5. Trade Balance and Trade Policy (व्यापार संतुलन एवं व्यापार नीति)

Trade Balance and Trade Policy

(व्यापार संतुलन एवं व्यापार नीति)



      उत्पादों का उत्पादनकर्ताओं के द्वारा उपभोक्ताओं तक पहुंचाने की प्रक्रिया को व्यापार कहते हैं। व्यापार तृतीय क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। व्यापार का कार्य स्थानीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर सम्पन्न होते हैं। मोटे तौर पर व्यापार को दो भागों में बाँटते है।:-

(1) देशी व्यापार और

(2) विदेशी व्यापार।

       जब कोई उत्पाद विदेशों में भेजा जाता है तो उसे निर्यात कहते हैं और जब विदेशों से कोई वस्तु/उत्पाद देश में मंगायी जाती है तो उसे आयात कहते हैं। आयात एवं निर्यात के रूप में उत्पाद किसी वस्तु या सेवा के रूप में हो सकता है। आयात और निर्यात से संबंधित सभी आँकड़े बंदरगाहों एवं एयरपोर्ट पर रिकॉर्ड किये जाते हैं और उसका मौद्रिक मूल्य में तब्दील किये जाते हैं।

      व्यापार में प्रयुक्त होने वाले वस्तु जो हमें दिखाई देते हैं उन्हें दृश्य वस्तु कहते हैं। वस्तुओं को छोड़‌कर सेवा क्षेत्र जो कि हमें दिखाई नहीं देते हैं उसे अदृश्य मद कहते हैं। जब किसी देश के निर्यात और आयात की मौद्रिक मूल्य बराबार होता है तो उसे व्यापार संतुलन कहते हैं। जब निर्यात अधिक और आयात कम होता है तो उसे अनुकूल व्यापार कहते है। इसी तरह निर्यात कम हो और आयात ज्यादा हो तो उसे प्रतिकूल व्यापार कहते हैं।

     आजादी के पूर्व भारत में अनुकूल व्यापार की स्थिति थी जबकि आजादी के बाद से प्रतिकूल व्यापार की स्थिति रही है। संतुलित व्यापार एक आदर्श स्थिति है जिसे सभी राष्ट्र प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। नीचे के तालिका में विदेशी व्यापार से संबंधित आँकड़े प्रस्तुत किये जा रहे हैं। जैसे:-

वर्ष निर्यात (करोड़ रू० में) आयात (करोड़ रू० में) कुल व्यापार (करोड़ रू० में) व्यापार घाटा (करोड़ रू० में)
1950-51 606 608 1214 -2
1960-61 642 1122 1764 -480
1970-71 1535 1634 3169 -99
1980-81 6710 12549 19259 -99
1990-91 32558 43193 75751 -10635
2000-01 203571 230873 434444 -27302
2005-06 45798 630527 1085444 -175727

स्रोत- योजना 2008, जून-जुलाई

     ऊपर के तालिका से स्पष्ट है कि भारत में आजादी के बाद से कभी भी व्यापार संतुलन की स्थिति नहीं रही है। भारत सरकार व्यापार संतुलन की स्थिति प्राप्त करने के लिए समय-समय पर कई उपाय करती रही है। जैसे-

(1) मुद्रा का अवमूल्यन,

(2) मुद्रा के विनिमय पर नियंत्रण,

(3) मुद्रा के संकुचन एवं विस्तार,

(4) राजकोषीय घाटे से कम करना,

(5) निर्यात को बढ़ावा देने हेतु EPZ और SEZ की स्थापना,

(6) आयात पर नियंत्रण,

(7) पर्यटन का विकास,

(8) विदेशी ऋण एवं सहायता लेना,

(9) समय-2 प व्यापार नीति की घोषणा।

व्यापार नीति

    भारतीय व्यापार विभिन्न प्रकार के अधिनियमों एवं नियमों के द्वारा निर्देशित होता है। भारत सरकार के पहली आयात-निर्यात नीति (Exim Policy/Trade Policy) अर्थात् एक्जिम नीति तत्कालीन वाणिज्य मंत्री श्री वी.पी. सिंह ने 12 अप्रैल, 1985 को घोषणा की। इस नीति की तीन प्रमुख विशेषता थी-

(1) औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए भारतीय उद्योगों की कच्चे माल, उच्च तकनीकी, यंत्रों एवं पूँजी तक पहुँच सुनिश्चित करना था।

(2) उद्योगों के आधुनिकीकरण एवं तकनीकी संवर्धन को बढ़ावा देना।

(3) भारतीय उद्योगों को उत्तरोत्तर (लगातार) अन्तरर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी बनाना।

      वर्तमान समय में 31 अगस्त 2004 को घोषित आयात-निर्यात नीति के तहत विदेशी व्यापार संचालित हो रहा है। भारत सरकार भारत को विश्व स्तर पर एक प्रमुख निर्यातक देश के रूप में स्थापित करना चाहती है। अत: 2004 की व्यापार नीति में व्यापक दृष्टिकोण समाहित करते हुए “पंचवर्षीय (2004-09) नीति” की घोषणा की थी। इस नीति के प्रमुख तथ्य निम्नलिखित थे-

(1) अगले 5 वर्षों में वस्तुगत व्यापार को बढ़ाकर दुगुना करना है।

(2) विदेशी व्यापार को आर्थिक विकास और रोजगार सृजन का प्रभावी हाथियार बनाया जायेगा।

(3) उपरोक्त उद्देश्यों के पूर्ति हेतु निमलिखित रणनीति पर कार्य की जायेगी-

(ⅰ) विभिन्न प्रकार के नियंत्रणों को समाप्त कर उद्योगपतियों और व्यापारियों की आन्तरिक उद्यमशीलता को प्रोत्साहित किया जायेगा।

(ii) विदेशी व्यापार से जुड़े सभी कार्यों को सरलीकृत किया जायेगा।

(iii) निर्यात लागत को कम किया जायेगा।

(iv) भारत को विनिर्माण, व्यापार और सेवाओं का वैश्विक केंद्र बनाया जयेगा।

(v) वैसे क्षेत्रों को बढ़ावा दिया जायेगा जो ग्रामीण एवं अर्द्धनगरीय क्षेत्र में रोजगार को बढ़ावा दे सकेंगें।

(vii) देश के व्यापार को विश्व स्तरीय प्रतिस्पर्द्धी बनाया जायेगा।

(viii) तकनीक, पूँजी और आधुनिक यंत्रों के आयात को बढ़ावा दिया जायेगा।

(ix) घरेलू व्यापार को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न देशों से मुक्त व्यापार समझौता एवं अधिमान्य व्यापार समझौता के द्वारा व्यापार घाटा पाटने का प्रयास होगा।

(x) व्यापार बोर्ड की भूमिका को पुनः परिभाषित की जायेगी।

(xi) देश की निर्यात रणनीति के निष्पादन में भारतीय दूतावासों की भूमिका सुनिश्चित की जायेगी तथा इलेक्ट्रॉनिक्स माध्यमों का अधिक से अधिक प्रयोग किया जा सकेगा।

     ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में घोषित व्यापार नीति में कई उल्लेखनीय तथ्यों को शामिल किया गया है। वर्तमान समय में इन नीतियों का व्यापार पर सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है। इसके पीछे मंदी का दौर/आर्थिक मंदी को उत्तरदायी ठहराया जा रहा है। मंदी समाप्त होते ही भारतीय व्यापार पर इसका सारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ेगा।

2. Cotton Textile Industry (सूती वस्त्र उद्योग)

Cotton Textile Industry

(सूती वस्त्र उद्योग)



प्रश्न प्रारूप

Q1. सूती वस्त्र उद्योग की समस्या की चर्चा करे।

Q2. भारत में सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण तथा वर्तमान गतिविधियों की चर्चा करे।

Q3. भारत में सूती वस्त्र के स्थानीयकरण हेतु कारकों का विश्लेषण कीजिए तथा इस उद्योग में अभिनव प्रवृतियों को बताएँ।

Q4. सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण हेतु कारकों की विवेचना कीजिए तथा इसके वितरण प्रतिरूप का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर- सूती वस्त्र उद्योग भारत का सबसे पुराना उद्योग है। यह भारत का सबसे बड़ा उद्योग है। यह भारत का सबसे बड़ा रुग्ण उद्योग भी है। भारत में सर्वाधिक कर्मचारी इसी उद्योग में संलग्न है। भारत कभी विश्व का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक देश हुआ करता था। लेकिन, इंगलैण्ड में हुए औद्योगिक क्रांति के कारण भारतीय सूती वस्त्र उद्योग को प्रायोजित तरीके से पीछे कर दिया गया।

विकास / वृद्धि

    सूती वस्त्र उद्योग यद्यपि भारत का सबसे प्राचीन उद्योग है। फिर इसका आधुनिक कारखाना 1818 ई० में कलकता के ‘फोर्ट ग्लोस्टर’ नामक स्थान पर लगाया गया था। लेकिन कच्चे माल के अभाव में असफल रहा। पुनः सफल सूती वस्त्र का कारखाना 1850 ई० में कलकत्ता में स्थापित किया गया। इस सफल प्रयास के बाद इस उद्योग का विकास सतत् जारी है। 

      1905 ई० तक भारत में 206 सूती वस्त्र के मील स्थापित हो चुके थे। 1958 ई० तक भारत में मीलों की संख्या 1767 पहुंच गयी थी। वर्तमान समय में इसकी संख्या बढ़कर 2000 से भी अधिक हो चुकी है।

स्थानीयकरण

      बेवर ने अपने न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत में बताया कि सूती वस्त्र उद्योग शुद्ध कच्चा माल पर आधारित एक ऐसा उद्योग है जिसमें हम जितना कच्चा माल लगाते है उतने ही मात्रा में शुद्ध उत्पाद प्राप्त करते है। ऐसे उद्योगों को समभार उद्योग कहा जा सकता है। इस प्रकार के उद्योगों का स्थानीकरण कच्चे माल वाले क्षेत्रों में, बाजार में या दोनों स्थानों पर हो सकता है। जैसे- मुम्बई के आसपास इस उद्योग का विकास बड़े पैमाने पर हुआ है क्योंकि महाराष्ट्र के काली मिट्टी की भूमि पर बड़े पैमाने पर कपास की खेती होती है।

      पुनः इस उद्योग का स्थानीयकरण कोलकाता के आस-पास हुआ है जबकि पूरे पश्चिम बंगाल में कपास की खेती कहीं नहीं की जाती है। अतः कलकत्ता के आस-पास सूती वस्त्र उद्योग विकास बाजार के कारण हुआ है।

विकास के विभिन्न चरण या नवीन प्रवृति या वितरण

    भारत उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु वाला देश है। इसलिए सम्पूर्ण भारत में सदैव सूती वस्त्र की माँग होती रही है। प्रारंभ में इसके विकास में केन्द्रीयकरण की प्रवृति थी। कालान्तर में यह विकेन्द्रीकृत उद्योग बना। केन्द्रीयकरण से विकेन्द्रीकृत उद्योग बनने में काफी लम्बा समय लगा है। इस समय को चार चरण में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

प्रथम चरण:-

  भारत में सूती वस्त्र उद्योग का प्रथम चरण 1854–1900 ई. तक माना जाता है। प्रथम चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास केवल मुम्बई महानगर में हुआ। यहाँ पर इस उद्योग के स्थानीयकरण के चार कारक महत्त्वपूर्ण थे। जैसे-

(1) मुम्बई भारत का सबसे बड़ा बंदरगाह रहा है।

  • कपास निर्यात करने के लिए यहाँ लाये जाते थे।
  • कपास के व्यापारी मुम्बई में ही रहा करते थे। उनके पास पूँजी और तकनीक पहले से मौजूद थी।
  • पुनः मुम्बई की आर्द्र जलवालु सूती वस्त्र उद्योग के लिए उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराती थी।

     यही कारण था कि मुम्बई द्वीप पर सूटी वस्त्र उद्योग का प्रथम विकास हुआ।

(2) चीन में विकसित हो रहे सूती वस्त्र उद्योग में धागा आपूर्ति करने का कार्य ब्रिटिश कंपनियाँ किया करती थी। जब ब्रिटिश कंपनियाँ चीन को पर्याप्त मात्रा में धागा आपूर्ति करने में असफल होने लगी तो उन्होंने भारतीय व्यापारियों के इस क्षेत्र में पूंजी निवेश के लिए प्रोत्साहित किया।

(3) मुम्बई महानगर में वाणिज्यिक ऊर्जा की कमी थी लेकिन द० अफ्रीका से आयातित कोयला पर मुम्बई के पास तापीय विद्युत केन्द्र की स्थापना की गई तो सुचारू रूप से विद्युत की आपूर्ति होने लगी।

(4) सस्ते श्रमिक और आन्तरिक बाजार की उपलब्धता भी यहाँ पर इस उद्योग के विकास में सहायक रहा।

    ऊपर वर्णित कारकों के कारण 19वीं सदी के अन्त तक मुम्बई द्वीप पर करीब 40 कारखाने विकसित हो चुके थे। इसे “भारत का मैनचेस्टर” या “कपास की महानगरी” भी कहा जाने लगा। स्वेज नहर के पूरब में सूती वस्त्र उत्पादन करने वाला यह सबसे बड़ा केन्द्र बन गया।

दूसरा चरण:-

      1900-23 ईo के मध्य लगे सूती वस्त्र उद्योग को इस चरण में शामिल करते हैं। इस चरण में उद्योगों का विकास मुम्बई के बाहरी क्षेत्रों में हुआ क्योंकि मुम्बई महानगर में लगातार जमीन का मूल्य बढ़ता जा रहा था। श्रमिक संगठनों का विकास बड़े पैमाने पर हो चुका था। मलीन बस्तियाँ विकसित होने लगी थी। अतः निवेशकों ने मुम्बई के बाहरी क्षेत्रों में पूँजी निवेश का कार्य प्रारंभ किया। इस चरण में स्थानीयकरण की दो प्रवृति थी- प्रथम मुम्बई के ही बाहरी क्षेत्रों में सूती वस्त्र के कारखाने लगाये गये।

     पुनः सूती वस्त्र कारखाना लगाने हेतु मुम्बई के आप-पास के नगरों का चयन किया जहाँ मुम्बई के समान सभी परिस्थितियाँ अनुकूल थी। जैसे- इस चरण में कल्याण, थाणे, पुणे, नासिक, सूरत, बड़ोदरा तथा अहमदाबाद जैसे नगरों में सूती वस्त्र उद्योग का तेजी से विकास हुआ क्योंकि ये सभी केन्द्र अरब सागर के निकट थे जिसके कारण नम जलवायु उपलब्ध थी। बड़ौदरा, सूरत बंदरगाह थे। “टाटा हाइड्रल प्रोजेक्ट” के द्वारा विद्युत की आपूर्ति सुनिश्चित हो चुकी थी। मुम्बई के ही समान सस्ते श्रमिक तथा बाजार उपलब्ध थे।

तीसार चरण:-

     1923 से 1947 ई० के बीच लगे उद्योगों को इस चरण में शामिल करते हैं। इस चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास दक्कन के लावा के पठारी क्षेत्र तथा मध्यवर्ती पठार पर हुआ। दक्कन के पठार पर पोरबन्दर, राजकोट, सुरेन्द्रनगर (सूरत), भूसावल, अहमदनगर, नागपुर, कोल्हापुर, सोलापुर, गुलवर्गा प्रमुख केन्द्र के रूप में थे। इन केन्द्रों में इस उद्योग का विकास कपास की खेती, सस्ते श्रमिक तथा बाजार की उपलब्धता के कारण हुआ।

      भारत के उ० मध्यवर्ती पठारी क्षेत्र में इस उद्योग का विकास इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, भोपाल, इटारसी, भिलवाड़ा, अजमेर, जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर में हुआ। इन क्षेत्रों में सूती वस्त्र उद्योग का विकास कई कारणों के चलते हुआ। जैसे-

(1) इन क्षेत्रों में कई बड़े देशी रियासत रहा करते थे। इन रियासतों ने इस उद्योग में रुचि लिया। ब्रिटिश कंपनियों ने भी देशी रजबाड़ों को इस क्षेत्र में आमंत्रित किया। देशी रजबाड़ों ने ब्रिटिश कंपनियों को भूमि दिया तो दूसरी ओर ब्रिटिश कंपनियों ने बड़े पैमाने पर पूंजी तथा तकनीक का निवेश किया। इसके अलावे मैदानी भारत का बाजार, सस्ते श्रमिक उपलब्धता और कपास की खेती ने भी इस उद्योग को आकर्षित किया।

     इसी चरण में कानपुर, आगरा, दिल्ली, हैदराबाद, बंगलोर, विशाखापतन तथा कलकता भी सूती वस्त्र केन्द्र के रूप में उभरे क्योंकि यहाँ की सभी भौगोलिक परिस्थितियाँ अनुकूल थी तथा सस्ते श्रमिक और बाजार उपलब्ध थे।

   आजादी के बाद भारत में सूती वस्त्र उद्योग

चौथा चरण:-

     आजादी के बाद विकसित हुए सूती वस्त्र उद्योगों को इसमें शामिल करते हैं। इस चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास चार क्षेत्रों में हुआ-

(i) उ०-प० भारत-

   इसमें पंजाब तथा हरियाणा को शामिल करते हैं। सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने के कारण इन क्षेत्रों में कपास की खेती प्रारंभ की गई। कपास की स्थानीय उपलब्धता के करण जालंधर, लुधियाना, अम्बाला, चंडीगढ़ अमृतसर तथा गंगानगर जिला सूती वस्त्र उद्योग केन्द्र के रूप में उभरे।

(ii) UP तथा बिहार-

   यहाँ पर सस्ते श्रमिक तथा बाजार की उपलब्धता के कारण इस उद्योग का विकास हुआ। UP में मेरठ, गाजियाबाद, सहारनपुर, मोदीनगर, मुरादाबाद, वाराणसी, मिर्जापुर जैसे नगर में और बिहार में गया, डुमराँव, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, पटना इत्यादि में विकसित हुआ। इस क्षेत्रों में सस्ते श्रमिक तथा बाजार उपलब्ध होने के कारण इस उद्योग कर विकास हुआ था।

(iii) पूर्वी भारत-

   बाजार की सुविधा, सस्ते श्रमिक, आयात-निर्यात की सुविधा तथा हुगली औद्योगिक प्रदेश में विकसित संरचनात्मक सुविधाओं के कारण इस उद्योग का यहाँ विकास हुआ। यहाँ इस उद्योग के मुख्य केन्द्र कोलकाता, हावड़ा, मानिकपुर, नैहाटी, चन्दन नगर, सियारामपुर, दीमापुर, इम्फाल, गुवाहाटी तथा कटक थे।

(iv) द० भारत-

    यहाँ सस्ते जल विद्युत की अपलब्धता तथा कपास की खेती किए जाने के कारण इस उद्योग का विकास हुआ। विजयवाड़ा,  बेलगाँव मैसूर, काँचीपुरम्, मदुरई, तिरुचिरापल्ली, पाण्डिचेरी तथा तिरुअनन्तपुरम जैसे नगरों में इस उद्योग का विकास हुआ। कोयम्बटूर को “दक्षिण भारत का मैनचेस्टर” भी कहा जाने लगा। भारत में सर्वाधिक सूती वस्त्र का मील तमिलनाडु राज्य में ही स्थित है।

   उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में सूती वस्त्र उद्योग का अभूतपूर्व विकेन्द्रीकरण हुआ है। भारत के प्रमुख सूती वस्त्र केन्द्रों को नीचे मानचित्र में देखा जा सकता है।

Cotton Textile Industry

चित्र: भारत के प्रमुख सूत्री वस्त्र उद्योग केंद्र

   भारत में सूती वस्त्र का उत्पादन तीन क्षेत्रों में किया जाता है:-

(1) मील 

(2) पावरलूम (छोटे-छोटे मशीन से)

(3) हथकरघा / चरखा

   इन तीनों क्षेत्रों में होने वाला उत्पादन को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है:-

Sector Approx Share (Indicative) Role
Powerloom Majority (सबसे बड़ा) कपड़े का बड़ा उत्पादन भाग Powerloom से आता है
Handloom छोटा हिस्सा पारंपरिक हस्तकल्याणित बुनाई
Mill औद्योगिक उत्पादन बड़े पैमाने पर घेराबंदी
Others न्यून खास/विशिष्ट वस्त्र

           नीचे के तालिका में सूत उत्पादन को प्रदर्शित किया जा रहा है:-     

वर्ष सूत का उत्पादन हजार टन में
1950-51  835
1960-61 1075
1970-71 1050
1980-81 1400
1990-91 1430
2000-01 1600
2010-11 4500
2020–21
5200

विश्लेषण 

  • 1950–51 से 1970–71 तक सूत उत्पादन में धीमी वृद्धि देखी जाती है।

  • 1980–81 के बाद आधुनिकीकरण, पावरलूम और मिल सेक्टर के विस्तार से उत्पादन तेज़ी से बढ़ा।

  • 2000–01 के बाद तकनीकी प्रगति, निर्यात वृद्धि और निजी निवेश के कारण उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई।

  • 2010–11 से 2020–21 के बीच भारत विश्व के प्रमुख सूत उत्पादक देशों में शामिल हो गया।

भारत में सूती वस्त्र उत्पादन करने वाले 5 प्रमुख राज्य

1. महाराष्ट्र 

  • सर्वाधिक सूती वस्त्र उत्पादन
  • प्रमुख केंद्र: मुंबई, नागपुर, शोलापुर, पुणे

2. गुजरात 

  • दूसरा स्थान
  • प्रमुख केंद्र: अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा

3. तमिलनाडु 

  • दक्षिण भारत में सबसे प्रमुख
  • प्रमुख केंद्र: कोयंबटूर, मदुरै, तिरुपुर

4. पश्चिम बंगाल

  • हावड़ा, हुगली क्षेत्र प्रमुख
  • जूट के साथ-साथ सूती वस्त्र उद्योग भी विकसित

5. मध्य प्रदेश

  • इंदौर, उज्जैन क्षेत्र
  • कपास उत्पादन के कारण सूती वस्त्र उद्योग को बढ़ावा

समस्या तथा संभावना

    सूती वस्त्र उद्योग कई समस्याओं का सामना कर रही है। जैसे-

(1) कच्चे माल की समस्या-

    भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण वस्त्र की माँग लगातार बढ़‌ती ही जा रही है। बढ़ती हुई मांग को देश पूरा नहीं कर पा रहा है जिसके कारण कपास का मूल्य लगागर बढ़‌ता ही जा रहा है। फलतः भारत को अन्य देशों से कपास आयात करना पड़ता है।

    भारत के पास कपास उत्पादन हेतु विस्तृत काली मिट्टी का क्षेत्र उपलब्ध है। अतः सिंचाई सुविधाओं का विकास कर कपास का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। उत्पादन को बढ़ाकर आयात पर से निर्भरता कम की जा सकती है।

(2) पुराने मशीन-

    भारत में अधिकांश वस्त्र का उत्पादन पूराने मशीनों से किया जाता है। जबकि USA, चीन, मिस्र, जैसे आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर सूती का उत्पादन करते हैं जिसके कारण भारतीय सूती वस्त्र उद्योग अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पिछड़‌ता जा रहा है। लेकिन, नई औद्योगिक नीति की घोषणा से यह उम्मीद जगी है कि भारत में नवीन विदेशी तकनीक आगमन होगा।

(3) अनियमित विद्युत की आपूर्ति-

     देश में लगातार ऊर्जा की मांग बढ़ती जा रही है। माँग के अनुरूप विद्युत की आपूर्ति न होने के कारण कोई भी कारखाना निर्बाध्य रूप से नहीं चल पाता है। लेकिन, आने वाले समय में परमाणु ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा इत्यादि के विकास से इस समस्या से निजात मिल सकेगा।

(4) हड़ताल तथा तालाबंदी-

    सूती वस्त्र उद्योग से जुड़े हुए श्रमिक संगठन काफी मजबूत है। ये संगठन अपने मांगों को लेकर हड़ताल करते हैं। अगर उनकी मांग पूरी नहीं हुई तो कंपनी में ताला लटका देते हैं, जिसके कारण उत्पादन में कमी आती है।

     हालांकि न्यापालिका के हस्तक्षेप से और सरकार के बीच-बचाव से इस समस्या में लगातार कमी आ रही है।

(5) कृत्रिम रेशे के साथ प्रतिस्पर्द्धा-

       देश की गरीब जनता कृत्रिम रेसे से बने वस्त्र का उपयोग करते हैं जो अधिक टिकाऊ, सस्ता तथा आकर्षक होता है जबकि सूती वस्त्र कम टिकाऊ तथा महंगा होता है।

(6) घाटे में चल रही मील-

    भारत में सबसे ज्यादा सूती वस्त्र मील तमिलनाडु में है। लेकिन, तमिलनाडू भारत का मात्र 6.4% ही सूती वस्त्र का उत्पादन करता है। उत्तर भारत में खाद्यान्न फसल की खेती कपास उपजाने वाले भूमि पर की जाने लगी, जिसके कार‌ण कच्चे माल की कमी हो गई। फलतः अधिकांश उत्तर भारत के सूती वस्त्र उद्योग बन्द हो गए। पुनः अधिक आयात शुल्क होने के कारण उसका आयात भी संभव नहीं था। लेकिन नवीन औद्योगिक नीति के कारण इसमें सुधार आने की संभावना है।

निष्कर्ष:

       ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत के सूती वस्त्र उद्योग कई समस्याओं का सामना कर रही है। फिर भी, यह भारत का सबसे बड़ा उद्योग है, इस उद्योग में सबसे अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

      यह भारत का पूर्ण रूप से विकेन्द्रित उद्योग है। भारत के पास देशी एवं विदेशी बाजार उपलब्ध है। अतः कहा जा सकता है कि भारत में सूती वस्त्र उद्योग का भविष्य काफी उज्ज्वल है।

43. According to Trewartha, The Climatic Regions of India and Their Characteristics (ट्रीवार्था के अनुसार भारत के जलवायु प्रदेश और उसकी विशेषता)

43. According to Trewartha, The Climatic Regions of India and Their Characteristics

(ट्रीवार्था के अनुसार भारत के जलवायु प्रदेश और उसकी विशेषता)



       जलवायु प्रदेश का तात्पर्य उस भौगोलिक भूखण्ड से है जहाँ जलवायु के तत्वों के बीच समानता पायी जाती है। विश्व व्यापी जलवायु कर्गीकरण में भारत को मानसूनी जलवायु वर्गीकरण में रखा गया है। लेकिन आन्तरिक विविधता के कारण कई छोटे-2 जलवायु प्रदेशों में वर्गीकृत किया गया है। ट्रीवार्था ने कोपेन जलवायु वर्गीकरण को आधार मानते हुए भारत के जलवायु प्रदेशों का निर्धारण किया।

     वस्तुत: कोपेन विश्व के संदर्भ में जलवायु प्रदेशों का निर्धारण किया था और अपने अनुभव के आधार पर भारतीय जलवायु प्रदेशों का निर्धारण किया। जबकि ट्रीवार्था का कार्य पूर्णतः भारतीय उपमहाद्वीप पर आधारित था। उन्होंने अधिक से अधिक जलवायु केन्द्रों पर जाकर आँकड़ों का संग्रहण किया और उसके बाद जलवायु प्रदेश को निर्धारित किये।

       पुन: ट्रीवार्था ने कोपेन के ही समान वनस्पति, तापमान, वर्षा और ऊँचाई को आधार मानते हुए भारत को 7 प्रमुख जलवायु प्रदेशों में वर्गीकृत किया। जैसे-

(1) उष्ण वर्षा वन की जलवायु प्रदेश (Am)

(2) उष्ण सवाना प्रदेश की जलवायु (Aw)

(3) उष्ण अर्द्ध मरूस्थतीय स्टेपी जलवायु प्रदेश (BSW)

(4) उष्ण मरुस्थलीय प्रदेश की जलवायु (Bwh)

(5) उष्ण उपोष्ण जलवायु प्रदेश (BS)

(6) आर्द्र उपोष्ण जलवायु प्रदेश (Cwa)

(7) पर्वतीय जलवायु (H)

According to Trewartha

       ट्रीवार्था और कोपेन के जलवायु प्रदेशों का तुलनात्मक अध्ययन नीचे के तालिका में किया जा रहा है:-

कोपेन का जलवायु प्रदेश ट्रीवार्था का जलवायु प्रदेश
1. Amw Am
2. AS BS
3. Aw Aw
4. BShw BSh
5. BWhw BWh
6. Cwg Cwa
7. Dfc H
8. ET
9. EF

(1) उष्ण वर्षा वन की जलवायु प्रदेश (Am):-

       ऐसे जलवायु प्रदेश जहाँ का तापमान 18°C से अधिक होती है वहाँ इस प्रकार की जलवायु की दशाएँ देखने को मिलती है। यहाँ ऐसे क्षेत्र आते है जहाँ की औसत वार्षिक तापमान 27°C से अधिक एवं औसत वार्षिक वर्षा 250 सेंमी० या इससे अधिक हो। भारत के पश्चिम तटीय क्षेत्रों, दक्षिणी असम, पश्चिम बंगाल तथा त्रिपुरा में इस तरह की जलवायु देखने को मिलती है।

(2) उष्ण सवाना प्रदेश की जलवायु (Aw):-

         यहाँ का भी तापमान 18°C से अधिक ही होती है। औसत वार्षिक तापमान लगभग 27°C के आसपास रहता है तथा औसत वार्षिक वर्षा 100 सेंमी० रहता है। यहाँ वर्षा मुख्य रूप से ग्रीष्म ऋतु में होती है।इस प्रकार की जलवायु मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत में देखने को मिलती है।

(3) उष्ण अर्द्ध मरूस्थतीय स्टेपी जलवायु प्रदेश (BSW):-

        इस प्रकार के जलवायु प्रदेशों में वर्षा बहुत कम होती है लेकिन अधिक गर्मी के कारण वाष्पीकरण अधिक तेजी से होती है। यह ऐसे जलवायु प्रदेश होते है जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 50 से 100 सेंटीमीटर तक होती है और औसत वार्षिक तापमान लगभग 27°C तक रहती है। भारत के राजस्थान और गुजरात में इस प्रकार की जलवायु देखने को मिलती है।

(4) उष्ण मरुस्थलीय प्रदेश की जलवायु (Bwh):-     

          यह उष्ण तथा अर्द्ध उष्ण मरुस्थलीय प्रकार की जलवायु है। इस प्रकार की जलवायु में वर्षा काफी कम होती है लेकिन वाष्पीकरण बहुत तेजी से होता है। यहाँ तापमान 40°C से भी अधिक पहुँच जाता है और वर्षा 50 सेंटीमीटर से भी कम होती है।भारत के थार मरुस्थल में इस प्रकार की जलवायु देखने को मिलती है।

(5) उष्ण उपोष्ण जलवायु प्रदेश (BS):-

            यह उष्ण तथा अर्द्ध उष्ण कटिबंधीय सवाना तुल्य जलवायु का भाग है। इसमें औसत वार्षिक तापमान 27°C तक तथा औसत वार्षिक वर्षा लगभग 100 सेंटीमीटर तक होती है। भारत के प्रायद्वीपीय पश्चिम तटीय भाग में जहां वृष्टि छाया प्रदेश है यहां इस प्रकार की जलवायु देखने को मिलती है।          

(6) आर्द्र उपोष्ण जलवायु प्रदेश (Cwa):-

               इस प्रकार की जलवायु में हवाएँ शुष्क और मौसम ठंडा होता है। यहाँ औसत वार्षिक तापमान 18°C से कम रहता है।इस प्रकार के जलवायु प्रदेशों में केवल ग्रीष्म ऋतु में ही वर्षा होती है। लेकिन शीत ऋतु जो वर्षा होती है वह पश्चिमी भाग में शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवाती हवाओं से होती है। यह जलवायु भारत के गंगा-यमुना के मैदान में पायी जाती है।    

(7) पर्वतीय जलवायु (H):-

                यह जलवायु भारत के हिलालय पर्वतीय क्षेत्रों में देखने को मिलती है। यहाँ शीत ऋतु में हिमपात अर्थात् बर्फबारी होती है औ ग्रीष्म काल में मासूनी हवाओं से वर्षा होती है।

42. Determination of Climatic Regions of India According to Koppen (कोपेन के अनुसार भारत के जलवायु प्रदेश का निर्धारण)

42. Determination of Climatic Regions of India According to Koppen

(कोपेन के अनुसार भारत के जलवायु प्रदेश का निर्धारण)



          जलवायु प्रदेश का तात्पर्य स्थलखंड के उस क्षेत्र से है जिसके अंतर्गत जलवायु तत्वों के बीच समरूपता पायी जाती है। कोपेन महोदय ने अपने विश्वव्यापी जलवायु वर्गीकरण में भारत को मानसूनी जलवायु क्षेत्र में रखा लेकिन भारत के जलवायु में आंतरिक विषमता को देखते हुए इसे कई जलवायु क्षेत्रों में वर्गीकृत किए।

          भारतीय जलवायु के निर्धारण में कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

       वस्तुत: ट्रीवार्था के कार्य को कोपेन जलवायु का प्रतीक माना जाता है। दोनों भूगोलवेत्ताओं ने वनस्पति, तापमान, वर्षा और उच्चावच को ध्यान में रखते हुए जलवायु प्रदेशों का निर्धारण किया है। दोनों भूगोवेत्ताओं ने जलवायु प्रदेशों को सांकेतिक शब्दावली से प्रकट किया है। कोपेन महोदय ने भारत को 9 प्रमुख जलवायु प्रदेशों में विभक्त किया है। जैसे-

(1) Amw

(2) Aw

(3) AS

(4) BShw

(5) Bwhw

(6) Cwg

(7) Dfc

(8) ET

(9) EF

Climatic Regions of India

      प्रारंभ में ET और EF प्रकार का जलवायु प्रदेश हिमालय क्षेत्र के लिए निर्धारित किया। बाद में उन्हें ऐसा लगा की हिमालय क्षेत्र में उच्चावच का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। अत: उच्चावच को ध्यान में रखते हुए उन्होंने Dfc जलवायु प्रदेश का सीमांकन हिमालय प्रदेश में किया।

(1) Amw प्रकार की जलवायु

        इसे उष्णार्द्र जलवायु कहते है। इस प्रकार की जलवायु पश्चिमी घाट के पश्चिमी भाग, अंडमान निकोबार द्वीप समूह तथा उत्तरी पूर्वी भारत में पाई जाती है। इस प्रकार की जलवायु प्रदेश में शुष्क ऋतु छोटी होती है। वार्षिक वर्षा 300 cm से अधिक होती है। वायुमंडलीय आर्द्रता भी अधिक होती है। वार्षिक तापांतर न्यून होती है। सालोंभार तापमान उच्च रहता है।

        इस क्षेत्र में मिलने वाली वनस्पति सदाबहार प्रकार के होती है। वृक्षों की लंबाई 45-60 मी० तक होती है। लकड़ियां कठोर होती है। वृक्षों के ऊपर विशिष्ट प्रकार के लताएं मिलती है जिसे लियाना कहते है। वन काफी सघन प्रकार के होते है। जंगलों में विविध प्रकार के वृक्ष पाए जाते है।

(2) Aw प्रकार की जलवायु

      Aw प्रकार की जलवायु लगभग संपूर्ण प्रायद्वीपीय पठार के वृष्टिछाया प्रदेश और तमिलनाडु के तटवर्ती क्षेत्र को छोड़कर पाई जाती है। यहाँ अधिकांश वर्षा दक्षिणी-पश्चिमी मानसून से होती है। वर्षा 75-200 cm रिकॉर्ड किया जाता है। यहाँ वार्षिक तापांतर 13.8ºC होता है। मौसमी विशेषता के आधार पर तीन ऋतुएं पाई जाती है। जैसे- शुष्क ग्रीष्म ऋतु, आर्द्र ग्रीष्म ऋतु और जाड़े की ऋतु। शुष्क गर्मी ऋतु में कभी कभी चक्रवातीय वर्षा होती है जिसे आम्र वृष्टि कहते है।

(3) AS प्रकार की जलवायु

         इस प्रकार की जलवायु प्रदेश में ग्रीष्म ऋतु शुष्क होती है जबकि शीत ऋतु में लौटती हुई तापमान से वर्षा होती है। यह जलवायु प्रदेश तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र पाई जाती है। अक्टूबर-नवंबर में यहां चक्रवातीय वर्षा होती है। इस वर्षा के दौरान बंगाल की खड़ी से जलवाष्प लायी जाती है।

(4) BShw प्रकार की जलवायु

      यह जलवायु प्रदेश भारत के वृष्टिछाया प्रदेश में और अरावली पर्वत के पूर्वी भाग में पाई जाती है। यहाँ सामान्य तौर पर वर्षा 50-100 cm के बीच होती है। कोपेन के अनुसार वृष्टिछाया प्रदेश में वर्षा 35-75 cm होती है जबकि अरावली के पश्चिमी भाग में 30-65 cm होती है। ये दोनों क्षेत्र जलवायु को आर्द्र मरुस्थलीय या स्टेपी तुल्य जलवायु कहा जाता है। वृष्टिछाया प्रदेश में तापीय स्थिति के कारण तापांतर कम होता है जबकि अरावली के पूर्वी भाग में तापांतर महाद्वीपीय स्थिति के अधिक पाई जाती है।

(5) BWhw प्रकार की जलवायु

इसे कोपेन ने शुष्क मरुस्थलीय जलवायु से संबोधित किया है। इसके अंतर्गत रण ऑफ कच्छ तथा थार मरुस्थलीय भाग को शामिल किया है। औसत वार्षिक वर्षा 35 cm से कम होती है। जून यहाँ का सर्वाधिक गर्म महीना है जबकि जनवरी यहां का सबसे ठंडा माह है। जून का तापमान 35ºC तक पहुंच जाता है जबकि जनवरी का तापमान 11ºC तक जाता है। यहाँ 5 जुलाई से 12 जुलाई के बीच मानसून की ऋतु पहुंचती है और अगस्त महीने में मानसून लौटने लगती है।

(6) Cwg प्रकार की जलवायु

      ऐसी जलवायु उत्तर भारत के मौसमी क्षेत्र में पाई जाती है। इसका विस्तार पंजाब से लेकर पूर्वी असम तक हुआ है। इसके पूर्वी सीमा पर वर्षा 300 cm तक और पश्चिमी सीमा पर वर्षा 65 cm तक होती है। इस तरह स्पष्ट है कि पूरब से पश्चिम की तरफ जाने पर लगातार वर्षा में कमी आते जाती है।

       यह जलवायु मौसमी विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र में तीन स्पष्ट ऋतुएं पाई जाती है। जाड़े की ऋतु, ग्रीष्म ऋतु और वर्षा ऋतु। मैदानी क्षेत्र शीत ऋतु में उच्च वायुदाब के रूप में बदल जाता है। इसीलिए वायु ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृति रखती है। जिसके कारण कड़ाके की ठण्डी पड़ती है।

      गांगेय घाटी में पछुवा विक्षोभ के कारण जनवरी एवं फरवरी महीने में थोड़ी मात्रा में वर्षा होती है। ग्रीष्म ऋतु शुष्क होती है क्योंकि सूर्य के लंबवत प्रभाव के कारण धरातलीय भाग के गर्म होने से हवा लंबवत रूप से ऊपर उठने लगती है जिसके कारण संपूर्ण मैदानी क्षेत्र निम्न वायुदाब क्षेत्र में बदल जाती है। थार मरूस्थलीय क्षेत्र से गर्म वायु गांगेय घाटी में चलने लगती है जिसे ‘लू’ कहते है। अप्रैल एवं मई महीने में मानसून पूर्व चक्रवातीय वर्षा होती है जिसे बंगाल में ‘कालवैशाखी’ बिहार में ‘अंधड़’ और पंजाब में ‘तूफान’ कहा जाता है।

       ग्रीष्म ऋतु के अंत में मानसून विस्फोट के साथ वर्षा ऋतु का आरंभ होती है। दक्षिण-पश्चिम मानसूनी की शाखा से 90 प्रतिशत वर्षा रिकॉर्ड की जाती है। इस क्षेत्र में मानसूनी पतझड़ वन पाए जाते है।

(7) Dfc प्रकार की जलवायु

        यह हिमालय प्रदेश की विशेषता है। इसके अंतर्गत उत्तरी पूर्वी भारत के हिमालय एवं पंजाब हिमालय को शामिल करते है। इस क्षेत्र में 4 महीने तक तापमान 10ºC से कम होता है। यहाँ वार्षिक वर्षा 200 cm से अधिक होती है अर्थात यह कम तापमान और अधिक वर्षा वाला क्षेत्र है।

(8) ET प्रकार की जलवायु

       यह भी हिमालय प्रदेश की जलवायु है। इसमें ग्रीष्म ऋतु का भी तापमान 10ºC से कम होता है। यह कड़ाके की सर्दी वाला क्षेत्र है। वर्ष में कभी न कभी हिमपात की क्रिया होती है और बर्फीली हवाएँ चलती है। यह जलवायु लघु हिमालय तथा हिमालय में मिलने वाले घाटी एवं दून प्रदेश में मिलती है। जाड़े की ऋतु में धरातल बर्फ से ढक जाती है जबकि ग्रीष्म ऋतु में बर्फ के पिघल जाने से धरातल पर जल की आपूर्ति बढ़ जाती है। समतल पर्वतीय ढालों पर फूलों की खेती की जाती है और घाटी क्षेत्र में धान की कृषि की जाती है।

(9) EF प्रकार की जलवायु

      इस प्रकार की जलवायु महान हिमालय के चोटियों पर तथा 6000 मी० से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाई जाती है। इस क्षेत्र का तापमान सदैव हिमांक से नीचे रहता है। धरातल सदैव बर्फ से अच्छादित रहते है। वनस्पति के रूप में शैवाल और मॉश पाई जाती है।

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि कोपेन महोदय ने अनुभावाश्रित विधि का प्रयोग कर भारत को कई जलवायु प्रदेश में वर्गीकृत किया है। आगे चलकर ट्रीवार्था महोदय ने संशोधन प्रस्तुत किया। इसीलिए कोपेन की तुलना में ट्रीवार्था के जलवायु वर्गीकरण को अधिक मान्यता है।

प्रश्न प्रारूप

Q. कोपेन के अनुसा भात के जलवायु प्रदेश का निर्धारण कीजिए और प्रत्येक जलवायु प्रदेश का विस्तार से चर्चा करें।

41. Climate Classification of India by Stamp and Kendrew (स्टैम्प तथा केन्ड्रयू द्वारा भारत की जलवायु वर्गीकरण)

41. Climate Classification of India by Stamp and Kendrew

(स्टैम्प तथा केन्ड्रयू द्वारा भारत की जलवायु वर्गीकरण)


        प्रो० एल० डी० स्टैम्प तथा डब्लू. जी. केन्ड्रयू ने भारत को अनेक जलवायु क्षेत्रों में विभाजित किया। यह वर्गीकरण स्वेच्छाचारी तथा अवास्तविक है। स्टैम्प ने जनवरी के महीने के लिए 18C की औसत तापमान की समताप रेखा का उपयोग देश को मोटे तौर पर दो जलवायु क्षेत्रों में विभाजित करने के लिए किया। जैसे-

(A) उपोष्ण जलवायु क्षेत्र उत्तर- उत्तर भारत में

(B) उष्णकटिबंधीय जलवायु क्षेत्र- दक्षिण भारत में।

         यह देखा जा सकता है कि 18C की समताप रेखा कर्क रेखा के लगभग समांतर गुजरती है। इन दो जलवायु क्षेत्रों की वर्षा के आधार पर 11 क्षेत्र में विभाजित किया गया है।  जैसे-

(A) उपोष्ण महाद्वीपीय जलवायु

      उपोष्ण महाद्वीपीय जलवायु को पांच जलवायु क्षेत्र में बांटा है। जैसे-

(1) हिमालय क्षेत्र

(2) उत्तर-पश्चिम क्षेत्र

(3) शुष्क निम्न भूमि

(4) सामान्य मध्यम वर्षा का क्षेत्र

(5) परवर्ती क्षेत्र

(B) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की जलवायु

        उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की जलवायु को निम्नलिखित 6 भागों में वर्गीकृत किया है-

(1) अत्यधिक भारी वर्षा का क्षेत्र

(2) भारी वर्षा का क्षेत्र

(3) सामान्य (मध्यम) वर्षा के क्षेत्र

(4) कोंकण तट

(5) मालाबार तट

(6) तमिलनाडु क्षेत्रClimate Classification

(A) उपोष्ण महाद्वीपीय जलवायु

(1) हिमालय क्षेत्र:-

      यह जलवायु जम्मू तथा कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है। इस जलवायु में ग्रीष्म ऋतु सुहावना तथा शीत ऋतु अत्यंत ठंड होती है। तापमान क्षेत्रीय वितरण (स्थलाकृति तथा ढाल) पर निर्भर करती है। 2500 मी० की ऊँचाई तक शीत ऋतु में औसत तापमान 4C से 8C के बीच होता है जबकि ग्रीष्म ऋतु में 12C- 18C के बीच होता है। पश्चिमी विक्षोभ के कारण शीत ऋतु में वर्षा दर्ज किया जाता है। जाड़े के महीने में हिमपात तथा हिमवर्षा महान तथा लघु हिमालय की सामान्य विशेषता है।

(2) उत्तरी पश्चिमी भारत की जलवायु:-

       यह जलवायु समतल नदी के उत्तर-पश्चिम में पाई जाती है जहाँ शीत ऋतु में औसत तापमान लगभग 15C होती है। जनवरी में तापमान कभी-कभी हिमांग के नीचे चला जाता है जबकि गर्मी में 45C को पार कर जाता है और लू चलती है।

(3) उत्तर-पश्चिम भारत का शुष्क मैदान:-

        यह जलवायु राजस्थान, कच्छ तथा हरियाणा के दक्षिण-पश्चिम भाग में पाई जाती है। शीत ऋतु का तापमान 15C से 25C तथा मई तथा जून में तापमान कभी-कभी 47C से भी अधिक हो जाता है औसत वार्षिक वर्षा 25 सेंटीमीटर से कम होती है।

(4) सामान्य (मध्यम) वर्षा का क्षेत्र:-

      यह जलवायु पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिम उत्तर प्रदेश, पश्चिम तथा उत्तर पश्चिम बिहार, उत्तर-पश्चिम झारखंड में पाई जाती है। औसत वार्षिक वर्षा 100 से 150 सेंटीमीटर के बीच होती है। 90% वर्षा वर्षा ऋतु में होती है। वर्षा बंगाल की खाड़ी के धारा से होती है। जनवरी का औसत तापमान 15C तथा जुलाई का औसत अधिकतम तापमान 40C से अधिक होता है।

(5) परवर्ती क्षेत्र:-

      यह संपूर्ण बिहार, उत्तर बंगाल और पश्चिम असम में पाई जाती है। औसत वर्षा 150 सेंटीमीटर से अधिक और तापमान सामान्य बना रहता है।

(B) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की जलवायु

(1) अत्यधिक भारी वर्षा का क्षेत्र:-

       यह जलवायु असम, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा तथा मिजोरम में पाई जाती है। यहाँ वार्षिक वर्षा 250 cm से अधिक होती है। विश्व में सर्वाधिक वर्षा चेरापूंजी और मासिनराम में दर्ज किया जाता है। 90% वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून से होता है। तरंगित स्थलाकृतिक विशेषता के कारण मासिक तापमान में भिन्नता दिखाई देती है।

(2) भारी वर्षा का क्षेत्र:-

      यह जलवायु पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखंड, आंध्रप्रदेश के पूर्वी भाग में पाई जाती है। यहाँ औसत वर्षा 100 से 200 सेंटीमीटर होती है। पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा घटती है। जनवरी का औसत तापमान 15C से अधिक, जून तथा जुलाई का तापमान 30C होता है।

(3) सामान्य (मध्यम वर्षा) के क्षेत्र:-

       यह पश्चिमी घाट के पूर्व गुजरात, दक्षिण-पश्चिम मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश के अधिकांश भाग में पाई जाती है। औसत वार्षिक वर्षा 75 सेंटीमीटर, जनवरी की तापमान 18C तथा जुलाई का 32C होता है।

(4) कोकण तट:-

      यह तापी नदी के मुहाने से लेकर गोवा तक तटीय भाग में पाई जाती है। औसत वार्षिक वर्षा 200 सेंटीमीटर से अधिक होती है। इसमें 90% वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है। जनवरी की औसत तापमान 24C तथा जुलाई का 27C होता है। औसत वार्षिक तापांतर 3 से 6C तक होता है।

(5) मालाबार तट:-

      यह गोवा से लेकर कन्याकुमारी तक तटीय भाग में पाई जाती है। इस क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 250 सेंटीमीटर से अधिक होती है। औसत वार्षिक तापमान लगभग 27C होती है।

(6) तमिलनाडु क्षेत्र:-

          यह तमिलनाडु और कोरोमंडल के अधिकांश क्षेत्र में पाई जाती है। औसत वार्षिक वर्षा 100 से 150 सेंटीमीटर के बीच होती है। अधिकांश वर्षा लौटती मानसून से होती है। जनवरी की औसत तापमान 24C और जुलाई का 30C होता है।

     इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि स्टैम्प तथा केन्ड्रयू महोदय ने तापमान और वर्षा का आधार मानकर भारत के जलवायु प्रदेशों का निर्धारण किया।


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40. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक

41. Climate Classification of India by Stamp and Kendrew (स्टैम्प तथा केन्ड्रयू द्वारा भारत की जलवायु वर्गीकरण)

40. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक

40. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक



       उद्योगों की स्थापना केवल उन्हीं स्थानों पर होती है, जहाँ इसके विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उपस्थित हों। उद्योगों को प्रभावित करने वाले कारकों में भौगोलिक, आर्थिक तथा राजनीतिक कारक महत्वपूर्ण हैं। अतः उद्योगों को प्रभावित करने वाले कारकों को दो वर्गों में बाँटा जाता जा सकता है:-

(क) भौगोलिक कारक तथा,

(ख) गैर-भौगोलिक कारक।

(क) भौगोलिक कारक (Geographical Factors)

      उद्योगों को प्रभावित करने वाले मुख्य भौगोलिक कारक निम्नलिखित हैं:-

1. कच्चे माल की उपलब्धता:-

       सामान्यतः उद्योग उन्हीं स्थानों पर स्थापित किए जाते हैं, जहाँ कच्चा माल उपलब्ध होता है। कच्चा माल उद्योगों के लिए चुम्बक का कार्य करता है। भारत में लोहा इस्पात उद्योग केवल उन्हीं स्थानों पर स्थापित किया गया है जहाँ इसमें प्रयोग होने वाला कच्चा माल, जैसे-लौह-अयस्क, कोयला, मैंगनीज आदि प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश तथा बिहार में गन्ने के कारण चीनी उद्योग, महाराष्ट्र तथा गुजरात में कपास के कारण सूती वस्त्र उद्योग, पश्चिम बंगाल में पटसन उद्योग स्थापित किए गए हैं। नाशवान (Perishable) / अल्पकालिक कच्चा माल प्रयोग करने वाले उद्योग तो कच्चे माल के स्रोत से दूर स्थापित हो ही नहीं सकते।

2. शक्ति के साधन:-

     उद्योगों में मशीनें चलाने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। शक्ति के प्रमुख साधन कोयला, पेट्रोलियम, जल-विद्युत्, प्राकृतिक गैस तथा परमाणु ऊर्जा हैं। लौह-इस्पात उद्योग कोयले पर निर्भर करता है, इसलिए यह उद्योग कोयले की खानों के पास ही स्थापित किया जाता है। दामोदर घाटी का प्रमुख लोहा-इस्पात केन्द्र जमशेदपुर अपनी शक्ति की आवश्यकता झरिया तथा रानीगंज से प्राप्त किए गए कोयले से पूरी करता है।

        पंजाब में औद्योगिक विकास का मुख्य कारण भाखड़ा से प्राप्त की गई जल-विद्युत् ही है। ऐलुमिनियम उद्योग के लिए प्रचुर मात्रा में विद्युत् शक्ति की आवश्यकता होती है, इसलिए यह उद्योग जल-विद्युत अथवा ताप-विद्युत् के स्रोत के निकट ही स्थापित किया जाता है। छत्तीसगढ़ का कोरबा तथा उत्तर प्रदेश का रेनूकूट ऐलुमिनियम उद्योग विद्युत् शक्ति की उपलब्धता के कारण ही स्थापित हुआ है।

3. सस्ते दर पर कुशल श्रमिकों की उपलब्धता:-

    यद्यपि आधुनिक युग में स्वचालित मशीनों तथा कम्प्यूटरों जैसे यंत्रों का प्रचलन बढ़ा है फिर भी औद्योगिक विकास में श्रम का महत्व बराबर बना हुआ है। सस्ते तथा कुशल श्रम की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता औद्योगिक विकास का मुख्य कारक है। कुछ उद्योग श्रम पर ही आधारित होते हैं। फिरोजाबाद में शीशा उद्योग, कानपुर में चर्म उद्योग, लुधियाना में हौजरी तथा जालन्धर एवं मेरठ में खेलों का सामान बनाने का उद्योग मुख्यतः सस्ते, कुशल तथा प्रचुर श्रम पर ही निर्भर हैं।

4. परिवहन एवं संचार के साधन:-

      यातायात मार्ग वे शिराएं हैं, जिनमें से होकर उद्योग की धमनियों का रक्त संचार होता है। कच्चे माल को उद्योग केन्द्र तक लाने तथा निर्मित माल को खपत के क्षेत्रों तक ले जाने के लिए सस्ते तथा कुशल यातायात का प्रचुर मात्रा में होना अनिवार्य है। सड़कों तथा रेलों के जंक्शन तथा सागरीय बन्दरगाह अच्छे औद्योगिक केन्द्र बन जाते हैं। मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली जैसे महानगरों में औद्योगिक विकास मुख्यतः यातायात के साधनों के कारण ही हुआ है।

       परिवहन की भांति संचार के साधन, जैसे-डाक, तार टेलीफोन, कम्प्यूटर भी औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमें उद्योग सम्बन्धी सूचनाएँ जल्दी मिलती हैं।

5. विस्तृत बाजार की उपलब्धता:-

     उद्योग का सारा विकास तब तक व्यर्थ है। जब तक निर्मित माल की खपत के लिए बाजार की उपलब्धता न हो। बाजार की निकटता से यातायात का खर्च कम हो जाता है और उपभोक्ता को औद्योगिक उत्पाद सस्ते दाम पर मिल सकते हैं। शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुओं को तो अधिक दूर तक ले जाना असम्भव ही होता है। 

6. सस्ती भूमि तथा जलापूर्ति:-

      उद्योगों की स्थापना के लिए सस्ती भूमि का होना भी आवश्यक है। दिल्ली में भूमि का अधिक मूल्य होने के कारण ही इसके उपनगरों में सस्ती भूमि पर उद्योगों ने द्रुत गति से प्रगति की है। लोहा-इस्पात, वस्त्र-निर्माण तथा रसायन कुछ ऐसे उद्योग हैं, जिनको पर्याप्त मात्रा में जल की आवश्यकता होती है। इसलिए ये उद्योग जल के स्रोत पर स्थापित किए जाते हैं।

7. अनुकूल जलवायु:-

       उद्योग धन्धों में काम करने वाले श्रमिकों की कार्यकुशलता के लिए जलवायु का स्वास्थ्यवर्द्धक होना आवश्यक है। अधिक उष्ण अथवा आर्द्र एवं कठोर शीत जलवायु श्रमिकों के कार्य में बाधा डालती है। उत्तर-पश्चिमी भारत की जलवायु ग्रीष्म ऋतु में अत्यन्त गर्म तथा शीत ऋतु में ठण्डी होती है, जिससे श्रमिकों की कार्य-कुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत, पश्चिमी तटीय भाग की जलवायु वर्ष भर सम रहती है, जिससे श्रमिकों की कार्य-कुशलता बनी रहती है। यही कारण है कि देश के 24% आधुनिक कारखाने तथा 30% श्रमिक अकेले महाराष्ट्र-गुजरात क्षेत्र में हैं।

        कुछ उद्योगों के लिए तो जलवायु का विशेष महत्व है। उदाहरणतया, सूती वस्त्र उद्योग के लिए आर्द्र जलवायु चाहिए, क्योंकि शुष्क जलवायु में धागा बार-बार टूटता रहता है। इसलिए सूती वस्त्र बनाने वाली अधिकांश मिलें महाराष्ट्र तथा गुजरात में ही हैं। आजकल कृत्रिम आर्द्र-यन्त्रों (Artificial Humidifiers) की सहायता से देश के अन्य भागों में भी सूती वस्त्र उद्योग लगाए गए हैं, परन्तु यह प्रणाली महंगी है।

(ख) गैर-भौगोलिक कारक (Non-Geographical Factors)

      वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिकी विकास के साथ, उद्योग-धन्धों की अवस्थिति में भौगोलिक कारकों की भूमिका पहले की भांति अधिक दृढ़ नहीं रही। अतः कुछ गैर-भौगोलिक कारक भी महत्वपूर्ण बन गए हैं, जिनमें आर्थिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक एवं सामाजिक कारक उल्लेखनीय हैं। कुछ महत्वपूर्ण गैर-भौगोलिक कारक निम्नलिखित हैं:-

1. पर्याप्त पूंजी:-

      कोई भी उद्योग बिना पूंजी के नहीं पनप सकता। बिना पूंजी के उद्योगों की स्थापना की कल्पना  बड़े-बड़े नगरों में पूंजीपति उद्योगों में पूंजी लगाते हैं, जिससे उद्योगों का विकास होता है। इसी कारण मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली, आदि बड़े-बड़े नगरों में उद्योग लगे हुए हैं। मोदीनगर में उद्योग स्थापित होने का मुख्य कारण ही मोदी सेठ द्वारा पूँजी निवेश है।

2. सरकार की नीति:-

     सरकार की नीतियाँ उद्योग-धन्धों की अवस्थिति को काफी हद तक प्रभावित करती हैं। सरकार प्रादेशिक असन्तुलन दूर करने के कई प्रयास कर रही है, जैसे- पिछड़े हुए क्षेत्रों में उद्योग-धन्धों की स्थापना करके, जल, वायु और भूमि के प्रदूषण की रोकथाम द्वारा पर्यावरण का संरक्षण तथा कुछ विकसित प्रदेशों में उद्योग-धन्धों के अतिकेन्द्रण को विकेन्द्रण प्रक्रम द्वारा रोकना आदि। सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के नियोजन में इन प्रारूपों का विशेष ध्यान रखा गया है। मथुरा के निकट तेल शोधनशाला, कपूरथला में कोच फैक्ट्री तथा जमशेदपुर में उवर्रक संयन्त्र की स्थापना सरकारी नीतियों का ही परिणाम है।

3. औद्योगिक जड़त्व अथवा प्रारम्भिक संवेग (Industrial Inertia or Momentum of Early Start):-

        कुछ उद्योग भौगोलिक परिस्थितियों के कारण स्थापित हो जाते हैं, परन्तु जब वे भौगोलिक सुविधाएँ वहाँ पर समाप्त हो जाती हैं तब भी वे उद्योग वहाँ पर बने रहते हैं। अलीगढ़ में ताला तथा जबलपुर में बीड़ी बनाने के उद्योग इसके उदाहरण हैं।

4. बैंकिंग सुविधा:-

      उद्योग-धन्धों में रोज करोड़ों रुपए का लेन-देन होता है जो बैंकों द्वारा ही सम्भव है। अतः जिन क्षेत्रों में बैंकों की सुविधा हो, वहाँ उद्योग-धन्धों के विकास में सहायता मिलती है।

5. बीमा की सुविधा:-

     बड़े-बड़े उद्योगों में भारी मशीनों को अचानक क्षति पहुंचने का भय रहता है। इसके अतिरिक्त, श्रमिकों की औद्योगिक दुर्घटना से मृत्यु हो जाती है। इन सब परिस्थितियों को देखते हुए बीमे की सुविधा का होना आवश्यक है।

6. राजनीतिक स्थिरता:-

       उद्योगपति उन्हीं प्रदेशों में उद्योग स्थापित करना पसन्द करते हैं जहाँ राजनीतिक स्थिरता हो।

प्रश्न प्रारूप

1. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित कने वाले कारकों की विवेचना कीजिये।


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5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

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11. गंगा का मैदान

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

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20. मानसून क्या है?

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत

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25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान

27. भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? 

37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व

38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव

39. प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपेत्तर भारत की प्रवाह प्रणाली (उत्तर और द० भारत की प्रवाह प्रणाली)

40. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक

38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव

38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव



         हरित क्रांति शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम डब्लू. एस. गौड ने खाद्यान्न उत्पादन में आई क्रांति, जो कि गेहूँ के HYV (High Yielding Varieties- उच्च उत्पादकता किस्में) प्रकार के आविष्कार से संभव हुई थी, के लिए किया था। यह क्रांति भारत, पाकिस्तान एवं विकासशील देशों में विद्यमान खाद्यान्न संकट को दूर करने में अत्यन्त मददगार रही। भारत में मुख्य रूप से भारतीय कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन द्वारा निर्देशित थी, जो नॉर्मन ई. बोरलॉग की बड़ी हरित क्रांति पहल का हिस्सा थी, जिसने अविकसित देशों में कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कृषि अनुसंधान और प्रौद्योगिकी का उपयोग किया था।

      उन्नत किस्म के बीज के अलावा अच्छी सिंचाई की व्यवस्था, आधुनिक यंत्रों का उपयोग, अच्छे उर्वरक का वैज्ञानिक प्रयोग इत्यादि हरित क्रांति के आधार थे। इसमें सस्ते मूल्य पर बिजली उपलब्ध कराने के साथ-साथ अन्य बैंकिंग एवं बाजार की सुविधा उपलब्ध करायी गयी। हरित क्रांति की सफलता के दो पक्ष रहे, एक सकारात्मक तो दूसरा नकारात्मक।

सकारात्मक पक्ष

     इस क्रांति से खाद्यान्न की उपज में काफी बढ़ोत्तरी हुई। 1950 में भारत में 50 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ था, जो बढ़कर अब 200 मिलियन टन हो चुका है। गेहूँ के उत्पादन में 177 प्रतिशत, चावल में 76 प्रतिशत तथा मक्के में 56 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई। खाद्यान्न में वार्षिक वृद्धि 2.62 प्रतिशत हो गयी, जो पहली बार जनसंख्या वृद्धि दर से अधिक थी अर्थात् खाद्यान्न संकट दूर हुआ।

      कृषि क्षेत्र में 1961 से 1999 के बीच 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 1960-61 में यह कुल कृषि क्षेत्र का 72 प्रतिशत था, जो 1970-71 में 78 प्रतिशत हो गया, 1980-81 में 81 प्रतिशत और अब 82 प्रतिशत के करीब है। पिछले तीन दशकों में गेहूँ के क्षेत्र में 150 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसमें 82 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र है तथा 95 प्रतिशत HYV के अंतर्गत आता है। चावल क्षेत्र में भी 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

       भारतीय कृषि पहली बार बाजार में लाभदायक व्यापार के रूप में आई क्योंकि अब किसानों के पास अतिरिक्त अन्न मौजूद था। कृषि उत्पादों पर आधारित उद्योगों का विकास हुआ तथा कृषि में प्रयुक्त होने वाले यंत्रों के निर्माण में भी लौह एवं यांत्रिक उद्योग को बढ़ावा मिला। भारतीय किसानों के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ, भारतीय किसान बढ़ी पैदावार को देखते हुए नवीन कृषि प्रणाली को अपनाने को तुरंत तैयार हो गये और कृषि सहायता से लाभदायक वाणिज्यिकी में परिणत हो गये।

     खाद्यान्न का आयात रुका तथा भारतीय मुद्रा का विदेश गमन भी नियंत्रित हुआ। भारत जैसे विकासशील देश में यह मुद्रा अधः संरचना के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी। ग्रामीण रोजगार के भी शुभ अवसर पैदा हुए। घरेलू उद्योग धंधों का भी विकास हुआ तथा मजदूरी में बढ़ोतरी हुई।

नकारात्मक पक्ष

     परंतु हरित क्रांति के नकारात्मक पक्ष भी उभर का सामने आये हैं। हरित क्रांति ने उसी क्षेत्र में सफलता पाई, जहाँ पर पूर्व से ही अधः संरचना का विकास हुआ था, किसान बड़े एवं धनी थे, कुल जोत अधिक थी तथा दूसरी भौगोलिक एवं सामाजिक शर्तें पूरी हो रही थीं। अतः यह पंजाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों में तो सफल रही, परन्तु उड़ीसा, मध्य प्रदेश आदि में असफल रही, जिससे आर्थिक विकास में असमानता आयी।

     उत्तर प्रदेश के अंदर ही पूर्वी एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विकास की विषमता दिखती है। इसी तरह कृष्णा, गोदावरी क्षेत्र एवं तेलंगाना और रायल सीमा क्षेत्र में विषमता दिखती है।

        अंतर्वैयक्तिक विषमता का भी जन्म हो गया। क्योंकि बड़े किसान ही इसका भरपूर फायदा उठा सके जबकि छोटे किसान आर्थिक रूप से असफल ही रह गये। गेहूँ और चावल की उपज एवं उपज क्षेत्र में तो बढ़ोत्तरी हुई, परंतु तिलहन एवं दलहन की उपज एवं उपज क्षेत्र दोनों ही घट गये। अंतर्वैयक्तिक विषमता ने बड़े किसानों के समाज में प्रभुत्व को पूर्वस्थापित कर दिया। छोटे किसान अपनी जमीन को बढ़ी कीमत में बेचने पर प्रलोभित हो गये तथा उनकी आर्थिक दुर्गति बढ़ गयी। कृषि में यांत्रिकी के प्रवेश से रोजगार के अवसर भी घट गये।

         हरित क्रांति के सर्वाधिक दुष्परिणाम पर्यावरणीय दृष्टि से उभर कर सामने आये। कृषि में HYV किस्म की आवश्यकता अधिक रहती है। हरित क्रांति के क्षेत्र में अपवाह प्रणाली बेहद खराब है। अतः नहरों से सिंचित क्षेत्र में जल जमाव एवं कूप तथा नलकूप क्षेत्र में लवणता की समस्या का जन्म हो गया। हरियाणा एवं पंजाब के अर्द्धशुष्क भौगोलिक दशा में लवणता को और बढ़ावा मिला।

        कृषि क्षेत्र को बढ़ाने के लिए वनस्पति का विनाश हुआ, अधिक उर्वरक के प्रयोग से प्राकृतिक उर्वरता का ह्रास तथा कृषि प्रणाली में परिवर्तन (जैसे दलहन का न बोया जाना) आदि प्रयोगों एवं कार्यों से मृदा अपरदन एवं प्रदूषण दोनों बढ़े। एकल कृषि तथा कृषि पारिस्थितिकी पर प्रभाव भी नकारात्मक पड़े। एक ही फसल उपजाने से कृषि पारिस्थतिकी का विनाश हो रहा है।

       रासायनिक खादों के उपयोग से तथा खाद्यान्नों में सीसा, तांबा, जस्ते आदि की मात्रा बढ़ने से यकृत संबंधी रोग तथा जल जमाव से मलेरिया, डेंगू आदि रोग बढ़े। डीडीटी और कीटनाशक दवाओं का दुधारू जानवरों के दूध में पाया जाना भी घातक संकेत है। इस तरह एक तफ तो हरित क्रांति से खाद्यान्न उत्पादन में आशानुरूप वृद्धि हुई तो दूसरी तफ इसने पर्यावरणीय एवं सामाजिक दुर्व्यवस्था को भी जन्म दे दिया।


37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व

37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व



      भूमि की आवश्यकतानुसार सिंचाई द्वारा पानी उपलब्ध कराने के लिए जिस प्रारूप, संयंत्र तथा तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, उसे ही सिंचाई व्यवस्था कहते हैं। देश के विभिन्न भागों में सिंचाई प्रणाली वहाँ के भू संरचना, जलवायु, जल की उपलब्धता आदि विभिन्न परिस्थितियों द्वारा निर्देशित होती है। इसलिए देश के विभिन्न भागों में सिंचाई की पद्धतियों में पर्याप्त असमानता पायी जाती है, हमारे देश में सिंचाई के जिन विविध साधनों का प्रयोग किया जाता है उनका संक्षिप्त वर्णन एवं महत्व निम्नानुसार है:-

1. कुएं एवं नलकूप

2. तालाब

3. नहरें

4. बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजनाएँ

1. कुआँ एवं नलकूप:-

       भारत में पानी के लिए कुओं का प्रयोग प्राचीन समय से ही होता आ रहा है और वर्तमान में भी यह जल प्राप्त करने या सिंचाई का एक महत्वपूर्ण साधन है। वर्तमान में हमारे देश में लगभग 89.6 लाख कुआँ हैं, जो देश के कुल सिंचित क्षेत्र के लगभग 21.1 प्रतिशत भाग की सिंचाई करते हैं, कुआँ प्रमुख रूप से दो प्रकार के होते हैं-

(i) कच्चा कुआँ

(ii) पक्का कुआँ,

      कच्चे कुओं को बनवाने के लिए कम खर्च करना पड़ता है, जबकि पक्के कुओं के निर्माण का खर्च अधिक है, कुआँ सिंचाई का सस्ता एवं सुगम साधन होने के कारण भारतीय किसान इसका उपयोग आमरूप में करता है, कुओं से गुजरात के कुल सिंचित क्षेत्र के 73 प्रतिशत, महाराष्ट्र के 60 प्रतिशत, राजस्थान के 46 प्रतिशत व मध्य प्रदेश के 37 प्रतिशत भाग की सिंचाई की जाती है।

      इस तरह उत्तर प्रदेश के 23.2 प्रतिशत, आन्ध्र प्रदेश के 6 प्रतिशत, तमिलनाडु 11 प्रतिशत, कर्नाटक 3 प्रतिशत तथा केरल के 4 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र की सिंचाई कुओं के द्वारा की जाती है, बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब, उड़ीसा व हरियाणा कुओं द्वारा सिंचाई करने वाले देश के अन्य राज्य हैं।

      ट्यूबवैल या नलकूप सिंचाई का एक नवीनतम साधन है, जिनका प्रयोग 1930 से आरम्भ किया गया था। यह एक अत्यधिक गहरा (30 फीट से 500 फीट तक) एवं संकरा छिद्र होता है (जिसकी खुदाई मशीन के द्वारा की जाती है) जिससे बिशेष यंत्र या विद्युत् मोटरों की सहायता से पानी निकाला जाता है

       ये प्रायः ऐसे कुएँ होते हैं जिनसे निरन्तर जल प्राप्त होता है पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, गुजरात नलकूपों द्वारा सिंचाई करने वाले प्रमुख भारतीय राज्य हैं राज्यों के सिंचित क्षेत्र का 51.6 प्रतिशत उत्तर प्रदेश, 26 प्रतिशत पंजाब तथा 20.6 प्रतिशत हरियाणा में नलकूपों द्वारा सिंचाई की जाती है इस प्रकार उत्तर प्रदेश नलकूपों से सिंचाई करने वाला देश का अग्रणी राज्य है।

         पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश तथा राजस्थान नलकूपों से सिंचाई करने वाले देश के अन्य प्रमुख राज्य हैं। इस समय ट्यूबवैल या नलकूपों से लगभग 14.3 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है, जो देश के कुल सिंचित क्षेत्र का 29.9 प्रतिशत है।

नलकूपों या ट्यूबवैलों का महत्व:-

(i) नलकूपों द्वारा कम वर्षा वाले देश के ऐसे भागों में सिंचाई की जा सकती है, जहाँ का जल स्तर नीचा हो वहाँ सिंचाई के अन्य साधन उपलब्ध न हों

(ii) नलकूपों द्वारा किसान फसलों को इच्छित समय में पानी दे सकता है

(iii) नलकूपों के जल में ऐसे कई रसायन होते हैं, जो फसलों के लिए उपयोगी होते हैं

(iv) नलकूपों के संचालन व्यवस्था का व्यय कम होता है

(v) नलकूपों द्वारा फसलों को आवश्यकतानुसार कम या अधिक जल दिया जा सकता है।

2. तालाब:-

      तालाब से आशय मानव या प्रकृति निर्मित उन जलाशयों से होता है जिसमें वर्षा का जल एकत्रित हो जाता है, तालाबों का आकार छोटे नालों या पोखरों से लेकर बड़ी-बड़ी झीलों के रूप में हो सकता है ये दो प्रकार के हो सकते हैं-

(i) कृत्रिम तालाब,

(ii) प्राकृतिक तालाब।

      कृत्रिम तालाब भूमि खोदकर तथा बांध बनाकर वर्षा का जल एकत्र करके बनाये जाते हैं। ये अपेक्षाकृत छोटे तथा गहरे होते हैं। जब प्राकृतिक गड्ढों में जल एकत्र हो जाता है तो प्राकृतिक तालाब बन जाते हैं, ये बड़े व छिछले होते हैं।

        तालाब द्वारा देश के प्रायद्वीपीय भाग में जहाँ की भूमि पथरीली, असमतल तथा कुएँ एवं नहरों के निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं है, इसी साधन से सिंचाई की जाती है। देश के कुल सिंचित क्षेत्र का लगभग 6.8 प्रतिशत भाग की सिंचाई तालाबों द्वारा की जाती है तालाबों द्वारा सिंचाई करने वाले राज्यों में तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा एवं पश्चिमी बंगाल प्रमुख हैं। इसके अलावा दक्षिणी झारखंड, दक्षिणी मध्य प्रदेश, द. छत्तीसगढ़ एवं दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के कुछ भागों में तालाबों द्वारा सिंचाई की जाती है।

       इस समय देश में लगभग 5 लाख बड़े और 60 लाख छोटे तालाब है, निजाम सागर (आन्ध्र प्रदेश), कृष्णराज सागर (कर्नाटक), जयसमन्द, उदय सागर एवं फतेह सागर (राजस्थान) आदि सिंचाई तालाबों के प्रमुख उदाहरण हैं जयसमन्द सबसे बड़ा तालाब है।

तालाबों द्वारा सिंचाई से लाभ-

(i) ऐसे भागों में जहाँ भूमि तल कठोर होता है, तालाब बनाना उपयुक्त रहता है।

(ii) इससे वर्षा जल का उचित उपयोग हो जाता है एवं पानी बेकार नहीं जाता।

(iii) तालाबों से सिंचाई के साथ-साथ मत्स्य पालन भी किया जा सकता है, जिससे कुछ सीमा तक खाद्य समस्या हल करने में सहायता मिल सकती है।

(iv) तालाबों द्वारा बिना मोटरों या पम्पों के बिना ही कुछ सीमा तक सिंचाई की जा सकती है।

(v) तालाबों का निर्माण ऐसे भागों में भी किया जा सकता है जहां कुएँ खोदना एवं नहर निकालना सम्भव नहीं होता।

      तालाबों द्वारा सिंचाई केवल वर्षा पर निर्भर रहती है, किसी-किसी वर्ष जब वर्षा कम होती है तो तालाब सूख जाते हैं और फसलों की सिंचाई नहीं हो पाती है।

3. नहरें

       नहरें भारत में सिंचाई का सबसे बड़ा व प्रमुख साधन हैं, जिससे देश की लगभग 35.7 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र की सिंचाई की जाती है इस समय देश में लगभग 1 लाख 50 हजार किमी लम्बी नहरें हैं जिससे 163.9 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है भारत की नहर प्रणाली विश्व की सबसे बड़ी नहर प्रणाली है। नहरों का विस्तार देश में प्रमुख रूप से उत्तरी भारत में मिलता है

        सिंचित क्षेत्रफल की दृष्टि से 20 प्रतिशत नहरों द्वारा सिंचाई केवल उत्तर प्रदेश में होती है आन्ध्र प्रदेश 10 प्रतिशत, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ 9.8 प्रतिशत, राजस्थान 8.3 प्रतिशत, पंजाब 8 प्रतिशत तथा हरियाणा 8 प्रतिशत, नहरों द्वारा सिंचाई प्राप्त करने वाले देश के अन्य प्रमुख राज्य हैं।

      भारत में नहरें तीन प्रकार की पायी जाती हैं:-

(i) बारहमासी नहरें- ये वे नहरें हैं जो पूरे वर्ष बहती हैं। इनका निर्माण नदियों में बांध बनाकर किया जाता है।

(ii) बरसाती नहरें- इन नहरों में पानी केवल बरसात में ही रह पाता है इनका निर्माण मुख्य रूप से नदियों में बाढ़ के अतिरिक्त जल की निकासी के लिए किया जाता है।

(iii) स्टोरेज वर्क्स- इस प्रकार की नहरें पहाड़ी घाटियों में बांध बनाकर वर्षा का पानी एकत्र करके निकाली जाती हैं इन नहरों का उपयोग तालाबों की तरह ही किया जाता है। इन्दिरा गांधी नहर (राजस्थान), सरहिन्द नहर (पंजाब), ऊपरी गंगा नहर, निचली गंगा नहर, मध्य गंगा नहर, पूर्वी यमुना नहर आदि सिंचाई नहरों के उदाहरण हैं।

नहरों द्वारा सिंचाई से लाभ-

(i) नहरों द्वारा खेतों को पानी देना सस्ता एवं सरल है

(ii) बाढ़ के समय नदियों के पानी को नहरों में छोड़ा जा सकता है और बाढ़ से उत्पन्न संकट से निपटा जा सकता है।

(iii) नहरों को आन्तरिक परिवहन के साधन के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।

(iv) नहरों के किनारे वृक्षारोपण करके मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।

(v) भारत की अधिकांश नहरें बारहमासी हैं, अतः किसान आवश्यकतानुसार कभी भी अपने खेत में सिंचाई कर सकता है।

        नहर सिंचाई से जहाँ एक ओर अनेक लाभ हैं वहीं दूसरी और सिंचित क्षेत्र के जलमग्न होने का भय भूमि की क्षारीयता, अन्तिम छोर में पानी की कमी, पानी सम्बन्धी आपसी विवाद जैसी कई समस्याएँ भी हैं।

4. बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजनाएँ-

         भारत में विभिन्न उद्देश्यों जैसे- सिंचाई, बाढ़ नियन्त्रण, पेयजल आपूर्ति, जल विद्युत उत्पादन, नहर परिवहन, पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण इत्यादि की पूर्ति बहुउद्देशीय परियोजनाओं के तहत् की जाती है इसलिए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू ने इन परियोजनाओं को “आधुनिक भारत का मंदिर” की संज्ञा दी है

          भारत की प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाएँ निम्नलिखित हैं-

(i)  कोसी परियोजना 

(ii) दामोद घाटी परियोजना 

(iii) रिहन्द बाँध परियोजना

(iv) हीराकुण्ड बाँध

(v) भाखड़ा नांगल परियोजना

(vi)  गंडक परियोजना

(vii) तुंग भद्रा परियोजना इत्यादि

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? 

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है?



       वर्षा के अभाव में खेतों को कृत्रिम ढंग से जल पिलाने की क्रिया को सिंचाई करना कहा जाता है। भारत एक उष्ण कटिबन्धीय देश है जिसमें कृषि मुख्यतः मानसूनी वर्षा पर ही निर्भर है, किन्तु इस वर्षा की प्रकृति एवं उसके वितरण में कई दोष पाये जाते हैं। इन दोषों को दूर करने एवं नियमित कृषि करने का सर्वोत्तम उपाय सिंचाई की व्यवस्था करना है।

सिंचाई की आवश्यकता के कारण

(1) वर्षा की अनिश्चितता (Uncertainty of Rainfall):-

         भारत में वर्षा समय एवं स्थान की दृष्टि से अनिश्चित होती है तथा विभिन्न क्षेत्रों में उसकी मात्रा भी भिन्न होती है। मोटे तौर पर अनुमान लगाया गया है कि प्रत्येक 7 वर्ष में दो बार सूखा पड़ जाता है। अकाल सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को क्षत-विक्षत कर देते हैं। कभी तो समय से बहुत पहले ही वर्षा हो जाती है और कभी लम्बे अन्तराल पर इसी कारण नियमित रूप में कृषि करने के लिए सिंचाई अनिवार्य है।

(2) वर्षा का असमान वितरण (Unequal Distribution of Rainfall):-

      यद्यपि देश में वर्षा का औसत 100 सेण्टीमीटर है, किन्तु इसका क्षेत्रीय वितरण असमान है। उदाहरण के लिए पश्चिमी तटीय क्षेत्रों और असम प्रदेश में 250 सेण्टीमीटर से भी अधिक वर्षा होती है। उत्तरी मैदान और प्रायद्वीप के पूर्वी भाग में यह 100 से 200 सेण्टीमीटर ही होती है। पंजाब के मैदान और दक्षिण प्रायद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भागों में वर्षा की मात्रा केवल 25 से 100 सेण्टीमीटर होती है।

        गंगा नदी के पूर्वी मैदान तथा पश्चिमी समुद्री तट को छोड़ कर अन्य सभी भागों में वर्षा की कमी से सदैव अकाल का संकट बना रहता है। राजस्थान, हरियाणा और दक्षिणी पंजाब में तो बहुत कम वर्षा होने से सिंचाई के बिना खेती करना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार दक्षिणी पठार के मध्यवर्ती एवं आन्तरिक भागों में कृषि बिना समुचित सिंचाई के सम्भव नहीं है, क्योंकि इन प्रदेशों में या तो सूखा पड़ता है या फिर वर्षा बहुत कम होती है।

(3) वर्षा का कुछ ही महीनों में सीमित होना (Restriction of Rainfall to few months):-

       भारत के सभी भागों में एक ही मौसम में वर्षा नहीं होती। शीतकाल में केवल दक्षिण-पूर्वी भाग में ही वर्षा होती है और शेष भाग सूखे रहते हैं। वर्षा का 74% जून से सितम्बर के महीनों में दक्षिण-पश्चिमी मानसून द्वारा प्राप्त होता है, शेष का एक भाग शीत ऋतु में उत्तर-पूर्वी मानसून द्वारा एवं उत्तर-पश्चिमी भारत में शीतकालीन चक्रवातों द्वारा ऐसी स्थिति में वनस्पति अथवा कृषि उत्पादन के लिए लम्बे शुष्क काल में सिंचाई आवश्यक हो जाती है।

(4) जनसंख्या में वृद्धि (Growth in Population):-

      भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या 121 करोड़ है। प्रतिवर्ष बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए अधिकाधिक मात्रा में खाद्यान्नों की आवश्यकता पड़ती है। देश में इनका उत्पादन कम होने से अभाव के वर्षों में अनाज आयात करना पड़ता है।

           अतः आयात बन्द करने के लिए अतिरिक्त उत्पादन, गहरी खेती और प्रति हेक्टेअर एक से अधिक फसले उगाने से ही सम्भव है। इसके लिए सिंचाई करना अनिवार्य है। ऐसा अनुमान है कि यदि गेहूँ और धान उत्पादक क्षेत्रों में सिंचाई की समुचित व्यवस्था बराबर की जा सके तो इन अनाजों का अतिरिक्त उत्पादन प्रतिवर्ष 1 करोड़ से 1.5 करोड़ टन तक बढ़ाया जा सकता है।

(5) विशेष फसलों के लिए अधिक जल की आवश्यकता (Some Special Crops Require more Water):-

       चावल, गन्ना, जूट, मिर्ची, प्याज, लहसुन, आलू, आदि फसलों के लिए नियमित रूप से अधिक जल की आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रकार ग्रीष्म काल की फसलें और बरसीम आदि के लिए प्रतिवर्ष 90 सेण्टीमीटर, रसदार फलों के लिए 100 सेण्टीमीटर तथा कठोर फलों के लिए 75 सेण्टीमीटर अतिरिक्त वर्षा की आवश्यकता पड़ती है। अतः अतिरिक्त जल की पूर्ति सिंचाई द्वारा की जाती है।

(6) मिट्टी की प्रकृति (Nature of Soil):-

       उत्तरी मैदान तथा नदियों के डेल्टाओं में उपजाऊ कांप मिट्टी पायी जाती है। जिससे थोड़ी सिंचाई करने से ही उत्पादन बढ़ जाता है। अन्य भागों में बलुई और दोमट मिट्टी अधिक समय तक जल रोकने में असमर्थ रहती है, अतः उसे कृषि योग्य बनाए रखने के लिए बार-बार सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है।

(7) चारागाहों के विकास के लिए (For Development (of Pastures):-

        पशु पालन और दुग्ध व्यवसाय को प्रोत्साहन देने के लिए प्राकृतिक चारागाहों की रक्षा करना आवश्यक है तथा नए चारागाहों के लिए पर्याप्त मात्रा में जल की उपलब्धता होना आवश्यक है।

(8) व्यावसायिक फसलों में वृद्धि के लिए (For Increas- ing Commercial Crops):-

         कृषि के अन्तर्गत कुल क्षेत्र के 20% पर व्यावसायिक फसलें पैदा की जाती हैं, जिनसे कृषि उत्पादन के कुल मूल्य का 35% प्राप्त होता है। इन फसलों के अन्तर्गत केवल 16% भाग को ही सिंचाई की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। चूंकि व्यावसायिक फसलों के निर्यात द्वारा भारत को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में लगभग 9% विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है और देश के उद्योगों के लिए कच्चा माल मिलता है, अतः इनके उत्पादन में वृद्धि करने के लिए सिंचाई की विशेष आवश्यकता पड़ती है।

(9) भारत में वर्षा प्रायः तेज बौछारों के रूप में होती है जो कृषि के लिए हितकर नहीं है। इससे वर्षा का जल भूमि में रिस नहीं पाता और भूमि प्यासी रह जाती है। निरन्तर फसलों के उत्पादन के लिए तब सिंचाई कना अनिवार्य हो जाता है।


प्रश्न प्रारूप

1. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? विवेचना कीजिये।

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश



        भारत एक कृषि प्रधान देश है, परन्तु यहाँ कृषि की दशा संतोषजनक नहीं है। भारत की जनसंख्या का लगभग 70% भाग कृषि कार्य में लगा हुआ है लेकिन इसके उपरान्त भी भारतीय कृषक की दशा अच्छी नहीं है। निम्न स्तर पर सीमित विकास के बावजूद आज भी भारतीय कृषक परम्परावादी हैं।

        भारतीय किसान कृषि कार्य को एक व्यवसाय के रूप में नहीं करता है, बल्कि जीविकोपार्जन के लिए करता है। कृषि की पुरानी विधियों, पूँजी की कमी, भूमि सुधार की कमी, विपणन एवं वित्त सम्बन्धी कठिनाइयों आदि के कारण भारतीय कृषि की उत्पादकता अत्यन्त न्यून है। अब नई पीढ़ी में शिक्षा एवं कृषि को कमाई का साधन मानने की प्रवृत्ति से भी कृषि एवं कृषक की आर्थिक दशा में कुछ सुधार आने लगा है। भारतीय कृषि की कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं, जिनसे भारतीय कृषि शताब्दियों से पीड़ित है-

(1) भूमि पर जनसंख्या का निरन्तर बढ़ता हुआ भार:-

     भारत में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है, अतः भूमि पर जनसंख्या का भार निरन्तर बढ़ता जा रहा है। जनसंख्या वृद्धि के कारण प्रतिव्यक्ति उपलब्ध भूमि का औसत कम होता जा रहा है। 1921 में यह 0.8 हेक्टेयर था, 1931 में 0.72, 1941 में 0.64, 1951 में 0.75 तथा 1981 में घटकर यह 0.18 एवं 2011 में 0.12 हेक्टेयर हो गया, जबकि विश्व का यह औसत 0.2 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति है। विश्व के कुछ देशों में जैसे- कनाडा में 2.12 है, अर्जेन्टाइना में 1.25 है, रूस में 1.03 है, सं. रा. अमेरीका में 0.89 तथा आस्ट्रेलिया में 3.39 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति है।

(2) भूमि का असमान वितरण:-

       भारत में भूमि का वितरण बहुत ही असमान एवं असन्तुलित है। देश में आज भी 62 प्रतिशत कृषि भूमि केवल 10 प्रतिशत किसानों के पास है तथा शेष 38 प्रतिशत भाग ही 90 प्रतिशत किसानों के पास है। इस तरह एक ओर जहाँ बड़े किसान अपनी भूमि क्षमता का समुचित उपयोग नहीं कर पाते वहीं दूसरी ओर छोटे किसान अपनी गुजर बसर करने में असमर्थ रहते हैं। यद्यपि भारत में 1952 में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया जा चुका है, लेकिन स्थिति में आशाजनक सुधार अभी तक नहीं हो पाया है।

(3) कृषि जोतों का बिखराव एवं भूमि का विभाजन:-

       भारत में उत्तराधिकार के नियमों के कारण भूमि का बंटवारा होता रहता है। इस कारण खेतों का आकार बहुत छोटा हो गया है। छोटे-छोटे खेत एक स्थान पर न होकर अनेक स्थानों पर बिखरे हुए रहते हैं। इस कारण आधुनिक यंत्रों के द्वारा उन्नत कृषि नहीं की जा सकती है।

(4) कृषि की न्यून उत्पादकता:-

       1970 तक देश के अधिकांश भागों में औसत उत्पादन स्तर अधिकांश विकसित व कई विकासशील देशों (मैक्सिको, ब्राजील, फिलीपीन्स) से भी काफी कम रहा, लेकिन अब हरित क्रांति एवं सरकारी प्रयत्नों से स्थिति में कुछ सुधार अवश्य हुआ है। गेहूँ, चावल, तिलहन, दलहन आदि फसलों के प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि हुई है।

(5) सिंचाई के साधनों की कमी:-

       भारतीय कृषि अधिकतर मानसूनी वर्षा पर ही निर्भर है और मानसून हमेशा अनियमित बना रहता है। ऐसी स्थिति में सिंचाई के साधनों की अत्यधिक आवश्यकता होती है, किन्तु दुर्भाग्य है कि आज भी सिंचाई के पर्याप्त साधनों का अभाव है। सिंचाई के साधनों के अभाव में आधुनिक ढंग से कृषि कार्य करना कठिन होता है। अतः आज भी भारतीय कृषि की दशा में सुधार नहीं हो सकी।

(6) कृषि आदानों का अभाव:-

       भारतीय कृषकों के पास कृषि आदानों (कृषि सामाग्रियों) का हमेशा अभाव बना रहता है, जिससे वे अच्छे बीज, खाद, सिंचाई, कृषि यंत्र आदि का उपयोग नहीं कर पाते हैं। इन साधनों के अभाव में कृषि कार्य करने पर प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम होता है।

(7) साख सुविधाओं की कमी:-

        भारतीय कृषकों की आर्थिक स्थिति कमजोर है, इस कारण उनके सामने हमेशा आर्थिक संकट बना रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों में साख-सुविधाओं का आज भी अभाव है। अतः कृषकों को वित्त पूर्ति के लिए गांव के महाजन एवं साहूकारों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। साहूकार ऊँची ब्याज दर वसूल करता है एवं कृषकों के साथ धोखाधड़ी करता रहता है। इस प्रकार एक बार जो कृषक साहूकार के चंगुल में फंस जाता है फिर उसका बाहर निकलना कठिन होता है। ये देशी महाजन बड़ी मात्रा में कृषकों का शोषण करते हैं, फलतः कृषक अपनी दीन-हीन दशा के कारण कृषि के विकास की ओर ध्यान नहीं दे पाता।

(8) मृदा अपरदन:-

        मृदा अपरदन के कारण कृषि भूमि को क्षति पहुंचती है, जिससे भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। जहां प्रतिवर्ष विस्तृत क्षेत्रों में भूमि का ह्रास हो जाता है वहां भूमि कृषि योग्य नहीं रहती है।

(9) धार्मिक एवं सामाजिक कारण:-

      भारतीय कृषक भाग्यवादी एवं अंधविश्वासी होता है। वह कृषि के विकास पर व्यय करने की अपेक्षा शादी, मृत्यु-भोज, सामाजिक रीति-रिवाजों व त्योहारों पर अपनी क्षमता से अधिक खर्च करता है। इस प्रकार कृषि के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है।

(10) कृषि बीमा का अभाव:-

        भारत में कृषि बीमा का अभाव है। किसानों को किसी-किसी वर्ष बाढ़, सूखा एवं विभिन्न प्रकार के कृषि रोगों से कृषि उत्पादन में भारी क्षति उठानी पड़ती है, यहाँ तक कि उस आय से वह उत्पादन का खर्च भी प्राप्त नहीं कर पाता और उनकी स्थिति इतनी दयनीय हो जाती है कि वे आत्महत्या तक के लिए विवश हो जाते हैं। ऐसी अनिश्चितताओं के कारण भारतीय किसान फसलों का व्यावसायिक उत्पादन करने से डरता है, यदि देश में कृषि बीमा का सर्वव्यापीकरण हो जाए तो कृषि उत्पादन में वृद्धि हो सकती है।

(11) विपणन व्यवस्था का अभाव:-

        विपणन व्यवस्था का अभाव भारतीय किसान की एक महत्वपूर्ण समस्या है, क्योंकि इसके अभाव में किसान को अपने फसल उत्पादों का उचित मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता है। विपणन की व्यवस्था नगरों या कस्बों तक सीमित है, जबकि फसलों का अधिकांश उत्पादन गाँव में ही होता है। अतः उसे अपना माल मण्डियों तक ले जाने के लिए अतिरिक्त परिवहन व्यय की आवश्यकता पड़ती है, विवश होकर वह अपना माल गाँव में कम मूल्य पर ही बिचौलियों को बेच देता है जिससे उसे कम लाभ प्राप्त होता है।

निष्कर्ष:

      इस प्रकार भारतीय कृषि अनेक समस्याओं से ग्रस्त है, और आज भी विकसित देशों की तुलना में काफी पिछड़ी स्थिति में है, इसके विकास के लिये अनेकानेक कारग कदम उठाने की आवश्यकता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश पर प्रकाश डालिए।


32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान



      राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार “बाढ़ वह स्थिति है जब नदी का जल खतरे के निशान से ऊपर बहने लगती है।” खतरे का निशान स्तर 50 वर्षों के औसत प्रवाह का स्तर है। संपूर्ण भारत में 80 नदियों के जलस्तर के गहन अध्ययन के बाद खतरे का निशान का निर्धारण किया गया है।

      बाढ़ के लिए अनेक भौगोलिक कारक जिम्मेदार है जिसकी चर्चा नीचे के शीर्षक में किया जा रहा है-

(i) मानसून की अनिश्चिता-

          मानसून अपने अनिश्चिता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। अति अनुकूल मानसून के स्थिति में भारी वर्षा होती है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। मानसून के अनिश्चितता की व्याख्या करने के लिए तापीय सिद्धांत, पछुआ हवा सिद्धांत, जेट स्ट्रीम सिद्धांत और एल-नीनो सिद्धांत दिया गया है। लेकिन अंतिम दो सिद्धांत ज्यादा प्रासंगिक है।

(ii) वनों का विनाश और मृदाक्षरण-

        वनों के विनाश से सतह की मिट्टी कमजोर होती है और कमजोर होने की स्थिति में वर्षा के बाद मिट्टी का तेजी से अपरदन होता है जिससे चट्टानें नग्न अवस्था में आ जाती है। जिसके परिणामस्वरूप नग्न चट्टानों में ग्राहय क्षमता निम्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में जब पुनः वर्षा होती है तो बहाव तेज हो जाता है और बेसिन क्षेत्र में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। शिवालिक प्रदेश में और मुख्यतः हिमाचल प्रदेश में जलस्तर का गिरना और पंजाब में बाढ़ आने की समस्या इससे जुड़ी हुई है।

       उत्तर-पूरब भारत और गढ़वाल क्षेत्र में भी इसी के कारण गंभीर समस्या उत्पन्न हुई है। हाल के वर्षों में राजस्थान और गुजरात आदि जैसे राज्यों में भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती रही है। यह निम्न वर्ष का क्षेत्र है लेकिन जब आकस्मिक तीव्र वर्षा होती है तो नग्न चट्टानों पर जल का बहाव तेजी से होता है और आकस्मिक बाढ़ की स्थिति को उत्पन्न करता है।

(iii) नदी के ताली में मालवों का जमाव-

          खास करके मैदानी भारत में नदियों का ढाल अत्यंत ही निम्न है। ऐसी स्थिति में चौड़ी घाटी के तली पर मलवे का जमा हो जाता है और मानसून ऋतु में जलस्तर तेजी से ऊपर उठ जाता है और उसके आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में आने वाले बाढ़ इसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।

(iv) नदियों के स्रोत क्षेत्र में भारी वर्षा का होना-

      हिमालय का दक्षिणी ढाल पर वर्षा अत्यधिक होती है। इसका परिणाम यह है कि मैदानी क्षेत्र में कम वर्षा के बावजूद बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। जैसे वर्षा नेपाल में होने के कारण उत्तर बिहार में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

(v) नदियों के मोड़दार प्रवाह-

       मोड़दार नदियों के प्रवाह से भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। यह स्थिति मुख्यत: पूर्वी गंगा के मैदान में देखने को मिलती है। पश्चिमी पंजाब और हरियाणा में समानांतर बहने वाली नदियों का जल वृहत क्षेत्र में नहीं फैलता है जबकि पूर्वी भारत की मोड़दार नदियां जल को बहुत क्षेत्र में फैला देती है।

(vi) उच्च ज्वार-

      तटवर्ती क्षेत्रों में चक्रवात के साथ आने वाले उच्च ज्वार भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। ऐसी स्थिति में नदी का मुहाना बंद हो जाता है और नदी का जल पीछे धकेला जाने लगता है जिससे नदियों के जलस्तर में उछाल आता है। उठता हुआ जल वृहत क्षेत्र में फैल जाता है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। इसी प्रक्रिया से गोदावरी, महानदी, कृष्ण, कावेरी आदि के बेसिन क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है।

(vii) भूस्खलन-

       उत्तरी-पूर्वी भारत के हिमाचल प्रदेश में भू-स्खलन से भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। इसमें बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़े भूस्खलित होकर नदियों में चली जाती है और मार्गों को अवरुद्ध कर देती है जिससे नदियों के ऊपरी भाग में पानी फैल कर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। हिमाचल प्रदेश में तिब्बत की ओर से आने वाली पारछु नदी के कारण कुछ वर्ष पहले ही गंभीर बाढ़ की समस्या उत्पन्न हुई थीपरिछु नदी

(viii) नदियों के द्वारा मार्ग परिवर्तन-

          पृथ्वी के घूर्णन गति के प्रभाव के कारण मैदानी भारत की नदियां मार्ग परिवर्तन करती रहती है क्योंकि उत्तर भारत की नदियां प्राय: उत्तर से दक्षिण की तरफ बहती है लेकिन घूर्णन गति पश्चिम से पूर्व की ओर होती है। ऐसी स्थिति में बड़ी नदियों के जाल में घूर्णन के विपरीत दिशा में प्रवाह की प्रवृत्ति विकसित होती है, जिसे नदियों के पश्चिमी तट का अपरदन अधिक होता है। ऐसी स्थिति में नदी में स्थानांतरण की प्रवृत्ति होती है जिससे कई नदियों के द्वारा पुराना मार्ग का निर्माण हो जाता है। वहां वर्षा के दिनों में जल जमाव की स्थिति होती है जो की बाढ़ की स्थिति का दो तक द्योतक है।

(ix) पठारीय स्थित-

        पठारीय क्षेत्रों से निकलने वाली नदियों में भी बाढ़ आती है। यहां धरातल पर अगम्य चट्टानों की उपस्थिति तथा तीव्र वर्षा के कारण बार की स्थिति उत्पन्न होती है। लेकिन बाढ़ की अवधि लंबी नहीं होती है। नदियों के ढाल तीव्र होते हैं, इसलिए पानी तुरंत बह जाती है।

(x) गंगा द्वारा सहायक नदी के जल स्रोतों में अवरोध-

         गंगा मैदानी भारत की रीढ़ के समान एक विशाल नदी है जिसमें उत्तर एवं दक्षिण दिशा से आकर अनेक नदियां मिलती है। जब गंगा का जलस्तर खतरे के निशान को पार कर रहा होता है, ठीक उसी समय अगर सहायक नदियों का भी जलस्तर ऊपर उठने लगता है तो सहायक नदी के जल को गंगा ग्रहण नहीं कर पाती है जिसके परिणामस्वरुप सहायक नदियों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। इसी तरह नदियों के संगम वाले स्थान पर सहायक नदी गंगा के स्वतंत्र जल के प्रवाह को बाधित करती है, जिसके कारण ऊपरी क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

(xi) उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र की बनावट-

         उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत के बीच कभी टेथिस सागर का गर्त रहा है। इसी में मालवा के जमाव से मैदानी क्षेत्र का यहाँ निर्माण हुआ है। यह क्षेत्र आज भी टेथिस सागर के छाड़न क्षेत्र के रूप में जो वर्षा ऋतु में अस्थाई समुद्र में बदलकर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है।

(xii) मानवीय कारण-

         मानव निर्मित बड़े-बड़े बांधों का जलस्तर जब ऊपर उठने लगता है तो अचानक जल को छोड़ दिया जाता है जिसके कारण निम्न मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। फरक्का बांध के कारण बांग्लादेश में बाढ़ आती है। मैटूर डैम के कारण कावेरी के डेल्टाई क्षेत्रों में बाढ़ आती है। टिहरी के कारण उत्तर प्रदेश और बिहार में बाढ़ आने की संभावना रहती है।

         आधुनिक युग में नगरीय बाढ़ की समस्या भी उत्पन्न होने लगी है जो पूर्ण रूपेण मानवीय कर्ण के कारण उत्पन्न होती है। जैसे नगरों में मकानों के जंगल कंक्रीट के द्वारा खड़ा किया जा रहा है। जल रिचार्ज वाले क्षेत्रों पर मकान बना दिए गए हैं। नालियों में पॉलिथीन के जमाव के कारण प्रवाह रुक जाने से आकस्मिक वर्षा होने पर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

बाढ़ वाले क्षेत्रों का वितरण

        राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार भारत में 342 मिलियन हेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र मुख्यतः पूर्वी भारत में स्थित है। गहनता के दृष्टि से असम सर्वाधिक प्रतिकूल क्षेत्र है लेकिन वास्तविक हानी के दृष्टि से उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य प्रमुख है।

     राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, असम और आंध्र प्रदेश ऐसे राज्य है जहां प्रतिवर्ष बाढ़ आते हैं। कुल हानि का दो-तिहाई भाग उत्तर प्रदेश, बिहार और आंध्र प्रदेश में होता है। 60% बाढ़ प्रभावित क्षेत्र गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र में स्थित है और बाढ़ के विभिषका के लिए कभी कोसी, दामोदर, ब्रह्मपुत्र आदि नदियां प्रसिद्ध थी। कभी कोसी बिहार का शोक तो दामोदर को बंगाल का शोक कहा जाता था लेकिन वर्तमान समय में कुछ नवीन नदियां भी बाढ़ प्रभावित क्षेत्र को विस्तार दिए हैं जिसमें महानदी और तीस्ता नदी प्रमुख है।

          बाढ़ के प्रभाव का समय सभी क्षेत्रों में एक समान नहीं होता है। सबसे लंबी अवधि ब्रह्मपुत्र के मैदान में होती है जहां प्रतिवर्ष बाढ़ का प्रभाव 6 सप्ताह तक या अधिक रहता है। उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में इसका प्रभाव 4 से 6 सप्ताह होते होता है।

       पूर्वी तटवर्ती मैदानी और डेल्टाई क्षेत्रों में इसका प्रभाव 1 से 3 सप्ताह तक रहता है तथा पंजाब, नर्मदा और ताप्ती के घाटियों में सामान्यत: इसका प्रभाव एक सप्ताह होता है और आकस्मिक बाढ़ वाले क्षेत्रों में गुजरात, राजस्थान और पूर्व के पर्वतीय क्षेत्र में इसका प्रभाव एक सप्ताह से कम होता है। लेकिन उत्तर-पूर्वी भारत में बाढ़ के बारंबारता अधिक होने के कारण कुल प्रभाव का समय 4 सप्ताह से अधिक हो जाता है। बाढ़ प्रणव क्षेत्र को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।-

भारत में

समाधान हेतु किया गया प्रयास-

           आजादी के पूर्व इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया था। जो भी प्रयास हुए हैं वह आजादी के बाद के हैं। इन प्रयासों में नदी घाटी प्रदेश के विकास की एकीकृत योजना सबसे प्रमुख है। इसके अंतर्गत बहुउद्देशीय नदी घाटी योजना सबसे प्रमुख है। यह ऐसी योजना है जो बाढ़ और सुखे दोनों ही समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है। दामोदर पर डीवीसी और कोसी पर हनुमान नगर में, गंडक पर भैंसा लोटन में बांध बनाकर बाढ़ की समस्या एवं प्रभाव को कम किया गया है।

         इस योजना के साथ वनों का विकास, वृक्षारोपण तथा मृदा संरक्षण जैसी भी एकत्रित योजनाएं चल रही है। सामाजिक वानिकी का कार्यक्रम संपूर्ण भारत में चलाया जा रहा है। वन रोपण कार्यक्रम में नदी के स्रोत क्षेत्र में प्रमुख रूप से वृक्ष लगाए जा रहे हैं ताकि मृदा कटाव को रोककर बार की समस्या को कम कर सके।

      बाढ़ नियंत्रण के लिए अनेक विशिष्ट कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। ऐसे कार्यक्रमों में मृदा संरक्षण हेतु बेडिंग तथा कंटूर कृषि का विकास किया जा रहा है। बेडिंग के तहत छोटी-छोटी सरिताओं के प्रवाह को बाधित करने का प्रयास किया जाता है जबकि कन्टूर कृषि के तहत पहाड़ी क्षेत्रों में समोच्च रेखा के सहारे जुताई का कार्य किया जाता है ताकि मृदा का अपरदन न हो सके।

      भारत में पर्वतीय क्षेत्रों एवं वन्य क्षेत्रों में झूम कृषि के द्वारा वनों का विनाश हो रहा है। अतः इसे रोकने के लिए 1976 ई० में ही “झूम प्रीवेंशन फार्मिंग एक्ट” का निर्माण किया गया था। इससे वनों का संरक्षण होगा और बंजर भूमि का विकास नहीं होगा इससे बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होगी।

       बाढ़ के प्रभाव को रोकने के लिए बाढ़ के पूर्व सूचना देने का भी प्रयास किया जा रहा है और इस दिशा में विशेष कार्य भारतीय बाढ़ आयोग और भारतीय मौसम विज्ञान ने किया है। वर्तमान समय में कृत्रिम उपग्रहों का सहारा लेकर सात केन्द्रों पर बड़े और 147 स्थानों पर छोटे भविष्यवाणी केंद्र स्थापित किए गए हैं। इनका 57% भविष्यवाणी सही रहता है। बड़े केंद्र के रूप में है- भुवनेश्वर में महानदी पर, दिल्ली में यमुना नदी पर, गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी पर, जलपाईगुड़ी में तीस्ता नदी पर, लखनऊ में गोमती नदी पर, पटना में गंगा पर और सूरत में ताप्ती नदी पर स्थापित किया गया है।

          बाँध, तटबंध, विशिष्ट प्रकार के खुले पूल और जल निकासी का विकास कार्य भी वृहत स्तर पर किया गया है। जिसका मुख्य उद्देश्य बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की सुरक्षा है। इन बचाव कार्यक्रम के तहत 1954 से 1987 के बीच 14511 किलोमीटर तटबंधों का निर्माण किया गया था। 2838 किलोमीटर जल निकासी का विकास किया गया था।

          नदी के तली से मलवों को निकालने का कार्यक्रम बहुत खर्चीला है। सामान्यत: यह कार्य उन क्षेत्रों में किया जा रहा है जहाँ नदी का उपयोग नावों के लिए किया जाता है।

        ऊपर वर्णित कार्यक्रमों के लिए प्रत्येक पंचवर्षीय योजनाओं में बाढ़ हेतु विशिष्ट राशियों का आवंटन होता है। जैसे प्रथम पंचवर्षीय योजना में 13.77 करोड रुपए आवंटित किए गए थे। जबकि आठवीं में 1623 करोड रुपए जारी किए गए थे।

        बाढ़ की समस्या से निपटने हेतु कई तात्कालिक कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। इसके लिए पैसों का आवंटन वार्षिक बजट में किया जाता है। आठवीं वित्त आयोग के अनुसार हानि की समीक्षा का कार्य केंद्र सरकार का होगा। केंद्र द्वारा समीक्षा कर केंद्रीय सहयोग शुरू किया जाएगा। सरकार बाढ़ संभावित वाले क्षेत्र से बचाकर सुरक्षित स्थानों पर ले जाती है।

        बाढ़ आ जाने पर बाढ़ राहत कार्यक्रम चलती है। हेलीकॉप्टर, गोताखोरों, प्लास्टिक बोट का सहारा लेती है। भोजन के पैकेट का वितरण करती है। पेयजल हेतु जलापूर्ति किया जाता है। मवेशियों हेतु चारा उपलब्ध कराए जाते हैं। बाढ़ समाप्त होने पर अनेक संक्रामक बीमारियों से बचाव हेतु टीका, दवा का प्रबंध करती है। जल निकासी, संचार व्यवस्था और परिवहन आदि का प्रबंध किया जाता है। केंद्र एवं राज्य सरकारों के अलावे स्वंय सेवी संस्थाओं का भी सहारा लिया जाता है।

सुझाव-

        यद्यपि बाढ़ की समस्या से निपटने हेतु कई प्रयास किया जा रहा है फिर भी समस्या लगभग यथावत है। अतः इस समस्या से निपटने हेतु और अधिक पेनिट्रेटिव योजनाओं की जरूरत है। पुनः टिकाऊ विकास नीति के अंतर्गत ऐसी योजनाओं की जरूरत है जिसमें पर्यावरण के असंतुलन किए बगैर इन समस्याओं का समाधान किया जा सके।

      बाढ़ एवं जल जमाव वाले क्षेत्रों में ऐसी कृषि का विकास किया जाए जो बाढ़ के स्थिति में भी उग सके। जैसे चावल के ऐसे किस्म विकसित किए जाए जो 15 से 20 दिन तक चल मग्न रहने पर भी स्वस्थ रहें। द्वितीय जल कृषि का विकास किया जाए। इसके लिए मखाने, सिंघाड़े की खेती किया जा सकता है तथा बड़े पैमाने पर मछली का पालन किया जा सकता है।

        बाढ़ वाले क्षेत्रों में निर्माण तकनीक को विकसित किया जाए। बाढ़ वाले क्षेत्रों में सीमेंट एवं ईट से मकान निर्माण की गतिविधि को प्रोत्साहित किया जाए।

       बाढ़ वाले क्षेत्रों में ऐसे पुल निर्माण तकनीक पर बल दिया जाए जिससे जल ऊपर एवं नीचे दोनों से आसानी से बह सके। इसके लिए खुला पुल का निर्माण सर्वाधिक उपयोगी होगा। इसके साथ ही वानिकी कार्यक्रम और अन्य विकास कार्यक्रम को भी तीव्रता से लागू करने की आवश्यकता है।

         भारत में बाढ़ नियंत्रण में सबसे बड़ी बाधा नेपाल से आने वाली नदियों के जल को रोका जाना है। अतः इस कार्य के लिए भारत को अंतर्राष्ट्रीय कानून को पालन करना पड़ता है। ऐसे में भारत सरकार एवं राज्य सरकारें नेपाल से आने वाली नदियों को अनेक चैनलों में विभाजित कर गंगा नदी में जल को गिराकर समाधान का प्रयास करना चाहिए।

      बाढ़ प्रणव वाले क्षेत्रों में कृत्रिम उपग्रह के माध्यम से सूचना तंत्र को और प्रभावी बनाए जाने की आवश्यकता है।

       भूमि जल रिचार्ज करने वाले तकनीक को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। इसके लिए जोहार, आहरा, कच्चे कुआं एवं तालाब, पाइन इत्यादि को पुर्नोद्धार किया जाए।

        बाढ़ राहत कार्यक्रम को भ्रष्टाचार से मुक्त कर सही तरीके से चलाया जाए। अंततः क्रांति के तहत नदी जोड़ो कार्यक्रम को अतितीव्र गति से कार्य रूप दिया जाए। जहां आवश्यक हो वहां पर बड़े बांध और छोटे बांधों का निर्माण किया जाए। नगरों में “वाटर हार्वेस्टिंग” को अनिवार्य गतिविधि के रूप में शामिल किया जाए।

प्रश्न प्रारूप

1. भात में बाढ़ के काण, प्रभावित क्षेत्र, समाधान के दिशा में किया गया प्रयास एवं सुझाव की चर्चा करें।

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान



परिभाषा- 

          भारतीय मौसम आयोग (IMO) ने सूखा को परिभाषित करते हुए बतलाया है की मई माह के मध्य से अक्टूबर माह के मध्य लगातार 4 सप्ताह तक वर्षा की मात्रा 5 सेमी० या उससे कम हो, सूखा की स्थिति कहलाएगी। यही समयावधि मानसून के आगमन का है, इसीलिए इसे सूखा का पैमाना बनाया गया है। यानी मानसून के कमजोर होने पर सूखा की स्थिति लगभग तय है।

कारण-

       सूखे की स्थिति के लिए अनेक भौगोलिक कारक जिम्मेदार है-

(i) मानसून की अनिश्चिता-

        इसे फ्लोन का विषुवतीय पछुआ सिद्धांत, जेट स्ट्रीम व एल-नीनो से स्पष्ट किया जा सकता है।

(ii) वनों की कटाई व मृदा का अपरदन-

        वनों की कटाई से वायुमंडलीय आर्द्रता में कमी और तापमान में वृद्धि होती है, जिससे बादल निर्माण की प्रक्रिया बाधित होती है और वर्षा के अभाव में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

       मृदा अपरदन से मिट्टी का ऊपरी सतह अपरदित हो जाता है और नग्न चट्टाने दृष्टिगत होने लगती है। नग्न चट्टानों की जल ग्राहय क्षमता कम होती है। इससे प्रदेश का भूमिगत जलस्तर नीचे चला जाता है और सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।

       पुन: मिट्टी के नमी में कमी आने से फसल मारी जाती है। ऐसी समस्या झारखंड के चतरा और पलामू बिहार के भभुआ और नवादा आदि जिलों में पाई जाती है। ऐसी ही समस्या चंबल, बेतबा और केन नदी के बेसिनों में भी मिलती है।

(iii) तापमान में वृद्धि-

        यह कारक मूलत: जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। इससे वायुमंडलीय तापमान में लगातार वृद्धि की स्थिति है। नग्न चट्टानें सूर्याताप के प्रभाव में आ जाती है और वाष्पोत्सर्जन की क्रिया तेजी से होने लगती है और अधिक ताप के ही वाष्प संघनित नहीं हो पाते हैं, जिससे वर्षा नहीं हो पाती है। उत्तर भारत के पठारीय क्षेत्रों में सूखे के स्थिति का प्रमुख कारण यही है। साथ ही चंबल घाटी से लेकर झारखंड के चतरा जिला के बीच सूखा के लिए यही कारण प्रमुख है।

(iv) असमान वर्षा का वितरण-

          संपूर्ण भारत में वर्षा का वितरण असमान होने के कारण भी सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। न्यून वर्षा क्षेत्रों में इसकी प्रबलता तत्काल दृष्टिगोचर होती है।

सूखा जनित समस्याएँ

⇒ कृषि कार्य हेतु जलजमाव की समस्या

⇒ तापमान वृद्धि की समस्या

⇒ वन ह्रास व मृदा अपरदन की समस्या

⇒ पेय जल की समस्या

⇒ जलस्तर में गिरावट व भू-आर्द्रता में कमी

⇒ संक्रमण व बिमारियों के प्रकोप में वृद्धि

⇒ सरकारी व निजी कार्यों के संचालन में बाधा

वितरण-

       भारत में सुखा प्रभावित क्षेत्र मुख्यत: पश्चिम भारत में स्थित है। IMO के अनुसार 13 राज्यों के 67 जिलों में लगभग स्थायी तौर पर सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। भारत का मध्यवर्ती राज्य व पठारीय भाग इसके अंतर्गत आते है। लेकिन भौगोलिक वितरण के दृष्टि से अगर देखा जाए तो 50 सेमी० वार्षिक वर्षा से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में लगभग प्रत्येक वर्ष सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। भारत के सिंचाई अयोजनानुसार यह दायरा 75 सेमी० से कम वर्षा वाले क्षेत्र तक है। 75 सेमी० वर्षा रेखा भारत को सुखा व आर्द्र दो भागों में बांटता है। सूखा आगमन की बारंबारता के दृष्टिगत 100 सेमी० से कम वर्षा वाला क्षेत्र सूखे की सबसे अधिक संभावित क्षेत्र है।

भारत में सूखा के कारण

चित्र: भारत में वर्षा का सामान्य वितरण

         100 सेमी० से 150 सेमी० के बीच वाले क्षेत्रों में एक विशिष्ट स्थिति होती है। यहां कभी बाढ़, कभी सुखाड़ या बाढ़ एवं सुखाड़ की वैकल्पिक स्थिति देखने को मिलती है। उदाहरण के तौर पर बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल का उल्लेख किया जा सकता है। प्राय: 150 सेमी० से अधिक वर्षा वाला क्षेत्र अधिक वर्षा के बाद जद में क्षेत्र की लहलहाती फसलों को डूबो देती है और अंतत: सूखे की स्थिति उत्पन्न कर देती है।

सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए किए गए विकास कार्य:-

     इस दिशा में पहली योजना भारत में 1863 ई० में बनी थी जो आकाल आयोग के रिपोर्ट पर आधारित थी। इसके अंतर्गत नदियों से कुछ प्रत्यक्ष नहर निकले गए जिसमें सरहिंद नहर प्रमुख था। पंजाब राज्य में संप्रति नहर। परंतु, सुख से निजात हेतु वास्तविक प्रयास स्वतंत्रता के बाद किए गए। जिसके तहत दो महत्वपूर्ण स्वीकृत प्रयास थे- 

1. बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना

2. वानिकी व बंजर भूमि सुधार योजना

      बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना में कावेरी जल कमान एरिया और भाखड़ा नांगल परियोजना प्रमुख था। कावेरी जल कमान एरिया तमिलनाडु के तंजौर जिला में स्थित है। पहले यह जिला सूखाग्रस्त था लेकिन आज हरित क्रांति का क्षेत्र बन चुका है। इस प्रकार भाखड़ा नांगल परियोजना से पंजाब, हरियाणा व राजस्थान में कृषि कार्य में तेजी आई।

        वानिकी एवं बंजर भूमि की योजना द्वारा तापीय प्रभाव को कम किया गया है जिससे आर्द्रता में वृद्धि हुई। वानिकी एवं बंजर भूमि विकास योजना के द्वारा मिट्टी के नमी क्षमता में वृद्धि करने का प्रयास किया जा रहा है। 1967 ई० के सूखे के बाद सिंचाई संदर्भ को अधिक प्राथमिकता दी जा रही है। 

       पांचवीं पंचवर्षीय योजना में “कमांड क्षेत्र विकास योजना” और “सूखाग्रस्त क्षेत्र विकास योजना” (DPADP) प्रारंभ की गई। प्रथम के तहत 97 कमांड क्षेत्र चिह्नित किए गए जैसे चंबल कमांड क्षेत्र, सोन कमांड क्षेत्र, इंदिरा कमांड क्षेत्र आदि। इसके अंतर्गत 189 लाख हैक्टेयर भूमि सिंचाई की व्यवस्था है।     

        DPADR संपूर्ण भारत में चलाए जा रहे हैं। शुष्क कृषि विकास, स्थानीय जल संसाधन का उचित प्रबंध, वैज्ञानिक भू-उपयोग पद्धति का विकास, ग्रामीण स्तर पर वानिकी व पशुपालन को प्रोत्साहन इस योजना के प्रमुख लक्ष्य है। सूखे की स्थिति में भी फसल कम से कम प्रभावित हो इसके लिए विशेष किस्म के बीज तैयार किया जा रहे हैं। जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में उगाने हेतु कपास के PRS72, PRS73, PRS74 नमक बीज विकसित किया गया है। राजस्थान के लिए 100 दिन में उपजा लिए जाने वाले चावल के बीच तैयार किए गए हैं। इस क्षेत्र में नित नए शोध कार्य जारी है।

       सूखे से निजात हेतु आपातकालीन कार्यक्रम भी चलाए गए हैं। जिसका आवंटन वार्षिक बजट में किया जाता है। आठवें वित्त आयोग के अनुसार सूखाग्रस्त क्षेत्र में हुए हानि का जायजा व सहायतार्थ कार्य केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी।

सुझाव-

     यद्यपि सूखाग्रस्त की समस्या के समाधान हेतु कई स्तरों पर प्रयास किए गए हैं, लेकिन यह समस्याएं आज राष्ट्रीय समस्या के रूप में कायम है। आज अधिक पेनेट्रेटिव योजनाओं, पर्यावरण हितैषी टिकाऊ विकास नीति, मानसून का सही आंकलन पर विशेष जोर देने की जरूरत है। नदी जोड़ योजना कार्य में तेजी लाने की आवश्यकता है।

⇒ बड़ी परियोजनाओं पर पुनः विचार करने की जरूरत है क्योंकि गहन आंकलन के बाद जयपुर पर्यावरण अध्ययन केंद्र ने संकेत दिया था की बड़ी परियोजनाएं मानसूनी जलवायु को बदल सकती है।

⇒ सूखाग्रस्त इलाकों में पशुपालन कृषि को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, क्योंकि चारा उत्पादन हेतु अधिक सिंचाई की जरूरत नहीं होती है। यह कार्यक्रम राजस्थान में सफल भी हो रहे हैं। स्थानीय जल सुविधा व वर्षा जल संरक्षण पर विशेष ध्यान व जागरूकता लाने की जरूरत है।

⇒ बिहार राज्य प विश्व बैंक की रिपोर्ट है कि यहां नह के बदले ट्यूबवेल सिंचाई अधिक समीचीन है।

          अंततः सुखा का सामना सामूहिक प्रयास से ही संभव है। 

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