Archives January 2024

4. What do you understand by ecosystem? Discuss its types (पारिस्थितिक तंत्र से आप क्या समझते है? इसके प्रकार की विवेचना करें।)

4. What do you understand by ecosystem? Discuss its types.

(पारिस्थितिक तंत्र से आप क्या समझते है? इसके प्रकार की विवेचना करें।)



       इकोसिस्टम (Eco-system) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम इंग्लैंड के एक इकोलोजिस्ट ए. जी. टेन्सले ने सन् 1935 में किया था। टेन्सले के अनुसार इकोसिस्टम वातावरण के सभी जैवकि एवं अजैविक घटकों के पूर्ण समन्वय से बनी प्रणाली (system) है।

“The system resulting form the intergration or all the living and non-living factors of the environment.”

      इकोसिस्टम शब्द में Eco शब्द से अभिप्राय वातावरण से है तथा System का अर्थ है परस्पर क्रियाशील तथा परस्पर जटिल तंत्र। दूसरे शब्दों में, “वातावरण के जैविक एवं अजैविक घटकों जीवों एवं वातावरण की अंतर्क्रियाओं के फलस्वरूप बने तंत्र को ही पारिस्थितिक तंत्र कहते हैं।”

       विभिन्न Ecologists द्वारा Ecosystem के लिए कुछ अलग प्रकार के शब्दों का भी उपयोग किया गया है। ये शब्द निम्नलिखित हैं-

(i) बायोसीनोसिस (Biocoenosis)- यह शब्द कार्ल मोबियस (Karl Mobias, 1879) द्वारा प्रयोग में लाया गया था।

(ii) माइक्रोकोस्म (Microcosm)- यह शब्द सफोर्बस (Saforb, 1887) द्वारा प्रयोग में लाया गया था।

(iii) जियोबायोसीनोसिस (Geobiocoenosis)- यह शब्द व्ही. व्ही. डकशेव (V. V. Dokuchaev, 1846 & 1903) द्वारा प्रयोग में लाया गया था।

(iv) होलोसीन (Holocoen)- इस शब्द को फ्रेडरिकस (Friedericsh, 1930) ने दिया था।

(v) बायोसिस्टम (Biosystem)- थीनमेन (Thienemann, 1939) द्वारा इस शब्द का प्रयोग किया गया था।

(vi) बायोइनर्ट बॉडी (Bioenert Body)- वरनाड्स्की (Vernadsky. 1944) ने इस. शब्द का प्रयोग किया था।

(vii) इकोकॉस्म (Ecocosm)- आर. मिश्रा (R. Mishra, 1968) ने यह शब्द दिया था।

       उपरोक्त शब्दों का अधिक प्रचलन तंत्र नहीं है। Ecosystem ही सर्वाधिक प्रचलित शब्द है।

     पृथ्वी एक विशाल पारिस्थितिक तंत्र है। यहाँ पर जैविक एवं अजैविक घटक समान रूप से एक-दूसरे से अंतर्क्रिया करते हैं जिसके कारण इस पारिस्थितिक तंत्र में संरचनात्मक एवं क्रियात्मक परिवर्तन होते हैं। पृथ्वी के विशाल पारिस्थतिक तंत्र को जैव मंडल (Biosphere) कहते हैं। जैव मंडल का अध्ययन करना अत्यन्त कठिन होता है। इस कारण अध्ययन की सुविधा के लिये इसे कृत्रिम रूप से छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित कर अध्ययन किया जाता है। ये इकाइयाँ स्थलीय, जलीय तथा मानव निर्मित पारिस्थितिक तंत्र की हो सकती हैं।

      इस प्रकार एक Ecosystem एक छोटा तालाब हो सकता है, एक खेत हो सकता है, एक मरुस्थल हो सकता है, एक जंगल हो सकता है अथवा एक महासमुद्र हो सकता है। बहुत बड़े पारिस्थितिक तंत्र को बायोम (Biome) कहते हैं; जैसे- सागर, महासागर, सम्पूर्ण वन क्षेत्र आदि। सबसे छोटा पारिस्थतिक तंत्र एक वृक्ष या एक जल की बूँद हो सकती है। Ecosystem सामान्यतः एक खुला तंत्र होता है जिसमें सामग्री (materials) एवं ऊर्जा (energy) का निरंतर प्रवाह (influx) एवं हानि (loss) होता रहता है।

पारिस्थितिक तंत्र के प्रकार (Types of Ecosystem)

      Ecosystem को निम्नलिखित दो प्रकारों में बाँटा जा सकता है-

(1) प्राकृतिक पारिस्थतिक तंत्र

(2) कृत्रिम (मानव निर्मित) पारिस्थितिक तंत्र

(1) प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र (Natural Ecosystem):-

      इस प्रकार के Ecosystem प्राकृतिक दशाओं में कार्य करते हैं तथा इनमें मनुष्य का हस्तक्षेप नहीं होता है या बहुत ही कम होता है। प्राकृतिक आवास के आधार पर प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र को निम्न दो प्रकारों में बाँटा जा सकता है-

(A) स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र (Terrestrial Ecosystem)-

           यह Ecosystem स्थल पर विकसित होता है। कुछ प्रमुख स्थलीय Ecosystem निम्नलिखित हैं-

(i) घास भूमि पारिस्थितिक तंत्र,

(ii) वन पारिस्थितिक तंत्र,

(iii) मरुस्थलीय पारिस्थितिक तंत्र,

(iv) पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र।

(B) जलीय पारिस्थितिक तंत्र (Aquatic Ecosystem)-

        यह जल में विकसित होता है। इसे निम्न दो प्रकारों में बाँटा जा सकता है-

(i) स्वच्छ जल पारिस्थितिक तंत्र (Fresh Water Ecosystem)-

       ऐसा जल जिसमें लवणों की मात्रा नहीं पायी जाती है, स्वच्छ जल कहलाता है। नदी, तालाब, झील, दलदल आदि का Ecosystem स्वच्छ जल पारिस्थतिक तंत्र होता है। झरना,

(ii) सामुद्रिक जल पारिस्थितिक तंत्र (Marine Water Ecosystem)-

        यह लवणीय जल में विकसित होता है। समुद्र तथा महासागर का पारिस्थितिक तंत्र सामुद्रिक जल पारिस्थितिक तंत्र होता है।

(2) कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र (Artificial Ecosystem):-

       इस प्रकार के पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण मनुष्य स्वयं अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये करता है। इस कारण इसे मानव निर्मित पारिस्थितिक तंत्र भी कहते हैं। इसके उदाहण निम्नलिखित हैं-

(i) कृषि पारिस्थितिक तंत्र (Agro Ecosystem)

(ii) जल जीवशाला पारिस्थितिक तंत्र (Water Aquarium Ecosystem)


Read More:

3. What do you understand by environment? Discuss its components. (पर्यावरण से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख घटक की विवेचना करें।)

3. What do you understand by environment? Discuss its components.

(पर्यावरण से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख घटक की विवेचना करें।)



भूगोल परिभाषा कोश के अनुसार, “चारों ओर उन बाहरी दशाओं का योग, जिसके अन्दर एक जीव अथवा समुदाय रहता है या कोई वस्तु रहती है।”

ए. जी. टेन्सले के अनुसार, “प्रभावकारी दशाओं का सम्पूर्ण योग, जिसमें जीव रहते हैं, पर्यावरण कहलाता है”

विद्वान रॉस के अनुसार, “पर्यावरण वह बाह्य शक्ति है, जो प्रभावित करती हैं।”

भूगोलवेत्ता डडले स्टाम्प के अनुसार, “पर्यावरण प्रभावों का ऐसा योग है, जो जीव के विकास एवं प्रकृति को परिवर्तित तथा निर्धारित करता है ।”

हर्सकोविट्स के अनुसार, “वातावरण उन सब बाहरी दशाओं और प्रभावों का योग है, जो प्राणी के जीवन और विकास पर प्रभाव डालते हैं।”

        संक्षेप में हम कह सकते हैं कि पर्यावरण में वे सभी प्राकृतिक एवं मानव निर्मित कारक सम्मिलित हैं, जो चारों ओर से घेरे हुए हैं और प्रभावित करते हैं।

      दूसरे शब्दों में, पर्यावरण के अन्तर्गत भौतिक, सांस्कृतिक अथवा जैविक-अजैविक प्रभावशील घटकों को सम्मिलित किया जाता है, जो जीव की दशाओं और कार्यों को प्रभावित करता है। इस प्रकार भौतिक कारक के अलावा सांस्कृतिक कारकों के प्रभावों को भी सम्मिलित किया जाता है। इस प्रकार पर्यावरण को पाँच बिन्दुओं में विश्लेषित किया जा सकता है-

(1) पर्यावरण बाह्य शक्ति है।

(2) ये शक्तियाँ परस्पर संबंधित हैं।

(3) इन शक्तियों का संयुक्त प्रभाव पड़ता है।

(4) ये शक्तियाँ गत्यात्मक (परिवर्तनशील) हैं।

(5) इन शक्तियों का जीव पर प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।

      पर्यावरण को दो प्रमुख प्रकारों में बाँटा जा सकता है-

1. भौतिक पर्यावरण (Physical Environment):-           

        भौतिक पर्यावरण प्रकृति का अनुपम उपहार है। इसका कोई विकल्प नहीं है। यह अमूल्य संसाधन सहज सभी को उपलब्ध है। भौतिक पर्यावरण से तात्पर्य उन भौतिक अथवा प्राकृतिक कारकों से है, जिन पर प्रकृति का सीधा नियंत्रण है, जिन्हें भगवान ने बनाया अर्थात् मानव का हस्तक्षेप इसके निर्माण में नहीं है।

        यदि मनुष्य को इस पृथ्वी से हटा लिया जाय, तो जिन क्रियाओं-प्रक्रियाओं और प्रतिक्रियाओं पर कोई अन्तर न आये, उन सब कारकों को भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत रखा जाता है। इसका आशय यह है कि जिसका निर्माण और नियंत्रण मनुष्य से परे है, जो प्रकृति प्रदत्त है, वह सब कुछ भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत आता है, जैसे- सूर्य ताप, ऋतु परिवर्तन स्थिति, भू-वैज्ञानिक संरचना, धरातल, भूकंप, ज्वालामुखी, खनिज, मिट्टियाँ, वनस्पति, जलराशियाँ, जीव-जन्तु ऐसे कारक हैं, जो प्रकृति जन्य हैं। इसलिए उक्त सभी कारकों को प्राकृतिक अथवा भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत रखा जाता है।

2. सांस्कृतिक पर्यावरण (Cultural Environment):-               

        सांस्कृतिक पर्यावरण मानव निर्मित होता है तथा मानव का इस पर पूर्ण नियंत्रण होता है। जैसे- संविधान, धर्म, दर्शन, संस्कृति, प्रतिमान, आदर्श मूल्य, सामाजिक परम्पराएँ, रीति-रिवाज, सामाजिक संबंध। इन अमूर्त तथ्यों के अलावा मूर्त कारक भी सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत आते हैं, जैसे- सड़कें, पुल, भवन, तालाब, आवास, शहर, सुरक्षा, चिकित्सा, शिक्षा केन्द्र, परिवहन स्थान, मनोरंजन स्थल आदि। मनुष्य पहले इनका निर्माण करता है और फिर इनसे प्रभावित होता है। नगरीय एवं औद्योगिक स्थलों पर सांस्कृतिक पर्यावरण विशेष प्रभावी होता है।

       शिक्षा केन्द्र और सुरक्षा केन्द्रों पर भी सांस्कृतिक कारक अत्यधिक प्रभावी होते हैं जबकि पर्यटन स्थलों पर भौगोलिक और सांस्कृतिक दोनों कारक प्रभावी होते हैं। सांस्कृतिक पर्यावरण वस्तुतः मनुष्य के भौतिक कारकों के प्रति अनुकूलन, समायोजन, संघर्ष आदि की प्रतिक्रिया-अनुक्रिया के परिणामस्वरूप जन्मा है; जो कृषि, उद्योग के साथ-साथ संस्कृति में भी देखा जा सकता है।

पर्यावरण के अवयव (घटक)

(Components of Environment)

      पर्यावरण अनेक अवयवों से मिलकर बना है। स्थूल रूप में अध्यात्म में इसे जड़ और चेतन कहा गया है। जिसे आधुनिक वैज्ञानिक अजैविक एवं जैविक कह कर विभाजित करते हैं। इसे भौतिक एवं अभौतिक अवयवों में विभक्त किया जा सकता है। इन घटनों की सर्वप्रथम वैज्ञानिक विवेचना 1948 में वनस्पतिशास्त्री ओस्टिंग ने की और निम्नलिखित प्रमुख घटकों में विभाजित किया-

1. पदार्थ (मिट्टी+पानी),

2. दशाएँ (ताप+प्रकाश)

3. बल (पवन+गुरुत्व)

4. जीव (जन्तु+वनस्पति)

5. काल (ऋतु+समय)।

      पर्यावरणविद् डौरेनमिर (1954) ने पर्यावरण के कारकों को सात वर्गों में विभाजित किया है-

1. मिट्टी,

2. हवा,

3. पानी,

4. आग,

5. ताप,

6. रोशनी,

7. जीव-जन्तु।

      संक्षेप में, पर्यावरण अध्ययन को सरल करते हुए पर्यावरण घटकों को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

1. भौतिक कारक (Physical Factor)

A. पार्थिक कारक (Terrestrial factors):-

(i) भू रचना- (भूवैज्ञानिक संरचना खनिज, चट्टानें एवं मृदा)।

(ii) धरातल- (उच्चावच पर्वत, पठार, मैदान)।

(iii) स्थिति- (अवस्थिति, ज्यामिति परिस्थिति एवं क्षेत्र के संदर्भ में स्थिति)

2. सांस्कृतिक घटक (Cultural Factor):-

(i) आर्थिक घटक- कृषि, उद्योग, तथा व्यापार।

(ii) सामाजिक घटक-  संस्कृति, दर्शन, व्यवहार और आदर्श।

(iii) धार्मिक घटक- संस्कार तथा परम्पराएँ।

(iv) राजनैतिक घटक- नीतियाँ औ चेतना।


Read More:

6. A glimpse of world history (विश्व इतिहास का एक झलक)

A glimpse of world history

(विश्व इतिहास का एक झलक)



1. पुनर्जागरण का अर्थ होता है

⇒ फिर से जगना (बौद्धिक जागरण)

2. पुनर्जागरण का आरंभ माना जाता है

इटली के फ्लोरेंस नगर से (16वीं सदी में)

3. पुनर्जागरण का अग्रदूत माना जाता है

दाँते को (इटली के महान कवि)

4. ‘डिवाइन कॉमेडी’ के लेखक है

⇒ दाँते (1260-1321 ई०)

5. ‘मानववाद’ का संस्थापक माना जाता है

⇒ पेट्रॉक को (इटली निवासी 1304-1367 ई.)

6. आधुनिक राजनीतिक दर्शन का जनक कहा है

⇒ मैकियावेली को (प्रसिद्ध पुस्तक द प्रिंस)

7. ‘द लास्ट सपर’ और ‘मोनालिसा’ नामक अमर चित्रों के चित्रकार है

⇒ लियोनार्डो द विंची (इटली का)

8. ‘द लास्ट जजमेंट’ एवं ‘द फॉल ऑफ मैन’ महान कृतियाँ है

⇒ माइकल एंजेलो की (इटली का)

9. ‘ओथैलो’, ‘रोमियो एण्ड जुलियट’ और ‘हेमलेट’ अमर कृति है

⇒ शेक्सपीयर (इंगलैंड) की

10. धर्म सुधार आन्दोलन (शुरुआत 16वीं सदी,  इंगलैंड में) इंग्लैंड का प्रवर्तक था

मार्टिन लुथर (जर्मनी का)

11. समुद्री मार्ग से सम्पूर्ण विश्व का चक्कर लगाने वाला प्रथम व्यक्ति था

⇒ मैगलन (स्पेन निवासी)

12. अमेरिका का स्वतंत्रता युद्ध समाप्त हुआ था

⇒ पेरिस संधि (1783 ई०) द्वारा

13. अमेरिका को पूर्ण स्वतंत्रता मिली

⇒ 4 जूलाई, 1776 को (विद्रोह शुरू 1775 में)

14. अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का तात्कालिक कारण था

⇒ बोस्टन की चाय पार्टी (16 दिसम्बर 1773 को)

15. ‘बोस्टन टी पार्टी’ का नायक था

⇒ सैम्युल एडम्स

16. प्रजातंत्र एवं धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना सर्वप्रथम हुई थी

⇒ अमेरिका में

17. संसार में सर्वप्रथम लिखित संविधान लागू हुआ

⇒ संयुक्त राज्य अमेरिका में (1789 में)

18. मनुष्यों की समानता तथा उसके मौलिक अधिकारों की घोषणा करने वाला पहला देश था

अमेरिका

19. वाटरलू (बेल्जियम) का युद्ध हुआ था

⇒ 16 मई 1815 ई० को

20. अमेरिका (मूल निवासी रेड इंडियन) की खोज की थी

⇒ किस्ट्रोफर कोलम्बस ने

21. अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति थे

⇒ जार्ज वाशिंगटन

22. अब्राहम लिंकन ने दास प्रथा का उन्मूलन किया

⇒ जनवरी 1863 को

23. अमेरिका में फिलोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना की थी

⇒ बेंजामिन फ्रैंकलिन ने

24. अमेरिकी गृहयुद्ध की समाप्ति हुई थी

⇒ 26 मई 1865 को

25. अब्राहम लिंकन की हत्या की थी

⇒ जॉन विल्कीज बूथ ने (4 मार्च, 1865 ई० को)

26. फ्रांस की राज्यक्रांति लुई सोलहवाँ के शासन काल में हुई थी

⇒ 1789 ई. में

27. समानता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व का नारा देन है

⇒ फ्रांस की राज्यक्रांति की

28. मैं ही राज्य हूँ और मेरे शब्द ही कानून है।’ यह कथन है

⇒ लुई चौदहवाँ का

29. ‘सौ चूहों की अपेक्षा एक सिंह का शासन उत्तम है’ यह उक्ति है

⇒ वाल्टेयर की

30. ‘कानून की आत्मा’ की रचना की थी

⇒ मन्टेस्क्यू ने

31. ‘माप-तौल की दशमलव प्रणाली’ देन है

⇒ फ्रांस की

32. नेपोलियन का जन्म कोर्सिका द्वीप की राजधानी अजासियों में हुआ था

⇒ 15 अगस्त 1769 को

33. इंगलैंड को ‘बनियों का देश’ कहा था

⇒ नेपोलियन ने (पिता काली बेनापर्ट)

34. नेपोलियन (अन्य नाम- लिट्ल कारपोल) फ्रांस का सम्राट बना

⇒ 1804 ई. में

35. ‘आधुनिक फ्रांस का निर्माता’ माना जाता है

⇒ नेपोलियन को (उपनाम लिटिल कारपोरल)

36. मित्र राष्ट्रों की सेना ने नेपोलियन को वाटरलू के युद्ध (18 जून, 1915 ई.) में पराजित कर नजरबंद किया था

⇒ सेंट हेलेना द्वीप पर

37. भारत और चीन के बीच ‘पंचशील समझौता’ हुआ था

⇒ 20 अप्रैल 1954 को

38. इटली के एकीकरण का जनक माना जाता है

⇒ जोसेफ मेजनी को (जन्म- जेनेवा)

39. ‘लाल कुरती’ नामक सेना संगठित किया था

गैरीबाल्डी ने

40. इटली का एकीकरण किया था

⇒ काउण्ट कावूर ने (1871 ई. में)

41. जर्मनी का एकीकरण किया था

➤ बिस्मार्क ने (जन्म- ब्रेडनबर्ग में)

42. जर्मनी का सबसे शक्तिशाली राज्य था

➤ प्रशा

43. आस्ट्रिया का चांसलर था

➤ मेटरनिख

44. फ्रांस और प्रशा के बीच सुडान का युद्ध हुआ था

➤ 15 जुलाई 1870 ई० को

45. फ्रांस और प्रशा के बीच ‘फ्रैंकफर्ट की संधि’ हुई थी

➤ 10 मई 1871 ई० को

46. ‘दास कौपिटल’ और ‘काम्यूनिस्ट मैनीफेस्टो (1848 ई० में)’ पुस्तक के रचनाकार है

➤ कार्ल मार्क्स

47. ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ का नारा दिया था

➤ कार्ल्स मार्क्स ने (वैज्ञानिक समाजवाद का संस्थापक)

48. रूस के शासक को कहा जाता था

➤ जार

49. रूस का अंतिम जार शासक था

➤ निकोलस द्वितीय

50. रूसी क्राति हुई थी

➤ मार्च, 1917 ई० में

51. पोल्सेविक क्राति हुई थी

➤ 7 नवम्बर 1917 को (नेता-लेनिन)

52. लाल सेना का संगठन किया था

➤ ट्रॉटस्की ने

53. ‘एक जार, एक चर्च और एक रूस’ का नारा दिया था

➤ जार निकोलस द्वितीय ने

54. लेनिन ने रूस में नई आर्थिक नीति (NEP) लागू की थी

➤ 1921 ई० में

55. ‘मदर’ पुस्तक की रचना की है

➤ मैक्सिम गोर्की ने

56. औद्योगिक क्राति की शुरूआत हुई थी

➤ इंगलैंड में (सूती कपड़ा उद्योग से)

57. इंगलैंड में गृह-युद्ध हुआ था

➤ 1642 ई० में (चार्ल्स प्रथम के शासन काल में)

58. इंगलैंड में गौरवपूर्ण क्रांति (जेम्स द्वितीय के समय) हुई थी

➤ 1688 ई० में

59. सौ वर्षीय युद्ध हुआ था

➤ इंगलैंड एवं फ्रांस के बीच (1338-1453)

60. गुलाबों का युद्ध हुआ था

➤ इंगलैण्ड में (1455-1485) 

61. प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत हुई थी

➤ 28 जुलाई 1914 को

62. प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले देशों की संख्या थी

➤ 37

63. प्रथम विश्व युद्ध का तात्कालिक कारण था

➤ आस्ट्रिया के राजकुमार फर्डिनेंड की सेराजेवो में हत्या

64. प्रथम विश्व युद्ध में धूरी राष्ट्रों का नेतृत्व किया था

➤ जर्मनी ने

65. इंगलैंड प्रथम विश्व युद्ध में शामिल हुआ था

➤ 8 अगस्त 1914 को

66. प्रथम विश्व युद्ध के समय अमेरिका के राष्ट्रपति थे

➤ वुडरो विल्सन

67. अमेरिका प्रथम विश्वयुद्ध में शामिल हुआ था

➤ 6 अप्रैल 1917 को

68. प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त हुई थी

➤ 11 नवम्बर 1918 ई० को

69. वर्साय की संधि हुई थी

➤ 28 जून 1919 को (जर्मनी व मित्र राष्ट्रों के बीच)

70. 1911 ई. में हुई चीनी कांति का नायक था

➤ डॉ॰ सनयात सेन

71. चीन का राष्ट्रपिता कहा जाता है

➤ डॉ॰ सनयात सेन को

72. चीन में गृह-युद्ध शुरू हुआ था

➤ 1928 ई० में

73. ‘खुले द्वार की नीति’ अपनाई गयी थी

➤ चीन में (प्रतिपादक- जॉन हे)

74. ‘एशिया का मरीज’ कहा जाता है

➤ चीन को 

75. ‘यूरोप का मरीज’ कहा जाता है

➤ तुर्की को

76. ‘आधुनिक तुर्की का निर्माता’ माना जाता है

➤ मुस्तफा कमालपाशा को (अतातुर्क)

77. 1923 ई में लोजान को संधि हुई थी

➤ तुर्की एवं युनान के बीच

78. इस्ताम्बुल का पुराना नाम थी

➤ कुस्तुनतुनिया

79. हिटलर का जन्म हुआ था

➤ 20 अप्रैल 1889 को (वान में)

80. ‘एक राष्ट्र एक नेता’ का नारा दिया था; जो ‘फ्यूहरर’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ

➤ एडोल्फ हिटलर ने (आत्मकथा- माई कैम्फ)

81. द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लेने वाले देश थे

➤ 61

82. द्वितीय विश्व युद्ध का तत्कालिक कारण था

➤ जर्मनी का पोलैण्ड प आक्रमण

 83. अमेरिका का द्वितीय विश्व युद्ध में प्रवेश हुआ था

➤ 8 सितम्ब 1941 को

8. What is meant by regional imbalance? Explain the reasons for regional imbalance. (प्रादेशिक असन्तुलन से क्या तात्पर्य है? प्रादेशिक असन्तुलन के कारणों का विवरण को समझाइए।)

8. What is meant by regional imbalance? Explain the reasons for regional imbalance.

(प्रादेशिक असन्तुलन से क्या तात्पर्य है? प्रादेशिक असन्तुलन के कारणों का विवरण को समझाइए।)regional imbalance    

     सापेक्षतः विकसित एवं आर्थिक दृष्टि से दबे हुए राज्यों का सह-अस्तित्व और प्रत्येक राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति की दृष्टि से भिन्नता को ही प्रादेशिक (क्षेत्रीय) असन्तुलन (Regional Imbalance) कहा जाता है। भारत जैसे संघीय राज्य के समन्वित विकास के लिए प्रादेशिक (क्षेत्रीय) विकास अनिवार्य है, किन्तु यहां प्रादेशिक भिन्नता स्पष्टतः दिखाई देती है।

      पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल, आदि कुछ राज्य आर्थिक दृष्टि से बहुत विकसित हैं जबकि बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ उत्तरांचल, उत्तर प्रदेश, आदि राज्य पिछड़े हुए हैं। वस्तुतः एक क्षेत्र के संसाधनों के अधिक क्षमतापूर्ण प्रयोग से वह क्षेत्र अत्यधिक विकसित हो जाता है तथा दूसरे क्षेत्र के संसाधनों के सम्भावित अधिकतम क्षमतापूर्ण उपयोग न होने से वह क्षेत्र अविकसित रह जाता है। यही प्रादेशिक असन्तुलन है।

प्रादेशिक असन्तुलन के कारण

      प्रादेशिक असन्तुलन के निम्नलिखित कारण हैं:-

(1) संसाधनों का असमान वितरण:-

      देश के विभिन्न भागों में प्रकृति प्रदत्त संसाधन जैसे- मिट्टी एवं जल, वन तथा खनिज असमान रूप से वितरित होने के कारण देश में कृषि एवं उद्योगों के विकास में विषमताएँ उत्पन्न होती हैं जिससे प्रादेशिक असन्तुलन उत्पन्न होता है।

(2) जनसंख्या का वितरण:-

       प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ देश के विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या का वितरण असमान पाया जाता है जिसके कारण भी प्रादेशिक असन्तुलन को बढ़ावा मिलता है।

(3) आवश्यक आर्थिक संरचना का अभाव:-

      देश के जिन क्षेत्रों में आर्थिक विकास के लिए आवश्यक आर्थिक संरचना, जैसे- यातायात एवं सन्देश वाहन के साधन, विद्युत् शक्ति, विपणन व्यवस्था खाद्य सुविधाओं का पर्याप्त विकास नहीं होता, वे क्षेत्र अपेक्षाकृत पिछड़े रहते हैं। इससे भी प्रादेशिक असन्तुलन को बढ़ावा मिलता है।

(4) आर्थिक शक्तियों का प्रभाव:-

         वे क्षेत्र जो पहले से विकसित होते हैं और जहां आर्थिक संरचनाएँ पहले से ही उपलब्ध होती हैं, उन क्षेत्रों में निजी पूँजी अधिक आकर्षित होती है। फलतः विकसित क्षेत्र और अधिक विकसित हो जाते हैं और क्षेत्रीय विषमताएँ बढ़ती हैं।

(5) सामाजिक एवं सांस्कृतिक घटकों का प्रभाव:-

       वे क्षेत्र जो पिछड़े हुए रूढ़िवादी होते हैं, वहां के निवासियों में सामान्यतया जीवन स्तर को सुधारने, अधिक बचत करने सम्बन्धी आदतों का अभाव रहता है जिसके परिणामस्वरूप ऐसे क्षेत्रों का अपेक्षाकृत कम विकास होता है जिससे प्रादेशिक असन्तुलन को बढ़ावा मिलता है।

(6) राजनीतिक प्रभाव:-

     ऐसे क्षेत्र जिनमें नागरिक शिक्षित होते हैं तथा राजनीतिक रूप से जागरूक होते हैं, अपने राजनीतिक महत्व के कारण सरकार पर इन क्षेत्रों के विकास के लिए अधिक दबाव डाल देते हैं। अतः ऐसे क्षेत्रों का अधिक विकास हो जाता है।

(7) सरकारी नीति:-

       सरकारी नीति भी प्रादेशिक असन्तुलन को प्रोत्साहन देती है। उदाहरण के लिए, भारत में योजनाकाल में सरकारी नीति पर इस बात का प्रभाव रहा है। विकसित क्षेत्रों में विनियोग करने से शीघ्र परिणाम सामने आ सकेंगे और यदि सीमित साधनों का इतने विशाल पिछड़े क्षेत्र में विनियोग किया गया तो साधन गरीबी के दुश्चक्र को तोड़ने में अधिक प्रभावशाली नहीं रह जाएंगे। परिणामस्वरूप विकसित क्षेत्रों में ही विनियोजन किया गया जिसके कारण भी प्रादेशिक असन्तुलन में वृद्धि हुई है।

(8) विदेशी व्यापार:-

      अर्द्ध विकसित देश विदेशी व्यापार के क्षेत्र में भी पिछड़े हुए होते हैं। अतः उन्हें निर्यात का मूल्य कम मिलता है तथा आयात का मूल्य अधिक देना पड़ता है फलतः वे अपना विकास तेजी से नहीं क पाते हैं। इसके विपरीत विकसित देशों में विकास की गति और तेज हो जाती है फलस्वरूप प्रादेशिक असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है।


Read More:-


7. Description of the effects of regional imbalance (प्रादेशिक असन्तुलन के प्रभावों का वर्णन)

7. Description of the effects of regional imbalance

(प्रादेशिक असन्तुलन के प्रभावों का वर्णन)



effects of regional imbalance  

   प्रादेशिक असन्तुलन का प्रभाव निम्नलिखित रूपों में देखा जा सकता है :

(A) आर्थिक प्रभाव:-

    प्रादेशिक असन्तुलन के आर्थिक प्रभाव निम्नांकित हैं:

(1) साधनों का अपूर्ण उपयोग:-

    प्रादेशिक असन्तुलनों के कारण देश के सम्पूर्ण साधनों का प्रयोग सम्भव नहीं हो पाता। प्रादेशिक असन्तुलनों की अटल स्थिति, विकास के एक कुशल तरीके का प्रतिनिधित्व करती है।

(2) बेरोजगारी में वृद्धि:-

     प्रादेशिक असन्तुलन कुछ क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि कर देता है जबकि अन्य क्षेत्रों में बेरोजगारी व्याप्त रहती है और उसमें वृद्धि होती है।

(3) साधनों का समुचित उपयोग:-

      प्रत्येक देश के प्राकृतिक साधन सीमित होते हैं अतः उनका उपयोग अत्यन्त मितव्ययिता से किया जाना चाहिए ताकि भविष्य के लिए उनका संरक्षण किया जा सके। उद्योगों का क्षेत्रीय असन्तुलन इस उद्देश्य की पूर्ति में बाधक होता है।

(4) जीवन-स्तर में भिन्नता:-

      प्रादेशिक असन्तुलन से विभिन्न क्षेत्र के लोगों के जीवन-स्तर में बहुत अन्तर आ जाता है। विकसित क्षेत्रों में आय का उच्च स्तर होने से जीवन स्तर भी उच्च होता है, जबकि पिछड़े क्षेत्रों में आय का स्तर निम्न होता है अतः वहां का जीवन स्तर भी निम्न होता है, परिणामस्वरूप लोगों में असन्तोष की भावना बढ़ती है।

(5) श्रम शक्ति का एकांगी होना:-

     असन्तुलित विकास श्रम शक्ति को पंगु बना देता है। क्षेत्र विशेष में कुछ उद्योगों के विकास के कारण श्रम शक्ति भी उसी उद्योग विशेष के लिए कुशल होती है।

(6) अन्य आर्थिक प्रभाव:-

(i) क्षेत्रीय असन्तुलन में अर्थव्यवस्था का एकांगी विकास ही हो पाता है।

(ii) क्षेत्र विशेष के विकसित होने तथा दूसरे क्षेत्र के अविकसित रहने से श्रम की गतिशीलता में कमी आती है।

(B) सामाजिक प्रभाव:-

       सामाजिक प्रभाव निम्नलिखित हैं:

(1) आय एवं सम्पत्ति की असमानताओं में वृद्धि:-

     प्रादेशिक असन्तुलन के कारण गांव व नगरों के मध्य आय एवं सम्पत्ति की असमानताओं में निरन्तर वृद्धि होती रहती है।

(2) असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा:-

     प्रादेशिक असन्तुलनों के कारण एक ही क्षेत्र या कुछ ही क्षेत्रों की ओर श्रमिकों का प्रवास बढ़ जाता है जिसके कारण अनेक समस्याएं जैसे- भीड़-भाड़ की समस्या, आवास व्यवस्था की कमी, बिजली एवं जलापूर्ति की समस्या उत्पन्न हो जाती है। सभी व्यक्तियों को रोजगार न मिलने के कारण असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है। इसके साथ ही मानव शक्ति का यथोचित विकास नहीं हो पाता है।

(3) सामाजिक लागतों में वृद्धि:-

     प्रादेशिक असन्तुलन के परिणामस्वरूप किसी क्षेत्र विशेष में अत्यधिक औद्योगीकरण होने पर वहां प्रदूषण, आदि के कारण श्रमिकों में व्याप्त रोगों के उपचार के लिए अस्पताल, स्वास्थ्य सदन, आदि की अतिरिक्त लागत देनी पड़ती है।

(C) राजनीतिक प्रभाव:-

         राजनीतिक प्रभाव निम्नलिखित हैं:

(1) राजनीतिक अस्थिरता:-

          विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त अत्यधिक असमानताएँ अस्थिरता को बढ़ावा देती हैं। भारत में पंजाब व जम्मू-कश्मीर में उग्रवाद के लिए प्रादेशिक असन्तुलन भी उत्तरदायी है।

(2) क्षेत्रवाद को बढ़ावा:-

      जब अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों का अधिक विकास एवं कुछ का कम विकास होता है तो उससे क्षेत्रवाद को बढ़ावा मिलता है।

(3) सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव:-

     प्रादेशिक असन्तुलन सुरक्षा प प्रतिकूल प्रभाव डालता है। एक क्षेत्र में उद्योगों, आदि का विकास होने प वहां युद्ध के समय शत्रु देश आसानी से हवाई हमला कर सकता है।


Read More:-

15. What is religion? Characteristics of religion and description of Indian religions (धर्म क्या है? धर्म की विशेषताएँ तथा भारतीय धर्मों का विवरण)

15. What is religion? Characteristics of religion and description of Indian religions

(धर्म क्या है? धर्म की विशेषताएँ तथा भारतीय धर्मों का विवरण)



  What is religion

     धर्म शब्द का अर्थ है ‘धारणा’। धारणा से तात्पर्य उन आदर्शों की अन्तरंग प्रतिष्ठापना से है जो व्यक्ति और समाज को श्रेष्ठता और सद्भावना की दिशा में प्रेरित करते हैं। धर्म का दूसरा अर्थ है अभ्युदय और निश्रेयस अर्थात् उन गतिविधियों को अपनाया जाना जो कल्याण और प्रगति का शालीनता युक्त पथ प्रशस्त करती हैं।

      स्मृतिकारों ने धर्म को कर्तव्यपालन के अर्थ में लिया है। सामान्य अर्थों में धर्म अलौकिक शक्ति पर विश्वास है। प्रत्येक समाज व समुदाय में धर्म किसी न किसी रूप में अवश्य पाया जाता है। धर्म जीवन को सम्पूर्णता प्रदान करने की एक विधि है।

डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार, जिन सिद्धान्तों के अनुसार हम अपना दैनिक जीवन व्यतीत करते हैं तथा जिनके द्वारा हमारे सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना होती है, वही धर्म है। यह जीवन का सत्य है और हमारी कृति को निर्धारित करने वाली शक्ति है।”

जेम्स फ्रेजर के अनुसार, “धर्म से मैं मनुष्य से श्रेष्ठ उन शक्तियों की सन्तुष्टि या आराधना समझता हूं जिसके सम्बन्ध में यह विश्वास किया जाता है कि प्रकृति और मानव जीवन को मार्ग दिखलाती व नियन्त्रित रखती है।

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैलिनोवस्की के अनुसार, धर्म क्रिया का एक तरीका है, साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था भी। धर्म समाजशास्त्रीय घटना के साथ-साथ एक व्यक्तिगत अनुभव भी है।” इस परिभाषा से स्पष्ट है कि धर्म विश्वासों की एक व्यवस्था है। यह विश्वास आत्मा, परमात्मा या अलौकिक शक्ति आदि पर हो सकता है। तथा व्यवस्था का आशय आराधना, पूजा-पाठ, प्रार्थना या भक्ति से है।

ईमाइल दुर्खीम के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं से सम्बन्धित विश्वासों एवं आचरणों की समग्रता है, जो इन पर विश्वास करने वालों को एक नैतिक समुदाय के रूप में संयुक्त करती है।”

जॉनसन के अनुसार, “धर्म कम या अधिक रूप में उच्च आलौकिक क्रम या प्राणियों, शक्तियों, स्थानों एवं अन्य तत्वों के सम्बन्ध में विश्वास व व्यवहारों की एक स्थिर प्रणाली है।”

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, “धर्म वह है जो मानव को इस संसार एवं परलोक में आनन्द की खोज के लिए प्रेरित करता है।”

मजूमदार एवं मदान के अनुसार, “धर्म किसी आलौकिक और अतीन्द्रिय शक्ति के भय का एक मानवीय प्रत्युत्तर है। यह व्यवहार की अभिव्यक्ति अथवा परिस्थितियों से किए जाने वाले अनुकूलन का वह रूप है, जो आलौकिक शक्तियों की धारणा से प्रभावित होता है।”

धर्म की विशेषताएँ-

       धर्म की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं।:-

(1) अतिमानवीय व अलौकिक शक्ति पर प्रभाव:-

    धर्म में यह स्वीकार किया जाता है कि निश्चित रूप से कोई न कोई ऐसी अलौकिक शक्ति है जो मानव शक्ति से श्रेष्ठ व मानव से परे रहकर विश्व का संचालन करती है।

(2) पवित्रता की धारणा:-

    धर्म पवित्र वस्तुओं से सम्बन्धित विश्वासों एवं क्रियाओं की एक समन्वित व्यवस्था है अर्थात् धार्मिक विश्वासों, वस्तुओं, स्थानों, आदि में पवित्रता का भाव पाया जाता है।

(3) धार्मिक क्रियाकलाप:- 

    प्रत्येक धर्म में कुछ न कुछ क्रियाकलाप अवश्य पाए जाते हैं जिन्हें पूर्ण करके व्यक्तियों को आत्मिक सुख प्राप्त होता है।

(4) भय की धारणा:-

   धर्म में भय की धारणा होती है, इसलिए व्यक्ति धार्मिक क्रियाकलापों के माध्यम से पारलौकिक या अलौकिक शक्ति को प्रसन्न करने का प्रयास करता है तथा धार्मिक क्रियाकलापों में ऐसे कार्य करता है जिससे अलौकिक शक्ति द्वारा उसकी इच्छाएं पूर्ण हों और वह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहता जो धर्म के विरुद्ध हो।

(5) धर्म वैयक्तिक व सामाजिक:-

    धर्म व्यक्तिगत अनुभवों के साथ-साथ सामाजिक अनुभवों से भी सम्बन्धित होता है।

(6) तर्क का अभाव:-

      धर्म का आधार विश्वास है, अतः इसमें तर्क का कोई स्थान नहीं होता है और न ही वैज्ञानिक आधार पर इसे सही या गलत बताया जा सकता है।

(7) सार्वभौमिकता:-

    धर्म प्राचीन समय से ही किसी न किसी रूप में रहा है। इसका रूप परिवर्तन अवश्य हो सकता है।

भारतीय धार्मिक संरचना

      भारतीयों के जीवन में धर्म का प्रमुख स्थान रहा है। वह जन्म से मृत्यु तक धार्मिक संस्कारों से आबद्ध है। हमारे अनेक धार्मिक कृत्य, रीति-रिवाज व स्तुतियाँ, आदि वैदिक काल से चले आ रहे हैं और आज भी हमारे धर्म सम्बन्धी कार्य वेदों के अनुसार होते हैं। भारत में धार्मिक स्वतन्त्रता प्राचीन काल से रही है, यही कारण है कि भारत-भू पर विविध धर्मों एवं धार्मिक विचारों व सम्प्रदायों का प्रादुर्भाव समय के साथ होता रहा है। इसके साथ ही बाहर से आए धर्म एवं धार्मिक विचारों का परिष्कार भी हुआ। भारत के प्रमुख धर्म निम्नलिखित हैं:

(1) हिन्दू धर्म देश का सबसे प्रमुख धर्म है। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अनुसार, हिन्दू वह है जो भारत में उत्पन्न किसी धर्म को मानता है तथा जो भारत में भारतीय माता-पिता की सन्तान है। इस महासभा के अनुसार सनातनी, आर्य समाजी, जैन, सिख, बौद्ध, ब्राह्मण, आदि सभी हिन्दू कहे जा सकते हैं। यह सत्य ही कहा है कि भाषा भारतीय लोगों को भौगोलिक समुदायों में बांटती है, धर्म उन्हें समान्तर परतों में बांटता है।

         हिन्दू धर्म की तीन विशेषताएँ हैं:-

(i) एक सर्वोच्च सत्ता तथा अनेक छोटे देवताओं में प्रत्येक हिन्दू धर्मावलम्बी पूर्ण आस्था रखता है।

(ii) इसकी प्रवृत्ति सहनशीलता की है तथा कोई भी हिन्दू देवी या देवता विशेष की आराधना कर सकता है, उस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।

(iii) यह कर्म, पुनर्जन्म और मृत्यु के बाद मोक्ष मिलने में विश्वास रखता है। गीता की यह सूक्ति ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनः’ (Action is the duty, Reward is not the concern)

      सभी भारतीयों में मान्यता पाती है।

    हिन्दू धर्म की अपनी एक विशेष सामाजिक व्यवस्था होती है जिसके मुख्य तत्व जाति, समुदाय, संयुक्त परिवार प्रणाली, बाल-विवाह की प्रथा, सार्वभौमिक विवाह प्रथा, आदि हैं।

भारत में धर्म के अनुसार जनसंख्या का वितरण- 2011

क्रम संख्या धार्मिक समुदाय प्रतिशत
1.

2.

3.

4.

5.

6.

7.

हिंदू

मुस्लिम

ईसाई

सिख

बौद्ध

जैन

अन्य

79.8

14.2

2.3

1.7

0.7

0.4

0.9

कुल योग 100.00

(2) मुस्लिम (Muslims) या इस्लाम धर्म का जन्म अरब देश में हुआ, किन्तु यह भारत में 12वीं शताब्दी के लगभग उत्तर-पश्चिम की ओर आने वाले आक्रमणकारियों द्वारा लाया गया। अतः इसका विस्तार उत्तर-पश्चिमी भारत तक ही सीमित रहा, किन्तु शनैः-शनैः यह गंगा की घाटी में फैल गया तथा पश्चिम बंगाल में भी इसने अपनी जड़ें जमा लीं। प्रायद्वीप भारत में यह अधिक नहीं फैल सका और इसलिए वहां 15% से अधिक मुस्लिम नहीं हैं। मुस्लिम अधिकतर पश्चिमी भागों में पाए जाते हैं।

(3) ईसाई (Cristians):

       सीरिया के ईसाई जो ईसा शताब्दी के प्रारम्भिक काल में ट्रावनकोर-कोचीन में आ बसे थे, वह अन्य मिशनरी ईसाइयों से भिन्न हैं। रोमन, कैथोलिक, ऐंग्लिकन तथा बैपटिस्ट ईसाइयों की संख्या ही भारत में अधिक है। ईसाई धर्म का विस्तार भारत में पहाड़ी जातियों तथा हिन्दुओं की निम्न जातियों में अधिक हो पाया है। इस समय ईसाइयों का केन्द्रीकरण विशेषतः केरल, गोआ, दमन, दीव, पाण्डिचेरी, नगालैण्ड, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में ही है।

(4) सिख (Sikhs):-

       इस धर्म का जन्म 16वीं शताब्दी में वैष्णव धर्म से पृथक् होकर हुआ। यह धर्म प्राचीन हिन्दू धर्म को एक शुद्ध धर्म के रूप में अपनाने का ही प्रयास था जिसने बहु-देवों, मूर्ति पूजा, जाति प्रथा, तीर्थयात्रा और पुनर्जन्म का खण्डन किया। मुसलमानों की राजनीतिक क्रूरता तथा हिन्दुओं की सामाजिक क्रूरता के फलस्वरूप ही सिक्खों ने एक शान्तिमय पथ के स्थान पर एक सैनिक धर्म का अवलम्बन किया।

      इस धर्म के दो सिद्धान्त हैं- लम्बे बाल रखना तथा धूम्रपान न करना। इनके पास सदैव कच्छा, कृपाण, कंघी, कड़ा और केश रहते हैं जिनसे इन्हें अन्य धर्मावलम्बियों के बीच सरलतापूर्वक पहचाना जा सकता है। यह प्रारम्भ में अविभाजित पंजाब में केन्द्रित थे। अब पंजाब, हरियाणा, उत्तरी गंगा नहर (राजस्थान एवं दिल्ली व चण्डीगढ़) में अधिक फैले हैं। ये बड़े हट्टे-कट्टे होते हैं और इसलिए ये भारतीय सेना में बड़ी संख्या में मिलते हैं।

(5) जैन (Jains):-

   जैन धर्म हिन्दू धर्म की ही एक शाखा मानी जाती है। यद्यपि जैन धर्मावलम्बी हिन्दू धर्म के सिद्धान्तों को मानते हैं, किन्तु यह जीवों के प्रति अहिंसा पर अधिक जोर देते हैं। ये अधिकांशतः व्यापारी और धनवान होते हैं तथा भारत में दूर-दूर तक फैले हैं।

(6) बौद्ध (Buddhist):-

     बौद्ध धर्म भी हिन्दू धर्म की ही एक शाखा है। इसे गौतम बुद्ध ने छठी शताब्दी ई. पू. में चलाया था। इसका सबसे अधिक प्रचार गंगा की घाटी में ही हुआ। यह धर्म नीति पर अवलम्बित है। यद्यपि भारत में यह धर्म 10वीं शताब्दी के बाद से लोप हो गया, किन्तु आज महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम तथा सिक्किम के पहाड़ी भागों में इनके अनुयायी मिलते हैं।

(7) पारसी (Zoroastrian):–

   पारसी लोग भारत में 7वीं शताब्दी में फारस के मुस्लिम धर्म की क्रूरता से बचने के लिए आए और भारत के पश्चिमी तटीय भागों में बस गए। यह लोग सूर्य और अग्नि की पूजा करते हैं। यह अधिकांशतः व्यापारी उद्योगी हैं। इनका सबसे अधिक केन्द्रीकरण मुम्बई नगर में है।

निष्कर्ष:

   उपर्युक्त वर्णन के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत के निवासियों का सम्बन्ध किसी-न-किसी धर्म से है। अधिकांश धर्मों का सम्बन्ध तीर्थ स्थानों से बताया जाता है। उदाहरणार्थ, काशी धर्म और संस्कृति से सम्बन्धित है। यहाँ अनेक हिन्दू मन्दिर हैं। हिन्दुओं के लिए गंगा सबसे पवित्र नदी है जिसके तट पर मृत्यु अथवा अन्त्येष्टि क्रिया से आत्मा को शान्ति प्राप्त होना माना जाता है।

      अलीगढ़, हैदराबाद और देवबन्द के विश्वविद्यालय मुस्लिम संस्कृति के केन्द्र हैं। सिखों के पंजाब में ननकाना साहब और अमृतसर तथा बिहार में पटना साहिब, जैनियों के राजस्थान (महावीरजी, दिलवाड़ा, रणकपुर, ऋषभदेव), गुजरात (पालीताना, गिरनार) बिहार (सम्मेद शिखर) तथा पारसियों के मुम्बई नगर में सांस्कृतिक केन्द्र हैं। बौद्ध गया (बिहार), सारनाथ (उत्तर प्रदेश), सांची (मध्य प्रदेश) में बोध के विहा हैं। बद्रीनाथ, केदारनाथ, जगन्नाथपुरी, द्वारिका, रामेश्वरम्, वाराणसी, कांजीवम् सभी हिन्दुओं के लिए पूज्य स्थान हैं।


Read More:

16. Description of sources and characteristics of Hindu religion (हिन्दू धर्म के स्रोत तथा लक्षणों का विवरण)

16. Description of sources and characteristics of Hindu religion

(हिन्दू धर्म के स्रोत तथा लक्षणों का विवरण)



    characteristics of Hindu religion   

     प्रत्येक धर्म का कोई न कोई आधार होता है। यह भी कहा जा सकता है कि धर्म के आधार व स्रोत एक नहीं बल्कि अनेकानेक हैं।

मनु के अनुसार वेद, स्मृति, आचार तथा आत्म सन्तुष्टि, आदि धर्म के चार आधार हैं।

याज्ञवल्क्य के अनुसार वेद, स्मृति, सदाचार, अपनी आत्मा अनुकूल कार्य तथा उचित संकल्प से उत्पन्न हुई इच्छा ये सब धर्म के मूल कहे गए हैं।

विशिष्ट धर्म सूत्र के अनुसार, “श्रुति स्मृति विहितो धर्मः तदालाभे शिष्टाचारः प्रमाणम्” अर्थात् वेद और स्मृतियों में जो विहित है वह धर्म है, उनके अभाव में शिष्टाचार प्रमाण हैं।”

भीष्म के अनुसार, “वेद, स्मृति और सदाचार धर्म के स्वरूप को लक्षित करने वाले लक्षण हैं।”

      सामान्यतः हिन्दू धर्म के निम्नांकित स्रोत हैं:

(1) वेद:-

     वेद हिन्दू धर्म का मूल ग्रन्थ है। इन्हें श्रुति भी कहा जाता है। हिन्दू धर्म ग्रन्थों में वेदों को प्राचीनतम माना जाता है। केवल हिन्दू धर्म ग्रन्थों के ही अनुसार नहीं अपितु इतिहासकारों के विचार से भी ॠग्वेद इस पृथ्वी पर उपलब्ध साहित्य में प्रथम ग्रन्थ है। मनु के अनुसार, “वेदोलिखो धर्ममूल” अर्थात् वेद धर्म के मूल हैं।

       चाणक्य ने लिखा है “न वेदो ब्राह्मो धर्मः” अर्थात् धर्म वेद से बाहर नहीं होता। महाभारत में कहा गया है “वेदोक्तः परमो धर्मः” अर्थात् वेदों में कहा गया धर्म ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है। ब्रह्मा जी ने लिखा है कि वेद ही मेरे उत्तम नेत्र हैं, वे ही मेरे परम बल हैं, वेद ही मेरे परम आश्रय तथा वेद ही मेरे सर्वोत्तम उपास्य देव हैं।” वेदों से ईश्वरीय ज्ञान का प्रतिपादन होता है। इसलिए प्रत्यक्ष एवं अनुमान से जो प्राप्त नहीं हो सकता है, वह ज्ञान वेदों से प्राप्त किया जा सकता है।

(2) स्मृति:-

    स्मृति का अर्थ है याद करना। स्मृतियों के अन्तर्गत देश एवं काल के अनुसार श्रुतियों की व्याख्या एवं सार संयोजित है। श्रुतियों पर आधारित होने के कारण स्मृतियाँ भी प्रामाणिक मानी जाती हैं। स्मृतियाँ वेदों का ही अनुसरण करती हैं। मनु और याज्ञवल्क्य ने वेदों और स्मृतियों को धर्म का मूल आधार कहा है।

(3) सदाचार:-

     धर्म सूत्रों में इसे शील, शिष्टाचार अथवा सामयाचारिक तथा स्मृतियों में इसे आचार अथवा सदाचार कहा गया है। मनु याज्ञवल्क्य, गौतम, वशिष्ट, आपस्तम्ब, आदि ने वेद और स्मृति के साथ-साथ सदाचार को भी धर्म का मूल स्रोत कहा है। मनु ने निर्देश दिया है कि “श्रुति और स्मृतियों में भली-भांति बताए गए अपने कर्मों के अनुष्ठान में धर्ममूलक सदाचार का आलस्य रहित होकर पालन करें।”

(4) अन्तःकरण:-

    धर्म का अन्तिम स्रोत व्यक्ति का अन्तःकरण कहा गया है अर्थात् धर्म का निर्णय स्वयं व्यक्ति के अन्तःकरण से होता है। व्यक्ति को अपने प्रत्येक कर्म का फल स्वयं भोगना पड़ता है। अतः धर्मशास्त्रों के निर्देश एवं अनुमोदन के बाद भी किसी कर्म के अन्तिम निर्णय का अधिकार व्यक्ति का होना ही चाहिए। जिन कार्यों को व्यक्ति का अन्तःकरण सहमति दे केवल उन्हीं को सम्पन्न करना चाहिए। इसके विपरीत जिन्हें अन्तःकरण अनुमति न दे, भले ही धर्मशास्त्र निर्देश व अनुमति दे, नहीं करना चाहिए।

धर्म के लक्षण:–

       मनु ने धर्म के दस लक्षणों का उल्लेख किया है- धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, धी, विद्या, सत्य, अक्रोध।

धृतिः क्षमाः दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रहः।

धीर्विद्याः सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥

(1) धृति:-

     धृति का अर्थ है धैर्य। धैर्यवान व्यक्ति को ही धीर कहा जाता है। गीता में धृति के सात्विकी, राजसी और तामसी तीन भेद किए गए हैं। सांसारिक बन्धनों में न बंधकर मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करने को सात्विक धृति कहते हैं।

     फल की इच्छा रखते हुए धर्म, अर्थ, काम को धारण करना राजसी धृति कहलाता है। जब व्यक्ति दुर्बुद्धि होकर निन्दा, भय, चिन्ता, दुख एवं उन्मत्तता को नहीं छोड़ता तो उसे तामसी धृति कहते हैं। महाभारत में कहा गया है कि सुख या दुख प्राप्त होने पर मन में विचार न होना धृति है।

(2) क्षमा:-

   महर्षि वाल्मीकि के अनुसार व्यक्ति का सच्चा आभूषण क्षमा है। क्षमा ही दान, सत्य, यज्ञ, यश तथा धर्म है। महाभारत में कहा गया है कि क्षमा धर्म है, यश है, वेद है, शास्त्र है, ब्रह्म है, सत्य है, भूत है, भविष्य है, तप है तथा शौच है।

(3) दम:-

    दम से तात्पर्य है बाह्य इन्द्रियों का संयम जिसके लिए अन्तःकरण को संयमित करना पड़ता है। गीता में कहा गया है कि जो व्यक्ति मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त होकर कर्मेन्द्रियों का संयम करता है, वह श्रेष्ठ है।

(4) अस्तेय:-

    अस्तेय का अर्थ स्तेय अथवा चोरी के त्याग से होता है। इसके अन्तर्गत वे सभी वस्तुएं आती हैं जो शास्त्रों के द्वारा ग्रहणीय कही गई हैं। इसी प्रकार अस्तेय के अन्तर्गत मन, वचन और कर्म तीनों से किए जाने वाले स्तेय का त्याग सम्मिलित होता है।

(5) शौच:-

    शौच से तात्पर्य पवित्रता है। शौच बाह्य एवं आन्तरिक दो प्रकार की होती है। शरीर के विभिन्न अंगों को मिट्टी एवं जल आदि के द्वारा शुद्ध करना बाह्य शौच कहलाता है जबकि मैत्री, करुणा, सहानुभूति, तप, सत्य, आदि वृत्तियों द्वारा मन को निर्मल रखना आन्तरिक शौच कहलाता है।

(6) इन्द्रिय निग्रह:-

    इन्द्रिय निग्रह से तात्पर्य इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाना है। गीता में कहा गया है कि बुद्धिमान पुरुष के मन को भी ये इन्द्रियाँ बलात विषयों की ओर खींच लेती हैं। इसलिए बुद्धि को स्थिर रखने के लिए इन्द्रियों को वश में रखना आवश्यक है।

(7) धी:-

   धी का अर्थ विवेक बुद्धि है। विवेक बुद्धि व्यक्ति को वस्तुओं एवं विषयों के गुण-दोषों का ज्ञान कराती है ताकि वह गुणों का ग्रहण तथा दोषों का परित्याग कर सके। महाभारत में कहा गया है कि बुद्धि ही धन की प्राप्ति कराती है, बुद्धि से मनुष्य को कल्याण प्राप्त होता है।

(8) विद्या:-

    भर्तृहरि के अनुसार विद्या मनुष्य का सबसे बड़ा सौन्दर्य है, उसका छिपा हुआ गुप्त धन है। विद्या भोग देने वाली है, यश और सुख प्रदान करने वाली है। विद्या गुरुओं का भी गुरु है। परदेश में विद्या ही बन्धुजन है, विद्या ही परम देवता है। विद्या ही राजाओं में सम्मान्य है, वही धन है। इसलिए विद्या रहित पुरुष पशु है।

(9) सत्य:-

    सत्य की महिमा का वर्णन प्रत्येक जगह मिलता है। महाभारत में कहा गया है कि “सत्य ही धर्म, तप और योग है। सत्य ही सनातन ब्रह्म है, सत्य को ही परम यज्ञ कहा गया है तथा सब कुछ सत्य पर ही टिका हुआ है।” ऋग्वेद में कामना की गई है कि “सत्य वाणी के सहारे आकाश टिका है, सम्पूर्ण संसार के प्राणी उसी पर आश्रित हैं, उसी से सूर्य का उदय होता है, उसी से जल निरन्तर बहता है वही सत्य हमारी रक्षा करता है।”

(10) अक्रोध:-

     अक्रोध का अर्थ है कारण होते हुए भी क्रोध न करना। गीता में कहा गया है कि “क्रोध से अविवेक उत्पन्न होता है, अविवेक से स्मरण शक्ति भ्रमित होती है, स्मृति के भ्रमित होने से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश होता है औ बुद्धि के नाश होने से व्यक्ति अपने श्रेय साधन से गि जाता है।” अतः व्यक्ति को अक्रोधी ही बनना चाहिए।


Read More:

14.. Explain habitat as a cultural expression/ सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में निवास स्थान को समझाइए।

14. Explain habitat as a cultural expression.

(सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में निवास स्थान को समझाइए।)

अथवा

विश्व के विभिन्न भागों में निवास करने वाली प्रतिनिधि प्रजातियाँ



         मानव जीवन विभिन्न परिस्थितियों द्वारा प्रभावित होता है। विभिन्न क्षेत्रों में पाई जाने वाली परिस्थितियाँ भिन्नता वाली होती हैं। अतः वहाँ का मानव-जीवन अन्य क्षेत्रों से भिन्न होता है। मानव निवास की दृष्टि से निम्नांकित क्षेत्र हैं:-

(i) विषुवतरेखीय क्षेत्र

(ii) उष्ण मरुस्थलीय क्षेत्र

(iii) घास के मैदान

(iv) टुण्ड्रा प्रदेश

       इन प्रदेशों में निवास करने वाली प्रतिनिधि प्रजातियों का विवरण नीचे दिया जा रहा है:

(1) पिग्मी:-

     पिग्मी मध्य अफ्रीका के कांगो बेसिन में जायरे व कांगो गणराज्यों एवं गैबन व कैमरून में पाए जाते हैं। इनकी मुख्य बस्तियाँ छोटे-छोटे समूहों में घने वनों के आसपास पाई जाती हैं। पिग्मी काले, नाटे कद के नीग्रिटो प्रजाति के लोग हैं। इनका कद 1 से 1.5 मीटर तक होता है। इसीलिए इन्हें बौने कहा जाता है। इनकी शारीरिक रचना में छोटा कद, भार कम, रंग काला अथवा चाकलेटी, पैर लम्बे, बाल छोटे और छल्लेदार गुच्छों वाले, होठ लटकते हुए मोटे, नथुने चौड़े, नाक चपटी और ठोढ़ी पतली होती है।

     पिग्मी स्थायी घर बनाकर नहीं रहते हैं। अधिकांश पिग्मी जंगली जीवों से सुरक्षा की दृष्टि से अपनी झोपड़ियाँ वृक्षों पर ही बनाते हैं। ये झोपड़ियाँ पेड़ की टहनियों, पत्तों एवं घास-फूस से बनाई जाती हैं। उन पर चढ़ने के लिए बांस की सीढियाँ काम में लाई जाती हैं।

     उष्ण एवं आर्द्र जलवायु के कारण इन लोगों को वस्त्रों की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है। अतः ये बहुत कम वस्त्रों का प्रयोग करते हैं।

    पिग्मी को वनों में फूल, मांस के लिए पशु एवं पक्षी अधिक मात्रा में मिल जाते हैं। अतः शिकार और फल एकत्रित कर इनका भी भोजन पिग्मी जाति के लोग करते हैं। ये लोग कन्द, मूल, फल, केला, कसाबा, रतालू, मक्का आदि खाते हैं। पिग्मी लोगों का मुख्य व्यवसाय पशुओं का शिकार, वन से वस्तुएं एकत्रित करना और मछली मारना है। आखेट करने में ये लोग बड़े चतुर होते हैं। हाथी जैसे भीमकाय पशु का शिकार भी सरलता से कर लेते हैं।

(2) बोरो:-

     पश्चिमी अमेजन बेसिन में निवास करने वाली जाति बोरो है। ब्राजील, पीरू तथा कोलम्बिया के समीपवर्ती क्षेत्र में जहाँ अमेजन की सहायक-जापुरा, पुतुगामा, ईसा के बेसिन हैं, वहाँ बोरो आदिम जाति कृषक के रूप में जीवन-यापन करती है। ये लोग शारीरिक गठन में अमेरिकी इण्डियन जैसे हैं। इनकी त्वचा का रंग भूरा, सीधे काले बाल, तथा मध्यम कद होता है। इनका भोजन कुसावा की रोटियाँ तथा पका मांस मुख्य होता है। जापुरा नदी तट के निवासी प्रातः स्नान कर ठण्डी कसावा की रोटी तथा जंगली फलों का भोजन करते हैं। इनके अतिरिक्त ग्रब, मछली तथा मधु का भी प्रयोग करते हैं।

     नृत्य के समय स्त्रियाँ अपने सम्पूर्ण शरीर में चित्रकारी करती हैं और बीजों का हार बनाकर पहनती हैं। पुरुष नृत्य के समय पक्षियों के पंखों का मुकुट पहनते हैं।

    बोरो जाति के लोग वनों को जलाकर साफ की हुई भूमि पर बड़े और ऊँचे मकान बनाते हैं। कई परिवारों का संयुक्त मकान होता है। यहाँ के निवासी कृषि करते हैं। ये कृषि के अतिरिक्त आखेट भी करते हैं। ये प्रतिदिन नदियों और जलाशयों में मछली और केकड़ों को जाल में फंसाकर पकड़ते हैं। शिकार के लिए एक विशेष प्रकार का यंत्र प्रयोग करते हैं जिसे ब्लो-पाइप कहते हैं।

     बोरो का परिवार सारा गाँव ही होता है, परन्तु पूरे गाँव में भी छोटे-छोटे कई परिवार होते हैं। दो परिवारों के मध्य लड़के-लड़कियों का विवाह होने से इनके रीति-रिवाज तथा भाषा में समानता पाई जाती है।

(3) सेमांग:-

       सेमांग जनजाति मलेशिया में मलाया प्रायद्वीप के उत्तरी भाग तथा थाईलैण्ड के दक्षिणी भाग के पहाड़ी भागों में फैली हुई है। इनके प्रमुख क्षेत्र उत्तरी पैराक, केदा, केलनतान, पैहांग में पाए जाते हैं। उनकी शारीरिक रचना नीग्रिटो जैसी हैं। इनका रंग चाकलेटी या गहरा भूरा, नाक चपटी व खुली हुई, होठ मोटे, आंखें बड़ी और स्थिर दृष्टि वाली, ठोड़ी अन्दर को घंसी हुई होती है एवं कद नाटा होता है।

     यह जनजाति अपना भरण-पोषण वन-वस्तु संग्रह एवं शिकार द्वारा करती है। विषुवतरेखीय एवं आर्द्र मानसूनी वनों से ये कन्द मूल, फल जड़ें, मोटे तने जैसे कन्द एकत्रित करते हैं। जंगली रतालू एवं ड्यूरिन पेड़ के मोटे फल का यहाँ के भोजन में विशेष महत्व है।

       ये लोग अपना निवास स्थान पहाड़ी ढालों पर सुरक्षित स्थलों के निकट बनाते हैं। इनकी झोपड़ियाँ चट्टानी भाग की छाया में प्रायः खजूर, रटन, ताड़ एवं अन्य लम्बी पत्ती वाली टहनियों से बनाई जाती है। झोपड़ियों का निर्माण स्त्रियाँ करती हैं, किन्तु पुरुष भी सहायता करते हैं।

सेमांग के एक या एक से अधिक घरों के समूह में एक ही कबीले के या बड़े परिवार के लोग रहते हैं। यही इनका समाज भी है। इनका मुख्य उद्यम कन्द मूल, फल, आदि एकत्रित करना तथा आखेट करना है। वन्य पदार्थों को एकत्रित करने का कार्य प्रायः स्त्रियाँ करती हैं।

(4) सकाई:-

     मलेशिया में मुख्य मलाया प्रायद्वीप के मध्यवर्ती पहाड़ी ढालों पर दूर-दूर तक फैली हुई जनजाति है। इनकी शारीरिक रचना अधिक आकर्षक एवं बदन गठीला होता है। इनका रंग हल्का भूरा अथवा साफ होता है। ये लोग पहाड़ी ढालों से नीचे नदी घाटियों एवं संकरी मैदानी पट्टी में रहते हैं। इनका आवास झोपड़ियाँ होती हैं जो टहनियों, छाल व पत्तों से ढकी जाती हैं।

     ये अपना भरण-पोषण मुख्यतः शिकार, वन्य-वस्तु संग्रह एवं मछलियाँ पकड़कर करते हैं। रबर के बगीचों में भी कार्य करके मजदूरी प्राप्त करते हैं। इनकी सामाजिक व्यवस्था एवं रीति-रिवाज सेमांग से मिलती जुलती है।

(5) पापुआन:-

      प्रशान्त महासागर में न्यूगिनी द्वीप के निवासी पापुआन कहलाते हैं। ये कद में मोटे नाटे होते हैं तथा चमड़ी का रंग हल्का होता है। ये लोग वृक्षों की जड़ों, छाल, कन्दमूल, फल, आदि से भोजन प्राप्त करते हैं। शिकार से प्राप्त मांस अन्य जीव भी भोजन के मुख्य पदार्थ हैं। इनके गाँव पहाड़ियों की चोटियों पर होते हैं। प्रत्येक गाँव पुराने ढंग पर किलाबन्दी किए रहता है। इनके घर का आकार गोल होता है।

       ये लोग सांपों तथा शत्रुओं से रक्षा हेतु कभी-कभी ऊँचे पेड़ों पर भी अपना मकान बना लेते हैं। इनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है। कृषि में गन्ना तथा पपीता मुख्य उत्पादन है। ये लोग पशुपालन भी करते हैं। पालतू पशुओं में सुअर का प्रमुख स्थान है।

    पापुआन की लड़ाई का आधार रोटी है। ये बड़े खूंखार होते है। लड़ना-झगड़ना तथा हत्या करना बड़ी सामान्य बात है। ये लोग अन्धविश्वासी होते हैं।

(6) बद्दू:-

     बद्दुओं का निवास क्षेत्र दक्षिण-पश्चिमी एशिया में पश्चिमवर्ती अरब प्रायद्वीप तथा अफ्रीका में सहारा के उष्ण मरुस्थल हैं। ये अपने को सेमेटिक जाति की एक शाखा के वंशज मानते हैं। केवल स्थायी विकास क्षेत्रों को छोड़कर बद्दू लोगों का कोई स्थायी निवास नहीं होता है। ये अपने कबीलों, ऊंटों, घोड़ों, कुत्तों, भेड़-बकरियों, आदि के साथ चारे-पानी और मरुद्यानों की खोज में भ्रमण करते रहते हैं। इनका मुख्य भोजन खजूर है। इसके अलावा गेहूँ, जौ, मक्का, आदि भी खाते हैं।

        ये लोग अपने शरीर को सूती वस्त्रों से ढंके रहते हैं। इनके कपड़े ढीले-ढाले होते हैं। इनका मुख्य व्यवसाय भेड़, बकरी, ऊंट और घोड़े पालना है। ये मरुद्यानों के लोगों को खजूर, ऊन, पशु, मांस और दूध बेचकर बदले में गेहूँ, जौ, कपड़े तथा तम्बाकू, आदि ले लेते हैं।

(7) बुशमैन:-

       कालाहारी मरुस्थल में निवास करने वाले बुशमैन हैं। ये लोग ठिगने कद के होते हैं। ये चपटी मुखाकृति, भारी पलकों और तिरछी आंखों वाले होते हैं। इनका रंग भूरा और पीलापन लिए होता है। इनका आवास कच्ची झोपड़ी गुफाओं तथा कन्दराओं में होता है, ये लोग प्रायः अर्द्ध नग्नावस्था में रहते हैं। बुशमैन मांसाहारी होते हैं। शिकार करना और मांस प्राप्त करना इनका मुख्य व्यवसाय है। शिकार के लिए स्थान-स्थान पर घूमना व शिकार के पीछे मीलों दूर तक भगाकर मारना इनके लिए अनिवार्य हो जाता है।

(8) खिरगीज:-

      ये लोग मध्य एशिया में किरगिजस्तान में पामीर उच्च भूमि तथा ध्यानशान पर्वतमाला के क्षेत्र में निवास करते हैं। इनका शरीर खूब गठा हुआ सुडौल तथा मजबूत होता है। यह तुर्कों के सम्मिश्रण से उत्पन्न हुई जाति है। खिरगीज घुमक्कड़ जाति के लोग होते हैं। अतः इनका कोई स्थायी घर नहीं होता है। भ्रमणकारी होने के कारण तम्बू ही इनका घर होता है। इन्हें पशुओं की खाल तथा ऊन के नमदों से बनाया जाता है। इनका भोजन पशुओं से ही प्राप्त होता है। पशुओं का मांस, रक्त, दूध, दूध पदार्थ इनके भोजन के अंग हैं। बकरे का मांस इनका प्रिय भोजन है।

     खिरगीज अर्थव्यवस्था में गाय, घोड़ों, भेड़ और बकरियों का विशेष महत्व है। ये जूते, टोपियाँ, टोकरियाँ, मशकें, कोट, पायजामे, आदि बनाते हैं। ये लोग मौसमी पशुचारण करते हैं।

(9) एस्किमो:-

     एस्किमो का निवास ध्रुवीय क्षेत्रों में टुण्ड्रा प्रदेश में स्थित है। एस्किमो मंझोले कद के होते हैं। इनका रंग भूरा व पीलापन लिए होता है, चेहरा गोल और चौड़ा तथा शरीर, बेडौल, आंखें काली और छोटी, नाक चपटी, मांसल शरीर, जबड़े भारी तथा दांत विशेष मजबूत होते हैं। ये लोग मांसाहारी होते हैं। इनका मुख्य भोजन सील, बालरस और ह्वेल, मछलियाँ, कैरीबो, बारहसिंगे, ध्रुवीय भालू, आदि का मांस है।

     इनका मुख्य व्यवसाय आखेट है। ये लोग श्वेत भालू, रेण्डियर, कैरीबो, आर्कटिक लोमड़ी, खरगोश, समूरदार जानवर, ह्वेल, सील, बालरस, आदि का शिकार करते हैं।

        इनका निवास गृह इग्लू (Igloo) कहलाता है। ये तीन या चा मीटर के घेरे में बनाए जाते हैं। इनके वस्त्र जानवरों की खाल से निर्मित होते हैं। स्त्रियाँ एवं पुरुष एक समान वस्त्र पहनते हैं। स्लेज, कयाक, उमियाक तथा हारपून इनके दैनिक उपकरण हैं।

 



Read More:

error: