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7. Cause and Effect of Global Warming (भूमंडलीय उष्मण के कारण एवं परिणाम)

7. Cause and Effect of Global Warming 

(भूमंडलीय उष्मण के कारण एवं परिणाम)


Cause and Effect of Global Warming 

भूमंडलीय उष्मण के कारण एवं परिणाम⇒Cause and Effect of Global Warming

           भू-मंडल के निरंतर बढ़ते हुए तापमान को ‘भूमंडलीय उष्मण’ कहा जाता है। इसे ‘ग्लोबल वार्मिंग’ या ‘वैश्विक तापन’ के नाम से भी जाना जाता है। भूमंडलीय उष्मण वर्तमान समय की प्रमुख विश्वव्यापी पर्यावरणीय समस्या है। वायुमंडल में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड गैस पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने वाली प्रमुख गैस है। इसके अलावा मिथेन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, नाइट्रस ऑक्साइड, हैलोन आदि ग्रीन हाउस गैसें भी भूमंडलीय उष्मण वृद्धि में योगदान देती है। ये गैसें दीर्घ तरंगी पार्थिव विकिरण को वायुमंडल से बाहर जाने से रोक देती है। परिणाम स्वरूप तापमान बढ़ने से पृथ्वी का ताप संतुलन बिगड़ जाता है। भूमंडलीय तापमान में इस वृद्धि को ही वैज्ञानिक शब्दावली में ‘ग्लोबल वार्मिंग’ करते हैं।

         सौर विकिरण ऊर्जा का लगभग 51% भाग लघु तरंगों के रूप में वायुमंडल को पार कर पृथ्वी के धरातल पर पहुंचता है। पृथ्वी का वायुमंडल लघु तरंग सौर्यीक विकिरण के लिए पारदर्शी होता है। अतः सौर विकरण बिना किसी रूकावट के धरातल पर पहुँचता है।लघु तरंगें पृथ्वी से टकराकर ऊष्मा में परिवर्तित हो जाती है। यह ऊष्मा दीर्घ तरंगों को अवशोषित कर लेती है तथा ऊष्मा की तरंगों को वायुमंडल से बाहर जाने से रोक देती है।

      पार्थिव विकिरण (दीर्घ तरंग) अवरुद्ध हो जाने से पृथ्वी के धरातल का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। ऐसी अवस्था में वायुमंडल ‘ग्रीन हाउस’ के शीशे की भाँति काम करता है और पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हो जाती है। इसे ‘ग्रीन हाउस प्रभाव’ कहा जाता है।Cause and Effect of Global Warming

       निरंतर बढ़ता हुआ सान्द्रण भूमंडलीय तापमान में वृद्धि के लिए उत्तरदायी है। 1861 के बाद पृथ्वी के तापमान में निरंतर वृद्धि हो रही है क्योंकि 1861 से तापमान संबंधी उपकरणों द्वारा अंकित विश्वसनीय आँकड़े उपलब्ध है। ग्लोबल वार्मिंग के संबंध में उचित जानकारी प्राप्त करने हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1988 में ‘Inner Governmental Pannel on Climate Change (IPCC) का गठन किया।

         1995 ई० में UNO द्वारा गठित IPCC के अंतर्गत दो हजार वैज्ञानिकों ने वैश्विक तापमान के संबंध में आँकड़े एकत्रित किये जिससे यह साबित हुआ कि विश्व के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार 1861 से 1990 तक पृथ्वी का औसत तापमान में 0.6℃ की वृद्धि हुई जो 2020 तक बढ़कर 1.5℃ तक होने की संभावना है। WHO के अनुसार 1900-1990 के बीच विश्व के तापमान में 0.5℃ तापमान में वृद्धि हुई है। विश्व में तापमान बढ़ने के अगर यही प्रवृत्ति रही तो 2050 ई० तक विश्व का औसत तापमान बढ़कर 19℃ हो जाने की संभावना है।

        वैश्विक तापन कोई नई घटना नहीं है। भूगर्भिक काल के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि कार्बोनिफेरस युग और प्लेस्टोसीन युग में कई बार हिमयुग एवं अंतर हिमानी का युग आया। हिमयुग के दौरान तापमान में कमी आ जाती थी और अंतरहिमयुग में तापमान में बढ़ोतरी हो जाती थी। लेकिन ये सभी प्रक्रियाएँ प्राकृतिक कारकों द्वारा नियंत्रित होती थी। लेकिन वर्तमान समय में हो रहे तापमान में वृद्धि मानव क्रिया की प्रतिक्रिया के फलस्वरुप हो रहा है। वैश्विक तापन किसी एक कार्य का परिणाम नहीं है बल्कि अनेक अंतर क्रियाओं की देन है।

भूमंडलीय उष्मण के कारण: 

       भूमंडलीय उष्मण के कई कारण हैं। इनमें प्रमुख कारण निम्नवत है-

(i) ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि,

(ii) वनीय ह्रास,

(iii) ताप विद्युत संयंत्रों की स्थापना,

(iv) ओजोन परत में छिद्रीकरण,

(v) एलनीनो जलधारा,

(vi) निर्माण कार्य,

(vii) जीवाश्म ईंधनों का दहन,

(viii) औद्योगिकरण,

(ix) नगरीकरण,

(x) जनसंख्या में वृद्धि इत्यादि।

(i) ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि-

            भूमण्डलीय उष्मण के लिए मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, हेलोन इत्यादि गैसें उत्तरदायी है। इन गैसों का सान्द्रण वायुमंडल में निरंतर बढ़ता जा रहा है। ये गैसें वायुमंडल में ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करती है। परिणामस्वरूप पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है। ग्रीन हाउस गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा भूमंडलीय ऊष्मण के लिये सर्वाधिक उत्तरदायी हैं।

       वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड बड़ी मात्रा में जीवाश्म ईंधन के जलने से, परिवहन साधनों से, औद्योगिकरण एवं नगरीकरण से, बढ़ती हुई जनसंख्या से प्राप्त हो रहा है। औद्योगिक क्रांति के पूर्व प्रतिवर्ष 2.8 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता था और उसका भी 30% भाग समुद्री वातावरण द्वारा अवशोषित कर लिया जाता था। 1997 में यह मात्रा बढ़कर 5.5 बिलियन टन प्रतिवर्ष हो गया। 2050 में इसका उत्सर्जन बढ़कर 5.6 बिलियन टन हो जाने की संभावना है। समुद्री वातावरण द्वारा इसकी अवशोषण की मात्रा नियत होने के कारण वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से वैश्विक तापन की समस्या उत्पन्न हुई है।

(ii) वनीय ह्रास-

      पेड़-पौधों कार्बन डाइऑक्साइड के अच्छे अवशोषक होते हैं। अर्थात पेड़-पौधे कार्बन डाइऑक्साइड भोजन निर्माण के दौरान ग्रहण करते हैं और ऑक्सीजन का उत्सर्जन करते हैं लेकिन जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के साथ वनों की अंधाधुंध कटाई ने विकट पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं।

      आवास एवं कृषि योग्य भूमि में विस्तार के कारण बीसवीं शताब्दी में उष्णकटिबंधीय वनों का तीव्र गति से ह्रास हुआ। भारत में प्रतिवर्ष अनुमानत: 17 लाख हेक्टेयर वनों की कटाई हो रही है। फलत: वनीय ह्रास के कारण कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण घटने से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ते जा रही है। इसके कारण भूमंडलीय ऊष्मण में वृद्धि हो रही है।

(iii) तापविद्युत संयंत्रों की स्थापना-

       विश्व में बढ़ती हुई विद्युत ऊर्जा की माँग एवं पूर्ति हेतु काफी संख्या में तापीय संयंत्रों की स्थापना की गई है। इन संयंत्रों में वृहत पैमाने पर जीवाश्म ईंधन का प्रयोग विद्युत उत्पादन हेतु किया जाता है। इसके कारण इससे भारी मात्रा में CO2, CO, NO2, NO, SO2, इत्यादि हानिकारक गैस उत्सर्जित होते हैं। ये सभी गैसें तापमान में वृद्धि के लिए उत्तरदायी माने जाते हैं।

(iv) ओजोन परत में छिद्रीकरण- 

       ओजोन परत के छिद्रीकरण से तात्पर्य वायुमंडल की ओजोन परत में ओजोन नामक विशिष्ट गैस की कमी हो जाने से है। ओजोन एक त्रि-परमाण्विक गैस है जिसमें ऑक्सीजन के 3 परमाणु (O3) होते हैं। ओजोन समताप मंडल में धरातल से 20 से 35 किलोमीटर की ऊँचाई तक सर्वाधिक पाई जाती है। इसी भाग को ‘ओजोन परत’ कहा जाता है।

      यह परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी के वायुमंडल में आने से रोक कर सुरक्षा कवच की तरह कार्य करती है किंतु विगत कुछ दशकों से मानवीय क्रियाकलापों द्वारा उत्सर्जित हानिकारक रसायनों जैसे- क्लोरोफ्लोरोकार्बन, नाइट्रस ऑक्साइड, कार्बन टेट्राक्लोराइड, क्लोरोफॉर्म और क्लोरीन इत्यादि के कारण ओजोन परत पतली होती जा रही है। जिसे ‘ओजोन छिद्रीकरण’ कहते हैं। ओजोन छिद्रीकरण भूमंडलीय उष्मण का एक प्रमुख कारण माना जाता है। 

(v) एलनीनो जलधारा- 

       अलनीनो उपसतही गर्म जलधारा है जो पेरू के तट से उत्पन्न होता है और विषुवत रेखा के सहारे पूर्वी अफ्रीका के तट तक फैल जाता है। इसके कारण समुद्र का तापमान 3℃ से 6℃ तक बढ़ जाता है। 1998 के पूर्व अलनीनो का प्रभाव चक्रीय रूप से 4 वर्ष के बाद दिखाई देता था। लेकिन 1998 के बाद इसका प्रभाव प्रत्येक वर्ष देखा जा रहा है। 

(vi) निर्माण कार्य- 

         बढ़ती हुई जनसंख्या के मद्देनजर लगातार निर्माण का कार्य जारी है। अर्थात शहर के नाम पर सीमेंट और कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं। यह ऐसे जंगल है जिनमें वृक्ष का अभाव है। इसके कारण ये थोड़ी सी ताप प्राप्त कर स्थानीय वातावरण को गर्म कर देते हैं। जैसे- वर्ष 1998 में शिकागो नगर का तापमान 50℃ पहुँच गया। वर्ष 2004 में फ्रांस के कई नगरों का तापमान इतना अधिक बढ़ गया कि लगभग 200 लोग लू लगने से मर गए।

         उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त जीवाश्म ईंधनों का दहन, औद्योगिकरण, नगरीकरण, उपभोक्तावादी जीवन, जनसंख्या वृद्धि इत्यादि के कारण भी भूमंडलीय उष्मण में वृद्धि हो रही है।

भूमण्डलीय उष्मण के परिणाम:- 

          भूमंडलीय उष्मण वर्तमान शताब्दी की सबसे बड़ी पर्यावरणीय समस्या है। 3 फरवरी 2007 में आई.पी.सी.सी. द्वारा जारी की गई विश्वसनीय रिपोर्ट में भूमंडलीय उष्मण के कारण उत्पन्न भयानक परिणामों की ओर संकेत किया गया है। इसके कारण पृथ्वी के वातावरण पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ सकते है:-

(i) समुद्री जल स्तर में वृद्धि- भूमंडलीय उष्मण के कारण ध्रुवीय क्षेत्रों तथा पर्वतीय हिमनदों के पिघलने से समुद्री जल स्तर के ऊपर उठने की आशंका है। इसके कारण तटीय इलाके जलमग्न हो जाएगे।

(ii) समुद्री जीवों पर संकट- तापमान वृद्धि का बुरा प्रभाव समुद्री जीवों पर भी पड़ेगा। उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव पर रहने वाले सील, पेंग्विन, व्हेल आदी समुद्री जीवों के नष्ट हो जाने की आशंका है।

(iii) जलवायु परिवर्तन- तापमान में वृद्धि के कारण मौसम में लगातार अभूतपूर्व परिवर्तन हो रहे हैं। परिणामस्वरूप अनावृष्टि, अतिवृष्टि, अकाल, लू और गर्म हवाओं का प्रकोप बढ़ने की संभावना है।

(iv) जमीन की उर्वरता में कमी- भू-मंडलीय उष्मण के कारण जमीन की उर्वरता घटने की आशंका है। परिणामस्वरूप फसल उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

(v) जैव विविधत का ह्रास- पृथ्वी के बढ़ते तापमान के कारण जैव-विविधता का ह्रास होने की आशंका है। कई जीव-जंतु और वनस्पतियाँ जलवायु परिवर्तन के कारण विलुप्त हो जाएगे।

(vi) प्रवाल भित्तियों का क्षरण- तापमान में बढ़ोतरी और असमान परिवर्तन के कारण विश्व प्रसिद्ध प्रवाल भित्तियाँ कुछ दशकों में नष्ट हो जायेंगे।

(vii) पर्वतीय हिमनदों का सिकुड़ना- तापमान में वृद्धि के कारण पर्वतीय हिमनद निरंतर पिघलते जा रहे हैं। जिन नदियों का उद्गम स्रोत पर्वतीय हिमनद है, उनमें भयंकर बाढ़ आने की आशंका है तथा हिमनद के नष्ट हो जाने से सदावाहिनी नदियों के सूखने का अंदेशा है। हिमालय क्षेत्र में कई हिमनद सिकुड़ते जा रहे हैं।

(viii) मानव स्वास्थ्य को खतरा- तापमान वृद्धि से मानव स्वास्थ्य को भी गंभीर खतरा है। जलवायु में परिवर्तन के कारण मध्य एवं उच्च अक्षांशों में कई जल जनित और कीटाणु जनित रोगों के फैलने की आशंका है। त्वचा कैंसर एवं आंखों से संबंधित बीमारियाँ बढ़ेंगी।

(ix) पारिस्थितिक असंतुलन- भूमंडलीय उष्मण के कारण पृथ्वी पर अवस्थित सभी पारिस्थितिक तंत्र में असंतुलन बढ़ रही है। परिणाम स्वरूप समस्त जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा।

(x) दावानल में वृद्धि- वैश्विक तापन के कारण दावानल में वृद्धि की संभावना है। USA के कैलिफोर्निया क्षेत्र, आस्ट्रेलिया तथा इंडोनेशिया के जंगलों में यह समस्या प्रतिवर्ष उत्पन्न होने लगी है।

(xi) ऊर्जा संकट- तापमान में वृद्धि के कारण मध्य अक्षांशीय प्रदेशों में एयर कंडीशनर, पंखा, कूलर आदि के अधिक प्रयोग से विद्युत खपत बढ़ेगी, जिससे ऊर्जा संकट उत्पन्न हो जाएगी।

भूमंडलीय उष्मण को नियंत्रित करने के उपाय:-

        भूमंडलीय उष्मण के नियंत्रण को लेकर विश्व स्तर  पर कई सम्मेलन और समझौते हुए जिनमें प्रथम विश्व सम्मेलन (1972) मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, (1987) पृथ्वी सम्मेलन, रियो डे जेनरियो (1992), क्योटो संधि (1997 व 2005), कोपनहेगन 2009 इत्यादि प्रमुख है। वर्ष 1997 में आयोजित क्योटो संधि 141 देशों द्वारा स्वीकार की गई कि 34 औद्योगिक राष्ट्रों का ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन वर्ष 1990 के स्तर से 5.2 प्रतिशत कम करना है। किंतु इस दिशा में कोई ठोस परिणाम दिखाई नहीं दिए। अमेरिका जो सबसे ज्यादा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करता है, स्वंय अपना हाथ पीछे खींचता नजर आ रहा है।

         भूमंडलीय उष्मण को कम करने की दिशा में निम्नलिखित कदमों के पहल की आवश्यकता है:-

(i) वनों की कटाई रोकते हुए भूमंडल के 33% भूभाग पर सघन वृक्षारोपण किया जाए ताकि अधिक उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण वृक्षों द्वारा किया जा सके।

(ii) कार्बन डाइऑक्साइड गैस का उत्सर्जन कम-से-कम किया जाए।

(iii) जनसंख्या तीव्र वृद्धि पर प्रभावी अंकुश लगाई जाए।

(iv) क्लोरो फ्लोरो कार्बन का उत्सर्जन कम-से-कम किया जाए, साथ ही इसके विकल्प की खोज की जाए।

(v) उर्जा प्रदूषण रहित तकनीकों का विकास हो और इसके अनुसंधान की ओर ध्यान दिया जाए।

(vi) प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग तथा वैकल्पिक स्रोत का विकास किया जाए।

(vii) पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने हेतु जन सहभागिता कार्यक्रमों को संचालित किया जाए।

(viii) अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ठोस और कारगर कानून बनाकर उसका दृढ़ता से अनुपालन किया जाए।

       अर्थात प्रत्येक विकसित और विकासशील दोनों देशों को मिलकर इस पर नियंत्रण रखना होगा। यदि समय रहते इस पर काबू नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हम सभी इससे झुलस जाएंगे और जल प्रलय की विभीषिकाओं से बच नहीं पाएंगे।

निष्कर्ष:-

       उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी का बढ़ता हुआ तापमान वर्तमान विश्व की सबसे गंभीर पर्यावरणीय समस्या है। यह समस्या मानवीय क्रियाकलापों की देन है। बेशक विकास की धारा को मोड़ा नहीं जा सकता है किंतु इसे मानवीय हित में इतना नियंत्रित तो अवश्य किया जा सकता है कि जिससे पृथ्वी पर मंडरा रहे इस गंभीर संकट को दूर किया जा सके। ऐसे विकास का कोई औचित्य नहीं है जिस कारण मानव अस्तित्व खतरे में पड़ जाए। पृथ्वी मानव के अलावा असंख्य जीव-जंतुओं एवं वनस्पतियों का भी घर है। अतः मानव को अपनी करतूतों पर लगाम लगानी चाहिए तथा “जियो और जीने दो” के सिद्धांत का पालन करते हुए पर्यावरण सुरक्षा में जुट जाना चाहिए।


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  6. Clouds (बादल)

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Clouds (बादल)⇒

Clouds (बादल)

संघनन- जल के गैसीय अवस्था से तरल या ठोस अवस्था में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को संघनन कहा जाता है। यदि हवा का तापमान ओसांक बिन्दु से नीचे पहुंच जाये तो संघनन की क्रिया प्रारंभ होती है। संघनन की प्रक्रिया पर वायु के आयतन, तापमान, वायुदाब एवं आर्द्रता का प्रभाव पड़ता है।

यदि संघनन हिमांक (Freezing Point) से नीचे होता है, तो तुषार (Frost), हिम (Snow) एवं पक्षाभ मेघ (Cirrus Cloud) का निर्माण होता है।

यदि संघनन हिमांक से ऊपर होता है तो ओस, कुहरा, कुहासा एवं बादलों का निर्माण होता है।

 यदि संघनन पृथ्वी के धरातल के समीप होता है तो ओस (Dew), पाला (Frost), कुहरा एवं कुहासे का निर्माण होता है।

 जब संघनन की क्रिया अधिक ऊँचाई पर होती है तो बादलों का निर्माण होता है।

ओस (Dew)- हवा का जलवाष्प जब संघनित होकर छोटी-छोटी बूंदों के रूप में धरातल पर पड़ी वस्तुओं (घास पत्तियों आदि) पर जमा हो जाता है, तो इसे ओस कहा जाता है। ओस के निर्माण के लिए साफ आकाश, लगभग शांत वायुमंडल, उच्च सापेक्षिक आर्द्रता एवं ठंडी तथा लंबी रात का होना आवश्यक है।

 ओस के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि तापमान हिमांक से ऊपर हो।

तुषार या पाला (Frost)- जब संघनन की क्रिया हिमांक से नीचे होती है (0°C या उससे कम पर) तो जलवाष्प जल कणों के बदले हिम कणों में परिवर्तित हो जाता है। इसे ही तुषार या पाला कहा जाता है। पाला के निर्माण के लिए उन सभी अन्य परिस्थितियों का होना आवश्यक है, जो ओस के निर्माण के लिए हैं।

नोट :- ओस या पाला ऊपर से नहीं गिरता है, बल्कि यह वहीं बनता है जहां हम इसे देखते हैं।

कुहरा (Fog)- कुहरा एक प्रकार का बादल है। जब जलवाष्प का संघनन धरातल के बिल्कुल समीप होता है तो कुहरे का निर्माण होता है। कुहरे में कुहासे की तुलना में जल के कण अधिक छोटे एवं सघन होते हैं।

कुहासा (Mist)- कुहासा भी एक प्रकार का कुहरा है, जिसमें कुहरे की अपेक्षा दृश्यता (Visibility) दूर तक रहती है। इसमें दृश्यता एक किलोमीटर से अधिक, परंतु दो किलोमीटर से कम होती है।

धुआंसा (Smog)- बड़े-बड़े शहरों में फैक्टरियों के निकट जब कुहरे में धुएं के कण मिल जाते हैं तो उसे धुआंसा (Smoke+Fog = Smog) कहा जाता है। धुआंसा कुहरे की तुलना में और अधिक सघन होता है एवं इसमें दृश्यता और भी कम होती है।

बादल (Clouds):- वायुमंडल में संघनन के पश्चात हिमकणों अथवा जलसीकरों (Droplets/Rain Drops) के समूह को बादल कहा जाता है। अर्थात् जब वायु का तापमान ओसांक (Dew-point) से नीचे गिर जाता है, तो जलवाष्प धूल तथा धुँए के कणों पर केन्द्रित होकर बादल का रूप धारण कर लेती है।

कुहरा (Fog)- जब 100 मीटर से कम दूरी दिखाई दे।

कुहासा (Mist)- जब 100 मीटर से अधिक दूरी दिखाई दे।

तुषार/पाला (Frost)- पानी से हिम बनना

बादलों का निर्माण प्रायः क्षोभमंडल के ऊपरी भाग में होता है। बादल निर्माण हेतु वायुमंडल में जलवाष्प का होना एक अनिवार्य तत्व है।  वायुमंडल में जलवाष्प की प्राप्ति मुख्यतः तीन प्रक्रियाओं से होती है। 

(i) वाष्पीकरण (Evaporation)

(ii) वाष्पोत्सर्जन 

(iii) उर्ध्वपातन

       किसी वाष्प या गैस का द्रव या ठोस के रूप में परिवर्तन होना संघनन कहलाता है। वस्तुतः संघनन वाष्पीकरण का उल्टा प्रक्रिया होता है। वाष्पीकरण में जल गैस के रूप में तब्दील करता है जबकि संघनन में गैस द्रव्य या ठोस के रूप में बदलता है। वाष्पीकरण में गुप्त ऊष्मा ग्रहण किया जाता है जबकि संघनन क्रिया में गुप्त ऊष्मा बाहर की ओर निकलता है।

 वायु में जितना जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता है उतना ही जलवाष्प मौजूद हो तो उसे संतृप्त वायु कहते हैं।

जिस वायु में जितना आर्द्रता ग्रहण करने की क्षमता है और अगर उतनी मात्रा में जलवाष्प मौजूद नहीं हो तो वैसी वायु को असंतृप्त वायु कहते हैं।

 अगर संतृप्त वायु का तापमान बढ़ा दिया जाए तो वह असंतृप्त वायु में तब्दील कर जाती है।

 जब असंतृप्त वायु का तापमान घटा दिया जाए तो वह संतृप्त वायु में बदल जाती है।

 जिस तापमान पर वायु संतृप्त हो जाती है उस तापमान को ओसांक बिंदु (Dew Point) कहते हैं।

 जल के वाष्पीकरण से वर्षण तक निम्नलिखित चरण पाये जाते है:-

जल का वाष्पीकरण- असंतृप्त वायु- ओसांक बिंदु- संतृप्त वायु- संघनन- वर्षण

 संतृप्त वायु में संघनन की क्रिया तब ही प्रारंभ होती है जब वायुमंडल में सूक्ष्म जलग्राही नाभिक प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। वायुमंडल में निम्नलिखित जलग्राही नाभिक मौजूद होते हैं।

1. लवण

2. सल्फर डाइऑक्साइड 

3. नाइट्रिक ऑक्साइड

डी. ब्रन्ट – वायुमंडल में 2000-5000 की संख्या में जल ग्राही नाभिक मौजूद रहने के बाद ही संघनन प्रारंभ होता है।

 जलग्राही कणों का आकार 0.01 माइक्रोन से 50 माइक्रोन तक होता है।

 जलग्राही नाविकों का तापमान सबसे कम होता है तभी उसके चारों ओर जलवाष्प का संघनन होता है। संघनन के पूर्व वायुमंडल की सापेक्षिक आर्दता 100% पहुँच जाती है।

 संघनन के बाद पहले धूंध या कुहासा उसके बाद कुहरा, कुहरा के बाद बादल और बादल के बाद जल बूँदों या हिमकणों का निर्माण होता है।

मेघाच्छान्नता का विश्व वितरण

        आकाश का जितना भाग मेघों से आच्छादित रहता है उसे  मेघाच्छान्नता कहते हैं। इसके वितरण नीचे के तालिका में देखा जा सकता है – 

 क्षेत्र-  मेघाच्छान्नता का विश्व में क्रम-  कारण- वर्षा

1. विषुवतीय क्षेत्र- दूसरे स्थान- संवहन धारा- सर्वाधिक

2. 30°-60° अक्षांश- प्रथम स्थान- शीतोष्ण चक्रवात- दूसरे स्थान पर

3. उपोष्ण कटिबंध उच्च वायुदाब – अति अल्प- प्रतिचक्रवात- अल्प

बादलों का वर्गीकरण

       बादलों का वर्गीकरण कई आधार पर किया जाता है। अन्तराष्ट्रीय मौसम विभाग ने 1932 ई० में बादलों को 3 वर्गों में बाँटा है-

1. अधिक ऊँचाई वाले बादल- 7-12 Km के बीच

2. मध्यम ऊँचाई वाले बादल- 2.5 -7 Km के बीच

3. निम्न ऊँचाई वाले बादल- 2.5Km के नीचे

1. अधिक ऊँचाई वाले बादल- 3 प्रकार

(i) Cirus Clouds (पक्षाभ बादल)

(ii) Cirro Stratus (पक्षाभ स्तरी बादल)

(iii) Cirro Cumulus (पक्षाभ कपासी बादल)

(i) Cirus Clouds (पक्षाभ बादल)-

        पक्षाभ बादल सबसे अधिक ऊँचाई पर बनने वाला बादल है। देखने में बच्चों के घुंघराले बाल या पंख की भांति होता है। बादलों में सूक्ष्म हिमकण पाए जाते हैं। जब यह आसमान में असंगठित रूप में मौजूद होता है तो मौसम साफ होने का सूचना देता है। लेकिन जब संगठित रूप से इसका विस्तार बहुत अधिक होता है तो मौसम खराब होने का सूचना देता है। इस बादल के कारण शाम के वक्त नैनाभिराम दृश्य (जो देखने में आकर्षित कर ले) उत्पन्न होता है।

(ii) Cirro Stratus (पक्षाभ स्तरी बादल)- 

         पक्षाभ स्तरी बादल 7 से 12 Km के बीच बनता है वर्गीकरण में इसे दूसरा स्थान प्राप्त है। इस कारण दूधिया और स्वरूप चादर के समान है। यह बादल सूर्य और चंद्रमा के चारों ओर प्रभामंडल (Halo) का निर्माण करते हैं। इस बादल की उपस्थिति बताती है कि निकट भविष्य में चक्रवात आने वाला है।

(iii) Cirro Cumulus (पक्षाभ कपासी बादल)-

         7-12 Km के बीच पाया जाता है। इसे वर्गीकरण में तीसरा स्थान प्राप्त है। इसकी संरचना रुई के ढेर के समान होती है। इसका रंग श्वेत होता है और इसका आकार लहरनुमा होता है।

        इसे मैकरल स्काई क्लाइड भी कहते हैं। ऐसे बादल से धरातल पर छाया का निर्माण नहीं होता।

2. मध्यम ऊँचाई वाले बादल- 2 प्रकार

(i) मध्य स्तरी बादल (Alto Stratus Clouds)

(ii) मध्य कपासी बादल (Alto Cumulus Clouds)

(i) मध्य स्तरी बादल (Alto Stratus Clouds):-

         यह मध्यम ऊँचाई का बादल है जो देखने में रुई के ढेर के समान होता है। इस बादल का रंग ग्रे या काला होता है। इससे कभी-कभी बूँदा-बूँदी होती है।

(ii) मध्य कपासी बादल (Alto Cumulus Clouds)

        इसे पताका मेघ कहा जाता है। यह भी रुई के ढ़ेर के समान होता है लेकिन इसका मध्य भाग काला या भूरा रंग का होता है जबकि बाहरी भाग चमकीला होता है। इस बादल के कारण कभी इंद्रधनुष का निर्माण होता है। ऐसे बादल पर्वतों के शिखर पर बनते हैं। इसलिए इसे पर्वतीय मेघ बादल कहा जाता है।

3. निम्न ऊँचाई वाले बादल- 3 प्रकार

(i) स्तरी कपासी बादल (Strato Cumulus Clouds

(ii) स्तरी बादल (Stratus Clouds)

(iii) स्तरी बर्षी बादल या बर्षा स्तरी बादल (Nimbo Stratus Clouds)

         निम्न ऊँचाई पर ही दो अन्य विशिष्ट प्रकार के बादल बनते है:-

(i) कपासी बादल 

(ii) कपासी बर्षी बादल

(i) स्तरी कपासी बादल (Strato Cumulus Clouds) 

        यह 300-2500 m के बीच बनती है। इसमें बादल के कई स्तर मिलते हैं। जिसके कारण पृथ्वी पर गहरा छाया उत्पन्न होता है। इस बादल में कई स्तर उत्पन्न होते हैं तथा इससे कभी-कभी भारी वर्षा होती है।

(ii) स्तरी बादल (Stratus Clouds) 
       यह कुहासा के समान होता है। इस बादल का निर्माण दो विपरीत स्वभाव वाली हवाओं के मिलने से उत्पन्न होता है। इस बादल के कारण आकाश लंबे समय तक धुंधला रहता है और बूँदा-बाँदी की संभावना रहती है।
(iii) स्तरी बर्षी बादल या बर्षा स्तरी बादल (Nimbo Stratus Clouds)
       इसे वर्षा वाला बादल भी कहते हैं क्योंकि इससे वर्षा अधिक होती है। यह बादल शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात के उष्ण वाताग्र के क्षेत्र में तथा उष्णकटिबंधीय चक्रवात के दौरान इस बादल का निर्माण होता है। इस बादल के कारण कभी-कभी ओले भी गिरते हैं।
कपासी बादल (Cumulus Clouds)
       इसका आकार फूल गोभी के समान होता है। इस बादल का निर्माण दोपहर के बाद विषुवतीय क्षेत्र में होता है। इस बादल का लम्बवत विस्तार अधिक होता है। यह बादल गर्जन एवं चमक के साथ वर्षा लाती है।
कपासी बर्षी बादल (Cumulo Nimbus Clouds)
          इसे थंडर क्लाउड या ओलावृष्टि या तूफान को जन्म देने वाला बादल कहा जाता है। इस बादल का आकार कीप के समान होता है। इस बादल के निचले भाग में वर्षा वाले बादल पाए जाते हैं। भारत में यह बादल मार्च-अप्रैल में बनता है। तड़ित झंझा, मूसलाधार वर्षा तथा ओला कपासी वर्षी बादल की प्रमुख विशेषता है।

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5. वर्षण / Precipitation

5. वर्षण / Precipitation


वर्षण (Precipitation)

             वर्षण का तात्पर्य जलचक्र के उस अवस्था से है जिसमें वायुमंडलीय आर्द्रता, जलबूँद, हिमकण या ओला के रूप में पृथ्वी की सतह पर गिरते हैं। जलबूँद एवं हिमकण का तात्कालिक स्रोत बादल होता है। बादलों का निर्माण संतृप्त वायु की संघनन क्रिया से होता है। बादलों का निर्माण बहुस्तरीय होता है।

      सामान्यत: निम्न ऊँचाई वाले बादल से जलबूंदों का वर्षण होता है जबकि ऊँचाई वाले बादल से हिमकणों का। जलबूँद या हिमकण का निर्माण जलग्राही नाभिक तापमान निम्न होने से प्रारंभ होता है। जलग्राही नाभिकों के चारों ओर जल के संघनन से जलबूँदों तथा हिमकणों का निर्माण होता है। जब संतृप्त वायु का तापमान गिर जाती है तो वायु आर्द्रता धारण करने की क्षमता खो देती है जिसके फलस्वरूप वर्षण की क्रिया प्रारंभ हो जाती है।

         मौसम वैज्ञानिकों ने वर्षण क्रिया को तीन वर्गों में बाँटा है:-

(1) हिम वर्षण

(2) जल वर्षण

(3) मिश्रित वर्षण

(1) हिम वर्षण – हिम वर्षण के  अंतर्गत हिमकण बादल से धरातल की ओर आते हैं। विश्व में हिमवर्षण के दो प्रमुख क्षेत्र है:-

(i) उच्च अक्षांशीय क्षेत्र 

(ii)उच्च पर्वतीय क्षेत्र

         उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में दोनों गोलार्ध के ध्रुवीय क्षेत्रों को शामिल करते हैं। आर्कटिक वृत्त के उत्तर और आर्कटिक वृत्त के दक्षिण हिमवर्षण सालों भर संपन्न होती है। उत्तरी कनाडा, ग्रीनलैंड, साइबेरिया और अंटार्कटिका हिमवर्षण के प्रमुख क्षेत्र है।

           ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में हिमालय,आल्प्स, रॉकी तथा एंडीज जैसे पर्वतीय क्षेत्रों को शामिल करते हैं। हिमवर्षण के लिए यह आवश्यक है कि वायुमंडल तथा धरातल का तापमान हिमांक बिंदु से नीचे होना चाहिए लेकिन अगर दोनों के तापमान में भिन्नता हुई तो सहिम वर्षण (Sleet Precipitation)  होता है।

       इस प्रकार का वर्षण प्रायः आर्द्र प्रदेशों में होता है। इसमें कभी-कभी जलबूंदों का वर्षा होता है तो कभी हिमकणों का। सहिम वर्षण के लिए साइबेरिया का क्षेत्र विश्व प्रसिद्ध है। साइबेरिया क्षेत्र में ही मकान का आकार त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय होता है। जिसे परमाफ्रास्ट (Perma Frost) के नाम से जानते हैं।

★ परमाफ्रास्ट शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग पेल्टियर महोदय ने किया था।

(2) जल वर्षण:-   

      जब बादल से धरातल की ओर जलबूँद के रूप में वर्षण का कार्य होता है तो उसे जल वर्षण कहते हैं। जल वर्षण में जलबूँदों का आकार भिन्न-भिन्न हो सकता है। जब जलबूँद हवा में तैरते रहते हैं तो उसे फुहारा कहते हैं। जल वर्षण उष्ण एवं शीतोष्ण जलवायु प्रदेशों की विशेषता है।  जलवर्षण के लिए वायुमंडलीय तापमान ओसांक बिंदु से नीचे लेकिन हिमांक बिंदु से ऊपर होना चाहिए। जल वर्षण प्रक्रिया के दृष्टि से वर्षा तीन प्रकार की होती है:-

(i) संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall)

(ii) पर्वतीय वर्ष (Orographic Rainfall)

(iii) चक्रवाती वर्षा (Cyclonic Rainfall)

(i) संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall):-  

       संवहनीय वर्षा विषुवतीय प्रदेशों की विशेषता है। विषुवतीय के क्षेत्रों में सालों भर उच्च तापमान के कारण तथा न्यूनतम कोरियालिस प्रभाव के कारण गर्म (उष्ण) जलवाष्प से युक्त वायु लंबवत रूप से ऊपर उठती है। ऊपरी वायुमंडल में ताप की कमी के कारण संघनन की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। जिससे प्रतिदिन दोपहर के बाद (3-4 बजे) वर्षा होती है।

       यह वर्षा 5°N से 5°S अक्षांश के बीच होती है।  इन प्रदेशों में औसत वार्षिक वर्षा 200 सेंटीमीटर से अधिक होती है। यह वर्षा प्रति दिन 4:00 बजे शाम के आस-पास होती है। इसीलिए इसे 4 O’Clock कहते है। इस वर्षा के प्रमुख तीन क्षेत्र निम्न है – अमेजन बेसिन, जायरे बेसिन तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया के द्वीपीय समूह।

वर्षण

        अफ्रीका के पूर्वी भाग और अमेजन बेसिन के पश्चिमी भाग में उच्चावच के प्रभाव के कारण संवहनीय वर्ष नही होती है।

(ii) पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall):- 

          पर्वतीय वर्षा में आर्द्र एवं उष्ण वायु पर्वतीय ढाल के सहारे अति ऊँचाई पर पहुँच जाते हैं। बढ़ते हुए ऊँचाई के साथ तापीय ह्रास के कारण वायु संतृप्त होती है। पुनः जब संतृप्त वायु का तापमान ओसांक बिंदु के नीचे चला जाता है तो वर्षण की क्रिया प्रारंभ हो जाती है।

           पर्वतीय वर्षा में जिस ढाल के सहारे वायु ऊपर की ओर चढ़ती है उस भाग को अभिमुख ढाल कहते है। अभिमुख ढाल पर ही वर्षण का कार्य अधिक होता है। जबकि अभिमुख ढाल के विपरीत दूसरे ढाल को विमुख ढाल कहते हैं।

        विमुख ढालों पर वायु ढाल के सहारे नीचे उतरने की प्रवृत्ति रखती है और वर्षा नगण्य होती है। फलत: वृष्टि छाया प्रदेश का निर्माण करती है।

      पर्वतीय वर्षा दक्षिणी दिल्ली में एंडीज पर्वत के कारण, आस्ट्रेलिया के पूर्वी भाग में ग्रेट डिवाइडिंग रेंज के कारण, दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी भाग में ड्रेकेन्सवर्ग पर्वत के कारण, भारत के पश्चिमी तट में पश्चिमी घाट पर्वत के कारण पर्वतीय वर्षा होती है।

Precipitation

(iii) चक्रवाती वर्षा (Cyclonic Rainfall):-

         चक्रवाती वर्षा वह वर्षा है जब किसी निम्न वायुदाब केंद्र को भरने के लिए उच्च वायुदाब क्षेत्र से हवा चलती है तो ऐसी स्थिति में आर्द्र एवं उष्ण वायु लम्बवत रूप से ऊपर उठ जाते हैं और संघनित होकर जल वर्षण का कार्य करते हैं। चक्रवातीय वर्षा भी दो प्रकार की होती है। 

(a) उष्ण चक्रवाती वर्षा तथा 

(b) शीतोष्ण चक्रवाती वर्षा 

         8°-20° अक्षांश के बीच दोनों गोलार्द्ध में उष्ण चक्रवात का निर्माण होता है। इसमें वायु तेजी से लंबवत रूप से ऊपर उठती है और मोटे बादलों का निर्माण कर जलबूँद के रूप में वर्षण का कार्य करती है।

         शीतोष्ण चक्रवातीय चक्रवात के कारण शीत वाताग्र और उष्ण वाताग्र का निर्माण होता है। इन्हीं वाताग्रो के सहारे मध्य प्रशांत क्षेत्रों में जल वर्षण का कार्य होता है। दक्षिण यूरोप, पश्चिम यूरोप शीतोष्ण चक्रवातीय वर्षा के लिए प्रसिद्ध है। शेतोष्ण चक्रवातीय वर्षा में जलवर्षण का कार्य धीरे-धीरे लेकिन कई दिनों तक चलता रहता है।

Precipitation

(3) मिश्रित वर्षण:-

     जब हिमकण एवं जलकण साथ-साथ धरातल की ओर गिरते हैं तो उसे मिश्रित वर्षण कहते हैं। यह उपोष्ण एवं महाद्वीपीय जलवायु क्षेत्रों की विशेषता है क्योंकि जब महाद्वीपीय क्षेत्र तेजी से गर्म होते हैं तो हवाएँ तीव्रता से लंबवत उठने लगती है। अगर उठती हुई वायु में आर्द्रता रही तो 7 किलोमीटर की ऊँचाई पर बहुस्तरीय बादलों का निर्माण करते हैं। नीचले क्रम के बादल से जलबूँदों का तथा ऊँचाई वाले बादल से हिमकणों का वर्षण होता है। जब जलबूँदों के साथ बड़े आकार के हिमकण धरातल पर गिरते हैं तो उसे ओला कहते हैं। भारत में अप्रैल एवं मई माह में ऐसे वर्षण को देखा जा सकता है। यह वर्षण समसामयिक एवं विनाशकारी होता है।


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4. HYDROLOGIC CYCLE / जलचक्र

4. HYDROLOGIC CYCLE / जलचक्र


HYDROLOGIC CYCLE / जलचक्र⇒

जलचक्र:- जल चक्र क्रिया हमारे वायुमंडल एवं पृथ्वी तंत्र की महत्वपूर्ण विशेषता है। इसके अंतर्गत पार्थिव जल सतत स्थान एवं अवस्था में परिवर्तन लाते रहते हैं। अवस्था परिवर्तन  वाले जल चक्र को नीचे के मॉडल में देखा जा सकता है।

               जलचक्र में स्थान परिवर्तन जलवायु विज्ञान में विशेष महत्व रखता है। इसके अंतर्गत पृथ्वी की सतह से जल का गैसीय स्थानांतरण वायुमंडल में होता है। जब वायुमंडल की वायु संतृप्त हो जाती है और तापमान ओसांक बिंदु के नीचे चला जाता है तो पहले बादल उसके बाद जलबूँद एवं हिमकण का निर्माण होता है। ये जलबूँद एवं हिमकण वर्षण की क्रिया से पुनः धरातल पर गिरते हैं और जल स्रोतों में समाहित हो जाते हैं। इस तरह पृथ्वी के धरातलीय जल का वायुमंडल में जाना और वायुमंडल से पुनः धरातल की ओर आना ही भौगोलिक जलचक्र कहलाता है।

       जलचक्र के अंतर्गत जलीय अधिवास में सतत परिवर्तन होता है। लेकिन पृथ्वीतंत्र में अवस्थित जलीय अधिवासों में जल की मात्रात्मक अनुपात में कोई परिवर्तन नहीं होता है। जैसे 97% जल महासागरों में स्थित है जबकि मात्र 3% भाग ही महाद्वीपों पर स्थित है।
         स्थलीय जल अधिवास में भी सन्तुलन की स्थिति कायम रहती है। स्थलीय जल का तात्पर्य स्वच्छ जल से है। जलचक्र के बावजूद इसका निश्चित अधिवासीय वितरण इस प्रकार से है:-
क्रम  स्वच्छ जल का अधिवासित क्षेत्र  स्वच्छ जल का प्रतिशत (अगर 3% को 100 इकाई माना जाय)
1. हिम चादर और हिमानी  75%
2. भूमिगत जल  24.575%
3. झील  0.300%
4. मृदा नमी  0.060%
5. वायुमंडल 0.035%
6. नदी  0.030%

        MTC के अनुसार (1971) जल के प्रमुख स्रोत आधिवासीय क्षेत्र है। इन आधिवासीय क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न अवधि तक अधिवासित होते हैं। इन अधिवासित क्षेत्रों के जल भी जलचक्र में भाग लेते हैं। अधिवासीय समय को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है:-

क्रम अधिवासीय क्षेत्र औसत समय 
1. वायुमंडल 10 दिन तक जल रहता है 
2. नदी दो सप्ताह 
3. झील 10 सप्ताह 
4. मृदा 2-50 सप्ताह 
5. भूमिगत जल  1 वर्ष से 10 हजार वर्ष 
6. समुद्री जल  3600 वर्ष
7. ध्रुवीय जल  15000 वर्ष 
             
       इस तरह ऊपर के तथ्यों/तालिका से स्पष्ट है कि अलग-अलग अधिवासीय क्षेत्र के जल अलग-अलग समय तक अधिवासित होते हैं।
    जलवायु विज्ञानवेताओं ने पृथ्वीतंत्र में चलने वाला जलचक्र को 5 वर्गों में बाँटा है:-
(i) वायुमंडलीय जलचक्र क्रिया
(ii) बाधित जलचक्र क्रिया
(iii) लघु जलचक्र क्रिया
(iv) लंबित जलचक्र क्रिया
(v) सामान्य जलचक्र क्रिया
(i) वायुमंडलीय जलचक्र क्रिया
          वायुमंडल में बादल तैराव की स्थिति में होते हैं। जब उसका तापमान ओसांक बिंदु के नीचे जाता है तो जलबूँद के रूप में तब्दील होकर धरातल पर आने का प्रयास करते हैं लेकिन वायुमंडलीय जलचक्र में जलबूँद पृथ्वी के धरातलीय सतह पर नहीं पहुँच पाते। सूर्य के तापीय प्रभाव में आकर वर्षा के जल वाष्प के रूप में बदलकर पुनः बादल के रूप में तब्दील कर जाते हैं। चूँकि यह संपूर्ण क्रिया वायुमंडल में चलती रहती है इसीलिए इसे वायुमंडलीय जलचक्र क्रिया कहते हैं।
(ii) बाधित जलचक्र क्रिया
              जब समुद्र का वाष्पीकृत जल वायुमंडल में पहुँचता है और संघनित होकर बादल का निर्माण करता है तथा पुनः बादल से जलबूँद या हिमकण स्थलखंड पर वर्षण के रूप में पहुँचते हैं। लेकिन वर्षण के ये जलबूँद या हिमकण पुनः समुद्र में न पहुँचकर मृदा या वनस्पति में समाहित हो जाते हैं। चूँकि यह स्रोत तक नहीं पहुँच पाते हैं और वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया में जल वायुमंडल में आ जाते हैं। इसीलिए इसे बाधित जलचक्र कहते है।
 
(iii) लघु जलचक्र क्रिया
           विषुवतीय क्षेत्रों में प्रतिदिन समुद्र का जल वाष्पीकृत होकर वायुमंडल में पहुँचता है और दोपहर के बाद संघनित होकर पुनः धरातल या समुद्री सतह पर वर्षा के रूप में लौट आता है। ऐसे जलचक्र को ही लघु जलचक्र क्रिया कहते हैं।

(iv) लंबित जलचक्र क्रिया
            जिस जलचक्र में वर्षण का जल ध्रुवीय हिमानी या भूमिगत जल का अंग बन जाता है तो वैसी स्थिति में जल लंबे समय तक हिमानी या भूमिगत जल के रूप में अधिवासित होते हैं। ऐसे ही जलचक्र को लंबित जलचक्र किया कहते हैं।
 
(v) सामान्य जलचक्र क्रिया
         सामान्य जलचक्र में समुद्री जल वाष्पीकृत होकर वायुमंडल में पहुँचता है यह जलवाष्प संघनित होकर पहले बादल का निर्माण करता है। उसके बाद संघनित होकर जलबूँद के रूप में स्थल पर गिरता है। पुनः यहाँ से जल अपवाह तंत्र के माध्यम से समुद्र तक पहुँच जाता है ऐसे ही जलचक्र को सामान्य जलचक्र कहते हैं।
निष्कर्ष

    इस तरह ऊपर के तथ्यों  से स्पष्ट है कि जलचक्र हमारे वायुमंडल का प्रमुख घटक है। यही वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से आर्द्रता एवं जल का सतत वितरण होता रहता है। इसके अलावा जल के सभी अधिवासीय क्षेत्र में जलीय अनुपात को नियत रखता है। वायुमंडल को स्वच्छ बनाए रखने में मदद करता है। पर्यावरणीय संतुलन को कायम रखता है। अतः जलचक्र रोके जाने वाले किसी कदम को रोका जाना आवश्यक है।


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3. हवाएँ / Winds

3. हवाएँ (Winds)



हवाएँ

       हवा तीन प्रकार के होते है- 

1. प्रचलित हवा (Permanent or Planetary Winds)

     वैसी हवा जो सलोंभर निश्चित दिशा में बहती है। जैसे- वाणिज्यिक हवा, पछुआ हवा, ध्रुवीय हवा।

2. मौसमी हवा (Periodic or Seasonal Winds)

       वैसी हवा जो मौसमी विशेष में निश्चित दिशा में बहती है।

3. स्थानीय हवा (Local Winds)

        वैसी हवा जो स्थानीय परिस्थितियों के प्रभाव से उत्पन्न होती है। ये प्रभाव इसके दिशा निर्धारित करते है। यही कारण है कि अलग-अलग स्थानीय हवा के अलग-अलग दिशा होती है

स्थायी /प्रचलित/ग्रहीय वायु

      उच्च वायुदाब पेटियाँ ही वायु के स्रोत क्षेत्र होते हैं। H.P. से ही वायु L.P. की ओर चला करती है। फेरल नियम के अनुसार उत्तरी गोलार्ध में वायु दायीं ओर और दक्षिणी गोलार्ध में वायु बायीं ओर मुड़ जाती है। अपने मार्ग से विचलन का प्रमुख कारण पृथ्वी की घूर्णन गति है। अतः पृथ्वी रूपी ग्रह का प्रभाव वायु पर पड़ता है इसलिए ऐसे वायु को ग्रहीय वायु करते हैं। यह तीन प्रकार के होते हैं

1. वाणिज्यक/व्यापारिक/सन्मार्गी वायु (Trade Winds)

2. पछुआ वायु (Westerlies)

3. ध्रुवीय वायु (Polar Winds)

1. वाणिज्यक/व्यापारिक/सन्मार्गी वायु-

       इसका स्रोत क्षेत्र उपोष्ण भार का क्षेत्र होता है। उत्तरी गोलार्ध में इसकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण-पूरब से उत्तर-पश्चिम की ओर होती है। इस हवा का लक्ष्य क्षेत्र विषुवतीय निम्न भार का केंद्र होता है।

      दोनों गोलार्द्धों से चलने वाली वाणिज्यिक हवाएँ विषुवतीय निम्न वायुदाब के अंतर्गत मिलने की प्रवृत्ति रखती है। जिसे अंतर उष्ण अभिसरण (ITCZ) कहते हैं। इस अभिसरण के बाद वायुदाब में थोड़ी वृद्धि होती है जिसके कारण वायु में गतिशीलता समाप्त हो जाती है, जिसे शांत पेटी या डोलड्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। डोलड्रम का निर्माण प्रायः समुद्री सतह पर होता है। विषुवतीय क्षेत्र में वायु के अभिसरण से प्रतिरोधी विषुवतीय वायु भी उत्पन्न होती है जिसे विषुवतीय पछुआ हवा कहते हैं।

2. पछुआ वायु

       इस वायु का भी स्रोत क्षेत्र उपोष्ण उष्ण वायुदाब का क्षेत्र होता है लेकिन इसका लक्ष्य क्षेत्र उपध्रुवीय निम्नवायु दाब का क्षेत्र होता है। उतरी गोलार्द्ध में इसकी दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूरब की ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में उतर-पश्चिम से दक्षिण-पश्चिम की ओर होती है। यह निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर जाने वाली वायु है जिसके  कारण तापमान में सामान्यतः कमी आती है।

      इस वायु का अभिसरण ध्रुवीय वायु से होता है। ध्रुवीय वायु अत्यधिक ठंडा जबकि उसके तुलना में पछुआ वायु गर्म होता है। इसीलिए दोनों मिलकर एक वाताग्र का निर्माण करते है और अंततः वाताग्र के सहारे (शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात) की उत्पति होती है।

      दक्षिण गोलार्द्ध में पछुआ वायु तुलनात्मक दृष्टि से अधिक स्थिर और बाधारहित मार्ग से गुजरती है क्योंकि दक्षिण गोलार्द्ध में समुद्र का विस्तार अधिक हुआ है। जब पछुआ हवा 40° दक्षिण अक्षांश के पास से गुजरती है तो उसे गरजता चालीसा (Roaring Forties) कहते है। 50°S अक्षांश के पास प्रचण्ड पचासा या गरजता पचासा (Furious Fifties) और 60°S अक्षांश के पास चीखता साठा (Shrieking Sixties) कहलाता है।

3. ध्रुवीय वायु

      इसका स्रोत क्षेत्र ध्रुवीय उच्च वायुदाब का क्षेत्र होता है और लक्ष्य क्षेत्र उपध्रुवीय निम्न वायुदाब का क्षेत्र होता है। दक्षिणी गोलार्द्ध में उतर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूरब से उत्तर-पश्चिम की ओर चलती है।  ध्रुवीय वायु की पछुआ वायु से मिलकर शीतोष्ण चक्रवात को जन्म देती है।

निष्कर्ष:

     ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि विश्व के जलवायु और मौसमी परिस्थतियों के निर्माण में वायुदाब पेटी और स्थायी हवा का विशेष योगदान है।

स्थानीय हवा/LOCAL WINDS

         स्थानीय वायु मौसम विज्ञान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है क्योंकि ये बादल निर्माण में मदद करते है। यह दो प्रकार का होता है।

(A) गर्म स्थानीय वायु

(B) ठंडी स्थानीय वायु

(A) गर्म स्थानीय वायु 

1. सिरक्को (Sirocco)

◆ यह हवा सहारा मरुस्थल में उत्पन्न होकर भूमध्यसागरीय भागों में प्रवाहित होती है।

◆ तापमान 3.7℃

◆ सापेक्ष आर्द्रता 10-20%

◆ यह हवाएँ लगातार 24 घंटे से 43 घंटे तक चला करती है।

स्रोत क्षेत्र- सहारा मरुस्थल

◆ धूल के कणों से वायुमंडल इतना अंधेरा हो जाता है कि सूर्य भी दिखाई नहीं पड़ता।

◆ यह हवाएँ भूमध्य सागर को पार करके दक्षिण फ्रांस तथा इटली पहुँचती है तो इनमें आर्द्रता की मात्रा अधिक पाई जाती है। इस आर्द्रता को यह भूमध्य सागर से प्राप्त कर लेती है।

◆ इटली में जब बारिश होती है तो इन बालू के कणों के कारण वर्षा की बूँदे लाल रंग की हो जाती है जिसे Blood Rain कहते हैं।

◆ सिरक्को को अलग-अलग देश में अलग-अलग नाम से जानते हैं।

(i) खमसिन

◆ मिस्र के डेल्टा की ओर चलने वाली धूल भरी आँधी है जिसका स्रोत क्षेत्र सहारा है।

◆ प्रायः वसंत ऋतु में ही चलती है।

(ii) लेवेची

◆ स्पेन में सहारा क्षेत्र से चलने वाली हवा।

(iii) लेस्ट

◆ मदिरा तथा कनारी द्वीप समूह में चलने वाले गर्म एवं शुष्क पूर्वी हवाओं को, जो सहारा के उष्ण मरुस्थल से चलती है, लेस्ट के नाम से पुकारा जाता है।

(iv) हरमट्टान

◆ इस पवन की उत्पत्ति शीतकाल में सहारा मरूमदेश में होती है।

◆ यह पश्चिम अफ्रीका के सहारा से उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में चलने वाले गर्म एवं अति शुष्क हवा है।

◆ गिनी के तट पर इसका प्रभाव शीतलकारी होता है।

◆ नाइजीरिया और घाना में इसे डॉक्टर हवा कहते हैं क्योंकि वहाँ के निवासियों को आर्द्र मौसम से राहत देती है।

◆ परंतु सहारा के मरुस्थल में यह पवन ऊँट के काफीलों के लिए काफी कष्टदायक होती है।

2. ब्रिकफील्डर (Brick Filder)

◆ ऑस्ट्रेलिया में मरुस्थलीय प्रदेशों में चलने वाले गर्म एवं शुष्क पवन को ब्रिकफील्डर कहा जाता है।

◆ दक्षिण आस्ट्रेलिया (एडिलेड के पश्चिम) में उत्तर से दक्षिण की ओर चलने वाली हवा है।

3. ब्लैक रोलर

◆ उत्तरी अमेरिका के विशाल मैदान में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूरब की ओर तेज धूल भरी आँधियाँ चला करती है। जिनसे कभी-कभी मार्ग में पड़ने वाली इमारतें रेत के ढेर के नीचे दब जाती है। इन स्थानीय हवा को ब्लैक रोलर कहा जाता है।

स्रोत क्षेत्र- कोलरेडो के मरुस्थलीय क्षेत्र (न्यू मैक्सिको)

प्रभाव- मिसीसिपी मिसौरी के मध्यवर्ती क्षेत्र में

◆धूल कण का आकार बड़ा-बड़ा होता है।

4. शामल

◆ मेसोपोटामिया तथा फारस की खाड़ी की ओर उत्तर-पूरब से चलने वाली गर्म हवा को शामिल कहा जाता है।

◆ इराक में चलने वाली हवा है।

◆ वस्तुतः यह सिमूम हवा ही है।

5. नार्वेस्टर

◆ न्यूजीलैंड में वहाँ की पर्वत मालाओं से उत्पन्न गर्म, शुष्क तथा  झोंकेंदार पवन को नॉर्वेस्टर कहा जाता है।

6. गिबली

◆ लीबिया में सहारा क्षेत्र में चलने वाली हवा।

7. चिली

◆ ट्यूनीशिया की स्थानीय हवा जो सहारा क्षेत्र से चलती है।

◆ यह धूल भरी आंधी के समान है।

8. सिमूम

◆ अफ्रीका एवं अरब के मरुस्थलों में गर्म एवं शुष्क आँधियाँ चलती है जिनको सिमूम कहते हैं।

◆ यह अरब मरुस्थल के मध्य से चलने वाली हवा है जो इराक और कुवैत की ओर (पर्शियन गल्फ) चलती है।

◆ इनके साथ रेत की मात्रा अधिक होती है जिससे दृश्यता समाप्त हो जाती है।

◆ यह बवण्डर की तरह उठती है।

◆ यह दमघोंटू हवा है।

9. लू 

◆ गर्मी के महीने में उत्तरी भारत में चलने वाली पश्चिमी एवं उत्तर-पश्चिमी गर्म तथा अत्यधिक शुष्क वायु को लू कहते हैं।

◆ थार के मरुस्थल से उत्तरी भारत एवं पाकिस्तान के मैदान में मई एवं जून में प्रवाहित होती है।

◆ इनकी गति पर प्रायः 20 किलोमीटर प्रति घंटा से अधिक होती है।

◆ उत्तर में लू दोपहर के थोड़ा पहले से सूर्यास्त तक प्रभावित होती है।

◆ मानसून के आविर्भाव के साथ लू खत्म हो जाती है।

◆ यह गर्म हवा है जिसकी धूलकण बनारस तक और इसका प्रभाव भागलपुर तक रहता है।

तापमान- 40℃ से 50℃

◆ इसे Heat Waves भी कहते हैं।

10. काराबूरान

यह मध्य एशिया के तारिम बेसिन और गोबी मरूस्थल से चलने वाली गर्म हवा है।

यह धूल से भरी वायु है।

मध्य एशिया में लोएस का मैदान का निर्माण इसी वायु से हुआ है।

11.  सांता आना (Santa Ana)

पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित घाटियों में जब ऊँचाई पर एकत्रित वायु पूंज तीव्र गति से नीचे उतरती है, तो उन शुष्क और गर्म हवाओं को फॉल विन्डस (fall winds) की संज्ञा प्रदान की जाती है।

उ० अमेरिका के कैलिफोर्निया में सांताआना कैनियन (घाटी) से होकर तटवर्ती मैदानों (कैलिफोर्निया) की ओर चलने वाली धूल भरी आँधी को सांताआना कहा जाता है।

ये आंधियाँ उत्तर अथवा उत्तर- पू० की ओर से चलती है।

उत्पति का मूल स्थान- ग्रेट बेसिन

शुष्कता अत्यधिक

अत्यधिक शुष्क एवं गर्म हवाओं से कैलीफोर्निया के फल के बगीचों की अपार क्षति होती है।

प्रबल वेग

इन हवाओं से पेड़ सूख जाती है तथा जंगलों में आग लग जाती है।

हवा में रेत की महीन कणों की मात्रा अधिक होने के कारण श्वास लेना भी कठिन हो जाता है।

12. योमा (Yoma)

सांताआना के समान जापान में चलने वाली गर्म हवा को योमा कहा जाता है।

➤  पश्चिमी तट पर ताप को बढ़ा देता है।

यह जाड़े की ऋतु में साइ‌बेरिया से आने वाली ठंडी हवा के प्रभाव को कम करती है।

इसका प्रभाव होन्शू द्वीप पर पड़ता है।

13. जोंडा (zonda)

एंडीज पर्वत से प० पेंटागोनियाँ में चलने वाली स्थानीय हवाओं को जोंडा कहते है।

यह सांताआना के समान है।

पम्पास प्रदेश (द० अमेरिका) में चलने वाली है।

यह पम्पास के मैदान में चारे की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

यह घाटियों से एंडीज पर्वत के पूरब की ओर उतरने वाली हवा है।

14. फॉन (Fochn)

➤ उन पर्वतीय क्षेत्रों में जहाँ चक्रवातीय तुफान चला करते हैं, फॉन नामक गर्म और शुष्क स्थानीय हवायें पायी जाती है।

➤ इनकी उत्पति पर्वतों के वायु विमुख ढाल की ओर वायु के अवतलन के कारण होती है।

➤ यह आल्प्स से उत्तर की ओर चलने वाली हवा है।

➤ चीनूक और फॉन का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से 15 डिग्री सेल्सियस तक होता है इसलिए जाड़े के लिए यह उपयुक्त होती है।

➤ इस स्थानीय हवा को तथा ऑस्ट्रिया तथा जर्मनी में फॉन कहा जाता है।

➤ इसका प्रभाव स्वीटजरलैंड पर भी पड़ता है।

➤ यह हवा सेब, अंगूर की खेती के लिए उपयुक्त होती है।

15. चिनूक (chinook)

➤ संयुक्त राज्य अमेरिका (उत्तरी अमेरिका) में रॉकी पर्वत के पश्चिमी ढाल के सहारे चढ़ती है एवं पूर्वी ढाल के सहारे गर्म होकर उतरती है जो कोलेरेडो से कोलंबिया तक के प्रांतों को प्रभावित करती है।

इन हवाओं को पश्चिमी कनाडा तथा USA में चिनूक कहा जाता है।

ये हवाएं अधिकांशत: जाड़े के ऋतु में प्रभावित होती है।

➤ मृत घाटी सियरा नेवादा के पवन विमुख ढाल पर स्थित है।

➤ फॉन तथा चिनूक हवाओं के गर्म होने के दो प्रमुख कारण है:-

(i) वायु अभिमुख ढाल पर आरोही पवन में संघनन की गुप्त ऊष्मा द्वारा वायु के तापमान में वृद्धि है।

(ii) उन हवाओं के अवरोहण के समय संपीडन के कारण उनके तापमान में अतिरिक्त वृद्धि है।

इसके तापमान बढ़ने की दर 10 से 15 मिनट में 3ºC से 10ºC तक रहती है। 24 घंटे में 12 से 15ºC तापमान बढ़ जाता है।

➤ इसे हिम भक्षिणी Snow Eaters भी कहा जाता है।

➤चिनूक हवा शुष्क रुद्दोष्म दर से गर्म होता है

अन्य गर्म हवा

16. बाग्यो (Bayuio)

➤ फिलिपिंस में चलने वाली उष्ण कटिबंधीय चक्रवातीय हवा है

➤ यह उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात भी है।

17. सुखोवे

➤ रूस एवं कजाकिस्तान में चलने वाली गर्म हवा है।

18. गोरिच

➤ ईरान में प्रवाहित होने वाली गर्म एवं शुष्क पवन है।

19. मारिन

➤ द० फ्रांस में बहने वाली गर्म एवं आर्द्र पवन है।

20. अयाला

➤ फ्रांस के मध्य मैसिफ में चलने वाली गर्म हवा है।

21. कोयम बैग

➤ यह इंडोनेशिया में चलने वाली गर्म हवा है।

➤ इससे तम्बाकू के फसल को हानि होती है।

22. सिस्टन (seistan या 120 दिन की पवन)

➤ पूर्वी ईरान की गर्म हवा है।

23. वीरोजन (virozon)

➤ पेरू तथा चिली के प० तटों पर बहने वाली हवा है।

24. वेन्डावेल्स (vendavales)

➤ जिब्राल्टर तथा स्पेन के पूर्वी तट पर चलने वाली ठंडी हवा को वेन्डावेल्स कहते है।

25. टेम्पोराल्स (Temporals)

➤ मध्य अमेरिका के प्रशांत तट पर की हवा है।

➤ मैक्सिको की भी हवा है।

26. सोमून (Somun)

➤ ईरान में कुर्दिस्तान पर्वत से उत्तर-पश्चिम की हवा है।

27. हबूब (Haboob)

➤ सूडान में उत्तर-पूर्व दिशा की ओर चलने वाली हवा है।

➤ स्रोत- सहारा मरुस्थल

28. ग्रेगल

➤ पश्चिमी यूरोप में उत्तर-पूर्व दिशा की ओर चलने वाली हवा है।

29. मेस्ट्रो (Maestro)

➤ भूमध्यसागरीय क्षेत्र से उ०-प० (स्पेन और पुर्तगाल की ओर चलने वाली हवा)

30. बर्ग

➤ द० अफ्रीका में फॉन के समान वायु, जो आंतरिक पठारी भाग से तटवर्ती क्षेत्र की ओर चलती है।

(B) ठंडी स्थानीय वायु

गुरुत्व पवन (Gravity Winds):-

     समुद्र के तटवर्ती क्षेत्रों में जहां पठार अथवा पर्वतों से घिरे मैदानी भाग है वहां शीत ऋतु में भारी मात्रा में शीतल वायु एकत्रित हो जाती है। इन पठारों अथवा पर्वतों के ढालों से खिसक कर वायु की कुछ राशि घाटियों तथा नदी कंदराओं में एकत्रित हो जाती है।

     साधारण स्थिति में ये हवाएं मंद पवन या समीर के रूप में तट की ओर प्रवाहित होती है। किंतु जब कभी चक्रवातों का आगमन होता है तो न्यून वायु भार व्यवस्था के अंतर्गत शीतल और भारी वायु राशि प्रबल वेग के रूप में तट की ओर प्रवाहित होने लगती है। इस प्रकार के पवनों को अवरोही पवन, गुरुत्व पवन, फॉल विंड्स (Fall Winds), ड्रेनेज विंड्स (Drainage Winds) अथवा केटाबेटिक विंड्स आदि कई नामों से अलंकृत किया जाता है।

    इन अवरोही पवनोंं को विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है:-

गुरुत्व पवन (Gravity Winds):-

(i) बोरा (Bora)

➤ बोरा एक शीतल स्थानीय पवन है जो उत्तर/उ०-पू० दिशा से एड्रियाटिक सागर के उत्तरी तट पर चला करता है।

➤ इन पवनों का वेग 128 km/h से लेकर 196 km/h hota है।

➤ तीव्र झोंका के साथ चलने वाली शीतल हवा है।

➤ यह आल्प्स पर्वत की हवा है।

➤ यह आल्प्स पर्वत के दर्रों से आनेवाली हवा है।

➤ यह फॉन का उल्टा हवा है।

➤ यह इटली, यूनान, युगोस्लाविया के तट पर कष्टकर स्थिति उत्पन्न करती है।

➤ रसेदार फसलों के लिए हानिकारक है।

(ii) गिरती पवन (Fall Winds)

➤ नार्वेजियन तट पर इसको गिरती पवन (Fall Winds) कहा जाता है।

(iii) मिस्ट्रल (Mistral)

➤ फ्रांस के भूमध्यसागरीय तट पर गुरुत्व पवन को मिस्ट्रल कहा जाता है।

➤ यह द० फ्रांस की हवा है जो मध्यवर्ती यूरोप से आती है और भूमध्यसागर की ओर बहती है।

➤ रसेदार फसलों के लिए हानिकारक होती है।

हिमझंझा (Blizzard)

➤ अत्यधिक सर्द, वेगवान तथा हिमकणों से युक्त पवन को हिम झंझा कहा जाता है।

➤ प्रारंभ में इस पवन का नामकरण USA स्थित रॉकी पर्वत के पूर्व की ओर मैदानी भागों में चलने वाली बर्फीली आंधियों के लिए किया गया था।

➤ इनकी उत्पत्ति शीतकालीन चक्रवातों के पृष्ठ भाग में स्थित प्रतिचक्रवातों से होती है।

➤ इनमें भारी मात्रा में हिमकण प्रवाहित होती है।

➤ यह जाड़े की ऋतु में उत्तरी अमेरिका में ध्रुवीय प्रदेश से आने वाली हवा है।

➤ कपास, प्याज के लिए हानिकारक साबित होता है।

➤ इससे उत्तरी अमेरिका में पाला पड़ने लगता है।

➤ आजकल उच्च अक्षांशों में चलने वाली पवनों में यदि हिमकण मिश्रित होते है तो उन्हें ब्लिजार्ड कहा जाता है।

➤ अंटार्कटिका में प्राय: ऐसे हिमझंझावत चला करते है जिनमें पवन का वेग कभी-कभी 80 Km/h तथा तापमान -7ºC होता है।

(i) बुरान (Buran)/ पुर्गा

➤ सोवियत रूस तथा मध्य साइबेरिया में उ०-पू० से चलने वाली अत्यधिक सर्द हवाओं को बुरान कहा जाता है तथा बर्फीली आंधियों को पूर्गा (Purga) कहते है।

(ii) बाइज (Bise)/लेवांतर

➤ शीत ऋतु में प्रबल वेग से चलने वाली अत्यधिक ठंडी हवाओं को दक्षिणी फ्रांस में बाइज कहा जाता है तथा स्पेन में लेवांतर (Levanter) कहा जाता है। स्रोत क्षेत्र- Northerly Winds.

➤ तापमान हिमांक से नीचे चला जाता है जबकि मिस्ट्रल का तापमान हिमांक से ऊपर रहता है।

(iii) पैम्पीरो (Pampero)

➤ द० अमेरिका में अर्जेंटीना के पंपास क्षेत्र में उरुग्वे से प्रचंड वेग वाली सर्द हवाएं चला करती है जिन्हें वहां पैम्पीरो कहते है।

➤ इन हवाओं के साथ धूल भरी आंधियां भी चला करती है।

(iv) पापागायो (Papagayo)

➤ कोस्टा रीका के उत्तरी-पश्चिमी तट तथा समीपवर्ती प्रशांत तटवर्ती क्षेत्रों में पापागायो की खाड़ी में शीतकालीन उत्तर-पूर्वी हवाएं चलती है जिन्हें उस खाड़ी के नाम पर पापागायो कहा जाता है।

➤ ये हवाएं बड़ी प्रचंड होती है।

(v) टेहुयांटिपेकर (Tehuanterpecer)

➤ दक्षिणी मैक्सिको तथा उत्तरी मध्य अमेरिका से जाड़े के मौसम में धूलभरी तेज आंधियाँ चला करती है जिसे टेहुयांटिपेकर कहा जाता है।

➤ कोलेरेडो और ग्रेट बेसिन से जाड़े की ऋतु में चलती है।

(vi) फ्राइजेम (Friagem)

➤ ब्राजील के उष्ण कटिबंधीय कम्पोज तथा मध्य अमेजन घाटी में मई तथा जून के महीनों में भीषण शीत लहरी का प्रकोप हो जाता है, फ्राइजेम कहा जाता है।

➤ इन सर्द हवाओं का प्रकोप 3 से 5 दिन रहता है।

➤ जाड़े की ऋतु में एंडीज पर्वत से नीचे उतरने वाली हवा है।

➤ यह भी आनंददायक हवा है।

सदर्न बस्टर (Southern Buster)

➤ ध्रुवीय प्रदेशों से द० ऑस्ट्रेलिया (न्यू साउथ वेल्स) में प्रवाहित होने वाली हवा है।

नेवाडोह

➤ यह दक्षिणी अमेरिका के एंडीज के हिम क्षेत्रों से इक्वाडोर की उच्च घाटियों में प्रवाहित होने वाली पवन है।

➤ यह एक पर्वत समीर है।

ट्रामोण्टाना

➤ पश्चिमी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में शीत काल में प्रवाहित होने वाली शुष्क एवं शीतल हवा है।

केप डाक्टर

➤ द० अफ्रीका के पठारी क्षेत्र से दक्षिणी तट की ओर बहती है।

➤ इस हवा को टेबल क्लॉथर कहा जाता है क्योंकि यह पवन पर्वतीय क्षेत्रों में बादलों का निर्माण करती है।

नार्दर (Norther)

➤ यह वास्तव में एक ध्रुवीय पवन है जो अवरोध के अभाव के कारण दक्षिण में अमेरिका के टेक्सास एवं खाड़ी तटीय क्षेत्रों तक पहुंच जाती है।

➤ इसका अगला क्रम मध्य अमेरिका में Norte कहलाता है।

विलीवाव (Willywaw)

➤ यह एक गुरुत्व पवन है।

➤ अंटार्कटिका में शीतल और भारी हवाएं पठारी ढालों से नीचे उतरकर तीव्र वेग से चलती है जिसे विलीवाव कहा जाता है।

➤ अलास्का में इस पवन को बिलिबॉब कहते है।

➤ जब सूर्य दक्षिणायन होती है तब यह पवन चलती है।

मौसमी हवा या सामयिक पवन

      मौसम के अनुसार या समय के साथ चलने वाली हवा को मौसमी हवा कहते हैं। यह कुल तीन प्रकार के होते हैं-

1. स्थलीय समीर और सागर समीर 

2. पर्वत समीर और घाटी समीर 

3. मानसून पवनें

1. स्थलीय समीर और सागर समीर (Land Breeze and Sea Breeze)

दिन के समय समुद्र के निकटवर्ती क्षेत्र, समुद्र की तुलना में जल्दी गर्म हो जाते हैं जिससे स्थल पर LP का और समुद्र पर HP का निर्माण हो जाता है जिससे हवा समुद्र से स्थल की ओर प्रवाहित होने लगती है, इसे सागरीय या समुद्री समीर कहते हैं। 

इसके विपरीत रात के समय पार्थिव विकिरण के कारण स्थलीय भाग सागरीय भाग की तुलना में शीघ्रता से ठंडी हो जाती है जिससे स्थल पर HP एवं समुद्र पर LP का निर्माण होता है, जिसके कारण हवा स्थल से समुद्र की ओर चलने लगती है, इसे स्थलीय समीर कहते हैं।

हवाएँ

स्थलीय समीर और समुद्री समीर की निम्नलिखित विशेषताएँ है-

◆ 24 घंटे में इनकी दिशा में दो बार परिवर्तन होता है।

◆ ये समीर तटीय क्षेत्रों को एक पतली पेटी में प्रभावित करती है।

◆ इसी समीर के कारण तटीय क्षेत्रों में मौसम हमेशा सम बना रहता है। दिन के समय समुद्र से आने वाली हवा के कारण वायु में आर्दता की मात्रा अधिक रहती है जबकि स्थालीय समीर के कारण रात के समय मौसम शीतल हो जाता है। यही कारण है कि तटीय क्षेत्रों में अवस्थित नगरों में आर्थिक गतिविधियाँ देर रात तक संचालित होती रहती है।

2. पर्वत समीर और घाटी समीर

ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में दो प्रकार की दैनिक हवाएँ चलती है- पर्वत समीर एवं घाटी समीर।

 दिन के समय पर्वतीय ढाल बाला क्षेत्र घाटियों की तुलना में जल्दी एवं अधिक गर्म हो जाते हैं जिससे ढलानों पर LP और घाटी में HP का निर्माण हो जाता है। जिसके कारण पवन का संचरण ढालों के सहारे नीचे से ऊपर की ओर होने लगती है, इसे घाटी समीर कहते हैं।

इसके विपरीत रात्रि के समय बढ़ती ऊँचाई के कारण तापमान में कमी आ जाती है जिससे पर्वतों के ऊपरी क्षेत्रों में हवा ठंडी एवं भारी हो जाती है एवं HP का निर्माण कर लेती है जबकि घाटी में LP की स्थिति बनती है। अतः हवा पर्वतीय ढालों के सहारे नीचे की ओर संचरित होने लगती है, इसे पर्वतीय समीर कहा जाता है।

विशेषताएँ

◆ यह एक दैनिक हवा है जो पर्वतीय ढालों के सहारे चलती है। घाटी समीर ‘एनावेटिक हवा’ है जबकि पर्वतीय समीर एक ‘केटावेटिक’ हवा है।

◆ उष्ण एवं शीतोष्ण प्रदेशों में 35° से 50° अक्षांश के बीच इस हवा को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है।

◆ यह हेडली सेल के विपरीत कार्य करता है। इसी समीर के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में फलों के बागान, नगरों का विकास, या अधिवासी क्षेत्र का निर्माण न तो घाटी में होता है और न ही पर्वतीय कटकों पर बल्कि इनका विकास पर्वतीय ढलान पर होता है।

3. मानसूनी हवा

      यह मौसम विशेष की हवा है। हेडली महोदय ने इसे परिभाषित करते हुए कहा है कि मानसून एक ऐसी हवा है जो 6 महीने स्थल से समुद्र की ओर और अगले 6 महीने समुद्र से स्थल की ओर चलती है।

विशेषताएँ

◆ मानसून की उत्पत्ति के संबंध में चार सिद्धांत दिए हैं-

(i) तापीय सिद्धांत

(ii) पछुआ हवा सिद्धांत

(iii) जेट स्ट्रीम सिद्धांत और

(iv) अलनीनो सिद्धांत

◆ यह एक अनिश्चिताओं से भरी हुई हवा है क्योंकि इसके आने और जाने की तिथि अनिश्चित है।

◆ इसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है।

◆ वर्षा का वितरण एवं मात्रा दोनों अनिश्चित है।

◆ बादल विस्फोट की घटना घटित होती है।

◆ इस हवा की उत्पत्ति 8° से 35° अक्षांश के बीच में होती है। इसका विस्तार भारतीय उपमहाद्वीप, उत्तरी-पूर्वी आस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्वी ब्राजील, दक्षिणी चीन, मेडागास्क, संयुक्त राज्य अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य इत्यादि में हुआ है



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2. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण / Koppens’ Climatic Classification 

2. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण 

(Koppens’ Climatic Classification)


कोपेन का जलवायु वर्गीकरण

      विश्व के जलवायु वर्गीकरण की दिशा में अनेक कार्य किए गए हैं जिनमें कोपेन की योजना को आधारभूत योजना के रूप में मान्यता प्राप्त है। कोपेन का पूरा नाम व्लादिमिर कोपेन था जिसका जन्म जर्मनी में हुआ था। लेकिन आस्ट्रिया के ग्राज विश्वविद्यालय में जीव विज्ञान के प्राध्यापक थे। उन्होंने 1900 से 1936 ई० तक अनुसंधान प्रपत्र के माध्यम से कई बार जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया। अनुसंधान प्रपत्र में इनका वर्गीकरण 1900, 1918 तथा 1936 में प्रकाशित हुआ। कोपेन के द्वारा प्रस्तुत संशोधित और मान्य जलवायु वर्गीकरण 1936 ई० में “हैंडबुक डर क्लाइमेटोलॉजी” पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। वर्तमान समय में कोपेन के द्वारा प्रस्तुत 1936 ई० की योजना विश्वव्यापी मान्यता रखती है।

कोपेन का जलवायु वर्गीकरण की विशेषता:-

◆ कोपेन अपना जलवायु वर्गीकरण अनुभव के आधार पर प्रस्तुत किया था। इसीलिए इनकी योजना को आनुभाविक विधि (Empirical Method) पर आधारित माना जाता है।

◆ इनका वर्गीकरण मुख्यतः वनस्पति के वर्गीकरण पर आधारित है। कोपेन ने डी. कैंडोल के द्वारा प्रस्तुत वनस्पति वर्गीकरण को ही जलवायु वर्गीकरण का आधार माना।

◆ कोपेन का मानना था कि वनस्पति के विकास पर तापमान और वर्षा की वास्तविक मात्रा का भी प्रभाव पड़ता है। इसीलिए उन्होंने जलवायु वर्गीकरण के दौरान तापमान तथा वर्षा के वास्तविक मात्रा को भी ज्ञात किया और उसे अपने जलवायु वर्गीकरण में शामिल किया। यही कारण है कि इनके वर्गीकरण को परिणात्मक वर्गीकरण या मात्रात्मक वर्गीकरण (Quantitative Classification) भी कहते हैं।

◆ कोपेन ने अपने जलवायु वर्गीकरण में कई सांकेतिक अक्षरों का प्रयोग किया है जिसका मूल उद्देश्य मौसमी विशेषताओं को सांकेतिक भाषा में प्रस्तुत करना है। इस प्रकार के प्रस्तुतीकरण के द्वारा जलवायु के विभिन्न घटकों का मूल्यांकन एक ही नजर में किया जा सकता है।

◆ कोपेन का जलवायु वर्गीकरण तीन पदानुक्रम में प्रस्तुत किया गया है। प्रथम पदानुक्रम में उन्होंने विश्व की जलवायु को 5 भागों में बाँटा है। इसके लिए कोपेन ने A, B, C, D और E अक्षरों का प्रयोग किया है।

      दूसरे पदानुक्रम के जलवायु वर्गीकरण को प्रस्तुत करने के लिए चार सांकेतिक बड़े अक्षर S, W, T, F का प्रयोग किया है। 

        तीसरे पदानुक्रम के लिए उन्होंने अंग्रेजी के 17 छोटे अक्षरों का प्रयोग किया है। जैसे- a,  b, c, d, f, g, h, i, k, k’, m, n, s, w, w’, w”, x। इस तरह उन्होंने अंग्रेजी के 9 बड़े एवं 17 छोटे अक्षरों का प्रयोग किया।

◆ कोपेन के जलवायु वर्गीकरण को एक व्यवहारिक वर्गीकरण माना जाता है, क्योंकि इनके जलवायु वर्गीकरण से जलवायु प्रदेशों की विशेषताओं का बोध होता है।

◆ कोपेन के जलवायु वर्गीकरण में दो जलवायु प्रदेशों के बीच किसी भी संक्रमण पेटी का विकास नहीं होता है।

◆ कोपेन ने प्रथम पदानुक्रम वाले जलवायु प्रदेशों को एक अक्षर से, दूसरे पदानुक्रम के जलवायु को दो अक्षर से और तीसरे पदानुक्रम के जलवायु को तीन अक्षर से प्रस्तुत किया।

     इस तरह इनका वर्गीकरण एक बहु स्तरीय योजना है।

◆कोपेन ने विश्व को प्रथम पदानुक्रम में 5 और द्वितीय पदानुक्रम में 13 और तृतीय पदानुक्रम में 24 भागों में जलवायु को बाँटा है। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर तापमान और वर्षा का आँकड़ा लघु स्तर पर इकट्ठा किया जाता है तो तीसरे पदानुक्रम में जलवायु वर्गीकरण की संख्या में बढ़ोतरी हो सकती है।

◆ कोपेन का जलवायु वर्गीकरण जलवायु के कारकों पर आधारित है। इसलिए इनके वर्गीकरण को अनुवांशिक वर्गीकरण (Genetic Classification) भी कहा माना जाता है।

जलवायु वर्गीकरण के आधार

        कोपेन ने अपना जलवायु वर्गीकरण हेतु चार कारकों को आधार बनाया जैसे – वनस्पति, तापमान, वर्षा और उच्चावच।

      कोपेन का जलवायु वर्गीकरण मुख्यतः डी. कैंडोल द्वारा प्रस्तुत वनस्पति वर्गीकरण पर आधारित है। डी. कैंडोल महोदय (वनस्पति शास्त्री) ने विश्व को 5 वनस्पति क्षेत्रों में बाँटा था। इसलिए कोपेन महोदय ने भी प्रारंभ में विश्व को 5 जलवायु प्रदेशों में वर्गीकरण किया और उन्होंने बताया कि प्राकृतिक वनस्पति के प्रदेश ही प्रमुख जलवायु प्रदेश है। ऐसा बताने के पीछे उनका उद्देश्य था कि जलवायु प्रदेशों की सीमा का निर्धारण किया जा सके।

       कोपेन तापमान को दूसरी बार प्रथम एवं द्वितीय पदानुक्रम के जलवायु वर्गीकरण हेतु आधार माना। जबकि वर्षा को द्वितीय एवं तृतीय पदानुक्रम के जलवायु वर्गीकरण को प्रस्तुत करने में प्रयोग किया। कोपेन ने यह भी बताया कि औसत वार्षिक तापमान प्रथम पदानुक्रम की वृहद जलवायु प्रदेशों को निर्धारित करने में मदद करता है जबकि जलवायु के अन्य कारण क्षेत्रीय विषमता उत्पन्न करते हैं। इसलिए उन्होंने अन्य कारणों को लघु स्तर पर जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत करने के लिए उनका प्रयोग किया।

      कोपेन ने प्रारंभ में केवल वनस्पति को ही आधार मानकर जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया। जब उनकी आलोचना होने लगी तो उन्होंने अपना वर्गीकरण हेतु वनस्पति के अलावे तापमान एवं वर्षा को आधार बनाया। पुनः जब उन्हें यह पता चला कि उच्चावच के कारण भी जलवायु में संशोधन होता है तो पुनः उन्होंने 1936 ई० में वनस्पति, तापमान, वर्षा और उच्चावच को ध्यान में रखते हुए जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया।

कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की योजना/प्रणाली

         कोपेन के द्वारा प्रारंभ की गई यह परंपरा आगे चलकर थार्नथ्वेट और ट्रीवार्था ने भी इनका अनुसरण किया। कोपेन ने अपने जलवायु वर्गीकरण में अंग्रेजी के 9 बड़े तथा 17 छोटे अक्षरों का प्रयोग सांकेतिक रूप से किया जिनका अर्थ निम्नवत है-

 रोमन लिपि के 9 बड़े अक्षर एवं अर्थ:

 A = उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु प्रदेश

 B = उपोष्ण शुष्क जलवायु प्रदेश

 C = शीतोष्ण आर्द्र जलवायु प्रदेश

 D = शीत जलवायु प्रदेश

 E = ध्रुवीय जलवायु प्रदेश

       कोपेन उपरोक्त 5 बड़े अक्षरों के अलावे चार अन्य बड़े अक्षरों का प्रयोग किया है जो B और E जलवायु प्रदेश को लघु स्तर पर जलवायु वर्गीकरण में मदद करता है।

S  =  अर्द्ध शुष्क / स्टेपी जलवायु

W= शुष्क / मरुस्थलीय जलवायु

T = टुण्ड्रा प्रकार की जलवायु

F = हिमाच्छादित जलवायु

रोमन लिपि के 17 छोटे अक्षर एवं अर्थ:

       कोपेन दूसरे तथा तीसरे पदानुक्रम के लिए रोमन लिपि के 17 छोटे अक्षरों का प्रयोग किया जिनमें प्रमुख निम्नवत है:-

f  = वर्ष भर वर्षा /आर्द्र

m = मानसूनी प्रचुर वर्षा

w = शीतकाल शुष्क

s = ग्रीष्मकाल शुष्क

a = गर्म ग्रीष्म ऋतु 

b = सामान्य गर्म ग्रीष्म ऋतु

c = लघु कालीन एवं कम गर्म ग्रीष्म ऋतु

d = शीत ऋतु अत्यधिक सर्द, सबसे ठंडे माह का औसत मासिक तापमान -38℃ से कम।

h = औसत वार्षिक तापमान 18℃ से अधिक

k = औसत वार्षिक तापमान 18℃ से कम

        उपरोक्त सांकेतिक अक्षरों का प्रयोग करते हुए विश्व को प्रथम पदानुक्रम में 5 द्वितीय पदानुक्रम में 13 और तृतीय पदानुक्रम में 24 या उससे अधिक भागों में प्रस्तुत किया है। तीसरे स्तर में संख्या नियत / निश्चित नहीं है। इसलिए प्रथम और द्वितीय पदानुक्रम तक ही विशेष मान्यता रखता है। कोपेन के द्वारा प्रस्तुत जलवायु वर्गीकरण की योजना को नीचे की तालिका में देखा जा सकता है। 

कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की योजना
क्रम संख्या  प्रथम पदानुक्रम का जलवायु या प्रमुख जलवायु प्रदेश-5 द्वितीय पदानुक्रम का जलवायु या उपजलवायु प्रदेश-13 तृतीय पदानुक्रम का जलवायु या गौण जलवायु प्रदेश-24 
1. A-उष्ण आर्द्र जलवायु Af-विषुवतीय जलवायु

Am-मानसूनी जलवायु

Aw-सवाना जलवायु

2. B-उपोष्ण शुष्क जलवायु BS-स्टेपी तुल्य जलवायु

BW-मरुस्थलीय जलवायु

BSh,

BSk,

BWh, BWk

3. C-शीतोष्ण आर्द्र जलवायु Cf-प० यूरोपीय तुल्य जलवायु

Cw-चीन तुल्य जलवायु

Cs-भूमध्यसागरीय जलवायु

Cfa,

Cfb,

Cfc,

Cwa,

Cwb,

Cwc,

Csa,

Csb

4. D-शीत जलवायु Df-पछुआ प्रभाव वाला जलवायु क्षेत्र

Dw-पूर्वी तटीय जलवायु क्षेत्र

Ds- शीतल एवं आर्द्र जलवायु, जिसमें ग्रीष्म ऋतु शुष्क होता है।

Dfa,

Dfb,

Dfc,

Dfd,

Dwa, Dwb, Dwc, Dwd,

Dsa,

Dsb,

Dsc,

Dsd

5. E-ध्रुवीय जलवायु ET-टुन्ड्रा तुल्य जलवायु

EF-टैगा जलवायु या हिमाच्छादित जलवायु

निर्धारित नहीं 
कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की आलोचना

      कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की कई आधार पर आलोचना की गई है जैसे-

◆ कोपेन के वर्गीकरण को डी. कैंडोल के वनस्पति वर्गीकरण का प्रतिलिपि माना जाता है।

◆ कोपेन अपना वर्गीकरण कई बार प्रस्तुत किया। 1936 में प्रस्तुत वर्गीकरण भी पूर्ण नहीं था इसलिए पुनः इसमें संशोधन कर 1948 (कोपेन तथा उनके मित्र) में प्रस्तुत किया।

◆ इनका वर्गीकरण अनुभावाश्रित विधि पर आधारित है अर्थात वैज्ञानिक तथ्यों की कमी के कारण गलत परिणाम आ सकते हैं।

◆ इन्होंने अपना जलवायु वर्गीकरण हेतु वनस्पति, तापमान, वर्षा और उच्चावच इत्यादि को आधार माना लेकिन जलवायु के अन्य घटकों को उन्होंने नजरअंदाज किया। जबकि वे घटक भी जलवायु को प्रभावित करते हैं। जैसे- वायु की दिशा, वायुदाब, वायुमंडलीय दृश्यता, पृथ्वी की परिभ्रमण गति, समुद्री जलधारा जैसे कारकों का महत्व नहीं दिया।

◆ इन्होंने अपना जलवायु वर्गीकरण में कई सांकेतिक अक्षरों का प्रयोग किया जिससे वर्गीकरण के जटिल होने का आभास होता है।

◆ कुछ जलवायुविज्ञानवेता इनके वर्गीकरण को अति सरल रूप में प्रस्तुत करने का आरोप लगाता है।

◆ थार्नथ्वेट ने इनका आलोचना करते हुए कहा है कि कोपेन महोदय ने अपने वर्गीकरण में तापमान एवं वर्षा की मात्रा को वर्गीकरण का आधार माना है जबकि वास्तव में वर्षा एवं तापमान के प्रभावोत्पादकता पर वर्गीकरण किया जाना था।

◆ कोपेन के जलवायु वर्गीकरण में दो जलवायु पेटी के बीच बनने वाले संक्रमण पेटी का भी उल्लेख नहीं किया है जबकि वास्तव में एक जलवायु प्रदेश की सीमा समाप्त होते है तो अचानक ही दूसरी जलवायु क्षेत्र प्रारंभ नहीं होती बल्कि दोनों के बीच एक संक्रमण पेटी का निर्माण होता है।

निष्कर्ष

     उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद कई अन्य गुण भी है जिसकी चर्चा विशेषता रूपी शीर्षक के अंतर्गत किया गया है। उन विशेषताओं के अलावे जलवायु वर्गीकरण की दिशा में किया गया यह पहला प्रयास था। कोपेन ने जिन आधारों पर अपना जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया वही आधार कुछ संशोधन कर अपना वर्गीकरण को प्रस्तुत करते रहे। उपरोक्त गुणों के काण इनके जलवायु वर्गीकरण को आज भी विशेष मान्यता प्राप्त है।

कोपेन का जलवायु वर्गीकरण

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20. Static Change in Sea Level (समुद्रतल में स्थैतिक परिवर्तन)

20. Static Change in Sea Level

(समुद्रतल में स्थैतिक/स्थायी परिवर्तन)


Static Change in Sea Level (समुद्रतल में स्थैतिक/स्थायी परिवर्तन)⇒Static Change in Sea Level

          समुद्री जल का तल (S.L.) समुद्री वातावरण का एक गत्यात्मक पहलू है। यद्दपि पृथ्वी तंत्र के कुल जल की मात्रा निश्चित है। लेकिन समय-समय पर जल के अवस्था में परिवर्तन के कारण समुद्रतल में भी परिवर्तन होता है। समुद्रतल का परिवर्तन कई कारकों का परिणाम है।

जैसे-

(i) हिम युग के आगमन से समुद्र तल में गिरावट आती है और जब ही युग की समाप्ति होती है तथा वातावरण का तापमान अधिक हो जाता है तो स्थलीय हिम पिघलकर समुद्र में आ जाते हैं और जल स्तर ऊँचा हो जाता है।

(ii) भूगर्भिक प्रक्रियाएँ भी समुद्र के जलस्तर में परिवर्तन लाते हैं। जैसे – अगर भूगर्भीय हलचल के कारण समुद्री नितल का उत्थान होता है तो जलस्तर गिरती है और जब धँसान होता है तो जलस्तर बढ़ती है। जैसे कई स्थलीय भूभागों पर समुद्री जीवाश्म के प्रमाण मिलते हैं जो यह बताता है कि कभी वहाँ पर समुद्री जल रहा होगा और जब वहाँ समुद्र रहा होगा तो निश्चित रूप से एक समुद्री जलस्तर भी रहा होगा। जब उस भूभाग का उत्थान हो जाता है तो समुद्र का जल स्तर नीचे की ओर खिसक जाता है। लेकिन यह एक सापेक्षिक घटना है।

अगर समुद्री तल का धँसान होता है तो जलस्तर नीचे चली जाती है और जब समुद्र नितल का उत्थान होता है तो समुद्र जलस्तर बढ़ जाता है।

(iii) विभिन्न जलवायु विज्ञान एवं समुद्री विज्ञान के वैज्ञानिकों ने समुद्रतल में होने वाले परिवर्तन को गत्यात्मक मानते हुए यह माना है कि समुद्र तल में परिवर्तन जल के आयतन में बढ़ोतरी या कमी से होती है।

       उपरोक्त तीनों कारकों में से प्रथम कारक ही समुद्र तल में परिवर्तन के लिए सबसे उत्तरदायी कारक है।

      विभिन्न अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि समुद्र तल में 110 से 140 मीटर तक परिवर्तन हुआ है। प्रायः सभी हिमयुग में समुद्र का तल 100 से 150 मीटर के बीच नीचे चले गए थे। प्लीस्टोसीन के अंतिम हिमानी युग के अंत में समुद्र का तल वर्तमान तल से 110 मीटर नीचे पहुँच गया था। फेयर ब्रिज के अनुसार “समुद्र तल में सतत् सूक्ष्म परिवर्तन होते रहते हैं।” लेकिन 1800 ई० के बाद में इसमें काफी स्थिरता आयी है लेकिन औद्योगिक क्रांति के बढ़ते प्रभाव के कारण 1970 के दशक से वातावरण में तापमान की बढ़ोतरी से समुद्र तल में भी होने लगी है। सामान्य नियम के अनुसार 1 डिग्री सेल्सियस वायुमंडलीय तापमान के बढ़ने से 0.55 mm समुद्र तल में वृद्धि होती है। विश्व जलवायु विज्ञान संस्था के अनुसार 1985 से 1997 ईo के बीच औसत तापमान में बढ़ोतरी 0.37 हुआ है।

परिणाम-

      अनेक पारिस्थैतिक वैज्ञानिकों के अनुसार 2030 ई० तक समुद्र तल में 3 मीटर तक वृद्धि हो सकती है ऐसी स्थिति में विश्व के कई द्वीपय देश पूर्णत: जलमग्न हो सकते हैं। मालदीप तथा दक्षिणी प्रशांत महासागर की कई के द्वीप समुद्र में डूब जाएँगे। कई तटीय महानगर जैसे मुंबई, न्यूयार्क, टोकियो, मक्सिको सिटी, रियो-द-जेनरियो पर संकट के बादल मँडराने लगे हैं। कई प्रवाल भित्ति जलमग्न हो जाएँगे अधिक समुद्री तल के परिवर्तन से जलवायु पर भी विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है। नदियों के मुहाने पर समुद्री ज्वार के कारण बाढ़ का प्रभाव बढ़ जाएगा। कई तटीय मैंग्रोव/ज्वारीय वनस्पति विलुप्त हो जाएँगे केवल बांग्लादेश में ही 1.5 करोड़ जनसंख्या को विस्थापित होना पड़ेगा। अर्थात समुद्र तल में हो रहे परिवर्तन का विनाशकारी प्रभाव अवश्य संभावी है।

उपाय-

     भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने ग्लोबल वार्मिंग और समुद्र तल में हो रहे बढ़ोतरी का अध्ययन करवाया है। इन दोनों के बीच पाए जाने वाले संबंध को देखते हुए एक आपातकालीन योजना बनाने का निर्णय लिया है। इस योजना के तहत लगभग एक करोड़ आबादी तटीय क्षेत्र से विस्थापित कर सुरक्षित स्थान पर बसाने का कार्य किया जा रहा है। इसी तरह विश्व के कई देश ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, समुद्र तल में हो रहे परिवर्तन नजर टिकाये हुए हैं। समुद्रतल में परिवर्तन न हो इसके लिए कई देशों ने शिखर बैठक कर पृथ्वी सम्मेलन के दस्तावेज पर, क्योटो प्रोटोकॉल पर, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर अपना सहमति व्यक्त किया है ताकि वायुमंडल को गर्म होने से बचाया जाए वहीं दूसरी ओर समुद्र तल में हो रहे परिवर्तन को रोका जाए।


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19. Effect of Ocean Currents (महासागरीय जल धाराओं का प्रभाव)

19. Effect of Ocean Currents

(महासागरीय जल धाराओं का प्रभाव)


Effect of Ocean Currents (महासागरीय जल धाराओं का प्रभाव)

Effect of Ocean Currents

महासागरीय जलधाराओं का प्रभाव कई क्षेत्रों पर पड़ता है जो निम्नलिखित है-

(i) मौसमी दशाओं पर प्रभाव- महासागरीय धाराएँ जिन तटीय भागों से होकर गुजरती है, वहाँ की मौसम संबंधी दशाओं में पर्याप्त संशोधन करती है। इसका प्रभाव सबसे अधिक तटीय भागों के तापक्रम पर होता है। यह प्रभाव लाभदायक एवं हानिकारक दोनों प्रकार का हो सकता है। गर्म जलधारायें जब ठंडे भागों में पहुँचती है तो वहाँ का तापमान कम नहीं होने देती है। या सर्दियों में उन्हें अपेक्षाकृत गर्म रखती है।

          उत्तर-पश्चिमी यूरोप के तटीय देशों की आदर्श जलवायु का राज गल्फस्ट्रीम का बढ़ा भाग उत्तरी अटलांटिक धारा ही है। सर्दियों में इन तटीय देशों (ग्रेट ब्रिटेन, नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क, हॉलैंड आदि) का तापक्रम अपेक्षाकृत अधिक रहता है। परंतु यही गल्फस्ट्रीम धारा यू.एस.ए.के तटीय भागों में ग्रीष्म काल में गर्म लहर(Heat Waves) को जन्म देकर तापक्रम को अचानक ऊँचा कर देती है जिसके कारण मौसम कष्टदायक हो जाता है। शरदकाल में भी पूर्वी यू.एस.ए. गल्फस्ट्रीम से लाभ नहीं उठा पाता, क्योंकि इस समय हवाएँ स्थल से जल की ओर चलती है।

(ii) ऊष्मा संतुलन पर प्रभाव- गर्म जलधाराएँ उष्णकटिबंधीय उच्च तापक्रम को उच्च अक्षांशों की ओर ले जाकर तापमान के वितरण में समानता लाने का प्रयास करती है। इस तरह पृथ्वी के क्षैतिज ऊष्मा संतुलन को स्थापित करने में गर्म जलधाराएँ पर्याप्त मदद करती है, क्योंकि निम्न अक्षांशों की अतिरिक्त ऊष्मा को उच्च अक्षांशों की ओर स्थानांतरित करती है।

(iii) हिमपात की स्थिति पर प्रभाव- इसके विपरीत ठंडी जलधाराएँ जहाँ से गुजरती है, वहाँ का तापक्रम अत्यंत नीचा कर देती है, जिसके कारण हिमपात की स्थिति आ जाती है। क्यूराइल, लैबराडोर, फॉकलैंड की ठंडी धाराएँ प्रभावित क्षेत्र में भारी हिमपात के लिए पूर्णतया जिम्मेदार है।

(iv) वर्षा पर प्रभाव एवं मरुस्थलों का विकास- गर्म धाराओं के ऊपर चलने वाले हवाएँ नमी धारण कर लेती है तथा प्रभावित क्षेत्रों को वर्षा प्रदान करती है। उदाहरण के लिए उत्तर-पश्चिमी यूरोप के तटीय भागों में उत्तरी अटलांटिक धारा तथा जापान के पूर्वी भाग में क्यूरोशियो धारा के कारण वर्षा होती है। उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट की वर्षा कुछ अंश तक गर्म धारा के कारण होती है। 

               इसके विपरीत ठंडी जलधाराएँ वर्षा रोकती है। उदाहरण के लिए दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी तट पर कालाहारी तथा दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर अटाकामा मरुस्थलों के विकास में क्रमशः बेंगुएला तथा पेरू (हंबोल्ट) की ठंडी धाराओं का हाथ है। 

(v) कोहरा/कुहरा(Fog) का उत्पन्न होना- गर्म तथा ठंडी धाराओं के मिलन स्थल पर कोहरा उत्पन्न होता है जो जलयानों के लिए खतरनाक होता है। न्यूफाउलैंड के पास लैबराडोर ठंडी धारा तथा गल्फस्ट्रीम गर्म धारा के मिलने से ताप व्यतिक्रम (Inversion of Temperature) होने से घना कुहरा पड़ता है। इसी तरह जापान के पास क्यूराइल(ओयाशियो) ठंडी धारा तथा क्यूरोशियो गर्म जलधारा के मिलने से भी उत्पन्न होता है।

(vi) मत्स्य उद्योग/समुद्री बैंकों पर प्रभाव- जलधाराएँ मछलियों के जीवित रहने के लिए आवश्यक तत्व, ऑक्सीजन, भोजन को वितरित करने का कार्य करती है। धाराओं द्वारा प्लैंकटन नामक और घास का लाया जाना मछलियों के लिए आदर्श स्थिति पैदा करता है।

          गल्फस्ट्रीम धारा द्वारा ययह प्लैंकटन न्यूफाउंडलैंड तथा उत्तर पश्चिमी यूरोप तट पर पहुँचाया जाता है जिसके कारण वहाँ पर मत्स्य उद्योग अत्यधिक विकसित हो गया है। परंतु पेरू तट पर एलनीनो धारा के कारण प्लैंकटन  अदृश्य हो जाने पर मछलियाँ मर जाती है और इस उद्योग को क्षति उठानी पड़ती है।

         शीत क्षेत्रों में पैदा होने वाली खाद्य मछलियाँ ठंडी धाराओं के साथ गर्म प्रदेशों में आ जाती है। गर्म और ठंडी धाराएँ भी मिलकर विभिन्न प्रकार की मछलियों को जन्म देती है।

(vii) समुद्री मार्ग व्यापार पर प्रभाव-  महासागरीय धाराएँ जलमार्गों को निश्चित करती है, जिसके सहारे व्यापारिक जलयानों का परिवहन किया जाता है। परंतु धाराओं का यह प्रभाव प्राचीनकाल में अधिक था क्योंकि वर्तमान समय में शक्ति चालित जहाज हवा तथा धाराओं की दिशा का परवाह नहीं करते। 

              जहाँ पर गर्म एवं ठंडी धाराएँ मिलती है वहाँ पर कुहरा पड़ता है जो कि सामुद्रिक जहाजों के परिवहन में बाधा उत्पन्न करती है। जैसे न्यूफाउंडलैंड तथा जापान के तट के पास इसी तरह के कुहरे के कारण जलयानों को अपार क्षति उठानी पड़ती है। ठंडी धाराओं द्वारा बड़ी-बड़ी हिम शिलाएँ निम्न अक्षांशों की ओर लायी जाती है जिनसे टकराने के कारण जलयान क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। गर्म धाराओं के कारण ठंडे स्थानों के बंदरगाह खुले रहते हैं।

निष्कर्ष: 

       उपर्युक्त तथ्यों के विवरण से स्पष्ट होता है कि महासागरीय जल धाराओं का मानव वातावरण एवं उनकी आर्थिक क्रियाकलापों पर व्यापक प्रभाव पड़ता है।


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18. Difference Between Current and Tides / महासागरीय जल धारा और ज्वार में अंतर

18. Difference Between Current and Tides

(महासागरीय जल धारा और ज्वार में अंतर)



Difference Between Current and Tides

महासागरीय जल धारा और ज्वार में अंतर⇒

         महासागरों एवं समुद्र का जल कभी शांत नहीं रहता। इनमें हमेशा विभिन्न प्रकार के गतियाँ होती रहती है। इन गतियों को मुख्यतः तीन भागों में बाँटते हैं-

(i) ज्वार-भाटा

(ii) जलधारा और

(iii) लहर

       इन सभी गतिओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ज्वार-भाटा माना जाता है, क्योंकि यह ऐसी गति है जिससे महासागर का संपूर्ण जल ऊपर से नीचे तक प्रभावित होता है। सागरीय गतियों में जलधाराएँ सर्वाधिक शक्तिशाली होती है क्योंकि इनके द्वारा सागरीय जल हजारों किलोमीटर तक वहा लिया जाता है।

महासागरीय जलधारा और ज्वार में अंतर

        महासागरीय जलधारा और ज्वार में अंतर निम्नलिखित आधार पर स्पष्ट कर रहे हैं-

(1) परिभाषा के आधार पर-

        महासागरीय नितल का ऊपरी जल एक निश्चित दिशा में प्रवाहित होने की गति को जलधारा कहते हैं। जबकि सूर्य तथा चंद्रमा की आकर्षण शक्तियों के कारण सागरीय जल के ऊपर उठने तथा नीचे बैठने को ज्वार-भाटा कहा जाता है।

(2) उत्पत्ति के आधार पर अंतर-

         महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति पृथ्वी की घूर्णन गति, गुरुत्वाकर्षण बल, वायु की दिशा, वायुदाब, तापमान आदि द्वारा होती है। जबकि ज्वार की उत्पत्ति चंद्रमा तथा सूर्य के आकर्षण बलों द्वारा होती है। 

(3) गति के आधार पर अंतर-

    समुद्री जलधाराओं में क्षैतिज गति पाई जाती है। जबकि ज्वार में लंबवत गति होती है। 

(4) समय के आधार पर अंतर-

       सागरीय जलधाराएँ सालोंभर गतिशील रहती है। जबकि ज्वार दिन एवं महीने के निश्चित समय अंतराल के बाद आते हैं।

(5) तापमान के आधार पर अंतर-

      महासागरीय धाराएँ तापमान के आधार पर दो प्रकार की होती है-

(i) गर्म जलधारा और

(ii) ठंडी जलधारा। जबकि ज्वार के साथ ऐसी बात नहीं है।

(6) जल एवं ऊष्मा के वितरण के आधार पर अंतर-

       महासागरीय जलधाराओं के द्वारा जल एवं ऊष्मा का महासागरों में क्षैतिज एवं लंबवत वितरण किया जाता है। जबकि ज्वार के कारण महासागरों में जल का स्थानांतरण नहीं होता बल्कि दोलन क्रिया द्वारा होती है। ज्वार के द्वारा ऊष्मा स्थानांतरण भी नहीं होता है। 

(7) जलवायु के प्रभाव के आधार पर अंतर-

      महासागरीय जलधाराएँ समुद्र तटीय भागों की जलवायु को प्रभावित कर वहाँ के तापमान या तो बढ़ा देती है या घटा देती है। जबकि ज्वार का जलवायु पर कोई अंतर नहीं पड़ता।

(8) प्रवाह के आधार पर अंतर-

      महासागरीय जलधाराएँ नदी के समान प्रवाहित होती है। जबकि ज्वार में जल का स्तर ऊपर उठता है।

(9) आर्द्रता ग्रहण करने के आधार पर अंतर-

     महासागरीय गर्म जल धाराएँ अपने ऊपर आर्द्रता के साथ चलती है। जबकि ज्वार अपने ऊपर आर्द्रता के साथ नहीं उठती है।

ज्वार भाटा के प्रभाव

      ज्वार-भाटा महासागरीय जल की एक ऐसी गति है जिसका प्रभाव मानव तथा पर्यावरण दोनों पर पड़ता है। यह ज्ञात है कि समुद्रों की अपेक्षा तटवर्ती क्षेत्रों में ज्वार का प्रभाव अधिक पड़ता है। ज्वार-भाटे का प्रभाव अन्य कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर पड़ता है। जैसे:-

(1) जलयानों के आगमन पर प्रभाव-

       समुद्रों में जलयानो के आगमन पर ज्वार-भाटे के प्रभाव को देखते हुए ज्वार-भाटे के समय और उससे उत्पन्न लहरों की ऊँचाइयों का पूर्वानुमान अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

(2) कचड़े के निस्तारण में सहायक-

       समुद्रों के तट पर स्थित महानगरों से निकलने वाले कचड़े को प्रायः सागर जल में डाल दिया जाता है जिससे पर्यावरण प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है। ज्वार-भाटा द्वारा इन कचड़ों को बहाकर दूर समुद्र में पहुँचा दिया जाता है। इस प्रकार कचड़े के निस्तारण में ज्वार-भाटा से बड़ी सहायता मिलती है। ज्वारीय तरंगों से बंदरगाहों में जमा होने वाले मलवे की सफाई होती रहती है। किंतु कहीं-कहीं ज्वारीय तरंगों के द्वारा पोताश्रयों एवं पत्तनों में भारी मात्रा में मलवे का निक्षेपण किया जाता है जिसे साफ करने के लिए काफी धन खर्च करना पड़ता है।

(3) मत्स्य उद्योग पर प्रभाव-

      ज्वार-भाटा मत्स्य उद्योग को भी प्रभावित करता है। ज्वारीय तरंगे विभिन्न प्रकार के प्लैंकटन के वितरण द्वारा मछलियों के लिए भोजन की आपूर्ति करने में सहायक होती है जिनसे उनकी संख्या में वृद्धि होती है। अनेकों तटों पर ज्वार-भाटा के फलस्वरुप विभिन्न प्रकार के छोटे-छोटे समुद्री जीव, शंख सीप तथा अनेक ऐसे पदार्थ बिखेर दिए जाते हैं। इन्हें चुनकर लोग अपना जीविकोपार्जन करते हैं।

(4) बंदरगाहों पर प्रभाव-

       ज्वार-भाटे से सर्वाधिक लाभ संसार के उन बड़े-बड़े बंदरगाहों को होता है जो समुद्र से कुछ दूर नदियों के किनारे बनाए गए हैं। कोलकाता, लंदन एवं अन्य ऐसे बंदरगाह तक बड़े मालवाही पोतों को ज्वार के समय जल स्तर ऊँचा होने पर पहुँचाया जाता है। ज्वारों के अभाव में ऐसे जहाजों को दूर समुद्र में खड़ा रहना पड़ता है तथा माल की ढुलाई में काफी व्यय पड़ता है।

(5) विद्युत उत्पादन में सहायक-

        ज्वारीय तरंगों की ऊँचाई का लाभ उठाते हुए आधुनिक तकनीकी के अनुप्रयोग द्वारा विद्युत उत्पादन किया जा सकता है। इनमें कोई संदेह नहीं कि कुछ तटों पर ज्वारीय तरंगों से विद्युत उत्पादन की विशाल संभावनायें पाई जाती है। किंतु इस दिशा में अभी सीमित प्रयास किए गए हैं। आशा की जाती है कि भविष्य में ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों की उपलब्धता क्षीण हो जाने पर समुद्र के तट पर बिजली उत्पन्न करने के लिए बड़ी संख्या में विद्युत शक्ति केंद्रों की स्थापना की जाएगी

(6) तटों के आकार-प्रकार पर प्रभाव-

      ज्वा-भाटा का तटों के आकार-प्रकार पर भी प्रभाव पड़ता है। ज्वारीय धाराएँ एवं तरंगे अपरदन, परिवहन तथा निक्षेपण क्रियाओं द्वारा तटों के स्वरूप परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान करती है।

निष्कर्ष:-

       उपर्युक्त तथ्यों के विवरण से स्पष्ट होता है कि ज्वार-भाटा का प्रभाव जलयानों के आवागमन, कचड़े की सफाई, मत्स्य उद्योग, बंदरगाह, विद्युत उत्पादन, तटों के आकार-प्रकार एवं पर्यावरण पर पड़ता है।



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17. Theories related to the origin of the coral reef / प्रवाल भित्ति के उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत

17. Theories related to the origin of the coral reef

(प्रवाल भित्ति के उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत)


Theories related to the origin of the coral reef 

प्रवाल भित्ति के उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत

             प्रवाल भित्ति की उत्पत्ति के संबंध में तीन प्रमुख सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं-

(1) अवतलन का सिद्धांत 

(2) स्थायी स्थल का सिद्धांत 

(3) हिमानी नियंत्रण का सिद्धांत

1. अवतलन का सिद्धांत

      अवतलन सिद्धांत को 1837 ई० में चार्ल्स डार्विन महोदय ने मार्शल द्वीप समूह के बिकनी द्वीप के संदर्भ में प्रस्तुत किया। कालांतर में अमेरिकी भूगोलवेत्ता 1883 में डाना, डेविस(1928), मोनार्ड(1964) इत्यादि ने सिद्धांत का समर्थन करते हुए कई प्रमाण प्रस्तुत किया। 

        अवतलन के सिद्धांत के अनुसार प्रारंभ में प्रवाल जीवों का विकास किनारे पर तटीय प्रवाल के रूप में होता है। लेकिन जब किसी कारणवश भूगर्भिक हलचल के कारण तटीय क्षेत्रों का धँसान प्रारंभ हो जाता है तो पॉलिप भोजन ग्रहण करने हेतु ऊपर की ओर विकसित होना शुरू हो जाते हैं, जिसके कारण धीरे-धीरे प्रवाल भित्तियों की मोटाई बढ़ने लगती है। फलत: तटीय प्रवाल भित्ति अवरोधक प्रवाल भित्ति का निर्माण होता है। अंततः जब संपूर्ण भाग का धँसान क्रिया पूर्ण हो जाती है तो कहीं कहीं पर  प्रवाल भित्ति रिंग के रूप में दिखाई देने लगते हैं जिसे वलयाकार प्रवाल भित्ति कहते हैं। 

        स्पष्ट है कि प्रवाल भित्तियों का विकास डार्विन के अनुसार क्रमिक रूप से होता है।सबसे पहले तटीय प्रवाल भित्ति ,उसके बाद अवरोधक प्रवाल भित्ति और अंत में वलयाकार प्रवाल भित्ति का विकास होता है। इसलिए अवतलन सिद्धांत को एक “उद्द्विदकासीय सिद्धांत” माना जाता है।
Theories related to the origin

सिद्धांत के पक्ष में प्रस्तुत प्रमाण

डाना, डेविस, मोनार्ड एवं स्वयं डार्विन महोदय ने अवतलन सिद्धांत प्रमाणित करने हेतु कई प्रमाण प्रस्तुत किए। डेविस महोदय ने अपना प्रमाण “कोरल रीफ प्रॉब्लम” नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया।

जैसे :-

(i) डार्विन ने कहा कि वलयाकार प्रवाल भित्ति वहीं पर विकसित हो रहे हैं जहाँ पर द्वीप का क्रमिक रूप से धँसान हो रहा है। इसे बिकनी द्वीप के संदर्भ में अध्ययन किया जा सकता है।

(ii) अवतलन/धँसान के कारण प्रवाल भित्ति की मोटाई और लैगून की गहराई में लगातार वृद्धि होती है लेकिन धँसान की क्रिया मंद होती है जबकि उससे तेज गति में प्रवाल का विकास होता है।

(iii) प्रवाल भितियों में अलग-अलग काल में निर्मित प्रवाल भित्तियों का स्तर पाया जाता है। जो अवतलन के पक्ष में सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है। सोनार नामक यंत्र से जब हवाई द्वीप का अध्ययन किया गया तो वहाँ 330 मीटर गहराई तक अवतलन का प्रमाण मिला।

(iv) बिकनी और फुनाफूटी पर 700 मीटर गहराई कुएँ की खुदाई कर अवतलन का प्रमाण ढूंढा गया।

(vi) जब यह स्पष्ट हुआ कि प्रवाल भित्तियों का निर्माण अवतलन से हुआ है तो प्रारंभ में यह अंदाज लगाया गया कि अवतलन वाले क्षेत्रों में पेट्रोलियम का संचित भंडार होना चाहिए। इसी अंदाज प्रवाली द्वीपों पर तेल कुओं की खुदाई की गई तो वहाँ से खनिज तेल का प्रमाण मिला।

आलोचना/दोष

(i) सोलोमन द्वीप और पलाऊ द्वीप मिलने वाले प्रवाल भित्तियों की व्याख्या अवतलन सिद्धांत से नहीं की जा सकती है।

(ii) डार्विन ने यह नहीं बताया कि समुद्री किनारों का अवतलन क्यों कब और कैसे हुआ।

(iii) कई ऐसे प्रवाल भित्ति है जिनका निर्माण धँसान वाले क्षेत्र में नहीं बल्कि उत्थान वाले क्षेत्रों में मिलते हैं। जैसे ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर।

(iv) यदि यह मान लिया जाए कि प्रवाल भित्तियों का क्रमिक विकास अवतलन से हो रहा है तो अब तक सभी प्रवाल भित्तियों को विलुप्त हो जाना चाहिए था।

(v) अवतलन सिद्धांत में बताया गया है कि प्रवाल भित्तियों का विकास क्रमिक रूप से होता है। इसका तात्पर्य है कि एक समय में एक ही स्थान पर एक ही प्रकार का प्रवाल भित्ति मिलना चाहिए। लेकिन कई क्षेत्र हैं जहाँ पर अनेकों प्रकार के प्रवाल भित्ति का प्रमाण मिलता है।

निष्कर्ष:

      उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अवतलन सिद्धांत कुछ प्रवाल भित्तियों की उत्पत्ति की सटीक व्याख्या करता है। वहीं कुछ प्रवाल भित्ति के संदर्भ में इसके द्वारा सटीक व्याख्या नहीं होती है। फिर भी प्रवाल भित्ति की उत्पत्ति की दिशा में किया गया प्रथम सैद्धांतिक कार्य के रूप में इसे मान्यता प्राप्त है।

2. स्थायी स्थल का सिद्धांत (Non Subsideence Theory)

      डार्विन के द्वारा प्रतिपादित अवतलन के सिद्धांत का खंडन करते हुए 1880 ई० में जॉनमर्रे ने प्रवाल भित्तियों के उत्पत्ति की व्याख्या करने हेतु स्थायी स्थल का सिद्धांत प्रस्तुत किया। मर्रे के अनुसार “प्रवाल भित्ति वैसे स्थानों पर मिलते हैं जहाँ पर अवतलन का कोई प्रमाण नहीं है। वे कहते हैं कि प्रवाली भित्ति समुद्र में वहीं पर विकसित होते है जहाँ पर स्थायी रूप से छिछला समुद्र या चबूतरा या डूबा हुआ द्वीप मिलते है। उनपर ही ये प्रवाली जीव विकसित होना प्रारंभ करते हैं ताकि समुद्री जल में लटके खाद्य पदार्थों का ग्रहण कर सके। ज्यों-ज्यों प्रवाली  जीवों की संख्या बढती जाती है, त्यों-त्यों प्रवाल भिति की मोटाई भी बढ़ती जाती है और अंततः समुद्रतल से ऊपर आकर वलयाकार प्रवाल भित्त्ति का निर्माण करते हैं।” प्रवाल प्रारंभ में लगभग तट से सटे सिकसित होने का प्रयास करते है लेकिन मृत प्रवाल के चुना पत्थर घुलने से लैगून की गहराई कम होती है तथा ज्यों-ज्यों प्रवाल की मोटाई बढ़ती है, त्यों -त्यों लैगून की गहराई भी घटती जाती है।

सिद्धांत के पक्ष प्रमाण

(1) मर्रे के अनुसार प्रवाल भित्ति की अधिकतम मोटाई 180 फीट तक होती है क्योंकि इसी गहराई तक अधिकतर चबूतरे समुद्र में डूबे हुए मिलते है। हिन्द और प्रशान्त महासागर में अनेक चतूबरों का प्रमाण मिलता है।

(2) मर्रे के सिद्धांत के पक्ष में लीकाण्टे, स्लूटर और सैम्पर जैसे भूगोलवेताओं ने भी इस सिद्धांत का समर्थन करते हुए कई प्रमाण इक्कठे किये हैं-

          इन विद्वानों के अनुसार प्रवाली जीवों के शरीर से प्राप्त चुनापत्थर के घुलने  से आरंभ में छिछले लैगून का विकास होता है लेकिन कालांतर में प्रवाल भित्ति की मोटाई बढ़ने के करण लैगून गहरा होता जाता है।

आलोचना

1. स्थायी स्थल सिद्धांत की सबसे बड़ी आलोचना लैगून की गहराई को लेकर है क्योंकि प्रवाल भित्ति की मोटाई बढ़ने से लैगून की की गहराई बढ़ती है बढ़ती है न कि घटती।

2. मर्रे के अनुसार अधिकतर समुद्री चबूतरे 180 फीट गहराई पर मिलते है। परन्तु ऐसा सर्वत्र होना असंभव है। कुछ विद्वानों ने यह प्रश्न उठाया है कि अगर कोई उसकी चबूतरा कम गहराई वाला मिलता है तो क्या उस पर प्रवाल का विकास नहीं हो सकेगा।

3. मर्रे के अनुसार प्रवालों के शरीर से प्राप्त चुनापत्थर जल में घुलननशील होते हैं। अगर इस तथ्य को मान लिया जाय तो सभी प्रवाल भिति जल में घुलकर विलुप्त हो जायेंगें। लेकिन ऐसा नही हो रहा है।

निष्कर्ष :

      यह कहा जाता है कि यह एक ऐसा सिद्धांत/परिकल्पना है जो वैज्ञानिक एवं तार्किक विश्लेषण से काफी दूर है।

3.  हिमानी नियंत्रण का सिद्धांत

      हिमानी नियंत्रण सिद्धांत को अमेरिकी भूगोलवेता रेगिनॉल्ड डेली ने 1915 ई० में प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत को उन्होंने हवाई द्वीप के प्रवाल भित्तियों के अध्ययन करने के बाद प्रस्तुत किया था। यह सिद्धांत स्थिर स्थल सिद्धांत का विकलित स्वरूप है। हिमानी नियंत्रण सिद्धांत के अनुसार विश्व के सभी प्रवाल भित्तियों का निर्माण प्लिस्टोसीन कल्प में हुए हिमानीयुग के दौरान और उसके बाद हुआ है।

         हिमानी नियंत्रण सिद्धांत के अनुसार प्लिस्टोसिन कल्प में जब हिमयुग आया तो समुद्र का जल स्तर 76 मी० तक नीचे चला गया और सभी समुद्री प्रवाल समुद्री तल के ऊपर आ गये तथा अधिक शीत वातावरण के कारण प्रवाल जीवित न रह सके। लेकिन कुछ प्रवाल जीवित रहे। समुद्र के जलस्तर नीचे गिरने के कारण तरंगों के द्वारा जगह-जगह पर किये गए अपरदन से कई समुद्री चबूतरों का विकास हुआ। जब हिमयुग समाप्त होने लगा तो समुद्र का जल स्तर भी बढ़ने लगा तथा समुद्र मे जो प्रवाली जीव बच गये थे वे नये चबूतरों पर आकर भोजन ग्रहण करने हेतु नया उपनिवेश स्थापित करने लगे। उसके बाद ज्यों-ज्यों समुद्र का तल बढ़ा त्यों-त्यों प्रवाल की भी मोटाई बढ़ने लगी।

       हिमानी नियंत्रण सिद्धांत के अनुसार प्रारंभ में लैगून की गहराई कम थी। लेकिन बाद में समुद्र में जल स्तर बढ़ने के करण लैगून की गहराई में बढोत्तरी हुई।

      इस तरह स्पष्ट होता है कि डेली महोदय ने प्रवाल भित्तियों की उत्पत्ति के संबंध में एक वैज्ञानिक एवं तार्किक सिद्धांत प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत की सबसे  बड़ी विशेषता यह है कि- 

1. प्रवाल भित्तियों के विकास की क्रिया को जलवायु परिवर्तन से जोड़ा।

2. इस सिद्धांत से प्रवाल भित्तियों की मोटाई बढ़ने के साथ-2 लैगून की गहराई भी बढ़ती है। इसका भी व्याख्या होता है। 

प्रमाण

  • प्रवाल भितियों में कई जगह जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। 
  • डेली ने अपने सिद्धांत में बताया कि प्रवाल भित्तियों के ऊपरी तल चपटे होते हैं, जो कि अध्ययन से ऐसा प्रमाणित हो चुका है।
  • लैगून की गहराई की उन्होंने प्रवाल भित्तियों के बढ़ते मोटाई से नहीं जोड़ा है बल्कि समुद्र के बढ़ते हुए जलस्तर से जोड़ा है जो एक सटीक तर्क है।

आलोचना

  • डेली के अनुसार समुद्र तल 76 मी० तक नीचे चला गया था। लेकिन अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि समुद्र के जलस्तर में इससे भी अधिक गिरावट आई थी।
  • समुद्र के जलस्तर गिरने के बाद समुद्र के तरंगों के द्वारा अपदन से नये चबूतरों का विकास हुआ होगा। इन नये चबूतरों पर कीचड़ भी पाये गये होंगें तो ऐसे में कीचड़युक्त चबूतरे पर पुन, प्रवाल कैसे विकसित हो सकते हैं।
  • डेविस महोदय ने इसका आलोचना करते हुए कहा कि पूरे विश्व का समुद्री जलस्तर एक समान ऊपर उठा है। ऐसे में बली लैगून की गहराई एक समान होना चाहिए लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है।
  • डेली के अनुसार हिमयुग में 76 मी० की गहराई पर चबूतरों का विकास हुआ था। इसका तात्पर्य है कि प्रवाल भित्तियों की मोटाई 76 मी० तक ही होना चाहिए। लेकिन विकनी द्वीप जैसे अनेक द्वीप है जो 180 मी० से अधिक गहरे है।

एक के बाद एक दो सिद्धांतों की तुना करना एक नजर में देखें-

निष्कर्ष

        उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि कोई भी एक सिद्धांत प्रवाल भित्ति की उत्पत्ति की व्याख्या करने में सक्षम नहीं है। अत: अलग-अलग स्थानों पर विकसित प्रवास भित्तियों की व्याख्या अलग-अलग सिद्धांतों से की जा सकती है। अगर ऐसा संभव नहीं है तो सभी सिद्धांतों को मिलाकर एक एकीकृत सिद्धांत प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।


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16. Coral Reaf (प्रवाल भित्ति)

16. Coral Reaf (प्रवाल भित्ति)


Coral Reaf (प्रवाल भित्ति)Coral Reaf

          समुद्र में कई प्रकार के जीव-जंतु पाए जाते हैं। उनमें से एक जीव का नाम पॉलिप है जिसके शरीर से चूना पत्थर चट्टानों का स्राव होता है। इसे मूँगा भी कहते हैं। यह झूंडों में अधिवासित होने की प्रवृत्ति रखता है। ये समुद्र के नितल पर भोजन की तलाश में इधर-उधर घूमते रहते हैं। ये भोजन की तलाश में छिछले समुद्री भाग पर जमा होने लगते हैं और भोजन ग्रहण करने के लिए एक-दूसरे पर चढ़ने लगते हैं जिसके कारण सबसे नीचे स्थित पॉलिप दबाव क्रिया के कारण मरने लगते हैं। 

       पॉलिप के मृत शरीर और उनके शरीर से निकले चूनापत्थर का निक्षेपण धीरे-धीरे छिछले समुद्री भूपटल पर जमा होने लगता है। घोंघा या मोलस्का, ब्रायोजोआ, कोरामेनिफेरा एवं अन्य हाइड्रोजोआ जैसे जीवों से प्राप्त पदार्थ चूना पत्थर के चट्टानों को जोड़ देते हैं जिसके कारण छिछले समुद्री भागों में गुंबदाकार या एक दीवाल के समान निक्षेपित स्थलाकृति बनती है, जिसे प्रवाल भित्ति कहते हैं।

प्रवाल भित्ति की विशेषताएँ

(1) प्रवाल भित्ति एक प्रकार के समुद्री जीवों के मरने एवं उनके निक्षेपण से निर्मित स्थलाकृति है।

(2) प्रवाल भित्ति का विकास विषुवतीय क्षेत्र को छोड़कर 35°N से 35°S अक्षांश के बीच होता है।

(3) उपयुक्त अक्षांशों में ही प्रवाल भित्ति का विकास छिछले सागरीय क्षेत्र में तथा तटीय भाग से थोड़ा दूर होती है।

(4) प्रवाल भित्ति प्राय: महाद्वीपों के पूर्वी तट पर विकसित होते हैं।

(5) प्रवाल भित्ति का आकार एक दीवार के समान या गुंबदाकार होता है।

(6) प्रवाल भित्ति और तट के बीच छिछले सागर मिलते हैं, जिसे लैगून कहते हैं।

भौगोलिक कारक/उपयुक्त परिस्थितिययाँ

(1) प्रवाल भित्ति के विकास हेतु 20 से 21℃ के बीच तापमान होना चाहिए। इसके लिए आदर्श वार्षिक तापमान 20℃ माना जाता है।

(2) प्रवाल भित्ति के विकास हेतु आदर्श गहराई 45 से 55 मीटर मानी जाती है क्योंकि इसी गहराई तक सूर्य की किरणें पहुंचती है। विभिन्न प्रकार के प्लैंकटन का विकास होता है।

(3) प्रवाल वहीं पर विकसित होते हैं जहां पर चूर मात्रा में प्लैंकटन मिलते हैं। प्रवाली जीव न तो अत्याधिक लवणता वाले और न ही अत्यधिक स्वच्छ जल में विकसित होते हैं इनके विकास हेतु 27 से 30 ‰ लवणता उपयुक्त मानी जाती है।

(4) प्रवाली जीवों के लिए कीचड़युक्त जल भी हानिकारक होता है। यही कारण है कि ये महाद्वीपों के किनारे से सटे विकसित नहीं होते बल्कि कुछ दूरी पर विकसित होते हैं।

(5) प्रवाल भित्ति का विकास तीव्र महाद्वीपीय ढालों पर नहीं होता क्योंकि उन ढालों पर न तो प्लैंकटन  स्थिर रह पाते हैं और न ही स्वयं पॉलिप झुंडो में अधिवास कर सकते हैं।

(6) प्रवाली जीवों का विकास प्राय: महाद्वीपों के पूर्वी तट पर होता है क्योंकि महाद्वीपों के पूर्वी तट पर विषुवतीय गर्म जलधारा का प्रभाव होता है जबकि पश्चिमी तट पर ठंडी समुद्री जलधारा के कारण ये विकसित नहीं हो पाते हैं।

(7) प्रवाल भित्तियों के विकास को प्रचलित हवा भी प्रभावित करती है। जैसे उत्तरी गोलार्ध में महाद्वीपों के पूर्वी तट पर वाणिज्य हवा समुद्र से स्थल की ओर चढ़ती है जबकि पश्चिमी तट पर स्थल से समुद्र की ओर उतरती है। इसी तरह की घटना दक्षिणी गोलार्ध में भी होती है। पूर्वी तटीय भागों में वाणिज्य हवा के द्वारा प्लैंकटन को दूर-दूर से लाकर तटीय भागों में जमा कर दिया जाता है जबकि पश्चिमी तट में वाणिज्यिक हवा तट से दूर ले जाने की प्रवृत्ति रखते हैं।

         उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि प्रवाल भित्ति विभिन्न प्रकार के भौगोलिक परिस्थितियों की देन है।

प्रवाल भित्ति के प्रकार (Types of Coral Reaf)

         महासागरों में मिलने वाली प्रवाल भित्तियों को निम्नलिखित दो वर्गों में विभाजित किया गया है-

I आकृति तथा उत्पत्ति के आधार पर वर्गीकरण

      आकृति तथा उत्पत्ति के आधार पर भित्तियों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है, जो निम्नलिखित हैं:-

(1) तटीय प्रवाल भित्ति (Fringing Coral Reaf)

(2) अवरोधक प्रवाल भित्ति (Barrier Coral Reaf)

(3) वलयाकार प्रवाल भित्ति (Atolls)

(1) तटीय प्रवाल भित्ति 

       तटीय प्रवाल भित्ति प्रायः तट के समानांतर विकसित होता है। इस प्रकार के प्रवाल भित्ति की मोटाई 50 से 55 मीटर तक होता है। लैगून अत्यंत छिछला होता है। लैगून की गहराई 1.5 से 3 मीटर तक होती है। ऐसे लैगून को Boot Channel कहते हैं। लैगून के सतह पर मृत पॉलिप इधर-उधर बिखरे पाए जाते हैं। तटीय प्रवाल भित्ति में तट के किनारे वाले प्रवाल भित्ति का ढाल मंद होता है जबकि समुद्र की ओर वाला ढाल तीव्र होता है। अंडमान निकोबार और अमेरिका के फ्लोरिडा तट पर तटीय प्रवाल भित्ति पाए जाते हैं।

(2) अवरोधक प्रवाल भित्ति 

        अवरोधक प्रवाल का विकास के तट समानांतर होता है लेकिन तटीय प्रवालों की तुलना में यह निम्न संदर्भों में भिन्न होता है। जैसे –

(i) इनमें प्रवाल भित्ति की मोटाई 55 मीटर से अधिक होता है। आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर मिलने वाला ग्रेट बैरियर रीफ की मोटाई 180 मीटर तक है। 

(ii) इसमें लैगून की गहराई भी अधिक होती है और अवरोधक प्रवाल भित्ति के द्वारा विकसित लैगून की गहराई 60 मीटर तक होती है। 

(iii) अवरोधक प्रवाल भित्ति के दोनों ढाल तटीय प्रवाल भित्ति की तुलना में अधिक होता है। सामान्यत: स्थल भाग की ओर वाला ढाल 15° से 20° और समुद्र की ओर वाला ढाल 45° तक होता है। ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड के पूर्वी तट पर विश्व की सबसे लंबी अवरोधक प्रवाल भित्ति पाई जाती है जिसकी लंबाई 1920 किलोमीटर और मोटाई 180 मीटर, न्यूनतम चौड़ाई 16 किलोमीटर, अधिकतम चौड़ाई 144 किलोमीटर है। यह तट से लगभग 32 किलोमीटर दूर स्थित है। अवरोधक प्रवाल भित्ति का प्रमाण न्यूकैलेडोनियन द्वीप समूह के पास भी मिलता है।

(3) वलयाकार प्रवाल भित्ति

       एटॉल प्रवाल भित्ति का विकास ज्वालामुखी द्वीपों के चारों ओर होता है। जब प्रवाल भित्ति धीरे-धीरे विकसित होकर समुद्र तल से ऊपर आ जाते हैं तो प्रवाल द्वीप का निर्माण करते हैं। वलयाकार/एटॉल प्रवाल भित्ति में मोटाई, लैगून की गहराई और ढाल तटीय और अवरोधक प्रवाल भित्ति की तुलना में अधिक होता है। वलयाकार प्रवाल भित्ति भी कई प्रकार के होते हैं। जैसे –

(i) वैसा वलयाकार प्रवाल भित्ति जिसके मध्य में लैगून दिखता हो। जैसे : लक्ष्यद्वीप।

(ii) वैसा वलयाकार प्रवाल भित्ति जिसके मध्य में लैगून एवं छोटे-छोटे द्वीप दोनों मिलते हो। प्रशांत महासागर के अधिकतर प्रवाल भित्ति इसी प्रकार के हैं। 

(iii) वैसा प्रवाल भित्ति  जिसके मध्य में लैगून का अभाव हो। जैसे : हवाई द्वीप।

II स्थिति के आधार पर वर्गीकरण

          स्थिति के आधार पर वर्गीकरण स्थिति के आधार पर प्रवाल भित्तियों को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया गया है-

1. उष्ण कटिबंधीय प्रवाल भित्तियाँ (Tropical Coral Reefs):

      उष्ण कटिबंधीय प्रवाल भित्तियों का अक्षांशीय विस्तार 25° उत्तरी अक्षांश से 25° दक्षिणी अक्षांश तक पाया जाता है। इन अक्षांशों के मध्य प्रवालों के लिए आवश्यक भौतिक दशाएँ आसानी से उपलब्ध होती रहती है। प्रशान्त महासागर, अटलांटिक महासागर तथा हिन्द महासागर में महाद्वीपों तथा छोटे-छोटे द्वीपों के निकट प्रवाल भित्ति अधिकता में पायी जाती है। महाद्वीपों के पूर्वी भाग में जहाँ उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र स्थित है, प्रवाल जीव अपनी भित्तियों की रचना करने में अधिक सफल होते हैं। उत्तरी तथा दक्षिणी अमरीका, अफ्रीका तथा आस्ट्रेलिया महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में प्रायः ठण्डी धाराओं के बहने के कारण समुद्र के जल के तापमान में कमी आ जाती है तथा प्रवाल जीव मर जाते हैं।

     इसके विपरीत महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में गर्म धाराओं के बहने से प्रवालों का प्रमुख भोजन कैल्शियम अर्थात् चूना अधिक मात्रा में उत्पन्न होता है, जिसके कारण प्रवाल जीव अपने विकास में उन्नतोत्तर वृद्धि करते रहते हैं। प्रवाल जीवों के लिए अत्यधिक तापमान हानिकारक होता है। इसलिए भूमध्य रेखा तथा इसके आस-पास प्रवाल जीव नहीं पाये जाते हैं। प्रशान्त महासागर के पश्चिमी तथा मध्य भाग में प्रवाल भित्तियाँ पाई जाती हैं। इन भागों में स्थित ज्वालामुखियों पर भी प्रवाल जीव अपनी भित्ति का निर्माण आरम्भ कर देते हैं। उष्ण कटिबंधीय प्रवाल भित्तियाँ भूगर्भ में होने वाली विभिन्न प्रकार की गतियों में भी उत्पन्न हो जाती हैं। महासागरीय धरातल भूगर्भ की गतियों के कारण 100 फीट तक ऊंचे उठ जाते हैं। कहीं-कहीं यह 400 फीट तक ऊंचा उठ गया है जिसे अपनी अलग-अलग परिस्थिति के कारण विभिन्न नामों से जाना जाता है।

2. सीमान्त प्रदेशीय प्रवाल भित्तियाँ (Marginal Belt Coral Reefs):

     सीमान्त प्रदेशीय प्रवाल भित्तियों का अक्षांशीय विकास 25° उत्तरी अक्षांश से 30° दक्षिणी अक्षांश तक विस्तृत है। लेकिन ये प्रवाल भित्तियाँ प्राचीन समय में पायी जाती थी। प्लीस्टोसीन हिमयुग में समुद्र के जल की सतह नीची हो जाने के कारण विकासोन्मुखी प्रवाल भित्तियों के प्रवाल अपनी जान गंवा बैठे। इनके साथ-साथ प्रवाल भित्तियाँ भी धीरे-धीरे समाप्त हो गई। वर्तमान समय में ये प्रवाल भित्तियाँ बहुत पुराने टापू के रूप में पाई जाती है। इनमें से अनेक प्रवाल भित्तियाँ महासागरों में जल की सतह से कुछ ही नीचे काफी बड़े-बड़े चबूतरे के रूप में दिखलाई देती है। उदाहरण के लिए बरमूदा, बहामा तथा हवाई द्वीप आदि चबूतरे स्पष्ट रूप से दिखलाई देते हैं। किसी समय जब समुद्र के पानी का तल बढ़ जाता है तो प्रवाल जीव इन चबूतरों पर अपनी भित्तियों का निर्माण करना प्रारम्भ कर देते हैं। इस प्रकार की प्रवाल भित्तियाँ कम संख्या में मिलती हैं। उदाहरण के लिए छोटी एण्डीलीज की प्रवाल भित्तियाँ आदि।

प्रवाल भित्ति के उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत

        प्रवाल भित्ति की उत्पत्ति के संबंध में तीन प्रमुख सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं-

(1) अवतलन का सिद्धांत 

(2) स्थायी स्थल का सिद्धांत 

(3) हिमानी नियंत्रण का सिद्धांत

 अवतलन का सिद्धांत 

     अवतलन सिद्धांत को 1837 ई० में चार्ल्स डार्विन महोदय ने मार्शल द्वीप समूह के बिकनी द्वीप के संदर्भ में प्रस्तुत किया। कालांतर में अमेरिकी भूगोलवेत्ता 1883 में डाना, डेविस(1928), मोनार्ड(1964) इत्यादि ने सिद्धांत का समर्थन करते हुए कई प्रमाण प्रस्तुत किया।

         अवतलन के सिद्धांत के अनुसार प्रारंभ में प्रवाल जीवों का विकास किनारे पर तटीय प्रवाल के रूप में होता है। लेकिन जब किसी कारणवश भूगर्भिक हलचल के कारण तटीय क्षेत्रों का धँसान प्रारंभ हो जाता है तो पॉलिप भोजन ग्रहण करने हेतु ऊपर की ओर विकसित होना शुरू हो जाते हैं, जिसके कारण धीरे-धीरे प्रवाल भित्तियों की मोटाई बढ़ने लगती है। फलत: तटीय प्रवाल भित्ति अवरोधक प्रवाल भित्ति का निर्माण होता है। अंततः जब संपूर्ण भाग का धँसान क्रिया पूर्ण हो जाती है तो कहीं कहीं पर  प्रवाल भित्ति रिंग के रूप में दिखाई देने लगते हैं जिसे वलयाकार प्रवाल भित्ति कहते हैं। 

        स्पष्ट है कि प्रवाल भित्तियों का विकास डार्विन के अनुसार क्रमिक रूप से होता है।सबसे पहले तटीय प्रवाल भित्ति ,उसके बाद अवरोधक प्रवाल भित्ति और अंत में वलयाकार प्रवाल भित्ति का विकास होता है। इसलिए अवतलन सिद्धांत को एक “उद्द्विदकासीय सिद्धांत” माना जाता है।

सिद्धांत के पक्ष में प्रस्तुत प्रमाण

        डाना, डेविस, मोनार्ड एवं स्वयं डार्विन महोदय ने अवतलन सिद्धांत प्रमाणित करने हेतु कई प्रमाण प्रस्तुत किए। डेविस महोदय ने अपना प्रमाण “कोरल रीफ प्रॉब्लम” नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया।

जैसे :-

(i) डार्विन ने कहा कि वलयाकार प्रवाल भित्ति वहीं पर विकसित हो रहे हैं जहाँ पर द्वीप का क्रमिक रूप से धँसान हो रहा है। इसे बिकनी द्वीप के संदर्भ में अध्ययन किया जा सकता है। 

(ii) अवतलन/धँसान के कारण प्रवाल भित्ति की मोटाई और लैगून की गहराई में लगातार वृद्धि होती है लेकिन धँसान की क्रिया मंद होती है जबकि उससे तेज गति में प्रवाल का विकास होता है।

(iii) प्रवाल भितियों में अलग-अलग काल में निर्मित प्रवाल भित्तियों का स्तर पाया जाता है। जो अवतलन के पक्ष में सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है। सोनार नामक यंत्र से जब हवाई द्वीप का अध्ययन किया गया तो वहाँ 330 मीटर गहराई तक अवतलन का प्रमाण मिला।

(iv) बिकनी और फुनाफूटी पर 700 मीटर गहराई कुएँ की खुदाई कर अवतलन का प्रमाण ढूंढा गया।

(vi) जब यह स्पष्ट हुआ कि प्रवाल भित्तियों का निर्माण अवतलन से हुआ है तो प्रारंभ में यह अंदाज लगाया गया कि अवतलन वाले क्षेत्रों में पेट्रोलियम का संचित भंडार होना चाहिए। इसी अंदाज प्रवाली द्वीपों पर तेल कुओं की खुदाई की गई तो वहाँ से खनिज तेल का प्रमाण मिला।

आलोचना/दोष

(i) सोलोमन द्वीप और पलाऊ द्वीप मिलने वाले प्रवाल भित्तियों की व्याख्या अवतलन सिद्धांत से नहीं की जा सकती है। 

(ii) डार्विन ने यह नहीं बताया कि समुद्री किनारों का अवतलन क्यों कब और कैसे हुआ। 

(iii) कई ऐसे प्रवाल भित्ति है जिनका निर्माण धँसान वाले क्षेत्र में नहीं बल्कि उत्थान वाले क्षेत्रों में मिलते हैं। जैसे ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर। 

(iv) यदि यह मान लिया जाए कि प्रवाल भित्तियों का क्रमिक विकास अवतलन से हो रहा है तो अब तक सभी प्रवाल भित्तियों को विलुप्त हो जाना चाहिए था। 

(v) अवतलन सिद्धांत में बताया गया है कि प्रवाल भित्तियों का विकास क्रमिक रूप से होता है। इसका तात्पर्य है कि एक समय में एक ही स्थान पर एक ही प्रकार का प्रवाल भित्ति मिलना चाहिए। लेकिन कई क्षेत्र हैं जहाँ पर अनेकों प्रकार के प्रवाल भित्ति का प्रमाण मिलता है।

निष्कर्ष :

       उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अन्तः सागरीय रूपों में प्रवाल भित्तियों का अलग विशिष्ट महत्व है। यद्यपि अवरोधक तथा वलयाकार प्रवाल भित्तियों के निर्माण की समस्या अत्यन्त जटिल है। इसके संबंध में अनेक विद्वानों ने अपने-अपने मतों का प्रतिपादन किया है लेकिन आज भी डार्विन तथा डाना के अवतलन सिद्धांत को अधिक महत्वपूर्ण माना है।


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15. Tides / ज्वार भाटा

15. Tides (ज्वार भाटा)


ज्वार भाटा (Tides)⇒

            समुद्री जल में कई प्रकार की गतियाँ पाई जाती है। जैसे- लहर, जलधारा, ज्वार-भाटा। सर्वप्रथम मर्रे महोदय ने ज्वार-भाटा को परिभाषित करते हुए कहा- “सूर्य और चंद्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण समुद्री तल के नियमित रूप से ऊपर उठने और नीचे बैठने की क्रिया को ज्वार-भाटा कहते हैं।” मर्रे की इस परिभाषा से यह स्पष्ट नहीं होता है कि एक दिन में समुद्री तल कितनी बार ऊपर उठता है और कितनी बार नीचे गिरता है। अतः इस समस्या को मारमर महोदय ने अपनी परिभाषा में दूर करते हुए कहा “समुद्र का जल प्रतिदिन दो बार ऊपर उठता है और दो बार नीचे गिरता है तथा आकर्षण के फलस्वरूप समुद्र तल के ऊपर उठने तथा आगे बढ़ने को ज्वार तथा समुद्री तल के नीचे उतरने और पीछे की ओर हटने को भाटा कहते है।” इस प्रकार स्पष्ट है कि नियमित रूप से समुद्री जल का ऊपर उठना और नीचे बैठना ही ज्वार भाटा कहलाता है।

        ज्वार-भाटा के संबंध में मानव प्राचीन काल से ही जानने को उत्सुक रहा है। सर्वप्रथम हेरोडोटस एवं पीथियस ने ज्वार-भाटा का संबंध चंद्रमा से बताया था। उसके बाद में रोमन भूगोलवेत्ता प्लिनी ने ज्वार-भाटा का विस्तृत अध्ययन किया। 17वीं शताब्दी में न्यूटन महोदय ने गुरुत्वाकर्षण शक्ति का न केवल खोज किया बल्कि ज्वार-भाटा की उत्पत्ति के संबंध में 1667 ई० में संतुलन का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसी तरह 1755 ई० में लाप्लास ने गतिक सिद्धांत, 1833 ई० में विलियम वेवेल के प्रगामी तरंग सिद्धांत और आगे चलकर हैरिस महोदय ने 1928 ई०  दोलन सिद्धांत या स्थायी तरंग सिद्धांत प्रस्तुत किया।

ज्वार-भाटा की विशेषता

             ज्वार-भाटा सागरीय जल की लंबवत गति है। जिसकी पहचान केवल तट पर ही की जा सकती है। ज्वार-भाटा को तटीय भागों में नियमित रूप से प्रतिदिन देखा जा सकता है। समुद्र के किनारे किसी एक स्थान पर कोई व्यक्ति खड़ा है तो उसे 24 घंटे में दो बार समुद्र का जल ऊपर उठते हुए और दो बार नीचे बैठते हुए प्रतीत होता है। ज्वार-भाटा की उत्पत्ति पर पृथ्वी के घूर्णन गति और चंद्रमा के परिभ्रमण गति का प्रभाव पड़ता है। दो ज्वार या दो भाटा के बीच समय अंतराल नियत होता है। जैसे एक ज्वार अगर आज समुद्र के किनारे 10:00 बजे सुबह आई हो तो अगले दिन ज्वार ठीक 10:00 बजे नहीं आएंगे बल्कि 52 मिनट देर से आती है। दो क्रमबद्ध ज्वार के बीच 26 मिनट का अंतर होता है जबकि दो क्रमबद्ध ज्वार और भाटा के बीच 13 मिनट का अंतर होता है। इसका प्रमुख कारण पृथ्वी और चंद्रमा की स्थिति में क्रमश: घूर्णन एवं परिभ्रमण गति से उत्पन्न देशांतरीय विषमता है। अतः इसी विषमता के कारण किसी भी देशांतर पर 24 घंटे के बाद जो ज्वार-भाटा आता है, वह 52 मिनट की देरी से आता है और यह देर होने का क्रम 27 दिन तक चलता रहता है। पृथ्वी पर एक समय में दो विपरीत देशांतरों पर आकर्षण बल के कारण ज्वार उत्पन्न होता है और ठीक उसी समय समकोणिक देशांतर पर भाटा उत्पन्न होता है।

ज्वार उत्पादक शक्तियॉं

        ज्वार उत्पन्न करने वाले शक्तियों में सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण शक्ति का महत्वपूर्ण योगदान है। सर्वप्रथम न्यूटन महोदय ने स्पष्ट किया कि अंतरिक्ष में स्थित सभी ग्रह, नक्षत्र एवं तारे गुरुत्वाकर्षण शक्ति के द्वारा एक-दूसरे के परिपेक्ष्य में संतुलित है तथा एक-दूसरे को आकर्षित कर रहे हैं। न्यूटन अपने गुरुत्वाकर्षण का नियम ने बताया है कि “दो पिंडों के बीच में आकर्षण शक्ति उनके द्रव्यमान के गुणनफल का समानुपाती एवं दूरी के वर्ग का व्युत्क्रमानुपाती होता है।” अर्थात जो पिण्ड जितना बड़ा होगा उसका आकर्षण शक्ति भी उतना ही अधिक होगा। इसके साथ ही जो पिंड जितना नजदीक होगा उसका भी आकर्षण बल उतना अधिक होगा। अतः इसी कारण से पृथ्वी पर सूर्य की तुलना में चंद्रमा के आकर्षण बल का प्रभाव अधिक रहता है क्योंकि चंद्रमा सूर्य की तुलना में कम द्रव्यमान भले ही रखता है लेकिन सूर्य की तुलना में पृथ्वी से काफी नजदीक है। 

        चंद्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है जिसका व्यास पृथ्वी के व्यास का 1/3 भाग है। यह पृथ्वी का परिक्रमा लगभग 27 दिन में कर लेता है। चंद्रमा और पृथ्वी के केंद्र के बीच की दूरी 3.84 लाख किलोमीटर है। लेकिन दोनों के सतह के बीच की दूरी 3.776 लाख किलोमीटर है। इससे स्पष्ट है कि चंद्रमा के सामने पृथ्वी की धरातलीय सतह वाले भाग के ठीक पीछे से चंद्रमा का धरातल 3.904 किलोमीटर दूर रहता है। पृथ्वी का वह भाग जो चंद्रमा के सामने पड़ता है, चंद्रमा के आकर्षण शक्ति से सर्वाधिक प्रभावित होता है। जबकि पीछे वाला भाग चंद्रमा की आकर्षण शक्ति से सबसे कम प्रभावित होता है। चंद्रमा के सामने वाला पृथ्वी का समुद्री जल चंद्रमा की ओर खींचा जाता है और ज्वार की स्थिति उत्पन्न करता है। जबकि ठीक उसके विपरीत वाले भाग में अपसारी के कारण भी ज्वार की स्थिति उत्पन्न होती है। चंद्रमा के सामने और उसके विपरीत भागों के बीच समकोण पर आकर्षण बल के कम प्रभाव के कारण जल का सतह नीचा ही रह जाता है। जिसके कारण वहाँ भाटा की स्थिति उत्पन्न होती है।

        चंद्रमा की परिक्रमण दिशा और पृथ्वी की घूर्णन दिशा एक समान है तथा चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा कर रही है। जब पृथ्वी 24 घंटे के घूर्णन गति के बाद पुनः चंद्रमा के सामने आती है तो चंद्रमा अपने परिक्रमण पथ पर 52 मिनट आगे बढ़ जाता है। फलत: पृथ्वी की नियत देशांतर को चंद्रमा के सम्मुख आने में 52 मिनट की देरी हो जाती है। इसी देर होने के कारण एक देशांतर पर ज्वार 24 घंटे के बाद 52 मिनट के देर से आती है।

ज्वार के प्रकार

        समुद्रीवेत्ताओं ने ज्वार के कई प्रकार बताया है। जैसे-

(1) दीर्घ / वृहत ज्वार (Spring Tide)

(2) लघु ज्वार

(3) दैनिक ज्वार

(4) मिश्रित ज्वार

(5) अपभू एवं उपभू ज्वार (Apogean & Perigean Tides)

(6) अयनवृतीय ज्वार & भूमध्यरेखीय ज्वार (Tropical Tides & Equatorial Tides)

(1) दीर्घ / वृहत ज्वार (Spring Tide)- यह पूर्णमासी (Full Moon) और अमावस्या (New Moon) के दिन आता है क्योंकि इन दोनों दिनों में सूर्य चंद्रमा और पृथ्वी तीनों एक सीधी रेखा में स्थित होते हैं। इस स्थिति को यूति-वियुति (Syzygy) कहा जाता है। पूर्णिमा के दिन वियुति (Opposition) कहते  हैं। जबकि अमावस्या के दिन यूति (Conjuction) की स्थिति उत्पन्न होती है।

      अमावस्या एवं पूर्णिमा के दिन सूर्य और चंद्रमा एक सीधी में होते हैं जिसके कारण समुद्री जल पर दोनों क्षेत्रों के आकर्षण बल कार्य करते हैं जिसके कारण प्रतिदिन आने वाले सामान्य ज्वार की तुलना में 20% अधिक जल ऊपर उठ जाता है। इसे ही “दीर्घ ज्वार” कहते हैं।

(2) लघु ज्वार-  प्रत्येक महीने शुक्ल  एवं कृष्ण पक्ष की सप्तमी एवं अष्टमी के रात में सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक-दूसरे के समकोण की स्थिति में होते हैं जिसके कारण दोनों के आकर्षण बल का प्रभाव एक साथ नहीं पड़ पाता है जिसके कारण एक देशांतर पर आने वाला प्रतिदिन के समान ज्वार की तुलना में 20% कमी जल ऊपर उठ पाता है। इसीलिए इसे लघु ज्वार करते हैं।

(3) दैनिक ज्वार- किसी स्थान पर एक दिन में आने वाले एक ज्वार और एक भाटा को दैनिक ज्वार कहते हैं। दैनिक ज्वार ही है जो 24 घंटे के बाद अगले दिन 52 मिनट देर से आती है। मैक्सिको की खाड़ी, फिलीपींस और आलास्का के तट पर आने वाले दैनिक ज्वार को देखा जा सकता है। 

अर्द्ध दैनिक ज्वार (Semi Daily Tides)- कई स्थानों पर 24 घंटे में दो बार ज्वार और दो बार भाटा आता है। एक बार आने के बाद 12 घंटे 26 मिनट बाद आने वाली ज्वार को अर्द्ध दैनिक ज्वार कहते हैं।

(4) मिश्रित ज्वार- दैनिक ज्वार और अर्द्ध दैनिक ज्वार को मिश्चित ज्वार कहते हैं। किसी भी स्थान पर भिन्न ऊंचाई वाले ज्वार को भी मिश्रित ज्वार कहते हैं।

(5) अपभू एवं उपभू ज्वार (Apogean & Perigean Tides)- 

      जब चंद्रमा पृथ्वी से सबसे निकट (3.54 किमी०) होती है तो उसे उपभू (Perigean) और जब सबसे दूर (4.07 किमी०) में स्थित होती है तो उसे अपभू (Apogean) कहते हैं। 

        उपभू की स्थिति में उत्पन्न ज्वार को उपभू ज्वार (Perigean Tides) और अपभू (Apogean Tides) की स्थिति में उत्पन्न ज्वार को अपभू कहते हैं।

(6) अयनवृतीय ज्वार & भूमध्यरेखीय ज्वार (Tropical Tides & Equatorial Tides)- ज्वार चंद्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण उत्पन्न होती है। एक चंद्रमास में चंद्रमा कर्क रेखा, मकर रेखा और भूमध्य रेखा के सम्मुख बारी-बारी से आती है। जब चंद्रमा कर्क एवं मकर रेखा पर होती है तो उस वक्त उत्पन्न ज्वार  को अयनवृत्तीय ज्वार (मध्य अक्षांशीय ज्वार) कहते हैं लेकिन जब चंद्रमा विषुवत रेखा पर होती है तो उस स्थिति में उत्पन्न ज्वार को विषुवतीय ज्वार (भूमध्यरेखीय ज्वार )कहते हैं।

ज्वार-भाटा की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत 

       ज्वार-भाटा की उत्पत्ति से संबंधित प्रक्रिया को कई भूगोलवेताओं ने सैद्धांतिकरण करने का प्रयास किया है। उन सिद्धांतों में प्रमुख सिद्धांत है:-

(i) संतुलन का सिद्धांत (Equilibrium Theory)- न्यूटन

(ii) प्रगामी तरंग सिद्धांत (Progressive Wave Theory)- विलियम वेवेल

(iii) स्थायी तरंग सिद्धांत (Stationary Wave Theory)-  हैरिस

(iv) नहर सिद्धान्त- एयरी

(v) गतिक सिद्धान्त- लाप्लास

    उपरोक्त सिद्धान्तों में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत संतुलन का सिद्धांत को माना जा रहा है जिनकी व्याख्या नीचे की जा रही है।

संतुलन का सिद्धांत (Equilibrium Theory)

         संतुलन सिद्धांत के प्रस्तुतकर्ता सर आइजक न्यूटन रहे हैं। इन्होंने 1687 ई० में गुरुत्वाकर्षण के आधार पर संतुलन का सिद्धांत प्रस्तुत किया। न्यूटन ने बताया कि विभिन्न आकाशीय पिंड एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। ये आकर्षण बल आकाशीय पिंडों के द्रव्यमान के गुणनफल पर और दूरी के वर्ग पर निर्भर करते हैं। इसे प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने निम्नलिखित सूत्र का प्रतिपादन किया।  

जहाँ,  F = आकर्षण बल

G = एक नियतांक

m1 = पृथ्वी का द्रव्यमान

m2 = चन्द्रमा का द्रव्यमान

r = दोनों आकाशीय पिण्डों के बीच की दूरी

        इस नियम के अनुसार न्यूटन ने बताया कि सूर्य एवं चंद्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण ही समुद्र में ज्वार उत्पन्न होते हैं। कालांतर में लाप्लास महोदय ने इस सिद्धांत को और विकसित करने का प्रयास किया। लाप्लास के अनुसार ज्वार चंद्रमा एवं सूर्य के आकर्षण बल तथा अपकेंद्रीय बल दोनों के कारण उत्पन्न होती है। उन्होंने बताया कि जब कोई पिंड वृत्ताकार पथ पर गतिशील होती है तो आकर्षण शक्ति के विरुद्ध अपकेंद्रीय बल का जन्म होता है ताकि आकर्षण बल एवं अपकेंद्रीय बल के कारण संतुलन की स्थिति बना रहे।

       न्यूटन एवं लाप्लास दोनों ने बताया कि सूर्य की तुलना में चंद्रमा के आकर्षण बल का प्रभाव पृथ्वी पर अधिक पड़ता है क्योंकि सूर्य की तुलना में चन्द्रमा काफी निकट है। चंद्रमा के ठीक सामने वाला पृथ्वी का भाग केंद्र की अपेक्षा 6400 किलोमीटर चंद्रमा के निकट होता है। जबकि इसके विपरीत वाला भाग चंद्रमा से 12800 किलोमीटर अधिक को दूर होता है जिसके कारण चंद्रमा के सम्मुख वाले पृथ्वी के भाग पर अधिक आकर्षण बल कार्य करता है जबकि ठीक उसके विपरीत आकर्षण बल का प्रभाव नगण्य होता है। विपरीत भाग में आकर्षण बल को संतुलित करने हेतु अपकेंद्रीय बल लगने लगता है। इन दोनों बलों के कारण ही समुद्री जल में उछाल आती है।जिससे ज्वार उत्पन्न होता है। 

आलोचना-     

       कई समुद्रवेत्ताओं ने इस सिद्धांत को दो आधारों पर आलोचना किया है। 

(1) पृथ्वी के धरातल पर अगर केवल जल ही होता तो इस सिद्धांत के क्रियाशील होने की संभावना थी परंतु, पृथ्वी के धरातल पर जल एवं स्थल का वितरण काफी असमान है। यहाँ ज्वार चंद्रमा की आकर्षण बल के कारण एक ही देशांतर पर एक ही बार ज्वार उत्पन्न नहीं होता है। 

(2) सागर की गहराई सागर की नितलीय उच्चावच, चक्रवात और चंद्रमा की कलाएँ इत्यादि का ज्वार-भाटा की उत्पत्ति में कोई उल्लेख नहीं किया है। 

(3) इस नियम के अनुसार प्रतिदिन एक देशांतर पर निश्चित अंतराल पर दो बार ज्वार और दो बार भाटा आना चाहिए। लेकिन इंग्लिश चैनल में एक दिन में चार बार ज्वार और चार बार भाटा आती है। इसके कारणों का भी स्पष्टीकरण न्यूटन ने नहीं किया है। 

(4) चंद्रमा के आकर्षण शक्ति का प्रभाव पृथ्वी की एक ही देशांतर पर एक समान रूप से पड़नी चाहिए थी और एक देशांतर पर जल का उत्थान भी एक समान होनी चाहिए था। लेकिन सामान्य रूप से ऐसा नहीं होता। जैसे- उत्तरी अमेरिका के तट पर अवस्थित फंडी की खाड़ी में विश्व के सबसे ऊँचा ज्वार उत्पन्न होता है। यहाँ 15 से 18 मीटर तक जल में उछाल आता है जबकि ठीक उसी देशांतर पर इतनी ऊँची-ऊँची ज्वारें नहीं आती। 

निष्कर्ष:-  इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि न्यूटन के द्वारा प्रतिपादित संतुलन सिद्धांत की कई सीमाएँ हैं। इसके बावजूद ज्वार-भाटा के उत्पत्ति की व्याख्या करने वाला सबसे मान्य सिद्धांत है।


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