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14. Currents of The Pacific Ocean / प्रशांत महासागर की जलधाराएँ

14. Currents of The Pacific Ocean

(प्रशांत महासागर की जलधाराएँ)

Currents of The Pacific Ocean



Currents of The Pacific Ocean

प्रशांत महासागर की जलधाराएँ⇒

         प्रशांत महासागर की धाराएँ अटलांटिक महासागर के धाराओं के समान बहती है। केवल थोड़ा बहुत परिवर्तन महासागर के विस्तार और स्वरूप के कारण आ जाता है। प्रशांत महासागर में निम्नलिखित धाराएँ चलती है-

(A) उत्तरी प्रशांत महासागर की जलधाराएँ

(i) उत्तरी भूमध्य रेखीय धारा-

      इसका प्रारंभ उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका के मिलन स्थल पर पश्चिमी भाग से होती है। यहां से प्रारंभ होकर यह धारा संपूर्ण प्रशांत महासागर की 7500 मील की यात्रा करके फिलीपाइन द्वीप समूह के तट पर आकर टकराती है और उत्तर की ओर मुड़ जाती है। यह एक गर्म जलधारा है। यह पूर्व से पश्चिम दिशा में बहती है। यह संसार की सबसे लंबी जलधारा है।

(ii) क्यूरोशियो या जापान धारा-

     उतरी विषुवतीय प्रशांत जलधारा की ही अग्रभाग है जो दक्षिण से उत्तर की ओर चलती है। यह फिलीपींस से 35°N अक्षांश के बीच जापान के पूर्वी तट के सहारे चलती है। 40°अक्षांश के पास यह सीधे पूरब की ओर मुड़ जाती है और उत्तरी प्रशांत प्रवाह को जन्म देती है। लेकिन इसके पहले क्यूशू द्वीप से टकराकर इसकी दो शाखा हो जाती है। एक शाखा जापान सागर में “शुसीमा धारा” कहलाती है।

(iii) क्यूराइल या ओयाशिवो ठंडी जलधारा- 

     यह एक ठंडी जलधारा है। उत्तरी आर्कटिक महासागर से चला हुआ जल बेरिंग जलडमरूमध्य से होकर दक्षिण की ओर प्रवाहित होता है जिसे ओयाशिवो जलधारा कहते हैं। होकैडो द्वीप के पास यह क्यूरोशियो जलधारा से मिल जाती है। इसे कमचटका धारा भी कहते हैं।

(iv) उत्तरी प्रशांत महासागरीय ड्रिफ्ट-

     उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट के समान ही प्रशांत महासागर में क्यूरोशियो धारा से टकराकर जब पछुआ पवनों के प्रभाव में आती है तो पूर्व की ओर मुड़ जाती है। तब इसकी गति मंद होती है। इसकी एक शाखा बेरिंग समुद्र में घुसकर अल्युशियन द्वीपों के उत्तरी भाग में घड़ी की सुई के विपरीत दिशा में घूमती है। यह एक ठंडी धारा के रूप में क्यूराइल से जाकर मिल जाती है। इसे अल्युशियन जलधारा भी कहते हैं। दूसरी शाखा अलास्का की खाड़ी में प्रवेश करके अलास्का धारा के नाम से जानी जाती है। यह गर्म जलधारा के रूप में बहती है जिसके कारण कनाडा के तटीय क्षेत्र में हिम को जमने नहीं देता है।

(v) कैलिफोर्निया जलधारा- यह एक उपसतही ठंडी जलधारा है जो उत्तर से दक्षिण की ओर कैलिफोर्निया की खाड़ी के तट के सहारे चलती है और उत्तरी विषुवतीय जलधारा से जाकर मिल जाती है।

(B) दक्षिणी प्रशांत महासागर की जलधारा

(i) दक्षिण विषुवतीय जलधारा- 

     दक्षिण पश्चिम वाणिज्य पवन के कारण पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली जलधारा है। यह एक गर्म जलधारा है। मध्य प्रशांत महासागर में यह धारा अनेक द्वीपों की स्थिति के कारण विभाजित हो जाती है।

(ii) पूर्वी आस्ट्रेलियन धारा-

      जब दक्षिणी विषुवतीय प्रशांत जलधारा न्यूगिनी तट से टकराती है तो इसका अधिकांश जल दक्षिण की ओर मुड़कर आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट के सहारे बहने लगती है। इसे ही पूर्वी ऑस्ट्रेलियन जलधारा कहते हैं। न्यूजीलैंड के निकट इसकी दो शाखाएं क्रमशः पश्चिम तथा पूरब से बहकर बहती है और पुनः मिल जाती है। 40°S अक्षांश के निकट यह पूर्व की ओर प्रवाहित होने लगती है और दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट तक चलती चली जाती है।

(iii) अंटार्कटिक प्रवाह- 

     यह धारा अंटार्कटिका के चारों ओर चक्कर लगाती है। इसकी दिशा पश्चिम से पूरब की ओर है। यह एक ठंडी जलधारा है जो पछुआ पवनों के प्रवाह में रहती है। इसे पछुआ पवन प्रवाह जलधारा भी कहते हैं। अवरोध के अभाव में स्वतंत्र रूप से बहती है।

(iv) पेरू या हंबोल्ट की ठंडी जलधारा- 

      पेरू के तट पर दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है। यह अंटार्कटिका ड्रिफ्ट की एक शाखा है। इसकी खोज 1522 ई० में हुआ। 1802 में इसका नाम हंबोल्ट ने अपने नाम पर रखा। तट से इसका विस्तार 900 किलोमीटर दूर तक मिलता है। इसके कारण गैलपोगस द्वीप पर पेंग्विन पक्षी मिलते हैं।

(v) एलनीनो जलधारा- 

     यह एक गर्म जलधारा है। यह फरवरी-मार्च में चलती है। 3°S से 33°S के बीच उत्पन्न होती है। एक मान्यता के अनुसार एलनीनो की उत्पत्ति जाड़े की ऋतु में धाराओं के दक्षिणी गोलार्ध में खिसकने के फलस्वरुप होती है। इसका तापमान सामान्य जल से 3℃ से 6℃ अधिक होता है।

(vi) विपरीत विषुवतीय जलधारा- 

       विषुवत रेखा के सहारे पश्चिम से पूरब की ओर चलती है। यह एक गर्म जलधारा है। इसकी उत्पत्ति प्रशांत महासागर के पश्चिम में जल संचय से होता है।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका 

       प्रशान्त महासागर की जधाराएं उत्तरी प्रशान्त महासागर में, उत्तरी विषुवतीय धारा पूर्व से पश्चिम की ओर महासागर के आर-पार बहती है। यह धारा जैसे जैसे पश्चिम की ओर बढ़ती है, इसके आयतन में वृद्धि होती जाती है। मध्य अमरीका के पश्चिमी तट से शुरू होकर यह पश्चिमी प्रशान्त महासागर में फिलिपीन द्वीपसमूह तक पहुंचती है। वहां से यह उत्तर की ओर मुड़ती है और क्यूरोसिबो धारा के नाम से फिलीपीन द्वीप समूह, ताईवान तथा जापान के तटों के साथ लगी हुई उत्तर की ओर बहती है। यह गर्म जल की धारा है। इसकी एक शाखा सुशिमा धारा के नाम से जापान सागर में प्रवेश करती है।

          जापान के दक्षिण-पूर्वी तट के समीप क्यूरोसियो धारा प्रचलित पछुआ पवन की चपेट में आ जाती है और महासागर के आर-पार पश्चिम से पूर्व दिशा में उत्तरी प्रशान्त धारा के नाम से बहती है। उत्तरी अमेरीका के पश्चिमी तट पर पहुंचकर यह दो शाखाओं में बंट जाती है। उत्तरी शाखा ब्रिटिश कोलंबिया तथा अलास्का के तटों पर घड़ी की सुइयों के विपरीत दिशा में अलास्का धारा के नाम से बहती है। इस क्षेत्र के समुद्री जल की अपेक्षा इस धारा का जल अधिक गर्म होता है। उत्तरी प्रशान्त धारा की दूसरी शाखा कैलिफोर्निया के तट पर दक्षिण की ओर बहती है। यह ठण्डी जलधारा है और इसे कैलिफोर्निया धारा कहते हैं। यह धारा निचले अक्षांशों में आकर उत्तरी विषुवतीय धारा से मिल जाती है। यह उत्तरी विषुवतीय धारा, व्यापारिक पवन के प्रभाव से महासागर के आर-पार, 14,500 किमी की दूरी तय करती है। इस प्रकार इन धाराओं का एक चक्र पूरा होता है।

        प्रशान्त के उत्तरी भाग में ओयासिवो धारा कमचटका प्रायद्वीप के तट के समीप उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है। यह एक दण्डी जलधारा है। उत्तरी प्रशान्त की दूसरी ठण्डी जलधारा ओखोटस्क धारा है। जो सखालीन के समीप बहती है और होकडो के निकट ओयासिवो धारा से मिल जाती है। ओयासिवो धारा अन्त में क्यूरोसियो धारा से मिलकर उसके गर्म जल के नीचे डूब जाती है।

        दक्षिणी प्रशान्त महासागर में दक्षिणी विषुवतीय धारा पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और पूर्वी आस्ट्रेलियाई धारा के नाम से दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। आगे चलकर तस्मानिया के समीप यह दक्षिणी प्रशान्त धारा में मिल जाती है जो पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। दक्षिणी अमरीका के दक्षिण-पश्चिमी तट पर पहुंचकर यह उत्तर की ओर मुड़ जाती है। यहाँ इसे पेरू धारा कहते हैं। यह एक ठण्डी जलधारा है जो अन्त में दक्षिणी विषुवतीय धारा में विलीन होकर एक चक्र पूरा करती है। उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धाराओं के बीच एक जलधारा पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है, जिसे विरुद्ध विषुवतीय धारा कहते हैं। उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धाराएं महासागर के पश्चिमी भाग में विशाल जलराशि एकत्र करती रहती हैं। जिससे महासागरीय जलस्तर असन्तुलित होता रहता है। इस असन्तुलन को दूर करने का कार्य विरुद्ध विषुवतीय धारा करती हैं।



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13. Atlantic Oceanic Currents

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(अटलांटिक महासागर की जलधारा) 

Atlantic Oceanic Currents


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अटलांटिक महासागर की जलधारा⇒

         अटलांटिक महासागर पश्चिम में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका और पूर्व में यूरोप तथा फिर का कीमत 8.24 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अवस्थित है। उत्तर में यह डेविस की खाड़ी, डेनमार्क जलडमरूमध्य तथा नार्वेजियन सागर द्वारा आर्कटिक सागर से जुड़ा हुआ है। अफ्रीका के दक्षिण में यह हिंद महासागर से मिला हुआ है। इसका आकार अंग्रेजी के S- अक्षर के समान है।अटलांटिक महासागर में मंद व तीव्र तथा उष्ण एवं शीतल सभी प्रकार के धाराएं प्रवाहित होती है। अटलांटिक महासागर की प्रमुख धाराएं निम्नलिखित है –

(A) उत्तरी अटलांटिक की जलधारा

1.उतरी अटलांटिक विषुवतीय गर्म जलधारा

2. कैरेबियन जलधारा

3. यूकाटन जलधारा

4. मैक्सिको जलधारा

5. गल्फ स्ट्रीम

6. उतरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह

7. पूर्वी ग्रीनलैंड जलधारा

8. नार्वेजियन जलधारा

9. इरमिंजर जलधारा

10. लैबराडोर जलधारा

11. केनारी जलधारा

(B) दक्षिणी अटलांटिक की जलधारा

1. दक्षिणी अटलांटिक विषुवतीय गर्म जलधारा

2. ब्राजीलियन गर्म जलधारा

3. फॉकलैण्ड जलधारा

4. अंटार्कटिका पछुआ प्रवाह (विश्व मे)

5. वेंगुएला जलधारा

(A) उत्तरी अटलांटिक की जलधारा 

(1) उत्तरी अटलांटिक विषुवतीय गर्म जलधारा- इसका विस्तार 0° से 10°N अक्षांश तक होता है। व्यापारिक हवा के कारण इस धारा की प्रवाह दिशा पूर्व से पश्चिम की ओर है। यह अफ्रीका के तट को छोड़ने के बाद अपने गुणों को प्राप्त करती है। यह एक गर्म जलधारा है। मध्य अटलांटिक कटक को पार कर उत्तर पश्चिम की ओर मुड़कर दो शाखाओं में बँट जाती है। वेस्टइंडीज के पूर्व में “एंटीलीज जलधारा” और पश्चिम में “कैरेबियन जलधारा” कहलाता है। कैरेबियन जलधारा ही मैक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करता है। 

(2) फ्लोरिडा जलधारा- यह कैरेबियन जलधारा का अग्रभाग है जो यूकाटन चैनल से होती हुई मैं मैक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करती है। मैक्सिको की खाड़ी अर्द्धचंद्राकार रूप में है। वुस्ट महोदय के अनुसार यह गर्म जलधारा औसतन 26 मिलियन घन मीटर/सेकंड वार्षिक जलराशि फ्लोरिडा जल डमरूमध्य से होकर अटलांटिक महासागर में लाती है। इस जलधारा का विस्तार 30°N अक्षांश तक रहता है। भूमध्यरेखा से मैक्सिको की खाड़ी तक इस धारा का तापक्रम 75° F तथा सतह की लवणता 36% रहती है। 30°N अक्षांश से आगे एंटीलिस जलधारा से मिल जाती है।

(3) गल्फ स्ट्रीम धारा- यह एक गर्म जलधारा है। इसकी खोज 1513 ई० में पास दि लियोन ने की थी। फ्लोरिडा की धारा का जहाँ अंत होता है वहाँ से यह धारा प्रारम्भ होती है। मैक्सिको की खाड़ी में जन्म लेने के कारण इसका नाम गल्फ स्ट्रीम पड़ा है। यह सेंटलॉरेन्स नदी के मुहाने तक निर्विध्न रूप से चलती है। 40°N अक्षांश के पास तक यह उत्तरी-पूर्वी दिशा में बहती है और इसके बाद एकदम पूर्व की ओर मुड़ जाती है।

                  न्यूफाउंडलैंड तट के पास यह उत्तर की ओर से आने वाले लैब्रोडोर ठंडी जलधारा से मिलकर घना कोहरा उत्पन्न करती है। 45° W देशांतर के बाद गल्फस्ट्रीम कई शाखाओं में बँट जाती है। बिस्के की खाड़ी में बहने वाली धारा रेनेल धारा कहलाती है। यह इंग्लिश चैनल में भी प्रवेश करती है। एक शाखा नार्वे के तट से होकर बहती है जो नॉर्वेजियन जलधारा कहलाता है। आईसलैंड के दक्षिणी किनारे पर चलने वाली शाखा इरमिंजर जलधारा कहलाती है।                              

                 न्यूफाउंडलैंड के बाद गल्फस्ट्रीम धारा की दिशा व प्रवाह गति पर पछुआ पवनों का विशेष प्रभाव पड़ता है। पुनः 40° N अक्षांश पर इसकी दिशा पृथ्वी के विक्षेपक बल के कारण बदलती, 45°W अक्षांश के बाद गल्फस्ट्रीम ही उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह जलधारा कहलाती है।

(4) लैब्रोडोर धारा- उत्तरी अटलांटिक महासागर में लैब्रोडोर तट के सहारे उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूरब की ओर चलने वाली जलधारा लैब्रोडोर जलधारा कहलाती है। यह एक ठंडी जलधारा है। यह उत्तरी ध्रुव महासागर का ठंडा जल खींचकर ले आती है। सेंट लारेंस नदी के मुहाने पर न्यूफाउलैंड द्वीप के समीप यह गल्फस्ट्रीम से मिल जाती है जिससे घना कोहरा बनता है।

(5) केनारी जलधारा- अफ्रीका के उत्तर-पश्चिम तट के सहारे के केनारी द्वीपों के पास से बहने वाली जलधारा केनारी जलधारा कहलाती है। यह धारा ठंडी है और उतर से दक्षिण दिशा में बहती है। वाणिज्य पवन इसे विशेष गति प्रदान करते हैं। यह धारा आगे चलकर उतरी विषुवतीय जलधारा में मिल जाती है। यह एक उपसतही जलधारा है।

(6) पूर्वी ग्रीनलैंड जलधारा- ग्रीनलैंड के पूर्व से भी एक ठंडी जलधारा दक्षिण की ओर चलती है जिसे पूर्वी ग्रीनलैंड जलधारा कहते हैं। यह उतरी अटलांटिक प्रवाह में मिल जाती है।

                      उत्तरी अटलांटिक महासागर के मध्य में जलधाराओं का एक वृत्त बन जाता है जिसकी प्रवाह दिशा घड़ी की सूईयों की गति की तरह होती है। इसके बीच का भाग स्थिर रहता है, जिसमें सारगैसो नामक समुद्री घास उग जाती है। जिसके कारण इसे सारगैसो सागर करते हैं। इसका विस्तार 20° से 35°N के बीच है। लेक के अनुसार दूसरे महासागरों में इस प्रकार की विशेषता नहीं पाई जाती है। मगर मारशक के अनुसार विश्व के महासागरों में ऐसे सागरों की संख्या 6 तक हो सकती है। इसके संबंध में अभी ज्ञान अधूरा है। अतः उनकी उचित खोज आवश्यक है।Atlantic Oceanic Currents

(B) दक्षिणी अटलांटिक की धाराएँ :-

(1) दक्षिणी अटलांटिक विषुवतीय जलधारा- इस धारा का प्रवाह क्षेत्र 0° से 20°S अक्षांश के मध्य पश्चिमी अफ्रीकी तट से प्रारंभ होकर दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तट पर जाकर सैनरॉक नामक टापू से टकराकर दो भागों में बँट जाती है। इसकी एक शाखा उतरी विषुवतीय धारा से तथा दूसरी शाखा ब्राजील तट के पास से दक्षिण की ओर गुजरती है जो ब्राजील गर्म जलधारा कहलाती है। 

(2) विपरीत विषुवतीय जलधारा- इस धारा की दिशा उत्तरी तथा दक्षिणी विषुवतीय धारा के प्रतिकूल दिशा में होती है। यह पश्चिम से पूरब की ओर प्रवाहित होती है। यह एक गर्म एवं कम शक्तिशाली जलधारा है। यही धारा पुरब में गिनी खाड़ी में पहुंचकर गिनी गर्म धारा के रूप में प्रवाहित होती है। 

(3) ब्राजील गर्म जलधारा- दक्षिण विषुवतीय धारा दक्षिण अमेरिकी के पूर्वी तट पर सैन रॉक अंतरीप से टकराकर दो भागों में विभक्त हो जाती है। एक शाखा तट के सहारे उत्तर की ओर चलती है जबकि दूसरी शाखा दक्षिण की ओर चलती है जो ब्राजील गर्म जलधारा कहलाता है। इसकी जल 40°S अक्षांश के निकट पहुंचकर फॉकलैंड की धारा से मिल जाती है।

(4) फाकलैंड की ठंडी जलधारा- दक्षिणी अटलांटिक में फाकलैंड द्वीप के पास अर्जेंटीना तट के सहारे दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है। अंटार्कटिका ड्रिफ्ट का एक अंग होने के कारण यह एक ठंडी धारा है।

(5) दक्षिणी अटलांटिक ड्रिफ्ट या पछुआ प्रवाह – जब 40° अक्षांश के पास ब्राजील व फाकलैंड पछुआ पवनों के प्रभाव में आती है तो समुद्री धारा का प्रवाह पश्चिम से पूर्व की ओर होने लगता है। इसे पश्चिम वायु प्रवाह (West Wind Drift) भी कहते हैं। यह एक ठंडी जलधारा है। अंटार्कटिका महाद्वीप के तट के सहारे चलती है। यह 40° से 60°S अक्षांशों के मध्य बहती है।

(6) बेंगुएला जलधारा- पश्चिमी वायु प्रवाह का कुछ जल पृथ्वी की दैनिक गति के कारण थोड़ा-सा उत्तर की ओर मुड़ जाता है। यह धारा दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी तट से टकराकर उत्तर की ओर प्रवाहित होती है। यह एक ठंडी जलधारा है जो कालाहारी मरुस्थल के तट पर चलती है। उत्तर में यह दक्षिणी विषुवतीय जलधारा से मिल जाती है और अंततः चक्र को पूरा करता है।

                 अत: उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उत्तरी एवं दक्षिणी अटलांटिक महासागर में अलग-अलग विशेषताओं से युक्त कई जलधाराएं मिलती है।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका 

                       अटलाण्टिक महासागर की धाराएँ प्रचलित व्यापारिक पवन, विषुवत् रेखा के उत्तर और दक्षिण में महासागर के धरातलीय जल को प्रेरित करते हैं। इससे यहां का जल दो धाराओं के रूप में पश्चिम की ओर बहता है। इन्हें उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धारा कहते हैं। इस प्रकार से असन्तुलित हुए जलस्तर पर सन्तुलन वापस लाने के उद्देश्य से एक वापसी धारा जिसे विरुद्ध विषुवतीय धारा कहते हैं, उपरोक्त दोनों विषुवतीय धाराओं के बीच पश्चिम से पूर्व की और बहती है। पश्चिमी अफ्रीका के तट के समीप इसे गिनी धारा कहते हैं।

               ब्राजील के साओ राक अन्तरीप के समीप दक्षिणी विषुवतीय धारा दो शाखाओं में बंट जाती है। इसकी उत्तरी शाखा उत्तरी विषुवतीय धारा में मिल जाती है। इस सम्मिलित धारा का कुछ अंश कैरिबियन सागर तथा मेक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करता है, जबकि शेष भाग वेस्टइंडीज द्वीप समूह के पूर्वी किनारे पर अंटाईल्स धारा के नाम से बहता हुआ गुजरता है।

                जो शाखा मेक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करती है, उसमें व्यापारिक पवन द्वारा प्रेरित तथा मिसिसिपी नदी द्वारा प्रदत्त अतिरिक्त जल की आपूर्ति होती है। इसके परिणामस्वरूप खाड़ी का जलस्तर अटलाण्टिक महासागर के जलस्तर की अपेक्षा कुछ ऊंचा हो जाता है। अतः खाड़ी से जल की धारा फ्लोरिडा के मुहाने से होकर बाहर खुले महासागर में निकलती है, जहां अंटाईल्स की धारा इससे मिल जाती है। फ्लोरिडा अन्तरीप से यह सम्मिलित धारा संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी तट पर बहने लगती है। इसे हटेरस अन्तरीप तक फ्लोरिडा धारा कहते हैं। हटेरस अन्तरीप से न्यू फाउंडलैण्ड के समीप स्थित ग्रैंड बैंक तक इस धारा को गल्फस्ट्रीम कहते हैं। गहरे जल में यह गल्फस्ट्रीम सुस्पष्ट रहती है।

          ग्रैंड बैंक से गल्फस्ट्रीम, पछुआ पवन के प्रभाव में आकर, पूर्व की ओर मुड़ जाती है और अटलाण्टिक के आर-पार उत्तरी अटलाण्टिक धारा के नाम से पूर्व की ओर बहती है। महासागर के पूर्वी भाग में पहुंचकर यह धारा दो मुख्य शाखाओं में बंट जाती है। मुख्य धारा ब्रिटिश द्वीप समूह पहुंचकर वहां के नार्वे के तट पर बहने लगती है, जिसे नार्वे धारा कहते हैं। वहां से यह आर्कटिक महासागर में प्रवेश कर जाती है। दक्षिणी शाखा स्पेन तथा एजोर्स के मध्य दक्षिण की ओर बहती है। यहाँ इसे कनारी धारा कहते हैं। यह एक ठण्डी जलधारा है। अन्त में यह उत्तरी विषुवतीय धारा में विलीन होकर उत्तरी अटलाण्टिक में धाराओं के चक्र (Gyre) को पूरा करती है। बीच के शान्त क्षेत्र को सारगेसो सागर कहते हैं जो सारगेसम नामक समुद्री शैवाल से भरा हुआ है।
                दो ठण्डी जलधाराएं आर्कटिक महासागर से अटलाण्टिक महासागर में बहती हैं। ये हैं- पूर्वी ग्रीनलैण्ड धारा तथा लेब्राडोर धारा।       

           लेब्राडोर धारा कनाडा के पूर्वी तट पर दक्षिण की ओर  बहती हुई गर्म गल्फस्ट्रीम से मिलती है। भिन्न तापमान वाली इन दो धाराओं के संगम से न्यू फाउंडलैण्ड के समीप विश्व विख्यात कोहरे का निर्माण होता है। यहां संसार का सबसे महत्वपूर्ण मत्स्य-आखेट क्षेत्र है।

                  दक्षिणी अटलाण्टिक महासागर में दक्षिणी विषुवतीय धारा की एक शाखा साओ राक अन्तरीप से दक्षिण की ओर दक्षिणी अमेरीका के पूर्वी तट से लगी हुई बहती है। इसे ब्राजील धारा कहते हैं। लगभग 35° अक्षांश पर ब्राजील धारा पूर्व की ओर मुड़ जाती हैं और पछुआ पवन से प्रेरित दक्षिणी अटलाण्टिक धारा से मिलकर पश्चिम से पूर्व की ओर बहने लगती है।

                   गुड होप अन्तरीप के निकट, दक्षिणी अटलाण्टिक धारा की एक शाखा दक्षिणी अफ्रीका के पश्चिमी तट पर उत्तर की ओर बहती है। यह ठण्डी जलधारा है और इसे बेंगुएला धारा कहते हैं। यह अन्त में दक्षिणी विषुवतीय धारा से मिलकर दक्षिणी अटलाण्टिक महासागर की धाराओं का चक्र पूरा करती है। एक ठण्डी जलधारा दक्षिणी अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी तट पर दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है, जिसे फाकलैण्ड धारा कहते हैं।


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12. Indian Ocean Currents / हिन्द महासागर की जलधारा

12. Indian Ocean Currents

(हिन्द महासागर की जलधारा)

Indian Ocean Currents


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हिन्द महासागर की जलधारा⇒

                 हिन्द महासागर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी महासागर है। यह एकमात्र ऐसा महासागर है जो आर्कटिक महासागर से नहीं जुड़ा हुआ है। पूरब में प्रशांत महासागर और पश्चिम में अटलांटिक महासागर से जुड़ा हुआ है। हिंद महासागर के पूर्व में आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और मलाया प्रायद्वीप है। उत्तरी भाग में एशिया, पश्चिम में अफ्रीका और दक्षिण में अंटार्कटिका महाद्वीप स्थित है। विषुवत रेखा इस महासागर को दो भागों में बांटती है-

(i) उत्तरी हिंद महासागर और

(ii) दक्षिणी हिंद महासागर।

            दक्षिणी हिंद महासागर एक पूर्ण महासागर है। इसमें समुद्री जल धाराएं सामान्य नियमों के अनुरूप प्रवाहित होती है जबकि उत्तरी हिंद महासागर की जलधाराएं ऋतु के अनुरूप अपना मार्ग परिवर्तित करती है। उत्तरी हिंद महासागर की जलधाराएं मुख्यतः तीन कारकों से प्रभावित होती है-

(i) मानसूनी जलवायु

(ii) तटीय आकृति तथा

(iii) उत्तर में महाद्वीपीय स्थिति के कारण उत्पन्न तापीय प्रभाव।

                        हिंद महासागर के जलधाराओं का अध्ययन मुख्यतः दो भागों में बांटकर करते हैं-

(A) दक्षिणी हिंद महासागर की जलधारा 

(B) उत्तर हिंद महासागर की जलधारा 

(A) दक्षिणी हिंद महासागर की जलधारा- 

                  दक्षिण हिन्द महासागर में पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण विषुवतीय क्षेत्रों में हिंद महासागरीय गर्म विषुवतीय जलधारा उत्पन्न होती है। यह जलधारा पूरब से पश्चिम दिशा की ओर चलते हुए पूर्वी अफ्रीकी तट से टकराती है। लेकिन मेडागास्कर द्वीप के कारण दो भागों में बँट जाती है। 

         प्रथम शाखा मोजांबिक और मेडागास्कर के बीच से गुजरती है जिसे मोजांबिक जलधारा कहते हैं। दूसरी शाखा मेडागास्कर के पूर्वी तट से गुजरती है जिसे मलागासी जलधारा कहते हैं। ये दोनों जलधारायें दक्षिण की ओर अग्रसारित होकर आपस में मिल जाती है और अगुलहास जलधारा को जन्म देती है। यह जलधारा दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी तट पर चलती है। यह जल आगे अग्रसारित होकर विश्व स्तरीय जलधारा पछुआ वायु प्रवाह (West Wind Drift) अंटार्कटिक प्रवाह से मिल जाती है।

          अंटार्कटिका प्रवाह पश्चिम से पूरब चलने की प्रवृति रखती है। इसकी उत्पत्ति अंटार्कटिका के हिमानी पिघलने से होती है। इसलिए इसकी प्रकृति ठंडी होती है। अंटार्कटिका प्रवाह का अधिकांश जल प्रशांत महासागर में प्रविष्ट कर जाता है लेकिन थोड़ा बहुत जल ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी भाग से टकराकर दक्षिण से उत्तर की ओर चलने लगती है। यह एक ठंडी जलधारा है जिसे पश्चिमी आस्ट्रेलियन ठंडी जलधारा के नाम से जानते हैं और ये जलधारा अंततः विषुवतीय गर्म जलधारा से मिल जाती है इस तरह ये एक चक्र को पूरा करती है। इसे आगे के मानचित्र में भी देखा जा सकता है।

Indian Ocean Currents
(B) उत्तरी हिंद महासागर की जलधारा –
                       उत्तरी हिंद महासागर एक अपूर्ण महासागर है। इसका नितल काफी छिछला है। हिंद महासागर में भारतीय प्रायद्वीप काफी अंदर तक घुसा हुआ है। आर्कटिक महासागर से नहीं जुड़े रहने के कारण इसमें ठंडी जलधाराएं नहीं पाई जाती है। यह एकमात्र ऐसा महासागर है जिसमें जलधाराएं ऋतु के अनुरूप अपने दिशा में परिवर्तन लाती है।
             उतरी हिंद महासागर में समुद्री जल जुलाई माह में घड़ी की सुई की दिशा में चलती है। जबकि जनवरी महीने में उत्तरी पूर्वी मानसून या वाणिज्यिक हवा के प्रभाव में आकर घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में प्रवाहित होने लगती है। जुलाई के महीने में चलने वाली धारा को दक्षिण-पश्चिम मानसून प्रवाह और जनवरी के महीने में चलने वाली जलधारा को उत्तरी-पूर्वी मानसून प्रवाह कहते हैं।

         विषुवतीय क्षेत्रों में पूर्वी अफ्रीका के तट पर विशाल जलराशि के जमाव के कारण विषुवतीय प्रति जलधारा का भी निर्माण होता है।

★ दक्षिण पश्चिम मानसून प्रवाह उत्तरी पूर्वी मानसून प्रवाह की तुलना में ठंडी होती है।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका 

                  हिन्द महासागर की धाराओं का प्रवाह क्रम प्रशान्त एवं अटलाण्टिक महासागर की धाराओं के प्रवाह-क्रम से भिन्नता लिए हुए है। हिन्द महासागर की धाराओं पर स्थलखण्डों एवं मानसूनी पवनों का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। हिन्द महासागर उत्तर में भारतीय उपमहाद्वीप, पश्चिम में अफ्रीका तथा दक्षिण में आस्ट्रेलिया महाद्वीप से घिरा हुआ है फलतः इस महासागर में धाराओं का स्थायी क्रम अस्तित्व में नहीं रह पाता है। उत्तरी हिन्द महासागर में उत्तर पूर्वी तथा दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं के कारण वर्ष में दो बार धाराएं अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती हैं। स्पष्ट है कि हिन्द महासागर में स्थायी और सामयिक दोनों ही प्रकार की धाराएं प्रवाहित होती हैं।

(A) सामयिक धाराएं

                        विषुवत् रेखा के उत्तर में हिन्द महासागर की समस्त धाराएं मानसून के प्रभाव से अपनी दिशा एवं क्रम में वर्ष में दो बार परिवर्तन कर लेती हैं। मानसूनी पवनों से प्रवाहित होने के कारण इन्हें मानसून प्रवाह भी कहते हैं।

(1) उत्तर-पूर्वी मानसून धारा- शरदकाल में (उत्तरी गोलार्द्ध में) उत्तर-पूर्वी मानसूनी हवाएं स्थल से जल की ओर चलती हैं। जिस कारण उत्तरी हिन्द महासागर में अण्डमान तथा सोमाली के बीच पश्चिम दिशा में प्रवाहित होने वाली उत्तर-पूर्वी मानसून धारा का जन्म होता है। यह धारा 5° उत्तरी अक्षांश से होकर प्रवाहित होती है। यह एशिया महाद्वीप के दक्षिणी तटों के सहारे बहते हुए अफ्रीका के तट पर पहुंचती है। फिर अफ्रीका के शृंग से टकराकर दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। विषुवत् रेखा के उत्तर में यह पूर्व की ओर मुड़कर पूर्वी द्वीप समूह तक जाती है। इस सम्पूर्ण चक्र को उत्तर-पूर्वी मानसून प्रवाह कहते हैं। यह एक मन्द समुद्री धारा है।

(2) भारतीय प्रतिधारा- यह उपर्युक्त 2° से 8° दक्षिणी अक्षांशों के मध्य शीतकाल में जंजीबार से सुमात्रा के बीच पूर्व की ओर बहने वाली धारा है।

(3) दक्षिण-पश्चिमी मानसून धारा- ग्रीष्मकाल में (उत्तरी गोलार्द्ध में) मानसूनी हवाओं की दिशाएं उलट कर दक्षिण-पश्चिमी हो जाती हैं। जिस कारण उत्तरी हिन्द महासागर का धारा क्रम भी उलट जाता है। उत्तर-पूर्वी मानसून धारा उलट जाती है और उसकी जगह पर दक्षिण-पश्चिमी मानसून धारा का जन्म होता है, जो मोजाम्बिक के पास से प्रारम्भ होकर अफ्रीका के पूर्वी तट के सहारे बहती हुई अरब सागर में प्रवेश करती है और दक्षिणी एशिया के तटवर्ती भागों का अनुसरण करती हुई सुमात्रा के पश्चिमी तट तक पहुंचती है। अन्त में यह भूमध्य रेखीय धारा से मिल जाती है।

(B) स्थायी धाराएं

               हिन्द महासागर के दक्षिणी भाग में स्थायी धाराओं का क्रम पाया जाता है जो निम्नलिखित हैं :

(1) दक्षिणी विषुवत्रेखीय धारा- यह धारा दक्षिणी हिन्द महासागर में 10° से 15° दक्षिणी अक्षांश के बीच आस्ट्रेलिया और अफ्रीका के बीच दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पश्चिम की ओर बहती है। 10° अक्षांशों के निकट यह मालागासी द्वीप के उत्तर में दो शाखाओं में विभाजित होकर दक्षिण की ओर बहती है।

(2) मोजाम्बिक धारा- उपर्युक्त धारा के मालागासी के उत्तर में दो भाग हो जाते हैं जिसका पश्चिमी भाग मोजाम्बिक धारा कहलाती है। यह शाखा अफ्रीका महाद्वीप और मालागासी द्वीप के बीच भाग से दक्षिण की ओर बहती है।

(3) अगुलहास की धारा-  मेडागास्कर द्वीप के दक्षिण में दक्षिणी विषुवतरेखीय धारा की दो विभाजित शाखाएं पुनः मिलकर एक हो जाती हैं और दक्षिण की और दक्षिण-पूर्व अफ्रीका के तट के सहारे अगुलहास की धारा के नाम से बहते हुए अन्ततः अण्टार्कटिक प्रवाह से मिल जाती हैं।

(4) मालागासी धारा- यह धारा उपर्युक्त वर्णित दक्षिणी विषुवतरेखीय धारा की (जब वह पूर्वी अफ्रीका तट पर दक्षिण की ओर बहती है और मेडागास्कर के उत्तर से दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है।) पूर्वी शाखा को ही, जो मेडागास्कर के पूर्व से होकर दक्षिण दिशा में बहती है, मेडागास्कर या मालागासी धारा कहते हैं।

(5) अण्टार्कटिक प्रवाह-  हिन्द महासागर के दक्षिण पश्चिम भाग में अगुलहास धारा जब पछुआ हवाओं के प्रभाव में आती है तो पूर्व की ओर मुड़कर निर्वाध रूप से बड़ी तीव्र गति से पूर्व की ओर बहती है। यह बड़ी ठण्डी धारा होती है।

हिन्द महासागर की धाराओं एवं पवनों में सम्बन्ध तथा ऋत्विक भिन्नता-

              हिन्द महासागर की धाराओं का अध्ययन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि यहां उत्तरी हिन्द महासागर में प्रवाहित होने वाली धाराएं अस्थायी तथा शीतकालीन व ग्रीष्मकालीन मानसूनी पवनों की दिशा के अनुरूप होती हैं। जबकि दक्षिणी हिन्द महासागर में चलने वाली धाराएं स्थायी तो है, परन्तु उनकी गति व दिशा पर भी (प्रत्येक महासागर की धाराओं की तरह) पवनी का प्रभाव दिखाई पड़ता है। पवनों व धाराओं का जितना स्पष्ट सम्बन्ध हिन्द महासागर में दिखाई पड़ता है, उतना किसी भी महासागर में प्रतीत नहीं होता है।

            उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी की मौसमी पवनों तथा धाराओं का अध्ययन किया गया। 1857 से 1952 ई. तक हिन्द महासागर की मौसमी पवनों के 6 माह एक दिशा में तथा 6 माह दूसरी दिशा में प्रवाहित होने के कारणों का पता लगाने के लिए इस क्षेत्र में 16 बार समुद्री खोज की गई।

               1968 में हेले ने स्पष्ट किया था कि मानसून पवनें दक्षिणी गोलार्द्ध में व्यापारिक पवनों की पेटी से उत्पन्न होती हैं तथा  पृथ्वी की घूर्णन गति से उत्पन्न विक्षेपक बल के कारण ये पवनें पश्चिमी भारत के वर्षा क्रम के अन्तर्गत आ जाती है।

             पीसारोटी ने अन्तर्राष्ट्रीय भारतीय समुद्री खोज के समय सिद्ध किया कि जितने जल की मात्रा भूमध्य रेखा को पार करके अरब सागर में पहुंचती है, उससे भी तिगुनी वाष्पभरी पवनें जुलाई के महीने में भारत के पश्चिमी तट को पार करके प्रायद्वीपीय भारत में पहुंचती है।

            लाइट हिल ने 1969 में यह स्पष्ट किया कि हिन्द महासागर में सोमालीलैण्ड के निकट सोमाली धारा केवल स्थानीय क्षेत्र के मानसून पवनों के प्रवाह एवं आयतन को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि सम्पूर्ण क्षेत्र की पवनों एवं समुद्र की गति को प्रभावित करती है। इन्होंने भूमध्यरेखीय भागों में स्थित होने के कारण हिन्द महासागर में पवनों की गति का प्रभाव वहां की लहरों पर आंका है।


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11. Ocean current / समुद्री  जलधारा

 11. Ocean current / समुद्री  जलधारा 


Ocean current / समुद्री  जलधारा

Ocean current                                         

                    मोंकहाउस ने समुद्री जलधारा को परिभाषित करते हुए कहा है कि “समुद्री नितल के ऊपर स्थित विशाल जलराशि की एक निश्चित दिशा में प्रवाहित होने वाली सामान्य गति को महासागरीय जलधारा करते हैं।” जलधाराओं के अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि जलधाराएं नदी के समान होती है। इनके किनारों पर जल लगभग स्थिर होते हैं जबकि मध्यवर्ती भाग में गति अधिक होती है। जलधाराएं न केवल समुद्री सतह के ऊपर चलती है बल्कि गहराई में भी चलती है। जलधाराएं एक निश्चित दिशा में निरंतर प्रवाहित होती रहती है। जलधाराओं में जल की गति 2 से 10 किलोमीटर प्रति घंटा तक होती है। समुद्री जलधाराएं भौतिक विशेषता गति एवं स्थिति के आधार पर कई प्रकार की होती है। जैसे :- भौतिक विशेषता के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार की होती है-

(i) ठंडी जलधारा 

(ii) गर्म जलधारा 

               विषुवतीय क्षेत्र से चलने वाले जलधाराएं गर्म प्रकार की होती है जबकि ध्रुवीय क्षेत्रों से उत्पन्न होने वाली जलधाराएं ठंडी होती है। जैसे – तीनों महासागरों में चलने वाले विषुवतीय जलधारा गर्म जलधारा का उदाहरण है। जबकि हम्बोल्ट (पेरू) जलधारा, अंटार्कटिका, पछुआ प्रवाह ठंडी जलधारा का उदाहरण है। 

            स्थिति के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार की होती है। 

(i) सतही जलधारा

(ii) अधोवाहिनी जलधारा / उप सतही जलधारा

(i) सतही जलधारा (Surface Current)- ध्रुवों और भूमध्यरेखीय भागों के बीच तापक्रम में अधिक अंतर पाया जाता है। समुद्री जल गर्म होकर हल्की होती है और ठंडी होकर भारी होती है। इसलिए विषुवतीय क्षेत्र से ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने वाली जलधाराएं समुद्र सतह के ऊपर से प्रवाहित होती है। ऐसी जलधारा को सतही जलधारा कहते हैं।

(ii) अधोवाहिनी जलधारा / उप सतही जलधारा- ध्रुवों से विषुवतीय क्षेत्र की ओर प्रवाहित होने वाली जलधाराएं ठंडी एवं भारी होती है। इसलिए वे समुद्री नितल के ऊपर से प्रवाहित होने लगती है और धीरे-धीरे गर्म होकर ऊपर उठने की प्रवृत्ति रखती है। ऐसी जलधाराओं को ही अधोवाहिनी जलधारा या उपसतही जलधारा कहते हैं। 

         गति के आधार पर समुद्री जल धाराएं तीन प्रकार की होती है –

(i) प्रवाह (Drift)- जब सागरीय जल मंद गति से प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है तो उसे प्रवाह कहते हैं। प्रवाह में समुद्री जल केवल ऊपरी सतह पर प्रगतिशील रहता है। प्रवाह की उत्पत्ति में प्रचलित हवाओं का विशिष्ट योगदान है। प्रवाह की कोई निश्चित गति सीमा निर्धारित नहीं है।

(ii) धारा (Current)- धारा की औसत गति 30 से 40 किलोमीटर प्रतिदिन होता है। इसमें समुद्री नितल के ऊपर स्थित संपूर्ण समुद्री जलराशि प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है। धारा की गति प्रवाह की तुलना में अधिक होती है।

(iii) स्ट्रीम (Stream)-  स्ट्रीम विशाल मात्रा में समुद्री जलराशि किसी एक निश्चित दिशा में तीव्र गति से प्रभावित होने की प्रवृत्ति रखती है। स्ट्रीम की गति धारा से भी अधिक होती है।

समुद्री जलधारा की उत्पत्ति के कारक

                समुद्री जलधाराओं में क्षैतिज गति पाई जाती है। इसकी उत्पत्ति के कारकों को मोटे तौर पर 4 वर्गों में बांटा जा सकता है – 

(1) पृथ्वी की विशेषता से जुड़े हुए कारक (पृथ्वी की आकृति एवं गुरुत्वाकर्षण बल, पृथ्वी की घूर्णन गति)

(2) वायुमंडलीय कारक / बाह्य सागरीय कारक (वायुदाब, वायु की दिशा, वाष्पीकरण, वर्षण)

(3) समुद्री जल की विशेषता से जुड़े हुए कारक (लवणता, घनत्व, तापमान)

(4) धाराओं की दिशा को प्रभावित करने वाला कारक (समुद्री नितल की उच्चावच, तटीय आकृति, मौसम परिवर्तन, पृथ्वी का भ्रमण/कोरियोलिस बल)

(1) पृथ्वी की विशेषता से जुड़े हुए कारक- पृथ्वी की आकृति, गुरुत्वाकर्षण बल एवं घूर्णन गति का प्रभाव जलधाराओं की उत्पत्ति पर पड़ता है। विषुवत रेखा पर गुरुत्वाकर्षण बल न्यूनतम एवं अपकेंद्रीय बल अधिकतम होता है। जबकि ध्रूवों पर गुरुत्वाकर्षण बल अधिकतम तथा अपकेंद्रीय बल न्यूनतम होता है। इसके कारण विषुवतीय प्रदेश का सागरीय जल ध्रूवों की ओर प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखता है।

                      अर्थात पृथ्वी अपने दोनों ध्रुवों पर नारंगी की तरह धँसी हुई है। जबकि विषुवतीय भाग में ऊपर उठी हुई है। पुनः ध्रुवीय भागों में गुरुत्वकर्षण शक्ति अधिक होने के कारण जल का ऊपरी स्तर नीचे की ओर दवा हुआ रहता है। जबकि विषुवतीय क्षेत्र में गुरुत्वाकर्षण क्षमता कम होने के कारण जल का स्तर ऊपर उठा रहता है। फलतः उच्च  जल स्तर से निम्न जल स्तर की ओर जल में प्रवाह की प्रवृति होती है।

                    इसी तरह पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण ही जलधाराएँ उत्पन्न होती है। पृथ्वी पश्चिम से पूरब की ओर घूम रही है। चूंकि समुद्र की सतह ठोस है। जबकि समुद्री पानी द्रव है। इसीलिए जब पृथ्वी पश्चिम से पूरब घूमती है तो समुद्री जल में पूरब से पश्चिम की ओर क्षैतिज गति उत्पन्न होती है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण सभी विषुवतीय गर्म जलधाराएँ हैं। पृथ्वी की घूर्णन गति का पर प्रभाव समुद्री सतह पर जलधारा सर्वाधिक विषुवतीय क्षेत्र में ही पड़ता है।

(2) वायुमंडलीय कारक / बाह्य सागरीय कारक- वायुमंडलीय कारकों के अंतर्गत को शामिल किया जाता है-

(i) वायुदाब

(ii) वायु की दिशा 

(iii) वाष्पीकरण

(iv) वर्षण 

वायुदाब- सामान्यत: निम्न वायुदाब प्रदेश के जल उच्च वायुदाब प्रदेश की तरफ गतिशील हो जाते हैं क्योंकि दोनों के जलसतह में अंतर होता है। जैसे – केनारी जलधारा, कैलिफ़ोर्निया जलधारा ये सभी उपध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र से उपोष्ण उच्च वायुदाब क्षेत्र की ओर चलती है।

वायुदिशा/प्रचलित पवनें एवं घर्षण बल- समुद्री जलधाराओं के निर्धारण में वायुदिशा का अभूतपूर्व प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः इतना प्रभाव किसी भी अन्य कारक का नहीं है। वायुदिशा के अनुरूप समुद्री जलधाराएं हजारों किलोमीटर तक प्रवाहित होती है। विश्व के प्रमुख प्रचलित वायु के समानांतर ही कई जलधाराएं चला करती है।

जैसे – 

◆ उत्तरी-पूर्वी वाणिज्य हवा- उत्तरी विषुवतीय गर्म जलधारा 

◆ दक्षिणी-पूर्वी वाणिज्य हवा- दक्षिणी विषुवतीय गर्म जलधारा 

◆ उत्तरी गोलार्ध की पछुआ वायु- उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह और उत्तरी प्रशांत प्रवाह 

◆ दक्षिणी गोलार्ध की पछुआ वायु- पश्चिमी वायु प्रवाह

वाष्पीकरण- अधिक वाष्पीकरण के कारण जल की मात्रा कम हो जाती है। साथी जल की लवणता एवं घनत्व में वृद्धि होती है। इन सबका सम्मिलित प्रभाव यह होता है कि अधिक वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों में जल का तल नीचा हो जाता है।  फलस्वरुप कम वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों से अधिक वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों की ओर समुद्री जल जलधाराओं के रूप में प्रवाहित होती है। 

वर्षण- जिन क्षेत्रों में वर्षण क्रिया से अतिरिक्त जल की आपूर्ति होती है। उन क्षेत्रों से जल कम वर्षण वाले क्षेत्रों की ओर प्रवाहित होती है। जैसे – विषुवतीय क्षेत्र में वर्षण की क्रिया से अधिक जलापूर्ति होने के कारण जलधाराएँ उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र के कम वर्षा वाले क्षेत्र की ओर प्रवाहित होती है।

(3) समुद्री जल की विशेषता से जुड़े कारक / अंतः समुद्री कारक- सागरीय जल के तापमान, लवणता, घनत्व आदि में स्थानीय परिवर्तन होते हैं जिसके कारण जल धाराओं की उत्पत्ति होती है। तापमान के कारण लवणता प्रभावित होती है और लवणता के कारण जल का घनत्व प्रभावित होता है। अतः ये तीनों कारक आपस में जुड़े हुए हैं। सामान्यतः निम्न घनत्व के जल अधिक घनत्व जल की तरफ गतिशील होते हैं। जैसे- निम्न घनत्व वाले अटलांटिक महासागर का जल अधिक घनत्व वाले भूमध्यसागर की ओर प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है। सामान्यत: समुद्री जलधारा की उत्पत्ति में घनत्व का सबसे कम प्रभाव है।

समुद्र जल का तापमान- समुद्र की सतह के तापीय विषमता ही जल धाराओं को उत्पन्न करती है। जैसे निम्न अक्षांश क्षेत्र के जल उच्च अक्षांश क्षेत्र की तुलना में गर्म होती है। इसका परिणाम यह है कि सभी समुद्रों में जलधारा की सामान्य प्रवाह निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की तरफ होती है। गर्म जल सापेक्षिक रूप से उठे हुए होते हैं। इसी तरह ध्रुवोय क्षेत्रों में हिमानी के कारण और सूर्य के तापीय प्रभाव कम होने के कारण जल का तापमान कम हो जाता है। ऐसे जल उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर प्रवाहित होती है।

(4) समुद्री जल धाराओं के दिशाओं को प्रभावित करने वाले कारक

उच्चावच एवं तट की आकृति- समुद्री नितल का उच्चावच और तटीय आकृति समुद्री जलधाराओं की दिशा निर्धारण में मदद करते हैं। इसलिए इसे संशोधनात्मक कारक कहा जाता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण उत्तरी अटलांटिक महासागर में विषुवतीय गर्म जलधारा का मध्य अटलांटिक कटक के पास उत्पन्न प्रतिरोध के कारण उत्तर की तरफ मुड़ जाना है। इसी तरह सभी विषुवतीय जलधाराएं महाद्वीपों के पूर्वी तट से टकरा कर निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की तरफ चलने की प्रवृत्ति रखते हैं। इसी तरह छोटे द्वीपों के कारण जलधाराएं कई भागों में विभक्त होकर प्रवाहित होती है।

                                          पृथ्वी की घूर्णन गति से उत्पन्न कोरियोलिस बल या विक्षेप बल (Deflective Force) के कारण जलधाराएं उत्तरी गोलार्ध में दायीं ओर एवं दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मुड़ जाती है। पृथ्वी के पश्चिम से पूरब दिशा में घूर्णन के कारण धाराओं का मार्ग गोलाकार हो जाता है।  

मौसम परिवर्तन का प्रभाव:- जब सूर्य उत्तरायण होता है तो समुद्री धाराओं  का प्रवाह क्षेत्र थोड़ा सा उत्तर की ओर खिसक जाता है एवं दक्षिणायन होता है तो धारा क्षेत्र थोड़ा दक्षिण की ओर खिसक जाता है। मानसूनी पवनों की दिशा में परिवर्तन के कारण उत्तरी हिंद महासागर में धाराओं की दिशा में भी परिवर्तन हो जाता है।

                 इस प्रकार स्पष्ट है कि समुद्री जल धाराओं की उत्पत्ति में कई कारकों का प्रभाव होता है।


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10. OCEAN WAVE / समुद्री तरंग

10. OCEAN WAVE (समुद्री तरंग)

OCEAN WAVE


OCEAN WAVE (समुद्री तरंग)

          समुद्री जल में कई प्रकार की गतियाँ पायी जाती है। जैसे- ज्वार-भाटा, जलधारा, तरंग इत्यादि। रिचर्ड महोदय ने समुद्री तरंग को परिभाषित करते हुए कहा है कि “समुद्री लहर महासागर की तरल सतह का एक विक्षोभ गति है।” इसे दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि समुद्री जल का ऊपरी भाग किसी एक निश्चित बिंदु के इर्द-गिर्द दोलन करने वाली गति को तरंग कहते हैं। समुद्री लहरें व्यापक एवं सर्वत्र पायी जाने वाली गति है। लहरों की उत्पत्ति में वायु, ज्वार-भाटा तथा भूकंप का योगदान होता है। इन तीनों में सर्वाधिक योगदान वायु की होती है। वायु जब सागरीय जल के साथ घर्षण करते हुए आगे बढ़ती है तो सागरीय जल के ऊपरी भाग में एक दोलन गति उत्पन्न होती है। इस गति में जल का स्थानांतरण नहीं होता है बल्कि जल एक निश्चित बिंदु के आगे या पीछे ऊपर या नीचे दोलन करती है।

OCEAN WAVE

 

लहर की संरचना

          तरंग में जल के लगातार उठाव और गिराव का क्रम जारी रहता है। इसके उठाव वाले भाग को शिखर या शीर्ष कहते हैं। जबकि गिराव वाले भाग को गर्त कहते हैं। दो क्रमबद्ध शीर्ष या दो क्रमबद्व गर्त के बीच की दूरी को तरंग की लंबाई कहते हैं।

           गर्त बिंदु से शीर्ष बिंदु के बीच की लम्बवत ऊंचाई को तरंग की ऊंचाई कहते हैं। दो शीर्ष बिंदुओं को एक निश्चित बिंदु से गुजरने में जो समय लगता है उसे तरंग की अवधि कहते हैं। तरंग की वेग और उसकी अवधि वायु की गति पर निर्भर करती है। जैसे- खुले समुद्रों में निर्विध्न रुप से हवाएं चलती है वहां अधिक लंबी एक ऊंची लहरें उत्पन्न होती है। पवन का प्रभाव सागर के भीतर 100 वर्ग मीटर की गहराई तक पड़ता है।
         सागरीय तरंगे तट की ओर अग्रसर होती है। जैसे-जैसे लहरें तट के निकट आते जाती है वैसे-वैसे सागरों की गहराई में भी कमी आते जाती है। इसी कारण से छिछले समुद्र में तरंग का निचला भाग समुद्र नितल से रगड़ खाकर आगे बढ़ने लगता है। रगड़ के कारण तरंग के प्रवाह में रुकावट आती है जिसके कारण लहरों की ऊंचाई अधिक हो जाती है लेकिन तरंग की लंबाई कम हो जाती है। तरंग की शीर्ष की ऊंचाई अधिक हो जाने से वह टूटकर आगे गिरता है। तरंग की टूटी हुई जल की भाग को सर्फ या ब्रेकर या स्वाश कहा जाता है। इसमें जल पीछे की ओर गिरते हुए प्रतीत होता है। 
 चित्र  : समुद्र में उत्पन्न तरंग एवं सर्फ
 
         समुद्री तरंगों में उत्पन्न तरंग दो कारकों पर निर्भर करते हैं-
(i) जल की गहराई पर
(ii) तरंग की ऊंचाई पर
      टुक्कर नामक समुद्रीवेता ने तरंग की लंबाई ज्ञात करने के लिए एक सूत्र का प्रयोग किया। जैसे-
तरंग की लंबाई = तरंग के दो शीर्षों की लम्बाई ÷ उनकी अवधि
        इस सूत्र के आधार पर टुक्कर ने बताया कि यदि तरंग की लंबाई अधिक है और जल की गहराई कम है तो उसकी गति पर नियंत्रण जल की गहराई का होता है। यदि लहर की लंबाई कम है तो गति पर लहर की लंबाई का नियंत्रण होता है। खुले समुद्रों में लहरों की गति एवं आकार पर जल की गहराई और वायु के वेग पर निर्भर करती है। लेकिन तटवर्ती क्षेत्रों में तटीय आकृति का भी लहरों पर प्रभाव पड़ने लगता है।
तरंग की प्रकार
 
      दोलन के आधार पर सागरीय तरंग दो प्रकार के होते हैं:-
1. अनुप्रस्थ
2. अनुधैर्य
        अनुप्रस्थ तरंग की तुलना प्रकाश तरंग से और अनुदैर्ध्य तरंग की तुलना ध्वनि गति से की जा सकती है। अनुप्रस्थ तरंग में जल किसी निश्चित बिंदु के इर्द-गिर्द लंबवत रूप से ऊपर उठने एवं नीचे बैठने की प्रवृत्ति रखता है जबकि अनुदैर्ध्य तरंग में क्षैतिज रूप से जल दोलन करने की प्रवृत्ति रखता है। ब्यूफोर्ट महोदय ने कुछ विशिष्ट लहरों का विवरण प्रस्तुत किया है। जैसे- 
(1) स्वेल- स्वेल तरंग में तरंग का शीर्ष गोलाकार तथा गर्त ज्यावक्रीय होती है। इसमें जल की सतह हल्के उभार वाली होती है। 
(2) फेनिल तरंग (Surf)- ऐसे तरंगें छिछले सागरों में उत्पन्न होते है। छिछले सागर में तरंग की शीर्ष टूटकर सर्प का निर्माण होता है। 
(3) स्थानांतरण तरंग- स्थानांतरण तरंग में जल की वास्तविक गति और तरंग की गति एक ही दिशा में होती है। स्थानांतरण तरंग में जल की ऊपरी सतह से लेकर सागर की तली तक का समस्त जल एक ही दिशा में गतिशील होता है।
(4) दोलन करने वाली लहरें- जब किसी निश्चित बिंदु के इर्द-गिर्द तरंगों के शीर्ष एवं गर्त का निर्माण होता है तो उसे दोलन करने वाली लहरें कहते हैं।
(5) हानिकारक तरंग- इसे ब्यूफोर्ट महोदय ने पुनः दो भागों में बाँटा है:-
(i) सूनामी- सुनामी समुद्री क्षेत्रों में आने वाले भूकंप एवं ज्वालामुखी उद्गारों के कारण उत्पन्न होते हैं। सुनामी एक जापानी शब्द है जिसका तात्पर्य भूकंप से उत्पन्न समुद्री लहर है। सुनामी लहर के उत्पन्न में वायु का कोई योगदान नहीं होता। सुनामी सामान्य लहरों की तुलना में बड़ी एवं विनाशकारी होती है। भूकम्प आने के 12 मिनट बाद सुनामी लहरें आती है। समुद्र में जितने भूकंप के झटके आते हैं समुद्र में उतने ही सुनामी लहरें आती है। प्रशांत महासागर सुनामी तरंगों के लिए प्रसिद्ध है। फिलीपींस, जापान, हवाई द्वीप सुनामी तरंगों से अत्याधिक प्रभावित होते हैं। खुले समुद्रों में सुनामी तरंगे अधिक हानिकारक नहीं होती है। लेकिन तटीय क्षेत्रों में इनकी भयंकर परिणाम होते हैं। 1883 ई० में इंडोनेशिया के क्राकाडोवा द्वीप पर भयंकर ज्वालामुखी उद्गार से 360 मीटर ऊँची तरंगे उत्पन्न हुई थी जिसमें 36000 लोग मारे गए थे। 26 दिसंबर 2004 को सुमात्रा के दक्षिणी भाग में आए भूकंप के कारण उत्पन्न सुनामी लहरों के कारण लाखों लोग मारे गए।
(ii) तूफानी तरंग- जब हरिकेन जैसे चक्रवात उत्पन्न होते हैं तो तटीय भागों में ऊंची-ऊंची लहरें उठती है। इससे प्रायः तटीय भागों में जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।
समुद्री तरंग का महत्व
(1) समुद्री तरंगों के द्वारा तट का कटाव होता है। कटे-फटे तट जलयानों एवं बंदरगाहों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
(2) लहरों के द्वारा होने वाले कटाव के कारण कृषि योग्य भूमि इत्यादि विलीन हो जाते हैं।
(3) लहरों के कारण वायु और जल में मिश्रण का कार्य होता है जिससे समुद्री जीव ऑक्सीजन ग्रहण कर जीवित रहते हैं। 
(4) लहरों के कारण संचार व्यवस्था प्रभावित होती है।
(5) लहरों के कारण समुद्री तट पर कई प्रकार के निक्षेप एकत्रित हो जाते हैं।
(6) लहरी तरंग ऊर्जा के उत्पादन में सहायक होता है।
निष्कर्ष:- इस उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री लहर मानव जीवन को कई प्रकार से प्रभावित करते हैं।

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9. Oceanic Deposits / महासागरीय निक्षेप

Oceanic Deposits

(महासागरीय निक्षेप)  



Oceanic DepositsOceanic Deposits (महासागरीय निक्षेप)  

         समुद्र के तली पर मिलने वाले अनेक असंगठित पदार्थों के निक्षेप को समुद्री निक्षेप कहते है। इन निक्षेपों में अकार्बनिक एवं कार्बनिक दोनों प्रकार के पदार्थ शामिल होते है। समुद्री निक्षेप के विषय में अनेक अध्ययन समुद्रीवेताओं के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। समुद्री निक्षेप के सम्बन्ध में सर्वप्रथम जानकारी यूनानी भूगोलवेत्ता हेरोडोटस ने दिया था। उसके बाद 1773 ई० में कैप्टन किप्स, 1872 ई० में मर्रे और रेनार्ड ने समुद्री निक्षेप का मानचित्र प्रस्तुत किया। उसके बाद गरहार्ड स्कॉट महोदय ने विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया।

        इन विद्वानों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि समुद्री निक्षेप के कई स्रोत है। जैसे स्थलीय भाग, ज्वालामुखी उदगार से प्राप्त मलबा, वायुमंडल, ब्रह्मांड एवं समुद्र से मिलने वाले अनेक जीव जंतु। इन स्रोतों से प्राप्त होने वाले पदार्थों का निक्षेपण लाखों वर्षों से हो रहा है। इसकी मोटाई एक समान नहीं है। लेकिन कहीं-कहीं पर मोटाई 500 मीटर से अधिक पाई गई है। समुद्री निक्षेपों का वितरण कणों के आकार-प्रकार, समुद्री लवणता एवं समुद्री जल की गतियों पर निर्भर करता है। समुद्री निक्षेप के जमाव का दर बहुत ही मन्द है। इन निक्षेपों में स्थलीय निक्षेप की भाँति स्तर नहीं पाए जाते हैं। लेकिन यह स्पष्ट है कि समुद्र तल से ज्यों-ज्यों गहराई में जाते हैं, त्यों-त्यों समुद्री निक्षेप की गहनता में वृद्धि होती जाती है। इसी तरह तटीय क्षेत्र से गहन सागर क्षेत्रों की ओर जाने पर इनके वितरण प्रारूप में परिवर्तन होता जाता है।

समुद्री निक्षेप का वर्गीकरण

      समुद्री निक्षेपों का कई आधार पर एवं कई विद्वानों के द्वारा वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है। जैसे:-

(1) मरे के अनुसार-  मरे महोदय ने स्थिति के आधार पर समुद्री निक्षेप को दो भागों में बांटा है- 

(i) भूमिज निक्षेप

(ii) पेलाजिक निक्षेप

      मरे के अनुसार 100 फैदम या 200 मी० की गहराई तक भूमिज निक्षेप और उसके आगे पेलाजिक निक्षेप पाई जाती है।

(2) जेनकिंस के अनुसार- जेनकिंस ने समुद्र की गहराई को आधार मानते हुए समुद्री निक्षेप को तीन भागों में बांटा है:-

(i) तटीय निक्षेप- तटीय निक्षेप उच्च ज्वार और निम्न ज्वार के बीच में तटीय भागों में पाई जाती है। यह सामान्यतः 100 फैदम की गहराई तक पाए जाते हैं। इसमें मूलतः कंकड़, बालू, बजरी जैसे पदार्थों का निक्षेपण पाया जाता है।

(ii) छिछला सागर निक्षेप- यह 100 से 200 फैदम में समुद्री गहराई के बीच मिलते हैं।

(iii) गहन सागरीय निक्षेप- इसे जेनकिंस महोदय ने पेलाजिक निक्षेप से भी संबोधित किया है।

(3) जॉनसन के अनुसार- जॉनसन ने समुद्री निक्षेपों के प्रकृति को आधार मानते हुए समुद्री निक्षेप को तीन भागों में बांटा है :-

(i) छिछला सागरीय समुद्री निक्षेप- कुल समुद्री भूपटल के क्षेत्र का 9.1% भाग पर फैला है। 

(ii) भूमिज निक्षेप- इसका विस्तार 15.4% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

(iii) पेलाजिक निक्षेप- इसका विस्तार 75.5% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

(4) स्रोत के आधार पर समुद्री निक्षेप का वर्गीकरण

         यह किसी एक समुद्रीवेता के द्वारा  प्रस्तुत नहीं किया गया है। समुद्री निक्षेप का सबसे उपयुक्त एवं वैज्ञानिक विश्लेषण स्रोत के आधार पर ही किया जा सकता है। स्रोत के आधार पर किए गए वर्गीकरण से उसकी उत्पत्ति एवं प्रत्येक की विशेषता का भी विश्लेषण स्पष्ट हो जाता है। अतः स्रोत के आधार पर समुद्री निक्षेप को 6 भागों में बांटते हैं:-

(i) भूमिज निक्षेप (Terrigenous Deposits)

(ii) ज्वालामुखी निक्षेप (Volcanic Deposits)

(iii) अजैविक निक्षेप (Inorganic Deposits)

(iv) ब्रह्माण्डीय निक्षेप 

(v) जैविक निक्षेप (Organic Deposits)

(vi) लाल चिका 

(1) भूमिज निक्षेप (Terrigenous Deposits)- 

       समुद्र के तली पर निक्षेपित अधिकतर पदार्थ स्थलीय भागों से ही प्राप्त होते हैं। स्थलीय भागों के चट्टानें सतत ऋतुक्षरित होते रहती है। ऋतुक्षरण से प्राप्त मलबा को अपरदन के दूत समुद्र के नितल तक पहुंचाते रहते हैं। इनमें सबसे प्रमुख योगदान नदियों का है। भूमिज निक्षेप को उत्पत्ति, कणों की आकृति और रासायनिक संगठन के आधार पर कई भागों में बांटते हैं :-

(A) गोलाश्म और बजरी (Bolder and Gravel)

(B) रेत या बालू (Sand)

(C) गाद (Silt)

(D) मृतिका (Clay)

(E) पंक (Mud)

           गोलाश्म के टुकड़ों का व्यास न्यूनतम 256 mm होता है जबकि बजरी का व्यास 2 से 256 mm तक होता है। ये दोनों समुद्री तरंगों के द्वारा तटीय क्षेत्रों में सतत किए जा रहे अपरदन से प्राप्त होते हैं। इनका निक्षेपण प्राय: तटीय क्षेत्रों में देखने को मिलता है। 

          रेत या बालू के कणों का व्यास 1/8 से 2mm तक होता है। बालू की प्राप्ति स्थानीय चट्टानों के ऋतुक्षण एवं अपरदन से होता है। रेत के कण भी कई प्रकार के होते हैं। जैसे :- बहुत मोटी रेत, मोटी रेत, मध्यम बालू/ रेत, बारिक रेत और बहुत बारीक रेत।

           गाद, मृतिका और पंक के कणों के व्यास 1/8192mm से 1/8mm तक होता है। गाद पंक के चट्टानी कणों को जोड़ने का कार्य करता है। छिछली एवं शांत सागरों में मृतिका एवं पंक बारीक कण के रूप में पानी पर लटके रहते हैं।

        सबसे सूक्ष्म भूमिज निक्षेप में पंक या कीचड़ को शामिल किया जाता है। कीचड़ प्रायः 1000 फैदम गहराई के बाद ही पाये जाते हैं। मर्रे महोदय ने बताया कि ये कई रंग के होते है। रंग के आधार पर उन्होनें पंक या कीचड़ को तीन भागों में बांटा है- 

(i) नीला पंक (Blue Mud)

(ii) लाल पंक (Red Mud)

(iii) हरा पंक (Green Mud)

        नीला पंक उन चट्टानों के अवशेषों से बनती है जिसमें आयरन सल्फाइड एवं अन्य जैविक तत्व मौजूद रहते है। नीली पंक सभी महासागरों में मिलती है। इसका विस्तार लगभग 232 लाख वर्ग किमी में है।

         लाल पंक का निर्माण लौह ऑक्साइड वाले चट्टानों के ऋतुक्षरण से हुआ है। इसका सर्वाधिक विस्तार पीला सागर और अटलांटिक महासागर के ब्राजील के तट पर देखा जा सकता है।

       हरा पंक का निर्माण नीला पंक के रासायनिक परिवर्तन से होता है। इसमें हरा रंग Gluconites नामक खनिज के कारण होता है। हरा पंक उतरी अमेरिका के प्रशांत एवं अटलांटिक तट पर, ऑस्ट्रेलिया और जापान के तट पर तथा दक्षिण अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के तट पर पाये जाते हैं।

(2) ज्वालामुखी निक्षेप 

           ज्वालामुखी उदगार के कारण बड़े पैमाने पर मलबा का जमाव स्थलीय एवं सागरीय भूपटल पर होता रहता है। स्थलीय भाग पर होने वाला ज्वालामुखी उदगार से निकले मलबा, लावा धीरे-धीरे ठंडा होने की प्रवृति रखते है। जबकि सागरीय भूपटल पर होने वाला ज्वालामुखी उदगार से निकले लावा तेजी से ठंडा होता है। अतः इसके आधार पर ज्वालामुखी निक्षेप को दो भागों में बांटते हैं –

(i) समुद्री ज्वालामुखी निक्षेप

(ii) स्थलीय ज्वालामुखी निक्षेप

         स्थलीय ज्वालामुखी पदार्थ अपरदन के दूतों के द्वारा समुद्री भूपटल पर लाये जाते हैं जो भूमिज के निक्षेप के साथ मिश्रित हो जाते है जिसके कारण इन्हें अलग से पहचान करना संभव नहीं हो पाता है। जबकि समुद्री ज्वालामुखी से प्राप्त पदार्थ अपने मौलिक अवस्था में लंबे समय तक बने रहते हैं। अपरदन एवं ऋतुक्षरण के अभाव में इनका मौलिक गुण यथावत रहता है। 10 लाख वर्ग किमी० समुद्री भूपटल पर इनका निक्षेपण हुआ है। इसका प्रमाण महासागरीय कटक और ज्वालामुखी द्वीपों के सहारे मिलता है।

(3) अजैविक निक्षेप (Inorganic Deposits) 

      अजैविक समुद्री निक्षेप का मुख्य स्रोत वायुमण्डल है। जब जलवायु परिवर्तन होता है तो वैसी स्थिति में वायुमण्डल के ठोस कण सतह पर गिरने लगते है और रासायनिक प्रतिक्रिया कर ग्लूकोनाइट जैसे खनिज का निर्माण करते हैं। इसी तरह यदि वायुमण्डल से CO2 हटा दिया जाय तो डोलोमाइट, सिलिका और लौहे के कण सतह पर गिरकर विशिष्ट अजैविक समुद्री निक्षेप का निर्माण करते हैं। इनका निक्षेपण लगभग सभी सागरों में हुआ है। 

(4)  ब्रह्माण्डीय निक्षेप

          ब्रह्माण्डीय पिंडों से हमारी समुद्री सतह पर निक्षेपित होने वाली पदार्थों को ब्रह्माण्डीय निक्षेप कहते है। स्पष्ट है कि इसका स्रोत हमारी पृथ्वी या वायुमण्डल नहीं है बल्कि हमारे सौरमण्डल या अन्य खगोलीय पिंड इसके स्रोत है। इस प्रकार के निक्षेप सबसे अधिक प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर और हिन्द महासागर में हुआ है। प्रशांत महासागर के 0.25% क्षेत्रफल पर इसका विस्तार हुआ है। ब्रह्माण्डीय निक्षेप का रंग काला होता है तथा इसमें लोहे का अंश अधिक होता है।

(5) जैविक निक्षेप 

            समुद्री जल में अनेक प्रकार के जीव जंतु पाए जाते हैं। जब ये सागरीय जीव मरते हैं तो उन जीवों के हड्डियां, मांस एवं उनके शरीर में पाए जाने वाले खनिज पदार्थों इत्यादि का जमाव समुद्री नीतल पर होता रहता है। जैविक समुद्री निक्षेप गर्म सागरीय क्षेत्रों में अधिक पाए जाते हैं। गुणों के आधार पर जैविक निक्षेप को दो भागों में बांटते हैं –

(i) नेरेटिक जमाव/ तट तलवासी निक्षेप

(ii) पेलाजिक जमाव/अगाध सागरस्थ निक्षेप

           समुद्र में पाए जाने वाले जीव-जंतुओं की हड्डियों, मछलियों, प्रवाल, शीप, स्पंज इत्यादि के स्थिर पंजर वाले अवशेषों को नेरेटिक जमाव कहते हैं। नेरिटिक जमाव समुद्री तली में किसी विशिष्ट स्थान पर नहीं पाए जाते। लेकिन इन पर लगातार समुद्री लहरों एवं जल धाराओं के प्रहार के कारण महीन कण के रूप में टूटते रहते हैं। 

           पेलाजिक जमाव कीचड़ के समान होता है जिसे ऊज (Ooze) भी कहा जाता है। सूखने पर यह पाउडर के समान हो जाता है। इसका निर्माण विशिष्ट प्रकार के शैवाल, प्रोटोजोआ, डायटम जैसे जीवों के द्वारा होता है। ये प्रायः सागरीय क्षेत्रों में मिलते हैं। रसायनिक विशेषता के आधार पर इसे दो भागों में बांटते हैं –

(A) चुना प्रधान पेलाजिक- दो प्रकार के

(i) टेरोपॉड

(ii) ग्लोबीजेरिना

(B) सिलिका प्रधान पेलाजिक- दो प्रकार के

(i) रेडियोलेरियन पेलाजिक

(ii) डायटम पेलाजिक

       टेरोपॉड का विस्तार 0.4%, ग्लोबीजेरिना का विस्तार 29.2%, रेडियोलेरीयन का विस्तार 3.4% और डायटम का विस्तार 6.4% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

      टेरोपॉड चूनायुक्त पदार्थ है। इसका स्रोत चूना प्रधान वाले जीवों का शरीर होता है। इस निक्षेप का नाम भी टेरोपॉड नामक जीव के आधार पर किया गया है। यह प्रायः उष्ण एवं छिछले सागरों में पाया जाता है। यह 1600-3000 मीटर की गहराई में मिलते हैं। इसका सर्वाधिक विस्तार अटलांटिक महासागर में हुआ है।

        ग्लोबीजेरिना का रंग सफेद होता है। इसका प्रमुख स्रोत फेरामिनीफेरा नामक समुद्री जीव है। 3000 से 4000 मीटर की गहराई पर मिलते हैं। ठंडे सागरीय जल में कम और गर्म सागरीय जल में अधिक मिलते हैं।

          डायटम सिलिका प्रधान जैविक निक्षेप है। इसका रंग स्लेटी होता है। 1200 से 4000 मीटर की गहराई पर अधिक मिलते हैं। इसका प्रमुख स्रोत डायटम नामक जीव है। उच्च अक्षांशीय भागों के ठंडे सागरीय क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है। अंटार्कटिका के इर्द-गिर्द इसका निक्षेप सर्वाधिक हुआ है। 

       रेडियोलेरियन नामक समुद्री निक्षेप का मुख्य स्रोत रेडियोलेरियन नामक जीव है। जो उष्ण जल में मिलने वाला जीव है। 4000-10000 मीटर की गहराई तक इसका निक्षेपण हुआ है। प्रशांत महासागर में इसका विस्तार सबसे अधिक है।

(6) लाल चीका 

        यह मुख्यतः एलुमिनियम और ऑक्सीकृत लोहा के हाइड्रेट सिलिकेट से निर्मित होता है। प्राथमिक मान्यता यह रही है कि इसका निर्माण विभिन्न प्रकार के समुद्री निक्षेपों से प्राप्त होने वाले खनिजों के टूटने से बनता है। लेकिन नवीन मान्यता वाईविल थॉमसन ने विकसित करते हुए कहा है कि यह भी एक प्रकार का जैविक निक्षेप ही है जिसका निर्माण चूना प्रधान वाले जीवों के विघटन से होता है। लाल चिका चूना प्रधान वाले जीवों में मिलने वाला ऐसा खनिज है जिसका विलियन संभव नहीं हो सका है। लाल चिका का निक्षेपण तीनों महासागरों में हुआ है। 

          इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि स्रोत के आधार पर किया गया वर्गीकरण को सबसे अधिक मान्यता प्राप्त है। समुद्री निक्षेपों के वितरण को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।



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8. OCEAN SALINITY / सागरीय  लवणता

OCEAN SALINITY

सागरीय  लवणता

OCEAN SALINITY




OCEAN SALINITY / सागरीय  लवणता 

         समुद्री जल में लवण की घुली हुई मात्रा को समुद्री लवणता कहते है प्रारंभ में जब पृथ्वी का निर्माण हुआ तो उसका उपरी भाग ठंडा होकर भूपटल का निर्माण किया। भूपटल का वह भाग जिसका घनत्व कम था उससे महाद्वीपीय भूपटल का निर्माण हुआ और भूपटल का वह भाग जिसका घनत्व अधिक था उससे महासागरीय भूपटल का निर्माण हुआ 

     कालान्तर में स्थ्लमंडल से अपरदन के दूतों के द्वारा लवणों को सागर तक पहुँचाने का कार्य अनवरत जारी है समुद्री जल में मुख्यतः 47 प्रकार के लवण पाए जाते है जिसमें NaCl की मात्रा सर्वाधिक (77.08%) है इसके अतिरिक्त MgCl (10.09%), MgSo4 (4.9%) कैल्सियम सल्फेट (3.6%) भी प्रमुख लवण पाए जाते है शेष अन्य प्रकार के लवण पाए जाते है

लवणता का मापन:

        लवणता का मापन प्रति हजार ग्राम जल में उपस्थित लवण की मात्रा के अनुपात से ज्ञात करते है इसे प्रति हजार (gm ‰) के द्वारा निरुपित करते है डिटमर महोदय के अनुसार सागरीय जल में औसत लवणता 35 ‰ पायी जाती है समुद्री जल में लवणता सर्वत्र एक सामान नहीं पाई जाती है लवणता को प्रभावित करने वाले कई कारक है-

लवणता को प्रभावित करने वाले  कारक:

1. वर्षा एवं वाष्पीकरण-

      वर्षा एवं लवणता  के बीच व्यत्क्रमानुपाती संबंध होता है अर्थात जिन स्थानों पर वर्षा ज्यादा होती है वहाँ लवणता कम होती है जहाँ पर वर्षा कम होती है वहाँ पर लवणता अधिक होती हैइसी तरह लवणता एवं वाष्पीकरण के बीच समानुपाती का संबंध होता है जिन क्षेत्रों में वाष्पीकरण अधिक होता है उन क्षेत्रों में लवणता अधिक पाई जाती है और जहाँ वाष्पीकरण कम होता है वहाँ लवणता भी कम पायी जाती है इन संबंधों को नीचे के ग्राफ में देखा जा सकता है-

चित्र : लवणता एवं वर्षा में व्युत्क्रमानुपाती संबंध
चित्र: लवणता एवं वाष्पीकरण में समानुपाती का सम्बंध

          विषुवतीय क्षेत्र को छोड़कर अन्य उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में वाष्पीकरण का प्रभाव कम होता है और वर्षा कम होती है। यही कारण है की विश्व के अधिक लवणता वाले क्षेत्र विषुवतीय क्षेत्र में स्थित नहीं है बल्कि 30° से 35° अक्षांश के बीच उपोष्ण उच्च वायुदाब वाले क्षेत्र में स्थित है। जैसे- तुर्की का वानगोलु झील (330 ‰), मृत सागर (340 ‰), ग्रेट बेसिन (220 ‰)।

            विषुवतीय क्षेत्रों में वाष्पीकरण की तुलना में वर्षा अधिक होती है। इसीलिए वहाँ लवणता कम पाए जाते है।

2. समुद्री जलधाराएँ-

       विश्व के सभी महासागरों में समुद्री जलधाराएँ चला करती है। उत्तरी गोलार्द्ध  में जलधाराएँ Clock Wise  और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anticlock Wise चला करती है। इसका तात्पर्य हुआ कि निम्न अक्षांश से जलधाराएँ उच्च अक्षांश की ओर जाती है और कुछ जलधाराएँ उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर आती है। तापमान के विशेषता के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार के होती है-

(i) ठंडी जलधारा

(ii) गर्म जलधारा।

     गर्म जलधारा में वाष्पीकरण अधिक होता है जिससे लवणता बढ़ने की प्रवृति रखती है। इसके विपरीत ठंडी जलधाराओं में वाष्पीकरण कम होता है। इसीलिए लवणता भी कम होती है। उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह के कारण ही उत्तरी सागर में लवणता बढ़ जाती जाती है। इसी तरह उत्तरी प्रशांत गर्म जल जलधारा के कारण अलास्का की खाड़ी में लवणता बढ़ जाती है।

 3. बर्फ का पिघलना-

       यह ज्ञात है कि ध्रुवीय क्षेत्र बर्फ से ढके हुए हैं। सूर्याताप प्राप्त करके जब बर्फ पिघलती हैं तो समुद्र में जलापूर्ति बढ़ जाती है। जिसके परिणामस्वरूप लवणता में भी कमी आ जाती है। यही कारण है कि आर्कटिक सागर और अंटार्कटिका के तटीय क्षेत्रों में लवणता कम पाई जाती है।

4. नदियों के द्वारा स्वच्छ जल की  आपूर्ति-

          नदी जल स्वच्छ जल के उदाहरण है। विश्व के कई बड़ी बड़ी नदियां अपना जल सतत समुद्र में उधेड़ रही है। काला सागर और कैस्पियन सागर दोनों एक ही अक्षांश पर है लेकिन काला सागर में डेन्यूब नदी और वोल्गा नदी के गिरने के कारण काला सागर की लवणता कम और कैस्पियन सागर की लवणता अधिक है।

5. तटीय आकृति-

       जिन क्षेत्रों में समुद्र का किनारा सीधा और सपाट है वहाँ पर जल का मिश्रण आसानी से हो जाता है। जबकि अधिक कटे-फटे तटीय क्षेत्रों में जल का मिश्रण आसानी से नहीं हो पाता है जिसके कारण ऐसे क्षेत्रों में लवणता अधिक पाई जाती है।

6. ज्वालामुखी उदगार की क्रिया-

        प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर और भूमध्यसागर में कई जीवित ज्वालामुखी पाये जाते हैं। इन ज्वालामुखी उदगारों के कारण जल वाष्पीकृत होते है और लवणता को बढ़ा देते हैं। ज्वालामुखी उदगार के ही कारण अटलांटिक कटक के सहारे लवणता अधिक पायी जाती है।

7. वायुदाब-

       अधिक वायुदाब के कारण जल के सतह नीचे की ओर धँस जाता है जबकि निम्न वायुदाब क्षेत्रों में जल का सतह सामान्य जल स्तर से ऊपर उठा होता है। इस परिघटना के कारण समुद्री जलधाराएँ  उच्च जल स्तर वाले क्षेत्र से निम्न जलस्तर वाले क्षेत्र की ओर चलने लगते है जिसके कारण समुद्री लवणताएँ प्रभावित होती है।

       इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री लवणता को कई कारक प्रभावित करते हैं।

लवणता का वितरण

         विश्व के सभी महासागर आपस में जुड़े हुए हैं। इसीलिए बड़े महासागर और छोटे महासागरों के लवणता में कोई विशेष अंतर नहीं पायी जाती है। लेकिन धरातल  पर कुछ ही जलाशय हैं जो समुद्र से जुड़े हुए नहीं हैं। ऐसे ही बंद सागरों की लवणता खुली सागरों की तुलना में अधिक है। सामान्य तौर पर समुद्री लवणता का अध्ययन दो शीर्षकों में बाँटकर किया जा सकता है-

(A) क्षैतिज लवणता

(B) लम्बवत लवणता

(A) क्षैतिज लवणता

      इसके अंतर्गत महासागरीय लवणता का वितरण का अध्ययन अक्षांशीय आधार पर किया जाता है। सामान्यतः पृथ्वी को दो भागों में बाँटा जाता है- उत्तरी गोलार्द्ध एवं  दक्षिणी गोलार्द्ध। 

     उत्तरी गोलार्द्ध में महासागर का विस्तार कम और महाद्वीपों का विस्तार अधिक हुआ है। जबकि दक्षिणी  गोलार्द्ध में सागर का विस्तार अधिक और स्थल का विस्तार कम हुआ है। यही कारण है कि उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी  गोलार्द्ध के पानी में लवणता कम पायी जाती है। दोनों गोलार्द्धों में समुद्री लवणता के अक्षांशीय वितरण को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है-

अक्षांशीय क्षेत्र उत्तरी गोलार्द्ध में लवणता दक्षिणी गोलार्द्ध में लवणता प्रमुख कारण
0°–10° (भूमध्यरेखीय क्षेत्र) कम (≈ 34‰) कम (≈ 34‰) अधिक वर्षा, नदियों का मीठा जल
10°–20° मध्यम मध्यम वर्षा में कमी, वाष्पीकरण बढ़ता
20°–30° (उपोष्ण कटिबंध) अधिकतम (≈ 36–37‰) अधिकतम (≈ 36‰) तीव्र वाष्पीकरण, कम वर्षा
30°–40° घटती हुई घटती हुई पश्चिमी पवनों से वर्षा
40°–60° कम कम कम तापमान, हिम पिघलना
60°–90° (ध्रुवीय क्षेत्र) बहुत कम (≈ 30–32‰) बहुत कम (≈ 30–32‰) हिम गलन, न्यून वाष्पीकरण
   उपरोक्त तालिका के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी गोलार्द्ध की लवणता कम होती है। लेकिन समुद्री लवणता के वितरण को आधार बनाकर विश्व के महासागरीय क्षेत्र को सामान्य रूप से चार भागों में वर्गीकृत कर अध्ययन करते है।

(1) अत्यधिक लवणता वाले क्षेत्र

(2) अधिक लवणता वाले क्षेत्र

(3) निम्न लवणता वाले क्षेत्र

(4) अति निम्न लवणता वाले क्षेत्र

(1) अत्यधिक लवणता वाले क्षेत्र-

     इसके अंतर्गत वैसे सागरों एवं झीलों को शामिल किया जाता है जिनकी औसत लवणता 40 ०/०० से अधिक है। इसके अंतर्गत उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र के बन्द सागर एवं झील आते है। ये वे क्षेत्र है जहाँ वाष्पीकरण अधिक एवं जलापूर्ति या वर्षा कम होती है। यह सामान्यतः 30° से 35° अक्षांश के बीच के क्षेत्र है। इन्ही क्षेत्रों में मरुस्थलीय एवं अर्द्धमरुस्थलीय जलवायु पायी जाती है। विश्व में सर्वाधिक लवणता रखने वाला मृत सागर (340‰), वानगोलू/वुलर झील (330 ‰), ग्रेट बेसिन (220 ‰), ऑस्ट्रेलिया के आयर झील आते है। इसके अलावे लाल सागर, पार्सियन की खाड़ी, कैस्पियन सागर, भूमध्य सागर के अफ्रीकी तट और जिब्राल्टर के मुहाना पर भी समुद्री लवणता 40 ‰ से अधिक पायी जाती है।

(2) अधिक लवणता वाले क्षेत्र-

      इसके अंतर्गत 30 से 40 ‰ लवणता रखने वाले जलाशयों को शामिल करते है। भौगोलिक वितरण की दृष्टि से विषुवतीय क्षेत्र 5º से 5º को छोड़कर 5º से 30º अक्षांश वाले क्षेत्र को और 45° से 50° अक्षांश के मध्य दोनों गोलार्द्धों में लवणता अधिक पायी जाती है। 40° से 50° अक्षांश के बीच गर्म समुद्री जलधारा के कारण लवणता अधिक पायी जाती है। जबकि 5° से 30° अक्षांश के बीच वर्षा एवं वाष्पीकरण में विभिन्नता के कारण लवणता अधिक पायी जाती है।

(3) निम्न लवणता वाले क्षेत्र- 

      इसके अंतर्गत 20 से 30 ‰ लवणता वाले क्षेत्र को शामिल करते है। इसके अंतर्गत मुख्यतः तीन क्षेत्र आते है-

(क) विषुवतीय क्षेत्र के महासागरों में 5°N से 5°S के बीच। यहाँ पर लवणता कम होने का प्रमुख कारण वर्षा अधिक और वाष्पीकरण का कम होना है।

(ख) 35° से 45°अक्षांश के बीच

(ग) 55° अक्षांश से ध्रुव (90° अक्षांश) तक

      विषुवतीय क्षेत्रों में निम्न लवणता का एक प्रमुख कारण बड़ी-बड़ी नदियों का समुद्र में गिरना भी है। जैसे- जायरे एवं अमेजन नदी अपना मुहाना विषुवतीय क्षेत्रों में ही बनाती है। यही कारण है कि इनके मुहाने पर औसत लवणता 10 ‰ तक पहुँच जाती है।

      उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में न्यून लवणता का प्रमुख कारण सूर्य के तापीय प्रभाव का कम होना है। सूर्य के कम तापीय प्रभाव के कारण वाष्पीकरण की क्रिया भी कम होती है। इसके अलावे उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में ध्रुवीय हिम शीलाखण्ड और सेंटलॉरेन्स, राईन, एनेसी, ओब, लीना, जैसे नदियों के द्वारा बड़े पैमाने पर जलापूर्ति की जाती है।

(4) अति निम्न लवणता वाले क्षेत्र- 

       इसके अंतर्गत 20‰ से कम लवणता वाले क्षेत्रों को शामिल करते है। इसके अंतर्गत उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों के बन्द सागर और झील को शामिल करते है। उच्च अक्षांशीय क्षेत्र में शामिल होने के कारण यहाँ वाष्पीकरण कम होता है और हिमानियों के द्वारा स्वच्छ जल की आपूर्ति अधिक होती है।

      विश्व में सबसे कम लवणता बाल्टिक सागर के गल्फ ऑफ बोथनियाँ में गोटलैंड द्वीप (6 से 8 ‰) के पास पायी जाती है। इसके अलावे हड्सन की खाड़ी, कारा सागर, उजला सागर और बाल्टिक सागर की भी औसत लवणता बहुत कम पायी जाती है।

(B) लम्बवत लवणता का वितरण 

           महासागरों में लम्बवत दृष्टिकोण से भी लवणीय विषमता दिखाई पड़ती है। जैसे-

(i) विषुवतीय क्षेत्रों में सतह के ऊपर वर्षा अधिक होने के कारण लवणता कम पायी जाती है। जबकि लवण का घनत्व अधिक होने के कारण नीचे की ओर बैठने की प्रवृति होती है। इसी कारण से ऊपर से नीचे की ओर जाने पर विषुवतीय क्षेत्रों में लवणता अधिक मिलती है।

(ii) मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में 200 फैदम की गहराई तक लवणता में वृद्धि होती है। लेकिन उसके बाद लवणता में कमी आती है क्योंकि उपसतही जलधारा के कारण मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों के नीचले भागों में जलापूर्ति बढ़ जाती है।

(iii) ध्रुवीय क्षेत्रों के ऊपरी भागों में हिमशीलाखण्डों के पिघलने के कारण लवणता कम पायी जाती है। जबकि लवण के बैठने के कारण निचले भागों में लवणता अधिक पायी जाती है। सम्पूर्ण लम्बवत सागरीय लवणता के वितरण को नीचे के Flow Chart में देखा जा सकता है-

निष्कर्ष:

     इस प्रकार उपर्युक्त तथ्यों  से स्पष्ट है कि सागरीय लवणता में क्षैतिज एवं लम्बवत रूप से काफी विषमताएँ पायी जाती है। सागरीय लवणता में विषमता उतपन्न करने वाले कई कारक है। लेकिन इसके अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वर्षा और वाष्पीकरण लवणता को प्रभावित करने वाले दो सबसे प्रमुख कारक हैं।

नोट:

👉 वानगोलू झील (Lake Van) तुर्की के पूर्वी अनातोलिया क्षेत्र में स्थित एक अंत:स्थलीय खारी क्षारीय झील है। यह तुर्की की सबसे बड़ी झील है और समुद्र से कोई निकास नहीं रखती।

👉 मृत सागर

  • यह मध्य पूर्व (Middle East) में स्थित है।

  • इज़राइल और जॉर्डन की सीमा के बीच फैली हुई है।

  • यह पृथ्वी का सबसे निचला स्थल है (समुद्र तल से लगभग 430 मीटर नीचे)।

  • अत्यधिक लवणता के कारण इसमें जीव लगभग नहीं पाए जाते इसीलिए इसे मृत सागर कहा जाता है।

👉 ग्रेट बेसिन झील 

  • ग्रेट बेसिन झील उत्तरी अमेरिका के ग्रेट बेसिन क्षेत्र में स्थित है।
  • यह झील मुख्यतः Utah राज्य में पाई जाती है।
  • इसे सामान्यतः Great Salt Lake के नाम से जाना जाता है।
  • यह एक आंतरिक अपवाह (Inland Drainage) क्षेत्र की झील है, अर्थात इसका जल समुद्र तक नहीं पहुँचता।
  • अधिक वाष्पीकरण के कारण इसका जल अत्यधिक लवणीय (खारा) है।


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7. Temperature of Oceanic Water / सागरीय जल का तापमान

7. Temperature of Oceanic Water

(सागरीय जल का तापमान)



Temperature of Oceanic Water / सागरीय जल का तापमानTemperature of Oceanic Water

                 समुद्री जल ऊर्जा के अनेक स्रोतों से गर्म होने की प्रवृत्ति रखती है जिसे सागरीय तापमान कहते हैं। सागरीय जल को ऊष्मा कई स्रोतों से प्राप्त होती है। जैसे – सौर विकरण, रेडियो सक्रिय पदार्थों के विखंडन, ज्वालामुखी, सागरीय जल के दबाव एवं सागरीय जल के विभिन्न स्तरों के मध्य होने वाला घर्षण इत्यादि से। ऊर्जा के इन स्रोतों में से सबसे प्रमुख स्रोत सौर ऊर्जा है। सौर ऊर्जा स्थल और जल दोनों एक साथ प्राप्त करते हैं। लेकिन दोनों में तापमान ग्रहण करने की दर में अंतर होता है क्योंकि स्थल जल्दी गर्म होता है और जल्द ठंडा होने की प्रवृत्ति रखता है इसके विपरीत सागर जल देर से गर्म और देर से ठंडा होने की प्रवृत्ति रखता है। यही कारण है कि स्थल के औसत तापमान 15॰C की तुलना में सागरीय जल का औसत तापमान 17॰C होता है। समुद्री जल एवं स्थल के वार्षिक तापांतर में भी विभिन्नता पाई जाती है। जैसे- स्थल का वार्षिक तापांतर 145.5॰C है जबकि सागरीय जल का वार्षिक तापांतर 80॰C है क्योंकि समुद्री जल में लगातार मिश्रण होता रहता है। जबकि स्थलीय भाग में इस तरह का कोई मिश्रण नहीं होता है। सागरीय जल सूर्य विकिरण के अवशोषण, पृथ्वी के नितल द्वारा, संवहन, गतिज ऊर्जा, जलवाष्प का संघनन जैसे प्रक्रियाओं से गर्म होता है। उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि सागरीय जल कई स्रोतों से एवं कई प्रक्रियाओं से गर्म होने की प्रवृत्ति रखते हैं। इन प्रक्रियाओं को कई कारक प्रभावित करते हैं। जिसके कारण सागरीय जल के वितरण में विविधता पाई जाती है।

सागरीय जल के तापमान को प्रभावित करने वाले कारक
            समुद्री जल के तापमान को कई कारक प्रभावित करते हैं। जैसे:- 
(1) अक्षांशीय स्थिति
(2) समुद्री जलधारा
(3) प्रचलित वायु और वायुदाब
(4) लवणता
(5) तट रेखा की बनावट
(6) मेघावरण
(7) हेमशीलाखंड
(8) समुद्री जल का घनत्व
 
(1) अक्षांशीय स्थिति
             विषुवत रेखा (0 अक्षांश रेखा) या निम्न अक्षांशीय क्षेत्र सालों भर सूर्य की लंबवत किरण प्राप्त करते हैं जिसके कारण इस क्षेत्र के समुद्री भाग में तापमान अधिक होता है। जबकि ध्रुवीय प्रदेश में सूर्य की किरणें सालोंभर तिरछी पड़ती है। इसलिए यहां का तापमान काफी कम होता है। विषुवतीय प्रदेश का औसत समुद्री तापमान 25॰-26॰C के मध्य होता है जबकि आर्कटिक सागर का औसत तापमान शून्य से -1॰C से 1.9॰C होता है।
 
(2) समुद्री जल धारा
             यह ज्ञात है कि समुद्री जलधाराएं दो प्रकार की होती है -(i) गर्म जलधारा (ii) ठंडी जलधारा  गर्म जलधाराएं निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर चला करती है जबकि ठंडी जलधाराएं उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर चला करती है। जिसके कारण समुद्री जल के तापमान में स्थानांतरण की प्रक्रिया पाई जाती है उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह एक गर्म जलधारा है जिसके कारण उच्च अक्षांश के क्षेत्रों में स्थित बंदरगाहें खुली रहती है। जैसे नार्वे का हेमरफिस्ट और रूस का मरमंस्क बंदरगाह। दोनों लगभग एक ही अक्षांश पर स्थित है लेकिन समुद्री गर्म जलधारा के कारण हेमरफिस्ट का बंदरगाह सालोंभर खुला रहता है जबकि मरमंस्क बंदरगाह सालों भर लगभग बंद रहता है।
          अलनीनो और लानीनो ऐसी दो जलधाराएं हैं जिसके कारण समुद्री जल के तापमान में विविधता उत्पन्न होती है अलनीनो के कारण समुद्री जल के तापमान में 1-6॰C तक बढ़ोतरी होती है जबकि लानीनो के कारण समुद्री जल के तापमान में गिरावट आती है।
 
(3) प्रचलित वायु और वायुदाब
               समुद्री जल के तापमान का निर्धारक प्रचलित वायु और वायुदाब को भी माना जाता है। जैसे- उच्च वायुदाब वाले क्षेत्रों में समुद्र का जलस्तर नीचे जबकि निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों में समुद्र जल का स्तर ऊपर होता है जिसके कारण जल का प्रवाह उच्च जल स्तर से निम्न जलस्तर क्षेत्र की ओर होने लगता है। अगर जल का प्रवाह विषुवतीय निम्न वायुदाब से उपोष्ण उच्च वायुदाब वाले क्षेत्र की ओर हो रहा हो तो तापमान का हस्तांतरण निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर होता है। इसके विपरीत जब जल का प्रवाह उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र से उपोष्ण उच्च वायुदाब क्षेत्र की ओर हो रहा हो तो तापमान का स्थानांतरण उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर होता है।
           प्रचलित वायु मुख्यत: तीन है- (i) वाणिज्य हवा (ii)  पछुआ हवा और (iii) ध्रुवीय हवा। ये हवाएं समुद्री सतह पर हजारों किलोमीटर तक सतत चलने की प्रवृत्ति रखती है। वाणिज्यिक हवा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र से विषुवतीय क्षेत्र की ओर ध्रुवीय हवा ध्रुवीय उच्चभार से निम्न उपध्रुवीय भार की ओर, जबकि पछुआ हवा उपोष्ण उच्चभार से निम्न उपध्रुवीय वायुदाब क्षेत्र की ओर चला करती है ये हवाएं समुद्र से तापमान को ग्रहण भी करती है और समुद्री जल के तापमान को बढ़ाती है। यह वायु की प्रकृति पर निर्भर करती है जैसे ध्रुवीय वायु ठंडी होने के कारण मध्य अक्षांशीय क्षेत्र के जलीय तापमान को घटा देती है इसके विपरीत पछुआ हवा गर्म होने के कारण उच्च अक्षांश क्षेत्र के समुद्री तापमान को बढ़ा देती है।
 
(4) लवणता
              समुद्री लवणता के कारण जल का प्रवाह कम लवणता वाले क्षेत्र से अधिक लवणता वाले क्षेत्र की ओर होता है। जैसे- अटलांटिक महासागर की तुलना में भूमध्य सागर का लवणता अधिक है जिसके कारण अटलांटिक महासागर का जल भूमध्यसागर में प्रविष्ट करता रहता है जिसके फलस्वरूप भूमध्यसागर के औसत तापमान में 1-2C तापमान की कमी हो जाती है।
 
(5) तट रेखा की बनावट
            अगर कोई खुला समुद्र हो तो उसका तापमान कम होता है जबकि बंद सागरों का तापमान अधिक होता है जैसे विश्व के तीनों बड़े महासागरों में सबसे कम औसत समुद्री तापमान प्रशांत महासागर का और सबसे ज्यादा औसत समुद्र तापमान हिंद महासागर का है हिंद महासागर में भी लाल सागर और परसियन  की खाड़ी का तापमान अरब सागर की तुलना में अधिक है क्योंकि वे दोनों सागर स्थलीय भाग से घिरे हैं जिसके कारण समुद्री जल का मिश्रण नहीं हो पाता है।
 
(6) मेघावरण
            विषुवतीय क्षेत्र और शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात क्षेत्र में मेघावरण अधिक पाई जाती है। जिसके कारण सूर्य की रोशनी समुद्री सतह पर सतह नहीं पड़ पाती है जबकि उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र में आसमान सालोंभर साफ रहती है जिसके कारण समुद्री सतह सालोंभर सूर्यातप प्राप्त करती है फलत: समुद्री जल के तापमान में विभिन्नताएँ उत्पन्न होती है।
 
(7) हिमशीलखण्ड
                 ध्रुवीय क्षेत्रों में गर्म समुद्री जलधारा के कारण एवं ग्लोबल वार्मिंग के कारण सदियों से जमीन पिघल रहे हैं जिसके कारण यहां एक ओर समुद्री जल स्तर वृद्धि हो रही है वहीं दूसरी ओर समुद्री जल की औसत तापमान में कमी आ रही है।
 
(8) समुद्री जल का घनत्व
                समुद्री जल का घनत्व मूलतः लवणता से ही संबंधित है फिर भी अलग-अलग गहराई पर अलग-अलग समुद्री लवणता के कारण समुद्री जल में उदग्र रूप से कई स्तर पाए जाते हैं। जैसे – समुद्री जल के सबसे ऊपरी भाग में जब लवणता अधिक होती है तो उसका घनत्व भी अधिक हो जाता है जिसके कारण सौर विकरण के अवशोषण की क्षमता भी अधिक हो जाती है जबकि 100 फैदम गहराई के बाद लवणता में कमी के कारण दूसरी परत का निर्माण होता है फलत: ऊपरी परत की तुलना में निचली परत के तापमान में लगभग 1C कमी आ जाती है। अतः समुद्री जल के विभिन्न स्तर भी समुद्री तापमान को प्रभावित करने में सक्षम है।
 
सागरीय तापमान का वितरण
                समुद्री जल के तापमान का वितरण को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया जाता है:-
(i)  क्षैतिज वितरण 
(ii) लम्बवत वितरण
 
(i) क्षैतिज वितरण
               तीनों प्रमुख महासागरों के क्षैतिज तापमान को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है:-
Temperature of Oceanic Water
(ii) लम्बवत वितरण
              समुद्री जल के तापमान का लंबवत वितरण का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया है। इसके बावजूद समुद्री वैज्ञानिकों के द्वारा निम्नलिखित लम्बवत तापीय वितरण को मान्यता प्राप्त है:-
Temperature of Oceanic Water
निष्कर्ष

          इस तरह उपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री जल के क्षैतिज एवं उदग्र तापमान में काफी विषमता पाई जाती है।


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Indian Geography Capsule 1

भारत का भूगोल 

Indian Geography Capsule 1


Indian Geography Capsule 1

एक नजर में इन्हें जरुर देखें

1. भारत का अक्षांशीय विस्तार है-
उत्तर- 8°4′ से 37°6′ उत्तरी अक्षांश तक

2. भारत का देशांतरीय विस्तार है-
उत्तर- 68°7′ से 97°25′ पूर्वी देशांतर तक

3. भारत का कुल क्षेत्रफल है –
उत्तर- 32 लाख 87 हजार 263 वर्ग किलोमीटर

4. क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भारत का विश्व में स्थान है-
उत्तर- 7 वाँ ( 2.42%)

5. क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भारत से बड़े छः देश है-
उत्तर- रूस> कनाडा> संयुक्त राज्य अमेरिका> चीन> ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया

6. जनसँख्या के दृष्टिकोण से विश्व के 8 बड़े देश है-
उत्तर- चीन, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, इंडोनेशिया, ब्राजील, पकिस्तान, बांग्लादेश, और रूस

7. भारत के उत्तर से दक्षिण में विस्तार है-
उत्तर- 3214 किमी०

8. भारत के पूरब से पश्चिम में विस्तार है-
उत्तर- 2933 किमी०

9. भारत की आकृति कैसी है-
उत्तर- चतुष्कोणीय

10. भारत में सबसे पहले सूर्योदय किस राज्य में होता है-
उत्तर- अरूणाचल प्रदेश

11. भारत में सूर्यास्त सबसे बाद किस राज्य में होता है-
उत्तर- गुजरात

12. अरुणाचल प्रदेश और गुजरात राज्यों में सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय में अंतर है-
उत्तर- लगभग 2 घटा

13. भारत की स्थल-सीमा की कुल लम्बाई है-
उत्तर- 15200 किमी०

14. भारत के तटीय भाग की कुल लम्बाई है-
उत्तर- 7516.5 किमी०

15. भारत के मुख्य तटीय भूमि की लम्बाई है-
उत्तर- 6100 किमी०

16. भारत के 7 पड़ोसी देश का नाम है-
उत्तर- बांग्लादेश, चीन, पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार, भूटान और अफगानिस्तान

17. भारत की जल एवं स्थल सीमा से लगे देश है-
उत्तर- बांग्लादेश, म्यांमार और पाकिस्तान

18. भारत का सबसे दक्षिणतम बिंदु है-
उत्तर- इंदिरा पॉइंट (निकोबार द्वीप समूह)

19. भारत का उत्तरी बिंदु है-
उत्तर- इन्दिरा कॉल (जम्मू-कश्मीर)

20. भारत का पूर्वी बिंदु है-
उत्तर- वालांगू / किबिथु (अरुणाचल प्रदेश)

21. भारत के पश्चिमी बिंदु है-
उत्तर- सरक्रीक (गुजरात)

22. भारत में पूर्वी घाट को कहा जाता है-
उत्तर- कोरोमंडल तट

23. भारत में पश्चिमी घाट को कहा जाता है-
उत्तर- सह्याद्री

24. सबसे अधिक राज्यों को छूने वाला भारतीय राज्य है-
उत्तर- उत्तर प्रदेश (8)

Indian Geography Capsule 1
25. भारत में पर्वत, पठार एवं मैदान का प्रतिशत है-
उत्तर- क्रमश : 29.3, 27.7, 43

26. भारत की सबसे ऊँची चोटी है-
उत्तर- K2 / गौडविन ऑस्टिन (8611मीटर, काराकोरम श्रेणी में)

27. हिमालय की सबसे ऊँची श्रेणी है-
उत्तर- हिमाद्री

28. विश्व की सबसे ऊँची चोटी एवरेस्ट (नेपाल) हिमालय के किस श्रेणी में स्थित है-
उत्तर- हिमाद्री पर्वत श्रेणी में

29. भारत में हिमालय की सबसे ऊँची चोटी है-
उत्तर- कंचनजंघा (8598 मीटर, सिक्किम में)

30. जेलेप्ला और नाथूला दर्रा अवस्थित है-
उत्तर- सिक्किम में

31. बुर्जिल एवं जोजीला दर्रा अवस्थित है-
उत्तर- जम्मू-कश्मीर में

32. शिपकीला,रोहतांग और बारालाचा ला दर्रा अवस्थित है-
उत्तर- हिमाचाल प्रदेश

33.काराकोरम, पीरपंजाल तथा बनिहाल दर्रा अवस्थित है-
उत्तर- जम्मू-कश्मीर में

34. निति, माना तथा लिपुलेख दर्रा अवस्थित है-
उत्तर- उतराखंड

35. तुजु दर्रा अवस्थित है-
उत्तर- मणिपुर

36. जैलेप्ला, बोमडिला तथा यांग्याप दर्रा अवस्थित है-
उत्तर- अरुणाचल प्रदेश

37. भारत एवं चीन के बीच स्थित सीमा रेखा को कहते है-
उत्तर- मैकमोहन रेखा

38. भारत एवं पकिस्तान के बीच स्थित सीमा रेखा को कहते है-
उत्तर- रेडक्लिफ

39. पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान के बीच स्थित सीमा रेखा को कहते है-
उत्तर- डूरंड रेखा (आजादी के पूर्व भारत और अफगानिस्तान के बीच)

40. श्रीलंका और भारत को अलग करता है-
उत्तर- पाक जलसंधि और मन्नार की खाड़ी

41. भारतीय उपमहाद्वीप में सम्मलित देश है-
उत्तर- भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान

42. किस राज्य की तट रेखा सबसे अधिक लम्बी है-
उत्तर- गुजरात

43. भारत तटरेखा से लगे 9 राज्य है-
उत्तर- गुजरात, महारष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, ओड़िसा तथा पश्चिम बंगाल

44. बांग्लादेश से तीन ओर से घिरा राज्य है-
उत्तर- त्रिपुरा

45. असम एवं अरुणाचल प्रदेश के बीच सीमा बनाने वाली नदी है-
उत्तर- संकोश नदी

46. किस दर्रे के पास ब्रह्मपुत्र नदी भात में प्रवेश करती है-
उत्तर- यांग्याप दर्रे

48. जोजिला दर्रे का निर्माण किस नदी द्वारा हुआ है-

उत्तर- सिन्धु नदी

49. शिपकीला दर्रे का निर्माण किस नदी द्वारा हुआ है-
उत्तर- सतलज नदी

50. जैलेप्ला दर्रे का निर्माण किस नदी द्वारा हुआ है-
उत्तर- तिस्ता नदी


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नोट :  मैं आशा करता हूँ कि भारत का भूगोल से सम्बंधित सभी Capsule आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामनाता हूँ।

Thank You @ By Dr. Amar Kumar


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भूगोल- सामान्य भूगोल और भारत का भूगोल

इतिहास

राजनीतिशास्त्र

अर्थशास्त्र

जीवविज्ञान

भौतिकशास्त्र

रसायनशास्त्र

6. BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN / प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच

6. BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN

(प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच)


BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN / प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच       BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN                     

        प्रशांत महासागर तथा उसके तटवर्ती सागर सम्मिलित रूप से विश्व के एक तिहाई भाग पर फैले हुए हैं। प्रशांत महासागर एक विशाल त्रिभुज के आकार का है जिसका विस्तार उत्तर में बेरिंग जलडमरूमध्य तथा दक्षिण में अंटार्कटिका महाद्वीप के मध्य है। इसके पश्चिम में एशिया तथा आस्ट्रेलिया और पूर्व में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप है। प्रशांत महासागर उत्तर से दक्षिण 14000 किलोमीटर लंबा और भूमध्यरेखा पर इसकी चौड़ाई 16000 किलोमीटर से कुछ अधिक है। प्रशांत महासागर की औसत गहराई 4572 मीटर है। प्रशांत महासागर में छोटे-बड़े मिलाकर लगभग 20,000 द्वीप पाए जाते हैं। यदि पश्चिमी तट द्वीपों की भरमार से आवृत है तो पूर्वी तट पर इनकी संख्या विरल है।

          सामान्य तौर पर प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत करते हैं।

(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)
               
         प्रशांत महासागर के मग्नतट उसके तटवर्ती क्षेत्रों की संरचना और बनावट पर निर्भर करते हैं। प्रशांत महासागर के पूर्वी तट पर मग्नतटों की चौड़ाई बहुत कम है। उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तटों के समानांतर क्रमशः रॉकी और एंडीज पर्वत मालाओं की उपस्थिति के कारण मग्नतट प्रायः अत्याधिक सँकरे हो गए हैं। उनकी औसत चौड़ाई 80 किलोमीटर है परंतु प्रशांत महासागर के पश्चिमी भाग में पर्वतों अथवा पठारों की समानांतर श्रृंखला के अभाव में मग्नतट अधिक विस्तृत है।
        ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी-द्वीप समूह तथा एशिया महाद्वीप से सटे मग्नतट का अपेक्षाकृत अधिक चौड़े हैं। इनकी औसत चौराहे 160 से 1600 किलोमीटर तक पाई जाती है। इन ग्नतटों की औसत गहराई 1000 मीटर से अधिक नहीं है। इन मग्नतटों पर प्रशांत महासागर के अनेक द्वीप (क्यूराइल, जापान द्वीप, फिलीपाइन्स, इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड आदि)  तथा कई आंतरिक एवं सीमांत सागर (बेरिंगसागर, ओखोटस्क, जापान सागर, पीत सागर, चीन सागर सागर, जावा सागर, कोरल सागर आदि) स्थित है।
(2) महासागरीय कटक / श्रेणी (Ocean Ridges)
           
       प्रशांत महासागर में अटलांटिक महासागर तथा हिंद महासागर के समान मध्यवर्ती कटक नहीं है। कुछ बिखरे कटक अवश्य मिलते हैं। जैसे- पूर्वी प्रशांत कटक (अलबट्रास पठार) लॉर्डहोवे कटक, टुआमामार्ट कटक, कोकरा कटक, हवायन कटक, होंशू कटक इत्यादि इसमें प्रसिद्ध है। पूर्वी प्रशांत कटक जिसे अलबट्रास पठार के नाम से जानते हैं 1600 किलोमीटर की चौड़ाई में विस्तृत है।
         23°- 35° दक्षिणी अक्षांश के बीच इसकी दो शाखाएँ हो जाती है। पूर्वी शाखा चिली तट की ओर चली जाती है तथा पश्चिमी शाखा इस्टर्न आईलैंड राइज के नाम से दक्षिण की ओर चली जाती है। दूसरा प्रमुख कटक न्यूजीलैंड रिज है। ऑस्ट्रेलिया के ग्रेट बैरियर रीफ के पश्चिम में क्वींसलैंड पठार प्रमुख कटक है। मध्य प्रशांत महासागर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कटक हवायन उभार है जो 960 किलोमीटर चौड़ा और 2640 किलोमीटर लंबा है।
 
(3) महासागरीय बेसिन/ मैदान/ द्रोणी (Oceans Besins)
                    
         प्रशांत महासागर के नितल का अधिकांश भाग गहरे अंत: समुद्री मैदानों से बना है। अन्य महासागरों की तुलना में इसमें अपेक्षाकृत अधिक गहरे अंत: समुद्री मैदान मिलते हैं। तट से मैदानों के में उतरते ही अचानक गहराई में वृद्धि हो जाती है। प्रशांत महासागर में कैलीफोर्निया के तट पर उत्तरी-पूर्वी बेसिन, जापान के तट पर उत्तरी-पश्चिमी बेसिन, पेरू एवं चिली के तट पर दक्षिणी-पूर्वी प्रशांत बेसिन और आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर दक्षिणी-पश्चिमी प्रशांत बेसिन, न्यूजीलैंड एवं पूर्वी आस्ट्रेलिया के बीच तस्मानियाँ बेसिन, फिजी द्वीप के दक्षिण में फिजी बेसिन स्थित है।
(4) महासागरीय गर्त /खाई (Ocean Deeps)
       
        प्रशांत महासागर में अभी तक 32 गर्तों की खोज की गई है। प्रशांत महासागर के अधिकांश गर्त पश्चिमी प्रशांत में मिलते हैं। ये गर्त या तो द्वीपीय चापों या पर्वतीय श्रृंखलाओं के समांतर पाए जाते हैं। प्रशांत महासागर में ही विश्व का सबसे गहरा गर्त मेरियाना ट्रेंच (11.02 Km) है जो फिलीपींस दीप के पूर्वी भाग में स्थित है।
         विश्व का दूसरा सबसे गहरा गर्त टोंगा गर्त (5022 मैदम) दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित है। इसके अतिरिक्त प्रशांत महासागर में क्यूराइल, फिलीपाइन, करमाडेक, पेरू-चिल्ली, अल्यूशियन, मध्य अमेरिका, रिक्यू, नीरो, मरे, ब्रूक, बेली, प्लानेट इत्यादि प्रमुख गर्त हैं।
निष्कर्ष

      उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच में भी अनेक विविधतापूर्ण विशेषताएँ मौजूद है। प्रशांत महासागरीय भूपटल भी महाद्वीपीय भूपटल के समान काफी जटिल संरचना वाले भूपटल है।


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आपदा काल में वैकल्पिक संचार व्यवस्था / बिहार बोर्ड-10 Geography Solutions खण्ड (ख) इकाई-5.

बिहार बोर्ड वर्ग-10वाँ Geography Solutions
खण्ड (ख) 

इकाई-5. आपदा काल में वैकल्पिक संचार व्यवस्था

आपदा काल में वैकल्पिक संच


आपदा काल में वैकल्पिक संचार व्यवस्था

वस्तुननिष्ठ प्रश्नोत्तर
1. सामान्य संचार व्यवस्था के बाधित होने का मुख्य कारण है-
(a) केबुल का टूट जाना
(b) संचार टावरों की दूरी
(c) टावरों की ऊँचाई में कमी
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- (a) केबुल का टूट जाना
2. संचार का सबसे लोकप्रिय साधन है-
(a) सार्वजनिक टेलीफोन
(b) मोबाइल
(c) वॉकी-टॉकी
(d) रेडियों
उत्तर- (b) सार्वजनिक टेलीफोन
3. सुदूर संवेदी उपग्रह (रिमोट सेंसिंग उपग्रह) का प्रयोग किसलिए होता है?
(a) दूर संचार के लिए
(b) मौसम विज्ञान के लिए
(c) संसाधनों की खोज एवं प्रबंधन हेतु
(d) दूरदर्शन के लिए
उत्तर- (b) संसाधनों की खोज एवं प्रबंधन हेतु
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. सामान्य संचार व्यवस्था के बाधित होने के प्रमुख कारणों को लिखिए।
उत्तर – सामान्य संचार व्यवस्था के बाधित होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित है-
◆ केबल टूट जाने,
◆ बिजली आपूर्ति का बाधित होना,
◆ संचार भवनों के ध्वस्त होने पर संचार यंत्रों का क्षतिग्रस्त हो जाना, और
◆ ट्रांसमीशन टावर का क्षतिग्रस्त हो जाना, इत्यादि।
प्रश्न 2. प्राकृतिक आपदा में उपयोग होने वाले किसी एक वैकल्पिक संचार माध्यम की चर्चा कीजिए।
उत्तर – प्राकृतिक आपदा में उपयोग होने वाले वैकल्पिक संचार माध्यम में रेडियो संचार, एमेच्योर अथवा हेम रेडियो तथा उपग्रह संचार है।
रेडियो संचार- रेडियो तरंग इलेक्ट्रोमैग्नेटिक होती है, जिसे एंटीना द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्रेषित किया जाता है। रेडियो तरंगे निम्न, उच्च और अत्यधिक उच्च फ्रीक्वेंसी की हो सकती है। रेडियो रिसीवर को किसी खास फ्रीक्वेन्सी पर रखकर हम खास संकेत प्राप्त कर सकते है । जैसे, लंबी दूरी से सम्पर्क साधने के लिए उच्च फ्रीक्वेंसी की तरंगों तथा बहुत अधिक फ्रीक्वेंसी वाली तरंगों का प्रयोग कम दूरी के लिए किया जाता है। अत्यधिक उच्च फ्रीक्वेन्सी के बैंडों का प्रयोग हाथ वाला वायरलेस कहा जाता है वाकी-टॉकी जैसे बिना तार के यंत्रों का प्रयोग ऐसे समय में महत्वपूर्ण होता है।
 
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. प्राकृतिक आपदा में वैकल्पिक संचार माध्यमों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर – प्राकृतिक आपदा में उपयोग होने वाले वैकल्पिक संचार माध्यम में रेडियो संचार, एमेच्योर अथवा हेम रेडियो तथा उपग्रह संचार है।
रेडियो संचार- रेडियो तरंग इलेक्ट्रोमैग्नेटिक होती है, जिसे एंटीना द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्रेषित किया जाता है। रेडियो तरंगे निम्न, उच्च और अत्यधिक उच्च फ्रीक्वेंसी की हो सकती है। रेडियो रिसीवर को किसी खास फ्रीक्वेन्सी पर रखकर हम खास संकेत प्राप्त कर सकते है। जैसे, लंबी दूरी से सम्पर्क साधने के लिए उच्च फ्रीक्वेंसी की तरंगों तथा बहुत अधिक फ्रीक्वेंसी वाली तरंगों का प्रयोग कम दूरी के लिए किया जाता है। अत्यधिक उच्च फ्रीक्वेन्सी के बैंडों का प्रयोग हाथ वाला वायरलेस कहा जाता है वाकी-टॉकी जैसे बिना तार के यंत्रों का प्रयोग ऐसे समय में महत्वपूर्ण होता है।
एमेच्योर अथवा हेम रेडियो- एमेच्योर रेडियो को हेम रेडियो भी कहा जाता है। इसके लिए आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता नहीं होती है। वास्तव में हेम रेडियो में कुछ विशेष फ्रीक्वेंसी की तरंगों का प्रयोग अन्तर्राष्ट्रीय दूर संचार नियमों के अनुसार होती है, जिनका नियंत्रण भारत में संचार मंत्रालय के अधीन बेतार प्रयोजन एवं समन्वय स्कन्ध द्वारा किया जाता है। एमेच्योर अथवा हेम रेडियो ने बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में अन्य संचार साधनों के अवरुद्ध होने पर भी सफलतापूर्वक कार्य किया है। इस प्रकार इसे वैकल्पिक संचार माध्यमों में सबसे अधिक प्रभावशाली अनुभव किया गया है। 1999 में उड़ीसा में आए भीषण चक्रवात (Super Cyclone) और 2001 में गुजरात में भूकम्प के दौरान एमेच्यूर स्वंयसेवकों ने प्रशंसनीय सेवा प्रदान की है।
उपग्रह संचार-  इस प्रणाली में रेडियो में रिले स्टेशन तथा संचार उपग्रह अंतरिक्ष मे होता है और पृथ्वी पर घटने वाली किसी भी प्राकृतिक आपदा से इसे कोई नुकसान नहीं होता है इसीलिए यह विधि आपदा के समय अधिक विश्वसनीय है।
                             आपदा प्रबन्धन में सर्वाधिक उपयोग में लाया जानेवाला संचार साधन उपग्रह फोन है। यह फोन बहुत ही विश्वसनीय साफ आवाज में डाटा संचार की सुविधा प्रदान करता है। भारत सरकार द्वारा विभिन्न राज्यों/जिलों और आपदा प्रभावित क्षेत्रों को आपदाओं से निपटने के लिए पोर्टेबल उपग्रह फोन से लैस कर रही है।
प्रश्न 2. निम्नलिखित पर नोट लिखिए।
(i) हेम रेडियों- एमेच्योर रेडियो को हेम रेडियो भी कहा जाता है। इसके लिए आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता नहीं होती है। वास्तव में हेम रेडियो में कुछ विशेष फ्रीक्वेंसी की तरंगों का प्रयोग अन्तर्राष्ट्रीय दूर संचार नियमों के अनुसार होती है, जिनका नियंत्रण भारत में संचार मंत्रालय के अधीन बेतार प्रयोजन एवं समन्वय स्कन्ध द्वारा किया जाता है। एमेच्योर अथवा हेम रेडियो ने बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में अन्य संचार साधनों के अवरुद्ध होने पर भी सफलतापूर्वक कार्य किया है। इस प्रकार इसे वैकल्पिक संचार माध्यमों में सबसे अधिक प्रभावशाली अनुभव किया गया है। 1999 में उड़ीसा में आए भीषण चक्रवात (Super Cyclone) और 2001 में गुजरात में भूकम्प के दौरान एमेच्यूर स्वंयसेवकों ने प्रशंसनीय सेवा प्रदान की है।
(ii) उपग्रह संचार- इस प्रणाली में रेडियो में रिले स्टेशन तथा संचार उपग्रह अंतरिक्ष मे होता है और पृथ्वी पर घटने वाली किसी भी प्राकृतिक आपदा से इसे कोई नुकसान नहीं होता है इसीलिए यह विधि आपदा के समय अधिक विश्वसनीय है।

        आपदा प्रबन्धन में सर्वाधिक उपयोग में लाया जानेवाला संचार साधन उपग्रह फोन है। यह फोन बहुत ही विश्वसनीय साफ आवाज में डाटा संचार की सुविधा प्रदान करता है। भारत सरकार द्वारा विभिन्न राज्यों/जिलों और आपदा प्रभावित क्षेत्रों को आपदाओं से निपटने के लिए पोर्टेबल उपग्रह फोन से लैस कर रही है।


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आपदा और सह-अस्तित्व / बिहार बोर्ड-10 Geography Solutions खण्ड (ख) इकाई 6.

बिहार बोर्ड वर्ग-10वाँ Geography Solutions

खण्ड (ख) 

इकाई 6. आपदा और सह-अस्तित्व

आपदा और सह


आपदा और सह-अस्तित्व

वस्तुननिष्ठ प्रश्नोत्तर

1. निम्नलिखितमें कौन प्राकृतिक आपदा है?
(a) आग लगना
(b) बम विस्फोट
(c) भूकंप
(d) रासायनिक दुर्घटनाएँ
उत्तर- (c) भूकंप
2. भूकंप संभावित क्षेत्रों में भवनों की आकृति कैसी होनी चाहिए?
(a) अण्डाकार
(b) त्रिभुजाकार
(c) चौकोर
(d) आयताकार
उत्तर- (d) आयताकार
3. भूस्खलन वाले क्षेत्र में ढलान पर मकानों के निर्माण क्या है?
(a) उचित
(b) अनुचित
(c) लाभकारी
(d) उपयोगी
उत्तर- (b) अनुचित
4. सुनामी प्रभावित क्षेत्र में मकानों के निर्माण कहाँ करना चाहिए?
(a) समुद्र के निकट
(b) समुद्र तट से दूर
(c) समुद्र तट से दूर ऊँचाई पर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- (c) समुद्र तट से दूर ऊँचाई पर
5. बाढ़ से सबसे अधिक हानि होती है-
(a) फसल को
(b) पशुओं को
(c) भवनों को
(d) उपरोक्त सभी को
उत्तर- (d) उपरोक्त सभी को
 
6.कृषि सुखाड़ होता ही-
(a) जल के अभाव में
(b) मिट्टी की नमी के अभाव में
(c) मिट्टी के क्षय के कारण
(d) मिट्टी की लवणता के कारण
उत्तर- (b) मिट्टी की नमी के अभाव में
 
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. भूकम्प के प्रभावों  को कम करने वाले उपायों को लिखिए।
उत्तर – भूकम्प के प्रभावों को कम करने के लिए निम्नलिखित उपायों करना चाहिए-
◆  दो मकानों के बीच की सड़कों या गलियों को चौड़ा रखना चाहिए।
◆  मकान छोटा और आयताकार बनाना चाहिए।
◆  नींव को मजबूत एवं भूकम्परोधी होनी चाहिए।
◆ दरवाजे तथा खिड़कियों की स्थिति भूकम्परोधी होनी चाहिए।
◆ लंबी दीवारों को सहारा देने हेतु ईंट-पत्थर या कंक्रीट के कॉलम होने चाहिए।
 प्रश्न 2. सुनामी सम्भावित क्षेत्रों में गृह निर्माण पर अपना विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर- सुनामी संभावित क्षेत्रों में ऐसे मकान का निर्माण हो जो भूकम्प एवं सुनामी लहरों के प्रभाव को न्यून कर सके।
प्रश्न 3. सुखाड़ में मिट्टी की नमी को बनाये रखने के लिए आप क्या करेंगे।
उत्तर- सुखाड़ जैसे प्राकृतिक आपदा को विभिन्न विधियों को अपनाकर इसकी विभीषिका को कम किया जा सकता है। जैसे, जल संसाधन का वैज्ञानिक विकास और प्रबंधन द्वारा जल की समस्या का समाधान किया जा सकता है; क्योंकि सुखाड़ के समय जल के अभाव से न केवल मिट्टी की नमी समाप्त हो जाती है, बल्कि सभी प्राणियों को जान तक बचाना मुश्किल हो जाता है। जल विभाजक के विकास की योजना ऐसी स्थिति में बहुत सहायक होती है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न1.भूस्खलन अथवा बाढ़ जैसी प्राकृतिक विभीषिकाओं का सामना आप किस प्रकार कर सकते हैं। विस्तार से लिखिए।

उत्तर- भूस्खलन अथवा बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का होना स्वभाविक है, इसे रोका नहीं जा सकता है बल्कि इसके मुकाबले/सामना के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए और आपदा पूर्व ही तैयारी करनी चाहिए ताकि कम से कम क्षति हो सके और याधिक से अधिक लोगों को जान-माल सुरक्षा मिल सके। ऐसा न हो कि हम यह समझ कर नजर अंदाज कर दें कि यह सब एक प्राकृतिक प्रकोप है, इसका सामना करना मनुष्य के लिए असंभव है।


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