i) कृषि एवं पशुपालन का साहचर्य

(ii) कृषि की उत्पादन-विधि।

(iii) कृषि भूमि में श्रम, पूंजी आदि के विनियोग की मात्रा।

(iv) कृषि से उत्पादित पदार्थों के उपभोग का तरीका।

(v) कृषि कार्य में सहायक यंत्रों, उपकरणों एवं आवास आदि संबंधी दशाएं।

(i) फसलों एवं पशुओं का पारस्परिक सम्बन्ध:-

        विश्व में कृषि एवं पशुपालन क्रियाएँ साथ-साथ चलती हैं। दोनों कार्य विस्तृत भूमि एवं मिट्टी की उर्वरता से सम्बन्धित हैं। पशु मानवीय श्रम की पूर्ति करते हैं और मानवीय क्षमता को बढ़ाते हैं। वे दुग्ध, मांस, चमड़ा, हड्डी, खाद जैसे पदार्थों को उपलब्ध कराकर कृषि संस्कृति के महत्वपूर्ण घटक बन जाते हैं। भूमि के अनुकूलतम उपयोग के लिए फसलों एवं पशुओं का साहचर्य आवश्यक होता है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में यह साहचर्य अलग-अलग प्रकार का मिलता है जो कृषि दशाओं की समानता की प्रादेशिक भिन्नताओं को प्रदर्शित करता है।

(ii) कृषि उत्पादन विधियाँ:-

       पृथ्वी के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कृषि की दशाओं में भिन्नता के साथ कृषि की उत्पादन विधियाँ भी बदल जाती हैं जिसके कारण कृषि दशाओं की प्रादेशिक समानता एवं सम्बद्धता मिलती है। उदाहरणार्थ, किसी क्षेत्र में कृषि उत्पादन में पारस्परिक विधियों, जैसे पशुओं तथा हल, आदि का प्रयोग होता है तो किसी क्षेत्र में आधुनिक कृषि यंत्र जैसे ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, आदि का प्रयोग होता है। किन्हीं क्षेत्रों में फसल उत्पादन सिंचाई पर आधारित है और किन्हीं क्षेत्रों में बिना सिंचाई के कृषि सम्भव है। इसी प्रकार विस्तृत एवं गहन कृषि भी विभिन्न उत्पादन विधियों के उदाहरण हैं।

(iii) कृषि में पूंजी, श्रम एवं संगठन आदि के विनियोग की मात्रा:-

       किन्हीं कृषि प्रदेशों में पूँजी का निवेश अधिक होता है तो कहीं श्रम का अथवा कहीं-कहीं दोनों का ही अधिक उपयोग किया जाता है। अतः पूंजी एवं श्रम के विनियोग की मात्राओं की भिन्नता के आधार पर भी कृषि दशाओं की प्रादेशिक समरूपता एवं सम्बद्धता में भिन्नता मिलती है। मानवीय श्रम पर आधारित कृषि जीवन निर्वाहक हो जाती है। यांत्रिक कृषि लाभांश को बढ़ाती है। पूंजी विनियोग से कृषि उत्पादन की मात्रा, किस्म एवं विविधता प्रभावित होती है। संगठन कृषि का एक आवश्यक तत्व है। पिछड़े देशों में प्रत्येक कृषक अलग-अलग कृषि उत्पाद का विनिमय करता है, अतः वह मोल-भव में घाटा उठाता है। उत्पादकों में विपणन की उचित व्यवस्था, मूल्यों पर ध्यान रखना संगठनात्मक पहलू के उत्तम उदाहरण हैं।

(iv) कृषि उत्पादन के उपभोग का स्वरूप:-

       कृषि पदार्थों की मात्रा, विविधता एवं किस्म उपभोग प्रतिरूप से प्रभावित होती है। यदि कृषि उत्पादन व्यापारिक दृष्टि से किया जाता है जब वहाँ विस्तृत प्रकार की फसलों के विशेषीकरण वाली कृषि होती है जैसे रबर, गन्ना, कॉफी, चाय, गेहूँ, आदि की, परन्तु यदि उत्पादन कृषक के निजी उपभोग के लिए किया जाता है तब वहाँ निर्वाहक कृषि के अन्तर्गत अनाज, दलहन, तिलहन, आदि अनेक फसलों की कृषि की जाती है। अतः कृषि उपज के उपभोग के तरीके से भी कृषि दशाओं में प्रादेशिक विविधता मिलती है जो कृषि प्रदेशों के सीमांकन हेतु आधार प्रदान करती है।

(v) कृषि उत्पादन में प्रयुक्त यन्त्र एवं उपकरण तथा आवास सम्बन्धी दशाएँ:-

       कृषि क्षेत्रों की अपनी संस्कृति होती है। उसमें कृषि उपकरणों का प्रयोग तथा कृषकों की जीवन पद्धतियाँ आती हैं। उदाहरण के लिए यूरोप एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के गाँव जीवन की सभी सुविधाओं से युक्त होते हैं। वहाँ कृषि पद्धति एवं कृषकों का जीवन स्तर उच्च कोटि के होते हैं। दक्षिणी एशिया के अधिकांश गांवों में परिवहन, विद्युत्, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है। अतः कृषकों का जीवन निम्न स्तर का होता है। 

      उपरोक्त तत्त्वों के आधार पर व्हीट्लसी ने विश्व को निम्नलिखित 13 कृषि प्रदेशों में विभाजित किया है:

डी. ह्विटलसी द्वारा वर्गीकृत विश्व के कृषि प्रदेश:-

1. चलवासी पशुचारण प्रदेश (Nomadic Herding Region)

2. व्यापारिक पशुपालन प्रदेश (Livestocking Ranching Region)

3. स्थानान्तरी कृषि प्रदेश (Shifting Cultivation Region)

4. प्रारम्भिक स्थानबद्ध कृषि प्रदेश (Redimental Sedentary tillage Region)

5. चावल प्रधान गहन निर्वाह कृषि प्रदेश (Intensive Subsistence Tillage with Rice Dominant) 

6. चावल विहीन गहन निर्वाह कृषि प्रदेश (Intensive Subsistence Tillage region without Paddy Rice)

7. व्यापारिक बागान कृषि प्रदेश (Commercial Plantation Tillage Region)

8. भूमध्य सागरीय कृषि प्रदेश (Mediterranean Agricultural Region)

9. व्यापारिक अनाज उत्पादक कृषि प्रदेश (Com- mercial Grain Farming Region)

10. व्यापारिक फसल एवं पशु उत्पादक कृषि प्रदेश (Commercial Livestock Crop and Farming Region)

11. निर्वाह फसल एवं पशु उत्पादक कृषि प्रदेश (Subsistence Crop and Livestock Farming Region)

12. व्यापारिक दुग्ध पशुपाल कृषि प्रदेश (Commercial Dairy Farming Region)

13. विशेषीकृत बागवानी या उद्यान कृषि प्रदे (Specialised Horticulture Region)

(i) चलवासी / स्थानान्तरणशील पशुचारण प्रदेश:-

         इस कृषि प्रदेश में अफ्रीका का सहारा प्रदेश, इथियोपिया, मिस्र, सूडान, सऊदी अरब, ईरान, इराक, अफगानिस्तान, पूर्व सोवियत संघ से अलग हुए मध्य एशिया के देश, उत्तरी चीन, मंगोलिया, दक्षिणी अफ्रीका के भाग आते है। यह शुष्क एवं अर्द्धशुष्क प्रदेश है। घास यहाँ प्राकृतिक वनस्पति है। घास के विस्तृत मैदानों में चरवाहों के समूह एक स्थल की घास समाप्त होने पर दूसरे स्थान पर जाते हैं। अतः इसे स्थानान्तरणशील पशुचारण कहते हैं। यहाँ जनसंख्या का घनत्व कम होता है पशुचारण समूह अस्थाई अधिवास बनाते हैं तथा परिवर्तन उनके जीवन का अंग होता है। किरगिज, मसाई, बद्दू जैसे समूह इसके उदाहरण हैं।

        यहाँ के निवासियों का जीवन पशुओं से प्राप्त उत्पादों यथा दूध, मक्खन, पनीर, चमड़ा, माँम, हिड्डी, सींग, खुर पर आधारित रहता है। अन्य वस्तुएँ जो इतर क्षेत्रों से मिलती हैं उनके लिए विलासिता के वर्ग में आती हैं। उनके वस्त्र, तम्बू, हथियार, पशुओं से संबंधित होते हैं। मरुस्थलों में ऊँट, अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में बकरी, भेड़ आई प्रदेशों में गाय, बैल, टुन्ड्रा में रेण्डियर, तिब्बत में याक जैसे जानवर मिलते हैं। इन पशुओं की जीवन निर्वाह हेतु विविध रूपों में प्रयोग किया जाता है।

(2) व्यापारिक पशुपालन प्रदेश:-

         इस प्रदेश का विस्तार मध्य पश्चिमी अमेरिका, मध्य पूर्वी दक्षिणी अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका, यूरोप के सीमित क्षेत्र और आस्ट्रेलिया में है। इन प्रदेशों में अन्न उत्पादन पर कम ध्यान दिया जाता है और पशुपालन पर अधिक।

         क्षेत्रों की विशेषता के अनुसार कहीं गाय, बैल (अमेरिका) तो कहीं भेड़, बकरी (आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड) की प्रधानता है। ये प्रदेश ऊन, चमड़ा, माँस, दूध और उससे बनी वस्तुओं जैसे मक्खन, पनीर का निर्यात करते हैं। पशुओं की नस्ल में सुधार करते हैं तथा विस्तृत चारागाहों की व्यवस्था इनके जीवन का अंग होता है। इन प्रदेशों के घास के मैदान कृषि के लिए उपयुक्त भी नहीं होते हैं। यहाँ वर्षा 35 सेमी० वार्षिक से अधिक नहीं होती है।

        व्यापारिक पशुपालन वैज्ञानिक युग की देन है। त्वरित परिवहन, रेफ्रीजरेशन, रेल, जहाज, ट्रक की सुविधा, औद्योगिक केन्द्रों में वृहद् जनसमूहजन्य माँग आदि इनके अभ्युदय के प्रमुख कारण हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, अर्जेण्टाइना, पेटेगोनिया, उरुग्वे, ब्राजील, चाको का पठार, वेनेजुएला, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड इस तरह की कृषि के पर्याप्त हैं।

       व्यापारिक पशुपालन में कम संख्या में मनुष्यों की आवश्यकता पड़ती है। रखवाली करने वाले कुत्तों और घोड़ों की सहायता से यह कार्य किया जाता है। जीवन पद्धति पशुओं पर आधारित होती है। उत्तम संगठन व्यवस्था, निर्यात के प्रति जागरूकता, पूँजी इसके विकास के आवश्यक तत्व हैं।

(3) स्थानान्तरणशील कृषि:-

      यह कृषि प्रदेश अमेजन घाटी, दक्षिणी वेनेजुएला, गायना, नाइजीरिया, घाना, काँगो, चाड, जिम्बाबे, मालागासी, न्यूगिनी, बोर्नियो, म्यांमार कम्पूचिया जैसे देशों में मिलता है।

       ऐसी कृषि मुख्यत: आदिवासियों द्वारा जंगलों को साफ करके की जाती है तथा कालान्तर में खेत छोड़कर कृषक अन्यत्र नये जंगल साफ करते हैं। इसमें मानवीय श्रम एवं न्यूनतम उपकरण का प्रयोग होता है। इसे असम में झुम, इण्डोनेशिया में लदांग, श्रीलंका में चेना, रोडेशिया में मिल्पा के नाम से जाना जाता है।

प्रमुख फसलें- 

         इस तरह के कृषि प्रदेश में फसलोत्पादन प्रधान होता है और पशुपालन नगण्य होता है। फसलों में धान (एशियाई देश), मक्का (अमेरिका) और ज्वार-बाजरा प्रधान होते हैं। फसल की देख-रेख निराई-गुड़ाई नहीं होती है। अतः उपज कम होती हैं। कृषक फल संग्रह एवं आखेट भी करते रहते हैं।

      यह कृषि पद्धति पिछड़ी अवश्य है किन्तु प्राकृतिक वातावरण से पूर्णत: समायोजित होती हैं। कृषकों की सूझ-बूझ प्रधान होती है। ऐसे प्रदेशों में अज्ञानतावश वनों की क्षति अवश्य होती है।

(4) प्रारंभिक स्थायी कृषि प्रदेश:-

         यह प्रदेश उत्तर-पूर्वी भारत, मलाया, प्रायद्वीप, सुमात्रा, प० न्यूगिनी, मध्य एण्डीज के देशों में मिलता है। यहाँ खेती सीमित क्षेत्रों में होती है, अतः स्थानान्तरणशीलता संभव नहीं होती। अधिकांश विशेषताएँ स्थानान्तरणशील कृषि प्रदेश के समान होती हैं। बागानी खेती के संलग्न प्रदेशों में, उत्खनन, केन्द्रों से संलग्न भागों में तथा पठारी भागों में यह कृषि मिलती है। यहाँ कृषि गहन भी होती है तथा पशुपालन भी इससे संबंधित होता है। गाय, बैल, भैंस, खच्चर, घोड़े, भेड़, बकरी आदि स्थान एवं क्षेत्र के अनुरूप पाये जाते हैं।

(5) चावल प्रधान गहन निर्वाहक कृषि प्रदेश:-

        इस प्रदेश में बंग्लादेश, श्रीलंका, भारत, दक्षिणी एवं मध्य चीन, म्यांमार, कम्पूचिया, थाईलैण्ड, जावा आदि देश व प्रदेश प्रमुख रूप से आते हैं। यह कृषि प्रदेश प्राकृतिक वातावरण से समायोजित होता है। मानसूनी जलवायु के अधिक वर्षा वाले भाग इसमें आते हैं। अधिक ताप एवं मौसमी परिवर्तन इसकी विशेषता है।

      औसत वार्षिक वर्षा 150 सेमी० से अधिक होती है। समतल मैदानी भागों में मेंड़ बाँध कर धान की खेती की जाती है। अपेक्षाकृत उच्च भाग अथवा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का जैसी फसलें होती हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र का मैदान, कृष्णा, गोदावरी का डेल्टाई भाग, दक्षिणी पश्चिमी भारत का तट, इरावदी, सोनम, मौकांग, सीक्यांग, यॉरिटसीक्यांग, हांगहों के डेल्टाई प्रदेशों को इस कृषि का प्रतीक माना जा सकता है।

        कृषि उत्पादन का प्रमुख उद्देश्य जीवन निर्वाह होता हैं। वर्तमान समय में तकनीकी प्रगति, कृत्रिम खाद, कीटनाशक दवायें, कृषि यंत्रों का प्रयोग आदि से उत्पादन बढ़ा है तथा चावल का निर्यात भी होता है किन्तु तीव्र जनावृद्धि से अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता है।
(6) चावल विहीन गहन निर्वाहक कृषि प्रदेश:-

           इसके अन्तर्गत पाकिस्तान, मध्य पश्चिमी भारत, उत्तरी मंगोलिया, दक्षिणी कोरिया जैसे देश प्रमुख रूप से आते हैं। यहाँ वर्षा का सापेक्ष अभाव तथा तापमान की कमी से गेहूँ की खेती की उपयुक्त दशाएँ मिलती हैं। सिंचाई का प्रसार होने से गेहूँ की खेती का विस्तार हुआ है क्योंकि वह अधिक टिकाऊ एवं प्रमुख खाद्यान्न फसल है। यहाँ वर्षा 150 सेमी से कम होती है। कुछ संक्रमण वाले क्षेत्रों में बरसात में धान (खरीफ) तथा जाड़े में गेहूँ की खेती की जाती है।

अन्य विशेषताएँ-

       उपर्युक्त चावल प्रधान एवं गेहूँ प्रधान क्षेत्र नदियों के मैदानी भाग हैं। यहाँ जनसंख्या का घनत्व सर्वाधिक मिलता है, अतः यहाँ स्वभावतः गहन कृषि होती है। मानवीय श्रम का भरपूर प्रयोग होता है। कुछ क्षेत्रों में क्रमश: यांत्रिकीकरण भी हो रहा है। अधिकांश मानसूनी क्षेत्रों में ‘हरित क्रांति’ (Green Revolution) से धान एवं गेहूँ की किस्मों में सुधार हुआ है। उत्पादन की मात्रा बढ़ी है तथा आत्मनिर्भरता के साथ व्यापारिक प्रवृत्ति भी पनपी है। मानूसन की अनिश्चितता से बाढ़ तथा सूखा जैसे प्राकृतिक संकट आते रहते हैं।

         राजनीतिक दृष्टि से यह क्षेत्र लगभग स्थिर है तथा प्रशासन कृषि के विकास का प्रयास कर रहा है। धार्मिकता, रूढ़िवादिता और परम्पराओं का कुप्रभाव कम हो रहा है। विपणन व्यवस्था में शासकीय हस्तक्षेप बढ़ने से छोटे किसानों को लाभ मिल रहा है। भूमिहीन कृषकों को कुछ भूमि मिल रही है। सभी कृषक वैज्ञानिक विधियों को अपना रहे हैं। परिवहन एवं संचार के साधनों का विकास हुआ है। रेडियो, दूरदर्शन एवं समाचार-पत्र भी किसानों को प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं।

(7) व्यापारिक बागानी कृषि प्रदेश:-

          यह कृषि प्रदेश उष्ण कटिबन्धों में मिलती है। लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, दक्षिणी एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया इसमें प्रधान रूप से आते हैं। यह क्षेत्र एक फसली होता है।

प्रमुख फसलें-

           कोको, कॉफी, चाय, रबर, गन्ना, नारियल, मिर्च-मसाले इसमें प्रधान हैं। गन्ना प० द्वीप समूह, ब्राजील, पूर्वी अफ्रीका, मलागासी होता है। केला, प० द्वीप समूह, मध्य अमेरिका, वेनेजुएला तथा अफ्रीका के कुछ भाग में होता है।

विशेषतायें

       यहाँ कृषि बड़े-बड़े बागानों पर होती है। बगानों में फसल की बुआई, कटाई, सुखाई उसे डिब्बो में बंद करना, निर्यात प्रबंध आदि सभी व्यवस्थायें उपलब्ध होती हैं।

       बागानी खेती अधिकांश विदेशी आधिपत्य में है। वैज्ञानिक विधि का प्रयोग, आधुनिक यंत्र, कीटनाशक, उन्नत बीज यहाँ प्रयोग में लाये जाते हैं।

         श्रमिकों को रहने के लिए घर, स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन आदि के लिए सम्पूर्ण व्यवस्था रहती है। कृषि का उद्देश्य निर्यात करना होता है। स्थानीय जनसंख्या श्रमिक के रूप में कार्य करती है अतः प्रादेशिक विकास नहीं हो पाता है।

         यह कृषि प्रदेश प्रधानतः उष्ण क्षेत्रों में ही मिलता है। पूँजी निवेश इसकी प्रमुख आवश्यकता होती है। इसके उत्पादों की माँग भी स्थाई होती है। कुछ फसलों को कृत्रिम उत्पादों से प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता है।

(8) भमूमध्य सागरीय कृषि प्रदेश:-

      यह कृषि प्रदेश भूमध्य सागर के चतुर्दिक स्थित देशों- मध्य स्पेन, इटली, दक्षिणी फ्रांस, यूनान, तुर्की, सीरिया एवं कैलिफोर्निया, दक्षिणी-पश्चिमी आस्ट्रेलिया, दक्षिणी-पश्चिमी अफ्रीका तथा दक्षिणी चिली में मिलता है। वस्तुतः यह भूमध्य सागरीय जलवायु के पर्याप्त हैं। इस प्रदेश में जाड़े में वर्षा होती है और ग्रीष्म काल शुष्क रहता है। अतः यहाँ की फसलों को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

(अ) जाड़े की फसलें-

         इसके अन्तर्गत गेहूँ, आलू, प्याज, टमाटर, सेम और फल की खेती होती है। यहाँ की फसलों की माँग यूरोपीय नगरों में बहुत होती है। उदाहरणार्थ कैलीफोर्निया से संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी तट के नगरों को सब्जी एवं फल की आपूर्ति होती है।

(ब) ग्रीष्म ऋतु की फसलें-

         इस ऋतु में सिंचाई द्वारा खेती की जाती है। अंगूर इस मौसम की प्रमुख फसल है। हल्के ढाल वाले क्षेत्रों में अंगूर की बेलें लगाई जाती हैं। सेब, नाशपाती, जैतून, अंजीर, चीकू आदि फल होते हैं, सब्जियाँ भी उगाई जाती हैं।

अन्य विशेषताएँ-

        भूमध्य सागरीय कृषि प्रदेश में कहीं फल एवं सब्जी प्रधान होते हैं तो कहीं-कहीं पशुपालन भी होता है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भेड़-बकरियाँ चराई जाती हैं। ऊन का निर्यात होता है। कहीं माँस के लिए भी पशु पाले जाते हैं।

        यह कृषि प्रदेश धरातल, जलवायु एवं मानवीय तत्त्वों में अद्भुत सामंजस्य प्रकट करता है। धरातलीय विभिन्नता का प्रभाव फसलों एवं सब्जियों पर पड़ता है। यहाँ जनसंख्या का घनत्व अपेक्षाकृत अधिक पाया जाता है। यहाँ से तेल, शराब, माँस, सूखे फल आदि का निर्यात किया जाता है।

(9) व्यापारिक अन्नोत्पादक कृषि प्रदेश:-

           यह कम जनसंख्या वाला ऐसा क्षेत्र है जहाँ कृषि का उद्देश्य व्यापार करना होता है। उत्तरी अमेरिका में प्रेयरी, रूस में स्टेपी, अर्जेण्टाइना में पम्पा, आस्ट्रेलिया में मरे-डार्लिंग बेसिन आदि इसी कृषि प्रदेश में आते हैं।

अन्य विशेषतायें-

          सैकड़ों हेक्टेयर के खेत तथा एकाकी मकान इस प्रदेश में कृषि की पहचान होते हैं। फार्मों में व्यापक पैमाने पर यंत्रों का प्रयोग होता है, तथा एक या दो व्यक्ति मिलकर फसल संबंधी सभी कार्य जुताई-बुआई, निराई-गुड़ाई कटाई-महाई, भण्डारण आदि करते हैं। कटाई के समय कभी-कभी अस्थाई श्रमिक भी लगाये जाते हैं।

          यहाँ कीटनाशक दवाओं का प्रयोग, खाद, सिंचाई का प्रयोग पर्याप्त होता है। वर्षा प्राय: 25 से 50 सेमी० तक होती है अतः गेहूँ ही प्रधान फसल है। यहाँ की मिट्टी में नमी पर्याप्त मात्रा में होती है, अतः प्रति इकाई उपज अधिक होती है।

          कृषि व्यापार पर आधारित होती है। विदेशों में माँग कम होने या कीमत गिरने या अत्यधिक उत्पादन होने पर फसल या तो जानवरों को खिलाई जाती है या जला दी जाती है।

(10) व्यापारिक कृषि एवं पशुपालन प्रदेश:-

         इस कृषि में पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, साइबेरिया के क्षेत्र आते हैं। इस प्रदेश में फसलों का उत्पादन पशुपालन के उद्देश्य से किया जाता है। पशुओं को मोटा करना और उनसे अधिक माँस प्राप्त करना प्रमुख उद्देश्य होता है। हड्डी, चमड़ा, सींग, खुर, अण्डे अदि भी प्राप्त हो जाते हैं।

प्रमुख फसलें-

      प्रमुख फसलों में जई, चरी (Hay) मक्का, आलू, चुकन्दर, गाजर, मटर, गोभी, सेम, शलजम ककड़ी का भी उत्पादन होता है तथा हरे चारे की भी खेती होती है।

अन्य विशेषतायें-

       इस प्रदेश में अनाज, हरा चारा एवं सब्जियों का क्रमानुक्रम में उत्पादन किया जाता है। जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहे।

      संयुक्त राज्य अमेरिका में फार्म विस्तृत होते हैं, जबकि यूरोप में छोटे फार्म पर मकान, पशुशाला, यंत्रागार भंडारगृह बने होते हैं। 

        फसल चारे के रूप में या अनाज के रूप में पशुओं को खिलाई जाती है तथा विक्रय भी की जाती है।

        पशुओं का विक्रय होता है या माँस तैयार करके बेचा जात है। उत्पादनों का निर्यात विदेशों में किया जाता है। कृषि में पूँजी एवं श्रम का विनियोग अधिक होता है तथा कृषि वैज्ञानिक विधियों से की जाती है।

         आर्थिक दृष्टिकोण से यह खेती लाभदायक होती है। भूमि संरक्षण तथा भूमि की उर्वरता को बनाये रखने का प्रयास किया जाता है। आवश्यकतानुसार फसलों या पशुओं का उत्पादन समायोजित किया जाता रहा है जिनमें हानि नहीं होती है।

(11) निर्वाहक अन्न और पशुपालन प्रदेश:-

       इस प्रकार की कृषि पद्धति पश्चिमी एशिया में तुर्की उत्तरी ईरान, मध्यवर्ती एशिया और उत्तरी साइबेरिया के क्षेत्रों में जलवायु और स्थलीय बाधाओं के कारण विकसित हुई है। यहाँ न तो पूर्ण कृषि पर जीवनयापन आश्रित है और न पशुपालन पर। फलतः अन्नोत्पादन और पशुपालन दोनों से जीवन निर्वाह हो पाता है। यहाँ शुष्कता एवं ठंडा के कारण कंवल एक फसल किसी प्रकार हो पाती है। फलतः पशुपालन आवश्यक हो जाता है।

(12) व्यापारिक दुग्धोत्पादन कृषि प्रदेश:-

         यह कृषि प्रदेश संयुक्त राज्य अमेरिका में बड़ी झीलों के समीप विस्तृत भाग में, पश्चिमी यूरोप में रूस के पश्चिमी मध्य पेटी में तथा दक्षिणी-पूर्वी आस्ट्रेलिया, रूमानिया एवं न्यूजीलैण्ड में मिलता है।

        इस कृषि प्रदेश में दुग्धोत्पादन प्रधान पेशा है। गाय सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है। पालतू गायों की किस्में दूध की मात्रा एवं दूध में मक्खन की मात्रा से संबंधित होती है। जर्सी, स्विश, आयरिश, बाउन, होन्सटाइन नस्लें प्रधान हैं। यहाँ सूअर और मुर्गियाँ भी पाली जाती हैं। फसलों में मक्का एवं हरे चारे की प्रधानता होती है।

        ताजे दूध एवं मक्खन, पनीर के निर्यात हेतु लम्बी दूरी तक त्वरित परिवहन साधनों का प्रयाग होता है। पानी के जहाजों पर शीत गृह का निर्माण कर माँस, मक्खन, पनीर का निर्यात होता है।

        दुग्धोत्पादन के निर्माण से संबंधित कारखानों की स्थापना की जाती है। दूध से पाउडर, आइसक्रीम, मक्खन आदि बनाये जाते हैं।

       पशुओं के रहने, नहाने, टहलने, स्वास्थ्य आदि की देखभाल के लिए विस्तृत प्रबंध किये जाते हैं। पशुओं को वातानुकूलित कक्षों में रखा जाता है।

        पशुओं के दूध निकालने के लिये, माँस काटने के लिए और बाल निकालने के लिए मशीनों का प्रयोग किया जाता है। संबंधित फसलों को बोने-काटने हेतु भी यंत्रों का प्रयोग किया जाता है।

        उत्पादों की पर्याप्त माँग इन कृषि प्रदेशों का आधार है अतः विकसित एवं संपन्न राष्ट्रों से यह कृषि प्रदेश संबंधित है।

(13) विशेषीकृत बागवानी कृषि प्रदेश:-

        संयुक्त राज्य अमेरिका में खाड़ी एवं अटलांटिक तट, कैलीफोर्निया की घाटी, मध्य एशिया, पेरू, ब्राजील तट और दक्षिणी अफ्रीका में ऐसी विशिष्ट कृषि का विकास हुआ है। फल, सब्जी, फूल और कुछ अन्य फसलों की गहन खेती इस क्षेत्र में की जाती है। संयुक्त राज्य अमेरिका का यह क्षेत्र ऐसी फसलों के उत्पादन में अग्रणी है।

1. बेबर के औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत (Weber’s theory of industrial localization)

1. बेबर के औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत 

(Weber’s theory of industrial localization)


बेबर के औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत

प्रश्न प्रारूप 

1. औद्योगिक स्थानीयकरण सिद्धांत की चर्चा करें। 

2. बेबर के औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धत की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करें तथा वर्तमान समय में इसकी उपयोगिता की चर्चा करें। 

औद्योगिक अवस्थिति का सिद्धांत

                     उद्योगों के स्थानीयकरण पर कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। इनमें कच्चा माल, बाजार, परिवहन, श्रमिक, तकनीकी उपलब्धता, ऊर्जा और अन्य संरचनात्मक सुविधाएँ प्रमुख हैं। सभी उद्योगों पर इन सभी कारकों का एक समान प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी असमानता को देखते हुए कई भूगोल‌वेताओं एवं अर्थशास्त्रियों ने उद्योगों के स्थानीयकरण की प्रवृति को सैद्धांतिक रूप देने का प्रयास किया है। इनमें से बेबर, हुबर, लॉश, फेटर, हौर्टलीन तथा स्मिथ का सिद्धांत प्रमुख हैं। इनमें से बेबर का सिद्धांत सबसे पुराना है। इस सिद्धांत को बेबर ने 1909 में दक्षिणी जर्मनी के औद्योगिक क्षेत्रों का अध्ययन कर प्रस्तुत किया। इनका सिद्धांत निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है:- 

मान्यताएँ :- 

         बेबर ने बताया कि मेरा सिद्धांत वहीं पर लागू होगा जहाँ-

(1) एकाकी प्रदेश होगा तथा वह संपूर्ण प्रदेश एक ही प्रशासन के अन्तर्गत होगा।

(2) सम्पूर्ण प्रदेश में एक ही जलवायु, एक ही संस्‌कृति और एक समान जनसंख्या उपलब्ध हो या सम्पूर्ण प्रदेश में भौगोलिक समरूपता एक समान हो।  

(3) एक समय में एक ही उद्योग की स्थानीयकरण का विश्लेषण किया जाता हो। 

(4) कच्ची सामाग्री के स्रोत और इसकी भौगोलिक अवस्थिति का पूर्ण ज्ञान हो। 

(5) बाजार की अवस्थिति का पूर्ण ज्ञान हो।

(6) श्रम उपलब्धता निश्चित हो तथा उसकी पूरी जानकारी हो।

(7) परिवहन लागत भार और दूरी के सापेक्ष में वास्तविक वृद्धि हो।

सिद्धांत / परिकल्पना

        बेबर के अनुसार औद्योगिक स्थानीकरण सिद्धांत को न्यूतम परिवहन लागत का सिद्धांत कहते है। बेबर के अनुसार “न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान ही न्यूनतम उत्पादन लागत वाला स्थान होता है और न्यूनतम लागत वला स्थान ही उद्योगों की स्थापना के लिए उपयुक्त स्थान होता है।”

      बेबर ने दूसरा परिकल्पना भी प्रस्तुत किया है। जैसे- “सस्ता श्रम और संरचनात्मक सुविधाएं इत्यादि उद्योगों के स्थानीयकरण को न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान से विचलित करता है।” अर्थात न्यूनतम  श्रम लागत और संरचनात्मक सुविधाएं उद्योगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

स्थानीयकरण का मॉडल

             ऊपर वर्णित मान्यताओं और परिकल्पनाओं के संदर्भ में बेबर ने प्रयोगों के स्थानीयकरण की दो परिस्थितियाँ बतायी है-

(1) प्रथम स्थिति में एक ही कच्चे माल पर उद्योग आधारित होता है। 

(2) दूसरी परिस्थिति में एक से अधिक कच्चे माल पर उद्योग आधारित होते हैं।

I. पहली दश एक बाजार और एक कच्चा माल (R1) 

                       एक कच्चे माल पर आधारित उद्योगों का स्थानीयकरण की तीन प्रवृति होती हैं-

(1) वैसा उद्योग जिसका कच्चा माल सर्वत्र उपलब्ध है। ऐसी स्थिति है। उद्योगों की स्थापना बजार के केन्द्र में होती है, क्योंकि वहाँ पर परिवहन लागत नगण्य होता है। जैसे- जूता मरम्मत उद्योग, छाता मरम्मत उद्योग।   (2) दूसरी परिस्थिति के अनुसार कच्चा माल अशुद्ध हो तथा स्थानीय हो तो वैसी स्थिति में उद्योगों की स्थापना माल के केन्द्र में होती है क्योंकि परिष्कृत समान की दुलाई कच्चे माल की दुलाई के तुलना में परिवहन लागत कम होता है। जैसे:- चीनी उद्योग।

नोट:- यहाँ अशुद्ध का तात्पर्य वजन ह्रास वाले उद्योग से है।

(3) तीसरी परिस्थिति के अनुसार वैसे उद्योग आते हैं जिनका कच्चा माल शुद्ध हो और स्थानीय तौर पर उपलब्ध हो। ऐसी उद्योगों की स्थापना बाजार क्षेत्र या कच्चे माल के क्षेत्र में किया जा सकता है। जैसे- वस्त्र उद्योग, रेडिमेट गार्मेन्ट उद्योग। 

II. दूसरी दशा:- एक बाजार तथा दो से अधिक कच्चा माल (R2)

              एक से अधिक कच्चे माल पर आधारित उद्योग के लिए बेबर ने त्रिभुजाकार मॉडल प्रस्तुत किया है। वेबर ने कहा है कि कई ऐसे उद्योग हैं जिसमें एक से अधिक कच्चे माल का प्रयोग होता है। जैसे लौह-इस्पाल उद्योग में लौह अयस्क, चूना पत्थर, कोयला, मैंगनीज, क्रोमियम जैसे खनिजों का प्रयोग होता है।

           बेबर के अनुसार ऐसे उद्योगों का स्थानीयकरण सभी कच्चे माल से प्रभावित नहीं होता बल्कि कुछ ‌कच्चे माल उद्योगों के स्थानीयकरण को प्रभावित करते हैं। जैसे- लौह-इस्पात उद्योग को लौह अयस्क एवं कोयला,  सीमेन्ट उद्योग को चूना पत्थर एवं कोयला, एल्युमिनियम उद्योग को बॉक्साइट एवं विद्युत इत्यादि।

           एक से अधिक कच्चे माल पर आधारित उद्योगों की स्थानीयकरण की व्याख्या करने हेतु दो परिस्थिति की चर्चा किया है।- 

(1) वजन ह्रास उद्योग के संदर्भ में 

(2) वजन वृद्धि उद्योग के संदर्भ में

(1) वजन ह्रास उद्योग के संदर्भ में

           लौह-इस्पात उद्योग, सीमेन्ट उद्योग इत्यादि इसके अच्छे उदा० है। वजन द्वास उद्योग के अन्तर्गत सर्वाधिक अनुकूल स्थान दो कच्चे माल के बीच त्रिभुज के अन्तर्गत होता है। इसे नीचे के मॉडल से समझा जा सकता है-बेबर के औद्योगिक

            उपरोक्त त्रिभुजाकार मॉडल सही अर्थों में लौह इस्पात उद्योग के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व अधिकांश लौह इस्पात उद्योग का विकास इसी अवधारणा के अनुसार हुआ है। जमशेदपुर का कौह इस्पात केन्द्र इस मॉडल का एक अच्छा उदा० है।

          वेबर ने अपने त्रिभुजाकार मॉडल में बताया कि अगर उद्योग वजन ह्रास वाला है तो उसका स्थानीयकरण कच्चे माल के क्षेत्र से नजदीक होता है। जैसे-

(2) वजन वृद्धि उद्योग के संदर्भ में

            बेबर ने वजन वृद्धि वाले उद्योग के स्थानीयकरण का व्याख्या करते हुए बताया कि ऐसे उद्योगों का स्थानीयकारण भी त्रिभुजाकार मॉडल के अनुरूप ही होगा लेकिन ऐसे उद्योग नगर से नजदीक होते हैं। जैसे- बेकरी उद्योग, सौन्दर्य प्रसाधन उद्योग, वस्त्र उद्योग। 

             बेबर ने स्वयं यह बताया है कि ऊपर वर्णित उद्योगों के स्थानीयकरण में दो कारणों से विचलन हो सकता-

(1) यदि किसी स्थान पर श्रमिक अत्यधिक सस्ते हो तो उस स्थिति में उद्योग न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान पर स्थापित न होकर न्यूनतम मजदूरी लागत वाला स्थान पर स्थापित होता है। न्यूनतम श्रमिक लागत वाला स्थान के निर्धारण हेतु उन्होंने Isodapane Line खींचा है। यह एक ऐसी काल्पनिक रेखा है जो उन सभी बिन्दुओं को मिलाती है जहाँ न्यूनतम परिवहन लागत केन्द्र से परिवहन लागत में समान वृद्धि होती है। जैसे-

बेबर के औद्योगिक

बेबर का Isodapane Line

            वह आइसोडापेन रेखा जिसपर न्यूनतम श्रम लागत आता है उसी स्थान पर उद्योगों की स्थापना की जाती है। न्यूनतम श्रमिक लागत वाला आइसोडापेन लाइन को Critical Isodapane Lime कहते हैं।     

             इसका सबसे अच्छा उदहारण USA में देखने को मिलता है। जैसे – USA में सूती वस्त्र उद्योग का विकास न्यू इंगलैण्ड क्षेत्र में हुआ लेकिन सस्ते श्रम के कारण यह उद्योग स्थानांतरित होकर टेक्सॉस एवं अल्वामा जैसे राज्यों में चला गया है। इसी तरह से इलेक्ट्रॉनिक्स एवं साफ्टवेयर उद्योग सस्ते श्रम वाले क्षेत्र की ओर स्थानांतरित हो रहे हैं।
 
(2) बेबर के अनुसार संरचनात्मक सुविधाएँ भी उद्योगों के स्थानीयकरण को न्यूनतम परिवहन लागत वाले स्थानों से विचलित करते हैं। ये सुविधाएँ भारी उद्योगों को प्रभावित नहीं कर पाते हैं बल्कि छोटे एवं हल्के उद्योगों को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। खासकर फूटलूज उद्योग। जैसे – सौंदर्य प्रशाधन उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक उद्योग, माँग आधारित उद्योग, रेडिमेट गार्मेन्ट उद्योग इत्यादि। दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगरों में इस तरह के उद्योगों का विकास न्यूनतम परिवहन लागत के कारण नहीं बल्कि संरचनात्मक सुविधाओं के कारण हुआ है।

नोट: फुटलुज उद्योग – वैसा उद्योग जिसकी स्थापना कहीं भी की जा सकती है जहाँ संरचनात्मक सुविधाएँ उपलब्ध हो।

आलोचना

                 बेबर के द्वारा प्रस्तुत न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत के आलोचकों में हुबर, हॉटलीन फेटर, और स्मिथ अग्रणी है।

1. हुबर न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान न्यूनतम उत्पादन लागत का स्थान नहीं हो सकता क्योंकि उद्योगों के स्थानीयकरण को न केवल परिवहन प्रभावित करता है बल्कि तकनीकी लागत, श्रमिक लागत, ऊर्जा लागत इत्यादि का भी प्रभाव पड़ता है।

हूबर – दो से अधिक कच्चे माल का प्रयोग करने वाले उद्योगों का स्थानीयकरण त्रिभुज के अन्दर हो यह कोई जरूरी नहीं है। आज विश्व में अधिकांश इस्पात उद्योगों का विकास समुद्र के तटवर्ती क्षेत्र में हो रहा है न कि बेबर के त्रिभुजाकार मॉडल के अनुसार। 

            फेटर, हाटलीन और स्मिथ जैसे आचारपरक भूगोलवेताओं ने कहा है कि उद्योगों का स्थानीयकरण उपभोक्ताओं की इच्छा और क्रय क्षमता पर निर्भर करता है। हॉटलीन एवं फेटर ने मियामी बिच (USA) के पास विकसित आइसक्रीम उद्योगो का हवाला देते हुए यह बताया है कि यहाँ पर आइसक्रीम उद्योग विश्व का सर्वाधिक लागत वाला उद्योग है। फिर भी पर्यटकों के व्यवहार (मांग) के कारण इस उद्योग का यहाँ विकास हुआ है।

            अनेक आलोचकों ने बेबर के मान्यता को ध्यान में रखकर आलोचना किया है। जैसे- वर्तमान समय में कोई प्रदेश एकाकी प्रदेश नहीं हो सकता है और न ही उसमें भौगोलिक समरूपता पायी जा सकती है। इसी तरह बढ़ते दूरी एवं भार के अनुसार परिवहन मूल्य (भाड़ा) में सापेक्षिक वृद्धि भी नहीं हो सकती है। 

आलोचनात्मक मूल्यांकन

         इन आलोचनाओं के बावजूद बेबर के सिद्धांत का अपना महत्व है क्योंकि आज भी यह सिद्धांत चीनी उद्योग, वस्त्र उद्योग, खाद्य सामाग्री उद्योग के स्थानीयकरण की सटीक व्याख्या करता है। कुछ भूगोलवेताओं का यह भी कहना है कि समुद्री तट के किनारे विकसित होने वाले इस्पात उद्योग वर्तमान समय में बेबर के सिद्धांत के अनुरूप ही हो रहा है। जैसे- भारत का विशाखापतनम, जापान कोबे, USA का बाल्कि मोर इसके अच्छे उदाहरण हैं। भारत का विशाखापतनम कारखाना, बेलाडीला और डॉलीराजहरा से लौह-अयस्क प्राप्त करता है। और कोयला  का आयात न्यूनतम परिवहन लागत के कारण विदेशों से ही किया जाता है। इस तरह विशाखापतनम न्यूनतम परिवहन लागत इस्पात का प्रमुख केन्द्र बना है।

निष्कर्ष : 

      अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि कुछ खामियों के बावजूद बेबर का न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत चिरसंवतकालीन सिद्धांत है। यह सिद्धांत सुती वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योगो, लौह- इस्पात उद्योगों के स्थानीयकरण की सटीक व्याख्या कने में सक्षम है।

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