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BA SEMESTER/PAPER IIIGEOGRAPHY OF INDIA(भारत का भूगोल)

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

       34.भारत की प्राकृतिक वनस्पति



भारत की प्राकृतिक वनस्पति

           प्रकृति में स्वतंत्र रूप से उगने वाले वनस्पतियों के समुच्य को “प्राकृतिक वनस्पति” कहते हैं। दूसरी ओर वैसी वनस्पति जो मानवीय हस्तक्षेप से विकसित होती हैं उन्हें “मानव जनित वनस्पति” कहते हैं। जैसे- बाग-बगीचा, उद्यान आदि।

       प्राकृतिक वनस्पतियों के ऊपर जलवायु, उच्चावच एवं मिट्टी का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। कोपेन के अनुसार उपरोक्त तीनों कारकों में सर्वाधिक प्रभाव जलवायु का पड़ता है। उन्होंने बताया कि- “वनस्पति जलवायु का सूचकांक होता है।”

     प्राकृतिक वनस्पति में पुनर्नवीनीकरण का गुण पाया जाता है। इसका तात्पर्य है कि यदि पृथ्वी को 25 वर्षों तक स्वतंत्र छोड़ दिया जाय तो यह पुनः प्राकृतिक वनस्पतियों से भर जायेगी। पुनः प्राकृतिक वनस्पतियों में अनुकूलन की क्षमता भी पायी जाती है।

प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार

     भारत की प्राकृतिक वनस्पति प्राकृतिक वातावरण में रहते हुए विविध रूपों में रूपान्तरित हो चुकी है। भारत में लगभग 30 हजार से अधिक प्रकार के वनस्पति पाये जाते हैं। इन वनस्पत्तियों को वर्षा और तापीय स्थिति के आधार पर छ: भागों में बाँटकर अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(1) उष्ण-आर्द्र सदाबहार वनस्पति

(2) उष्ण-आर्द्र मानसूनी वनस्पति

(3) उष्ण शुष्क वनस्पति

(4) ज्वारीय वनस्पति

(5) उपोषण पर्वतीय वनस्पति

(6) हिमालय प्रदेश की वनस्पति

(1) उष्ण-आर्द्र सदाबहार वनस्पति-

         उष्णार्द्र सदाबहार वनस्पति की तुलना ‘विषुवतीय वनस्पति’ से की जाती है। इसकी सामान्य विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-

(i) इसकी वृक्ष की लम्बाई 30-60 मी० तक होती है।

(ii) इसकी जड़े बहुत गहराई तक नहीं पहुँच पाते हैं क्योंकि धरातल पर ही उन्हें पर्याप्त वर्षा जल प्राप्त हो जाती है।

(iii) पौधों में शाखाएँ कम पायी जाती हैं जिसके कारण इसका बितान कम चौड़ा होता है।

(iv) इसका तना काफी कठोर होता है।

(v) पत्तियाँ चौड़ी होती हैं क्योंकि सूर्य की रोशनी प्राप्त करने के लिए पौधों में प्रतिस्पर्धा चलती है।

         उष्णार्द्र सदाबहार वनस्पति में विविध प्रकार के वृक्ष एक साथ मिलते हैं। वृक्षों के ऊपर बड़े पैमाने पर अधिपादप (Ekiphyte) पाये जाते हैं। वृक्ष सालोंभर हरे-भरे रहते हैं। ये एक ही बार में सभी पत्तियों को नहीं गिराते, इसीलिए इसे “चिरहरित सदाबहार वनस्पति” कहते हैं। प्रमुख वृक्षों में महोगनी, बालनट, आबनूस, कब्रेका, सिनकोना, गाटापार्चा, एबोनी, रबड़, तेलताड़, सीडर, रोजवुड, आयरन वुड आदि हैं।

       उष्णार्द्र सदावहार वनस्पति सामान्यतः वैसे क्षेत्र में विकसित होती है, जहाँ वर्षा सालों भर होती है। तापमान अति उच्च रहता है। वर्षा 130-250 cm के बीच होती है। औसत तापमान 22°- 27°C, वायुमण्डलीय आर्द्रता 70% तथा तापान्तर 10°C से कम रहता है।

        भारत में विषुवतीय वनस्पति के तीन प्रमुख क्षेत्र है-

(i) अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह,

(i) मालाबार और कोंकण तट,

(iii) उ.-पू. भारत

(2) उष्ण-आर्द्र मानसूनी वनस्पति

         भारत के मानसूनी जलवायु क्षेत्रों में उगने वाले वनस्पति को मानसूनी वनस्पति कहते हैं। मानसून क्षेत्र में स्पष्ट रूप से दो शुष्क एवं आर्द्र जलवायु पायी जाती है। उष्णार्द्र मानसूनी वनस्पति शुष्क मौसम में पत्तियाँ गिरा देती है जिसे “पतझड़ मानसूनी वन” कहते हैं। जैसे- शीशम, पीपल, सागवान, इमली, अमलतास, एक्सल, सेमल आदि। मानसूनी प्रदेश में कुछ ऐसे भी वृक्ष मिलते हैं जो एक ही बार पत्तियों को नहीं गिराते हैं। जैसे- आम, अमरूद, बरगद इत्यादि। मानसूनी वनस्पति की जड़े विषुवतीय वनस्पति की तुलना में लम्बी होती है। तना मोटा होता है। बितान चौड़ा होता है। पतियों की चौड़ाई सामान्य होती है। वृक्षों के छाल काफी मोटे होते हैं। शुष्कता से बचने के लिए ही पौधे पत्तियों को गिराती है।

       मानसूनी वनस्पति मानसूनी जलवायु के प्रभाव में उगने वाली वनस्पति है। यहाँ न्यूनतम तापमान 18ºC अधिकतम तापमान 35°C, वर्षा ऋतु में वर्षा की मात्रा 60-130 cm नवम्बर से मई महीने तक मौसम शुष्क पायी जाती है।

        मानसूनी वनस्पति का विस्तार गंगा के मैदानी क्षेत्र, शिवालिक पर्वत, असम के मैदान, कोयम्बटूर के पठार, मध्यवर्ती भारत में हुआ है। भारत में मानसूनी वनस्पति का विस्तार सबसे अधिक क्षेत्र पर हुआ है।

(3) उष्ण शुष्क वनस्पति

          शुष्क जलवायु प्रदेशों में उगने वाले वनस्पति को “शुष्क और अर्द्धशुष्क वनस्पति” कहते हैं। सामान्यतः ऐसे वनस्पति को दो भागों में बाँटते हैं-

(i) अर्द्ध शुष्क वनस्पति

(i) पूर्ण शुष्क वनस्पति

           अर्द्ध शुष्क वनस्पति में घासभूमि और झाड़ियाँ बड़े पैमाने पर मिलती है। झाड़ियों की ऊँचाई 6-9 मी० तक होती है। जबकि पूर्ण शुष्क वनस्पति में कंटीले या कैक्टस वनस्पति का विकास बड़े पैमाने पर होता है। खेजड़ी अर्द्धशुष्क प्रदेश की प्रमुख वृक्ष हैं। जबकि पूर्ण शुष्क प्रदेश में नागफनी, बबूली, खजूर जैसे वृक्ष मिलते हैं। शुष्क वातावरण होने के कारण पौधों की जड़ें जलग्रहण करने हेतु काफी लम्बी हो जाती है। पत्तियाँ काँटों में रूपान्तरित हो जाती है। पति और तना के ऊपर मोम जैसे परत विकसित हो जाते हैं। कीटों को आकर्षित करने हेतु फूलों के रंग काफी चटकदार हो जाते हैं।

       50-100 cm वर्षा वाले क्षेत्रों में अर्द्धशुष्क वनस्पति का विकास होता है। जबकि 50 cm ये कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पूर्ण शुष्क वनस्पति का विकास होता है। शुष्क मानसूनी वनस्पति का विकास वहीं होता है जहाँ 8-11 माह तक शुष्क मौसम रहती है। तापमान और वाष्पोत्सर्जन की क्रिया अधिक होती है।

        अरावली पर्वत के पूर्वी भाग में, द. भारत के वृष्टिछाया प्रदेश में तथा लेह लद्दाख क्षेत्र में ‘अर्द्धशुष्क वनस्पत्ति’ पायी जाती है। जबकि थार मरुस्थलीय क्षेत्र में “पूर्ण शुष्क वनस्पति” पायी जाती है।

(4) ज्वारीय वनस्पति

        इसे ‘गरान’ या ‘मैंग्रोव वनस्पति’ भी कहा जाता है। इसका विकास तटीय क्षेत्रों में हुआ है। चूँकि तटीय क्षेत्रों में लवण की मात्रा अधिक पायी जाती है। इसलिए लवणीय वातावरण के साथ इनका अनुकूलन हुआ है। ज्वारीय वनस्पति को भी दो भागों में बाँटते हैं-

(i) ज्वारीय प्रवाह क्षेत्र के वन-

        इसे सुन्दर वन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें सुन्दरी, केन और बेंत नामक वृक्ष मिलते हैं। इन वृक्षों की ऊँचाई 30 मी० तक होती है। लकड़ियाँ काफी नाजुक होती है।

(ii) ज्वारीज प्रवाह से मुक्त प्रदेश की वनस्पति-

         यहाँ ताड़ और नारियल जैसे वृक्ष प्रमुख हैं। इनकी लम्बाई बहुत अधिक होती है। तना में रेशम पायी जाती है जिसके कारण लकड़ियाँ काफी मजबूत होती है।

     ज्वारीय वनस्पति मुख्य रूप से विषुवतीय वातावरण में उगने वाली वनस्पति है। लेकिन तटीय क्षेत्रों में अधिक लवण पाये जाने के कारण अनुकूलन की क्षमता पायी जाती है। जैसे- धरातल के ऊपर आ जाते हैं ताकि श्वसन की क्रिया आसानी से हो सके।

      भारत में ज्वारीय वनस्पति का विकास तटवर्ती क्षेत्रों में स्थित ज्वारनदमुख, नदियों के मुहानों, संकरी खाड़ियों या निवेशिकाओं में हुआ है। गंगा ब्रह्मपुत्र का डेल्टा विश्व का सबसे बड़ा मैन्ग्रोव वनस्पति का क्षेत्र है।

(5) उपोष्ण पर्वतीय वनस्पत्ति

        उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति का विकास वैसे क्षेत्रों में हुआ है जहाँ की जलवायु उष्णकटिबंधीय है। लेकिन, ऊँचाई के कारण जलवायु में परिवर्तन हुई है और यह उपोष्ण जलवायु में बदल चुकी है। उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति को भी दो भागों में बाँटते है। जैसे-

(i) आर्द्र उपोष्ण पहाड़ी वनस्पति और

(ii) आर्द्र शीतोष्ण पहाड़ी वनस्पति

      आर्द्र उपोष्ण पहाड़ी वनस्पति 1070-1525 मी० की ऊँचाई पर मिलती है। जबकि आर्द्र शीतोष्ण वनस्पति 1525 से भी अधिक ऊँचाई पर मिलती है। ऐसे वनस्पति को ‘सोलास वन या शोला वन के नाम से भी जानते हैं। उपरोक्त दोनों प्रकार के वनों में मिलने वाले वृक्ष सदाबहार प्रकार के होते हैं। ज्यों-2 ऊँचाई बढ़ती जाती है त्यों-2 लकड़ी गुलायम तथा पते की चौड़ाई कम होते जाती हैं। चेस्टनट, रोजवुड, यूकेलिप्टस, देवदार, पाइन इत्यादि वृत मिलती हैं।

        उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति उपोष्ण जलवायु क्षेत्र में पायी जाती हैं। यह प्रायद्वीपीय भारत की वनस्पति है। जो अरावली, विन्ध्यन, सतपुड़ा, अजन्ता, पूर्वी घाट, प० धाट, नीलगिरि, अन्नामलाई की पहाड़ियों पर 1070 मी० से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में मिलते हैं।

(6) हिमालय प्रदेश की वनस्पति

         इसे अल्पाइन वनस्पति भी कहते हैं। हिमालय प्रदेश की प्राकृतिक वनस्पति पर निम्न कारकों का प्रभाव पड़ा है। उच्चावच, पवन, वर्षा की मात्रा, ऊँचाई के साथ तापीय परिवर्तन, अक्षांश और ढाल का।

     हिमालय का उत्तरी ढाल मंद और द० ढाल तीव्र है जिसके कारण उत्तरी ढालों पर वनों का विस्तार अधिक तथा दक्षिणी ढालों पर वनों का विस्तार कम हुआ है। महान हिमालय के दक्षिणी ढाल पर कश्मीर हिमालय में मिलने वाले घास को ‘गुलमर्ग’ और ‘सोनमर्ग’ तथा कुमायूँ हिमालय में बुग्याल और ‘प्यायर’ कहते हैं। यह एक शीतोष्ण प्रकार के मुलायम घास है जिसका प्रयोग पशुचारे के रूप में किया जाता है।

       अक्षांशीय प्रभाव के आधार पर भी हिमालय के वनस्पति को दो भागों में बाँटते हैं।

 (i) पूर्वी हिमालय की वनस्पति और

(ii) पश्चिमी हिमालन की वनस्पति।

        पूर्वी हिमालय निम्न अक्षांश पर है। अतः यहाँ आर्द्रता अधिक, वर्षा 200 cm तक और सूर्य की लम्बवत किरणें मिलती है। जबकि पश्चिम हिमालय अपेक्षाकृत उच्च अक्षांश पर स्थित है जिसके कारण आर्द्रता कम, वार्षिक वर्षा 75 से कम और सूर्य की लम्बवत किरणों का प्रभाव कम पड़ता है। पूर्वी हिमालय में पतझड़ वन मिलते है जबकि प० हिमालय में नहीं। इसी तरह प० हिमालय में शीतोष्ण शुष्क वनस्पति मिलती है जबकि पूर्वी हिमालय में नहीं।

        हिमालय प्रदेश की वनस्पति पर उच्च्वाच का व्यापक प्रभाव पड़ा है। ऊँचाई के अनुसार ताप में परिवर्तन होते है और उसी के अनुरूप वनस्पति बदलते हैं जिसे नीचे के चित्र में दिखाया गया है।

भारत की प्राकृतिक
चित्र: भारत के प्राकृतिक वनस्पति

            इस प्रकार उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में अनेक प्रकार के प्राकृतिक वनस्पति पायी जाती हैं। इन वनस्पतियों पर जलवायु, उच्चावच, ढाल, मिट्टी, सूर्याताप, समुद्र से दूरी इत्यादि भौगोलिक काकों का प्रभाव पड़ा है। इन कारकों में सबसे ज्यादा प्रभाव जलवायु का पड़ा है। इसलिए कोपेन का कथन सत्य प्रतीत होता है कि “भारतीय वनस्पतियाँ जलवायु के सूचकांक होती हैं।”

प्रश्न प्रारूप

1. “भातीय प्राकृतिक वनस्पतियाँ जलवायु के सूचक हैं।” विवेचना करें।

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I ‘Dr. Amar Kumar’ am working as an Assistant Professor in The Department Of Geography in PPU, Patna (Bihar) India. I want to help the students and study lovers across the world who face difficulties to gather the information and knowledge about Geography. I think my latest UNIQUE GEOGRAPHY NOTES are more useful for them and I publish all types of notes regularly.

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