8. Physical Geography vs Human Geography/भौतिक भूगोल बनाम मानव भूगोल
Physical Geography vs Human Geography
भौतिक भूगोल बनाम मानव भूगोल

भौतिक भूगोल एवं मानव भूगोल
(Physical Geography vs Human Geography)
20वीं सदी से पूर्व भूगोल का समस्त अध्ययन मुख्यतः भौतिक भूगोल तक ही सीमित था। इसे सामान्य या क्रमबद्ध भूगोल भी कहा जाता था। उस समय मानव से संबंधित विषयों का अध्ययन भी भौतिक भूगोल के अंतर्गत ही किया जाता था। 19वीं शताब्दी के मध्य में अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Cosmos (1845) में प्रकृति की एकता पर बल दिया और यह स्पष्ट किया कि प्राकृतिक तत्व परस्पर जुड़े हुए हैं। इसके बाद कार्ल रिटर ने Erdkunde (1859) में मानव को भौगोलिक अध्ययन के केंद्र में रखते हुए मानव-केंद्रित दृष्टिकोण को विकसित किया।
हम्बोल्ट और रिटर के विचारों के प्रभाव से भूगोल में सौंदर्यवादी एवं समन्वयात्मक दृष्टिकोण का विकास हुआ। वे प्रकृति को जड़ तत्व न मानकर सजीव और सृजनशील शक्ति के रूप में देखते थे। 1887 में मैकिंडर ने अपने व्याख्यान Scope and Methods of Geography में यह स्पष्ट किया कि भूगोल में प्राकृतिक और सामाजिक तथ्यों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद 20वीं सदी के प्रारंभ में भूगोल स्पष्ट रूप से दो शाखाओं- भौतिक भूगोल और मानव भूगोल में विभाजित हो गया। विश्वविद्यालयों में दोनों के अलग-अलग विभाग स्थापित होने लगे, जिससे यह द्वंद्व और गहरा हो गया।
इस काल में कुछ भूगोलवेत्ताओं जैसे पेंक, डेविस आदि ने भौतिक भूगोल को ही वास्तविक भूगोल माना और मानव तत्वों की उपेक्षा की। इसके विपरीत फ्रेडरिक रैट्जेल ने मानव को भौगोलिक अध्ययन का केंद्र मानते हुए Anthropogeographie में यह सिद्ध किया कि मानव की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को प्राकृतिक वातावरण से अलग नहीं किया जा सकता। रैट्जेल के अमेरिकी शिष्य एलन चर्चिल सेम्पल ने History and Its Geographical Conditions (1903) के माध्यम से मानव-केंद्रित भूगोल को और मजबूत किया।
फ्रांस में विडाल-डी-ला-ब्लांश ने मानव भूगोल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने यह माना कि प्राकृतिक पर्यावरण मानव जीवन की संभावनाएँ प्रदान करता है, परंतु मानव अपनी संस्कृति और तकनीक के माध्यम से उनका चयन करता है। उनके शिष्य जीन ब्रून्स और अन्य विद्वानों ने भी मानव और प्रकृति के पारस्परिक संबंधों को भूगोल का मूल विषय माना। इसी क्रम में हार्टशोर्न (1959) ने कहा कि यदि भूगोल को भौतिक और मानव तथ्यों में विभाजित कर दिया गया, तो भूगोल एक समग्र विज्ञान नहीं रह पाएगा।
निष्कर्ष:
अंततः 20वीं सदी के मध्य और उत्तरार्द्ध में यह विचार प्रबल हुआ कि भौतिक भूगोल और मानव भूगोल एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। दोनों मिलकर ही भूगोल को एक संपूर्ण और एकीकृत विज्ञान बनाते हैं। आधुनिक भूगोल में मानव-पर्यावरण अंतःक्रिया, क्षेत्रीय अध्ययन और समन्वयात्मक दृष्टिकोण को विशेष महत्व दिया गया है। इस प्रकार भौतिक बनाम मानव भूगोल का विवाद धीरे-धीरे समाप्त होकर भौगोलिक एकता और समन्वय की दिशा में विकसित हुआ।
उत्तर लिखने का दूसरा तरीका
परिचय
20वीं सदी के प्रारंभ में ही भूगोल स्पष्टतया दो-भौतिक एवं मानव-भागों में विभक्त हो गया। भूगोल की इन दोनों ही शाखाओं के मध्य दूरी इतनी बढ़ गयी कि विश्व भर के विश्वविद्यालयों में भौतिक एवं मानव भूगोल के अलग-अलग विभागाध्यक्षों की भी नियुक्तियाँ होने लगी। अर्थात् भौतिक बनाम मानव भूगोल के द्वन्द चरम पर पहुंच गये।
इस दौर में एक ओर पेंशल, डेविस तथा पेंक सदृश भूगोलवेत्ताओं ने वैज्ञानिक या व्यवस्थित या भौतिक भूगोल को ही भूगोल माना वहीं रेटजेल, हैकल, बकल एवं कुमारी सैंपुल सदृश विद्वानों ने मानव भूगोल को भौगोलिक अध्ययन का आधार घोषित कर दिया।
इसी समय ब्लॉश, ब्रून्स तथा हेटनर जैसे विद्वानों ने भौगोलिक अध्ययन में प्रकृति एवं मानव दोनों ही तथ्यों को अविभाज्य करार कर दिया।
इन्हीं द्वंदों के मध्य मेकिन्डर, कार्ल शॉवर एवं रिचथीफेन जैसे विद्वानों ने भौगोलिक एकता को अक्षुण्ण रखने में योगदान किया।

संक्षेप में भूगोल को सामान्यतः दो भागों में बाँटा जाता है-
1. भौतिक भूगोल
2. मानव भूगोल
इन दोनों के बीच लंबे समय से द्वैत (Dualism) का विवाद चला आ रहा है, लेकिन व्यवहार में इन्हें पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
✍️यूनानी विद्वानों ने सबसे पहले भूगोल को दो भागों में बाँटा।
✍️हेकाटियस ने भौतिक भूगोल को अधिक महत्व।
✍️हेरोडोटस और स्ट्रैबो ने मानव दृष्टिकोण पर जोर।
इसी कारण भूगोल में भौतिक और मानव पक्षों के बीच अंतर की बहस शुरू हुई।
भौतिक भूगोल (Physical Geography)
अध्ययन के विषय:
⇒ जलवायु
⇒ मौसम
⇒ जलराशियाँ एवं प्रवाह
⇒ समुद्र विज्ञान
⇒ भू-आकृतियाँ
⇒ भूगर्भ विज्ञान
प्रमुख विशेषताएँ :
✍️यह प्राकृतिक विज्ञान (Natural Sciences) से जुड़ा होता है।
✍️अध्ययन मापन योग्य होता है।
✍️परिणाम अधिक सटीक, निश्चित और वैज्ञानिक होते हैं।
✍️प्रयोग और गणना संभव होती है।
मानव भूगोल (Human Geography)
अध्ययन के विषय:
⇒ सामाजिक घटनाएँ
⇒ सांस्कृतिक गतिविधियाँ
⇒ मानव क्रियाएँ और उनका पर्यावरण से संबंध
प्रमुख विशेषताएँ:
✍️ये घटनाएँ समय और स्थान के अनुसार बदलती रहती हैं
✍️इन्हें पूरी तरह मापा नहीं जा सकता
✍️परिणाम अनिश्चित और संभावनात्मक होते हैं
✍️प्राकृतिक विज्ञान की विधियाँ पूरी तरह लागू नहीं होतीं
अध्ययन की पद्धति में अंतर
| भौतिक भूगोल | मानव भूगोल |
| प्राकृतिक विज्ञान आधारित | सामाजिक विज्ञान आधारित |
| मापन योग्य | मापन कठिन |
| अधिक निश्चित परिणाम | अनिश्चित परिणाम |
| स्थिर नियम | परिवर्तनशील नियम |
द्वैतता (Dualism) का कारण
✍️कुछ विद्वान दोनों भूगोलों को अलग-अलग विषय मानते हैं।
✍️यहाँ तक कि उनकी अध्ययन पद्धतियों को भी अलग माना जाता है।
✍️इसी सोच से भौतिक–मानव द्वैत की धारणा बनी।
निष्कर्ष
✍️भौतिक और मानव भूगोल को पूरी तरह अलग करना व्यावहारिक नहीं है।
✍️दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
✍️आधुनिक भूगोल में समन्वय दृष्टिकोण (Integrated Approach) को अधिक महत्व दिया जाता है।
