1. माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत
(Malthusian Population Theory)
(Malthusian Population Theory)
प्रश्न प्रारूप (पारिस्थितिकी तंत्र का प्रकार)
पारिस्थितिकी तंत्र का प्रकार⇒
प्रश्न प्रारूप
1. पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न प्रकारों का विवरण उनकी प्रमुख विशेषताओं के आधार पर दीजिए।
पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन समय और स्थान के सन्दर्भ में किया जाता है। प्रत्येक तन्त्र, समय और स्थान के सन्दर्भ में जैविक व अजैविक घटकों के सकल योग को दर्शाता है। पारिस्थितिकी तन्त्र के विकास की विभिन्न अवस्थाओं को उनकी विशेषताओं के आधार पर चार प्रकारों में विभाजित किया जाता है:-
(A) प्रौढ़ पारिस्थितिकी तंत्र-
यह पारिस्थितिकी तंत्र अनुकूल भौतिक पर्यावरण में लम्बे समय तक विकसित होता है। इस तन्त्र का जैवभार (Biomass) अधिक होता है। खाद्य श्रृंखला जटिल होकर खाद्य जाल का रूप ले लेती है, जिसमें पेड़-पौधों व जीव-जन्तुओं के साथ अपघटक (Decomposers) जीव भी होते हैं। ऐसे तंत्र में जीवों का जीवन-चक्र लम्बा एवं जटिल होता है। वन पारिस्थितिकी तंत्र इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। इसमें उत्पादक जीवों के साथ-साथ सभी श्रेणियों में उपभोक्ता जीव पाए जाते हैं। प्रौढ़ पारिस्थितिकी तंत्र में जैविक विविधता (Bio Diversity) अधिक पाई जाती है।
(B) अपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र-
इस प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्र में जैव-विकास की प्रारम्भिक अवस्था ही पायी जाती है। इसमें खाद्य शृंखला (Food Chain) छोटी एवं रैखिक (Linear) होती है। जैवभार कम तथा जीवों का जीवन-चक्र छोटा होता है। इस तंत्र में जैविक विविधता कम पायी जाती है। और उच्च श्रेणी के उपभोक्ताओं की कमी होती है। दलदली और छोटी घास वाली भूमि के पारिस्थितिकी तंत्रों में ये विशेषताएं पाई जाती हैं।
(C) मिश्रित पारिस्थितिकी तंत्र-
इस प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्र में प्रौढ़ और अपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों की विशेषताओं का मिश्रित रूप पाया जाता है। ऐसे पारिस्थितिकी तन्त्र में जैवभार सामान्य होता है। यद्यपि खाद्य श्रृंखला व्यवस्थित होती है, परन्तु खाद्य जाल (Food web) के रूप में परिवर्तित नहीं होती है। मिश्रित पारिस्थितिकी तंत्र का विकास पर्यावरण में परिवर्तन होने के कारण होता है। अपरदन चक्र में पुनर्योवन (Rejuvenation) के कारण भी मिश्रित पारिस्थितिकी तंत्र का विकास होता है। मानवीय क्रियाकलापों के फलस्वरूप वन पारिस्थितिकी तंत्र जब घास पारिस्थितिकी तंत्र बदल जाता है तो उसमें प्रौढ़ और अपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र की विशेषताओं का समावेश हो जाता है।
(D) निष्क्रिय पारिस्थितिकी तंत्र-
भौतिक पर्यावरण की प्रतिकूलता के कारण जब पारिस्थितिकी तंत्र में जीवन नष्ट हो जाता है तब वह निष्क्रिय (Inert) हो जाता है। निष्क्रिय पारिस्थितिकी तंत्र का विकास ज्वालामुखी विस्फोट, भूकम्प, जलवायु परिवर्तन, हिमकाल के आगमन के कारण या तो अपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र या प्रौढ़ पारिस्थितिकी तंत्र में सम्पूर्ण जीवन नष्ट हो जाने के कारण होता है। मानवकृत स्रोतों द्वारा झील में प्रदूषण होने पर जीवों का विनाश हो जाता है, जिससे तंत्र निष्क्रिय हो जाता है। प्रदूषण समाप्त होने पर तंत्र में पुनः जीवन प्रारम्भ हो जाता है।
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पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना⇒

प्रश्न प्रारूप
1. पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना का वर्णन कीजिए।
प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना में पाए जाने वाले समस्त घटकों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता-
(1) जैविक तत्व (Biotic Elements) तथा
(2) अजैविक तत्व (Abiotic Elements)
(1) जैविक तत्व (Biotic Elements)
पारिस्थितिकी तंत्र के जैविक तत्वों में पेड़-पौधों व जीव-जन्तुओं की आबादी (Population) के समुदाय (Community) होते हैं। ये सभी जीव आपस में किसी-न-किसी प्रकार से एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं। इन जीवों में परस्पर सम्बन्धों का मुख्य आधार भोजन है। अतः इन जीवों के भोजन प्राप्त करने के प्रकार के अनुसार जैविक तत्व को दो भागों में विभक्त किया गया है :-
(i) स्वपोषी या उत्पादक (Autotrophic or Producers)-
पारिस्थितिकी तंत्र में जो जीव साधारण अकार्बनिक पदार्थों को ग्रहण कर सूर्य की प्रकाशीय ऊर्जा की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis) की क्रिया कर भोजन का निर्माण करते हैं, उन्हें स्वपोषी घटक (Autotrophic Component) कहते हैं। ये जीव अपने पोषण हेतु स्वयं भोजन का निर्माण करते हैं। स्थल पर उगने वाले सभी पौधे तथा जल में विद्यमान जलोद्भिद पौधे, शैवाल व सूक्ष्मदर्शी पौधे स्वपोषी जीवों के अन्तर्गत आते हैं। ये समस्त जीव कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण करते हैं जिसका उपयोग अन्य जीव प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से भोजन रूप में करते हैं। ये अपना भोजन स्वयं विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा प्रकृति में मूल रूप में प्राप्य गैस व प्रकाश के माध्यम से सर्वप्रथम उत्पादित करते हैं, इसलिए उत्पादक (Producer) जीव कहलाते हैं।
(ii) परपोषित घटक अथवा उपभोक्ता (Heterotrophic or Consumers)-
पारिस्थितिकी तंत्र में वे जीव जो प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से ऊपर वर्णित उत्पादकों द्वारा निर्मित भोजन पर निर्भर रहते हैं, परपोषित अथवा उपभोक्ता जीव कहलाते हैं। वस्तुतः वनस्पति उत्पादक है और हर जीव उपभोक्ता है। इन उपभोक्ता जीवों को पुनः दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है:-
(अ) वृहत् या गुरु उपभोक्ता (Macro Consumers) तथा
(ब) सूक्ष्म या लघु उपभोक्ता (Micro Consumers)
(अ) वृहत् या गुरु उपभोक्ता (Macro Consumers)-
पारिस्थितिकी तंत्र में वे जीव जो अपना भोजन पौधों तथा जन्तुओं से प्राप्त करते हैं, वृहद् उपभोक्ता या भक्षकपोषी (Phagotroph) या बायोफेगस (Biophages) कहलाते हैं। ये उपभोक्ता जीव भोजन को ग्रहण कर अपने शरीर के अन्दर उसका पाचन करते हैं। शाकाहारी जीव अपने पोषण के लिए पौधों पर निर्भर रहते हैं; जैसे वन में हिरण भोजन के लिए प्रत्यक्ष रूप से पौधों पर निर्भर होता है तथा शेर अपने भोजन के लिए हिरण को खाता है।
यहाँ पर हिरण और शेर दोनों ही उपभोक्ता हैं लेकिन हिरण अपने भोजन के लिए प्रत्यक्ष रूप से पेड़-पौधों पर निर्भर है जबकि शेर अप्रत्यक्ष रूप से। अतः इन उपभोक्ताओं की श्रेणियां अलग-अलग हैं। इस प्रकार उपभोक्ताओं को भी तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है:-
(1) प्रथम श्रेणी के उपभोक्ता या प्राथमिक उपभोक्ता (Consumers of First Order)
(2) द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ता या द्वितीयक उपभोक्ता (Consumers of Second Order)
(3) तृतीय श्रेणी के उपभोक्ता या तृतीयक उपभोक्ता (Consumers of Third Order)
(1) प्रथम श्रेणी के उपभोक्ता या प्राथमिक उपभोक्ता (Consumers of First Order or Primary Con- sumers)-
वे जीव जो भोजन की प्राप्ति के लिए प्रत्यक्ष रूप से हरे पौधों या स्वपोषी जीवों पर निर्भर होते हैं, प्राथमिक उपभोक्ता कहलाते हैं। ये मुख्य रूप से शाकाहारी (Herbivores) होते हैं। स्थलीय पारिस्थितिकी तन्त्र में रोडेण्ट्स (Rodents), कीट, गाय, भैंस, बकरी, खरगोश, भेड़, हिरण, चूहा इत्यादि प्राथमिक उपभोक्ता हैं। इसी प्रकार प्रोटोजोआ (Protozoans), क्रस्टेशियन्स (Crustaceans) व मोलस्कस (Molluscus) समुद्रों तथा तालाबों के प्राथमिक उपभोक्ता हैं।
(2) द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ता या द्वितीयक उपभोक्ता (Consumers of Second Order or Secondary Con- sumers)-
इस श्रेणी के उपभोक्ता अपना भोजन प्रथम श्रेणी के शाकाहारी उपभोक्ताओं से प्राप्त करते हैं। ये प्रायः मांसाहारी (Cornivores) या सर्वाहारी (Omnivores) होते हैं। जैसे- कौआ, मेंढक, लोमड़ी, कुत्ता, सांप, बिल्ली, आदि।
(3) तृतीय श्रेणी के उपभोक्ता या तृतीयक उपभोक्ता (Consumers of Third Order or Tertiary Con- sumers)-
इस श्रेणी के उपभोक्ता अपना भोजन प्राथमिक एवं द्वितीयक श्रेणी के उपभोक्ताओं से प्राप्त करते हैं। ये उपभोक्ता सर्वाहारी जीवों का भी भक्षण करते हैं। पारिस्थितिकी तन्त्र में इस श्रेणी के अन्तर्गत वे ही जीव आते हैं जो स्वयं तो अन्य मांसाहारी जीवों को खा जाते हैं, किन्तु उन्हें कोई जीव नहीं खा सकता।
इस प्रकार के उपभोक्ताओं को उच्च मांसाहारी या उपभोक्ता (Top consumers) कहा जाता है, जैसे- शेर, चीता, बाज (Hawk), गिद्ध (Vulture), इत्यादि। इन्हें सर्वोच्च (Top) या अन्तिम उपभोक्ता भी कहा जाता है क्योंकि इनका उपभोग करने वाला कोई अन्य जीव नहीं होता है।

(ब) सूक्ष्म या लघु उपभोक्ता (Micro Consumers) –
पारिस्थितिकी तंत्र के लघु उपभोक्ताओं में कवक (Fungi), जीवाणु (Bacteria) तथा मृतोपजीवी (Saprotrophs) होते है, इन्हें अपघटक (Decomposers) वा आस्माट्राप्स (Osmotrophs) भी कहते हैं। ये जीव उत्पादक तथा उपभोक्त जीवों के मृत शरीरों पर क्रिया कर जटिल कार्बनिक पदार्थों को साधारण पदार्थों में परिवर्तित करते हैं। इस प्रक्रिया में ये स्वयं अपना पोषण करते हैं और अकार्बनिक पदार्थ पुनः उत्पादक हरे पौधों द्वारा उपयोग में ले लिए जाते हैं। ये अपघटक पारिस्थितिकी तन्त्र के अस्तित्व को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
(2) अजैविक तत्व (Abiotic Elements):-
पारिस्थितिकी तन्त्र के अजैविक तत्वों में वे समस्त भौतिक कारक आते हैं जो जीवों के जीवन को बनाए रखते हैं। इन तत्वों का निर्माण भौतिक पर्यावरण की शक्तियों और प्रक्रियाओं से हुआ है। इन तत्वों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है :-
(i) अकार्बनिक पदार्थ (Inorganic Substances)-
अकार्बनिक पदार्थों के अन्तर्गत मिट्टी, जल, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, फॉस्फेट, आदि सम्मिलित हैं। जल और मिट्टी के माध्यम से इन अकार्बनिक पदार्थों का पारिस्थितिकी तन्त्र में चक्रीकरण होता है।
(ii) कार्बनिक पदार्थ (Organic Substances)-
इसमें वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, ह्यूमस, क्लोरोफिल, लिपिड इत्यादि होते हैं।
(iii) जलवायविक कारक (Climatic Factors)-
इसमें सौर प्रकाश, तापमान, आर्द्रता, पवन, वर्षा, इत्यादि भौतिक तत्व महत्वपूर्ण हैं। इन सभी भौतिक तत्वों में सौर ऊर्जा पारिस्थितिकी तन्त्र की क्रियाशीलता के लिए अति आवश्यक होती है।
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(The Indus-Ganga-Brahmaputra Plain)
हिमालय पर्वत तथा दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार के बीच सिन्धु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदियों की निक्षेप क्रिया द्वारा निर्मित एक विशाल मैदान स्थित है, जिसे सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान कहा जाता हैं। भारत के उत्तरी भाग में स्थित होने के कारण इसे उत्तरी भारत का मैदान भी कहते हैं। गंगा और सिन्धु नदियों के मुहाने के बीच पूर्व-पश्चिम दिशा में इसकी लम्बाई लगभग 3,200 किमी तथा चौड़ाई 150 से 300 किमी है। असम में यह मैदान संकरा है और यहां इसकी चौड़ाई 90 से 100 किमी है।
यह मैदान पूर्व से पश्चिम की ओर चौड़ा होता जाता है। राजमहल की पहाड़ियों के पास इसकी चौड़ाई 160 किमी है जो बढ़कर प्रयागराज के निकट 280 किमी हो जाती है। इस मैदानी भाग में नदियों द्वारा तलछट के निरन्तर निक्षेपण से जलोढ़ की बहुत ही मोटी परतें जम गई हैं। अधिकांश भाग पर जलोढ़ की मोटाई 2,000 मीटर तक पायी गई है। उच्चावच की दृष्टि से इस मैदानी भाग का विवरण निम्नलिखित है :
(i) भाबर प्रदेश (Bhabar Region)-
भाबर प्रदेश शिवालिक के गिरिपाद प्रदेश में सिन्धु नदी से तिस्ता नदी तक पाया जाता है। यह प्रदेश 8 से 16 किमी चौड़ाई वाली संकरी पट्टी के रूप में स्थित है। गिरिपाद पर स्थित होने के कारण इस क्षेत्र में नदियां बड़ी मात्रा में पत्थर, कंकर, बजरी आदि लाकर जमा कर देती हैं जिससे पारगम्य चट्टानों का निर्माण होता है। अतः इस क्षेत्र में पहुंचकर अनेक छोटी-छोटी नदियां भूमिगत होकर अदृश्य हो जाती हैं। यह प्रदेश कृषि के लिए अधिक उपयोगी नहीं है।
(ii) तराई प्रदेश (Terai Region)-
यह भाबर के दक्षिण में वह मैदानी भाग होता है, जहां भाबर की लुप्त नदियां फिर से भूमि पर प्रवाहित होती हुई दिखाई देने लगती हैं। इसे ही तराई प्रदेश कहते हैं। नदियों द्वारा निक्षेपित जलोढ़ के कण भाबर प्रदेश की तुलना में यहां अपेक्षाकृत महीन होते हैं फलस्वरूप तराई प्रदेश में दलदल की अधिकता होती है।
इसकी चौड़ाई 20 से 30 किमी होती है। दलदल तथा नमी की अधिकता के कारण तराई प्रदेश में घने वन तथा विविध प्रकार के वन्य जीव पाये जाते हैं। उत्तरी भारत के अधिकांश राष्ट्रीय उद्यान तथा वन्य जीव अभयारण्य तराई प्रदेश में ही हैं।
(iii) बांगर प्रदेश (Bangar Region)-
बांगर प्रदेश मैदान का वह ऊंचा भाग होता है जहां नदियों की बाढ़ का जल नहीं पहुंचता है। यह पुरानी जलोढ़ मिट्टी द्वारा बना होता है। इसमें कंकड़ के रूप में चूनायुक्त संग्रहों की अधिकता होती है। यह प्रदेश कृषि के लिए अधिक उपयोगी नहीं है। पंजाब के मैदान में बांगर को ‘धाया’ कहते हैं।
(iv) खादर प्रदेश (Khadar Region)-
खादर प्रदेश वह नीचा भाग है जहां नदियों की बाढ़ का जल प्रति वर्ष पहुंचता है। बाढ़ के जल के साथ नवीन मिट्टी भी इस प्रदेश में बिछती रहती है, अतः खादर प्रदेश का निर्माण नवीन जलोढ़ द्वारा होता है। खादर प्रदेश अत्यधिक उपजाऊ होते हैं और यहां गहन खेती की जाती है। पंजाब के मैदान में खादर प्रदेश को ‘बेट’ कहते हैं।
(v) रेह (Reh)-
बांगर मिट्टी के उन क्षेत्रों में जहां सिंचाई कार्यों की अधिकता है, वहां पर कहीं-कहीं भूमि पर एक नमकीन सफेद परत बिछी हुई पायी जाती है। सफेद परत वाली इस मिट्टी को ‘रेह या कल्लर’ के नाम से पुकारते हैं। उत्तर प्रदेश और हरियाणा के शुष्क भागों में इसका विस्तार सबसे अधिक है।
(vi) भूड (Bhur)-
बांगर मिट्टी के उन क्षेत्रों में जहां आवरण क्षय के फलस्वरूप ऊपर की मुलायम मिट्टी नष्ट हो गई है वहां अब कंकरीली ऊंची भूमि मिलती है। ऐसी भूमि को भूड़ कहते हैं। गंगा और रामगंगा नदियों के प्रवाह क्षेत्रों में भूड़ का जमाव विशेष रूप से पाया जाता है।
(vii) शंकु तथा अन्तःशंकु (Cones and Inter cones)-
इस विशाल मैदान में नदियों के निक्षेपण के परिणामस्वरूप जलोढ़ पंख अथवा शंकु तथा अन्तः शंकुओं का निर्माण हुआ है। हिमालय की घाघरा नदी को छोड़कर बाकी सभी नदियों ने जलोढ़ शंकुओं का निर्माण किया है। इन शंकुओं का आधार दक्षिण में मैदान की तरफ तथा शीर्ष पहाड़ियों से नदी के निकास बिन्दु की तरफ होता है। इनका तल उत्तल (Convex) होता है। अन्तः शंकुओं का आकार इसके ठीक विपरीत होता है और इसके किनारे अवतल (Concave) होते हैं।
निक्षेप के विस्तार के साथ-साथ शंकु एवं अन्तः शंकुओं के कुछ स्थानों पर आपस में मिलने से शंकु-पाद मैदानों (Cone-foot Plains) का निर्माण हुआ है। हिमालय की अधिकांश नदियों ने सामान्य शंकु बनाये हैं जबकि व्यास रावी एवं महानन्दा तिस्ता नदियों ने मिश्रित शंकुओं (Composite cones) का निर्माण किया है। उत्तरी बिहार में गंडक और कोसी, झारखण्ड में महानन्दा और तिस्ता नदियों ने बड़े पैमाने पर शंकुओं का निर्माण किया है। ये शंकु एक-दूसरे से अन्तः शंकुओं द्वारा विभाजित हैं।
(viii) डेल्टा (Delta)-
गंगा तथा सिन्धु नदियों के डेल्टा इस मैदानी भाग के दो महत्वपूर्ण संरचनात्मक अंग हैं। गंगा का डेल्टा राजमहल की पहाड़ियों से सुन्दरवन के किनारे तक 430 किमी की लम्बाई में फैला हुआ है। इसकी चौड़ाई 480 किमी है। गंगा के डेल्टा में तलछट के निक्षेप की मात्रा अधिक तथा अत्यधिक गहराई तक विद्यमान है। इस डेल्टा में निक्षेपित तलछट के कण बहुत ही महीन हैं। सिन्धु नदी का डेल्टा यद्यपि 960 किमी लम्बा है किन्तु इसकी चौड़ाई 160 किमी ही है। सिन्धु नदी के डेल्टा में तलछट के निक्षेप की मात्रा और गहराई भी कम है। इस डेल्टा में निक्षेपित तलछट के कण भी अपेक्षाकृत मोटे हैं।
प्रश्न प्रारूप
सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान के प्रमुख भू-आकृतिक स्वरूपों का वर्णन कीजिए।
Read More:
1. सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान (The Indus-Ganga-Brahmaputra Plain)
2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व (Distribution and Density of Population of India)
4.नदियों के किनारें बसे प्रमुख नगर
5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास
6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व
7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व
8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई
9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश
10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र
11. गंगा का मैदान
12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना
13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य
15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र
16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत) / Drainage System
17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास
18. गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र
20. मानसून क्या है?
21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत
22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत
23. एलनीनो सिद्धांत
24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी (Monsoon of Mechanism)
25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना
26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान
27. भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव
28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव
29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।
31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात
32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान
भारत का भूगोल
Indian Geography Capsule 9
एक नजर में इन्हें जरुर देखें
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भारत के प्रमुख जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र |
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| क्रम | नाम | राज्य |
| 1. | मन्नार की खाड़ी | तमिलनाडु |
| 2. | सुन्दर वन | पश्चिम बंगाल |
| 3. | मानस | असम |
| 4. | ग्रेट निकोबार | अण्डमान एण्ड निकोबार |
| 5. | नन्दा देवी | उत्तरांचल |
| 6. | नोक्रेक | मेघालय |
| 7. | नीलगिरि | कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु |
| 8. | सिमलीपाल | उड़ीसा |
| 9. | डिब्रू सेखोवा | असम |
| 10. | दिहांग देबंग | अरुणाचल प्रदेश |
| 11. | पंचमढी | मध्य प्रदेश |
| 12. | कंचनजंगा | सिक्किम |
| 13. | अगस्तस्य मलाई | केरल |

अगस्तस्य मलाई
|
भारत के प्रमुख पर्वतीय नगर |
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| क्रम | पर्वतीय नगर | राज्य |
| 1. | गुलमार्ग | जम्मू-कश्मीर |
| 2. | पहलगांव | जम्मू कश्मीर |
| 3. | श्रीनगर | जम्मू-कश्मीर |
| 4. | शिमला | हिमाचल प्रदेश |
| 5. | डलहौजी | हिमाचल प्रदेश |
| 6. | कसौली | हिमाचल प्रदेश |
| 7. | मनाली | हिमाचल प्रदेश |
| 8. | सोलन | हिमाचल प्रदेश |
| 9. | धर्मशाला | हिमाचल प्रदेश |
| 10. | कुल्लू घाटी | हिमाचल प्रदेश |
| 11. | मंडी | हिमाचल प्रदेश |
| 12. | लैंसडाउन | उत्तराखंड |
| 13. | मसूरी | उत्तराखंड |
| 14. | मुक्तेश्वर | उत्तराखंड |
| 15. | नैनीताल | उत्तराखंड |
| 16. | रानीखेत | उत्तराखंड |
| 17. | अल्मोड़ा | उत्तराखंड |
| 18. | भुवाली | उत्तराखंड |
| 19. | दार्जिलिंग | पश्चिम बंगाल |
| 20. | मिरिक | पश्चिम बंगाल |
| 21. | कलिम्पोंग | पश्चिम बंगाल |
| 22. | लोनावाला | महाराष्ट्र |
| 23. | खांडला | महाराष्ट्र |
| 24. | पंचगनी | महाराष्ट्र |
| 25. | महाबालेश्वर | महाराष्ट्र |
| 26. | नंदी हिल्स | कर्नाटक |
| 27. | केमानगुंडी | कर्नाटक |
| 28. | पेरियार | केरल |
| 29. | मन्नार | केरल |
| 30. | कोडाईकनाल | तमिलनाडु |
| 31. | कोटगिरि | तमिलनाडु |
| 32. | ऊटी | तमिलनाडु |
| 33. | कुन्नूर | तमिलनाडु |
| 34. | कोटलिम | तमिलनाडु |
| 35. | येरकार्ड | तमिलनाडु |
| 36. | गंगटोक | सिक्किम |
| 37. | राँची | झारखंड |
| 38. | शिलांग | मेघालय |
| 39. | माउंट आबू | राजस्थान |
| 40. | पंचमढ़ी | मध्यप्रदेश |
| 41. | सपूतारा | गुजरात |
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नोट : मैं आशा करता हूँ कि भारत का भूगोल से सम्बंधित सभी Capsule आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।
Thank You @ By Dr. Amar Kumar
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भूगोल- सामान्य भूगोल और भारत का भूगोल
(भूगोल में प्राचीन चिरसम्मत काल)
प्रश्न प्रारूप
प्रश्न- प्राचीन चिरसम्मत काल (Classical Ancient Times) के भौगोलिक ज्ञान के स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
अथवा, भूगोल में चिरसम्मत शास्त्रीय कालीन भूगोलवेताओं के योगदान का वर्णन कीजिए।
चिरसम्मत शास्त्रीय काल में मुख्यतः यूनानी व रोमन भूगोलवेत्ताओं को सम्मिलित किया जाता है। इस काल में अधिकांश समय यूनानी भूगोलवेत्ताओं का प्रभुत्व ही भूगोल पर रहा। उन्होंने भूगोल को एक स्वतन्त्र विषय के रूप में तो मान्यता दिलाई ही साथ ही विभिन्न भौगोलिक पक्षों (Aspects) का वर्णन भी अपने ग्रन्थों में किया।
यूनानी भूगोलवेत्ताओं द्वारा भूगोल का विकास प्रमुखतः तीन विधाओं द्वारा किया गया— अन्वेषण, मानचित्र और परिकल्पना।
यूनानी भूगोलवेत्ताओं द्वारा भूगोल की समस्त प्रमुख शाखाएँ स्थापित कर ली गई थीं। गणितीय भूगोल का जन्म, थेल्स, अनेग्जीमेण्डर तथा अरस्तु के द्वारा हुआ जिसे इरेटॉस्थनीज ने चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। पृथ्वी का गोल आकार जो कि आश्चर्यजनक रूप से शुद्धता के निकट था तथा विभिन्न स्थानों के अक्षांश व देशान्तर ज्ञात कर लिए गए थे।
यूनानी भूगोलवेत्ताओं का योगदान
1. महाकवि होमर (Homer) ⇒ 900 ई० पू०
लगभग 900 ई० पू० में ये वस्तुतः एक इतिहासकार थे। इन्होंने दो महाकाव्य ओडिसी व इलियड लिखे। इनमें बहुत से क्षेत्रों, मानव वर्गों तथा जनपदों के वर्णन हैं। इनके अनुसार पृथ्वी तैरती हुई वृत्ताकार मानी गई थी। 500 वर्षों तक यह विचारधारा ठीक मानी जाती रही। दूसरे महाकाव्य ओडिसी में सुदूर पूर्व के विभिन्न भू-भागों को वर्णित किया गया है। इसमें यातायात तथा अन्य देशों के निवासियों के भी वर्णन हैं। होमर ने चार स्वर्गों की कल्पना की थी जो पृथ्वी के चारों कोनों पर स्थित माने जाते थे। उन्होंने चार प्रकार की पवनों का उल्लेख किया है—बोरस (उत्तरी हवा, साफ-स्वच्छ नीला आकाश, हवा ठण्डी और तेज); यूरस (पूर्वी हवा, गर्म और मन्द); नोटस (दक्षिणी पवन, यह वर्षा और झंझा युक्त होती हैं) और जेफिरस (पश्चिमी पवन, झंझावाती वेग)
2. थेल्स (Thales) ⇒ 700 ई० पू०
यह एक दार्शनिक था जो यूनान में प्राकृतिक विज्ञान व दर्शनशात्र (Philosophy) का जन्मदाता था। 500 BC में इन्होंने विश्व की उत्पत्ति व नक्षत्रों के विषय में एक पुस्तक लिखी, जिससे उस समय गणितीय भूगोल का जन्म हुआ। थेल्स ने भी पृथ्वी को चपटी, वृत्ताकार व पानी पर तैरती हुई माना था। इन्होंने बताया था कि जल में तैरने के कारण ही पृथ्वी पर भूकम्प आते हैं। सूर्यग्रहण व चन्द्रग्रहण के सन्दर्भ में भी इन्होंने अपने मत प्रकट किए थे।
3. पाइथागोरस (Pythagorus) ⇒
सर्वप्रथम 582 BC में उन्होंने ब्रह्माण्ड विज्ञान के सन्दर्भ में अपने विचार प्रकट किए। इन्होंने मत प्रकट किया था कि पृथ्वी गोलाकार व अस्थिर है। यह अन्य आकाशीय पिण्डों की परिक्रमा करती है। इन्होंने सूर्य व चन्द्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा करते बताया था।
4. अनेग्जीमेण्डर (Anaximander) ⇒ 610-546 ई० पू०
यह थेल्स के शिष्य थे। इनको नक्षत्र विज्ञान व ब्रह्माण्ड विज्ञान का पर्याप्त ज्ञान था। पृथ्वी की उत्पत्ति, आकार के बारे में इनके विचार प्रगतिवादी थे। इनका मत था कि पृथ्वी गोल है तथा ठोस पिण्ड के रूप में ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित है। वे विश्व के प्रथम मानचित्र के निर्माण में योगदान किया। सर्वप्रथम सूर्य घड़ी (Gnomon) का निर्माण किया। जैव भूगोल जैसे स्वतन्त्र विषयों की नींव रखी। विभिन्न जीव उत्पत्ति तथा प्रकाश सम्बन्धी लेख लिखे। उनका मत था कि पृथ्वी तल के समस्त जीव एक निरन्तर विकास प्रक्रिया के परिणाम है। उन्होंने कहा कि मानव की उत्पत्ति इसी विकास प्रक्रिया के परिणामस्वरूप मछली से हुई है।
5. अनेग्जीमैनस (Anaximenes) ⇒
यह अनेग्जीमेण्डर का शिष्य था। ब्रह्माण्ड विज्ञान के सन्दर्भ में इन्होंने अपने स्वतन्त्र विचार प्रकट किए थे। इनका विचार था कि सूर्य व तारे पृथ्वी से काफी दूर हैं व पर्वतों द्वारा सूर्य का प्रकाश अवरुद्ध हो जाने से रात हो जाती है।
6. हिकेटियस (Hecataeus ⇒ 520 ई० पू०
हिकेटियस (मलेशियम्) नगर का निवासी था। इन्होंने व्याख्यात्मक भूगोल पर अपने विचार प्रकट किए थे और पृथ्वी का वर्णन’ (Gesperiodos) नाम की पुस्तक लिखी। इसमें उस समय के ज्ञात विश्व का प्रादेशिक वर्णन था। इस ग्रन्थ द्वारा इन्होंने यूनान में प्रादेशिक भूगोल की नींव रखी। इसी पुस्तक में मलेशियस नगर का मानचित्र भी दिखाया गया था। पृथ्वी को इन्होंने वृत्ताकार माना था। हिकेटियस को भूगोल का जनक (Father of Geography) कहा जाता है।
7. हिरोडोटस (Herodotus) ⇒ 485-425ई० पू०
इनको इतिहास का जन्मदाता मानते हैं। हिरोडोटस ने उन भौगोलिक क्षेत्रों का निरीक्षण एवं अन्वेषण किया था जो उस समय तक अज्ञात थे। इन्होंने दक्षिणी इटली, भूमध्यसागरीय क्षेत्रों, मिस्र, वेबीलोन, आदि क्षेत्रों का विशद वर्णन प्रस्तुत किया। इन्होंने विश्व के मानचित्र का भी निर्माण किया था और नील नदी के डेल्टा के निर्माण की प्रक्रिया का वर्णन किया था। हेरोडोटस ने ही सबसे पहले विश्व मानचित्र पर याम्योत्तर (Meridian) खींचा। हेरोडोटस ने विश्व की भूसंहति को तीन महादेशों- यूरोप, एशिया तथा लीबिया (अफ्रीका) में बांटा।
8. प्लेटो (Plato) ⇒ 428-348 ई० पू०
प्लेटो (428-348 ई. पू.) का नाम तो सदैव दर्शनशास्त्र के साथ जोड़ा जाता है। परन्तु उन्होंने भौगोलिक अवधारणाओं के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। निगमनात्मक तर्कणा (Deductive Reasoning) के प्रबल प्रतिपादक प्लेटो को यह बताने का श्रेय प्राप्त है कि धरती एक गोलाभ (Sphare) की भांति है और ब्रह्माण्ड के केन्द्र में स्थित है तथा सूर्य सहित शेष सभी खगोलीय पिण्ड धरती के चारों ओर चक्कर काटते हैं। उनकी यह खोज उनके जमाने में बड़ी क्रांतिकारी सिद्ध हुई।
9. अरस्तु (Aristotle) – 384-322 ई० पू०
यह प्रसिद्ध विचारक प्लेटो का शिष्य था। इसको वैज्ञानिक भूगोल का जन्मदाता माना जाता है। अरस्तु दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, जीवविज्ञान, आदि विषयों में प्रकाण्ड पण्डित थे। गणितीय भूगोल में इनका योगदान सराहनीय है। उन्हाने पृथ्वी की आकृति गोलाकार बताई थी। सर्वप्रथम जलवायु कटिबन्धों का निर्धारण किया था और मौसम विज्ञान पर ग्रन्थ लिखा था। इसमें वायु ऋतु परिवर्तन, वर्षा, ओला, भूकम्प आदि का वर्णन किया था। वातावरणवाद (Environmental Determinism) को सर्वप्रथम व्यवस्थित रूप में अरस्तु ने ही प्रस्तुत किया था।
10. सिकन्दर (Alexander) ⇒
यह एक अन्वेषक यात्री थे। इन्होंने युद्धों के सन्दर्भ में अनेक यात्राएं की थी। इन यात्राओं के वर्णनों में भौगोलिक ज्ञान के दर्शन होते हैं तथा उन्होंने दक्षिण-पश्चिमी एशिया, दक्षिणी एशिया, मिस्र, आदि की खोज की थी। इनके वर्णन प्रादेशिक व सामान्य भूगोल के विकास में सहायक सिद्ध हुए तथा उनसे व्याख्यात्मक भूगोल को भी बल मिला।
11. थियोफ्रेस्टस (Theophrastus) ⇒
यह अरस्तु के शिष्य थे। इन्होने अरस्तु के कार्यों को आगे बढ़ाया। जलवायु विज्ञान पर अपने स्वतन्त्र विचार भी प्रस्तुत किए। जलवायु व वनस्पति के सम्बन्धों का वर्णन किया। चट्टानों एवं मिट्टियों का अध्ययन किया। इन्होंने ‘हिस्ट्री ऑफ प्लेनेटस’ (History of Planets) नाम की पुस्तक लिखी जिसमें मैसिडोनिया के मैदानी क्षेत्रों, निकटवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों तथा अन्य क्षेत्रों की वनस्पति का तुलनात्मक अध्ययन किया था। इस प्रकार वनस्पति भूगोल की नींव डाली।
12. इरेटास्थनीज (Eratosthenes) ⇒ 276-196 ई० पू०
यह प्रसिद्ध गणित भूगोलवेत्ता थे और सिकन्दरिया (Alexandria) स्थित संसार की सर्वोच्च शिक्षा संस्था के पुस्तकालयाध्यक्ष थे। यहां इन्होंने अपने भौगोलिक ज्ञान में वृद्धि की तथा नक्षत्र विज्ञान व गणितीय भूगोल पर काफी लेख लिखे। इन्होने पृथ्वी की परिधि की गणना की थी जो शुद्ध माप से 14% अशुद्ध थी। उन्होंने उस समय के ज्ञात विश्व का मानचित्र भी बनाया था और पृथ्वी के वर्णन के लिए सर्वप्रथम ज्यॉग्राफी (Geography) शब्द का प्रयोग किया या भूगोल विषय पर पहली औपचारिक कृति ‘The Geographica’ नाम से इरेटास्थनीज ने ही लिखी।

13. हिप्पार्कस (Hipparchus) ⇒ 190-125 ई० पू०
हिप्पार्कस एक खगोलशास्त्री तथा गणितज्ञ था जिसने Equinoxes का पता लगाया तथा वर्ष की लम्बाई बतायीं। यह पहला विद्वान था जिसने असीरियाई गणित के आधार पर वृत्त को 360º में विभक्त किया था। इसने विषुवत रेखा तथा देशांतरीय वृत्त को वृहत्त वृत्त (Great Circle) बताया। इन्होंने ही नक्षत्रों के अध्ययन के लिए एस्ट्रोलेब (Astrolabe) नामक यंत्र का अविष्कार किया और इसकी सहायता से अक्षांश एवं देशांतर वृतों का भी निर्धारण किया। एस्ट्रोब नोमान की तुलना में सरलता से प्रयोग किया जा सकता था।
अक्षांस एवं देशांतर के आधार पर उसने विश्व को क्लाइमाटा (Climata) अर्थात अक्षांश पेटियों में विभाजित किया। अक्षांश एवं देशांतर रेखा जाल की सहायता से इसने ज्ञात विश्व को 11 जलवायु प्रदेशों में विभाजित किया था।
हिप्पार्कस ही पहला व्यक्ति था जिसने त्रि विमीय (Three Dimension) गोलाभ को दो विमीय (Two Dimension) तल में बदलने का तरीका खोज निकला, परिणामस्वरुप पृथ्वी के गोलीय भाग को समतल क्षेत्र में बनाना संभव हो पाया। इसने दो प्रक्षेप बनाने की विधि बताएँ- (1) समरूपीय प्रक्षेप (Stereographic Projection) और (2) लंबरेखीये प्रक्षेप (Orthographic Projection)। इसने अक्षांश और देशांतर के महत्व पर बल दिया। इस प्रकार उन्होंने वैज्ञानिक मानचित्र कला (Scientific Cartography) के क्षेत्र में सराहनीय कार्य किये।
14. पोसीडोनियस (Posidonius) ⇒ 135-50 ई० पू०
पोसिडोनियस एक महत्वपूर्ण यूनानी इतिहासकार और भूगोलवेता था। इन्होंने ने “द ओसियन” नामक पुस्तक लिखा था। इसको समुद्र विज्ञान का विशेषज्ञ माना जाता है। क्योंकि सर्वप्रथम इन्होंने ही बताया की पूर्णिमा (Full Moon) और अमावस्या (New Moon) के दिन सूर्य चन्द्रमा और पृथ्वी तीनो के एक सीध में होने के कारण समुद्र में दीर्घ ज्वार (Spring Tide) आते है और साथ ही कृष्ण पक्ष (Waning Moon) और शुक्ल पक्ष (Waxing Moon) को समकोण की स्थिती में होने के कारण लघु ज्वार (Neap Tide) आते हैं। महासागरों की गहराई ज्ञात करने वाला यह पहला भूगोलवेत्ता था। पोसिडोनियस ने भौतिक भूगोल को तर्कसंगत ढंग से विक्सित किया जिसके कारण इसे भौतिक भूगोल का पिता भी कहा जाता है।
रोमन भूगोलवेताओं का योगदान
1. स्ट्रेबो (Strabo) ⇒ 64-20 ई० पू०

⇒ स्ट्रैबो ने उस समय के बसे हुए संसार के ज्ञात भाग का वर्णन 17 पुस्तकों की ग्रंथमाला (Geographical Encyclopedia) के रूप में संकलित किया था।
⇒ स्ट्रेबो द्वारा तत्कालीन समस्त भौगोलिक ज्ञान को एक साथ एकत्रित कर एक सामान्य पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करने का सबसे पहला प्रयास किया गया।
⇒ प्राचीन भूगोल के विषय में जो जानकारी आज उपलब्ध है वह मुख्य रूप से स्ट्रेबो की ‘ज्योग्राफी’ से ही ली गई है, क्योंकि प्रारंभिक भूगोलवेत्ताओं द्वारा लिखी गई अधिकांश पुस्तकें विलुप्त हो चुकी हैं। स्ट्रैबो ने 43 ग्रंथों की रचना ‘ऐतिहासिक स्मृतियाँ’ (Historical Memories) के शीर्षक से की है।
⇒ स्ट्रैबो प्रथम विद्वान था जिसने संपूर्ण भौगोलिक प्रबंध, उसकी सभी चारों शाखाओं (गणितीय, भौतिक, राजनीतिक एवं ऐतिहासिक) के संबंध में लिखे।
⇒ भूगोल एवं इतिहास के बीच के गहरे संबंध को उसने स्पष्ट करने का प्रयास किया। इतिहास के विकास पर भूगोल के प्रभाव का वर्णन करते हुए उसने यह लिखा कि इटली की विशेष सुरक्षित भौगोलिक स्थिति के कारण ही इस देश के निवासी प्रगतिशील एवं विकासशील रहे हैं।
⇒ स्ट्रैबो को नियतिवादी चिंतन का प्रथम महत्त्वपूर्ण विचारक माना जाता है।
⇒ उसने पहली बार एटलस एवं विसुवियस पर्वत का वर्णन किया है। विसुवियस को उसने ‘जलता हुआ पर्वत’ कहा है।
⇒ उसने अधिवासित प्रदेशों के लिए ‘ओकुमेन’ (Oikoumene) शब्द का प्रयोग किया, जिसे वर्तमान समय में ‘इकुमेन’ (Ecumene) कहा जाता है।
⇒ स्ट्रैबो ने पृथ्वी को दीर्घायत अर्थात (Oblong) माना था।
2. प्लिनी (Pliny) ⇒ 27-79 ई० पू०
इन्होंने ‘हिस्टोरिया नेचुरेलिस‘ (Historia Naturalis) नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की थी जिसमें उसने ब्रह्माण्ड, जीव विज्ञान तथा मानव विज्ञान का वर्णन किया था।
3. टॉलमी (Ptolemy) ⇒ 90-168 ई०
टॉलमी ज्योतिष विज्ञान के प्रकाण्ड पण्डित थे। इनके अध्ययन के प्रमुख क्षेत्र गणितीय भूगोल, मानचित्र विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, आदि थे। इनके कार्य इरेटास्थनीज व स्ट्रैबों से काफी मिलते जुलते हैं। टॉलमी ने पृथ्वी को गोलाकार बताया था। अल्मागेस्ट (Almagest) टॉलमी की प्रसिद्ध पुस्तक है। इसमें गणितीय भूगोल तथा खगोलिकी की जटिल समस्याओं की चर्चा है। इन्होंने खगोलीय कार्यों के लिए कुछ यन्त्रों का प्रयोग किया था जिसमें टॉलमी मापक, म्यूरल चक्र यन्त्र (Mural Quardrand), गोला यन्त्र (Armillary), आदि प्रमुख हैं। मानचित्रांकन में टॉलमी ने प्रक्षेपों का सहारा लिया। टॉलमी ने अपने कार्यों में कुछ त्रुटियाँ भी की जिनका उत्तरकालीन भूगोलवेत्ताओं पर व्यापक प्रभाव पड़ा।
3. पोम्पोनियस मेला (Pomponiums) ⇒ 335-391 ई०
इसकी पुस्तक दो खण्डों में लैटिन भाषा में प्रकाशित हुई। प्रथम खण्ड कॉस्मोग्राफी (Cosmography) एवं द्वितीय खंड डी-कोरोग्राफिया (De-Georographia) के नाम से जाना जाता है।
भारत का भूगोल
Indian Geography Capsule 6
एक नजर में इन्हें जरुर देखें
1. क्षेत्रफल की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य है-
उत्तर- राजस्थान
2. मरकट द्वीप (एमराल्ड आइसलैंड) के नाम से प्रसिद्ध है-
उत्तर- अंडमान निकोबार द्वीप समूह
3. कोच्चि का जुड़वाँ नगर कहा जाता है-
उत्तर- एर्नाकुलम
4. क्षेत्रफल की दृष्टिकोण से भारत का सबसे छोटे राज्य है-
उत्तर- गोवा
5. रामेश्वरम किस राज्य में स्थित है-
उत्तर- तमिलनाडु
6. आदम का पुल (Adam’s Bridge) किन दो देशों के बीच स्थित है-
उत्तर- भारत एवं श्रीलंका
7. जनसंख्या की दृष्टिकोण से भारत का सबसे छोटा राज्य है-
उत्तर- सिक्किम
8. ग्लोब पर कर्क रेखा भारत के कितने राज्यों से होकर गुजरती है-
उत्तर- आठ
9. क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा जिला है-
उत्तर- कच्छ
10. मैकमोहन रेखा किन दो देशों को अलग करती है-
उत्तर- भारत – चीन
11. जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व मे स्थान है-
उत्तर- दूसरा (प्रथम चीन का)
12. हिन्द महासागर के तट पर स्थित देशों में सर्वाधिक तट की लम्बाई वाला देश है-
उत्तर- भारत
13. भारत की तट रेखा की कुल लंबाई लगभग है-
उत्तर- 7516.6 किमी०
14. गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियाँ किसका भाग है-
उत्तर- हिमालय का
15. जम्मू-कश्मीर सड़क मार्ग जवाहर सुरंग से होकर गुजरता है जिसका संबंध है-
उत्तर- बनिहाल दर्रे से
16. कश्मीर को शेष भारत से जोड़ता है-
उत्तर- बनिहाल दर्रा
17. हिमालय पर्वत का निर्माण हुआ है –
उत्तर- महाद्वीप-महाद्वीप प्लेटों के अभिसरण द्वारा
18. किस भारतीय राज्य का आंशिक भाग हिमालय पर्वत के उत्तर में स्थित है-
उत्तर- जम्मू-कश्मीर
19. केरल के तट पर मिलने वाले लैगून को कहा जाता है-
उत्तर- कयाल (Kyal)
20. चंडीगढ़ किस पहाड़ी के नीचे स्थित है-
उत्तर- शिवालिक पहाड़ी
21. भारत की दक्षिणतम पर्वतमाला है-
उत्तर- कार्डेमम पर्वतमाला
22. राँची का पठार उदाहरण है-
उत्तर- उत्थित पेनिप्लेन का
23. भारत का प्राचीनतम पर्वतक्रम है-
उत्तर- अरावली
24. भारत का कौन सा प्राचीन पथरी भाग सबसे ऊंचा उठा है-
उत्तर- पश्चिमी घाट की दक्षिणवर्ती पहाड़ियाँ
25. भाबर एक भू-स्वरूप है जो मिलता है-
उत्तर- शिवालिक के किनारे
26. धौलाधर पर्वत श्रेणी किस राज्य में स्थित है-
उत्तर- हिमाचल प्रदेश
27. हिमालय में सबसे गहन अपरदन है-
उत्तर- शिवालिक उपान्त में
28. सह्याद्री किस प्रकार के पर्वत का उदाहरण है–
उत्तर- भ्रंशोत्थ

उत्तर- असम
30. महाबलेश्वर किस राज्य में स्थित है-
उत्तर- महाराष्ट्र
31. हिमालय की कौन सी श्रेणी सर्वाधिक चौड़ी है-
उत्तर- महान हिमालय श्रेणी
32. सबसे नई पर्वत श्रेणी है-
उत्तर- शिवालिक
33. संरचनात्मक दृष्टि से शिलांग का पठार अंग है-
उत्तर- प्रायद्वीपीय भारत का
34. ‘पाट’ भूमि पाई जाती है-
उत्तर- छोटानागपुर में
35. हिमालय क्षेत्र में मिलने वाली ‘दून’ घाटियाँ किस प्रकार की है-
उत्तर- संकीर्ण अनुदैर्ध्य
36. हिमालय का सर्वाधिक ऊँचा भाग स्थित है-
उत्तर- नेपाल में
37. भारत और ट्रिम बेसिन के बीच जिस दर्रे से संपर्क स्थापित होता है, वह है-
उत्तर- काराकोरम दर्रा
38. भारत का कौन सा भू-आकृतिक विभाग प्राचीनतम है-
उत्तर- प्रायद्वीपीय पठार
39. पश्चिमी घाट पर्वत किस प्रकार की श्रेणी है-
उत्तर- ब्लॉक पर्वत
40. हिमालय में मुख्य सीमांत भ्रंश पृथक करता है-
उत्तर- मध्य हिमालय को शिवालिक से
41. जलोढ़ शंकुओं तथा अंत: शंकुओं के सबसे अच्छा उदाहरण किस राज्य में देखने को मिलता है-
उत्तर- बिहार
42. उत्तरांचल हिमालय में सर्वोच्च पर्वत शिखर कौन-सा है-
उत्तर- नन्दादेवी
43. धौलाधर तथा पीरपंजाल नामक पर्वत श्रेणियाँ अवस्थित है-
उत्तर- लघु हिमालय में
44. भाबर पेटी पाई जाती है-
उत्तर- हिमालय के गिरिपदीय क्षेत्रों में
45. अरावली पर्वतमाला महान जलविभाजक है-
उत्तर- सिंधु और गंगा नदी के बीच
46. तवा नदी किसकी सहायक नदी है-
उत्तर- गोदावरी
47. नदियों द्वारा अपने किनारों पर प्राकृतिक रूप से बनाए गए बांधों को किस नाम से जाता है-
उत्तर- लेवीज या तटबन्ध
48. हिमालय की नदियों की प्रमुख विशेषता है-
उत्तर- वर्षभर पानी का बहना
49. माही नदी गिरती है-
उत्तर- अरब सागर में
50. प्रायद्वीपीय पठार की आकृति है-
उत्तर- त्रिभुजाकार
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नोट : मैं आशा करता हूँ कि भारत का भूगोल से सम्बंधित सभी Capsule आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।
Thank You @ By Dr. Amar Kumar
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भूगोल- सामान्य भूगोल और भारत का भूगोल
1. बेबर के औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत
(Weber’s theory of industrial localization)
1. औद्योगिक स्थानीयकरण सिद्धांत की चर्चा करें।
2. बेबर के औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धत की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करें तथा वर्तमान समय में इसकी उपयोगिता की चर्चा करें।
औद्योगिक अवस्थिति का सिद्धांत
उद्योगों के स्थानीयकरण पर कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। इनमें कच्चा माल, बाजार, परिवहन, श्रमिक, तकनीकी उपलब्धता, ऊर्जा और अन्य संरचनात्मक सुविधाएँ प्रमुख हैं। सभी उद्योगों पर इन सभी कारकों का एक समान प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी असमानता को देखते हुए कई भूगोलवेताओं एवं अर्थशास्त्रियों ने उद्योगों के स्थानीयकरण की प्रवृति को सैद्धांतिक रूप देने का प्रयास किया है। इनमें से बेबर, हुबर, लॉश, फेटर, हौर्टलीन तथा स्मिथ का सिद्धांत प्रमुख हैं। इनमें से बेबर का सिद्धांत सबसे पुराना है। इस सिद्धांत को बेबर ने 1909 में दक्षिणी जर्मनी के औद्योगिक क्षेत्रों का अध्ययन कर प्रस्तुत किया। इनका सिद्धांत निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है:-
मान्यताएँ :-
बेबर ने बताया कि मेरा सिद्धांत वहीं पर लागू होगा जहाँ-
(1) एकाकी प्रदेश होगा तथा वह संपूर्ण प्रदेश एक ही प्रशासन के अन्तर्गत होगा।
(2) सम्पूर्ण प्रदेश में एक ही जलवायु, एक ही संस्कृति और एक समान जनसंख्या उपलब्ध हो या सम्पूर्ण प्रदेश में भौगोलिक समरूपता एक समान हो।
(3) एक समय में एक ही उद्योग की स्थानीयकरण का विश्लेषण किया जाता हो।
(4) कच्ची सामाग्री के स्रोत और इसकी भौगोलिक अवस्थिति का पूर्ण ज्ञान हो।
(5) बाजार की अवस्थिति का पूर्ण ज्ञान हो।
(6) श्रम उपलब्धता निश्चित हो तथा उसकी पूरी जानकारी हो।
(7) परिवहन लागत भार और दूरी के सापेक्ष में वास्तविक वृद्धि हो।
सिद्धांत / परिकल्पना
बेबर के अनुसार औद्योगिक स्थानीकरण सिद्धांत को न्यूतम परिवहन लागत का सिद्धांत कहते है। बेबर के अनुसार “न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान ही न्यूनतम उत्पादन लागत वाला स्थान होता है और न्यूनतम लागत वला स्थान ही उद्योगों की स्थापना के लिए उपयुक्त स्थान होता है।”
बेबर ने दूसरा परिकल्पना भी प्रस्तुत किया है। जैसे- “सस्ता श्रम और संरचनात्मक सुविधाएं इत्यादि उद्योगों के स्थानीयकरण को न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान से विचलित करता है।” अर्थात न्यूनतम श्रम लागत और संरचनात्मक सुविधाएं उद्योगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
ऊपर वर्णित मान्यताओं और परिकल्पनाओं के संदर्भ में बेबर ने प्रयोगों के स्थानीयकरण की दो परिस्थितियाँ बतायी है-
(1) प्रथम स्थिति में एक ही कच्चे माल पर उद्योग आधारित होता है।
(2) दूसरी परिस्थिति में एक से अधिक कच्चे माल पर उद्योग आधारित होते हैं।
I. पहली दश एक बाजार और एक कच्चा माल (R1)
एक कच्चे माल पर आधारित उद्योगों का स्थानीयकरण की तीन प्रवृति होती हैं-
(1) वैसा उद्योग जिसका कच्चा माल सर्वत्र उपलब्ध है। ऐसी स्थिति है। उद्योगों की स्थापना बजार के केन्द्र में होती है, क्योंकि वहाँ पर परिवहन लागत नगण्य होता है। जैसे- जूता मरम्मत उद्योग, छाता मरम्मत उद्योग।
(2) दूसरी परिस्थिति के अनुसार कच्चा माल अशुद्ध हो तथा स्थानीय हो तो वैसी स्थिति में उद्योगों की स्थापना माल के केन्द्र में होती है क्योंकि परिष्कृत समान की दुलाई कच्चे माल की दुलाई के तुलना में परिवहन लागत कम होता है। जैसे:- चीनी उद्योग।
नोट:- यहाँ अशुद्ध का तात्पर्य वजन ह्रास वाले उद्योग से है।
(3) तीसरी परिस्थिति के अनुसार वैसे उद्योग आते हैं जिनका कच्चा माल शुद्ध हो और स्थानीय तौर पर उपलब्ध हो। ऐसी उद्योगों की स्थापना बाजार क्षेत्र या कच्चे माल के क्षेत्र में किया जा सकता है। जैसे- वस्त्र उद्योग, रेडिमेट गार्मेन्ट उद्योग।
II. दूसरी दशा:- एक बाजार तथा दो से अधिक कच्चा माल (R2)
एक से अधिक कच्चे माल पर आधारित उद्योग के लिए बेबर ने त्रिभुजाकार मॉडल प्रस्तुत किया है। वेबर ने कहा है कि कई ऐसे उद्योग हैं जिसमें एक से अधिक कच्चे माल का प्रयोग होता है। जैसे लौह-इस्पाल उद्योग में लौह अयस्क, चूना पत्थर, कोयला, मैंगनीज, क्रोमियम जैसे खनिजों का प्रयोग होता है।
बेबर के अनुसार ऐसे उद्योगों का स्थानीयकरण सभी कच्चे माल से प्रभावित नहीं होता बल्कि कुछ कच्चे माल उद्योगों के स्थानीयकरण को प्रभावित करते हैं। जैसे- लौह-इस्पात उद्योग को लौह अयस्क एवं कोयला, सीमेन्ट उद्योग को चूना पत्थर एवं कोयला, एल्युमिनियम उद्योग को बॉक्साइट एवं विद्युत इत्यादि।
एक से अधिक कच्चे माल पर आधारित उद्योगों की स्थानीयकरण की व्याख्या करने हेतु दो परिस्थिति की चर्चा किया है।-
(1) वजन ह्रास उद्योग के संदर्भ में
(2) वजन वृद्धि उद्योग के संदर्भ में
(1) वजन ह्रास उद्योग के संदर्भ में
लौह-इस्पात उद्योग, सीमेन्ट उद्योग इत्यादि इसके अच्छे उदा० है। वजन द्वास उद्योग के अन्तर्गत सर्वाधिक अनुकूल स्थान दो कच्चे माल के बीच त्रिभुज के अन्तर्गत होता है। इसे नीचे के मॉडल से समझा जा सकता है-
उपरोक्त त्रिभुजाकार मॉडल सही अर्थों में लौह इस्पात उद्योग के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व अधिकांश लौह इस्पात उद्योग का विकास इसी अवधारणा के अनुसार हुआ है। जमशेदपुर का कौह इस्पात केन्द्र इस मॉडल का एक अच्छा उदा० है।
वेबर ने अपने त्रिभुजाकार मॉडल में बताया कि अगर उद्योग वजन ह्रास वाला है तो उसका स्थानीयकरण कच्चे माल के क्षेत्र से नजदीक होता है। जैसे-

(2) वजन वृद्धि उद्योग के संदर्भ में
बेबर ने वजन वृद्धि वाले उद्योग के स्थानीयकरण का व्याख्या करते हुए बताया कि ऐसे उद्योगों का स्थानीयकारण भी त्रिभुजाकार मॉडल के अनुरूप ही होगा लेकिन ऐसे उद्योग नगर से नजदीक होते हैं। जैसे- बेकरी उद्योग, सौन्दर्य प्रसाधन उद्योग, वस्त्र उद्योग।

बेबर ने स्वयं यह बताया है कि ऊपर वर्णित उद्योगों के स्थानीयकरण में दो कारणों से विचलन हो सकता-
(1) यदि किसी स्थान पर श्रमिक अत्यधिक सस्ते हो तो उस स्थिति में उद्योग न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान पर स्थापित न होकर न्यूनतम मजदूरी लागत वाला स्थान पर स्थापित होता है। न्यूनतम श्रमिक लागत वाला स्थान के निर्धारण हेतु उन्होंने Isodapane Line खींचा है। यह एक ऐसी काल्पनिक रेखा है जो उन सभी बिन्दुओं को मिलाती है जहाँ न्यूनतम परिवहन लागत केन्द्र से परिवहन लागत में समान वृद्धि होती है। जैसे-

बेबर का Isodapane Line
वह आइसोडापेन रेखा जिसपर न्यूनतम श्रम लागत आता है उसी स्थान पर उद्योगों की स्थापना की जाती है। न्यूनतम श्रमिक लागत वाला आइसोडापेन लाइन को Critical Isodapane Lime कहते हैं।
नोट: फुटलुज उद्योग – वैसा उद्योग जिसकी स्थापना कहीं भी की जा सकती है जहाँ संरचनात्मक सुविधाएँ उपलब्ध हो।
बेबर के द्वारा प्रस्तुत न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत के आलोचकों में हुबर, हॉटलीन फेटर, और स्मिथ अग्रणी है।
1. हुबर न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान न्यूनतम उत्पादन लागत का स्थान नहीं हो सकता क्योंकि उद्योगों के स्थानीयकरण को न केवल परिवहन प्रभावित करता है बल्कि तकनीकी लागत, श्रमिक लागत, ऊर्जा लागत इत्यादि का भी प्रभाव पड़ता है।
हूबर – दो से अधिक कच्चे माल का प्रयोग करने वाले उद्योगों का स्थानीयकरण त्रिभुज के अन्दर हो यह कोई जरूरी नहीं है। आज विश्व में अधिकांश इस्पात उद्योगों का विकास समुद्र के तटवर्ती क्षेत्र में हो रहा है न कि बेबर के त्रिभुजाकार मॉडल के अनुसार।
फेटर, हाटलीन और स्मिथ जैसे आचारपरक भूगोलवेताओं ने कहा है कि उद्योगों का स्थानीयकरण उपभोक्ताओं की इच्छा और क्रय क्षमता पर निर्भर करता है। हॉटलीन एवं फेटर ने मियामी बिच (USA) के पास विकसित आइसक्रीम उद्योगो का हवाला देते हुए यह बताया है कि यहाँ पर आइसक्रीम उद्योग विश्व का सर्वाधिक लागत वाला उद्योग है। फिर भी पर्यटकों के व्यवहार (मांग) के कारण इस उद्योग का यहाँ विकास हुआ है।
अनेक आलोचकों ने बेबर के मान्यता को ध्यान में रखकर आलोचना किया है। जैसे- वर्तमान समय में कोई प्रदेश एकाकी प्रदेश नहीं हो सकता है और न ही उसमें भौगोलिक समरूपता पायी जा सकती है। इसी तरह बढ़ते दूरी एवं भार के अनुसार परिवहन मूल्य (भाड़ा) में सापेक्षिक वृद्धि भी नहीं हो सकती है।
आलोचनात्मक मूल्यांकन
इन आलोचनाओं के बावजूद बेबर के सिद्धांत का अपना महत्व है क्योंकि आज भी यह सिद्धांत चीनी उद्योग, वस्त्र उद्योग, खाद्य सामाग्री उद्योग के स्थानीयकरण की सटीक व्याख्या करता है। कुछ भूगोलवेताओं का यह भी कहना है कि समुद्री तट के किनारे विकसित होने वाले इस्पात उद्योग वर्तमान समय में बेबर के सिद्धांत के अनुरूप ही हो रहा है। जैसे- भारत का विशाखापतनम, जापान कोबे, USA का बाल्कि मोर इसके अच्छे उदाहरण हैं। भारत का विशाखापतनम कारखाना, बेलाडीला और डॉलीराजहरा से लौह-अयस्क प्राप्त करता है। और कोयला का आयात न्यूनतम परिवहन लागत के कारण विदेशों से ही किया जाता है। इस तरह विशाखापतनम न्यूनतम परिवहन लागत इस्पात का प्रमुख केन्द्र बना है।
निष्कर्ष :
अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि कुछ खामियों के बावजूद बेबर का न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत चिरसंवतकालीन सिद्धांत है। यह सिद्धांत सुती वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योगो, लौह- इस्पात उद्योगों के स्थानीयकरण की सटीक व्याख्या करने में सक्षम है।
भारत का भूगोल
Indian Geography Capsule 5

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नोट : मैं आशा करता हूँ कि भारत का भूगोल से सम्बंधित सभी Capsule आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।
Thank You @ By Dr. Amar Kumar
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भूगोल- सामान्य भूगोल और भारत का भूगोल
भारत का भूगोल
Indian Geography Capsule 8
| क्रम | नगर का नाम | नदियाँ |
| 1. | आगरा | यमुना |
| 2. | बद्रीनाथ | अलकनंदा |
| 3. | प्रयागराज | गंगा, यमुना |
| 4. | दिल्ली, कोंटासाहेब, मथुरा | यमुना |
| 5. | फिरोजपुर | सतलज |
| 6. | हरिद्वार, ऋषिकेष | गंगा |
| 7. | कानपुर, बक्सर | गंगा |
| 8. | अयोध्या, फैजाबाद | सरयू |
| 9. | कोलकाता, हल्दिया, डायमण्ड हार्बर | हुगली |
| 10. | लखनऊ | गोमती |
| 11. | डिब्रूगढ़ | ब्रह्मपुत्र |
| 12. | गुवाहाटी | ब्रह्मपुत्र |
| 13. | जबलपुर | नर्मदा |
| 14. | कोटा | चम्बल |
| 15. | कुर्नूल | तुंगभद्रा |
| 16. | सोकोवा घाट | ब्रह्मपुत्र |
| 17. | कन्नौज | गंगा |
| 18. | श्रीनगर, लेह | झेलम |
| 19. | सूरत | ताप्ती |
| 20. | हैदराबाद | मूसी |
| 21. | मथुरा | यमुना |
| 22. | अहमदाबाद, गांधीनगर | साबरमती |
| 23. | राँची, जमशेदपुर | स्वर्णरेखा नदी |
| 24. | पंढरपुर | भीमा नदी |
| 25. | बरेली | रामगंगा |
| 26. | कटक, भुवनेश्वर | महानदी |
| 27. | नासिक | गोदावरी |
| 28. | सम्बलपुर | महानदी |
| 29. | श्रीरंगपट्टनम | कावेरी |
| 30. | जौनपुर | गोमती |
| 31. | ओरछा | बेतबा |
| 32. | वाराणसी | गंगा |
| 33. | उज्जैन, कोटा | क्षिप्रा |
| 34. | लुधियाना | सतलज |
| 35. | विजयवाड़ा | कृष्णा |
| 36. | तिरुचिरापल्ली, मैसूर | कावेरी |
| 37. | पटना | गंगा |
| 38. | भागलपुर, फरक्का | गंगा |
| 39. | मुंगेर | गंगा |
| 40. | सोनपुर, हाजीपुर | गंडक |
| 41. | गोरखपुर | रापती |
| 42. | गंगटोक | तिस्ता |
| 43. | बोधगया | निरंजना |
| 44. | गया | फल्गु |
| 45. | लखीसराय | किऊल |
| 46. | मुम्बई | माहिम |
| 47. | जम्मू | तवी |
| 48. | दुर्ग, रायपुर | शिवनाथ |

बद्रीनाथ
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भारत का भूगोल
Indian Geography Capsule 7
| क्रम | झील का नाम | सम्बंधित राज्य |
| 1. | वुलर झील | जम्मू कश्मीर |
| 2. | बैरीनाग झील | जम्मू कश्मीर |
| 3. | मानसबल झील | जम्मू कश्मीर |
| 4. | शेषनाग झील | जम्मू कश्मीर |
| 5. | अनंतनाग झील | जम्मू कश्मीर |
| 6. | डल झील | जम्मू कश्मीर |
| 7. | नागिन झील | जम्मू कश्मीर |
| 8. | राजसमंद झील | राजस्थान |
| 9. | पिछौला झील | राजस्थान |
| 10. | सांभर झील | राजस्थान |
| 11. | लूणकरनसर झील | राजस्थान |
| 12. | जयसमंद झील | राजस्थान |
| 13. | फतेहसागर झील | राजस्थान |
| 14. | डीडवाना झील | राजस्थान |
| 15. | सातताल झील | उत्तराखंड |
| 16. | नैनीताल झील | उत्तराखंड |
| 17. | राकसताल झील | उत्तराखंड |
| 18. | मालताल झील | उत्तराखंड |
| 19. | देवताल झील | उत्तराखंड |
| 20. | खुरपताल झील | उत्तराखंड |
| 21. | नौकुछियाताल झील | उत्तराखंड |
| 22. | हुसैनसागर झील | आंध्र प्रदेश |
| 23. | कोलेरू झील | आंध्र प्रदेश |
| 24. | पुलीकट झील | तमिलनाडु व आंध्र प्रदेश |
| 25. | बेम्बनाड झील | केरल |
| 26. | पेरियार झील | केरल |
| 27. | अष्टमुदि झील | केरल |
| 28. | लोकटक झील | मणिपुर |
| 29. | चिल्का झील | ओडिशा |
| 30. | लोनार झील | महाराष्ट्र |
| क्रम | जलप्रपात | स्थिति | ऊँचाई |
| 1. | धुँआधार | नर्मदा नदी | 10 मीटर |
| 2. | येन्ना | नर्मदा नदी | 183 मीटर |
| 3. | चूलिया | चम्बल नदी | 18 मीटर |
| 4. | पुनासा | चम्बल नदी | 12 मीटर |
| 5. | शिवसमुद्रम | कावेरी नदी | 90 मीटर |
| 6. | गोकक | गोकक नदी | 55 मीटर |
| 7. | बिहार | टोंस नदी | 100 मीटर |
| 8. | हुंडरू | स्वर्णरेखा नदी | 74 मीटर |
| 9. | जोग या गरसोप्पा | शरावती नदी | 255 मीटर |
| 10. | पायकारा | नीलगिरि क्षेत्र | — |

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नोट : मैं आशा करता हूँ कि भारत का भूगोल से सम्बंधित सभी Capsule आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।
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भूगोल- सामान्य भूगोल और भारत का भूगोल
(भारत का भूगोल)
Indian Geography Cpasule 4
एक नजर में इन्हें जरुर देखें
1. गंगा का उद्गगम स्रोत है-
उत्तर- गंगोत्री हिमानी
2. अलकनंदा का उद्गगम स्रोत है-
उत्तर- सतोपंथ हिमानी
3. देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा के संगम के बाद किस नाम से जानी जाती है-
उत्तर- गंगा
4. भागीरथी और अलकनंदा का संगम है-
उत्तर- देवप्रयाग
5. अलकनंदा और मंदाकिनी का संगम है-
उत्तर- रुद्रप्रयाग
6. गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है-
उत्तर- यमुना
7. गंगा को बांग्लादेश में किस नाम से जाना जाता है-
उत्तर- पदमा
8. तिब्बत (चीन) में ब्रह्मपुत्र नदी को कहा जाता है-
उत्तर- सांग्पो
9. गंगा एवं ब्रह्मपुत्र नदी की संयुक्त धारा को कहा जाता है-
उत्तर- मेघना
10. ब्रह्मपुत्र नदी को भारत मे प्रवेश करने पर अरुणाचल प्रदेश में कहा जाता है-
उत्तर- दिहांग
11. ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश में किस नाम से बहती है-
उत्तर- जमुना
12. पोंग बाँध स्थित है-
उत्तर- व्यास नदी पर (हिमाचल प्रदेश में)
13. थीन बाँध स्थित है-
उत्तर- रावी नदी पर (पंजाब में)
14. वृद्धा गंगा या दक्षिण गंगा के नाम से जाना जाता है-
उत्तर- गोदावरी नदी
15. नर्मदा नदी का उद्गगम स्थल है-
उत्तर- अमरकंटक की पहाड़ियाँ
16. पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ जो डेल्टा नहीं बनती है-
उत्तर- नर्मदा एवं ताप्ती
17. नर्मदा नदी की जुड़वाँ नदी कहा जाता है-
उत्तर- ताप्ती नदी को
18. गुजरात की जीवन रेखा कहा जाता है-
उत्तर- नर्मदा नदी को
19. नर्मदा नदी सर्वाधिक बहती है-
उत्तर- मध्यप्रदेश में
20. प्रायद्वीपीय भारत की सबसे बड़ी नदी है-
उत्तर- गोदावरी नदी
21. गोदावरी नदी का उद्गगम स्थान है-
उत्तर- नासिक के निकट ऋयंबक पहाड़ी
22. नासिक स्थित है-
उत्तर- गोदावरी नदी के तट पर
23. प्रायद्वीपीय भारत की दूसरी सबसे बड़ी नदी है-
उत्तर- कृष्णा नदी
24. विंध्याचल एवं सतपुड़ा पर्वत श्रेणी के बीच बहने वाली नदी है-
उत्तर- नर्मदा
25. गंगा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, पेन्नार तथा बैगाई नदियाँ गिरती है-
उत्तर- बंगाल की खाड़ी में
Indian Geography Cpasule 4
26. सिन्धु, नर्मदा तथा ताप्ती नदियाँ गिरती है-
उत्तर- अरब सागर में
27. गोकक जल प्रपात स्थित है-
उत्तर- गोकक नदी पर (कर्नाटक में)
28. दिल्ली तथा आगरा स्थित है-
उत्तर- यमुना नदी के किनारे
29. श्रीरंगपट्टम अवस्थित है-
उत्तर- कावेरी नदी तट पर
30. दक्षिण से उत्तर की ओर बहने वाली नदी है-
उत्तर- बेतबा
31. भारत के सबसे दक्षिण में स्थित नदी है-
उत्तर- वैगई
32. देश की पहली बहुद्देश्यीय परियोजना है-
उत्तर- दामोदर घाटी परियोजना (1948 में)
33. शिवसमुद्रम जल विद्युत परियोजना स्थित है-
उत्तर- कावेरी नदी पर
34. भारत की प्रथम जल विद्युत परियोजना है-
उत्तर- शिवसमुद्रम (1902 में)
35. भारत मे मानव निर्मित अर्थात कृत्रिम सबसे बड़ी झील है-
उत्तर- गोविंदसागर झील (भाखड़ा-नांगल बाँध से निर्मित)
36. सर्वाधिक सीधी बहने वाली नदी है-
उत्तर- नर्मदा नदी
37. भारत की सबसे लम्बी नहर इंदिरा गाँधी नहर (राजस्थान) जल प्राप्त करता है-
उत्तर- सतजल नदी से
38. जो नदी डेल्टा का निर्माण नहीं करती है उसके मुहाने को कहा जाता है-
उत्तर- एश्चुअरी या ज्वारमुख
39. नदी द्वारा लाये गए मलवो का जमाव जब मुहाने पर होता है तो निर्माण होता है-
उत्तर- डेल्टा का
40. राजस्थान की एकमात्र नदी जो सालोंभर बहती है-
उत्तर- चम्बल नदी
41. चूलिया जलप्रपात स्थित है-
उत्तर- चंबल नदी पर
42. सिंधु नदी भारत के किस राज्य से होकर बहती है-
उत्तर- केवल जम्मू एवं कश्मीर से
43. कावेरी नदी का उद्गगम स्थान है-
उत्तर- ब्रह्मगिरि पहाड़ी (कर्नाटक)
44. ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गगम स्थल है-
उत्तर- मानसरोवर झील (तिब्बत में)
45. व्यास नदी का उद्गगम स्थल है-
उत्तर- व्यास कुण्ड
46. झेलम नदी का उद्गगम स्थल है-
उत्तर- शेषनाग झील

शेषनाग झील
उत्तर- मानसरोवर झील के पास स्थित राकस ताल झील
48. सिंधु नदी का उद्गगम स्थल है-
उत्तर- मानसरोवर झील के पास सानोख्याबाब हिमनद से
49. सोन नदी का उद्गगम स्थल है-
उत्तर- अमरकंटक की पहाड़ियाँ
50. कृष्णा नदी का उद्गगम स्थल है-
उत्तर- महाबलेश्वर के समीप पश्चिमी घाट पहाड़ से
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नोट : मैं आशा करता हूँ कि भारत का भूगोल से सम्बंधित सभी Capsule आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।
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भूगोल- सामान्य भूगोल और भारत का भूगोल