Archives August 2022

अध्याय 1.2 (ख) वन एवं वन्य जीव संसाधन

इकाई 1. अध्याय 1.2 (ख) वन एवं वन्य जीव संसाधन

बिहार बोर्ड के 8वीं कक्षा का भूगोल विषय का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर

सरल एवं आसान शब्दों में उत्तर देना सीखें


वन एवं वन्य जीव

अध्याय 1.2 (ख) वन एवं वन्य जीव संसाधन

I. बहुवैकल्पिक प्रश्नोत्तर
सही विकल्प को चुनें।
1. भारत में सबसे अधिक वन क्षेत्रफल किस राज्य में है?
(क) मेघालय
(ख) मणिपुर
(ग) मध्य प्रदेश
(घ) महाराष्ट्र
उत्तर- (ग) मध्य प्रदेश
2. विश्व में लगभग कितने प्रकार की वनस्पतियाँ मिलती है?
(क) 5 लाख
(ख) 10 हजार
(ग) 50 लाख
(घ) 10 लाख
उत्तर- (घ) 10 लाख
3. बिहार उत्तर प्रदेश एवं झारखंड में किस प्रकार के वन पाए जाते हैं?
(क) उष्णकटिबंधीय पतझड़ वन
(ख) उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन
(ग) शीतोष्ण पतझड़ वन
(घ) कोणधारी वन
उत्तर- (क) उष्णकटिबंधीय पतझड़ वन
4. इनमें कौन उभयचर जीव है?
(क) केचुआ
(ख) कछुआ
(ग) कौवा
(घ) बाघ
उत्तर – (ख) कछुआ
5. इनमें कौन भारत का राष्ट्रीय पशु है?
(क) मोर
(ख) शेर
(ग) ऊँट
(घ) बाघ
उत्तर- (घ) बाघ
6. रेड डाटा बुक क्या है?
(क) विलुप्त हो रहे प्रजातियों की सूची
(ख) भारत के वनों की सूची
(ग) भारत के सभी पशुओं की सूची
(घ) भारत के सभी पक्षियों की सूची
उत्तर- (क) विलुप्त हो रहे प्रजातियों की सूची (1970)
7. देश में राष्ट्रीय उद्यानों की कुल संख्या कितनी है?
(क) 448
(ख) 14
(ग) 85
(घ)21
उत्तर- (ग) 85
II. खाली स्थान को उपयुक्त शब्दों से पूरा करें।
1. वन है तो हम है।
2. कृत्रिम रूप से किए गए पौधारोपण को  सामजिक वानिकी कहा जाता है।
3. हिमालय वन  से प्राप्त रसायन कैंसर के उपचार में उपयोगी है।
4. चंदन के वन कर्नाटक में मिलते हैं।
5. अंडमान निकोबार द्वीप समूह में सदाबहार वन जाते हैं।
6. गौतम बुद्ध अभयारण्य गया जिला में है।
7. वन को पृथ्वी का फेफड़ा कहा जाता है।
III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें। (अधिकतम 50 शब्दों में)
1. सामाजिक वानिकी किसे कहा जाता है?
उत्तर- सामजिक स्तर पर परती या बेकार भूमि पर पर्यावरण संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए कृत्रिम वनों का विकास किया जाता है, जिसे सामाजिक वानिकी कहा जाता है। दुसरे शब्दों में कृत्रिम रूप से किए गए पौधारोपण को सामजिक वानिकी कहा जाता है।
2. उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन के तीन प्रमुख वृक्षों के नाम लिखिए।
उत्तर- उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन के तीन प्रमुख वृक्षों के नाम – शीशम, सागवान, साल।
3. किस वर्ग के लोगों के लिए वन आश्रय स्थली का काम करता है?
उत्तर- जनजातीय वर्ग के लोगों के लिए वन आश्रय स्थली का काम करता है
4. उन राज्यों के नाम लिखिए जहाँ देश में सदाबहार वन पाए जाते हैं?
उत्तर- असम, मेघालय, अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम।
5. वनों के कोई तीन महत्व लिखिए।
उत्तर- (i) जलावन एवं फर्नीचर के लिए।
(ii) कई उद्योगों के लिए कच्चा माल में।
(iii) औषधियों के निर्माण में।
IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें। (अधिकतम 200 शब्दों में)
1. वन से आप क्या समझते हैं? भारत में पाए जाने वाले वनों का विस्तृत विवरण दीजिए।
त्तर- वह स्थान जहाँ पेड़-पौधों का घनत्व सामान्य से अधिक होता है उसे वन/जंगल कहा जाता हैं।
             100 से 200 सेंटीमीटर वर्षा वाले भागों में पर्णपाती मानसूनी वन पाए जाते हैं। 50 सेंटीमीटर से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मरुस्थलीय वन पाये जाते हैं। भारत के कुल वन क्षेत्रों में 93 प्रतिशत उष्ण कटिबन्धीय वन तथा 87 प्रतिशत शीतोष्ण कटिबन्धीय वन पाए जाते हैं।
2. वन में पाए जाने वाले विभिन्न प्राणियों का वर्गीकरण उदाहरण के साथ दीजिए।
उत्तर- वन और वन्य जीवों की बीच आपस में गहरा संबंध होता है। यहाँ विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु अपना जीवन व्यतीत करते हैं। जिनमें मांसाहारी जीव जैसे – शेर, बाघ आदि। 
शाकाहारी जीव जैसे-हिरण, हाथी आदि। 
उभयचर जीव जैसे-मेढ़क, कछुआ आदि।
सरीसृप जीव जैसे-सांप, छिपकली, जोंक, केंचुआ आदि पाए जाते हैं। इन जीवों के अलावा यहाँ विभिन्न  प्रकार के पक्षी भी मिलते हैं।
3. वन एवं वन्यजीवों के संरक्षण के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन कीजिए।
उत्तर – वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण संघ इस दिशा में अनेक कार्यक्रम चला रहा है। वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय उद्यान, अभ्यारण्य एवं जैवमंडल क्षेत्र विकसित किए गए हैं।
       
        इस समय देश में 85 राष्ट्रीय उद्यान, 448 अभ्यारण्य एवं 16 जैवमंडल सुरक्षित क्षेत्र हैं। बिहार में कांवर झील पक्षी विहार (बेगूसराय), गया में गौतम बुद्ध अभ्यारण्य, पश्चिमी चम्पारण में वाल्मीकि नग वन्य प्राणी अभ्यारण्य प्रसिद्ध हैं।

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इकाई 1. अध्याय 1.1 (क) भूमि, मृदा एवं जल संसाधन

 इकाई 1. अध्याय 1.1 (क) भूमि, मृदा एवं जल संसाधन

बिहार बोर्ड के 8वीं कक्षा का भूगोल विषय का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर

सरल एवं आसान शब्दों में उत्तर देना सीखें



इकाई 1. अध्याय

I. बहुवैकल्पिक प्रश्नोत्तर

सही विकल्प को चुनें।

1. पृथ्वी का कितने प्रतिशत भाग पर स्थल है?
(क) 71
(ख) 29
(ग) 41
(घ) 46
उत्तर- (क) 71
2. विश्व में सघन जनसंख्या कहाँ मिलती है?
(क) पहाड़ों पर
(ख) पठारों पर
(ग) मैदानों में
(घ) मरुस्थल में
उत्तर- (ग) मैदानों में
3. भारत में भूमि उपयोग संबंधी आँकड़े कौन रखता है?
(क) भूगर्भ विज्ञान विभाग
(ख) भू राजस्व विभाग
(ग) गृह विभाग
(घ) चिकित्सा विभाग
उत्तर – (ख) भू राजस्व विभाग
 4. भूमि उपयोग के कुल कितने प्रमुख वर्ग है?
(क) 9
(ख) 7
(ग) 5
(घ) 3
उत्तर- (ग) 5
5. मृदा में कुल कितने स्तर पाए जाते हैं?
(क) 2
(ख) 3
(ग) 4
(घ) 7
उत्तर- (ग) 4
6. समोच्च रेखीय खेती करना किसका उपाय है?
(क) जल प्रदूषण को रोकने का
(ख) मृदा अपरदन को रोकने का
(ग) जल संकट को दूर करने का
(घ) भूमि की उर्वरता घटाने का
उत्तर – (ख) मृदा अपरदन को रोकने का
7. रासायनिक दृष्टि से जल किस का संयोजन है?
(क) हाइड्रोजन एवं नाइट्रोजन का
(ख) ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन का
(ग) हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन का
(घ) ऑक्सीजन एवं कार्बन का
उत्तर- (ग) हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन का
8. इनमें कौन एक महासागर नहीं है?
(क) अंटार्कटिक
(ख) आर्कटिक
(ग) हिन्द
(घ) प्रशांत
उत्तर- (क) अंटार्कटिक
 II. खाली स्थान को उपयुक्त शब्दों से पूरा करें:-
1. मृदा में जीवों के सड़े-गले अवशेषों कोक ह्यूमस कहा जाता है।
2. दक्कन क्षेत्र में काली मृदा पाई जाती है।
3. लेटराइट मृदा का निर्माण प्रक्रिया निक्षालन से होता है।
4. भूमि एक प्राकृतिक संसाधन है।
5. महासागरों में जल का 97.3 प्रतिशत भाग पाया जाता है।
III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें। (अधिकतम 50 शब्दों में)
1. भूमि उपयोग से आप क्या समझते हैं?
उत्तर – भूमि उपयोग मानव के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। इसके बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती हैं। भूमि पर ही कृषि कार्य होता है तथा इसी पर पेड़-पौधे, उगते हैं तथा मकान, गाँव, शहर, तालाब, नहर, कुंआ, चापाकल, सड़कमार्ग, रेलमार्ग, पाइपलाइन मार्ग, कारखाना, विभिन्न खेलों के मैदान एवं स्टेडियम इत्यादि इसी पर बने होते हैं।
2. मृदा निर्माण में सहायक कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर – किसी स्थान पर मृदा के निर्माण में वहाँ उपस्थित मौलिक चट्टान, क्षेत्र की जलवायु, वनस्पति, सूक्ष्म जीवाणु, क्षेत्र की ऊँचाई, क्षेत्र की ढाल तथा समय की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
3. भूमि उपयोग को प्रभावित करने वाले कारकों के नाम लिखिए।
उत्तर – भूमि उपयोग को प्रभावित करने वाले दो महत्वपूर्ण कारक होता है :- प्राकृतिक कारक और मानवीय कारक।
प्राकृतिक कारक-
            स्थल रूप में भिन्नता, मृदा की विशेषता, खनिजों की उपस्थिति, जलवायु एवं जल संबंधी विशेषताएँ इत्यादि जैसे प्राकृतिक कारक भूमि उपयोग में परिवर्तन लाते हैं।
मानवीय कारक-
           तकनीकी ज्ञान में वृद्धि, जनसंख्या वृद्धि, श्रमिकों की उपलब्धता तथा मानवीय आवश्यकताओं में अंतर इत्यादि जैसे कारक भूमि उपयोग को प्रभावित करते हैं।
4. ऋतुक्षरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर – जब चट्टानें ऋतु अर्थात समय के साथ टूट-फुट कर अपने ही मूल स्थानों पर कणों के रूप में बिखरने लगती है तो उस प्रक्रिया को ऋतुक्षरण कहा जाता है। इसे अपक्षय  के नाम से भी जाना जाता है। 
IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें। (अधिकतम 200 शब्दों में)
1. भूमि उपयोग क्या है? भूमि उपयोग के विभिन्न वर्गों का विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर- भूमि उपयोग का तात्पर्य कुल उपलब्ध भूमि का विविध कार्यों में होनेवाले उपयोग के आँकड़ों से है। इससे संबंधित आँकड़े हमेशा बदलते रहते हैं। मतलब यह कि विभिन्न देशों के मध्य इसका प्रारूप एक जैसा नहीं मिलता है। कहीं वन क्षेत्र अधिक मिलता है, तो कहीं शुद्ध बोई गई भूमि का क्षेत्र, तो कहीं बंजर भूमि का क्षेत्र अधिक मिलता है। भारत में भूमि उपयोग प्रारूप संबंधी आँकड़े या रिकार्ड भू-राजस्व विभाग रखता है।
         
         भूमि उपयोग के विभिन्न वर्ग निम्नलिखित हैं:-
(i) वन क्षेत्र की भूमि
(ii) कृषि कार्य के लिए अनुपलब्ध भूमि
a. बंजर एवं व्यर्थ भूमि
b. सड़क, मकान, उद्योगों में लगी भूमि
(iii) परती भूमि
a. चालू परती भूमि (जिस भूमि पर एक वर्ष या उससे कम समय से कृषि नहीं की गई हो)
b. अन्य परती भूमि (जिस भूमि पर एक वर्ष से अधिक तथा पाँच वर्ष से कम समय से कृषि नहीं की गई हो।)
(iv) अन्य कृषि अयोग्य भूमि
a. स्थायी चारागाह की भूमि
b. कृषि योग्य बंजर भूमि (जिस भूमि पर पाँच वर्ष से अधिक समय से खेती नहीं की गई हो।)
(v) शुद्ध बोई गई भूमि
2. मृदा निर्माण प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- किसी स्थान पर मृदा के निर्माण में वहाँ उपस्थित मौलिक चट्टान, क्षेत्र की जलवायु, वनस्पति, सूक्ष्म जीवाणु, क्षेत्र की ऊँचाई, क्षेत्र की ढाल तथा समय की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। मृदा निर्माण प्रक्रिया में सबसे पहले मौलिक चट्टानें टूटती हैं। टूटे हुए कणों के और महीन होने की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है। हजारों लाखों वर्षों बाद वही चट्टानी टुकड़ा भौतिक, रासायनिक एवं जैविक ऋतुक्षरण से महीन कणों में बदल जाता है, जो ‘मृदा’ कहलाता है। सामान्यत: यह एक सेंटीमीटर मोटी सतह वाली मृदा के निर्माण में सैकड़ों हजारों वर्ष लग जाते हैं।
               
           इस प्रकार मृदा निर्माण की प्रक्रिया काफी लंबी अवधि में पूरी होती है। परिणामस्वरूप इस क्रम में मृदा के तीन स्तर तैयार हो जाते हैं। इन्हें ऊपर से नीचे की ओर क्रमशः ‘अ’ स्तर, ‘ब’ स्तर, एवं ‘स’ स्तर के नाम से जाना जाता है। ऊपरी स्तर ‘अ’ में ह्यूमस की अधिकता होती है। ‘ब’ स्तर में बालू एवं पंक की प्रधानता होती है। ‘स’ स्तर में ऋतुक्षरण/अपक्षरण से प्राप्त चट्टानी कण मिला करते हैं। जबकि सबसे निचले स्तर में मूल चट्टानें होती हैं।
3. मृदा अपरदन के कारकों का उल्लेख कर इसके बचाव हेतु उपयुक्त सुझाव दीजिए।
उत्तर- मृदा अपरदन के मुख्य कारक हैं- वनों की कटाई, पशुचारण, आकस्मिक तेज वर्षा, तेज पवन, अवैज्ञानिक–कृषि पद्धति तथा बाढ़ के प्रभाव से मृदा का अपरदन ज्यादा होता है । तेज पवन या पानी के बहाव से मैदानी या चौरस क्षेत्रों में सतही अपरदन होता है। जबकि उबड़-खाबड़ क्षेत्रों में क्षुद्रनालिका या अवनालिका अपरदन होता है। मृदा अपरदन के कारण मृदा के मौलिक गुणों एवं उर्वरता में कमी आने लगती है। इसका असर फसलों, फलों एवं साग-सब्जियों के उत्पादन पर पड़ता है। इसलिए मृदा संरक्षण के उपायों को अपनाना जरूरी है। मृदा संरक्षण के लिए हमें निम्नलिखित उपाय करना चाहिए-
(i) पर्वतीय क्षेत्रों में समोच्चरेखी खेती करना चाहिए।
(ii) फसल चक्र तकनीक को अपनाना चाहिए।
(iii) खेती के वैज्ञानिक तकनीक को अपनाना चाहिए।
(iv) जैविक खाद का अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए।
(v) पर्वतीय ढलानों पर वृक्षारोपण का कार्य करना चाहिए।
(iv) बंजर भूमि पर घास लगाने का कार्य करना चाहिए।
4. जल प्रदूषण के कारकों का उल्लेख कर इसके दूर करने के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर- जल के स्वाभाविक/प्राकृतिक गुणों में अंतर आना या जल में अवांछित पदार्थों का मिल जाना, जो जीवन के लिए हानिकारक हो, जल प्रदूषण कहलाता है। जल प्रदूषण के निम्नलिखित स्रोत हैं:-
(i) घरेलू कूड़ा-करकट का उचित निपटान न करना।
(ii) औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों का नदियों में प्रवाहित करना।
(iii) नगरीय क्षेत्रों का गंदा जल का जमाव या नदियों में प्रवाहित करना।
(iv) लाशों या मरे जानवरों को नदियों में प्रवाह करना।
               
         इस प्रदूषित जल को पीने से कई प्रकार की बीमारियाँ होती हैं। जैसे-उल्टी आना, किडनी का खराब होना, पेट दर्द, सिर दर्द, डायरिया, छाती दर्द, हड्डी का विकृति, वजन घटना, दिमागी विकृति इत्यादि।
             
           जल प्रदूषण से बचने के लिए निम्नलिखित उपाय करना चाहिए:-
(i) नदियों, तालाबों में अपशिष्ट पदार्थों को डालने पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
(ii) रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों के उपयोग पर रोक लगाना चाहिए।
(iii) लाशों या मरे जानवरों को नदियों में प्रवाह पर रोक लगाना चाहिए।
5. जल संकट क्या है जल संकट के लिए जिम्मेदार कारकों का उल्लेख कर इसे दूर करने के उपायों का विवरण दीजिए।
उत्तर– किसी निश्चित क्षेत्र के भीतर जल उपयोग की मांगों को पूरा करने के लिए उपलब्ध जल संसाधनों की कमी को ही जल संकट कहा जाता है। विश्व के सभी महाद्वीपों में रहने वाले लगभग 2.8 बिलियन लोग हर वर्ष कम से कम एक महीने जल की कमी से किसी न किसी रूप से प्रभावित होते हैं। 1.2 अरब से अधिक लोगों के पास पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है।
       
      जनसंख्या का तीव्र गति से बढ़ना, जल का अति दोहन, जल का अनुचित उपयोग, जल का असमान वितरण, जल का प्रदूषित होना, शहरों में पनपती अपार्टमेंट संस्कृति इत्यादि जल प्रदूषण के बड़े कारण हैं। कई शहरों में आवश्यकता से अधिक जल उपलब्ध है, परंतु वे प्रदूषित हैं। इसी तरह, कई  शहर महासागरों के किनारे अवस्थित हैं परंतु वहाँ जल का उपयोग नहीं किया जा सकता। इसलिए जल की कमी या जल संकट पूरे विश्व में व्याप्त है। जल संकट को दूर करने के निम्नलिखित उपाय हैं:-
⇒ जल के पुन:चक्रण तकनीक को अपनाना चाहिए।
⇒ सिंचाई के लिए आधुनिक तकनीकों को उपयोग करना चाहिए।
⇒ बच्चों के बीच जल संरक्षण की महत्ता को बताना चाहिए।
⇒ प्राचीन जल संचय तकनीकों का भी उपयोग करना चाहिए।
⇒ वर्षा जल संग्रह की आधुनिक तकनीक का उपयोग करना चाहिए।
⇒ छत का वर्षा जल संग्रहित करना चाहिए।
⇒ जल का समुचित उपयोग करना चाहिए।
⇒ जल को प्रदूषित होने से बचाना चाहिए।
6. भारत में पाई जाने वाली मृदा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर- भारत में जलोढ़ मृदा, काली मृदा, लाल मृदा, पीली मृदा, लैटेराइट मृदा, मरूस्थलीय मृदा एवं पर्वतीय मृदा पाई जाती है।
⇒ जलोढ़ मृदा देश के सभी नदी घाटियों में पाई जाती है। उत्तर भारत का विशाल मैदान पूर्णत: जलोढ़ मृदा से निर्मित है। नवीन जलोढ़ मृदा को खादर एवं पुराने जलोढ़ मृदा को बाँगर कहा जाता है। जलोढ़ मृदा चावल, गेंहूँ, मक्का, गन्ना एवं दलहन फसलों के उत्पादन के लिए उपयुक्त है। इसमें ह्यूमस की मात्रा अधिक होती है।
⇒ काली मृदा ऐलुमिनियम एवं लौह यौगिक की उपस्थिति के कारण काली होती है। यह मृदा कपास की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना तथा तामिलनाडु में यह मृदा अधिक पाई जाती है।
⇒ लाल एवं पीली मृदा प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी एवं दक्षिणी हिस्से में पाई जाती है। लोहे के अंश के कारण इस मदा का रंग लाल होता है। जल में मिलने के बाद यह मृदा पीली रंग की हो जाती है। ज्वार, बाजरा, मक्का, मुंगफली, तंबाकू और फलों के उत्पादन के लिए उपयुक्त यह मृदा उड़ीसा, झारखंड एवं मेघालय में पाया जाता है।
⇒ लैटेराइट मृदा का निर्माण निक्षालन की प्रक्रिया से होता है। यह मृदा केल, कर्नाटक, तमिलनाडु राज्यों में मिलती है। मरूस्थलीय मृदा हल्के भूरे रंग की होती है जो राजस्थान, सौराष्ट्र, कच्छ, पश्चिमी हरियाणा एवं दक्षिणी पंजाब में पाई जाती है।

⇒  पर्वतीय मृदा पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है।


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इकाई 1. अध्याय 1. संसाधन

 इकाई 1. अध्याय 1. संसाधन

बिहार बोर्ड के 8वीं कक्षा का भूगोल विषय का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर

सरल एवं आसान शब्दों में उत्तर देना सीखें



अध्याय 1. संसाधन

I. बहुवैकल्पिक प्रश्नोत्तर

सही विकल्प को चुनें।

1. इनमें से कौन एक प्राकृतिक संसाधन है
(क) पंचायत भवन
(ख) विद्यालय
(ग) भूमि
(घ) हवाई अड्डा
उत्तर – (ग) भूमि
2. इनमें कौन प्राकृतिक संसाधन नहीं है
(क) सूरज
(ख) मिट्टी
(ग) जाल
(घ) हवाई जहाज
उत्तर – (घ) हवाई जहाज
3. केरल में पाया जाने वाला थोरियम किस प्रकार के संसाधन का उदाहरण है
(क) निजी
(ख) नवीकरणीय
(ग) संभाव्य
(घ) जैव संसाधन
उत्तर – (ग) संभाव्य
4. संसाधन निर्माण के लिए क्या आवश्यक है
(क) तकनीक
(ख) आवश्यकता
(ग) ज्ञान
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (ग) ज्ञान
II. खाली स्थान को उपयुक्त शब्दों से पूरा करें।
1. मानव संसाधन क्षेत्र के विकास के लिए आधार का काम करते हैं।
2. राजस्थान में पाया जाने वाला तांबा वास्तविक संसाधन का उदाहरण है।
3. दिमागीएवं शारीरिक क्षमता मानव संसाधन बनाने के लिए आवश्यक है।
4. संसाधन के लिए मूल्य की अभिव्यक्ति विविध प्रकार से की जाती है। 
III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें। (अधिकतम 50 शब्दों में) 
1. संसाधन की परिभाषा दें। 
उत्तर – वे सभी जीव-जन्तु, वस्तुएँ एवं पदार्थ जिसका मानव अपने उपयोग में लाता है, संसाधन कहलाता है।
2. संसाधन के वर्गीकरण के प्रमुख आधार कौन-कौन से हैं? 
उत्तर – संसाधन के वर्गीकरण के प्रमुख आधार निम्नलिखित है-
  • उत्पत्ति के आधार पर– जैव और अजैव संसाधन
  • उपलब्धता के आधार पर– नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य संसाधन
  • स्वामित्व के आधार पर– व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संसाधन
  • विकास के स्तर एवं उपयोग के आधार पर– संभावी, विकसित भंडार और संचित कोष संसाधन
  • वितरण के आधार पर- स्थानीय एवं सर्वत्र उपलब्ध संसाधन
3. प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण क्यों जरूरी है? 
उत्तर – प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना अत्यंत जरूरी है ताकि उनका उपयोग अधिक समय तक किया जा सके। अर्थात भावी पीढ़ीयों के लिए भी प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रख सकें।
4. नवीकरणीय संसाधन किसे कहा जाता है ? उदाहरण के साथ लिखें।
उत्तर – वैसे संसाधन जिसकी पुन: पूर्ति प्राकृतिक रूप से होती रहती है, उसे नवीकरणीय संसाधन कहते है। जैसे- पवन, सूर्य की किरण, मिट्टी, जल इत्यादि।
5. प्राकृतिक संसाधनों के वितरण में असमानता के प्रमुख कारणों को लिखें।
उत्तर – प्राकृतिक संसाधनों के वितरण पर भू-आकृतियों, जलवायु, ऊँचाई, वनस्पति इत्यादि जैसे अनेक भौतिक कारकों का प्रभाव पड़ता है। पृथ्वी पर इन सभी कारकों में विभिन्नता होने के कारण संसाधनों का वितरण  में असमानता होती है।
IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें। (अधिकतम 200 शब्दों में)
1. प्राकृतिक संसाधन का वर्गीकरण उपयुक्त उदाहरण के साथ प्रस्तुत करें।
उत्तर- ⇨ विकास एवं उपयोग की दृष्टि से प्राकृतिक संसाधन दो प्रकार के होते है:-
(i) वास्तविक संसाधन- पश्चिम एशिया का पेट्रोलियम, आस्ट्रेलिया का सोना, झारखंड का अभ्रक, मध्य प्रदेश का मैंगनीज एवं राजस्थान का तम्बा इत्यादि।
(ii) संभाव्य संसाधन- केरल में मिलने वाला थोरियम, लद्धाख में पापा जाने वाला यूरेनियम इत्यादि।
⇨ उत्पत्ति के आधार पर प्राकृतिक संसाधन  दो प्रकार के होते है:-
(i) जैविक संसाधन- पेड़-पौधे, वन, जीव-जंतु इत्यादि।
(ii) अजैविक संसाधन- खनिज, चट्टान, मिट्टी, भूमि, खेत तालाब, नदी, झील इत्यादि।
⇨ उपलब्धता के आधार पर प्राकृतिक संसाधन  दो प्रकार के होते है:-
(i) नवीकरणीय संसाधन- सूर्य की किरणे एवं पवन इत्यादि। 
(ii) अनवीकरणीय संसाधन- कोयला, पेट्रोलियम, अभ्रक इत्यादि।
⇨ स्वामित्व के आधार पर संसाधन चार प्रकार के होते है:-
(i) व्यक्तिगत संसाधन- भूखंड,घर व अन्य जायदाद, बाग-बगीचा,तालाब, कुआँ इत्यादि जिस पर व्यक्ति निजी स्वामित्व रखता है।
(ii) समुदायक संसाधन- गाँवों में श्मशान,मंदिर या मस्जिद परिसर, सामुदायिक भवन, तालाब आदि। शहरों में सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल, खेल मैदान, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, एवं गिरिजाघर।
(iii)राष्ट्रीय संसाधन- किसी राजनीतिक सीमा के अंतर्गत भूमि, खनिज पदार्थ, जल संसाधन, वन व वन्यजीव एवं समुद्री जीव (200 KM महासागरीय क्षेत्र तक) राष्ट्रीय संसाधन है।
(iv) अंतरार्ष्ट्रीय संसाधन- किसी देश की तट रेखा से 200 KM की  दूरी तक का क्षेत्र(अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र)।
⇨ वितरण के आधार पर प्राकृतिक संसाधन  दो प्रकार के होते है:-
(i) सर्वत्र उपलब्ध संसाधन- मिट्टी, पवन इत्यादि।
(ii) स्थानिक संसाधन- कोडरमा में पाया जाने वाला अभ्रक, जादूगोड़ा में मिलने वाला यूरेनियम, छोटानागपुर क्षेत्र में पाया जान बाला कोयला इत्यादि।
2. “संसाधन बनाए जाते हैं।” उपयुक्त उदाहरणों के साथ स्पष्ट करें।
उत्तर- संसाधन होते नहीं बनाये जाते हैं यह कथन ई. जिम्मरमैन का है। संसाधन ऐसा स्त्रोत है, जिसका उपयोग मानव अपने फायदे के लिए करता है। जिम्मरमैन का मानना था कि कोई वस्तु प्रकृति में भले ही उपस्थित है, परन्तु जब तक हम उसका उपयोग अपने फायदे के लिए नहीं करते हैं, तब तक  हम उसे संसाधन नहीं कह सकते हैं।
 
           इस प्रकार  “संसाधन बनाये जाते हैं।” जैसे- नदी या मरुस्थल में पड़े बालू का वहाँ कोई उपयोग नहीं होता, परन्तु जब वहाँ से उठाकर बालू को निर्माण कार्य हेतु गाँव या शहर में लाया जाता है तब इसका उपयोग और मूल्य दोनों बदल जाते हैं। अत: हम यह कह सकते हैं कि संसाधन बनाये जाते हैं।
3. संसाधन संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डालें। 
उत्तर- बिना संसाधन के मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। परन्तु इन संसाधनों के उपयोग की तकनीकी ज्ञान एवं उन संसाधनों की आवश्यकता का होना आवश्यक है। मनुष्य ने अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिए संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया है। हमने इसका इस्तेमाल तो किया ही है इसे इस प्रकार प्रदूषित भी कर दिया है कि वे आज सीधे उपयोग के लायक नहीं रह गए हैं।
         
         यही नहीं, हमने कई संसाधनों (जैसे कोयला, पेट्रोलियम इत्यादि) का इतना अधिक खनन एवं उपयोग किया है कि इनके भंडार धीरे-धीरे समाप्ति की ओर है। भविष्य में इनके भंडार खत्म होने की पूरी संभावना है। मानव के लिए इनका होना भविष्य में भी उतना ही जरूरी है जितना की आज। मानव जीवन सतत् चलता रहे, इसके लिए यह जरूरी है कि हम इन अमूल्य प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग सुनिश्चित कर इसे भावी पीढ़ीयों के लिए संरक्षित करें।
4. संसाधन के अत्यधिक दोहन से मानव ने संकट पैदा कर दिया है। इस कथन से आप कहाँ तक सहमत है।

उत्तर- संसाधनों के बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। लेकिन इन संसाधनों के उपयोग की तकनीक एवं उन संसाधनों की आवश्यकता का होना अति आवश्यक है। मनुष्य ने अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया है। हमने इसका इस्तेमाल तो किया ही है इसे इस प्रकार प्रदूषित भी कर दिया है कि वे आज सीधे उपयोग के लायक नहीं रह गए हैं।

          यही नहीं, हमने कई संसाधनों का इतना अधिक खनन एवं उपयोग किया है कि इनके भंडार धीरे-धीरे समाप्ति की कगार पर है। भविष्य में इनके भंडार समाप्त होने की पूरी सम्भावना है। मानव के विभिन्न आवश्कताओं की पूर्ति  लिए इनका होना भविष्य में भी उतना ही जरूरी है जितना की आज। मानव जीवन सतत् चलता रहे, इसके लिए यह जरूरी है कि हम इन अमूल्य प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग सुनिश्चित कर इसे भविष्य के लिए संक्षित करें। अर्थात संसाधनों के अत्यधिक दोहन से मानव ने संकट पैदा कर दिया है। इस कथन से हम पूर्णत: सहमत है।


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1. मानव विकास सूचक / Human Development Index

1. मानव विकास सूचक 

(Human Development Index)


मानव विकास सूचक⇒मानव विकास सूचक

             मानव विकास सूचक का प्रथम प्रकाशन 1990 में यू.एन.डी.पी. (U.N.D.P. United Nation Development Programme) द्वारा प्रकाशित किया गया। इस सूचक का विकास संयुक्त राष्ट्र संघ के सहयोग से चार अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा मिलकर किया गया है। जैसे:-

(i) WRI – World Resource Institute

(ii) UNEP – United Nation Invironmental Programme

(iii) UNDP – United Nation Development Programme

(iv) WB – World Bank

        यह प्रतिवर्ष प्रकाशित किया जाता है जो विश्व के विभिन्न प्रदेशों में मानव विकास की स्थिति को बताता है यह सूचक तीन महत्वपूर्ण चरों पर आधारित है-

(i) जीवन प्रत्याशा या आयु (Longevity) 

(ii) ज्ञान (Knolwledge) – आयु के आधार पर दो वर्गों में बांटा गया है – 0-15 वर्ष की आयु के बच्चों का जीवन प्रत्याशा और 15 से अधिक (Adult Literaney level)

(iii) रहन-सहन का स्तर या जीवन स्तर (Standary of Living) – यह तीन P पर आधारित है – Purchasing, Power and Parity.

          मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार जीवन प्रत्याशा अप्रत्यक्ष रूप से खान-पान स्तर और स्वास्थ्य सेवाओं को बताता है। ज्ञान किसी भी समाज के जागरूकता और चेतना को बताता है जो संसाधनों के विकास पारिस्थतिकी संरक्षण और स्वास्थ्य जीवन शैली में सहायक हो सकता है।

        जीवन स्तर वह आधार है जो किसी भी देश के क्रय क्षमता को अंतर्राष्ट्रीय बाजार के संदर्भ में बताता है। वर्तमान उदारीकरण के युग में सकल राष्ट्रीय उत्पाद की तुलना में क्रय क्षमता अधिक उपयोगी सूचक है।

             मानव विकास रिपोर्ट – 1995 में, 174 देशों को इन दोनों चरों से संबंधित सूचनाएं प्राप्त हो सकी। अतः मानव विकास रिपोर्ट 174 देशों के लिए तैयार की गई। 1996 और 1997 का रिपोर्ट भी 174 देशों पर आधारित था। यह रिपोर्ट तीनों ही सूचनाओं को मिलाकर संयोजित सूचक (Composite Index) विकसित करता है।

       इस मापक को विकसित करने के लिए तीनों चरों को अधिकतम और न्यूनतम मान लिया गया है और देश विशेष के संदर्भ में विचलन विधि का प्रयोग करते हुए साख्यिकी मान निकाला गया है। तीनों ही चरों को सांख्यिकी मान को जोड़ कर उस तीन से भाग दिया गया है और भागफल ही सूचक मान है।

    मानव विकास सूचक विकसित करने के बाद विश्व के देशों को तीन वर्गों में बांटा गया है:-

(i) L.H.D. (Low Human Development Country) 

(ii) MHD (Mean Human Develoment Country) 

(ii) HHD (High Human Development Country)

          L.H.D का सूचक मान < 0.5 अर्थात् 0.5 से कम है। इसके अंतर्गत 1995 के अनुसार 58 देश है – प्रमुख देशों में भारत, मोरक्को एवं गेबोन सहित अधिकतर अफ्रीकी देश, द० एशिया के सभी देश आते हैं। 

       MHD का सूचक मान 0.5 से 0.8 है। इसके अंतर्गत भी 8 देश है जिसमें ब्राजील, चीन, टर्की, द० अफ्रीका, रूस, सऊदी अरबिया, मिस्र और अल्जीरिया जैसे देश है। पूर्वी यूरोप तथा मध्य एशियाई गणतंत्र इसी वर्ग में आते है।  पू० एशिया के भी अधिकतर देश, मध्य अमेरिका और द० अमेरिका के अधिकतर देश इसी वर्ग में है। 

         HHD का सूचक माग (above > 0.800) है। इसके अंतर्गत सभी विकसित देशों के अलावे ब्रुनेई, UAE. कतार, मेक्सिको, क्यूबा, बहामास, टोबैगो, मारिशस जैसे देश इस वर्ग में आते है। 

       ब्रुनेई, कतार और U.A.E तेल निर्यात आधारित देश है जिसने मानव विकास पर पर्याप्त खर्च किया है। मेक्सिको उन देशों में है जहां प्रतिव्यक्ति आय कम होने के बावजूद मानव विकास कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी गई है। 

       मानव विकास की वार्षिक रिपोर्ट की अनिवार्यता इसलिए महसूस की गई है कि विश्व के आर्थिक सामाजिक विषमता तेजी से बढ़ रहा थी। इसे दूर करने के लिए आवश्यक है कि वैसे देशों की पहचान की जाए जहाँ कि मानव विकास के लिए निवेश आवश्यक है और इस दिशा में अधिक आय वर्ग के देश, बहुराष्ट्रीय कंपनियां तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं (जैसे WHO, UNICEF) सकारात्मक सहयोग दे सकती है।

        इस दिशा में कई कदम उठाए गए है जैसे IDA (International Development Agencies) ने निर्णय लिया है कि उन देशों को ऋण नहीं दिए जाएंगे जिनका Standard of Living उच्च या प्रति व्यक्ति आय 400 से अधिक है। इसी प्रकार W.H.O. और Unicef निम्न मानव विकास के देशों में अपने कार्यों को प्राथमिकता दे रहा है।

        मानव विकास रिपोर्ट में धन के वितरण की विषमता पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। 1995 के रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 225 अति धनी (Ultra rich) व्यक्ति है जिनकी कुल सम्पत्ति One Milion Dollar है जो विश्व के 2.5 व्यक्ति की आय के बराबर है।

       इसी प्रकार से यह रिपोर्ट बताता है कि विश्व के मात्र 20% जनसंख्या के पास विश्व का 34.75 GNP (Gross National Product) इसी 20% जनसंख्या का 84.7% के व्यापार का लाभ मिलता है। मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार इन विषमताओं का अंत मात्र आर्थिक विकास, निवेश, उदारीकरण के द्वारा नहीं वन् सफल मानव विकास के द्वारा संभव है।

 2. मानचित्र के प्रकार 

 2. मानचित्र के प्रकार / Type of Map


मानचित्र के प्रकार

मानचित्र मापनी के आधार पर दो प्रकार के होते हैं: 

(1) Large Scale Map (बड़ी मापक मानचित्र)

(i) Cadastral Map (भूसम्पति मान‌चित्र) 

(ii) Topographical Map (स्थलाकृति मानचित्र)

(2) Small Scale Map (छोटी मापक मानचित्र)

(i) Wall Map (दीवारी मानचित्र)

(ii) Atlas Map (एटलस मानचित्र)

1. Large Scale Map (बड़ी मापनी मानचित्र)

            एक छोटे भूभाग को बड़े इकाई (Scale/ मापनी) पर दिखाये जाने वाले मानचित्र को Large Scale Map कहते हैं।

1cm = 10km.

(i) Cadastral Map (भूसम्पति मानचित्र) 

⇒ यह एक Large Scale Map है।

⇒ यह एक ऐसा Map है जिस पर किसी एक गाँव का, ग्राम पंचायत का, खेतों के मेढ़ को, ग्रामीण रास्तों को, गाँव में मिलने वाला कुँआ, छोटे -2 जलाशय, सार्वजनिक स्थान इत्यादि को प्रदर्शित किया जाता है। यह Map भूमि Survey करने वाले अमीन, C.O. और जिला में अवस्थित survey विभाग के पास होता है।

⇒ भूसम्पति मानचित्र का प्रयोग भूराजस्व पदाधिकारी कर वसूली में करते हैं। इसके अलावे इसका प्रयोग नगर नियोजन एवं भूमि उपयोग के नियोजन में किया जाता है।

⇒ भारत के गाँवों में 1:3960 या 16″ = 1 मील से 1:1980 (32″ = 1 मील) तक पैमाना पर भूसम्पत्ति मानचित्र बनाये जाते हैं।

(ii) स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographical Map)

⇒ जहाँ Cadastral Map में निजी भवन, ग्रामीण कुँआ, जलाशय इत्यादि को प्रदर्शित किया जाता है वहीं स्थलाकृतिक मानचित्र पर विभिन्न प्रकार के स्थलाकृतिक लक्षण जैसे उच्चावच, प्रवाह प्रणाली, वन क्षेत्र, दलदली क्षेत्र इत्यादि को गाँव के साथ -2 दिखाया जाता है।

⇒ स्थलाकृतिक मानचित्र पर प्राकृतिक विशेषताओं के साथ-साथ सांस्कृतिक भूदृश्य को भी प्रदर्शित करते हैं।

⇒  स्थलाकृतिक मानचित्र सामान्यत: 1: 2,50,000 (1″ = 4 मील) से 1: 62500 (1″ = 1 मील) तक की मापनी पर बनाया जाता है।

⇒ 1″ = 4 मील से छोटी मापनी पर बनने वाला स्थलाकृतिक मानचित्र को ही भौगोलिक मानचित्र कहते हैं।

⇒ भारत में स्थलाकृतिक मानचित्रों का निर्माण 1: 62500 को 1: 50000 की मापनी में बदलकर प्रदर्शित किया जाता है।

(2) छोटी मापनी का मानचित्र (Small Scale Map)

⇒ छोटी मापनी के मानचित्र पर बहुत बड़े भूभाग को मानचित्र के छोटे इकाई पर प्रदर्शित करते हैं। जैसे:- 1m = 10,000 km 

(i) दीवाल मानचित्र (Wall Map)

⇒ दीवाल मानचित्र एक ऐसा मानचित है जिसपर पूरे विश्व को, एक महाद्वीप को, एक देश को, एक राज्य को, एक जिला को प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ Wall Map का प्रयोग मुख्यतः शिक्षण संस्थानों या कार्यालयों में किया जाता है।

⇒  Wall Map की मापनी Atlus Map के मापनी से बड़ी होती है। लेकिन स्थलाकृतिक मानचित्र के तुलना में छोटी होती हैं।

⇒  भारत में Wall Map 1: 15000000 1: 25,00000 के मापनी पर बनाया जाता है।

(ii) Atlas Map (एटलस मानचित्र)

Atlas Map एक Small Scale Map है। इन मानचित्रों में एक छोटे से कागज के पन्नों पर पूरे विश्व, महाद्वीप, देश, इत्यादि को प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार के मानचित्र 1:2,0000000 के मापनी पर बनाये जाते हैं। इस प्रकार के मानचित्र पर अलग -2 क्षेत्रों को अलग-2 रंग से प्रदर्शित करते हैं। इसलिए इसे “क्षेत्र वर्णी मानचित्र” भी कहते हैं।

भारत में सरकारी एटलस का प्रकाशन Survey of India, देहरादून द्वारा होता है

⇒ भारतीय सर्वेक्षण विभाग भारत के रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।

⇒ भारत में सर्वप्रथम प्रो० S.P. चटर्जी ने “बंगाल इन Maps” एटलस प्रकाशित किया था।

⇒ भारत के महापंजीकार कार्यालय के अधीन कार्यरत जनगणना विभाग ने पूरे देश और सभी प्रान्तों का 32 खण्डों में विभक्त कर एक एटलस का प्रकाशन किया है।

NOTE ग्लोब⇒ यह पृथ्वी का वास्तविक प्रतिरूप होता है। इसका आकार गोल तथा 23 1/2° अक्ष पर झुका होता है।

⇒ उद्देश्य एवं विषय सामग्री के आधार पर मानचित्र के प्रकार। 

               इसके आधार पर मानचित्र को दो भागों में बाँटते है:

(A) प्राकृतिक मानचित्र 

(i) खगोलीय मानचित्र (Astronomical Map)

(ii) स्थलीय मानचित्र (Orographic Map) Relief Map

(iii) भूगर्भीक मानचित्र (Geological Map) – इसमें चट्टानों के संस्तर को प्रदर्शित करते हैं। चट्टानों के एक संस्तर को Bed कहते हैं।

मानचित्र के प्रकार

(iv) जलवायु मानचित्र (Climate Map) 

(v) वनस्पति मानचित्र (Vegitation Map) 

(vi) मृदा मानचित्र (Soil Map)

(B) सांस्कृतिक मानचित्र 

        यह भी कई प्रकार का होता है। जैसे- आर्थिक मानचित्र,  राजनीतिक मानचित्र, सैनिक मानचित्र, ऐतिहासिक मानचित्र, सामाजिक मानचित्र, वितरण मानचित्र 

वितरण मानचित्र  (Distribution Map)

⇒ भौगोलिक तत्वों को वितण मानचित्र के माध्यम से प्रदर्शित करते हैं। यह मूलतः चार प्रकार का होता है।

(i) रंगारेखी मानचित्र (Chromatic Map) 

⇒ जब मानचित्र पर विभिन्न आकड़ों को विभिन्न रंगों के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है तो उसे Chromatic Map (रंगारेखी मानचित्र) कहते हैं।

(ii) प्रतीक चिह्न

⇒ इसमें फसलों, खनिजों आदि के वितरण प्रदर्शित करने वाले मानचित्र में अक्षरों एवं वर्णों का प्रयोग कर जो मानचित्र प्रस्तुत किया जाता है। वैसे Map को क्रोसमैटिक मैप कहते हैं।

(iii) सम्मान रेखा मानचित्र (Isopleth)

⇒ ऐसा मानचित्र जिसपर भौगोलिक तत्वों को समताप रेखा (Isotherm), समवर्षा रेखा (Isohyte), समधूप रेखा (lsohel), समोच्च रेखा (Contour) के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। 

(iv) वर्णमात्री मानचित्र (Choropleth map) 

⇒ वैसा मानचित्र जिसमें भौगोलिक तत्वों को आड़ी तिरछी लम्बवत रेखाओं के द्वारा प्रदर्शित करते हैं उसे Choropleth कहते हैं।

नोट:- Atlas में सबसे ज्यादा प्रयोग रंगारेखी मानचित्र (Chromatic Map) का किया जाता है।


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  1.Cartography / मानचित्रावली

Cartography

मानचित्रावली

         पृथ्वी के समस्त भूभाग अथवा किसी एक भाग को कागज पर सांकेतिक चिन्हों के द्वारा उचित मापक (Scale) तथा प्रक्षेप (Projection) पर चित्रण को ही मानचित्र कहते हैं। और इस प्रकार मानचित्रों के संग्रह को मानचित्रावली अथवा एटलस (Atlas) कहा जाता हैं। 

 किसी भी मानचित्र की शुद्धता एवं उपयोगिता निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है:-

(1) दिशा (Direction) – 10

Cartography

N = North – उत्तर

S = south – दक्षिण

E = East – पूरब

W = West – पश्चिम

NE = इषाण कोण

NW =  वायु कोण

SW = नैऋत्य कोण

SE = आग्नेय कोण

Zenith = आकाश

Nadir = पाताल

(2) मापक (Scale)

(3) उचित प्रक्षेप (Suitable Projection)

(4) उचित सांकेतिक चिह्न

(5) मानचित्रकार की कुशलता

(6) उचित निर्माण की विधि

✶मानचित्र निर्माण करने की विधि

(1) सर्वेक्षण विधि के द्वारा

(2) फोटोचित्रण विधि के द्वारा

(3) रेखाचित्रों एवं आरेख के द्वारा

(4) कम्प्यूटर एवं दूर संवेदन विधि के द्वारा 

नोट :- सर्वेक्षण विधि में मानचित्र बनाने हेतु जरीब, थियोडोलाइट, प्रिज्मेटिक कम्पास, शाहुल जैसे उपकरण का प्रयोग किया जाता है।

✶मानचित्र रचना के इतिहास को निम्नलिखित चरण में बाँटते हैं:-

(1) प्राचीन काल

(2) अंध काल – युरानी -रोमन के पत्नन से शुरू

(3) पुनर्जागरण काल – 1500-1600 ई०

(4) आधुनिक काल – औद्योगिक क्रांति से

I प्राचीन काल

➡ 3000 वर्ष पूर्व सर्वप्रथम मिस्र के लोगों ने मानचित्र निर्माण की कला का विकास किया।

* वास्तव में यूनानी विद्वानों को मानचित्र प्रारंभ करने का श्रेय जाता है। जैसे: –

(1) इरैटोस्थनीज ने सर्वप्रथम पृथ्वी के परिधि को अनुमानित किया तथा उसने भूमध्य रेखा को भी निर्धारित करने का प्रयास किए।

(2) हिप्पारकस ने पहली बार विश्व मानचित्र पर अक्षांश और देशान्तर रेखाओं का जाल खींचा। 

(3) क्रेटस ने पहली बार यह अनुमान लगाया कि पृथ्वी की आकृति एक गोलाभ के समान है।

(4) टॉलेमी

पुस्तक- “ज्योगरफिया सिन्टैक्सिस” या “अल्मागस्ट”

           इस पुस्तक में टॉलमी ने मानचित्र निर्माण हेतु वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत किए। उन्होंने मानचित्र के संबंध में बताया कि मानचित्र में निम्नलिखित तीन गुण आवश्य होना चाहिए:-

(1) दिशा शुद्ध होनी चाहिए।

(2) आकृति शुद्ध होती चाहिए।

(3) क्षेत्रफल शुद्ध होनी चाहिए।

II अंध काल

➡अंधकाल में बनाये गये मानचित्र में पृथ्वी को चपटा दिखाया गया और पृथ्वी के केन्द्र में एरुसेलम या जेरूसेलम को दिखाया गया। 

➡अंध काल का प्रारंभ: 6 ठी शताब्दी से मानी जाती है। और 15वीं शताब्दी तक रही। इस काल में रोमन सभ्यता का उदय हुआ। लोगों के सोच पर चर्च और पोप का जबरदस्त प्रभाव पड़ा जिसके कारण लोगों के वैज्ञानिक चिंतन समाप्त हो गई। 

III. पुनर्जागरण काल

➡ पुनर्जागरण काल की   शुरूआत 16वीं शताब्दी से होती है। 

➡डच (आयरलैण्ड)वैज्ञानिक/विद्वान मर्केंटर महोदय ने मानचित्र कला को टॉलेमी के प्रभाव से मुक्त किया।  

➡ फ्रांसीसी विद्वान कैसीनी वे 1779 ई० में फ्रांस के सर्वेक्षण कर मानचित्रावली का प्रकाशन किया।

➡इसी काल में या 1767 ई० में सर्वेक्षण विभाग की स्थापना की गई। 

IV आधुनिक काल

➡ आधुनिक काल की  शुरुआत औद्योगिक क्रांति के बाद से मानी जाती है। इसे मानचित्र निर्माण कला का स्वर्ण युग कहा जाता है।

➡ इस चरण में मानचित्र का निर्माण सुदूर संवेदन प्रणाली इत्यादि के द्वारा किया जाने लगा ।

➡भारत में 1924 ई0 से कैमरा के द्वारा या वायुफोटोग्राफी की पद्धति प्रारंभ हुई। 

➡भारत में 1975 ई० से सुदूर संवेदन प्रणाली का विकास हुआ।

➡भारत में मुद्रणकला का विकास 1804 ई०-1860 ई० के बीच हुआ। इसी काल में जर्मनी में Stieler, फ्रांस में ब्लाश और मारटीन तथा इंगलैण्ड में “Bartholemou” नामक मानचित्रावली प्रकाशित की गई।

✶मानचित्र के निर्माण में निम्नलिखित उपकरण की आवश्यकता पड़ती है।

(1) Set BoX (औजार बॉक्स)

(2) Protactar (चाँद) 

(3) Scale

(4) Dividers

(5) Pencil

(5) Set Square (प्रकाल)

(6) इरेजर

(2) T- Square का Scale

(3) Drawing Board / Table 

(4) स्लाइड कैलीपस

(5) इंडियन इंक

(6) Sticking टेप

(7) साण्डरस या काइंड्स किण्ड Drawing Paper

(8) UNO स्टेनसिल

(9) लीराय Pen


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3. विकास केन्द्र और विकास ध्रुव / Growth Centre and Growth Pole 

3. विकास केन्द्र और विकास ध्रुव / Growth Centre and Growth Pole


विकास केन्द्र और विकास ध्रुव⇒

                  प्रादेशिक नियोजन हेतु कई विशिष्ट मॉडल विकसित किये गये हैं। उनमें से उपरोक्त दोनों मॉडल को विश्व व्यापी मान्यता प्राप्त है। यह मॉडल पदानुक्रमिक, समन्वित प्रादेशिक विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कार्य माना जाता है। इस मॉडल का विकास 50 के दशक में पेरॉक्स महोदय ने किया था। लेकिन भौगोलिक संदर्भ में इसका सर्वप्रथम प्रयोग बोडोविले महोदय ने किया था। बोडोविले ने कहा है कि किसी भी प्रदेश के नियोजन या विकास हेतु मनुष्य की दो प्रवृतियों का अध्ययन आवश्यक है। प्रथम – अभिसारी प्रवृति और द्वितीय – अपसारी प्रवृत्ति। 

              अभिसारी प्रवृतियाँ किसी भी कार्यों का केन्द्रीयकरण करती है। जबकि अपसारी शक्तियाँ कार्यों का विकेन्द्रीकरण करती हैं। प्रादेशिक नियोजन के संदर्भ में यह देखना आवश्यक है कि किस प्रकार के कार्यों  का केन्द्रीयकरण किस केन्द्रीय स्थल पर हो रहा है। इसी के साथ यह भी देखना आवश्यक है कि किसी भी कार्यों का विकेन्द्रीयकरण आस -पास के क्षेत्रों में कैसे हो रहा है।

बोडोबिले –“प्रादेशिक नियोजन का महत्वपूर्ण आधार केन्द्रीय बस्तियों का पदानुक्रमिक नियोजन, है।” इस संदर्भ में उन्होंने केन्द्रीय बस्तियों के नियोजन हेतु चार पदानुक्रम निर्धारित किये हैं।

पदानुक्रम    केन्द्रीय स्थल 

(1)               विकास ध्रुव

(2)               विकास केन्द्र

(3)              विकास बिन्दु

(4)               सेवा केन्द्र

            विकास ध्रुव का तात्पर्य किसी वृहत प्रदेश के नियोजन से है। विकास केन्द्र का तात्पर्य मध्य स्तरीय प्रादेशिक नियोजन से है जबकि विकास बिन्दु और सेवा केन्द्र  का तात्पर्य लघु स्तरीय प्रादेशिक नियोजन से है।

           बोडोविले के अनुसार किसी प्रदेश के सर्वाधिक केन्द्रीय स्थल पर विकास ध्रुव का विकास होता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि ध्रुव सम्पूर्ण प्रदेश के लिए आकर्षण का केन्द्र होता है। विकास ध्रुव वह स्थान है जहाँ पर शिक्षा, स्वास्थ्य, बाजार के अतिरिक्त ऐसे विशिष्ट कार्यो को करता है जो उस प्रदेश के अन्य किसी केन्द्र पर संभव नहीं है। विकास ध्रुव नव-उत्पाद का केन्द्र होता है। विकास के अवयव इसी केन्द्र से विकेन्द्रीकृत होकर सम्पूर्ण केन्द्र में पहुँचते हैं। 

          दूसरे शब्दों में विकास ध्रुव किसी भी भौगोलिक प्रदेश का सबसे बड़ा नगर होता है। विकास ध्रुव को प्राथमिक नगर से ही सम्बोधित किया जा सकता है। प्रत्येक प्राथमिक नगर या विकास ध्रुव के सहयोग हेतु कई विकास केन्द्र का विकास होता है। विकास केन्द्र वह केन्द्रीय स्थल है जहाँ पर द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों का केन्द्र होता है। विकास केन्द्र के विकास के पीछे दो प्रमुख कारण है – 

(1) विकास ध्रुव वाले नगरों में कार्यों का अति केन्द्रीयकरण न हो और 

(2) ग्रामीण नगरीय जनसंख्या स्थानान्तरण को विकास केन्द्र में ही रोककर विकास ध्रुव के जनसंख्या को नियंत्रित किया जाय।

                  विकास बिन्दु भी रोजगारी उन्मुख केन्द्रीय स्थल है। लेकिन विकास केन्द्र से यह कई मायने में भिन्न है।:-

(1) विकास केन्द्र की तुलना में विकास बिन्दु का विकास कम महत्व वाले केन्द्रीय स्थल पर होता है। इसकी जनसंख्या के आकार काफी छोटा होता है और विकास केन्द्र के प्रति पूरक होता है।

(2) विकास केन्द्र में बड़े-बड़े उद्योग विकसित होते हैं तथा रोजगार प्रदान करने की अधिक क्षमता होती है जबकि विकास बिन्दु स्थानीय कच्चे माल पर आधारित उद्योगों का विकास होता है तथा कम लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं।

          सेवा केन्द्र सबसे लघु आकार के केन्द्रीय बस्ती है। यहाँ पर प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, प्राथमिक डाक संचार, लघु स्तर के बैंक एवं लघु स्तरीय प्रशासनिक सुविधा उपलब्ध होती है। ये सामान्यत: छोटे जनसंख्या आकार वाले होते हैं। आम लोगों के दैनिक आकर्षण का केन्द्र होता है। इसे नीचे के मॉडल से भी समझा जा सकता है –विकास केन्द्र और विकास ध्भारत के संदर्भ में

            भारत के प्रारंभिक नियोजन के दिनों में 5वीं पंचवर्षीय योजना तक नियोजन की विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया अपनाये जाने के कारण अंत: प्रादेशिक और अन्तर प्रादेशिक विषमता का जन्म हुआ। अत: छठी पंचवर्षीय योजना में यह अनुभव किया गया कि भारत की नियोजन प्रक्रिया को तीव्र करने के लिए विकास ध्रुव मॉडल को अपनाया जाना चाहिए। प्रो० R. P. मिश्रा, श्रो. सुन्दरम, प्रो० देश पाण्डेय और L.S.भट्ट जैसे भूगोलवेताओं ने अपने तर्कों से योजना आयोग को प्रभावित किया और विकास ध्रुव पर आधारित नियोजन को लागू करने के लिए तैयार किया। R. P. मिश्रा ने केन्द्रीय स्थलों के नियोजन हेतु 5 पदानुक्रम की आवश्यकता पर जोर दिया क्योंकि उन्होंने माना कि भारत एक गाँवों का एक देश है। बड़े- बड़े गाँवों में सेवा केन्द्र विकसित करने की आवश्यकता है और छोटे गाँवों में लघु सेवा केन्द्र विकसित करने की आवश्यकता है।

पदानुक्रम    केन्द्रीय स्थल 

(1)               विकास ध्रुव

(2)               विकास केन्द्र

(3)               विकास बिन्दु

(4)               सेवा केन्द्र

(5)               लघु सेवा केन्द्र

                बोडोबिल ने कहा था कि सेवा केन्द्र कोई भी गाँव या नगर हो सकता है। R.P. मिश्रा ने उनके विचारों  का समर्थन करते हुए कहा कि केन्द्रीय ग्रामीण बस्ती में विकास की प्रक्रिया को तीव्र करने हेतु लघु सेवा केन्द्र का विकसित किया जाना आवश्यक है। वर्तमान समय में योजना आयोग/नीतिआयोग R. P. मिश्रा के द्वारा बताये गये 5 पदानुक्रम पर आधारित नियोजन की प्रक्रिया अपना रही है। इसके लिए निम्नलिखित 5 पदानुक्रम और अनुकूल जनसंख्या का निर्धारण किया गया है। विकास केन्द्र और विकास ध्

            योजना आयोग ने भारत के सभी 35 महानगरों को विकास ध्रुव के रूप में मान्यता दिया है। योजना आयोग के अनुसार भारत में कम-से-कम 500 विकास केन्द्रों की स्थापना की योजना है। एक विकास केन्द्र में 12 लाख जनसंख्या को रखा जा रहा है। विकास केन्द्र को ही ध्यान में रखकर 1980 ई0 से औद्योगिक शंकुल की स्थापना की जा रही है। इसके अलावे महानगरों में बढ़ती जनसंख्या को ध्यान में रखकर महानगरों के बाहर विकास केन्द्र विकसित करने की योजना है। जब किसी भी विकास केन्द्र को विकसित किया जाता है तो निम्नलिखित तथ्यों पर गौर किया जाता है:-

(1) कितने लोग उस केन्द्र पर आते हैं और कितने लोग जाते हैं।

(2) किन-किन परिवहन साधनों का वहाँ विकास हुआ है।

(3) वर्तमान समय में उस स्थान का कार्यिक संरचना और संरचनात्मक सुविधाएँ क्या-क्या है 

(4) जनसंख्या वृद्धि का दर क्या है 

(5 ) औद्योगिक संसाधनों की विकसित होने की क्या संभवना है। 

             विकास बिन्दु का तात्पर्य उन स्थानों से है जो स्थानीय संसाधनों की मदद से लघु उद्योगों को विकसित कर सकते हैं। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में विकास बिन्दुओं की विशेष भूमिका हो सकती है। योजना आयोग भारत में 10 हजार विकास बिन्दुओं को पहचानकर उन्हें विकसित करने की प्रयास कर रही है। एक विकास बिन्दु को एक से दो लाख जनसंख्या को ध्यान में रखकर विकसित करने की प्रयास कर रही है।

            सेवा केन्द्रों का मूल उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करना है। भारत में लगभग 30 हजार सेवा केन्द्रों की पहचान कर उसे विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। सामान्यतः प्रखण्ड स्तर पर सेवा केन्द्र विकसित करने की योजना है। सेवा केन्द्रों में Cold Storage, खाद्यान्न भण्डारण सुविधा, दैनिक बाजार इत्यादि विकसित करने की योजना है।

      ग्रामीण सेवा केन्द्र पंचायत स्तर पर विकसित करने की योजना है। भारत में 1 लाख गाँव को ग्रामीण सेवा केन्द्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। ये सेवा केन्द्र निश्चित रूप से ग्रामीण विकास कार्यक्रम को त्वरित कर सकेंगे। 

निष्कर्ष 

          इस तरह उपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि विकास ध्रुव मॉडल के अन्तर्गत विकसित किये जा रहे सभी केन्द्रीय स्थल एक-दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करेंगी जिससे अंतः और अन्तर प्रादेशिक विषमता दूर हो सकेगी। पिछले 20 वर्षों के दौरान विकास ध्रुव नीति पर आधारित नियोजन का कार्य किये जाने के बाद भी इसका लाभ कुछ सीमित क्षेत्रों को ही मिल पाया है। लेकिन इस मॉडल के अनुसार महानगरों का विकास तेजी से हो रहा है। ग्रामीण स्तर पर पंचायतों का नियमित चुनाव नहीं होने के कारण तथा उनके राजनीतिक अधिकार नहीं दिये जाने के कारण यह मॉडल पूर्ण से सफल नहीं हो सकता है।

➡वृद्धि केन्द्र = विकास केन्द्र

प्रश्न प्रारूप 

1. विकास ध्रुव सिद्धांत के आलोचनात्मक व्याख्या भारतीय नियोजन के संदर्भ में करे।

2. प्रदेशों का सीमांकन / प्रादेशीकरण / Regionalization / Delimitation of Regions

2. प्रदेशों का सीमांकन/प्रादेशीकरण

(Regionalization / Delimitation of Regions)



प्रदेशों का सीमांकन⇒प्रदेशों का सीमांकन

            भौगोलिक प्रदेशों का सीमांकन / प्रादेशीकरण एक जटिल कार्य है। प्रारंभ में यह कार्य अनुभावाश्रित विधि से किया जाता था। लेकिन वर्तमान समय में प्रदेशों का सीमांकन सांख्यिकी विधि के द्वारा किया जा रहा है। अनुभावाधित विधि के द्वारा प्रदेशों के सीमांकन से दो प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती है:-

(1) दो प्रदेशों के बीच में एक संक्रमण पेटी का विकास होता था।

(2) विकास एवं नियोजन के कार्य में कठिनाई उत्पन्न होती थी।

           द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद प्रदेशों के सीमांकन में सांख्यिकी विधि के साथ-साथ अनुभावाश्रित विधि को ध्यान में रखकर प्रादेशीकरण का कार्य किया जा रहा है। प्रदेशों के सीमांकन हेतु हेगेट महोदय ने Thiessen Polygon Model और न्यूनतम दूरी विधि (Minimum Distance Method) का विकास किया है।

       Thiessen polygon विधि केन्द्रीयता पर आधारित है। हेगेट का मानना है कि किसी भी भौगोलिक प्रदेश की कोई-न-कोई विशिष्टता होती है और उस विशिष्टताओं का कहीं-न-कहीं केन्द्रीयकरण होता है। उसी केन्द्रीय स्थान से विशिष्टता का मूल्यांकन करके सीमांकन का कार्य किया जाता है।

           कुछ भूगोलवेताओं ने प्रदेशों के सीमांकन हेतु गुरुत्वाकर्षण मॉडल का विकास किया है। इसके लिए उन्होंने निम्नलिखित सूत्र का विकास किया है।

p = MA x MB /d2

जहाँ:-

p = प्रदेश की सीमा है। 

MA और MB = दो प्रदेशों की विशिष्टता 

d = दो प्रदेशों के बीच की दूरी है।

       इस मॉडल के आधार पर 60 के दशक तक प्रदेशों का सीमांकन किया जाता था। उपर में बताये गये दोनों मॉडल विशिष्ट विशुद्ध रूप से सांख्यिकी पर साधारित थे। इसमें अनुभावाश्रित विधि का उपयोग कहीं नहीं किया गया था। यही कारण है कि 60 के दशक के मध्य से सांख्यिकी सह अनुभावाश्रित विधि के द्वारा प्रदेशों के सीमांकन का कार्य किया जाने लगा।

       यह मॉडल नियोजन प्रदेशों के सीमांकन हेतु उपयोगी मॉडल माना जाता है। इसी मॉडल के आधार पर राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश का तथा भारत के अन्य महानगरीय प्रदेश के नियोजन का कार्य किया गया है।

       इस विधि के अंतर्गत प्रथमतः गुरुत्वाकर्षण मॉडल से पहले किसी भी प्रदेश का बाहरी सीमा का निर्धारण करते हैं। उसके बाद अनुभव के आधार पर प्रदेशों के सर्वेक्षण कार्य कर गुरुत्वाकर्षण मॉडल के द्वारा निर्धारित प्रदेशों के सीमा में संशोधन का कार्य किया जाता है। यही कारण है कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश का बाहरी सीमा सहारनपुर, भरतपुर, अलीगढ़ और सोनीपथ तक फैल चुका है।

निष्कर्ष 

         अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि किसी भी भौगोलिक प्रदेश का सीमांकन उसकी विशिष्ट तथ्यों की पहचान कर की जाती है। वर्तमान भूगोल में प्रदेशों क सीमांकन नियोजन और विकास के लिए काफी उपयोगी है। प्रदेशों के सीमांकन का कार्य भूगोल में जहाँ एक ओ उपयोगिता लाता है वहीं अन्तरविषयक अध्ययन में भी मदद कता है।


1. प्रदेश की संकल्पना (Concept of Region)

1. प्रदेश की संकल्पना

(Concept of Region)



प्रदेश की संकल्पना⇒प्रदेश की संकल्पना

           ‘प्रदेश’ शब्द का विकास मूलत: भूगोल विषय के अन्तर्गत किया गया है। इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम यूनानी भूगोलवेता हेरोडोटस और रोमन भूगोलवेता स्ट्रेबो ने किया था। आधुनिक भूगोल में प्रदेश शब्द का प्रयोग जर्मन भूगोलवेता रीटर ने किया था। वस्तुतः रीटर ने ‘प्रदेश’ शब्द का उपयोग द्वैतवाद उपागम के रूप में किया था जिसके कारण भूगोल में “क्रमबद्ध बनाम प्रादेशिक भूगोल” की द्वैतवाद प्रारंभ हुआ था।

         साधारण शब्दों में प्रदेश का तात्पर्य स्थलखण्ड के उस इकाई से है जहाँ पर अधिकतर भौगोलिक तत्वों में समरूपता पायी जाती है। उसकी भौगोलिक परिस्थितियाँ उसके आस-पास के क्षेत्रों की परिस्थितियों से भिन्न होती है।

हर्बटशन ⇒ “प्रदेश पृथ्वी की सतह का वह क्षेत्र है, जहाँ भूमि, जल, वायु, वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मानव के बीच क्षेत्रीय सह-संबंध होता है।”

डिक्सन ⇒ प्रदेश विशिष्ट आर्थिक समरूपता वाला क्षेत्र है। लेकिन इसका आधार भौतिक परिस्थितियों की समरूपता होती है। 

➡ अमेरिका के नियोजन समीति ने कहा है कि “प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ की परिवेश विशेष के संदर्भ में विशेष लक्षणों वाली मानवीय अभियोजना का स्वरूप विकसित हुआ है।”

➡ रूसी भूगोलवेता गैरीसीमोव ने संलिष्ट एकीकृत प्रदेश की संकल्पना प्रस्तुत की है जिसके अन्तर्गत आधुनिक नियोजन का कार्य और पारिस्थैतिक विकास की नीति/कार्य एक साथ की जाती है। ऐसे ही पारिस्थैतिकी पर आधारित नियोजन वाले क्षेत्र को प्रदेश कहते है।

प्रदेश की विशेषताएँ

            सामान्यतः भौगोलिक प्रदेश की निम्नलिखित विशेषताएँ होती है। जैसे:-

➡सभी प्रदेशों में मिलने वाले भौगोलिक घटकों के बीच सरूपता होती है।

➡कोई भी भौगोलिक प्रदेश दूसरे भौगोलिक प्रदेश की तुलना में विशिष्ट होता है और आस-पास के क्षेत्रों से भिन्न होता है।

➡किसी भी प्रदेश के भौगोलिक घटकों के बीच सह-संबंध एवं सह-अस्तित्व पाया जाता है। 

➡किसी भी प्रदेश में पदानुक्रमिक विभाजन की विशेषताएँ होती है। 

➡एक जैसे भौगोलिक प्रदेश में समस्याएँ भी एक सामान होती है।

➡प्रदेशों का सीमांकन उद्देश्य के आधार पर किया जाता है। 

➡दो प्रदेशों के बीच में सीमा खींचना एक कठिन कार्य है अर्थात् दो प्रदेशों के मिलन क्षेत्र में संक्रमण प्रदेश मिलने की संभावना होती है।

➡प्रदेशों के सीमांकन की दो विधियाँ है:- 

(i) अनुभावाश्रित विधि (Empirical method)

(ii) सांख्यिकी विधि (Statistical method)

➡ सांख्यिकी विधि के द्वारा प्रदेशों का सीमांकन करने पर संक्रमण क्षेत्र मिलने की संभावना नहीं रहती है। 

प्रदेश के प्रकार (प्रदेशों का वर्गीकरण

➡ किसी भौगोलिक प्रदेशों को तीन आधारों पर बाँटा जा सकता है:-

(i) एक कारक पर आधारित प्रदेश। जैसे:- जलवायु प्रदेश, मिट्टी प्रदेश, जैविक प्रदेश, इत्यादि।

(ii) बहुकारक आधारित प्रदेश। जैसे:- आर्थिक प्रदेश, सामाजिक प्रदेश

(iii) सम्पूर्ण कारकों पर आधारित प्रदेश। जैसे:- आर्थिक-सामाजिक नियोजन प्रदेश, संश्लिष्ट एकीकृत प्रदेश इत्यादि।

       आधुनिक भूगोल में किसी भी प्रदेश का कार्यिक महत्व बढ़ता जा रहा है। अतः पूरे विश्व में कार्यिक महत्व पर विशेष जोर दिया जा रहा है। कार्यों के आधार पर प्रदेशों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जाता है। जैसे:- नियोजन प्रदेश, नगरीय प्रदेश, कमांड क्षेत्र प्रदेश, महानगरीय प्रदेश, औद्योगिक प्रदेश इत्यादि। 

       लिंटन तथा व्हिटलसी महोदय ने प्रदेश के विशिष्ट गुणों के आधार पर वर्गीकृत करने का प्रयास किया है। लिंटन महोदय ने प्रदेशों का वर्गीकरण 7 पदानुक्रम में व्हिटलसी ने 4 पदानुक्रम में वर्गीकृत किया हैं:-

लिंटन के अनुसार

पदानुक्रम      प्रदेश

(1)               महाद्वीप

(2)              वृहत प्रदेश

(3)               प्रान्त 

(4)                खण्ड

(5)                ट्रैक्ट

(6)                 स्टो

(7)              बसाव स्थान 

व्हिटलसी   के अनुसार

पदानुक्रम    प्रदेश

(1)            प्रभामंडल

(2)            प्रान्त

(3)             जिला

(4)            स्थानीय

निष्कर्ष:-

         इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भूगोल में प्रदेशों का वर्गीकरण कई आधारों पर किया है। लेकिन उनमें से सर्वाधिक मान्यता कार्यों के आधार प प्रदेशों के वर्गीकरण को प्राप्त है।

प्रश्न प्रारुप

1. प्रदेश की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये।

2. संक्षेप में प्रदेश के लक्षण बताइये।

1. Concept of Rural and Urban Settlement / ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती की संकल्पना

1. Concept of Rural and Urban Settlement



(ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती की संकल्पना or ग्रामीण एवं नगरीय भूगोल की संकल्पना)

             ग्रामीण एवं नगरीय भूगोल बस्ती भूगोल की एक महत्वपूर्ण संकल्पना है। बस्ती भूगोल के अन्तर्गत मानवीय अधिवास, प्रतिरूप, उनके प्रकार, उनका वर्गीकरण, समस्याएँ, अंतर प्रादेशिक और अन्तः प्रादेशिक तत्वों, बस्ती से जुड़े पर्यावणीय मुद्दों एवं उससे संबंधित समस्त पक्षों का अध्ययन किया जाता है।

          बस्ती का तात्पर्य वैसे भौगोलिक क्षेत्र से हैं जहाँ पर मानव सामूहिक रूप से अधिवास करता है। रोमन भूगोलवेता स्ट्रैबो ने सामूहिक अधिवास वाले स्थानों के लिए ‘Okument’ शब्द का प्रयोग किया। जबकि जर्मन भूगोलवेता रेटजेल ने ‘Ekumen’ शब्द पर प्रयोग किया। हालांकि भूगोल में बस्ती भूगोल की शुरुआत करने का श्रेय जर्मन भूगोलवेता कार्ल रीटर को जाता है क्योंकि इन्होंनें सबसे पहले बस्ती भूगोल शब्द का प्रयोग किया था। 

Concept of Rural and Urban Settlement

ग्रामीण बस्ती

बस्ती के प्रकार

      कार्यों के आधार पर बस्ती दो प्रकार के होते हैं।:-

(1) ग्रामीण बस्ती

(2) नगरीय बस्ती

            अगर इन दोनों बस्तियों का तुलनात्मक विश्लेषण किया जाय तो उससे इनकी संकल्पना स्वत: स्पष्ट हो जाती है। जैसे:-

कार्यों के आधार पर 

         ग्रामीण बस्ती का तात्पर्य किसी स्थान पर निवास करने वाला उस सामूहिक अधिवास से है जहाँ की दो-तिहाई जनसंख्या प्राथमिक आर्थिक क्रियाकलाप में संलग्न रहती है। यहाँ पर प्राथमिक आर्थिक क्रियाकलाप का तात्पर्य कृषि, पशुपालन, मत्स्यन, शिकार, खाद्य संग्रहण, खनन इत्यादि से है।

     जबकि नगरीय बस्ती का तात्पर्य उस सामूहिक अधिवासीय स्थल से है जहाँ की दो-तिहाई जनसंख्या द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों  में संलग्न रहती है। यहाँ पर द्वितीय एवं तृतीय कार्यों का तात्पर्य उद्योग, निर्माण, विनिर्माण, परिवहन, वाणिज्य व व्यापार एवं सेवा क्षेत्र से है।

➡ कार्यों के आधार पर ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती की संकल्पना को ही भूगोल में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है।

➡ ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती की संकल्पना को निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर और स्पष्ट किया जा सकता है :- 

जनसंख्या के आकार के आधार पर 

     अगर जनसंख्या के आधार पर इनका विश्लेषण किया जाय तो स्पष्ट होता है कि ग्रामीण बस्तियों की जनसंख्या का आकार छोटा होता है जबकि नगरीय बस्तियों की जनसंख्या का आकार बड़ा होता है। अलग-अलग  देशों में नगरीय बस्ती होने के लिए अलग आकार सुनिश्चित किये गये है। जैसे- भारत में 5000 जनसंख्या अधिवासीय क्षेत्र को नगर, न्यूजीलैण्ड और स्वीडेन में 200, अमेरिका में 500 सामूहिक अधिवासीय क्षेत्र को नगर के रूप में मान्यता दी जाती है। दूसरी ओर भारत में कई ऐसे गाँव हैं जिनकी जनसंख्या 10 हजार से भी अधिक है फिर भी उन्हें नगर के श्रेणी में नहीं रखा जाता है। 

जनसंख्या के घनत्व के आधार पर

         जनसंख्या घनत्व को आधार मानते हुए भी ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती में अन्तर स्थापित किया जाता है। जैसे- जिस स्थान पर 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर जनसंख्या अधिवास करती है, वैसे स्थान को नगरीय बस्ती और उससे कम जनघनत्व वाले क्षेत्र को ग्रामीण बस्ती के श्रेणी में रखा जाता है।

सामाजिक जीवन / बंधन 

           ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक जीवन काफी सुदृढ़ होता है। परिवार, विवाह, नातेदारी जैसे सामाजिक संस्थाएँ जीवंत होती है। लेकिन नगरीय बस्तियों में सामाजिक बंधन का तत्व कमजोर होता है। यहाँ पर प्राथमिक सामाजिक संस्थाओं का कार्य स्कूल, कॉलेज, हॉस्पीटल, क्लब इत्यादि के द्वारा किया जाता है।

आर्थिक गतिविधियों का विशिष्टीकरण

              ग्रामीण बस्ती में आर्थिक गतिविधियों का विशिष्टीकरण नहीं होता है जबकि नगरीय बस्तियों के आर्थिक गतिविधियों का न केवल विशिष्टीकरण होता है बल्कि केन्द्रीयकरण भी होता है। 

आधारभूत संरचनाओं का स्तर 

                  ग्रामीण बस्तियों में आधारभूत संरचनाओं का पूर्ण विकास नहीं हो पाता है। अगर होता भी है तो उनका स्तर निम्न होता है। जबकि नगरीय बस्तियों में आधारभूत संरचनाओं के विकास का स्तर उच्च होता है।

नियोजित एवं अनियोजित बस्ती

                  ग्रामीण बस्तियाँ प्राय: जैविक एवं अनियोजित तरीके से विकसित होती है। जबकि नगरीय बस्तियाँ नियोजित एवं अनियोजित देनों प्रकार के हो सकती है।

निष्कर्ष

         इस तरह उपर के तथ्यों से  स्पष्ट है कि ग्रामी एवं नगरीय बस्ती दो अलग-2 संकल्पनाएँ हैं। इन दोनों अधिवासीय क्षेत्र निर्धारण करने का सबसे उचित तरीक कार्यिक आधार को माना जाता है।


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8. Sea Floor Spreading Theory / सागर नितल प्रसार का सिद्धांत

8. Sea Floor Spreading Theory

(सागर नितल प्रसार का सिद्धांत)



Sea Floor Spreading Theory

          सागर नितल प्रसार सिद्धान्त 1960 ई०  में हैरीहेस महोदय के द्वारा प्रस्तुत किया गया था यह सिद्धान्त उन्होंने समुद्री नितल का 5 वर्षों तक अनुसंधान करने के बाद प्रस्तुत किया था। हैरिहेस से पहले ऑर्थर होम्स महोदय ने सागरीय नितल के प्रसार के संबंध में संभावना व्यक्त किया था इसके संबंध में कोई विशेष मत प्रकट नहीं किया।  कालांतर में जब प्लेट टेक्टोनिक सिद्धान्त का आगमन हुआ तो उससे भी सागर नितल सिद्धान्त पर प्रकाश पड़ा।

                हैरिहेस महोदय ने अपना समुद्री नितल प्रसार सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर प्रस्तुत किया:-

1. हैरिहेस ने अपना सिद्धान्त तभी प्रस्तुत किया जब यह पूर्णत: स्पष्ट हो गया कि महासागरीय भूपटल की सामान्य मोटाई 6-7 KM और महाद्विपीय भूपटल की मोटाई 30-40 KM है । उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि महासागरीय भूपटल का तात्पर्य बेसाल्टिक चट्टानों से है और महाद्विपीय भूपटल का तात्पर्य ग्रेनाइट चट्टानों से है।

2. सभी महासागरों में महासागरीय कटक पाये जाते है जो बेसाल्टिक चट्टानों से निर्मित हैं और  महासागरीय नितल मैदान से इसकी सामान्य ऊंचाई 2-3 KM है।

3. हैरिहेस ने अपना मत तभी प्रस्तुत किया जब यह ज्ञात हो गया कि महासागरीय भूपटल की चट्टानें महाद्विपीय भूपटल की तुलना में कम आयु के है । महाद्विपीय चट्टानों के अधिकतम आयु 4600 मिलियन वर्ष और महासागरीय भूपटल की आयु 160 मिलियन वर्ष अनुमानित की गयी।

            इन्हीं तीन मान्यताओं के आधार पर हैरिहेस महोदय ने अपना सिद्धान्त प्रस्तुत किया। हैरिहेस ने अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हुए कहा कि “समुद्र का नितल सतत प्रसार की अवस्था मे है”।

सिद्धांत की व्याख्या   

     हैरिहेस ने महासागरीय नितल प्रसार का केंद्र महासागरीय कटक को माना है उन्होंने ऑर्थर होम्स की संवहन तरंग सिद्धान्त को आधार मानते हुए यह विचार प्रस्तुत किया कि मध्य महासागरीय कटक के पास संवहन तरंग लम्बवत रूप से ऊपर उठती है और अपनी ऊर्जा का उत्सर्जन करती है। लम्बवत ऊर्जा उत्सर्जन के कारण ही ज्वालामुखी की क्रिया होती है और उसी ज्वालामुखी क्रिया से महासागरीय कटक का निर्माण होता है। पुनः उन्होंने यह भी बताया की लम्बवत रूप से निकलने वाली संवहन तरंग का कुछ भाग भू-पटल के नीचे ही क्षैतिज रूप से प्रवाहित होने लगती है। इन्ही क्षैतिज तरंगों के कारण भू-पटल दो दिशाओं में खिसकने लगती है। ज्यों-ज्यों भूपटल का खिसकाव बढ़ता जाता है त्यों-त्यों लावा उत्सर्जन की मात्रा बढ़ने लगती है। यह क्रिया सतत सक्रिय रहती है। अतः उन्होंने बताया कि प्रत्येक महासागरीय कटक के पास नवीन भू-पटल का निर्माण होता है और उसी के साथ समुद्री नितल का प्रसार भी होता है।

          हैरिहेस महोदय ने बताया कि जब समुद्र नितल के प्रसार हो रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि पृथ्वी के परिधि में भी वृद्धि हो रही है। वास्तव में महासागरीय कटक के सहारे जब नवीन भूपटल का निर्माण होता है तो महासागरीय भूपटल का दूसरा किनारा महाद्वीपीय भूपटल से अभिसरण करता है। महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक होने के कारण महाद्वीपीय भू-पटल में प्रविष्ट कर जाता और गहराई में जाकर पिघलने की प्रवृत्ति रखता है। अतः यह सम्भव है कि महाद्वीपीय भूपटल की तुलना में महासागरीय भूपटल नवीन चट्टानों से निर्मित है।

सिद्धान्त के पक्ष में प्रमाण

      समुद्री नितल प्रसार के संबंध में प्रस्तुत किये गए प्रमाणों को दो वर्गों में बांटते है।

(A) हैरीहेस के द्वारा एकत्रित किये गए प्रमाण

(B) 1960 ई०के बाद नवीन अनुसंधानों के द्वारा एकत्रित प्रमाण

(A) हैरीहेस के द्वारा एकत्रित किये गए प्रमाण

      हैरिहेस महोदय ने अपने परिकल्पना के समर्थन में कुल 9 प्रमाण एकत्रित किये है-

1.चाट्टानो की आयु से संबंधित प्रमाण:–

       हैरिहेस के अनुसार महासागरीय भू-पटल में महासागरीय कटक के पास सबसे कम आयु के चट्टान और जहाँ पर महासागरीय भूपटल महाद्वीपीय भूपटल में प्रविष्ट कर रहा है वहां पर अधिक उम्र के चट्टानें मिलती है। पुनः उन्होंने यह भी कहा कि ज्यों-ज्यों गर्त से कटक की ओर जाते है त्यों -त्यों चट्टानों की आयु में कमी होती जाती है।  ऐसा तभी सम्भव है जब समुद्री नितल का प्रसार हो रहा हो।

2. महासागरीय नितल पर Sea mount और गयॉट जैसी अवशिष्ट पहाड़ियां मिलती है। ये दोनों स्थलकृतियाँ बेसाल्टिक चट्टानों से निर्मित है। हैरिहेस के अनुसार ये अवशिष्ट पहाड़ियां कभी महासागरीय कटक के शिखर थे । लेकि प्रसार प्रक्रिया के कारण ये महासागरीय कटक से दूर हट गए है । यह तभी संभव है जब महासगरीय नितल का प्रसार हो रहा हो।

3. हैरिहेस महोदय ने अपने अनुसंधान में पाया कि महासागरीय नितल पर अनेक अंत: नितल दरार पाये जाते है। अमेरिका के कैलिफोर्निया तट से रूस के कमचटका प्रायद्वीप तक ऐसे लगभग 2 दर्जन दरारें है। इन्ही दरारों से मैग्मा पदार्थ बाहर निकलकर ज्वालामुखी द्वीपों का निम्न करती है। इन दरारों का निर्माण होना सागरीय नितल प्रसार के संबंध में सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है।

4. महासागरीय नितल के किनारे महासागरीय गर्त का पाया जाना नितल प्रसार के पक्ष में एक महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करता है। हैरिहेस के अनुसार समुद्री गर्तों का निर्माण प्लेटों के प्रत्यावर्तन से संभव है  और प्रत्यावर्तन तभी संभव है जब समुद्री नितल का प्रसार हो रहा हो।

5. तटीय वलित पर्वतों के निर्माण भी महासागरीय नितल प्रसार का महत्वपूर्ण प्रमाण है। वस्तुतः प्रसारित हो रहे समुद्री नितल के दबाव से ही महाद्वीपीय चट्टाने मुड़कर किनारों पर वलित पर्वत का निर्माण करते है।

6. पुरा-चुम्बकीय प्रमाण:-

      यह साबित हो चुका है कि प्रति तीन लाख वर्ष के बाद चुम्बकीय दिशा में परिवर्तन हो जाता है। ऐसा तभी सम्भव है जब भूपटल के गर्भ से मैग्मा पदार्थ बाहर निकल रहे हो । नवीन चट्टानों के निर्माण कर रहे हो और भूपटल एक दूसरे के सापेक्ष में प्रसारित हो रहे हो।

7. महासागरीय नितल और तटवर्ती क्षेत्रों में होने वाली विवर्तनिकी क्रियाएं भी महासागरिय नितल प्रसार की पुष्टि करते है। अभिसरण और अपसरण के क्षेत्र में ही अधिकांश भूकंप एवं ज्वालामुखी की क्रियाएँ होती है जो समुद्री नितल प्रसार की पुष्टि करते है। 

8. विभिन्न महाद्वीपों के विस्थापन तथा अनेक प्रवाली द्वीपों का विस्थापन भी नितल प्रसार को पुष्टि करता है।

9. महासागरीय मैदान के सतह पर परतदार चट्टान का न पाया जाना भी महासागरीय नितल का प्रमाण प्रस्तुत करता है।

(B) 1960 ई०के बाद नवीन अनुसंधानों के द्वारा एकत्रित प्रमाण

             हैरिहेस महोदय सागर नितल प्रसार के संबंध में विशेष अनुसंधान कार्य किया था जिस पर प्रकाश डालने के लिए 1960 ई० के बाद कई और वैज्ञानिकों ने साक्ष्य इक्कठे किये। जैसे-

1. 1962 ई० में Mason(मासोन) महोदय ने प्रशांत महासागर के नितल का पुराचुम्बकीय अध्धयन किया जिसके आधार पर उन्होंने बताया कि प्रशांत महासागर कर नितल का प्रसार जारी है।

2. 1963 ई० में F.J. Vine और D.H. Mathus के द्वारा हिन्द महासागर का पुरचम्बकीय अध्ययन किया गया जिसके आधार पर उन्होंने बताया कि हिन्द महासागर में अवस्थित महासागरीय कटक के सहारे समुद्री नितल का प्रसार हो रहा है।

3. प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के द्वारा यह प्रमाणित हो चुका है कि अपसरण सीमा के सहारे समुद्री नितल का प्रसारहो रहा है और अभिसरण सीमा के सहारे पुराने नितल का विनाश हो रहा है।

4. 1981 ई० में C.D. Ollier महोदय ने विवर्तनिकी एवं भूआकृति नामक पुस्तक लिखा जिसमें महासागरीय नितल प्रसार के संबंध में कई प्रमाण प्रस्तुत किये। जैसे- उन्होंने बताया कि अंटार्कटिका और न्यूजीलैंड के बीच एक महासागरीय कटक है जहाँ महासागरीय नितल का फैलाव 6 मीटर प्रतिवर्ष के दर से हो रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि जुरासिक काल के पहले दो ही महासागर थे– प्रथम अटलांटिक महासागर दूसरा प्रशांत। हिन्द महासागर का निर्माण जुरासिक काल के बाद सागरीय नितल प्रसार के परिणामस्वरूप ही हुआ है।

5. 1968 ई० में Joides Report प्रस्तुत  किया गया जिसका पूरा नाम Joint Oceanography Institution  of Deep Earth  Shivling  इस अंनुसन्धान Report  ने समुद्र नितल के 84 स्थानों पर अनुसंधान का कार्य किया। अपने अनुसंधान कर्यों में इसने भी समर्थन किया कि समुद्र नितल का प्रसार हो रहा है।

6. 2003 में NASA  उत्तरी अमेरिका अनुसंधान के एक रिपोर्ट के द्वारा लाल सागर के मध्य बैसाल्टिक संरचना का अध्ययन किया गया जिससे यह साबित हुआ कि लाल सागर का प्रसार हो रहा है।

          अतः स्पष्ट है कि अधिकतम नवीन प्रमाण हैरिहेस के परिकल्पना की पुष्टि करते है लेकि अभी इससे जुड़ी हुई कई समस्याएं है जैसे– पहला सबसे बड़ी समस्या यह है कि महासागरीय नितल के ऊपर विशाल जल राशि मौजूद होने के वाबजूद कैसे संतुलित बना हुआ है। दूसरी आलोचना प्लेट विवर्तनिकी से संबंधित है जो कहता है समुद्री नितल का प्रसार नहीं हो रहा है बल्कि प्लेटो का विस्तार/प्रसार हो रहा है।

निष्कर्ष 

          इन आलोचना के वाबजूद साग नितल प्रसार सिद्धान्त को व्यापक मान्यता प्राप्त है। इस पर किया गया अनुसंधान कार्य भूगर्भशास्त्र में अनुसंधान हेतु सन्दर्भ बिन्दु का कार्य करता है।



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19. Applied Geomorphology / अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान

19. Applied Geomorphology

(अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान)


Applied Geomorphology 

अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान ⇒

1. परिचय
2. व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान की विषय वस्तु
2.1 भू-आकृति विज्ञान तथा खनन कार्य
2.2 भू-आकृति विज्ञान तथा इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट
2.3 भू-आकृति विज्ञान तथा भूमिगत जल का अध्ययन
2.4 भू-आकृति विज्ञान तथा तटीय स्थलाकृति का अध्ययन
2.5 भू-आकृति विज्ञान तथा भूमि उपयोग
2.6 भू-आकृति विज्ञान तथा पर्यावरण प्रबंधन
2.7 भू-आकृति विज्ञान तथा प्रादेशिक विकास
2.8 भू-आकृति विज्ञान तथा सैन्य क्षेत्र
3. निष्कर्षApplied Geomorphology

 1. परिचय 

         व्यावहारिक भूआकृति विज्ञान का विकास द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ है। डब्ल्यू.एम.डेविस, बाल्थर पेंक और एल.सी. किंग जैसे भूगोलवेताओं ने भूआकृति विज्ञान का विकास दार्शनिक एवं सैद्धांतिक तत्वों के आधार पर किया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मात्र वही विषय जीवित रह सके जो प्रत्यक्ष उपयोगिता रखता था या वे विषय जिन्होंने समय के अनुसार अपने विषय वस्तु में परिवर्तन कर लिया। इसी का परिणाम था कि भूआकृति विज्ञान में अनुप्रयुक्त भूआकृति विज्ञान का विकास किया गया। इसके कारण भू आकृति विज्ञान की उपयोगिता एवं महत्व और बढ़ गयी।
        व्यावहारिक भूआकृति विज्ञान शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग थॉर्नबरी महोदय के द्वारा 1954 ई० में किया गया था। उन्होंने 1954 में “प्रिंसिपल्स ऑफ ज्योमॉरफोलोजी” नामक पुस्तक लिखा जिसके अंत में एक अध्याय था जिसका शीर्षक ‘व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान’ था। थॉर्नबरी महोदय ने कहा कि “भूआकृति विज्ञान का अध्ययन मात्र सजावट की भाँति है। यदि इसके व्यावहारिक पक्ष को स्थापित नहीं किया गया तो यह अजयघर की वस्तु हो जाएगी।” थॉर्नबरी की इस चेतावनी को ध्यान में रखते हुए 1956 में अंतरराष्ट्रीय भौगोलिक यूनियन एक समिति का गठन किया इसी तरह 1968 में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के द्वारा भी एक आयोग का गठन किया गया। इन दोनों आयोगों ने भूआकृति विज्ञान के उपयोग के संबंध में एक समान विचार प्रकट किए। इन दोनों ने सिफारिश किया कि व्यवहारिक भूआकृति विज्ञान का अध्ययन एवं अध्यापन अनिवार्य रूप से कराया जाना चाहिए। 1960-70 के दशक में कनाडा, जर्मनी, इंग्लैंड, पूर्व सोवियत संघ और जापान जैसे देशों में अध्ययन अध्यापन का कार्य प्रारंभ हो गया। भारत में इसका अध्ययन 1980 के दशक से माना जाता है। इसका श्रेय पूणा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दीक्षित और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सविंद्र सिंह को जाता है। इसके अलावे दिल्ली स्कूल आफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर एस.के. पाल का विशेष योगदान है।
          जर्मनी के प्रोफेसर ब्रून्स डेन ने 1985 ई० में भू आकृति विज्ञान के सर्वाधिक मान्यता प्राप्त परिभाषा प्रस्तुत किया। यह परिभाषा आर.जे.जोहानटन के द्वारा प्रतिपादित पुस्तक “द फ्यूचर ऑफ ज्योग्राफी” में प्रकाशित हुआ। ब्रून्स डेन ने अपनी परिभाषा एक अनुसंधान प्रपत्र में “ज्योमोरफोलॉजी इन द साइंस ऑफ सोसाइटी” के रूप में प्रस्तुत किया था। इस अनुसंधान प्रपत्र को ही जॉनस्टन महोदय ने अपनी पुस्तक में शामिल किया था।
ब्रून्स डेन- “व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान एक ऐसा विषय वस्तु है जो स्थलाकृति विशेषताओं की सूचनाओं के आधार पर पृथ्वी के सीमित संसाधनों की खोज, मूल्यांकन, प्रबंधन तथा उनके संरक्षण में सहायक होता है। इसके अध्ययन के द्वारा पर्यावरण का पतन तथा प्राकृतिक विपदाओं के संभावनाओं का आकलन कर प्रभाव को कम किया जा सकता है।”
          जब से भूगोल में सुदूर संवेदन प्रणाली का प्रयोग किया जाने लगा है तब से भूआकृति विज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग को और बढ़ावा मिला है। इस नवीन तकनीक के द्वारा भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) का विकास किया गया है। जिससे भूआकृति विज्ञान के व्यवहारिक प्रयोग में व्यावहारिकता का आगमन हुआ है।
2. व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान की विषय वस्तु 
            Verstaphen महोदय ने अनुप्रयुक्त भू आकृति विज्ञान के 6 विषय वस्तु का उल्लेख किया है-
(1) प्राकृतिक संसाधनों का स्थलाकृतिक मानचित्र तथा सभी प्रकार के तथ्यों से पूर्ण मानचित्र का निर्माण करना- इन दोनों ही कार्यों के लिए उच्चावच का अध्ययन अनिवार्य है। इसका अध्ययन भूआकृति विज्ञान में ही होता है। उच्चावच के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि किस ऊँचाई पर किस प्रकार के वृक्ष या कृषि कार्य किया जा सकता है। अधिक उच्चावच वाले क्षेत्र में तीव्र अपरदन की संभावना है। ऐसे में अनुप्रयुक्त भूआकृति विज्ञान अधिक उच्चावच वाले क्षेत्रों का मानचित्रण कर लोगों को सचेत कर सकता है।
(2) प्राकृतिक विपदाओं (जैसे -भूस्खलन, हिमस्खलन, भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी क्रिया, बाढ़, सुखाड़) का वैज्ञानिक विश्लेषण भू आकृति विज्ञान में किया जाता है। ऐसे में इनका पूर्ण अध्ययन कर मानव एवं अन्य जीवों पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जा सकता है।
(3) स्थलाकृति विकास की प्रक्रियाओं का प्रभाव ग्रामीण विकास और नियोजन के कार्यों पर पड़ता है। ऐसे में ग्रामीण विकास और नियोजन कार्य प्रारंभ करने के पहले स्थलाकृतिक विकास का अध्ययन अनिवार्य है।
(4) नगरीय योजनाएँ भी व्यवहारिक भू आकृति विज्ञान के अंग है। अर्थात नगर उसी स्थान पर विकसित होते हैं जहाँ पर स्थलाकृतिक परिस्थितियाँ विकास में मदद करती है।
(5) व्यवहारिक भू आकृति विज्ञान का अध्ययन खनन क्रिया को प्रारंभ करने के लिए या खनन कार्य के संभावित क्षेत्रों के सीमांकन के लिए अत्यंत ही आवश्यक है।
(6) व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान का अध्ययन अभियंताओं के लिए भी आवश्यक है। जैसे- नदियों पर बाँध बनाने में, अन्य जलाशयों के निर्माण में भू आकृति विज्ञान का अध्ययन अनिवार्य हो जाता है।
           ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान एक उपयोगी विज्ञान है और यह अपना पहचान धीरे-धीरे स्थापित कर रहा है। वर्सटापेन के अलावे भारतीय भूगोलवेताओं ने इसके 8 विषय वस्तु निर्धारित किये हैं। जैसे:-
2.1 भू-आकृति विज्ञान तथा खनन कार्य
2.2 भू-आकृति विज्ञान तथा इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट
2.3 भू-आकृति विज्ञान तथा भूमिगत जल का अध्ययन
2.4 भू-आकृति विज्ञान तथा तटीय स्थलाकृति का अध्ययन
2.5 भू-आकृति विज्ञान तथा भूमि उपयोग
2.6 भू-आकृति विज्ञान तथा पर्यावरण प्रबंधन
2.7 भू-आकृति विज्ञान तथा प्रादेशिक विकास
2.8 भू-आकृति विज्ञान तथा सैन्य क्षेत्र 
2.1 भू-आकृति विज्ञान तथा खनन कार्य-                  व्यवहारिक भू-आकृति वैज्ञानिकों की अवधारणा है कि भू-आकृति का वृहद अध्ययन खनिजों के संभावित क्षेत्र और उसके उपयोग की संभावनाओं को बता सकता है। सुदूर संवेदन प्रणाली इस कार्य में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। जैसे यदि कोई प्रदेश मंद रूप से वलित हो और उसके विभिन्न स्तरों में चुना प्रधान चट्टान पाए जा रहे हैं तो वहां पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मिलने की संभावना होती है। जैसे भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर खनिज तेल की खोज की गई थी।
       यदि जलोढ़ प्रक्रिया का सही अध्ययन किया गया हो तो यह बताया जा सकता है कि किस नदी में किस प्रकार के खनिज मिल सकते हैं? औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने स्वर्ण रेखा और कोयल नदी के स्रोत क्षेत्र का अध्ययन कर यह बताया था कि इन नदियों के बालू में सोना पाए जाते हैं।
       ऋतुक्षरण प्रक्रिया और ऋतुक्षरण के प्रभाव क्षेत्र के आधार पर खनन संभावनाओं को बताया जा सकता है। जैसे- यदि लैटेराइट संरचना के क्षेत्र का अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होता है कि उसमें अपक्षालन(Leaching) की क्रिया अधिक होती है जिसके तहत लोहा एवं एल्युमिनियम जैसे खनिज पदार्थ के संचित भंडार मिलने की संभावना होती है। 
2.2 भू-आकृति तथा इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट-
           भूआकृति विज्ञान इंजीनियरिंग कार्य और भूमिगत जल संसाधन के निर्धारण में भी मदद करता है। जैसे- अभियंता लोग बड़े-बड़े बांधों का निर्माण उन्हीं क्षेत्रों में करना पसंद करती है जिस प्रदेश की ढाल तीव्र हो और नदी घाटियाँ सँकरी हो। इसी तरह आस्ट्रेलिया में अर्टिजियन उत्सुप्त कूआँ विशिष्ट भौगोलिक आकृति के कारण ही पाए जाते हैं।
       भू आकृति विज्ञान के आधार पर तटीय स्थलाकृतियों का अध्ययन किया जा सकता है और बड़े बंदरगाहों के निर्माण की संभावनाएं ढूँढ़ी जा सकती है।
        भू आकृति विज्ञान के अध्ययन कर भूमि उपयोग और पर्यावरण प्रबंधन तथा प्रादेशिक विकास में संतुलन स्थापित किया जा सकता है।
       अक्सर सेनाओं को विषम भौगोलिक प्रदेशों में कार्य करना पड़ता है। ऐसे में प्रादेशिक भू आकृति विज्ञान का अध्ययन उनके लिए अनिवार्य है।
       सम्म (Schumm) महोदय ने भूआकृति विज्ञान के तीन उपयोग जलोढ़ स्थलाकृति का अध्ययन कर बताया है। इसी तरह से अनुप्रयुक्त भूआकृति विज्ञान में नित्य-प्रतिदिन नए-नए महत्त्व सामने उभरकर आ रहे हैं।

3. निष्कर्ष:-

      अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भू-आकृति विज्ञान का यह नवीन शाखा कार्यिक महत्व रखने के कारण आने वाले वर्षों में अंतर विषय विषय-वस्तु के रूप में और भी महत्व प्राप्त कर सकता है।


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