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7. Plate Tectonic Theory (प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत)

7. Plate Tectonic Theory

(प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत)



Plate Tectonic

➤ प्लेट विवर्तनिकी एक ऐसा सिद्धान्त है जो भू-भौतिकी से संबंधित अनेक घटनाओं जैसे-पर्वत निर्माण, ज्वालामुखी क्रिया इत्यादि के संबंध में व्यक्त किये गये सभी परम्परागत सिद्धान्तों का परित्याग कर नया विचार प्रस्तुत करता है।
➤ इस परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी का ऊपरी भाग दृढ़ भूखंडों से निर्मित है। ये भूखंड कई भागों में विभक्त है, इसके एक भाग को प्लेट से संबोधित करते है।
➤ सर्वप्रथम वर्ष 1955 में कनाडा के भू-वैज्ञानिक जे. टूजो विल्सन (J-Tuzo Wilson) ने ‘प्लेट’ शब्द का प्रयोग किया था।  
प्लेटों की संख्या
 
➤ अमेरिकी अर्थ साइंस के अनुसार पृथ्वी 7 बड़े और 6 छोटे प्लेट निम्नलिखित है-
प्रमुख प्लेट- 7
1. प्रशांत महासागरीय प्लेट
2. उ० अमेरिकी प्लेट
3. द० अमेरिकी प्लेट
4. अफ्रीकन प्लेट
5. युरेशियन प्लेट
6. इण्डियन प्लेट
7. अंटार्कटिका प्लेट
गौण प्लेट- 6
(i) अरेबियन प्लेट
(ii) फिलीपींस /फिलीपाइन प्लेट
(iii) कोकस प्लेट
(iv) नास्का प्लेट
(v) स्कोशिया प्लेट
(vi) कैरेबियन प्लेट
Plate Tectonic Theory
➤ इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों को दो भागों में बांटा जाता है–
1. स्थिर प्लेट
2. गतिशील प्लेट 
         
➤ स्थिर प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे नहीं चल रही है जबकि गतिशील प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे चल रही है। 
➤ संरचना के दृष्टिकोण से प्लेट दो प्रकार के होते है- 
1. महासागरीय प्लेट
2. महाद्वीपीय  प्लेट
                   
महासागरीय प्लेट बैसाल्ट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व अधिक है जबकि महाद्वीपीय प्लेट ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व कम है।
सीमा या सीमांत         
       
इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों के मिलन स्थल को प्लेट के सीमा या सीमांत कहते है।
इसके अनुसार प्लेटों में 3 प्रकार की सीमाएं पायी जाती है। इसे  निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-
 प्लेटों के संचालन शक्तियाँ
इस सिद्धांत के अनुसार सभी प्लेट पृथ्वी के अक्ष का अनुसरण करते हुए पूरब से पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हो रही है।
प्लेटों में गति हेतु कई कारक उत्तरदायी माना गया है। जैसे- पृथ्वी के घूर्णन गति, प्लवनशीलता बल, गुरुत्वाकर्षण बल और प्लेटों का 45° पर प्रत्यावर्तन, सूर्य एवं चन्द्रमा का ज्वारीय बल, संवहन तरंग आदि।
इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों में 3 प्रकार के गतियाँ पायी जाती है। जैसे – निर्माणकारी गति की उत्पत्ति अपसरण सीमा के सहारे होती है, विनाशकारी गति की उत्पति अभिसारी सीमा के सहारे तथा संरक्षी गति संरक्षी सीमा के सहारे उत्पन्न होता है।
प्लेटों का क्रियाविधि
उठती हुई संवहन तरंगे अपसरण सीमा को जन्म देती है। इसी सीमा के सहारे दरार का निर्माण होता है। इन दरारों से ही दुर्बलमंडल से लावा/मैग्मा निकलती है, जिससे ज्वालामुखी क्रिया होती है।
गिरती हुई संवहन तरंगे अभिसारी सीमा का निर्माण करती है। इस सीमा के सहारे अधिक घनत्व वाले प्लेट कम घनत्व वाले प्लेट में घुसने की प्रवृति रखती है। प्लेट अत्यधिक अंदर जाकर पिघलती है और “बेनी ऑफ जोन” निर्माण करती है तथा चट्टानों के वलन के साथ-साथ ज्वालामुखी का उदगार भी होता है। इसे निम्न चित्र से समझा जा सकता है-
प्रमाण 
   प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के समर्थन में निम्नलिखित प्रमाण प्रस्तुत किये गए है–
1. ज्वालामुखी-
   
        विश्व के ज्वालामुखी वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी क्रियाएं अभिसारी प्लेट सीमा के सहारे होती है।
2. भूकम्प-
   
       भूकम्पीय वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित क्षेत्रों में आती है। ये क्षेत्र संरक्षी प्लेट सीमा के सहारे स्थित है।
3. सागर नितल प्रसार और पुराचुमकत्व- 
     
      सागर नितल प्रसार सिद्धान्त से स्पष्ट है कि सागर नितल प्रसार अपसारी सीमा के सहारे हो रही है तथा नवीन चट्टानों में पुराचुमकत्व का गुण कम तथा पुराने चाट्टानों में चुमकत्व का गुण अधिक पाया जाता है।
 4. भूगर्भिक समस्याओं का समाधान  
                   
       प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के माध्यम से कई भूगर्भिक समस्याओं का समाधान होता है। जैसे- पर्वतों के उत्त्पति, भूकंप, भूसंचालन, महाद्वीपीय विखण्डन, समुद्री नितल प्रसार, पुराचुमकत्व, द्वीपीय चाप के निर्माण आदि।
आलोचना
         
      उपरोक्त विशेषताओं के वाबजूद इस सिद्धांत की कई खामियां है। जैसे –  प्लेटों की संख्या का स्पष्ट पता नहीं चल पाता है, प्लेटों में संवहन तरंगे क्यों उत्पन्न होती है?, हरसिनियन और कैलिडोनियन युग के पर्वतों की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं करता है, बेनी ऑफ जोन से निकलने वाला मैग्मा पदार्थ के परिणाम का वैज्ञानिक व्याख्या नहीं करता।   

      इन सीमाओं के वाबजूद भूगर्भ विज्ञान का एक क्रांतिकारी विचा है क्योंकि भूपटल से संबंधित सभी भूगर्भिक घटनाओं का एक बा में ही व्याख्या प्रस्तुत करता है। 



प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



1. महाद्वीप और महासागर किस श्रेणी के उच्चावच हैं?

[A] प्रथम श्रेणी
[B] द्वितीय श्रेणी
[C] तृतीय श्रेणी
[D] चतुर्थ श्रेणी

[read more] [A] प्रथम श्रेणी [/read]

2. पृथ्वी के धरातल के कितने प्रतिशत भाग पर महाद्वीपों का विस्तार पाया जाता है?

[A] 25.5
[B] 29.2 
[C] 35.6 
[D] 40.7

[read more] [B] 29.2  [/read]

3. महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धान्त के प्रणेता हैं-

[A] ग्रेगरी
[B] प्राट
[C] वेग्नर
[D] होम्स

[read more] [C] वेग्नर [/read]

4. कार्बोनिफेरस युग में विश्व में सम्पूर्ण महाद्वीप आपस में मिले हुए थे, यह किसकी मान्यता है?

[A] वेग्नर
[B] डाना
[C] जेफ्रीज
[D] होम्स

[read more] [A] वेग्नर [/read]

5. प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त किस वर्ष प्रस्तुत किया?

[A] 1875
[B] 1965
[C] 1875
[D] 1960

[read more] [D] 1960 [/read]

6. प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किसने किया था?

[A] हैरी हैस
[B] टेलर
[C] जेफ्रीज
[D] डाना

[read more] [A] हैरी हैस [/read]

7. वेग्नर के अनुसार महाद्वीपीय विस्थापन जिस दिशा में हुआ, वह है-

[A] भूमध्य रेखा व उत्तरी ध्रुव
[B] भूमध्य रेखा व पश्चिमी
[C] भूमध्य रेखा व दक्षिणी ध्रुव
[D] भूमध्य रेखा व पूर्व

[read more] [B] भूमध्य रेखा व पश्चिमी [/read]

8. वेग्नर के अनुसार पेंजिया का विखण्डन किस युग में प्रारम्भ हुआ?

[A] कैम्ब्रियन
[B] प्रीकैम्ब्रियन
[C] कार्बोनिफेरस
[D] पर्मियन

[read more] [C] कार्बोनिफेरस [/read]

9. वेग्नर के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

[A] कार्बोनिफेरस युग में विश्व के सभी महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे जिसे उन्होंने पेंजिया कहा।
[B] पेंजिया टेथिस सागर नामक महासागर से घिरा हुआ था।
[C] उत्तरी अमेरिका, यूरोप आदि अंगारालैंड के भाग थे।
[D] अंटार्कटिका गोण्डवानालैंड का अंग था।

[read more] [B] पेंजिया टेथिस सागर नामक महासागर से घिरा हुआ था। [/read]

10. महाद्वीपीय विस्थापन को स्पष्ट करने वाला नवीनतम सिद्धान्त कौन है?

[A] टेलर की महाद्वीपीय विस्थापन परिकल्पना
[B] वेग्नर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त
[C] चतुष्फलक परिकल्पना
[D] प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त

[read more] [D] प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त [/read] 

6. Continental Drift Theory (महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत)

6. Continental Drift Theory

(महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत)



वेगनर महोदय एक जलवायुवेता एवं भूगर्भशास्त्री थे।

इन्होंने 1912 ई० में अपनी पुस्तक डाई इंटेस्टहंगडर कण्टिनेंट एण्ड ओगोनी में महाद्वीपीय विस्थापन का सिद्धांत प्रस्तुत किया।

इनका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन एवं विभिन्न स्थानों पर मिलने वाले वनस्पतियों के समानता का व्याख्या करना था।

➤  इन्होंने सिद्धांत के व्याख्या में दो तर्क दिए-

(1) या तो समय-समय पर जलवायु में परिवर्तन होता रहा है।

(2) या तो महाद्वीपों का विस्थापन होता रहा है।

वेगनर के अनुसार कार्बोनिफेरस युग में सभी महाद्वीप आपस में जुड़े थे, जिसे पेंजिया कहा है।

➤ पेंजिया के चारों ओर स्थित विशाल महासागर को पैंथालास कहा।

कालान्तर में पेंजिया के विखण्डन से मध्य भाग में गहरी व सकरी भूसन्नति का निर्माण हुआ जिसे टेथिस सागर कहा।

➤ उन्होंने टेथिस के उत्तर में स्थित भूखण्ड को लॉरेशिया तथा दक्षिण में स्थित भूखण्ड को गोंडवानलैंड कहा।

वेगनर के अनुसार भूपटल सियाल से निर्मित है और इससे नीचे सीमा तथा निफे की परत है तथा सियाल सीमा पर अबाध रूप से तैर रही है।

कार्बोनिफेरस युग में कुछ भूगर्भिक शक्तियों के कारण लॉरेशिया एवं गोंडवाना लैंड में विखण्डन की क्रिया हुई जिससे छोटे-छोटे भूखण्ड यानी महाद्वीपों का निर्माण हुआ।

➤  इन महाद्वीपों के विस्थापन से ही दरार घाटी में हुए जलविस्तार से महासागरों का निर्माण हुआ जिसे निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-

महाद्वीपों का प्रवाह

      वेगनर के अनुसार महाद्वीपों के विस्थापन के लिए दो बल उत्तरदायी है– 

(i) गुरुत्वाकर्षण एवं प्लवनशीलता बल- महाद्वीपों का उत्तर की ओर विस्थापन

(ii) सूर्य एवं चन्द्रमा का ज्वारीय बल- महाद्वीपों के पश्चिम दिशा की ओर विस्थापन के लिए उत्तरदायी।

वेगनर के अनुसार लौरेशिया भूखंड में उ० अमेरिका, ग्रीनलैंड, यूरोप एवं एशिया के अधिकांश भाग तथा गोण्डवाना लैंड में द० अमेरिका, अफ्रीका, प्रायद्वीपीय भारत, ऑस्ट्रेलिया एवं अंटार्कटिका सम्मलित थे।

पक्ष में प्रमाण

(1) भूगर्भिक प्रमाण- भारतीय पठार, अफ्रीकी पठार, ब्राजील का पठार एवं ऑस्ट्रेलिया के पठार सभी एक ही समय के निर्मित एवं समान विशेषताएं वाले चट्टान है। 

(2) अटलांटिक महासागर के दोनों तटों पर समानता पायी जाती है तथा दोनों तटों को मिलाया जा सकता है, जिसे उन्होंने– Zig-Saw-Fit कहा।

Continental Drift

(3) साइबेरिया, ग्रीनलैण्ड, कनाडा में कोयला का पाया जाना तथा केन्या, युगांडा, ब्राजील के मध्य भाग में बोल्डर क्ले का पाया जाना।

(4) सभी महाद्वीपों पर गलोसॉप्टेरिस एवं रेन्डियर का पाया जाना।

(5) लेमिंग नामक जंतु का पश्चिम की ओर भागने की प्रवृति।

(6) सभी महाद्वीपों को कम्प्यूटर पर टूटे हुए प्लेट के समान जोड़ा जा सकता है।

आलोचना

वेगनर मूलतः जलवायुवेता एवं भूगर्भशास्त्री थे जो जलवायु परिवर्तन का अध्ययन न कर महाद्वीप के विस्थापन का अध्ययन करने लगे।

इनके द्वारा प्रस्तुत महाद्वीपीय विस्थापन का कारक बल पर्याप्त नहीं है।

आस्ट्रेलिया का उ० पू० में प्रवाहित होना इस सिद्धांत के विरुद्ध है।

प्लेट विवर्तनिकी के अनुसार विस्थापन महाद्वीपों का नहीं बल्कि प्लेटों का हो रहा है।

इनके अनुसार महाद्वीप सियाल एवं महासागर सीमा से निर्मित है जो गलत है।

इनके अनुसा सियाल सीमा प निर्बाध रूप से तैर रही है परंतु मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति के लिए सीमा द्वारा अवरोध बताता है जो विरोधाभाषी है।



महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



1. महाद्वीप और महासागर किस श्रेणी के उच्चावच हैं?

[A] प्रथम श्रेणी
[B] द्वितीय श्रेणी
[C] तृतीय श्रेणी
[D] चतुर्थ श्रेणी

[read more] [A] प्रथम श्रेणी [/read]

2. पृथ्वी के धरातल के कितने प्रतिशत भाग पर महाद्वीपों का विस्तार पाया जाता है?

[A] 25.5
[B] 29.2 
[C] 35.6 
[D] 40.7

[read more] [B] 29.2  [/read]

3. महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धान्त के प्रणेता हैं-

[A] ग्रेगरी
[B] प्राट
[C] वेग्नर
[D] होम्स

[read more] [C] वेग्नर [/read]

4. कार्बोनिफेरस युग में विश्व में सम्पूर्ण महाद्वीप आपस में मिले हुए थे, यह किसकी मान्यता है?

[A] वेग्नर
[B] डाना
[C] जेफ्रीज
[D] होम्स

[read more] [A] वेग्नर [/read]

5. प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त किस वर्ष प्रस्तुत किया?

[A] 1875
[B] 1965
[C] 1875
[D] 1960

[read more] [D] 1960 [/read]

6. प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किसने किया था?

[A] हैरी हैस
[B] टेलर
[C] जेफ्रीज
[D] डाना

[read more] [A] हैरी हैस [/read]

7. वेग्नर के अनुसार महाद्वीपीय विस्थापन जिस दिशा में हुआ, वह है-

[A] भूमध्य रेखा व उत्तरी ध्रुव
[B] भूमध्य रेखा व पश्चिमी
[C] भूमध्य रेखा व दक्षिणी ध्रुव
[D] भूमध्य रेखा व पूर्व

[read more] [B] भूमध्य रेखा व पश्चिमी [/read]

8. वेग्नर के अनुसार पेंजिया का विखण्डन किस युग में प्रारम्भ हुआ?

[A] कैम्ब्रियन
[B] प्रीकैम्ब्रियन
[C] कार्बोनिफेरस
[D] पर्मियन

[read more] [C] कार्बोनिफेरस [/read]

9. वेग्नर के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

[A] कार्बोनिफेरस युग में विश्व के सभी महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे जिसे उन्होंने पेंजिया कहा।
[B] पेंजिया टेथिस सागर नामक महासागर से घिरा हुआ था।
[C] उत्तरी अमेरिका, यूरोप आदि अंगारालैंड के भाग थे।
[D] अंटार्कटिका गोण्डवानालैंड का अंग था।

[read more] [B] पेंजिया टेथिस सागर नामक महासागर से घिरा हुआ था। [/read]

10. महाद्वीपीय विस्थापन को स्पष्ट करने वाला नवीनतम सिद्धान्त कौन है?

[A] टेलर की महाद्वीपीय विस्थापन परिकल्पना
[B] वेग्नर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त
[C] चतुष्फलक परिकल्पना
[D] प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त

[read more] [D] प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त [/read]

4. Chief Governor General and Viceroy (प्रमुख गवर्नर जनरल एवं वायसराय)

4. Chief Governor General and Viceroy

(प्रमुख गवर्नर जनरल एवं वायसराय)



1. बंगाल का पहला गवर्नर जनरल था

➤ वारेन हेस्टिंग्स (1774-75 ई०) 

2. बंगाल में द्वैध शासन की व्यवस्था की

➤ रार्बट क्लाइव ने

3. बंगाल के गवर्नर को गवर्नर जनरल कहा जाने लगा

➤ रेक्यूलेटिंग एक्ट 1773 ई० के अनुसार

4. गीता का अंग्रेजी में अनुवाद किया था

➤ विलियम विलकिन्स ने

5. द एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की स्थापना की थी

➤ सर विलियम जोंस ने 1784 ई० में

6. सिविल सेवायें प्रारंभ की थी

➤ लॉर्ड कार्नवालिस ने

7. भारत में नागरिक सेवा का जनक माना जाता है

➤ कॉर्नवालिस को

8. भारत में सहायक संधि का प्रयोग किया था

➤ फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले ने

9. कलकता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की थी

➤ लॉर्ड वेलेजली ने

10. स्वयं को बंगाल का शेर कहा करता था

➤ लॉर्ड वेलेजली

11. भारत का पहला गवर्नर जेनरल था

➤ लॉर्ड विलियम बैटिक

12. सती प्रथा को समाप्त किया था

➤ लॉर्ड विलियम बैंटिक ने 1829 ई० में

13. अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाया गया

➤ मैकाल की अनुशंसा पर 

14. भारतीय प्रेस का मुक्तिदाता कहा जाता है

➤ चार्ल्स मेटकॉफ को 

15. प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध महत्त्वपूर्ण घटना है

➤ लॉर्ड ऑकलैण्ड के समय की 

16. प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (1839-42 ई०) समाप्त हुआ

➤ लॉर्ड एलिनबरो के समय

17. नरबलि पर प्रतिबंध लगाया था

➤ लॉर्ड हार्डिंग ने

18. शिक्षा संबंधी सुधारों में बुड डिस्पैच को लागू किया था

➤ लॉर्ड डलहौजी ने  सन् 1854 ई० में 

19. भारत में रेलवे का जनक माना जाता है

➤ लॉर्ड डलहौजी को 

Chief Governor General

लॉर्ड डलहौजी

20. भारत में सिविल सेवाओं की शुरुआत किसने की थी?

➤ लार्ड कार्नवालिस ने

21. भारत में कम्पनी द्वारा नियुक्त अंतिम गवर्नर जनरल तथा भारत का प्रथम वायसराय था

➤  लॉर्ड कैनिंग

22. विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित हुआ

➤ लॉर्ड कैनिंग के समय 1856 ई० में   

23. बहावी आन्दोलन का दमन किया था

➤ लॉर्ड ऐल्गिन ने

24. वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट को पारित कर समाचार पत्रों पर कठोर प्रतिबंध लगाया था

➤ मार्च 1878 में लॉर्ड लिटन ने

25. वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट को समाप्त किया था

➤ लॉर्ड रिपन ने 1882 ई० में

26. सिविल सेवा में प्रवेश की आयु को 19 वर्ष से बढ़ाकर 21 वर्ष किया था

➤ लॉर्ड रिपन ने

27. भारत में प्रथम जनगणना हुई थी

➤ लॉर्ड मेयो के समय 1872 में

28. भारत में नियमित जनगणना करवायी गयी

➤ लॉर्ड रिपन के समय 1881 में

29. लॉर्ड रिपिन को ‘भारत के उद्धारक’ की संज्ञा दी

➤ फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने

30. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई थी

➤ लॉर्ड डफरिन के समय

31. 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ

➤ लॉर्ड कर्जन के समय

32. 1911 में बंगाल विभाजन को रद्द करने की घोषणा की गयी थी

➤ लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय के समय

33. 28 जुलाई, 1914 ई० को प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ था

➤ लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय के समय

34. 1919 में रॉलेट एक्ट तथा 1917 में शिक्षा पर सैडलर आयोग का गठन हुआ था

➤ लॉर्ड चेम्सफोर्ड के शासन में

35. 13 अप्रैल, 1919 ई. को जालियाँवाला बाग हत्या कांड के समय गवर्नर जनरल था

➤ लॉर्ड चेम्सफोर्ड

36. चौरी-चौरा काण्ड (5 फरवरी, 1922 ई०) के समय गवर्नर जनरल था

➤ लॉर्ड रीडिंग

37. 1 सितम्बर, 1939 को द्वितीय युद्ध प्रारंभ के समय गवर्नर जनरल था

➤ लॉर्ड लिनलिथगो

38. ब्रिटिश भारत का अंतिम तथा स्वतंत्र भारत का प्रथम गवर्नर जनरल था

➤ लॉर्ड माउण्टबेटन

39. 1857 के क्रांति के समय गवर्नर जनरल था

➤ लॉर्ड कैनिंग

40. 1907 में सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के विभाजन के समय गवर्नर जनरल था

➤ लॉर्ड मिण्टो द्वितीय

41. ब्रिटिश शासन काल का स्वर्णयुग कहा जाता है

➤ लार्ड रिपन के शासन काल को

42. भारत में पहली बार डाक टिकट प्रचलन आरंभ तथा पोस्ट ऑफिस एक्ट पारित हुआ था

➤ लॉर्ड डलहौजी के समय

43. पंजाब का प्रसिद्ध कूका आन्दोलन हुआ था

➤ लॉर्ड नार्थब्रुक के समय

44. स्थानीय स्वशासन की शुरुआत की थी

➤ लॉर्ड रिपन ने

45. भा में लोक सेवा का जनक कहा जाता है।

➤ लॉर्ड कार्नवालिस को

46. भारतीय सिविल सेवा में प्रथम व्यक्ति कौन चुना गया था?

➤ सत्येन्द्र नाथ टैगो

3. Indian National Congress and Mahatma Gandhi (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं महात्मा गाँधी)

3. Indian National Congress and Mahatma Gandhi

(भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं महात्मा गाँधी)


1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई थी

28 दिसम्बर 1885 ई को बम्बई में (गोकुलबास तेजपाल संस्कृत कॉलेज भवन में)

2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक थे

ए० ओ० झूम (स्कौटलैण्ड निवासी)

3. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष थे

व्योमेश चन्द्र बनर्जी

4. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम महिला अध्यक्ष थी

श्री मती एनी बेसेंट (कलकता अधिवेशन, 1917)

5. कांग्रेस के प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष थे

बदरूद्दीन तैयबजी (1887, मद्रास अधिवेशन) 

6. कांग्रेस के प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष थे

जार्ज यूले (1888, इलाहाबाद अधिवेशन)

7. कांग्रेस में प्रथम फुट पड़ी थी

सूरत अधिवेशन, 1907 में (अध्यक्ष डॉ रास बिहारी घोष)

8. कांग्रेस का पुन: मिलन हुआ था

लखनऊ अधिवेशन (1916 में)

9. कांग्रेस की स्थापना के समय भारत का वायसराय था

लार्ड डफरिन

10. कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में शामिल सदस्यों की संख्या थी

➤ 72 

11. कांग्रेस के एक मात्र अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता महात्मा गांधी ने की थी

बेलगाँव अधिवेशन (कर्नाटक, 1924 में)

12. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष थी

सरोजनी नायडू (1925, कानपुर अधिवेशन)

13. पहली बार ‘स्वराज्य’ की माँग दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में की गई थी

1906 के कलकता अधिवेशन में

14. ‘पूर्ण स्वराज्य’ का मांग जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में की गई थी

1929 के कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में

15. जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का एक मात्र अधिवेशन जो गाँव में हुआ था

1937 का फैजपुर अधिवेशन 

16. जब भारत आजाद हुआ, उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे

जे० बी० कृपलानी 

17. महात्मा गांधी (मोहनदास करमचन्द गांधी) का जन्म हुआ था

2 अक्टूबर 1869 को पोरबन्दर (गुजरात) में

18. गांधीजी दक्षिण अफ्रिका गये थे

1893 में (एक मुकदमें के पैरवी के लिए)

19. गांधीजी दक्षिण अफ्रिका से भारत आये थे

1915 ई० में

20. गांधीजी के राजनीतिक गुरु थे

गोपाल कृष्ण गोखले

21. गांधीजी ने ‘सत्याग्रह’ का सर्वप्रथम प्रयोग किया था

द० अफ्रिका में (1906 में)

22. गांधीजी ने भारत में सत्याग्रह का पहला प्रयोग किया था

बिहार के चम्पारण में (1917 ई. में)

23. गांधीजी को सर्वप्रथम ‘महात्मा की उपाधि’ दी थी

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने

24. गांधीजी ने खिलाफत आन्दोलन का नेतृत्व किया था

1920 ई० में

25. गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन की शुरूआत की थी

1 अगस्त, 1920 को

26. गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्राप्त ‘कैसर-ए-हिन्द’ के उपाधि को लौटा दिया था

1920 में (जलियावाला बाँग हत्याकांड के विरोध में)

27. ‘यंग इंडिया’ एवं ‘नवजीवन’ समाचार पत्रों की स्थापता गांधीजी ने की थी

1919 ई० में

28. मई 1942 में प्रस्तुत क्रिप्स प्रस्ताव को ‘पोस्टडेटेड चेक’ कहा था

गांधी जी ने

29. गांधी जी ने ‘नमक कानून’ तोड़ने के लिए डांडी यात्रा (साबरमती से) की थी

12 मार्च 1930 को 78 स्वयंसेवकों के साथ

30. ‘करो या मरो’ का नारा गांधीजी ने ‘भारत छोड़ों आन्दोलन’ के दौरान दिया था

8 अगस्त 1942 को

31. गांधी-इरविन या दिल्ली समझौता हुआ था

5 मार्च 1931 को

32. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (17 सितम्बर 1931) में कांग्रेस का नेतृत्व किया था

गांधीजी ने

33. गांधीजी और अम्बेदकर के बीच ‘पूना पैक्ट’ हुआ था

26 सितम्बर 1932 को

34. गांधीजी को गिरफ्तार कर रखा गया था

आगा खाँ पैलेस (पूना) में

Indian National Congress

आगा खाँ पैलेस (पूना) में

35. ‘हरमिट ऑफ शिमला’ कहा जाता है

ए. ओ. ह्यूम को

36. महात्मा गांधी का अंतरात्मा रक्षक (कन्साइन्स कीपर) कहा जाता है

रविन्द्रनाथ टैगोर को

37. महात्मा गांधी को अर्द्धनग्न फकीर (नंगा फकीर) कहा था

बिस्टन चर्चिल ने

38. गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन किया था

1930 में

39. गांधी जी चम्पाण गये थे

राजकुमार शुक्ल के आग्रह प

40. सर्वप्रथम महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ कहा था

सुभाष चन्द्र बोस ने (1944 में)

41. गांधीजी की मृत्यु (समाधि स्थल-राजघाट) हुई थी

30 जनवरी 1948 को (नाथुराम गोड्से द्वारा हत्या)

2. Medieval Indian History (मध्यकालीन भारतीय इतिहास)

2. Medieval Indian History

(मध्यकालीन भारतीय इतिहास)



1. गुलाम वंश की स्थापना 1206 ई० में किया था

➤ कुतुबुद्दीन ऐबक ने (राजधानी- लाहौर)

2. कुतुबमीनार की नींव डाली थी

➤ कुतुबुद्दीन ऐबक ने (पुरा किया- इल्तुतमिश ने)

3. ढ़ाई दिन का झोपड़ा (अजमेर में) नामक मस्जिद का निर्माण कराया था

➤ कुतुबुद्दीन ऐबक ने

4. लाख बख्श (लाखों का दान देने वाला) के नाम से प्रसिद्ध था

➤ कुतुबुद्दीन ऐबक

5. दिल्ली सल्तनत की प्रथम मुस्लिम महिला शासक थी

➤ राजिया सुल्तान (इल्तुतमिश की पुत्री)

6. नालंदा विश्वविद्यालय को ध्वस्त करने वाला था

➤ बख्तियार खिलजी (ऐबक का सहायक)

7. 1210 ई० में कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु हुई थी

➤ चौगन खेलते समय (दफनाया गया लाहौर में)

8. लाहौर से राजधानी को स्थानान्तरित कर दिल्ली ले गया था

➤ इल्तुतमिश ने

9. भारत में इस्लामी पद्धति पर आधारित प्रथम मस्जिद था

➤ कुव्वत-उल-इस्लाम (निर्माणकर्ता ऐबक)

10. दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है

➤ इल्तुतमिश को

11. कुतुबमीनार का निर्माण किया गया था

➤ ख्वाजा बख्तियार काकी की स्मृति में

12. शुद्ध अरबी (टका) सिक्के चलाने वाला पहला तुर्क सुल्तान था

➤ इल्तुतमिश

13. दिल्ली सल्तनत में इक्तेदारी प्रथा चलाने वाला प्रथम शासक था

➤ इल्तुतमिश

14. गुलाम वंश का अंतिम शासक था

➤ शम्सुद्दीन कैमुर्स

15. टोपी सीकर अपना जीवन निर्वाह करने वाला सुल्तान था

➤ नासीरूद्दीन महमूद

16. ‘लौह एवं रक्त’ की नीति का पालन किया था

➤ बलबन ने

17. खिलजी वंश का संस्थापक था

➤ जलालुद्दीन खिलजी

18. घोड़ा दागने एवं सैनिको की हुलिया रखने की प्रथा शुरू की थी

➤ अलाउद्दीन खिलजी ने

19. अलाउद्दीन खिलजी का दरबारी कवि था

➤ अमीर खुसरो

20. अलाउद्दीन का खिलजी का मूल नाम था

➤ अली एवं गुर्शास्प (बचपन का नाम) 

21. स्वयं को खलीफा घोषित करने वाला दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था

➤  मुबारक खिलजी (अलाउद्दीन का पुत्र)

22. तुगलक वंश का संस्थापक था

➤ ग्यासुद्दीन तुगलक

23. सिंचाई के लिए कुएँ एवं नहरों का निर्माण करवाया था

➤ ग्यासुद्दीन ने

24. पागल बादशाह, स्वप्न शील एवं रक्त पिपासु कहा जाता है

➤ मुहम्मद बिन तुगलक को

25. अफ्रीकी यात्री इब्नबतुता भारत आया था

➤ मुहम्मद बिन तुगलक के समय

26. विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ई० में किया था

➤ हरिहर एवं बुक्का ने (मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में)

27. ब्राह्मणों पर जजिया कर लगाने वाला पहला मुसलमान शासक था

➤ फिरोज तुगलक

28. तुगलक वंश का अंतिम सुल्तान था

➤ नासिरूद्दीन महमूद

29. सैय्यद वंश का संस्थापक था

➤ खिज्र खाँ

30. सर्वप्रथम ‘शाह’ की उपाधि धारण किया था

➤ मुबारक खाँ ने (खिज्र खाँ का पुत्र)

31. सैय्यद वंश का अंतिम सुल्तान था

➤ अलाउद्दीन आलमशाह

32. लोदी वंश का संस्थापक था

➤ बहलोल लोदी (1451 ई० में)

33. दिल्ली पर प्रथम अफगान राज्य की स्थापना का श्रेय जाता है

➤ बहलोल लोदी को

34. 1504 ई० में आगरा शहर की स्थापना की थी

➤ सिकन्दर लोदी ने

35. विजयनगर की राजधानी थी

➤ हम्पी (कर्नाटक) में

36. पानीपत का प्रथम युद्ध इब्राहीम लोदी और बाबर के बीच हुआ था

➤ 21 अप्रैल 1526 ई० को (विजयी बाबर)

37. दिल्ली सल्तनत की राजकीय भाषा था

➤ फारसी

38. तेनालीराम दरबारी थे

➤ कृष्णदेव राय (आंध्र प्रदेश) के

39. अमीर खुसरों के गुरू थे

➤ निजामुद्दीन औलिया

40. विजय नगर साम्राज्य के खंडहर अवस्थित है

➤ तुंगभद्रा नदी के तट पर

41. इटली यात्री निकोलोकाण्टी विजयनगर की यात्रा पर आया था

➤ देवराय प्रथम के काल में

42. कृष्णदेव राय के दरबार में ‘अष्टू दिग्गज थे

तेलुगु साहित्य के 8 सर्वश्रेष्ठ कवि

43. हजारा एवं विठ्ठलस्वामी मंदिर का निर्माण करवाया था

कृष्णदेव राय ने

44. तालीकोटा का युद्ध हुआ था

25 जनवरी 1565 में

45. तालीकोटा के युद्ध में विजयनगर का नेतृत्व किया था

राम राय ने

46. तुलुव वंश का अंतिम शासक था

सदाशिव

47. बहमनी साम्राज्य का संस्थापक था

अलाउद्दीन बहमनशाह (हसन गंगू)

48. बहमनी साम्राज्य की राजधानी थी

गुलबर्गा

49. जामा मस्जिद  (उत्तर प्रदेश के जौनपुर में) का निर्माण किया था

हुसैनशाह  शर्की के द्वारा (1470 ई. में)

Medieval Indian

जामा मस्जिद  (उत्तर प्रदेश के जौनपुर में)

50. महाभारत एवं राजतरंगिनी को फारसी में अनुबाद करवाया था

जैन-ऊल-आबदीन (कश्मीर का अकबर) ने

51. मांडू के किले का निर्माण करवाया था

हुशंगशाह ने

52. राणा कुम्भा ने 1448 ई० में निर्माण करवाया था

विजय स्तंभ (चित्तौड़ में)

53. खानवा का युद्ध 17 मार्च 1527 ई. में हुआ था

राणा सांगा और बाबर के बीच (विजयी बाबर)

54. 1576 ई. में हल्दीघाटी का युद्ध हुआ था

राणा प्रताप एवं अकबर के बीच (विजयी अकबर)

55. मेवाड़ की राजधानी थी

चित्तौड्ङ्गव

56. गुरुनानक का जन्म हुआ था

1469 ई. में (पंजाब के तलवंडी स्थान पर)

57. चैतन्य स्वामी का जन्म (1486 ई. में) हुआ था

नदिया (बंगाल) में

58. मुगलवंश का संस्थापक था

बाबर

59. माघर (वास्तविक नाम जहीरूदीन मुहम्मद बाबर) का जन्म हुआ था

24 फरवरी 1483 ई० को (फरगना में) 

60. बाबर को भारत पर आक्रमण करने का नियंत्रण दिया था

पंजाब के शासक दौलत खाँ लोदी ने

61. बाबर के तोपची थे

उस्ताद अली और मुस्तफा

62. भारत में बाबर का अंतिम युद्ध (अफगानों एवं बाबर के बीच) था

घाघरा का युद्ध (6 मई 1529 ई- को)

63. तोपखाने का प्रयोग बाबर में पहली बार किया था

पानीपत के प्रथम युद्ध में

64. बाबर ने गाजी को उपाधि धारण की थी

खानवा के युद्ध में

65. बाबर के विजय का मुख्य कारण था

तोपखाने का प्रयोग

66. बाबर (पिता-उमरशेख ‘मिर्जा’) की मृत्यु हुई थी

1530 ई में (दफनाया गया आगरा के अरामबाग में)

67. तुगलमा युद्ध नीति (उस्मानी एवं रूपी विधि) एवं बारूद का सर्वप्रथम प्रयोग किया था

बाबर ने

68. बाबरनामा (बाबर की आत्मकथा) की रचना की थी

बाबर ने

69. बाबरनामा का अनुवाद फारसी भाषा में किया था

अब्दुल रहीम खान खाना

70. बाबरनामा का अंग्रेजी में अनुवाद किया था

 सी० एस० बेवरीज ने

71. हुमायूँ का जन्म हुआ था

1508 ई० में (काबूल में)

72. चौसा का युद्ध (25 जून 1539 ई० को) हुआ था

शेरशाह एवं हुमायूँ के बीच (विजयी शेरशाह)

73. 1 जनवरी 1556 ई. को हुमायूँ की मृत्यु हुई थी

पुस्तकालय की सोड़ियों से गिरने से

74. हुमायूँनामा की रचना की थी

गुलबदन बेगम ने

75. सप्ताह के सातों दिन सात रंग के कपड़े पहनने के नियम बनाए

हुमायूँ ने

76. शेरशाह (बचपन का नाम फरीद खाँ) का जन्म हुआ था

1472 ई. में बजवाड़ा (होशियारपुर) में

77. शेरशाह की मृत्यु (कालिंजर जीतने के क्रम में) हुई थी

22 मई, 1545 ई० को

78. शेरशाह का मकबरा स्थित है

सासाराम (बिहार) में

79. कबूलियत एवं पट्टा प्रथा की शुरूआत की थी

शेरशाह ने

80. पाटलिपुत्र को पटना के नाम से पुनः स्थापित किया था

शेरशाह ने (1541 ई. में)

81. ग्रांड ड्रंक रोड का निर्माण करवाया था

शेरशाह ने

82. अकबर (वास्तविक नाम जलालउदीन मुहम्मद अकबर) का जन्म हुआ था

15 अक्टूबर, 1542 ई को अमरकोट (पाकिस्तान) में

84. अकबर का संरक्षक था

बैरम खाँ ने कलानौर में

83. अकब का राज्याभिषेक 14 फरवरी, 1556 ई० को सम्पन्न करवाया था

बैम खाँ (1556 से 1560 ई.)

85. पापीपत की दूसरी लड़ाई अकबर एंव हेमू के बीच हुई थी

5 नवम्बर 1556 ई० को

86. बैरम खाँ की हत्या (मक्का तीर्थ यात्रा के दौरान) की थी

मुबारक खाँ ने

87. हल्दी घाटी का युद्ध मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप एवं अकबर के बीच हुआ था

18 जून, 1576 ई० को

88. अकबर के सेनापति का नाम था

मान सिंह

89. फतेहपुर सीकरी का निर्माण करवाया और राजधानी बनाया था

अकबर ने (1571 ई० में)

90. दास प्रथा (1562 ई० में), जजिया कर (1564 में) तथा तीर्थयात्रा कर (1563 में) को समाप्त या अंत किया था

अकबर ने

91. अकबर का राजस्व मंत्री था

टोडरमल

92. अकबर ने इबादतखाने की स्थापना की थी

1575 ई० में

93. दीन-ए-इलाही (स्थापना – 1582) तथा इलाही संवत् (शुरूआत – 1583) की शुरूआत किया था

अकबर ने

94. अकबर के दरबार का प्रसिद्ध संगीतकार एवं चित्रकार था

क्रमशः तानसेन एवं अब्दुसमद

95. अकबर के दरबार में राजकवि था

फैजी (अबुल फजल का बड़ा भाई)

96. अकबरनामा ग्रंथ की रचना की थी

अबुल फजल ने

97. अकबर की शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषता थी

मनसबदारी प्रथा

98. अकबर के समकालीन प्रसिद्ध सुफी संत थे

संत शेख सलीम चिश्ती

99. अकबर को दफनाया गया था

सिकन्दरा के निकट

100. संगीत सम्राट तानसेन (बचपन का नाम रामतनु पाण्डेय) का जन्म हुआ था

ग्वालियर में

101. तानसेन, बैजू बाबरा प्रसिद्ध गायक थे

अकबर के शासनकाल में

102. ‘दीन-ए-इलाही’ धर्म को अपनाने वाला प्रथम एवं अंतिम हिन्दू व्यक्ति था

बीरबल (बचपन का नाम महेश दास)

103. मुगलों की राजकीय भाषा थी

फारसी

104. बुलन्द दरवाजा का निर्माण करवाया था

अकबर ने (गुजरात विजय के उपलक्ष्य में)

105. अकबर का दरबार सुशोभित था

नवरत्न से

106. अकबर ने ‘शीरी कलम’ तथा ‘जड़ी कलम’ की उपाधि दिया था

अब्दुसमद तथा मुहम्मद हुसैन कश्मीरी को

107. हिन्दी साहित्य के ‘स्वर्णकाल’ कहा जाता है

अकबर के काल को

108. हुमायूँ के मकबरे का निर्माण करवाया था

हाजी बेगम (1564 में) ने

109. हुमायूँ के मकबरे का प्रसिद्ध वास्तुकार था

मिरक-मिर्जा-ग्यास-वेग

110. आगरा का किला (दिल्ली में) निर्माण हुआ था

कासिम खाँ के नेतृत्व में

111. ‘न्याय की जंजीर’ के लिए याद किया जाता है

जहाँगीर को

112. सिखों के 5 वें गुरू अर्जुन देव को फांसी दिलवा दी थी

जहाँगीर ने

113. जहाँगीर के मकबरे का निर्माण लाहौर में शहादरा के पास कराया था

नूरजहाँ ने (वास्तविक नाम मेहरूनिसा)

114. गुलाब से इत्र निकालने की विधि खोजी थी

अस्मत बेगम (नूरजहाँ की माँ) ने

115. यूरोपीय यात्री सर टॉमस रो, कैप्टन हॉकिन्स, विलियम किंग आये थे

जहाँगीर के शासनकाल में

116. ‘चित्रकला का स्वर्णकाल’ कहा जाता है

जहाँगीर के काल को

117. उस्ताद मंसूर (पक्षियों एवं पुष्पों का चितेरा) विख्यात चित्रकार था

जहाँगीर के समय

118. शाहजहाँ (खुर्रम) का जन्म हुआ था

5 जनवरी, 1592 ई. को (लाहौर में)

119. ताजमहल का निर्माण करने वाला मुख्य स्थापत्य कलाकार था

उस्ताद अहमद लाहौरी

120. ‘स्थापत्य कला का स्वर्णयुग’ कहा जाता है

शाहजहाँ के शासनकाल को

121. दिल्ली के लाल किला, जामा मस्जिद तथा मयूर सिंहासन का निर्माण करवाया था

शाहजहाँ ने

122. ‘जिन्दा-पीर’ कहा जाता था

औरंगजेब को

123. सिखों के 9 वें गुरू तेगबहादुर की हत्या करवा दी थी

औरंगजेब ने

124. झरोखा दर्शन की प्रथा तथा नौरोज मनाने पर रोक लगाई थी

औरंगजेब ने

125. हिन्दू मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया था

औरंगजेब ने (1699 ई० में)

126. जयसिंह एवं शिवाजी के बीच पुरन्दर की संधि हुई थी

22 जून 1665 ई० को

127. शिवाजी को औरंगजेब ने कैद कर रखा था

आगरा के जयपुर भवन (16 मई 1966 ई०) में

128. जजिया कर को पुनः लागू किया था

औरंगजेब ने (1679 ई० में)

129. औरंगजेब ने ‘बीबी का मकबरा’ का निर्माण 1679 ई० में करवाया था

औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में

130. लाल किले के मोती मस्जिद को बनवाया था

औरंगजेब ने

131. ताजमहल की फूहड़ नकल कहा जाता है

बीबी के मकबरा को

132. भारत को दारूल हर्ष (काफिरों का देश) से दारूल इस्लाम (इस्लाम का देश) बनाना चाहता था

औरंगजेब

133. औरंगजेब की मृत्यु (1707) होने के बाद उसे दफनाया गया था

दौलताबाद में

134. सवार पद में दुअस्पा एवं सिंह-अस्पा की व्यवस्था की थी

जहाँगीर ने

135. मराठा साम्राज्य का संस्थापक शिवाजी का जन्म हुआ था

1627 ई० में शिवनेर दुर्ग (चुन्नार के समीप) में

136. शिवाजी के पिता तथा माता का नाम था

शाहजी भोंसलें एवं जीजाबाई

137. शिवाजी के गुरू एवं संरक्षक थे

दादाजी कोण्डदेव

138. शिवाजी ने अपनी राजधानी बनायी थी

रायगढ़ को (1656 ई० में)

139. शिवाजी के मंत्रिमंडल (अष्ट्प्रधान) में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पद था

पेशवा (प्रधानमंत्री)

140. 16 जून, 1674 ई० को शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक करवाया था

➤ श्री गंगाभट्ट द्वारा (रायगढ़ में)

141. रैयतवाड़ी प्रथा (एक भूमि कर प्रणाली) को चलाया था

शिवाजी ने

142. शिवाजी के काल में ‘चौथ’ और ‘सरदेशमुखी’ था

एक कर

143. मराठा राज्य का दूसरा संस्थापक माना जाता है

बालाजी विश्वनाथ को

144. शिवाजी की मृत्यु (1680) के बाद उनका उत्तराधिकारी था

शम्भा जी

145. दिल्ली पर आक्रमण करने वाला पहला पेश्वा था

बाजीराव प्रथम

146. अंतिम पेशवा था

बाजीराव-।।

147. महाभारत का अनुवाद रज़्मनामा नाम से फारसी में किया था

बदायूनी, नकीब खाँ तथा अब्दुल कादिर ने

148. तख्ते ताऊस (मयूर सिंहासन) पर बैठने वाला अंतिम शासक था

मुहम्मदशाह

149. अंतिम मुगल शासक था

बहादुर शाह जफर द्वितीय

150. ‘रंगीला बादशाह’ कहा जाता है

मुहम्मद शाह को

151. मुगल वंश का ‘घृणित कायर’ कहा गया है

फारूखसियर को

152. ‘लम्पट मूर्ख’ कहा जाता था

जहाँदार शाह को

153. शिवाजी की पैदल सेवा को कहा जाता था

पाईक

154. अवध का अंतिम नवाब था

वाजिद अली शाह

155. लखनऊ से पहले अवध की राजधानी थी

फैजाबाद

156. शिवाजी को ‘राजा’ की उपाधि दी थी

औरंगजेब ने (1667 ई० में)

157. पानीपत का तीसरा युद्ध अहमदशाह अब्दाली और मराठों के बीच हुआ था

1761 ई० में (हार-मराठा की)

158. पेशवा का पद वंशानुगत हो गया

बालाजी विश्वनाथ के समय से

159. कश्मीर के ‘निशात बाग’ तथा लाहौर का ‘शालीमार बाग’ का निर्माण करवाया था

बाबर ने

160. ‘राजत्व का नया सिद्धांत’ दिया था

बलवन ने

161. बहादुर शाह का उपनाम था

शाह-बेखबर

162. ‘रंगीला बादशाह’ कहा जाता था

मुहम्मद शाह को 

163. ‘ईरान का नेपोलियन’ कहा जाता है

नादिरशाह को

164. सिखों के 9वें गुरू तेगबहादुर को फाँसी की सजा दी थी

औरंगजेब ने

165. अंग्रेजों द्वारा बंदी बनाकर बहादुरशाह जफर द्वितीय को भेजा गया था

रंगून में

166. अहमदशाह अब्दाली का वास्तविक नाम था

अहमद खाँ

167. तानसेन के गुरू थे

बाबा हरिदास (गायन एवं शास्त्रीय संगीत)

168. ‘पूर्व का रॉफेल’ कहा जाता है

वेहजाद को

169. बाबर का मकबरा है

काबूल (आफगानिस्तान में)

12. Suez Canal Trade Route (स्वेज नहर व्यापारिक मार्ग)

12. Suez Canal Trade Route

(स्वेज नहर व्यापारिक मार्ग)



 परिचय

      स्वेज नहर एक मानव निर्मित अर्थात् कृत्रिम नहर है जो कि भूमध्य सागर और लाल सागर को आपस में जोड़ती है। यह नहर सम्पूर्ण विश्व के लिए एक छोटा व्यापारिक मार्ग उपलब्ध कराता है। इस नहर के बनने से यूरोप, एशियाई देशों, ऑस्ट्रेलिया और पूर्वी अफ्रीकी देशों के बीच व्यापार में आशातीत प्रगति हुआ है।

स्वेज नहर

स्वेज नहर का निर्माण

     स्वेज नहर का निर्माण  सन 1859 ई० में एक फ्रांसीसी इंजीनियर फर्डिनेंड ने शुरू किया था। इस नहर के बनने और शुरु होने में लगभग 10 वर्ष का समय लग गए थे। यातायात के लिए यह 1869 ई० में खोला गया। इस नहर के बनने में लगभग 1,20,000 मजदूर हैजा तथा अन्य बीमारियों से काल कवलित हो गए थे अर्थात यह नहर काफी अधिक त्याग और तपस्या से बनी थी।

स्वेज नहर की संरचना

     यह नहर की लम्बाई 168 किमी०, चौडाई 60 मीटर और गहराई 10 से 15 मीटर है। इस नहर के भूमध्य सागर वाले उत्तरी छोर पर पोर्ट सईद तथा लाल सागर वाले दक्षिणी छोर पर पोर्ट तौफीक, स्वेज और पोर्ट इब्राहीम स्थित है।

Suez Canal

जहाजों का परिचालन

      नहर को 1869 ई० में यातायात के लिए खोल दिया गया। शुरूआत में केवल दिन में ही जहाज नहर को पार करते थे परंतु  बाद में 1888 ई० से रात में भी पार होने लगे। 1866 ई० में इस नहर के पार होने में 36 घंटे समय लगते थे परंतु आज सिर्फ 10 से 12 घंटे का समय लगता है। इस नहर में प्रतिदिन 24 जलयान ही आवागमन कर सकते हैं। जलयानों की चाल 11 से 15 किलोमीटर प्रति घंटा के बीच होती है। इससे ज्यादा गति होने पर इस नहर के दोनों किनारों को नुकसान पहुँचने का डर रहता है।

स्वेज नहर से लाभ

     स्वेज नहर के पहले यूरोप से आने वाले जहाजों को उत्तमाशा अंतरीप का चक्कर लगाना पड़ता था जो कि काफी लंबी दूरी वाला जलमार्ग है। अब उन्हें सीधे भूमध्य सागर से होकर स्वेज नहर होते हुए लाल सागर में प्रवेश करना पड़ता है जो अपेक्षाकृत एक बेहद छोटा मार्ग है। स्वेज नहर मार्ग के कारण यूरोप से एशिया और पूर्वी अफ्रीका का सीधा मार्ग खुल गया है और इससे लगभग 6000 मील की दूरी की बचत होती है। इसके कारण अनेक देशों, पूर्वी अफ्रीका, ईरान, अरब, भारत, पाकिस्तान, सुदूर पूर्व एशिया के देशों ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशों के साथ व्यापार में बड़ी सुविधा हुई है और व्यापार काफी अधिक बढ़ गया है।

     इस नहर के बन जाने से यूरोप एवं सुदूर पूर्व के देशों के मध्य दूरी काफी कम हो गई है जैसे कि ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशों के साथ व्यापार में बड़ी सुविधा हुई है और व्यापार बहुत बढ़ गया है। इस नहर के बन जाने से यूरोप एवं सुदूर पूर्व के देशों के मध्य दूरी काफी कम हो जाती है जैसे कि लिवरपूल से मुंबई- 7250 किमी०, लिवरपूल से हांगकांग- 4500 किमी० तथा न्यूयार्क से मुंबई- 4500 किमी० की दूरी कम होने से एशियाई तथा यूरोपीय देशों के व्यापारिक संबंध प्रगाढ़ हुए हैं।

स्वेज नहर से होने वाले व्यापार

    इस नहर के द्वारा फारस की खाड़ी के देशों से खनिज तेल भारत तथा अन्य एशियाई देशों से अभ्रक, लौह अयस्क, मैगनीज, चाय, कॉफी, जुट, रबड, कपास, ऊन, मसाले, चीनी, चमड़ा, खाल, सागवान की लकड़ी, सूती वस्त्र, हैंडीक्राफ्ट आदि पश्चिम यूरोपीय देशों तथा उत्तर अमेरिका को भेजी जाती हैं।

   यूरोपीय देशों तथा उत्तर अमेरिका आदि देशों से रासायनिक पदार्थ, इस्पात, मशीन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, औषधियाँ, मोटर गाड़ियाँ, वैज्ञानिक उपकरणों आदि का आयात किया जाता है।

स्वेज नहर का स्वामित्व

      इस नहर के निर्माण के बाद इसका प्रबंधन ‘स्वेज कैनाल कंपनी’ करती थी जिसमें आधे का शेयर फ्रांस का था और आधे में तुर्की, मिस्र और अन्य अरब देशों के थे। बाद में तुर्की, मिस्र और अन्य अरब देशों का शेयर अंग्रेजों ने खरीद लिया। 1888 ई० के अंतर्राष्ट्रीय संधि के अनुसार यह नहर सभी देशों के लिए समान रूप से खोल दिया गया परंतु अंग्रेजों ने 1904 ई० में यह संधि तोड़ दी और बाद में 1956 ई० में मिस्र के राष्ट्रपति कर्नल नासिर ने इस नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया और इस प्रकार यह पूर्ण रूप से अब मिस्र के नियंत्रण में आ गया।

निष्कर्ष

     इस प्रकार कहा जा सकता है कि स्वेज नह का विश्व के व्यापार और अर्थव्यवस्था को मजबूत कने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस नहर के निर्माण से न सिर्फ दूरियाँ कम हुई है बल्कि व्यापार भी काफी अधिक बढ़ गए हैं।

11. Panama Canal Trade Route (पनामा नहर व्यापारिक मार्ग)

11. Panama Canal Trade Route

(पनामा नहर व्यापारिक मार्ग)



परिचय

      पनामा नहर एक कृत्रिम अर्थात् मानव निर्मित जलमार्ग है जो पनामा में स्थित है। यह नहर दो विशाल महासागर प्रशांत तथा अटलांटिक को जोड़ने का काम करती है। यह नहर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रमुख जलमार्गों में से एक है।

पनामा नहर का निर्माण

     पनामा नहर का निर्माण पनामा जलडमरुमध्य के आर-पार पनामा नगर एवं कोलोन के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका के द्वारा किया गया जिसके दोनों ही ओर के 8 किलोमीटर क्षेत्र को खरीद कर इसे नहर मंडल का नाम दिया है। यह नहर 72 किलोमीटर लंबी है जो लगभग 12 किलोमीटर लंबी अत्यधिक गहरी कटान से युक्त है। इसकी चौड़ाई 90 मीटर तथा न्यूनतम गहराई 12 मीटर है। इस नहर में कुल 8 जल बंधक तंत्र (Water Locking System) है तथा जलयान पनामा की खाड़ी में प्रवेश करने से पहले इन जल बंधक तंत्रों से होकर विभिन्न ऊँचाई की समुद्री सतह (26 मीटर ऊपर या नीचे) को पार करते हैं।

     नहर का निर्माण 14 अगस्त 1914 ई० को पूरा हुआ और 15 अगस्त 1914 ई० को यह जलयानों के आवागमन के लिए खोल दिया गया था। पनामा नहर के निर्माण में कई सौ वर्षों का समय लगा था। सबसे पहला प्रयास स्पेन के राजा ने 1534 ई० में किया था। इसके बाद में स्कॉटलैंड राज्य द्वारा 1658 ई० में भी प्रयास किया गया था। 1855 ई० में विलियम कनिष नामक इंजीनियर ने संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार के लिए काम करते हुए इस इलाके का सर्वेक्षण किया और अपनी विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। पुनः 1877 ई० में अरमंड रेक्लस नामक फ्रांसीसी सेना इंजिनियर और लूसियान नेपोलियन नामक इंजीनियरों ने मिलकर नहर के निर्माण के लिए सर्वेक्षण किया।

     अंततः नहर निर्माण का कार्य फ्रांस द्वारा 1 जनवरी 1881 ई० को फर्डिनेंडो डी लेपस के नेतृत्व में शुरू किया गया। क्योंकि क्षेत्र का भूगर्भिक और जलवायुविक सर्वेक्षण नहीं किया गया था अतः यहां भयानक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। मच्छरों, बीमारियों और दुर्घटनाओं में लगभग 22000 लोगों की जान चली गई। 1889 ई० में फर्डिनेंडो डी लेपस की कंपनी जब दिवालिया हो गई तब कंपनी को निरस्त कर दिया गया और नहर निर्माण का  कार्य रुक गया। 1894 ई० में पुन: दूसरी कंपनी ने प्रयास किया लेकिन वह भी असफल रहा।

   सबसे अंत में अमेरिकी सरकार ने आगे बढ़ते हुए 1904 ई० में इस नहर का निर्माण का कार्य शुरू किया और 1914 ई० में पूरा किया। इस प्रोजेक्ट में लगभग 37.5 करोड़ डॉलर खर्च हुए। तमाम परिवर्तनों, विवादों और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में इसकी निष्पक्ष स्थिति को बनाए रखने हेतु इस नहर का प्रशासन 31 दिसंबर 1999 को पनामा को सौंप दिया गया।

पनामा नहर की क्षमता

     वर्तमान में पनामा नहर से सिर्फ वही जहाज गुजर सकते हैं जो 1050 फीट लंबा, 110 फीट चौड़ा और 41 फीट गहरा हो। हालांकि आधुनिक जहाज आकार में काफी बड़े हो चुके हैं इसलिए यहाँ नया लॉक सिस्टम बनाया जा रहा है।

पनामा नहर का विस्तार और पुनः व्यापारिक यातायात

      पनामा नहर को विस्तार के बाद 26 जून 2016 को विशाल जहाजों के लिए खोल दिया गया। इसके विस्तार पर करीब 5.4 अरब डॉलर खर्च हुए। चीन के एक विशाल जहाज का कास्को शिपिंग पनामा ने इस विस्तारित नहर का उ‌द्घाटन किया। करीब 9000 कंटेनरों के साथ जहाज ने नहर में प्रवेश किया। नहर में पहले की तुलना में 3 गुना ज्यादा बड़े जहाज गुजर सकेंगे। इससे पनामा नहर प्राधिकरण को 2021 तक सालाना लगभग 2.1 अरब डॉलर का राजस्व प्राप्त होने की उम्मीद है।

पनामा नहर से लाभ

      अमेरिका के पूर्वी और पश्चिमी तटों के बीच की दूरी इस नहर से होकर गुजरने पर तकरीबन 8,000 मील घट जाती है क्योंकि इसके ना होने की स्थिति में जलयानों को दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी छोर केप हॉर्न अंतरीप से होकर चक्कर लगाते हुए जाना पड़ता था। पनामा नहर को पार करने में जलयानों को 8 घंटे का समय लगता है।

     इस नहर के द्वारा समुद्री मार्ग से न्यूयॉर्क एवं सैन फ्रांसिस्को के मध्य लगभग 13000 किलोमीटर की दूरी कम हो गई है। इसी प्रकार पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी तट, उत्तर पूर्वी और मध्य संयुक्त राज्य अमेरिका और पूर्वी तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के मध्य की दूरी बेहद कम हो गई है।

Panama Canal

पनामा नहर के द्वारा व्यापार

     पनामा नहर जल मार्ग से होकर विश्व के लगभग 5% से अधिक जहाज गुजरते हैं। इस नहर द्वारा अमेरिका, कनाडा, पश्चिमी यूरोप, चीन, कोरिया, और दक्षिण अमेरिका के अन्य देशों की कंपनियों द्वारा ऑटोमोबाइल, खाद्य पदार्थ, वस्त्र, दवाइयाँ, रसायन, मशीनरी, कोयला, पेट्रोलियम आदि विभिन्न उत्पादों का परिवहन किया जाता है। इस नहर का अधिकतम उपयोग अमेरिकी जलयान करते हैं जो चीन, जापान, कोलंबिया तथा साउथ कोरिया को जाते हैं।

 

निष्कर्ष

       इस प्रकार निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि पनामा नहर का आर्थिक महत्व काफी अधिक है हालाँकि स्वेज नहर की अपेक्षा कम है। फिर भी विश्व व्यापार के साथ ही दक्षिण अमेरिका की अर्थव्यवस्था में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। अमेरिकन सोसाइटी ऑफ सिविल इंजीनिय ने आधुनिक अभियांत्रिकी के सात आश्चर्य में पनामा नह को स्थान दिया है। 

10. North Atlantic Sea Route (उत्तरी अटलांटिक समुद्री मार्ग)

10. North Atlantic Sea Route

(उत्तरी अटलांटिक समुद्री मार्ग)



परिचय

       व्यापार के लिए समुद्री मार्ग आज से नहीं बल्कि प्राचीन काल से ही प्रयोग होते आया है क्योंकि इसमें सड़क मार्ग तथा रेल मार्ग की तरह मार्ग बनाने का खर्च नहीं के बराबर होता है। हालांकि समुद्री मार्ग में समय ज्यादा लगता है लेकिन आजकल प्रशीतक कक्ष, विशेष प्रकार के जहाज जो पूर्णतया या अंशतः वातानुकूलित होते हैं, जिसकी व्यवस्था होने के बाद शीघ्र खराब होने वाले सामानों का परिवहन भी समुद्री मार्ग से संभव हो गए हैं।

     आधुनिक सामुद्रिक जहाज रडार, वायरलेस तथा अन्य सुविधाओं और उपकरणों से सुसज्जित होते हैं। मौसम खराब होने तथा तूफान आने की स्थिति में भी सुरक्षित रहते हैं। इसलिए समुद्री परिवहन का महत्व काफी बढ़ गया है।

उत्तर अटलांटिक समुद्री मार्ग

      यह मार्ग औद्योगिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दो विकसित प्रदेशों अर्थात् उत्तरी अमेरिका और पश्चिमी यूरोप को मिलाता है। विश्व का लगभग एक चौथाई विदेशी व्यापार इसी मार्ग द्वारा होता है। इसलिए यह विश्व का व्यस्ततम व्यापारिक जलमार्ग कहलाता है।

     दूसरे शब्दों में इसे वृहद ट्रंक मार्ग (Big Trunk Route) भी कहा जाता है। उत्तरी अटलांटिक समुद्री मार्ग के दोनों ओर के भाग कोयला, पेट्रोलियम आदि की पर्याप्त सुविधाओं से सुसज्जित है। दोनों तरफ के भाग पर काफी घने आबादी बसे हुए हैं साथ ही दोनों ओर के भाग उपजाऊ और उन्नत भी हैं। दोनों भागों तकनीकी ज्ञान और बेशुमार पूँजी की दृष्टि से बहुत ही विकसित हैं। अतः इस मार्ग का महत्व और भी बढ़ जाता है।

     इस मार्ग पर प्रथम बार स्टिमर जलपोत 1938 ई० में शुरू हुआ था, तब से आज तक इस मार्ग का इतना विकास हुआ कि लगभग 300 कंपनियों के जलपोत इस मार्ग पर चलते हैं। इसी तरह संसार के 50 बड़े पोताश्रय में से लगभग आधे इसी मार्ग पर स्थित है।

उत्तरी अमेरिका की तरफ स्थित बंदरगाह:-

    उत्तरी अमेरिका की तरफ स्थित प्रमुख बंदरगाह न्यूयॉर्क, बोस्टन, फिलाडेल्फिया, बाल्टीमोर, मॉट्रियल, क्यूबेक, हेलीफैक्स, सेंट लॉरेंस, झीलों के जल मार्ग, टोरंटो इत्यादि है।

पश्चिमी यूरोप की तरफ के बंदरगाह:-

     पश्चिमी यूरोप की तरफ के बंदरगाह रॉटरडम, एंटवर्प, लंदन, साऊथैम्पटन, ग्लास्गो, लिवरपूल, मैनचेस्टर, ली हैवर, हैंबर्ग, गोटबोर्ड, कोपनहेगन, स्टॉकहोम, ओस्लो आदि है। इनकी पृष्ठभूमि में घनी आबादी बसी हुई है।

परिवहन की गई सामग्री:-

      इस मार्ग पर उत्तरी अमेरिका तथा पश्चिमी यूरोप के बीच विभिन्न प्रकार के औद्योगिक व्यापारिक कच्चे माल और तैयार माल का परिवहन होता है।

उत्तरी अमेरिका की तरफ से पश्चिम यूरोप को भेजे जाने वाली प्रमुख सामग्री:-

      उत्तरी अमेरिका की तरफ से पश्चिम यूरोप को भेजे जाने वाली प्रमुख सामाग्रियों में स्क्रैप लोहा, कपास, गेहूँ, मांस, फल, लुगदी, इमारती लकड़ी, मशीनरी, कृषि यंत्र, वैज्ञानिक उपकरण, मोटरकार तथा वस्त्र इत्यादि है। कनाडा से गेहूँ, मछली, नरम लकड़ी काष्ठ भंड, पारा, पोटाश, चांदी आदि पश्चिम यूरोप को भेजे जाने वाली प्रमुख सामग्री है।

पश्चिमी यूरोप से उत्तरी अमेरिका की ओर परिवहन की जाने वाली पमुख सामग्री:

    पश्चिमी यूरोप से उत्तरी अमेरिका की ओर परिवहन की जाने वाली पमुख सामाग्रियों में कपड़ा, रसायन, मशीन, उर्वरक, इस्पात, शराब, कृषि उपकरण, लोहा, पत्थर आदि है।

       जहाओं द्वारा ढोए गए माल में भारी विविधता देखने को मिलती है। जैसे:- निर्मित सामग्री, अर्द्ध परिष्कृत सामग्री, कच्चे माल और भोज्य पदार्थ शामिल होते हैं। उत्तरी अमेरिका से यूरोप जाने वाले माल का भार यूरोप से उत्तरी अमेरिका आने वाले माल से चौगुनी भारी होती है क्योंकि उत्तरी अमेरिका से गेहूँ, सोयाबीन, डेयरी के उत्पाद तथा अन्य भोज्य पदार्थों का विशाल भार होता है। इसके अलावा कोयला, पेट्रोलियम, धातुएँ, लकड़ी, चीनी, मांस, इस्पात स्क्रैप आदि यूरोप को आते हैं जबकि यूरोप से आने वाले जहाजों में निर्मित सामग्री और निम्न भार के उच्च मूल्य की वस्तुएं होती हैं।

      अतः पश्चिम की ओर जाने वाले जहाजों में बहुत खाली स्थान पड़ा रहता है जिसको भरने के लिए जहाज बहुत सस्ते भाड़े पर भारी माल जैसे लोहा और इस्पात, इस्पात का सामान, चीनी मिट्टी और पत्थर तक भी यूरोप से भरकर ले जाते हैं।

वृहत वृत्त मार्ग (Great Circle Route) का अनुसरण

      उत्तरी अटलांटिक मार्ग ग्रेट सर्किल रुट का अनुसरण करता है। उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट बहुत हद तक बृहत मार्ग से मिलता-जुलता है। यद्यपि लैब्राडोर का प्रायदीप कुछ आगे की ओर निकला हुआ है। पश्चिमी यूरोप को जाने वाले जलपोत उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट के सहारे चलते हैं। मध्य अमेरिका में कोलोन (पनामा) से चलने वाले और शिकागो से जाने वाले जलपोत मार्ग में मिल जाते हैं और एक ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

      वृहत वृत्त मार्ग का शत-प्रतिशत अनुसरण नहीं किया जा सकता है जिसके निम्नलिखित कारण है-

 लैब्राडोर प्रायद्वीप बाहर की ओर निकला हुआ है।

पत्तनो की आपेक्षिक स्थिति भिन्न है।

गल्फ स्ट्रीम जैसे समुद्री जलधारा तथा लैब्राडोर जैसी ठंडी धारा के मिलने का फलस्वरुप कोहरा उत्पन्न होता है।

➤  ग्रैंड बैंक के निकट मार्ग में शैल भित्तियाँ और शोल्स आते हैं।

उत्तरी कैरोलिना तक पर हट्टेरास अंतरीप के समीप बालू भित्तियाँ है।

कभी-कभी ग्रीनलैंड के पश्चिमी तट से तैरते हुए हिम शिलाएं मार्ग में आ जाती हैं जिसके कारण प्रसिद्ध टाइटैनिक दुर्घटना इसी मार्ग पर हुई थी।

       इतना ही नहीं शीत ऋतु में तूफानों के कारण जलपोतों को वृहद वृत्त मार्ग छोड़कर दक्षिण की ओर जाना पड़ता है। हालांकि एक अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षण दल इस मार्ग की मौसम रिपोर्ट का प्रत्येक चार-चार घंटों में प्रसारण करते हैं और हिमखंडों के मौसम में जहाज दक्षिण की ओर मुड़कर जाते हैं।

पूर्व से पश्चिम को और पश्चिम से पूर्व को जाने वाले जलपोत के मार्ग एक-दूसरे से लगभग 100 किलोमीटर दूर है ताकि दो भिन्न दिशाओं से आने जाने वाले जहाज आपस में टकरा न जाएं।

North Atlantic

निष्कर्ष:

     इस प्रका उत्तरी अटलांटिक व्यापारिक मार्ग विश्व का अति व्यस्ततम जलमार्ग है। इस मार्ग पर व्यापारिक और औद्योगिक मालों  की ढुलाई के अतिरिक्त न्यूयॉर्क और साउथमटन तथा यूरोप के अन्य पत्तनों के बीच आधुनिक सुविधाओं से युक्त आरामदायक यात्री जहाजों के बेड़े भी नियमित रूप से चलते हैं।


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5. Internal Structure of The Earth (पृथ्वी की आंतरिक संरचना)

5. Internal Structure of The Earth

(पृथ्वी की आंतरिक संरचना)



          पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है।

पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है।

पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवं भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है।

पृथ्वी के नीचे जाने पर प्रति 32 मीटर की गहराई पर तापमान 1°C बढ़ता जाता है।

स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

(1) सियाल (SiAl) 

       पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SiMa)

        स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NiFe)

         पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

Internal Structure

        भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सबसे अधिक वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। जिसके अनुसार पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा गया है-

1. भूपर्पटी (Crust)

2. भूप्रावर (Mantle)

3. क्रोड (Core)

(1) भूपर्पटी (Crust):-

➤ यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है।

➤ पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% भूपर्पटी में शामिल है।

➤ इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है।

➤ महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है।

➤ इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

➤ भू-पर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है।

➤ सम्पूर्ण पृथ्वी की रासायनिक संरचना में सर्वाधिक लोहा (35.50%), ऑक्सीजन (30.00%), सिलिकन (15.00%) पायी जाती है।

➤ यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग (P), द्वितीयक तरंग (S), सतही तरंग (L), P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:- 

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

➤ महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है।

➤ महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टानें पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

(2) भू-प्रावार (Mantle):-

➤ भूपर्पटी और भू-प्रावार के बीच एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे मोहोअसम्बद्धता (Moho Discontinuty) कहते है।

➤ भूप्रावार की मोटाई मोहो असम्बद्धता से 2900 KM तक है।

➤ पृथ्वी के कुल आयतन का 83% और कुल द्रव्यमान का 68% भाग भूप्रावार में शामिल है।

➤ यह अधिक तापमान के कारण पिघली हुई अवस्था (द्रव) के समान है।

➤ भू-प्रावार पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग  तो संचरित होती है लेकिन द्वितीयक तरंग विलुप्त हो जाती है।

➤ इसका निर्माण सिलिकन & मैग्नेशियम जैसे तत्वों से हुआ है।

➤ भू-प्रावार का घनत्व 3 से 5.5 तक मानी जाती है। 

➤ क्रस्ट और मेंटल के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमण्डल/लिथोस्फेयर कहा जाता है।

➤ स्थलमण्डल के नीचे वाले मण्डल को दुर्बलमण्डल (Aestheno Sphere) कहते है।

➤ होम्स ने बताया  है कि दुर्बलमण्डल में ही संवहन तरंगे चलती है। ये तरंगे इतनी शक्तिशाली होती है जो स्थलमण्डल को तोड़ने एवं मोड़ने की क्षमता रखती है।

(3) क्रोड (Core)/अंतरतम:-   

➤ यह पृथ्वी का केंद्रीय भाग है।

➤ इसका घनत्व 10 से 13.6 g/cm3 है।

➤ पृथ्वी के कुल आयतन का 16% एवं द्रव्यमान का 32% भाग क्रोड में शामिल है।

➤ क्रोड पृथ्वी का वह मण्डल है जसमें केवल प्राथमिक तरंगे गुजरती है।

➤ यह मण्डल निकेल और लोहा से निर्मित है। इसी कारण से पृथ्वी में चुम्बकीय गुण है।

➤ क्रोड अत्याधिक दबाव के कारण ठोस भाग के रूप में परिणत हो चुका है।

➤ क्रोड की औसत मोटाई 3471 KM है।

➤ Mantle और Core के बीच में एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे गुटेनबर्ग असम्बद्धता कहते हैं।

          पृथ्वी की आंतरिक संरचना को नीचे के चित्रों में भी देखा जा सकता है।

Internal Structure of The Earth

चित्र: पृथ्वी की आतंरिक संरचना

पृथ्वी के स्थलीय क्षेत्र प सबसे नीचा क्षेत्र जॉर्डन में मृत सागर के आस-पास का क्षेत्र है। यह क्षेत्र समुद्रतल से औसतन 400 मीटर नीचा है।

पृथ्वी की बाह्य सतह को मुख्यतः चा भागों में बाँट सकते हैं-

1. स्थलमंडल (Lithosphere)

2. जलमंडल (Hydrosphere)

3. वायुमंडल (Atmosphere)

4. जैवमंडल (Biosphere)

नोट:

➤ कोनार्ड असंबद्धता (Conard Discontinuity) : ऊपरी क्रस्ट एवं निचले क्रस्ट के बीच के संक्रमण क्षेत्र को कोनार्ड असंबद्धता कहते हैं।

➤ मोहो असम्बद्धता (Mohovicic Discontinuity) : क्रस्ट एवं मेंटल के बीच के संक्रमण क्षेत्र को मोहो असम्बद्धता कहते हैं।

➤ रेपेटी असंबद्धता (Repetti Discontinuity) : ऊपरी मेंटल एवं निचले मेंटल के बीच के संक्रमण क्षेत्र को रेपेटी असंबद्धता कहते हैं।

➤ गुटेनबर्ग असंबद्धता (Guttenburg Discontinuity) : मेंटल तथा क्रोड के बीच के संक्रमण क्षेत्र को गुटेनबर्ग असंबद्धता कहते हैं।

➤ लेहमैन असंबद्धता (Lehman Discontinuity) : बाह्य क्रोड तथा आन्तरिक क्रोड के बीच के संक्रमण क्षेत्र को लेहमैन असंबद्धता कहते हैं।



पृथ्वी की आन्तरिक संरचना से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



1. पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के सम्बन्ध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण जानकारी का स्रोत क्या है?

(a) अप्राकृतिक साधन

(b) भूकम्प विज्ञान

(c) ज्वालामुखी क्रिया

(d) प्लेट विवर्तनिकी

उत्तर- (b) भूकम्प विज्ञान

2. सियाल, सीमा तथा निफे के रूप में भूगर्भ का विभाजन किसके द्वारा किया गया है?

(a) वैन डर ग्रैट द्वारा

(b) डेली द्वारा

(c) होम्स द्वारा

(d) स्वेस द्वारा

उत्तर- (d) स्वेस द्वारा

3. पृथ्वी के धरातल से केन्द्र की ओर निम्नलिखित का सही क्रम क्या होगा?

I. सीमा

II. सियाल

III. निफे

कूट :

(a) I, II, III

(b) II, I, III

(c) I, III, II

(d) III, II, I

उत्तर- (b) II, I, III

4. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?

(a) सियाल में ग्रेनाइट एवं नीस जैसी चट्टानों की प्रधानता है।

(b) सीमा का निर्माण मुख्यतः बेसाल्ट एवं गैब्रो जैसी चट्टानों से हुआ है।

(c) क्रोड में निकेल एवं लोहा जैसे तत्वों की अधिकता है।

(d) उपर्युक्त सभी

उत्तर- (d) उपर्युक्त सभी

5. भूपृष्ठ की किस परत में बैसाल्ट चट्टानों की अधिकता है?

(a) सियाल

(b) सीमा

(c) निफे

(d) किसी में नहीं

उत्तर- (b) सीमा

6. पृथ्वी के किस भाग में निकेल और लोहा की प्रधानता है?

(a) सियाल

(b) सीमा

(C) निफे

(d) किसी में नहीं

उत्तर- (C) निफे

7. पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत के लिए सर्वप्रथम ‘सियाल’ (SiAl) शब्द का प्रयोग किसने किया?

(a) होम्स

(b) स्वेस

(c) जेफरीज

(d) डेली

उत्तर- (b) स्वेस

8. पृथ्वी की तीन संकेन्द्री परतों में ऊपर से दूसरी परत का नाम क्या है?

(a) सियाल

(b) सीमा

(c) निफे

(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (b) सीमा

9. पृथ्वी के केन्द्र में पाया जाने वाला चुम्बकीय पदार्थ है-

(a) ग्रेनाइट

(b) बैसाल्ट

(c) निकेल

(d) डायोराइट

उत्तर- (c) निकेल

10. स्वेस ने पृथ्वी के आन्तरिक भाग को तीन भागों में बाँटा था। उनके विभाजन में नहीं है-

(a) सियाल

(b) सीमा

(c) निफे

(d) सबस्टेटम

उत्तर- (d) सबस्टेटम

11. स्थल मण्डल का तात्पर्य है-

(a) पृथ्वी का आन्तरिक भाग

(b) पृथ्वी का मध्यवर्ती भाग

(c) पृथ्वी का ऊपरी भाग

(d) पृथ्वी की बाह्य पपड़ी

उत्तर- (d) पृथ्वी की बाह्य पपड़ी

12. स्थल मण्डल की मोटाई भूकम्पीय तरंगों के आधार पर कितनी मापी गयी है?

(a) 105 किमी०

(b) 100 किमी०

(c) 200 किमी०

(d) 80 किमी०

उत्तर- (c) 200 किमी०

13. निम्नलिखित में से किस परत को बेरीस्फीयर कहा जाता है?

(a) वायुमण्डल का सबसे ऊपरी परत

(b) पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत

(c) पृथ्वी की सबसे आन्तरिक परत

(d) पृथ्वी की मध्यवर्ती परत

उत्तर- (c) पृथ्वी की सबसे आन्तरिक परत

14. धरातल से भूगर्भ की ओर जाने पर गहराई के साथ तापमान वृद्धि की दर क्या है?

(a) 1°C प्रति 165 मीटर

(b) 1°C प्रति 165 फीट

(c) 1°C प्रति 32 मीटर

(d) 1°C प्रति 32 फीट

उत्तर- (c) 1°C प्रति 32 मीटर

15. पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के अनुसार भूगर्भ का विभाजन भू-पटल, मेंटल तथा कोर (Core) में किया गया है। यह विभाजन किसका है?

(a) होम्स

(b) जेफरीज

(c) डेली

(d) ग्राट

उत्तर- (d) ग्राट

नोट: एडवर्ड स्वेस (Edward Suess) ने भी एक प्रसिद्ध रासायनिक विभाजन दिया था, जिसे सियाल (SIAL), सीमा (SIMA) और निफे (NIFE) के नाम से जाना जाता है। अक्सर छात्र इनमें भ्रमित हो जाते हैं, इसलिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि प्रश्न में ‘भूपटल, मेंटल और कोर’ के बारे में पूछा गया है।

16. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

(a) भू-पटल (The crust) की औसत मोटाई लगभग 33 किमी० है।

(b) महाद्वीपीय भाग में भू-पटल की मोटाई अधिक है जबकि महा-सागरीय भाग में यह छिछला है।

(c) महाद्वीपीय भू-पटल मुख्यतः ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित है।

(d) महासागरीय भू-पटल की तुलना में महाद्वीपीय भू-पटल का घनत्व अधिक है।

उत्तर- (d) महासागरीय भू-पटल की तुलना में महाद्वीपीय भू-पटल का घनत्व अधिक है।

17. महासागरीय सतह का निर्माण किस प्रकार की चट्टानों से हुआ है?

(a) ग्रेनाइट

(b) बैसाल्ट

(c) परतदार

(d) ग्रेबो

उत्तर- (b) बैसाल्ट

18. मेंटल के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

(a) इसकी गहराई 35 किमी० से 2900 किमी० तक है।

(b) इसका सम्पूर्ण भाग प्लास्टिक की अवस्था में है।

(c) पृथ्वी के आयतन का 83.5% एवं द्रव्यमान का 67.8% भाग मेंटल है।

(d) इसका घनत्व 3-0 से लेकर 5-5 तक है।

उत्तर- (b) इसका सम्पूर्ण भाग प्लास्टिक की अवस्था में है।

19. स्थलमण्डल (Lithosphere) में सम्मिलित है-

(a) केवल ऊपरी भू-पटल

(b) ऊपरी भू-पटल तथा निचली भू-पटल दोनों

(c) ऊपरी भू-पटल, निचली भू-पटल तथा मेंटल का ठोस ऊपरी भाग

(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (c) ऊपरी भू-पटल, निचली भू-पटल तथा मेंटल का ठोस ऊपरी भाग

20. स्थलमण्डल का विस्तार कितने किमी० की गहराई तक है?

(a) 80 किमी०

(b) 100 किमी०

(c) 180 किमी०

(d) 200 किमी०

उत्तर- (d) 200 किमी०

21. निम्न में से किसको “व्हाइट ऑफ द अर्थ” कहा जाता है?

(a) क्रस्ट (Crust)

(b) मेंटल (Mantle)

(c) कोर (Core)

(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (b) मेंटल (Mantle)

22. मेंटल में निम्नलिखित में से किन तत्वों की प्रधानता होती है?

(a) सिलिका और मैंगनीज

(b) सिलिका और ऐलुमिनियम

(c) सिलिका और मैग्नीशियम

(d) सिलिका और लोहा

उत्तर- (c) सिलिका और मैग्नीशियम

23. पृथ्वी के कुल द्रव्यमान का लगभग कितना प्रतिशत मेंटल (Mantle) में पाया जाता है?

(a) 32%

(b) 52%

(c) 68%

(d) 83%

उत्तर- (c) 68%

24. मोहो असम्बद्धता स्थित है-

(a) क्रस्ट तथा मैंटल के बीच

(b) ऊपरी मेंटल तथा निचली मेंटल के बीच

(c) मेंटल एवं कोर के बीच

(d) आन्तरिक मेंटल तथा बाह्य मेंटल के बीच

उत्तर- (a) क्रस्ट तथा मैंटल के बीच

25. पृथ्वी के कोर (Core) में किस तत्व की प्रधानता होती है?

(a) सिलिका एवं ऐलुमिनियम

(b) सिलिका एवं मैग्नीशियम

(c) सिलिका एवं निकेल

(d) लोहा एवं निकेल

उत्तर- (d) लोहा एवं निकेल

26. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

(a) महाद्वीप मुख्यतः ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित है।

(b) महासागरीय बेसीन में बेसाल्ट चट्टान की प्रधानता है।

(c) कोर (Core) को बेरीस्फीयर के नाम से भी जाना जाता है।

(d) पृथ्वी के समस्त आयतन का लगभग 68% एवं द्रव्यमान का 83.5% मेंटल में व्याप्त है।

उत्तर- (d) पृथ्वी के समस्त आयतन का लगभग 68% एवं द्रव्यमान का 83.5% मेंटल में व्याप्त है।

27. भू-गर्भ में तापमान वृद्धि का कारण है

(a) दबाब

(b) रेडियोसक्रिय पदार्थों का विखण्डन

(c) उपर्युक्त दोनों

(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (c) उपर्युक्त दोनों

28. गहराई में वृद्धि के अनुसार महाद्वीपीय भू-पटल के विभिन्न परतों का सही क्रम है-

(a) परतदार, ग्रेनाइट, बेसाल्ट

(b) परतदार, बेसाल्ट, ग्रेनाइट

(c) ग्रेनाइट, परतदार, बेसाल्ट

(d) ग्रेनाइट, बेसाल्ट, परतदार

उत्तर- (a) परतदार, ग्रेनाइट, बेसाल्ट

29. भू पर्पटी में पाए जाने वाले विभिन्न तत्वों की मात्रा का सही अवरोही क्रम है-

(a) ऑक्सीजन, सिलिकन, लोहा, ऐलुमिनियम

(b) सिलिकन, ऑक्सीजन, ऐलुमिनियम, लोहा

(c) लोहा, सिलिकन, ऑक्सीजन, ऐलुमिनियम

(d) ऑक्सीजन, सिलिकन, ऐलुमिनियम, लोहा

उत्तर- (d) ऑक्सीजन, सिलिकन, ऐलुमिनियम, लोहा

30. पृथ्वी के भू-पर्पटी में कौन-सा तत्व प्रचुर मात्रा में पाया जाता है?

(a) कैल्शियम

(b) ऐलुमिनियम

(c) लोहा

(d) ऑक्सीजन

उत्तर- (d) ऑक्सीजन

31. धरातल से मोहो असम्बद्धता की गहराई लगभग कितनी है?

(a) 30 किमी०

(b) 100 किमी०

(c) 200 किमी०

(d) 700 किमी०

उत्तर- (a) 30 किमी०

18. What is biodiversity? Its importance and types (जैव विविधता क्या हैं? इसके महत्त्व एवं प्रकार)

18. What is biodiversity? Its importance and types

(जैव विविधता क्या हैं? इसके महत्त्व एवं प्रकार)



            ‘जैव विविधता’ दो शब्दों से बनी है: पहला ‘जैव’, जिसका अर्थ है जीव विज्ञान या जीवित जीवों से संबंधित, और दूसरा ‘विविधता’, जिसका अर्थ है विभिन्न चीजों या विविधता की एक श्रृंखला से। इस प्रकार जैव विविधता आनुवंशिक, प्रजाति और पारिस्थितिकी तंत्र स्तरों पर भिन्नता है। जैव विविधता सभी जीवित चीजों की विविधता है: विभिन्न पौधे, जानवर और सूक्ष्मजीव, उनमें मौजूद विभिन्न आनुवंशिक जानकारी और उनके द्वारा बनाए गए विविध पारिस्थितिक तंत्र।

     ‘जैव विविधता’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1986 में वाल्टर जी. रॉसेन ने किया एवं जैव विविधता को निम्नलिखित शब्दों में समझाया- “पादपों, जन्तुओं एवं सूक्ष्म जीवों के विविध प्रकार और विभिन्नता ही जैव विविधता है।” निश्चित ही जैव विविधता जातियों की विपुलता (पादपों, जन्तुओं और सूक्ष्म जीवों) है, जो एक अन्योन्य क्रिया तन्त्र की तरह एक निश्चित आवास में उत्पन्न होते हैं।

      पृथ्वी पर विभिन्न जीव समुदाय की विभिन्न जातियाँ पायी जाती है। स्थानिक अवस्थिति के बदलते ही पारिस्थितिक तंत्र की प्रकृति भी बदल जाती है जिससे जातियों में विविधता आ जाती है। इन जातियों की संख्या एवं विभिन्नता ही जैव विविधता कहलाती है। पिछले 25 वर्षों में मनुष्य ने विश्व के पौधे और जीव-जन्तुओं के संरक्षण में गहन रूचि लेना प्रारम्भ कर दिया है। इसके अन्तर्गत पृथ्वी सम्मेलन सन् 1992 अति महत्त्वपूर्ण रहा, जिसके अन्तर्गत 1993-94 से 2003-04 को अन्तर्राष्ट्रीय जैव विविधता दशक मनाये जाने का निर्णय लिया और विभिन्न महत्त्वपूर्ण संगठनों ने अपना कार्य प्रारम्भ किया।

      सन् 2002 में जोहान्सबर्ग में सतत् विकास पर विश्व सम्मेलन में जैव विविधता और महत्त्वपूर्ण विषय हो गया है। लाखों वर्षों में उत्पन्न हुआ जैविक समुदाय आधुनिक मानव द्वारा संसाधनों के शोषण के कारण नष्ट हो रहा है। जैव विविधता ह्रास का मुख्य कारण जीवों के आवासीय क्षेत्र को क्षति  पहुंचाना है; जैसे- वन संसाधनों का शोषण (वन भूमि का घटता क्षेत्र), चारागाहों तथा घास के मैदानों पर कृषि भूमि का दबाव, जन्तु जगत और वनों का अत्यधिक शोषण (शिकार) एवं वृक्षों की कटाई एवं पशुपालन आदि है।

      जैव विविधता समस्त पारिवारिक तंत्र के संचालन के लिए अपरिहार्य हैं, जैव विविधता अपने मुख्य दो कार्यों के कारण समस्त पारिस्थितिक तंत्र को पुष्ट करती है।

1. जैवमण्डल का स्थायित्व (Biosphere sustainability) जैव विविधता पर निर्भर करता है। ये जल, मृदा, वायु की रासायनिक संरचना को स्थिर रखती है। इस प्रकार जैव मण्डल के सम्पूर्ण स्वास्थ्य को दृढ़ता प्रदान करती है।

2. जैव विविधता उन वस्तुओं का भी स्रोत है जिन पर जीव अपने भोजन, चारा, ईंधन तथा औषधि आदि के लिए निर्भर होती है।

“जैव विविधता जातियों की विपुलता (जन्तुओं, सूक्ष्म जीवों और पौधों) है जो एक अन्योन्याश्रित क्रिया तंत्र की तरह एक-दूसरे से संबंद्ध है और एक निश्चित आवास में उत्पन्न होते हैं।”

अथवा, “पर्यावरण में जीव-जन्तु, पौधों और सूक्ष्म जीवों के बीच आनुवंशिक (Genetic) जातिगत (Species), और पारिस्थितिक (Ecological) स्तर पर पायी जाने वाली विविधता को जैव विविधता कहते हैं।”

U.S. Office of technology Assessment (1987) के अनुसार जैव विविधता को निम्न प्रकार से पारिभाषित किया गया है- “The variety and variability among living organisms and the ecological complexes in which they occur is called Biodiversity.”

      सरल शब्दों में, हम यह कह सकते हैं कि पृथ्वी पर विद्यमान प्रत्येक जाति के जीवों में विविधता, जातियों के मध्य विविधता तथा पारिस्थितिक तंत्रों की विविधता ही जैव विविधता है।

Biodiversity शब्द Biological Diversity का संक्षिप्त रूप है जो पृथ्वी पर जीवन के विविध रूपों को व्यक्त करता है। वर्तमान में पृथ्वी पर जीवों की जो भी जातियाँ पायी जाती हैं, उनके अस्तित्व का कारण लम्बे समय से परिवर्तित होती आ रही दशाओं में स्वयं को अनुकूलित करते रहना है। ये जातियाँ परस्पर क्रियाशील तथा एक-दूसरे से संबंध रखती हैं। जीवों की जातियों का परस्पर संबंध तथा जातियों एवं पर्यावरण का परस्पर संबंध पारिस्थितिक तंत्र को गति एवं दृढ़ता प्रदान करता है।

       किसी भी क्षेत्र में पाये जाने वाली जीवों की जातियाँ एक जैविक समुदाय बनाती है जो विभिन्न जातियों के जटिल खाद्य जालों के रूप में होता है। जैविक समुदाय के किसी भी हिस्से में आये व्यवधान से समुदाय के सभी भागों के सदस्यों पर प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार पारिस्थितिक तंत्र को सुचारू रूप से चलाने एवं उसकी दृढ़ता बनाए रखने के लिए जैव विविधता का होना अत्यन्त आवश्यक है।

       जैव विविधता एक ऐसा संसाधन है, जिसे पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता है अर्थात् जो जातियाँ विलुप्त हो जाती हैं उन्हें पुन: उत्पन्न नहीं किया जा सकता है। जातियों के विलुप्तीकरण के अनेक कारण हैं; जैसे प्राकृतिक आवासों का नष्ट होना, विदेशी जातियों का अनियोजित प्रवेश, पादप तथा जन्तु संसाधनों का अधिक मात्रा में उपयोग तथा प्रदूषण।

    ऐसा अनुमानित किया गया है कि प्रतिदिन जीवों की कई जातियाँ विलुप्त हो रही हैं। यह विलुप्तीकरण एक गम्भीर विषय है। इस संदर्भ में सन् 1992 में रियो डि जेनेरियो (ब्राजील) में पृथ्वी सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में भारत सहित 168 देशों ने जैव विविधता पर प्रस्तावित समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते में जैव विविधता के संरक्षण तथा उसकी वृद्धि करने के प्रयासों पर जोर दिया है।

जैव विविधता के प्रकार

   जैव विविधता के प्रकार को प्रायः तीन मुख्य तथा दो गौण स्तरों में बाँटा जा सकता है-

मुख्य प्रकार

(1) आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity)-

  आनुवंशिक स्तर पर एक जाति के सदस्यों में पायी जाने वाली विविधता आनुवंशिक विविधता कहलाती है। यह विविधता एक स्थान पर एक जाति की जनसंख्या के व्यक्तिगत जीवों में या इसी जाति के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में वितरित जनसंख्या में हो सकती है; तथा गेहूँ, धान, कपास की विविध किस्में अपने रूप रंग, आकार, स्वाद में मिले होते हुए भी एक ही जीन्स या जाति के हैं।

(2) जातिगत विविधता (Species Diversity)-

    पृथ्वी पर पाये जाने वाले सभी प्रकार के जीवों (बैक्टीरिया से लेकर बड़े पौधों एवं जन्तुओं तक) की जातियों की विविधता, जातिगत विविधता कहलाती है। जैसे—घोड़ा, बकरी, भैंस, शेर, कुत्ता विभिन्न जातियों के जीव हैं।

(3) पारिस्थितिक विविधता (Ecological Diversity)-

    बड़े स्तर पर जैव विविधता के अन्तर्गत पारिस्थितिक तंत्र के जैविक समुदायों में पायी जाने वाली विविधता पारिस्थितिक विविधता कहलाती है। एक पारिस्थितिक तंत्र एक विशेष प्रकार के जीव-जन्तुओं के प्रारूप को बनाता है। इसलिए पारिस्थितिक तंत्र की विविधता भी जैव विविधता को जन्म देती है; जैसे- विभिन्न भौगोलिक प्रदेशों के जीवों में विविधता मिलती हैं। यथा- भू-रेखीय प्रदेशों या मरुस्थलीय प्रदेशों के जीव-जन्तु।

गौण प्रकार

(1) घरेलू विविधता (Domesticated Biodiversity)-

     पालतू पशु एवं घरेलू पेड़-पौधों के जीन्स में मानवीय हस्तक्षेप से अलग तरह के जीव एवं फसलों में विविधता आ रही हैं। यथा- मुर्गियों, बकरियों, गायों आदि की विभिन्न नस्लें या तिलहन, धान, गेहूँ आदि की विभिन्नतायें मानवीय हस्तक्षेप जीन्स में होने से विविधता दिखती है।

(2) सूक्ष्मजीवीय विविधता-

       एक सूई की नोंक पर 3-4 करोड़ जीवाणु होना, जैव विविधता समृद्धि ही उल्लेखनीय है।

जैव भौगोलिक प्रदेश (Bio-Geographical Regions)

     विभिन्न प्रदेशों में पाये जाने वाले प्राणिजात (fauna) और वनस्पति-जात (flora) की समानताओं तथा विभिन्नताओं के आधार पर विश्व को निम्न छः जैव भौगोलिक क्षेत्रों में उपविभाजित किया गया है-

(i) पेलिआर्कटिक परिमण्डल (palearctic realm) या पुरानी दुनिया,

(ii) निआर्कटिक परिमण्डल (Nearctic realm) या उत्तरी अमेरिका,

(iii) इथियोपी परिमण्डल (Ethiopian realm) या सहारा मरुस्थल से दक्षिण का सम्पूर्ण अफ्रीका,

(iv) प्राच्य परिमण्डल (Oriental realm) या हिमालय से दक्षिण तक का क्षेत्र,

(v) निओट्रॉपिकल परिमण्डल (Neotrapical realm) या दक्षिण तथा केन्द्रीय अमरीका, और

(vi) आस्ट्रेलियाई परिमण्डल (Austrollan realm) या आस्ट्रेलिया एवं संबंधित द्वीपसमूह।

      इन छः परिमण्डलों को विश्व के मानचित्र पर नीचे दिखलाया गया है। इन जैव भौगोलिक क्षेत्रों में से अधिकांश समुद्रों, मरुस्थलों और पर्वतों द्वारा एक-दूसरे से पृथक हैं।

What is biodiversity

भारत का जैव भौगोलिक वर्गीकरण

     भारत क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से विश्व का सातवाँ बड़ा क्षेत्रफल वाला देश हैं। विश्व की 2.4 प्रतिशत भूमि भारत के अन्तर्गत है। यह उत्तर से दक्षिण 3214 किलोमीटर तथा पूर्व से पश्चिम 2933 किलोमीटर है। वृहत् क्षेत्रफल 32,87,782 वर्ग किमी० विविध जलवायु और मृदा प्रदेशों के कारण विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों का उद्भव और विकास हो गया है जिससे वनस्पति और जैव जगत में अत्यधिक भिन्नता आ गयी है। साथ ही जैव विविधता के दृष्टिकोण से देश संपन्न हो गया है। यहाँ विश्व की 8 प्रतिशत जैव जातियाँ पायी जाती हैं। जैव विविधता भारत का एक महत्त्वपूर्ण संसाधन और शक्ति है। विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों के आधार पर भारत को निम्नलिखित 10 जैव भौगोलिक क्षेत्रों में वर्गीकृत कर सकते हैं-

1. ट्रांस हिमालय क्षेत्र
2. हिमालयी क्षेत्र
3. रेगिस्तान क्षेत्र
4. अर्ध शुष्क क्षेत्र
5. पश्चिमी घाट क्षेत्र
6. डेक्कन पठार क्षेत्र
7. गंगा के मैदान
8. तटीय क्षेत्र
9. उत्तर पूर्व क्षेत्र
10. द्वीप

1. ट्रांस हिमालय क्षेत्र:-

      इस क्षेत्र के अंतर्गत कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र का 5.6% भाग आता है। ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में जम्मू और कश्मीर, उत्तरी सिक्किम, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के स्पीति और लाहौल क्षेत्र शामिल हैं। इस क्षेत्र की विशेषता अल्पाइन वनस्पति है और यह जंगली बकरियों और भेड़ों की सबसे बड़ी आबादी का घर है। यहाँ पाए जाने वाले जानवरों में हिम तेंदुए और प्रवासी काली गर्दन वाले सारस सबसे लोकप्रिय हैं। इस क्षेत्र में ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्र का अत्यंत नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र शोधकर्ताओं के लिए अद्वितीय और उल्लेखनीय है।

2. हिमालयी क्षेत्र:-

        हिमालय क्षेत्र वनस्पतियों और जीवों के मामले में एक समृद्ध क्षेत्र है और इस क्षेत्र के अंतर्गत कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र का 6.4 प्रतिशत हिस्सा आता है। यह कुछ सबसे ऊँची चोटियों का भी घर है। इस क्षेत्र में अल्पाइन और उप-अल्पाइन वन, पर्णपाती वन और घास के मैदान शामिल हैं जो कुछ लुप्तप्राय प्रजातियों, जैसे- भरल, आइबेक्स, मार्खोर, हिमालयी तहर और ताकिन का घर हैं। अन्य लुप्तप्राय प्रजातियाँ जैसे हंगुल और कस्तूरी मृग को भी इस क्षेत्र में देखा जा सकता है।

3. रेगिस्तान क्षेत्र:-

      रेगिस्तानी क्षेत्र कुल भारतीय भौगोलिक विस्तार का लगभग 6.6% हिस्सा है और इसमें कच्छ और थार रेगिस्तान शामिल हैं। यह काराकल, भेड़िये, रेगिस्तानी बिल्लियों आदि सहित कुछ लुप्तप्राय स्तनधारियों का घर है। इस क्षेत्र में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और होउबारा बस्टर्ड जैसे कुछ पक्षी भी संरक्षण में हैं। घास के मैदानों का विस्तृत विस्तार इस क्षेत्र में लुप्तप्राय स्तनधारियों के अस्तित्व का समर्थन करता है।

4. अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र:-

      अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र का विस्तार कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 16.6% है। यह पश्चिमी घाट के घने जंगलों और रेगिस्तानों के बीच एक संक्रमण क्षेत्र भी है। प्रायद्वीपीय भारत में जलवायु की दृष्टि से दो बड़े अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों में कई प्राकृतिक और दलदली भूमि और कृत्रिम झीलें हैं। स्वादिष्ट झाड़ियों की परतें और उल्लेखनीय घास के मैदान इस क्षेत्र की विशेषता हैं जो कुछ लुप्तप्राय वन्यजीवों को भोजन और आश्रय देते हैं, जिनमें चीतल और सांभर की गर्भाशय प्रजातियाँ शामिल हैं। शेर (गुजरात तक सीमित), सियार, भेड़िया और कैराकल भी इस क्षेत्र में पाए जाते हैं।

5. पश्चिमी घाट क्षेत्र:-

       यह कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र का 4% है और भारत का एक उल्लेखनीय उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन है। यह भारत के कुल चार में से एक आधिकारिक जैव विविधता हॉटस्पॉट भी है। पश्चिमी घाट में विभिन्न प्रकार की कशेरुक आबादी है, जिनमें से कई प्रकृति में लुप्तप्राय प्रजातियाँ हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र में एक विशिष्ट और समृद्ध जीव-जंतु तत्व है जो इस क्षेत्र की विशेषता है।

      इस क्षेत्र की मूल निवासी महत्वपूर्ण प्रजातियों में नीलगिरि लंगूर, ग्रिजल्ड जाइंट स्क्विरेल और मालाबार ग्रे हॉर्नबिल शामिल हैं। लायन टेल्ड मकाक, मालाबार सिवेट और नीलगिरि तहर भी पश्चिमी घाट को अपना घर कहते हैं। त्रावणकोर कछुआ और केन कछुआ दो लुप्तप्राय प्रजातियाँ हैं जो मध्य पश्चिमी घाट में पाई जाती हैं।

6. डेक्कन पठार क्षेत्र:-

      कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 42% हिस्से पर फैले दक्कन का पठार देश का सबसे बड़ा जैव-भौगोलिक क्षेत्र है। यह पश्चिमी घाट के वृष्टि छाया क्षेत्र में पड़ता है। यह एक अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र है और भारत के मध्य प्रदेश, ओडिशा और महाराष्ट्र राज्यों में कुछ बेहतरीन जंगल हैं। इस क्षेत्र में अधिकांश वन पर्णपाती प्रकार के पाए जाते हैं।

       हालाँकि, दक्कन के पठार के पहाड़ी क्षेत्रों में अन्य प्रकार के जंगल भी हैं। ख़राब झाड़ियाँ और पर्णपाती और कांटेदार जंगल कई लुप्तप्राय प्रजातियों को आश्रय प्रदान करते हैं। इस क्षेत्र में सांभर, चीतल, चौसिंघा और बार्किंग हिरण जैसी प्रजातियाँ पाई जाती हैं। अन्य प्रजातियाँ जो यहाँ देखी जा सकती हैं उनमें गौर, हाथी, जंगली भैंसा और दलदली हिरण शामिल हैं।

7. गंगा के मैदान:-

      यह क्षेत्र कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 10.8% है। इसकी सैकड़ों किलोमीटर तक एक समान स्थलाकृति है। यह क्षेत्र अपनी विविध वनस्पतियों और जीवों के लिए जाना जाता है जो इस क्षेत्र की अद्वितीय विशेषता हैं। इस क्षेत्र के जीवों में भैंस, गैंडा, हाथी, हॉग हिरण, दलदली हिरण और हिस्पिड खरगोश शामिल हैं।

8. तटीय क्षेत्र:-

      यह कुल भारतीय भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 2.5% है जिसमें मैंग्रोव, रेतीले समुद्र तट, मूंगा चट्टानें और मिट्टी के फ्लैट शामिल हैं। यह क्षेत्र समुद्री एंजियोस्पर्म के लिए भी लोकप्रिय है जो इस क्षेत्र को अद्वितीय और समृद्ध बनाता है। गुजरात से सुंदरबन तक के क्षेत्र का हिस्सा कुल समुद्र तट 5,423 किमी० का विस्तार है। लक्षद्वीप कुल 25 मूंगा द्वीपों से बना है और इसमें एक विशिष्ट रीफ लैगून प्रणाली है जो इसे समुद्री जैव विविधता से समृद्ध बनाती है। हालाँकि, लक्षद्वीप में कोई प्राकृतिक वनस्पति नहीं दिखती है।

9. उत्तर पूर्व क्षेत्र:-

        कुल जैव-भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 5.2% को इसमें शामिल करते हुए, उत्तर-पूर्व भारत-मलायन, भारतीय और भारत-चीनी जैव-भौगोलिक क्षेत्रों के बीच संक्रमण क्षेत्र है। यह प्रायद्वीपीय भारत और हिमालय पर्वतों का जंक्शन भी है। इस प्रकार, पूर्वोत्तर देश की जैव विविधता हॉटस्पॉट होने के अलावा भारत की अधिकांश वनस्पतियों और जीवों का प्रवेश द्वार है। इस क्षेत्र में पाई जाने वाली जानवरों की कई प्रजातियाँ इस क्षेत्र की विशेषता हैं या खासी पहाड़ियों की मूल निवासी हैं । यहाँ पाए जाने वाले जीवों के सबसे लोकप्रिय उदाहरणों में से एक एक सींग वाला गैंडा है जो एक लुप्तप्राय प्रजाति है जो मुख्य रूप से असम में पाई जाती है।

10. द्वीप:-

     लगभग 0.3% क्षेत्र इसके अंतर्गत आता है, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत में कुल तीन में से एक उष्णकटिबंधीय नम सदाबहार वन का घर है। यह क्षेत्र समृद्ध और विविध वनस्पतियों का घर है जिसमें भारत के कुछ सदाबहार वन शामिल हैं। निकोबार द्वीप समूह में केवल जनजातियाँ ही पाई जाती हैं।

17. Throw light on the ozone layer (ओजोन परत पर प्रकाश डालें।)

17. Throw light on the ozone layer

(ओजोन परत पर प्रकाश डालें।)



        विश्व ओजोन दिवस हर साल 16 सितंबर को ओजोन क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध रूप से समाप्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करने की याद में मनाया जाता है। यह संधि 16 सितंबर 1987 में हुआ था।  इसी तथ्य को मद्देनजर रखकर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 16 सितम्बर को प्रतिवर्ष ओजोन दिवस मनाने का फैसला किया है।

       गत 12 दिसम्बर को विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने ओजोन मण्डल के सन्दर्भ में अपनी रिपोर्ट जारी की। इसके अनुसार ओजोन मण्डल के सुराख का आकार पिछले वर्ष की अपेक्षा दूना हो गया है। अब इसका क्षेत्रफल लगभग एक करोड़ वर्ग किमी. अर्थात् यूरोप महाद्वीप के क्षेत्रफल के लगभग बराबर है। ओजोन मण्डल का यह छिद्र अंटार्कटिका क्षेत्र के ऊपर स्थित है, जिसके आकार में जुलाई के अन्त से सितम्बर की शुरूआत के दौरान प्रतिदिन एक प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

       पृथ्वी से लगभग 15 किमी. की ऊँचाई पर 24 किमी. मोटी ओजोन गैस की परत है। ओजोन छतरी सूर्य से विकरित पराबैंगनी किरणों से हमारी रक्षा करती है। वायुमण्डल में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन है और 21 प्रतिशत ऑक्सीजन नाइट्रोजन एवं ऑक्सीजन दोनों ही आणविक स्थिति में मौजूद होते हैं लेकिन फिर भी ऑक्सीजन के अणु पराबैंगनी किरणों की उपस्थिति में ओजोन में बदल जाते हैं। अत्यधिक क्रियाशील होने के कारण ओजोन नाइट्स ऑक्साइड से मिलकर एक नया रूप धारण कर लेता है। यह क्रिया स्वाभाविक रूप से समताप मण्डल में चलती रहती है परंतु जब वायुमण्डल में कुछ विजातीय परमाणु का आगमन होता है तब इस प्रक्रिया में बाधा भी आ जाती है।

    ओजोन परत में छेद हो जाने की जानकारी सर्वप्रथम 1973 में मिली जब कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक  डॉ. शेरी रालैण्ड एवं डा. मैरियो मोलिना को सी. एफ. सी. द्वारा उत्सर्जित क्लोरीन परमाणु के भक्षक प्रकृति का पता चला। सन् 1975 में इस सूचना को जन-सामान्य के लिये भी उपलब्ध करा दिया गया।

   वर्ष 1985 में जब ब्रिटिश अंटार्कटिका सर्वेक्षण दल ने तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर ओजोन मण्डल में छिद्र होने की घोषणा की तो सब स्तब्ध रह गये। ओजोन छतरी में छिद्र के आकार में वृद्धि चिन्ताजनक है क्योंकि ओजोन परत में एक प्रतिशत कमी आने का तात्पर्य है कि पृथ्वी पर पहुँचने वाली पराबैंगनी किरणों की मात्रा में 1.3 से 1.5 प्रतिशत की वृद्धि अर्थात् त्वचा कैंसर एवं मोतियाबिन्द की सम्भावना में 2.6 से 3 प्रतिशत की वृद्धि।

    पृथ्वी को सूर्य की नुकसानदेह किरणों से बचाने वाली वातावरण की ओजोन परत में चीन के क्षेत्रफल के दो गुने के बराबर छिद्र हो गया है। संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम की एक रिपोर्ट के अनुसार अंटार्कटिका के ऊपर स्थित यह छिद्र करीब 2 करोड़ 20 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है जो चीन के क्षेत्रफल के दोगुने से भी ज्यादा है।

   ओजोन परत को रेफ्रिजरेशन में इस्तेमाल होने वाले क्लोरोफ्लोरो कार्बन (सी.एफ.सी.) जैसे रसायनों के कारण नुकसान पहुँच रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक क्लाउस टायफर ने कहा कि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले रसायनों और गैसों के इस्तेमाल पर अंकुश लगाकर ओजोन परत की क्षति कम की गयी है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सन् 2050 तक ओजोन परत सन् 1980 के पहले वाली स्थिति में पहुँच जायेगी।

    ओजोन परत में छेद हो जाने से सूर्य की अल्ट्रा वायलेट किरणें सीधे पृथ्वी पर पहुँचने लगीं, जो मनुष्य, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों तथा समुद्री जीवों को भी नुकसान पहुँचायेंगी। इस वर्ष का संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण पुरस्कार नोबल पुरस्कार विजेता मारियो जे. मोलिना को दिया गया है जो ओजोन पर्त के रसायनशास्त्र की ही विशेषज्ञ हैं।

पृथ्वी का रक्षा कवच- ओजोन परत

      सूर्य प्रकाश में सात रंगबैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी और लाल होते हैं। वस्तुतः यह सूर्य की किरणों का एक भाग है जिसे हमारी आँखें देख सकती हैं। सूर्य की किरणों का दूसरा अदृश्य भाग जो लाल रंग के बाद होता है अवरक्त या (Infra-Red) किरण कहलाता है। इसी प्रकार बैंगनी रंग के परे जो अदृश्य भाग होता है उन्हें पराबैंगनी या अल्ट्रा वायलेट किरण कहते हैं, जिनकी तरंगदैर्ध्य क्रमश: 7500 A से ऊपर तथा 4000 A से कम होती है।

      सामान्यतः सभी पराबैंगनी विकिरण जीवों के लिए हानिकारक हैं। परंतु अपने दुष्प्रभावों के आधार पर इन्हें भी A, B और C तीन श्रेणियों में बाँटा गया है। C श्रेणी के पराबैंगनी विकिरण अत्यन्त घातक होते हैं किन्तु B और C श्रेणी के विकिरण पृथ्वी की सतह तक पहुँच ही नहीं पाते। हमारे वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर स्थित ओजोन गैस की परत इन्हें रोक लेती है अन्यथा ये धरती पर विनाश कर देते। इस प्रकार गैस का यह ऊपरी घोल पृथ्वी के लिये सुरक्षा कवच, चादर या छतरी का काम करता है।

    संतरे के छिलके की तरह पृथ्वी के चारों ओर 800 किमी. मोटी वायुमण्डल की परत है। पृथ्वी का वायुमण्डल गुरुत्वाकर्षण की शक्ति के कारण पृथ्वी से पृथक नहीं हो पाता।

     पृथ्वी सतह से 16 किमी. की ऊँचाई के ऊपर समताप मण्डल में उच्च ऊर्जा वाले पराबैंगनी प्रकाश किरणों की उपस्थिति में ऑक्सीजन के तीन अणुओं से ओजोन के दो अणुओं का निर्माण होता है। ओजोन हमारी प्राणवायु का ही एक अन्य रूप है। साधारण ऑक्सीजन गैस के एक अणु में दो परमाणु होते हैं जबकि ओजोन गैस के एक अणु में तीन परमाणु होते हैं।

     यद्यपि ऑक्सीजन और ओजोन एक ही प्रकार के परमाणुओं से मिलकर बने होते है परंतु ऑक्सीजन का ओजोन में परिवर्तन आसान नहीं है। हाँ, B श्रेणी के पराबैंगनी विकिरण यह काम जरूर कर सकते हैं। अतः सूर्य किरणों में उपस्थित इन किरणों को सोखकर ऑक्सीजन ओजोन में बदल जाती है। यही ओजोन अब C श्रेणी के तेज विकिरणों को सोखकर पुनः ऑक्सीजन में बदल जाती है। वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर यह प्रक्रिया सतत् चलती रहती है।

      प्राकृतिक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ऊँचाई पर ओजोन का अनुपात बढ़ता जाता है। ओजोन गैस 23 से 30 किमी. तक की ऊँचाई में सघन रूप में पायी जाती है। यद्यपि ओजोन गैस 48 किमी. तक विरल मात्रा में मिलती है। अपने स्वभाव के अनुसार यह गैस सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को सोख लेती है। यह अवशोषण 20 से 40 किमी. ऊँचाई के मध्य सबसे अधिक होता है जिससे इस परत का तापमान प्रति किमी. ऊँचाई पर 16 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता है। पृथ्वी पर जीवन ही नहीं होता यदि यह रक्षाकवच वायुमण्डल में नहीं होता।

      विश्व में अंटार्कटिका महाद्वीप (दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र) के ऊपर ओजोन परत में बढ़ता छिद्र सन् 1985 से चिन्ता का विषय बना हुआ है। इसी वर्ष बढ़ते क्षेत्र को प्रमाणित ब्रिटिश वैज्ञानिक जे. फोरमेन ने किया था। नवीनतम शोधों के अनुसार पता लगता है कि यह छेद और बड़ा होता जा रहा है, साथ ही कनाडा, पश्चिमी यूरोप, रूस, न्यू इंग्लैण्ड के उत्तरी भाग, स्केन्डिनेविया, प्रायद्वीप में नार्वे और स्वीडन के ऊपर भी विशाल क्षेत्र बनने की आशंका पैदा हो गयी है।

      आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार पृथ्वी में ओजोन मण्डल का ह्रास जारी है। ह्रास की यह दर प्रति दशक उत्तरी और दक्षिणी मध्य अक्षांश में लगभग पाँच प्रतिशत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्यावरण में क्लोरीन गैस के स्तर का निरंतर बढ़ना जारी है, हालांकि यह दर 1980 में 2.9 प्रतिशत की तुलना में 1994 में अपेक्षाकृत 1.6 प्रतिशत ही बढ़ी।

ओजोन परत का ह्रास : कारण और प्रभाव

      ओजोन मण्डल के ह्रास में निरंतर कमी आने की वजह अन्तर्राष्ट्रीय दबाव रहा है। यह समस्या मांट्रियल समझौते के बावजूद बनी हुई है क्योंकि औद्योगिक क्षेत्र में क्लोरीन गैस की प्रचुरता 1998 तक अत्यधिक होने की आशंका व्यक्त की गई है और उसके बाद स्थिति के पूर्ववत् होने में लगभग 50 वर्ष तक लग जाएंगे। इसके साथ ही विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि माँट्रियल समझौते का व्यावहारिक कार्यान्वयन नहीं किया गया तो क्लोरीन गैस का स्तर आगामी 50 वर्ष में समताप मण्डल पर लगभग नौ प्रतिशत तक बढ़ जाएगा।

     पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार ओजोन मण्डल के स्तर में 1.3 प्रतिशत ह्रास का परिणाम धरातल पर सूर्य का हानिकारक पराबैंगनी विकिरण का 1.8 प्रतिशत की वृद्धि होना है।

the ozone layer

भारत और ओजोन परत-

       वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि भारत के ऊपर ओजोन परत अभी तो सुरक्षित है परंतु दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में पराबैंगनी किरणें काफी मात्रा में बढ़ रही हैं। भारतीय वैज्ञानिक दक्षिण भारत के तटीय इलाकों में बढ़ती पराबैंगनी किरणों से चिंतित हैं। उनकी राय में पराबैंगनी किरणों की अधिकता ओजोन परत में कमी या छेद होने का संकेत देती है। हालांकि एक विचार यह भी है कि पराबैंगनी किरणों का कारण भौगोलिक स्थिति है न कि ओजोन स्तर में कमी। 

      भारत में ओजोन का स्तर 240 से 350 डॉब्सन यूनिट के बीच है। जबकि अन्य देशों में ओजोन परत में बहुत अधिक कमी आयी है। वहाँ ओजोन का स्तर 110 से 115 डाब्सन यूनिट के बीच पहुँच गया है। ओजोन नेटवर्क के पाँच स्टेशन- श्रीनगर, दिल्ली, वाराणसी, पुणे, त्रिवेन्द्रम में हैं जो कुल ओजोन को मापने के लिये जमीन के उपकरण का इस्तेमाल करते हैं।

      सतही ओजोन की लगातार रिकार्डिंग करने के लिये इन पाँच स्टेशनों में से तीन स्टेशन (दिल्ली, पुणे और त्रिवेन्द्रम) ऐसे हैं जो ओजोन वितरण का लम्बात्मक स्वरूप जानने के लिये गुब्बारे वाली ओजोन सोडे का इस्तेमाल करते हैं। देश में वायु प्रदूषण की पृष्ठभूमि की मानीटरिंग करने के लिये दस स्टेशन खोले गये हैं जिनका उद्देश्य वायुमण्डलीय तत्त्वों के जमाव से सम्बन्धित क्षेत्रीय स्वरूपों का पता लगाना है। इस विभाग की सहायता से भारतीय प्रौद्योगिकीय संस्थान, नई दिल्ली में स्थित वायुमण्डलीय विज्ञान केन्द्र भारत पर वायुमण्डलीय स्थिति, ओजोन और वायु प्रदूषण के क्षेत्रों में विभिन्न अध्ययन कर रहा है।

क्लोरोफ्लोरो कार्बन और ओजोन परत-

      इसके अन्तर्गत कार्बन से जुड़े हुए हाइड्रोजन, क्लोरीन, फ्लोरीन के परमाणु होते हैं, जब ये वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर पहुँचता है तब सूर्य की पराबैंगनी किरणें सी. एफ. सी. अणुओं को तोड़ती हैं। फलस्वरूप क्लोरीन तथा अन्य परमाणुओं से अलग होते हैं जो ओजोन परत के लिए घातक हो जाते हैं। क्लोरीन का एक परमाणु ओजोन के अणुओं से प्रतिक्रिया कर इसे ऑक्सीजन में बदल देता है। यह प्रक्रिया एक श्रृंखला के रूप में चलती है।

      इस तरह क्लोरीन परमाणु ओजोन अणुओं को लगातार तोड़ते रहते हैं अर्थात् क्लोरोफ्लोरोकार्बन का एक अणु, ओजोन गैस के एक लाख अणुओं को नष्ट करता है। पृथ्वी के रक्षा कवच (ओजोन परत) में ह्रास से विश्व की यह समस्या भयावह रूप ले रही है। जून 1992 के रीओडीजैनेरो में हुए पृथ्वी सम्मेलन में आये वैज्ञानिकों द्वारा इस सम्बन्ध में भारी चिन्ता व्यक्त की गयी थी।

ओजोन परत को नष्ट करने वाले उद्योग एवं प्रमुख देश-

       क्लोरोफ्लोरो कार्बन का उपयोग औद्योगिक क्षेत्रों में सबसे अधिक किया जाता है। प्रशीतन (रेफ्रिजरेटर), एयर कण्डीशनर, हेयर डाई तथा सुगंध का छिड़काव करने से क्लोरोफ्लोरो कार्बन निकलती है। वायु विलय (एरोसोल) पेन्ट, उर्वरकों के निर्माण करने वाले कारखानों, प्लास्टिक पैन तैयार करने, धमनकारी के रूप में प्रयुक्त करने पर यह बड़ी मात्रा में निकलती है।

      इसके अतिरिक एयरोस्पेस, इलेक्ट्रॉनिक, ऑप्टीकल तथा फार्मेसी उद्योगों में वृहत् स्तर पर इसका उत्पादन होता है। इसके साथ हवाई जहाजों से भी यह रिसती है। शीत युद्ध के दौरान सुपरसोनिक विमान आसमान में 15-29 किमी. की ऊँचाई पर उड़कर सीएफसी छोड़ते हैं। अणु बम का विस्फोट भी ओजोन परत का घातक है।

      सातवें दशक में विश्व में सीएफसी का वार्षिक उत्पादन मात्र 6 लाख टन के लगभग था। 8वें दशक के अन्त तक यह सोलह गुने से अधिक हो गया अर्थात् 1 अरब टन में हो गया। उपग्रहों ने ओजोन परत के ह्रास के चिन्ताजनक चित्र उपलब्ध कराये हैं।

      वर्तमान विश्व में सीएफसी का वार्षिक उत्पादन 7,50,000 मीट्रिक टन है। इसमें से मात्र विकसित देशों में इसका उत्पादन और उपयोग 88 प्रतिशत से अधिक है। अकेले संयुक्त राज्य अमेरीका 97.4 प्रतिशत, पश्चिमी यूरोप 96.70 प्रतिशत, जापान 12.4 प्रतिशत, पुराने साम्यवादी देश 2.2 प्रतिशत, शेष दुनिया के देश 4.1 प्रतिशत भारत और चीन ओजोन सतह के लिए हानिकारक रसायनों का उत्पादन विश्व के कुल उत्पादन का 3 प्रतिशत ही करते हैं। मिथाइल क्रोमाइड भी ओजोन के लिये अन्य घातक गैस है।

सी. एफ. सी. के उत्पादन का वर्तमान और भविष्य-

       सी. एफ. सी. का वर्तमान वार्षिक उत्पादन 7,50,000 मीट्रिक टन है। अमेरीका में इसका उपयोग 3,000 ग्राम प्रति व्यक्ति है जबकि भारत में प्रति व्यक्ति खपत मात्र 10 ग्राम है। यद्यपि भारत में भी तीव्र औद्योगीकरण हो रहा है जिसमें सी. एफ. सी. का उपयोग-उत्पादन भी होगा। 

       वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वायुमंडल में कुछ ओजोन-घटाने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सी.एफ.सी.) की सांद्रता वर्तमान में तेजी से बढ़ रही है, बावजूद इसके कि इन रसायनों के उत्पादन पर 2010 से विश्व स्तर पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

       सी.एफ.सी. का उपयोग आमतौर पर रेफ्रिजरेंट्स, एयरोसोल प्रोपेलेंट और सॉल्वैंट्स में किया जाता था जब तक कि उन्हें ओजोन परत के विनाश के पीछे प्रेरक शक्ति के रूप में नहीं खोजा गया था। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत, उनका उत्पादन 1989 से 2010 तक चरणबद्ध तरीके से बंद कर दिया गया था।

     लेकिन ब्रिटेन के ब्रिस्टल विश्वविद्यालय में ल्यूक वेस्टर्न एवं उनके सहयोगियों ने 2010 और 2020 के बीच पाँच सी.एफ.सी. रसायनों की वैश्विक वायुमंडलीय सांद्रता में तेज से वृद्धि का खुलासा किया है, जो यह संकेत दे रहा है कि कुछ कारखानों में अभी भी उनका अवैध रूप से उत्पादन किया जा रहा है।

   दुनिया भर के 14 माप स्थलों से डाटा का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने पाया कि सी.एफ.सी.-112A, सी.एफ.सी.-113, सी.एफ.सी.-113A, सी.एफ.सी.-114A और सी.एफसी.-115 की सांद्रता 2010 के बाद से बढ़ी है, जो 2020 में वायुमंडल में रिकॉर्ड उच्च बहुतायत तक पहुँच गई है। वेस्टर्न ने एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि उत्सर्जन में बढ़ोतरी से ओजोन परत की रिकवरी में उल्लेखनीय बाधा आने की संभावना नहीं है, जिसके 2060 के दशक तक पूरी तरह से ठीक होने की उम्मीद है , लेकिन सी.एफ.सी. गैसों के ग्रह-वार्मिंग प्रभाव का मतलब है कि परिणाम चिंता का विषय हैं।

ओजोन छेद से निसृत पराबैंगनी किरणों के प्रभाव

1. मनुष्यों पर:-

(i) त्वचा पर-

      यदि ओजोन परत में एक प्रतिशत ओजोन गैस घटती है तो पृथ्वी पर दो प्रतिशत त्वचा कैंसर बढ़ता है। चूँकि ओजोन परत में सबसे बड़ा छेद दक्षिणी ध्रुव के पास है अतः आस्ट्रेलिया में “मेलानोमा कैंसर से मरने वालों की संख्या सर्वाधिक है। किरणें जिनकी तरंगदैर्घ्य 250-350 एन. एम. एस. होती है, त्वचा कैंसर के लिए उत्तरदायी हैं। गोरी चमड़ी वालों पर यह अधिक प्रभावी सिद्ध हुई है।

(ii) आँखों पर-

      मोतियाबिन्द (कैटरिक्ट) आँखों के लैंसों में धुंधलापन तथा आँखों में असाध्य दृष्टि दोष और अंधापन उत्पन्न होता है। सन् 1990-91 से आँखों की बीमारियों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है अर्थात् 2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

(iii) प्रतिरोधक तंत्र पर-

       प्रतिरोधक क्षमता का ह्रास होने से संक्रामक रोगों की आशंका बढ़ जाती है।

2. कृषि एवं वनस्पतियों पर:-

    250 से 350 एन. एम. एस. (नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य की इकाई) तरंगदैर्घ्य वाली पराबैंगनी किरणें, यू. बी. बी. सबसे ज्यादा फसलों, मानसून प्रणाली एवं वनस्पतियों को प्रभावित करती हैं। इन किरणों का प्रकाश संश्लेषण की क्रिया पर प्रभाव पड़ने से फसलें और वनस्पतियाँ नष्ट होंगी जिससे उपज भी कुप्रभावित होती है।

3. समुद्री जीवों पर:-

      विकिरण का कुप्रभाव फाइटोप्लेंकटन पर पड़ता है जो मछलियों का प्रमुख खाद्य पदार्थ है। इसकी संख्या में ह्रास हो जाता है। अतः भविष्य में मछलियों एवं अन्य सामुद्रिक जीवों के उत्पादन में भारी कमी आ सकती है।

4. स्वास्थ्य पर:-

     हाल ही में की गई एक खोज से पता चला है कि ओजोन स्तर में वृद्धि का सम्बन्ध शहरी क्षेत्रों के लोगों की मौत से है। वाहनों से निकलने वाला धुआँ और पावर स्टेशनों से हुआ प्रदूषण ओजोन का स्तर बढ़ाता है। फलस्वरूप अस्पतालों में अस्थमा और फेफड़ों से सम्बन्धित रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है।

5. जलवायु पर:-

      धरती से लगभग 20 किमी. के ऊपर ओजोन की परत है जो लगभग 2 प्रतिशत ताप अवशोषित करती है। जिससे इस परत का तापमान ऊपर जाने पर बहुत तेजी से (16 डिग्री सेल्सियस प्रति किमी. की दर से) बढ़ता है। इसी ऊँचाई पर जैट स्ट्रीम (संकरे चैनल) में तेज गति से वायु प्रभावित होती है जो मानसूनी हवाओं को प्रभावित करती है जिससे जलवायु परिवर्तन का क्रम परिलक्षित होता है।

सी. एफ. सी. का विकल्प:-

      कम तरंगदैर्घ्य का यू.बी.सी. (100-280 एम. एम. एस.) पराबैंगनी किरणों को, कार्बन डाइ ऑक्साइड तथा पानी और ऑक्सीजन अवशोषित करती है। इसके साथ ही कुछ और भी गैसें हैं जो पराबैंगनी किरणों का अवशोषण करती हैं। सी. एफ. सी. के अन्य विकल्पों में हाइड्रोक्लोरो कार्बन, हाइड्रो कार्बन तथा अमोनिया गैस है, इसके साथ ही हाइड्रो क्लोरो कार्बन भी है। इसका उपयोग क्रमशः उद्योगों और रेफ्रीजरेटरों में किया जा रहा है।

सी. एफ. सी. पर प्रतिबन्ध:-

     अन्तर्राष्ट्रीय जगत में सन् 1987 में मांट्रियल प्रोटोकाल के तहत विकसित देशों को सन् 2000 तक 50 प्रतिशत सी. एफ. सी. के उत्पादन में कमी लानी है। दूसरा प्रयास अगस्त 1990 में लंदन में किया गया जिसमें 1995 तक सी. एफ. सी. की पूर्ण समाप्ति के लिये प्रस्ताव रखा गया था। विकासशील देशों को 10 वर्ष का अतिरिक्त समय दिया गया था।

      संशोधन में सी. एफ. सी. के कई अन्य पदार्थ शामिल किये गये। कार्बन ट्रेटा क्लोराइड और क्लोरोफार्म भी इस नई सूची में शामिल किये गये। जून 1992 में रियोडीजैनेरो (ब्राजील) में पश्चिम के देश जैव विविधता के सिद्धांत पर सहमत नहीं हुए। पूरब के देश क्लोरो फ्लोरो कार्बन के उपयोग पर प्रतिबन्ध नहीं चाहते। अतः भविष्य में इसका उत्पादन कम होगा, इसमें आशंका है।

निष्कर्ष:-

      संक्षेप में कहा जा सकता है कि क्लोरो फ्लोरो कार्बन का एक अणु ओजोन गैस के एक लाख अणुओं को नष्ट करता है और यदि ओजोन गैस एक प्रतिशत घटती है तो पृथ्वी पर दो प्रतिशत त्वचा कैंसर और अंधत्व की बीमारियाँ बढ़ जाती हैं। पराबैंगनी किरण मनुष्य की प्रतिरक्षा प्रणाली पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और वह साधारण सी बीमारियों का भी मुकाबला नहीं कर पाता।

     पराबैंगनी किरणों का प्रभाव हमारे गुणसूत्रों (जीन्स) पर भी पड़ता है, और आने वाली पीढ़ी विकलांग, मानसिक रोगी अथवा विक्षिप्त भी हो सकती है। यह विकिरण वनस्पति पर भी अपना कुप्रभाव डालते हैं।

     अतः संक्षेप में कह सकते हैं कि पृथ्वी की ओजोन परत तेजी से बिगड़ रही है और वह अपना प्राकृतिक स्वरूप खोती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र से सम्बद्ध मौसम अभिकरण ने यह बात कही है। ज्ञातव्य है कि वायुमण्डल में प्राकृतिक रूप से बनी ओजोन आकाश में अपनी परत और फिर मण्डल बनाकर सूर्य की नुकसानदेह पराबैंगनी किरणों से हमारी एवं जीव-जन्तुओं और मवेशियों तथा सम्पूर्ण वनस्पति जगत की रक्षा करता है।

     संयुक्त राष्ट्र के अभिकरण के अनुसार ओजोन परत को नुकसान पहुँचाने में उद्योग-धन्धों से निकलने वाली कई गैसें मुख्यतया जिम्मेदार हैं। इसके कारण लोगों में त्वचा कैंसर तथा मोतियाबिन्द का खतरा बढ़ता जा रहा है। ओजोन परत में छेद होने का पता पहली बार नौवें दशक में दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में चला तब से ओजोन स्तर के खराब होने की स्थिति प्रतिवर्ष बदस्तूर बनती जाती है। बताया गया है कि तीव्र सर्दी तथा सूर्य की रोशनी मिल करके ओजोन की परत को सबसे अधिक खराब करती है।

     ओजोन के लिये संयुक्त राष्ट्र मौसम संगठन के सलाहकार डारूमेन बोजकोव के अनुसार ओजोन परत का ह्रास एक खतरनाक मोड़ ले लेता है, जबकि समताप मण्डल का तापमान बहुत कम हो जाता है। ज्ञातव्य है कि वायुमण्डल में ओजोन मण्डल के कम होने से क्लोरीन का स्तर बढ़ जाता है। यह क्लोरो फ्लोरो कार्बन में मिलता है। दक्षिण ध्रुव क्षेत्र में निरीक्षण जांच स्थलों से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार विश्व मौसम संगठन के क्षेत्र में सितम्बर और अक्टूबर में ओजोन स्तर के ह्रास का मापन किया।

       विश्व मौसम संगठन के प्रवक्ता एराह डाल गोर ने कहा है कि हम ओजोन परत के बारे में यथासम्भव नया रिकार्ड देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि वायुमण्डल में 17 किमी. की ऊँचाई पर ओजोन की स्थिति काफी चिन्ताजनक है।

      विश्व मौसम संगठन में पर्यावरण अनुसंधान के निदेशक फ्रीडेरिक डेल्सोल ने कहा कि ओजोन मण्डल में मामूली क्षेत्र में बिगड़ाव का उतना दूरगामी प्रतिकूल असर नहीं छोड़ता, परंतु ओजोन स्तर में बिगड़ाव की व्यापक प्रवृत्ति दिख रही है, उन्होंने कहा कि विगत चार वर्षों में ओजोन परत के छिद्र का आकार बढ़कर दो गुना हो गया है। ज्ञातव्य है कि संयुक्त राष्ट्र का यह अभिकण ओजोन के स्थल की जाँच पिछले चालीस वर्ष से कती आ रही है।


16. What is acid rain? Its causes and effects (अम्लीय वर्षा क्या है? इसके कारण एवं प्रभाव)

16. What is acid rain? Its causes and effects

(अम्लीय वर्षा क्या है? इसके कारण एवं प्रभाव)



        अम्लीय वर्षा’ शब्द का उपयोग सर्वप्रथम रॉबर्ट एंग्स ने सन् 1972 में किया। वर्षा का जल वायुमण्डल में उपस्थित गैसों से रासायनिक क्रिया कर जब अम्लीय होकर बरसता है तो इसे अम्लीय वर्षा कहते हैं। दूसरे शब्दों में किसी भी प्रकार की वर्षा जिसमें अम्ल की असामान्य उपस्थिति होती है, अम्लीय वर्षा होती है। यह कम पीएच देने वाली बारिश में हाइड्रोजन आयनों की उच्च संख्या को इंगित करता है। अम्लीय वर्षा का जलीय जीवन, पौधों और बुनियादी सुविधाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अम्लीय वर्षा के मुख्य घटक हवा में जल वाष्प अणुओं के साथ उत्सर्जित सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड की प्रतिक्रिया से बनते हैं। 

       सघन औद्योगिक प्रदेशों में वर्षा के पानी की अम्लीयता हानिकारक स्थिति तक पहुँच जाती है। तेजाबी वर्षा का विशेष तथ्य यह है कि कुछ एक राष्ट्रों की चिमनियाँ धुआँ उगलती हैं और दूसरे राष्ट्रों के लोग भी इसके कारण अम्लीय वर्षा झेलते हैं। नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क आदि यूरोपीय राष्ट्र, ब्रिटेन और फ्रांस पर यह आरोप लगा रहे हैं कि उनके कल-कारखानों से निकलने वाले धुएँ से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है तथा उनके देशों में अम्लीय वर्षा हो रही है। पूरे यूरोप, कनाडा, अमेरिका और स्कैण्डिनेवियायी देशों में अम्ल वृष्टि का प्रकोप खतरनाक ढंग से बढ़ता जा रहा है। अब तक स्वीडन की 10 हजार और कनाडा की 40 हजार झीलें अम्लीय हो चुकी हैं।

       अप्रैल 1979 में स्कॉटलैण्ड में अम्लीय वर्षा के कारण नींबू के रस जितनी अम्लीयता (pH-2.2) या सिरके से ज्यादा अम्लीय वर्षा रिकार्ड की गयी। विश्व में उत्तरी-पूर्वी अमेरीका, उत्तरी यूरोप और पश्चिमी तटीय भारत भविष्य के आशंकाग्रस्त क्षेत्र हैं। यू. एस. ए. के लॉस एन्जिल्स और झीलों के देश स्वीडन की झीलों में अम्लीय वर्षा के प्रभाव परिलक्षित हुए।

अम्लीय वर्षा की प्रक्रिया

       वह जल वाष्प जो SO2 (सल्फर डाइ ऑक्साइड) और नाइट्रोजन ऑक्साइड के भूरे भूरे बादलों के रूप में आकाश में मँडराते हैं। ये दोनों ऑक्साइड कारखानों में जलते ईंधन से निकलकर सूक्ष्म कणों के रूप में वायु और मेघों में जमा हो जाते हैं और बाद हैं। में सल्फ्यूरिक एसिड और नाइट्रिक एसिड का रूप ले लेते हैं हवा का बहाव कभी-कभी उन्हें अपने मूल स्थान से हजारों किलोमीटर दूर भेज देता है। इस तरह अम्लीय वर्षा के ये बादल विकसित देशों से चलकर देशों में जा पहुँचते हैं।

अम्लीय वर्षा के कारण-

       जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला और पेट्रोल जो उद्योगों एवं आधुनिक परिवहन के साधनों में दहन किया जाता है या बड़ी मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। इसके साथ ही कुछ अयस्क जिनमें सल्फर होता है वे भी गरम होने पर सल्फर डाइ-ऑक्साइड बनाते हैं। उच्च तापमान पर सल्फर एवं नाइट्रोजन के ऑक्साइड जल वाष्प की उपस्थिति में सल्फ्यूरिक एसिड। गन्धक का अम्ल तथा नाइट्रिक एसिड (शोरे का अम्ल) बनाते हैं।

     इसी प्रकार ताप विद्युत गृहों में कोयले के जलने से निसृत क्लोरीन गैस जल से क्रिया करके हाइड्रोक्लोरिक एसिड बनाती है। कार्बन डाइ ऑक्साइड भी कार्बोलिक अम्ल तनु (दुर्लभ) रूप में बनाती है। संक्षेप में तेज धूप में नाइट्रस ऑक्साइड, ओजोन, हाइड्रो कार्बन तथा ऑक्सीजन परस्पर क्रिया करते हैं जिससे रासायनिक कोहरा बनता है। इसी कोहरे के परिणामस्वरूप कालांतर में अम्लीय वर्षा होती है। इस प्रकार विभिन्न स्रोतों से विभिन्न अम्ल बनने की क्रिया रासायनिक सूत्रों द्वारा चित्र में अभिव्यक्त की गयी है।

What is acid rain

     वर्तमान युग में आटोमोबाइल्स एवं औद्योगिक इकाइयों की स्थापना की प्रतिस्पर्धा होने से इनकी संख्या में दिनोंदिन वृद्धि हो रही है। ताप विद्युत गृहों की संख्या और उनमें कोयला उपयोग की मात्रा में निरंतर वृद्धि होने से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइ ऑक्साइड गैस पैदा हो रही है। कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैस अम्लीय प्रकृति की गैस है। अतः जल में घुलकर (तनु) कार्बोलिक अम्ल बनाती है जिससे वर्षा जल की प्रवृत्ति अम्लीय हो जाती है। शुद्ध जल का पी. एच. मूल्य 7 है। जहाँ न पानी अम्लीय होता है और न ही क्षारीय अर्थात् उदासीन होता है। इससे कम होने या पी. एच. मूल्यांक घटाने पर अम्लीयता बढ़ती है तथा पी. एच. मूल्यांक बढ़ने पर क्षारीयता बढ़ती है।

      अम्ल वृष्टि से प्राप्त जल में 1.9 से 5.7 तक पी. एच. मूल्य पाया जाता है। यह मात्रा कोयले के अयस्क में उपस्थित गन्धक की मात्रा के ऊपर निर्भर करती है। कोयले के उपयोग की मात्रा भी इसको प्रभावित करती है। जैसे सिंगरौली के सुपर पावर थर्मल प्लाण्ट में प्रतिदिन 909 मीट्रिक टन कोयला उपयोग कर 45 से 182 मीट्रिक टन सल्फर डाइ-ऑक्साइड पैदा होती है। यदि ऐसी स्थिति में चिमनियाँ ऊँची न हों तो अम्ल वृष्टि क्षेत्रीय समस्या के रूप में भविष्य में उभर सकती है। इसी प्रकार पेट्रोलियम शोधक कारखानें भी सल्फर डाइऑक्साइड को बड़ी मात्रा में उत्पादित कर अम्ल वृष्टि की आशंका को जन्म देती है।

     विगत दशक में यह समस्या यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरीका के सघन औद्योगिक क्षेत्रों में जन्मी तथा वर्तमान में बहुत से औद्योगिक केन्द्र एवं औद्योगिक प्रदेश भी इसकी आशंका से ग्रसित हैं। जैसे कानपुर, कोटा, सिंगरौली, छोटानागपुर का पठार आदि।

अम्ल वृष्टि का प्रभाव:-

     अम्ल वृष्टि का कुप्रभाव जलाशय, वन संसाधनों, मिट्टियों की उत्पादकता के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व में भू-दृश्यों पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पेयजल स्रोत अम्लीय होकर स्वतः ही प्रदूषण की ओर अग्रसर हो रहा है। अतः मत्स्य संसाधन को भारी क्षति होना स्वाभाविक ही है। मिट्टियाँ अम्लीय हो जाने से अनुत्पादक हो जाती हैं।

     अम्ल वर्षा से सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व के पर्यटन स्थल एवं जलाशय कुप्रभावित हो जाते हैं। इमारतों को भारी क्षति पहुँचती है। जैसे आगरा के उद्योग एवं मथुरा रिफाइनरी की स्थापना के समय यह एक प्रश्नचिह्न उभर कर सामने आया था कि शोधन प्रक्रिया से निकली सल्फर डाइऑक्साइड शीघ्र ही सल्फ्यूरिक अम्ल वृष्टि से ताजमहल जैसी विश्व प्रसिद्ध इमारत, जो संगमरमर की बनी है, क्षतिग्रस्त होगी।

      ऐसा अनुमान है कि सभी उपाय और सावधानी के बावजूद मन्थरगति से क्षरण का प्रभाव भविष्य में देखा जायेगा। वैसे ताजमहल के सफेद रंग में परिवर्तन अभी से दिखाई पड़ रहा है। यही कारण है कि एक कानून पास कर शासन ने आगरा तथा उसके आसपास के कारखानों को 1992 में बंद करने के आदेश दिये थे।

अम्ल वर्षा का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव:-

     निम्न गैसों की निम्नांकित प्रतिशत से अधिक मात्रा मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है-

       सल्फर डाइ-ऑक्साइड (SO2)- 3 पी.पी.एम., कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO)-100 पी. पी. एम., नाइट्रोजन ऑक्साइड 1.4 पी. पी. एम.।

     इनमें सबसे ज्यादा खतरनाक सल्फर डाइऑक्साइड गैस है। इससे धूम्र कोहरा बढ़ता है, और यदि आर्द्रता अधिक हो तो अस्थमा, ब्रोन्काइटस एवं फेफड़ों के कैंसर की आशंका बढ़ जाती है। इसके सूक्ष्मकण फेफड़ों में जाते हैं जिससे कोशिकाओं को हानि होती है और कालांतर में घाव बन जाते हैं। इससे फेफड़े के कैंसर की आशंका बढ़ जाती है।

     ‘कार्बन मोनो ऑक्साइड में कोई गन्ध नहीं होती, परंतु यह जहर का काम करती है। एक अध्ययन के अनुसार सन् 1952 में लंदन में मृत्यु दर 250 प्रतिदिन थी जो धूम्र, कुहरे में बढ़कर 750 हो गयी थी। इससे आँखों की तकलीफें बढ़ जाती हैं और ट्रिकोमा, इन्जेक्टीवाईटिस प्राय: ज्यादा धुएँ वाले इलाकों में देखने को मिलते हैं। इससे मानव को न केवल शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य और कार्यक्षमता प्रभावित होती है अपितु परोक्ष रूप से दूसरी बीमारियों का भी जन्म होता है; जैसे- आमाशय कैंसर और तंत्रिका तंत्र की शिथिलता; अम्लीय जल के प्रभाव से चर्मरोग जैसे- खाज-खुजली, एक्जिमा और एलर्जी का प्रकोप बढ़ सकता है।

       दूसरी तरफ गुर्दों से सम्बन्धित बीमारियाँ जन्म लेती हैं जैसे- पथरी पड़ना। अल्सर और पीलिया दूषित पानी से होता है। वैसे अम्लीय वर्षा से स्वास्थ्य पर प्रभाव का कोई प्रामाणिक अध्ययन अभी तक प्रस्तुत नहीं हो सका है न ही अम्ल वर्षा बड़े पैमाने पर वर्तमान में किसी बड़े क्षेत्र में निश्चित रूप से हो रही है किन्तु भविष्य में होने की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।

अम्ल वर्षा का पेड़-पौधों पर प्रभाव:-

       अम्लीय वर्षा जिसमें सल्फर डाइ-ऑक्साइड की मात्रा होने से प्रकाश संश्लेषण कुप्रभावित होता है और वनस्पति पर कुठाराघात होता है। परिणामस्वरूप वातावरण और दूषित हो जाता है। सल्फर डाइ-ऑक्साइड की अधिकता से पेड़-पौधों के ऊतक जल जाते हैं, पत्तियों के नुकीले हिस्से जलकर टेढ़े हो जाते हैं। इसको महानगरीय सघन परिवहन के क्षेत्र में पेड़-पौधों में देखा जा सकता है, ओजोन गैसे पत्तियों के ऊतकों को नुकसान पहुँचता है। “पराक्लीएसाइल नाइट्रेट” नई कोपलों को नष्ट कर देता है।

     सिनसिनाटी एवं न्यूयार्क नगर में वायु प्रदूषण के एक अध्ययन में पाया गया है कि कार्बन मोनोऑक्साइड का प्रतिशत पार्क और खुले इलाकों की तुलना में औद्योगिक क्षेत्रों में 60 से 70 प्रतिशत अधिक था। यह प्रतिशत पेड़-पौधों के लिए भी बहुत हानिकारक है और पेड़ों के विकास और वृद्धि पर बुरा असर डालता है।

अम्ल वर्षा की आशंका से बचने के उपाय

1. औद्योगीकरण से होने वाले प्रदूषणों पर रोक लगाना।

2. जन चेतना द्वारा जागरूकता पैदा करना।

3. सामूहिक प्रयास।

4. ऊर्जा के ऐसे स्रोतों की खोज जो प्रदूषण न फैलाते हों।

5. निरंतर वायुमण्डल की दशा का अध्ययन।

6. पर्यावण संक्षण कानूनों का कड़ाई से पालन।


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