12. Concept and Methodological Development in Geography /भूगोल में संकल्पनात्मक एवं पद्धतिगत विकास
Concept and Methodological Development in Geography
भूगोल में संकल्पनात्मक एवं पद्धतिगत विकास
परिचय:
भूगोल केवल पृथ्वी की सतही विशेषताओं का वर्णन करने वाला विषय नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, मानव और उनके पारस्परिक संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन है। समय के साथ भूगोल में न केवल विषय-वस्तु बदली, बल्कि संकल्पनाओं (Concepts) और अध्ययन-पद्धतियों (Methodologies) में भी व्यापक परिवर्तन हुआ।
प्रारम्भिक काल में भूगोल वर्णनात्मक (Descriptive) था, किंतु आधुनिक काल में यह विश्लेषणात्मक, वैज्ञानिक और बहु-विषयी बन गया है। इस विकास को समझने के लिए भूगोल के संकल्पनात्मक एवं पद्धतिगत विकास का अध्ययन आवश्यक है।
भूगोल में संकल्पना (Concept) का अर्थ:
सामान्यतय: संकल्पना से आशय उन मौलिक विचारों और धारणाओं से है, जिनके आधार पर किसी विषय का अध्ययन किया जाता है। भूगोल में संकल्पनाएँ विषय को दिशा प्रदान करती हैं और यह तय करती हैं कि हम पृथ्वी और मानव को किस दृष्टि से देखें।
भूगोल की प्रमुख संकल्पनाएँ:
भूगोल की प्रमुख संकल्पनाएँ पृथ्वी को एक समग्र इकाई मानकर प्रकृति और मानव के आपसी संबंधों को समझने पर आधारित हैं। इनमें विविधता में एकता, क्षेत्रीय भिन्नता, मानव–पर्यावरण अंतःक्रिया, क्षेत्र की व्यक्तित्वता और समग्रता शामिल हैं, जो भूगोल को वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करती हैं।
(i) पृथ्वी एक इकाई के रूप में
प्रारम्भिक भूगोलवेत्ताओं जैसे हम्बोल्ट और रिटर ने पृथ्वी को एक समग्र इकाई (Unity of Earth) माना। उनका विचार था कि पृथ्वी पर घटित सभी प्राकृतिक घटनाएँ आपस में जुड़ी हुई हैं।
(ii) विविधता में एकता (Unity in Diversity)
यह संकल्पना बताती है कि पृथ्वी पर विविध भौतिक और मानवीय स्वरूप पाए जाते हैं, किंतु उनके पीछे कुछ सामान्य नियम कार्य करते हैं। यह विचार भूगोल को वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।
(iii) क्षेत्रीय भिन्नता (Areal Differentiation)
रिचर्ड हार्टशोर्न द्वारा प्रतिपादित यह संकल्पना भूगोल की केंद्रीय अवधारणा मानी जाती है। इसके अनुसार- “भूगोल का उद्देश्य पृथ्वी की सतह पर पाए जाने वाले क्षेत्रों की भिन्नताओं का अध्ययन करना है।”
(iv) मानव-पर्यावरण संबंध
भूगोल की सबसे महत्वपूर्ण संकल्पनाओं में से एक है मानव और पर्यावरण का संबंध। इसके अंतर्गत विभिन्न विचारधाराएँ विकसित हुईं-
⇒ पर्यावरण नियतिवाद (Environmental Determinism)
⇒ संभावनावाद (Possibilism)
⇒ नव-नियतिवाद (Neo-determinism)
(v) क्षेत्र की व्यक्तित्वता (Regional Individuality)
यह संकल्पना बताती है कि प्रत्येक क्षेत्र की अपनी अनोखी पहचान होती है, जो प्राकृतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक तत्त्वों के सम्मिलन से बनती है।
(vi) समग्रता (Holism / Totality)
इस संकल्पना के अनुसार किसी क्षेत्र या घटना का अध्ययन उसके सभी घटकों को एक साथ लेकर किया जाना चाहिए, न कि अलग-अलग।
भूगोल में पद्धति (Methodology) का अर्थ
पद्धति से आशय उन तरीकों और विधियों से है जिनके माध्यम से भूगोल में तथ्यों का संग्रह, विश्लेषण और व्याख्या की जाती है। पद्धति यह तय करती है कि भूगोल का अध्ययन कैसे किया जाएगा।
भूगोल के पद्धतिगत विकास के चरण:
(i) वर्णनात्मक पद्धति (Descriptive Method)
✍️ प्रारम्भिक काल में भूगोल पूर्णतः वर्णनात्मक था
✍️ यात्रियों और खोजकर्ताओं के विवरण पर आधारित
✍️ वैज्ञानिक विश्लेषण का अभाव
✍️ यह पद्धति ज्ञान-संग्रह के लिए उपयोगी थी, परंतु नियम-निर्माण में असमर्थ थी।
(ii) ऐतिहासिक पद्धति (Historical Method)
✍️ किसी क्षेत्र या घटना के विकास क्रम का अध्ययन
✍️ विशेष रूप से प्रादेशिक भूगोल में उपयोगी
✍️ मानव और पर्यावरण के ऐतिहासिक संबंधों पर बल
(iii) आगमनात्मक पद्धति (Inductive Method)
✍️ विशिष्ट तथ्यों से सामान्य नियमों की ओर
✍️ हम्बोल्ट और रिटर द्वारा समर्थन
✍️ अनुभव और अवलोकन पर आधारित
(iv) निगमनात्मक पद्धति (Deductive Method)
✍️ सामान्य सिद्धांतों से विशिष्ट निष्कर्षों की ओर
✍️ गणितीय एवं भौतिक भूगोल में अधिक प्रयोग
✍️ तर्कसंगत और सैद्धांतिक दृष्टिकोण
(v) क्षेत्रीय (प्रादेशिक) पद्धति (Regional Method)
✍️ किसी विशिष्ट क्षेत्र का समग्र अध्ययन
✍️ विदाल द ला ब्लाश द्वारा विकसित
✍️ प्राकृतिक एवं मानवीय तत्त्वों का समन्वय
(vi) तुलनात्मक पद्धति (Comparative Method)
✍️ विभिन्न क्षेत्रों या घटनाओं की तुलना
✍️ समानताओं और भिन्नताओं की पहचान
✍️ सामान्यीकरण में सहायक
(vii) मात्रात्मक पद्धति (Quantitative Method)
✍️ 1950 के दशक के बाद विकास
✍️ सांख्यिकी, गणित और मॉडल का प्रयोग
✍️ भूगोल को अधिक वैज्ञानिक बनाया
👉 इसे Quantitative Revolution कहा जाता है।
(viii) प्रणाली पद्धति (Systems Approach)
✍️ पृथ्वी को विभिन्न उप-प्रणालियों का समूह माना
✍️ प्राकृतिक और मानवीय प्रणालियों का अध्ययन
✍️ आधुनिक भौगोलिक विश्लेषण का आधार
(ix) व्यवहारवादी पद्धति (Behavioural Approach)
✍️ मानव के निर्णय और व्यवहार पर बल
✍️ स्थानिक व्यवहार (Spatial Behaviour) का अध्ययन
✍️ मानव भूगोल में महत्वपूर्ण
(x) समालोचनात्मक एवं मानववादी पद्धति
✍️ मानव अनुभव, मूल्य और भावना पर बल
✍️ भूगोल को मानवीय दृष्टिकोण से देखने का प्रयास
संकल्पना और पद्धति का परस्पर संबंध:
संकल्पना और पद्धति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि पूरक हैं।
✍️ संकल्पना → क्या अध्ययन करना है
✍️ पद्धति → कैसे अध्ययन करना है
बिना स्पष्ट संकल्पना के पद्धति दिशाहीन हो जाती है और बिना उचित पद्धति के संकल्पना अमूर्त रह जाती है।
आधुनिक भूगोल में समन्वित दृष्टिकोण
आधुनिक भूगोल में-
✍️ सामान्य और प्रादेशिक का समन्वय
✍️ गुणात्मक और मात्रात्मक दोनों पद्धतियों का प्रयोग
✍️ बहु-विषयी (Interdisciplinary) दृष्टिकोण
भूगोल अब एक समग्र, वैज्ञानिक और व्यावहारिक विज्ञान बन चुका है।
निष्कर्ष:
भूगोल में संकल्पनात्मक और पद्धतिगत विकास ने इसे एक साधारण वर्णनात्मक विषय से आधुनिक वैज्ञानिक अनुशासन में परिवर्तित कर दिया है। समय के साथ नई संकल्पनाएँ और पद्धतियाँ जुड़ती गईं, जिससे भूगोल का दायरा व्यापक हुआ। आज भूगोल न केवल पृथ्वी और मानव के संबंधों को समझता है, बल्कि भविष्य की योजनाओं और सतत विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
