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15. Describe the gases causing green house effect (हरित गृह प्रवाह को बढ़ाने वाली गैसों का वर्णन)

15. Describe the gases causing green house effect

(हरित गृह प्रवाह को बढ़ाने वाली गैसों का वर्णन)



      कार्बन डाइ ऑक्साइड के अलावा जल वाष्प, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन और ओजोन अन्य गैसें हैं जो धरती का तापमान बढ़ा रही हैं। इनमें वायुमण्डल में अत्यधिक जीवाश्म ईंधन के दहन से निरंतर कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा तेजी से बढ़ रही है। पिछले वर्षों में हुए औद्योगीकरण के कारण वायुमण्डल में कार्बन डाइ-ऑक्साइड की मात्रा 25 प्रतिशत तक बढ़ गयी है। एक मोटे अनुमान के अनुसार एक ही वर्ष में 1.8 टन तक कार्बन डाइ ऑक्साइड वायुमण्डल में बढ़ जाती है। अतः आज के औद्योगिक युग में अनुमानतः कार्बन डाइ ऑक्साइड विगत युगों से दुगुनी मात्रा में निकल रही है। प्रत्येक वर्ष 4 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड विलुप्त हो जाती है।

      एक प्रतिवेदन के अनुसार इस समय प्रतिवर्ष 5.7 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड पेट्रोल और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों को जलाने से वायुमण्डल में पहुँच रही है। इसके अतिरिक्त प्रतिवर्ष दो अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड उष्णकटिबन्धीय वनों के विनाश के कारण वायुमण्डल में पहुँच रही है। इस प्रकार उद्योग और आधुनिक परिवहन के साधनों में ईंधन के दहन के द्वारा 5.7 अरब टन अर्थात् 600 करोड़ टन (6 अरब टन) कार्बन डाइ ऑक्साइड प्रतिवर्ष वायुमण्डल में छोड़ी जाती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मृदा जुताई द्वारा उत्पन्न कार्बन डाइ-ऑक्साइड, 200 करोड़ टन वायुमण्डल में प्रतिवर्ष निकलती है।

       इस प्रकार कुल 7.7 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड में सिर्फ 3.8 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड ही वायुमण्डल में बची रहती है। शेष करीब 4 टन कार्बन डाइ ऑक्साइड हर वर्ष गायब हो जाती है। इसे लापता कार्बन डाइक्साइड कहते हैं। प्रतिवेदन के अनुसार ऐसा न होने पर वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा एकाएक कई गुना बढ़ जायेगी और ग्रीन हाउस प्रभाव में वृद्धि होने से धरती का तापमान अचानक बढ़ जायेगा। इस आशंका के मद्देनजर वैज्ञानिक लापता कार्बन डाइ ऑक्साइड का पता लगाने के काम में पूरे जोर-शोर से जुटे हैं।

      वैज्ञानिकों के एक वर्ग का अनुमान है कि आधी कार्बन डाइ ऑक्साइड समुद्रों द्वारा अवशोषित हो जाती है तथा आधी वनस्पतियों द्वारा अवशोषित होने पर भी लगभग 3 अरब टन अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड प्रतिवर्ष वायुमण्डल में जमा हो रही है। कार्बन डाइ-ऑक्साइड की यह मात्रा ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न कर समस्त पृथ्वी को निरंतर गर्म कर रही है। भविष्य में प्रत्येक दशक में तापमान में औसतन 0.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होगी और परिणामस्वरूप अगले 300 वर्षों में यदि इसी तरह प्रकृति बनी रही तो तापमान 10 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाने का अनुमान है। एक अनुमान के अनुसार सन् 2025 में पृथ्वी का तापमान 1 डिग्री सेल्सियस अधिक होगा और सन् 2050 में 2.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक होगा।

     सन् 2100 में 5.5 डिग्री तथा सन् 2300 में पृथ्वी का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस अधिक हो जायेगा। आज वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड 0.03 प्रतिशत से बढ़कर 0.05 प्रतिशत तक पायी जा रही है। आधुनिक परिवहन के साधन, उद्योग, घटते वन और बढ़ते नगरों से पिछले सौ वर्षों में 36,000 करोड़ टन कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्पन्न की है और इससे अधिक आज उत्पन्न की जा रही है। चीन कार्बन डाइ ऑक्साइड के उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान रखता है। विश्व में सन् 1960 से 1990 के बीच ज्वलनशील ईंधन ने वायुमण्डल में लगभग 14 प्रतिशत कार्बन डाइ ऑक्साइड की वृद्धि कर दी है। इससे तापमान में सन् 1960 से 0.5 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वृद्धि हुई है। जबकि पूर्व वर्षों में कई सदियों से यह मात्रा लगभग एक-सी रही है और सन्तुलन कायम रहा है। यद्यपि वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की 0.03 प्रतिशत मात्रा पृथ्वी में ऊर्जा सन्तुलन जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों के लिये आवश्यक हैं वनस्पतियों की वृद्धि और विकास के लिए यह वांछनीय है। लेकिन इसकी निरंतर वृद्धि से भविष्य में घातक परिणाम सामने आ सकते हैं जो सम्पूर्ण पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन करने की क्षमता रखते हैं। हर वर्ष 110 अरब टन कार्बन डाइ-ऑक्साइड धरती से होने वाली तमाम जैविक प्रक्रियाओं द्वारा वायुमण्डल में पहुँचती है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, उद्योगों, मोटर वाहनों, घरेलू उपयोग आदि की ऊर्जा की आवश्यकता के लिये जलाये गये कोयले या पेट्रोल (जीवाश्म ईंधनों) से हर वर्ष 5.7 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड वायुमण्डल में पहुँच रही है। इसके अलावा हर वर्ष दो अरब टन से भी ज्यादा कार्बन डाइ ऑक्साइड धरती के कहे जाने वाले उष्ण कटिबन्धीय जंगलों के विनाश से (खेती के लिए/ आग जलाकर साफ किये जाने के कारण) वायुमण्डल में पहुँच रही है।

       कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्पन्न करने वाली अनेक प्रक्रियाएँ हैं। इनमें मुख्य हैं ईंधन का दहन, कार्बनिक पदार्थों का विघटन, पेड़-पौधों और जन्तुओं के शरीर में भोजन के कारण और अन्य अप्राकृतिक विधियों से भी कार्बन डाइऑक्साइड का उत्पादन होता है। विभिन्न उद्योग जो कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधन पर आश्रित हैं। वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की बढ़ती मात्रा के लिए जिम्मेदार हैं। वनों के जलने और नष्ट होने से यह बढ़ी और औद्योगीकरण के पूर्व में वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा 290 पी. पी. एम. (पार्टस पर मिलियन) या 0.029 प्रतिशत थी। विगत वर्षों में 0.003 प्रतिशत से बढ़कर आज यह 0.38 प्रतिशत हो गयी है। इस प्रकार इसमें लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि हो गयी है।

      कार्बन डाइ ऑक्साइड की वृद्धि यदि इसी दर से पृथ्वी पर होती रही तो आने वाले सौ वर्षों में इसका असर या स्तर औद्योगीकरण के पहले के स्तर से दुगुना हो जायेगा। इस तथ्य का ठीक-ठीक अनुमान लगाये जाने पर विद्वानों में मतभेद है, फिर भी भविष्यवाणी की जा सकती है कि सन् 2030 में सार्वत्रिक माध्यताप (Global Mean Temperature) सन् 1980 की तुलना में 2 डिग्री सेल्सियस अधिक होगा। यह भी अनुमान लगाया जाता है कि सन् 2030 में पृथ्वी इतनी गर्म होगी, जितनी कि पिछले 1,20,000 वर्षों में कभी नहीं रही होगी।

     ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा करने वाली गैसों में आधी से अधिक कार्बन डाइ-ऑक्साइड ही प्रभावी है। शेष के अधिकांश भाग में क्लोरोफ्लोरो कार्बन, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें हैं। औद्योगीकरण की गति दुगुने से अधिक है। अतः इन गैसों का मिश्रण भविष्य में बढ़ेगा।

     वायुमण्डल में अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड का होना तथा इससे होने वाली सर्वात्रिक तापन (global warming) वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के लिये गहन चिन्ता का विषय है। सन् 1989 में प्रकाशित यू. एस. ए. नेशनल रिसोर्सेज, डिफेन्स काउनसलिंग के प्रतिवेदन के अनुसार सार्वत्रिक तापन ध्रुवों पर सबसे अधिक होगा। सात-आठ डिग्री फारेनहाइट की ध्रुव पर 20 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान की वृद्धि कर सकती है। इतने अधिक गरमाहट से कार्बन डाइ ऑक्साइड की बहुत बड़ी मात्रा जो कि अभी मिट्टी और वनस्पति के साथ जमी है, बाहर आयेगी। इससे सार्वत्रिक तापन को और बढ़ावा मिल सकता है। सार्वत्रिक तापन के साथ-साथ बदलती हुई प्रवृत्ति (Inter-Governmental Panel on Climatic Change) के अनुसार सन् 1940 तक गरमाहट प्रदर्शित करती है और इसके पश्चात् सन् 1970 तक शीतलन की प्रकृति परिलक्षित होती है। अब सन् 1970 के बाद फिर से गरमाहट होने का संकेत मिला है अर्थात् वर्तमान में तापमान में वृद्धि हो रही है जो पहले की तुलना में कहीं ज्यादा है। सन् 1980 से 1990 का दशक इस शताब्दी का सर्वाधिक गरम दशक रहा है।

हरित गृह प्रभाव को बढ़ाने वाली अन्य गैसें:-

       स्पष्ट है कि ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करने वाली प्रमुख गैसों की मात्रा वायुमण्डल में आवश्यकता से अधिक होती जा रही है और इसी कारण पृथ्वी का औसत तापमान भी बढ़ता जा रहा है। 1980 के दशक में पृथ्वी पर सबसे अधिक गर्मी पड़ी थी वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि यही स्थिति जारी रही तो अगले 25 वर्षों में पृथ्वी का औसत तापमान 3 डिग्री तक बढ़ सकता है। कुछ क्षेत्रों में तो यह वृद्धि में पृथ्वी का औसतन तापमान 3 डिग्री तक बढ़ सकता है। कुछ क्षेत्रों में तो यह वृद्धि 5 डिग्री से 7 डिग्री तक भी हो सकती है। कुछ वैज्ञानिकों का यह भी अनुमान है कि अगले 50 वर्षों में पृथ्वी इतनी गर्म हो जायेगी जितने पिछले एक लाख वर्षों में कभी नहीं रही होगी।

        हरित ग्रह प्रभाव को प्रभावी बनाने वाली निम्नलिखित क्रियाएँ एवं गैसें हैं-

1. जल वाष्प:-

       जल वाष्प एक प्राकृतिक ग्रीन हाउस गैस है। तापमान बढ़ाने में इसकी एक अलग भूमिका है। होता यह है कि ग्रीन हाउस गैसों के कारण तापमान में वृद्धि होने से जल के वाष्पन की दर भी बढ़ जाती है। इससे वायुमण्डल में ज्यादा वाष्प जमा होती है और परिणामस्वरूप तापमान और बढ़ जाता है। इसकी मात्रा स्थान-स्थान के मौसम पर निर्भर करती है।

2. नाइट्स ऑक्साइड:-

       नाइट्रस ऑक्साइड सूक्ष्म विषाणुओं की मिट्टी में क्रिया-प्रतिक्रिया का परिणाम है। नाइट्रस ऑक्साइड में उर्वरकों के प्रयोग से और कृषि कार्यों में उत्पन्न चीजों के सड़ने-गलने से नाइट्रोजन निकलती है। यह प्राकृतिक तौर पर जीवाणु की मिट्टी और पानी में क्रिया द्वारा उत्पन्न होती है। नाइट्रस ऑक्साइड भी प्रतिवर्ष 0.25 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सन् 2030 में औद्योगिक युग के पूर्व की तुलना में यह 34 प्रतिशत अधिक उत्पन्न होगी। इसका प्रत्येक अणु कार्बन डाइ ऑक्साइड की तुलना में 250 गुना अधिक ताप प्रकट करता है। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक स्रोत उष्ण कटिबन्धीय मिट्टी है जहाँ पर जीवाणु नाइट्रोजन के प्राकृतिक यौगिकों से क्रिया करके नाइट्रस ऑक्साइड पैदा करते हैं। यह नाइट्रस ऑक्साइड के पूरे वायुमण्डलीय उत्सर्जन का 20-30 प्रतिशत इसी क्षेत्र में उत्पन्न होता है।

     कृषि में नाइट्रोजन उर्वरकों के इस्तेमाल, भूमि की सफाई के लिये जलाये गये पेड़-पौधे, नाइट्रोजन वाले ईंधन को जलाने से और नाइलोन उद्योगों द्वारा छोड़ी जाने वाली गैसों के कारण वायुमण्डल में इसकी मात्रा में वृद्धि हुई है। अब अध्ययनों से यह पता चलता है कि इस समय वायुमण्डल में इसकी मात्रा लगभग 0.31 प्रतिशत प्रति दस लाख भाग है।

3. मीथेन गैस:-

       मीथेन एक प्राकृतिक गैस है जो जीवाणुओं और उनकी क्रियाओं के परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में पैदा होती है। अर्थात् वह अपघटों की देन है। वायुमण्डल में अधिकांश मीथेन के स्रोत जैविक हैं। मीथेन गैस धान के खेतों, नम भूमि, दलदल से निकलती है इसलिए यह मार्श गैस भी कहलाती है।

       इसी प्रकार लगभग 36 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर चावल की खेती की जाती है। इस पैदावार के दौरान मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है। यह गैस भी प्रमुख ग्रीन हाउस पैदा करने वाली गैसों में एक है। 

      अकेले भारत में मवेशियों की संख्या लगभग 46 करोड़ के आसपास है। जुगाली करने वाले ये जानवर जब भी हवा छोड़ते हैं, मीथेन गैस की कुछ मात्रा वायुमण्डल में मिल जाती हैं। यह सागरों, ताजे पानी, खनन कार्य, गैस ड्रिलिंग, जैविक पदार्थों के सड़ने आदि से उत्पन्न होती है। इस स्रोत के अलावा गाय, भैंस, भेड़-बकरी, घोड़ा, ऊँट, सुअर आदि पशु और लकड़ी खाने वाले कीड़े जैसे दीमक को मीथेन छोड़ने के लिए जिम्मेदार पाया गया है।

      हिमानियों के अंदर पाये गये बुलबुलों के नमूनों और हाल के परीक्षणों से पता चला है कि उन्नसवीं सदी के शुरूआत के साथ वायुमण्डल में मीथेन की मात्रा बढ़ रही है। यह पिछले कुछ दशकों में 0.9 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रही है। पूरे विश्व में वर्तमान में लगभग 52.5 करोड़ टन मीथेन धान के खेतों से उत्पन्न होती है। वायुमण्डल में कार्बन मोना ऑक्साइड और कुछ अन्य प्रदूषक गैसें मीथेन को वायुमण्डल में ज्यादा देर तक रोकने में सहायक हैं। 1990 में इस गैस की वायुमंडल में मात्रा 1.72 भाग प्रति लाख (पी.पी.एम.) पायी गयी है तथा लगभग 11 प्रतिशत प्रतिवर्ष बढ़ रही है। जनसंख्या वृद्धि के साथ समानान्तर वृद्धि से मिथेन की वृद्धि का स्तर बढ़ रहा है। तापमान बढ़ने में इसका प्रत्येक अणु कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 25 गुना अधिक प्रभावी है।

4. क्लोरोफ्लोरो कार्बन:-

       क्लोरोफ्लोरो कार्बन सिन्थेटिक यौगिकों का समूह है। सी. एफ. सी. एस. (CFCs) वायुमण्डल के ऊपरी सतह पर समताप मण्डल में क्लोरीन को मुक्त करती है, जो ओजोन को तोड़ती है। ओजोन परत सूर्य की अल्ट्रा वायलेट किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है। सी. एफ. सी. एस. तथा सी. एफ. सी. 12 का प्रत्येक अणु कार्बन डाइ-ऑक्साइड की तुलना में 20 हजार गुना ताप रोकती है। इन दोनों की मात्रा 5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है। यह मनुष्य का अनुसंधान है और प्राकृतिक तौर पर नहीं पायी जाती है। ये यौगिक एयरकण्डीशनरों तथा रेफ्रीजरेटरों में प्रशीतन (Cooling) और छिड़काव यंत्रों में प्रणोदक (Propelent) के रूप में झाग (Foam) को फैलाने और इलेक्ट्रॉनों की घटकों की सफाई और आग बुझाने के आधुनिक यंत्रों में इस्तेमाल होते हैं। पिछले छः दशकों में इसकी खपत में अत्यधिक वृद्धि हुई है और आज 4 प्रतिशत की दर से वायुमण्डल में इसकी मात्रा बढ़ रही है।

5. ओजोन:-

      समताप मण्डल की ओजोन पराबैंगनी विकिरण को सोखकर धरती के जीव-जन्तुओं की रक्षा करती है लेकिन निचले वायुमण्डल में इसका जमाव गर्मी बढ़ाने का काम करती है। यह गैस प्राकृतिक तौर पर निचले वायुमण्डल में बहुत कम मात्रा में मौजूद होती है। यह नाइट्रोजन के ऑक्साइड, मीथेन, हाइड्रोकार्बन और अन्य कार्बनिक यौगिकों के आपसी क्रिया से बनी है। इसकी मात्रा का सही-सही पता नहीं लगाया जा सका है। इसके अलावा समताप मण्डल की ओजोन का क्षय कुल मिलाकर गर्मी बढ़ाता या घटाता है। इस विषय पर भी और अधिक अध्ययन की आवश्यकता है।

6. सर्वत्र औसत तापमान में वृद्धि के प्रभाव:-

      जीवाश्म अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि विगत 14,500 वर्षों में समुद्र स्तर में 100 मीटर से भी अधिक की वृद्धि हुई है। साथ ही पृथ्वी के सर्वत्र औसत तापमान में वृद्धि के अनेक प्रभाव भविष्य में परिलक्षित होंगे। तापमान के बढ़ने से समुद्र में ऊष्णीय प्रसार होगा जिससे इसका तल ऊपर उठ सकता है। अगर पृथ्वी के ध्रुवों पर जमी हुई बर्फ पिघलती है तो इसकी सतह कहीं ज्यादा उठ जाने की सम्भावना है। वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले 100 वर्षों में समुद्र की सतह 0.10 से 0.15 सेमी. ऊपर उठ चुकी है और प्रत्येक दशक में जब तापमान 0.3 डिग्री बढ़ेगा तो समुद्र की सतह 6 सेमी, उठेगी, अथवा सागरों के तल में औसत 6 सेमी. की बढ़ोत्तरी भविष्य में हो सकती है। सन् 2030 तक इसमें 17 से 26 सेमी. का उठाव और आ सकता है जिससे समुद्र के किनारे बसे देशों में बाढ़ आ जायेगी। परिमापक के आधार पर बताया गया है कि मात्र 1 मीटर की समुद्र तल में उठाव से मिस्र देश की 12 से 15 प्रतिशत कृषि भूमि तथा बंगलादेश की 25 प्रतिशत से अधिक उपजाऊ भूमि जलमग्न हो जायेगी। सन् 1930 से 1990 के मध्य के 50 वर्षों में पृथ्वी का औसत तापमान डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। ताप वृद्धि के परिणामस्वरूप दक्षिण मध्य यूरेशिया एवं उत्तरी अमेरीका की वायु शुष्कता में वृद्धि हुई और कहीं-कहीं धूल भरी आँधियाँ भी चली हैं।

      वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणियाँ भी की हैं कि पृथ्वी का तापमान वर्तमान ताप से 30 डिग्री और बढ़ जाये तो अटलाण्टिका और आर्कटिक ध्रुवों के विशाल हिमावरण पिघल जायेंगे और समुद्र की सतह 100 मीटर ऊँची हो जायेगी। समस्त तटीय प्रदेश उस जल प्लावन में डूब जायेंगे। उस समय में सिडनी, मियामी, मोंटी कार्लों, कोलकाता और मुम्बई महानगर जलमग्न हो जायेंगे। अलनीनो जो ठण्डी जलधारा दक्षिणी अमेरीका के तट पर बहती थी, आज गर्म हो गयी है और निकटवर्ती वनस्पति और जीव जगत रूपान्तरण के दौ से गुज रहा है।


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14. Gobal Consequences of Climatic Change (जलवायु परिवर्तन के विश्वव्यापी परिणाम)

14. Gobal Consequences of Climatic Change

(जलवायु परिवर्तन के विश्वव्यापी परिणाम)



           जलवायु परिवर्तन के विश्वव्यापी परिणामों को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत वर्णन किया जा सकता है- 

1. विश्व में फसल प्रारूप और उत्पादन में परिवर्तन होना:-

         मौसम वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक शोध में पाया कि पर्यावरण में हो रहे तापमान में परिवर्तन का प्रभाव फसलों की पैदावार पर भी पड़ सकता है। यह प्रभाव विभिन्न स्थानों के लिये अलग-अलग होंगे। इस अध्ययन में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि “ग्लोबल वार्मिंग” के कारण विश्व के गरीब और विकासशील देशों की फसलों की पैदावार के ऊपर इसके नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेंगे, वहीं कुछ विकसित देशों की फसलों के पैदावार में इससे वृद्धि की सम्भावना है।

      मौसम वैज्ञानिक महेन्द्र शाह की रिपोर्ट के अनुसार वायुमण्डल में कार्बन डाइ-ऑक्साइड की मात्रा बढ़ने के कारण आने वाले 70 वर्षों में विश्व की कुल फसलों की पैदावार में वृद्धि होगी। साथ ही भूमध्य रेखा के पास के देशों की फसलों की पैदावार पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। भूमध्य रेखा के पास ज्यादातर गरीब या विकासशील देश हैं, जिसके कारण करीब-करीब करोड़ों लोगों की इससे प्रभावित होने की आशंका है।

      ब्राजील, भारत और दूसरे अफ्रीकी देशों की फसलों की पैदावार कम होने की आशंका है जबकि रूस, चीन, कनाडा तथा अर्जेन्टाइना की फसलों की पैदावार में वृद्धि होने की सम्भावना व्यक्त की गयी है। इन मौसम वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के लिये पृथ्वी को लगभग 2.2 मिलियन छोटे हिस्सों में बाँट लिया। फिर उनमें से प्रत्येक हिस्से से सम्बन्धित आंकडों, जिनमें मौसम, मिट्टी के प्रकार, भू-प्रदेश, फसलों के प्रकार आदि का अध्ययन किया, फिर इसकी तुलना उन्होंने मौसम परिवर्तन के प्रचलित तीन मॉडलों से की। इसके बाद उन्होंने यह निष्कर्ष दिया कि भूमध्य रेखा के पास का क्षेत्र भविष्य में और गर्म होता जायेगा, जिससे कि वर्तमान में जो फसल उगाई जा रही है, उनकी पैदावार मुश्किल हो जायेगी।

        वहीं उत्तरी अमेरिका, रूस तथा चीन के तापमान में भी बढ़ोत्तरी होगी, पर फिर भी वे ठंडे प्रदेश बने रहेंगे, जिससे कृषि का इन उत्तरी हिस्सों में विकास सम्भव हो पायेगा। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अध्ययन उन देशों को अपनी फसलों के विकल्प खोजने में सहायक सिद्ध होगा, जिन देशों की फसलों को पैदावार के लिये फसलों का चयन कर पायेंगे। सन् 2003 को सदी का सबसे गर्म वर्ष माना गया है।

2. मरुभूमि में वृद्धि होगी:-

        एक अध्ययन के बाद यह पता चला है कि 19वीं शताब्दी की तुलना में 20वीं सदी में पृथ्वी का औसत तापमान 0.6 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है। सन् 1860 जब से वैश्विक तापमान का रिकार्ड रखा जा रहा है, के बाद से पाया गया कि बीती सदी में 90 का दशक सर्वाधिक गर्म वर्ष रहा है जिसमें 1998 में गर्मी के सभी रिकार्ड टूट गये। पिछले 200 वर्षों में वातावरण में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा 30 प्रतिशत बढ़ गयी। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड के इस बढ़ते स्तर को देखते हुए वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी दी है कि सन् 2100 सदी के उत्तरार्द्ध तक पृथ्वी का औसत तापमान आज की अपेक्षा 1.00 से 3.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जायेगा।

    वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिंग के नए खतरों में धरती पर बढ़ते रेगिस्तान को भी जोड़ रहे हैं। मस्थलीकरण का विस्तार इतनी तीव्र गति से बढ़ रहा है कि दुनिया के 110 देशों में रेगिस्तान पांव फैला चुका है। इनमें अल्पविकसित, विकासशील और विकसित सभी तरह के देश शामिल हैं। हर वर्ष मानवीय गतिविधियों के कारण लगभग पांच लाख हेक्टेयर भूमि रेगिस्तान में बदल जाती है। इसके कारण वायुमण्डल के तापमान में अस्थिरता आ जाती है और ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बहुत बढ़ जाता है।

      अगर हमारे वातावरण का तापमान इसी तरह चढ़ता रहा तो आने वाली सदी में एक ओर विश्व के अधिकांश हिस्से ग्लेसियरों की बर्फ पिघलने के कारण जलमग्न हो जायेंगे तो साथ ही दूसरी ओर शेष बची दुनिया मरुस्थल से आच्छादित हो जायेगी और दोनों ही परिस्थितियाँ मनुष्य के जीवन के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं हैं।

3. जैव विविधता में परिवर्तन:-

     जलवायु परिवर्तन का जैव विविधता प्रभाव दो रूपों में दिखलाई देता है-

(1) धनात्मक प्रभाव,

(2) ऋणात्मक प्रभाव।

(1) धनात्मक प्रभाव-

       तापमान वर्षा परिवर्तन से कुछ जातियों को लाभ हुआ है। जैसे वे जातियाँ जो अनुकूलन करने में सक्षम हैं या विश्व के अन्य स्थानों में फैलकर आवास बना लिये हैं अथवा जिन जातियों में मनुष्य लाभ के प्रति प्रभावी हुआ है अथवा मनुष्य का संग-साथ प्रभावी हो गया है। जैसे- चूहा (Mice), कबूतर, घरेलू चिड़ियाँ आदि। इसी प्रकार CO2 की वृद्धि पर वनस्पति जगत में वृद्धि हुई है।

(2) ऋणात्मक प्रभाव-

      जलवायु परिवर्तन से विश्व में ऊष्मीकरण हुआ है। ताप वृद्धि को बहुत से जीव सह नहीं पाते हैं। प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण उन जातियों की क्षति हुई जो प्राचीन अवशेष मात्र रह गयी हैं अथवा स्थान विशेष पर ही थोड़ी मात्रा में पायी जाती हैं अथवा आनुवांशिक जैव विविधता कम है अथवा जिनकी वृद्धि दर न्यून है अथवा स्थानान्तरित करने वाले जीवों को जलवायु परिवर्तन से क्षति हुई है। जैसे- भारत में शीत ऋतु में साइबेरिया से कुछ पक्षी आते हैं। यदि कहीं भी जलवायु परिवर्तन होता है तो इनका क्षतिग्रस्त होना स्वाभाविक है।

4. ध्रुवीय हिमखण्ड पिघलेंगे:-

      पृथ्वी के तापमान में बढ़ोत्तरी होने के कारण ध्रुवों पर जमे हिम खण्डों और हिमाचल के हिमनदों के पिघलने की प्रक्रिया में तेजी आयी है। इन हिमखण्डों के पिघलने से समुद्रों के जल स्तर में लगातार वृद्धि हो रही है। एक ओर अंटार्कटिका की बर्फ की सतह में दरारें उभर आयी हैं, तो दूसरी ओर आर्कटिक महासागर की चालीस प्रतिशत बर्फ पिछले पचास वर्षों में पिघल चुकी है। अंटार्कटिका की तीन बर्फीली परतें- दक्षिणवर्ती, दक्षिण लार्सन और प्रिंस गुस्तव तो पूरी तरह पिघल कर गायब हो चुकी हैं।

     ओस्लो में चल रहे एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण दुनिया भर के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे बांग्लादेश और नीदरलैंड सहित विश्व के अनेक देशों के तटीय इलाकों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है। विशेषज्ञों ने बताया है कि बर्फ पिघलने के कारण आल्प्स पर्वतमाला के ग्लेशियर पिछले दो दशकों में 20 प्रतिशत से ज्यादा सिकुड़ गये हैं।

     दुनिया के सबसे सघन हिमालयी ग्लेशियर श्रृंखला की ऐन तलहटी में अवस्थित भारत के अनेक राज्यों में इस परिघटना ने खतरे की घंटी बजा दी है।

       वैज्ञानिकों ने चेताया है कि इस प्राकृतिक आपदा से बचाव के लिये समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गये तो जान-माल की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक परियोजना में किये गये अध्ययन के अनुसार, वाहनों, फैक्ट्रियों और बिजलीघरों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों के कारण दुनिया का तापमान सन् 2100 तक 1.4 से 5.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। ऐसा विद्वानों के दूसरे वर्ग का अनुमान है।

     उल्लेखनीय है कि दो वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और काठमांडू स्थित ईसीमॉड संस्थान के एक संयुक्त परियोजना में हिमालय के तेजी से पिघल रहे ग्लेशियरों पर गहरी चिन्ता व्यक्त की गयी थी। परियोजना में नेपाल और भूटान हिमालय के 4000 ग्लेशियरों तथा 5000 बर्फानी झीलों का व्यापक जमीनी और उपग्रहीय अध्ययन किया गया। इसके निष्कर्षो में बताया गया था कि नेपाल और भूटान की दर्जनों बर्फीली झीलें ग्लेशियरों के पिघलने के कारण खतरनाक हद तक फूल गयी हैं और आगामी पाँच वर्षों के भीतर कभी भी फट सकती हैं। अध्ययन में सम्भावना जतायी गयी है कि झीलों में लगातार बढ़ रहें जलस्तर के कारण हिमालय और इसकी तलहटी के क्षेत्र भीषण बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं।

       संयुक्त राष्ट्र अध्ययन में कहा गया था कि हिमालय का सबसे बड़ा हिस्सा भारत में पड़ता है लेकिन भारतीय क्षेत्र में पड़ने वाले ग्लेशियरों की स्थिति का आंकलन अभी तक नहीं किया गया है। हालांकि भारत भूगर्भीय सर्वेक्षण विभाग के अध्ययनों से पता चला है कि भारतीय हिमालय में पड़ने वाले ग्लेशियर पिघलने के कारण 15 मीटर प्रतिवर्ष की गति से सिकुड़ रहे हैं। पिछले दिनों तिब्बत की पारि छू नदी में बन गयी कृत्रिम झील के कारण हिमाचल प्रदेश में अब तक खतरा बना हुआ है।

    अनेक विशेषज्ञ कृत्रिम झील बनने की परिघटनाओं को ग्लेशियरों के पिघलने से जोड़कर देखते हैं। उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं की सम्भावनाएँ तलाशे जाने के मद्देनजर ग्लेशियरों के पिघलने और इसके परिणामस्वरूप बर्फानी झीलों के फटने की प्रवृत्ति को गम्भीरता से लिये जाने की जरूरत बतायी है।

5. निचले द्वीप व देशों का अस्तित्व संकटमय होगा:-

        विश्व के दो सबसे छोटे असइलैंड देशों कीरीबती एवं तुवेलू का अस्तित्व संकट में है। समुद्र का जल स्तर बढ़ने के कारण वे डूबने ही वाले हैं। इन देशों का अस्तित्व संकट में हैं, वैज्ञानिकों की चेतावनी के बाद भी न सँभलने का मालद्वीप एवं बंगाल की खाड़ी के ‘सागर-द्वीपसमूह’ में पाँच में से तीन द्वीपों का अस्तित्व संकट में है।

       आइसलैंड फोरम की नौरा में हाल ही सम्पन्न बैठक में तुवेलू के मामले में चर्चा हुई, जो कि समुद्र तल से सिर्फ पाँच मीटर ऊँचा है। यह देश कब डूब जाए, कहा नहीं जा सकता। इससे 12 हजार लोगों की जान खतरे में है।

6. जलवायु परिवर्तन से स्वास्थ्य संकट होगा-

      पर्यावरणविद् या मौसम वैज्ञानिक वार्मिंग के अनुसार कई तरह की बीमारियों के पैदा होने का खतरा बढ़ गया है। साथ ही इसका हमारे पर्यावरण पर भी बहुत बुरा असर देखने को मिल रहा है। ब्रिटेन जैसे विकसित देश में भी जलवायु के कारण बदलते मौसम ने कई समस्याएँ खड़ी कर दी हैं। यह ध्यान देने योग्य बात है कि अमेरीका व अन्य चुनिंदा देशों की तरह ब्रिटेन की भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से अग्रणी भूमिका रही है। ब्रिटेन के नागरिक भी अब गरीब देशों की समझी जाने वाली उष्ण कटिबन्धीय बीमारियों की चपेट में आने लगे हैं।

      ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस तरह के आकलन में पाया कि हर वर्ष गर्मी के मौसम के तापमान में बढ़ोत्तरी हो रही है, जो यहाँ नागरिकों को मलेरिया और डेंगू के अलावा जोड़ों की बीमारियाँ दे रहा है। ब्रिटिश स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह चेतावनी दी है कि अगले 20 वर्षों में यहाँ के वायुमण्डल के तापमान में जो बढ़ोत्तरी होगी, उससे ग्रीष्मकाल के दौरान अनुमानतः आधे इंग्लैण्ड में महामारियों का संकट उठ खड़ा होगा। इसके अलावा विषाक्त भोजन के मामले में भी बढ़ोत्तरी हो रही है।

      एक अनुमान के अनुसार ग्रीष्माकाल में ब्रिटेन में भोजन विषाक्त के दस हजार, लू के दो हजार और त्वचा कैंसर के पांच हजार नये रोगियों की संख्या हर वर्ष बढ़ जायेगी। ग्लोबल वार्मिंग का ऐसा प्रभाव इस रूप में देखने को मिलेगा कि गर्मियों के बाद भीषण शीत, हृदयघात से मरने वालों की संख्या बढ़कर 80 हजार तक पहुँच जायेगी। इसके बाद सन् 2020 तक इस संख्या में 15 हजार और सन् 2050 तक पाँच हजार नये रोगियों के बढ़ने की आशंका वैज्ञानिक जता चुके हैं।

       ब्रिटिश स्वास्थ्य मंत्रालय के वैज्ञानिक प्रो. डोनाल्डसन तो और भी भयावह तस्वीर पेश करते हैं। उनके अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के कारण देश में जटिल किस्म की उष्ण कटिबन्धीय बीमारी “नील फीवर” का प्रसार हो सकता है।

निष्कर्ष

    संक्षेप में, जलवायु परिवर्तन के पृथ्वी प प्रभाव के बारे में हो सकता है कि हम अधिक आँक हे हों, लेकिन यह भी हो सकता है कि हम वास्तविकता से कम आँक रहे हैं, इसलिये जरूरी है कि ग्रीन हाउस गैस सान्द्रता को घटाने के लिये हम प्रभावशाली कदम बढ़ायें।

13. Climatic Change (जलवायु परिवर्तन)

13. Climatic Change

(जलवायु परिवर्तन)



      हरितगृह प्रभाव, प्रदूषण एवं अन्य भौतिक परिवर्तनों से पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन उल्लेखनीय मात्रा में हो रहे हैं। पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन का बहुत बड़ा कारण ग्रीन हाउस गैस (कार्बन डाइ ऑक्साइड, जलवाष्प, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड) की सतत् वृद्धि से बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारतीय उपमहाद्वीप की लाखों एकड़ उपजाऊ जमीन पानी में समा जायेगी।

      अकेले बांग्लादेश की ही 13 मिलियन आबादी प्रभावित होगी। चावल उत्पादन में 16 प्रतिशत की कमी आ जायेगी, क्योंकि बाग्लादेश में चावल उत्पादन के लिए उपाजाऊ जमीन का 17.5 प्रतिशत हिस्सा सागरों में समा जायेगा। बढ़े हुए तापमान के कारण पेड़ों तथा जमीन की ऊपरी सतह नमी के वाष्पीकरण में तेजी से वृद्धि होगी। अमेरीका की सम्मानित संस्था ईपीए के अनुसार तापमान में 4ºC वृद्धि से वाष्पीकरण में 30 से 40 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है, जिससे एशिया तथा अफ्रीका के अर्द्धशुष्क प्रदेश पूर्ण शुष्क प्रदेशों में बदल जायेंगे। घास के बड़े-बड़े मैदानों में तेजी से कमी आयेगी, जिससे पशुओं के चारे, पानी की समस्या विकराल रूप लेगी।

    संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अफ्रीका, मध्य पूर्व तथा दक्षिण यूरोप में पीने के पानी की समस्या और बढ़ेगी। विश्व की औसत वर्षा में वृद्धि होगी पर इसके वितरण में असमानता बढ़ती जायेगी। तापमान में वृद्धि के कारण वातावरण के निचले स्तर में शक्तिशाली प्रदूषक “ओजोन” की मात्रा में वृद्धि हो रही है। तापमान के साथ-साथ मच्छरों से फैलने वाले रोग जैसे- मलेरिया, पीला बुखार, डेंगू आदि में वृद्धि होगी। सन् 2001 तक अमरीका में उद्योगों से उत्सर्जित होने वाली कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा सन् 1990 के स्तर से 8.3 प्रतिशत बढ़ चुकी थी।

        जलवायु परिवर्तन के निम्नलिखित कारक जिम्मेदार है-

1. प्रदूषण:-

     प्रदूषण आज की अन्तर्राष्ट्रीय समस्या बन चुका है। जलवायु परिवर्तन में प्रदूषण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बढ़ती आबादी के कारण विभिन्न क्षेत्रों में पर्यावरण असन्तुलित हो रहा है। महानगरीय क्षेत्रों में औद्योगीकरण एवं जनसंख्या विस्फोट के कारण तापमान द्वीप, प्रदूषण, गुम्बद तथा ‘ओजोन परत में छेद’ आदि के कारण पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है जिससे प्रदूषण क्षेत्र न्यून वर्षा के गर्म क्षेत्र बन जाते हैं। वायुमण्डल में ओजोन परत में छेद होने के कारण आगत वर्षों में पराबैंगनी किरणों का प्रभाव 8 से 15 प्रतिशत और बढ़ जायेगा। महानगरीय सीमेंट के जंगलों में एक विशेष जलवायु परिवर्तन हो जाया करता है जिससे उच्च तापमान द्वीप बनते हैं। 

2. भौतिक परिवर्तन-

       अलनिनो प्रभाव इस भौतिक परिवर्तन में उल्लेखनीय है। दक्षिणी अमेरीकी महाद्वीप के तटवर्ती प्रशांत महासागर में तापमान असमान रूप से बढ़ जाने से मौसम में बदलाव आता है। इसका सीधा असर भारत के दक्षिणी-पश्चिमी मानसून पर पड़ता है जो भारत में 80 प्रतिशत वर्षा से अधिक के लिये जिम्मेदार है। यह मानसून मई से सितम्बर तक सक्रिय रहता है।

   भारत, बांग्लादेश एवं पाकिस्तान में अलनिनो का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। अर्थात् भारतीय महाद्वीप में अलनिनो ने भारतीय मानसून को अत्यधिक प्रभावित किया ही है। साथ ही आस्ट्रेलिया और दक्षिणी चीन में अनावृष्टि की है।

अलनिनो का प्रभाव-

     अलनिनो प्रशांत महासागर में पैदा होने वाली गर्म जलधाराओं का प्रभाव है जो पूरी दुनिया में उथल-पुथल मचा सकता है। यह गर्म जलधारा मात्रा प्रशांत महासागर में इसलिए पैदा होती है क्योंकि इस क्षेत्र पर सूर्य की सीधी किरणों के कारण समुद्र का तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है। जलवायविक वैज्ञानिकों का मानना है कि अलनिनो के कारण पैदा होने वाली हवाएँ पूरब से पश्चिम की ओर जिस भी क्षेत्र से गुजरती है वहाँ पर जलवायु के विपरीत प्रभाव डालती हैं। अलनिनो के कारण इंडोनेशिया में सूखा पड़ा। भारत में भी अलनिनो के प्रभाव से मानसून अस्थिरता की पराकाष्ठा पर पहुँच गया है।

3. वनों का ह्रास-

       वनों की आग का प्रभाव आस्ट्रेलिया और इण्डोनेशिया के जंगलों में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। वन भूमि पर कृषि भूमि का दबाव भारत में सबसे अधिक वन विनाश का प्रभाव जलवायु पर और जलवायु का प्रभाव वन विनाश पर स्पष्ट है। विश्व सन्दर्भ में तापमान की बढ़ोत्तरी जलवायु परिवर्तन का मुख्य बिन्दु है।

   विगत अनुमान से जलवायु परिवर्तन विशेषतः दुगना बढ़ रहा है। निरंतर जलवायु का पृथ्वी पर खतरनाक प्रभाव पड़ रहा है। यह जैसा सोचा गया था, उससे कहीं अधिक घातक है। पृथ्वी को इस भयावह प्रभाव से बचाने की सख्त जरूरत है। ये चेतावनी संयुक्त राष्ट्र द्वारा गत माह “मौसम परिवर्तन” पर तीसरी अध्ययन रिपोर्ट जारी करते हुए “Inter Governmental Panel on Climate Change” डॉ. राबर्ट वाटसन ने दी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पृथ्वी का तापमान पूर्वानुमानों की तुलना में दुगुनी गति से बढ़ रहा है। मौसम परिवर्तन पर्यावरण से जुड़ा यह गम्भीर मुद्दा है।

      अध्ययन दल से जुड़े एक अन्य सदस्य ने भूमण्डल का तापमान बढ़ने का पर्यावरण के लिये महासंकट की भविष्यवाणी की है। संयुक राष्ट्र की ताजी रिपोर्ट तीन हजार वैज्ञानिकों के कठिन परिश्रम के बाद तैयार की गयी है। कम्प्यूटर आधारित गणना के आधार पर दावा है कि शताब्दी के अन्त तक तापमान में 5.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ोत्तरी हो सकती है। इस स्थिति के लिये वे प्रकृति को नहीं, बल्कि इंसानी गतिविधियों को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि औद्योगिक प्रदूषण और गैसों का निस्तारण हालात बिगाड़ने में सर्वाधिक दोषी हैं। पृथ्वी के पर्यावरण पर मँडरा रहे खतरे के लिए संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार औद्योगिकी रूप से समृद्ध देश जिम्मेदार हैं। 

     औद्योगिक प्रदूषण एवं उद्योगों से निकली गैसों के वायुमण्डल में मिलने से पृथ्वी क तापमान बढ़ रहा है। मौसम विज्ञान अध्येता डॉ. आर. वाटसन का कहना है कि “मौसम के पृथ्वी पर प्रभाव के बारे में हो सकता है कि हम अधिक आंक रहे हों, लेकिन यह भी हो सकता है कि हम वास्तविकता से कम आंक रहे हैं। इसलिये जरूरी है कि ग्रीन हाउ गैस सान्द्रता को घटाने के लिये हम प्रभावशाली कदम बढ़ाएँ।” उनका विश्वास है कि यह गैस औद्योगिक रूप से समृद्ध देश ही सर्वाधिक बढ़ रहे हैं।

      विश्व सन्दर्भ में जलवायु परिवर्तन को संक्षेप में लिखा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन से मुख्य आशय तापमान की बढ़ोत्तरी है जिसे डॉ. दिनेश मणि ने अपने शोध लेख ‘पृथ्वी की गरमाहट’ में बतलाया कि भारत और अन्य देशों में 2010 से 2070 ई० तक की अवधि में हरित ग्रह प्रभाव के कारण मानसून में भारी वृद्धि होगी तथा नीचे के इलाके जलमग्न एवं बाढ़ग्रस्त हो जायेंगे। छोटे द्वीप डूब जायेंगे और समुद्र के तट नष्ट हो जायेंगें और कृषि भूमि एवं मछलियाँ कम हो जायेंगी। विश्व का तापमान बढ़ने से मलेरिया, कालाजार, मस्तिष्क शोध, नेत्र रोग, आदि बढ़ सकते हैं।

     अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण संगठन की रिपोर्ट से भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, इथोपिया आदि देशों में मलेरिया, कालाजार की वापसी इसका प्रमाण है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार आगामी वर्षों में विश्व के औसत तापमान में प्रति दशक 0.3 प्रतिशत की वृद्धि होगी और इस प्रकार विद्वानों का एक वर्ग मानता है कि सन् 2100 के अन्त तक 3.6 सेल्सियस तापमान बढ़ जायेगा।

     वाशिंगटन स्थिति प्रसिद्ध अनुसंधान केन्द्र ‘Climate Institute’ ने एशिया में जलवायु परिवर्तन नामक नवीन प्रतिवेदन में बतलाया कि हरित ग्रह गैसों की अधिकता के कारण भारत, लक्षद्वीप, पाकिस्तान, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम, फिलीपीन्स, ब्रिटेन (आइसलैण्ड) आदि देशों में तापमान और समुद्र सतह में उठाव का संकट निकट भविष्य में है।

       प्रतिवेदन के अनुसार यदि ग्रीन हाउस गैसों में ज्यादा वृद्धि होती है तो इन देशों के समुद्री क्षेत्रों के तापमान में 0.5 डिग्री से 3 डिग्री और मैदानी क्षेत्रों के तापमान में 0.7 डिग्री सेल्सियस से 4.5 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है। ऐसी स्थिति में समुद्र का जलस्तर 15 सेमी. से 90 सेमी. तक बढ़ सकता है। यदि ग्रीन हाउस गैसों में मध्यम स्तर की वृद्धि होती है तब समुद्री क्षेत्रों के तापमान में 0.3 डिग्री और मैदानी क्षेत्रों के तापमान में 0.5 डिग्री से 2.5 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है।

     जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से फलोत्पादन एवं कृषि उत्पादन में अंतर आना स्वाभाविक है। कार्बन डाई ऑक्साइड की सान्द्रता के कारण वायुमण्डल में नमी बढ़ती है और वर्षा की सम्भावना बढ़ जाती है। कीटजनित रोगों के लिए अनुकूल होते हैं तो खाद्य समस्या को प्रत्यक्ष प्रभावित करते हैं

      सर्वात्रिक परिसंचरण मॉडल सन् 2030 तक विश्व तापमान में 1.5 से 5.2 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि होने का संकेत देते हैं। ये मॉडल ऊपरी वायुमण्डल के ठण्डा होने के साथ-साथ सतह के गर्म होने का संकेत भी देते हैं। खासकर ऊपरी तथा मध्य अक्षांशों में तापमान में सर्वाधिक परिवर्तन होने की सम्भावना है।

       शरदकाल में तापमान की वृद्धि औसत परिवर्तन में दुगुनी या उससे भी ज्यादा हो सकती और यह वृद्धि बड़ी तेजी से होगी। दुगनी कार्बन डाइ ऑक्साइड सान्द्रता के साथ जलचक्र 10 प्रतिशत अधिक तीव्रता से काम करेगा, वायुमण्डल के तापमान में 5.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि औसत उसकी जलवह क्षमता की लगभ 40 प्रतिशत तक बढ़ा देगी जो कि जलवायु में भारी परिवर्तन का संकेत है।

4. Latitude, Longitude, International Date Line and Time (अक्षांश, देशांतर, अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा व समय)

4. Latitude, Longitude, International Date Line and Time

(अक्षांश, देशांतर, अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा व समय)



अक्षांश (Latitude) या Parallel

        पृथ्वी के केन्द्र पर बनाये गये उदग्र (Vertical) कोणीय मान को अक्षांश कहते हैं। दूसरे शब्दों में ग्लोब पर किसी स्थान तथा विषुवतरेखा के मध्य कोणीय दूरी को उस स्थान का आक्षांश कहते हैं। यह कोणीय दूरी ग्लोब के केन्द्र से मापी जाती है। 

➤ सामान्य परिभाषा के अनुसार ग्लोब पर पूरब से पश्चिम दिशा की ओर खींची गयी काल्पनिक रेखा को अक्षांश रेखा कहते हैं।

ग्लोब पर समान आक्षांश वाले बिन्दुओं को मिलाने वाले काल्पनिक वृत्तों को आक्षांश वृत्त कहा जाता है। विषुवत रेखा पूर्ण वृहत् वृत्त (Great Circle) होती है तथा शेष समस्त आक्षांश वृत्त लघु वृत्त होते हैं।

वृहत वृत्त:-

      वृहत वृत्त वह रेखा होती है जो गोलाकार पृथ्वी को दो समान परिधियों वाले गोलाद्धों में विभाजित करती है। पृथ्वी पर सभी देशान्तरों (Meridians) के अतिरिक्त भूमध्य रेखा/विषुवत रेखा एक वृहत वृत्त भी है।

भूमध्यरेखा पृथ्वी के मध्य से होकर गुजरने वाली अक्षांश रेखा है। इसे विषुवत रेखा या  0° अक्षांश भी कहते हैं। इस पर वर्ष भर दिन-रात बराबर होते हैं। इसलिए इसे विषुवत रेखा कहते हैं।

विषुवत रेखा वृहत् वृत का उदाहरण है क्योंकि यह पृथ्वी को दो बराबर भागों में बाँटती है।

भूमध्यरेखा पृथ्वी को दो गोलार्द्धों (उत्तरी और दक्षिणी) में विभक्त करती है।

अक्षांश रेखाओं का मान न्यूनतम 0º और अधिकतम 90º होता है।

उत्तरी गोलार्द्ध में खीची गई अक्षांश रेखा को N के द्वारा और दक्षिणी गोलार्द्ध में खींची गई  रेखा को S के द्वारा निरुपित करते है।

अश्व अक्षांश (Horse Latitude):-

       30° से 35° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश के मध्य स्थित पेटी को अश्व अक्षांश कहा जाता है। इसे उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी (Subtropical High Pressure Belt) भी कहते हैं। इसके बनने का कारण इन अक्षांशो के मध्य प्रतिचक्रवातों का उत्पन्न होना है।

0º अक्षांश⇒ भूमध्यरेखा या विषुवत रेखा (Equator)

23½º N अक्षांश⇒ कर्क  रेखा (Tropic of Cancer)

23½º S अक्षांश⇒ मकर रेखा (Tropic of Capricorn)

66½º N अक्षांश⇒ आर्कटिक वृत्त

66½º S अक्षांश⇒ अण्टार्कटिक वृत

90º N⇒ उतरी ध्रुव

90º S⇒ दक्षिणी ध्रुव

➤ 23½° से 66½° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य स्थित क्षेत्र को शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र कहते हैं। यहाँ पर वर्ष भर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं।

➤ प्रति 1° पर एक अक्षांश निर्मित होता है। विषुवत रेखा से ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर जाने पर अक्षांशीय वृत्त का आकार छोटा होता जाता है, जो ध्रुवों पर अंततः एक बिन्दु में परिवर्तित हो जाता है।

➤ 90° अक्षांश एक बिंदु के रूप में पाया जाता है, जिसे ध्रुव (Pole) कहते हैं। 90° उत्तरी अक्षांश को उत्तरी ध्रुव (North Pole) तथा 90° दक्षिण अक्षांश को दक्षिणी ध्रुव (South Pole) के नाम से जाना जाता है।

➤ 66½° से 90° उत्तरी अक्षांशों के मध्य स्थित क्षेत्र को ध्रुवीय क्षेत्र (Polar Region) कहते हैं। यहाँ 6 महीने का दिन तथा 6 महीने की रात होती है।

भूमध्य रेखा की परिधि की आधी लम्बाई 60° अक्षांश रेखा पर प्राप्त होती है।

90° अक्षांश रेखा एक बिन्दु के समान होती है।

सभी अक्षांश रेखा (90º को छोड़कर) देशान्तर रेखा को समकोण पर काटती है।

सभी अक्षांश रेखाएँ एक-दूसरे के समान्तर और समान दूरी पर अवस्थित होते हैं।      

किसी भी स्थान का अक्षांश रेखा का निर्धारण Pole Star से आने वाली किरण और चक्षु अक्ष के बीच बने कोणीय माप के द्वारा निर्धारित करते हैं।

ग्लोब पर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 179 है।

नोट: यदि अक्षांश रेखाओं को 1° के अंतराल पर खींचते हैं, तो उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों में 89-89 अक्षांश रेखाएँ होंगे। इस प्रकार विषुवत रेखा को लेकर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 179 होगी क्योंकि दोनों ध्रुव एक बिंदु के रूप में है न कि रेखा या वृत्त के रूप में।

मानचित्र पर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 181 है।

नोट: यदि अक्षांश रेखाओं को 1° के अंतराल पर खींचते हैं, तो उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों में 90-90 अक्षांश रेखाएँ होंगे। इस प्रकार विषुवत रेखा को लेकर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 181 होगी क्योंकि दोनों ध्रुव मानचित्रों पर एक रेखा के रूप में होती है न कि बिंदु के रूप में।

अक्षांशों की कुल संख्या 180 है।

नोट: यदि अक्षांशों को 1° के अंतराल पर खींचते हैं, तो उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों में 90-90 अक्षांश होंगे। यहाँ विषुवत रेखा का मान 0 अक्षांश होगा, इस प्रकार कुल अक्षांशों की संख्या 180 होगी क्योंकि दोनों ध्रुवों का अंश 90º मानचित्र या ग्लोब पर होगा, यहाँ पर एक रेखा या बिंदु के रूप में नहीं होगा।

 प्रति 1º की अक्षांशीय दूरी लगभग 111 Km के बराबर होती है जो पृथ्वी के गोलाकार होने के कारण भूमध्यरेखा से ध्रुवों तक भिन्न-भिन्न मिलती है। अर्थात् दो अक्षांशों के बीच की दूरी 111 किमी० होती है।

Latitude

देशान्तर या याम्योत्तर (Longitude):

         ग्लोब पर प्रमुख याम्योत्तर (Prime meridian) तथा किसी दिये गये स्थान के मध्य की कोणीय दूरी को उस स्थान का देशान्तर कहते हैं। यह दूरी ग्लोब के ध्रुवीय अक्ष से मापी जाती है।

➤ देशान्तर ग्लोब पर निर्मित होने वाले ऐसे काल्पनिक अर्द्धवृत्त हैं, जो उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव को जोड़ते हैं। ये देशांतर सदैव अक्षांशों के लम्बवत् निर्मित होते हैं, जो 0° देशान्तर अर्थात् ग्रीनवीच रेखा से किसी स्थान की कोणीय दूरी होती है।

180° देशान्तर, प्रधान याम्योत्तर के साथ मिलकर ग्लोब पर बृहत-वृत्त का निर्माण करती है।

0° देशांतर इंग्लैण्ड की राजधानी लन्दन के समीप स्थित ग्रीनविच नामक स्थान से होकर जाता है, जिसे मानक देशांतर अथवा प्रधान याम्योत्तर (मध्याह्न रेखा) कहा जाता है।

दोनों ध्रुवों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा को देशान्तर रेखा कहते हैं।

देशान्तर रेखा हमेशा उत्तर से दक्षिण दिशा में खींची जाती है।

दो देशान्तर रेखाओं के बीच में विषुवत रेखा पर अधिकतम दूरी (111.3 किमी०) होती है जबकि ध्रुवों की ओर जाने पर दोनों देशान्तर रेखाओं के बीच दूरी घटते जाती है।

देशान्तर रेखाएँ पृथ्वी के केन्द्र पर क्षैतिज तल में बनाया गया कोण को व्यक्त करता है।

देशान्तर रेखाओं का न्यूनतम मान 0º और अधिकतम मान 180° होता है।

इस तरह कुल  देशांतर रेखाओं की संख्या ग्लोब पर 360 (180+1+179) और मानचित्र पर 361 (180+1+180) होती है।

0º देशान्तर रेखा को प्रधान मध्यान्ह / प्रधान याम्योत्तर रेखा (Prime Meridian) कहा जाता है। जबकि 180°  देशांतर रेखा को अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहते हैं।

0° देशान्तर रेखा पृथ्वी को दो भागों में बाँटती है-

(i) पूर्वी गोलार्द्ध और

(ii) पश्चिमी गोलार्द्ध।

पूर्वी गोलार्द्ध के देशान्तर रेखा को E के द्वारा और पश्चिमी गोलार्द्ध के देशान्तर रेखा को W के द्वारा विरूपित करते हैं।

देशान्तर

1884 ई0 में वाशिंगटन बैठक के दौरान यह निर्णय लिया गया कि 0° देशान्तर रेखा लंदन के एक ग्रीनवीच शहर में स्थित “रॉयल वेधशाला” के कैम्पस में स्थित एक Pointer से होकर गुजरती है। शेष सभी देशान्तर रेखाओं को पूरब एवं पश्चिम में इसके अनुरूप ही खींचते हैं। इस समय ग्रीनविच मध्याह्न को शून्य मानकर अन्य देशान्तरों की गणना की जाती है। समय का निर्धारण भी इसी को आधार मानकर किया जाता है।

भूग्रि(The Earth Grid):-

          किसी प्रक्षेप रचना में एक निश्चित मापनी पर अक्षांश और देशान्तर रेखाओं के रेखा जाल को भूग्रिड कहते हैं।

गोरे (Gore)

      दो देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी गोरे (Gore) नाम से जानी जाती है।

समय का निर्धारण

       पृथ्वी एक घूर्णन पूरा करने में लगभग 24 घंटे का समय लेती है। घूर्णन की यह अवधि पृथ्वी दिवस (Earth Day) कहलाती है। इसका अर्थ है कि पृथ्वी गोलाकार होने के कारण 24 घंटे में 360° पूरा कर लेती है। इसलिए प्रत्येक 15° देशान्तर की दूरी को पूरा करने के लिए यह एक घंटा तथा 1° देशान्तर की दूरी को पूरा करने के लिए 4 मिनट का समय लेती है।

➤ 0° से 180° पूर्व की ओर जाने पर 12 घंटे का समय लगता है और इस प्रकार यह ग्रीनविच समय से 12 घंटे आगे होता है। ठीक इसी प्रकार 0° से 180° पश्चिम की ओर जाने पर ग्रीनविच समय से 12 घंटे का समय लगता है। यही कारण है कि 180° पूर्व व पश्चिम देशान्तर में कुल 24 घंटे अर्थात् एक दिन और एक रात का अंतर पाया जाता है।

➤ पृथ्वी को एक-एक घंटे के 24 समय क्षेत्रों में बाँटा गया है। इन समय क्षेत्रों को ग्रीनविच मीन टाइम व मानक समय में एक घंटे के अन्तराल के आधार पर विभाजित किया गया है अर्थात प्रत्येक जोन 15° के बराबर होता है।

➤ पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। अतः अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग समय पर दिन की शुरुआत होती है।

➤ ग्रीनविच मीन टाइम से पूर्व स्थित स्थानों पर ग्रीनविच मीन टाइम से पश्चिम दिशा में स्थित स्थानों की तुलना में सूर्योदय पहले होता है।

➤ चूँकि सूर्य पूर्व में उदित होता है तथा पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूम रही है। अत: 0° देशान्तर से पूर्व का समय आगे तथा पश्चिम का समय पीछे रहता है। इसी कारण पृथ्वी के सभी स्थानों पर समय की भिन्नता देखने को मिलती है।

मानक समय (Standard Time)

       मानक समय किसी देश के मध्य से गुजरने वाली याम्योत्तर का माध्य होता है, जो स्थानीय समय की असुविधा को दूर करने के लिए संपूर्ण देश के लिए लागू माना जाता है। प्रत्येक देश का मानक समय ग्रीनविच मीन टाइम से आधे घंटे (अथवा 0° देशान्तर के 7½º)  के गुणक के अन्तर पर निर्धारित किया जाता है।

➤ मानक समय स्वेच्छा से चयनित याम्योत्तर का स्थानीय समय होता है जो एक विशिष्ट क्षेत्र या देश के लिए मानक समय निर्धारित करता है। उदाहरण के लिए 82½° पूर्वी देशान्तर (याम्योत्तर) जो कि प्रयागराज के निकट मिर्जापुर से होकर गुजरती है, संपूर्ण भारत के लिए मानक समय (IST) का निर्धारण करती है।

➤ भारत का स्थानीय समय ग्रीनविच मानक समय से 5½ घंटा आगे है। अतः जब ग्रीनविच में दोपहर के 12 बजे हों तो उस समय भारत में शाम के 5½ (5:30PM) बजेंगे। इससे भारत के विभिन्न प्रदेशों में देशान्तरीय अंतर के कारण समय की भिन्नता को समायोजित करने की समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

➤ किसी देश का मानक समय उस देश के माध्य देशांतर पर निर्भर करता है, अर्थात् प्रत्येक देश का एक मानक समय होता है, परंतु कुछ देश इसके अपवाद हैं। जैसे- अविभाजित रूस में 11 समय क्षेत्र (Time Zone) थे जो विभाजन के बाद केवल चार रह गए हैं, इसी प्रकार कनाडा में 6, संयुक्त राज्य अमेरिका में 6 तथा चीन में 1 समय क्षेत्र हैं, वर्तमान समय में भारत में भी दो समय क्षेत्र बनाने की माँग बढ़ रही है।

स्थानीय समय (Local Time)

      स्थानीय मध्याह्न समय वह समय है जब सूर्य उस स्थान विशेष पर लम्बवत् चमकता है। इस प्रकार यह पृथ्वी पर स्थान विशेष का सूर्य की स्थिति से परिकलित समय है। भारत के सर्वाधिक पूर्व (अरुणाचल प्रदेश) एवं सर्वाधिक पश्चिम (गुजरात के द्वारका) में स्थित स्थानों के स्थानीय समय में लगभग दो घंटे का अंतर पाया जाता है।

स्थानीय समय की गणना में सहायक कुछ प्रमुख कारक

➤ 0° देशांतर (ग्रीनविच रेखा) के बायीं ओर पश्चिमी देशांतर व दायीं ओर पूर्वी देशांतर होता है जबकि 180° देशांतर (अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा) के बायीं ओर पूर्वी देशांतर व दायीं ओर पश्चिमी देशांतर होता है।

➤ किसी भी देशांतर से जब बायीं ओर जाते हैं तो प्रत्येक 1° देशांतर पर समय में 4 मिनट की कमी आती है, जबकि दायीं ओर 4 मिनट की वृद्धि होती है।

➤ 180° देशांतर (अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा) के बायीं ओर जाने पर एक दिन जोड़ना पड़ता है, जबकि दायीं ओर जाने पर एक दिन घटाना पड़ता है।

➤ किसी जलपोत या विमान द्वारा यात्रा करने पर स्थानीय समय निकालने के पश्चात् उसमें आवश्यकतानुसार यात्रा अवधि को जोड़ा या घटाया जाता है। वह विमान या जलपोत कब पहुँचेगा यह ज्ञात करने के लिए यात्रा अवधि को स्थानीय समय में जोड़ा जाता है, जबकि वह कब चला था यह जानने के लिए स्थानीय समय निकालने के पश्चात् यात्रा अवधि घटाई जाती है।

अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा (International Date Line)

       ग्लोब पर 180° याम्योत्तर के लगभग समानांतर स्थलखंडों को छोड़ते हुए निर्धारित की गई काल्पनिक रेखा, जिसे अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहा जाता है।

➤ अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 180° देशान्तर के सहारे निर्मित हुई है जो 180° देशान्तर के दायें या बायें मुड़ जाती है ताकि स्थलीय भागों का विभाजन न हो और लोगों को तिथियों के बारे में भ्रम न हो।

➤ रूस, एल्यूशियन द्वीप, फिजी, टोंगा तथा चैथम द्वीपों के कारण तीन स्थानों से हट गई है, ये रेखा 8 स्थानों पर विचलित भी हुई है।

➤ साइबेरिया को विभाजित होने से बचाने एवं साइबेरिया को अलास्का से अलग रखने के लिए 75° उत्तरी अक्षांश पर यह पूर्व की ओर मोड़ी गई है।

➤ यह रेखा आर्कटिक सागर, चुक्ची सागर, बेरिंग जल सन्धि व प्रशान्त महासागर से होकर गुजरती है।

➤ बेरिंग जलसन्धि अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के समानान्तर स्थित है।

➤ बेरिंग सागर में यह रेखा पश्चिम की ओर मोड़ी गई है।

➤ फिजी द्वीप समूह एवं न्यूजीलैंड के विभिन्न भागों को एक साथ रखने के लिए यह रेखा दक्षिणी प्रशांत महासागर में पूर्व दिशा की ओर मोड़ी गई है।

➤ अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के पूर्व व पश्चिम में एक दिन का अंतर पाया जाता है। अतः इसे पार करते समय एक दिन बढ़ाया या घटाया जाता है।

➤ जब कोई जलयान अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को पा कर पश्चिम दिशा में यात्रा कता है तो एक दिन जोड़ दिया जाता है तथा जब पूर्व दिशा में यात्रा करता है तो एक दिन घटा दिया जाता है।

➤ अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के अनुसार कोई भी समय (मध्य रात्रि, सूर्योदय, सूर्यास्त आदि) सबसे पहले किरिबाति देश के कॅरोलीन द्वीप समूह के लाँग आइलेट में होता है। यह देश प्रशांत महासागर में स्थित है।

➤ नार्वे देश को अर्द्धरात्रि सूर्य का देश कहा जाता है क्योंकि उत्तरी नॉर्वे के हेमरफेस्ट शहर में एक वर्ष में 76 दिन-रात सिर्फ 40 मिनट की होती हैं।

➤ ये आर्कटिक वृत्त (66½º अक्षांश) के ऊपर स्थित है जहाँ सूर्य का प्रकाश 6 महीने के लिए रहता है।

Latitude



अक्षांश, देशांतर, अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा व समय से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



1. भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण किसी दिये गये स्थान की कोणीय दूरी क्या कहलाती है?

[A] प्रधान देशान्तर
[B] देशान्तर
[C] अक्षांश
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [C] अक्षांश [/read]

2. निम्नलिखित में से कौन-सा वृहत वृत्त (Great Circle) का उदाहरण है?

[A] कर्क रेखा
[B] भूमध्य रेखा
[C] मकर रेखा
[D] आर्कटिक रेखा

[read more] [B] भूमध्य रेखा [/read]

3. ट्रॉपिक ऑफ कैंसर (Tropic of Cancer) निम्न में से क्या है?

[A] एक प्रकार की रक्त सम्बन्धी बीमारी
[B] कैंसर की रोकथाम का एक वैज्ञानिक उपकरण
[C] 23½º उत्तरी अक्षांश रेखा
[D] 23½º दक्षिणी अक्षांश रेखा

[read more] [C] 23½º उत्तरी अक्षांश रेखा [/read]

4. ध्रुवों की तरफ जाने पर अक्षांश रेखाओं के व्यास की प्रकृति कैसी होती है?

[A] यह स्थिर रहता है।
[B] यह बढ़ता है।
[C] यह घटता है।
[D] पहले घटता है पुनः बढ़ता है।

[read more] [C] यह घटता है। [/read]

5. सूची-1 को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए-

सूची-1         सूची-II

a. भूमध्य रेखा 1. 66½º दक्षिण

b. कर्क रेखा  2. 66½º उत्तर

c. मकर रेखा  3. 0°

d. आर्कटिक वृत्त 4. 23½º उत्तर

e. अंटार्कटिक वृत्त 5. 23½º दक्षिण

कूट:

      a b c d e

[A] 5 4 3 1 2
[B] 3 4 5 2 1
[C] 2 1 3 4 5
[D] 4 3 2 5 1

[read more] [B] 3 4 5 2 1 [/read]

6. धरातल पर 1° अक्षांश की दूरी निम्न में से किसके बराबर होती है?

[A] 11 किमी०
[B] 21 किमी०
[C] 111 किमी०
[D] 121 किमी०

[read more] [C] 111 किमी० [/read]

7. भूमध्य रेखा के अतिरिक्त कौन-सी अक्षांश रेखा पृथ्वी को दो बराबर भागों में विभाजित करती है?

[A] 23½º N
[B] 23½º
[C] 66½º एवं 66½º
[D] कोई भी अक्षांश नहीं

[read more] [D] कोई भी अक्षांश नहीं [/read]

8. मकर रेखा अथवा 23½º दक्षिणी अक्षांश वृत्त निम्नलिखित में से कहाँ से होकर गुजरती है? 

[A] जिम्बाब्वे
[B] मालागासी
[C] भारत
[D] ग्रीनलैंड 

[read more] [B] मालागासी [/read]

9. वह काल्पनिक रेखा जो पृथ्वी को दो भागों में बाँटती है, क्या कहलाती है?

[A] भूमध्य रेखा
[B] मकर रेखा
[C] कर्क रेखा
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [A] भूमध्य रेखा [/read]

10. 66½º दक्षिणी अक्षांश को कहते हैं-

[A] आर्कटिक वृत्त
[B] कर्क रेखा
[C] अंटार्कटिक वृत्त
[D] मकर रेखा

[read more] [C] अंटार्कटिक वृत्त [/read]

11. दोनों ध्रुवों को जोड़ने वाली वह काल्पनिक रेखा जो भूमध्य रेखा को समकोण पर प्रतिच्छेद करती है, क्या कहलाती है?

[A] मध्याह्न
[B] अक्षांश
[C] देशान्तर
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [C] देशान्तर [/read]

12. दो देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी निम्न में से किस नाम से जानी जाती है?

[A] बेल्ट
[B] गोरे
[C] काले
[D] समय पेटी

[read more] [B] गोरे [/read]

13. एक देशान्तर से दूसरे देशान्तर के बीच कितना समयान्तराल होता है?

[A] 4 मिनट
[B] 1 घण्टा
[C] 15 मिनट
[D] 12 घण्टा

[read more] [A] 4 मिनट [/read]

14. वह अक्षांश रेखा जिस पर सदैव दिन व रात की अवधि समान रहती है, है

[A] भूमध्य रेखा
[B] कर्क रेखा
[C] मकर रेखा
[D] हिंज रेखा

[read more] [A] भूमध्य रेखा [/read]

15. निम्नलिखित में से कौन सुमेलित नहीं है?

[A] कर्क रेखा – 23½º N
[B] मकर रेखा – 23½º S
[C] आर्कटिक वृत्त – 66½º N
[D] प्रधान याम्योत्तर-180°

[read more] [D] प्रधान याम्योत्तर-180° [/read]

16. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

[A] देशान्तर रेखाओं की कुछ संख्या 180 है।
[B] किसी भी स्थान की ग्रीनविच रेखा से कोणीय दूरी को उस स्थान का देशान्तर कहा जाता है।
[C] देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी विषुवत रेखा पर अधिकतम एवं ध्रुवों पर शून्य होती है।
[D] विषुवत रेखा पर देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी 111.3 किमी० होती है।

[read more] [A] देशान्तर रेखाओं की कुछ संख्या 180 है। [/read]

17. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

[A] विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी स्थिर रहती है।
[B] किसी भी स्थान की प्रधान याम्योत्तर से कोणीय दूरी को उस स्थान का अक्षांश कहा जाता है।
[C] विषुवत रेखा एक बृहत् वृत्त है।
[D] सभी देशान्तर रेखाएँ वृहत् वृत्त है।

[read more] [B] किसी भी स्थान की प्रधान याम्योत्तर से कोणीय दूरी को उस स्थान का अक्षांश कहा जाता है। [/read]

18. दो अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी लगभग होती है-

[A] 111 मील
[B] 111 किमी०
[C] 121 मील
[D] 121 किमी०

[read more] [B] 111 किमी० [/read]

19. 1° देशान्तर की सर्वाधिक दूरी कहाँ पर होगी?

[A] कर्क रेखा पर
[B] विषुवत रेखा पर
[C] मकर रेखा पर
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [B] विषुवत रेखा पर [/read]

20. कुल अक्षांशों की संख्या कितनी है?

[A] 66
[B] 90
[C] 180
[D] 360

[read more] [C] 180 [/read]

21. देशान्तरों की संख्या कितनी है?

[A] 24
[B] 90
[C] 180
[D] 360

[read more] [D] 360 [/read]

22. विषुवत रेखा के समानान्तर कल्पित रेखाएँ क्या कहलाती है?

[A] अक्षांश रेखाएँ
[B] ग्रीन विच रेखा
[C] देशान्तर रेखाएँ
[D] मध्याह्न रेखाएँ

[read more] [A] अक्षांश रेखाएँ [/read]

23. पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली रेखा क्या कहलाती है?

[A] अक्षांश रेखा
[B] अन्तर्राष्ट्रीय रेखा
[C] देशान्तर रेखा
[D] मिलन रेखा

[read more] [C] देशान्तर रेखा [/read]

24. प्रधान मध्याह्न रेखा किस स्थान से होकर गुजरती है?

[A] ग्रीन विच
[B] सिडनी
[C] ग्रीनलैंड
[D] इलाहाबाद

[read more] [A] ग्रीन विच [/read]

25. ग्रीन विच रेखा से तात्पर्य है-

[A] 0° अक्षांश
[B] 0° देशान्तर
[C] 180° पूर्वी देशान्तर
[D] 180° पश्चिमी देशान्तर

[read more] [B] 0° देशान्तर [/read]

26. मकर रेखा निम्न में से किस देश से होकर नहीं जाती है?

[A] चिली
[B] द० अफ्रीका
[C] अर्जेण्टीना
[D] फिलीपीन्स 

[read more] [D] फिलीपीन्स [/read]

27. पृथ्वी एक घण्टे में कितना देशान्तर घूम लेती है?

[A] 20°
[B] 12°
[C] 15°
[D] 18°

[read more] [C] 15° [/read]

28. दक्षिणी ध्रुव का अक्षांश है-

[A] 70°
[B] 80°
[C] 90°
[D] 100°

[read more] [C] 90° [/read]

29. सूची-1 को सूची-11 के साथ सुमेलित कीजिए तथा सूचिओं के नीचे दिये गये कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये।

सूची-1     सूची-11

a. विषुवत रेखा 1. 23½º उत्तरी अक्षांश

b. कर्क रेखा 2. 23½º दक्षिणी अक्षांश

c. मकर रेखा 3. 0° देशान्तर

d. ग्रीन विच रेखा 4. 0° अक्षांश

कूट: a b c d

[A] 4 1 2 3
[B] 4 1 3 2
[C] 2 3 4 1
[D] 3 4 2 1

[read more] [A] 4 1 2 3 [/read]

30. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए तथा सूचिओं के नीचे दिये गये कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये।

सूची-1     सूची-II

a. आर्कटिक वृत्त 1. 66½º दक्षिणी अक्षांश

b. अंटार्कटिक वृत्त 2. 0° अक्षांश

c. अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 3. 66½º उत्तरी अक्षांश

d. विषुवत रेखा 4. 180° देशान्तर

कूट: a b c d

[A] 4 1 3 2
[B] 4 1 2 3
[C] 3 1 4 2
[D] 1 2 4 3

[read more] [C] 3 1 4 2 [/read]

31. दो स्थानों के देशान्तरों में 1° का अन्तर होने पर उनके समयों में कितना अन्तर होगा?

[A] 15 मिनट
[B] 8 मिनट
[C] 4 मिनट
[D] 2 मिनट

[read more] [C] 4 मिनट [/read]

32. निम्नलिखित में से किस देश से होकर कर्क रेखा नहीं गुजरती है?

[A] भारत
[B] म्यान्मार
[C] चीन
[D] जायरे

[read more] [D] जायरे [/read]

33. उत्तरी गोलार्द्ध में भू-धरातल अधिकतम है-

[A] 30° N – 40° N
[B] 40° N – 50° N
[C] 50°N – 60° N
[D] 60° N – 70°N

[read more] [A] 30° N – 40° N [/read]

34. मानचित्र पर स्थित अक्षांश एवं देशान्तर रेखाओं के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?

[A] दोनों समानान्तर रेखाएँ है।
[B] दोनों एक-दूसरे को लम्बवत काटती है।
[C] दोनों ध्रुवों पर मिलती है।
[D] दोनों भूमध्य रेखा पर मिलती है।

[read more] [B] दोनों एक-दूसरे को लम्बवत काटती है। [/read]

35. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहलाता है-

[A] 0° अक्षाश
[B] 0° देशान्तर
[C]  66½º अक्षांश
[D] 180° देशान्तर

[read more] [D] 180° देशान्तर [/read]

36. ग्रीनविच से 180° मध्याह्न काल्पनिक रेखा कहलाती है-

[A] अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा
[B] मकर रेखा
[C] अक्षांश रेखा
[D] कर्क रेखा

[read more] [A] अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा [/read]

37. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा की स्थिति निम्न में से किसके निकटतम है?

[A] 0° अक्षांश
[B] 90° पूर्वी एवं पश्चिमी देशान्तर
[C] 0° देशान्तर
[D] 180° पूर्वी एवं पश्चिमी देशान्तर

[read more] [D] 180° पूर्वी एवं पश्चिमी देशान्तर [/read]

38. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा टेढ़ी-मेढ़ी है। ऐसा होने का कारण है

[A] समय एवं तिथि के अन्तर को समाप्त करना
[B] हवाई जहाजों के लिए सही तिथि रखना
[C] 180° देशान्तर की विशिष्टता स्थापित करना
[D] मार्ग में पड़ने वाले द्वीपों को छोड़ने हेतु

[read more] [A] समय एवं तिथि के अन्तर को समाप्त करना [/read]

39. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा बिलकुल सीधी नहीं है, क्योंकि इसका कारण है-

[A] अन्तर्राष्ट्रीय समझौता
[B] कोरियोलिस बल
[C] कुछ देशों के विभिन्न भागों के दिन एवं समय को एकसमान रखना
[D] उपर्युक्त में सभी

[read more] [C] कुछ देशों के विभिन्न भागों के दिन एवं समय को एकसमान रखना [/read]

40. उत्तरी प्रशान्त महासागर में अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के विचलन का कारण है-

[A] हवाई द्वीप समूह
[B] क्यूराइल द्वीप समूह
[C] एल्यूशियन द्वीप समूह
[D] उपर्युक्त सभी

[read more] [C] एल्यूशियन द्वीप समूह [/read]

41. यदि अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा पर दिन के 12 बजे हो तो उस समय भारत का मानक समय क्या होगा?

[A] 6.30 सुबह
[B] 5.30 शाम
[C] 5.30 सुबह
[D] 6.30 शाम

[read more] [C] 5.30 सुबह [/read] 

42. भारत का प्रामाणिक समय किस देशान्तर से लिया गया है?

[A] 81½º W
[B] 82½º W
[C] 81½º E
[D] 82½º E

[read more] [D] 82½º E [/read]

43. भारत का प्रामाणिक समय किस स्थान से निश्चित किया जाता है?

[A] मुम्बई
[B] दिल्ली
[C] मिर्जापुर (प्रयागराज)
[D] कोयम्बटूर

[read more] [C] मिर्जापुर (प्रयागराज) [/read]

44. निम्नलिखित में से किस स्थान का प्रामाणिक समय एवं स्थानीय समय लगभग एक समान है?

[A] मिर्जापुर (प्रयागराज)
[B] नई दिल्ली
[C] अहमदाबाद
[D] राँची

[read more] [A] मिर्जापुर (प्रयागराज) [/read]

45. भारत के सर्वाधिक पूर्व एवं पश्चिम में स्थित स्थानों के स्थानीय समय में कितना का अन्तर है?

[A] 1 घण्टा
[B] 2 घण्टा
[C] 2 घण्टा 30 मिनट
[D] 1 घण्टा 30 मिनट

[read more] [B] 2 घण्टा [/read]

46. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 180° देशान्तर से कितनी बार विचलित होती है?

[A] 8
[B] 60
[C] 10
[D] 4

[read more] [A] 8 [/read]

47. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 180° याम्योत्तर से अन्तर करती है जिससे कि वह-

[A] एक ही प्रशासन के अन्तर्गत द्वीप समूह को विभाजित न करे।
[B] बेरिंग जलडमरूमध्य को विभाजित न करे।
[C] एक ही प्रशासन के अन्तर्गत भू-भागों को विभाजित करें।
[D] प्रशान्त महासागर को दो बराबर भागों में विभाजित करें।

[read more] [A] एक ही प्रशासन के अन्तर्गत द्वीप समूह को विभाजित न करे। [/read]

48. यदि किसी स्थान का स्थानीय मानक समय ग्रीनविच समय से 12 घण्टे आगे है तो वह स्थान कहाँ स्थित होगा?

[A] 90° E
[B] 90° W
[C] 180° E
[D] 180° W

[read more] [D] 180° E [/read]

49. ग्रीनविच पर समय मध्याह्न 12 बजे हैं, 50º पूर्वी देशान्तर पर स्थित एक स्थान पर समय क्या होगा?

[A] प्रातः 8.40
[B] सांय 3.20 
[C] प्रातः 5.00
[D] मध्य रात्रि 12.00

[read more] [B] सांय 3.20 [/read]

50. यदि ग्रीनविच (0° देशान्तर) पर रात्रि के 12.00 बजे है तो 30° पूर्वी देशान्तर पर स्थित काहिरा में क्या समय होगा?

[A] 2:00 बजे रात्रि
[B] 8:00 बजे रात्रि
[C] 10 बजे रात्रि
[D] 12 बजे रात्रि

[read more] [A] 2:00 बजे रात्रि [/read]

51. पृथ्वी पर दो स्थानों की स्थिति के अनुदैर्ध्य का अंतर 15° है। स्थानीय समय में कितना का अंतर होगा?

[A] 2 घण्टे
[B] 1 घण्टा
[C] 5 घण्टे
[D] 15 घण्टे

[read more] [B] 1 घण्टा [/read]

52. यदि दो स्थानों के बीच समय में अन्तर 2 घण्टे 20 मिनट है तो देशान्तर में अन्तर होगा?

[A] 35°
[B] 45°
[C] 40°
[D] 30°

[read more] [A] 35° [/read]

53. अन्तर्राष्ट्रीय दिनांक रेखा कहाँ से होकर गुजरती है?

[A] 0°
[B] 180°
[C] 90°
[D] 270°

[read more] [B] 180° [/read]

54. ग्रीनविच किस देश में है?

[A] यू०एस०ए०
[B] यू० के० 
[C] भारत
[D] हॉलैंड 

[read more] [B] यू० के० [/read]

55. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

[A] यह एक काल्पनिक रेखा है।
[B] बेरिंग सागर में यह रेखा पश्चिम की ओर मोड़ी गई है।
[C] 75° उत्तरी अक्षांश पर यह रेखा पश्चिम की ओर मोड़ी गई है।
[D] न्यूजीलैंड एवं फिजी द्वीप समूह को एक साथ रखने के लिए दक्षिणी प्रशान्त महासागर में यह रेखा पूर्व की ओर मोड़ी गई है।

[read more] [C] 75° उत्तरी अक्षांश पर यह रेखा पश्चिम की ओर मोड़ी गई है। [/read]

56. भारत और ग्रीनविच के मानक समय में कितने का अन्तर है?

[A] 4 घण्टा 30 मिनट
[B] 5 घण्टा 30 मिनट
[C] 5 घण्टा 15 मिनट
[D] 6 घण्टा 30 मिनट

[read more] [B] 5 घण्टा 30 मिनट [/read]

57. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा का निर्धारण किस वर्ष किया गया?

[A] 1662 ई०
[B] 1745 ई०
[C] 1884 ई०
[D] 1947 ई०

[read more] [C] 1884 ई० [/read]

58. पृथ्वी को कितने समय कटिबन्धों में बाँटा जा सकता है?

[A] 2
[B] 4
[C] 24
[D] 64

[read more] [C] 24 [/read]

59. एक देशान्तर को पार करने में दो स्थानों के स्थानीय समय के बीच क्या अन्तर होता है?

[A] 8 मिनट
[B] 4 मिनट
[C] 2 मिनट
[D] 0 मिनट

[read more] [B] 4 मिनट [/read]

3. Earth’s motions (पृथ्वी की गतियाँ)

3. Earth’s motions (पृथ्वी की गतियाँ)



पृथ्वी की गतियाँ

         पृथ्वी की मुख्यतः दो गतियाँ है-

(1) घूर्णन या परिभ्रमण या दैनिक गति:-

       पृथ्वी सदैव अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व दिशा में लट्टू के समान घूमती रहती है, जिसे पृथ्वी का घूर्णन (Rotation) या परिभ्रमण कहते हैं। इस गति के कारण ही पृथ्वी पर दिन व रात होते हैं। इसीलिए इस गति को दैनिक गति भी कहा हैं।

➤ पृथ्वी का अक्ष भूमध्यरेखीय तल के लम्बवत् रहता है तथा पृथ्वी के केन्द्र से होकर गुजरता है।

➤ इसके एक पूर्ण घूर्णन की अवधि लगभग 24 घंटे (23 घंटा, 56 मिनट 4.09 सेकेण्ड) है। यह अवधि एक दिन का निर्माण करती है।

➤ यदि पृथ्वी अपनी धुरी पर झुकी हुई न होती तो सर्वत्र दिन-रात की अवधि एक समान होती।

➤ यदि पृथ्वी अपनी अक्ष पर न घूमती और सूर्य की परिक्रमा न करती तो पृथ्वी के एक गोलार्द्ध में सदैव दिन बड़े और रातें छोटी होतीं तथा दूसरे गोलार्द्ध में सदैव रातें बड़ी और दिन छोटे होते।

➤ पृथ्वी के घूर्णन की यह गति भूमध्यरेखा पर 0.5 किमी. प्रति सेकेण्ड होती है, 60° अक्षांश पर इसकी आधी 0.23km/h तथा ध्रुवों पर शून्य हो जाती है। अर्थात् ध्रुवों की ओर यह गति क्रमशः कम (धीमी) होती जाती है।

➤ ज्वारीय घर्षण पृथ्वी की घूर्णन गति को कम कर देता है। इस क्रिया के फलस्वरूप दिन की अवधि 0.002 सेकेण्ड प्रति शताब्दी की दर से बढ़ जाती है।

➤ पवनों व समुद्री धाराओं में विक्षेपण, दैनिक ज्वार-भाटा की स्थिति में परिवर्तन, ध्रुवों का चपटाकार स्वरूप, भूमध्य रेखा का उभार (Bulge) तथा उत्तरी चुम्बकीय ध्रुव का गतिमान होना पृथ्वी के घूर्णन गति के कारण ही सम्भव होते हैं।

(2) परिक्रमण अथवा वार्षिक गति:-

        पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमने के साथ-साथ सूर्य के चारों ओर एक अंडाकार मार्ग पर 365 दिन तथा 6 घंटे में एक परिक्रमा पूर्ण करती है। पृथ्वी की इस गति को परिक्रमण या वार्षिक गति कहते हैं।

➤ पृथ्वी के परिक्रमण पथ अर्थात् अंडाकार मार्ग को भू-कक्षा (Earth Orbit) कहते हैं।

➤ चूँकि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर अण्डाकार कक्ष में घूमती है, इसीलिए पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी परिवर्तित होती रहती है। पृथ्वी और सूर्य के बीच की औसत दूरी 14.96 करोड़ किमी. है।

➤ एक वर्ष में एक बार पृथ्वी सूर्य से सबसे दूरस्थ बिन्दु पर तथा दूसरी बार सबसे निकटस्थ बिन्दु पर स्थित होती है।

नक्षत्र दिवस (Sidereal Day):-

     एक मध्याह्न रेखा के ऊपर किसी निश्चित नक्षत्र के लगातार दो बार गुजरने के बीच की अवधि को नक्षत्र दिवस कहते हैं। यह 23 घंटे, 56 मिनट व 4 सेकण्ड अवधि की होती है।

सौर दिवस (Solar Day):- 

     किसी निश्चित मध्याह्न रेखा के ऊपर से सूर्य के दो बार गुजरने की अवधि को सौर दिवस के नाम से जाना जाता है।

➤ जब सूर्य को गतिहीन मानकर पृथ्वी द्वारा उसके परिक्रमण की गणना दिवसों के रूप में की जाती है तब सौर दिवस प्राप्त होता है। इसकी अवधि पूरे 24 घंटे की होती है।

➤ औसत सौर दिवस, नक्षत्र दिवस से 3 मिनट 56 सेकेण्ड बड़ा होता है। इसका कारण यह है कि पृथ्वी अपने अक्ष पर जब एक चक्कर पूरा करती है तो वह अपने कक्ष पर पूर्व की स्थिति से एक अंश आगे निकल जाती है। पृथ्वी की किसी निश्चित मध्याह्न रेखा को सूर्य के सम्मुख पुनः आने में कुछ अतिरिक्त समय लग जाता है।

लीप वर्ष:-
       पृथ्वी एक वर्ष या 365 दिन 6 घण्टे में सूर्य का एक चक्कर लगाती है। हम लोग एक वर्ष 365 दिन का मानते हैं तथा सुविधा के लिए 6 घंटे को इसमें नहीं जोड़ते हैं। चार वर्षों में प्रत्येक वर्ष के बचे हुए 6 घंटे मिलकर एक दिन यानी 24 घंटे के बराबर हो जाते हैं। इसके एक अतिरिक्त दिन को फरवरी के महीने में जोड़ा जाता है। इस प्रकार प्रत्येक चौथे वर्ष फरवरी माह 28 के बदले 29 दिन का होता है। इस प्रकार ऐसा वर्ष जिसमें 366 दिन होते हैं उसे लीप वर्ष कहा जाता है। 

उपसौर (Perihelion):-

   पृथ्वी जब सूर्य के अत्यधिक पास होती है तो इसे उपसौर कहते हैं। ऐसी स्थिति प्रत्येक वर्ष 3 जनवरी को होती है।

➤ उपसौर के समय पृथ्वी और सूर्य के बीच की औसत दूरी 14.70 करोड़ किमी. होती है।

➤ उपसौर की दशा में पृथ्वी सूर्य से सामान्य दिनों की अपेक्षा 7 प्रतिशत अधिक सूर्यताप (Insolation) प्राप्त करता है।

➤ उपसौर की दशा में पृथ्वी का दक्षिणी गोलार्द्ध सूर्य की ओर होता है। इसीलिए यहाँ गर्मी थोड़ी बढ़ जाती है

➤ इस दशा में चूँकि उत्तरी गोलार्द्ध की दूरी अधिक होती है इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में पड़ने वाली गर्मी थोड़ी कम हो जाती है।

अपसौर (Aphelion):-

     पृथ्वी जब सूर्य से अधिकतम दूरी पर होती है तो इसे अपसौर कहते हैं। ऐसी स्थिति प्रत्येक वर्ष 4 जुलाई को होती है।

➤ अपसौर के समय पृथ्वी और सूर्य के बीच की औसत दूरी 15.20 करोड़ किमी. होती है।

➤ अपसौर की दशा में पृथ्वी सूर्य से सामान्य दिनों की अपेक्षा 7 प्रतिशत कम सूर्यताप (Insolation) प्राप्त करता है।

➤ अपसौर की दशा में पृथ्वी का उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर होता है। इसलिए दक्षिणी गोलार्द्ध में पड़ने वाली गर्मी थोड़ी कम हो जाती है।

➤ इस दशा में चूँकि उत्तरी गोलार्द्ध  की दूरी कम होती है इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में पड़ने वाली गर्मी थोड़ी अधिक हो जाती है।

Earth

एपसाइड रेखा:-

        उपसौरिक एवं अपसौरिक को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा सूर्य के केन्द्र से गुजरती है, इसे ही एपसाइड रेखा कहते हैं।

दिन और रात का छोटा व बड़ा होना

      विषुवतरेखीय भाग को छोड़कर विश्व के शेष सभी भागों में विभिन्न ऋतुओं में दिन और रात की अवधि में अंतर पाया जाता है। विषुवत रेखा पर सदैव दिन और रात की अवधि बराबर होती है, क्योंकि इसे प्रकाश वृत्त सदैव दो बराबर भागों में बाँटता है। अतः विषुवत रेखा का आधा भाग प्रत्येक स्थिति में सूर्य का प्रकाश प्राप्त करता है।

ग्लोब पर वह वृत्त जो दिन तथा रात को विभाजित करता है उसे प्रदीप्ति वृत्त कहते हैं।

पृथ्वी पर दिन और रात की स्थिति

     उत्तरी गोलार्द्ध 21 मार्च से 23 सितम्बर की अवधि के दौरान सूर्य का प्रकाश 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त करता है। अतः यहाँ दिन बड़े एवं रातें छोटी होती हैं। हम जैसे-जैसे उत्तरी ध्रुव की ओर बढ़ते जाते हैं, दिन की अवधि भी बढ़ती जाती है। इस समय उत्तरी ध्रुव पर दिन की अवधि छः महीने की होती है और दक्षिणी ध्रुव पर छः महीने की रात होती है।

     दक्षिणी गोलार्द्ध 23 सितम्बर से 21 मार्च की अवधि के दौरान सूर्य का प्रकाश 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त करता है। हम जैसे-जैसे दक्षिणी ध्रुव की ओर बढ़ते हैं, दिन की अवधि भी बढ़ती जाती है। दक्षिणी ध्रुव पर इसी कारण छः महीने तक दिन रहता है जबकि उत्तरी ध्रुव पर इस समय छः महीने की रात रहती है।

सूर्य के सापेक्ष पृथ्वी कि स्थिति

उत्तर अयनांत (Summer Solstice):
       21 जून को विषुवत वृत के उत्तरी भाग में सबसे लंबा दिन तथा सबसे छोटी रात होती है। ठीक इसके विपरीत इसी दिन दक्षिणी गोलार्ध में सबसे लंबी रात एवं छोटी दिन होती है। पृथ्वी की इस अवस्था को उत्तर अयनांत कहते है।  
दक्षिण अयनांत (Winter Solstice) :-
       22 दिसंबर को विषुवत वृत के दक्षिणी भाग में सबसे लंबा दिन तथा सबसे छोटी रात होती है।ठीक इसके विपरीत इसी दिन उत्तरी गोलार्ध में सबसे लंबी रात एवं छोटी दिन होती है। पृथ्वी की इस अवस्था को दक्षिण अयनांत कहते है। 
विषुव-
       21 मार्च एवं 23 सितंबर को सूर्य की किरणें  विषुवत वृत्त पर सीधी पड़ती है। इस अवस्था में कोई भी ध्रुव सूर्य की ओर नहीं झुका रहता है, इसलिए पूरी पृथ्वी पर रात एवं दिन बराबर होते हैं। इसे विषुव कहा जाता है।
       23 सितंबर को उत्तरी गोलार्ध में शरद ऋतु होती है जबकि दक्षिणी गोलार्ध में बसंत ऋतु होती है। 21 मार्च को स्थिति ठीक इसके विपरीत होती है क्योंकि इस दिन उत्तरी गोलार्ध में बसंत ऋतु तथा दक्षिणी गोलार्ध में शरद ऋतु होती है। 

21 जून की स्थिति

➤ 21 मार्च व 23 सितम्बर को सूर्य की किरणें विषुवत रेखा पर लम्बवत होती हैं। 21 मार्च के बाद सूर्य के उत्तरायण होने के साथ-साथ उत्तरी गोलार्द्ध में दिन की अवधि में भी वृद्धि होने लगती है व ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है।

➤ 21/22 जून तक सूर्य कर्क रेखा के लम्बवत स्थिति में आ जाता है। इस स्थिति को कर्क संक्रान्ति या ग्रीष्म अयनांत कहते हैं।

➤ 21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध में दिन बड़ा (सर्वाधिक अवधि वाला) तथा रात्रि छोटी (न्यूनतम अवधि वाली) होती है। दक्षिणी गोलार्द्ध में इस समय शीत ऋतु होती है। 21 जून के पश्चात् 23 सितम्बर तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी कम होने लगती है।

22 दिसम्बर की स्थिति

➤ 22 दिसम्बर को दक्षिणी गोलार्द्ध सूर्य की ओर तथा उत्तरी गोलार्द्ध विपरीत दिशा में स्थित होता है। इस तिथि को सूर्य मकर रेखा (Tropic of Capricorn) पर लम्बवत् चमकता है। इस स्थिति को मकर संक्राति या शीत अयनांत (Winter Solstice) कहते हैं। इस तिथि को दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन बड़ा (सर्वाधिक अवधि वाला) तथा रातें छोटी (न्यूनतम अवधि वाली) होती हैं।

➤ इस दौरान दक्षिणी गोलार्द्ध में निम्न वायुदाब अर्थात् ग्रीष्म ऋतु होती है। इसके विपरीत उत्तरी गोलार्द्ध में इस समय उच्च वायुदाब अर्थात् शीत ऋतु होती है, क्योंकि कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं। कर्क रेखा भारत के लगभग मध्य भाग से होकर गुजरती है। इसीलिए इस समय उत्तर-पश्चिम भारत में उच्च वायुदाब का केन्द्र विकसित होता है।

➤ वस्तुतः सूर्य के दक्षिणायन होने अर्थात् दक्षिणी गोलार्द्ध की ओर उन्मुख होने की प्रक्रिया 23 सितम्बर के पश्चात् प्रारंभ हो जाती है, जिससे दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन बड़े व रातें छोटी होने लगती हैं। इस समय उत्तरी गोलार्द्ध में इसके विपरीत स्थिति देखी जाती है। 22 दिसम्बर के उपरान्त 21 मार्च तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में धीरे-धीरे ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति हो जाती है।

21 मार्च व 23 सितम्बर की स्थितियाँ

➤ इन दोनों स्थितियों में सूर्य की किरणें विषुवत रेखा पर लम्बवत् पड़ती हैं। इसलिए इस समय सभी अक्षांश रेखाओं का आधा भाग सूर्य का प्रकाश प्राप्त करता है। और सर्वत्र दिन व रात की अवधि समान होती है।

➤ इन तिथियों में दिन व रात की अवधि के समान रहने एवं ऋतु की समानता के कारण इन दोनों स्थितियों को विषुव अथवा सम रात-दिन (Equinox) कहा जाता है।

21 मार्च की स्थिति को बसंत विषुव (Vernal/Spring Equinox) एवं 23 सितम्बर वाली स्थिति को शरद विषुव (Autumnal Equinox) कहा जाता है।

➤ जब सूर्य अण्डाकार (Ecliptic) कक्ष के सहारे वसन्त विषुव (Vernal Equinox) या शरद विषुव (Autumnal Equinox) की दिशा में होता है तो इसका दिक्पात (Declination) शून्य होता है। उस समय पृथ्वी के सभी स्थानों पर दिन व रात 12 घण्टे के होते हैं।

➤ यदि पृथ्वी का अक्ष, कक्ष तल (Orbital Plane) के समकोण पर होता तो पृथ्वी पर ऋतुओं का परिवर्तन नहीं होता। प्रत्येक अक्षांश पर रहने वाले मनुष्य वर्ष भर एक ही प्रकार की ऋतु की अनुभव करते। भूमध्यरेखा के आस-पास के प्रदेश में सदैव ग्रीष्म ऋतु तथा ध्रुवों के पास सदैव शीत ऋतु का अनुभव होता।

➤ उत्तरी ध्रुव पर 6 महीने का दिन वसन्त विषुव (Vernal Equinox) से प्रारम्भ होता है तथा 6 महीने की रात शद विषुव (Autumnal Equniox) के साथ प्राम्भ होती है। ऐसी दशा दक्षिणी गोलार्द्ध में भी पायी जाती है।



पृथ्वी की गतियाँ से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



1. पृथ्वी पर दिन तथा रात्रि चक्र किसके कारण होता है?

[A] पृथ्वी का घूर्णन
[B] पृथ्वी का परिक्रमण
[C] पृथ्वी का घूर्णन तथा परिक्रमण दोनों
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [A] पृथ्वी का घूर्णन [/read]

2. पृथ्वी अपनी धुरी के चारों तरफ किस दिशा में घूमती है?

[A] पूर्व से पश्चिम
[B] पश्चिम से पूर्व
[C] उत्तर से दक्षिण
[D] दक्षिण से पूर्व

[read more] [B] पश्चिम से पूर्व [/read]

3. अपने अक्ष पर पृथ्वी एक चक्कर कितने समय में पूरा करती है?

[A] 23 घंटे 30 मिनट
[B] 23 घंटे 56 मिनट 4.9 सेकंड
[C] 23 घंटे 10 मिनट 2 सेकंड
[D] 24 घंटे

[read more] [B] 23 घंटे 56 मिनट 4.9 सेकंड [/read]

4. पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में लगते हैं लगभग-

[A] 365.25 दिन
[B] 365 दिन
[C] 365.50 दिन
[D] 365.75 दिन

[read more] [A] 365.25 दिन [/read]

5. पृथ्वी की परिक्रमण धुरी (ध्रुवीय धुरी) सदा झुकी होती है:

[A] दीर्घवृत्तीय धुरी से 23.1° पर
[B] दीर्घवृत्तीप धुरी से 23.00 पर
[C] दीर्घवृत्तीय पुरी से 24.5° पर
[D] दीर्घवृत्तीय धुरी से 23.5° पर

[read more] [D] दीर्घवृत्तीय धुरी से 23.5° पर [/read]

6. अपने परिक्रमा पथ में पृथ्वी लगभग किस माध्य वेग से सूर्य के चक्कर लगाती है?

[A] 30 km/s
[B] 40 km/s
[C] 50 km/s
[D] 20 km/s

[read more] [A] 30 km/s [/read]

7. परिक्रमण करती हुई पृथ्वी या एक ग्रह की अपने कक्ष में सूर्य से अधिकतम दूरी को क्या कहा जाता है-

[A] उपसौर
[B] अपसौर
[C] अपोजी
[D] पेरिजी

[read more] [B] अपसौर [/read]

8. पृथ्वी, सूर्य से अपनी अधिकतम दूरी पर होती है-

[A] 30 जनवरी को
[B] 22 दिसंबर को
[C] 22 सितंबर को
[D] 4 जुलाई को

[read more] [D] 4 जुलाई को [/read]

9. परिक्रमण करती हुई पृथ्वी या एक ग्रह की अपने कक्ष में सूर्य से न्यूनतम दूरी को क्या कहा जाता है-

[A] उपसौर
[B] अपसौर
[C] अपोजी
[D] पेरिजी

[read more] [A] उपसौर [/read]

10. पृथ्वी की उपसौर (Perihelion) स्थिति किस महीने में होती है?

[A] जून
[B] जनवरी
[C] सितंबर
[D] मार्च

[read more] [B] जनवरी [/read]

11. किस दिन पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है?

[A] 23 सितंबर
[B] 3 जनवरी
[C] 4 जुलाई
[D] 21 मार्च

[read more] [B] 3 जनवरी [/read]

12. पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, इस सिद्धांत को पेश करने वाले प्रथम व्यक्ति कौन थे?

[A] अल्बर्ट आइंस्टीन
[B] गैलीलियो
[C] कॉपरनिकस
[D] न्यूटन

[read more] [C] कॉपरनिकस [/read]

13. यह किसने सर्वप्रथम प्रतिपादित किया कि सूर्य हमारे सौर मण्डल का केन्द्र है, और पृथ्वी उसकी परिक्रमा करती है?

[A] गैलीलियो
[B] न्यूटन
[C] पाणिनी
[D] कॉपरनिकस

[read more] [D] कॉपरनिकस [/read]

14. निम्नलिखित में से यह किसका मत था कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है?

[A] ब्रह्मगुप्त
[B] आर्यभट्ट
[C] वराहमिहिर
[D] उपर्युक्त में से कोई नहीं

[read more] [C] वराहमिहिर [/read]

15. पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के लिए लगने वाले समय की गणना करने वाले प्रथम भारतीय भूगोलशास्त्री कौन थे?

[A] आर्यभट्ट
[B] वेद भटनागर
[C] भास्कराचार्य
[D] बिशु देवतामापी

[read more] [C] भास्कराचार्य [/read]

16. पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा कर रहा कृत्रिम उपग्रह इसलिए पृथ्वी पर नीचे नहीं गिरता क्योंकि पृथ्वी का आकर्षण-

[A] चंद्रमा के आकर्षण से निष्क्रिय हो जाता है
[B] उतनी दूरी पर अस्तित्वहीन होता है
[C] उसकी नियमित चाल के लिए आवश्यक गति प्रदान करता है
[D] उसकी गति के लिए आवश्यक त्वरण प्रदान करता है

[read more] [D] उसकी गति के लिए आवश्यक त्वरण प्रदान करता है [/read]

17. प्रदीप्ति का वृत्त पृथ्वी को कौन से दो गोलर्द्धों में विभाजित करता है?

[A] उत्तरी और दक्षिणी
[B] पूर्वी और पश्चिमी
[C] दिन और रात
[D] ग्रीष्म और शीत

[read more] [C] दिन और रात [/read]

18. इक्विनोक्स (Equinox)/विषुव होता है जब-

[A] दिन और रात बराबर होते हैं 
[B] एक वर्ष के दौरान सबसे छोटा दिन होता है
[C] एक वर्ष के दौरान सबसे बड़ा दिन होता है
[D] एक वर्ष के दौरान जब सबसे अधिक वर्षा होती है

[read more] [A] दिन और रात बराबर होते हैं [/read]

19. विश्व के सभी अंगों में 23 सितंबर को दिन और रात की समान लंबाई को क्या कहते हैं?

[A] शरदकालीन विषुव
[B] खगोलीय विषुव
[C] शीतकालीन विषुव
[D] वसंतकालीन विषुव

[read more] [A] शरदकालीन विषुव [/read]

20. दिन-रात जिस कारण होते हैं, वह है-

[A] भू-परिभ्रमण
[B] भू-परिक्रमण
[C] पृथ्वी के अक्ष का झुकाव
[D] 91 डिग्री पश्चिम

[read more] [A] भू-परिभ्रमण [/read]

21. वह कौन-सी तिथि/तिथियों है, जब दोनों गोलर्द्धों (Hemispheres) में दिन और रात बराबर होते हैं?

[A] 22 दिसंबर
[B] 21 जून
[C] 21 मार्च एवं 23 सितंबर
[D] 21 जून एवं 22 दिसंबर

[read more] [C] 21 मार्च एवं 23 सितंबर [/read]

22. जब दिन और रात की अवधि बराबर होती है तो सूर्य की किरणें सीधी पड़ती है-

[A] भूमध्य रेखा पर
[B] उत्तरी ध्रुव पर
[C] दक्षिणी ध्रुव पर
[D] कर्क रेखा पर

[read more] [A] भूमध्य रेखा पर [/read]

23. अलग-अलग ऋतुओं में दिन-समय और रात्रि-समय के विस्तार में विभिन्नता किस कारण से होती है?

[A] पृथ्वी का, सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्तीय रीति से परिक्रमण
[B] पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णन
[C] स्थान की अक्षांशीय स्थिति
[D] पृथ्वी का नत अक्ष पर परिक्रमण

[read more] [D] पृथ्वी का नत अक्ष पर परिक्रमण [/read]

24. निम्नलिखित तिथियों में से किसमें दोपहर को आपकी छाया (Shadow) सबसे छोटी होती है?

[A] मार्च 21
[B] दिसम्बर 25
[C] जून 22
[D] फरवरी 14

[read more] [C] जून 22 [/read]

25. निम्नलिखित में से किस तिथि पर उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्मकाल अयनांत को देखा जाता है?

[A] 21 जून
[B] 5 अगस्त
[C] 18 जुलाई
[D] 19 दिसंबर

[read more] [A] 21 जून [/read]

26. निम्नलिखित में से किस-किस तिथियों पर उत्तरी गोलार्द्ध में शीतकाल अयनांत को देखा जाता है?

I. 22 दिसंबर

II. 5 अगस्त

III. 10 जनवरी

[A] केवल I
[B] I तथा II दोनो
[C] केवल III
[D] केवल II

[read more] [A] केवल I [/read]

27. निम्नलिखित में से किस तिथि पर दक्षिणी गोलार्द्ध में ग्रीष्मकालीन अयनांत (Summer solstice) को देखा जाता है?

[A] 22 दिसंबर
[B] 5 अगस्त
[C] 18 जुलाई
[D] 23 सितंबर

[read more] [A] 22 दिसंबर [/read]

28. निम्नलिखित में से किस तिथि पर दक्षिणी गोलार्द्ध में शीतकाल अयनांत को देखा जाता है?

[A] 5 अगस्त
[B] 10 अगस्त
[C] 15 फरवरी
[D] 21 जून

[read more] [D] 21 जून [/read]

29. 21 जून को शीतकालीन सोलस्टिस (अयनांत)…… गोलार्द्ध में होता है।

[A] उत्तरी
[B] पूर्वी
[C] पश्चिमी
[D] दक्षिणी

[read more] [D] दक्षिणी [/read]

30. दक्षिणी गोलार्द्ध में सबसे बड़ा दिन है-

[A] 22 दिसम्बर
[B] 22 जून
[C] 21 मार्च
[D] 22 सितम्बर

[read more] [A] 22 दिसम्बर [/read]

31. दक्षिणी गोलार्द्ध में सबसे छोटा दिन होता है।

[A] 22 नवंबर
[B] 22 दिसंबर
[C] 22 मार्च
[D] 21 जून

[read more] [D] 21 जून [/read]

32. उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे लंबा दिन कौन-सा है?

[A] 21 मार्च
[B] 21 सितंबर
[C] 21 जून
[D] 21 अप्रैल

[read more] [C] 21 जून [/read]

33. उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे छोटा दिन होता है।

[A] 22 नवंबर
[B] 22 दिसंबर
[C] 22 मार्च
[D] 22 जून

[read more] [B] 22 दिसंबर [/read]

34. वर्ष का सबसे बड़ा दिन कौन-सा होता है?

[A] 21 जून
[B] 21 मई
[C] 22 दिसंबर
[D] 25 दिसंबर

[read more] [A] 21 जून [C] 22 दिसंबर [/read]

35. कौन सी तिथि को सबसे छोटे दिन और सबसे लम्बी रात के रुप में जाना जाता है?

[A] 23 सितम्बर
[B] 3 जनवरी
[C] 22 दिसम्बर
[D] 24 सितम्बर

[read more] [C] 22 दिसम्बर [/read]

36. भारत निम्नलिखित में से किस गोलार्द्ध में स्थित है?

[A] उत्तरी और पूर्वी
[B] दक्षिणी और पूर्वी
[C] उत्तरी और पश्चिम
[D] उत्तरी और दक्षिणी

[read more] [A] उत्तरी और पूर्वी [/read]

37. भारत में सबसे छोटा दिन कब होता है?

[A] 23 सितम्बर
[B] 22 दिसम्बर
[C] 23 जून
[D] 23 अप्रैल

[read more] [B] 22 दिसम्बर [/read]

38. निम्न में किस दिन सूर्य और पृथ्वी के बीच सबसे कम दूरी होती है?

[A] 21 जून
[B] 22 दिसंबर
[C] 22 सितंबर
[D] 3 जनवरी

[read more] [D] 3 जनवरी [/read]

39. निम्नलिखित में से कौन-सा लीप वर्ष या अधिवर्ष था?

[A] 1100
[B] 1300
[C] 1900
[D] 2000

[read more] [D] 2000 [/read]

40. ‘मध्यरात्रि सूर्य’ का क्या अर्थ है?

[A] सांध्य प्रकाश
[B] उदीयमान सूर्य
[C] बहुत चमकदार चंद्रमा
[D] सूर्य का ध्रुवीय वृत्त में देर तक चमकना

[read more] [D] सूर्य का ध्रुवीय वृत्त में देर तक चमकना [/read]

41. निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में ‘मध्यरात्रि सूर्य’ को देखा जा सकता है?

[A] उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में
[B] उष्ण शीतोष्ण क्षेत्रों में
[C] आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में
[D] सूर्यग्रहण के समय कहीं भी

[read more] [C] आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में [/read]

42. मध्य रात्रि का सूर्य इनमें से किस क्षेत्र में दिखायी देता है?

[A] भूमध्यसागरीय क्षेत्र में
[B] भूमध्यरेखीय क्षेत्र में
[C] आर्कटिक क्षेत्र में
[D] जापान से पूर्व में

[read more] [C] आर्कटिक क्षेत्र में [/read]

43. सूची-1 को सूची-11 के साथ सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिये गये कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

सूची-I (घटना) सूची-II (दिनांक)

a. ग्रीष्म संक्रांति 1. 21 जून

b. शीत संक्रांति 2. 22 दिसम्बर

c. बसन्त विषुव 3. 23 सितम्बर

d. शरद विषुव 4. 21 मार्च

कूट :

[A] a-1, b-2, c-4, d-3
[B] a-1, b-4, c-2, d-3
[C] a-3, b-2, c-4, d-1
[D] a-3, b-4, c-2, d-1

[read more] [A] a-1, b-2, c-4, d-3 [/read]

44. सूर्य ग्रहण के समय, निम्नलिखित में से कौन मध्य में रहता है?

[A] पृथ्वी
[B] चंद्रमा
[C] सूर्य
[D] कोई अन्य ग्रह

[read more] [B] चंद्रमा [/read]

45. सूर्य ग्रहण कब होता है?

[A] जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी के बीच होता है
[B] जब पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य के बीच होता है
[C] जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच में होता है
[D] जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी को जोड़ने वाली रेखा पर नहीं होता है

[read more] [C] जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच में होता है [/read]

46. प्रत्येक सूर्यग्रहण होता है-

[A] केवल अमावस्या के दिन
[B] केवल पूर्णिमा के दिन
[C] दोनों (A) तथा (B)
[D] न (A) न ही (B)

[read more] [A] केवल अमावस्या के दिन [/read]

47. खग्रास (पूर्ण) सूर्यग्रहण केवल सीमित भू-क्षेत्र में ही दिखाई पड़ता है क्योंकि

[A] पृथ्वी की सतह सपाट नहीं है बल्कि उसमे उभार और अवनमन हे
[B] पृथ्वी के अनुप्रस्थ परिच्छेद की तुलना में पृथ्वी पर पड़ने वाली चंद्र की छाया का आकार छोटा होता है
[C] सूर्य के चारों ओर पृथ्वी का तथा पृथ्वी के चारों ओर चंद्र का प्रक्षेप पथ पूर्णतः वृत्ताकार नहीं है
[D] वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण सूर्य की किरणे चंद्रछाया के अधिकांश परिधीय क्षेत्र तक पहुँच सकती है

[read more] [B] पृथ्वी के अनुप्रस्थ परिच्छेद की तुलना में पृथ्वी पर पड़ने वाली चंद्र की छाया का आकार छोटा होता है [/read]

48. सूर्य या चंद्र ग्रहण में पृथ्वी की छाया कितने भाग में विभाजित हो जाती है?

[A] पांच भाग
[B] दो भाग
[C] चार भाग
[D] तीन भाग

[read more] [B] दो भाग [/read]

49. हीरक बलप, ईश्वर की आँख और बेती के मनके, निम्नलिखित प्राकृतिक घटनाओं में से किस एक के हिस्से है?

[A] पूर्वीय ज्योति
[B] सूर्यग्रहण
[C] तड़ित
[D] सौर आँधी

[read more] [B] सूर्यग्रहण [/read]

50. हीरक वलय एक दृश्य है जिसे देखा जा सकता है-

[A] पूर्ण सूर्यग्रहण के अंत में
[B] पूर्ण सूर्यग्रहण के आरम्भ में
[C] केवल पूर्णता पथचिन्ह के परिधीय क्षेत्रों पर
[D] केवल पूर्णता पथचिन्ह के केंद्रीय क्षेत्रों पर

[read more] [C] केवल पूर्णता पथचिन्ह के परिधीय क्षेत्रों पर [/read]

51. चन्द्रग्रहण तब होता है जबकि-

[A] सूर्य व चन्द्रमा के बीच पृथ्वी हो
[B] पृथ्वी व चन्द्रमा के बीच सूर्य हो
[C] सूर्य व पृथ्वी के बीच चन्द्रमा हो
[D] उक्त में से कोई भी अवस्था हो

[read more] [A] सूर्य व चन्द्रमा के बीच पृथ्वी हो [/read]

52. चंद्र ग्रहण के समय, निम्नलिखित में से कौन मध्य में रहता है?

[A] पृथ्वी
[B] चंद्रमा
[C] सूर्य
[D] कोई अन्य ग्रह

[read more] [A] पृथ्वी [/read]

53. कौन-सी परिस्थिति में चन्द्रग्रहण होता है-

[A] नव चन्द्र
[B] अर्द्ध चन्द्र
[C] पूर्ण चन्द्र
[D] उपर्युक्त में कोई नहीं

[read more] [C] पूर्ण चन्द्र [/read]

54. सूर्य और पृथ्वी के बीच चन्द्रमा कब आता है?

[A] चन्द्र ग्रहण
[B] सूर्य ग्रहण
[C] नक्षत्र दिन
[D] पूर्णिमा के दिन

[read more] [B] सूर्य ग्रहण [/read]

55. ग्रहण के दौरान पड़ने वाली छाया का सबसे काला भाग-

[A] प्रभामंडल
[B] प्रच्छाया
[C] उपच्छाया
[D] ब्लैक होल

[read more] [B] प्रच्छाया [/read]

56. सिजिगी (syzygy) क्या है?

[A] सूर्य, पृथ्वी तथा चंद्रमा की एक ही सीधी रेखा में स्थिति
[B] सूर्य तथा चंद्रमा के बीच पृथ्वी की स्थिति
[C] पृथ्वी के एक ही ओर सूर्य तथा चंद्रमा की स्थिति
[D] सूर्य और पृथ्वी से चंद्रमा की समकोणीय स्थिति

[read more] [A] सूर्य, पृथ्वी तथा चंद्रमा की एक ही सीधी रेखा में स्थिति [/read]

57. निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही नहीं है?

[A] युति-वियुति बिन्दु (सिजिगी) संयोजन सूर्यग्रहण का कारण है।
[B] सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा की 180° कोण की एक सीधी रेखा की स्थिति युति-वियुति बिन्दु (सिजिगी) कहलाती है।
[C] युति-वियुति बिन्दु प्रतिकूलता चन्द्र ग्रहण का कारण है।
[D] युति-वियुति बिन्दु संयोजन केवल उपसौर के समय होता है।

[read more] [D] युति-वियुति बिन्दु संयोजन केवल उपसौर के समय होता है। [/read]

58. वसंत ज्वार तब आते हैं, जब

[A] चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी एक रेखा में होते हैं
[B] सूर्य पृथ्वी के सबसे निकट होता है
[C] चंद्रमा पृथ्वी से सबसे दूर होता है
[D] पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के साथ समकोण पर होता है

[read more] [A] चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी एक रेखा में होते हैं [/read]

59. लघु ज्वार-भाटा होते हैं-

[A] प्रबल
[B] दुर्बल
[C] मध्यम
[D] अत्यंत प्रबल

[read more] [B] दुर्बल [/read]

60. बृहत ज्वार भाटा आता है-

[A] जब सूर्य तथा चन्द्रमा पृथ्वी से समकोण बनाते हैं।
[B] जब सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा एक सीधी रेखा में होते है
[C] जब तेज हवा चलती है
[D] जब रात बहुत ठंडी होती है

[read more] [B] जब सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा एक सीधी रेखा में होते है [/read]

61. सभी वृहत् ज्वारों में सबसे ऊँचा ज्वार किस समय घटित होता है?

[A] विषुव के साथ पूर्णिमा या अमावस्या
[B] दक्षिण अयनान्त के साथ पूर्णिमा या अमावस्या
[C] उत्तर अयनान्त के साथ पूर्णिमा या अमावस्या
[D] दक्षिण अयनान्त और वैसे ही उत्तर अयनान्त

[read more] [A] विषुव के साथ पूर्णिमा या अमावस्या [/read]

62. अप्रत्यक्ष उच्च ज्वार उत्पन्न होने का कारण है-

[A] सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल
[B] चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल
[C] पृथ्वी का अपकेन्द्रीय बल
[D] पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल

[read more] [C] पृथ्वी का अपकेन्द्रीय बल [/read]

63. कथन I : ज्वार-भाटा, चंद्रमा और सूर्य के द्वारा लगने वाले गुरुत्वीय बल तथा पृथ्वी के घूर्णन के सम्मिलित प्रभावों के कारण समुद्री स्तरों में होने वाले उतार-चढ़ाव है।

कथन II : पृथ्वी, सूर्य के सापेक्ष 24 घंटे में एक बार पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है।

कूट:

[A] दोनों कथन व्यष्टितः सत्य है किन्तु कथन II, कपन I का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
[B] दोनों कथन व्यष्टितः सत्य है और कथन II, कथन I का सही स्पष्टीकरण है।
[C] कथन I सत्य है, किन्तु कथन II असत्य है।
[D] कथन I असत्य है, किन्तु कथन II सत्य है।

[read more] [A] दोनों कथन व्यष्टितः सत्य है किन्तु कथन II, कपन I का सही स्पष्टीकरण नहीं है। [/read]

64. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1. लघु ज्वार भाटा तब आती है जब चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य एक पंक्ति में होते हैं।

2. बृहत् ज्वार भाटा के दौरान तट के निकट जब तीव्र झंझा गुजरता है तो उच्च ज्वार पर, तरंगे ज्वारीय तरंगों का कारण बन सकती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/है?

[A] केवल 2
[B] केवल 1
[C] 1 और 2 दोनों
[D] न तो 1 और ही 2

[read more] [A] केवल 2 [/read]

65. निम्न प्रश्न में दो वक्तव्य है, एक को कथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है, इन वक्तव्यों का सावधानीपूर्वक परीक्षण कर इन प्रश्नों का उत्तर नीचे दिए कूट की सहायता से चुनिए-

कूट:

कथन (A): लघु ज्वार-भाटाओं के समय उच्च ज्वार सामान्य से निश्तर तथा निम्न ज्वार सामान्य से उच्चतर होता है।

कारण (R): लघु ज्वार भाटा बृहत ज्वार-भाटा के विपरीत पूर्ण चन्द्र के स्थान पर नव चन्द्र के समय होता है।

[A] A और R दोनों सही है और R, A का सही स्पष्टीकरण है
[B] A तथा R. दोनों सही है परन्तु R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है
[C] A सही है, परन्तु R गलत है
[D] A गलत है, परन्तु (R) सही है

[read more] [C] A सही है, परन्तु R गलत है [/read]

66. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1. चंद्र समकोण स्थिति में लघु भाटा आता है।

2. चंद्र समकोण स्थिति के दौरान ज्वार भाटा उत्पन्न करने वाले बल एक-दूसरे के पूरक होते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/है?

[A] केवल 2
[B] केवल 1
[C] 1 और 2 दोनों
[D] न तो 1 और न ही 2

[read more] [B] केवल 1 [/read]

67. महासागरों और समुद्रों में ज्वार-भाटाएँ किसके/किनके कारण होता/होते हैं?

1. सूर्य का गुरुत्वीय बल

2. चन्द्रमा का गुरुत्वीय बल

3. पृथ्वी का अपकेन्द्रीय बल

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

[A] केवल 2 और 3
[B] केवल 1
[C] केवल 1 और 3
[D] 1, 2 और 3

[read more] [D] 1, 2 और 3 [/read]

68. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

 सूची-I (जननिक अवस्थाएँ) सूची-II (परिणामी ज्वारभाटा)

a. सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी से 1. बृहत् ज्वार-भाटा समकोण पर है

b. सूर्य चंद्रमा और पृथ्वी सरल 2. लघु ज्वार-भाटा रेखा में है

c. चन्द्रमा पृथ्वी के समीपतम है 3. अपभू ज्वार-भाटा

d. चन्द्रमा पृथ्वी से सबसे अधिक 4. भूमिनीच ज्वार-भाटा दूरी पर है।

कूट:

[A] a-2, b-4, c-1, d-3
[B] a-2, b-1, c-4, d-3
[C] a-3, b-4, c-1, d-2
[D] a-3, b-1, c-4, d-2

[read more] [B] a-2, b-1, c-4, d-3 [/read]

69. ‘ब्लू मून’ परिघटना होती है जब-

[A] एक ही कैलेण्डर वर्ष में दो लगातार माहों में चार पूर्णिमाएँ हो
[B] एक ही माह में दो पूर्णिमा हो
[C] एक ही केलंण्डर वर्ष में तीन बार एक ही माह में दो पूर्णिमाएँ हो
[D] उपरोक्त कोई नहीं

[read more] [B] एक ही माह में दो पूर्णिमा हो [/read]

70. उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की जलवायु सामान्यतः गर्म होती है, क्योंकि ये …… क्षेत्र के आसपास स्थित होते हैं।

[A] ध्रुव
[B] दक्षिणी गोलार्द्ध
[C] अधिक ऊंचाई
[D] भूमध्य रेखा

[read more] [D] भूमध्य रेखा [/read]

71. ग्रह गति का केप्लर नियम बताता है कि कालावधि का वर्ग….. के बराबर है।

[A] अर्ध दीर्घ अक्ष
[B] अर्ध दीर्घ अक्ष के वर्ग
[C] अर्ध दीर्घ अक्ष के घन
[D] अर्ध दीर्घ अक्ष की चौथी के समानुपाती

[read more] [C] अर्ध दीर्घ अक्ष के घन [/read]

72. मौसम बदलने का क्या कारण है?

[A] पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना
[B] पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना (चक्कर लगाना) एवं सूर्य के चारों ओर घूमना (चक्कर लगाना)
[C] पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना व अपने अक्ष पर झुका होना
[D] पृथ्वी का अपनी धूरी पर चक्कर लगाना व अपने अक्ष पर झुका होना

[read more] [C] पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना व अपने अक्ष पर झुका होना [/read]

73. मौसम-परिवर्तन पृथ्वी की गति की किस विशिष्टता से होता है-

[A] पुरी पर 23½ अंश का झुकाव
[B] सूर्य के चारों ओर परिक्रमा
[C] ऊपर बताये गये (A) व (B) का सम्मिलित प्रभाव
[D] अपनी धुरी पर घूमना

[read more] [C] ऊपर बताये गये (A) व (B) का सम्मिलित प्रभाव [/read]

74. निम्नलिखित में से किसने सबसे पहले यह कहा था कि पृथ्वी गोलाकार है?

[A] कोपरनिकस
[B] अरस्तु
[C] टॉलमी
[D] स्ट्रेबो

[read more] [B] अरस्तु [/read]

75. निम्नलिखित में से किसने सुझाया था कि पृथ्वी का धुरी पर अवस्था बदलना जलवायु परिवर्तन के लिए एक कारक है?

[A] मिलुटिन मिलन कोलिच
[B] रॉबर्ट एक
[C] जॉर्ज सिम्पसन
[D] टी. सी. चैम्बरलिन

[read more] [A] मिलुटिन मिलन कोलिच [/read]

76. निकोलस कोपरनिकस प्रसिद्ध है?

[A] यह बताने के लिए कि ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं न कि पृथ्वी के
[B] दूरबीन के आविष्कार के लिए
[C] केलकुलस (Calculus) की खोज के लिए
[D] मानव शरीर को शल्प क्रिया का अध्ययन करने के लिए

[read more] [A] यह बताने के लिए कि ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं न कि पृथ्वी के [/read]

77. निम्न में से कौन जलवायु परिवर्तन के खगोलीय सिद्धान्तों से सम्बन्धित नहीं है?

[A] पृथ्वी की पूर्णन अक्ष की तिर्यकता (झुकाव)
[B] पृथ्वी की कक्षा की उत्केन्द्रता (अण्डाकार कक्षीय मार्ग)
[C] विषुव अयन (पृथ्वी की सूर्य से अपसौर या उपसौर की स्थिति)
[D] सौर किरणित ऊर्जा (सौर विकिरण)

[read more] [D] सौर किरणित ऊर्जा (सौर विकिरण) [/read]

78. पृथ्वी अपने कक्ष में लगभग 4400 किमी. प्रति घंटा की गति से घूमती है। इस तेज गति को हम अनुभव क्यों नहीं करते हैं?

[A] अपने कक्ष में पृथ्वी की गति की अपेक्षा में हमारी गति शून्य है।
[B] पृथ्वी के आकार की अपेक्षा में हम बहुत छोटे है।
[C] सम्पूर्ण सूर्य मंडल भी चलायमान है।
[D] पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण निरन्तर हमें पृथ्वी के केन्द्र की ओर खींचता है।

[read more] [D] पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण निरन्तर हमें पृथ्वी के केन्द्र की ओर खींचता है। [/read]

2. Solar System (सौरमंडल)

Solar System

(सौरमंडल)



सौरमंडल

     सूर्य तथा सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने वाले विभिन्न ग्रहों, उपग्रहों, क्षुद्रग्रहों या लघुग्रहों, धूमकेतुओं या पुच्छलताराओं, उल्काओं तथा अन्य आकाशीय पिंडों के समूह को सौरमंडल (Solar system) कहते हैं।

➤ सौरमंडल में सूर्य का प्रभुत्व है, सौरमंडल के समस्त ऊर्जा का स्रोत भी सूर्य ही है।

Solar System

सौरमंडल की उत्पत्ति से सम्बंधित प्रमुख सिद्धांत

1. अद्वैतवादी संकल्पना (Monistic Concept):-

(i) वायव्य राशि परिकल्पना (1755)- इमैनुएल कांट

(ii) निहारिका परिकल्पना (1796)- लाप्लास

2. द्वैतवादी संकल्पना (Dualistic Concept):-

(i) ग्रहाणु परिकल्पना (1905)- टी०सी० चैम्बरलिन

(ii) ज्वारीय परिकल्पना (1919)– जेम्स जीन्स एवं जेफरीज

(iii) द्वैतारक परिकल्पना- एच० एन० रसेल

3. सुपर नोवा या नवतारा विस्फोट परिकल्पना (Nova Hypothesis):- फ्रेड होयल & लिटिलटन

4. बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त/ महाविस्फोट सिद्धांत- जॉर्ज लैमेण्टर

सूर्य (Sun)

     सूर्य हमारी आकाशगंगा के 1011 अरब तारों में से एक है, जिसे सौरमण्डल का जनक, प्रधान या मुखिया कहा जाता है। इस प्रकार सूर्य सौरमण्डल का सबसे बड़ा सदस्य है।

➤ यह हमारी आकाशगंगा दुग्धमेखला “(Milkyway) के केन्द्र से लगभग 30,000 प्रकाश वर्ष की दूरी (पृथ्वी से 14.96 करोड़ किमी. दूरी) पर स्थित है।

➤ सूर्य दुग्धमेखला आकाशगंगा के केन्द्र की 250 किमी. प्रति सेकेण्ड की गति से परिक्रमा कर रहा है।

➤ निरन्तर प्रवाहित सौर पवन (Solar Wind) सूर्य से निकलती रहती है। यह प्रवाहित पवन बराबर संख्या में इलेक्ट्रॉन एवं प्रोटॉन रखती है, जिसको प्लाज्मा (Plasma) कहा जाता है।

➤ सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में 8 मिनट 16.6 सेकेण्ड का समय लगता है।

➤ सौर ज्वाला को उत्तरी ध्रुव पर औरोरा बोरियालिस और दक्षिणी ध्रुव पर औरोरा औस्ट्रेलिस कहते हैं।

➤ सूर्य का व्यास 13 लाख 92 हजार किमी है, जो पृथ्वी के व्यास का लगभग 110 गुना है।

➤ सूर्य हमारी पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है, और पृथ्वी को सूर्यताप का 2 अरबवां भाग मिलता है।

ब्रह्माण्ड वर्ष (Cosmos Year):-

       सूर्य का परिक्रमण काल (दुग्धमेखला के केन्द्र के चारों ओर एक चक्कर लगाने में लगा समय) लगभग 25 करोड़ वर्ष है, जिसे ब्रह्माण्ड वर्ष (Cosmos Year) कहते हैं।

➤ सूर्य अपने अक्ष पर पूर्व से पश्चिम की ओर घूमता है। इसका मध्य भाग 25 दिनों में व ध्रुवीय भाग 35 दिनों में एक घूर्णन पूरा करता है।

➤ सूर्य एक गैसीय गोला है, जिसमें हाइड्रोजन 71%, हीलियम 26.5% एवं अन्य तत्व 2.5% होता है।

➤ सूर्य का केन्द्रीय भाग क्रोड (Core) कहलाता है, जिसका ताप 1.5 करोड़ °C होता है तथा सूर्य के बाहरी सतह का तापमान 6000°C है।

➤ हैंस बेथ (Hans Bethe) ने बताया कि 1 करोड़ °C ताप पर सूर्य के केन्द्र पर चार हाइड्रोजन नाभिक मिलकर एक हीलियम नाभिक का निर्माण करता है। अर्थात् सूर्य के केन्द्र पर नाभिकीय संलयन होता है जो सूर्य की ऊर्जा का स्रोत है।

प्रकाशमंडल तथा वर्णमंडल:-

      सूर्य की दीप्तिमान सतह को प्रकाशमंडल (Photosphere) कहते हैं। प्रकाशमंडल के किनारे प्रकाशमान नहीं होते, क्योंकि सूर्य का वायुमंडल प्रकाश का अवशोषण कर लेता है। इसे वर्णमंडल (Chromosphere) कहते हैं। यह लाल रंग का होता है।

प्रकाशमंडल

वर्णमंडल

सूर्य-किरीट:-

     सूर्य ग्रहण के समय सूर्य के दिखाई देनेवाले बाह्यतम भाग को सूर्य-किरीट (Corona) कहते हैं। सूर्य-किरीट X-ray उत्सर्जित करता है। इसे सूर्य का मुकुट कहा जाता है। पूर्ण सूर्य ग्रहण के समय सूर्य-किरीट से प्रकाश की प्राप्ति होती है। सूर्य-किरीट का ताप इतना उच्च होता है कि, यह सूर्य से अलग होता दिखाई पड़ता है। सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल भी इनको सूर्य के साथ बाँधे रखने में अपर्याप्त होता है।

➤ सूर्य की कुल उम्र 10 बिलियन वर्ष है जिसमें शेष उम्र 5 बिलियन वर्ष और है।

➤ भविष्य में सूर्य द्वारा ऊर्जा देते रहने का समय 1011 वर्ष है।

सौर कलंक (Sun Spots):-

      यह प्रकाशमंडल में उत्पन्न होते हैं। गैलिलियो (Galileo) ने इन कलंको की खोज की थी। सौर कलंक के सर्वाधिक काले केन्द्रीय भाग को अम्ब्रा (Umbra) कहा जाता है। यह हल्के काले भाग पेनम्ब्रा (Penumbra) से घिरा होता है।

➤ समय के साथ सौर कलंकों की संख्या बदलती रहती है। इनकी संख्या 11 वर्ष की चक्रीय घटना के रूप में बढ़ती और घटती रहती है। इनका जीवन काल कुछ दिनों से कुछ महीनों का होता है।

➤ सूर्य के कलंकों का तापमान सूर्य के सतह के तापमान से 1500°C कम अर्थात् 4500°C होता है।

➤ सूर्य के धब्बों का एक पूरा चक्र 22 वर्षों का होता है; पहले 11 वर्षों तक यह धब्बा बढ़ता है और बाद के 11 वर्षों तक यह धब्बा घटता है। जब सूर्य की सतह पर कलंक दिखायी पड़ता है, उस समय पृथ्वी पर चुम्बकीय झंझावात (Magnetic Storm) उत्पन्न होते हैं। इससे चुम्बकीय सुई की दिशा बदल जाती है एवं रेडियो, टेलीविजन, विद्युत चालित यंत्र आदि में समस्या उत्पन्न हो जाती है।

ग्रह (Planets)

     सूर्य या किसी अन्य तारे के चारों ओर परिक्रमा करने वाले खगोलीय पिण्ड को ग्रह कहते हैं। ये प्रकाशहीन होते हैं, जो सूर्य से प्राप्त परावर्तित प्रकाश से चमकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ के अनुसार, हमारे सौरमंडल में (सूर्य से दूरी के अनुसार व्यवस्थित) 8 ग्रह हैं- बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण एवं वरुण।

➤ सामान्यतः सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर घड़ी की विपरीत दिशा (Anticlockwise) अर्थात् पश्चिम से पूर्व की ओर परिक्रमण करते हैं, परन्तु शुक्र और अरुण घड़ी की दिशा अर्थात् पूर्व से पश्चिम की ओर भ्रमण करते हुए सूर्य की परिक्रमा करते हैं।

➤ सूर्य की परिक्रमा की समयावधि सूर्य से ग्रहों की दूरी पर निर्भर करती है। अर्थात् जो ग्रह सूर्य से जितनी दूरी स्थित है उसकी परिक्रमा अवधि भी उतनी ही अधिक होगी। कोई ग्रह सूर्य के जितना समीप आता है, उसकी वेग और गति उतनी ही बढ़ जाती है।

➤ बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल एवं बृहस्पति ग्रहों पर हाइड्रोजन, हीलियम तथा मेथेन गैसें बड़ी मात्रा में विद्यमान हैं। इन पाँचों ग्रहों को नग्न आँख से देखा जा सकता है। परन्तु अन्य ग्रहों को खुली आँखों से नहीं देखा जा सकता।

ग्रहों के प्रकार

     ग्रहों को दो भागों में विभाजित किया गया है-

1. पार्थिव या आन्तरिक ग्रह (Terrestrial or Inner planet):

          पार्थिव ग्रह छोटे एवं ठोस होते हैं, जिसके अंतर्गत बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल को सम्मिलित किया जाता है। अर्थात् बुध, शुक्र, पृथ्वी एवं मंगल को पार्थिव ग्रह कहा जाता है क्योंकि ये पृथ्वी के सदृश होते हैं।

2. बृहस्पतीय/जोवियन या बाह्य ग्रह (Jovean or outer planet):

          जोवियन ग्रह बड़े एवं तरल अवस्था में होते हैं, जिनके अंतर्गत बृहस्पति, शनि, अरुण एवं वरुण को सम्मिलित किया जाता है।

सूर्य से दूरी के अनुसार ग्रहों का क्रम : बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण (यूरेनस) एवं वरुण (नेप्च्यून) यानी सूर्य के सबसे निकट का ग्रह बुध एवं सबसे दूर स्थित ग्रह वरुण है।

आकार के अनुसार ग्रहों का क्रम (घटते क्रम में) है : बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण, पृथ्वी, शुक्र, मंगल एवं बुध अर्थात सबसे बड़ा ग्रह बृहस्पति एवं सबसे छोटा ग्रह बुध है।

बुध (Mercury):

➤ यह सूर्य का सबसे नजदीकी ग्रह है, जो सायंकालीन एवं ऊषाकालीन तारे के रूप में एक वर्ष में 3 बार दिखाई पड़ता है। यह सूर्य के निकलने के दो घंटे पहले दिखाई देता है।

➤ यह सबसे छोटा ग्रह है, जिसके पास कोई उपग्रह नहीं है।

➤ इसका सबसे विशिष्ट गुण है- इसमें चुम्बकीय क्षेत्र का होना।

➤ यह सूर्य की परिक्रमा सबसे कम समय में पूरी करता है। अर्थात यह सौरमंडल का सर्वाधिक कक्षीय गति वाला ग्रह है।

➤ बुध के सबसे पास से गुजरने वाले अंतरिक्ष यान (Space Probe) के द्वारा लिए गए चित्रों से पता चलता है कि, चन्द्रमा के समान इसकी सतह पर कई पर्वत, क्रेटर और मैदान हैं।

➤ यहाँ दिन अति गर्म व रातें बर्फीली होती हैं। इसका तापान्तर सभी ग्रहों में सबसे अधिक (600°C) है। इसका तापमान रात में -173°C व दिन में 427°C हो जाता है।

शुक्र (Venus):

➤ यह पृथ्वी का निकटतम, सबसे चमकीला एवं सबसे गर्म ग्रह है।

➤ भ्रंशघाटी, पर्वत, पठार एवं क्रेटर युक्त धरातल से यह निष्कर्ष निकलता है कि इसके, पृष्ठ पर भी प्लेट संचलन क्रिया का प्रभाव पड़ा है। परन्तु यह प्रभाव पृथ्वी से कम-गहन प्रतीत होता है। शुक्र ग्रह की उत्पत्ति 4.6 बिलियन वर्ष पूर्व हुई है।

➤ शुक्र का वायुमण्डल अत्यधिक मोटा है। इसके वायुमंडल का 90 प्रतिशत भाग 1 किमी. की ऊँचाई तक ही विस्तृत है। शुक्र की सतह का तापमान 462°C रहता है। इसके वायुमण्डल में 96 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड का संकेन्द्रण है।

➤ तापमान एवं कार्बन-डाईऑक्साइड की अधिकता के कारण इस ग्रह पर जीवन की संभावना अत्यधिक कम हो जाती है तथा यहाँ प्रेशर कुकर जैसी स्थिति पायी जाती है।

➤ इसे साँझ का तारा या भोर का तारा कहा जाता है, क्योंकि यह शाम में पश्चिम दिशा में तथा सुबह में पूरब की दिशा में आकाश में दिखाई पड़ता है।

➤ यह अन्य ग्रहों के विपरीत दक्षिणावर्त (clockwise) चक्रण करता है।

➤ इसे पृथ्वी का भगिनी ग्रह कहते हैं। यह घनत्व, आकार एवं व्यास में पृथ्वी के समान है।

➤ इसके पास कोई उपग्रह नहीं है।

मंगल (Mars):

➤ इसे लाल ग्रह (Red Planet) कहा जाता है।

➤ इसका रंग लाल, आयरन ऑक्साइड के कारण है।

➤ मंगल के वायुमण्डल में 95% कार्बन डाई ऑक्साइड, 1-3% नाइट्रोजन, 1-2% ऑर्गन तथा 0.1-0.4% ऑक्सीजन पायी जाती है। इसके वायुमंडल में ओजोन स्तर का अभाव पाया जाता है।

➤ यहाँ पृथ्वी के समान दो ध्रुव हैं तथा इसका कक्षातली 25° के कोण पर झुका हुआ है; जिसके कारण यहाँ पृथ्वी के समान ऋतु परिवर्तन होता है।

➤ इसके दिन का मान एवं अक्ष का झुकाव पृथ्वी के समान है।

➤ यह अपनी धुरी पर 24 घंटे में एक बार पूरा चक्कर लगाता है।

➤ इसके दो उपग्रह हैं- फोबोस (Phobos) और डीमोस (Deimos)।

➤ सूर्य की परिक्रमा करने में इसे 687 दिन लगते हैं।

सौरमंडल का सबसे बड़ा ज्वालामुखी ओलिपस मेसी एवं सौरमंडल का सबसे ऊँचा पर्वत निक्स ओलम्पिया (Nix Olympia) जो माउंट एवरेस्ट से तीन गुना अधिक ऊँचा है, इसी ग्रह पर स्थित है

बृहस्पति (Jupiter):

➤ यह सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। इसे अपनी धुरी पर चक्कर लगाने में 10 घंटा (सबसे कम) औ सूर्य की परिक्रमा कने में 12 वर्ष लगते हैं।

➤ इसके उपग्रह गैनिमेड सभी उपग्रहों में सबसे बड़ा है।

➤ इसका रंग पीला है।

➤ बृहस्पति के 95 उपग्रह हैं। 

➤ गैनिमीड इसके सभी उपग्रहों में से सबसे बड़ा (व्यास 5,260 किमी.) है। 

➤ इसमें 75% हाइड्रोजन, 24% हीलियम तथा 1% में भारी तत्वों की प्रधानता है।

➤ इसके ऊपर सफेद, नीले, लाल एवं पीले रंग के बादल के स्तर दिखायी देते हैं। इसके वायुमंडल की मोटाई 9656 किमी. है। बृहस्पति पर अनुमानित ऋणात्मक तापमान यह दर्शाता है कि इसका धरातल बर्फ से आच्छादित होगा।

शनि (Saturn)

➤ यह आकार में दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है।

➤ इसकी विशेषता है- इसके तल के चारों ओर वलय का होना (मोटी प्रकाश वाली कुंडली)।

➤ वलय की संख्या- 7 है। यह आकाश में पीले तारे के समान दिखाई पड़ता है।

➤ बड़े आकार और उच्च उजलापन के कारण शनि ग्रह रात्रि में दिखाई देता है।

➤ इसके वायुमंडल में भी बृहस्पति के समान हाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन और अमोनिया आदि गैसें उपस्थित हैं। बृहस्पति के समान यह भी विस्तृत बादलों को समाहित किए हुए है।

➤ इसकी संरचना सूर्य के समान है, जिसका आन्तरिक भाग 74 प्रतिशत हाइड्रोजन, 24 प्रतिशत हीलियम तथा 2 प्रतिशत भारी तत्वों से बना है।

➤ शनि को गैसों का गोला (Sphere of Gases) एवं गैलेक्सी के समान ग्रह (Galaxy Like Planet) भी कहा जाता है। यह आकाश में पीले तारे के समान दिखाई देता है।

➤ शनि के कुल 146 उपग्रह हैं। 

➤ सबसे अधिक उपग्रह शनि (146) के हैं।

➤ शनि का सबसे बड़ा उपग्रह टाइट है जो सौरमंडल का दूसरा सबसे बड़ा उपग्रह है। यह आकार में बुध के बराबर है।

➤ टाइटन की खोज 1665 में डेनमार्क के खगोलशास्त्री क्रिश्चियन हाइजोन ने की। यह एकमात्र ऐसा उपग्रह है जिसका पृथ्वी जैसा स्वयं का सघन वायुमंडल है।

➤ फोबे नामक शनि का उपग्रह इसकी कक्षा में घूमने की विपरीत दिशा में परिक्रमा करता है।

➤ इसका घनत्व सभी ग्रहों एवं जल से भी कम है। यानी इसे जल में रखने पर तैरने लगेगा।

अरुण (Uranus):

➤ यह आकार में तीसरा सबसे बड़ा ग्रह है। इसका तापमान लगभग-215°C है।

➤ इसकी खोज 1781 ई. में विलियम हर्शेल द्वारा की गयी है।

➤ शनि की भाँति अरुण के चारों ओर दस वलयों में पाँच वलयों का नाम- अल्फा (α), बीटा (β), गामा (γ), डेल्टा (δ) एवं इप्सिलॉन है।

➤ यह अपने अक्ष पर पूर्व से पश्चिम की ओर (दक्षिणावर्त) घूमता है, जबकि अन्य ग्रह पश्चिम से पूर्व की ओर (वामावर्त) घूमते हैं। यहाँ सूर्योदय पश्चिम की ओर एवं सूर्यास्त पूरब की ओर होता है। इसके सभी उपग्रह भी पृथ्वी की विपरीत दिशा में परिभ्रमण करते हैं।

➤ इस ग्रह पर वायुमंडल बृहस्पति और शनि की ही भाँति अधिक सघन है, जिसमें हाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन एवं अमोनिया की प्रमुखता है।

➤ दूरदर्शी (Telescope) से देखने पर यह हरा दिखायी देता है। सूर्य से दूर होने के कारण यह अत्यधिक ठंडा है।

➤ यहाँ 300 से 400 मीटर प्रति सेकेण्ड की गति से प्रवाहित होने वाली हवाएँ भी पायी जाती हैं।

यह अपनी धुरी पर सूर्य की ओर इतना झुका हुआ है कि लेटा हुआ सा दिखलाई पड़ता है, इसलिए इसे लेटा हुआ ग्रह कहा जाता है।

➤ इसके कुल उपग्रहों की संख्या 27 है। इसका सबसे बड़ा उपग्रह टाइटेनिया (Titania) है।

वरुण (Neptune):

इसकी खोज 1846 ई. में जर्मन खगोलज्ञ जहाँन गाले ने की है।

➤ नई खगोलीय व्यवस्था में यह सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह है।

➤ यह हरे रंग का ग्रह है। इसके चारों ओर अति शीतल मिथेन का बादल छाया हुआ है।

➤ इसके कुल उपग्रहों की संख्या 14 है। उपग्रहों में ट्रिटॉन (Triton) और मेरिड प्रमुख है।

➤ इस ग्रह का वायुमंडल अति सघन है, जिसके चारों ओर अतिशीतल मीथेन के बादल हैं। साथ ही, इसके वायुमंडल में अमोनिया हाइड्रोजन, हीलियम, एथेन आदि गैसें भी पायी जाती हैं।

➤ इसकी सतह का तापमान 218°C आँका गया है तथा इसका घनत्व एवं द्रव्यमान अरुण के समान है। इस प्रकार सम्भव है कि इसकी आन्तरिक संरचना भी अरुण के समान ही होगी। इसलिए अरुण और वरुण को जुड़वा ग्रह कहा जाता है।

पृथ्वी (Earth):

➤ पृथ्वी आकार में 5वाँ सबसे बड़ा ग्रह है। यह अपने अक्ष पर 23½º झुकी हुई है।

➤ यह सौरमंडल का एकमात्र ग्रह है, जिस पर जीवन है। 

➤ इसका एकमात्र उपग्रह चन्द्रमा है।

➤ इसका विषुवतीय व्यास 12,756 किमी. और ध्रुवीय व्यास 12,714 किमी. है।

➤ यह अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व 1,610 किमी० प्रति घंटा की चाल से 23 घंटे 56 मिनट और 4 सेकेण्ड में एक पूरा चक्कर लगाती है। पृथ्वी की इस गति को घूर्णन या दैनिक गति कहते हैं। इस गति से दिन-रात होते हैं।

➤ पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट 46 सेकेण्ड (लगभग 365 दिन 6 घंटे) का समय लगता है। सूर्य के चतुर्दिक पृथ्वी के इस परिक्रमा को पृथ्वी की वार्षिक गति अथवा परिक्रमण गति कहते हैं। पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा करने में लगे समय को सौर वर्ष कहा जाता है। प्रत्येक सौर वर्ष, कैलेण्डर वर्ष से लगभग 6 घंटा बढ़ जाता है, जिसे हर चौथे वर्ष में लीप वर्ष बनाकर समायोजित किया जाता है। लीप वर्ष 366 दिन का होता है, जिसके कारण फरवरी माह में 28 के स्थान पर 29 दिन होते हैं।

➤ पृथ्वी पर ऋतु परिवर्तन, इसकी अक्ष पर झुके होने के कारण तथा सूर्य के सापेक्ष इसकी स्थिति में परिवर्तन यानी वार्षिक गति के कारण होती है। वार्षिक गति के कारण ही पृथ्वी पर दिन-रात छोटा-बड़ा होता है।

➤ आकार एवं बनावट की दृष्टि से पृथ्वी शुक्र के समान है।

➤ जल की उपस्थिति के कारण इसे नीला ग्रह भी कहा जाता है।

➤ इसका अक्ष इसकी कक्षा के सापेक्ष 66.5° का कोण बनाता है।

➤ सूर्य के बाद पृथ्वी के सबसे निकट का तारा प्रॉक्सिमा सेन्चुरी है, जो अल्फा सेन्चुरी समूह का एक तारा है। यह पृथ्वी से 4.22 प्रकाश वर्ष दूर है।

क्षुद्र ग्रह (Asteroids):-

        मंगल एवं बृहस्पति ग्रह की कक्षाओं के बीच कुछ छोटे-छोटे आकाशीय पिंड है जो सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं, उसे क्षुद्र ग्रह कहते हैं।

➤ खगोलशास्त्रियों के अनुसार ग्रहों के विस्फोट के फलस्वरूप टूटे टुकड़ों से क्षुद्र ग्रह का निर्माण हुआ है।

➤ क्षुद्र ग्रह जब पृथ्वी से टकराता है, तो पृथ्वी के पृष्ठ पर विशाल गर्त (लोनार झील-महाराष्ट्र) बनता है।

फोर वेस्टा एकमात्र क्षुद्र ग्रह है जिसे नंगी आँखों से देखा जा सकता है।

उपग्रह (Satellite):-

        उपग्रह वे आकाशीय पिंड हैं, जो अपने ग्रहों के साथ-साथ सूर्य की भी परिक्रमा करते हैं। ग्रहों की भाँति इनकी भी अपनी चमक नहीं होती, अतः ये भी सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित होते हैं।

➤ ग्रहों के समान उपग्रहों का भ्रमण पथ भी परवलयाकार (Parabolic) होता है।

➤ बुध और शुक्र का कोई उपग्रह नहीं है।

➤ सबसे अधिक उपग्रह शनि (146) के हैं।

➤ पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह चन्द्रमा है।

सौर मंडल में उपग्रहों की स्थिति
क्रम ग्रह उपग्रह की संख्या
1. बुध 0
2. शुक्र 0
3. पृथ्वी 1
4. मंगल 2
5. बृहस्पति 95
6. शनि 146
7. अरुण 27
8. वरुण 14

चन्द्रमा (Moon):-

➤ चन्द्रमा की सतह और उसकी आन्तरिक स्थिति का अध्ययन करने वाला विज्ञान सेलेनोलॉजी कहलाता है।

➤ चन्द्रमा एवं पृथ्वी के बीच की औसतन दूरी 3,84,365 किमी० है।

➤ चन्द्रमा पर काले धब्बे वाले क्षेत्र (धूल के मैदान) को शान्ति सागर कहते हैं। यह चन्द्रमा का पिछला भाग है, जो अंधकारमय होता है।

➤  चन्द्रमा पर वायुमंडल नहीं है तथा बादल भी नहीं दिखते हैं। इसका आन्तरिक भाग ठंडा है। इसके ऊपर अनेक ज्वालामुखी और उससे बने क्रेटर पाये गये हैं।

➤ चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर स्थित लीबनिज पर्वत (10,668 मीटर) चन्द्रमा का उच्चतम पर्वत है। चन्द्रमा को जीवाश्म ग्रह भी कहा जाता है।

➤ चन्द्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा लगभग 27 दिन 8 घंटे में पूरी करता है और इतने ही समय में अपने अक्ष पर एक घूर्णन करता है। यही कारण है कि चन्द्रमा का सदैव एक ही भाग दिखाई पड़ता है।

➤  हम पृथ्वी से चन्द्रमा का लगभग 57% भाग को ही देख सकते हैं।

➤ चन्द्रमा का अक्ष तल पृथ्वी के अक्ष के साथ 58.48° का अक्ष कोण बनाता है। चन्द्रमा पृथ्वी के अक्ष के लगभग समानान्तर है। इसका परिक्रमण पथ भी दीर्घ वृत्ताकार है।

➤ चन्द्रमा का व्यास 3,480 किमी० तथा द्रव्यमान, पृथ्वी के द्रव्यमान का लगभग 1/81 है।

➤ सूर्य के संदर्भ में चन्द्रमा की परिक्रमा की अवधि 29.53 दिन (29 दिन, 12 घंटे, 44 मिनट और 2.8 सेकेण्ड) होती है। इस समय को एक चन्द्रमास या साइनोडिक मास कहते हैं।

➤ नाक्षत्र समय के दृष्टिकोण चन्द्रमा लगभग 27½ दिन में पुनः उसी स्थिति में होता है।  27½ दिन, (27दिन, 7 घंटे, 43 मिनट और 11.6 सेकेण्ड) की यह अवधि एक नाक्षत्र मास कहलाती है।

➤ ज्वार उठने के लिए अपेक्षित सौर एवं चन्द्रमा की शक्तियों का अनुपात 11 : 5 है।

➤ अपोलो के अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा लाये गये चट्टानों से पता चला है कि चन्द्रमा भी उतना ही पुराना है जितना पृथ्वी (460 करोड़ वर्ष)। इन चट्टानों में टाइटेनियम अधिक मात्रा में है।

सुपर मून (Super Moon):-

      जब चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है, तो उस स्थिति को सुपर मून कहते हैं। इसे पेरिजी फुल मून भी कहते हैं। इसमें चाँद 14% ज्यादा बड़ा तथा 30% अधिक चमकीला दिखाई पड़ता है।

ब्लू मून (Blue Moon):-

      जब एक कैलेण्डर माह में दो पूर्णिमाएँ हों, तो दूसरी पूर्णिमा का चाँद ब्लू मून कहलाता है। इसका नीले रंग से कोई संबंध नहीं है। वास्तविक में इसका मुख्य कारण दो पूर्णिमाओं के बीच अंतराल 31 दिनों से कम होना है। ऐसा दो-तीन साल पर एक बार होता है। अगस्त, 2012 ई. में दो पूर्णिमा (2 व 31 अगस्त) देखे गये। इनमें से 31 अगस्त के पूर्णिमा को ब्लू मून कहा गया। जनवरी (2 व 31 जनवरी) 2018 में ब्लू मून की स्थिति देखी गई।

ब्लू मून ईयर (Blue Moon Year):-

जब किसी वर्ष विशेष में दो या अधिक माह ब्लू मून के होते हैं तो उसे ब्लू मून ईयर कहा जाता है। वर्ष 2018 को ब्लू मून ईयर कहा जाता है।

ब्लड मून (Blood Moon):-

      जब पृथ्वी, चन्द्रमा पर पूर्ण छाया डालती है तब, पूर्ण चन्द्रग्रहण की स्थिति उत्पन्न होती है। इसमें चन्द्रमा का रंग लाल हो जाता है। इसे ही ब्लड मून (रक्त चन्द्र) कहा जाता है।

धूमकेतु (Comet):-

       सौरमंडल के छोर पर बहुत ही छोटे-छोटे अरबों पिंड विद्यमान हैं, जो धूमकेतु या पुच्छल तारे कहलाते हैं।

➤ यह गैस एवं धूल का संग्रह है।

➤ पुच्छल तारे कई वर्षों के पश्चात् जब सूर्य के पास से गुजरते हैं तो इनका तापमान बढ़ने के कारण इनसे गैसों की फुहारें निकलती हैं, जो एक लंबी चमकीली पूँछ के समान प्रतीत होती हैं। कभी-कभी ये पूँछ लाखों किमी. तक लंबी होती है।

➤ जब पुच्छल तारे सूर्य के नजदीक (सबसे कम दूरी पर) पहुँचते हैं, तो सूर्य की तीव्र ऊष्मा और ज्वारीय बल के कारण अपने कुछ पदार्थों को खो देते हैं। परिणामतः या तो ये समाप्त हो जाते हैं या शूमेकर की तरह विखण्डित हो जाते हैं।

➤ धूमकेतु की पूँछ हमेशा सूर्य से दूर होता दिखाई देता है।

➤ सूर्य के चारों ओर लम्बी परंतु अनियमित कक्षा में घूमते है।

➤ खगोलशास्त्रियों के अनुसार, सौरमंडल में लगभग 1 लाख धूमकेतु विचरण कर रहे हैं।

➤ धूमकेतु हमेशा के लिए टिकाऊ नहीं होते, फिर भी इनके लौटने का समय निश्चित होता है।

➤ हैले नामक धूमकेतु का परिक्रमण काल 76 वर्ष है, यह अंतिम बार 1986 ई. में दिखाई दिया था। अगली बार यह 1986 + 76=2062 में दिखाई देगा।

उल्का (Meteors) एवं उल्कापिंड (Meteoroids)

उल्का (Meteors):-

         उल्काएँ प्रकाश की चमकीली धारी के रूप में देखते हैं जो आकाश में क्षणभर के लिए चमकती हैं और लुप्त हो जाती हैं।

➤ उल्काएँ क्षुद्र ग्रहों के टुकड़े तथा धूमकेतुओं द्वारा पीछे छोड़े गये धूल के कण होते हैं।

➤ कभी-कभी ये पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश कर जाते हैं। धूल व गैस निर्मित ये पिंड जब वायुमंडल में प्रवेश करते हैं तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण तेजी से पृथ्वी की ओर आकर्षित होते हैं तथा वायुमंडलीय घर्षण से चमकने लगते हैं। इसलिए इन्हें टूटता हुआ तारा (Shooting Star) कहा जाता है।

➤ पृथ्वी के धरातल से 80 किमी की ऊँचाई तक पहुँचते-पहुँचते लगभग सभी उल्का घर्षित होकर पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं।

उल्कापिंड (Meteoroids):-

➤ जब उल्का जलकर नष्ट न होकर एक पिण्ड के रूप में पृथ्वी पर आ गिरता है, तब उसे उल्कापिंड या उल्काश्म कहते हैं। पृथ्वी की सतह पर मिलने वाला सबसे बड़ा उल्कापिंड होबा वेस्ट है, जो नामीबिया के ग्रूटफोन्टीन के पास पाया गया है। पृथ्वी की सतह पर मिलने वाले उल्का का अवशिष्ट गोला ग्लासी पदार्थ टेक्टाइट कहलाता है।

➤ पृथ्वी के धरातल पर भारी उल्कापिंडों के गिरने से उल्कापातीय क्रेटर का निर्माण होता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के एरिजोना में विन्सलों के पास बैरिगर क्रेटर विश्व का सर्वाधिक प्रसिद्ध उल्कापाती क्रेटर है।

➤ भारत में महाराष्ट्र के बुल्ढ़ाना जिले की लोनार झील भी एक उल्कापातीय क्रेटर झील का उदाहरण है, जिसका व्यास 1.5 किमी. तथा गहराई 100 मीटर है।

सौर परिवार एक नजर में

ग्रह   घूर्णन काल परिक्रमण काल उपग्रहों की संख्या
बुध 58.6 दिन 88.0 दिन 0
शुक्र 243 दिन 224.7 दिन 0
पृथ्वी 23.9 घंटे 365.26 दिन 1
मंगल 24.6 घंटे 687.0 दिन 2
बृहस्पति 9.9 घंटे 11.9 वर्ष 95
शनि 10.3 घंटे 29.5 वर्ष 146
अरुण 17.2 घंटे 84.0 वर्ष 27
वरुण 16.1 घंटे 164.8 वर्ष 14


सौरमंडल से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



1. प्रथमतः सौरमण्डल के बारे में विश्व के समक्ष जानकारी प्रस्तुत करने का श्रेय किस विद्वान को है?

[A] गैलीलियो
[B] स्ट्रैबो
[C] कॉपरनिकस
[D] केप्लर

[read more] [C] कॉपरनिकस [/read]

2. सूर्य के चारों ओर घूमने वाले खगोलीय पिण्ड क्या कहलाते हैं?

[A] ग्रह
[B] उपग्रह
[C] क्षुद्रग्रह
[D] पुच्छल तारा

[read more] [A] ग्रह [/read]

3. किसी ग्रह के चारों ओर परिक्रमा करने वाले छोटे आकाशीय पिण्ड को क्या कहते हैं?

[A] ग्रह
[B] उपग्रह
[C] क्षुद्रग्रह
[D] सौर तारा

[read more] [B] उपग्रह [/read]

4. ग्रहों की गति का नियम किसने प्रतिपादित किया?

[A] न्यूटन
[B] केप्लर
[C] कॉपरनिकस
[D] गैलीलियो

[read more] [B] केप्लर [/read]

5. सौरमण्डल में कुल कितने ग्रह हैं?

[A] आठ
[B] नौ
[C] दस
[D] ग्यारह

[read more] [A] आठ [/read]

6. सूर्य से बढ़ती दूरी के अनुसार ग्रहों का निम्न में से कौन-सा क्रम सही है?

[A] बुध, शुक, पृथ्वी, मंगल
[B] बुध, पृथ्वी, मंगल, शुक्र
[C] बुध, मंगल, पृथ्वी, शुक्र
[D] बुध, मंगल, शुक्र, पृथ्वी

[read more] [A] बुध, शुक, पृथ्वी, मंगल [/read]

7. पृथ्वी से बढ़ती दूरी के अनुसार ग्रहों का निम्न में से कौन-सा क्रम सही है?

[A] मंगल, शुक्र, बुध, बृहस्पति
[B] शुक्र, मंगल, बुध, बृहस्पति
[C] मंगल, शुक्र, बृहस्पति, बुध
[D] शुक्र, बुध, मंगल, बृहस्पति

[read more] [B] शुक्र, मंगल, बुध, बृहस्पति [/read]

8. आकार के अनुसार सौरमण्डल के ग्रहों का अवरोही क्रम है-

[A] बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण, पृथ्वी, शुक्र, मंगल एवं बुध
[B] बृहस्पति, शनि, वरुण, अरुण, पृथ्वी, शुक्र, बुध एवं मंगल
[C] बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण, पृथ्वी, बुध, मंगल एवं शुक्र
[D] बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण, शुक्र, पृथ्वी, मंगल एवं बुध

[read more] [A] बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण, पृथ्वी, शुक्र, मंगल एवं बुध [/read]

9. उपग्रहों की संख्या के आधार पर सौरमण्डल के ग्रहों का सही अवरोही क्रम है-

[A] शनि, बृहस्पति, अरुण, वरुण
[B] शनि, बृहस्पति, वरुण, अरुण
[C] बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण
[D] बृहस्पति, शनि, वरुण, अरुण

[read more] [A] शनि, बृहस्पति, अरुण, वरुण [/read]

10. सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते ग्रह का वेग-

[A] नियत रहता है
[B] अधिकतम होता है, जब सूर्य के समीप होता है
[C] अधिकतम होता है, जब सूर्य से दूर होता है
[D] कुछ नहीं कहा जा सकता है

[read more] [B] अधिकतम होता है, जब सूर्य के समीप होता है [/read]

11. अन्तरिक्ष में कु कितने तारामण्डल हैं?

[A] 87
[B] 88
[C] 89
[D] 90

[read more] [C] 89 [/read]

12. निक्स ओलम्पिया कोलम्पस पर्वत किस ग्रह पर स्थित है?

[A] बुध
[B] शुक्र
[C] पृथ्वी
[D] मंगल

[read more] [D] मंगल [/read]

13. पार्थिव ग्रहों की संख्या कितनी है?

[A] 3
[B] 4
[C] 5
[D] 6

[read more] [B] 4 [/read]

14. निम्नलिखित में से कौन एक पार्थिव ग्रह नहीं है?

[A] बुध
[B] शुक्र
[C] मंगल
[D] शनि

[read more] [D] शनि [/read]

15. बाह्य ग्रह या बृहस्पति सदृश ग्रहों की संख्या कितनी है?

[A] 4
[B] 3
[C] 5
[D] 6

[read more] [A] 4 [/read]

16. बृहस्पति सदृश ग्रहों में सम्मिलित नहीं है

[A] शनि
[B] अरुण
[C] वरुण
[D] मंगल

[read more] [D] मंगल [/read]

17. निम्नलिखित में से किन दो ग्रहों को छोड़कर शेष सभी ग्रह सूर्य के चारों और वामावर्त घूमते हैं?

[A] बुध और शुक्र
[B] अरुण और वरुण
[C] पृथ्वी और शुक्र
[D] शुक्र और अरुण

[read more] [D] शुक्र और अरुण [/read]

18. सौरमण्डल का जन्मदाता किसे कहा जाता है?

[A] सूर्य को
[B] बृहस्पति को
[C] पृथ्वी को
[D] शनि को

[read more] [A] सूर्य को [/read]

19. ब्रह्मण्ड में विस्फोटी तारा कहलाती है?

[A] धूमकेतु
[B] उल्का
[C] अभिनव तारा 
[D] लुब्धक

[read more] [C] अभिनव तारा [/read]

20. सौरमण्डल की खोज किसने की?

[A] कॉपरनिकस
[B] केप्लर
[C] आर्यभट्ट
[D] न्यूटन

[read more] [A] कॉपरनिकस [/read]

21. निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रह नहीं है, जिसे प्राचीन भारतीय ग्रह मानते थे?

[A] सूर्य
[B] मंगल
[C] शुक्र
[D] शनि

[read more] [A] सूर्य [/read]

22. सूर्य के संगठन में सहायक गैस है-

[A] ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड
[B] हीलियम और ऑक्सीजन
[C] हीलियम और नाइट्रोजन
[D] हाइड्रोजन और हीलियम

[read more] [D] हाइड्रोजन और हीलियम [/read]

23. सूर्य के मध्य भाग को क्या कहा जाता है?

[A] समतापमंडल
[B] वर्णमंडल
[C] प्रकाशमंडल
[D] स्थलमंडल

[read more] [C] प्रकाशमंडल [/read]

24. सूर्य के ऊपर के भाग को क्या कहा जाता है?

[A] अधोमंडल
[B] वर्णमंडल
[C] प्रकाशमंडल
[D] समतापमंडल

[read more] [B] वर्णमंडल [/read]

25. सूर्य सदैव पूर्व में निकलता है क्योंकि-

[A] पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है
[B] पृथ्वी पूर्व से पश्चिम की ओर घूमती है
[C] इनमें से सभी
[D] यह पूर्व में स्थित है

[read more] [A] पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है [/read]

26. नार्वे में अर्द्धरात्रि के समय सूर्य कब दिखायी देता है?

[A] 21 मार्च
[B] 23 सितम्बर
[C] 21 जून
[D] 22 दिसम्बर

[read more] [C] 21 जून [/read]

27. एक ग्रह की अपने कक्ष में सूर्य से अधिकतम दूरी को क्या कहा जाता है?

[A] उपसौर
[B] अपसौर
[C] अपोजी
[D] पेरिजी

[read more] [B] अपसौर [/read]

28. एक ग्रह की अपने कक्ष में सूर्य से न्यूनतम दूरी को क्या कहा जाता है?

[A] उपसौर
[B] अपसौर
[C] अपोजी
[D] पेरिजी

[read more] [A] उपसौर [/read]

29. प्राचीन भारतीय ज्योतिष शास्त्र में निम्न में से किसे एक ग्रह के रूप में मान्यता प्राप्त थी?

[A] यम
[B] बृहस्पति
[C] सूर्य
[D] मंगल

[read more] [C] सूर्य [/read]

30. सूर्य के धरातल का तापमान लगभग कितना होता है?

[A] 3,000°C
[B] 5,000°C
[C] 4,000°C
[D] 6,000°C

[read more] [D] 6,000°C [/read]

31. मध्य रात्रि का सूर्य किस क्षेत्र में दिखायी देता है?

[A] भूमध्यसागरीय क्षेत्र में
[B] आर्कटिक क्षेत्र में
[C] जापान से पूर्व के क्षेत्र में
[D] भूमध्यरेखीय क्षेत्र में

[read more] [B] आर्कटिक क्षेत्र में [/read]

32. सूर्य में ‘काला धब्बा’ क्या है?

[A] दिन के दौरान धब्बे ऊर्जा के स्रोत होते हैं
[B] सूर्य में एक बड़ा काला छेद है
[C] धब्बे वे स्थान हैं जो प्रकाश उत्सर्जित करने में असमर्थ हैं
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [C] धब्बे वे स्थान हैं जो प्रकाश उत्सर्जित करने में असमर्थ हैं , सूर्य के काले धब्बे (Sunspots) वास्तव में ऐसे क्षेत्र होते हैं जहाँ तापमान आसपास के भागों की तुलना में कम होता है, इसलिए वे कम प्रकाश उत्सर्जित करते हैं और काले दिखाई देते हैं। [/read]

33. सूर्य के रासायनिक मिश्रण में हाइड्रोजन का प्रतिशत कितना है?

[A] 71 %
[B] 61 %
[C] 75 %
[D] 54 %

[read more] [A] 71 % [/read]

34. निम्नलिखित में से कौन एक तारा है?

[A] चन्द्रमा
[B] शुक्र
[C] पृथ्वी
[D] सूर्य 

[read more] [D] सूर्य [/read]

35. सूर्य पृष्ठ पर लगभग कितना तापमान होता है?

[A] 800°C
[B] 600°C
[C] 6000°C
[D] 1000°C

[read more] [C] 6000°C [/read]

36. सूर्य के सबसे दूर कौन-सा ग्रह है?

[A] प्लूटो
[B] बुध
[C] बृहस्पति
[D] वरुण

[read more] [D] वरुण [/read] 

37. सूर्य प्रकाश धरती तक पहुँचने में कितने मिनट लेता है?

[A] 8.3
[B] 7.3
[C] 9.4
[D] 10

[read more] [A] 8.3 [/read]

38. कौन-सा ग्रह सूर्य के सबसे निकट स्थित है?

[A] मंगल
[B] बुध
[C] शुक्र
[D] पृथ्वी

[read more] [B] बुध [/read]

39. बुध (Mercury) सूर्य का एक चक्कर लगाने में कितना समय लेता है?

[A] 88 दिन
[B] 76 दिन
[C] 80 दिन
[D] 66 दिन

[read more] [A] 88 दिन [/read]

40. किस ग्रह में चन्द्रमा की तरह कलाएँ होती है?

[A] बुध
[B] मंगल
[C] शनि
[D] बृहस्पति

[read more] [A] बुध [/read

41. दो ग्रह जिनके उपग्रह नहीं हैं, वे हैं

[A] पृथ्वी और बृहस्पति
[B] शुक्र और शनि
[C] बुध और शुक्र
[D] शुक्र और मंगल

[read more] [C] बुध और शुक्र [/read]

42. निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रह सूर्य का चक्कर सबसे कम समय में लगाता है?

[A] बुध
[B] पृथ्वी
[C] मंगल
[D] शुक्र

[read more] [A] बुध [/read]

43. सबसे तीव्र गति से सूर्य का चक्कर लगाने वाला ग्रह है-

[A] बुध
[B] पृथ्वी
[C] बृहस्पति
[D] शनि

[read more] [A] बुध [/read]

44. निम्नलिखित में से किस ग्रह की परिभ्रमण गति सबसे अधिक है?

[A] बृहस्पति
[B] बुध
[C] शुक्र
[D] मंगल

[read more] [B] बुध [/read]

45. निम्नलिखित में से किस ग्रह का अक्षीय झुकाव सबसे अधिक है?

[A] शनि
[B] प्लूटो
[C] पृथ्वी
[D] बुध

[read more] [D] बुध [/read] 

46. चन्द्रमा के सदृश दिखायी देने वाला ग्रह है-

[A] बुध
[B] वरुण
[C] शुक्र
[D] मंगल

[read more] [A] बुध [/read]

47. सौरमण्डल का अत्यधिक तीव्र घूर्णन वाला ग्रह कौन है?

[A] बृहस्पति
[B] शुक्र
[C] बुध
[D] पृथ्वी

[read more] [A] बृहस्पति [/read]

48. निम्नलिखित में से किस ग्रह को ‘पृथ्वी की बहन’ कहा जाता है?

[A] बुध
[B] शुक्र
[C] मंगल
[D] बृहस्पति

[read more] [B] शुक्र [/read]

49. किस ग्रह को शाम का तारा (Evening Star) कहा जाता है

[A] शुक्र
[B] पृथ्वी
[C] बुध
[D] मंगल

[read more] [A] शुक्र [/read]

50. निम्नलिखित में से कौन सबसे चमकदार ग्रह है?

[A] मरकरी
[B] वीनस
[C] मार्स
[D] नेपच्यून

[read more] [B] वीनस [/read]

51. सूर्य तथा पृथ्वी के निकटतम ग्रह क्रमशः कौन से हैं?

[A] बुध तथा शुक्र
[B] बुध तथा मंगल
[C] शुक्र तथा बुध
[D] बुध तथा बृहस्पति

[read more] [A] बुध तथा शुक्र [/read]

52. यूरोपवासी किस ग्रह की पूजा देवी के रूप में करते थे?

[A] शुक्र
[B] पृथ्वी
[C] बुध
[D] मंगल 

[read more] [A] शुक्र [/read]

53. सौरमण्डल का सर्वाधिक गर्म ग्रह कौन है?

[A] मंगल
[B] बुध
[C] शुक्र
[D] पृथ्वी

[read more] [C] शुक्र [/read]

54. पृथ्वी से निकटतम दूरी पर स्थित ग्रह है-

[A] मंगल
[B] बुध
[C] शुक्र
[D] पृथ्वी

[read more] [C] शुक्र [/read]

55. निम्नलिखित में से किस ग्रह को ‘सुबह का तारा’ कहा जाता है?

[A] मंगल
[B] बृहस्पति
[C] शुक्र
[D] शनि

[read more] [C] शुक्र [/read]

56. निम्नलिखित ग्रहों में से किसे ‘सौन्दर्य का देवता’ कहा जाता है?

[A] बुध
[B] शुक्र
[C] बृहस्पति
[D] मंगल

[read more] [B] शुक्र [/read]

57. बिना उपग्रह वाले ग्रह हैं-

[A] बुध और शनि
[B] बुध और मंगल
[C] मंगल और शुक्र
[D] बुध और शुक्र

[read more] [D] बुध और शुक्र [/read]

58. निम्नलिखित में से किस ग्रह की कक्षा पृथ्वी के सबसे अधिक नजदीक है?

[A] बुध
[B] शुक्र
[C] बृहस्पति
[D] मंगल

[read more] [B] शुक्र [/read]

59. वे कौन से ग्रह हैं जिनके चारों ओर परिक्रमा करने वाले उपग्रह नहीं है?

[A] मंगल और शुक्र
[B] मंगल और बुध
[C] बुध और शुक्र
[D] नेप्ट्यून और यूरेनस

[read more] [C] बुध और शुक्र [/read]

60. सबसे अधिक चमकने वाला ग्रह है?

[A] बुध
[B] शुक्र
[C] बृहस्पति
[D] मंगल

[read more] [B] शुक्र [/read]

61. पृथ्वी की आकृति सर्वोत्तम ढंग से किस शब्द से स्पष्ट की जा सकती है?

[A] चतुष्फलक से
[B] विषुवत रेखा से
[C] नारंगी से
[D] लध्वक्ष गोलाभ से

[read more] [D] लध्वक्ष गोलाभ से , पृथ्वी ध्रुवों पर थोड़ी चपटी और विषुवत रेखा पर उभरी हुई है, इसलिए इसकी आकृति को सर्वोत्तम रूप में लध्वक्ष गोलाभ (Oblate Spheroid) कहा जाता है।[/read]

62. पृथ्वी सूर्य के परितः अपनी कक्षा में लगभग किस गति से चक्कर लगाती है?

[A] 5° प्रतिदिन
[B] 1° प्रतिदिन
[C] 2° प्रतिदिन
[D] 3° प्रतिदिन

[read more] [B] 1° प्रतिदिन [/read]

63. सूर्य के चारों ओर पृथ्वी के परिभ्रमण की चाल-

[A] वर्ष भर एकसमान रहती है।
[B] अधिकतम होती है जब पृथ्वी सूर्य के निकटतम होती है।
[C] अधिकतम होती है जब पृथ्वी सूर्य से अधिकतम दूरी पर होती है।
[D] न्यूनतम होती है जब पृथ्वी सूर्य के निकटतम होती है।

[read more] [B] अधिकतम होती है जब पृथ्वी सूर्य के निकटतम होती है। [/read]

64. पृथ्वी के भ्रमण की गति है-

[A] 28 किमी०/मिनट
[B] 31 किमी०/मिनट
[C] 25 किमी०/मिनट
[D] 39.5 किमी/मिनट

[read more] [A] 28 किमी०/मिनट [/read] 

65. भूमध्य रेखा पर पृथ्वी का व्यास है लगभग-

[A] 12,800 किमी०
[B] 25,000 किमी०
[C] 20,000 किमी०
[D] 6,400 किमी०

[read more] [A] 12,800 किमी० [/read] 

66. सूर्य की परिक्रमा के दौरान पृथ्वी सूर्य से अधिकतम दूरी पर किस महीने में होती है?

[A] मार्च
[B] जुलाई
[C] सितम्बर
[D] जनवरी

[read more] [B] जुलाई [/read]

67. पृथ्वी को उपसौर (Perihelion) स्थिति किस महीने में होती है?

[A] जून
[B] जनवरी
[C] सितम्बर
[D] मार्च

[read more] [B] जनवरी [/read]

68. ऋतुएँ क्यों होती है?

[A] पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूर्णन के कारण 
[B] पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण के कारण
[C] पृथ्वी के अक्ष के झुकाव के कारण
[D] पृथ्वी की आकृति के कारण

[read more] [B] पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण के कारण [/read]

69. गोलाभ पृथ्वी ध्रुवों पर चपटी होती है यह इस तथ्य से स्पष्ट सिद्ध होता है-

[A] पृथ्वी का भार ध्रुवों पर सर्वाधिक तथा विषुवत रेखा पर न्यूनतम होता है।
[B] पदार्थ का भार ध्रुवों पर न्यूनतम तथा विषुवत रेखा पर सर्वाधिक होता है।
[C] पदार्थ का भार ध्रुवों तथा विषुवत रेखा पर समान होता है।
[D] ध्रुवों पर पदार्थ अपना भार खो देता है।

[read more] [A] पृथ्वी का भार ध्रुवों पर सर्वाधिक तथा विषुवत रेखा पर न्यूनतम होता है। [/read]

70. पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है-

[A] पूर्व से पश्चिम
[B] उत्तर से दक्षिण
[C] पश्चिम से पूर्व
[D] दक्षिण से उत्तर

[read more] [C] पश्चिम से पूर्व [/read]

71. आकार की दृष्टि से सौरमण्डल में पृथ्वी का कौन-सा स्थान है?

[A] तीसरा
[B] चौथा
[C] पाँचवाँ
[D] छठा

[read more] [C] पाँचवाँ [/read]

72. नीला ग्रह (Blue Planet) के नाम से जाना जाता है-

[A] मंगल
[B] शुक्र
[C] पृथ्वी
[D] यूरेनस

[read more] [C] पृथ्वी [/read]

73. परिक्रमा पथ में पृथ्वी के दोनों ओर रहने वाले ग्रह हैं-

[A] मंगल और बृहस्पति
[B] शुक्र और शनि
[C] बुध और शुक्र
[D] मंगल और शुक्र

[read more] [D] मंगल और शुक्र [/read]

74. सूर्य और पृथ्वी के मध्य न्यूनतम दूरी होती है-

[A] 22 दिसम्बर को
[B] 21 जून को
[C] 4 जुलाई
[D] 3 जनवरी को

[read more] [D] 3 जनवरी को [/read]

75. सूर्य और पृथ्वी के मध्य अधिकतम दूरी होती है-

[A] 4 जुलाई
[B] 22 दिसम्बर
[C] 30 जनवरी
[D] 23 सितम्बर

[read more] [A] 4 जुलाई [/read]

76. पृथ्वी सूर्य के इर्द-गिर्द परिक्रमा करती है लगभग-

[A] 365.12 दिन में
[B] 365.50 दिन में
[C] 365.25 दिन में
[D] 365.75 दिन में

[read more] [C] 365.25 दिन में [/read]

77. पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह है-

[A] मंगल
[B] रोहिणी
[C] चन्द्रमा
[D] आर्यभट्ट

[read more] [C] चन्द्रमा [/read]

78. दिन व रात होने का कारण है-

[A] पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णन
[B] पृथ्वी की सापेक्ष सूर्य की गति
[C] पृथ्वी के अक्ष का झुकाव
[D] सूर्य के चारों ओर पृथ्वी का परिभ्रमण

[read more] [A] पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णन [/read]

79. सूर्य के अतिरिक्त निकटतम सितारे से प्रकाश पृथ्वी तक पहुँचता है?

[A] 4.2 सेकण्ड
[B] 42 सेकण्ड
[C] 4.2 वर्ष
[D] 42 वर्ष

[read more] [C] 4.2 वर्ष [/read]

80. सूर्य से पृथ्वी की दूरी है

[A] 149 मिलियन किमी०
[B] 150 मिलियन किमी०
[C] 300 मिलियन किमी०
[D] 227 मिलियन किमी०

[read more] [A] 149 मिलियन किमी० [/read]

81 . पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है-

[A] 23 घंटे 51 मिनट 12 सेकण्ड
[B] 23 घंटे 56 मिनट 4 सेकण्ड
[C] 23 घंटे 56 मिनट 12 सेकण्ड
[D] 24 घंटे 11 मिनट 49 सेकण्ड

[read more] [B] 23 घंटे 56 मिनट 4 सेकण्ड [/read]

82. पृथ्वी पर दिन-रात की अवधि समान होती है-

[A] ध्रुवों पर
[B] मकर रेखा पर
[C] भूमध्य रेखा पर
[D] कर्क रेखा पर

[read more] [C] भूमध्य रेखा पर [/read]

83. इक्विनॉक्स (Equinox) का तात्पर्य है, वह तिथि जब-

[A] दिन और रात समान अवधि के होते हैं।
[B] रात की अपेक्षा दिन लम्बे होते हैं।
[C] दिन की अपेक्षा रात लम्बी होती है।
[D] वर्ष के सबसे छोटे दिन एवं सबसे छोटी रात होती है।

[read more] [A] दिन और रात समान अवधि के होते हैं। [/read]

84. दक्षिणी गोलार्द्ध में सबसे लम्बा दिन कब होता है?

[A] 21 जून
[B] 21 मार्च
[C] 23 सितम्बर
[D] 22 दिसम्बर

[read more] [D] 22 दिसम्बर [/read] 

85. भू-कक्ष तल पर भू-अक्ष का झुकाव है-

[A] 90º
[B] 23½º
[C] 0º
[D] 66½º

[read more] [D] 66½º [/read]

86. पृथ्वी के उपग्रहों की संख्या कितनी है?

[A] आठ
[B] शून्य
[C] एक
[D] दो

[read more] [C] एक [/read]

87. 21 जून को दिन का प्रकाश उत्तरी ध्रुव पर दिखायी देता है-

[A] शून्य घण्टे
[B] 12 घण्टे
[C] 24 घण्टे
[D] 18 घण्टे

[read more] [C] 24 घण्टे [/read]

88. पृथ्वी के सबसे निकट स्थित ग्रह है

[A] बुध
[B] शुक्र
[C] मंगल
[D] बृहस्पति

[read more] [B] शुक्र [/read]

89. दूरी की दृष्टि से तृतीय क्रम में कौन-सा ग्रह है?

[A] बुध
[B] शुक्र
[C] पृथ्वी
[D] मंगल

[read more] [C] पृथ्वी [/read]

90. पृथ्वी अपने परिक्रमण मार्ग पर परिक्रमा करते हुए अपने अक्ष द्वारा कक्षा तल पर कितने डिग्री का कोण बनाती है?

[A] 90º
[B] 23½º
[C] 0º
[D] 66½º

[read more] [D] 66½º [/read]

91. निम्न में से किन तिथियों को सूर्य की किरणें विषुवत रेखा पर सीधी पड़ती है?

[A] वर्ष भर
[B] 23 सितम्बर
[C] 21 मार्च तथा 23 सितम्बर
[D] 21 मार्च

[read more] [C] 21 मार्च तथा 23 सितम्बर [/read]

92. निम्नलिखित में से कौन-सा तारा पृथ्वी के सर्वाधिक समीप है?

[A] ध्रुव तारा
[B] सूर्य
[C] अल्फा सेंचुरी
[D] लुब्धक

[read more] [B] सूर्य [/read]

93. यह किसने सर्वप्रथम प्रतिपादित किया कि सूर्य हमारे सौरमण्डल का केन्द्र है और पृथ्वी उसकी परिक्रमा करती है?

[A] न्यूटन
[B] पाणिनी
[C] गैलीलियो
[D] कॉपरनिकस

[read more] [D] कॉपरनिकस [/read]

94. पृथ्वी को गोलाकार बताने वाला प्रथम विद्वान था-

[A] कॉपरनिकस
[B] पाइथागोरस
[C] अरस्तू
[D] केप्लर

[read more] [B] पाइथागोरस [/read]

95. यदि पृथ्वी एवं अन्तरिक्ष के बीच से वायुमण्डल को हटा हुआ माना जाय तो आसमान का रंग कैसा होगा?

[A] नीला 
[B] लाल
[C] सफेद
[D] काला

[read more] [D] काला [/read]

96. पृथ्वी की परिधि है-

[A] 35,000 किमी०
[B] 45,000 किमी०
[C] 40,075 किमी ०
[D] 47,050 किमी०

[read more] [C] 40,075 किमी० [/read]

97. किस तिथि को उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे लम्बा दिन होता है?

[A] 21 जून
[B] 23 सितम्बर
[C] 22 दिसम्बर
[D] 21 मार्च

[read more] [A] 21 जून [/read]

98. किस तिथि को उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे छोटा दिन होता है?

[A] 21 जून
[B] 23 सितम्बर
[C] 22 दिसम्बर
[D] 21 मार्च

[read more] [C] 22 दिसम्बर [/read]

99. ध्रुवों पर दिन की अवधि होती है-

[A] तीन माह
[B] छह माह
[C] बारह माह
[D] नौ माह

[read more] [B] छह माह [/read] 

100. निम्नलिखित में से किस ग्रह का औसत घनत्व सबसे अधिक है?

[A] बृहस्पति
[B] मंगल
[C] पृथ्वी
[D] बुध

[read more] [C] पृथ्वी [/read]

101. सर्वप्रथम पृथ्वी की त्रिज्या मापने वाला विद्वान कौन था?

[A] टॉलमी
[B] इरैटोस्थनीज
[C] कॉपरनिकस
[D] गैलीलियो

[read more] [B] इरैटोस्थनीज [/read]

102. पृथ्वी का ध्रुवीय व्यास उसके विषुवतीय व्यास से कितना कम है?

[A] 25 किमी० 

[C] 80 किमी०
[D] 30 किमी०

[read more] [B] 43 किमी० [/read]

103. पृथ्वी का विषुवतीय व्यास लगभग कितना है?

[A] 12,700 किमी०
[B] 12,650 किमी०
[C] 12,750 किमी०
[D] 12,600 किमी०

[read more] [C] 12,750 किमी० [/read]

104. पृथ्वी को उसके काल्पनिक अक्ष पर घूमने को क्या कहते हैं?

[A] परिक्रमण
[B] घूर्णन
[C] कक्षा
[D] इनमें कोई नहीं

[read more] [B] घूर्णन [/read] 

105. पृथ्वी की अपनी कक्षा में गति है-

[A] पश्चिम से पूर्व
[B] पूर्व से पश्चिम
[C] दक्षिण से उत्तर
[D] उत्तर से दक्षिण

[read more] [A] पश्चिम से पूर्व [/read] 

106. पृथ्वी तथा सूर्य के मध्य सर्वाधिक दूरी किसके दौरान होती है?

[A] उत्तर अयनांत
[B] दक्षिण अयनांत
[C] अपसौर
[D] उपसौर

[read more] [C] अपसौर [/read]

107. ऋतुएँ निम्नलिखित के कारण होती है-

[A] पृथ्वी घूर्णन करती है
[B] सूर्य के चारों ओर पृथ्वी का परिक्रमण
[C] पृथ्वी का अक्ष से 66½º आनत है
[D] उपर्युक्त (B) और (C) दोनों

[read more] [B] सूर्य के चारों ओर पृथ्वी का परिक्रमण [/read]

108. पृथ्वी से आकार में छोटे ग्रह हैं-

[A] अरुण और मंगल
[B]  शुक्र और मंगल
[C] वरुण और शुक्र
[D] वरुण और मंगल

[read more] [B]  शुक्र और मंगल [/read]

109. निम्न में से किसने पहली बार कहा कि पृथ्वी गोल है?

[A] कॉपरनिकस
[B] अरिस्टोटल
[C] स्ट्राबो
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [B] अरिस्टोटल [/read]

110. पृथ्वी की धुरी है-

[A] झुकी हुई
[B] क्षैतिज
[C] वक्रीय
[D] उर्ध्वाधर

[read more] [A] झुकी हुई [/read]

111. पृथ्वी के अतिरिक्त किस ग्रह पर वायुमण्डल पाया जाता है?

[A] बुध
[B] बृहस्पति
[C] शुक्र
[D] मंगल

[read more] [D] मंगल [/read]

112. लाल रंग का दिखायी देने वाला ग्रह है-

[A] शुक्र
[B] शनि
[C] मंगल
[D] वरुण

[read more] [C] मंगल [/read]

113. पृथ्वी के अतिरिक्त किस ग्रह पर ऋतु परिवर्तन संभव है?

[A] अरुण
[B] वरुण
[C] मंगल
[D] बृहस्पति

[read more] [C] मंगल [/read]

114. पृथ्वी के अतिरिक्त किस ग्रह पर मानव उपस्थिति की सम्भावना है?

[A] मंगल
[B] शुक्र
[C] बुध
[D] शनि

[read more] [A] मंगल [/read]

115. प्रथम बार मंगल ग्रह पर उतरने वाला अन्तरिक्ष यान है

[A] मीर
[B] रोहिणी
[C] एडवेन्चर
[D] पाथ फाइण्डर

[read more] [D] पाथ फाइण्डर [/read]

116. किसमें पृथ्वी के अलावा अन्य जीवन की संभावना है, क्योंकि वहाँ का पर्यावरण जीवन के लिए बहुत अनुकूल है?

[A] बृहस्पति
[B] यूरोपा
[C] मंगल
[D] चन्द्रमा

[read more] [C] मंगल [/read]

117. एक ग्रह के दिन का मान और उसके अक्ष का झुकाव लगभग पृथ्वी के दिन के मान और झुकाव के तुल्य है-

[A] यूनेनस के विषय में
[B] शनि के विषय में
[C] नेपच्यून के विषय में
[D] मंगल के विषय में

[read more] [D] मंगल के विषय में [/read]

118. सौरमण्डल का सबसे छोटा उपग्रह कौन है?

[A] फोबोस
[B] डिमोस
[C] लेडा
[D] फार्डेलिया

[read more] [B] डिमोस [/read]

119. रात्रि को आकाश में कौन-सा ग्रह लाल दिखता है?

[A] बुध
[B] मंगल
[C] बृहस्पति
[D] शनि

[read more] [B] मंगल [/read]

120. सौरमण्डल का सबसे बड़ा ग्रह कौन है?

[A] बुध
[B] मंगल
[C] बृहस्पति
[D] शनि

[read more] [C] बृहस्पति [/read]

121. बृहस्पति ग्रह पर लाल धब्बे किस संकेत के सूचक हैं?

[A] गैस
[B] अशान्त बादल
[C] तरल पदार्थ
[D] भूमि

[read more] [B] अशान्त बादल [/read]

122. संयुक्त राज्य अमेरिका ने किस ग्रह की खोज के लिए गैलीलियो नामक अन्तरिक्ष यान भेजा था?

[A] मंगल
[B] बृहस्पति
[C] नेपच्यून
[D] शनि

[read more] [B] बृहस्पति [/read]

123. मैग्लन अभियान किस ग्रह से सम्बन्धित है?

[A] मंगल
[B] शनि
[C] बृहस्पति
[D] शुक्र

[read more] [C] बृहस्पति [/read]

124. शुमेकर लेवी-9 धूमकेतु किस ग्रह से टकराया था?

[A] मंगल
[B] शनि
[C] बृहस्पति
[D] शुक्र

[read more] [C] बृहस्पति [/read]

125. सूर्य के गिर्द एक परिक्रमा के लिए निम्न में से कौन-सा एक ग्रह अधिकतम समय लेता है?

[A] पृथ्वी
[B] मंगल
[C] बृहस्पति
[D] शुक्र

[read more] [C] बृहस्पति [/read]

126. सौरमण्डल का सबसे बड़ा उपग्रह निम्नलिखित में से कौन है?

[A] टाइटन
[B] मिराण्डा
[C] गेनीमेड
[D] चन्द्रमा

[read more] [C] गेनीमेड [/read]

127. निम्नलिखित ग्रहों में से किसके चारों ओर वलय है?

[A] वरुण
[B] शनि
[C] बृहस्पति
[D] शुक्र

[read more] [B] शनि [/read]

128. निम्नलिखित ग्रहों में से किस ग्रह के अधिकतम संख्या में प्राकृतिक उपग्रह है?

[A] नेप्च्यून
[B] शनि
[C] यूरेनस
[D] बृहस्पति

[read more] [B] शनि [/read] 

129. सौरमण्डल के बड़े उपग्रहों में से एक टाइटन निम्न में से किसका उपग्रह है?

[A] नेप्च्यून
[B] शनि
[C] यूरेनस
[D] बृहस्पति

[read more] [B] शनि [/read]

130. शनि ग्रह के कितने उपग्रह है?

[A] 45
[B] 21
[C] 146
[D] 95

[read more] [C] 146 [/read]

131. शनि ग्रह को सर्वप्रथम किस खगोलशास्त्री ने देखा था?

[A] गैलीलियो
[B] केप्लर
[C] टॉल्मी
[D] कॉपरनिकस

[read more] [A] गैलीलियो [/read]

132. नंगी आँखों द्वारा दिखने वाला सबसे दूर का ग्रह है-

[A] यूरेनस
[B] बृहस्पति
[C] शनि
[D] प्लूटो

[read more] [C] शनि [/read] 

133. शनि ग्रह के चारों ओर पाये जाने वाले वलयों की संख्या कितनी है?

[A] 7
[B] 8
[C] 10
[D] 12

[read more] [A] 7 [/read]

134. सौरमण्डल का सबसे कम घनत्व वाला ग्रह है-

[A] अरुण
[B] वरुण
[C] पृथ्वी
[D] शनि

[read more] [D] शनि [/read]

135. सौरमण्डल का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह कौन है?

[A] अरुण
[B] वरुण
[C] शनि
[D] पृथ्वी

[read more] [C] शनि [/read]

136. शनि (Saturn) ग्रह का सबसे बड़ा उपग्रह है-

[A] टाइटन
[B] एटलस
[C] टेलेस्टो
[D] लापेट्स

[read more] [A] टाइटन [/read]

137. निम्न में से किस ग्रह के चारों ओर स्पष्ट वलय है?

[A] यूरेनस
[B] बृहस्पति
[C] मंगल
[D] शनि

[read more] [D] शनि [/read]

138. यूरेनस की खोज किसने की थी?

[A] हर्शेल
[B] गैलीलियो
[C] कॉपरनिकस
[D] केप्लर

[read more] [D] केप्लर [/read] 

139. कौन-सा ग्रह सर्वाधिक गैसों से घिरा हुआ है?

[A] बृहस्पति
[B] प्लूटो
[C] यूरेनस
[D] वीनस

[read more] [C] यूरेनस [/read] 

140. यूरेनस के कितने उपग्रह हैं?

[A] 15
[B] 27
[C] 12
[D] 23

[read more] [B] 27 [/read]

141. पश्चिम की ओर भ्रमण करने वाला ग्रह है-

[A] यम
[B] अरुण
[C] वरुण
[D] शनि

[read more] [B] अरुण [/read]

142. ओवेरान, टाइटेनिया, एरियल, अम्बरियल और मिराण्डा- ये पाँचों किस ग्रह के उपग्रह हैं?

[A] बृहस्पति
[B] अरुण
[C] वरुण
[D] मंगल

[read more] [B] अरुण [/read]

143. अपनी धुरी पर सूर्य की ओर अधिक झुकाव के कारण निम्न में से कौन-सा ग्रह ‘लेटा हुआ ग्रह’ के उपनाम से जाना जाता है?

[A] अरुण
[B] वरुण
[C] बृहस्पति
[D] शनि

[read more] [A] अरुण [/read]

144. यूरेनस सूर्य के चारों ओर एक चक्कर कितने वर्षों में लगाता है?

[A] 29 वर्ष
[B] 48 वर्ष
[C] 84 वर्ष
[D] 92 वर्ष

[read more] [C] 84 वर्ष [/read]

145. अन्य ग्रहों की अपेक्षा विपरीत दिशा में घूमने वाला ग्रह कौन-सा है?

[A] अरुण
[B] वरुण
[C] बृहस्पति
[D] प्लूटो

[read more] [A] अरुण [/read]

146. कौन-सा ग्रह हरे प्रकाश को उत्सर्जित करता है?

[A] बृहस्पति
[B] यूरेनस
[C] शुक्र
[D] वरुण

[read more] [D] वरुण [/read]

147. सौर परिवार के निम्न ग्रहों में से कौन-सा ग्रह सबसे अधिक ठंडा ग्रह है?

[A] नेप्ट्यून
[B] पृथ्वी
[C] मंगल
[D] बुध

[read more] [A] नेप्ट्यून [/read]

148. किस गैस की उपस्थिति के कारण वरूण ग्रह हरे रंग का दिखाई देता है?

[A] अमोनिया
[B] नाइट्रोजन
[C] हाइड्रोजन
[D] मीथेन

[read more] [D] मीथेन [/read]

149. निम्नलिखित में से कौन से दो ग्रह ‘सहोदर भाई’ के नाम से जाने जाते हैं?

[A] बुध और शुक्र
[B] बृहस्पति और शनि
[C] पृथ्वी और शुक्र
[D] अरुण और वरुण

[read more] [D] अरुण और वरुण [/read]

150. सौरमण्डल का सबसे छोटा ग्रह कौन है?

[A] बुध
[B] शुक्र
[C] पृथ्वी
[D] मंगल

[read more] [A] बुध [/read]

151. निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रह सूर्य और पृथ्वी दोनों से सर्वाधिक दूरी पर स्थित है?

[A] बुध
[B] नेप्ट्यून
[C] मंगल
[D] शनि

[read more] [B] नेप्ट्यून [/read]

152. वर्ष दीर्घतम होता है-

[A] बृहस्पति पर
[B] नेप्ट्यून पर
[C] पृथ्वी पर
[D] शनि पर

[read more] [B] नेप्ट्यून पर [/read]

153. सौरमण्डल का बाह्यतम ग्रह कौन है?

[A] पृथ्वी
[B] यूरेनस
[C] नेप्ट्यून
[D] शनि

[read more] [C] नेप्ट्यून [/read]

154. यम अथवा कुबेर (Pluto) की खोज सन् 1930 में निम्न में से किस खगोलज्ञ द्वारा की गयी थी?

[A] क्लाइड टाम्बैग
[B] विलियम हर्शेल
[C] जॉन गैले
[D] जेम्स पी० हव्यल

[read more] [A] क्लाइड टाम्बैग [/read]

155. निम्नलिखित में किस आकाशीय पिण्ड को परिक्रमण और परिभ्रमण दोनों गति में बराबर समय लगता है?

[A] चन्द्रमा
[B] बुध
[C] शुक्र
[D] शनि

[read more] [A] चन्द्रमा [/read]

156. कौन-सा खगोलीय पिण्ड ‘रात की रानी’ कहलाता है?

[A] चन्द्रमा
[B] बृहस्पति
[C] मंगल
[D] प्लूटो

[read more] [A] चन्द्रमा [/read]

157. पृथ्वी से दिखने वाली चन्द्रमा की सतह उसकी कुल सतह का कितना प्रतिशत है?

[A] 59%
[B] 33%
[C] 69%
[D] 70%

[read more] [A] 59% [/read]

158. क्लेवियस (Clavius) निम्नलिखित में से क्या है?

[A] बृहस्पति ग्रह का उपग्रह
[B] चन्द्रमा पर स्थित सबसे बड़ा क्रेटर
[C] जलमार्ग से सम्पूर्ण ग्लोब का सर्वप्रथम चक्कर लगाने वाला इटली का नाविक
[D] उपर्युक्त में से कोई नहीं

[read more] [B] चन्द्रमा पर स्थित सबसे बड़ा क्रेटर [/read]

159. पृथ्वी एवं चन्द्रमा के बीच स्थित अन्तरिक्ष को किस नाम से जाना जाता है?

[A] अन्तः अन्तरिक्ष
[B] सिसलुनर
[C] बाह्य अन्तरिक्ष
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [B] सिसलुनर [/read]

160. निम्नलिखित में से कौन सूर्य का ग्रह नहीं है?

[A] बुध
[B] शुक्र
[C] चन्द्रमा
[D] नेप्ट्यून

[read more] [C] चन्द्रमा [/read]

161. पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह है-

[A] डीमोस
[B] टाइटन
[C] लापेटस
[D] चन्द्रमा

[read more] [D] चन्द्रमा [/read]

162. शान्त समुद्र और तूफानों का महासागर निम्न में से कहाँ स्थित है?

[A] चन्द्रमा
[B] वरुण
[C] बृहस्पति
[D] शनि

[read more] [A] चन्द्रमा [/read]

163. सी ऑफ ट्रॅक्विलिटी’ कहाँ पर है?

[A] चन्द्रमा
[B] सूर्य
[C] बृहस्पति
[D] शनि

[read more] [A] चन्द्रमा [/read]

164. चन्द्रमा पृथ्वी का एक चक्कर कितने दिनों में लगाता है?

[A] लगभग 28.1 दिन
[B] लगभग 30.2 दिन
[C] लगभग 27.3 दिन
[D] लगभग 28.3 दिन

[read more] [C] लगभग 27.3 दिन [/read]

165. चन्द्रमा से पृथ्वी तक प्रकाश के पहुँचने में लगने वाला समय है-

[A] एक सेकण्ड
[B] दो सेकण्ड से अधिक
[C] एक सेकण्ड से कम
[D] दो सेकण्ड से कम

[read more] [D] दो सेकण्ड से कम [/read]

166. निम्नलिखित में से किस आकाशीय पिण्ड को ‘पृथ्वी पुत्र’ कहा जाता है?

[A] बुध
[B] शुक्र
[C] चन्द्रमा
[D] मंगल

[read more] [C] चन्द्रमा [/read]

167. सी ऑफ टुक्विलिटी स्थित है-

[A] दक्षिण-पूर्व अफ्रीका में
[B] चन्द्रमा पर
[C] रूस के पश्चिमी तट पर
[D] भारत के पश्चिमी तट पर

[read more] [B] चन्द्रमा पर, सी ऑफ टुक्विलिटी (Sea of Tranquility) चन्द्रमा की सतह पर स्थित एक समतल क्षेत्र (लूनर मारे) है, जहाँ अपोलो-11 मिशन के दौरान मानव ने पहली बार कदम रखा था। [/read]

168. आकाश का सबसे चमकदार तारा है-

[A] प्रोक्सिमा सेंचुरी
[B] सिरियस
[C] नेवुला
[D] बर्नार्ड

[read more] [B] सिरियस [/read] 

169. हैली धूमकेतु का आवर्त काल होता है?

[A] 66 वर्ष
[B] 76 वर्ष
[C] 86 वर्ष
[D] 96 वर्ष

[read more] [B] 76 वर्ष [/read]

170. सूर्य को छोड़कर पृथ्वी के सर्वाधिक निकट स्थित तारे के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में कितना समय लगता है?

[A] 4.5 घंटा
[B] 4.5 दिन
[C] 4.5 माह
[D] 4.5 वर्ष

[read more] [D] 4.5 वर्ष [/read]

171. मंगल एवं बृहस्पति ग्रहों के मध्य सूर्य की परिक्रमा करने वाले खगोलीय पिण्ड को कहते हैं-

[A] धूमकेतु
[B] उल्का
[C] क्षुद्रग्रह
[D] उल्का पिण्ड

[read more] [C] क्षुद्रग्रह [/read]

172. क्षुद्रग्रह जिन ग्रहों के बीच पाये जाते हैं, वे हैं

[A] मंगल और शुक्र
[B] मंगल और बृहस्पति
[C] बृहस्पति और शनि
[D] शनि और अरुण

[read more] [B] मंगल और बृहस्पति [/read]

173. सर्वप्रथम खोजा गया क्षुद्रग्रह है-

[A] वेस्टा
[B] सिरस
[C] पलास
[D] जूनो

[read more] [B] सिरस [/read]

174. धूमकेतु की पुच्छ सूर्य से परे दिष्ट होती है क्योंकि-

[A] जैसे-जैसे धूमकेतु सूर्य के चारों ओर घूर्णन करता है वैसे-वैसे उसका हल्का द्रव्यमान केवल अपकेन्द्री बल के कारण दूर क्षिप्त हो जाता है।
[B] जैसे-जैसे धूमकेतु घूर्णन करता है, उसका हल्का द्रव्यमान उसकी पुच्छ की दिशा में स्थित किसी तारे द्वारा आकर्षित हो जाता है।
[C] सूर्य द्वारा उत्सर्जित विकिरण घूमकेतु पर भैज्य दाब डालता है, जिससे उसकी पुच्छ सूर्य से दूर क्षिप्त हो जाती है।
[D] घूमकेतु की पुच्छ सदैव एक ही अभिविन्यास में रहती है।

[read more] [C] सूर्य द्वारा उत्सर्जित विकिरण घूमकेतु पर भैज्य दाब डालता है, जिससे उसकी पुच्छ सूर्य से दूर क्षिप्त हो जाती है। [/read] 

175. क्षुद्र ग्रहों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

I. क्षुद्र ग्रह सूर्य की परिक्रमा करने वाले विभिन्न आकारों के चट्टानी मलबे हैं।
II. अधिकांश क्षुद्र ग्रह छोटे हैं किन्तु कुछ का व्यास 1000 किमी तक बड़ा है।
III. क्षुद्र ग्रहों की कक्षा बृहस्पति और शनि की कक्षाओं के मध्य स्थित है।

[A] I, II और III सही है।
[B] I और II सही है।
[C] II और III सही है।
[D] I और III सही है।

[read more] [B] I और II सही है। [/read]

176. सूर्य ग्रहण होता है जब-

[A] सूर्य चन्द्रमा और पृथ्वी पर त्रिकोण बनाते हैं।
[B] पृथ्वी की परछाई चन्द्रमा पर पड़ती है।
[C] चन्द्रमा पृथ्वी और सूर्य के मध्य आ जाता है और सूर्य पूरी तरह स्पष्ट दिखायी नहीं देता है।
[D] सूर्य चन्द्रमा और पृथ्वी के बीच आ जाता है।

[read more] [C] चन्द्रमा पृथ्वी और सूर्य के मध्य आ जाता है और सूर्य पूरी तरह स्पष्ट दिखायी नहीं देता है। [/read]

177. पूर्ण सूर्य ग्रहण के समय सूर्य का कौन-सा भाग दिखायी देता है?

[A] किरीट (Corona)
[B] वर्ण मण्डल
[C] प्रकाश मण्डल
[D] इनमें से कोई नहीं

[read more] [A] किरीट (Corona) [/read]

178. सूर्य ग्रहण निम्नलिखित में से किस स्थिति में पड़ता है?

[A] जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चन्द्रमा आ जाता है।
[B] जब सूर्य और चन्द्रमा के बीच में पृथ्वी आ जाती हैं।
[C] जब सूर्य चन्द्रमा तथा पृथ्वी समकोण पर स्थित होते हैं। 
[D] इसका कोई निश्चित समय नहीं है।

[read more] [A] जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चन्द्रमा आ जाता है। [/read] 

179. सूर्य ग्रहण की स्थिति पायी जाती है-

I. जब पृथ्वी चन्द्रमा और सूर्य के बीच आ जाती है।

11. जब चन्द्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है।

III. जब अमावस्या का दिन होता है।

IV. जब पूर्णिमा का दिन होता है।

कूट:

[A] II, और IV सही है।
[B] II और III सही है।
[C] I और III सही है।
[D] I और IV सही है।

[read more] [B] II और III सही है। [/read]

180. एक कैलेण्डर वर्ष में अधिक से अधिक कितने ग्रहण हो सकते हैं?

[A] 5
[B] 9
[C] 11
[D] 7

[read more] [D] 7 [/read]

181. डायमण्ड रिंग (Diamond Ring) की घटना होती है-

[A] प्रत्येक पूर्णिमा के दिन
[B] प्रत्येक अमावस्या के दिन
[C] सूर्य ग्रहण के दिन
[D] चन्द्र ग्रहण के दिन

[read more] [C] सूर्य ग्रहण के दिन [/read]

182. सिजिगी (syzygy) है-

[A] सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा की एक ही सीधी रेखा में स्थिति
[B] पृथ्वी के एक ही ओर सूर्य तथा चन्द्रमा की स्थिति
[C] सूर्य तथा चन्द्रमा के बीच पृथ्वी की स्थिति
[D] सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी की समकोणिक स्थिति

[read more] [A] सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा की एक ही सीधी रेखा में स्थिति [/read]

183. चन्द्रग्रहण का कारण है-

[A] पृथ्वी एवं सूर्य के बीच चन्द्रमा का आना
[B] पृथ्वी एवं चन्द्रमा के बीच सूर्य का आना
[C] सूर्य एवं चन्द्रमा के बीच पृथ्वी का आना
[D] उपर्युक्त में सभी

[read more] [C] सूर्य एवं चन्द्रमा के बीच पृथ्वी का आना [/read]

184. चन्द्रग्रहण घटित होता है-

[A] अमावस्या के दिन
[B] अर्धचन्द्र के दिन
[C] पूर्णिमा के दिन
[D] उपर्युक्त (A) और (B)

[read more] [C] पूर्णिमा के दिन [/read]

185. सूची-1 को सूची-11 के साथ सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-

सूची-1 (विशेष लक्षण)

अ. सौरमण्डल का सबसे छोटा ग्रह

ब. सौरमण्डल का सबसे बड़ा ग्रह

स. सौरमण्डल में सूर्य से दूसरे स्थान पर का ग्रह

द. सूर्य से सबसे दूर ग्रह

सूची-11 (ग्रह)

1. बुध

2. शुक्र

3. बृहस्पति

4. नेप्ट्यून

कूट अ ब स द

[A] 2 3 4 1
[B] 3 4 1 2
[C] 4 1 2 3
[D] 1 3 2 4

[read more] [D] 1 3 2 4 [/read]

186. निम्नलिखित में से किसे शुक्र ग्रह कहते हैं?

[A] प्लूटो (Pluto)
[B] वीनस (Venus)
[C] जुपीटर (Jupiter)
[D] मार्स (Mars)

[read more] [B] वीनस (Venus) [/read]

1. Universe (ब्रह्माण्ड)

1. Universe (ब्रह्माण्ड)



ब्रह्माण्ड-

      सूक्ष्मतम अणुओं से लेकर विशालकाय आकाशगंगाओं (Galaxies) तक के सम्मिलित स्वरूप को ब्रह्माण्ड कहा जाता है। हमारी पृथ्वी इन्ही असंख्य आकाशगंगाओं में से एक दुग्धमेखला (Milkyway) नामक आकाशगंगा में स्थित है।

Universe

ब्रह्माण्ड से सम्बंधित प्रमुख अवधारणाएँ

1. प्लेटो (428- 348 ई० पू०)-

      यूनानी भूगोलवेत्ता प्लेटो ने सर्वप्रथम ब्रह्माण्ड का नियमित अध्ययन कर भू-केन्द्रीत अवधारणा (Geocentric Concept) का प्रतिपादन किया था। इस अवधारणा के अनुसार, पृथ्वी ब्रह्माण्ड के केन्द्र में है तथा सूर्य व अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। ब्रह्माण्ड के संदर्भ में यह अवधारणा बहुत लम्बे समय तक बनी रही।

2. कॉपरनिकस (1543 ई०)-

     पोलैंड खगोलशास्त्री कॉपरनिकस ने अपनी हस्तलिखित पुस्तक में सूर्य केन्द्रित अवधारणा (Heliocentric Concept) के अन्तर्गत यह बताया कि, ब्रह्माण्ड के केन्द्र में पृथ्वी नहीं, अपितु सूर्य है। यद्यपि ब्रह्माण्ड सम्बंधी उनकी अवधारणा सौर परिवार तक ही सीमित थी, तथापि इस अवधारणा ने ब्रह्माण्ड के अध्ययन की दिशा ही बदल दी। इस सिद्धांत के अनुसार दैनिक गति में पृथ्वी अपने अक्ष पर तथा वार्षिक गति में सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करती है।

3. वाराहमिहिर (छठी शताब्दी ई०)-

      भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री कॉपरनिकस से लगभग 1,000 वर्ष पूर्व ही बता दिया था कि, चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है।

ब्रह्मांड की उत्पत्ति से सम्बंधित प्रमुख सिद्धांत

1. महाविस्फोट सिद्धांत (Big Bang Theory)- जॉर्ज लैमेतेयर

2. साम्यावस्था सिद्धांत (Steady State Thoery)- थॉमस गोल्ड एवं हर्मन बांडी

आकाशगंगा Galaxy:-

    आकाशगंगा (Galaxy) तारों का एक विशाल पूँज है। ब्रह्माण्ड में लगभग 1011 आकाशगंगाएँ हैं। प्रत्येक आकाशगंगा में 1011 तारें हैं। तारों के अतिरिक्त आकाशगंगा में धूल (Dust) एवं गैसें (Gases) भी पायी जाती हैं। आकाशगंगा में 98% भाग तारों का तथा 2% भाग गैस, हैड्रॉन व धूल का होता है।

⇒ हमारी पृथ्वी दुग्धमेखला (Milky way) नामक आकाशगंगा में स्थित है। अन्य आकाशगंगाओं में वृहत मैग्लेनिक मेघ, लघु मैग्लेनिक मेघ, अर्सा माइनर सिस्टम, स्कल्पचर सिस्टम और ड्रेको सिस्टम हैं।

एंड्रोमेडा (Andromeda):-

    एण्डोमेड्रा सर्पिलाकार आकाशगंगा हमारी आकाश गंगा मिल्की वे से सबसे निकटतम स्थित है। यह पृथ्वी से 2.5 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर अवस्थित है। इसे देवयानी भी कहते हैं।

आकाशगंगा के प्रकार

       आकृति के आधार पर आकाशगंगाएँ तीन प्रकार की होती हैं:-

(i) अण्डाकार या दीर्घवृत्तीय (Eliptical)- M87

(ii) सर्पिलाकार (Spiral)- मिल्की वे (Milkyway) एवं एंड्रोमेंडा (Andromenda)

(iii) अनियमित आकार (Irregular)

प्रॉक्सिमा सेन्चुरी (Proxima Centauri):-

      यह सूर्य का सबसे निकटतम तारा है। यह सूर्य से 4.25 प्रकाश वर्ष दूर है।

साइरस या डॉगस्टार (Sirius or Dog Star):-

        यह रात में आकाश में दिखने वाला सर्वाधिक चमकीला तारा है। इसका द्रव्यमान सूर्य से दोगुना है। यह सौर मंडल से लगभग 8.6 प्रकाश वर्ष दूर है, जो प्रॉक्सिमा सेन्चुरी के बाद सबसे नजदीक का तारा है।

ध्रुव तारा (Pole Star or North Star):-

       यह पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव पर खड़े व्यक्ति के ठीक शिरोबिन्दु (Zenith) पर 431 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है लेकिन क्योंकि यह बहुत चमकदार है इसलिए आसानी से देखा जा सकता है।

प्रकाश वर्ष (Light Year):- 

         प्रकाश वर्ष, समय का नहीं बल्कि दूरी का मात्रक है। प्रकाश की गति लगभग 3 लाख किमी. प्रति सेकेण्ड है। 1 वर्ष में सूर्य का प्रकाश जितनी दूरी तय कता है, वह एक प्रकाश वर्ष कहलाती है।

⇒ एक प्रकाश वर्ष 9.46×1012 किमी. के बराबर होता है।

पारसेक (Parsec):-

       यह दूरी मापन की सबसे बड़ी इकाई है, जिसका मान लगभग 3.26 प्रकाश वर्ष के बराब होता है।

1 पारसेक = 3.26 प्रकाश वर्ष

तारों का रंग, तापमान एवं उम्र

⇒ तारों के रंग से उसके तापमान को ज्ञात किया जाता है।

⇒ तारों द्वारा मुक्त ऊष्मा के आधार पर उनकी उम्र ज्ञात की जा सकती है, जैसे-

नीला व सफेद – युवा (आद्य तारा)

नारंगी – प्रौढ़

लाल – वृद्ध

⇒ अंततः विस्फोट के बाद तारे की मृत्यु हो जाती है या वह ‘कृष्ण विवर’ (Black Hole) बन जाता है।

चंद्रशेखर सीमा (Chandrasekhar Limit)-

⇒ एस. चंद्रशेखर भारतीय मूल के अमेरिकी खगोल भौतिकविद् थे। जिन्होंने श्वेत वामन तारों के जीवन अवस्था के बारे में सिद्धांत प्रतिपादित किया।

⇒ इसके अनुसार, 1.44 सौर द्रव्यमान ही श्वेत वामन के द्रव्यमान की ऊपरी सीमा है। इसे ही ‘चंद्रशेखर सीमा’ कहते हैं।

⇒ एस. चंद्रशेखर को संयुक्त रूप से नाभिकीय खगोल भौतिकी में ‘डब्ल्यू. ए. फाउलर’ के साथ 1983 में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

न्यूट्रॉन तारा (Neutron Star)

⇒ सुपरनोवा विस्फोट से बचे हुए केंद्रीय भाग, जो कि अत्यधिक घनत्व वाला होता है, से न्यूट्रॉन तारों का निर्माण होता है।

⇒ अधिक गति से चक्कर लगाने वाले न्यूट्रॉनों से बने तारों को ‘न्यूट्रान तारा’ कहते हैं।

⇒ न्यूट्रॉन तारे के सभी अंश न्यूट्रॉन के रूप में संगठित रहते हैं। यह तीव्र रेडियो तरंगें उत्सर्जित करते हैं।

⇒ न्यूट्रॉन तारे को ‘पल्सर’ भी कहा जाता है।

कृष्ण विवर (Black Hole)

⇒ कृष्ण विवर अंतरिक्ष में स्थित ऐसा स्थान है जहाँ गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक होता है कि प्रकाश का परावर्तन या किसी भी वस्तु का वहाँ से पलायन नहीं हो सकता।

⇒ इसे दूरबीन से भी नहीं देखा जा सकता।

⇒ कृष्ण विवर की पुष्टि प्रकाश के अपने पथ के विचलन के द्वारा की जाती है।

⇒ कृष्ण विवर का निर्माण तब हो सकता है जब न्यूट्रॉन तारे में द्रव्यमान एक ही स्थान पर संकेद्रित हो जाए अथवा उसकी मृत्यु हो रही हो।

⇒ ब्लैक होल आकार में बड़ा या छोटा हो सकता है। छोटे ब्लैक होल एक परमाणु जितने छोटे हो सकते हैं लेकिन उनका द्रव्यमान बहुत अधिक होता है।

⇒ जिन तारों का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के तीन गुने से अधिक होता है, वे विघटित होकर अंततः कृष्ण विवर में परिणत हो जाते हैं।



ब्रह्माण्ड से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



1. ‘भूगोल का जनक’ किसे कहा जाता है?

[A] हेरोडोटस
[B] इरैटोस्थनीज
[C] एनेक्जीमेण्डर
[D] हिकैटियस

[read more] [D] हिकैटियस [/read]

2. भूगोल को एक अलग अध्ययन शास्त्र के रूप में स्थापित करने का श्रेय निम्न में से किस विद्वान को है?

[A] इरैटोस्थनीज
[B] हेरोडोटस
[C] हिप्पार्कस
[D] हिकैटियस

[read more] [D] हिकैटियस [/read]

3. भूगोल के लिए ‘ज्योग्रैफिका’ (Geographica) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किसने किया?

[A] हिकैटियस
[B] इरैटोस्थनीज
[C] हेरोडोटस
[D] एनेक्जीमेण्डर

[read more] [B] इरैटोस्थनीज [/read]

4. ‘ज्योग्राफी’ (Geography) के शाब्दिक अर्थ के आधार पर भूगोल की परिभाषा की गई है

[A] भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वी के धरातल का अध्ययन करता है।
[B] भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वी तथा मानव के अर्न्तसम्बन्धों का अध्ययन करता है।
[C] भूगोल वह विज्ञान है जो मानवीय एवं प्राकृतिक विषमता का अध्ययन करता है।
[D] इनमें से कोई नहीं।

[read more] [A] भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वी के धरातल का अध्ययन करता है। [/read]

5. ‘भूगोल पृथ्वी को केन्द्र मानकर अध्ययन करने वाला विज्ञान है’, किसने कहा था?

[A] टॉलमी
[B] काण्ट
[C] वारेनियस
[D] टेलर

[read more] [C] वारेनियस [/read]

6. ‘भूगोल भूतल का अध्ययन है’-किसने कहा था?

[A] टॉलमी
[B] काण्ट
[C] वारेनियस
[D] हम्बोल्ट

[read more] [B] काण्ट [/read]

7. भौगोलिक विचारधाराओं में ‘नवनियतिवाद’ की विचारधारा का प्रवर्तक कौन है?

[A] फ्रेडरिक रैटजेल
[B] फेब्रे
[C] ग्रिफिथ टेलर
[D] विडाल-डि-ला-ब्लॉश

[read more] [C] ग्रिफिथ टेलर [/read]

8. ‘वर्तमान भूत की कुंजी है’ कथन किस विद्वान का है?

[A] डटन
[B] डेविस
[C] जेम्स हट्टन
[D] वाल्टर पेंक

[read more] [C] जेम्स हट्टन [/read]

9. ‘स्थल रूप संरचना, प्रक्रम तथा अवस्था का प्रतिफल होता है’ कथन किसका है?

[A] वाल्टर पेंक
[B] डब्ल्यू० एम० डेविस
[C] एल० सी० किंग
[D] पेल्टियर

[read more] [B] डब्ल्यू० एम० डेविस [/read]

10. ‘यदि इतिहास’ कब का वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करता है तो भूगोल ‘कहाँ’ (where) का वैज्ञानिक एवं तार्किक अध्ययन है’ कथन निम्नलिखित में से किस विद्वान का है?

[A] कार्ल सावर
[B] एच० जे० मैकिण्डर
[C] एन० जे० स्पाइकमैन
[D] डी० एच० ह्निटिल्सी

[read more] [A] कार्ल सावर [/read]

11. भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) का जन्मदाता किसे माना जाता है?

[A] डेविस
[B] पेशेल
[C] हट्टन
[D] पेंक

[read more] [B] पेशेल [/read]

12. ‘रूको और जाओ नियतिवाद’ (Stop and Go Determinism) की विचारधारा के प्रतिपादक कौन हैं?

[A] ए० जे० हरबर्टसन
[B] हार्टशोर्न
[C] जॉर्ज टैथम
[D] ग्रिफिथ टेलर

[read more] [D] ग्रिफिथ टेलर [/read]

13. भूगोल को ‘मानव पारिस्थिातिकी’ के रूप में परिभाषित करने वाला विद्वान कौन है?

[A] विडाल डि-ला-ब्लॉश
[B] हेटनर
[C] जीन ब्रून्श
[D] एच० एच० बैरोज

[read more] [D] एच० एच० बैरोज [/read] 

14. गणितीय भूगोल का प्रारम्भकर्ता निम्न में से कौन है?

[A] थेल्स
[B] स्ट्रेबो
[C] टॉलमी
[D] थियोफ्रेस्टस

[read more] [A] थेल्स [/read]

15. चूँकि मानव पृथ्वी पर निवास करता है, अतः पृथ्वी पर निर्भर है’ कथन किसका है?

[A] फैब्रे
[B] ब्लॉश
[C] सेम्पुल
[D] जीन ब्रून्श

[read more] [D] जीन ब्रून्श [/read]

16. ‘क्षेत्रीय भूगोल’ (Regional Geography) का पिता निम्न में से किस भूगोलवेत्ता को कहा जाता है?

[A] कार्ल रिटर
[B] फ्रेडरिक रैटजेल
[C] एच० जे० हरबर्टसन
[D] हम्बोल्ट

[read more] [A] कार्ल रिटर [/read] 

17. ‘मानव भूगोल का पिता’ निम्न में से किसको कहा जाता है?

[A] ब्लॉश
[B] कार्ल रिटर
[C] हम्बोल्ट
[D] जीन ब्रून्श

[read more] [B] कार्ल रिटर [/read]

18. ‘मानव भूगोल अस्थायी पृथ्वी एवं चंचल मानव के पारस्परिक परिवर्तनशील सम्बन्धों का अध्ययन है।’ कथन किसका है?

[A] ब्लॉश
[B] कु० सेम्पुल
[C] हण्टिंगटन
[D] हम्बोल्ट

[read more] [B] कु० सेम्पुल [/read]

19. महाविस्फोट सिद्धान्त संबंधित है-

[A] ब्रह्माण्ड की उत्पति से
[B] महाद्वीपीय विस्थापन से
[C] हिमालय की उत्पत्ति से
[D] ज्वालामुखियों के विस्फोट से

[read more] [A] ब्रह्माण्ड की उत्पति से [/read]

20. ब्रह्मांड के अध्ययन को ……. के नाम से जाना जाता है।

[A] कॉस्मोलॉजी
[B] एस्ट्रोलॉजी
[C] सिस्मोलॉजी
[D] लिम्नोलॉजी

[read more] [A] कॉस्मोलॉजी [/read]

21. भारी ब्रह्मांडीय कणों का अध्ययन करने के लिए नासा द्वारा प्रक्षेपित किया जाने वाले बेलून-जनित उपकरण का क्या नाम है?

[A] सुपर लम्बा
[B] सुपर टाइगर
[C] सुपर लायन
[D] सुपर मामा

[read more] [B] सुपर टाइगर [/read]

22. ‘बिग-बैंग सिद्धान्त’ निम्नलिखित के उद्भव की व्याख्या करता है:

[A] हिम युग
[B] स्तनधारी जीव
[C] ब्रह्माण्ड
[D] महासागर

[read more] [C] ब्रह्माण्ड [/read]

23. 1948 में विकसित बिग बैंग सिद्धांत के लिए निम्न में से कौन सा एक वैकल्पिक सिद्धांत है, जो ये बताता है कि ब्रह्मांड परिवर्तित नहीं होता है भले ही इसमें समय के साथ विस्तार होता है?

[A] ऑसीलेटिंग यूनिवर्स
[B] स्टेडी स्टेट यूनिवर्स
[C] मिरर यूनिवर्स
[D] इटरनल इन्फ्ते शन

[read more] [B] स्टेडी स्टेट यूनिवर्स [/read]

24. श्याम विवर (Black Hole)-

[A] पराबैंगनी किरणों को पार रक्त किरणों में बदल देता है।
[B] कोई भी विकिरण प्रवाहित नहीं करता।
[C] सारे विकिरण जो इसके पास से प्रवाहित होते है उनका अवशोषण करता है।
[D] एक काल्पनिक विचार है।

[read more] [C] सारे विकिरण जो इसके पास से प्रवाहित होते है उनका अवशोषण करता है। [/read]

25. ‘ब्लैक होल’ की जानकारी सर्वप्रथम दी थी-

[A] मेघनाथ साहा ने
[B] हरमान बाण्डी ने
[C] एस. चन्द्रशेखर ने
[D] जे. वी. नार्लिकर ने

[read more] [C] एस. चन्द्रशेखर ने [/read]

26. विज्ञान के किस क्षेत्र में आप ‘व्हाइट ड्वार्फ’ के बारे में सीखेंगे?

[A] कृषि
[B] खगोलशास्त्र
[C] जेनेटिक्स
[D] एन्थ्रोपोलॉजी

[read more] [B] खगोलशास्त्र [/read]

27. किसी तारे का रंग दर्शाता है-

[A] उसके ताप का
[B] उसकी पृथ्वी से दूरी
[C] उसकी ज्योति
[D] उसकी सूर्य से दूरी

[read more] [A] उसके ताप का [/read]

28. तारे अपनी ऊर्जा प्राप्त करते हैं-

1. नाभिकीय संलयन से

2. गुरुत्वीय संकुचन से

3. रासायनिक अभिक्रिया से

4. नाभिकीय विखण्डन से

अपने उत्तर का चयन नीचे दिए गए कूट से कीजिए-

[A] 1, 2 एवं 3
[B] 1 एवं 2
[C] 1 एवं 4
[D] 2 एवं 4

[read more] [B] 1 एवं 2 [/read]

29. तारे पूर्व से पश्चिम में किस कारण ज्यादा दिखते हैं?

[A] पूरा ब्रह्मांड, पूर्व से पश्चिम को घूम रहा है
[B] पृथ्वी, सूर्य की परिक्रमा कर रही है
[C] पृथ्वी, पूर्व से पश्चिम को घूम रही है
[D] पृथ्वी, पश्चिम से पूर्व को घूम रही है

[read more] [D] पृथ्वी, पश्चिम से पूर्व को घूम रही है [/read]

30. ‘सुपरनोवा’ क्या है?

[A] पुच्छल तारा
[B] ग्रहिका
[C] विस्फोटी तारा/एक मृतप्राय तारा
[D] ब्लैक होल

[read more] [C] विस्फोटी तारा/एक मृतप्राय तारा [/read]

31. पल्सर होते हैं-

[A] पृथ्वी की ओर जा रहे तारे
[B] पृथ्वी से दूर जा रहे तारे
[C] तेजी से घूमने वाले तारे
[D] उच्च तापमान वाले तारे

[read more] [C] तेजी से घूमने वाले तारे [/read]

32. तारों के मध्य दूरी ज्ञात करने की इकाई है-

[A] कॉस्मिक किलोमीटर
[B] स्टीलर मील
[C] गैलेक्टिक इकाई
[D] प्रकाश वर्ष

[read more] [D] प्रकाश वर्ष [/read]

33. तारामंडल ‘सप्त-ऋषि’ को पश्चिमी निवासी किस नाम से जानते हैं?

[A] सेवन मॉक
[B] अल्फा सेंटोरी
[C] बिग डिपर
[D] स्मॉल बियर

[read more] [C] बिग डिपर [/read]

34. जिस तारा मण्डल के तारे ध्रुवतारे की ओर संकेत करते हैं वह है-

[A] मृग
[B] सप्तऋषि
[C] वृश्चिक
[D] वृष

[read more] [B] सप्तऋषि [/read]

35. हमारे अंतरिक्ष में कितने तारामंडल (Constellations) है?

[A] 88
[B] 87
[C] 89
[D] 90

[read more] [A] 88 [/read]

36. ‘हेल-बॉप’ किसका नाम है?

[A] कार्टून चित्र
[B] पुच्छल तारा
[C] अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनी
[D] एक खिलौना

[read more] [B] पुच्छल तारा [/read]

37. खगोल-भौतिकी में बाह्य अंतरिक्ष में परिकल्पित होल को जहाँ से तारे और ऊर्जा निकलती है, क्या नाम दिया गया है?

[A] ब्लैक होल
[B] ओजोन होल
[C] एस्टिरॉपड बेल्ट
[D] वाइट होल

[read more] [D] वाइट होल [/read]

38. वह सीमा जिसके बाहर तारे आन्तरिक मृत्यु से ग्रसित होते हैं, कहलाती है-

[A] एडिंगटन सीमा
[B] चन्द्रशेखर सीमा
[C] हायल सीमा
[D] फाउलर सीमा

[read more] [B] चन्द्रशेखर सीमा [/read]

39. एक निक्षित आकृति में व्यवस्थित ताराओं का समूह कहलाता है-

[A] नक्षत्र
[B] आकाश गंगा
[C] एन्ड्रोमेडा
[D] सौर मण्डल

[read more] [A] नक्षत्र [/read]

40. घटकों के बीच गुरुत्वाकर्षण द्वारा भारी मात्रा में एक साथ एकत्र हुए तारों, धूल और गैस को क्या कहते हैं?

[A] गुच्छा
[B] वायुमंडल
[C] मंदाकिनी (आकाशगंगा)
[D] सौर परिवार

[read more] [C] मंदाकिनी (आकाशगंगा) [/read]

41. हमारी आकाशगंगा की आकृति हैं-

[A] वृत्ताकार
[B] दीर्घवृत्ताकार
[C] स्पाइरल
[D] उपर्युक्त में से कोई नहीं

[read more] [C] स्पाइरल [/read]

42. आकाश गंगा वर्गीकृत की गई है-

[A] विद्युत गैलेक्सी के रूप में
[B] सर्पाकार गैलेक्सी के रूप में
[C] अनियमित गैलेक्सी के रूप में
[D] गोलाकार गैलेक्सी के रूप में

[read more] [B] सर्पाकार गैलेक्सी के रूप में [/read]

43. आकाशगंगा मंदाकिनी सबसे पहले देखी थी-

[A] गैलीलियो ने
[B] मार्टेन श्मिट ने
[C] मार्कोनी ने
[D] न्यूटन ने

[read more] [A] गैलीलियो ने [/read]

44. उस आकाशगंगा का नाम क्या है जिसमें पृथ्वी एक ग्रह है?

[A] एन्ड्रोमेडा
[B] अर्सा मेजर
[C] उर्सा माइनर
[D] दुग्ध-मेखला

[read more] [D] दुग्ध-मेखला [/read]
45. हमारी आकाशगंगा के केन्द्र की परिक्रमा करने में सूर्य को समय लगता है-

[A] 10 करोड़ वर्ष
[B] 5 करोड़ वर्ष
[C] 20 करोड़ वर्ष
[D] 25 करोड़ वर्ष

[read more] [D] 25 करोड़ वर्ष [/read]

46. 11 बिलियन वर्षों पूर्व अस्तित्व में होने वाली ए 1682 बी11 नामक आकाशगंगा का आकार क्या था?

[A] विक्षोभ डिस्क
[B] कुंडलीकार
[C] पतली डिस्क
[D] कोई विकल्प सही नहीं है

[read more] [B] कुंडलीकार [/read]

47. 11 बिलियन वर्षों पूर्व अस्तित्व में होने वाली सबसे प्राचीन कुंडलित आकाशगंगा का क्या नाम है?

[A] A1689 B01
[B] A1689 B10
[C] A1689 B20
[D] A1689 B11

[read more] [D] A1689 B11 [/read]

12. Examples for man Made Disasters in India (भारत में मानव जनित आपदाओं का उदाहरण)

12. Examples for man Made Disasters in India

(भारत में मानव जनित आपदाओं का उदाहरण)



          भारत में मानवजनित आपदाओं को निम्न उदाहरण द्वारा देख सकते है।

(1) भोपाल गैस त्रासदी, 1984 (Bhopal Gas Tragedy)

       भोपाल में 2-3 दिसम्बर, सन् 1984 को हुई गैस दुर्घटना प्राणघातक गैसों के रख-रखाव में मनुष्य की असावधानी से उत्पन्न आपदापन्न प्रकोपों का ज्वलंत उदाहरण है। भोपाल स्थित अमेरिकन यूनियन कार्बाइड कारखाने के गैस संयंत्र से 2-3 दिसम्बर (1984) की शीत रात्रि में जहरीली मिक गैस (MIC= Methyle Iso-Cynate) के अचानक फूट निकलने के कारण वायु प्रदुषण की वृहत्तम दुर्घटना घट गयी। आधिकारिक सूचना के कारण इस प्रलयकारी गैस दुर्घटना के कारण कुछ घण्टों में ही 2500 व्यक्ति कालकवलित हो गये जबकि गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार इस दुर्घटना से मरने वालों की संख्या 5000 से अधिक बतायी गयी है।

       भोपाल स्थित इस अमेरिकी यूनियन कार्बाइड कारखाने में कीटनाशी रसायन के निर्माण के लिए मिक गैस का उत्पादन किया जाता था तथा उसका भूमिगत कंटेनरों में भण्डारन किया जाता था। 2-3 दिसम्बर की रात में इन्हीं कंटेनरों से मिक गैस का अचानक रिसाव (लीकेज) प्रारम्भ हुआ तथा यह रिसाव 40 मिनट तक चलता रहा।

       प्रातः कालीन वायु के प्रभाव से यह जहरीली गैस पुराने भोपाल नगर के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में तेजी से फैल गयी तथा पलक झपकते हजारों लोगों को निगल गयी। इसके अलावा हजारों निवासी इस विषाक्त गैस से बुरी तरह प्रभावित हो गये एवं हजारों जानवरों ने प्राण त्याग दिये। इस गैस मे पेय जल, मिट्टियों, तालाबों तथा जलाशयों के जल को बुरी तरह प्रदूषित कर दिया तथा गर्भस्थ शिशुओं (भ्रूणों), नवजात शिशुओं, गर्भवती महिलाओं, बच्चों एवं आबाल-वृद्ध लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया।

     गैस त्रासदी के समय जन्मे बच्चों, जो बाद में मर गये, के जिगर में नीले धब्बे पड़ गये वे खाँसी तथा अस्थमा के रोगी हो गये तथा अधिकांश की आँखों की रोशनी चली गयी। भोपाल गैस त्रासदी को घटित हुए एक लम्बा समय बीत गया है परन्तु आज भी पुराने भोपाल के खांसते, आँख, मलते तथा लंगड़ाते लोग मानव-कृत जानलेवा आपदा की घटना को ताजा कर जाते हैं।

(2) चसनाला कोयला खदान आपदा, 1975 (Chasnala Coal Mine Disaster)

       झारखण्ड राज्य के धनबाद जिले में स्थित चसनाला कोयला खदान में 27 दिसम्बर, 1975 को एक हृदय विदारक (Heart Shaking) ऐसी आपदा घट गयी जिस कारण खदान में कार्यरत 372 लोगों की जान चली गयी। चसनाला की गहरी खदान में सैकड़ों खननकर्ता (Miners) कार्य कर ही रहे थे कि एक विस्फोट करने पर खादान के एक चैम्बर की छत अचानक भर भराकर गिर गया और उसमें 272 दबकर मर गए।

(3) संरचनात्मक विफलता (structural failure)

     संरचनात्मक विफलता के कई ऐसे उदाहरण हैं जो भवनों के उनके निर्माण के समय ही ध्वस्त होने को दर्शाते हैं। अर्थात् अपने निर्माण की अवस्था में ही कई भवन भरभरा कर ढह जाते हैं (गिर पड़ते हैं)। उदाहरण: अप्रैल 2013 में महाराष्ट्र के थाणे जिला में 7 मंजिला भवन जिसका बिना सरकारी अनुमति के गैरकानूनी रूप से निर्माण कराया जा रहा था, भरभरा कर गिर गया।

      इस दुर्घटना में 39 व्यक्ति मारे गये तथा 72 घायल हो गये। उस समय राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF– National Disaster Response Force) की टीम ने अतिरिक्त 25-30 लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका जतायी थी। इसी तरह 2013 में ही महाराष्ट्र में संरचनात्मक विफलता की दुर्घटना सितम्बर महीने में घट गयी। मुम्बई में एक 4 मंजिला रिहायसी (Residential) भवन ताश के पत्ते की तरह भरभरा कर गिर गया, जिस कारण 61 व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी।

(4) संरचनात्मक अग्निकांड दुर्घटना आपदा (Structural Fire accidents Disaster)

    विभिन्न उपयोगों वाले भवनों यथा प्राइवेट एवं पब्लिक सेक्टर के कार्यालय, सिनेमा हाल, शापिंग माल, रिहायसी तथा वाणिज्यिक काम्प्लेक्स, धार्मिक शिविर, कारखाना तथा मिल आदि में आग लगने से जानलेवा मानव जनित आपदायें उत्पन्न हो जाती हैं, जिनसे जान-माल की भारी क्षति होती है।

     भवनों में आगजनी की दुर्घटनायें प्रायः शार्ट-सर्किटिंग, मशीनों एवं उपकरणों में खराबी, पावर स्टेशनों का खराब अनुरक्षण (रख-रखाव Maintenance), खराब एवं पुरानी वायरिंग, तोड़-फोड़ (Sabotage), आतंकी हमला, लापरवाही, सुरक्षा मानकों तथा फायर फाइटिंग मैनुअल की नजर अन्दाजी (Avoidance), अग्निशामकों (Fire Extinguishers) का अभाव होने पर या खराब अनुरक्षण, अपर्याप्त फायरटेण्डर या इनका पूर्णतया अभाव, आग बुझाने में लगे लोगों का समुचित प्रशिक्षण न होना एवं प्रशिक्षित फायरमैन की पर्याप्त संख्या का अभाव, जल की खराब आपूर्ति आदि के कारण होती हैं।

      जून 1997 में उपहार सिनेमाहाल में आग की दुर्घटना का निम्न उदाहरण सुरक्षा के अनुपालन में मानवीय लापरवाही की कहानी कह देता है:

          ‘बार्डर फिल्म’ के प्रीमियर प्रदर्शन के समय नई दिल्ली में ग्रीन पार्क के निकट अवस्थित ‘उपहार सिनेमा हाल’ में 13 जून, 1977 को दिल को दहला देने वाली आपदापन्न भीषण अग्निकाण्ड की दुर्घटना घट गयी। सिनेमा हाल में फंसे 59 व्यक्तियों की घने धुंए में दम घुटने से मृत्यु हो गयी। आग लगने की घटना से भगदड़ (Stampede) मच गयी, जिसमें अफरा-तफरी में 103 लोग गम्भीर रूप से घायल हो गये। भवन के तहखाने (Basement) में लगे 1000 KVA के विद्युत ट्रान्सफार्मर में अचानक ब्लास्ट (घमाका) होने से अग्निकाण्ड की यह आपदा हुई थी।

      उल्लेखनीय है कि भवन का तहखाना केवल सीमित संख्या में कार पार्किंग के उपयोग के लिए था। अन्य किसी भी प्रकार का उपयोग वर्जित था। उस दिन अनुमन्य कार पार्किंग के नियम का उल्लंघन करके 36 कारों की पार्किंग की गयी थी। तहखाने में स्थित बिजली के ट्रांसफार्मर के अनुरक्षण (Maintenance) में लापरवाही बरती गयी थी।

      ट्रांसफार्मर में अचानक ब्लास्ट होने से लगी आग ने 20 कारों को अपने चपेट में ले लिया। परिणामस्वरूप आग की लपटें तथा धुएं तेजी से फैलने लगे। देखते-देखते आग तथा धुंआ 5-मंजिला भवन में फैल गया। अधिकांश पीड़ित व्यक्ति बालकनी में फंस गये थे, तथा बाहर निकलने के दरवाजे के बन्द होने के कारण वे बाहर नहीं जा सके। परिणामस्वरूप दम घुटने (Suffocation) के कारण 59 लोगों की मृत्यु हो गयी।

(5) शिवकाशी आतिशबाजी आपदा, भारत, 2012

      तमिलनाडु में शिवकाशी से 13 किमी. दूर मुदालीपट्टी की एक आतिशबाजी (Fireworks) फैक्टरी में 5 सितम्बर, 2012 को आतिशबाजी की एक हृदयविदारक त्रासदी घट गयी, जिसमें 38 श्रमिक (2 महिलायें तथा अधिकांश बच्चे) मृत्यु के शिकार हो गये।

      उल्लेखनीय है कि सामान्य रूप से तमिलनाडु और मुख्य रूप से शिवकाशी भारत में आतिशबाजी का सर्वाधिक निर्माता है। परन्तु अराजकता, सुरक्षा एवं बचाव के उपायों की उपेक्षा एवं अनुपालन करने में लापरवाही राज्य सरकार की उपेक्षा तथा श्रमिकों की लापरवाही के कारण आतिशबाजी तथा पटाखों की फैक्टरियों एवं गोदामों में आये दिन आगजनी तथा विस्फोटों की दुर्घटनायें होती रहती हैं, जिस कारण आतिशबाजी तथा पटाखा बनाने के काम में लगे श्रमिकों, जिनमें अधिकतर बच्चे होते हैं (यह नियम विरुद्ध है) से कई मौत के शिकार हो जाते हैं।

      तमिलनाडु में शिवकाशी और उसके आस-पास के क्षेत्रों में आतिशबाजी, पटाखा एवं दियासलाई बनाने की कई इकाइयां हैं। इनमें से कई गैरकानूनी हैं तथा गावों एवं निजी घरों में स्थापित हैं। इनमें काम करने वाले श्रमिक पटाखों के निर्माण में काम आने वाले विस्फोटकों तथा अन्य खतरनाक सामग्रियों को हैण्डिल करने के लिए अच्छी तरह प्रशिक्षित नहीं हैं। साथ ही साथ कच्चे पदार्थों खासकर विस्फोटकों (बारूद) तथा निर्मित पटाखों के उचित भण्डारन की समुचित व्यवस्था एवं सुविधाओं का अभाव है। इन सभी के कारण भारत, पाकिस्तान तथा बांगलादेश में आतिशबाजी से जानलेवा दुर्घटनायें तथा जनहानियाँ होती रहती हैं। विकसित देशों में भी सुरक्षा उपायों के बावजूद आतिशबाजी की दुर्घटनायें होती हैं।

     शिवकाशी में 5 सितम्बर, 2012 की आतिशबाजी की दुर्घटना श्रमिकों एवं फैक्टरी के मालिकों की लापरवाही के कारण विस्फोट होने से हुई थी। धमाका इतना प्रबल था कि फैक्टरी की 30 कंक्रीट छतें पटरा हो गयीं तथा 38 लोग कालकवलित हो गये। यह दुर्घटना आतिशबाजी की एक प्राइवेट ओम शक्ति फैक्टरी में घटी थी।

(6) उल्लेखनीय है कि प्रति 12वें वर्ष महाकुम्भ के पवित्र स्नान पर्व के समय  प्रयागराज में गंगा, यमुना एवं अदृश्य सरस्वती नदियों के पवित्र संगम पर विश्व का सबसे बड़ा जन समुदाय एकत्रित होता है जिसमें कई करोड़ श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं।

      सन् 2013 में महाकुम्भ स्नान पर्व के समय 10 फरवरी को लगभग 4 करोड़ श्रद्धालुओं का संगम की रेती पर जमघट लग गया परन्तु राज्य एवं केन्द्र की सरकारों ने इस भारी भीड़ का इतना सुनियोजित ढंग से प्रबन्धन किया कि विश्व समुदाय के सामने भीड़ प्रबन्धन का यह सफल मॉडल एक नजीर बन गया विश्व की कई लब्धप्रतिष्ठ शैक्षिक संस्थाओं ने इस महाकुम्भ के दौरान भीड़ प्रबन्धन की भारतीय विधि का अध्ययन करने के लिए अपनी-अपनी विशेषज्ञों की टोलियाँ इलाहाबाद भेजी थीं।

      भीड़-भगदड़ मुख्य रूप से अफवाह फैलने पर दहसत में लोगों के सम्बन्धित स्थान से भाग निकलने के प्रयास में होती है। भीड़-भगदड़ के स्थानों में पूजा स्थल, खेल-कूद स्थल, सिनेमा हाल, शापिंग माल, धार्मिक मेला, रेलवे स्टेशन, संकरे पुल, व्यापारिक केन्द्र व बाजार, धार्मिक एवं राजनीतिक सभायें आदि प्रमुख हैं। भीड़-भगदड़ के समय अधिकांश मौत दम घुटने (Suffocation) तथा सिर एवं सीने में चोट लगने से होती है।

      भगदड़ पूर्वकथनीय नहीं है। अर्थात् भारी भीड़ में भगदड़ की सम्भावना तो रहती है, परन्तु यह पता नहीं होता है कि कब भगदड़ मचेगी। अतः भगदड़ आपदा के प्रबन्धन का एकमात्र तरीका उसकी प्रायिकता (Probability) का आंकलन कना तथा विषम परिस्थितियों में भीड़ का प्रबन्धन करने के लिए पहले से सावधान हना तथा सभी आवश्यक उपायों एवं साधनों को तैयार स्थिति में रखना है।


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11. Man-made disaster and its types (मानव जनित आपदा एवं उसके प्रकार)

11. Man-made disaster and its types
(मानव जनित आपदा एवं उसके प्रकार)



        मनुष्य के कार्यों, जो जानबूझ कर या अनजाने में किए जाँय तथा जिनसे जान-माल की भारी क्षति होती है, को मानवकृत (मानव जनित) आपदा कहते हैं। ऐसे इच्छित या अनिच्छित (Intentional or unintentional, deliberate indeliberate) कार्यों द्वारा जनित आपदाओं से मानव मृत्यु के अलावा सरकारी तथा निजी सम्पत्तियों को भारी हानि होती है। मानव जनित आपदा की इस परिभाषा का और अधिक विस्तरण किया जा सकता है:

      मनुष्य की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, इच्छित या अनिच्छित क्रियाओं, उसकी असावधानी, लापरवाही, अज्ञानता (Ignorance), गलती या मानव-निर्मित तंत्रों की विफलता के कारण उत्पन्न आपदाओं घटनाओं या दुर्घटनाओं (Accidents), जिनसे मानव के जान-माल की भारी क्षति होती है, को मानव जनित आपदा कहते हैं। निम्नलिखित कतिपय उदाहरणों द्वारा मानवकृत आपदाओं की अवधारणा को स्पष्ट किया जा सकता है:

(1) जानबूझकर/इच्छित कार्य (Deliberate and intentional acts):

⇒ द्वितीय विश्व युद्ध के समय सन् 1945 में अमेरिका सेना द्वारा जापान के हीरोशिमा एवं नागासाकी नगरों पर एटम बम गिराया जाना।

⇒ सन् 2001 में आतंकवादियों द्वारा 11 सितम्बर को संयुक्त राज्य के विश्व ट्रेड सेन्टर के दो टावरों तथा पेण्टागन पर हवाई जहाजों से हमला।

(2) लापरवाही के कार्य (Acts of negligence):

⇒ सन् 1986 में युक्रेन के चर्नोबिल स्थित परमाणु शक्ति संयन्त्र का मेल्टडाउन।

⇒ 3/4 दिसम्बर, 1984 को भारत की भोपाल गैस त्रासदी।

(3) अनिच्छित कार्य (Unintentional Act):

⇒ भूमण्डलीय ऊष्मण्न (Global Warming) तथा जलवायु परिर्वतन।

⇒ पर्यावरण प्रदूषण

⇒ तेज दर से मृदा अपरदन (Accelerated rate of soil erosion)

⇒ भीड़, भगदड़ (Crowd Stampede), यथा: भारत के मध्य प्रदेश के दतिया जिले में रतनगढ़ स्थित माता देवी मन्दिर में श्रद्धालुओं की लाखों की भीड़ में 13 अक्टूबर, 2013 को मची भगदड़ में 115 भक्तों की मृत्यु हो गयी। यह भगदड़ पुल टूटने की अफवाह तथा जिला प्रशासन की लापरवाही के कारण हुई थी।

(4) लापरवाही तथा बदइन्तजामी (Negligence and Mishanding) के सम्मिलित कार्य:

⇒ रेल दुर्घटनायें

⇒ सड़क दुर्घटनायें

⇒ हवाई दुर्घटनायें

⇒ सागरों में जलयानों की दुर्घटनायें।

       मनुष्य के कुछ कार्य प्राकृतिक आपदाओं को तेज तथा प्रेरित करते हैं, यथा: विफलता, आकस्मिक बाढ़, जल भण्डार-प्रेरित भूकम्पीय घटनायें (Reservoir-induced seismic events), भूस्खलन (वनविनाश तथा सड़क निर्माण द्वारा), तीव्र मृदा अपरदन (Accelerated soil erosion) आदि।

मानवजनित आपदायें: प्रकारिकी

(Man-Made Disasters: Typology)

       उल्लेखनीय है कि मानवकृत आपदाओं को निश्चित वर्गों में विभाजित करने के लिए कोई निर्धारित मानक क्रिया नहीं है। इसेक बावजूद कुछ ने मानव जनित आपदाओं को विशद रूप में विभिन्न प्रकारों/वर्गों में विभाजित करने का प्रयास किया है, जो निम्न प्रकार हैं:

(1) प्रौद्योगिकीय आपदायें (Technological Disasters):

(i) औद्योगिक प्रकोप तथा आपदायें

⇒ खतरनाक तत्वों के प्रक्रमण तथा भण्डारन (Processing and storage) से सम्बन्धित दुर्घटनायें।

⇒ कच्चे पदार्थों के निष्कासन (Extraction) तथा खनन (Mining) से सम्बन्धित दुर्घटनायें।

⇒ खतरनाक वस्तुओं, यथाः पेट्रोकेमिकल्स, पटाखा आदि, का उत्पादन करने वाली इकाइयों की दुर्घटनायें, आदि।

(ii) संरचना की विफलता तथा आग लगना (Structural failure and fire)।

(iii) बिजली का अत्यधिक उपयोग तथा खतरनाक वस्तुओं का विस्फोट, यथा: पटाखों के भण्डार में विस्फोट सम्बन्धी दुर्घटनायें

(iv) रेडियेशन सन्दूषण (Contamination)।

(v) खतरनाक जैविक पैथोजेन (वैक्टीरिया, वाइरस तथा परजीवी)।

(vi) रासायनिक, जैविक, रेडियोलाजिकल तथा परमाणु (CBRNS) तत्वों (Substances) से सम्बन्धित दुर्घटनायें आदि।

(2) परिवहन आपदायें (Transportation disasters):

(i) हवाई दुर्घटनायें

(ii) सड़क दुर्घटनायें

(iii) रेल दुर्घटनायें

(iv) स्पेस दुर्घटनायें

(v) तेलवाहक जलयानों से तेल का रिसाव तथा आयल स्लिक

(vi) समुद्री यात्रा की दुर्घटनायें

(3) सामाजिक आपदायें (Sociological Disasters):

(i) अपराध

(ii) लूट-मार

(iii) नागरिक उपद्रव (Civil disturbance)

⇒ धरना प्रदर्शन (Demonstration)

⇒ हड़ताल

⇒ दंगा-फसाद (Riots)

⇒ अपराधिक कार्य

⇒ सरकारी व्यवस्था की अवमानना

(4) आतंकवाद की आपदायें (Terrorism Disasters):

(i) राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद / अलगाववाद का आतंक

(ii) राष्ट्र-प्रायोजित आतंकवाद

(iii) धार्मिक आतंकवाद

(iv) वामपंथी आतंकवाद

(v) दक्षिणपंथी आतंकवाद

(vi) अराजकवादी (Anarchist) आतंकवाद

(Vii) साइबर आतंकवाद

(Viii) नार्को आतंकवाद

(5) भीड़ भगदड़ आपदा (Crowd Stampede disaster):

(i) धार्मिक मेला / स्नान/प्रार्थना / अनुष्ठान के समय भगदड़।

उदाहरण: महाकुंभ धार्मिक मेला/स्नान, 2013 (इलाहाबाद), मक्का में धार्मिक भीड़ भगदड़, प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में भगदड़ आदि।

(ii) स्पोर्ट्स आयोजनों के समय भगदड़।

(iii) राजनीतिक बड़ी सभाओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के समय भगदड़।

(6) राजनीतिक एवं धार्मिक आपदायें:

(i) युद्ध, यथा: प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध।

(ii) गृह युद्ध (Civil Wars) यथा: रूसी गृह युद्ध- 1917 से 21, अमेरिकी गृह युद्ध- 1861 से 1865, द्वितीय सूडानी गृह युद्ध- 1562 से 1598, नाइजेरियन गृह युद्ध- 1967 से 1970 आदि।

(iii) धार्मिक युद्ध, यथा: फ्रेंच धार्मिक युद्ध- 1562 से 1598।

(iv) नीति सम्बन्धित आपदायें, यथा: युक्रेन में रूस की होमोलोडोर पॉलिसी के कारण विकट अकाल पड़ने से लगभग 1,000,000 लोग भुखमरी से मर गये चीन की लीप फारवर्ड पॉलिसी के कारण चीन के उत्तरी प्रान्तों में व्यापक भुखमरी से कई मिलियन लोग मौत के शिकार हो गये। भारत में सन् 1942 में बंगाल चावल अकाल से सम्बन्धित ब्रिटिश शासन की नीति के कारण लाखों लोग भुखमरी से मर गये।

(v) नरसंहार (Genocides), जहरखुरानी (Poisioning), नजरबन्दी शिविर (Concentration camps) की आपदायें।

(7) मानव-प्रेरित प्राकृतिक आपदायें (Man-Induced Natural Disasters):

(i) बांध विफलता बाढ़ (Dam Failure floods)।

(ii) जलभण्डार- प्रेरित भूकम्पीय घटनायें (RIS, Reservoir induced seismic events)।

(iii) तीव्र मृदा अपरदन तथा अवसादीकरण (Accelerated soil erosion and sedimentation)।

(iv) प्रदूषण एवं पर्यावरण अवनयन (Environmental Degradation)।

(v) भूमण्डलीय ऊष्मन/तापन तथा जलवायु परिवर्तन।

 प्रौद्योगिकीय एवं औद्योगिक आपदायें

Technological and Industrial disasters

        प्रौद्योगिकीय आपदाओं के अंतर्गत निम्न को शामिल किया जाता है:

(i) औद्योगिक दुर्घटना

(ii) संरचनात्मक विफलता (भवनों का ध्वस्त होना)

(iii) घरों, कारखानों, तथा भवनों में आग लगना

(iv) विद्युत विफलता (Power failure) तथा बिजली संकट

(v) खतरनाक वस्तुओं में विस्फोट (यथा पटाखा दुर्घटना)

(vi) खतरनाक जैविक तत्वों के भण्डारण, रख-रखाव तथा उनके इस्तेमाल के समय जैव प्रयोगशालाओं तथा स्वास्थ्य केन्द्रों में दुर्घटनायें।

(viii) रासायनिक, जैविक, रेडियोलाजिकल तथा परमाणु ( CBRNs) तत्वों (Substances) से सम्बन्धित दुर्घटनायें।

(viii) परमाणु शक्ति संयंत्रों में रियक्टरों का मेल्टडाउन तथा रेडियेशन का रिसाव

औद्योगिक प्रकोप तथा आपदायें:-

       औद्योगिक अवस्थितियाँ (Sites), यथा कारखाने, मिल आदि, सदा दुर्घटना प्रकोप तथा आपदाओं के लिए सुभेद्य (Vulnerable) होती हैं। इन दुर्घटनाओं से मनुष्यों एवं पशुओं की मृत्यु हो जाती है, मानव सम्पत्ति तथा पर्यावरण को भारी क्षति होती है। ये औद्योगिक दुर्घटनायें मानव की असावधानी, लापरवाही तथा नासमझी के कारण ही होती हैं। उल्लेखनीय है कि औद्योगिक उत्पादनों में मशीनों द्वारा कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों (Steps) का संचालन मनुष्य द्वारा ही किया जाता है।

      अतः खनिजों के खनन (Mining), फैन्रीकेशन प्रक्रमण (Processing), भण्डारन (Storage), उत्पादित वस्तुओं के परिवहन तथा वितरण आदि सभी चरणों में मुनष्य का हाथ रहता है। अतः औद्योगिक उत्पादन, खतरनाक पैथोजेन की हैण्डलिंग तथा अन्य खतरनाक तत्वों एवं वस्तुओं के रख-रखाव एवं हैण्डलिंग के प्रत्येक चरण पर जोखिम एवं खतरे की सम्भावना बनी रहती है।

       औद्योगिक प्रकोपों एवं आपदाओं के कई कारक होते है जैसा कि नीचे दिया गया है:

 पदार्थों की स्वयं खतरनाक तथा आपदापन्न प्रकृति, यथा: माइक्रोबायोलाजी प्रयोगशालाओं, अस्पतालों तथा औषधि निर्माण करने वाले कारखानों (Pharmaceutical factories) में पैथोजेन का उपयोग।

 बिजली उत्पादन हेतु परमाणु शक्ति संयंत्रों में परमाणु खनिजों का उपयोग।

 पटाखा निर्माण करने वाले कारखानों में विस्फोटकों (Explosives) का उपयोग।

मानक सुरक्षा एवं बचाव के उपायों का अभाव (खासकर रासायनिक कारखानों, परमाणु शक्ति संयंत्रों, पेट्रो-केमिकल इकाइयों, पाइपलाइन द्वारा प्राकृतिक गैस वितरण आदि में) आदि।

      इस प्रकार औद्योगिक आपदाओं के कारकों को निम्न रूप में व्यक्त किया जा सकता है।

असावधानी के कारण सुरक्षा एवं बचाव के उपायों को नजर अन्दाज करना या जानबूझ कर इन उपायों का अनुपालन न करना।

  बिजली की ढीली फिटिंग, परिणामस्वरूप शार्ट सर्किट होने से आग लगना।

 आवस्थापना की सुविधाओं की विफलता (Failure of infrastructure Facilities)।

 उपकरणों तथा मशीनों की हैण्डलिंग करते समय मानवीय भूल तथा गलतियां या जानबूझ कर आतंकियों द्वारा तोड़-फोड़ (Sabotage) तथा औद्योगिक कार्यों में व्यवधान करना।

 अनिच्छित दुर्घटनायें आदि।

      निम्नलिखित खतरनाक प्रकोप तथा आपदाओं के क्षेत्र हैं, जिनपर अधिक ध्यान केन्द्रित करने तथा देख-भाल की आवश्यकता होती है:

 औद्योगिक प्रतिष्ठान जहां पर अत्यन्त ज्वलनशील तथा विस्फोटक सामग्रियों का महत्वपूर्ण सामरिक उपकरणों के निर्माण करने में उपयोग किया जाता है।

 परमाणु शक्ति, जलविद्युत एवं ताप शक्ति (Nuclear, hydel and thermal power) उत्पन्न करने के स्थान।

 खाद्यान्नों में खनिजों के खनन में डायनामाइट द्वारा ऊपर स्थित चट्टानों को उड़ाने वाले स्थल।

खतरनाक सामग्रियों के स्थल, यथा: मिलिट्री प्रतिष्ठापन (Installation) स्थल, परमाणु भण्डारन स्थल तथा परमाणु अपशिष्टों के निस्तारण स्थल,

खतरनाक सामग्रियों के परिवहन के मार्ग (सड़कें तथा रेल रोड),

 कच्चे पदार्थों के प्राप्ति स्थल, यथा: खदानें (कोयला खदानें, लौह अयस्क खदानें आदि) आदि।

    रासायनिक कारखानों में खतरनाक रसायनों से सम्बन्धित दुर्घटनाओं, परमाणु शक्ति संयंत्रों की दुर्घटनाओं तथा रेडियेशन रिसाव, खदानों आदि की दुर्घटनाओं से सम्बन्धित औद्योगिक आपदाओं, जिनके द्वारा भारी जान-माल की क्षति हुई है, के कतिपय उदाहरणों द्वारा औद्योगिक आपदाओं के खतरों तथा उनसे होने वाली हानियों की व्यापकता को दर्शाया जा सकता है।

भोपाल गैस त्रासदी, 1984

(Bhopal Gas Tragedy)

 भोपाल गैस त्रासदी:

      भोपाल में 2-3 दिसम्बर, सन् 1984 को हुई गैस दुर्घटना प्राण घातक गैसों के रख-रखाव में मनुष्य की असावधानी से उत्पन्न आपदापन्न प्रकोपों का ज्वलंत उदाहरण है। भोपाल स्थित अमेरिकन यूनियन कार्बाइड कारखाने के गैस संयंत्र से 2-3 दिसम्बर (1984) की शीत रात्रि में जहरीली मिक गैस (MIC= Methyle Iso-Cynate) के अचानक फूट निकलने के कारण वायु प्रदुषण की वृहत्तम दुर्घटना घट गयी। आधिकारिक सूचना के कारण इस प्रलयकारी गैस दुर्घटना के कारण कुछ घण्टों में ही 2500 व्यक्ति कालकवलित हो गये जबकि गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार इस दुर्घटना से मरने वालों की संख्या 5000 से अधिक बतायी गयी है।

     भोपाल स्थित इस अमेरिकी यूनियन कार्बाइड कारखाने में कीटनाशी रसायन के निर्माण के लिए मिक गैस का उत्पादन किया जाता था तथा उसका भूमिगत कंटेनरों में भण्डारण किया जाता था। 2-3 दिसम्बर की रात में इन्हीं कंटेनरों से मिक गैस का अचानक रिसाव (लीकेज) प्रारम्भ हुआ तथा यह रिसाव 40 मिनट तक चलता रहा। प्रातः कालीन समीर के प्रभाव से यह जहरीली गैस पुराने भोपाल नगर के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में तेजी से फैल गयी तथा पलक झपकते हजारों लोगों को निगल गयी। इसके अलावा हजारों निवासी इस विषाक्त गैस से बुरी तरह प्रभावित हो गये एवं हजारों जानवरों ने प्राण त्याग दिये।

       इस गैस ने पेय जल, मिट्टियों, तालाबों तथा जलाशयों के जल को बुरी तरह प्रदूषित कर दिया तथा गर्भस्थ शिशुओं (भ्रूणों), नवजात शिशुओं, गर्भवती महिलाओं, बच्चों एवं अबला वृद्ध लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया।

संरचनात्मक विफलता तथा अग्निकांड आपदा

(Structural failure and fire disasters)

     यहां पर संरचना की विफलता का तात्पर्य है मानव-निर्मित स्थायी संरचनाओं, यथा बहुमंजिला भवन, शापिंग माल, सिनेमा हाल, स्पोर्ट्स स्टेडियम, रिहायसी बहुमंजिला एपार्टमेण्ट्स, पुल, फुट ओवर पुल, कार्यालय, शिक्षा भवन आदि का ध्वस्त होना।

     आगजनी का तात्पर्य मानव-निर्मित प्रतिष्ठानों, यथाः मल्टीप्लेक्स, सिनेमा हाल, कार्यालय रिहायसी भवन, शापिंग माल, औद्योगिक प्रतिष्ठान, शिक्षण भवन आदि में विभिन्न कारणों से आग लगने की दुर्घटनाओं से है।

       संरचनात्मक विफलता के फलस्वरूप मानव-निर्मित संरचनायें निम्न प्राकृतिक एवं मानव जनित कारकों द्वारा ध्वस्त होकर भरभरा कर गिर जाती हैं:

प्राकृतिक कारकः

(1) जलवायु की दशायें:

     अत्यधिक आर्द्रता; मेघ प्रस्फोट (Cloud Burst) तथा मूसलाधार वर्षा; वायुमण्डलीय तूफान, यथा: टारनैडो, चक्रवात (ओडिशा तथा आन्ध्र प्रदेश में अक्टूबर, 2013 में फेलिन चक्रवात की घटना), टारनैडो, टाइफून आदि तथा इनसे उत्पन्न बाढ़। इन सबके कारण भवन तथा उनकी नींव (Foundation) कमजोर हो जाती हैं। ज्ञात रहे कि इन कारकों द्वारा मानव-निर्मित केवल लकड़ी, टिन तथा मिट्टी के बने भवन ही ध्वस्त होते हैं।

(2) भ्वाकृतिक दशायें (Geomorphological Conditions):

      धरातल, स्थलाकृति, धरातलीय ढाल, भूपदार्थों की मजबूती / शक्ति (Strength of geomaterials), अवस्थितियां (Locational sites, यथा: तटीय निम्न क्षेत्र, बाढ़ मैदान, तीव्र पहाड़ी ढाल, पर्वत आदि।

(3) भूकम्पीय घटनायें / दशायें (Seismicity):

       भूकम्प की दृष्टि से अधिक क्रियाशील क्षेत्र भवन निर्माण के लिए अत्यधिक सुभेद्य (Vulnerable) होते हैं। बहुमंजिली इमारतें भूकम्पीय झटकों से अत्यधिक प्रभावित होती हैं। कमजोर धरातलीय क्षेत्रों में भूकम्प के साधारण झटकों से ही कमजोर भवन ताश के पत्ते की तरह भरभरा कर गिर पड़ते है।

मानव-जनित कारकः

⇒ भवनों की खराब डिजाइन या स्थापत्य सम्बन्धी त्रुटि (Architectural flaw)।

⇒ भवन निर्माण की सामग्रियों, यथा- सीमेण्ट, रेत, लोहा, ईंट आदि की गुणवत्ता।

⇒ सुरक्षा एवं बचाव के उपायों का अनुपालन।

⇒ बिल्डिंग कोड।

⇒ भवनों का रख-रखाव (maintenance) या अनुरक्षण।

    संरचनात्मक विफलता के कई ऐसे उदाहरण हैं जो भवनों के उनके निर्माण के समय ही ध्वस्त होने को दर्शाते हैं। अर्थात् अपने निर्माण की अवस्था में ही कई भवन भरभरा कर ढह जाते हैं। उदाहरण: अप्रैल 2013 में महाराष्ट्र के थाणे जिला में 7 मंजिला भवन, जिसका बिना सरकारी अनुमति के गैरकानूनी रूप से निर्माण कराया जा रहा था, भरभरा कर गिर गया। इस दुर्घटना में 39 व्यक्ति मारे गये तथा 72 घायल हो गये।

     उस समय राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF- National Disaster Response Force) की टीम ने अतिरिक्त 25-30 लोगों के मलवे में दबे होने की आशंका जतायी थी।

    इसी तरह 2013 में ही महाराष्ट्र में संरचनात्मक विफलता की दुर्घटना सितम्बर महीने में घट गयी। मुम्बई में एक 4 मंजिला रिहायसी (Residential) भवन ताश के पत्ते की तरह भरभरा कर गिर गया, जिस कारण 61 व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी।

    सन् 2013 में ही बांगलादेश में एक 8 मंजिला वाणिज्यिक (Commercial) भवन अप्रैल में ध्वस्त (Collapse) होकर पटरा हो गया (Flattened) जिस कारण 397 व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी तथा 2,500 लोगों को मामूली चोटें लगीं।

    भवनों, पुलों तथा अन्य स्थायी संरचनाओं (यथाः फुटओवर पुल, पैदल मार्ग, बांध, स्ट्रीट वायाडक्ट, टावर आदि) के ध्वस्त होने के प्रमुख कारकों में निम्न को सम्मिलित किया जाता है:

⇒ भवन निर्माण की त्रुटिपूर्ण खराब डिजाइन

⇒ स्थापत्य की त्रुटि (Architectural defects)

⇒ भवन निर्माण की खराब सामग्री

⇒ खराब कार्यकुशलता (Poor Workmanship)

⇒ सुरक्षा मानकों को नजरअन्दाज (Avoidance) करना

⇒ मानक भवन कोड का अनुपालन न करना

     सन् 1995 में दक्षिण कोरिया में खराब एवं त्रुटिपूर्ण भवन डिजाइन के कारण साउथ कोरियन माल का ‘सैम्यूंग डिपार्टमेण्टल स्टोर’ ध्वस्त हो गया, जिस कारण 500 लोगों की बेशकीमती जानें चली गयीं। हजारों लोग घायल हो गये। लगभग 900 ग्राहकों (Shoppers) को गम्भीर चोटें लगीं।

परमाणु रेडियेशन रिसाव आपदा

(Nuclear Radiation leaks disastes)

      परमाणु प्रकोप तथा आपदायें निम्न रूपों में जनित होती हैं:

⇒ युद्ध के समय परमाणु अस्त्रों के उपयोग द्वारा, यथाः द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिकी सेना द्वारा जापान के नागासाकी एवं हीरोशिमा नगरों पर सन् 1945 में एटम बमों के गिराने से उत्पन्न भयानक आपदा।

⇒ परमाणु शक्ति संयंत्रों (Nuclear Power Plants); परमाणु अपशिष्टों के निस्तारण स्थलों (Nuclear Wastes Disposal Sites); परमाणु अपशिष्टों के निस्तारण के समय; परमाणु अस्त्रों के अनुरक्षण (Maintenance) के समय रेडियेशन रिसाव द्वारा।

⇒ परमाणु पनडुब्बियों (Submarines) की दुर्घटनाओं के समय परमाणु तत्वों (Substances) के रिसाव द्वारा।

⇒ रक्षा उद्देश्यों के लिए परमाणु अस्त्रों के परिवहन एवं भण्डारण (Storage) के दौरान दुर्घटनायें होने पर परमाणु रेडियेशन के रिसाव द्वारा आदि।

     परमाणु शक्ति संयंत्रों के रियेक्टरों से रेडिएशन का रिसाव सम्बन्धित क्षेत्र के मानव सहित सभी जीवों के घातक तथा जानलेवा होता है। युक्रेन में चर्नोबिल परमाणु संयंत्र से सन् 1986 में तथा जापान के डयेची फुकुशिमा परमाणु संयंत्र से सन् 2011 में रेडिएशन के व्यापक रिसाव की दो घटनायें विभिन्न उद्देश्यों हेतु एटामिक खनिजों (युरेनियम) के उपयोग से उत्पन्न खतरों की भयावहता तथा परिणाम को भलीभांति प्रदर्शित करती हैं।

     उल्लेखनीय है कि परमाणु ऊर्जा के उत्पादन की उपयोगिता एवं उसकी त्रुटिरहित सुरक्षा को लेकर आम जनता सदा से आशंकित रही है। परमाणु वैज्ञानिकों एवं सरकारों द्वारा सदा से परमाणु ऊर्जा को सर्वाधिक सुरक्षित ऊर्जा संसाधन बताया जाता रहा है, परन्तु परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से रेडिएशन के रिसाव की सम्भवना सदैव बनी रहती है।

     एक प्रसिद्ध भौतिक वैज्ञानिक तथा पर्यावरणविद बेन्जामिन के. सोवाकूल के अनुसार विश्व परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में 99 दुर्घटनायें हुई हैं; सन् 1986 में चर्नोबिल परमाणु संयंत्र आपदा के बाद से 57 परमाणु दुर्घटनायें हो चुकी हैं, इनमें से 57 प्रतिशत दुर्घटनायें अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका में हैं।

युद्ध विषाक्तन एवं नरसंहार आपदायें

(Wars, Poisoning and Genocide Disasters)

        निम्न कारणों के फलस्वरूप आन्तरिक वाह्य संघर्ष, गृहयुद्ध, विभिन्न आयाम (Dimension) के युद्ध, नरसंहार तथा सर्वनाश सम्बन्धी खतरनाक आपदायें उत्पन्न होती हैं:

⇒ परस्पर विरोधी धारायें (Conflicting Ideologies)

⇒ राजनीतिक एवं आर्थिक स्थितियाँ 

⇒ प्रतिद्वन्द्विता (Rivalaries)

⇒ शक्ति सर्वोच्चता (Power Supremacy)

⇒ धार्मिक प्रतिद्वन्द्विता तथा घृणा

⇒ क्षेत्रीय विस्तार की नीति

⇒ आर्थिक विषमता

⇒ संसाधनों को हड़पना (Grabing of resources)

⇒ राजनीतिक नीतियाँ 

⇒ क्रान्तियाँ आदि।

      दो देशों के बीच या विभिन्न देशों के समूहों के मध्य (प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध) संघर्ष एवं युद्ध के दौरान लाखों सेनानियों एवं नागरिकों की पिछले इतिहास में मृत्यु हो चुकी है।

    संघर्षों एवं युद्धों के कारण श्रृंखलाबद्ध समस्यायें पैदा हो जाती हैं, यथाः भारी संख्या में जनहानि (Human Casualties); बड़ी संख्या में शरणार्थी एवं बेघर लोग (Refugees and Homeless); अनाथ बच्चे एवं व्यक्ति; अपंग सैनिक एवं नागरिक; धार्मिक भावना/विद्वेष से प्रताड़ित लोग; खाद्य पदार्थों के अभाव का संकटः रोग तथा बीमारियाँ; महामारियाँ(Epidemics) एवं सर्वव्यापी रोग (Pandemics); जल की कमी; शरण शिविरों, स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाओं, मौलिक तथा आवश्यक सेवाओं का संकट आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक तंत्रों का विघटन (Disruption); धार्मिक एवं जातीय (Ethnic) संघर्ष एवं घृणा आदि।


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10. What do you understand by Soil Pollution? Throw light on its classification, Causes, Effects and Control Measures. (मृदा प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके वर्गीकरण, कारण, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय पर प्रकाश डालें।)

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(मृदा प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके वर्गीकरण, कारण, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय पर प्रकाश डालें।)



       जब मिट्टी में भौतिक और रासायनिक तत्व मिलकर मिट्टी को कृषि के दृष्टिकोण से अनुपयुक्त बना देते हैं अथवा उसका समुचित उपयोग नहीं हो पाता है तो वह मिट्टी प्रदूषित मानी जाती है। मिट्टी के प्रदूषित होते ही वृक्षों की जीवन शक्ति भी घट जाती।

     मृदा प्रदूण से फसलों का रूप- रंग, आकार, प्रारूप, उत्पादन सभी कुछ कुप्रभावित होना स्वाभविक ही है। मिट्टी की प्राकृतिक गुणवत्ता में ह्रास, खरपतवार में वृद्धि और कीटाणुनाशकों का अत्यधिक उपयोग भारत के सन्दर्भ में उल्लेखनीय है। खरपतवार नाशकों का उपयोग अवांछित वनस्पतियों को समाप्त करने के लिए किया जाता है। जिससे मिट्टी को मिलने वाली जीवांश की मात्रा भी भविष्य में घट जाती है। कीटनाशक पदार्थ और औद्योगिक निसृति पदार्थों से बहुत से स्थानों की मिट्टियाँ अम्लीय अथवा क्षारीय हो गयी हैं जिससे वनस्पति जगत प्रत्यक्षतः प्रभवित हुआ है।

    रासायनिक प्रदूषण मृदा के सन्दर्भ में सबसे अधिक भयावह है। औद्योगिक अपशिष्ट मृदा में ऐस खनिज लवणों की मात्रा बढ़ा देते हैं जिससे कोई वनस्पति उगने ही नहीं पाती। साथ ही रासायनिक पदार्थ मृदा में उपस्थित सहजीवी जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं जिससे नाइट्रोजन यौगिकीकरण प्रभावित होता है। एक बार प्रयोग किये गये रसायन अनेक वर्षों तक मृदा में विद्यमान रहते हैं।

      मिट्टी की उपयोगिता और गुणवत्ता में ह्रास, मानवीय एवं प्राकृतिक क्रियाओं का सम्मिलित परिणाम है। यथा वनों का निरन्तर ह्रास, खनन, अनियन्त्रित पशुचारण, भू-क्षरण से बीहड़ भूमि (खड्ड भूमि) का उद्भव हुआ है।

     भारत के विशेष संदर्भ में भू-क्षरण, जलमग्नता (जलाक्रान्त) एवं ऊसर भूमि की समस्या उल्लेखनीय है- देश की कुल कृषि भूमि का 28 प्रतिशत क्षेत्र इन समस्याओं से ग्रसित हैं, वर्षा में औसतन 20 टन मिट्टी प्रति हेक्टेयर वह जाती है। हमारे देश में प्रत्येक वर्ष अनुमानत: 53.340 लाख टन मिट्टी का क्षरण हो रहा है यानि 2800 करोड़ रुपये का नुकसान है।

       इस प्रकार भू-क्षरण एक स्थायी नुकसान है। आज भी भारत की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है। लगभग 70 प्रतिशत लोग तथा 45 प्रतिशत भूमि अप्रत्यक्षतः कृषि में लगी है। यदि इसमें कृषि, कृषक मजदूर, आलिया, व्यापारी, पल्लेदार आदि को भी जोड़ ले तो यह प्रतिशत लगभग 75 पहुँच जाता है। देश के 76 प्रतिशत लोग ग्रामों में रहते हैं, जिनका मुख्य उद्यम कृषि है।

      राष्ट्रीय आय का लगभग 33 प्रतिशत भाग कृषि से ही संबद्ध उत्पाद है। कृषि निर्यात व्यापार में 32 प्रतिशत का योगदान रखता है। यहाँ के प्रमुख बड़े उद्योग कृषि से प्राप्त कच्चे माल पर ही निर्भर हैं। इस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था का मेरूदंड कृषि और बोये गये 14 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में से लगभग 8 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र न्यूनाधिक रूप से भू-क्षरण से ग्रसित है। कृषि भूमि के 60 प्रतिशत भू-भाग को संरक्षण की आवश्यकता है। दुर्भाग्य से जल एवं वायु दोनों के द्वारा मृदा अपरदन हो रहा है।

     जल भू-क्षरण ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों- तिस्ता, हुगली, गण्डक, गंगा, यमुना और चम्बल नदियों के किनारे सर्वाधिक हो रहा है। योजना आयोग के प्रतिवेदन के अनुसार महाराष्ट्र- 138.6, आन्ध्र प्रदेश- 90.9, कर्नाटक- 80.9 तथा गुजरात का 73 लाख हेक्टेयर क्षेत्र अनुपजाऊ हो गया है। गहरे चम्बल के बीहड़ों से लगभग 18 लाख एकड़ भूमि अनुपयोगी हो चुकी है। इसमें से 6 लाख हेक्टेयर भूमि भिण्ड, मुरैना तथा ग्वालियर जिलों में आवास तक के लिये अनुपयुक्त हो गयी है।

       एक इंच मिट्टी को बनाने में प्रकृति को 100 से 500 वर्ष तक लग जाते हैं। नाली कटाव इस प्रकार भविष्य में भूमि उपजाऊ शक्ति, मृदा की किस्म, भूमि-जल स्तर, वनस्पति और कृषि को कुप्रभावित करेगा। गंगा-यमुना के उपजाऊ दोआब से नदियाँ धीरे-धीरे मैदानों में गहरी नालियाँ बनाकर मिट्टी की उर्वरा शक्ति का ह्रास कर रही हैं। दोआब में तीव्र सतही कटाव देखा जा सकता है।

     भारत का लगभग 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र भू-क्षरण से क्षतिग्रस्त हो गया है। इस समस्या से ग्रसित राज्य उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान तथा गुजरात हैं । चम्बल, यमुना, माही, साबरमती और उसकी सहायक नदियों के किनारे लगभग 50 से 60 लाख हेक्टेयर भूमि इससे प्रभावित हुई तथा चम्बल के प्रवाह क्षेत्र के 10 प्रतिशत गाँव उजड़ गये। आशंका है कि भारत कृषि भूमि का एक-तिहाई भाग अगले 20 वर्षों मे भू-भाग समस्या ग्रस्त हो जायेगा।

मृदा प्रदूषण के कारण

(Causes of Soil Pollution)

     जब मृदा अपने मूल स्वभाव वनस्पति जनन में अथवा कृषि कार्य के लिए अनुपयुक्त हो जाती है तो मृदा प्रदूषित कहलाती है। यहाँ मृदा की गुणवत्ता क्षय दो तरह से हो सकता है-

ऋणात्मक क्षय-

      इसमें मृदा के महत्त्वपूर्ण अंग खनिज जल में घुलकर अथवा जीवांश ग्रहणकर निकल जायें जिससे मृदा उपजाऊपन घट जाता है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक कारकों से होती है।

धनात्मक क्षय-

      जब मृदा में कोई विजातीय तत्व मिलकर उसकी गुणवत्ता में अवनयन कर दें। यह मानवीय, नगरीय अथवा औद्योगिक क्रिया-कलाप के परिणामस्वरूप होता है। इस प्रकार प्रदूषण के कारकों को दो वृहद् वर्गों में विभाजित कर सकते हैं-

1. भौतिक कारक,

2. मानवीय कारक।

1. भौतिक कारक- जलवायु एवं भौगोलिक स्थिति में अनुरूप होता है। इसके अन्तर्गत-

(अ) भू-क्षरण,

(ब) जलमग्नता,

(स) कांस घास,

(द) उच्च तापमान।

(अ) भू-क्षरण- इसके दोनों सतही एव नालीदार कटाव में मृदा की ऊपरी परत का क्षरण हो जाता है। नालीदार कटाव से समस्त क्षेत्र “मृत भूमि” में बदल जाता है। जैसे- म. प्र. में चम्बल के बीहड़।

(ब) जलाक्रान्त (जलमग्नता)- जब भू-जल स्तर भू-सतह पर आ जाता है तो स्थायी दलदल हो जाता है और भूमि कृषि के अयोग्य हो जाती है। जैसे उ. प्र. के तराई क्षेत्र।

Soil Pollution

जललग्नता (Waterlogging)

(स) कांस घास- वे ऐसी घास है कि अपने सिवाय किसी और वनस्पति को पैदा नहीं होने देती, साथ ही इसका विस्तार भी तेजी से होता है। इसे उ.प्र. के महोबार जिले में देखा जा सकता है।

कांस घास

(द) अति तापमान- तापमान की न्यूनता तथा अधिकता मृदा में उपस्थित जीवाणुओं के लिए हानिकारक है जिससे उनकी क्रियाशीलता कम हो जाती है और मृदा कृषि के अयोग्य हो जाती है। राजस्थान के मरूस्थल से लगे क्षेत्र बाड़मेर, बीकानेर तथा जैसलमेर जिलों में यह देखा जा सकता है।

2. मानवीय कारक-

       वर्तमान में कृषि और उद्योग यन्त्रीकरण के आधिक्य से अधिकाधिक उत्पादन में लगे हैं। इसलिए कृषि में रासायनिक खादें, कीटानुनाशकों का उपयोग, अत्यधिक सिंचाई के कारण कृषि सह-उत्पादक बढ़ गये हैं। नगरीकरण, औद्योगिकरण, बढ़ती जनसंख्या, प्रति व्यक्ति अधिक उपयोग, व्यर्थ पदार्थ, आधुनिक रहन-सहन के कारण मृदा में अकार्बनिक विषैले यौगिक कीटनाशी एवं कवकनाशी तथा रेडियो सक्रिय अपशिष्ट, परिवहन के साधनों से निकला धुआँ, नगरों से निकले ठोस अपशिष्ट से मृदा प्रदूषित हो गयी है।

(i) कृषि कार्य-

     अवैज्ञानिक, सिंचाई, अत्यधिक जुताई, झूमिंग कृषि, अत्यधिक कीटनाशकों के उपयोग से रासायनिक खादों से मृदा प्रदूषित हो रही है।

(अ) रासायनिक खादों से मृदा अम्लीय अथवा क्षारीय होकर कालान्तर में अनुपयोगी हो जाती है।

(ब) कीटनाशकों के उपयोग से मृदा के मित्र जीव एवं बैक्टीरिया मर जाते हैं। कुछ कीटनाशक दीर्घकाल तक मृदा में रहने से समस्त पारिस्थितिक को कुप्रभावित करते हैं। आर्गेनाक्लोरीन वर्ग के कीटनाशकों का स्थायित्व काल लम्बा होता है। इनके नाम हैं- D.D.T. क्लोरेडेन, आर्सेनिक, यूरिया आदि।

(ii) औद्योगिक कार्य-

     औद्योगिक अपशिष्ट जैसे ताप विद्युत गृहों की राख (फ्लाईऐश), कोयले के कण, नाभिकीय कचरा, रासायनिक कचरा, औद्योगिक कचरा, किसी भी तरह का ठोस जिसका पुनर्चक्रीकरण न हो अथवा देर से हो, मृदा के लिए घातक होता है। औद्योगिक अपजल से मृदा प्रदूषित होती है।

(iii) नगरीय कार्य-

       परिवहन नगरीय अपशिष्ट एवं खनन उत्पाद, सह-उत्पाद तथा अपजल भी मृदा को प्रदूषित करते हैं। परिवहन के साधनों से निकली सल्फर डाइ-ऑक्साइड अम्लीय वर्षा के लिए उत्तरदायी है। सभी प्रदूषण अन्त में जल अथवा मृदा में मिलकर प्रदूषित करते हैं। नगरीय अपजल एवं वाहित मल से मृदा और जल सन्दूषित हो जाये तो ये तत्व मिट्टी की भौतिक दशा को भी बिगाड़ते हैं। वाहित मल-जल के कारण मिट्टी के रन्ध्र अवरूद्ध हो जाते हैं जिससे मृदा बेकार पड़ जाती है।

       खनन के सह उत्पादक तथा खनन अपजल से मृदा में धातुओं की अधिक मात्रा में संचित होने से भूमि प्रदूषित हो जाती हैं। कैडमियम, मरकरी तथा लैड ये तीनों भारी धातुएँ न पौधों के लिए आवश्यक हैं और न ही जानवरों के लिये अर्थात इनकी परिस्थितियों से न केवल मृदा प्रदूषित होती है, समस्त पर्यावरण के लिए हानिकारक है।

      कुछ विषैली धातुएँ यथा- बेरीलियम, कोबाल्ट, निकिल, ताम्र, जिंक, एण्टीमनी, बिस्मथ आदि में मृदा भी जहरीली हो जाती हैं। तेल तथा प्राकृतिक गैस के उत्पादन के साथ-साथ प्रचुर मात्रा में खारा जल निकलता है जो दूर-दूर तक फैल कर भूमि के अन्य जल स्त्रोतों को प्रदूषित करता है।

      संक्षेप में, खानों की खुदाई से मृदा प्रदूषण होना सामान्य बात है अथवा उत्खनन से मृदा अवनयन होता है। जैसे- उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले में ईंटों के निर्माण के कारण भोगतीपुर पुखराया में भूमि अवनयन उल्लेखनीय है।

मृदा प्रदूषण के प्रभाव

(Effects of Soil Pollution)

1. मृदा पर-

       मल-जल से सिंचाई करने पर मृदा में नाइट्रोजन तथा कार्बनिक पदार्थ में वृद्धि होती है किन्तु निरन्तर सिंचाई से मृदा का PH मान, रन्ध्राकाश धनायन अधिशोषण मृदा, पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सामान्य मृदा तथा पौधों द्वारा अवशेषण होता है जो हानिकारक अवस्था में पहुँचती है। जिसमें कैडमियस युक्त जल सिंचाई के लिए अनुपयुक्त है। वाहित मल-जल से सिंचाई करने पर हरी पत्तीदार सब्जियों की और अन्य फसलों की उपज तो अच्छी होगी किन्तु भारी धातुओं के अवशोषण से ये उत्पाद मनुष्यों और पशुओं द्वारा प्रयोग करने पर अस्वास्थ्यजनक होगा। मैंगनीज की अधिक मात्रा पौधों में विषाक्तता के लिए जिम्मेदार है।

2. सतही जल पर-

       प्रदूषित मृदा से सतही तथा भूजल स्त्रोत प्रत्यक्ष प्रभावित होते हैं। अतः प्रदूषित मृदा से जल को भी प्रदूषित करने की धातुओं का आधिक्य तथा संदूषित जल पेय जल को प्रदूषित जल में बदल देगा।

3. भौम जल पर-

      भौम जल एवं प्रदूषण का निकट का संबंध है, जब मृदा प्रदूषित होती है तथा भौम जल में प्रदूषिकों की सान्द्रता 2 से 3 गुना तक हो जाती है। यदि यह क्षेत्र औद्योगिक या नगरीय हुआ तो कैडमियम, क्रोमियम, कोबाल्ट, कॉपर, लौह, लेड, मैंगनीज तथा पारे की उपस्थिति से भौम जल इन धातुओं के प्रवेश से प्रदूषित हो जाता है।

4. वन स्थितियों पर-

       प्रदूषित मृदा जो भारी धातुओं से हुई है। मृदा में इन धातुओं की अधिक सान्द्रता से पौधों की वृद्धि रूक जाती है और कभी-कभी पौधे मर भी जाते हैं। लेड, जिंक, कैडमियम, और ताप की अधिकता से पौधे की वृद्धि इसलिए रूक जाती है क्योंकि पर्णहरित (Chlorophyll) घट जाता है। निम्नलिखित सारणी भी मृदा प्रदूषण के प्रभाव दिखाती है।

मृदा प्रदूषक स्त्रोत एवं वनस्पतियों पर ऋणात्मक प्रभाव
क्रम मृदा प्रदूषक तत्व स्त्रोत प्रभाव
1. कैडमियम (Cd) जिंक उत्पादन, मानव मल- जल, खनन उद्योग, बैटरी, कॉस्मेटिक उद्योग  पर्णरहित घट जाना, वृद्धि रूक जाना, पत्तियों की नसों के मध्य पीले सफेद धब्बे पड़ना।
2. जिंक (Zn) मल-जल एवं संदूषित जल पत्तियों के सिरे मुड़कर मृत होना, पर्णहरित घटना, वृद्धि रूकना, पत्तियाँ सफेद, बौने रूप में आना।
3. क्रोमियम (Cr) औद्योगिक अपजल, खनन तथा संदूषित जल से पत्तियाँ पीली पड़ जाना, प्रारम्भ में उत्पन्न पत्तियों में शुष्क मृत धब्बे पड़ना।
4. मैंगनीज (Mn) वाहित मल जल उपयोग एवं औद्योगिक अपजल से मुड़ी, मृत, पर्णहरित पत्तियाँ,  किनारे मृत युक्त पत्तियाँ।
5. कोबाल्ट (Co) इलेक्ट्रॉनिक उद्योग पतियों पर सफेद मृत धब्बे पड़ना, पत्तियों पर श्वेत मृत धब्बे, असामान्य वृद्धि।
6. निकिल (Ni)
7. मोलिब्डिनम (Mo) खनन से वृद्धि रूक जाना।

5. मानव स्वास्थ्य पर-

        मृदा प्रदूषण में जो धातुएँ अत्यन्त विषैली हैं साथ ही सहज उपलब्ध हैं उनमें बेरीलियम, कोबाल्ट, निकिल, ताम्र, जिंक, टिन, कैडमियम, पारा, लेड, एंटीमनी आदि हैं। मृदा की ऊपरी सतह पर औसतन 0.18 पी. पी. एम. (पार्टस पर मिलियन) कैडमियम पाया जाता है। प्रदूषण की स्थिति में यकृत तथा गुदों में यह जमा हो जाता है। जो गुर्दों में पथरी के लिए उत्तरदायी होता है। यह मटर, मूली, चौलाई आदि के माध्यम से शरीर में पहुंचता है।

      विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि तीसरी दुनिया में होने वाले ढेर सारे रोगों एवं अनपेक्षित मौतों के मूल में जहरीले कीटनाशकों की घातक भूमिका है। सीसा एवं आर्सेनिक संचयी विष हैं। सीसे के विष की अधिकता से उल्टी, शरीर पर एनीमिया जैसे रोग हो जाते हैं। मिट्टी में पहुँचने पर पौधे इसे अधिक मात्रा में अवशोषित कर लेते है। जिससे फलियों पर इनका प्रभाव परिलक्षित होता है जैसे- सेम मटर आदि। पौधे जमीन से मोलिब्डिनम का अवशोषण करते हैं।

     संक्षेप में कह सकते हैं कि पौधों द्वारा विषैली धातुएँ अवशोषित की जाती हैं। इन पौधों को खाद्य में प्रयुक्त करने पर मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव होता है। उ. प्र., बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र राज्यों में कीटनाशकों से सामूहिक मौतें तक हो चुकी हैं।

6. पशुओं पर-

      मल जल संदूषित जल प्रयोग से पशुओं में अनेक रोग फैल जाना स्वाभाविक हैं। पोलीथिन में रखे खाद्य से पशुओं की मृत्यु सामान्य बात है। कृषि अपजल से सतही जल स्त्रोत प्रदूषित होते हैं जिससे जलीय जीवों में मृत्यु भी हो जाती है। कीटाणुनाशक से मृदा में मिले जीव (केंचुआ) जैसे अन्य मित्र जीव, बैक्टीरिया मृत हो जाते हैं। इस प्रकार प्रदूषण से जैव विविधता का ह्रास होता है।

मृदा प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय

(Measures to control soil pollution)


1. भू-क्षरण हेतु वृक्षारोपण- बांध-बंधियां बनाना, समोच्च रेशा के समान्तर, जुताई, सिंचाई करने से भू-क्षरण रुकेगा जलवायु के अनुरूप वृक्षारोपण सबसे कारगर उपाय है।

2. नगरीय उपान्त क्षेत्र- ठोस अपशिष्ट से प्रदूषित हो रहे हैं। इनका वैज्ञानिक उपयोग हो।

3. उर्वरकों का उपयोग मृदा परीक्षण के बाद किया जाये। जैविक खादों का अधिक उपयोग हो।

4. कीटनाशकों का सम उपयोग हो।

5. मल जल संयन्त्रों की स्थापना हो।

6. जैव प्रौद्योगिकी के प्रयोग से मृदा प्रदूषण रूक जाता है। बहुत से पौधे प्रदूषण को पी लेते हैं। पोलीथिन एवं कीटभक्षी का पता लग गया है। केंचुए मनुष्य के मित्र हैं। यह रबड़, प्लास्टिक, कांच एवं धातुओं को छोड़ सभी कार्बनिक गंदगी खाकर उर्वक मृदा बनाता है।

7. गहरी जुताई से कांस भूमि की समस्या हल हो जाती है।

8. मृदा प्रदूषण उचित प्रबन्ध से हल हो सकती है।



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9. What do you understand by Water Pollution? Throw light on its classification, Causes, Effects and Control Measures. (जल प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके वर्गीकरण, कारण, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय पर प्रकाश डालें।)

What do you understand by Water Pollution? Throw light on its classification, Causes, Effects and Control Measures.

(जल प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके वर्गीकरण, कारण, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय पर प्रकाश डालें।)


        जल प्रदूषण से आशय उसमें कोई रंग, गंध, स्वाद या जैविकीय परिवर्तन है जो मानवीय स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है अर्थात् स्वच्छ जल रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, पारदर्शक, जीवाणु, विषाणु रहित होता है। जब इस मूलभूत गुणों में ऋणात्मक परिवर्तन हो जाते हैं, जो मानवीय सहनक्षमता से अधिक हो तो यह प्रदूषण के अन्तर्गत आ जाता है।

        दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि जिसमें अशुद्धियाँ या खनिज इतनी अधिक मात्रा तक मिल गयी हों जो मानवीय स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हो गयी हो अथवा उनकी मात्रा इतनी कम हो जो पर्याप्त पोषक न दे सके तब जल को प्रदूषित कहा जा सकता है।   

गिलपिन के अनुसार, “जल के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक लक्षणों में होने वाले परिवर्तन, जो मनुष्य तथा जलीय जीवों पर हानिकारक प्रभाव छोड़ते हैं।” जल प्रदूषण को अन्य ढंग से भी परिभाषित किया जा सकता है-

1. जल में अनावश्यक पदार्थों का अत्यधिक मात्रा में मिलना जिससे मनुष्य, जन्तु तथा जलीय जीव क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।

2. जल के संघटन (Composition) में कोई विपरीत परिवर्तन होता है जिससे वह उस कार्य के अनुपयुक्त हो जाता है जिस कार्य के लिए प्राकृतिक अवस्था में उपयुक्त होता है।

       जल जीवन्त जगत की आत्मा है। इसके प्रदूषित होते ही समस्त प्राण संकटग्रस्त हो जायेंगे। जल के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में ऐसा परिवर्तन जो उसके स्वरूप, गंध और स्वाद के कारण जन स्वास्थ्य, पशुओं, जल-जीवों तथा वाणिज्यिक, औद्योगिक तथा कृषि कार्यों के लिये हानिकारक हो। यह परिवर्तन जल में सीवर नलिका के मिलने, गैस तरल अथवा ठोस पदार्थों के मिलने से होता है।

      प्राकृतिक जल में किसी बाह्य घुलनशील अथवा अघुलनशील वस्तुओं के मिलने के साथ ही प्रदूषण प्रारम्भ हो जाता है। अर्थात् मानवीय हस्तक्षेप के कारण जल के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में ह्रास हो तो उसे प्रदूषित जल कहते हैं। प्रायः रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, उदासीन, गुणवत्ता वाले जल में जब कोई मानवीय क्रियाओं के कारण विजातीय पदार्थ मिलते हैं तो उसे प्रदूषित जल कहते हैं।

         जल में स्वतः शुद्धीकरण की प्रक्रिया चलती रहती है। जल में उपस्थित विभिन्न प्रकार के जलीय पौधे; जैसे- एल्गी (काई) सूर्य की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण द्वारा पानी में ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं जो जलीय जीव-जन्तुओं और जीवाणुओं के द्वारा अपघटन के कार्यों में प्रयुक्त ऑक्सीजन की क्षतिपूर्ति करते रहते हैं। ऑक्सीजन का उपयोग और उत्पादन में सन्तुलन होने से जल प्रदूषित होने से बचा रहता है किन्तु जब इस सीमा से अधिक विजातीय पदार्थ या कूड़ा-करकट जलागारों में पहुँचता है तो वायुजीवी जीवाणु द्विगुणित होकर पानी में घुलनशील और तैरते हुए कूड़े को हजम करते हुए पानी में घुलित ऑक्सीजन का उपयोग संश्लेषण द्वारा पानी में पुनः ऑक्सीजन घोल देते हैं। इस प्रकार से स्वतः शुद्धिकरण की प्रक्रिया चलती रहती है।

जल प्रदूषण के प्रकार

Kinds of Water Pollution

        विभिन्न आधारों पर इसे वर्गीकृत किया जा सकता है। जैसे- जल गुणवत्ता के आधार पर इसे तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

(1) भौतिक प्रदूषण

(2) रासायनिक प्रदूषण

(3) जैविक प्रदूषण

(1) भौतिक प्रदूषण-

        इसमें जल में भौतिक गुणों में परिवर्तन होता है, जैसे रंग, स्वाद, पारदर्शिता (गंदलापन), गन्ध, विद्युत चालकता एवं सूक्ष्म जीव आदि।

(2) रासायनिक प्रदूषण-

       इसमें जल की अम्लीयता, क्षारीयता, घुलित ऑक्सीजन में परिवर्तित होती है। यह कार्बनिक प्रदूषकों या अकार्बनिक प्रदूषकों या दोनों द्वारा होता है। ये पतनशील और अपतनशील (Non-Biodegradable) दोनों हो सकते हैं। उदासीन अथवा पेय जल का pH मान 7 होता है। जैसे-जैसे यह मान घटता है जल की प्रकृति अम्लीय तथा pH मान बढ़ने पर क्षारीय हो जाती है। पेय जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा 14.5 मिलीग्राम प्रति लीटर (शून्य डिग्री से. पर) से 7.5 मिली ग्राम प्रति लीटर (30°C पर) तक होती है।

         प्रदूषित जल में रासायनिक एवं जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (C.O.D. – Carbon Oxygen Demand और B.O. D. – Biological Oxygen Demand) बढ़ जाती है जो प्रदूषण की मात्रा का सूचक है। कार्बनिक पदार्थों के ऑक्सीकरण के लिये आवश्यक ऑक्सीजन को C.O.D. कहते हैं। सूक्ष्म जीवों द्वारा कार्बनिक पदार्थों के ऑक्सीकरण के लिये आवश्यक ऑक्सीजन को B.O.D. कहते हैं। प्रदूषित जल में ये मांगे बढ़ जाने से घुलित ऑक्सीजन कम हो जाती है।

(3) जैविक प्रदूषण- जीवाणु प्रदूषण को जैविक प्रदूषण कहते हैं जो मनुष्य, पालतू एवं जंगली पशुओं से उत्सर्जित पदार्थों के छोड़े जाने से होता है। जैविक प्रदूषित जल संदूषित होकर जीवों की आँतों में संक्रमित रोग जैसे- दस्त, उलटी (Vomiting), हैजा, आंत्र शोध आदि उत्पन्न करते हैं।

जल प्रदूषण के कारण

Causes of Water Pollution

         मुख्यतः जल प्रदूषण के निम्नलिखित कारण हैं-

(1) प्राकृतिक प्रक्रमों द्वारा,

(2) मानवीय प्रक्रमों द्वारा।

(1) प्राकृतिक प्रक्रमों द्वारा-

         प्राकृतिक प्रक्रमों में सड़ी-गली वस्तुएँ, जीव-जन्तु, वनस्पति पदार्थ जल स्रोत में मिल जाते हैं, जिससे जल की प्रकृति प्रदूषित हो जाती है।

(2) मानवीय प्रक्रमों द्वारा जैसे-

(i) अपमार्जन-

       निवास स्थानों एवं अन्य स्थानों में बर्तन साफ करने में प्रयुक्त पाउडर, कीटाणुनाशक, फिनायल, डिटोल एवं अन्य नहाने में और कपड़े धोने में प्रयुक्त साबुन, अपमार्जक जल के साथ नालियों तथा नालों से होता हुआ तालाबों, झीलों तथा नदियों में पहुँचकर प्रदूषित करते हैं।

(ii) वाहित मल-

       नगरों तथा कस्बों के मकानों से निकला मल-मूत्र, कूड़ा-करकट आदि नालियों तथा नालों द्वारा नदियों, तालाबों और झीलों में डाल दिया जाता है जिसके फलस्वरूप जल प्रदूषित हो जाता है। दिल्ली में यमुना और भोपाल में छोटी झील का जल मानवीय उपयोग का नहीं रहा है। आगरा, कानपुर और पटना में भी यही हाल है।

(iii) कृषि उपयोगी पदार्थों का जल में मिलना-

        अधिक उपज लेने हेतु जब खेतों में कीटनाशी, कवकनाशी, खरपतवार नाशी तथा उर्वरक मिलाये जाते हैं तो इन पदार्थों का अधिकांश भाग मिट्टी में मिल जाता है, जो कि अंतत: बहकर नदी-नालों में पहुँच जाता है तथा कल-कारखानों से निकलने वाले जल में अनेक प्रकार की कार्बनिक तथा अकार्बनिक अशुद्धियाँ विद्यमान रहती हैं। यह जल नदियों में डाल दिया जाता है जिससे नदियों का जल प्रदूषित हो जाता है।

(iv) ईंधनों का जल में मिलना-

         भिन्न प्रकार के ईंधनों जैसे- कोयला, पेट्रोल, डीजल आदि के जलने से कई प्रकार की विषैली गैसें निकलती हैं जो वर्षा जल में घुलकर नदियों, तालाबों व झीलों में पहुँचकर जल को प्रदूषित करती हैं।

(v) रेडियोधर्मी पदार्थ-

        रेडियोधर्मी पदार्थ ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इस प्रक्रम में जल की अत्यधिक आवश्यकता होती है। उपरोक्त प्रक्रम से निकलने वाले विकिरण जल में घुल जाते हैं तथा प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। इसके साथ-साथ समुद्री जल में भी नाभिकीय विस्फोट किये जाते हैं। इससे अनेक प्रकार के घातक विकिरण निकलते हैं जो कि जल को प्रदूषित करते हैं।

(vi) जल का शोधन करने में-

      अशुद्ध जल को शुद्ध जल बनाने हेतु विभिन्न प्रकार के विषैले रासायनिक यौगिक मिलाये जाते हैं। यदि ये यौगिक अधिक मात्रा में मिला दिये जायें तो भी जल प्रदूषित हो जाता है।

जल प्रदूषण के प्रभाव 

Effect of Water Pollution

 1. पेड़-पौधों पर प्रभाव-

     यदि खेतों की सिंचाई प्रदूषित एवं संदूषित जल से की जाए तो पौधे संदूषित हो जाते हैं अर्थात् रोगग्रस्त हो जाते हैं जिसके फलस्वरूप उनके विकास व वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यदि मनुष्य या जीव-जन्तु इन प्रदूषित पौधों को या इनके फलों को लें तो स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

2. जीव-जन्तुओं पर प्रभाव-

     यदि जल प्रदूषित होता है तो उसमें ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जिसके फलस्वरूप उसमें पलने वाली मछलियाँ या अन्य जीव-जन्तुओं पर घातक प्रभाव पड़ता है तथा उनकी मृत्यु तक हो सकती है। जब नदी, तालाब आदि के जल में निलम्बित पदार्थ तली में बैठ जाते हैं तो शैवाल तथा जड़ वाले पौधे नष्ट हो जाते हैं।

3. पारिस्थितिक तत्व पर प्रभाव-

      चूँकि प्रदूषित जल के सेवन से पेड़-पौधे, जीवन-जन्तु, मनुष्य सभी कुप्रभावित होते हैं। अतः पारिस्थितिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। इससे पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है। जैसे- वर्षा समय पर न होना, अधिक गर्मी या सर्दी का होना जिससे समस्त जल परितंत्र और जलचक्र प्रभावित हो जाता है। मध्य प्रदेश की न्यूनतम प्रदूषित नर्मदा नदी में रायसेन जिले की फैक्टरी से निकले रसायन युक्त जल के कारण विगत् वर्षों में मछलियाँ मरी थीं। म. प्र. की सबसे प्रदूषित नदी सोन है। उसके जल से वनों पर संकट उल्लेखनीय है।

4. मनुष्यों पर प्रभाव-

       यदि मनुष्य प्रदूषित जल का सेवन करता है तो वह विभिन्न प्रकार के रोगों; जैसे- हैजा, पेचिश, पीलिया, टायफाइड, पक्षाघात, पोलियो आदि से ग्रसित हो जाता है। विषैले धातुयुक्त जल के सेवन से हृदय, गुर्दा, फेफड़े, मस्तिष्क आदि के रोग हो जाते हैं। रेडियोधर्मी पदार्थों से कैंसर, अपंग सन्तानें उत्पन्न हो जाती हैं।

       जल में लोहा, मँगनीज, नाइट्रेट, आर्सेनिक, क्रोमियम, पारा, सीसा, फ्लोराइड, डी.डी.टी., एल्ड्रिन, डाइएल्ड्रिन, हेप्टाक्लीन, बी. एच. सी. और एंडोसल्फान आदि हानिकारक तत्व पहुँचने लगे हैं। इनके लगातार अधिक मात्रा में प्रयोग से चर्मरोग, हैजा, आंत्रशोध, टायफाइड, पीलिया, गैस्ट्रोएण्यइटिस, ब्लू बेबी रोग, अस्थि, गुर्दे, यकृतीय एवं स्नायुतन्त्रीय सम्बन्धित बीमारियाँ आदि प्रमुख रूप से पायी जा रही हैं। एक अनुमान के अनुसार अशुद्ध जल की वजह से 10,500 गाँवों में लगभग 1 करोड़ 22 लाख लोग आर्थराइटिस (जोड़ों का दर्द) नामक बीमारी से 5 करोड़ वयस्क एवं बच्चे अन्य जलजन्य बीमारियों से पीड़ित हैं।

       देश में प्रदूषित जल के सेवन से होने वाले रोगों के कारण 7 करोड़ 30 लाख जीवन नष्ट हो रहे हैं। बीमारियों के इलाज में 1600 करोड़ से भी अधिक रूपये खर्च हो रहे हैं। विश्वभर में अशुद्ध जल का सेवन करने वाले लगभग 18 प्रतिशत अर्थात् 1 अरब 10 करोड़ लोग हैं। इसी कारण विश्वभर में लगभग 62 प्रतिशत मौत प्रदूषित जल के सेवन से हो रही है।

       विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) के अनुसार स्वच्छ जल उपलब्ध होने पर 50 प्रतिशत अतिसार एवं 90 प्रतिशत तक हैजा में कमी लायी जा सकती है। अर्थात् भारत में होने वाली दो-तिहाई बीमारियाँ प्रदूषित जल से होती हैं। पेय जल के साथ रोगवाहक बैक्टीरिया, वायरस, प्रोटोजोआ एवं कृमि मानव शरीर में पहुँचकर हैजा, टायफाइड, पेचिस, पीलिया, अतिसार, एक्जीमा, जियार्डियता, नारू, एकाकायलो, स्टोमियरा, सटाजिवाईडियोसिस, लेप्टोस्पाइरोसिस जैसे भयंकर रोग उत्पन्न करते हैं।

5. घटते जल संसाधनों पर प्रभाव-

       औद्योगिक एवं नगरीय अपशिष्ट से आज कुमायूँ, हिमालय की सबसे बड़ी झील, ताल (नैनीताल) म. प्र. का भोपाल ताल सिकुड़ रहे हैं। छोटी झीलें व तालाब गाद जमाव से जल क्षेत्र घट रहा है। अकेले कर्नाटक में 25,000 झीलें में से अब मात्र 10,000 तक सिमट कर रह गयी हैं। उत्तरांचल में पर्यटन में प्रमुख स्थान रखने वाले नैनीताल की प्रसिद्ध साल्ट लेक जो 80 वर्ग किमी. में फैली थी, वर्तमान में आधी से भी कम रह गयी है।

       इसी प्रकार बंगलौर में 262 में से 181 तालाब सूख चुके हैं और मैसूर में 25 तालाब और झीलों में मात्र 10 हजार ही शेष बचे हैं। देश के अन्य स्थानों पर भी तालाबों, झीलों तथा अन्य वर्षा जल संग्रहकर्ता दयनीय स्थिति में हैं। पूरे देश में तालाबों, झीलों, पोखरों आदि की परम्परा को पुनर्जीवित करना बहुत आवश्यक है।

जल प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय

Control measures of water pollution

       भारत सरकार ने जल प्रदूषण नियंत्रण एवं संरक्षण कानून सन् 1974 में बनाया, किन्तु अशिक्षा, स्वार्थपरता, अनिवार्य आर्थिक विकास एवं जनसंख्या में वृद्धि के कारण जल प्रदूषित हुआ। रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, सस्ता सहज उपलब्ध जल प्रकृति के इस उपहार की प्राकृतिक गुणवत्ता संरक्षित करने के निम्नलिखित उपाय हैं:

1. प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण-

       प्रदूषण पैदा करने वाले कारखानों, उद्योगों पर कानून का कठोर नियंत्रण अनिवार्य है जो प्रकृति प्रदत्त पर्यावरण को प्रदर्शित करते हैं अथवा औद्योगिक अपजल ओर अपशिष्ट बिना उपचार के नदियों और तालाबों में छोड़ते हैं। अतः प्रदूषण स्रोत पर ही नियंत्रण अपरिहार्य हो जाता है। जिस तरह एक उद्योगपति उपचार संयंत्रों में व्यय राशि को उत्पादित मूल्य में जोड़ता है और उद्योगपति उपचार पर व्यय नहीं करते वे बाजार में तुलनात्मक रूप में सस्ते दामों पर उत्पाद बेचता है। परिणामस्वरूप स्वार्थी उद्योगपति अधिक लाभ पा जाते हैं। अतः सभी पर कठोर नियंत्रण होना चाहिये। विगत दशकों में आर्थिक विकास को बहुत अधिक बल दिया गया है।

      अत: जब औद्योगिक कचड़ा एवं नगरीय संदूषित अपजल उपचार के बाद ही जलागारों में मिलाये जाने पर ध्यान देना होगा। समय-समय पर औद्योगिक अपजल का परीक्षण होना चाहिये। संदूषित जल में मैथागोनिक बैक्टीरिया से पेयजल स्रोतों को दूर रखने के लिये उपचारित जल में क्लोरिन मिला देनी चाहिये। वरना ये मुख्य नदी के जीव और वनस्पति की भी कुप्रभावित करेंगे।

2. जनमानस की जल प्रदूषण के प्रति जागरूकता पैदा करना-

     रेडियो, टेलीविजन, समाचार पत्र-पत्रिकाओं एवं विभिन्न विज्ञापनों के माध्यम से जल प्रदूषित होने के कारण और उनके कुप्रभावों को विज्ञापित करते रहना चाहिए। प्राथमिक पाठशालाओं, विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में शोध परिचर्चा, संगोष्ठी, कार्यशालाओं एवं प्रदर्शनी के माध्यम से आगत पीढ़ी में जागरूकता उत्पन्न करनी चाहिए।

3. प्रदूषक जन्य कारकों से रक्षा-

      नगरीय क्षेत्रों में सघन जनसंख्या के सैप्टिक टैंकों से प्राप्त संदूषित जल के शोधन हेतु प्रति 6 मिलोमीटर पर उपचार केन्द्र हों, ताकि मल-जल उपचारित होने पर ही मुख्य जल स्रोतों से मिल सकें। यदि विभिन्न केन्द्र से थोड़ी मात्रा में अपजल मिलता है तो नदी स्वशुद्धकरण क्षमता के कारण थोड़ी दूर जाकर शुद्ध हो जाती है। यदि बड़ी मात्रा में नगरीय अपजल प्राप्त हुआ तो बड़ी नदियाँ भी प्रदूषित हो जाती हैं। जैसे बिहार में गंगा नदी के साथ हुआ। इसलिये बड़ी मात्रा में नगरीय क्षेत्रों में मल-जल शोधन केन्द्रों की स्थापना अनिवार्य है। नहीं तो गंगा जैसी नदयाँ भी जीवाणु प्रदूषित हो जाती हैं।

4. प्रदूषण निवारण हेतु नयी तकनीकी के विकास से-

       सीवेज वाटर को पेयजल में बदला जा सकता है। फायनेंशियल टाइम्स लन्दन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार,  आस्ट्रेलिया की एक कम्पनी मेमटेक ने एक पर्यटक नगर के समुद्र तट को साफ स्वच्छ कर दिया है और दावा किया है कि उसने जो माइक्रो फिल्ट्रेशन तकनीक विकसित की है, उससे मल कीचड़युक्त जल न केवल उद्योगों में पुनः काम में लिया जा सकेगा, वरन् उससे बाग-बगीचे भी सींचे जा सकेंगे और उसका पेयजल की तरह उपयोग भी हो सकेगा ही नहीं यह पेयजल उन सारे बैक्टीरिया और वायरस से मुक्त होगा, जो हम आज पानी के साथ पी रहे हैं। कीचड़ अलग निकलेगा, वह खेतों के लिए उपयोगी और उपजाऊ खाद देगा।

       उल्लेखनीय है कि ऐसी ही जल शुद्धिकरण प्रक्रिया से जापान में गोल्फ के मैदान और बाग-बगीचे कई वर्षों से सींचे जा रहे हैं। जापान में यह भी प्रयोग किया गया कि अपजल को घुमावदार रास्तों से लाकर नदी में या खेतों के मध्य में मिलने दिया जाये, जिससे प्रदूषण का 50 प्रतिशत भाग कम हो गया। इस विधि का प्रयोग सस्ता, सरल और सुगम है। इस प्रकार की योजनाएँ भागोल के छात्र स्थानीय परिवेश के अनुसार सरलता से सुझा सकते हैं।

        इसको क्रमशः तीव्र ढंग से किया जा सकता है।

(i) शुद्धिकरण क्षमता का उपयोग-

        घरेलू अपजल को घुमावदार लम्बे मार्गों से ले जाने पर धूप, हवा, मिट्टी, पेड़ पौधे, जीव-जन्तु भी जल को शुद्ध करते हैं। साथ ही प्रदूषण स्रोत से दूर जाने पर जल को स्वयं शुद्धिकरण क्षमता के कारण प्रदूषण घटते घटते समाप्त हो जाता है। अतः संदूषित जल को घुमावदार मार्गों से ले जाकर जलाशयों में छोड़ना चाहिये।

(ii) ऑक्सीजन ताल-

        मल जल की गन्दगी को शैवाल द्वारा खुले तालाबों में प्रविष्ट कराया जाता है। इन तालाबों को ऑक्सीकरण या निरीक्षण ताल कहते हैं। इन तालाबों में गन्दे जल को भरा जाता है जिससे ठोस निलम्बित कण बैठ जाते हैं। इन कृत्रिम तालाबा मे विषाक्त पदार्थों को रासायनिक विधि से तथा कार्बनिक पदार्थों को जीवाणुओं की क्रिया द्वारा विघटित कराते हैं। यह ऑक्सीकरण द्वारा किया जाता है। ऑक्सीजन की आवश्यकता की पूर्ति कृत्रिम विधियों से की जाती है। इसमें हरे शैवालों का उपयोग होता है जो जल में प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं। यह कार्य जीवाणु और शैवाल की सहजीविता द्वारा सम्पन्न होता है।

(iii) शैवाल का पृथक्करण-

       जल में नीला थोथा (कापर सल्फेट) मिलाने से शैवाल नष्ट हो जाते हैं। सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति में भी शैवाल की वृद्धि रूक जाती। अतः जल को सार्वजनिक उपयोग हेतु ढक कर रखा जाता है।

5. जल की किस्म का परीक्षण एवं पेय जल स्रोत का चयन-

        इस सन्दर्भ में भूगोल का विद्यार्थी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकता है। सतही जलागारों को पानी की किस्म के अनुसार अ, ब, स और द वर्गों में विभाजित कर सकते हैं ताकि उन जलागारों का अनुकूल उपयोग सम्भव हो सके। जल की किस्म का परीक्षण होने से वैज्ञानिक और स्थानीय जनता बचाव के साधन खोज सकती है। पेयजल स्थानों के चयन नदी की ऊपरी धारा से किये जाने चाहिए वृक्षारोपण जल प्रदूषण का एक प्रभावी उपाय है। पारिस्थितिक संतुलन में वृक्षों की भूमिका अहम् है। वनस्पतियों में काई से लेकर बड़े वृक्ष तक प्रदूषण मुक्ति में सहायता करते हैं।

       वैज्ञानिक प्रमाणित कर चुके हैं कि वायु, ध्वनि, मृदा और जल प्रदूषण को वृक्ष रोकते हैं, अन्य उपायों में कीटाणुनाशकों का न्यूनतम उपयोग, शहरों में सीवर की सुविधा और शैवाल जल के ऐसे पौधे हैं जो जल को शुद्ध रखन में सहायक होते हैं। ऐसे शैवालों को जल में बढ़ने देना चाहिये।

      प्रदूषण की रोकथाम के लिये नाभिकीय विखण्डन, मृत जीव-जन्तुओं को नदी में बहाने और धार्मिक उत्सवों में निस्त पूजा सामग्री को विसर्जित करने पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिये। इसके साथ दो नगरों एवं कस्बों के मकानों से निकलने वाला मल-मूत्र तथा कूड़ा-करकट सड़, गल कर कम्पोस्ट खाद में परिवर्तित हो जाता है जिसे खेतों में खाद के रूप में डालना अधिक हितकारी होगा। घरों, उद्योगों आदि से निकलने वाले अपमार्जन पदार्थ तथा विषैले पदार्थों को नदियों, तालाबों, झीलों आदि में डालने से पूर्व शुद्ध करना चाहिये। इस प्रकार जल प्रदूषण की रोकथाम हो सकती है। इस दिशा में शासन द्वारा कार्य प्रारम्भ किया गया है।

6. जैव नियंत्रकों की खोज-

        अभी हाल में ही आस्ट्रेलिया के डेविड वूर्ने ने नदी के पानी में रिफन्गोमोनास वंश के एक ऐसे जीवाणु की खोज की है जिससे तीव्र एन्जाइम्स बनते हैं। एक एन्जाइम्स जिसे माइक्रो सिस्टेम नाम दिया गया है, की आकृति बदलकर मारक क्षमता प्रदान करता है। आस्ट्रेलिया के लोग इस जीवाणु की उत्पत्ति प्रदूषित जल को साफ कराने हेतु कर रहे हैं।

       जैव प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत कछुआ प्रदूशित जल को साफ करने में भविष्य में उललेखनीय भूमिका निभाएँगे तथा चम्बल के कछुए प्रदूषित गंगा के जल को श्री शुद्ध करने के लिये भेजे जाने की योजना है क्योंकि कछुए पानी को साफ करते हैं। चम्बल का जल इन्हीं कछुओं के कारण शुद्ध रहता है।

7. अपशिष्ट उपचार (Waste Treatment)-

      प्रदूषित जल में उपस्थित अपशिष्ट पदार्थों के उपचार परम्परागत तरीके से काफी खर्चीले हैं। नीरी NEERI (नागपुर) के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जो कम व्यय पर उच्च क्षमता रखती है, जैसे- घरेलू अथवा औद्योगिक अपशिष्ट को उथले तालाब में कुछ दिनों के लिये रखते हैं जिससे जीवाणु तेजी से कार्बनिक अपशिष्टों को नष्ट कर देते हैं। इस प्रका यह जल सिंचाई के लिए प्रयुक्त हो जाता है।



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8. What do you understand by Air Pollution? Throw light on its classification, Causes, Effects and Control Measures (वायु प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके वर्गीकरण, कारण, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय पर प्रकाश डालें।)

8. What do you understand by Air Pollution? Throw light on its Classification, Causes, Effects and Control Measures.

(वायु प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके वर्गीकरण, कारण, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय पर प्रकाश डालें।)



        वायु प्रदूषण से आशय वायु में प्रदूषक तत्व ठोस, द्रव अथवा गैसीय रूप में इस सीमा अथवा इस सान्द्रता तक मिल जायें जो मनुष्य, जीव-जन्तु, वनस्पति, सम्पत्ति के लिए हानिकारक हो, साथ ही प्रदूषक तत्व मानवीय स्वास्थ्य एवं क्षमता पर विपरीत प्रभाव छोड़े, उसे वायु प्रदूषण के अन्तर्गत माना जाता है।

     दूसरे शब्दों में, “वायु प्रदूषण से आशय वायु का प्राकृतिक गुणवत्ता में प्रतिकूल परिवर्तन है। वायु के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों में ऐसा कोई भी ऋणात्मक परिवर्तन या ह्रास जिसके द्वारा स्वयं मनुष्य तथा अन्य जीव-जन्तुओं के जीवन, परिस्थितियों, औद्योगिक प्रक्रमों तथा सांस्कृतिक सम्पत्ति को हानि पहुँचे, वायु प्रदूषण कहलाता है।”

पार्किन्स हेनरी के अनुसार, “वायुमण्डल में गैसें निश्चित मात्रा तथा अनुपात में होती हैं। जब वायु अवयवों में अवांछित तत्व प्रवेश कर जाते हैं तो उनका मौलिक संगठन बिगड़ जाता है। वायु के दूषित होने की यह प्रक्रिया वायु प्रदूषण कहलाती है।” वायुमण्डल में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन (N2), 21 प्रतिशत ऑक्सीजन (O2) तथा 0.03 प्रतिशत (CO2) शेष निष्क्रिय गैसें हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, “वायु प्रदूषण एक ऐसी स्थिति है जिसमें बाह्य वातावरण में मनुष्य और उसके पर्यावरण को हानि पहुँचाने वाले तत्व सघन रूप से एकत्रित हो जाते हैं।”

“वायु प्रदूषण उन परिस्थितियों तक सीमित रहता है जहाँ बाहरी परिवेशी वायुमण्डल में दूषित पदार्थों अथवा प्रदूषकों की सान्द्रता जीवों को हानि पहुँचाने की सीमा तक बढ़ जाते हैं।”

प्रदूषक- हमारे द्वारा उपयोग में लाये गये पदार्थों के अवशेष या बनाये गये पदार्थ पर्यावरण को किसी न किसी प्रकार प्रदूषित करते हैं। ऐसे पदार्थों को प्रदूषक कहते हैं। वायु प्रदूषकों को उनकी उत्पत्ति, रासायनिक गठन, प्रदूषक स्रोतों के आधार पर तीन प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है।

वायु प्रदूषण का वर्गीकरण (Classification of Air Pollution)

1. उत्पत्ति के आधार पर- 

              उत्पत्ति के आधार पर वायु प्रदूषकों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(क) प्राथमिक प्रदूषक- वे प्रदूषक हैं जो लम्बी प्राकृतिक एवं कृत्रिम प्रक्रियाओं द्वारा उत्पन्न होकर सीधे वायुमण्डल में जा मिलते हैं जैसे कार्बन डाइ-ऑक्साइड, सल्फर ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य हाइड्रोकार्बन।

(ख) द्वितीयक प्रदूषक- वे हैं जो प्राथमिक प्रदूषकों के साथ वातावरण के अन्य तत्वों से प्रतिक्रिया करके कुछ यौगिक बनाते हैं और क्षेत्र को गहन प्रदूषित क्षेत्रों में परिवर्तित कर देते हैं। उदाहरणार्थ- सल्फर डाइ-ऑक्साइड वर्षा ऋतु में जल वाष्प से मिलने पर गन्धक का अम्ल बनाकर अम्लीय वर्षा करके समस्त पर्यावरण को अत्यधिक क्षतिग्रस्त करती है।

2. रासायनिक गठन के आधार पर-

        वायु प्रदूषकों को रासायनिक गठन के आधार पर निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है-

(क) कार्बनिक प्रदूषक- जैसे- कार्बन, हाइड्रोजन, परागकण आदि।

(ख) अकार्बनिक प्रदूषक- जैसे- नाइट्रोजन, सल्फर, धातुकण आदि।

3. प्रदूषक स्वरूप के आधार पर-

           वायु प्रदूषकों को उनके स्वरूप के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

(क) सूक्ष्म लम्बित कण,

(ख) वाष्पीय,

(ग) गैसीय प्रदूषक।

(क) सूक्ष्म लम्बित कण या कणिकाएँ-

        यह विभिन्न पदार्थों के सूक्ष्मतम कण हैं, जो वायुमण्डल में नयूनतम भार के कारण वातावरण में लटके रहते हैं। जैसे- धूल, ज्वालामुखी राख, धुँआ, फ्लाईऐश आदि विभिन्न कार्बनिक पदार्थ जलने से तथा अधजले ईंधन से खनिज पदार्थों के सूक्ष्म कण जो वायु में लटके रहते हैं। इन कणों की अधिकता पर्यावरण को प्रदूषित करती है। अर्द्धजलित ईंधन, वेंजोपाइरिन जो कारसैनोजैनिक (कैंसर कारक) पदार्थ है। यह कैंसर कारक पदार्थ हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में विगत दशकों में सर्वाधिक पाया गया था। भारतवर्ष में मुम्बई में यह सर्वाधिक है जहाँ यह 30 U.G./M3 हैं। जबकि निर्धारित मात्रा 200 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है।

      दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई आदि मेट्रोपोलिटन शहरों में डीजल, ईंधन दहन से भी अतिरिक्त कार्बनिक पदार्थ वायुमण्डल में सुबह-शाम बड़ी मात्रा में मिलते हैं। सूक्ष्म लम्बित कणों की अधिकता से वातावरण धुंधला हो जाता है और परस्पर दृश्यता घट जाती हैं जो वायु परिवहन को कुप्रभावित करती है। कोयला, चूना और अन्य खनन प्रक्रियाओं से वातावरण में सूक्ष्म कणिकायें संख्या में बढ़ जाती हैं। वातावरण में इनकी अधिकता से कोहरा, धुंध आदि भी अधिक गहन होती है। इन कणों की अधिकता से वस्त्रों, घरों एवं शारीरिक स्वच्छता पर भी अधिक व्यय होता है।

        कानपुर, भिलाई, सतना, मैहर आदि में यह व्यय स्पष्ट दिखाई देता है। म. प्र. की खुली खदान, कोयला उत्पादन क्षेत्र सिंगरौली एवं जयन्त कालरी की उड़ी धूल के प्रदूषित क्षेत्र में आम और नींबू के उत्पादन में विगत 8-10 वर्षों में कमी हो गई है। इसी प्रकार चूना भट्टी क्षेत्र एवं सीमेंट, औद्योगिक क्षेत्रों (सतना, मैहर) में मिट्टी, जल एवं हवा की प्राकृतिक गुणवत्ता में ऋणात्मक परिवर्तन या ह्रास हुआ है जो वनस्पति में ह्रास से प्रमाणित होता है। दिल्ली में धूल (लम्बित कणों) की मात्रा सर्वाधिक 700 U.G/M3 है।

      भारत में ग्रामों, कस्बों में भी सुबह-शाम धूल कणों की मात्रा रहती है। जबकि न्यूयार्क, लन्दन और पश्चिमी देशों में तुलनात्मक दृष्टि से लम्बित कणों की मात्रा कम है।

(ख) वाष्प-

       सामान्यतः द्रव या ठोस में पाये जाने वाले पदार्थ की गैसीय अवस्था वाष्प कहलाती है। उदाहरणार्थ नन्हीं-नन्हीं जल की बूंदें (Droplets), कोहरा (Fog), धूम्र (Smoke) तथा ओस जल के वाष्पीय रूप का संघनन है।

(ग) गैस-

      द्रव्य की तीन अवस्थाओं में से यह एक है जिसका कोई स्वतंत्र आकार तथा आयतन नहीं होता तथा फैलने की असीमित क्षमता रखती हैं, वह गैस कहलाती है। पारिस्थितिक संतुलन के लिए सभी गैसों का प्राकृतिक रूप निर्धारित मात्रा में पाया जाना अति आवश्यक है, उपयोगी है। इसके विपरीत इनकी मात्रा में अधिकता अथवा न्यूनता दोनों ही घातक हैं।

(i) सल्फर डाइ-ऑक्साइड (SO2)-

        कोयला, कोक या तैलीय ईंधन के रूप में जलाये जाने पर यह गैस बड़ी मात्रा में निकलती है। अनुमानतः 100 टन कोयला जलाने पर 3 टन सल्फर डाइऑक्साइड उत्पन्न होती है। गन्धक युक्त ईंधन के दहन से 78 प्रतिशत गैस, कोयले से 18 प्रतिशत, तेल तथा अनेक औद्योगिक प्रक्रियाओं से शेष 4 प्रतिशत उत्पन्न होती हैं। तापीय विद्युत गृहों जैसे मिर्जापुर तापीय विद्युत गृह में 9000 मीट्रिक टन कोयला प्रतिदिन प्रयुक्त होता है। इससे 45 से 182 मीट्रिक टन सल्फर डाइ-ऑक्साइड निकटवर्ती पर्यावरण में प्रतिदिन मिलती है। इसके निकटवर्ती क्षेत्र में इसके प्रभाव से डोलोमाइट चट्टानें शीघ्रता से अपरक्षित हो रही हैं। तापीय विद्युत गृह के अति निकट की वनस्पति में पर्णहरित (क्लोरोफिल) की मात्रा कम गयी है तथा पत्तियों के नुकीले सिरे मुड़कर सूख गये हैं।

      इस गैस के प्रभाव से पेड़-पौधों की पत्तियों के किनारे तथा मध्य शिरा का स्थान सूख जाता है और इसकी मात्रा अधिक हुई तो पेड़-पौधों की कोशिकाएँ मर जाती हैं। आम के वृक्षों पर इसका प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। साथ ही यहाँ की मिट्टी भी अम्लीय हो गयी है। जिससे मिट्टी में खनिज तत्व असंतुलित हो गया है। अपघटन की प्रक्रिया बाधिक हो गयी है और अति अम्लीय मिट्टी एवं दलदली क्षेत्रों में अपक्षय की प्रक्रिया तीव्र हो गयी है। अम्लीयता की इस वृद्धि के फलस्वरूप प्रकाश को कम करती है जिससे कृषि जगत को हानि पहुँचती है। अत: संक्षिप्त में कह सकते हैं कि यह एक विषैली गैस है। आँख, नाक, गले में खराश तथा श्वसन रोगों की वृद्धि करती है। दमा, ब्रोंकाइटिस जैसे रोगों को बढ़ाती हैं। इसलिए महानगरीय भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में चिकित्सक के आँखों में जलन न हो इसीलिए वाहन चालकों को चश्मा लगाने की सलाह देते हैं। इसमें निहित बेन्जोपाइरीन कैंसर जैसी भयानक बीमारियों को जन्म देती है।

(ii) कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO)-

         75 प्रतिशत कार्बन मोनोऑक्साइड परिवहन के साधनों से विशेषकर पेट्रोल इंजन से निकलती है। जीवाश्म ईंधन के अधूरे जलने पर यह अधिक मात्रा में उत्पन्न होती है जैसा कि मोटर वाहनों में प्रायः देखने को मिलता है। विगत दशकों में मोटर गाड़ियों तथा स्कूटर्स की महानगरीय क्षेत्रों में इतनी अधिक वृद्धि हुई है कि इनका कुप्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होने लगा है। कार्बन मोनोअक्साइड की थोड़ी मात्रा भी खतरनाक है, यह हीमोग्लोबिन (मानव रक्त में पाया जाने वाला ऑक्सीजन वाहक) पर अपना प्रभाव ऑक्सीजन की तुलना में 200 गुना तेजी से डालती है। इसकी भयावहता की कल्पना करें कि यदि हम ऐसे पर्यावरण में रहे जिसके 100 भाग में ऑक्सीजन एवं एक भाग में कार्बन मोनोऑक्साइड हो तो ऐसी स्थिति में हमारे रक्त में कार्बन मोनो ऑक्साइड की मात्रा ऑक्सीजन की तुलना में दूनी होगी। इससे हमारे शरीर में ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता कम हो जाती है।

       यह तंत्रिकातंत्र (Nervous System) को कुप्रभावित करती है। फेफड़ों को जख्मी बनाती है। रक्त में हीमोग्लोबिन घटकर सिरदर्द, बेहोशी तथा मृत्यु के लिये उत्तरदायी है। हृदय रोगी के लिये घातक है। इसके दुष्परिणाम, अत्यधिक जनसंख्या, भीड़-भाड़ वाले चौराहों जहाँ आधुनिक परिवहन के साधन हों तथा कोयले का बड़ी मात्रा में प्रयोग हो ऐसे क्षेत्रो में देखने को मिलती हैं। चौराहों पर तैनात ट्रैफिक पुलिस के सिपाही पर इसका सबसे घातक प्रभाव होता है।

3. कार्बन डाइ ऑक्साइड (CO2)-

         कार्बन मोनोऑक्साइड स्वतंत्र अवस्था में नहीं रह पाती, इसीलिए कार्बन डाइ-ऑक्साइड में बदल जाती है। वर्तमान में कोयला, पेट्रोल, प्राकृतिक गैस, लकड़ी बड़ी मात्रा में जलायी जा रही है। अति नगरीकरण, औद्योगीकरण और जनसंख्या वृद्धि से विगत किसी भी सभ्यता की तुलना में अधिक कार्बन डाइ-ऑक्साइड उत्पन्न हो रही है। प्रौद्योगिक क्रान्ति के बाद CO2 की मात्रा में 25 प्रतिशत वृद्धि हुई है जबकि 1958 के बाद 11 प्रतिशत। यदि इसी प्रकार से वृद्धि होती रही तो अगले 30-40 वर्षों में तापमान 30 से 50 डिग्री से अधिक हो जायेगा। जिससे हरित गृह प्रभाव से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। विभिन्न ग्रहों का तापमान कार्बन डाइ ऑक्साइड की सान्द्रता पर निर्भर करता है।

       विगत शताब्दियों की तुलना में आज के औद्योगिक युग में कार्बन डाइ-ऑक्साइ दुगनी मात्रा में निकल रही है। जिसको सन् 1980 में सर्वाधिक माध्य तापमान सन् 1930 की तुलना में 20 डिग्री सेल्सियस अधिक हो गया। साथ ही CO2 के अधिभार का प्रभाव वनस्पतियों पर दो प्रकार से होगा। CO2 की बढ़ी मात्रा में प्रजनन प्रक्रिया बढ़ेगी और वानस्पतिक उत्पादन बढ़ेगा। दूसरे तापमान से जलवायु बदलेगी जिससे फसल प्रारूप शस्य तीव्रता समय व क्षेत्रों में परिवर्तन होगा। इसके अतिरिक्त हानिकारक गैसें सिल्वर ऑक्साइड तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड हैं जो पवन स्टेशनों से निकलती हैं। विद्युत केन्द्रों से निकलने वाली अधूरी ज्वलनशील गैसों को पूर्ण रूप से जलाने के लिए विद्युत केन्द्रों में “द प्लेयर” नामक उपकरण लगाकर कार्बन मोनोऑक्साइड से छुटकारा पाया जा सकता है।

4. हाइड्रोकार्बन-

       हाइड्रोकार्बन का मुख्य स्रोत परिवहन के साधनों से 56 प्रतिशत, उद्योगों से 16 प्रतिशत, कार्बन विलायकों से 9 प्रतिशत तथा अन्य द्वारा 8 प्रतिशत होता है। पेट्रोल (गैसोलिन) के दहन से पैराफीन तथा एरोमेटिक्स जैसे हाइड्रोकार्बन निकलते हैं जो अन्य गैसों के सहयोग से विषाक्त हो जाते हैं। इनमें बेन्जोपायरिन बहुकेन्द्रित हाइड्रोकार्बन निकलते हैं जो अन्य गैसों के सहयोग से विषाक्त हो जाते हैं। इनमें बेन्जोपायरिन बहुकेन्द्रित हाइड्रोकार्बन मुख्य हैं। ये पदार्थ वायुमण्डल में स्वतंत्र अणुओं के रूप में विद्यमान रहते हैं तथा वाहक कणों द्वारा अवशोषित होकर फेफड़ों तक पहुँच कर कैंसर के लिए उत्तरदायी हैं। यह अर्धजलित जीवाश्म ईंधन, फेफडों में पायी जाने वाली श्लेष्मा झिल्ली को क्षतिग्रस्त करता है। साथ ही सड़ने, गलने से मीथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड गैसें उत्पन्न होती हैं। वाहनों से निसृत होने वाले हाइड्रोकार्बन से मुक्ति पाने के लिये यदि मोटर कार में “रिसाईकलर” लगवा दिये जायें तो हाइड्रोकार्बन से छुटकारा मिल सकता है। एक अन्य उपकरण जो महँगा है “मफलर” से 90 प्रतिशत प्रदूषण समाप्त किया जा सकता है।

5. कार्बनिक प्रदूषक (Organic Pollutants)-

      भूसा, कार्बन के कण, परागकण तथा विशेष दुर्गन्धयुक्त पौधे भी पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। सेमल, अकडआ, यूकेलिप्ट, फर्न, आम और अन्य फलों के परागकण मौसम विशेष में एलर्जी उत्पन्न करते हैं।

वायु प्रदूषण के कारण (Causes of Air Pollution)

                    वायु प्रदूषण के निम्नलिखित कारण है:-

1. परिवहन के साधन-

       बस, ट्रक, टेम्पो, कारें, स्कूटर्स, चलती-फिरती लघु फैक्ट्रि ही हैं जो दिन-रात घूम-घूम कर विभिन्न क्षेत्रों में प्रदूषक तत्वों को फैलाती रहती हैं। नगरीय वायु में वाहन प्रदूषण सर्वप्रमुख स्रोत हैं। नगरों के बढ़ते आकार और अनियन्त्रित जनसंख्या वृद्धि से परिवहन के साधनों की संख्या अत्यधिक तेजी से बढ़ रही है। मोटर वाहन कार्बन मोनोऑक्साइड तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड के सबसे बड़े उत्पादक हैं। मोटर वाहनों में मुख्यतः एक्जॉस्ट पाइप, क्रेक केश, कार्बोरेटर एवं ईंधन की टंकी प्रदूषण के मुख्य अंग हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार निकास पाइप से निकलने वाला हाइड्रोकार्बन लगभग सारी कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा सीसा 55 प्रतिशत, टंकी व कार्बोरेटर से हाइड्रोकार्बन (20 प्रतिशत) तथा क्रेश टैंक से निकलने वाला (25 प्रतिशत) पदार्थ प्रदूषण का कारक होता है। कार से कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा 3 प्रतिशत निकलती है जबकि दुपहियों से 45 प्रतिशत।

      पेट्रोल वाहनों में डीजल की तुलना में अधिक प्रदूषण होता है क्योंकि पेट्रोल वाहन कार्बन मोनो-ऑक्साइड तथा सीसा अधिक छोड़ते हैं। जबकि डीजल से हाइड्रोकार्बन व नाइट्रोजन की मात्रा पेट्रोल वाहनों में घूँए के बराबर होती है। दिल्ली में पहले से 20 लाख मोटर गाड़ियाँ अधिक थीं। इसी कारण फ्लाई ओवर ब्रिज बनाये जा रहे हैं। दिल्ली में पिछले दशक में 10 लाख 70 हजार वाहनों की वृद्धि दर्ज की गयी है। अनुमान है कि प्रत्येक कार्य दिवस पर 600 से 800 गाड़ियाँ बढ़ जाती हैं। वाहन महानगरीय जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है।

     वित्त विशेषज्ञों के अनुसार आज देश का सकल घरेल उत्पाद (डी.जी.पी.) 7.5 प्रतिशत से 8 प्रतिशत है जिससे मध्यम और मध्यम-उच्च वर्ग की क्रय शक्ति 12 से 18 प्रतिशत के मध्य बढ़ी है। इसी कारण भारत में सन् 1999-2000 में 17,61,439 मोटर साइकिलें बिकी थीं वहीं 2002-03 में 37,05,893 ज्यादा बिकी हैं। उस पर भी 85 प्रतिशत ऋण सुविधा है।

      अत: एक अनुमान के अनुसार 550 टन प्रदूषक तत्य प्रतिदिन मुम्बई के पर्यावरण में मिलाये जा रहे हैं। मुम्बई में लगभग 4,00,000 मोटर गाड़ियाँ हैं और लगभग 100 वाहन प्रतिदिन अथवा 4 वाहन प्रति मिनट जुड़ रहे हैं। इनमें लगभग 15 हजार गाड़ियाँ तथा 6 हजार ट्रक प्रतिदिन आते-जाते हैं। इस प्रकार मुम्ब नगर में 48.5 प्रतिशत प्रदूषण मोटर गाड़ियों से मिल रहा है। विश्व में वर्तमान में 51 प्रतिशत वायु प्रदूषण आधुनिक परिवहन के साधनों से हो रहा है। भारत में 60 प्रतिशत वाहन प्रदूषण की दृष्टि से अयोग्य हैं जो प्रदूषण फैला रहे हैं।

2. औद्योगिक क्रिया-कलाप-

       वायु प्रदूषण में एक अहम् भूमिका का निर्वाह औद्योगिक क्रिया-कलाप करते हैं। कदाचित आज के युग में वायु प्रदूषण का यह प्रमुख स्रोत है जिससे सभी प्रकार का प्रदूषण पैदा होता है। प्रदूषण उद्योगों की प्रकृति पर निर्भर है। कच्चा माल, शक्ति के साधन और प्रक्रिया प्रदूषण की मात्रा और रूप को तय करती है। ऊर्जा के लिये कोयला, आणविक विखण्डन, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस तथा विद्युत का उपयोग होता है । इन उद्योगों से बड़ी मात्रा में निसृत गहरा काला धुँआ प्रमुख प्रदूषक तत्व हैं।

      औद्योगिक प्रक्रिया में निसृत गैसें विखण्डन तथा घिसाई पिसाई से निकले विभिन्न पदार्थ पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। यद्यपि सभी उद्योगों में थोड़ी मात्रा में प्रदूषण होता है किन्तु कुछ ऐसे उद्योग हैं जिनसे बहुत बड़ी मात्रा में पर्यावरण हास होता है; यथा- सीमेन्ट, रासायनिक उर्वरक, चमड़ा, कागज, सूती वस्त्र, शक्कर, डिस्टिलरी उद्योग आदि हैं। वायु प्रदूषण के घातक परिणाम वस्तुतः उद्योगों के साथ प्रारम्भ छुआ है।

     वर्तमान में उद्योगों की प्रतिस्पर्धा से वायुमण्डल में निरन्तर द्रव व ठोस तत्व छोड़े जा रहे हैं। धूल, राख, कार्बन कण, हाइड्रोकार्बन तथा जहरीली गैसें उत्पन्न होती हैं। उद्योगों से होने वाला प्रदूषण वर्तमान में कुल प्रदूषण का 14 प्रतिशत है।

3. ईंधन उपयोग-

          लकड़ी, कोयला, पेट्रोल आदि जीवाश्म ईंधन का उपयोग हमें ऊर्जा एवं ऊष्मा प्राप्ति के लिए करना पड़ता है। सर्वप्रथम घरेलू कार्यों के लिये अथवा मनुष्य अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लकड़ी गोबर (उपले), लकड़ी का कोयला, पत्थर का कोयला, मिट्टी का तेल, गोबर गैस (मीथेन) और कुकींग गैस (मीथेन), ईथेन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइ ऑक्साइड, सल्फर डाइ-ऑक्साइड, हाइड्रोजन साइनाइट जैसी गैसें तथा ईंधन के अपूर्ण दहन के फलस्वरूप अनेक हाइड्रोकार्बन तथा साइक्लिक पाइरिन यौगिक उत्पन्न होते हैं।

     ऑक्सीजन का बड़ी मात्रा में उपयोग होता है और कार्बन डाइ-ऑक्साइड उससे भी अधकि मात्रा में पैदा होती है जिससे पर्यावरण में असन्तुलन उत्पन्न होता है। घरेलू ईंधन का दहन कुल प्रदूषण के 10 प्रतिशत के लिये उत्तरदायी है।

4. अपशिष्ट पदार्थ के सड़ने से (Decomposition of the waste material)-

         इससे तीन प्रतिशत वायु प्रदूषित होकर प्रदूषण फैलाती है।

5. कृषि कार्य (Agriculture Work)-

           संयुक्त राज्य अमेरिका में तथा अन्य पश्चिमी देशों में कीटाणुनाशक दवाइयों का छिड़काव हेलीकॉप्टर से प्रारम्भ हुआ जिससे पश्चिमी देशों में कीटाणुनाशक विषाक्त पदार्थ जैसे डी.डी.टी., हवा में उड़ने वाले पदार्थों ने पर्यावरण को और विशेषकर वायु प्रदूषण को जन्म दिया। कृषि एवं अन्य ईंधन दहन से 15 प्रतिशत वायु प्रदूषित होती है ।

6. धूल-

        परिवहन, उद्योगों और औद्योगिक कार्यों से बड़ी मात्रा में धूल उड़कर पर्यावरण प्रदूषित करती है। ग्रीष्म ऋतु में लम्बित कणों की मात्रा निर्धारित मानक से तिगुनी-चौगुनी हो जाती है।

वायु प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Air Pollution)

         वायु प्रदूषण के स्पष्ट प्रभाव निम्नलिखित बिन्दुओं में व्यक्त किये जाते हैं।

1. स्वास्थ्य पर प्रभाव-

        वायु में उपस्थित सूक्ष्मतल धूल कण, गैसें तथा धात्विक कण विभिन्न बौमारियों के जनक हैं। सीसा विषाक्तता, शिशुओं की मस्तिष्क क्षमता को क्षति पहुँचाता हुआ मृत्यु की ओर खींच ले जाता है तथा प्रौढ़ों के तन्त्रिका तन्त्र को निर्बल बनात है। गैसोलिन के धुंए से बड़ी मात्रा में सीसा वातावरण में मिलता है जो श्वसन सम्बन्धी रोग को जन्म देता है। संक्षेप में सीसा जो पेट्रोल दहन से मिलता है स्वास्थ्य के लिए अत हानिकारक है। इससे रक्त में हीमोग्लोबिन (जो ऑक्सीजन ग्रहण करता है) की मात्रा प्रभावित होती है। खून में सीसे का स्तर बढ़ जाने से एनीमिया होने की आशंका बढ़ जाती है और कभी भी एन्जाइम्स तत्व प्रभावित हो सकते हैं, सीसा की मात्रा कैडमियम श्वसन तन्त्र के लिए विष है । यह उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोगों को बढ़ाता है।

      गुर्दे एवं यकृत में एकत्र होने पर वृहद, तनाव (हाइपरटेन्सन), फेफड़े के रोगा को बढ़ावा देता है । वातावरण में पारा की अधिकता, दृष्टि दोष, मासंपोशियों में शैथिल्य, लकवा, पागलपन, बेहोशी तथा मृत्यु तक ला सकता है। एस्बेस्टस के रेशे क्रोनिक फेफड़ों की बीमारियों, कैंसर तथा यकृत की बीमारियों के लिए उत्तरदायी है। सल्फर डाइऑक्साइड फेफड़ों की बीमारियों को बढ़ाती है। गंधक फेफड़ों में खिरजराहट (Irritation) पैदा करता है।

          गैस रूप में दमा, ब्रोंकाइट्स बढ़ाता है । नाइट्रिक ऑक्साइड जो ऑटोमोबाइल के अपूर्ण दहन से उत्पन्न होती है, यह रक्त में ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता का ह्रास करती है। नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड (N2O2) फेफड़ों को क्षतिग्रस्त तथा आँखों में खुजली उत्पन्न करती है। कुछ हाइड्रोकार्बन विशेषताओं वाले बेन्जापायोरीन अणु वायु से मिलकर कैंसर उत्पन्न कर मृत्यु की ओर धकेलते हैं। हाइड्रोकार्बन और नाइट्रोजन ऑक्साइड रासायनिक क्रिया कर पान (PAN-Pyorine and itric Oxide) जैसे यौगिक बनाते हैं जो आँखों और फेफड़ों को कुप्रभावित करते हैं।

        कार्बन मोनोऑक्साइड एक विषाक्त गैस है जो वर्तमान में जीवाश्म ईंधन के अपूर्ण दहन से उत्पन्न होती है और शीघ्र ही हानिकारक प्रभाव छोड़ती हुई वातावरण से ऑक्सीजन अवशोषित कर कार्बन डाइ ऑक्साइड में बदल जाती है। आधुनिक परिवहन के साधन इस गैस को नगरों के सघन जनसंख्या के क्षेत्र में छोड़ते हैं। जिससे महानगरीय भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में हीमोग्लोबिन की क्षति से सिर दर्द, मानसिक क्षमता ह्रास तथा बेहोशी तक अनुभूत होती है।

       इसी प्रकार ओजोन गैस आँखों में पीड़ा, सीने में दर्द तथा खाँसी उत्पन्न करती है। लोहे की खानों में काम करने वाले मजदूरों को लौह एवं सिलिका को धूल मिलकर “साईडोसिलिकोसिस’ रोग हो जाता है। लगभग 24 प्रतिशत खनिज मजदूर इस रोग से ग्रसित हो जाते हैं।

         कोयला की खदानों में काम करने वाले खनिकों को “फुफ्फस धूलमयता” रोग हो जाता है। धनबाद कोयला खदान में किये परीक्षण के अनुसार 3.7 प्रतिशत खनिक इस रोग से पूर्णतया प्रसित पाये गये एवं 11.7 प्रतिशत खनिकों को इसकी आशंका थी। इसी प्रकार झरिया कोयला क्षेत्र के खनिकों में 19 प्रतिशत लोग इस रोग से ग्रस्त थे। मध्य प्रदेश में सिंगरौली खुली खदान से उड़ी धूल तथा धुंआ से प्रभावित होकर सुबह काले रंग के कफ निकलने की शिकायत करते हैं।

       सतना में हर सातवाँ व्यक्ति एलर्जी अथवा दमे का रोगी है, यहाँ लम्बित कण चौक तथा कोतवाली के पास अपने निर्धारित मापदण्ड से दुगुने और तिगुनी मात्रा में पाये जाते हैं। इसी प्रकार सागर में 996.29 माइक्रोग्राम पाए गये हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में धूल से हर वर्ष 16 हजार नये रोगी बन जाते हैं। यहाँ 1044.02 माइक्रोग्राम से अधिक रिकार्ड की गयी है। रायपुर मार्ग सर्वाधिक प्रदूषित क्षेत्र है ।

       संक्षेप में, सीसा विषाक्त जो पेट्रोल से वायुमण्डल में मिलता है, स्वास्थ्य के लिए अति हानिकारक है। इससे रक्त में होमोग्लोबिन (जो ऑक्सीजन ग्रहण करता है) की मात्रा प्रभावित होती है। खून में सीसे का स्तर बढ़ जाने से एनीमिया की आशंका बढ़ जाती है और इसकी कमी से एन्जाइम तन्त्र प्रभावित होते हैं। सीसा की मात्रा बढ़ जाने से गुर्दे भी फेल हो सकते हैं तथा बच्चों का कद भी छोटा रह जाने का डर बना रहता है। उक्त शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर प्रदूषण हानिकारक प्रभाव छोड़ता है जिससे मानसिक समस्यायें जन्म लेती हैं ।

2. पेड़-पौधों पर प्रभाव-

         बहुत से पौधे वायु प्रदूषण के प्रति मनुष्यों, पशुओं और पक्षियों से भी अधिक सुग्राही हैं। इसलिए इनको प्रदूषक सूचक पौधे भी कहा जाता है जो हानिकारक सन्दूषण को प्रदर्शित करते हैं। गन्धक और गन्धक के ऑक्साइड का प्रभाव अंगूर, कपास, सेव के पौधों में स्पष्ट देखा जा सकता है जहाँ इनकी संख्या और उत्पादन घट जाता है । इसी प्रकार नाइट्रोजन के ऑक्साइड पेड़-पौधों की वृद्धि को रोक देते हैं।

     फ्लोरीन (Flourine) तीसरा तत्व है जो पेड़-पौधों को कुप्रभावित करता है। ओजोन से पत्तियों के ऊतक जल जाते हैं जिससे सब्जियाँ, फल, फूल तथा वन वृक्ष भी क्षतिग्रस्त होते हैं। तम्बाकू की पत्तियाँ ओजोन के प्रति बड़ी सुग्राही होती हैं। (राव, सी.एस.जी., 1972) प्रदूषक कण पत्तियों के ऊपर जम जाते हैं जिससे पेड़ों की जैविक क्रियाएँ प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन बनाने की क्रिया विशेषतः बाधित हो जाती है। कालान्तर में पत्ते पीले होकर गिर जाते हैं। मार्गों एवं महानगर में सड़कों के किनारे लगे वृक्षों के पत्तों को देखकर यह तथ्य प्रमाणित हो जाता है।

    वायु प्रदूषण का प्रत्यक्ष प्रभाव आम, पीपल, जामुन के पेड़ों पर और उसके उत्पादन की किस्म को देखकर किया जा सकता है। तापीय विद्युत गृहों के निकट इनके फल, पत्तियाँ छोटे तथा कम हो गये, साथ ही आम समय पर बौराया (फूला) नहीं।

3. पर्यटन स्थलों पर प्रभाव-

        औद्योगिक केन्द्रों से निकले रासायनिक धुँए से शैल एवं भित्तिचित्रों पर सफेद रंग की पर्त जम जाती है जो कालान्तर में क्षरण होता है। म. प्र. में मण्डीदीप (भोपाल) की औद्योगिक इकाइयों से निकलते धुएँ ने भीम बैठका की 750 गुफाओं को क्षतिग्रस्त कर दिया है। आगरा में विश्व प्रसिद्ध ताजमहल एवं वह महल जहाँ शाहजहाँ कैद रहा. के सफेद संगमरमर में पीलापन दिन-प्रतिदिन बढ़ना विवाद का विषय है।

4. मौसम पर प्रभाव-

         हम भली-भाँति जानते हैं कि सघन महानगरीय क्षेत्र (सी.बी. डी.) तथा सघन आवासीय क्षेत्रों का तापमान उपनगरीय और उपान्त क्षेत्रों की तुलना में अधिक रहता है। महानगरों के मध्य का तापमान धूल, धुंआ और जैविकीय प्रक्रियाओं से दो-तीन डिग्री सेल्सियस अधिक रहता है। औद्योगिक क्षेत्रों में आमेनिया सल्फेट और न्य के अम्ल वाष्प या कुहरा लम्बवत् तापमान को प्रभावित करता है।

5. अर्न्तदृश्यता पर प्रभाव-

         कार्बन के कण धूल, धुंआ, नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा सल्फर के ऑक्साइड वातावरण में प्रकाश को कम कर अन्तर्दृश्यता घटा देते हैं। अन्तर्दृश्यता का ह्रास आर्थिक क्रिया-कलापों, परिवहन में बाधा तथा मनोवैज्ञानिक मानसिक दबाव प्रदूषण, भय की आशंका बढ़ाती है। इससे हवाई अड्डों, बन्दरगाहों और परिवहन मार्गों पर महानगरों में दुर्घटनाओं की आशंकाएँ बढ़ जाती हैं। कोहरे के कारण जाड़ों में उत्तर से आने वाली ट्रेन प्रायः देरी से चलने लगती हैं।

6. पर्यावरणीय संकटों की तीव्रता पर प्रभाव-

        वायु प्रदूषक (एरोसोल) बादल, तापमान तथा वर्षण को प्रभावित करते हैं । औद्योगिक एवं परिवहन से निसृत कार्बन डाइ-ऑक्साइड के हरित गृह प्रभाव उल्लेखनीय हैं। क्लोरोफ्लोरो कार्बन के ओजोन पर्त के ह्रास के दुष्परिणामों की चर्चा पिछले 25 वर्षों से हो रही है।

7. अन्य प्रभाव-

     ओजोन सूती वस्त्रों के रंग को उड़ा देती है। सल्फर प्रदूषण पेन्ट्स को | उड़ा देते हैं तथा रबड़ से दरारों के लिए उत्तरदायी है। फ्लोराइट्स तथा आर्सेनिक यदि वायु में अधिक मात्रा में हो जाता है जो कालान्तर में घासों और पत्तियों पर जमते हैं जिसे पशु-पक्षी खाकर बीमार हो जाते हैं। इस प्रकार पशुओं को भी वायु प्रदूषण से क्षति होती है। यथा-भोपाल गैस काण्ड में मुर्गी, बकरी तथा गायों का मरना तथा प्रजनन क्षमता में हास प्रत्यक्ष प्रमाण है।

वायु प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय (Control Measures of Air Pollution)

        वायु प्रदूषण को व्यावहारिक रूप से पूर्णतः नियंत्रित करना कठिन है क्योंकि आधुनिक जीवन के कई क्रिया-कलापों से वायु प्रदूषण होता है; जैसे- बिना प्रदूषण उत्पन्न किये वाहनों, उद्योगों एवं सौन्दर्य प्रसाधन आदि का प्रयोग न करना सम्भव नहीं है।

        वायु प्रदूषण का नियंत्रण स्रोत पर ही सम्भव है। विकसित देशों में इस समस्या के समाधान के लिये प्रदूषण स्रोत पर ही सैकड़ों नियंत्रक उपायों को अध्यारोपित किया गया। है। द्वितीय वायु प्रदूषण की मात्रा एवं हानिकारक तत्वों की जाँच समय-समय पर होती रहे। सहनीय क्षमता तथा वस्तु की स्थिति की तुलनात्मक जानकारी का प्रकाशन होता रहना चाहिए, जिससे क्षेत्रीय सन्दर्भ में इसका समाधान किया जा सके।

     भारत में सर्वप्रथम नीरी (नागरपुर) में 10-12 बड़े नगरों का अध्ययन कर निष्कर्ष दिया कि कुछ क्षेत्रों में वर्ष के कुछ समय में यहाँ वायु प्रदूषण भयावह रूप धारण करता है। भारत सरकार ने National Committee of Environmental Planning and Co-ordination विभिन्न शहरों में प्रदूषण निवारक मण्डलों की स्थापना की है जो पर्यावरणीय प्रदूषण नियन्त्रण हेतु विभिन्न क्रिया-कलाप सम्पादित करती है। पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण हेतु निम्नलिखित उपाय सुझाये जा सकते हैं-

1. वायु प्रदूषण नियंत्रण हेतु कटिबन्ध बनाकर।

2. वायु प्रदूषण स्रोत पर नियंत्रण।

3. चिमनियों की ऊँचाई बढ़ाकर ताकि ऊँचाई पर प्रदूषक छोड़े जा सकें।

4. वनस्पति उगाकर।

5. उपकरणों के संशोधन, तकनीकी के परिवर्तन से।

6. सीसा रहित पेट्रोल।

7. सी. एन. जी. गैस का उपयोग।

8. शिक्षा से।

9. जागरूकता से।

1. वायु प्रदूषण नियंत्रण हेतु कटिबन्ध बनाकर-

        नगरों की कटिबन्ध निर्धारण योजना से बसे नगर यथा चण्डीगढ़, ओरेबिल, भोपाल, (भेल-गोविन्दपुरी) तथा भिलाई जैसे नगरों में उद्योगों को उस भाग में जिस दिशा में वायु नगर में न आती हो, उस दिशा में खुले स्थान पर जहाँ परिवहन की, जल शक्ति के साधन की सुविधा सुलभ हो, स्थापित किया गया है। जिससे औद्योगिक प्रदूषण से नगरवासियों को बचाया जा सके, नगर नियोजन के समय सी.बी.डी. (सेन्ट्रल बिजनिस डिस्ट्रिक्ट) औद्योगिक क्षेत्र, आवासीय क्षेत्र आदि में विभक्त कर नगर के विकास की योजना प्रस्तुत की जाती है। इसके विपरीत पुराने बसे नगर जैसे- ग्वालियर, उज्जैन, जबलपुर, सतना मैहर में भूमि का अवैज्ञानिक असंगत उपयोग के कारण प्रदूषण है। वर्तमान में इसके दो तथ्य और ध्यान में रखे जाने चाहिये।

(अ) उद्योगों का उत्पादन क्या है और कौन-सा प्रदूषण कितनी मात्रा में होता है।

(ब) उद्योग में कार्य करने का ढंग और पर्यावरण कैसा होता है और उसे किस चीज की आवश्यकता है। परिवहन, कच्चा माल, बना माल एवं प्रक्रिया इनमें से कहाँ पर , कौन-सा प्रदूषण तत्व निकलेगा, इस आधार पर उद्योगों का स्थान नियत करना आवश्यक है। यह क्षेत्रीय पर्यावरण से समुचित सन्तुलन स्थापित कर प्रदूषण को जनसंख्या के बसे क्षेत्रों से दूर रख सकेगा।

2. प्रदूषण स्रोत पर नियंत्रण स्रोत पर ही प्रदूषण नियंत्रण के लिए निम्नलिखित उपाय हो सकते हैं-

(अ) कच्चे माल में परिवर्तन,

(ब) प्रक्रिया में संशोधन,

(स) उपकरणों में विकल्प

(द) तकनीकी में परिवर्तन,

(इ) स्रोत पर कठोर कानूनी नियंत्रण।

(अ) कच्चे माल में परिवर्तन-

      यदि किसी उद्योग का कच्चा माल ही प्रदूषण कारक है तो कच्चे माल का विकल्प प्रयोग किया जाना चाहिए। यदि उसका विकल्प न हो तो उस प्रक्रिया को खुले और दूरवर्ती स्थानों पर स्थानान्तरित कर उद्योग क्षेत्र में लाना चाहिए।

(ब) प्रक्रिया में संशोधन-

        बहुत से उद्योग निर्माण प्रक्रिया के द्वारा प्रदूषण तत्व ह में छोड़ते हैं, ऐसी प्रक्रिया में नवीन तकनीकी प्रयोग कर प्रदूषण रहित करने का प्रयत्न करना चाहिए ।

(स) उपकरणों में विकल्प-

     प्रायः पुराने घिसे-पीटे उपकरण और पुरानी तकनीकी के यन्त्रों में से अधिक प्रदूषण की आशंका रहती है। नवीन मशीनें, उपकरण और वाहन अपेक्षाकृत कम प्रदूषण छोड़ते हैं, अतः नयी मशीनों की क्रय प्रक्रिया को सरल बनाना चाहिये।

(द) तकनीकी में परिवर्तन-

      पेट्रोल इंजन के स्थान पर डीजल इंजनों को प्राथमिकता देनी चाहिए क्योंकि इनसे कम मात्रा में घातक प्रदूषक निसृत होते हैं। सौर्य ऊर्जा से संचालित वाहनों से वायु प्रदूषण बिल्कुल नहीं होता अतः इन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। अभी कोटा इंजीनियरिंग कॉलेज, राजस्थान ने एक सोलन साइकिल का निर्माण किया है जो एक आदमी को 25 किमी एक दिन में ले जा सकती है और जिसे विशेष परिस्थितियों में 80 किमी. प्रति घण्टे की गति दी जा सकती है।

         इसी प्रकार एच.ई. भोपाल ने सौर्य ऊर्जा संचालित एक चार पहिया वाहन भी बनाया है जिसकी गति निःसन्देह कम है, किन्तु प्रदूषण रहित है। जैसे सीसा रहित पेट्रोल के उपयोग पर बल दिया जा रहा है। जहाँ पर यह उपलब्ध नहीं है वहाँ केटिलिटिक कनवर्टर कारों में लगाये जा रहे हैं जो उत्सर्जित धुएँ में उपस्थित CO व हाइड्रोकार्बन को CO2 में बदल देता है। इससे जहरीले कार्बन मोनोऑक्साइड का वायु में आना रूक जाता है। बिना जले हाइड्रोकार्बन को पूर्ण दहन कर CO2 में बदल देता है।

(इ) स्रोत पर कठोर कानूनी नियंत्रण-

       कठोर नियंत्रण से ही प्रदूषण निवारक महंगे उपकरणों का उपयोग उद्योगों में हो सकेगा। शासन को दुपहिया वाहन के स्रोत पर नियंत्रण कठोर करना होगा।

3. वायु प्रदूषण नियंत्रण हेतु ऊँची चिमनियाँ बनाकर-

        यदि स्रोत पर थोड़ी मात्रा में प्रदूषक तत्व निसृत हो रहे हों तब उन्हें ऊँची-ऊँची चिमनियाँ बनाकर निकटवर्ती बसे लोगों को बचाया जा सकता है। उस स्थिति में वायुमण्डल का तापमान, वायु की गति एवं उसकी दिशा उल्लेखनीय महत्त्व रखती है। विशेषज्ञों की राय में चिमनियों की ऊंचाई निर्मित इमारतों से ढाई गुना अधिक ऊँची होनी चाहिये। साथ ही निकलने वाली गैसें धुंआ की गति 20 मीटर प्रति सेकण्ड से अधिक नहीं होना चाहिये एवं हल्के और उड़नशील होने चाहिये।

4. प्रदूषण नियंत्रण के लिए वनस्पति उगाकर-

        यह प्रमाणित सत्य है कि पेड़-पौधे प्रदूषण को रोकते हैं एवं हजम करते हैं। प्रकृति के इस संसाधन का अधिकतम उपयोग करना चाहिये अतः औद्योगिक क्षेत्रों सघन परिवहन केन्द्रों तथा अत्यधिक भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में उपवनों, पार्कों और वृक्षों को लगाना चाहिये। कुछ वृक्ष विशेष प्रदूषकों को ग्रहण करते हैं। अतः उन क्षेत्रों में वे विशेष वृक्ष रोपित करना जरूरी है। सड़कों के किनारे वे वृक्ष लगाये जायें जो परिवहन से हुए प्रदूषण का अधिक मात्रा में अवशोषित कर सकें अथवा बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन को नित कर सकें। जैसे नीम, पीपल, बरगद आदि।

5. शिक्षा एवं जागरूकता-

        भारत जैसे विशाल देश में जहाँ आर्थिक विकास सर्वोपरि है और वायु प्रदूषण का मापन कठिन है (जो कुशल तकनीकी लोगों द्वारा ही सम्भव लक्ष्य है।) अत: पर्यावरण शिक्षा एवं जागरूकता से ही यह समस्या का समाधान ढूँढ़ा जा सकता हूँ। ताकि लोग व्यक्तिगत स्तर पर प्रदूषण न फैलायें और उससे बच सकेँ।

       पश्चिम के नागरिक पर्यावरण प्रदूषण के प्रति विशेष जागरूक है। जैसे एम्सटरडम नगर के मध्य में मोटरगाड़ियों को छोड़ कर वहाँ के निवासी साइकिल पर चलना पसन्द करते हैं। भारत के पुराने बसे महानगरीय क्षेत्रों के लिये यह अनुकरणीय होगा। पर्यावरणीय शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये पाठ्यक्रम में आवश्यक विषय वस्तु एवं क्रियाओं का समावेश किया जाना चाहिये। रेडियो, टी.वी., समाचार पत्र-पत्रिकायें, संगोष्ठी और परिचर्चा, शोध और उनका विज्ञापन जागरूकता के लिये विशेष महत्त्व रखता है।

6. सीसा रहित पेट्रोल-

      विश्व बैंक सीसा युक्त पेट्रोल का भारी मात्रा में उपयोग करने वाले देशों से आह्वान कर रहा है कि पहले चरण में पेट्रोल में सीसे की मात्रा 0.15 ग्राम या उससे कम प्रति लीटर के हिसाब से कम करें। विश्व बैंक के अनुसार दूसरे चरण में सीसा युक्त पेट्रोल के उपयोग को कम कर समाप्त करें। सीसा रहित पेट्रोल की कटौती लाने के उद्देश्यों से किये जा रहे नीतिगत और जनचेतना के प्रयासों में सक्रिय भूमिका का निर्वाह हो रहा है । सीसा युक्त पेट्रोल की कटौती के प्रयास मुख्य तौर पर मध्य एवं पूर्वी यूरोप, दक्षिण-पूर्वी एशिया एवं लैटिन अमेरिका में किये जा रहे हैं।

7. सी. एन. जी. का उपयोग-

       कोयला तथा खनिज तेल प्राथमिक ईंधन हैं। इनके जलने से कई वायु प्रदूषक उत्पन्न होते हैं। इनके द्वारा होने वाले वायु प्रदूषण से बचने के लिये सी. एन. जी. का प्रयोग किया गया है। यह पूर्णतः जल जाती है। इसका प्रयोग दिल्ली में बहुत सफल रहा है। भारत में प्राकृतिक गैस प्रचुर मात्रा में मौजूद है। इसीलिए सी. एन.जी. (Compressed Natural Gas) के उपयोग से प्रदूषण निवारण में मदद मिलेगी। पश्चिम में एथनॉल को डीजल में मिलाकर भी एक प्रयोग किया गया जो आर्थिक दृष्टि से सस्ता और पर्यावण के लिए लाभदायक हैं।

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