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2. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण / Koppens’ Climatic Classification 

2. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण 

(Koppens’ Climatic Classification)


कोपेन का जलवायु वर्गीकरण

      विश्व के जलवायु वर्गीकरण की दिशा में अनेक कार्य किए गए हैं जिनमें कोपेन की योजना को आधारभूत योजना के रूप में मान्यता प्राप्त है। कोपेन का पूरा नाम व्लादिमिर कोपेन था जिसका जन्म जर्मनी में हुआ था। लेकिन आस्ट्रिया के ग्राज विश्वविद्यालय में जीव विज्ञान के प्राध्यापक थे। उन्होंने 1900 से 1936 ई० तक अनुसंधान प्रपत्र के माध्यम से कई बार जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया। अनुसंधान प्रपत्र में इनका वर्गीकरण 1900, 1918 तथा 1936 में प्रकाशित हुआ। कोपेन के द्वारा प्रस्तुत संशोधित और मान्य जलवायु वर्गीकरण 1936 ई० में “हैंडबुक डर क्लाइमेटोलॉजी” पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। वर्तमान समय में कोपेन के द्वारा प्रस्तुत 1936 ई० की योजना विश्वव्यापी मान्यता रखती है।

कोपेन का जलवायु वर्गीकरण की विशेषता:-

◆ कोपेन अपना जलवायु वर्गीकरण अनुभव के आधार पर प्रस्तुत किया था। इसीलिए इनकी योजना को आनुभाविक विधि (Empirical Method) पर आधारित माना जाता है।

◆ इनका वर्गीकरण मुख्यतः वनस्पति के वर्गीकरण पर आधारित है। कोपेन ने डी. कैंडोल के द्वारा प्रस्तुत वनस्पति वर्गीकरण को ही जलवायु वर्गीकरण का आधार माना।

◆ कोपेन का मानना था कि वनस्पति के विकास पर तापमान और वर्षा की वास्तविक मात्रा का भी प्रभाव पड़ता है। इसीलिए उन्होंने जलवायु वर्गीकरण के दौरान तापमान तथा वर्षा के वास्तविक मात्रा को भी ज्ञात किया और उसे अपने जलवायु वर्गीकरण में शामिल किया। यही कारण है कि इनके वर्गीकरण को परिणात्मक वर्गीकरण या मात्रात्मक वर्गीकरण (Quantitative Classification) भी कहते हैं।

◆ कोपेन ने अपने जलवायु वर्गीकरण में कई सांकेतिक अक्षरों का प्रयोग किया है जिसका मूल उद्देश्य मौसमी विशेषताओं को सांकेतिक भाषा में प्रस्तुत करना है। इस प्रकार के प्रस्तुतीकरण के द्वारा जलवायु के विभिन्न घटकों का मूल्यांकन एक ही नजर में किया जा सकता है।

◆ कोपेन का जलवायु वर्गीकरण तीन पदानुक्रम में प्रस्तुत किया गया है। प्रथम पदानुक्रम में उन्होंने विश्व की जलवायु को 5 भागों में बाँटा है। इसके लिए कोपेन ने A, B, C, D और E अक्षरों का प्रयोग किया है।

      दूसरे पदानुक्रम के जलवायु वर्गीकरण को प्रस्तुत करने के लिए चार सांकेतिक बड़े अक्षर S, W, T, F का प्रयोग किया है। 

        तीसरे पदानुक्रम के लिए उन्होंने अंग्रेजी के 17 छोटे अक्षरों का प्रयोग किया है। जैसे- a,  b, c, d, f, g, h, i, k, k’, m, n, s, w, w’, w”, x। इस तरह उन्होंने अंग्रेजी के 9 बड़े एवं 17 छोटे अक्षरों का प्रयोग किया।

◆ कोपेन के जलवायु वर्गीकरण को एक व्यवहारिक वर्गीकरण माना जाता है, क्योंकि इनके जलवायु वर्गीकरण से जलवायु प्रदेशों की विशेषताओं का बोध होता है।

◆ कोपेन के जलवायु वर्गीकरण में दो जलवायु प्रदेशों के बीच किसी भी संक्रमण पेटी का विकास नहीं होता है।

◆ कोपेन ने प्रथम पदानुक्रम वाले जलवायु प्रदेशों को एक अक्षर से, दूसरे पदानुक्रम के जलवायु को दो अक्षर से और तीसरे पदानुक्रम के जलवायु को तीन अक्षर से प्रस्तुत किया।

     इस तरह इनका वर्गीकरण एक बहु स्तरीय योजना है।

◆कोपेन ने विश्व को प्रथम पदानुक्रम में 5 और द्वितीय पदानुक्रम में 13 और तृतीय पदानुक्रम में 24 भागों में जलवायु को बाँटा है। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर तापमान और वर्षा का आँकड़ा लघु स्तर पर इकट्ठा किया जाता है तो तीसरे पदानुक्रम में जलवायु वर्गीकरण की संख्या में बढ़ोतरी हो सकती है।

◆ कोपेन का जलवायु वर्गीकरण जलवायु के कारकों पर आधारित है। इसलिए इनके वर्गीकरण को अनुवांशिक वर्गीकरण (Genetic Classification) भी कहा माना जाता है।

जलवायु वर्गीकरण के आधार

        कोपेन ने अपना जलवायु वर्गीकरण हेतु चार कारकों को आधार बनाया जैसे – वनस्पति, तापमान, वर्षा और उच्चावच।

      कोपेन का जलवायु वर्गीकरण मुख्यतः डी. कैंडोल द्वारा प्रस्तुत वनस्पति वर्गीकरण पर आधारित है। डी. कैंडोल महोदय (वनस्पति शास्त्री) ने विश्व को 5 वनस्पति क्षेत्रों में बाँटा था। इसलिए कोपेन महोदय ने भी प्रारंभ में विश्व को 5 जलवायु प्रदेशों में वर्गीकरण किया और उन्होंने बताया कि प्राकृतिक वनस्पति के प्रदेश ही प्रमुख जलवायु प्रदेश है। ऐसा बताने के पीछे उनका उद्देश्य था कि जलवायु प्रदेशों की सीमा का निर्धारण किया जा सके।

       कोपेन तापमान को दूसरी बार प्रथम एवं द्वितीय पदानुक्रम के जलवायु वर्गीकरण हेतु आधार माना। जबकि वर्षा को द्वितीय एवं तृतीय पदानुक्रम के जलवायु वर्गीकरण को प्रस्तुत करने में प्रयोग किया। कोपेन ने यह भी बताया कि औसत वार्षिक तापमान प्रथम पदानुक्रम की वृहद जलवायु प्रदेशों को निर्धारित करने में मदद करता है जबकि जलवायु के अन्य कारण क्षेत्रीय विषमता उत्पन्न करते हैं। इसलिए उन्होंने अन्य कारणों को लघु स्तर पर जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत करने के लिए उनका प्रयोग किया।

      कोपेन ने प्रारंभ में केवल वनस्पति को ही आधार मानकर जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया। जब उनकी आलोचना होने लगी तो उन्होंने अपना वर्गीकरण हेतु वनस्पति के अलावे तापमान एवं वर्षा को आधार बनाया। पुनः जब उन्हें यह पता चला कि उच्चावच के कारण भी जलवायु में संशोधन होता है तो पुनः उन्होंने 1936 ई० में वनस्पति, तापमान, वर्षा और उच्चावच को ध्यान में रखते हुए जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया।

कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की योजना/प्रणाली

         कोपेन के द्वारा प्रारंभ की गई यह परंपरा आगे चलकर थार्नथ्वेट और ट्रीवार्था ने भी इनका अनुसरण किया। कोपेन ने अपने जलवायु वर्गीकरण में अंग्रेजी के 9 बड़े तथा 17 छोटे अक्षरों का प्रयोग सांकेतिक रूप से किया जिनका अर्थ निम्नवत है-

 रोमन लिपि के 9 बड़े अक्षर एवं अर्थ:

 A = उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु प्रदेश

 B = उपोष्ण शुष्क जलवायु प्रदेश

 C = शीतोष्ण आर्द्र जलवायु प्रदेश

 D = शीत जलवायु प्रदेश

 E = ध्रुवीय जलवायु प्रदेश

       कोपेन उपरोक्त 5 बड़े अक्षरों के अलावे चार अन्य बड़े अक्षरों का प्रयोग किया है जो B और E जलवायु प्रदेश को लघु स्तर पर जलवायु वर्गीकरण में मदद करता है।

S  =  अर्द्ध शुष्क / स्टेपी जलवायु

W= शुष्क / मरुस्थलीय जलवायु

T = टुण्ड्रा प्रकार की जलवायु

F = हिमाच्छादित जलवायु

रोमन लिपि के 17 छोटे अक्षर एवं अर्थ:

       कोपेन दूसरे तथा तीसरे पदानुक्रम के लिए रोमन लिपि के 17 छोटे अक्षरों का प्रयोग किया जिनमें प्रमुख निम्नवत है:-

f  = वर्ष भर वर्षा /आर्द्र

m = मानसूनी प्रचुर वर्षा

w = शीतकाल शुष्क

s = ग्रीष्मकाल शुष्क

a = गर्म ग्रीष्म ऋतु 

b = सामान्य गर्म ग्रीष्म ऋतु

c = लघु कालीन एवं कम गर्म ग्रीष्म ऋतु

d = शीत ऋतु अत्यधिक सर्द, सबसे ठंडे माह का औसत मासिक तापमान -38℃ से कम।

h = औसत वार्षिक तापमान 18℃ से अधिक

k = औसत वार्षिक तापमान 18℃ से कम

        उपरोक्त सांकेतिक अक्षरों का प्रयोग करते हुए विश्व को प्रथम पदानुक्रम में 5 द्वितीय पदानुक्रम में 13 और तृतीय पदानुक्रम में 24 या उससे अधिक भागों में प्रस्तुत किया है। तीसरे स्तर में संख्या नियत / निश्चित नहीं है। इसलिए प्रथम और द्वितीय पदानुक्रम तक ही विशेष मान्यता रखता है। कोपेन के द्वारा प्रस्तुत जलवायु वर्गीकरण की योजना को नीचे की तालिका में देखा जा सकता है। 

कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की योजना
क्रम संख्या  प्रथम पदानुक्रम का जलवायु या प्रमुख जलवायु प्रदेश-5 द्वितीय पदानुक्रम का जलवायु या उपजलवायु प्रदेश-13 तृतीय पदानुक्रम का जलवायु या गौण जलवायु प्रदेश-24 
1. A-उष्ण आर्द्र जलवायु Af-विषुवतीय जलवायु

Am-मानसूनी जलवायु

Aw-सवाना जलवायु

2. B-उपोष्ण शुष्क जलवायु BS-स्टेपी तुल्य जलवायु

BW-मरुस्थलीय जलवायु

BSh,

BSk,

BWh, BWk

3. C-शीतोष्ण आर्द्र जलवायु Cf-प० यूरोपीय तुल्य जलवायु

Cw-चीन तुल्य जलवायु

Cs-भूमध्यसागरीय जलवायु

Cfa,

Cfb,

Cfc,

Cwa,

Cwb,

Cwc,

Csa,

Csb

4. D-शीत जलवायु Df-पछुआ प्रभाव वाला जलवायु क्षेत्र

Dw-पूर्वी तटीय जलवायु क्षेत्र

Ds- शीतल एवं आर्द्र जलवायु, जिसमें ग्रीष्म ऋतु शुष्क होता है।

Dfa,

Dfb,

Dfc,

Dfd,

Dwa, Dwb, Dwc, Dwd,

Dsa,

Dsb,

Dsc,

Dsd

5. E-ध्रुवीय जलवायु ET-टुन्ड्रा तुल्य जलवायु

EF-टैगा जलवायु या हिमाच्छादित जलवायु

निर्धारित नहीं 
कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की आलोचना

      कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की कई आधार पर आलोचना की गई है जैसे-

◆ कोपेन के वर्गीकरण को डी. कैंडोल के वनस्पति वर्गीकरण का प्रतिलिपि माना जाता है।

◆ कोपेन अपना वर्गीकरण कई बार प्रस्तुत किया। 1936 में प्रस्तुत वर्गीकरण भी पूर्ण नहीं था इसलिए पुनः इसमें संशोधन कर 1948 (कोपेन तथा उनके मित्र) में प्रस्तुत किया।

◆ इनका वर्गीकरण अनुभावाश्रित विधि पर आधारित है अर्थात वैज्ञानिक तथ्यों की कमी के कारण गलत परिणाम आ सकते हैं।

◆ इन्होंने अपना जलवायु वर्गीकरण हेतु वनस्पति, तापमान, वर्षा और उच्चावच इत्यादि को आधार माना लेकिन जलवायु के अन्य घटकों को उन्होंने नजरअंदाज किया। जबकि वे घटक भी जलवायु को प्रभावित करते हैं। जैसे- वायु की दिशा, वायुदाब, वायुमंडलीय दृश्यता, पृथ्वी की परिभ्रमण गति, समुद्री जलधारा जैसे कारकों का महत्व नहीं दिया।

◆ इन्होंने अपना जलवायु वर्गीकरण में कई सांकेतिक अक्षरों का प्रयोग किया जिससे वर्गीकरण के जटिल होने का आभास होता है।

◆ कुछ जलवायुविज्ञानवेता इनके वर्गीकरण को अति सरल रूप में प्रस्तुत करने का आरोप लगाता है।

◆ थार्नथ्वेट ने इनका आलोचना करते हुए कहा है कि कोपेन महोदय ने अपने वर्गीकरण में तापमान एवं वर्षा की मात्रा को वर्गीकरण का आधार माना है जबकि वास्तव में वर्षा एवं तापमान के प्रभावोत्पादकता पर वर्गीकरण किया जाना था।

◆ कोपेन के जलवायु वर्गीकरण में दो जलवायु पेटी के बीच बनने वाले संक्रमण पेटी का भी उल्लेख नहीं किया है जबकि वास्तव में एक जलवायु प्रदेश की सीमा समाप्त होते है तो अचानक ही दूसरी जलवायु क्षेत्र प्रारंभ नहीं होती बल्कि दोनों के बीच एक संक्रमण पेटी का निर्माण होता है।

निष्कर्ष

     उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद कई अन्य गुण भी है जिसकी चर्चा विशेषता रूपी शीर्षक के अंतर्गत किया गया है। उन विशेषताओं के अलावे जलवायु वर्गीकरण की दिशा में किया गया यह पहला प्रयास था। कोपेन ने जिन आधारों पर अपना जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया वही आधार कुछ संशोधन कर अपना वर्गीकरण को प्रस्तुत करते रहे। उपरोक्त गुणों के काण इनके जलवायु वर्गीकरण को आज भी विशेष मान्यता प्राप्त है।

कोपेन का जलवायु वर्गीकरण

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11. Ocean current / समुद्री  जलधारा

 11. Ocean current / समुद्री  जलधारा 


Ocean current / समुद्री  जलधारा

Ocean current                                         

                    मोंकहाउस ने समुद्री जलधारा को परिभाषित करते हुए कहा है कि “समुद्री नितल के ऊपर स्थित विशाल जलराशि की एक निश्चित दिशा में प्रवाहित होने वाली सामान्य गति को महासागरीय जलधारा करते हैं।” जलधाराओं के अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि जलधाराएं नदी के समान होती है। इनके किनारों पर जल लगभग स्थिर होते हैं जबकि मध्यवर्ती भाग में गति अधिक होती है। जलधाराएं न केवल समुद्री सतह के ऊपर चलती है बल्कि गहराई में भी चलती है। जलधाराएं एक निश्चित दिशा में निरंतर प्रवाहित होती रहती है। जलधाराओं में जल की गति 2 से 10 किलोमीटर प्रति घंटा तक होती है। समुद्री जलधाराएं भौतिक विशेषता गति एवं स्थिति के आधार पर कई प्रकार की होती है। जैसे :- भौतिक विशेषता के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार की होती है-

(i) ठंडी जलधारा 

(ii) गर्म जलधारा 

               विषुवतीय क्षेत्र से चलने वाले जलधाराएं गर्म प्रकार की होती है जबकि ध्रुवीय क्षेत्रों से उत्पन्न होने वाली जलधाराएं ठंडी होती है। जैसे – तीनों महासागरों में चलने वाले विषुवतीय जलधारा गर्म जलधारा का उदाहरण है। जबकि हम्बोल्ट (पेरू) जलधारा, अंटार्कटिका, पछुआ प्रवाह ठंडी जलधारा का उदाहरण है। 

            स्थिति के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार की होती है। 

(i) सतही जलधारा

(ii) अधोवाहिनी जलधारा / उप सतही जलधारा

(i) सतही जलधारा (Surface Current)- ध्रुवों और भूमध्यरेखीय भागों के बीच तापक्रम में अधिक अंतर पाया जाता है। समुद्री जल गर्म होकर हल्की होती है और ठंडी होकर भारी होती है। इसलिए विषुवतीय क्षेत्र से ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने वाली जलधाराएं समुद्र सतह के ऊपर से प्रवाहित होती है। ऐसी जलधारा को सतही जलधारा कहते हैं।

(ii) अधोवाहिनी जलधारा / उप सतही जलधारा- ध्रुवों से विषुवतीय क्षेत्र की ओर प्रवाहित होने वाली जलधाराएं ठंडी एवं भारी होती है। इसलिए वे समुद्री नितल के ऊपर से प्रवाहित होने लगती है और धीरे-धीरे गर्म होकर ऊपर उठने की प्रवृत्ति रखती है। ऐसी जलधाराओं को ही अधोवाहिनी जलधारा या उपसतही जलधारा कहते हैं। 

         गति के आधार पर समुद्री जल धाराएं तीन प्रकार की होती है –

(i) प्रवाह (Drift)- जब सागरीय जल मंद गति से प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है तो उसे प्रवाह कहते हैं। प्रवाह में समुद्री जल केवल ऊपरी सतह पर प्रगतिशील रहता है। प्रवाह की उत्पत्ति में प्रचलित हवाओं का विशिष्ट योगदान है। प्रवाह की कोई निश्चित गति सीमा निर्धारित नहीं है।

(ii) धारा (Current)- धारा की औसत गति 30 से 40 किलोमीटर प्रतिदिन होता है। इसमें समुद्री नितल के ऊपर स्थित संपूर्ण समुद्री जलराशि प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है। धारा की गति प्रवाह की तुलना में अधिक होती है।

(iii) स्ट्रीम (Stream)-  स्ट्रीम विशाल मात्रा में समुद्री जलराशि किसी एक निश्चित दिशा में तीव्र गति से प्रभावित होने की प्रवृत्ति रखती है। स्ट्रीम की गति धारा से भी अधिक होती है।

समुद्री जलधारा की उत्पत्ति के कारक

                समुद्री जलधाराओं में क्षैतिज गति पाई जाती है। इसकी उत्पत्ति के कारकों को मोटे तौर पर 4 वर्गों में बांटा जा सकता है – 

(1) पृथ्वी की विशेषता से जुड़े हुए कारक (पृथ्वी की आकृति एवं गुरुत्वाकर्षण बल, पृथ्वी की घूर्णन गति)

(2) वायुमंडलीय कारक / बाह्य सागरीय कारक (वायुदाब, वायु की दिशा, वाष्पीकरण, वर्षण)

(3) समुद्री जल की विशेषता से जुड़े हुए कारक (लवणता, घनत्व, तापमान)

(4) धाराओं की दिशा को प्रभावित करने वाला कारक (समुद्री नितल की उच्चावच, तटीय आकृति, मौसम परिवर्तन, पृथ्वी का भ्रमण/कोरियोलिस बल)

(1) पृथ्वी की विशेषता से जुड़े हुए कारक- पृथ्वी की आकृति, गुरुत्वाकर्षण बल एवं घूर्णन गति का प्रभाव जलधाराओं की उत्पत्ति पर पड़ता है। विषुवत रेखा पर गुरुत्वाकर्षण बल न्यूनतम एवं अपकेंद्रीय बल अधिकतम होता है। जबकि ध्रूवों पर गुरुत्वाकर्षण बल अधिकतम तथा अपकेंद्रीय बल न्यूनतम होता है। इसके कारण विषुवतीय प्रदेश का सागरीय जल ध्रूवों की ओर प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखता है।

                      अर्थात पृथ्वी अपने दोनों ध्रुवों पर नारंगी की तरह धँसी हुई है। जबकि विषुवतीय भाग में ऊपर उठी हुई है। पुनः ध्रुवीय भागों में गुरुत्वकर्षण शक्ति अधिक होने के कारण जल का ऊपरी स्तर नीचे की ओर दवा हुआ रहता है। जबकि विषुवतीय क्षेत्र में गुरुत्वाकर्षण क्षमता कम होने के कारण जल का स्तर ऊपर उठा रहता है। फलतः उच्च  जल स्तर से निम्न जल स्तर की ओर जल में प्रवाह की प्रवृति होती है।

                    इसी तरह पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण ही जलधाराएँ उत्पन्न होती है। पृथ्वी पश्चिम से पूरब की ओर घूम रही है। चूंकि समुद्र की सतह ठोस है। जबकि समुद्री पानी द्रव है। इसीलिए जब पृथ्वी पश्चिम से पूरब घूमती है तो समुद्री जल में पूरब से पश्चिम की ओर क्षैतिज गति उत्पन्न होती है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण सभी विषुवतीय गर्म जलधाराएँ हैं। पृथ्वी की घूर्णन गति का पर प्रभाव समुद्री सतह पर जलधारा सर्वाधिक विषुवतीय क्षेत्र में ही पड़ता है।

(2) वायुमंडलीय कारक / बाह्य सागरीय कारक- वायुमंडलीय कारकों के अंतर्गत को शामिल किया जाता है-

(i) वायुदाब

(ii) वायु की दिशा 

(iii) वाष्पीकरण

(iv) वर्षण 

वायुदाब- सामान्यत: निम्न वायुदाब प्रदेश के जल उच्च वायुदाब प्रदेश की तरफ गतिशील हो जाते हैं क्योंकि दोनों के जलसतह में अंतर होता है। जैसे – केनारी जलधारा, कैलिफ़ोर्निया जलधारा ये सभी उपध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र से उपोष्ण उच्च वायुदाब क्षेत्र की ओर चलती है।

वायुदिशा/प्रचलित पवनें एवं घर्षण बल- समुद्री जलधाराओं के निर्धारण में वायुदिशा का अभूतपूर्व प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः इतना प्रभाव किसी भी अन्य कारक का नहीं है। वायुदिशा के अनुरूप समुद्री जलधाराएं हजारों किलोमीटर तक प्रवाहित होती है। विश्व के प्रमुख प्रचलित वायु के समानांतर ही कई जलधाराएं चला करती है।

जैसे – 

◆ उत्तरी-पूर्वी वाणिज्य हवा- उत्तरी विषुवतीय गर्म जलधारा 

◆ दक्षिणी-पूर्वी वाणिज्य हवा- दक्षिणी विषुवतीय गर्म जलधारा 

◆ उत्तरी गोलार्ध की पछुआ वायु- उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह और उत्तरी प्रशांत प्रवाह 

◆ दक्षिणी गोलार्ध की पछुआ वायु- पश्चिमी वायु प्रवाह

वाष्पीकरण- अधिक वाष्पीकरण के कारण जल की मात्रा कम हो जाती है। साथी जल की लवणता एवं घनत्व में वृद्धि होती है। इन सबका सम्मिलित प्रभाव यह होता है कि अधिक वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों में जल का तल नीचा हो जाता है।  फलस्वरुप कम वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों से अधिक वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों की ओर समुद्री जल जलधाराओं के रूप में प्रवाहित होती है। 

वर्षण- जिन क्षेत्रों में वर्षण क्रिया से अतिरिक्त जल की आपूर्ति होती है। उन क्षेत्रों से जल कम वर्षण वाले क्षेत्रों की ओर प्रवाहित होती है। जैसे – विषुवतीय क्षेत्र में वर्षण की क्रिया से अधिक जलापूर्ति होने के कारण जलधाराएँ उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र के कम वर्षा वाले क्षेत्र की ओर प्रवाहित होती है।

(3) समुद्री जल की विशेषता से जुड़े कारक / अंतः समुद्री कारक- सागरीय जल के तापमान, लवणता, घनत्व आदि में स्थानीय परिवर्तन होते हैं जिसके कारण जल धाराओं की उत्पत्ति होती है। तापमान के कारण लवणता प्रभावित होती है और लवणता के कारण जल का घनत्व प्रभावित होता है। अतः ये तीनों कारक आपस में जुड़े हुए हैं। सामान्यतः निम्न घनत्व के जल अधिक घनत्व जल की तरफ गतिशील होते हैं। जैसे- निम्न घनत्व वाले अटलांटिक महासागर का जल अधिक घनत्व वाले भूमध्यसागर की ओर प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है। सामान्यत: समुद्री जलधारा की उत्पत्ति में घनत्व का सबसे कम प्रभाव है।

समुद्र जल का तापमान- समुद्र की सतह के तापीय विषमता ही जल धाराओं को उत्पन्न करती है। जैसे निम्न अक्षांश क्षेत्र के जल उच्च अक्षांश क्षेत्र की तुलना में गर्म होती है। इसका परिणाम यह है कि सभी समुद्रों में जलधारा की सामान्य प्रवाह निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की तरफ होती है। गर्म जल सापेक्षिक रूप से उठे हुए होते हैं। इसी तरह ध्रुवोय क्षेत्रों में हिमानी के कारण और सूर्य के तापीय प्रभाव कम होने के कारण जल का तापमान कम हो जाता है। ऐसे जल उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर प्रवाहित होती है।

(4) समुद्री जल धाराओं के दिशाओं को प्रभावित करने वाले कारक

उच्चावच एवं तट की आकृति- समुद्री नितल का उच्चावच और तटीय आकृति समुद्री जलधाराओं की दिशा निर्धारण में मदद करते हैं। इसलिए इसे संशोधनात्मक कारक कहा जाता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण उत्तरी अटलांटिक महासागर में विषुवतीय गर्म जलधारा का मध्य अटलांटिक कटक के पास उत्पन्न प्रतिरोध के कारण उत्तर की तरफ मुड़ जाना है। इसी तरह सभी विषुवतीय जलधाराएं महाद्वीपों के पूर्वी तट से टकरा कर निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की तरफ चलने की प्रवृत्ति रखते हैं। इसी तरह छोटे द्वीपों के कारण जलधाराएं कई भागों में विभक्त होकर प्रवाहित होती है।

                                          पृथ्वी की घूर्णन गति से उत्पन्न कोरियोलिस बल या विक्षेप बल (Deflective Force) के कारण जलधाराएं उत्तरी गोलार्ध में दायीं ओर एवं दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मुड़ जाती है। पृथ्वी के पश्चिम से पूरब दिशा में घूर्णन के कारण धाराओं का मार्ग गोलाकार हो जाता है।  

मौसम परिवर्तन का प्रभाव:- जब सूर्य उत्तरायण होता है तो समुद्री धाराओं  का प्रवाह क्षेत्र थोड़ा सा उत्तर की ओर खिसक जाता है एवं दक्षिणायन होता है तो धारा क्षेत्र थोड़ा दक्षिण की ओर खिसक जाता है। मानसूनी पवनों की दिशा में परिवर्तन के कारण उत्तरी हिंद महासागर में धाराओं की दिशा में भी परिवर्तन हो जाता है।

                 इस प्रकार स्पष्ट है कि समुद्री जल धाराओं की उत्पत्ति में कई कारकों का प्रभाव होता है।


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9. Oceanic Deposits / महासागरीय निक्षेप

Oceanic Deposits

(महासागरीय निक्षेप)  



Oceanic DepositsOceanic Deposits (महासागरीय निक्षेप)  

         समुद्र के तली पर मिलने वाले अनेक असंगठित पदार्थों के निक्षेप को समुद्री निक्षेप कहते है। इन निक्षेपों में अकार्बनिक एवं कार्बनिक दोनों प्रकार के पदार्थ शामिल होते है। समुद्री निक्षेप के विषय में अनेक अध्ययन समुद्रीवेताओं के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। समुद्री निक्षेप के सम्बन्ध में सर्वप्रथम जानकारी यूनानी भूगोलवेत्ता हेरोडोटस ने दिया था। उसके बाद 1773 ई० में कैप्टन किप्स, 1872 ई० में मर्रे और रेनार्ड ने समुद्री निक्षेप का मानचित्र प्रस्तुत किया। उसके बाद गरहार्ड स्कॉट महोदय ने विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया।

        इन विद्वानों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि समुद्री निक्षेप के कई स्रोत है। जैसे स्थलीय भाग, ज्वालामुखी उदगार से प्राप्त मलबा, वायुमंडल, ब्रह्मांड एवं समुद्र से मिलने वाले अनेक जीव जंतु। इन स्रोतों से प्राप्त होने वाले पदार्थों का निक्षेपण लाखों वर्षों से हो रहा है। इसकी मोटाई एक समान नहीं है। लेकिन कहीं-कहीं पर मोटाई 500 मीटर से अधिक पाई गई है। समुद्री निक्षेपों का वितरण कणों के आकार-प्रकार, समुद्री लवणता एवं समुद्री जल की गतियों पर निर्भर करता है। समुद्री निक्षेप के जमाव का दर बहुत ही मन्द है। इन निक्षेपों में स्थलीय निक्षेप की भाँति स्तर नहीं पाए जाते हैं। लेकिन यह स्पष्ट है कि समुद्र तल से ज्यों-ज्यों गहराई में जाते हैं, त्यों-त्यों समुद्री निक्षेप की गहनता में वृद्धि होती जाती है। इसी तरह तटीय क्षेत्र से गहन सागर क्षेत्रों की ओर जाने पर इनके वितरण प्रारूप में परिवर्तन होता जाता है।

समुद्री निक्षेप का वर्गीकरण

      समुद्री निक्षेपों का कई आधार पर एवं कई विद्वानों के द्वारा वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है। जैसे:-

(1) मरे के अनुसार-  मरे महोदय ने स्थिति के आधार पर समुद्री निक्षेप को दो भागों में बांटा है- 

(i) भूमिज निक्षेप

(ii) पेलाजिक निक्षेप

      मरे के अनुसार 100 फैदम या 200 मी० की गहराई तक भूमिज निक्षेप और उसके आगे पेलाजिक निक्षेप पाई जाती है।

(2) जेनकिंस के अनुसार- जेनकिंस ने समुद्र की गहराई को आधार मानते हुए समुद्री निक्षेप को तीन भागों में बांटा है:-

(i) तटीय निक्षेप- तटीय निक्षेप उच्च ज्वार और निम्न ज्वार के बीच में तटीय भागों में पाई जाती है। यह सामान्यतः 100 फैदम की गहराई तक पाए जाते हैं। इसमें मूलतः कंकड़, बालू, बजरी जैसे पदार्थों का निक्षेपण पाया जाता है।

(ii) छिछला सागर निक्षेप- यह 100 से 200 फैदम में समुद्री गहराई के बीच मिलते हैं।

(iii) गहन सागरीय निक्षेप- इसे जेनकिंस महोदय ने पेलाजिक निक्षेप से भी संबोधित किया है।

(3) जॉनसन के अनुसार- जॉनसन ने समुद्री निक्षेपों के प्रकृति को आधार मानते हुए समुद्री निक्षेप को तीन भागों में बांटा है :-

(i) छिछला सागरीय समुद्री निक्षेप- कुल समुद्री भूपटल के क्षेत्र का 9.1% भाग पर फैला है। 

(ii) भूमिज निक्षेप- इसका विस्तार 15.4% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

(iii) पेलाजिक निक्षेप- इसका विस्तार 75.5% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

(4) स्रोत के आधार पर समुद्री निक्षेप का वर्गीकरण

         यह किसी एक समुद्रीवेता के द्वारा  प्रस्तुत नहीं किया गया है। समुद्री निक्षेप का सबसे उपयुक्त एवं वैज्ञानिक विश्लेषण स्रोत के आधार पर ही किया जा सकता है। स्रोत के आधार पर किए गए वर्गीकरण से उसकी उत्पत्ति एवं प्रत्येक की विशेषता का भी विश्लेषण स्पष्ट हो जाता है। अतः स्रोत के आधार पर समुद्री निक्षेप को 6 भागों में बांटते हैं:-

(i) भूमिज निक्षेप (Terrigenous Deposits)

(ii) ज्वालामुखी निक्षेप (Volcanic Deposits)

(iii) अजैविक निक्षेप (Inorganic Deposits)

(iv) ब्रह्माण्डीय निक्षेप 

(v) जैविक निक्षेप (Organic Deposits)

(vi) लाल चिका 

(1) भूमिज निक्षेप (Terrigenous Deposits)- 

       समुद्र के तली पर निक्षेपित अधिकतर पदार्थ स्थलीय भागों से ही प्राप्त होते हैं। स्थलीय भागों के चट्टानें सतत ऋतुक्षरित होते रहती है। ऋतुक्षरण से प्राप्त मलबा को अपरदन के दूत समुद्र के नितल तक पहुंचाते रहते हैं। इनमें सबसे प्रमुख योगदान नदियों का है। भूमिज निक्षेप को उत्पत्ति, कणों की आकृति और रासायनिक संगठन के आधार पर कई भागों में बांटते हैं :-

(A) गोलाश्म और बजरी (Bolder and Gravel)

(B) रेत या बालू (Sand)

(C) गाद (Silt)

(D) मृतिका (Clay)

(E) पंक (Mud)

           गोलाश्म के टुकड़ों का व्यास न्यूनतम 256 mm होता है जबकि बजरी का व्यास 2 से 256 mm तक होता है। ये दोनों समुद्री तरंगों के द्वारा तटीय क्षेत्रों में सतत किए जा रहे अपरदन से प्राप्त होते हैं। इनका निक्षेपण प्राय: तटीय क्षेत्रों में देखने को मिलता है। 

          रेत या बालू के कणों का व्यास 1/8 से 2mm तक होता है। बालू की प्राप्ति स्थानीय चट्टानों के ऋतुक्षण एवं अपरदन से होता है। रेत के कण भी कई प्रकार के होते हैं। जैसे :- बहुत मोटी रेत, मोटी रेत, मध्यम बालू/ रेत, बारिक रेत और बहुत बारीक रेत।

           गाद, मृतिका और पंक के कणों के व्यास 1/8192mm से 1/8mm तक होता है। गाद पंक के चट्टानी कणों को जोड़ने का कार्य करता है। छिछली एवं शांत सागरों में मृतिका एवं पंक बारीक कण के रूप में पानी पर लटके रहते हैं।

        सबसे सूक्ष्म भूमिज निक्षेप में पंक या कीचड़ को शामिल किया जाता है। कीचड़ प्रायः 1000 फैदम गहराई के बाद ही पाये जाते हैं। मर्रे महोदय ने बताया कि ये कई रंग के होते है। रंग के आधार पर उन्होनें पंक या कीचड़ को तीन भागों में बांटा है- 

(i) नीला पंक (Blue Mud)

(ii) लाल पंक (Red Mud)

(iii) हरा पंक (Green Mud)

        नीला पंक उन चट्टानों के अवशेषों से बनती है जिसमें आयरन सल्फाइड एवं अन्य जैविक तत्व मौजूद रहते है। नीली पंक सभी महासागरों में मिलती है। इसका विस्तार लगभग 232 लाख वर्ग किमी में है।

         लाल पंक का निर्माण लौह ऑक्साइड वाले चट्टानों के ऋतुक्षरण से हुआ है। इसका सर्वाधिक विस्तार पीला सागर और अटलांटिक महासागर के ब्राजील के तट पर देखा जा सकता है।

       हरा पंक का निर्माण नीला पंक के रासायनिक परिवर्तन से होता है। इसमें हरा रंग Gluconites नामक खनिज के कारण होता है। हरा पंक उतरी अमेरिका के प्रशांत एवं अटलांटिक तट पर, ऑस्ट्रेलिया और जापान के तट पर तथा दक्षिण अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के तट पर पाये जाते हैं।

(2) ज्वालामुखी निक्षेप 

           ज्वालामुखी उदगार के कारण बड़े पैमाने पर मलबा का जमाव स्थलीय एवं सागरीय भूपटल पर होता रहता है। स्थलीय भाग पर होने वाला ज्वालामुखी उदगार से निकले मलबा, लावा धीरे-धीरे ठंडा होने की प्रवृति रखते है। जबकि सागरीय भूपटल पर होने वाला ज्वालामुखी उदगार से निकले लावा तेजी से ठंडा होता है। अतः इसके आधार पर ज्वालामुखी निक्षेप को दो भागों में बांटते हैं –

(i) समुद्री ज्वालामुखी निक्षेप

(ii) स्थलीय ज्वालामुखी निक्षेप

         स्थलीय ज्वालामुखी पदार्थ अपरदन के दूतों के द्वारा समुद्री भूपटल पर लाये जाते हैं जो भूमिज के निक्षेप के साथ मिश्रित हो जाते है जिसके कारण इन्हें अलग से पहचान करना संभव नहीं हो पाता है। जबकि समुद्री ज्वालामुखी से प्राप्त पदार्थ अपने मौलिक अवस्था में लंबे समय तक बने रहते हैं। अपरदन एवं ऋतुक्षरण के अभाव में इनका मौलिक गुण यथावत रहता है। 10 लाख वर्ग किमी० समुद्री भूपटल पर इनका निक्षेपण हुआ है। इसका प्रमाण महासागरीय कटक और ज्वालामुखी द्वीपों के सहारे मिलता है।

(3) अजैविक निक्षेप (Inorganic Deposits) 

      अजैविक समुद्री निक्षेप का मुख्य स्रोत वायुमण्डल है। जब जलवायु परिवर्तन होता है तो वैसी स्थिति में वायुमण्डल के ठोस कण सतह पर गिरने लगते है और रासायनिक प्रतिक्रिया कर ग्लूकोनाइट जैसे खनिज का निर्माण करते हैं। इसी तरह यदि वायुमण्डल से CO2 हटा दिया जाय तो डोलोमाइट, सिलिका और लौहे के कण सतह पर गिरकर विशिष्ट अजैविक समुद्री निक्षेप का निर्माण करते हैं। इनका निक्षेपण लगभग सभी सागरों में हुआ है। 

(4)  ब्रह्माण्डीय निक्षेप

          ब्रह्माण्डीय पिंडों से हमारी समुद्री सतह पर निक्षेपित होने वाली पदार्थों को ब्रह्माण्डीय निक्षेप कहते है। स्पष्ट है कि इसका स्रोत हमारी पृथ्वी या वायुमण्डल नहीं है बल्कि हमारे सौरमण्डल या अन्य खगोलीय पिंड इसके स्रोत है। इस प्रकार के निक्षेप सबसे अधिक प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर और हिन्द महासागर में हुआ है। प्रशांत महासागर के 0.25% क्षेत्रफल पर इसका विस्तार हुआ है। ब्रह्माण्डीय निक्षेप का रंग काला होता है तथा इसमें लोहे का अंश अधिक होता है।

(5) जैविक निक्षेप 

            समुद्री जल में अनेक प्रकार के जीव जंतु पाए जाते हैं। जब ये सागरीय जीव मरते हैं तो उन जीवों के हड्डियां, मांस एवं उनके शरीर में पाए जाने वाले खनिज पदार्थों इत्यादि का जमाव समुद्री नीतल पर होता रहता है। जैविक समुद्री निक्षेप गर्म सागरीय क्षेत्रों में अधिक पाए जाते हैं। गुणों के आधार पर जैविक निक्षेप को दो भागों में बांटते हैं –

(i) नेरेटिक जमाव/ तट तलवासी निक्षेप

(ii) पेलाजिक जमाव/अगाध सागरस्थ निक्षेप

           समुद्र में पाए जाने वाले जीव-जंतुओं की हड्डियों, मछलियों, प्रवाल, शीप, स्पंज इत्यादि के स्थिर पंजर वाले अवशेषों को नेरेटिक जमाव कहते हैं। नेरिटिक जमाव समुद्री तली में किसी विशिष्ट स्थान पर नहीं पाए जाते। लेकिन इन पर लगातार समुद्री लहरों एवं जल धाराओं के प्रहार के कारण महीन कण के रूप में टूटते रहते हैं। 

           पेलाजिक जमाव कीचड़ के समान होता है जिसे ऊज (Ooze) भी कहा जाता है। सूखने पर यह पाउडर के समान हो जाता है। इसका निर्माण विशिष्ट प्रकार के शैवाल, प्रोटोजोआ, डायटम जैसे जीवों के द्वारा होता है। ये प्रायः सागरीय क्षेत्रों में मिलते हैं। रसायनिक विशेषता के आधार पर इसे दो भागों में बांटते हैं –

(A) चुना प्रधान पेलाजिक- दो प्रकार के

(i) टेरोपॉड

(ii) ग्लोबीजेरिना

(B) सिलिका प्रधान पेलाजिक- दो प्रकार के

(i) रेडियोलेरियन पेलाजिक

(ii) डायटम पेलाजिक

       टेरोपॉड का विस्तार 0.4%, ग्लोबीजेरिना का विस्तार 29.2%, रेडियोलेरीयन का विस्तार 3.4% और डायटम का विस्तार 6.4% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

      टेरोपॉड चूनायुक्त पदार्थ है। इसका स्रोत चूना प्रधान वाले जीवों का शरीर होता है। इस निक्षेप का नाम भी टेरोपॉड नामक जीव के आधार पर किया गया है। यह प्रायः उष्ण एवं छिछले सागरों में पाया जाता है। यह 1600-3000 मीटर की गहराई में मिलते हैं। इसका सर्वाधिक विस्तार अटलांटिक महासागर में हुआ है।

        ग्लोबीजेरिना का रंग सफेद होता है। इसका प्रमुख स्रोत फेरामिनीफेरा नामक समुद्री जीव है। 3000 से 4000 मीटर की गहराई पर मिलते हैं। ठंडे सागरीय जल में कम और गर्म सागरीय जल में अधिक मिलते हैं।

          डायटम सिलिका प्रधान जैविक निक्षेप है। इसका रंग स्लेटी होता है। 1200 से 4000 मीटर की गहराई पर अधिक मिलते हैं। इसका प्रमुख स्रोत डायटम नामक जीव है। उच्च अक्षांशीय भागों के ठंडे सागरीय क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है। अंटार्कटिका के इर्द-गिर्द इसका निक्षेप सर्वाधिक हुआ है। 

       रेडियोलेरियन नामक समुद्री निक्षेप का मुख्य स्रोत रेडियोलेरियन नामक जीव है। जो उष्ण जल में मिलने वाला जीव है। 4000-10000 मीटर की गहराई तक इसका निक्षेपण हुआ है। प्रशांत महासागर में इसका विस्तार सबसे अधिक है।

(6) लाल चीका 

        यह मुख्यतः एलुमिनियम और ऑक्सीकृत लोहा के हाइड्रेट सिलिकेट से निर्मित होता है। प्राथमिक मान्यता यह रही है कि इसका निर्माण विभिन्न प्रकार के समुद्री निक्षेपों से प्राप्त होने वाले खनिजों के टूटने से बनता है। लेकिन नवीन मान्यता वाईविल थॉमसन ने विकसित करते हुए कहा है कि यह भी एक प्रकार का जैविक निक्षेप ही है जिसका निर्माण चूना प्रधान वाले जीवों के विघटन से होता है। लाल चिका चूना प्रधान वाले जीवों में मिलने वाला ऐसा खनिज है जिसका विलियन संभव नहीं हो सका है। लाल चिका का निक्षेपण तीनों महासागरों में हुआ है। 

          इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि स्रोत के आधार पर किया गया वर्गीकरण को सबसे अधिक मान्यता प्राप्त है। समुद्री निक्षेपों के वितरण को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।



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8. OCEAN SALINITY / सागरीय  लवणता

OCEAN SALINITY

सागरीय  लवणता

OCEAN SALINITY




OCEAN SALINITY / सागरीय  लवणता 

         समुद्री जल में लवण की घुली हुई मात्रा को समुद्री लवणता कहते है प्रारंभ में जब पृथ्वी का निर्माण हुआ तो उसका उपरी भाग ठंडा होकर भूपटल का निर्माण किया। भूपटल का वह भाग जिसका घनत्व कम था उससे महाद्वीपीय भूपटल का निर्माण हुआ और भूपटल का वह भाग जिसका घनत्व अधिक था उससे महासागरीय भूपटल का निर्माण हुआ 

     कालान्तर में स्थ्लमंडल से अपरदन के दूतों के द्वारा लवणों को सागर तक पहुँचाने का कार्य अनवरत जारी है समुद्री जल में मुख्यतः 47 प्रकार के लवण पाए जाते है जिसमें NaCl की मात्रा सर्वाधिक (77.08%) है इसके अतिरिक्त MgCl (10.09%), MgSo4 (4.9%) कैल्सियम सल्फेट (3.6%) भी प्रमुख लवण पाए जाते है शेष अन्य प्रकार के लवण पाए जाते है

लवणता का मापन:

        लवणता का मापन प्रति हजार ग्राम जल में उपस्थित लवण की मात्रा के अनुपात से ज्ञात करते है इसे प्रति हजार (gm ‰) के द्वारा निरुपित करते है डिटमर महोदय के अनुसार सागरीय जल में औसत लवणता 35 ‰ पायी जाती है समुद्री जल में लवणता सर्वत्र एक सामान नहीं पाई जाती है लवणता को प्रभावित करने वाले कई कारक है-

लवणता को प्रभावित करने वाले  कारक:

1. वर्षा एवं वाष्पीकरण-

      वर्षा एवं लवणता  के बीच व्यत्क्रमानुपाती संबंध होता है अर्थात जिन स्थानों पर वर्षा ज्यादा होती है वहाँ लवणता कम होती है जहाँ पर वर्षा कम होती है वहाँ पर लवणता अधिक होती हैइसी तरह लवणता एवं वाष्पीकरण के बीच समानुपाती का संबंध होता है जिन क्षेत्रों में वाष्पीकरण अधिक होता है उन क्षेत्रों में लवणता अधिक पाई जाती है और जहाँ वाष्पीकरण कम होता है वहाँ लवणता भी कम पायी जाती है इन संबंधों को नीचे के ग्राफ में देखा जा सकता है-

चित्र : लवणता एवं वर्षा में व्युत्क्रमानुपाती संबंध
चित्र: लवणता एवं वाष्पीकरण में समानुपाती का सम्बंध

          विषुवतीय क्षेत्र को छोड़कर अन्य उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में वाष्पीकरण का प्रभाव कम होता है और वर्षा कम होती है। यही कारण है की विश्व के अधिक लवणता वाले क्षेत्र विषुवतीय क्षेत्र में स्थित नहीं है बल्कि 30° से 35° अक्षांश के बीच उपोष्ण उच्च वायुदाब वाले क्षेत्र में स्थित है। जैसे- तुर्की का वानगोलु झील (330 ‰), मृत सागर (340 ‰), ग्रेट बेसिन (220 ‰)।

            विषुवतीय क्षेत्रों में वाष्पीकरण की तुलना में वर्षा अधिक होती है। इसीलिए वहाँ लवणता कम पाए जाते है।

2. समुद्री जलधाराएँ-

       विश्व के सभी महासागरों में समुद्री जलधाराएँ चला करती है। उत्तरी गोलार्द्ध  में जलधाराएँ Clock Wise  और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anticlock Wise चला करती है। इसका तात्पर्य हुआ कि निम्न अक्षांश से जलधाराएँ उच्च अक्षांश की ओर जाती है और कुछ जलधाराएँ उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर आती है। तापमान के विशेषता के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार के होती है-

(i) ठंडी जलधारा

(ii) गर्म जलधारा।

     गर्म जलधारा में वाष्पीकरण अधिक होता है जिससे लवणता बढ़ने की प्रवृति रखती है। इसके विपरीत ठंडी जलधाराओं में वाष्पीकरण कम होता है। इसीलिए लवणता भी कम होती है। उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह के कारण ही उत्तरी सागर में लवणता बढ़ जाती जाती है। इसी तरह उत्तरी प्रशांत गर्म जल जलधारा के कारण अलास्का की खाड़ी में लवणता बढ़ जाती है।

 3. बर्फ का पिघलना-

       यह ज्ञात है कि ध्रुवीय क्षेत्र बर्फ से ढके हुए हैं। सूर्याताप प्राप्त करके जब बर्फ पिघलती हैं तो समुद्र में जलापूर्ति बढ़ जाती है। जिसके परिणामस्वरूप लवणता में भी कमी आ जाती है। यही कारण है कि आर्कटिक सागर और अंटार्कटिका के तटीय क्षेत्रों में लवणता कम पाई जाती है।

4. नदियों के द्वारा स्वच्छ जल की  आपूर्ति-

          नदी जल स्वच्छ जल के उदाहरण है। विश्व के कई बड़ी बड़ी नदियां अपना जल सतत समुद्र में उधेड़ रही है। काला सागर और कैस्पियन सागर दोनों एक ही अक्षांश पर है लेकिन काला सागर में डेन्यूब नदी और वोल्गा नदी के गिरने के कारण काला सागर की लवणता कम और कैस्पियन सागर की लवणता अधिक है।

5. तटीय आकृति-

       जिन क्षेत्रों में समुद्र का किनारा सीधा और सपाट है वहाँ पर जल का मिश्रण आसानी से हो जाता है। जबकि अधिक कटे-फटे तटीय क्षेत्रों में जल का मिश्रण आसानी से नहीं हो पाता है जिसके कारण ऐसे क्षेत्रों में लवणता अधिक पाई जाती है।

6. ज्वालामुखी उदगार की क्रिया-

        प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर और भूमध्यसागर में कई जीवित ज्वालामुखी पाये जाते हैं। इन ज्वालामुखी उदगारों के कारण जल वाष्पीकृत होते है और लवणता को बढ़ा देते हैं। ज्वालामुखी उदगार के ही कारण अटलांटिक कटक के सहारे लवणता अधिक पायी जाती है।

7. वायुदाब-

       अधिक वायुदाब के कारण जल के सतह नीचे की ओर धँस जाता है जबकि निम्न वायुदाब क्षेत्रों में जल का सतह सामान्य जल स्तर से ऊपर उठा होता है। इस परिघटना के कारण समुद्री जलधाराएँ  उच्च जल स्तर वाले क्षेत्र से निम्न जलस्तर वाले क्षेत्र की ओर चलने लगते है जिसके कारण समुद्री लवणताएँ प्रभावित होती है।

       इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री लवणता को कई कारक प्रभावित करते हैं।

लवणता का वितरण

         विश्व के सभी महासागर आपस में जुड़े हुए हैं। इसीलिए बड़े महासागर और छोटे महासागरों के लवणता में कोई विशेष अंतर नहीं पायी जाती है। लेकिन धरातल  पर कुछ ही जलाशय हैं जो समुद्र से जुड़े हुए नहीं हैं। ऐसे ही बंद सागरों की लवणता खुली सागरों की तुलना में अधिक है। सामान्य तौर पर समुद्री लवणता का अध्ययन दो शीर्षकों में बाँटकर किया जा सकता है-

(A) क्षैतिज लवणता

(B) लम्बवत लवणता

(A) क्षैतिज लवणता

      इसके अंतर्गत महासागरीय लवणता का वितरण का अध्ययन अक्षांशीय आधार पर किया जाता है। सामान्यतः पृथ्वी को दो भागों में बाँटा जाता है- उत्तरी गोलार्द्ध एवं  दक्षिणी गोलार्द्ध। 

     उत्तरी गोलार्द्ध में महासागर का विस्तार कम और महाद्वीपों का विस्तार अधिक हुआ है। जबकि दक्षिणी  गोलार्द्ध में सागर का विस्तार अधिक और स्थल का विस्तार कम हुआ है। यही कारण है कि उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी  गोलार्द्ध के पानी में लवणता कम पायी जाती है। दोनों गोलार्द्धों में समुद्री लवणता के अक्षांशीय वितरण को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है-

अक्षांशीय क्षेत्र उत्तरी गोलार्द्ध में लवणता दक्षिणी गोलार्द्ध में लवणता प्रमुख कारण
0°–10° (भूमध्यरेखीय क्षेत्र) कम (≈ 34‰) कम (≈ 34‰) अधिक वर्षा, नदियों का मीठा जल
10°–20° मध्यम मध्यम वर्षा में कमी, वाष्पीकरण बढ़ता
20°–30° (उपोष्ण कटिबंध) अधिकतम (≈ 36–37‰) अधिकतम (≈ 36‰) तीव्र वाष्पीकरण, कम वर्षा
30°–40° घटती हुई घटती हुई पश्चिमी पवनों से वर्षा
40°–60° कम कम कम तापमान, हिम पिघलना
60°–90° (ध्रुवीय क्षेत्र) बहुत कम (≈ 30–32‰) बहुत कम (≈ 30–32‰) हिम गलन, न्यून वाष्पीकरण
   उपरोक्त तालिका के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी गोलार्द्ध की लवणता कम होती है। लेकिन समुद्री लवणता के वितरण को आधार बनाकर विश्व के महासागरीय क्षेत्र को सामान्य रूप से चार भागों में वर्गीकृत कर अध्ययन करते है।

(1) अत्यधिक लवणता वाले क्षेत्र

(2) अधिक लवणता वाले क्षेत्र

(3) निम्न लवणता वाले क्षेत्र

(4) अति निम्न लवणता वाले क्षेत्र

(1) अत्यधिक लवणता वाले क्षेत्र-

     इसके अंतर्गत वैसे सागरों एवं झीलों को शामिल किया जाता है जिनकी औसत लवणता 40 ०/०० से अधिक है। इसके अंतर्गत उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र के बन्द सागर एवं झील आते है। ये वे क्षेत्र है जहाँ वाष्पीकरण अधिक एवं जलापूर्ति या वर्षा कम होती है। यह सामान्यतः 30° से 35° अक्षांश के बीच के क्षेत्र है। इन्ही क्षेत्रों में मरुस्थलीय एवं अर्द्धमरुस्थलीय जलवायु पायी जाती है। विश्व में सर्वाधिक लवणता रखने वाला मृत सागर (340‰), वानगोलू/वुलर झील (330 ‰), ग्रेट बेसिन (220 ‰), ऑस्ट्रेलिया के आयर झील आते है। इसके अलावे लाल सागर, पार्सियन की खाड़ी, कैस्पियन सागर, भूमध्य सागर के अफ्रीकी तट और जिब्राल्टर के मुहाना पर भी समुद्री लवणता 40 ‰ से अधिक पायी जाती है।

(2) अधिक लवणता वाले क्षेत्र-

      इसके अंतर्गत 30 से 40 ‰ लवणता रखने वाले जलाशयों को शामिल करते है। भौगोलिक वितरण की दृष्टि से विषुवतीय क्षेत्र 5º से 5º को छोड़कर 5º से 30º अक्षांश वाले क्षेत्र को और 45° से 50° अक्षांश के मध्य दोनों गोलार्द्धों में लवणता अधिक पायी जाती है। 40° से 50° अक्षांश के बीच गर्म समुद्री जलधारा के कारण लवणता अधिक पायी जाती है। जबकि 5° से 30° अक्षांश के बीच वर्षा एवं वाष्पीकरण में विभिन्नता के कारण लवणता अधिक पायी जाती है।

(3) निम्न लवणता वाले क्षेत्र- 

      इसके अंतर्गत 20 से 30 ‰ लवणता वाले क्षेत्र को शामिल करते है। इसके अंतर्गत मुख्यतः तीन क्षेत्र आते है-

(क) विषुवतीय क्षेत्र के महासागरों में 5°N से 5°S के बीच। यहाँ पर लवणता कम होने का प्रमुख कारण वर्षा अधिक और वाष्पीकरण का कम होना है।

(ख) 35° से 45°अक्षांश के बीच

(ग) 55° अक्षांश से ध्रुव (90° अक्षांश) तक

      विषुवतीय क्षेत्रों में निम्न लवणता का एक प्रमुख कारण बड़ी-बड़ी नदियों का समुद्र में गिरना भी है। जैसे- जायरे एवं अमेजन नदी अपना मुहाना विषुवतीय क्षेत्रों में ही बनाती है। यही कारण है कि इनके मुहाने पर औसत लवणता 10 ‰ तक पहुँच जाती है।

      उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में न्यून लवणता का प्रमुख कारण सूर्य के तापीय प्रभाव का कम होना है। सूर्य के कम तापीय प्रभाव के कारण वाष्पीकरण की क्रिया भी कम होती है। इसके अलावे उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में ध्रुवीय हिम शीलाखण्ड और सेंटलॉरेन्स, राईन, एनेसी, ओब, लीना, जैसे नदियों के द्वारा बड़े पैमाने पर जलापूर्ति की जाती है।

(4) अति निम्न लवणता वाले क्षेत्र- 

       इसके अंतर्गत 20‰ से कम लवणता वाले क्षेत्रों को शामिल करते है। इसके अंतर्गत उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों के बन्द सागर और झील को शामिल करते है। उच्च अक्षांशीय क्षेत्र में शामिल होने के कारण यहाँ वाष्पीकरण कम होता है और हिमानियों के द्वारा स्वच्छ जल की आपूर्ति अधिक होती है।

      विश्व में सबसे कम लवणता बाल्टिक सागर के गल्फ ऑफ बोथनियाँ में गोटलैंड द्वीप (6 से 8 ‰) के पास पायी जाती है। इसके अलावे हड्सन की खाड़ी, कारा सागर, उजला सागर और बाल्टिक सागर की भी औसत लवणता बहुत कम पायी जाती है।

(B) लम्बवत लवणता का वितरण 

           महासागरों में लम्बवत दृष्टिकोण से भी लवणीय विषमता दिखाई पड़ती है। जैसे-

(i) विषुवतीय क्षेत्रों में सतह के ऊपर वर्षा अधिक होने के कारण लवणता कम पायी जाती है। जबकि लवण का घनत्व अधिक होने के कारण नीचे की ओर बैठने की प्रवृति होती है। इसी कारण से ऊपर से नीचे की ओर जाने पर विषुवतीय क्षेत्रों में लवणता अधिक मिलती है।

(ii) मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में 200 फैदम की गहराई तक लवणता में वृद्धि होती है। लेकिन उसके बाद लवणता में कमी आती है क्योंकि उपसतही जलधारा के कारण मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों के नीचले भागों में जलापूर्ति बढ़ जाती है।

(iii) ध्रुवीय क्षेत्रों के ऊपरी भागों में हिमशीलाखण्डों के पिघलने के कारण लवणता कम पायी जाती है। जबकि लवण के बैठने के कारण निचले भागों में लवणता अधिक पायी जाती है। सम्पूर्ण लम्बवत सागरीय लवणता के वितरण को नीचे के Flow Chart में देखा जा सकता है-

निष्कर्ष:

     इस प्रकार उपर्युक्त तथ्यों  से स्पष्ट है कि सागरीय लवणता में क्षैतिज एवं लम्बवत रूप से काफी विषमताएँ पायी जाती है। सागरीय लवणता में विषमता उतपन्न करने वाले कई कारक है। लेकिन इसके अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वर्षा और वाष्पीकरण लवणता को प्रभावित करने वाले दो सबसे प्रमुख कारक हैं।

नोट:

👉 वानगोलू झील (Lake Van) तुर्की के पूर्वी अनातोलिया क्षेत्र में स्थित एक अंत:स्थलीय खारी क्षारीय झील है। यह तुर्की की सबसे बड़ी झील है और समुद्र से कोई निकास नहीं रखती।

👉 मृत सागर

  • यह मध्य पूर्व (Middle East) में स्थित है।

  • इज़राइल और जॉर्डन की सीमा के बीच फैली हुई है।

  • यह पृथ्वी का सबसे निचला स्थल है (समुद्र तल से लगभग 430 मीटर नीचे)।

  • अत्यधिक लवणता के कारण इसमें जीव लगभग नहीं पाए जाते इसीलिए इसे मृत सागर कहा जाता है।

👉 ग्रेट बेसिन झील 

  • ग्रेट बेसिन झील उत्तरी अमेरिका के ग्रेट बेसिन क्षेत्र में स्थित है।
  • यह झील मुख्यतः Utah राज्य में पाई जाती है।
  • इसे सामान्यतः Great Salt Lake के नाम से जाना जाता है।
  • यह एक आंतरिक अपवाह (Inland Drainage) क्षेत्र की झील है, अर्थात इसका जल समुद्र तक नहीं पहुँचता।
  • अधिक वाष्पीकरण के कारण इसका जल अत्यधिक लवणीय (खारा) है।


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7. Temperature of Oceanic Water / सागरीय जल का तापमान

7. Temperature of Oceanic Water

(सागरीय जल का तापमान)



Temperature of Oceanic Water / सागरीय जल का तापमानTemperature of Oceanic Water

                 समुद्री जल ऊर्जा के अनेक स्रोतों से गर्म होने की प्रवृत्ति रखती है जिसे सागरीय तापमान कहते हैं। सागरीय जल को ऊष्मा कई स्रोतों से प्राप्त होती है। जैसे – सौर विकरण, रेडियो सक्रिय पदार्थों के विखंडन, ज्वालामुखी, सागरीय जल के दबाव एवं सागरीय जल के विभिन्न स्तरों के मध्य होने वाला घर्षण इत्यादि से। ऊर्जा के इन स्रोतों में से सबसे प्रमुख स्रोत सौर ऊर्जा है। सौर ऊर्जा स्थल और जल दोनों एक साथ प्राप्त करते हैं। लेकिन दोनों में तापमान ग्रहण करने की दर में अंतर होता है क्योंकि स्थल जल्दी गर्म होता है और जल्द ठंडा होने की प्रवृत्ति रखता है इसके विपरीत सागर जल देर से गर्म और देर से ठंडा होने की प्रवृत्ति रखता है। यही कारण है कि स्थल के औसत तापमान 15॰C की तुलना में सागरीय जल का औसत तापमान 17॰C होता है। समुद्री जल एवं स्थल के वार्षिक तापांतर में भी विभिन्नता पाई जाती है। जैसे- स्थल का वार्षिक तापांतर 145.5॰C है जबकि सागरीय जल का वार्षिक तापांतर 80॰C है क्योंकि समुद्री जल में लगातार मिश्रण होता रहता है। जबकि स्थलीय भाग में इस तरह का कोई मिश्रण नहीं होता है। सागरीय जल सूर्य विकिरण के अवशोषण, पृथ्वी के नितल द्वारा, संवहन, गतिज ऊर्जा, जलवाष्प का संघनन जैसे प्रक्रियाओं से गर्म होता है। उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि सागरीय जल कई स्रोतों से एवं कई प्रक्रियाओं से गर्म होने की प्रवृत्ति रखते हैं। इन प्रक्रियाओं को कई कारक प्रभावित करते हैं। जिसके कारण सागरीय जल के वितरण में विविधता पाई जाती है।

सागरीय जल के तापमान को प्रभावित करने वाले कारक
            समुद्री जल के तापमान को कई कारक प्रभावित करते हैं। जैसे:- 
(1) अक्षांशीय स्थिति
(2) समुद्री जलधारा
(3) प्रचलित वायु और वायुदाब
(4) लवणता
(5) तट रेखा की बनावट
(6) मेघावरण
(7) हेमशीलाखंड
(8) समुद्री जल का घनत्व
 
(1) अक्षांशीय स्थिति
             विषुवत रेखा (0 अक्षांश रेखा) या निम्न अक्षांशीय क्षेत्र सालों भर सूर्य की लंबवत किरण प्राप्त करते हैं जिसके कारण इस क्षेत्र के समुद्री भाग में तापमान अधिक होता है। जबकि ध्रुवीय प्रदेश में सूर्य की किरणें सालोंभर तिरछी पड़ती है। इसलिए यहां का तापमान काफी कम होता है। विषुवतीय प्रदेश का औसत समुद्री तापमान 25॰-26॰C के मध्य होता है जबकि आर्कटिक सागर का औसत तापमान शून्य से -1॰C से 1.9॰C होता है।
 
(2) समुद्री जल धारा
             यह ज्ञात है कि समुद्री जलधाराएं दो प्रकार की होती है -(i) गर्म जलधारा (ii) ठंडी जलधारा  गर्म जलधाराएं निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर चला करती है जबकि ठंडी जलधाराएं उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर चला करती है। जिसके कारण समुद्री जल के तापमान में स्थानांतरण की प्रक्रिया पाई जाती है उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह एक गर्म जलधारा है जिसके कारण उच्च अक्षांश के क्षेत्रों में स्थित बंदरगाहें खुली रहती है। जैसे नार्वे का हेमरफिस्ट और रूस का मरमंस्क बंदरगाह। दोनों लगभग एक ही अक्षांश पर स्थित है लेकिन समुद्री गर्म जलधारा के कारण हेमरफिस्ट का बंदरगाह सालोंभर खुला रहता है जबकि मरमंस्क बंदरगाह सालों भर लगभग बंद रहता है।
          अलनीनो और लानीनो ऐसी दो जलधाराएं हैं जिसके कारण समुद्री जल के तापमान में विविधता उत्पन्न होती है अलनीनो के कारण समुद्री जल के तापमान में 1-6॰C तक बढ़ोतरी होती है जबकि लानीनो के कारण समुद्री जल के तापमान में गिरावट आती है।
 
(3) प्रचलित वायु और वायुदाब
               समुद्री जल के तापमान का निर्धारक प्रचलित वायु और वायुदाब को भी माना जाता है। जैसे- उच्च वायुदाब वाले क्षेत्रों में समुद्र का जलस्तर नीचे जबकि निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों में समुद्र जल का स्तर ऊपर होता है जिसके कारण जल का प्रवाह उच्च जल स्तर से निम्न जलस्तर क्षेत्र की ओर होने लगता है। अगर जल का प्रवाह विषुवतीय निम्न वायुदाब से उपोष्ण उच्च वायुदाब वाले क्षेत्र की ओर हो रहा हो तो तापमान का हस्तांतरण निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर होता है। इसके विपरीत जब जल का प्रवाह उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र से उपोष्ण उच्च वायुदाब क्षेत्र की ओर हो रहा हो तो तापमान का स्थानांतरण उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर होता है।
           प्रचलित वायु मुख्यत: तीन है- (i) वाणिज्य हवा (ii)  पछुआ हवा और (iii) ध्रुवीय हवा। ये हवाएं समुद्री सतह पर हजारों किलोमीटर तक सतत चलने की प्रवृत्ति रखती है। वाणिज्यिक हवा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र से विषुवतीय क्षेत्र की ओर ध्रुवीय हवा ध्रुवीय उच्चभार से निम्न उपध्रुवीय भार की ओर, जबकि पछुआ हवा उपोष्ण उच्चभार से निम्न उपध्रुवीय वायुदाब क्षेत्र की ओर चला करती है ये हवाएं समुद्र से तापमान को ग्रहण भी करती है और समुद्री जल के तापमान को बढ़ाती है। यह वायु की प्रकृति पर निर्भर करती है जैसे ध्रुवीय वायु ठंडी होने के कारण मध्य अक्षांशीय क्षेत्र के जलीय तापमान को घटा देती है इसके विपरीत पछुआ हवा गर्म होने के कारण उच्च अक्षांश क्षेत्र के समुद्री तापमान को बढ़ा देती है।
 
(4) लवणता
              समुद्री लवणता के कारण जल का प्रवाह कम लवणता वाले क्षेत्र से अधिक लवणता वाले क्षेत्र की ओर होता है। जैसे- अटलांटिक महासागर की तुलना में भूमध्य सागर का लवणता अधिक है जिसके कारण अटलांटिक महासागर का जल भूमध्यसागर में प्रविष्ट करता रहता है जिसके फलस्वरूप भूमध्यसागर के औसत तापमान में 1-2C तापमान की कमी हो जाती है।
 
(5) तट रेखा की बनावट
            अगर कोई खुला समुद्र हो तो उसका तापमान कम होता है जबकि बंद सागरों का तापमान अधिक होता है जैसे विश्व के तीनों बड़े महासागरों में सबसे कम औसत समुद्री तापमान प्रशांत महासागर का और सबसे ज्यादा औसत समुद्र तापमान हिंद महासागर का है हिंद महासागर में भी लाल सागर और परसियन  की खाड़ी का तापमान अरब सागर की तुलना में अधिक है क्योंकि वे दोनों सागर स्थलीय भाग से घिरे हैं जिसके कारण समुद्री जल का मिश्रण नहीं हो पाता है।
 
(6) मेघावरण
            विषुवतीय क्षेत्र और शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात क्षेत्र में मेघावरण अधिक पाई जाती है। जिसके कारण सूर्य की रोशनी समुद्री सतह पर सतह नहीं पड़ पाती है जबकि उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र में आसमान सालोंभर साफ रहती है जिसके कारण समुद्री सतह सालोंभर सूर्यातप प्राप्त करती है फलत: समुद्री जल के तापमान में विभिन्नताएँ उत्पन्न होती है।
 
(7) हिमशीलखण्ड
                 ध्रुवीय क्षेत्रों में गर्म समुद्री जलधारा के कारण एवं ग्लोबल वार्मिंग के कारण सदियों से जमीन पिघल रहे हैं जिसके कारण यहां एक ओर समुद्री जल स्तर वृद्धि हो रही है वहीं दूसरी ओर समुद्री जल की औसत तापमान में कमी आ रही है।
 
(8) समुद्री जल का घनत्व
                समुद्री जल का घनत्व मूलतः लवणता से ही संबंधित है फिर भी अलग-अलग गहराई पर अलग-अलग समुद्री लवणता के कारण समुद्री जल में उदग्र रूप से कई स्तर पाए जाते हैं। जैसे – समुद्री जल के सबसे ऊपरी भाग में जब लवणता अधिक होती है तो उसका घनत्व भी अधिक हो जाता है जिसके कारण सौर विकरण के अवशोषण की क्षमता भी अधिक हो जाती है जबकि 100 फैदम गहराई के बाद लवणता में कमी के कारण दूसरी परत का निर्माण होता है फलत: ऊपरी परत की तुलना में निचली परत के तापमान में लगभग 1C कमी आ जाती है। अतः समुद्री जल के विभिन्न स्तर भी समुद्री तापमान को प्रभावित करने में सक्षम है।
 
सागरीय तापमान का वितरण
                समुद्री जल के तापमान का वितरण को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया जाता है:-
(i)  क्षैतिज वितरण 
(ii) लम्बवत वितरण
 
(i) क्षैतिज वितरण
               तीनों प्रमुख महासागरों के क्षैतिज तापमान को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है:-
Temperature of Oceanic Water
(ii) लम्बवत वितरण
              समुद्री जल के तापमान का लंबवत वितरण का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया है। इसके बावजूद समुद्री वैज्ञानिकों के द्वारा निम्नलिखित लम्बवत तापीय वितरण को मान्यता प्राप्त है:-
Temperature of Oceanic Water
निष्कर्ष

          इस तरह उपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री जल के क्षैतिज एवं उदग्र तापमान में काफी विषमता पाई जाती है।


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5. BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN / हिंद महासागर के तलीय उच्चावच

5. BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN

(हिंद महासागर के तलीय उच्चावच)

BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN



BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN

         हिंद महासागर के तली का विस्तृत अध्ययन नहीं किया गया है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है। इसकी लंबाई लगभग 10000 किमी० और चौड़ाई 9000 किमी० है। इसका क्षेत्र 7.34 करोड़ वर्ग किमी० है। यह कुल महासागरीय जल का 20% जल अपने पास रखता है। इसके किनारे पर पूर्व में आस्ट्रेलिया, उत्तर में एशिया, पश्चिम में अफ्रीका और दक्षिण में अंटार्कटिका महाद्वीप उपस्थित है।

         हिंद महासागर का दक्षिणी भाग अंटार्कटिका के पास, पूरब में प्रशांत महासागर और पश्चिम में अटलांटिक महासागर से जुड़ जाता है। इसका तलीय भाग एवं तटीय भाग कठोर एवं सघन चट्टानों से निर्मित है। हिंद महासागर के तटीय भाग में ब्लॉक पर्वतों का प्रमाण मिलता है क्योंकि इसका निर्माण गोंडवाना भूखंड के विखंडन एवं उनके स्थानांतरण से हुआ है। हिन्द महासागर के पूर्वी भाग में मोड़दार पर्वतों की श्रेणियाँ है जो हिमालय का ही भाग माना जाता है। इसी मोड़दार पर्वत श्रृंखला पर कोको द्वीप, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह स्थित है। सामान्यत: प्रायद्वीपीय भारत दक्षिण में स्थित हिंद महासागर को दो भागों में बाँट देता है-

(1) बंगाल की खाड़ी

(2) अरब सागर।

       हिंद महासागर के सीमांत क्षेत्रों में कई छोटे-छोटे सागर मिलते हैं। जैसे- फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी, लाल सागर, मोजांबिक चैनल, अंडमान सागर इत्यादि।

     1965 में अंतरराष्ट्रीय हिंद महासागर अभियान जर्मन एवं भारतीय समुद्री वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। इनके अनुसार हिंद महासागर की औसत गहराई 4000 मीटर है। जॉनसन महोदय ने प्रादेशिक विशेषताओं के आधार पर हिंद महासागर को तीन भागों में वर्गीकृत किया है:-  

(1) पश्चिमी भाग- अफ्रीका के समीप, औसत गहराई 2000 फैदम

(2) पूर्वी भाग- ऑस्ट्रेलिया के पश्चिम में, औसत गहराई 3000 फैदम

(3) सँकरा और महाद्वीपीय मग्नढाल वाला क्षेत्र मध्यवर्ती भाग- एक उत्थित कटक के रूप में।

            सामान्य तौर पर हिंद महासागर के तलीय उच्चावच का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत करते हैं:-

(1) महाद्वीपीय मग्नतट

      हिंद महासागर के मग्नतट में काफी विविधता दिखाई देती है। इसकी औसत चौ० 640 किलोमीटर है। सबसे चौड़ा मग्नतट अफ्रीका के पूर्व और मेडागास्कर के समीप में पाए जाते हैं। इसी तरह बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर में भी चौड़े मग्नतट मिलते हैं। लेकिन आस्ट्रेलिया के पश्चिमी भाग और अंटार्कटिका के उत्तरी भाग में सँकरे मग्नतट मिलते हैं। जावा एवं सुमात्रा द्वीप के पास इसकी चौड़ाई मात्र 160 किलोमीटर है।

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल

     यह महाद्वीपों का अंतिम किनारा होता है। जिन-जिन क्षेत्रों में सँकरे महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ मग्नढाल तीव्र होता है और जिन क्षेत्रों में मंद ढाल वाले महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ पर महाद्वीपीय मग्नढाल भी मन्द होता है।

(3) महासागरीय कटक

       हिंद महासागर में उत्तर से दक्षिण दिशा में फैला एक मुख्य कटक मिलता है और इस मुख्य घटक के सहारे सहायक कटक भी मिलते हैं। हिंद महासागरीय कटक का आकार ‘Y’ अक्षर के समान है। यह समुद्र तल से 4000 मीटर नीचे तक अवस्थित है। यह कटक हिंद महासागर को पूर्वी एवं पश्चिमी भागों में बाँट देता है। कहीं-कहीं पर यह कटक समुद्री सतह से ऊपर चला जाता है जिस पर कई द्वीप बसे हुए हैं। जैसे- लक्षद्वीप, मालद्वीप, मॉरीशस द्वीप, कोकस किलिंग द्वीप, क्रिसमस द्वीप, रियूनियन द्वीप, सेशेल्स द्वीप, चैगोस द्वीप, डियागो गार्सिया द्वीप, प्रिंस एडवर्ड द्वीप, क्रोजेट द्वीप, कारगुलेन द्वीप, एमस्टर्डम द्वीप, सेंट पॉल द्वीप,  इत्यादि। यह उत्तर में प्रायद्वीपीय भारत के किनारे से शुरू होकर दक्षिण में अंटार्कटिका तक फैला हुआ है।

       प्रायद्वीपीय भारत के दक्षिण में इस कटक की चौड़ाई सर्वाधिक है। इसे लक्षद्वीप और मालद्वीप के बीच लक्काद्वीप चैगोस कटक कहते हैं। यही कटक दक्षिण की ओर बढ़ता चला जाता है। इसे विषुवत रेखा तथा 30° दक्षिणी अक्षांश के बीच चैगोस सेंटपॉल कटक कहते हैं। 30° से 50° दक्षिणी अक्षांश के बीच इसे एम्सटर्डम सेंटपॉल कटक कहते हैं। यहाँ पर इसकी चौड़ाई 1600 कि०मी० हो जाता है। 50° दक्षिणी अक्षांश के पास यह दो शाखाओं में विभक्त हो जाती है। पश्चिमी शाखा को करगुलेन गॉसबर्ग कटक और पूर्वी शाखा को इंडियन अंटार्कटिका कटक कहते हैं।

        हिंद महासागर का मुख्य कटक कई भागों में विभक्त है। जैसे- 5° दक्षिणी अक्षांश से एक शाखा निकलकर उत्तर-पश्चिम दिशा में चली जाती है जिसे सोकोत्रा चैगोस या कॉल्सबर्ग कटक कहते हैं। 18° दक्षिणी अक्षांश के पास से एक कटक निकलती है जिसे सेशेल्स कटक कहते हैं। यही कटक अचानक दक्षिण-पश्चिम दिशा में मुड़ जाता है जिसे मलागासी कटक कहते हैं। 48° दक्षिणी अक्षांश के पास हिंद महासागर के पश्चिमी भाग में एक कटक अवस्थित है, जिसे प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक कहते हैं। पूर्वी हिंद महासागर में 50° दक्षिणी अक्षांश के पास से ही एक कटक पूरब की ओर चली जाती है, जिसे दक्षिण-पूर्व इंडियन कटक कहते हैं।

सूची-

1. लक्काद्वीप चैगोस कटक

2. चैगोस सेंटपॉल कटक

3. एम्सटर्डम सेंटपॉल कटक

4. करगुलेन गॉसबर्ग कटक

5. इंडियन अंटार्कटिका कटक

6. सोकोत्रा चैगोस या कॉल्सबर्ग कटक

7. सेसिल्स कटक

8. मलागासी कटक

9. प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक

10. दक्षिण-पूर्व इंडियन कटक

(4) महासागरीय मैदान

      महासागरीय कटक हिंद महासागर को कई गहन सागरीय मैदानों में विभक्त करते हैं। जैसे-

(i) ओमान बेसिनओमान की खाड़ी में स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(ii) अरेबियन बेसिन- यह लक्काद्वीप चैगोस कटक और  सोकोत्रा द्वीप चैगोस के बीच स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट है।

(iii) सोमाली बेसिन- यह सोकोत्रा चैगोस, सेंटपाल कटक और सेशेल्स कटक के बीच स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(iv) मॉरीशस बेसिन- यह मलागासी और सेंट पाल कटक के बीच स्थित है। इसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट है।

(v) नेटाल बेसिन- मलागासी और दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी तट के बीच स्थित है। इसकी औसत गहराई 18000 फीट है।

(vi) अटलांटिक-भारतीय-अंटार्कटिका बेसिनयह अंटार्कटिका, दक्षिण अफ्रीका और प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक के बीच अवस्थित है। इसकी औसत गहराई 18000 फीट है।

(vii) अंडमान बेसिन- यह बंगाल की खाड़ी में अंडमान निकोबार के पूर्वी भाग में स्थित है। इसकी औसत गहराई 6000 से 12000 फीट है।

(viii) भारत-ऑस्ट्रेलिया बेसिन- इसका विस्तार 10° दक्षिणी अक्षांश से 50° दक्षिणी अक्षांश के बीच पूर्वी हिंद महासागर में हुआ है। इसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट के बीच है।

(ix) पूर्वी भारतीय अंटार्कटिका बेसिन- यह पूर्वी हिंद महासागर के सबसे दक्षिणी भाग में स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(5) महासागरीय गर्त

        हिंद महासागर में 6 प्रमुख गर्त मिलते हैं। इसके 60% भूभाग पर गहन सागरीय मैदान है। इसलिए इसमें गर्तों की संख्या बहुत कम है। हिंद महासागर का सबसे गहरा गर्त सुंडा गर्त है जो सुमात्रा एवं जावा द्वीप के पश्चिमी भाग में स्थित है जिसकी गहराई 7725 मीटर है।

निष्कर्ष

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट होता है कि हिंद महासागर के तलीय उच्चावच में भी अनेक विविधतापूर्ण विशेषताएँ मौजूद है।



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4. BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN / अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच

4. BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN 

(अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच)


BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN ⇒
BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN

           अटलांटिक महासागर पश्चिम में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका और पूर्व में यूरोप तथा अफ्रीका के मध्य 8.2 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अवस्थित है। यह संपूर्ण विश्व के क्षेत्रफल का 1/6 भाग तथा प्रशांत महासागर के क्षेत्रफल का 1/2 भाग है। इसका आकार अंग्रेजी के ‘S’ अक्षर के समान है जिससे यह प्रमाणित होता है कि प्रारंभ में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका यूरोप तथा अफ्रीका से मिले थे। बाद में महाद्वीपीय प्रवाह के कारण उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका अलग होकर पश्चिम दिशा में प्रवाहित हो गए। जिस कारण अटलांटिक महासागर का निर्माण हुआ।

       उत्तर में यह डेविस की खाड़ी तथा डेनमार्क जलडमरूमध्य एवं नार्वेजियन सागर द्वारा आर्कटिक सागर से जुड़ा हुआ है। अफ्रीका के दक्षिण में यह हिन्द महासागर से मिला हुआ है। अटलांटिक महासागर दक्षिण में सर्वाधिक चौड़ा है। 35° दक्षिणी अक्षांश पर इसकी पूर्वी-पश्चिमी चौड़ाई 5920 किलोमीटर है। भूमध्य रेखा की ओर यह निरंतर सँकरा होता जाता है। साओरोक अंतरीप तथा लाइबेरिया तट के बीच चौड़ाई 2560 किलोमीटर ही है। उत्तर की ओर चौड़ाई पुनः बढ़ती जाती है। 40° उत्तरी अक्षांश पर यह 4800 किलोमीटर हो जाती है। अटलांटिक महासागर के सीमांत सागरों में रूम सागर, कैरेबियन सागर, मेक्सिको की खाड़ी, बाल्टिक सागर, उत्तरी सागर, बैफिन की खाड़ी आदि प्रमुख है।

           अटलांटिक महासागर के नितल में निम्नलिखित चार प्रमुख रूप देखने को मिलते हैं:-

(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)

            कुछ भागों को छोड़कर अटलांटिक महासागर के चारों ओर चौड़े मग्नतट पाए जाते हैं। उत्तरी अटलांटिक महासागर में मग्नतट सर्वत्र सपाट एवं चौड़े हैं। मग्नतट की चौड़ाई समीपी तट के उच्चावच पर आधारित होती है। पर्वतीय अथवा पठारी तटों के मग्नतट अत्यधिक सँकरे और मैदानी तटों के मग्नतट अत्यधिक विस्तृत और समतल होते हैं। जैसे – बिस्के की खाड़ी से उत्तमाशा अंतरीप के बीच अफ्रीका का मग्नतट तथा 5°-10° S अक्षांश के बीच ब्राजील का मग्नतट सँकरा हो गया है। इसके विपरीत उत्तरी अमेरिका के उत्तरी-पूर्वी भाग तथा उत्तरी-पश्चिमी यूरोप के मग्नतट 240 से 400 किलोमीटर तक चौड़े है। न्यूफाउंडलैंड (ग्रांड बैंक) तथा ब्रिटिश द्वीप (डागर बैंक) के चारों ओर विस्तृत मग्नतट पाए जाते हैं। ग्रीनलैंड तथा आइसलैंड के बीच मग्नतट चौड़े हैं। दक्षिणी अटलांटिक महासागर में बाहियाब्लैंक तथा अंटार्कटिका के बीच चौड़े मग्नतट पाए जाते हैं। अटलांटिक महासागर के दक्षिणी भाग में सँकरे मैदान मिलते हैं। इस महासागर के मग्नतटों पर कई सीमांत सागर तथा असंख्य द्वीप पाए जाते हैं।

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल (Continental Slope)

        यह महाद्वीपों का अंतिम किनारा होता है। जिन-जिन क्षेत्रों में सँकरे महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ मग्नढाल तीव्र होता है और जिन क्षेत्रों में मंद ढाल वाले महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ पर महाद्वीपीय मग्नढाल भी मंद होता है। अटलांटिक महासागर में 12.4 प्रतिशत भाग पर मग्नढाल का विस्तार है।

(3) मध्य अटलांटिक कटक (Mid Atlantic Ridge)

           मध्य अटलांटिक कटक उत्तर में आइसलैंड से दक्षिण में बोवेट द्वीप तक ‘S’ अक्षर के आकार में 14400 किलोमीटर की लंबाई में फैला है तथा कहीं भी सागरतल से 4000 मीटर से नीचे नहीं जाता। इस श्रेणी की उपस्थिति ही अटलांटिक के नितल की सबसे बड़ी विशेषता है। भूमध्यरेखा के उत्तर इस कटक/श्रेणी को डॉल्फिन उभार तथा दक्षिण में चैलेंजर उभार कहते हैं। आइसलैंड और स्कॉटलैंड के बीच इस कटक को विविल थामसन कटक कहते हैं। ग्रीनलैंड के दक्षिण में कटक चौड़ा हो जाता है जिसे टेलीग्राफ पठार कहते हैं। 50°N अक्षांश के पास इस कटक की शाखा न्यूफाउंडलैंड उभार के नाम से अलग न्यूफाउंडलैंड तट तक चली जाती है। 40°N अक्षांश के दक्षिण मध्यवर्ती कटक से एक शाखा अजोर उभार के नाम से अजोर तट की ओर जाती है। भूमध्यरेखा पर सियरा लिओन उभार उ०-पू० की ओर तथा पारा उभार उत्तर-पश्चिम की ओर मध्यवर्ती कटक की दो शाखाओं के रूप में चले जाते हैं। 40°S  अक्षांश के पास इस कटक की एक शाखा वालविस कटक अफ्रीका के मग्नतट की ओर तथा दूसरी शाखा रियोग्रांडे उभार के नाम से दक्षिण अमेरिका की ओर मुड़ जाती है।

(4) महासागरीय बेसिन या द्रोणी (Oceanic Basin)

          मध्यवर्ती अटलांटिक कटक द्वारा अटलांटिक महासागर दो विस्तृत बेसिनों में विभक्त है जिनमें अनेक छोटी-छोटी बेसिनें पायी जाती हैं। इनमें प्रमुख बेसिन निम्नलिखित है:-

(i) लेब्राडोर बेसिन- यह उत्तर में ग्रीनलैंड तथा दक्षिण में न्यूफाउंडलैंड के मध्य 4000 मीटर की गहराई तक फैली है।

(ii) उतरी अमेरिका बेसिन- यह उत्तरी अटलांटिक महासागर की सबसे बड़ी बेसिन है। जिसका विस्तार 12° से 40° उत्तरी अक्षांशों के मध्य उत्तरी अमेरिका के तट से 5000 मीटर की गहराई तक विस्तृत है।

(iii) ब्राजील बेसिन- यह दक्षिणी अटलांटिक महासागर में भूमध्य रेखा से 30° दक्षिणी अक्षांश तथा दक्षिणी अमेरिका के तट एवं पारा उभार के मध्य स्थित है।

(iv) स्पेनिश बेसिन- यह मध्य अटलांटिक कटक के पूर्व आईबेरियन के पास 30° से 50° उत्तरी अक्षांश के बीच 5000 मीटर की गहराई तक है।

(v) उत्तरी तथा दक्षिणी कनारी बेसिन- यह दो वृत्ताकार बेसिनों से मिलकर बनी है, जिसका विभाजन उच्च भाग द्वारा होता है।

(vi) केपवर्ड बेसिन- यह मध्य अटलांटिक कटक तथा अफ्रीका के मध्य 10° से 20° उत्तरी अक्षांशों के बीच 5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(vii) गायना बेसिन- यह गायना कटक तथा सियरा लियोन के मध्य उ०-प० से द०-पू० दिशा में 4000-5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(viii) अंगोला बेसिन- अफ्रीका के तट से प्रारम्भ होकर उ०-पू० से द०-प० दिशा में वॉलविस कटक तक 5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(ix) केप बेसिन – 25° से 45° द० अक्षांशों के मध्य अफ्रीका के पश्चिम में स्थित है।

(x) अगुल्हास बेसिन – उत्तमाशा अंतरिप के दक्षिण में 40° से 50° दक्षिणी अक्षांश के मध्य इसका विस्तार अधिक है।

(5) महासागरीय गर्त (Ocean Deeps)

        अटलांटिक महासागर में प्रमुख 19 गर्त पाए जाते हैं। इनमें प्यूर्टोरिको गर्त सबसे गहरा है जिसकी गहराई 4812 फैदम है। प्यूर्टोरिको गर्त उत्तरी अटलांटिक महासागर में कैरेबियन सागर के प्यूर्टोरिको द्वीप के पास स्थित है। अटलांटिक महासागर के तटों के सहारे अभिनव वलन की अनुपस्थिति के कारण गर्त कम पाए जाते हैं। 19 प्रमुख गर्तों में रोमांश गर्त, नरेस गर्त, बाल्डीबिया गर्त, बुचानन, मोसले, चुन, दक्षिणी सैनविच गर्त है।

निष्कर्ष 

       उपर्युक्त तथ्यों के विवरण से स्पष्ट होता है कि अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच में भी अनेक विविधता पूर्ण विशेषताएँ देखने को मिलती है।


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