Archives 2022

8. एशिया का पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरण / Distribution and Production of Petroleum of Asia

8. एशिया का पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरण 

(Distribution and Production of Petroleum of Asia)


एशिया का पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरणएशिया का पेट्रोलियम

        शक्ति के साधनों में कोयला के बाद पेट्रोलियम का दूसरा स्थान है। परिवहन सुविधा के कारण इसका खर्चा कम आता है। आधुनिक युग में संसार की बढ़ती हुई यातायात की मांग तथा तेज रफ्तार में चलने वाले यंत्रों की चालक शक्ति के कारण पेट्रोलियम की काफी अधिक मांग है। औद्योगिक युग का विस्तार तथा विकास प्रत्यक्ष रूप से पेट्रोलियम की प्राप्ति पर निर्भर करता है।

उत्पादन: 

          एशिया महाद्वीप विश्व का लगभग 40% खनिज तेल अथवा पेट्रोलियम का उत्पादन करता है। दक्षिणी-पश्चिमी एशिया के तेल उत्पादक देश ईरान, इराक, सऊदी अरब, कुवैत, कतार, बहरीन, टर्की, इजरायल, आदि है। दक्षिणी-पूर्वी एशिया तथा एशियाई रूस में भी तेल का उत्पादन किया जाता है। दक्षिणी-पूर्वी एशिया के पेट्रोलियम उत्पादक देश इण्डोनेशिया, चीन, ब्रूनी, मलेशिया, म्यांमार आदि हैं

पेट्रोलियम का वितरण (Distribution of Petroleum): 

           एशिया में खनिज तेल का वितरण निम्नलिखित है-

1. दक्षिणी-पश्चिमी एशिया (South-West Asia):

               दक्षिण-पश्चिम एशिया आज केवल एशिया का ही नहीं बल्कि विश्व को सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पादक क्षेत्र है। यहाँ पर पेट्रोलियम का काफी विशाल भण्डार है। यहाँ तेल के अनेक कुएँ हैं। इन तेल भण्डारो को पाइप लाइन से आपस में जोड़ दिया गया है। यह तेल पाइप भूमध्य सागर के पूर्वी किनारे के तट तक फैले हुए हैं।

             हैफा और त्रिपोली बन्दरगाह को इस तेल की बहुत मात्रा इन पाइप लाइन से पहुँचा दी जाती है जहाँ से तेल का निर्यात किया जाता है। ईरान का आबादान तेल शोधन करने का विश्व में सबसे बड़ा केन्द्र है। दक्षिण-पश्चिमी एशिया के प्रमुख तेल क्षेत्र निम्नलिखित हैं –

सऊदी अरब: 

       संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सोवियत रूस के बाद सऊदी अरब विश्व का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। यहाँ रासतबूरा पत्तन के समीप दाहरीन क्षेत्र में तेल कूपों का आविष्कार 1936 में हुआ। इसके बाद अबैक्वेक और घावर क्षेत्र की खोज हुई। इस क्षेत्र में पेट्रोलियम उत्पादन फार्म इतनी शीघ्र प्रगति कर गया कि इस देश में पेट्रोलियम उत्पादन मुख्य पेशा बन गया। यहाँ से लेवनान के सिदोन पत्तन तक पाइप लाईन है। यहाँ पेट्रोलियम की सुरक्षित सम्पत्ति अति विशाल है।

         यहाँ के प्रमुख तेल क्षेत्र अल खाबर, अवकेक, हाफर, शेदगम, दम्माम सफानिया, कानिफ खुरेस, आबू अली, आबू, हिरेन, फथीली आदि है। रासतनूरा यहाँ का तेल शोधन केन्द्र है। यहां जल की कमी, तापमान की अधिकता, बालू के स्तूपों की प्रचुरता तथा परिवहन सुविधाओं में कमी पेट्रोल के विकास में प्रधान बाधायें है।

ईरान: 

           सउदी अरब के बाद ईरान एशिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। लेकिन ईराक-ईरान युद्ध के कारण यहाँ खनिज तेल का उत्पादन काफी गिर गया है। यहाँ 1908 में मस्जिदे सुलेमान पेट्रोल क्षेत्रों के अन्तर्गत पेट्रोल उत्पादन कार्य आरम्भ किया। यहाँ का प्रमुख तेल क्षेत्र आगाजरी, मस्जिदे सुलमान, हफ्ते केल, गाकसरन, नपत खानाह, नपतेशाह, नपते सफीद, लाली, गुलखरी, मारून आदि है।

         आबादान और करमन शाह यहाँ के तेल शोधन केन्द्र है। इस देश में पेट्रोल उत्पादन कार्य एंग्लो ईरानी कम्पनी के द्वारा होता था। अंग्रेज और ईरानी सरकार के बीच मतभेद हो जाने पर 1951 में इस कम्पनी का राष्ट्रीयकरण कर लिया जिससे कुछ समय के लिए उत्पादन कार्य ठप्प हो गया। इस कारण 1953 में यहाँ से मात्र 90 लाख वैरल पेट्रोल प्राप्त हुआ। इसके पश्चात् पुन: समझौता हो जाने के बाद पेट्रोल उत्पादन की व्यवस्था पूर्ववत हो गयी।

इराक: 

          पेट्रोल उत्पादन में इसका स्थान छठा है। 1927 में किरकुक पेट्रोल क्षेत्र के अन्तर्गत बाबागुरगुर स्थान पर पेट्रोल का पता लगा और वहाँ तेल कूप बनाये गये। सन् 1934 तक पेट्रोल उत्पादन में विशेष प्रगति नहीं हो पायी। कुछ वर्ष पूर्व किरकुक से त्रिपोली तथा हैफा पत्तनी तक तेल की पाइप लाइन बिछाई गयी। 1952 में यहाँ से सीरिया के बनेस स्थान तक पाइप लाइन ले जाई गयी।

        पेट्रोल उत्पादन के लिए डच, फ्रांसीसी तथा अमेरिकन कम्पनियों को लाइसेंस प्राप्त हुए हैं। प्रतिवर्ष यहाँ लगभग 3.4 करोड़ मीट्रिक टन पेट्रोल उत्पन्न किया जाता है। यहां के प्रमुख तेल क्षेत्र ऐनजलेह, मौसल, केयारा, किरकुक, जाम्बुरी, नहर उमर, जुबैर, रूमैला, बसरा खानविवन आदि है। किरकुक यहाँ का सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है। दौरा तथा करमनशाह में तेलशोधक कारखाने हैं। इसक अपने कुल उत्पादन का 80 प्रतिशत तेल निर्यात कर देता है।

कुवैत: 

       सुरक्षित मात्रा के विचार से इसका संसार में तीसरा स्थान है परन्तु उत्पादन में इसका चौथा स्थान है। यहाँ वर्धन क्षेत्र से पेट्रोल प्राप्त होता है। इस क्षेत्र में पेट्रोल निकालने का लाइसेंस एंग्लो अमेरिकन कम्पनी को प्राप्त हुआ है। यहाँ तेल फारस की खाड़ी के तट के समीप फैला हुआ है। यहाँ के प्रमुख तेल क्षेत्र बरगन, अलजहरा, मगब इत्यादि हैं। बरगन सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है। मीना अल अहमदी तेल शोधन केन्द्र तथा निर्यात करने वाला बन्दरगाह है।

कतार:

       फारस की खाड़ी के पश्चिमी तट पर स्थित कतार दक्षिणी-पश्चिमी एशिया का महत्वपूर्ण तेल उत्पादक देश है। यहाँ तेल के 24 कुएँ हैं। दूखन तेल क्षेत्र यहाँ का सबसे बड़ा तेल उत्पादक क्षेत्र है। दोहा में तेल शोधक कारखाना है। 

बहरीन:

        कुवैत और कतार के मध्य स्थित बहरीन फारस की खाड़ी का एक महत्वपूर्ण द्वीप है। यहाँ तटीय क्षेत्र में तेल के अनेक क्षेत्र फैले हुए हैं। बहेसि यहाँ का सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है। बहरीन में तेल शोधक कारखाना भी है। 

सीरिया: 

        यहाँ तेल उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र बनियास है। यहाँ नये तेल क्षेत्रों का पता लगाने के लिए मनहल कम्पनी काफी प्रयत्न कर रही है। होम्स नगर में तेल शोधन कारखाना है।

टर्की: 

       यहाँ का तेल क्षेत्र 1,21,000 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है। यहाँ तेल उत्पादक दो क्षेत्र है- (i) रमन और (ii) बरजन इस क्षेत्र में तेल प्राप्त करने का कार्य सरकार की टर्किश पेट्रोलियम कम्पनी करती है। वरजन तेल क्षेत्र से सन् 1949 ई. में प्रथम बार तेल प्राप्त किया गया। इस क्षेत्र का सम्भावित तेल भण्डार लगभग 525 लाख बैरल है।

        विभिन्न योजनाओं में ईरान और तुर्की के बीच 985 कि.मी. लम्बी पाइप लाइन का निर्माण किया। यहाँ दो पम्पिंग स्टेशनों की स्थापना की गयी। इनकी क्षमता 9000 से 10,000 अश्व शक्ति है। यहाँ प्रतिवर्ष 3.56 करोड़ टन कच्चा तेल पम्प करने के लिए प्राप्त होता है। 

दक्षिणी-पूर्वी एशिया  के तेल:

           क्षेत्र दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में तेल के उत्पादन की बहुत कमी है। इसका कारण यहाँ के तेल भण्डारों में सुरक्षित तेल की मात्रा कम होना है। दक्षिणी-पूर्वी एशिया में इण्डोनेशिया सबसे अधिक तेल का उत्पादन करता है। इस क्षेत्र के प्रमुख देशों के तेल क्षेत्र निम्न प्रकार है – 

1. इण्डोनेशिया:

         इण्डोनेशिया दक्षिणी पूर्वी एशिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक राष्ट्र है। यहाँ तेल के प्रमुख क्षेत्र सुमात्रा, जावा तथा कालीमण्टन (बोर्नियों) में है। सुमात्रा से पैलेमबाग, मेदन व जाम्बी, कालीमण्टन (बोर्नियों) में बालिक, पापन व तराकन तथा जावा में रेमबाग तथा सुरखाया प्रमुख तेल क्षेत्र हैं। सुमात्रा में मेदन तथा साबाग तेलशोधक केन्द्र है।

2. चीन: 

        चीन के दक्षिणी भाग में अनेक तेल के क्षेत्र पाए जाते हैं, जिनमें से काराभाई, तुन्शाजे, सैदाम बेसिन, आदि प्रमुख है।

3. म्यांमार: 

         म्यांमार के प्रमुख तेल क्षेत्र येनाग, सिगू, डण्डो, यनान्मा आदि है। यंगून (रंगून) तथा बेनांगयांग तेल शोधन केन्द्र है। यहाँ से विश्व का लगभग 1% खनिज तेल प्राप्त किया जाता है। यहाँ इरावदी नदी घाटी में तेल के कुएँ खोदे गए है। 

4. मलेशिया: 

               मलेशिया के प्रमुख तेल क्षेत्र साबाह तथा साराबाक है। लुटांग तेल शोधन केन्द्र है।

5. भारत:

         यहाँ गुजरात तथा असम राज्य प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादक है। मुम्बई के निकट मुम्बई हाई से बड़ी मात्रा में खनिज तेल निकाला जाता है। अभी हाल में गोदावरी डेल्टा में, कावेरी डेल्टा में तथा पश्चिमी राजस्थान में भी खनिज तेल के पर्याप्त भण्डा पाए गये है।

प्रश्न प्रारूप 

1. एशिया में पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितण की विवेचना कीजिए।

(Discuss the production and distribution of petroleum in Asia.) 

7. एशिया का कोयले के उत्पादन एवं वितरण / Distribution and Production of Coal of Asia

7. एशिया का कोयले के उत्पादन एवं वितरण

(Distribution and Production of Coal of Asia)


एशिया का कोयले के उत्पादन एवं वितरण⇒एशिया का कोयले

            शक्ति के साधनों में कोयला संसार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण खनिज पदार्थ है। आज के औद्योगिक युग में कोयले का महत्व और बढ़ गया है क्योंकि अनेक विशाल उद्योग कोयले पर ही निर्भर है। कोयला पृथ्वी के अन्दर चट्टानों के रूप में अनेक पत में पाया जाता है। इसमें प्रमुख रूप से कार्बन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, राख आदि पदार्थ प्राप्त होते है। कार्बन की मात्रानुसार कोयले के निम्नलिखित भेद है-

1. एन्थेसाइट: यह अच्छी किस्म का कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 90% से 959 तक होती है। इसका सामान्य प्रयोग घरेलू ईंधन के रूप में किया जाता है। 

2. विटूमीनस: यह भी अच्छी किस्म का कोयला है। इसमें कार्बनिक मात्रा 75 से 90 प्रतिशत तक होती है। इसका सामान्य प्रयोग उद्योग में शक्ति के रूप में किया जाता है।

3. लिग्नाइट: इसे भूरे कोयले के नाम से जाना जाता है। यह घटिया किस्म का अशुद्ध कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 40 से 60% तक होती है। इसमें मोम व कृत्रिम पेट्रोल बनाया जाता है।

4. पीट: यह कच्चा कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 40 प्रतिशत होती है। यह कोलतार बनाने में प्रयोग किया जाता है। 

उत्पादन (Production)

          एशिया समस्त विश्व के कुल कोयला उत्पादन का लगभग 27% भाग उत्पादन करता है। एशिया के प्रमुख कोयला उत्पादक देश चीन, भारत, जापान, एशियाई रूस, दक्षिणी एवं उत्तरी कोरिया, टर्की, ताईवान आदि है।

भारत: भारत संसार का लगभग 7% तथा एशिया का 14% कोयला उत्पन्न करता है। यहाँ कोयला झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों से निकला जाता है। कुछ मात्रा में कोयला उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, असम, बिहार तथा जम्मू-कश्मीर में भी है। भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण के अनुसार देश में 23.411.4 करोड़ टन कोयला के भण्डार है।

जापान: देश का अधिकांश कोयला उत्तरी क्यूशू द्वीप की चिकूहो, सागा, होकुशू तथा मिको खानी से निकाला जाता है। थोड़ी मात्रा होकैडो द्वीप की इशीकारी व कुशिरों खानों से एवं होन्शू की जीवान एवं उबे खानों से निकाला जाता है। जापान अपनी अधिकांश आवश्यकता का कोयला आयात करता है। 

चीन: एशिया एवं विश्व में कोयला का सर्वाधिक उत्पादन चीन में होता है। यहाँ कोयला का खनन हेदी, हिलोगजिआग, हेनान, लिआओनिंग शानडॉग, शान्सी, सिचुआन, निगजिआ तथा नी मंगोल क्षेत्रों में होता है। यहाँ कोयले का उत्पादन विश्व उत्पादन का 35% है। 

कोरिया: उत्तरी कोरिया की एलांग खाड़ी के तट क्षेत्र तथा दक्षिणी कोरिया दक्षिणी पूर्वी क्षेत्र भी प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र है। उत्तरी कोरिया में दक्षिणी कोरिया की अपेक्षा अधिक कोयला मिलता है।

पाकिस्तान: पाकिस्तान में अच्छे किस्म के कोयले की कमी है परन्तु टर्शियरी किस्म का कोयला यहाँ अधिक पाया जाता है। यहाँ कोयले का उत्पादन 2140 हजार टन है। कोयला यहां रावलपिडी, मजराबल तथा हैदराबाद में पाया जाता है।

म्यांमार: कोयला यहाँ चिन्दविन घाटी तथा शान पठार पर निकाला जाता है। 

थाइलैण्ड: कोयला थाइलैण्ड में दक्षिणी थाइलैण्ड के क्रावी क्षेत्र में मायेमोह की खानों से निकाला जाता है। यह घटिया किस्म का कोयला है। आमफरली में भी लिग्नाइट कोयले के भण्डार मिले हैं। 

मलेशिया: यहाँ घटिया किस्म का कोयला मिलता है जो कुछ गहराई पर निकाला जाता है। इस कारण यह कम निकाला जाता है। मलाया में कोयला सेलांगोर, सारावाक, सिलाप्टेक एवं साबाह में पाया जाता है।

 इण्डोनेशिया: इन्डोनेशिया का सबसे अधिक कोयला सुमात्रा द्वीप में पाया जाता है। कोयले की मुख्य खाने दक्षिण सुमात्रा में बुकिन आसाम तथा मध्य सुमात्रा में ओमविलिन में है। कालीमण्टन की महाकाम क्षेत्र की खानों में भी कोयला का उत्पादन होता है।

ताइवान: कोयला यहाँ का प्रमुख खनिज है। यहाँ के सम्पूर्ण भण्डार का 80 प्रतिशत उत्तरी ताइवान में पाया जाता है। इस कोयले की प्रमुख खाने चिलाओ, नानचुआंग, हिब्रू, कीलंग आदि है। यहाँ का लगभग 75 प्रतिशत कोयला विटमिनस किस्म का है जो धरातल पर कम गहराई में मिलता है।

सोवियत एशिया: कोयला साइबेरिया का मुख्य खनिज है। कोयला के भण्डारों के दृष्टिकोण से यह विश्व का धनी देश है। अन्तर्राष्ट्रीय भू-वैज्ञानिक कांग्रेस के अनुसार साइबेरिया में 1,73,900 करोड़ मीट्रिक टन कोयले का भण्डार है। साइबेरिया में कोयला उत्पादन क्षेत्र हैं- कुण्नेटस्क बेसीन यनीसो, लीना बेसीन चिलियाविस्क, इर्कुटस्क मिनुसिक्स, कारागंडा, आमूर दी की घाटी, ट्रान्स बैकाल ।

बांग्लादेश: खनिज पदार्थ के दृष्टिकोण से यह काफी निर्धन राष्ट्र है। यहाँ घटिया कोयला पाया जाता है। यहाँ के प्रमुख कोयला क्षेत्र रंगपुर, फरीदपुर, खुलना, मैमन सिंह इत्यादि हैं।

अफगानिस्तान: अफगानिस्तान में सबसे अधिक मात्रा में हिन्दुकुश पर्वतीय क्षेत्र में काफी कोयला पाया जाता है। दरे साफ में कोयले का काफी भण्डार है। कोयला को वार्षिक उत्पादन लगभग 150 हजार मीट्रिक टन पाया जाता है। 

       इस प्रकार एशिया समस्त संसार के कुल कोयला उत्पादन का लगभग 27 प्रतिशत भाग उत्पन्न करता है। संचित भण्डार के दृष्टिकोण से चीन का स्थान प्रथम है। परन्तु अच्छी श्रेणी के कोयले के उत्पादन के दृष्टिकोण से भारत का स्थान प्रथम है। 

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार (International Trade):

             कोयला का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापा बहुत महत्वपूर्ण है तथा इसकी माँग भी काफी अधिक है। भारत तथा चीन एशिया के प्रमुख कोयला निर्यात करने वाले देश है। जापान, पाकिस्तान, श्रीलंका तथा बर्मा प्रमुख कोयला आयात करने वाले देश है। कोयले की माँग भी निरन्तर बढ़ ही है। 

प्रश्न प्रारूप

1. एशिया कोयले के उत्पादन एवं वितरण का वर्णन कीजिये। 

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व (Distribution and Density of Population of India)

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व

(Distribution and Density of Population of India)


भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व⇒

परिचय –

     किसी देश में उत्पत्ति के संसाधनों में जनसंख्या का अधिक महत्व होता है। प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और देश की आर्थिक एवं व्यापारिक उन्नति वहाँ पाए जाने वाले जनसंख्या के वितरण, उसके घनत्व एवं लोगों के स्वभाव पर निर्भर करती है। अतः जनसंख्या के वितरण एवं घनत्व को जानना अति आवश्यक है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 121.2 करोड़ है तथा औसतन जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। वास्तव में वर्तमान में भारत विश्व का सघन बसे देशों की श्रेणी में सम्मिलित है। संपूर्ण विश्व के कुल क्षेत्रफल का 2.4%  भाग भारत के पास है अर्थात क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में सातवाँ परंतु जनसंख्या की दृष्टि से भारत विश्व में चीन के बाद दूसरा स्थान रखता है। भारत में विश्व की 17.5 % से अधिक जनसँख्या निवास करती है।     

    भारत में जनसंख्या का वितरण बहुत ही असमान है। देश की 16.51% जनसंख्या अकेले उत्तर प्रदेश में निवास करती है। यह जनसंख्या जापान की कुल जनसंख्या के बराबर है। जनसंख्या वितरण का सही ज्ञान जनसंख्या घनत्व से  होता है। प्रति इकाई क्षेत्र पर निवास करने वाली व्यक्तियों की संख्या को जनसंख्या घनत्व कहा जाता है। दूसरे शब्दों में जनसंख्या घनत्व संपूर्ण जनसंख्या एवं क्षेत्रफल का अनुपात है तथा इसके माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या दबाव का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।

      भारत में जनसंख्या का घनत्व सदैव एक समान नहीं रहा है। यह क्रमशः बढ़ता ही जा रहा है। निम्नलिखित तालिका से इस बात की भली-भांति पुष्टि हो जाती है।

  भारत में जनसंख्या घनत्व (1921-2011)

वर्ष जनसँख्या घनत्व

(प्रति वर्ग किलोमीटर)

1921 81
1931 90
1941 103
1951 117
1961 142
1971 177
1981 216
1991 274
2001 324
2011 382

     इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत के जनसंख्या घनत्व में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। 1931 से 1991 तक छह दशकों में जनसंख्या घनत्व 3 गुना हो गया है। 1951 से 2011 के बीच जनघनत्व में चार गुनी वृद्धि हुई है। उल्लेखनीय है कि उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। विगत दशक में घनत्व 58 व्यक्ति प्रति किलोमीटर बढ़ा है जो 1921 से 1951 के मध्य तीन दशकों में हुई कुल 36  से भी अधिक है । 1991 की जनगणना के अनुसार देश में जनसंख्या घनत्व 267 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर था जो  2001 में 324 तथा 2011 में 382 हो गई। यह एक ओर  बांग्लादेश, नीदरलैंड, जापान जैसे देशों से कम है तो दूसरी ओर कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और विश्व की तुलना में बहुत अधिक है। देश के विभिन्न भागों में जनसंख्या घनत्व में असमानता है। यह असमानता देश, राज्य और जिला स्तर पर देखने को मिलता है।

       प्रति वर्ग किलोमीटर जनसंख्या घनत्व एक ओर अरुणाचल प्रदेश में 17 व्यक्ति का है तो दूसरी ओर दिल्ली का जनघनत्व 11320 है। पहला पर्वतीय क्षेत्र है जहां मानव बसाव की परिस्थितियां सर्वथा प्रतिकूल है जबकि दूसरा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र है जहाँ मानव बसाव की परिस्थियाँ अनुकूल है। बिहार, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश,  हरियाणा उच्च जनघनत्व वाला राज्य है जबकि कई राज्यों में जनसंख्या का घनत्व राष्ट्रीय औसत से भी कम है।

     जनसख्या घनत्व के इस असमान वितरण के लिए कई कारण उत्तरदायी होते है–

1. प्राकृतिक या भौगोलिक कारक

2. मानवीय कारक

1. प्राकृतिक या भौगोलिक कारक

    जनसंख्या के वितरण घनत्व को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारक

  • धरातलीय संरचना
  • जलवायु
  • मिट्टी का उपजाऊपन
  • जलापूर्ति
  • खनिज पदार्थ

(i) धरातलीय संरचना-

        समतल मैदानी भाग पठारी भूतल की अपेक्षा घने बसे होते हैं, क्योंकि यहां उत्तम जलवायु व कृषि की सुविधाएं, परिवहन सुविधा और व्यापारिक सुविधा अधिक होती है जैसे- सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र। इसके अलावा पर्वतीय तथा पठारी क्षेत्रों में जनसंख्या कम होती है, क्योंकि यहां ऊंची नीची और कम उपजाऊ मिट्टी होती है। जैसे दक्कन का पठार पर्वतीय प्रदेशों में है यहां जनसंख्या बहुत कम है।

(ii) जलवायु-

      अनुकूल जलवायु परिस्थितियों वाले क्षेत्र घनी आबादी वाले हैं जबकि रेगिस्तान जैसे चरम जलवायु परिस्थितियों वाले क्षेत्र काफी कम आबादी वाले क्षेत्र हैं। इसलिए, मुंबई और तमिलनाडु शहर जैसे मध्यम जलवायु का अनुभव करने वाले तटीय क्षेत्र घनी आबादी वाले हैं जबकि थार रेगिस्तान और लेह और लद्दाख क्षेत्र मामूली या कम आबादी वाले हैं।

(iii) मिट्टी का उपजाऊपन-

         जहाँ की मिट्टी उपजाऊ होती है वहां मनुष्य को भोजन, वस्त्र, आवास आदि की सुविधाएं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो जाती है। इसीलिए उपजाऊ मिट्टी वाले भूभाग घने बसे होते हैं इसके विपरीत जहां की मिट्टी कम उपजाऊ होती है वहां कम जनसंख्या पाई जाती है। यही कारण है कि गंगा के मैदान वाले क्षेत्रों में आबादी बहुत घनी है जबकि पश्चिमी राजस्थान और पश्चिमी गुजरात कम आबादी वाले क्षेत्र हैं।

(iv) जल-आपूर्ति-

       जिन भू-भागों में पर्याप्त जल उपलब्ध होते हैं वह सघन बसे होते हैं। इसके विपरीत शुष्क एवं जल आभाव वाले क्षेत्रों में जनसंख्या कम निवास करती है। प्राय: यह देखा गया है कि भारत में नदियों की घाटियों एवं डेल्टाई भागों में अधिकांश जनसंख्या निवास करती है। इसका प्रमुख कारण स्वच्छ जल की उपलब्धता ही है। शुष्क एवं पर्वतीय भागों में, जहाँ भूमिगत जल की प्राप्ति में अधिक कठिनाई होती है, जनसंख्या विरल मिलती है।

(v) खनिज पदार्थ-

         खनिज पदार्थों की उपलब्धता जनसंख्या के घनत्व को बढ़ाती है, इसलिए जहां खनिज पदार्थ की उपलब्धता अधिक होगी वहां जनसंख्या भी अधिक होगी। क्योंकि खनिजों के खनन से अनेकों उद्योग का विकास होता है। छोटानागपुर क्षेत्र में खनिज उपलब्धता के कारण ही जनसंख्या का अधिक जमाव पाया जाता है।

2. मानवीय कारक

      जनसंख्या के वितरण घनत्व को प्रभावित करने वाले मानवीय कारक

  • नगरीकरण
  • परिवहन साधनों का विकास
  • औद्योगिकरण
  • सामाजिक एवं धार्मिक कारण
  • कृषि  योग्य भूमि की उपलब्धता
  • धान क्षेत्र
  • राजनीतिक कारक
  • सरकार की नीतियां

(i)  नगरीकरण- 

     नगरीकरण का मुख्य कारण सुरक्षा, रोजगार, परिवहन, शिक्षा आदि सुविधाओं का नगरों में पाया जाना है। नगर वाणिज्य व्यापार उद्योग तथा प्रशासन के भी केंद्र होते हैं। अतः नगरों में जनसंख्या की अधिक वृद्धि हुई है।

(ii) परिवहन साधनों का विकास- 

       परिवहन साधनों के विकास के साथ-साथ जनसंख्या में भी वृद्धि होती जाती है। जैसे सड़कों के किनारे कस्बों और नगरों एवं औद्योगिक प्रतिष्ठानों की स्थापना हो जाने से जनसंख्या बढ़ती है।

(iii) औद्योगिकरण- 

    औद्योगिक दृष्टि से विकसित प्रदेशों में जनसंख्या का घनत्व उच्च पाया जाता है क्योंकि इन प्रदेशों में रोजगार के अवसर विद्यमान होते हैं। जैसे- जमशेदपुर, भिलाई, तथा दुर्गापुर आदि का उदाहरण दिया जा सकता है। इसके अतिरक्त देश के महानगरों में जनसंख्या का अत्यधिक दबाव अन्य कारणों की अपेक्षा वहाँ पर स्थगित औद्योगिक भू-दृश्यों के करण भी होता है ।

(iv) सामाजिक एवं धार्मिक कारण- 

    जन-घनत्व के वितरण में सामाजिक, सांस्कृतिक  एवं धार्मिक कारकों की भी अहम भूमिका होती है । पर्वतीय एवं आदिवासी क्षेत्रों में सांस्कृतिक अलगाव की प्रवृति एवं धार्मिक कारणों से स्थानांतरण पर प्रतिबन्ध मिलता है । अत: इन भागों में जनसँख्या की विरलता मिलती है । जैसे पूर्वोत्तर भारत, झारखंड, छतीसगढ़ आदि राज्यों में ।

(v) कृषि योग्य भूमि की उपलब्धता-

       कृषि योग्य भूमि की उपलब्धता भारत में जनसँख्या घनत्व को प्रभावित करने वाला एक सर्वप्रमुख कारक है। भारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसकी लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या अपनी जीविका के लिए कृषि पर निर्भर रहती है। अत: देश के ऐसे भू-भाग जहाँ कृषि योग्य भूमि की अधिक उपलब्धता है, साथ ही कृषि भूमि के उपजाऊ होने के साथ-साथ अन्य भौगोलिक दशाएँ कृषि कार्यों के लिए अनुकूल है तो उन क्षेत्रों में जनसंख्या का दबाव अधिक मिलता है। गंगा-यमुना का का मैदानी भाग, पूर्वी तटीय भाग तथा मालाबार तट देश के अति सघन बसे भाग है। यह क्षेत्र कृषि के लिए देश के सर्वोत्तम क्षेत्र माने जाते है, जबकि देश के पर्वतीय भाग समतल भूमि की अनुपलब्धता के कारण विरल आबादी वाले है।

(vi) धान क्षेत्र-

         इस अनाज क्षेत्र में अधिक लोगों के जीवन-निर्वाह करने की बेजोड़ क्षमता है । गंगा का मैदान तथा पूर्वी समुद्र तटीय भाग धान के ही क्षेत्र है। यही कारण है कि यहाँ अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक जनसँख्या मिलती है। पूर्वी भारत तथा दक्षिणी भारत (झारखण्ड, बंगाल, ओडिशा, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना) के लोगों का मुख्य आहार चावल है। बिहार और केरल में भी घनी आबादी का यही कारण है।

(vii) राजनीतिक कारक- 

       राजनितिक उथल-पुथल, असुरक्षा, असंतोष आदि राजनितिक कारकों ने देश में जनसंख्या वितरण में असमानता उत्पन्न करने में प्रमुख भूमिका निभाई है। सीमावर्ती क्षेत्रों में आतंकवाद बढ़ने के कारण स्थानान्तरण दर में तीव्र वृद्धि भी जनसंख्या वितरण में असमानता का कारण बन गई है। जम्मू-कश्मीर, पंजाब व असम में आतंकवाद के कारण ही विरल जनसंख्या पाई जाती है।

         जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत को तीन भागों में बांटा जा सकता है-

जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत के तीन भाग

1. उच्च घनत्व के क्षेत्र-

      इसके अन्दर पूरे देश के लगभग 1/4 जिलें आते हैं। इसका विस्तार बिहार, पश्चिमी बंगाल, केरल,  उत्तर प्रदेश और हरियाणा में है। यहाँ जनसंख्या का घनत्व (Population Density) 500 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी से अधिक मिलता है। ये क्षेत्र भारतीय कृषि के प्रमुख क्षेत्र हैं। 

2. मध्यम घनत्व के क्षेत्र-

        भारत में लगभग 130 जिलों में 300-500 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी घनत्व पाया जाता है। भारत में मध्यम घनत्व के क्षेत्र उत्तरी भारत के उच्च घनत्व के निकटवर्ती क्षेत्र जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र के तटवर्ती भाग, छोटा नागपुर के पठार आदि हैं। इन क्षेत्रों में धरातल की विषमता और जल की कमी पाई जाती है। इसलिए ये क्षेत्र कृषि में महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाते. इसलिए इन क्षेत्रों में कम जनसंख्या पाई जाती हैं। पर यहाँ खनिजों का भण्डार है जिससे ये क्षेत्र औद्योगिक और आर्थिक रूप से विकसित हैं। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में कृषि तथा लघु उद्योगों के विकास के कारण मध्यम घनत्व के कुछ क्षेत्र विकसित हुए हैं। 

3. निम्न घनत्व के क्षेत्र-

      भारत के लगभग 150 जिलों में 300 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी से भी कम जनसंख्या का घनत्व मिलता है। उत्तर-पूर्व हिमालयी क्षेत्र में और पश्चिमी भारत में कमी और जनसंख्या का अल्प घनत्व मिलता है। मध्य प्रदेश और उड़ीसा के पठारी और जनजातीय क्षेत्रों, कर्नाटक के पूर्वी भाग और आंध्र प्रदेश के मध्यवर्ती भाग में भौतिक बाधाओं और कृषि के अविकसित होने के चलते कम जनसंख्या पाई जाती है। कच्छ के दलदल वाले क्षेत्र भी निम्न घनत्व वाले क्षेत्र हैं।

2011 के जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाले पाँच राज्य है-

  1. बिहार – 1106
  2. पश्चिम बंगाल – 1028
  3. केरल – 860
  4. उत्तर प्रदेश – 829
  5. हरियाणा – 573

2011 के जनगणना के अनुसार न्यूनतम जनसंख्या घनत्व वाले पाँच राज्य है-

  1. अरुणाचल प्रदेश –17
  2. मिजोरम – 52
  3. सिक्किम – 86
  4. नागालैंड- 119
  5. हिमाचल प्रदेश –123

2011 के जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाले पाँच केंद्रशासित राज्य है-

  1. राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र दिल्ली –11320
  2. चंडीगढ़ – 9258
  3. पुद्दुचेरी – 2547
  4. दमन एवं द्वीप – 2191
  5. लक्षद्वीप – 2149

          जबकि क्षेत्रीय आधार पर भी भारत को तीन जनसंख्या वर्गों में विभाजित किया गया है-

1. उत्तर का मैदानी भाग: 

       भारत में उत्तर का मैदानी भाग सर्वाधिक जनसंख्या रखने वाला क्षेत्र है जिसमें सन् 2011 में देश की लगभग 52 करोड़ जनसंख्या (42.7 प्रतिशत) निवासित थी। उत्तर के मैदानी क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश (19.96 करोड़), बिहार (10.38 करोड़), प. बंगाल (9.13 करोड़), राजस्थान (6.86 करोड़), पंजाब (2,77 करोड़) तथा हरियाणा (2.54 करोड़) नामक राज्य देश में सवार्धिक जनसंख्या वाले राज्य हैं।

2. दक्षिण के पठारी भाग:

         जनसंख्या की दृष्टि से दक्षिण के पठारी भाग का दूसरा स्थान है। महाराष्ट्र (11.24 करोड़), मध्य प्रदेश (7.26 करोड़), कर्नाटक (6.11 करोड़) तथा आन्ध्र प्रदेश (8.47 करोड़) दक्षिण के पठारी भाग पर विस्तृत राज्य हैं जिनमें सन् 2011 में देश की 27.3 प्रतिशत जनसंख्या निवासित थी।

3. तटवर्ती,पर्वतीय तथा मरुस्थलीय भाग:

       जनसंख्या की दृष्टि से दक्षिण के पठारी भाग का तिसरा स्थान है। देश के सभी तटीय क्षेत्रों, उत्तरी-पूर्वी पर्वतीय राज्यों तथा राजस्थान के पश्चिमी मरुस्थलीय भागों में प्राकृतिक एवं धरातलीय विषमता के कारण जनसंख्या कम निवासित है।

2011 के जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनसंख्या वाले पाँच राज्य है–

(i)   उत्तर प्रदेश – 16.51%

(ii)   महाराष्ट्र – 9.28%

(iii)  बिहार – 8.6%

(iv)  पश्चिम बंगाल – 7.54%

(v)   आंध्रप्रदेश – 6.99%

2011 के जनगणना के अनुसार सबसे कम जनसंख्या वाले पाँच राज्य है–

(i)  सिक्किम – 0.05%

(ii)   मिजोरम – 0.09%

(iii)  अरुणाचल प्रदेश – 0.11%

(iv)   गोवा – 0.12%

(v)   नागालैंड  – 0.16%

निष्कर्ष :

       निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि भारत में जनसंख्या वितरण व घनत्व सभी क्षेत्रों में एक सामान नहीं है। भारत में लगभग 50 प्रतिशत आबादी मात्र पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र,  बिहार,  पश्चिम बंगाल व आंध्रप्रदेश में निवास कती है जबकि 4 प्रतिशत उतरी एवं उत्तरी पूर्वी 10 पर्वतीय राज्यों  में निवास करती है।  साथ ही भारत के जन-घनत्व में 1901 से 2011 तक हमेशा वृद्धि ही  हुआ है।



Read More:

1. सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान (The Indus-Ganga-Brahmaputra Plain)

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व (Distribution and Density of Population of India)

3. भारत के प्रमुख जलप्रपात

4.नदियों के किनारें बसे प्रमुख नगर

5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

11. गंगा का मैदान

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार

15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत) / Drainage System

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास

18. गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

19. भारतीय जल विभाजक रेखा

20. मानसून क्या है?

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत

23. एलनीनो सिद्धांत

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी (Monsoon of Mechanism)

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान

27. भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

6. एशिया के प्राकृतिक वनस्पति / Natural Vegetation of Asiya

6. एशिया के प्राकृतिक वनस्पति

(Natural Vegetation of Asiya)


एशिया के प्राकृतिक वनस्पति⇒

                  प्राकृतिक वनस्पति मूलरूप से जलवायु की दशाओं पर निर्भर होती है। यही कारण है कि एशिया महाद्वीप में मिलने वाली भिन्न-भिन्न प्रकार की जलवायु भिन्न-भिन्न प्रकार की वनस्पति को जन्म देती है। इस विशाल भूखण्ड पर प्राकृतिक वनस्पति का विस्तृत आवरण है। एशिया को 12 वनस्पतिक प्रदेशों में विभक्त किया गया है, जिनका वर्णन इस प्रकार है –

(1) आर्द्र सदाबहार वन- ये वन एशिया महाद्वीप के विषुवत् रेखीय प्रदेशों एवं समीपवर्ती मानसूनी प्रदेशों में विस्तृत है। विषुवत् रेखीय प्रदेशों में जहाँ वर्षपर्यन्त वर्षा व उच्च तापमान रहता है वहीं दक्षिणी-पूर्वी एशिया के मानसूनी जलवायु वाले क्षेत्रों में 125 सेमी. से अधिक वर्षा होती है। विषुवत् रेखीय प्रदेशों में मलाया, फिलीपीन्स व इण्डोनेशिया के भाग सम्मिलित हैं।

         दक्षिणी-पूर्वी एशिया में भारत का पश्चिमी घाट, असम, म्यांमार, बांग्लादेश, थाइलैण्ड के वे भाग जहाँ 125 सेमी. से अधिक वर्षा पायी जाती है। उन भागों में ये वन विस्तृत हैं।

         इन वनों में पाये जाने वाले वृक्षों में महोगनी, गाटापार्चा, बाँस, बेंत, रबड़, सिनकोना आदि प्रमुख हैं। इन वृक्षों की लकड़ी अत्यधिक कठोर होती है। ये वृक्ष अत्यधिक पास-पास सघन रूप में पाये जाते हैं। इस क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के पेड़-पौधे एक साथ पाये जाते हैं। मुख्य वृक्षों के नीचे अन्य छोटे-छोटे पौधे तथा लताएँ पायी जाती हैं। अत्यधिक वर्षा व उच्च तापमान के कारण यहाँ वृक्ष 55 मीटर की ऊँचाई तक पाये जाते हैं।

          ये वृक्ष इतने सघन होते हैं कि सूर्य का प्रकाश तक धरातल पर नहीं पहुँच पाता। इन वनों में पाये जाने वाले कठोर लकड़ी के वृक्ष विविध कार्यों में प्रयोग किये जाते हैं। अत्यधिक मिश्रित होने तथा परिवहन की सुविधा नहीं होने के कारण इन वनों की आर्थिक उपयोगिता बहुत कम है।

एशिया के प्राकृतिक

एशिया के प्राकृतिक वनस्पति

(2) मानसूनी पतझड़ वन- मानसूनी वन क्षेत्र का विस्तार भारत के अनेक भागों तथा म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, कम्बोडिया, लाओस, वियतनाम, दक्षिणी चीन तथा जावा-सुमात्रा द्वीपों के कुछ भागों तक है।

        जहाँ वर्षा की मात्रा 200 सेमी. के लगभग होती है वहाँ सदाबहार वन पाये जाते हैं एवं 100 से 200 सेमी. के मध्य वर्षा वाले भागों में पतझड़ वन पाये जाते हैं। अधिक वर्षा वाले भागों में सागवान, सिनकोना, महोगनी एवं नारियल वृक्ष होते हैं एवं जहाँ वर्षा 100 सेमी. के लगभग होती है वहाँ शीशम, साल, आम, नीम, जामुन आदि वृक्षों की बहुतायत होती है।

          इन वनों में अधिकांश वृक्ष ग्रीष्मकाल में पत्तियाँ गिरा देते हैं। मानसूनी वनों से प्राप्त होने वाली लकड़ी बहुमूल्य होती है। यह लकड़ी इमारती सामान तथा फर्नीचर बनाने के काम आती है। ये वन सघन तथा लम्बे नहीं पाये जाते हैं। इन वनों की ऊँचाई लगभग 30 मीट तक पायी जाती है।

(3) शीतोष्ण मानसूनी वन प्रदेश- इन वनों का विस्तार जापान के दक्षिणी भाग, चीन के मध्यवर्ती भाग, मंचूरिया तथा ताइवान तक फैला हुआ है। इन वनों में पाये जाने वाले वृक्षों में ओक, मेपल, लारेल, वालनट, शहतूत आदि प्रमुख हैं। ये वृक्ष ग्रीष्म पत्तियाँ गिरा देते हैं। ये वन अधिक सघन नहीं होते हैं। इन वनों की लकड़ी बहुमूल्य होती ऋतु में अपनी है। जापान के पर्वतीय भागों में इन वनों को काटकर चाय के बागानों में परिवर्तित कर दिया है तथा चीन में इन वनों को काटकर कृषि भूमि बना ली गई है। इस प्रकार इन वनों का विस्तार कम होता जा रहा है।

(4) पर्वतीय वनस्पति- यह वनस्पति हिमालय से लेकर उत्तरी-पूर्वी साइबेरिया के पर्वतीय ढालों पर पायी जाती है जिसे अल्पाइन के नाम से भी जाना जाता है। ऊँचाई के साथ जैसे-जैसे जलवायु में परिवर्तन होता है वैसे ही प्राकृतिक वनस्पति का स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है। ऊँचाई के साथ वृक्षों को आकृति छोटी होती जाती है।

          इन वनों में चीड़-देवदार जैसे नरम वृक्ष पाये जाते हैं 1000 मीटर की ऊँचाई तक तो सघन वनस्पति पायी जाती है इसके पश्चात् 3000 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले भागों पर तो बहुत कम वनस्पति होती है। 4000 मीटर की ऊँचाई के बाद मात्र घास पायी जाती है।

(5) समशीतोष्ण घास के मैदान- समशीतोष्ण घास के मैदान मध्य एशिया में स्थित है। ये मंगोलिया, मध्य मंचूरिया तथा साइबेरिया के दक्षिणी भाग में फैले हुए हैं। मध्य शिया में स्थित इस वृक्षविहीन घास की पेटी को स्टेपी के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र में वर्षा बहुत कम होती है। इस कारण वृक्ष बहुत कम उगते हैं एवं घास बहुतायत में उगती है। ग्रीष्म ऋतु में यह स्टेपी घास झुलस जाती है। ग्रीष्म काल में उच्च ताप, न्यून वर्षा एवं शीत काल में न्यून तापमान व शुष्कता के कारण इस क्षेत्र में स्टेपी घास के अलावा अन्य वनस्पति उगने की सम्भावना नहीं है। इस क्षेत्र की घास गुच्छेदार होती है। जो पशुचारण के लिए उपयोगी होती है। इस क्षेत्र में पशुचारण का अधिक प्रचार है। 

(6) कोणधारी पतझड़ मिश्रित वन- इस प्रकार की वनस्पति मुख्यतः जापान, उत्तरी चीन, कोरिया, दक्षिणी-पूर्वी साइबेरिया तथा तुर्की के पठारी भागों एवं पर्वतीय दालो पर पायी जाती है। यहाँ पतझड़ तथा सदाबहार दोनों प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं। इन वृक्षों में नरम लकड़ी तथा कठोर लकड़ी दोनों प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं।

         नरम लकड़ी वाले वृक्षों में मेपल, बैतूल, चौड़ तथा हेमलाक प्रमुख है। जहाँ पर्याप्त वर्षा होती है वहाँ चौड़ी पत्ती वाले सदावहार वृक्ष पाये जाते हैं। चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वृक्षों में शहतूत, तुंग तथा कपूर आदि वृक्ष प्रमुख हैं।

(7) मिश्रित सदाबहार एवं पतझड़ वन- पूर्वी एशिया के सामान्य तापमान तथा पर्याप्त मानसूनी वर्षा वाले भागों में चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वन पाये जाते हैं। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पतझड़ वन के रूप में मिश्रित वन पाये जाते हैं।

        चीन तथा हिन्दचीन में इस प्रकार की वनस्पति पायी जाती है लेकिन जनाधिक्य के कारण इन देशों में अधिकांश वनस्पति का विनाश हो गया है। अब केवल उच्च भागों में इनके अवशेष हैं। चीन में ऐसे उच्च क्षेत्र नानशान तथा टिसिनलिंग है। यहाँ अनेक प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं। इनके मध्य में घास, बाँस आदि के भी विस्तार हैं।

(8) भूमध्यसागरीय वन प्रदेश- भूमध्यसागर के तटवर्ती देश इजरायल, लेबनान, सीरिया, टर्की के तटवर्ती भाग तथा उत्तरी ईराक, इरान आदि में इस वनस्पति का विस्तार पाया जाता है। वर्षा शीत ऋतु में होती है, ग्रीष्म ऋतु शुष्क होती है लेकिन इस वनस्पति क्षेत्र के वृक्षों को जड़ें लम्बी तथा पत्तियाँ मोटी व चिकनी होने के कारण ग्रीष्मकाल के तीव्र वाष्पीकरण को झेल लेती है। इस कारण वाष्पीकरण कम होता है तथा ये वृक्ष सदैव हरे-भरे रहते हैं।

           जैतून, ओक, अंगूर, अंजीर, नौबू, नारंगी, पाइन व फर इन वनों के मुख्य वृक्ष हैं। इन वनों में रसदार फल बहुतायत में उगते हैं। जैतून, अंगूर, नींबू आदि रसदार फल बहुतायत में पाये जाते हैं।

(9) शुष्क घास के मैदान- इस वनस्पति क्षेत्र का विस्तार ब्लूचिस्तान से लालसागर तक और साइबेरिया के कुछ भागों में फैला हुआ है। इस क्षेत्र में तीव्र गर्मी व वर्षा की मात्रा अति न्यून होती है जिसके कारण ग्रीष्मकाल में घासें सूख जाती हैं व धरातल वनस्पति विहीन हो जाता है। इस क्षेत्र में केवल वही वनस्पति जीवित रह सकती हैं जो गर्मी व वाष्पीकरण को सहन कर सके। खजूर, बबूल, झाड़ियाँ और ताड़ के वृक्ष यहाँ विकसित हो सकते हैं, क्योंकि इनमें शुष्कता सहन करने की क्षमता होती है।

(10) उष्ण मरुस्थलीय वनस्पति प्रदेश- एशिया महाद्वीप में उष्ण मरुस्थलीय वनस्पति का विस्तार भारत के थार के मरुस्थल, अरब, ईराक, इरान आदि के क्षेत्रों में है। इन क्षेत्रों में अल्प वर्षा व उच्च तापमान के कारण इस प्रकार की उष्ण मरुस्थलीय वनस्पति पायी जाती है। रेगिस्तानी भागों में उच्च तापमान व निम्न वर्षा के कारण काँटेदार वृक्ष तथा झाड़ियाँ पायी जाती हैं।

         कंटीली झाड़ियाँ, नागफनी, बबूल, खजूर आदि इस क्षेत्र में पाये जाने वाले प्रमुख वृक्ष हैं। रेगिस्तानी क्षेत्र में पौधों की जड़ें लम्बी, छाल मोटी तथा पत्तियाँ कम एवं काँटे अधिक पाये जाते हैं। यह वनस्पति ईंधन के अलावा और किसी उपयोग की नहीं होती हैं। 

(11) कोणधारी वन प्रदेश (टैगा)- सम्पूर्ण साइबेरिया के उत्तरी भाग में एक लम्बी-चौड़ी पेटी के रूप में पाये जाने वाले कोणधारी वन को टैगा वन कहा जाता है। टैगा वनों को बोरियल वन भी कहा जाता है। इन वनों में स्प्रूस, चीड़, लार्च, हेमलाक, फर, सीडार आदि वृक्ष प्रमुखता से मिलते हैं। टैगा वन प्रदेश में पाये जाने वाले वृक्षों की पत्तियाँ नुकीले आकार की होती हैं, जिनकी नोंक सुई की तरह होती है। अतः इसी कारण इन्हें कोणधारी वन कहते हैं।

          टैगा वन क्षेत्र में ग्रीष्मकाल में तापमान 6° सेल्सियस तक पाया जाता है एवं शीतकाल में तापमान हिमांक से नीचे चला जाता है। ग्रीष्मकालीन 3-4 महीनों में वर्षा होती है। अत: यहाँ ऐसी वनस्पति पायी जाती है जो लघु समय में विकसित हो सके।

(12) शीत टुण्ड्रा वनस्पति प्रदेश- यह वनस्पति प्रदेश एशिया महाद्वीप के उत्तरी भाग में उत्तरी ध्रुव महासागर के तट पर फैला हुआ है। यहाँ दस महीने तक कठोर सर्दी पड़ती है जिससे भूमि बर्फ से ढकी रहती है। वर्ष भर न्यूनतम तापमान रहता है। इसलिए यहाँ लम्बी शीत ऋतु के कारण मॉस, लाइकेन, काई आदि किस्म की छोटी घास पायी जाती हैं।

प्रश्न प्रारूप 

 Q.8. एशिया महाद्वीप को वनस्पतिक प्रदेशों में विभक्त कते हुये प्रत्येक की प्रमुख विशेषतायें बताइये।

(Divide Asia into the region of vegetation and explain the characteristics of each region.)

Or, एशिया के प्राकृतिक वनस्पति प्रदेशों के नाम बताइये तथा उनमें से किन्हीं दो की विवेचना कीजिए। 

(Name the natural vegetation region of Asia and discuss any two of them.)

Or, “वनस्पति जलवायु का सच्चा सूचक है।” एशिया के सन्दर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए।

(Natural vegetation is the true index of climate. Explain this statement in relation to Asia.) 

5. एशिया का कृषिगत जलवायु प्रदेश / Aagro-Climatic Region of Asia

5. एशिया का कृषिगत जलवायु प्रदेश

(Aagro-Climatic Region of Asia)


एशिया का कृषिगत जलवायु प्रदेश⇒

प्रश्न प्रारूप

1. एशिया को कृषि प्रदेशों में विभक्त कीजिए और उनकी विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन करें।

अथवा

एशिया को प्रमुख कृषिगत जलवायु का वर्णन करें। 

उत्तर-  किसी भी प्रदेश के जलवायु नियंत्रक तत्वों की भिन्नता के कारण वहाँ के धरातल की बनावट, प्राकृतिक वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मानव जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। विभिन्न जलवायुगत विशेषताओं से युक्त प्रदेश एक अलग इकाई का निर्माण करते हैं। एशिया को निम्नलिखित कृषिगत जलवायु प्रदेशों में बांटा जा सकता है-

1. भूमध्यवर्ती प्रदेश- इस प्रदेश में इण्डोनेशिया, मलेशिया तथा श्रीलंका शामिल किये जाते है। इसका विस्तार 10° उत्तर से 10° दक्षिण अक्षांश तक पाया जाता है। इस प्रदेश में वर्षभर सूर्य की किरणें लम्बवत पड़ती है, अत: सालभर अत्यधिक गर्मी पड़ती है। यहाँ वर्षा का औसत तापमान 26°C रहता है तथा यहाँ का ताप परिसर 1° रहता है। दैनिक ताप परिसर 9° तक रहता है। अत्यधिक गर्मी के कारण यहाँ पर अल्पवायु दाब अधिक विकसित होते हैं तथा संवहनीय वर्षा अधिक होती है। यहाँ वायु की आर्द्रता तथा बादल की मात्रा वर्षभर अधिक होती है।

           इस प्रदेश की असमान जलवायुगत विशेषतायें मानव विकास में बड़ी बाधक है। इसका आर्थिक विकास नहीं हो पाया है। कई भागों में जनसंख्या अधिक है। इस प्रदेश के भिन्न-भिन्न भागों के मानव-जीवन में बड़ा अन्तर है। जहाँ घने वन है वहाँ के निवासी असभ्य है और इनका मुख्य उद्यम जानवरों का शिकार, मछली पकड़ना तथा जंगलों से हाथी दाँत, फल तथा रबड़ आदि वस्तुओं को एकत्र करना है। परन्तु जिन भागों में जंगलों को काट दिया गया है वहाँ आधुनिक प्रकार की कृषि विकसित की गयी है।

2. मानसूनी प्रदेश- यह प्रदेश 7° उत्तर से 30° उत्तरी अक्षांश तक एशिया के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित है। इसके अन्तर्गत भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, वर्मा, थाईलैण्ड, कम्बोडिया, लाओस, वियतनाम, फिलिपाइन तथा चीन शामिल है। इस प्रदेश में ग्रीष्म ऋतु शुष्क और शीत ऋतु साधारण गर्म होती है। ग्रीष्म काल के आरम्भ में 37°C से भी अधिक तापमान होता है। किन्तु सभी स्थानों पर औसत तापमान 26°C रहता है। शीतऋतु का तापमान 18°C से 24°C रहता है। समुद्र से दूर के स्थानों पर तापमान काफी गिर जाता है।

      ग्रीष्मऋतु में यहाँ विशाल अल्पदाव क्षेत्र बन जाता है और समुद्र की ओर से वाप्पकृत हवायें चलने लगती है। यहाँ वर्षा मूसलाधार होती है। समय और स्थान के अनुसार वर्षा अनियमित तथा अनिश्चित होती है। प्रायः पर्वतीय तथा चक्रवातीय वर्षा होती है। भारत में दक्षिण-पश्चिमी मानसून से तथा फिलिपाइन और वियतनाम में दक्षिण-पूर्वी मानसून से वर्षा होती है। व्यापक वर्षा का औसत 100-200 से.मी. होता है। ग्रीष्मकाल में चलने वाले चक्रवातों को चीन में टाइफल, फिलिपाईन में बेग्यूस तथा भारत में लू कहते हैं।

             मानसूनी जलवायु के देश प्राचीन काल से कृषि के लिए प्रसिद्ध है। इस प्रदेश में धान, जूट, चाय, गन्ना, गेहूं, तम्बाकू, मक्का, ज्वार,बाजरा, तिलहन और कपास की खेती होती है। धान इस प्रदेश की मुख्य उपज है जो अधिक वर्षा वाले भागों में उपजायी जाती है। संसार का 90 प्रतिशत चावल एशियाई मानसूनी देशों में पैदा होता है, इसका सबसे प्रमुख उत्पादक चीन और भारत है। चाय इस प्रदेश की दूसरी मुख्य उपज है जो पहाड़ी ढालों पर पैदा की जाती है। संसार की 96 प्रतिशत उपज इसी प्रदेश में होती है।

       संसार के उत्पादकों में भारत प्रथम, श्रीलंक द्वितीय और चीन तृतीय स्थान पर है। संसार का सबसे अधिक जूट इस प्रदेश में नदी डेल्टाओं में पैदा होता है। संसार के सबसे बड़े जूट उत्पादक बांग्लादेश और भारत है। गन्ना के उत्पादन में भारत सबसे प्रथम है। इस प्रदेश में कृषि के प्रायः पुराने ढंग के औजार प्रायेग में आते हैं किन्तु भारत, पाकिस्तान तथा दक्षिणी चीन में नवीनतम ढंग के औजारों का तीव्रता से विकास हो रहा है। इस प्रदेश में आबादी काफी सघन है। उत्तम जलवायु तथा अन्य सुविधाओं के कारण यह प्रदेश उन्नति का प्रदेश कहा जाता है। इस प्रदेश में लोग आर्थिक तथा शैक्षणिक दृष्टिकोण से काफी उन्नत है।

एशिया का कृषिगत जलवायु

3. उष्ण मरुस्थलीय प्रदेश- यह प्रदेश 20° उत्तर अक्षाश से लेकर 30° उत्तर अक्षांश तक फैला हुआ है। इसके अन्तर्गत भारत में चार मरूस्थल, पाकिस्तान में सिन्धु नदी के निचले बेसीन का पूर्वी भाग और पश्चिम एशिया में अरब और सीरिया के मरुस्थल आते है। इस प्रदेश की जलवायु शुष्क एवं विषम है। ग्रीष्म ऋतु में काफी अधिक गर्मी पड़ती है। तापमान 32°C रहता है। परन्तु रात में तापमान में अन्तर पाया जाता है।

       दिन-रात का ताप परिसर 21°C तक पहुंच जाता है। शीतऋतु में कठोर सर्दी पड़ती है। इस प्रदेश में 25 से.मी. से अधिक वर्षा नहीं होती है। यह प्रदेश सन्मार्गी हवाओं की पेटी में स्थित है। इस प्रदेश में ग्रीष्मऋतु में धूलभरी आंधियाँ चलती है। शीतऋतु की वायु तीव्र होती है। इस प्रदेश में वर्षा अनिश्चित होती है।

        इस प्रदेश में कृषि का विकास नहीं हुआ है। केवल मरुधानों में खजूर, ज्वार, बाजरा तथा तम्बाकू की खेती होती है। जहाँ सिंचाई की सुविधा है, वहाँ खेती होती है। इराक तथा सिन्धु नदी की निचली घाटी में सिचाई की सहायता से खेती की जाती है। सिंचित क्षेत्रों में धान, कपास, गेहूं तथा फल की खेती होती है।

        इस प्रदेश की जनसंख्या कम है। केवल मरुधानों के समीप तथा खनिज उत्पादक स्थानों पर ही मानव बस्तियाँ पायी जाती है। यहाँ के निवासी लम्बे तथा गठीले शरीर वाले पाये जाते हैं। ये कृषक तथा पशुपालक होते हैं तथा ऊंट और भेड़-बकरी पालते हैं। अन्य मरुस्थलों के निवासी भ्रमणशील होते है। अरब के बहु इसी प्रकार के हैं। इनका भोजन ऊँट का दूध, खजूर, भेड़-बकरी का मांस इत्यादि है। इनका भोजन ऊंट का दूध, खजूर, भेड़-बकरी का मांस इत्यादि है।

4. भूमध्य सागरीय प्रदेश- पश्चिमी एशिया के 30° उत्तर से 42° उत्तरी अक्षाश के मध्य भूमध्य सागरीय तट पर स्थित तुर्की का पश्चिमी एवं दक्षिण-पश्चिम भाग, लेवनान तथा इजरायल देश इसमें शामिल किये जाते है। इस प्रदेश में ग्रीष्म ऋतु में साधारण गर्मी तथा शीतऋतु में हल्की ठण्ड पड़ती है। ग्रीष्म ऋतु का औसत तापमान 21°C तथा शीतऋतु का तापमान 10°C रहता है। वार्षिक ताप परिसर 17°C तक रहता है तथा दैनिक ताप परिसर 4°C रहता है। इस प्रदेश में शीतऋतु में वर्षा होती है। ग्रीष्मऋतु शुष्क होती है।

        ग्रीष्मकाल में यह प्रदेश सन्मार्गी हवाओं की पेटी में पड़ता है, अतः वर्षा नहीं होती है। शीतऋतु में यह प्रदेश पछुआ हवाओं की पेटी में रहता है। इस क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 50-100 से भी होती है। इस प्रदेश के निवासियों का मुख्य उद्यम फल उत्पादन करना तथा कृषि है। यहाँ की शुष्क ग्रीष्मऋतु तथा धूपदार मौसम फलों को पकाने तथा स्वादिष्ट बनाने में सहायक होती है। यहाँ के प्रमुख फल नारंगी, नीबू, अंजीर, सेव, अनार और बादाम है। कृषि क्षेत्र में गेहूँ, कपास तथा तम्बाकू पैदा होती है। यहाँ के निवासियों का मुख्य उद्यम कृषि और पशुपालन है। ये उन्नतिशील तथा सम्पन्न है।

5. शुष्क पठारी प्रदेश-  इस प्रदेश का विस्तार तुर्की, ईरान तथा अफगानिस्तान में है। अनातोलिया का पठार तथा ईरा-सीस्तान का पठार इस भाग में शामिल है। यह प्रदेश 26° उत्तरी अक्षांश से 45° उत्तरी अक्षांश तक विस्तृत है। इस प्रदेश की जलवायु काफी विषम है। ग्रीष्मऋतु का औसत तापमान 24°C हो जाता है। शीतऋतु का तापमान शून्य तक पहुँच जाता है। इस भाग में शीतऋतु मे वर्षा होती है। वर्षा का वार्षिक औसत 25 से.मी. तक होता है।

            यह प्रदेश अभी अविकसित है। मरुस्थलीय पठार तथा विषम जलवायु आर्थिक विकास के प्रतिकूल है। यहाँ के निवासियों का मुख्य उद्यम पशुपालन है। ये अधिकतर ऊंटो, घोड़ों तथा भेड़-बकरियों को लेकर इधर-उधर चराया करते हैं। वहाँ का प्रसिद्ध कृषि धान है। नदियों के सिचाई क्षेत्र में गेहूँ, कपास, तम्बाकू तथा फल पैदा होता है। इस प्रदेश में जनसंख्या बहुत कम है।

       पशुपालन यहाँ के लोगों का मुख्य उद्यम है। पशुपालक भ्रमणशील होते हैं। इनके भोजन में दूध और मांस प्रमुख हैं। जहाँ पानी तथा सिंचाई की सुविधा है वहाँ पर कृषि-कार्य होता है। यहाँ के लोगों का मुख्य उद्यम कम्बल और कालीन बुनना, फल सुखाना, शराब बनाना इत्यादि है। यहाँ के लोग काफिला जीवन व्यतीत करते हैं। अत्यधिक पूंजी और श्रम के उपयोग से इस प्रदेश का विस्तार हो रहा है। यद्यपि ईरान तथा अफगानिस्तान में शिक्षा का प्रचार काफी कम हुआ है।

6. तुरान प्रदेश- यह कैस्पियन सागर, अरब सागर तथा साइबेरिया के दक्षिण-पश्चिम की ओर विस्तृत एक प्रदेश है। इसका विस्तार 30° उत्तरी अक्षांश से 42° उत्तरी अक्षांश तक है। इस प्रदेश की जलवायु शुष्क, विषम तथा कठोर है। ग्रीष्मकाल का तापमान 27° से अधिक हो जाता है और जनवरी का तापमान हिमांक से भी नीचे गिरता है। यहाँ की नदियाँ तथा झीलें जम जाती है। उत्तर की सर्द हवा से जाड़े के दिनों हिमपात होता है। यहाँ का वार्षिक ताप परिसर अधिक रहता है।

        उत्तरी-पूर्वी तथा उत्तरी-पश्चिम वायु से वर्षा होती है। मैदानी भाग में 16 से.मी. से 40 से मी. तक वर्षा होती है। यह प्रदेश समुद्री प्रभाव से बाहर रहता है। इस प्रदेश का अधिकांश भाग मरुस्थल है। यहाँ वर्षा की कमी तथा सिंचाई का अभाव है। यहाँ के निवासियों का मुख्य उद्यम पशुपालन है। नदी की घाटियो, मरुधानों तथा नदियों की बेसिनों में सिचाई की व्यवस्था की सहायता से यहाँ गेहूँ, कपास, जौ, चुकन्दर तथा फल की खेती होती है। यहाँ मंगोल जाति के लोग रहते हैं।

         यहां की जनसंख्या काफी कम है। यहाँ का बहुत-सा क्षेत्र मानवहीन है। केवल कृषि क्षेत्र में ही स्थायी आबादी है। पशुपालक लोग स्थायी बस गये है। ये अधिकतर चारागाह तथा पानी की तलाश में घूमते है। गर्मियों में ये पहाड़ पर चले जाते हैं और शीतऋतु में मैदानों में उतर आते हैं।

7. स्टेपी प्रदेश-  एशिया में यह प्रदेश 45° उत्तर अक्षांश से 60° उत्तरी अक्षांश के मध्य स्थित है। इसमें साइबेरिया का दक्षिणी-पश्चिमी भाग, उत्तरी मंगोलिया तथा पूर्वोत्तर चीन के घास के मैदान शामिल किये जाते हैं। इस प्रदेश की जलवायु पर महाद्वीपीय प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। यहाँ ग्रीष्मकाल में कड़ी गर्मी तथा शीतकाल में कड़ाके की ठंड पड़ती है। ग्रीष्म काल का तापमान 21°C रहता है और शीतऋतु का तापमान 17°C रहता है। वार्षिक ताप परिसर काफी अधिक रहता है।

      इस प्रदेश में वर्षा कम अनियमित तथा अनिश्चित होती है। ग्रीष्मऋतु मे समुद्र से चलने वाली हवाओं से जलवृष्टि होती है। यहाँ वार्षिक वर्षा का औसत 25 से.मी. है। कभी-कभी दोपहर के समय अत्यधिक वर्षा होती है। साइबेरिया के स्टेप में जाड़े में शीत लहर चलती है जिसे तुरान कहते हैं। यहाँ के निवासियों का मुख्य उद्यम पशुपालन और पशुचारण है। जहाँ पानी एवं सिचाई की सुविधा है वहाँ कृषि द्वारा गेहूँ, जौ, कपास, तम्बाकू तथा तिलहन की कृषि होती है। पूर्वोत्तर चीन में गेहूं, जौ, राई, सोयाबीन और कोओलिआंग की फसलें उपजाई जाती है।

          विषम जलवायु के कारण यहाँ आबादी विरल है और अधिकांश निवासी बनजारे का जीवन व्यतीत करते हैं। ये काल्मुक जाति के होते हैं। एशियाई स्टेप के निवासी करिघिज कहलाते हैं। ये अधिकतर खेमों में निवास करते हैं।

8. चीन प्रदेश- एशिया में चीन प्रदेश 25° उत्तरी अक्षांश से 40° उत्तरी अक्षाश के मध्य विस्तृत है। इसमें मध्यचीन, दक्षिण-पूर्वी चीन, कोरिया तथा दक्षिण जापान को शामिल किया जाता है। इस प्रदेश की जलवायु ठण्डी मानसूनी है। यहाँ शीतऋतु में अधिक सर्दी और ग्रीष्मऋतु में अधिक गर्मी पड़ती है। शीतऋतु में पाला पड़ता है। यहाँ शीतकाल का तापमान 40°C से 13°C रहता है। ग्रीष्म काल का औसत तापमान 24°C-27°C रहता है। कभी-कभी तापमान 32°C तक पहुंच जाता है। यहाँ का वार्षिक ताप-परिसर अधिक होता है। दैनिक ताप-परिसर 11°C तक हो जाता है।

           वर्षा का वितरण वर्षभर रहता है किन्तु ग्रीष्मकाल में वर्षा का औसत अधिक रहता है क्योंकि ग्रीष्मकाल में समुद्र की ओर से दक्षिण-पूर्वी मानसूनी हवायें चलती है। जाड़े में हल्की वर्षा होती है। पतझड़ की ऋतु मे वर्षा कम होती है। कभी-कभी आंधी के साथ मूसलाधार वर्षा होती है। यहां के चक्रवातों को टाइफून कहा जाता है। यहाँ के लोगों का मुख्य उद्यम कृषि है। इसकी मुख्य उपज धान, गेहूँ, तम्बाकू, मक्का, चाय और रेशम है। नदियों के मैदानों में अनी का उत्पादन अधिक होता है। 

          पहाड़ी ढालों पर चाय के बगीचे लगाये जाते है। इस प्रदेश की आबादी काफी घनी है। भिन्न-भिन्न भागों में मानव जीवन में बड़ी विषमता है। यहाँ मंगोल जाति के लोग निवास करते हैं और कृषि कार्य कते हैं।


 

4. एशिया की जलवायु तथा जलवायु क्षेत्र / Climate and Climatic Region of Asia

4. एशिया की जलवायु तथा जलवायु क्षेत्र 

(Climate and Climatic Region of Asia)


एशिया की जलवायु तथा जलवायु क्षेत्र⇒

प्रश्न प्रारूप  

1. एशिया की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना कीजिये।

उत्तर- सभी भौतिक तत्वों में जलवायु सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है क्योंकि इसका प्रत्यक्ष प्रभाव मानव शरीर एवं कार्यों पर पड़ता है। भौतिक एवं सांस्कृतिक भूदृश्यों की विविधता का बहुत कुछ कारण जलवायुविक तत्व ही है। एशिया की संस्कृति एवं आर्थिक विविधता के लिए जलवायु सर्वाधिक उत्तरदायी कारक है।

        एशिया महाद्वीप विश्व का एक ऐसा महाद्वीप है जहाँ विश्व में पाई जाने वाले लगभग सभी प्रकार के मुख्य जलवायु कहीं न कहीं उपस्थित है। साथ ही साथ यहाँ विश्व जलवायु की अतिशय दशाएं जैसे सबसे गर्म स्थान जकोबाबाद, अति शीतल स्थान बर्खोयाँस्क, अतिवृष्टि का स्थान चेरापूंजी एवं अति शुष्क भाग अरब मरुस्थल भी उपस्थित है।

        इस महाद्वीप की जलवायु इस विविधता के लिए इन महाद्वीप की भौगोलिक दशाएं उत्तरदायी है जिनमें महाद्वीप की विशालता, मध्यवर्ती उच्च भूमि की उपस्थिति और अक्षांशीय विस्तार सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक है। 

         एशिया की जलवायु को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक है- 

(i) एशिया की विशालता- इस महाद्वीप की जलवायु को नियंत्रित करने में इसकी विशाल आकृति का प्रभाव सर्वाधिक है। जलवायु की दृष्टि से यूरोप एशिया का महाद्वीप है, अतः दोनों का सामूहिक प्रभाव इसकी जलवायु पर पड़ता है। इन दोनों महाद्वीपों का संयुक्त क्षेत्रफल संपूर्ण स्थलमंडल का लगभग आधा है। इस महाद्वीप की विशालता का प्रमाण इसके भाग से समुद्र तट की दूरी से लगाया जा सकता है। इसका कोई भी तक मध्यवर्ती भाग से 24000 किलोमीटर से अधिक दूर स्थित है। इस तथ्य ने एशिया महाद्वीप के विशाल भूखंड की जलवायु को महाद्वीपीय बना दिया है।

        विशाल स्थलीय प्रभाव के कारण वार्षिक तापांतर में भारी अंतर है (60° से 65° से०) और समुद्र की आर्द्र हवाएं आंतरिक भाग में पहुंचते-पहुंचते शुष्क हो जाती है जिससे न्यूनतम वर्षा होती है। इसके विस्तृत उत्तर भाग पर अति शीत, उष्ण और शुष्क जलवायु की उपस्थिति इसकी विशालता की देन है।

(ii) मध्यवर्ती उच्च भूमि- एशिया महाद्वीप की जलवायु पर, मध्य भाग में फैली हुई उच्च एवं विशाल पर्वत श्रेणियों का प्रभाव पड़ने के कारण महाद्वीप को दो भागों में बांटती है – उत्तरी एशिया एवं दक्षिण एशिया। ये विशाल पर्वत श्रेणियां हिन्द एवं प्रशांत महासागर की ओर से आने वाली जल से भरी हवाओं को उत्तर की ओर जाने से रोक देती है जिनके परिणामस्वरूप एशिया का मध्य एवं उत्तरी भाग वर्षा से वंचित रह जाता है। इसलिए ये भाग अत्यंत शुष्क रह जाते हैं। यही कारण है कि उच्च पर्वत श्रेणियों को विशाल पर्वतीय बाधा के नाम से पुकारा जाता है।

        एशिया की यह मानसूनी हवाएं इन विशाल पर्वतीय श्रेणियों से टकराकर एशिया के दक्षिण एवं दक्षिणी-पूर्वी भागों में वर्षा कर देती है और इस प्रकार एशिया का दक्षिणी तथा दक्षिणी-पूर्वी भाग संसार की सबसे अधिक वर्षा प्राप्त करता है।

                 एशिया महाद्वीप के मध्य भाग में स्थित पर्वत श्रेणीयां वर्षा के साथ-साथ इस क्षेत्र के तापमान के वितरण पर भी मुख्य रूप से प्रभाव डालती है। ये पर्वत श्रेणियां एशिया के उत्तरी तथा उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र से आने वाली बर्फीली हवाओं के लिए बाधक बन जाती है तथा इन हवाओं को दक्षिणी तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया में प्रवेश करने से रोकती है। फलस्वरुप दक्षिणी भागों में तापमान इतना अधिक गिरने नहीं पाता है जितना उत्तरी भाग में गिर जाता है। यही कारण है कि भारत और पाकिस्तान में सर्दियों में कुछ उत्तरी भागों में बर्फ नहीं जम जाती है जबकि एशिया के उत्तरी भागों में बर्फ जम जाती है। इस प्रकार ये पर्वत श्रेणियां दक्षिणी भागों में उच्च तापमान बनाए रखने में विशेष रूप से सहायक है तथा दूसरी ओर ये दक्षिण की से चलने वाली गर्म हवाओं को उत्तर की ओर आने से रोक देती है जिसके फलस्वरूप उत्तरी भाग सर्दियों में अधिक तापमान प्राप्त नहीं कर पाता है और अधिक ठंडा हो जाता है।

         अत्यधिक ठंड के कारण एशिया के उत्तर में स्थित आर्कटिक महासागर जम जाता है जिसके परिणामस्वरूप उत्तरी स्थलखंड  और भी अधिक ठंडे हो जाते हैं। यही कारण है कि उत्तरी एशिया का उत्तरी ध्रुवीय भाग अत्यधिक ठंडा होने के कारण विश्व का ‘शीत ध्रुव’ कहलाता है। स्पष्ट है कि ऊंची पर्वत श्रेणियों के कारण एशिया के जलवायु बहुत अधिक विषम हो गई है। पर्वतों के मध्य स्थित पठार वृष्टिछाया में पड़ने के कारण शीत एवं शुष्क है। तिब्बत का पठार, ईरान का पठार और अनातोलिया का पठार इसके अच्छे उदाहरण है।

(iii) अक्षांशीय विस्तार- एशिया की जलवायु को नियंत्रित करने में इसके अक्षांशीय विस्तार का प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। महाद्वीप का विस्तार 10° दक्षिणी अक्षांश से 80° उत्तरी अक्षांश तक है। इसका अधिकांश भाग उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। महाद्वीप का उष्णकटिबंधीय भाग, जो विषुवत रेखा के पास स्थित है, उच्च तापमान और संवहनीय वर्षा प्राप्त करता है। चूँकि इस सम्भाग में द्वीपों की प्रधानता है। इसीलिए यहाँ की जलवायु विषुवतीय होते हुए भी प्रतिकूल नहीं है।

       एशिया का अधिकांश भाग समशीतोष्ण कटिबंध में स्थित है जिसके फलस्वरूप लगभग तीन-चौथाई भूखंड पर शीतोष्ण जलवायु का विस्तार है। उत्तरी भाग में साईबेरिया के छोर पर शीत कटिबन्धीय जलवायु पाई जाती है। इस प्रकार एशिया में तीनों कटिबन्धों की जलवायु उपस्थित है।

(iv) अन्य प्रभावकारी कारक- एशिया की जलवायु को प्रभावित करने में अन्य कारकों जैसे चक्रवात और समुद्री धाराओं का उल्लेख भी आवश्यक है।पछुआ हवा के साथ चलने वाले समशीतोष्ण चक्रवात यूरोप पार कर दो शाखाओं में बँट जाते हैं, प्रथम शाखा में चक्रवात साइबेरिया में पहुंचकर हिमपात करते हैं और दूसरी शाखा में चक्रवात काला सागर होते हुए तुर्की, ईरान, इराक, अफगानिस्तान में वर्षा करते हुए भारत पहुंच जाता है।

             भारत के उत्तरी में सर्दियों में वर्षा इन्हीं के आने पर होती है। ग्रीष्म काल में हिंद महासागर, प्रशांत महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवात दक्षिणी तथा दक्षिणी-पूर्वी एशिया में वर्षा करते हैं और तूफान से भारी क्षति पहुंचाते हैं। चीन सागर में उठने वाला टाइफून भयंकर चक्रवात का उदाहरण है।

 निष्कर्ष-

         उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि एशिया महाद्वीप जलवायु के दृष्टिकोण से संपूर्ण विश्व का प्रतिनिधित्व करता है।

प्रश्न प्रारूप 

2.  एशिया महाद्वीप की जलवायु की विशेषताओं का वर्ण करें।

अथवा एशिया के शीत एवं ग्रीष्म ऋतु की दशाओं का वर्णन कीजिये।

उत्तर- एशिया महाद्वीप संसार का सबसे विशाल महाद्वीप है। इसमें जलवायु संबंधी अनेक विषमताएँ मिलती है। उदाहरण के लिए संसार का सबसे गर्म भाग जैकोबाबाद तथा संसार का सबसे ठण्डा भाग बर्खोयांस्क इसी महाद्वीप में स्थित है।

        एशिया का दक्षिणी-पश्चिमी एवं मध्य भाग सबसे अधिक तापमान (लगभग 50° सेण्टीग्रेड) प्राप्त करता है जबकि उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्रों में लगभग नौ माह तक कठोर सर्दियाँ पड़ती है और तापमान हिमांक से बहुत नीचे गिर जाता है जो लगभग -50° सेण्टीग्रेड तक पहुँच जाता है। जलवायु की यह विषमता वर्षा के वितरण में भी पाई जाती है।

        संसार की लगभग 50% वर्षा केवल भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैण्ड, लाओस, कम्बोडिया, वियतनाम, इण्डोनेशिया, मलेशिया तथा फिलीपाइन द्वीपसमूह में हो जाती है। इन भागों में वर्षा का सामान्य औसत 250 सेण्टीमीटर से भी अधिक है जबकि एशिया के मध्य एवं दक्षिणी-पश्चिमी भाग वर्षा की कमी के कारण शुष्क एवं मरुस्थलीय हैं। इन भागों में वर्षा का सामान्य औसत 25 सेण्टीमीटर से भी कम है। एशिया महाद्वीप में जलवायु की इस विषमता के मिलने के दो कारण है – 

1. एशिया महाद्वीप की विशालता, 

2. एशिया महाद्वीप के मध्य भाग में उठी हुई पर्वत श्रेणियाँ

               सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन होने के कारण कटिबन्धीय विस्तार में परिवर्तन के साथ वायुदाब, वायु दिशा एवं वर्षा की मात्रा में भी परिवर्तन हो जाता है। सामान्य तौर पर यहाँ दो ऋतुयें पाई जाती है – शीत ऋतु एवं ग्रीष्म ऋतु।

शीत ऋतु जलवायविक दशाएँ

        एशिया की जलवायु में शीत ऋतु की दशाएं अधिक प्रभावकारी हैं। शीत ऋतु में सूर्य की किरणें उत्तरी गोलार्द्ध में तिरछी होती हैं, जिसके परिणामस्वरूप एशिया के विस्तृत भाग में तापमान नीचे चला जाता है। इस अवधि में सम्पूर्ण उत्तरी भाग कम तापमान और ध्रुवीय हवाओं के प्रभाव के कारण शीत कटिबन्धीय हो जाता है।

          विस्तृत भाग का तापमान हिमांक के नीचे चला जाता है और सर्वत्र शुष्क प्रधान ध्रुवीय हवा का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। मध्य एशिया की उच्च भूमि अपनी विशेषता के अनुरूप इसमें सहयोग देती है। परिणामस्वरूप आर्कटिक सागर से लेकर तिब्बत के पठार तथा यूरॉल से लेकर प्रशान्त तट कर का सम्पूर्ण भाग शीतल एवं शुष्क हवा के चपेट में आने के कारण कष्टदाई जलवायु का क्षेत्र बन जाता है।

             ध्रुवीय हवाओं की सघनता एवं शीतलता के कारण वायुमण्डलीय दाब बढ़ जाता है।इसे ठण्डी वायुराशि (Cold Airmass) कहा जाता है। इस ऋतु में अधिकतम वायुदाब का केन्द्र मध्य एशिया में केन्द्रित होता है। ध्रुवीय हवाओं के अतिक्रमण के कारण एशिया महाद्वीप पर अयन रेखीय कम वायुदाब की पेटी विलुप्त हो जाती है। मध्यवर्ती भाग पर अधिक वायुदाब  होने के कारण बहिर्मुखी स्थलीय हवाएं चारों ओर चलने लगती हैं जो शुष्क एवं ठण्डी होती हैं। इनके प्रभाव के कारण सम्पूर्ण उत्तरी भाग में शीत-शुष्क जलवायु का विस्तार हो जाता है।

          दक्षिण में हिमालय के अवरोध के कारण भारत में इनका प्रभाव नहीं हो पाता है, जबकि पूरब में इनका प्रवेश चीन की जलवायु को अत्यधिक प्रभावित करता है। जब ये हवाएं तटीय क्षेत्रों के पास पहुँचती हैं तो वाष्प ग्रहण कर तट की ओर मुड़ जाती है, जिससे दक्षिणी कोरिया, मंचूरिया, जापान, फिलीपीन्स आदि में वर्षा प्राप्त होती है।

       इसी प्रकार की स्थलीय हवा उत्तर भारत के अधिक दबाव क्षेत्र से बंगाल की खाड़ी की ओर चलती और मुड़कर कोरोमण्डल तट एवं श्रीलंका में वर्षा करती है। इसे जाड़े की मानसून के नाम से भी पुकारा जाता है। इनका विस्तार दक्षिण-पूर्व एशिया तक हो जाता है, जहाँ संवाहनिक हवाओं के साथ मिलकर ये भारी वर्षा करती हैं। शीत ऋतु में यूरोप पछुवा हवाओं और संलग्न चक्रवातों के प्रभाव में रहता है।

          जब ये चक्रवात यूरोप को पार कर साइबेरिया में प्रवेश करते हैं तो अत्यधिक वायुदाब की पेटी के अवरोध के कारण दो शाखाओं में विभक्त हो जाते हैं। एक शाखा के चक्रवात साइबेरिया और दूसरी शाखा के चक्रवात एशिया माइनर की ओर मुड़ जाते हैं।

        साइबेरिया की ओर जाने वाले चक्रवातों से हिम वर्षा होती है, जबकि एशिया माइनर की ओर आने वाले चक्रवात भूमध्यसागरीय तट के देशों में शीतकालीन वर्षा करते हुए पश्चिम एशिया के देशों जैसे ईरान, अफगानिस्तान के रास्ते भारत तक पहुँच जाते हैं और जाड़े की ऋतु में वर्षा करते हैं। इनका आगमन भारत में पूर्णतः अनिश्चित रहता है। 

          इस प्रकार कुछ लघु क्षेत्रों को छोड़कर जाड़े की ऋतु में सम्पूर्ण एशिया शुष्क रहता है। जाड़े में एशिया के मात्र कुछ क्षेत्र ही वर्षा प्राप्त कर पाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में निम्नलिखित विशेष उल्लेखनीय हैं।

1. दक्षिणी-पूर्वी एशिया जहाँ संवाहनिक तरंगों के कारण वर्षा की प्राप्ति होती है। कुछ क्षेत्रों में तटवर्ती हवा के मुड़कर चलने के कारण भी वर्षा होती है जैसे – इण्डोचीन एवं मलाया में।

2. पूर्वी एशिया का तटीय भाग दक्षिणी कोरिया, जापान, पूर्वी चीन, फिलीपीन्स आदि जहाँ स्थलीय हवा के मुड़कर चलने के कारण जाड़े में वर्षा होती हैं। 

3. कोरोमण्डल तट एवं श्रीलंका में जाड़े की मानसून से वर्षा होती है। एशिया माइनर, पश्चिमी एशिया, दक्षिणी-पूर्वी एशिया एवं भारत में पश्चिमी चक्रवातों से वर्षा होती है।

ग्रीष्म कालीन दशाएं

       सूर्य के उत्तरायण होते ही ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है। तापमान में उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगती है, जिससे अनेक वायुमण्डलीय स्थितियां परिवर्तित होने लगती है। जाड़े में जो उत्तरी भाग शीत कटिबन्ध बना हुआ था वह गर्म होकर समशीतोष्ण हो जाता है। 100 सेण्टीग्रेड की समताप रेखा टैगा के समानान्तर गुजरती है। तापमान की वृद्धि के फलस्वरूप वायुमण्डली दाब घट जाता है और न्यूनतम वायुदाब का क्षेत्र मध्य एशिया में विकसित हो जाता है। इस समय समुद्रों पर अधिक वायुदाब होता है।

          इसी समय भारतीय उपमहाद्वीप पर एक अन्य कम वायुदाब कि का क्षेत्र विकसित हो जाता है। इससे प्रभावित होकर समुद्री हवाएं आन्तरिक भागों की ओर चलने लगती है, जिनसे वर्षा होती है। इन हवाओं के कारण जहाँ दक्षिणी एवं पूर्वी एशिया में वर्षा होती है, वहीं पश्चिमी एशिया शुष्क रह जाता है। पूरब से चलने वाली लम्बी दूरी तय करने के कारण मध्य एशिया अथवा साइबेरिया में पहुँचते-पहुँचते ये शुष्क हो जाती है, जिससे बहुत कम वर्षा की प्राप्ति हो पाती है।

          भारतीय उपमहाद्वीप की ओर चलने वाली समुद्री हवा मानसून के नाम से जानी जाती है जो एक लघु अवधि में अत्यधिक वर्षा करती है। लेकिन इस प्रकार की मानसूनी हवा से वर्षा की मात्रा और सामयिक वितरण हमेशा अनिश्चित रहता है। इनके साथ जब ऊष्ण चक्रवात मिल जाते हैं तो मूसलाधार वर्षा के कारण बाढ़ और जलप्लावन से अपार धन-जन की हानि होती है। मानसूनी क्षेत्रों में सूखा और बाढ़ सबसे बड़ी आपदा हैं। ऐसे क्षेत्र दक्षिणी, दक्षिणी-पूर्वी और पूर्वी एशिया में स्थित है।

         एशिया में ग्रीष्म कालीन वर्षा शरद कालीन वर्षा से अधिक होती है। यही नहीं औसत वर्षा के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि अधिक वर्षा या सामान्य वर्षा प्राप्त करने वाले भाग कम और कम वर्षा प्राप्त करने वाले क्षेत्र अधिक हैं। वर्षों की कमी के कारण यहाँ की जलवायु में बहुत अन्तर देखा जाता है। वर्षा की विषमता इस स्तर की है कि कहीं बाढ़ से लोग बह रहे होते हैं तो कहीं पानी के लिए तरसते है। 100 सेण्टीमीटर औसत वर्षा प्राप्त करने वाले क्षेत्रों का प्रतिशत सम्पूर्ण एशिया के क्षेत्रफल के संदर्भ में बहुत कम है।

           एशिया की जलवायु को चरितार्थ करने वाली ऋतुओं के विवेचन से स्पष्ट है कि कि दोनों ऋतुओं में अतिशयता (Extremes) की प्रधानता है। तापमान एवं वर्षा की इस अतिशयता ने यहाँ के निवासियों की कठिनाइयों को बढ़ा दिया है। वार्षिक वर्षा के विश्लेषण से प्रकट होता है कि बहुत लघु क्षेत्र पर आवश्यकता के लिए वर्षा हो पाती है।

         वर्षा के अभाव में पश्चिमी भाग मरुभूमि सदृश्य है तो मध्यवर्ती और उत्तरी भाग स्टेपी घास का मैदान है। सुविधा सम्पन्न वनस्पति पैदा करने वाली जलवायु एशिया के दक्षिणी, दक्षिणी-पूर्वी एवं पूर्वी छोरों पर पाई जाती है, जो पर्याप्त वर्षा के कारण विकसित क्षेत्र है।का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और यहां वर्षा सवहनीय होती है।।

निष्कर्ष:

        उपर्युक्त ऋतुओं के विवेचन से स्पष्ट है कि दोनों ऋतुओं में अतिशयता की प्रधानता है। तापमान एवं वर्षा की इस अतिशयता ने एशिया निवासियों की कठिनाइयों को और बढ़ा दिया है। वार्षिक वर्षा के विश्लेषण से प्रकट होता है कि बहुत कम क्षेत्र पर आवश्यकता के लिये वर्षा हो पाती है। वर्षा के अभाव में पश्चिमी भाग मरुस्थल  और मध्यवर्ती उत्तरी भाग स्टेपी घास का मैदान है।

प्रश्न प्रारूप 

3. एशिया के जलवायवीय प्रदेश का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

अथवा एशिया को जलवायु विभागों में विभक्त कीजिए और उनमें से किन्हीं दो की जलवायु की विशेषताओं का विवेचन कीजिए।

उत्तर- एशिया महाद्वीप ग्लोब के लगभग एक-तिहाई भाग पर फैला हुआ है, अतः इस विशाल महाद्वीप में जलवायु में विविधता पायी जाती है। प्रो. कैसी ने लिखा है कि- “प्रायः सभी प्रकार की जलवायु एशिया महाद्वीप में पायी जाती है।” इस प्रकार इस महाद्वीप की क्षेत्रीय विभिन्नताओं को ध्यान में रखकर यहाँ की जलवायु का वर्गीकरण अनेक जलवायुविदों ने किया है।

          विश्व स्तर पर जलवायु वर्गीकरण में इन विद्वानों ने अनेक प्रतीकों का प्रयोग किया है जिनके आधार पर ही एशिया की जलवायु का वर्गीकरण किया गया है। इनमें से कुछ मान्य वर्गीकरण निम्नलिखित हैं-

1. ब्लाडिमिर कोपेन का जलवायु वर्गीकरण

2. थर्नाथ्वेट का जलवायु वर्गीकरण

3. फिंच एवं ट्रिवार्था का जलवायु वर्गीकरण

 4. एल. डब्ल्यू. लायड का जलवायु वर्गीकरण

5. एल. डडले स्टाम्प का जलवायु वर्गीकरण 

6. सामान्य जलवायु वर्गीकरण

एशिया की जलवायु का सामान्य वर्गीकरण (General Climatic Division of Asia)

            उपर्युक्त विद्वानों का जलवायु वर्गीकरणों को ध्यान में रखते हुए एशिया की जलवायु का सामान्य परिचय प्राप्त करने के लिए हम एशिया को निम्नांकित जलवायु विभागों में बाँट सकते हैं :-

(1) भूमध्यरेखीय जलवायु- इस प्रकार की जलवायु मलाया, श्रीलंका और हिन्देशिया में पायी जाती है। यह प्रदेश भूमध्य रेखा के 5° उत्तर और 5° दक्षिण तक फैला हुआ है। इस जलवायु की सबसे बड़ी विशेषता वर्ष भर ऊँचा तापमान व प्रतिदिन वर्षा है।

        औसत वार्षिक तापमान 26° सेल्सियस रहता है। दैनिक तापमान अधिक-से-अधिक 30° सेल्सियस और कम-से-कम 25° सेल्सियस होता है। दैनिक तापान्तर न्यूनतम रहता है। यह प्रदेश उत्तरी-पूर्वी एवं दक्षिणी-पूर्वी व्यापारिक आर्द्र हवाओं के मार्ग में पड़ता है जिससे यहाँ वर्ष भर वर्षा होती है। वर्षा का वार्षिक औसत 200 सेमीo से अधिक है। उष्ण-आर्द्र जलवायु के कारण यहाँ चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वृक्ष पाये जाते हैं।

एशिया की जलवायु

(2) मानसूनी जलवायु- इस प्रकार की जलवायु पाकिस्तान, भारत, श्रीलंका, म्यांमार (बर्मा), थाइलैण्ड, हिन्दचीन, फिलीपाइन, फारमोसा और जापान आदि देशों में पायी जाती है। यहाँ गर्मी में तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है। कभी-कभी तापमान 40° सेल्सियस से भी ऊपर चला जाता है एवं वार्षिक व दैनिक तापान्तर अधिक होता है। सर्दी की ऋतु में कठोर सर्दी पड़ती है और उत्तरी भागों में तापमान 10° सेल्सियस एवं दक्षिणी भागों में तापमान 23° सेल्सियस के आसपास रहता है।

           ग्रीष्मकाल में यहाँ भयंकर गर्मी पड़ने के करण एशिया के मध्य से स्थल भाग काफी गरम हो जाते है, अत: वहाँ न्यून भार स्थापित हो जाता है। इस समय स्थल की अपेक्षा जल पर अधिक भार बना रहता है।

             अतः इस ऋतु के कारण एशिया के मध्य से स्थल भाग काफी गरम हो जाते हैं, अत: वहाँ न्यून भार स्थापित हो जाता है। इस समय स्थल की अपेक्षा जल पर अधिक भार बना रहता है। अत: इस ऋतु में हवायें जल से स्थलीय भाग की ओर चलती हैं एवं आर्द्र होती है जिससे इन आर्द्र हवाओं से वर्षा होती है। वर्षा की मात्रा एवं वितरण अनिश्चित होता है।

        दक्षिणी-पूर्वी चीन तट,भारत के पश्चिमी घाट एवं असम की पहाड़ियों पर वर्षा का औसत 500 सेमी. से अधिक है, वहीं उत्तरी-पश्चिमी भारत में 25 सेमी. से भी कम वर्षा होती है। यहाँ पतझड़ वनस्पतियाँ पायी जाती हैं।

(3) चीन तुल्य जलवायु- इस प्रकार की जलवायु का प्रमुख क्षेत्र उत्तरी चीन, दक्षिणी कोरिया एवं जापान द्वीप समूह है। यह भाग 30° उत्तरी अक्षांश से 45° उत्तरी अक्षांश के बीच मिलता है। गर्मियों में पर्याप्त गर्मी व सर्दियों में कठोर सर्दी इस जलवायु की मुख्य विशेषता है।

        गर्मियों में तापमान 28° सेल्सियस के लगभग रहता है। सर्दियों में मध्य एशिया से आने वाली बर्फीली हवाओं के कारण तापमान अत्यन्त कम हो जाता है जिससे बर्फ जम जाती है। ग्रीष्म काल में यहाँ मानसून हवाओं से बहुत वर्षा होती है। वर्षा का औसत 100 सेमी. तक होता है। ग्रीष्म ऋतु में उष्ण चक्रवात जिन्हें टाइफून कहते हैं, से घनघोर वर्षा होती है।

(4) उष्ण मरुस्थलीय जलवायु- इस प्रकार की जलवायु एशिया महाद्वीप के दक्षिणी-पश्चिमी भाग, सऊदी अरब, थार के मरुस्थलीय भागों, सीरिया एवं पश्चिमी इराक आदि क्षेत्रों में पायी जाती है। उच्च तापमान तथा शुष्कता यहाँ की जलवायु की प्रमुख विशेषता है। ग्रीष्म ऋतु में तापमान 50° सेल्सियस के आसपास रहता है तथा शीतकाल में तापमान 15° सेल्सियस तक पहुँचता है। शीतकाल की रात्रि में कभी-कभी तापमान हिमांक तक पहुँच जाता है। इस प्रकार की जलवायु में ग्रीष्मकाल में दिन गर्म एवं धूल भरी आँधियाँ एवं लू चलती है जबकि रात्रि के समय आकाश स्वच्छ रहता है एवं तापमान के गिर जाने के कारण रातें ठण्डी रहती हैं।

(5) भूमध्यसागरीय जलवायु- इस जलवायु को रूमसागरीय जलवायु के नाम से भी जाना जाता है। तुर्की, सीरिया, लेबनान, इजराइल, जार्डन, साइप्रस आदि भूमध्यसागरीय निकटवर्ती भागों में इस प्रकार की जलवायु पायी जाती है। ये देश एशिया महाद्वीप के पश्चिम में स्थित है।

         गर्मियों में बहुत गर्मी एवं सर्दियों में वर्षा इस जलवायु की सबसे बड़ी विशेषता है। ग्रीष्मकाल में वर्षा बहुत कम होती है। शीतकाल में चक्रवातों से वर्षा होती है, ग्रीष्मकाल में औसत तापमान 24° सेल्सियस एवं शीतकाल में 10° सेल्सियस रहता है। वर्षा का वार्षिक औसत 50 से 75 सेमी. तक रहता है।

(6) ईरान तुल्य जलवायु- ईरान, पूर्वी इराक एवं अफगानिस्तान में इस प्रकार की जलवायु पायी जाती है। गर्मियों में उच्च तापमान एवं शुष्कता तथा सर्दियों में कड़ी सर्दी इस ऋतु की मुख्य विशेषता है। गर्मियों में तापमान 45° सेल्सियस तक पहुँच जाता है और सर्दियों में तापमान 0° सेल्सियस से भी कम हो जाता है। रात्रि में ओस और कोहरा पड़ता है। औसत वार्षिक वर्षा 25 सेमी. है। वर्षा की कमी के कारण यह जलवायु प्रदेश शुष्क रह गया है।

(7) तूरान तुल्य जलवायु- इस प्रकार की जलवायु एशिया के आन्तरिक भाग में पायी जाती है। समुद्र से अधिक दूरी होने के कारण इस भाग पर सागरीय प्रभाव नगण्य है। अतः यह पूर्णतया महाद्वीपीय जलवायु है। तीव्र गर्मी, कड़ी सर्दी तथा अति न्यून वर्षा इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं। ग्रीष्मकाल में तापमान 40° सेल्सियस तक पहुँच जाता है एवं सर्दियों में तापमान हिमांक बिन्दु से नीचे गिर जाता है। वर्षा का वार्षिक औसत 20 सेमी. है। वर्षा केवल गर्मियों में होती है। शीत ऋतु में वर्षा बहुत कम होती है।

(8) मंचूरिया तुल्य जलवायु- मंचूरिया, उत्तरी जापान, उत्तरी कोरिया और सखालिन द्वीप में पायी जाने वाली जलवायु मंचूरिया तुल्य जलवायु कहलाती है। साधारण गर्मी, कठोर शीत एवं वार्षिक तापान्तर की अधिकता यहाँ की जलवायु की प्रमुख विशेषताएँ हैं। शीत ऋतु में साइबेरिया की ओर से आने वाली ठण्डी हवायें तापमान को गिरा देती हैं। ग्रीष्मकाल में औसत तापमान 22° सेल्सियस और औसत वार्षिक वर्षा 35 सेमी. प्राप्त होती है।

(9) तिब्बत तुल्य जलवायु- इस जलवायु प्रदेश का विस्तार तिब्बत व पामीर के पठारी भाग हैं। तिब्बत व पामीर के पठार समुद्र तल से 3500 मीटर से अधिक ऊँचे हैं। ये दोनों पठार चारों ओर से पर्वतों से घिरे हुए हैं। इस कारण यहाँ की जलवायु में अति विषमता पायी जाती है।

        गर्म व लघु ग्रीष्मकाल तथा कठोर व लम्बा शरदकाल इस जलवायु की प्रमुख विशेषता है। ग्रीष्मकाल में तापमान 20° सेल्सियस के निकट रहता है एवं शीतकाल में तापमान हिमांक बिन्दु से नीचे पहुँच जाता है। दैनिक तापान्तर बहुत अधिक पाया जाता है। सर्दियों में पाला पड़ता है। वर्षा गर्मियों में होती है। वर्षा का औसत 70 सेन्टीमीटर तक पाया जाता है।

(10) अल्टाई तुल्य जलवायु- एशिया महाद्वीप के मध्य भाग में अल्टाई पर्वतमाला के निकटवर्ती भागों में इस तरह की जलवायु पायी जाती है। सामान्य व लघु ग्रीष्मकाल तथा अति कठोर व लम्बा शीतकाल इस जलवायु की प्रमुख विशेषता है। ग्रीष्मकाल में तापमान 10° सेल्सियस के लगभग रहता है किन्तु शीतकाल में तापमान -25° तक पहुँच जाता है। सर्दियों में अत्यन्त शीतल व बर्फीली हवायें चलती जो चारों तरफ बर्फ जमा देती हैं। अधिकांश वर्षा ग्रीष्मकाल में होती है। वर्षा बर्फ व जल दोनों रूपों में होती है। वर्षा का वार्षिक औसत 100 सेमी. तक पाया जाता है।

(11) प्रेयरी तुल्य जलवायु- इस प्रकार की जलवायु को मध्य अक्षांशीय महाद्वीपीय या स्टेपी जलवायु के नाम से भी पुकारते हैं। यह जलवायु पश्चिमी साइबेरिया तथा मंगोलिया के घास के मैदानों में पायी जाती है। साधारण गर्मी तथा कठोर शीत इस ऋतु की प्रमुख विशेषता है।

         ग्रीष्मकाल में तापमान 24° सेल्सियस तक पाया जाता है। शीत ऋतु में बर्फीली तथा ठण्डी हवायें चलती हैं जिससे तापमान हिमांक बिन्दु से नीचे चला जाता है, कभी-कभी तापमान -50° सेल्सियस तक चला जाता है। विश्व का सबसे ठण्डा स्थान बर्खोयांस्क इसी जलवायु क्षेत्र में स्थित है। वर्षा ग्रीष्म ऋतु में होती है जिसका वार्षिक औसत 40 सेमी. है। वर्षा से घास उग जाती है जिसे स्टेपी घास के नाम से जाना जाता है।

(12) टैगा तुल्य जलवायु- एशिया महाद्वीप के अत्यन्त ठण्डे प्रदेश साइबेरिया के उत्तरी क्षेत्र में स्थित कोणधारी टैगा वन प्रदेश में यह जलवायु पायी जाती है। ग्रीष्मकाल 3 माह एवं शीतकाल 9 माह की अवधि का होता है। ग्रीष्मकाल 5° सेल्सियस तक सामान्य तापमान रहता है जबकि शीतकाल में तापमान -50° सेन्ट्रीग्रेड तक पहुँच जाता है।

        शीत ऋतु बड़ी कठोर व दीर्घ अवधि वाली होती है। कठोर सर्दी के कारण यहाँ अत्यधिक सहन शक्ति वाले कोणधारी वन पाये जाते हैं। ग्रीष्मकाल में हल्की वर्षा होती है एवं शीत ऋतु में वर्षा बर्फ के रूप में होती है। वर्षा का वार्षिक औसत 50 सेमी. पाया जाता है।

(13) टुण्ड्रा तुल्य जलवायु- आर्कटिक महासागर के किनारे पर हिममण्डित क्षेत्र में इस प्रकार की जलवायु पायी जाती है। यह क्षेत्र वर्ष भ हिम से आवृत्त रहता है।

3. एशिया की अपवाह प्रणाली / Drainage System of Asia

3. एशिया की अपवाह प्रणाली 

(Drainage System of Asia)


3. एशिया की अपवाह प्रणाली⇒

                  विश्व के सबसे विशाल एशिया महाद्वीप के विकास में वहाँ के अपवाह प्रणाली का विशेष महत्त्व होता है। नदियों तथा बहते हुए जल का अध्ययन अपवाह प्रणाली के अंतर्गत किया जाता है। किसी भी देश अथवा महाद्वीप के विकास में उस क्षेत्र की नदियाँ सर्वाधिक सहायक होती है। प्रोफेसर क्रैसी के अनुसार “एशिया में किसी बड़ी विशाल नदी का अभाव है जबकि अनेक छोटी नदियाँ एशिया के आंतरिक भागों से निकलती है।”
 
         एशिया महाद्वीप की अपवाह प्रणाली के अंतर्गत यहाँ की विशाल पर्वत श्रेणियों से निकलने वाली नदियों के मार्ग में ये पर्वत श्रेणियां बाधा उत्पन्न नहीं करती है। इन मध्यवर्ती पर्वत श्रेणियों से निकलने वाली सतत वाहिनी नदियाँ पर्वतीय ढालों के अनुसार बहती हुई पूरब, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण दिशाओं में अपने मार्ग का अनुसरण करती हुई आगे बढ़ जाती है।
          एशिया महाद्वीप को अफवाह के दृष्टिकोण से निम्न पॉंच क्षेत्रों में विभाजित किया गया है –
1. प्रशांत महासागर की अपवाह प्रणाली
2. हिंद महासागर की अपवाह प्रणाली
3. आर्कटिक महासागर की अपवाह प्रणाली
4. आंतरिक अपवाह प्रणाली
5. भूमध्यसागरीय अपवाह प्रणाली।
एशिया की अपवाह प्रणाली1. प्रशांत महासागर की अपवाह प्रणाली
                 मध्य एशिया की पर्वत श्रेणियों से निकलने वाली नदियाँ पूरब दिशा की ओर बहती हुई प्रशांत महासागर में गिर जाती है। प्रशांत महासागर अपवाह क्षेत्र का विस्तार कम है। इस अपवाह क्षेत्र में पाई जाने वाली नदियाँ आमूर, हांगहो, यांगटिसीक्यांग, सीक्यांग, मीकांग, मीनाम, लाल इत्यादि है। अन्य नदियों में आमूर की सहायक नदियाँ उसुरी तथा सुँगारी; हांगहो की सहायक नदियाँ  वी-हो तथा फेन-हो; यांगटिसीक्यांग की सहायक नदियाँ हान, मिन, कान, चार्लिंग, सियांग इत्यादि है।
            इस अपवाह क्षेत्र में अनेक प्रकार की अफवाह स्वरूप देखने को मिलते हैं, जैसे – हांगहो का अपवाह, ओरडोस पठार एवं सिनलिंग पर्वत श्रेणी के निकट भागों में आयताकार अपवाह प्रणाली के रूप में है जबकि  यांगटिसीक्यांग अपनी सहायक नदियों के साथ वृक्षीय अपवाह प्रणाली का विकास करती है। वृक्षीय अपवाह प्रणाली में पाए जाने वाले नदियाँ कृषि, परिवहन तथा सिंचाई में अपना विशेष महत्व रखती है। चीन का विशाल उत्तरी मैदान हांगहो की देन है। अपनी प्रतिवर्ष आने वाली भयंकर बाढ़ के कारण चीन का शोक कहलाती है।
2. हिंद महासागर की अपवाह प्रणाली
         पश्चिम दिशा में स्थित दजला-फरात नदियों के उद्गम स्थल से लेकर पूरब में मलेशिया तक का विस्तृत क्षेत्र हिंद महासागर अपवाह प्रणाली के अंतर्गत आता है। इस अफवाह क्षेत्र के मुख्य नदियाँ दजला, फरात, सिंधु, गंगा एवं ब्रह्मपुत्र है। अन्य नदियों  में इरावदी, सालवीन, चिंदविन, गोदावरी, नर्मदा, ताप्ती, कृष्णा, कावेरी, महानदी इत्यादि है। हिंद महासागर अपवाह क्षेत्र में नदी अपहरण के अनेक उदाहरण मिलते हैं। इरावदी और सिंधु नदियाँ इसके सबसे बड़े उदाहरण है।
         प्राचीन काल में उत्तर-दक्षिण घाटी में बहने वाली नदी का सिंधु नदी ने अपहरण किया था। इस प्रकार के नदी अपहरण के अनेक चिन्ह आज भी हिमालय पर्वत पर दिखाई देते हैं। भारत के दक्षिणी प्रायद्वीपीय पर बहने वाली नदियाँ मार्ग परिवर्तन की अपेक्षा अपनी घाटियों को गहरी करने में लगी हुई है। इस प्रकार की नदियों का अपवाह पुर्वोत्पन्न अपवाह प्रणाली के रूप में है। पुर्वोत्पन्न अपवाह प्रणाली में बहने वाली नदियाँ कृषि सिंचाई के दृष्टिकोण से अधिक महत्व रखती है।
        गंगा एवं सिन्धु का मैदान एशिया का प्रसिद्ध एवं सबसे अधिक उपजाऊ मैदान है। म्यांमार की इरावदी ने इस देश को एक सुचारू आर्थिक जीवन प्रदान किया है। इराक अपनी दोनों नदियों दजला एवं फरात की देन है। इस क्षेत्र में मिलने वाली नदियाँ इस क्षेत्र की जल की कमी की समस्या को बहुत कुछ अंश तक दूर करने में सहायक रही है। इस क्षेत्र में बहने वाली नदियों में वर्ष भर जला भरा रहता है।
एशिया की अपवाह प्रणाली3. आर्कटिक महासागर की अपवाह प्रणाली
           एशिया महाद्वीप की सबसे विशाल अपवाह प्रणाली एशिया के उत्तरी भाग में स्थित आर्थिक महासागरीय प्रवाह प्रणाली है। इस अपवाह प्रणाली में बहने वाली नदियाँ उच्च व गर्म प्रदेशों से निकलकर उत्तर के विशाल मैदान में बहती हुई आर्कटिक महासागर में जाकर गिरती है। आर्थिक सागर के अधिकांश भाग में वर्ष भर बर्फ के जमे रहने के कारण इस क्षेत्र के नदियाँ अपने मुहानों पर गिरने के पूर्व दोनों किनारों पर फैल जाती है जिससे नदियों के बेसिनों एवं समुद्र-तटीय भागों के निकट अनेक विस्तृत दलदल बन जाते हैं।
             दलदली भाग एवं शीत ऋतु में बर्फ जम जाने के कारण इस क्षेत्र की नदियों का कोई आर्थिक महत्व नहीं है। आर्कटिक महासागर में बर्ष के अधिकांश भाग में बर्फ जमी रहती है, इस कारण इस महासागर में किसी बंदरगाह का निर्माण नहीं हुआ है। इसलिए व्यापारिक दृष्टिकोण से इस क्षेत्र की नदियों का कोई महत्व नहीं है। इस क्षेत्र की  तीन विशाल नदियों ओब, यनीसी तथा लीना संसार की बड़ी नदियों में से है। इस क्षेत्र की नदियों में  इन्दिगिरिका,  कोलीमा, यना इत्यादि है। शीतकाल में कुछ नदियों का जल ऊपरी भाग में जम जाता है।
4. आंतरिक अपवाह प्रणाली
          आंतरिक अपवाह प्रणाली पश्चिम में आनातोलिया से लेकर पूरब में मंचूरिया तक विस्तृत है। इस अपवाह प्रणाली में पाई जाने वाली नदियाँ वर्षा तथा वर्ष के ऊपर निर्भर हैं। बर्फ पिघलने के कारण इन नदियों को पर्याप्त मात्रा में जल मिल जाता है। ये नदियाँ बहकर झीलों अथवा आन्तरिक  सागरों में गिर जाती है अन्यथा जल की मात्रा कम होने के कारण यह नदियाँ मध्य एशिया के शुष्क रेतीले भागों में सूखकर नदियाँ आमू दरिया और सर दरिया है जो अरल सागर में गिरती है।
           अन्य नदियों में इली, चू, तारिम, खोतान  इत्यादि है जो बालकश झील तथा लैपनौर झील में गिरती है। इस अफवाह क्षेत्र में नदियों की अपेक्षा झीलों का महत्व अधिक है। कैस्पियन, अरल तथा बालकश झीलें  उल्लेखनीय है। इस अपवाह क्षेत्र का विस्तार एशिया की लगभग 80 लाख पर किलोमीटर भूमि पर है लेकिन इनका कोई आर्थिक महत्व नहीं है।
5. भूमध्यसागरीय अपवाह प्रणाली
                एशिया महाद्वीप के पश्चिमी भाग में भूमध्य सागर विस्तृत है। एशिया के दक्षिणी-पश्चिमी भाग के देशों की नदियों का जल भूमध्य सागर में गिरता है। भूमध्य सागर अपवाह क्षेत्र का विस्तार बहुत कम है। टर्की, सीरिया, लेबनान, इजरायल, जॉर्डन तथा साइप्रस देशों तक ही सीमित है। इस जल-प्रवाह क्षेत्र का एशिया की जल-प्रवाह प्रणाली में विशेष महत्व है क्योंकि आरमीनिया की गाँठ ने  भूमध्य सागर का केवल थोड़े से ही क्षेत्र में संपर्क रहने दिया है। इस क्षेत्र में एशिया की कोई विशाल नदी भी नहीं है। केवल छोटी नदियाँ भूमध्य सागर में जाकर गिरती है जिनका कोई आर्थिक महत्व नहीं है। टर्की से निकलने वाली मनीसा तथा मैंडेरिस नदियाँ एवं सीरिया से निकलने वाली ओरोनटेस नदी ही इस जल प्रवाह क्षेत्र की मुख्य नदियाँ है जो भूमध्य साग में गिरती हैं।
प्रश्न प्रारूप 
Q1. एशिया की अपवाह प्रणाली का सविस्तार वर्णन कीजि
 अथवा
Q2. एशिया के जल-प्रवाह का वर्णन कीजिए 

2. एशिया का उच्चावच / Relief or Physiography of Asia

2. एशिया का उच्चावच 

(Relief or Physiography of Asia)


एशिया का उच्चावच⇒

                     विश्व का सबसे विशाल महाद्वीप एशिया पूर्वी गोलार्ध में स्थित है। भूमध्य रेखा से 10° दक्षिणी की ओर से लेकर 80° उत्तर की ओर स्थित होने के कारण यह दक्षिणी तथा उत्तरी दोनों गोलार्ध में अपनी भौगोलिक स्थिति लिए हुए है। एशिया महाद्वीप का अधिकांश भाग उत्तरी गोलार्ध में ही है। इस महाद्वीप की पूर्व से पश्चिम तक की स्थिति 25° पूर्वी देशांतर से लेकर 170° पश्चिमी देशांतर के बीच है। इस प्रकार एशिया महाद्वीप की स्थिति 90° अक्षांशों तथा 195° देशांतरों में है।
 
           इस महाद्वीप की उत्तर से दक्षिण की अधिकतम लंबाई 8580 किलोमीटर तथा पूरब से पश्चिम अधिकतम चौड़ाई 7720 किलोमीटर है। एशिया महाद्वीप का विस्तार 44030200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर है। यह विशाल महाद्वीप तीन ओर से समुद्र से तथा एक ओर से स्थलखंड (यूरोप महाद्वीप) से घिरा हुआ है।
           
            एशिया महाद्वीप के उच्चावच को निम्नलिखित पाँच भागों में बाँट सकते हैं-
 
1. मध्यवर्ती पर्वत-पठार-क्रम
2. नदियों के मैदान
3. दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार
4. उत्तर की निचली भूमि
5. द्वीप समूह मालाएँ
एशिया का उच्चावच

1. मध्यवर्ती पर्वत-पठार-क्रम

              विश्व का सबसे विशाल एशिया महाद्वीप अपनी धरातलीय विशेषताओं के कारण संसार के सभी महाद्वीपों से अलग है। एशिया के मध्य भाग में स्थित ये पर्वत श्रेणियाँ एशिया महाद्वीप के लगभग 20% भागों पर फैली हुई है। इसका विस्तार पश्चिम में टर्की से प्रारंभ होकर पूरब में चीन तथा उत्तर-पूर्व में बेरिंग सागर तक है। इसमें अनेक उच्च पर्वत एवं पठार सम्मिलित है। इस क्रम में पर्वत शिखरों की सामान्य ऊँचाई 1000 मीटर से लेकर 8848 मीटर तक है। एशिया के इस मध्यवर्ती पर्वत-पठार-क्रम का केंद्र पामीर की गाँठ है जो विश्व की छत कहलाती है।

  • पामीर की गाँठ से निकलने वाली पर्वत श्रेणियों का प्रथम क्रम पश्चिम की ओर फैली हुई है। इस क्रम के अंतर्गत निम्नलिखित पर्वत एवं पठार सम्मिलित है – हिंदुकुश, एल्बुर्ज, गिलगिट, सुलेमान, किरथर, जैग्रोस पर्वत श्रेणियाँ, ईरान का पठार, पौंटिक श्रेणी, टॉरस श्रेणी, एशिया माइनर का पठार।
  • पामीर की गाँठ से निकलने वाली पर्वत श्रेणियों का दूसरा क्रम दक्षिण-पूरब की ओर फैला हुआ है। इस क्रम के अंतर्गत निम्न पर्वत एवं पठार सम्मिलित है :
हिमालय पर्वत श्रेणी – हिमालय पर्वत श्रेणी पर संसार की सर्वोच्च पर्वत श्रेणी स्थित है। इसका सर्वोच्च पर्वत शिखर एवरेस्ट संसार का सबसे ऊँचा शिखर है जिसकी ऊँचाई 8848 मीटर है। हिमालय पर्वत श्रेणी की एक शाखा असम तथा म्यांमार होती हुई पूर्वी द्वीप समूह को चली गई है। असम में इसकी मुख्य पर्वत श्रेणियाँ नागा, गारो, खासी, जयंतिया तथा पटकोई है। म्यांमार में इसके मुख्य पर्वत श्रेणियाँ अराकानयोमा, पीगूयोमा और तनासरिमयोमा है।
  • पामीर की गाँठ से निकलने वाले पर्वत श्रेणियों का तीसरा क्रम पूरब की ओर फैला हुआ है। इस क्रम के अंतर्गत निम्न पर्वत एवं पठार सम्मिलित है – क्यूनलुन, बयानकारा, सिनलिंग, अलताइनतांग, नानशान, खिंगन, तिब्बत का पठार, काराकोरम।
  • पामीर की गाँठ से निकलने वाले पर्वत श्रेणियों का चौथा क्रम उत्तर-पूरब दिशा में फैला हुआ है। इस क्रम के अंतर्गत निम्न पर्वत एवं पठार सम्मिलित है – तियानशान, अल्टाई, यावलोनोय, स्टेनोवोय, बर्खोयानस्क, कोलिमा, अनादिर, कमचटका
एशिया का उच्चावच
2. नदियों के मैदान
                         विभिन्न नदियों के छोटे-बड़े मैदान मिलकर एशिया महाद्वीप के विशाल धरातल का निर्माण करते हैं। यह मैदान अत्यंत उपजाऊ मृदा द्वारा निर्मित है। अनेक महत्वपूर्ण सभ्यताओं का विकास इन मैदानों में हुआ है। सिंधु घाटी एवं दजला-फरात बेसिन की सभ्यता एशिया की प्राचीन सभ्यताओं में से है जहाँ से इसका प्रचार संसार के अनेक देशों में हुआ है। ये एशिया महाद्वीप के सांस्कृतिक विकास केंद्र है। आज भी एशिया महाद्वीप की जनसंख्या का सबसे अधिक घनत्व इन्हीं मैदानों में मिलता है। पश्चिम से पूरब की ओर ये मैदान क्रमशः निम्न प्रकार है-
(i) दजला-फरात का मैदान – इस मैदान का विस्तार इराक में है। दजला-फरात के मैदान को मेसोपोटामिया का मैदान भी कहा जाता है।
(ii) सिंधु-गंगा का मैदान – इसका विस्तार भारत तथा पाकिस्तान में है। सिंधु तथा गंगा और इन नदियों की अनेक सहायक नदियों की उपजाऊ कॉंप मिट्टी से यह मैदान निर्मित हुआ है। सिंधु घाटी की सभ्यता का विकास एशिया के सिंधु तथा गंगा के मैदान में ही हुआ।
(iii) इरावदी का मैदान – इस मैदान का विस्तार में म्यांमार में है। इरावती का उपजाऊ मैदान कॉंप मिट्टी की सैकड़ों मीटर गहरी परतों द्वारा निर्मित है जो चावल की कृषि के लिए विश्वविख्यात है।
(iv) मीनाम का मैदान – इस मैदान का विस्तार थाईलैंड में है। यह कॉंप उपजाऊ मिट्टी का मैदान है जिसका विस्तार दक्षिण की ओर अधिक है।
(v) मीकांग का मैदान – मीकांग नदी ने हिंदचीन प्रायद्वीप पर उपजाऊ मैदान का निर्माण किया है। इस मैदान में कॉंप मिट्टी की अनेक परतें बिछी हुई है।
(vi) सिक्यांग का मैदान – यह मैदान दक्षिणी चीन में विस्तृत है। इस मैदान का विस्तार अधिक नहीं है।
(vii) यांगटिसीक्यांग का मैदान – यह मैदान मध्य चीन में है जिसका निर्माण यांगटिसीक्यांग तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा हुआ है। यह उपजाऊ कॉंप मिट्टी का बना है। इसका रेड बेसिन प्रसिद्ध मैदानी भाग है।
(viii) ह्वांगहो का मैदान – इसका निर्माण ह्वांगहो अथवा पीली नदी द्वारा लोयस के पठार से बहाकर लाई गई पीली मिट्टी से हुआ है। इसलिए इसे उत्तरी चीन का विशाल पीला मैदान भी कहते हैं।
3. दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठा
                                      एशिया के दक्षिण-पश्चिमी, दक्षिणी एवं दक्षिणी-पूर्वी भाग में प्राचीन चट्टानों का विस्तार पाया जाता है। इन प्राचीन चट्टानों का उद्भव पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ हुआ। इन प्राचीन पठारों को तीन भागों में बांटा गया है-
(i) अरब का प्रायद्वीपीय पठार – यह पठार एशिया के दक्षिणी-पश्चिमी भाग अरब प्रायद्वीप में स्थित है। अरब का प्रायद्वीपीय पठार कठोर प्राचीन चट्टानों द्वारा निर्मित गोंडवाना भूमि का एक भाग है। इस पठार की सामान्य ऊँचाई 2000 मीटर है। यह एक शुष्क मरुस्थलीय भाग है। शुष्कता के कारण ही यह अत्यंत रेतीला हो गया है।
(ii) भारत का प्रायद्वीपीय पठार – यह पठार भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिणी भाग में स्थित है। अरब के प्रायद्वीपीय पठार की भांति यह भी प्राचीन चट्टानों से निर्मित गोंडवाना भूमि का अंश है जो कठोर रवेदार चट्टानों से बना है। इस पठार की सामान्य ऊँचाई 1400 मीटर है। पठार के उत्तरी भाग में विंध्याचल पर्वत, सतपुड़ा पर्वत तथा मालवा का पठार प्रमुख श्रेणियां है जबकि पठार के दक्षिणी भाग में नीलगिरी तथा इलायची की पहाड़ियां प्रमुख श्रेणियां है।
(iii) हिन्दचीन का पठार – यह दक्षिणी-पूर्वी एशिया में फैला हुआ प्रायद्वीपीय पठार है जिसका अधिकांश भाग हिन्दचीन में स्थित है। यह कठोर चट्टानों से निर्मित है। इस पठार की सामान्य ऊँचाई 1200 मीटर है। इस पठार पर नदियों द्वारा क्षरण कार्य बहुत कम हुआ है इसलिए यह कम कटा-फटा पठार है।
4. उत्तर की निचली भूमि
                साइबेरिया के उत्तर की निचली भूमि त्रिभुजाकार मैदान के रूप में विस्तृत है। इस मैदान के उत्तर में आर्कटिक महासागर, पश्चिम में यूराल पर्वत तथा दक्षिण एवं पूरब में मध्यवर्ती पर्वत-पठार क्रम फैला हुआ है। यह निचला मैदान ओबी तथा लीना नदियों के बेसिनों से बना है। इस विस्तृत मैदान को एशिया के धरातल में पड़ने वाले अनेक मोड़ों का सामना करना पड़ा है। इस मैदान का ढाल उत्तर में आर्कटिक सागर की ओर है। इसका ढाल अत्यंत मंद होने के कारण इसकी उत्तरी भाग में जल भर जाता है और अनेक दलदल बन जाते हैं। इस मैदान की नदियों के मुहाने तथा निचले भागों में बर्फ जम जाने के कारण इन नदियों का जल अपवाह रुक जाता है इससे अनेक दलदली क्षेत्र बन जाते हैं। यही कारण है कि इन क्षेत्रों की नदियों का कोई व्यापारिक महत्व नहीं है।
5. द्वीप समूह मालाएँ
               एशिया महाद्वीप के पूरब एवं दक्षिण-पूरब की ओर अनेक द्वीपसमूह एक विस्तृत पंक्ति में चाप की भांति फैले हुए हैं। ये द्वीप प्रशांत महासागर तथा हिंद महासागर में स्थित है जिसमें से प्रशांत महासागर में द्वीपों की बहुलता है। ये सभी पहाड़ी भाग के रूप में है जिनका निर्माण तृतीय कल्प की नवीन मोड़दर पर्वत श्रेणियों के साथ हुआ था। इन द्वीपों की चट्टानों में नवीन मोड़दार चट्टानें मिलती है।
             भूगर्भवेत्ताओं के अनुसार यह नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियों के उठे हुए भाग है जो समुद्र में डूबी हुई है। इन तीनों में पूर्वी एवं पश्चिमी समुद्र तटों पर संकरी मैदानी पट्टी मिलती है। इन द्वीपों की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ पर मिलने वाली ज्वालामुखी पर्वतों की अधिकता है। अनेक ज्वालामुखी पर्वत आज भी जागृत अवस्था में है। इस द्वीप समूह माला के प्रमुख द्वीप क्यूराइल, होकैडो, हांशू, क्यूशू, शिकोकू, ताइवान, लुजोन, मिडनाओ, समार, नेग्रोस, पलाबन, सैलीबीज, बोर्नियो, जावा, मदुरा, ईरियन, सिंगापु इत्यादि है।
प्रश्न प्रारूप 
Q1. एशिया को उच्चावच इकाईयों में विभक्त कीजिए और उनमें से किसी एक का विशद विवरण दीजिए
 अथवा
Q2.  एशिया को भौतिक  इकाईयों में विभाजित कीजिए तथा उनमें से किन्हीं दो की विवेचना  किजिए

1. एशिया की धरातल की संरचना (Asia : Surface Structure)

1. एशिया की धरातल की संरचना (Asia : Surface Structure)


एशिया की धरातल की संरचना⇒

For BA(Hons) Part-I, Paper-II 

                 धरातलीय संरचनाओं पर भू-गर्भ की प्राचीन चट्टानों के विशेष रूप से प्रभाव पड़ता है। प्राचीन चट्टानों की बनाबट का अध्ययन धरातलीय संरचना के आधार पर किया जाता है। एशिया महाद्वीप में धरातलीय संरचना के अंतर्गत भी अनेक विशेषताएँ मिलती है। इस महाद्वीप में उपकल्प(Eozoic Era) की पुरातन चट्टानें से लेकर टर्शियरी युग की नवीनतम चट्टानें मिलती है। चट्टानों की विविधता के साथ-साथ चट्टानों के धरातलीय स्वरूप में भी अनेक विविधताएँ पायी जाती है।
         एशिया महाद्वीप में अनेक ऐसे स्थलखंड विद्यमान है जिनमें धरातलीय परिवर्तन भूगर्भिक हलचलों के कारण उत्पन्न हुए हैं जबकि महाद्वीप पर कुछ स्थलखंड ऐसे भी है जो इन भूगर्भिक हलचलों से प्रभावित नहीं होते हैं। कुछ स्थान पर अयनवृत्तीकरण के कारण चट्टानों का बाहरी रूप अवश्य परिवर्तित हो गया है लेकिन चट्टानों की आंतरिक बनावट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। 
                  एशिया महाद्वीप की धरातलीय संरचना के बारे में विभिन्न भूतत्ववेताओं में मतभेद है फिर भी अधिकांश भूतत्ववेताओं ने एशिया को भूगर्भिक संरचना के आधार पर चार भागों में बाँटा है – 
(1) उत्तर के प्राचीन भूखंड 
(2) दक्षिण के प्राचीन भूखण्ड 
(3) नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियाँ 
(4) अवशेष भाग 
एशिया की धरातल की संरचना(1) उत्तर के प्राचीन भूखंड

                  उत्तर के प्राचीन भूखंडों का विस्तार एशिया महाद्वीप के उत्तरी भाग में हुआ है। इस प्राचीन भूखंड में कैंब्रियन युग से पहले की कठोर चट्टानों का विस्तार पाया जाता है। यह प्राचीन विशाल भूखंड पैंजिया स्थलखंड से अलग हुए विशाल भूखंड है। इन भूखंडों की चट्टानें बहुत कठोर है। इनमें से कुछ चट्टानों का रूप परिवर्तित भी हो गया है। इन भागों में आग्नेय चट्टानों की बहुलता है। मुख्य चट्टानें नाइस, शिष्ट, स्लेट तथा ग्रेनाइट है।

            उत्तर के प्राचीन भूखंड के अंतर्गत चार प्रमुख खंड आते हैं जिनमें एक भूखंड जिसका नाम रूसी चबूतरा है, एशिया महाद्वीप में न होकर यूरोप महाद्वीप में स्थित है लेकिन फिर भी इसका अध्ययन इसलिए आवश्यक हो जाता है क्योंकि इससे एशिया महाद्वीप की संरचना को समझने में सहायता मिलती है। यह एशिया की सीमा से लगा हुआ यूरोप के बाल्टिक सागर तक विस्तृत है, इसलिए इसे बाल्टिक शीट भी कहते हैं। उत्तर के प्राचीनतम भूखंडों के अंतर्गत निम्नलिखित भूखंड सम्मिलित किए जाते हैं –

(i) रुसी चबूतरा 
(ii) अंगारा भूमि 
(iii) चीनी मैसिफ
 (iv) सारडिनियन मैसिफ।
(2) दक्षिण के प्राचीन भूखण्ड
                 उत्तर के प्राचीन भूखंडों की भांति दक्षिण के प्राचीनतम भूखंड कठोर तथा प्राचीनतम चट्टानों द्वारा निर्मित है। यह प्राचीन भूखंड पैंजिया के टूटे हुए स्थल भूखंड है जिन्हें गोंडवाना भूमि के नाम से पुकारते हैं। विद्वानों के अनुसार यह गोंडवाना भूमि प्राचीन समय में दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, दक्षिण एशिया तथा आस्ट्रेलिया के कुछ भाग में फैली हुई थी। कालांतर में महाद्वीप की रचना के समय इसके टुकड़े हो गए। एशिया महाद्वीप में भी इस गोंडवाना भूमि के दो प्रमुख भूखंड मिलते हैं जो निम्नलिखित है-
1. अरब प्रायद्वीप 
2. प्रायद्वीपीय भारत
             
          कैंब्रियन युग से पहले की चट्टानों द्वारा इन दोनों प्राचीन भूखंडों का निर्माण हुआ है। इन दोनों भूखंडों में आग्नेय तथा रूपांतरित चट्टानों का विस्तार पाया जाता है जिनमें नाइस, शिस्ट तथा बैसाल्ट चट्टानों की प्रधानता है।
(3) नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियाँ
                नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियाँ एशिया महाद्वीप के मध्य भाग में पाई जाती है। पृथ्वी की हलचलों के परिणामस्वरुप टर्शियरी युग में इन पर्वत श्रेणियों का विस्तार हुआ। मध्य जीवकल्प(Mesozoic Era) के अंतिम समय में इन मोड़दार पर्वत श्रेणियों का निर्माण प्रारंभ हो गया तथा तृतीय युग में इन श्रेणियों का विकास पूर्ण रूप से हो पाया। यह पर्वत श्रेणियाँ अनेक मोड़ों द्वारा निर्मित हुई है। इन पर्वत श्रेणियों की चट्टानों में समुद्री मलवा तथा जीव-जंतुओं के अवशेष पाए जाते हैं।
           इनकी उत्पत्ति के बारे में विद्वानों का मत है कि अत्यंत प्राचीन काल में उत्तर-पूरब एवं दक्षिण के प्राचीन स्थित भूखंडों के बीच एक विशाल भू-अभिनति(Geosyncline) था जो जिब्राल्टर से लेकर पूर्वी एशिया तक फैला हुआ था जिसको विद्वानों ने तेथिस सागर के नाम से पुकारा। इस सागर के बचे हुए भाग आज भी एशिया महाद्वीप के पश्चिमी एवं मध्य भागों में भूमध्सायगर, कैस्पियन सागर, काला सागर, अरब सागर आदि के रूप में स्थित है। यह सागर कुछ स्थानों पर अत्यंत गहरा था। 
              टेथिस साग में उत्तर एवं दक्षिण के अनेक धरातलीय पदार्थ, मालवा तथा जीव-जन्तुओं के अवशेष करोड़ों वर्ष तक अपरदन द्वारा सागर की तलहटी में एकत्र होते रहे। इस जमाव क्रिया के फलस्वरुप समुद्र धरातल में अनेक परतें एक के ऊपर एक जमा होती रही। मुख्यतः परमियन काल से आदि नूतनकाल के पदार्थों की एक मोटी सागर की तली पर जमा हो गई। कालांतर में पृथ्वी की भूगतियों के कारण भूखंडों में हलचल उत्पन्न हो गई तथा उत्तर के प्राचीन भूखंड दक्षिण की ओर खिसके। दक्षिण का प्राचीन गोंडवाना भूखंड वह अपने ही स्थान पर स्थिर रहा। इससे दोनों भूखंडों के मध्य टेथिस सागर से जमा मलबे में अनेक मोड़ पड़ गए। जिन भागों में मलबे के परतें अधिक जमा थी और जहाँ भूखंडों का दबाव अधिक पड़ा,  उन क्षेत्रों में ऊँची पर्वत श्रेणियों की उत्पत्ति हुई।
               टेथिस सागर की इस क्रिया के फलस्वरुप इन नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियों की उत्पत्ति हुई। ये पर्वत श्रेणियां दक्षिण-पश्चिमी एशिया के पश्चिमी किनारे से लेकर दक्षिण-पूर्वी एशिया के पूर्वी किनारे तक विस्तृत है। इनमें मुख्य पर्वत श्रेणियां हिमालय, एशिया माइनर, आरमीनिया, काराकोरम, नानशान, आराकानयोमा इत्यादि है। अन्य पर्वतों में हिंदूकुश, एल्बुर्ज, जैग्रोस, टॉरस, पॉन्टिक, आनातोलिया का पठार, सुलेमान किरथर इत्यादि है। यूरोप का अल्पाइन पर्वत श्रेणियां का निर्माण भी इसी काल में हुआ। इसलिए इन नवीन मोड़दार पर्वत श्रृंखलाओं को अल्पाइन पर्वत श्रेणियों के नाम से पुकारा जाता है।
(4) अवशेष भाग
              एशिया महाद्वीप के इस भाग के अंतर्गत उन संपूर्ण क्षेत्रों का वर्णन किया जाता है जो नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियों के मध्य तथा उत्तर एवं दक्षिण की खंड के मध्य स्थित है। यह क्षेत्र अवशेषी भाग के रूप में जाना जाता है। इस अवशेषी भाग में पाए जाने वाले की चट्टानों का निर्माण पुराजीव कल्प(Paleozoic Era) और मध्य जीवकल्प(Mesozoic Era) में हुआ था ।विद्वानों का मत है कि इन युगों में संपूर्ण पृथ्वी पर विश्वव्यापी हलचलें हुई थी। इन हालचलों की क्रिया के फलस्वरुप पृथ्वी के समस्त धरातल का कुछ भाग ऊपर उठ गया था तथा कुछ भाग नीचे धँस गया था। 
           डिवोनियन युग के अंतर्गत होने वाली कैलीडोनियन हलचलों के अंतर्गत एशिया के इस मध्य धरातलीय भाग में अनेक मोड़दार पर्वतों का निर्माण हुआ। इसके बाद परमियन युग के अंतर्गत होने वाली हरसीनियन हलचलों के परिणामस्वरुप अनेक मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति हुई। इन पर्वतों पर बाद में अपदन क्रिया के फलस्वरूप इनका बाहरी रूप काफी घिस गया। इससे अनेक पर्वत अवशिष्ट पर्वत एवं पठारों का रूप ग्रहण कर गए। चीन का पठार भी इस प्रकार का रूपांतरित पठार है। अपनदन की क्रिया लंबे समय तक होने के कारण अधिकांश पर्वतों ने घिसकर समतल मैदान का रूप ले लिया।
 
निष्कर्ष  :
           निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि एशिया महाद्वीप में धरातलीय संरचना के अंतर्गत भी अनेक विशेषताएँ मिलती है। यहाँ पूरातन चट्टानों से लेकर टर्शियरी युग की चट्टानें पाई जाती है। उत्तर के प्राचीन भूखंड, दक्षिण के प्राचीन भूखंड के साथ-साथ महाद्वीपों के मध्य भाग में नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियाँ देखने को मिलता है। इसके अलावा यहाँ अवशेषी भाग भी पाए जाते हैं।
 
प्रश्न प्रारूप 
Q1. एशिया को संरचनात्मक इकाईयों में विभक्त कीजिए और उसमें से किसी एक का विशद विवरण दीजिए 
 अथवा 
Q2. एशिया की संचना के प्रमुख लक्षणों का वर्णन कीजिए 
अथवा  
Q3. एशिया की भू-रचना की विशेषताओं का वर्णन करें

1. अफ्रीका की जलवायु / Climate of Africa

1. अफ्रीका की जलवायु / Climate of Africa


अफ्रीका की जलवायु⇒

For BA(Hons) Part-III

Paper-V

अफ्रीका महादेश का सामान्य परिचय : 

            अफ्रीका महाद्वीप विश्व का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है जिसका विस्तार  37°14′ उत्तरी अक्षांश से 34°50′ दक्षिणी अक्षांश एवं 17°33′ पश्चिमी देशांतर से 51°23′ पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित है। इसका कुल क्षेत्रफल 3343578 वर्ग किलोमीटर अर्थात पृथ्वी के कुल भूभाग का लगभग 20% भाग में है। अफ्रीका के उत्तर में भूमध्यसागर एवं यूरोप महाद्वीप, पश्चिम में अटलांटिक महासागर, दक्षिण में दक्षिण महासागर तथा पूर्व में अरब सागर एवं हिंद महासागर हैं। पूर्व में स्वेज भूडमरूमध्य इसे एशिया से जोड़ता है तथा स्वेज नहर इसे एशिया से अलग करती है। जिब्राल्टर जलडमरूमध्य इसे उत्तर में यूरोप महाद्वीप से अलग करता है। इस महाद्वीप में विशाल मरुस्थल, अत्यन्त घने वन, विस्तृत घास के मैदान, बड़ी-बड़ी नदियाँ व झीलें तथा विचित्र जंगली जानवर हैं। मुख्य मध्याह्न रेखा (0°) अफ्रीका महाद्वीप के घाना देश की राजधानी अक्रा शहर से होकर गुजरती है। यहाँ सेरेनगेती और क्रुजर राष्ट्रीय उद्यान है तो जलप्रपात और वर्षावन भी हैं। एक ओर सहारा मरुस्थल है तो दूसरी ओर किलिमंजारो पर्वत भी है और सुषुप्त ज्वालामुखी भी है। युगांडा, तंजानिया और केन्या की सीमा पर स्थित विक्टोरिया झील अफ्रीका की सबसे बड़ी तथा सम्पूर्ण पृथ्वी पर मीठे पानी की दूसरी सबसे बड़ी झील है। यह झील दुनिया की सबसे लम्बी नदी नील के पानी का स्रोत भी है।
                  अफ्रीका एकमात्र ऐसा महाद्वीप है जिससे होकर पृथ्वी पर खींची गई तीनों प्रमुख काल्पनिक रेखाएँ (विषुवत रेखा, कर्क रेखा तथा मकर रेखा) गुजरती है।
जलवायु का अध्ययन करने का कारण
                 भौगोलिक अध्ययन में जलवायु का आधारभूत महत्व है क्योंकि इसका व्यापक प्रभाव सभी भौगोलिक तत्वों पर पड़ता है। प्रत्यक्ष रूप से जलवायु, वनस्पति एवं फसलों तथा अप्रत्यक्ष रूप से न केवल मिट्टी इत्यादि प्राकृतिक संसाधनों को बल्कि मानव की शारीरिक एवं मानसिक कार्यक्षमता के माध्यम से मानवीय संसाधनों को भी प्रभावित करती है। अफ्रीका महाद्वीपों के वर्तमान आर्थिक एवं मानवीय प्रारूप के विकास में जलवायु की प्राथमिक भूमिका है। इस महाद्वीपों के विशिष्ट संदर्भ में जलवायु के कारक एवं तत्वों तथा प्रादेशिक भिन्नता का अध्ययन अत्यंत ही महत्वपूर्ण है।
 
             अफ्रीकी महाद्वीपों के जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक अक्षांशीय स्थिति, प्रचलित वायु पेटियाँ एवं उनका मौसमी स्थानांतरण तथा पर्वत श्रेणियों की सापेक्षिक स्थिति एवं उसकी दिशा है। इसके अलावे तटवर्ती महासागरीय जल धाराएँ एवं धरातलीय ऊँचाई का भी स्थानीय प्रभाव पड़ता है। 
(1) अक्षांश की स्थिति :-
            अफ्रीका महाद्वीप का अधिकांश भाग उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में तथा कुछ भाग शीतोष्ण कटिबंध में पड़ता है। इस कारण यह महाद्वीप सर्वाधिक सूर्यातप प्राप्त करते हैं। जैसा कि हमलोग जानते भी है कि निम्न अक्षांशीय क्षेत्रों में सूर्यातप की मात्रा निरंतर अधिक होती है एवं इसमें मौसमी परिवर्तन भी नहीं के बराबर होती है। जैसे-जैसे हम लोग भूमध्य रेखा से दूर जाते हैं, सूर्यातप की मात्रा घटती जाती है। लेकिन अधिकतम सौरताप 20° अक्षांश के पास प्राप्त होता है जहाँ मेघच्छादन न्यूनतम रहता है। पश्चिमी तथा पूर्वी सहारा में 200 किलोग्राम कैलोरी प्रति वर्ग सेंटीमीटर औसत वार्षिक सूर्यातप की प्राप्ति होती है जो विश्व में सर्वाधिक है। अफ्रीका के मरुस्थलीय भाग में 180 किलोग्राम कैलोरी और भूमध्य रेखीय प्रदेशों में जहाँ सालोंभर मेघच्छादन रहता है 120 किलोग्राम कैलोरी प्रति वर्ग सेंटीमीटर औसत सूर्यातप की प्राप्ति होती है।
(2) प्रचलित वायु पेटियाँ :- 
                  अक्षांशीय स्थिति के अनुरूप अफ्रीका महाद्वीप में विषुवत रेखा के समीप निम्न वायुदाब की शांत पेटी मिलती है जिसे डोलड्रम अथवा अंत: उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) कहते हैं। इसके दोनों तरफ 30° अक्षांश के आसपास उच्च वायुदाब के उपोष्ण पेटी मिलता है मिलती है। उच्च वायुदाब की उपोष्ण पेटी मिलती है। उच्च वायुदाब वाले क्षेत्रों से क्षेत्रों से व्यापारिक हवाएँ विषुवत रेखीय निम्न वायुदाब की ओर पृथ्वी की दैनिक गति से प्रभावित होकर उत्तरी गोलार्ध में उ०- पू० तथा दक्षिणी गोलार्ध में द०-पू० दिशा से चलती है। अफ्रीका महाद्वीप का अधिकांश भाग इन्हीं व्यापारिक हवाओं की पेटी में पड़ता है। उत्तरी अफ्रीका को छोड़कर अन्य भागों में सागरीय हवाएँ हैं। इसी प्रकार उपोष्ण उच्च वायुदाब के क्षेत्र से ध्रुवों की ओर उत्तरी गोलार्ध में दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिणी गोलार्ध में उत्तर-पश्चिम दिशा से प्रचलित पछुआ हवाएँ उप-ध्रुवीय निम्न वायुदाब के क्षेत्र की ओर चलती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि अफ्रीका के उष्णकटिबंधीय भाग व्यापारिक हवाओं तथा मध्य अक्षांश में स्थित भाग पछुआ हवाओं के प्रभाव क्षेत्र में पड़ते हैं। महाद्वीपों के 30° दक्षिणी अक्षांश के दक्षिणी भागों में पछुआ हवाओं से वर्षा होती है जबकि विश्वतरेखा के समीप स्थित प्रदेश में संवहनीय प्रक्रिया द्वारा वर्षा होती है।
(3) पर्वत श्रेणियों की सापेक्षिक स्थिति :- 
                  उच्च पर्वत नमीयुक्त सागरीय हवाओं को रोककर वायु अभिमुख प्रदेशों में वर्षा करातें हैं जबकि वायु विमुख ढाल एवं आंतरिक प्रदेश में सामान्यतः शुष्क हो जाते हैं। अफ्रीका में स्थित ड्रेकेन्स-बर्ग पर्वत के कारण पूर्वी तट पर अधिक वर्षा होती है परंतु आंतरिक भाग एवं पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती है। मलागासी के मध्य में पर्वत स्थित होने के कारण पूर्वी तट पर सारभर अधिक वर्षा होती है। उत्तरी अफ्रीका में एटलस पर्वत स्थायी हवाओं के समानांतर स्थित होने के कारण वर्षा को अधिक प्रभावित नहीं करता। अतः उच्च पर्वत इन महाद्वीपों में अवरोधक के रूप में वर्षा की मात्रा एवं उसके वितरण को प्रभावित करते है साथ ही कुछ क्षेत्रों में सागरीय प्रभाव को आंतरिक भागों में पहुँचने से भी रोकते है। 
(4) धरातलीय ऊँचाई :-
           उष्ण कटिबंध में निम्न क्षेत्रों से हिमाच्छादित उच्च शिखर तक तापमान में लंबवत परिवर्तन उसी प्रकार का होता है जैसा कि भूमध्य रेखा से ध्रूवों की ओर जाते समय अक्षांशीय स्थिति के अनुसार होता है। परंतु विभिन्न तत्वों में विशेषकर तापमान में यह परिवर्तन स्थानीय स्तर पर ही होता है। उष्ण कटिबंधीय स्थित होते हुए भी विस्तृत अफ्रीकी पठारों पर शीतोष्ण जलवायु पाई जाती है जो कि यूरोप निवासियों के लिए सर्वथा उपयुक्त है। 
(5) तटवर्ती महासागरीय जलधाराएँ :- 
                  दक्षिणी गोलार्ध में महासागरीय जलधाराओं का प्रतिरूप घड़ी की सुईयों के विपरीत है। जल धाराएँ अपने गुण के अनुसार अपने पास स्थित तटीय भागों के तापमान एवं वर्षा को प्रभावित करती है। उत्तरी अफ्रीका के पश्चिमी तट पर कनारी एवं दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी तट के समानांतर बेंगुला की ठंडी जलधाराओं के प्रभाव से तापमान सामान्य से नीचे रहता है जबकि गिन्नी तट तथा पूर्वी तट पर भूमध्यरेखीय, मोजांबिक और आगुल्हास की गर्म जलधाराओं के कारण तापमान सामान्य से ऊपर रहता है।
              उपरोक्त दशाओं से स्पष्ट है कि अफ्रीका महाद्वीपों के सामुद्रिक वायु अभिमुख तटों पर प्रायः गर्म जलधाराएँ एवं वायु विमुख तटों पर ठंडी जलधाराएँ विद्यमान है। फलस्वरुप प्रमुख जलवायु कारकों के प्रभाव तिव्रतर हो जाते हैं। इनके अतिरिक्त निम्न अक्षांश में जिन तटों पर ठंडी जलधाराएँ चलती है वहाँ घना कोहरा छाया रहता है। दो विपरीत गुणों वाले जलधाराओं के संगम स्थल पर भी घना कोहरा पाया जाता है। उच्च अक्षांशों में गर्म जलधाराएँ तापमान को सामान्य से ऊंचा रखती है जबकि ठंडी जलधाराएँ जलवायु को और कठोर बना देती है। परोक्ष रूप से जलधाराएँ चक्रवतों के पथ को भी निर्धारित करती है। 
 
अफ्रीका महाद्वीप के जलवायु का वर्गीकरण
                  उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि जलवायु के विभिन्न तत्व और उनको प्रभावित करने वाले कारकों की प्रादेशिक विभिन्नता के परिणामस्वरूप अफ्रीका महाद्वीप में अनेक प्रकार की जलवायु पाई जाती है। अफ्रीका महाद्वीप की जलवायु के अध्ययन हेतु ट्रिवार्था द्वारा प्रस्तुत वर्गीकरण को अधिक उपयुक्त माना गया है क्योंकि केवल कुछ प्रधान जलवायु प्रकारों के कारण यह वर्गीकरण सरल होने के साथ ही सर्वमान्य है। इस वर्गीकरण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आवश्यकतानुसार द्वितीय एवं तृतीय क्रम के उप-विभाजनों द्वारा इसे विस्तृत रूप दिया जा सकता है। यह वर्गीकरण उपलब्ध आँकड़ों पर आधारित है। ट्रिवार्था ने पृथ्वी की जलवायु को 13 वर्गों में विभाजित किया है जिसमें निम्नलिखित 8 प्रकार की जलवायु के क्षेत्र अफ्रीका महाद्वीप में पाए जाते हैं : –
 
1. उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (Af, Am)
 
2. सवाना तुल्य जलवायु (Am)
 
3. स्टेपी तुल्य जलवायु (Bs)
 
4. मरुस्थलीय जलवायु (Bu)
 
5. भूमध्यसागरीय जलवायु (Cs)
 
6. मानसूनी जलवायु (Ca)
 
7. पश्चिमी यूरोपीय तुल्य जलवायु (Cb, Cc)
 
8. अविभाजित पर्वतीय जलवायु (H)
1. उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (Af,Am):-
                   वर्ष पर्यंत उच्च तापमान एवं अधिक वर्षा इस जलवायु की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं। भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5° या 10° अक्षाशों तक ही स्थित होने के कारण अफ्रीका का कांगो बेसिन इस जलवायु के प्रधान क्षेत्र। इसके अलावा मलागासी का पूर्वी भाग तथा गिनी तट पर भी यह जलवायु पाई जाती है।
                  वर्षा प्रमुख रूप से यहाँ संवहनीय होती है। प्रतिदिन तापमान में वृद्धि के साथ ही कुमुलस बादल दिखाई देते हैं और दोपहर बाद गरज एवं चमक के साथ मूसलाधार वर्षा होती है। भूमध्यरेखीय प्रदेशों में गरज के साथ आंधियाँ बहुत आती है जिनका औसत वर्ष में 75 से 105 दिन तक है। निरंतर मेघच्छादित आकाश तथा अविरल वर्षा के दिन मध्य अक्षांशीय प्रदेशों की अपेक्षा बहुत कम पाए जाते हैं। निम्न अक्षांशों में वायुमंडलीय व्यतिक्रम, जिनकी आवृत्ति अंत: उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) के समीप सर्वाधिक होती है, अधिक वर्षा से संबंधित होते हैं। चक्रवातीय वर्षा सापेक्षतया अधिक समय तक एक विस्तृत क्षेत्र में होती है जबकि संवहनीय वर्षा स्थानीय एवं दैनिक होती है।
 
2. सवाना/सूडान तुल्य जलवायु (Am):-
                  इसे उष्णकटिबंधीय आर्द्र शुष्क जलवायु भी कहा जाता है। निरंतर आर्द्र उष्ण कटिबंधीय जलवायु की तुलना में इन प्रदेशों में वर्षा कम होती है और विभिन्न महीनों में इसका वितरण असमान होता है। परिणामस्वरूप सघन वन के स्थान पर वृक्ष युक्त घास के मैदान पाए जाते हैं। सवाना नामक लंबी घास के आधार पर इसे सामान्यतया सवाना तुल्य जलवायु कहते हैं। भूमध्य रेखा की ओर महाद्वीपों के पश्चिमी तथा आंतरिक भागों में शुष्क जलवायु तथा पूर्वी भागों में उपोषण आर्द्र जलवायु के मध्य इस जलवायु के क्षेत्र पाए जाते हैं।
                  इस जलवायु के प्रदेश विषुवत रेखा के दोनों ओर सामान्यतया 5° या 10° से 15° या 20° अक्षांश के मध्य भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब एवं उपोष्ण उच्च वायुदाब क्षेत्रों के मध्य व्यापारिक हवाओं की पेटी में स्थित है। सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन होने के परिणामस्वरूप सूर्यातप वायुदाब और हवाओं की पेटियों के स्थानांतरित होने से इन प्रदेशों में ग्रीष्म ऋतु में अंत: उष्ण कटिबंधीय अभिसरण और डोलड्रम के प्रभाव में वर्षा होती है जबकि शीत ऋतु में व्यापारिक हवाओं तथा उपोष्ण प्रतिचक्रवातों के प्रभाव में मौसम शुष्क रहता है। ध्रूवों की ओर वर्षा की मात्रा क्रमशः कम होती जाती है। ध्रुवीय छोर पर शुष्क ऋतु अधिक लंबी एवं कठोर होती है।
                अफ्रीका में कांगो बेसिन की उत्तर में सूडान, दक्षिण में स्थित एक विस्तृत भू-भाग और हिंद महासागर तट पर मोजांबिक से लेकर उत्तर में सोमालिया तक का तटीय क्षेत्र, मालागासी का पश्चिमी भाग इस जलवायु के प्रदेश पाए जाते हैं। पूर्वी एवं दक्षिणी अफ्रीका में भी सवाना तुल्य जलवायु पाई जाती है परंतु उच्च पठारों में स्थित होने के कारण यहाँ तापमान कम हो जाता है।
 
3. स्टेपी तुल्य जलवायु (Bs) :- 
            इसे आर्द्र शुष्क जलवायु भी कहा जाता है। आर्द्र एवं शुष्क प्रदेशों के मध्य स्थित इस जलवायु के प्रदेश एक संक्रमण में मेखला सदृश्य है और सामान्यतया निम्न अक्षांशीय मरुस्थलों को उत्तर, पूर्व एवं दक्षिण से घेरे हुए मिलते हैं। उपोषण प्रतिचक्रवातों से संबंधित वायु समूहों के नीचे उतरने वाले उच्च वायुदाब प्रदेशों के किनारे पर स्थित होने के कारण यहाँ बर्ष में कुछ समय के लिए वर्षा ऋतु भी पाई जाती है। उत्तरी अफ्रीका में इस जलवायु की दो मेखलाएँ पूर्व-पश्चिम दिशा में फैली हुई मिलती है। प्रथम सहारा के उत्तर भूमध्यसागरीय प्रदेशों के दक्षिण तथा द्वितीय सहारा के दक्षिण अटलांटिक महासागर में प्रशांत तट तक विस्तृत सूडान तुल्य जलवायु प्रदेशों के उत्तर। इसके अतिरिक्त दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका मैं दो पतली पेटी के रूप में इस जलवायु के प्रदेश पाए जाते हैं।
 
4. मरुस्थलीय जलवायु (Bu):- 
                    वार्षिक वर्षा की मात्रा से वाष्पीकरण की अधिकता शुष्क जलवायु की प्रमुख विशेषता है। 15° से 30° अक्षांशों के मध्य सामान्यतः महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर उपोष्ण प्रतिचक्रवातों के नीचे उतरते शुष्क वायु समूहों के क्षेत्र में इस जलवायु के प्रदेश पाए जाते हैं।
                 शुष्क जलवायु अफ्रीका महाद्वीप के दो विस्तृत भाग में पायी जाती है- पहला उत्तरी अफ्रीका के पश्चिमी तट से लाल सागर तक 5600 किलोमीटर लंबाई तथा लगभग 2004 किलोमीटर चौड़ाई में विस्तृत सहारा मरुस्थल दूसरा दक्षिण अफ्रीका में 8 लाख वर्ग किलोमीटर में विस्तृत कालाहारी मरुस्थल ।
                   यहाँ गर्मी के महीनों का औसत तापमान 27℃ से 35℃ के बीच रहता है परंतु दोपहर में सामान्यतया 41℃ से 43℃ तक तापमान पाया जाता है। उत्तरी सहारा में औसत उच्चतम एवं निम्नतम तापमान क्रमश 37℃ तथा 22℃ होता है। त्रिपोली से 40 किलोमीटर दक्षिण स्थित अजीजिया में विश्व का उच्चतम तापमान 58℃ अंकित किया गया है। शीत ऋतु में दिन का औसत तापमान 16℃ से 21℃ तथा रात्रि का 10℃ के आस-पास पाया जाता है।
 
5. भूमध्यसागरीय जलवायु (Cs) :-
                  इसे शुष्क ग्रीष्म एवं आर्द्र शीत ऋतु, युक्त उपोष्ण जलवायु भी कहा जाता है। शीत ऋतु में साधारण ठंड तथा वर्षा एवं उच्च तापमान युक्त शुष्क ग्रीष्म ऋतु, इस जलवायु की प्रमुख विशेषताएँ है। यह जलवायु 30° से 40° अक्षांशों के मध्य महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर पछुआ हवाओं की पेटी में पायी जाती है। उतरी अफ्रीका का भूमध्यसागरीय तटीय प्रदेश, दक्षिणी अफ्रीका गणराज्य का दक्षिणी-पश्चिमी छोर इस जलवायु के अंतर्गत आता है।
                     उपोष्ण उच्च वायुदाब के ध्रुवोन्मुख ढल पर स्थित होने के कारण तथा सूर्य की स्थिति के अनुसार वायु पेटियों में ऋत्विक स्थानांतरण के परिणामस्वरूप ग्रीष्म ऋतु में यह क्षेत्र उपोष्ण उच्च वायुदाब के प्रभाव में रहते हैं, अतः ग्रीष्म ऋतु शुष्क होती है। शीत ऋतु में पछुआ हवाओं तथा उनसे संबंधित चक्रवातों के प्रभाव में होने के कारण वर्षा होती है।
                    मध्य अक्षांशीय एवं समुद्रतटीय स्थिति के कारण यहाँ कड़ाके की सर्दी नहीं पड़ती है। शीत ऋतु में औसत तापमान 4° से० से 10° से० तथा ग्रीष्म ऋतु में 21°से० से 27° से० के मध्य रहता है। वार्षिक ताप परिसर 11° से 17° से० पाया जाता है। तटीय क्षेत्रों में आंतरिक भाग की अपेक्षा ताप परिसर कम पाया जाता है।
 
6. मानसूनी जलवायु (Ca) :- 
              इसे आर्द्र उपोष्ण जलवायु भी कहा जाता है। अफ्रीका महाद्वीप के पूर्वी भाग में स्थित ग्रीष्मकालीन वर्षा अर्थात ग्रीष्म ऋतु में अधिक गर्मी एवं प्रचुर वर्षा तथा शीत ऋतु में साधारण वर्षा ठंड एवं शुष्कता होता इस जलवायु की प्रमुख विशेषता है।
              अफ्रीका महाद्वीप में यह जलवायु 25° से 40° अक्षांशों के मध्य पूर्वी तटों तथा समीपस्थ आंतरिक भागों में पाई जाती है। उष्णकटिबंधीय जलवायु एवं महाद्वीपीय कठोर शीत जलवायु के मध्य स्थित इन प्रदेशों की जलवायु दोनों से प्रभावित होती है। दक्षिण अफ्रीका गणराज का डरबन के पास स्थित हिंद महासागर तटीय क्षेत्र इस जलवायु के अंतर्गत आते हैं।
 
7. पश्चिमी यूरोपीय तुल्य जलवायु (Cb, Cc) :-
                 सामान्यतःयह जलवायु 40° से 60° अक्षांशों के मध्य महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर पाई जाती है परंतु अफ्रीका में यह जलवायु 25° दक्षिणी अक्षांश से ही प्रारंभ हो जाते हैं। इसका मुख्य कारण महाद्वीपों का दक्षिणी भाग संकरा एवं द्वीप के रूप में अवस्थित होना है।
 
8. अविभाजित पर्वतीय जलवायु (H) :-
                      वर्षा एवं तापमान की समरूपता नहीं वरन् ऊँचाई एवं अक्षांशीय स्थिति के अनुसार एक छोटे क्षेत्र में अनेक स्थानीय जलवायु की उपस्थिति जन्य विश्व स्तर पर मानचित्रण की समस्या ही इस जलवायु विभाग का आधार है। दिन एवं रात के तापमान में अधिक अंतर तथा ऊँचाई के साथ तापमान में अधिक अंतर तथा ऊँचाई के साथ तापमान में ह्रास इस जलवायु की प्रमुख विशेषता है। उच्च पर्वतीय प्रदेशों से संबंधित यह जलवायु पूर्वी अफ्रीका में अबीसीनिया पठार के उच्च भागों एवं विक्टोरिया झील के पश्चिम और पूर्व स्थित पर्वत चोटियों पर पाई जाती है। मध्य एवं पूर्वी अफ्रीका के कम उच्च पठारी भागों को अलग न रखकर सवाना तुल्य जलवायु के प्रदेशों में ही रखा गया है।
 
error: