Category BA Geography All Practical

18. Coastal Topography / समुद्र तटीय स्थलाकृति

18. Coastal Topography

(समुद्र तटीय स्थलाकृति) 

Coastal Topography


             स्थलाकृति के विकास के पांच प्रमुख दूतों में से एक दूत समुद्री तरंग है। समुद्री तरंग के द्वारा स्थलाकृतियों का निर्माण तटीय क्षेत्रों में होता है। इसीलिए समुद्री तरंग से निर्मित स्थलाकृति को तटीय स्थलाकृति कहते हैं। समुद्री तरंग के द्वारा अपरदित एवं निक्षेपित दोनों प्रकार के स्थलाकृति का निर्माण होता है। समुद्री तरंग प्रायः ऊपरी भागों का अपरदन करती है जबकि निचली भागों में निक्षेपण का कार्य करती है। समुद्री तरंग अपरदन का कार्य मुख्यतः 5 प्रक्रियाओं से करती है। जैसे-
(1) संक्षारण
(2) अपघर्षण
(3) सन्निघर्षण
(4) जल गतिक दबाब
(5) टूटते हुए लहरों के दवाब द्वारा इत्यादि।
                 
                तटीय भागों में अपरदन एवं निक्षेपण का कार्य कई कारकों पर निर्भर करता है। जैसे-
(i) तटीय भाग में प्रहर करने वाले तरंगों की आकार एवं उसमें व्याप्त ऊर्जा की मात्रा पर
(ii) तटीय प्रदेश की ढाल पर
(iii) तट रेखा की ऊँचाई पर
(iv) तटीय प्रदेशों की चट्टानों की संरचना पर
(v) तटीय प्रदेश में जल की गहराई पर
(vi) कहीं-कहीं तटीय क्षेत्रों में कई जीव-जंतु छिद्र बनाकर निवास करते हैं। ऐसी जीव तटीय क्षेत्रों में अपरदन के लिए अनुकूल परिस्थिति का निर्माण करते हैं।
               समुद्री तरंगों के द्वारा तटीय क्षेत्रों में दो प्रकार की स्थलाकृति विकसित होते हैं-
(A)अपरदनात्मक स्थलाकृति और
(B) निक्षेपात्मक स्थलाकृति
(A)अपरदनात्मक स्थलाकृति 
(1) गल्फ और खाड़ी (Bay)-
   
              तटीय क्षेत्रों में कठोर एवं मुलायम चट्टानों का वैकल्पिक जमाव समुद्री तरंग के सापेक्ष में दो प्रकार से संभव है।
(i) अगर कठोर एवं मुलायम चट्टान वैकल्पिक रूप से समुद्री तरंग के सापेक्ष में समानांतर अवस्थित हो तो समुद्री तरंग मुलायम चट्टानों को अपरदित कर खाड़ी का निर्माण करती है। जैसे- बंगाल की खाड़ी
       
         बंगाल की खाड़ी के पूर्वी भाग में मलाया प्रायद्वीप और पश्चिमी भाग में प्रायद्वीपीय भारत रूपी कठोर चट्टानें अवस्थित है। इन दोनों के बीच अवस्थित मुलायम चट्टानों को हिंद महासागर का जल अपरदित कर बंगाल की खाड़ी का निर्माण किया है। इसे नीचे चित्र में देखा जा सकता है।
(ii) दूसरी परिस्थिति के अनुसार तटीय क्षेत्रों में समुद्री तरंग के सापेक्ष में कठोर एवं मुलायम चट्टानों का जमाव लम्बवत हो तो समुद्री तरंग के प्रहार से पहले कठोर चट्टानों के अपरदन से एक निवेशिकों का विकास होता है निवेश का सेजल मुलायम चट्टानों के क्षेत्र में घोष कर चट्टानों के अपरदन से एक निवेशिका का विकास होता है। निवेशिका से जल मुलायम चट्टानों के क्षेत्र में घुसकर चट्टानों को अपरदित कर देती है और गल्फ का निर्माण करती है। जैसे- परसियन गल्फ। इसे इस चित्र में देखा जा सकता है- 
(2) समुद्री क्लिफ और तरंग घर्षित प्लेटफार्म-
            समुद्री तरंग तटीय भागों में अपने प्रहार के कारण चट्टानों को अपरदित करते रहती है। समुद्री तरंगों का जब तटीय भागों में स्थित खड़ी चट्टानों पर सतत प्रहार चलता रहता है तो उनके अपरदन से एक क्लिपनुमा संरचना का निर्माण होता है जिसे समुद्री क्लिप कहते हैं। जब समुद्री क्लिप का ऊपरी भाग असंतुलित होकर नीचे गिर जाती है तो “वेव कट प्लेटफार्म” का निर्माण करती है। समुद्री क्लिप सतत पीछे की ओर हटने की प्रवृत्ति रखती है जबकि वेव कट प्लेटफार्म सतत विस्तृत होने की प्रवृत्ति रखती है। इसे नीचे के चित्र में देखा जा सकता है-
(3) समुद्री गुफा- 
       जब तटीय भागों में कठोर चट्टानों के बीच-बीच में मुलायम चट्टान भी खड़ी अवस्था में स्थित हो तो समुद्री तरंग मुलायम चट्टानों को अपरदित कर गुफानुमा स्थलाकृति का विकास करती है, जिसे समुद्री गुफा कहते है।
(4) समुद्री मेहराव एवं तटीय स्तंभ- 
         तटीय भागों में चट्टानों काफी दूर तक कहीं-कहीं घुँसे हुए दिखाई देते हैं। अगर समुद्र में घुसे हुए चट्टान के बीच-बीच में मुलायम चट्टान और उसके चारों और कठोर चट्टान स्थित हो तो समुद्री तरंग उस प्रक्षेपित चट्टान के दोनों ओर प्रहार कर अपरदित कर देती है और मेहरावनुमा स्थलाकृति का निर्माण करती है जिसे “समुद्री मेहराव”कहते हैं। 
           जब समुद्री मेहराव का ऊपरी भाग असंतुलित होकर गिर जाता है तो चिमनी के समान कठोर चट्टाने समुद्र में खड़े दिखाई देते हैं जिन्हें समुद्री स्तंभ(Skerries) कहते हैं। इसे चित्र में देखा जा सकता है। 
(B) निक्षेपात्मक स्थलाकृति- 
          जब समुद्री तरंग तटीय क्षेत्रों से टकराकर पीछे की ओर लौटने लगती है तो वह जहाँ एक ओर कमजोर हो जाती है वहीं दूसरी ओर तटीय क्षेत्रों को काटकर लाई जा रही मलवा का निक्षेपण मंद ढाल वाले क्षेत्रों में प्रारंभ कर देती है। चट्टानों के निक्षेपण से तटीय क्षेत्रों में कई स्थलाकृति विकसित होते हैं। जैसे-
(1) स्पीट
(2) बालू रोधिका
(3) लैगून
स्पीट- 
       स्पीट बालू और पत्थर के टुकड़ों से बना बाँधनुमा स्थलाकृति है जो तट के लंबवत स्थित होता है। इसका एक भाग तट से जुड़ा होता है जबकि दूसरा भाग समुद्र की ओर प्रक्षेपित रहता है। अगर इसका आकार सीधा हो तो उसे सामान स्पीट कहते हैं। लेकिन जब समुद्री तरंगों के प्रहार की दिशा में परिवर्तन हो तो उससे टेढ़ी स्पीट का निर्माण होता है जिसे हुक कहते हैं।
         
             जब किसी एक ही स्थान पर सामान्य स्पीट और हुक स्थित मिलते हैं तो उसे संयुक्त या मिश्रित स्पीट कहते हैं।
बालू रोधिका & लैगून- 
         कभी-कभी जलमग्न तटीय भागों में समुद्री तरंगें बालू एवं कंकड़-पत्थर का निक्षेपण तट के समानांतर करती है लेकिन तट से थोड़ा अलग होती है तो वैसे निर्मित स्थलाकृति को बालू रोधिका कहते हैं। बालू रोधिका और तट के बीच के पीछे अवस्थित जलाशय को लैगून कहते हैं। भौगोलिक स्थिति के अनुसार बालू रोधिका तीन प्रकार का हो सकता है। जैसे – 
(i) संयोजक रोधिका- इसमें बालू रोधिका का दोनों किनारा स्थल से जुड़ा होता है। जैसे – केरल के एर्नाकुलम के पास। 
(ii) लुप रोधिका- जब किसी द्वीप के चारों ओर बालू रोधिका का विकास हो तो उसे लूप रोधिका कहते हैं। 
(iii) टोम्बोलो रोधिका- जब बालू रोधिका का एक भाग तट से और दूसरा भा किसी द्वीप से जुड़ा हुआ हो तो उसे टोम्बोलो रोधिका कहते हैं। 
निष्कर्ष-

          इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री तरंगों द्वारा किए गए अपरदन एवं निक्षेपण से तटीय क्षेत्रों में कई विशिष्ट स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।


Read More:

17. Karst Topography / कार्स्ट स्थलाकृति

17. Karst Topography

(कार्स्ट स्थलाकृति)



चुना प्रधान वाले क्षेत्रों को कार्स्ट प्रदेश के नाम से जानते हैं। कार्स्ट प्रदेश शब्द एड्रियाटिक सागर के पूर्वी भाग में स्थित चूना पत्थर युक्त मैदान से लिया गया है। युगोस्लाविया के लोग ही चुना पत्थर (limestone) मैदान को कार्स्ट नाम से संबोधित करते हैं।  

        कार्स्ट प्रदेश में भूमिगत जल (underground water)अपरदन का सबसे प्रमुख दूत (agent) होता है। कार्स्ट प्रदेश में बनने वाले स्थलाकृतियों का सबसे पहले 1911 ई०  में जे.डब्ल्यू. बीड  एवं 1918 ई० में जे. स्वीजिक  ने अध्ययन किया था। कार्स्ट स्थलाकृति का निर्माण उन्हीं प्रदेश में होता है जहाँ निम्नलिखित तीन परिस्थितियाँ रहती है:-

(i) जहाँ विलियन (soluble) करने वाली चुना प्रधान चट्टाने पाई जाती हो।

(ii) चुना प्रधान चट्टानों में संरोध (Joints) का विकास हुआ हो।

(iii) चुना प्रधान चट्टानों के नीचे अपारगम्य चट्टान (Impermeable) पाई जाती हो तथा उसके अंदर पर्याप्त ढाल का विकास हुआ हो।

        कार्स्ट स्थलाकृति में निम्नलिखित अपरदित एवं निक्षेपित स्थलाकृति का निर्माण होता है-

अपरदित स्थलाकृति

(1) लैपिज (Lapies)

(2) विलियन रन्ध्र (Swallow Holes) और घोलरन्द्र (Sink Holes)

(3) डोलाइन (Doline)

(4) युवाला (Uvalas)

(5) पोल्जे (Polje) 

(6) पोनोर (Ponor)

(7) अंधी घाटी (Blind Valley)

(8) पोल्जे (Polje)

(9) कार्स्ट खिड़की (Karst Window)

निक्षेपित स्थलाकृति

(1) स्टैलैक्टाइट (Stalactite)

(2) स्टैलेग्माइट (Stalagmite)

(3) कन्दरा स्तम्भ/ गुफा स्तम्भ (Cave Pillars)

(4) टेरारोसा (Tera Rosa)

अपरदित स्थलाकृति

लैपिज (Lapies):

     लैपिज स्थलाकृति की तुलना यारदांग से की जा सकती है। यह यारदांग के समान उबड़-खाबड़ स्थलाकृति है। लैपीज का विकास उसी चूना पत्थर प्रदेश में होता है जहाँ संरोध का विकास नहीं हो पाता है। संरोध के अभाव में चूना पत्थर जल के साथ घुल कर प्रवाहित हो जाती हैं और धरातल पर उबड़-खाबड़ स्थलाकृति का विकास होता है, जिसे लैपीज कहते हैं।

विलियन रन्ध्र और घोलरन्द्र:   

         जिस चूना प्रधान प्रदेश में संरोध का विकास होता है उन प्रदेशों में संरोध के ऊपरी भाग में चूना पत्थर युक्त चट्टान जल में घुलकर भूमिगत हो जाती है जिससे घोलरन्ध्र (Sink Holes) का निर्माण होता है। घोलरन्द्र का आकार एक कीप के समान होता है। लेकिन जब चुना पत्थर चट्टान का विलियन तेजी से होता है तो घोलरन्ध्र के स्थान पर विलियन रन्ध्र (Swallow Holes) का निर्माण होता है। विलियन रन्ध्र का आकार एक बेलन के समान होता है।

डोलाइन (Doline):

      डोलाइन घोलरन्ध्र का ही विकसित रूप है। इसका ऊपरी व्यास 30 फीट से 40 फीट तक होता है। इसकी गहराई 6 से 75 फीट तक होता है। डोलाइन एक अस्थायी झील के समान होता है। कुछ समय के बाद इसके जल संरोध के सहारे भूमिगत हो जाते हैं और झील सूख जाती है। युगोस्लाविया से अलग हुए सर्बिया राज्य में डोलाइन के अनेक उदाहरण मिलते हैं।

 

पोनोर (Ponor):

        डोलाइन के नीचे स्थित संरोध के सहारे जब जल भूमिगत होती है तो संरोध के किनारे स्थित चूना पत्थर का विलियन हो जाता है जिसके कारण संरोध काफी चौड़ा हो जाता है। इसी चौड़े संरोध वाले स्थलाकृति को पोनोर कहते हैं। अर्थात् पोनोर एक प्रकार का संरचनात्मक पाइप है, जो डोलाइन एवं उपसतही (Subsurface Cave) के मध्य विकसित होता है। इसका विकास भी संरोध के सहारे होता है। इसे गुफा का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।

 

युवाला (Uvalas):

    डोलाइन भी क्रमशः बड़ा होता जाता है। जब दो डोलाइन आसपास होते हैं तो बढ़ते-बढ़ते उनके बीच की दीवार टूट कर गिर जाती है और वे आपस में मिल जाते हैं। इससे एक वृहद् गड्ढे का निर्माण होता है, जो युवाला (Uvalas) कहलाता है।

      अर्थात् जब दो या दो से अधिक डोलाइन आपस में मिल जाते हैं तो एक विस्तृत गर्तनुमा स्थलाकृति का निर्माण होता है जिसे युवाला कहते हैं। युवाला का व्यास कई किलोमीटर तक हो सकता है। जल से भर जाने पर यह एक वृहद् झील के रूप में नजर आता है।

 
पोल्जे (Polje)

      अंधी गुफा के ऊपरी छत में घोलरन्ध्र के सहारे विकसित संरोध विलयन की क्रिया से चौड़ा होकर कार्स्ट खिड़की का निर्माण करती है। जब अंधी घाटी का ऊपरी छत धँस जाता है तो धँसान से निर्मित गर्त को पोल्जे कहते हैं।

      पोनोर के सहारे जब विलियन की क्रिया अति तीव्र हो जाती है तो धरातल और अपारगम्य चट्टान के बीच एक चौड़ी गुफानुमा स्थलाकृति का विकास होता है जिसे अंधी घाटी या अंधी गुफा कहते हैं। दूसरे शब्दों में, पोनोर का ही अति विस्तृत भाग अंधी घाटी या अंधी गुफा कहलाता है।

कार्स्ट खिड़की (Karst Window):

     गुफा स्तंभ के अभाव में जब कभी गुफा की छत का कुछ भाग ध्वस्त होकर गिर जाता है तो गुफा की छत में वृहद् छिद्र का निर्माण हो जाता है, जो ‘कार्ट खिड़की’ के नाम से जाना जाता है। इसे खिड़की इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसके द्वारा घरातल के ऊपर से भूमिगत जल-प्रवाह एवं अन्य उपसतही स्थल रूपों को देखा जा सकता है।

निक्षेपित स्थलाकृति

(1) स्टैलैक्टाइट (Stalactite)

(2) स्टैलेग्माइट (Stalagmite)

(3) कन्दरा स्तम्भ/ गुफा स्तम्भ (Cave Pillars)

(4) टेरारोसा (Tera Rosa)

      चुना प्रधान प्रदेशों में निक्षेपण की प्रक्रिया दो स्थानों पर संभव है:-

(i)  धरातल के ऊपर और

(ii) गुफा के अंदर।

     धरातल के ऊपरी भाग में स्थित चूना पत्थर युक्त चट्टानें घुलकर किसी निम्न प्रदेशों में निक्षेपित हो जाती है तो चूना पत्थर युक्त मिट्टी के मैदान का निर्माण करती है। चुना पत्थर युक्त मिट्टी को ही टेरारोसा कहते हैं और निर्मित मैदान को टेरारोसा का मैदान कहते हैं।

         ब्राजील के दक्षिणी पूर्वी भाग में टेरारोसा मैदान का विकास हुआ है। इसी मैदान में वहाँ बड़े पैमाने पर कहवा की खेती की जाती है।

     गुफा के अंदर निम्न प्रकार के निक्षेपित स्थलाकृति विकसित होते हैं।

(i)  स्टैलेक्टाइट

(ii) स्टैलेगमाइट

(iii) कन्दरास्तम्भ

(iv) ट्रेवर्टाइन (Travertine)

         स्टैलेगटाइट का निर्माण गुफा के छत के सहारे होता है जबकि स्टैलेगमाइट का निर्माण गुफा के निचली सतह पर होता है।

         जब स्टैलेक्टाइट और स्टैलेगमाइट आपस में मिल जाते हैं तो उससे स्तंभ का निर्माण होता है। जब अंधी गुफा के ऊपरी क्षेत्र में स्थित संरोध के सहारे जल भूमिगत होती है तो चूना पत्थर युक्त जल गुफा के सतह पर बूंद-बूंद टपकने की प्रवृत्ति रखती है। धरातल पर चुनायुक्त जल के गिरते ही जल वाष्पीकृत हो जाता है और चुना का निक्षेपण हो जाता है तो उससे निर्मत गुम्बदाकार स्थलाकृति को स्टैलेगमाइट कहते हैं।

     जब गुफा (कन्दरा) में गुफा के छत के सहारे निर्मित संरोध के सहारे भूमिगत होने वाले जल का रफ्तार काफी धीमी हो तो चुना का निक्षेपण मधुमक्खी के छत के समान गुफा के छत के सहारे हो जाता है जिसे स्टैलेगटाइट करते हैं।

  Karst Topography

     कालांतर में जब स्टैलेक्टाइट और स्टैलेगमाइट मिल जाते हैं तो उसे कन्दरा स्तम्भ करते हैं। जब गुफा के अन्दर चूना पत्थर प्रधान वाले क्षेत्रों में लंबे समय तक अपरदन एवं निक्षेपण का कार्य  चलता रहता है तो अंत में “अपरदन सह निक्षेपित मैदान” मैदान का निर्माण होता है जिसे कार्स्ट मैदान के नाम से जानते हैं। इसे समप्राय मैदान से तुलना की जा सकती है।

ट्रेवर्टाइन (Travertine):

     गुफा की सतह पर निक्षेपित चूना-प्रधान मलबों कोट्रेवर्टाइनकहते हैं। ये प्रायः सफेद, हल्का पीला या पीला-भूरा होते हैं। चूना या कार्बोनेट खनिज की प्रधानता के कारण ये मुलायम एवं पारगम्य होते हैं। बाद में, इन्हीं निक्षेपित मलबों द्वारा कार्स्ट मैदान का निर्माण होता है।

        समप्राय मैदान के समान ही यहाँ भी कठोर चट्टान के टीले मिलते हैं जिसे यूरोप के लोग हम्स (Hums), क्यूबा के लोग मेंगॉट या Hay Stack तक कहते हैं।

निष्कर्ष:

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि चुना पत्थर वाले प्रदेश में भूमिगत जल से अनेक प्रकार के अपरादित एवं निक्षेपित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

नोट: सर्वप्रथम अमेरिकी भूगर्भवेत्ता जे.डब्ल्यू. बीडे (J.W. Beede) ने सन् 1911 ई. में “कार्स्ट प्रदेश में अपरदन चक्र की संकल्पना” प्रस्तुत की थी। बाद में सन् 1918 ई. में, साइबेरियाई भूगोलवेत्ता जोवान स्वीजिक (Jovan Cvijic) ने यूगोस्लाविया के कार्स्ट क्षेत्र के अध्ययन के आधार पर “कार्स्ट चक्र की संकल्पना” को व्यवस्थित ढंग से सामने रखा।

बिहार के रोहतास पठार पर पायी जाने वाली गुप्त-धाम कंदरा भी अंतर्भौम गुफा का एक प्रमुख उदाहरण है।



Read More:

16. Arid Topography / पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति/शुष्क स्थलाकृति

16. Arid Topography

(पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति/शुष्क स्थलाकृति)



पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति/शुष्क स्थलाकृति⇒Arid Topography             वैसे भौगोलिक क्षेत्र जहाँ वार्षिक वर्षा 50 सेमी० से कम होती है, उसे शुष्क प्रदेश या मरुस्थलीय प्रदेश कहते हैं। जैसे- सहारा, कालाहारी, पश्चिम आस्ट्रेलिया, मध्य एशिया, गोबी, थार, सोनोरान, अटाकामा, पेटागोनिया मरुस्थल इत्यादि।

        डेविस के अनुसार किसी भी भौगोलिक प्रदेश में दिखाई देने वाले विशिष्ट स्थलाकृतियों के समूह को भूदृश्य / भूआकृति या भ्वाकृतिक कहते हैं। भ्वाकृतियों या स्थलाकृतियों के विकास पर प्रक्रम का प्रभाव पड़ता है। प्रक्रम का तात्पर्य अपरदन के दूतों से है। शुष्क प्रदेश में अपरदन के दो प्रमुख प्रक्रम सक्रिय रहते हैं। जैसे:

(1) शुष्क वायु

(2) बहता हुआ जल (आकस्मिक वर्षा)

       ये दोनों प्रक्रम शुष्क प्रदेशों में अपरदन, परिवहन एवं निक्षेपण का कार्य करते रहते हैं।

अपरदन – शुष्क वायु अपरदन की क्रिया तीन प्रकार से करती है-

(i) अपवाहन (Deflation)- अपवाहन क्रिया में वायु चट्टान-चूर्ण उड़ाकर अपरदन का कार्य करती है।

(ii) अपघर्षण(Abrasion)- तीव्र वेग से वायु के साथ उड़ते हुए रेत व धूलकण मार्गवर्ती शैलों को रगड़ते एवं घिसते हैं।

(iii) सन्निघर्षण (Attrition)- वायु के साथ उड़ते हुए धूल व रेत कण परस्पर टकराकर चूर-चूर हो जाते हैं।

    शुष्क वायु अपरदन को प्रभावित करने वाले कारक:-

(i) वायु की गति

(ii) वायु में रेत व धूलकणों की मात्रा

(iii) शैलों की संरचना

(iv) जलवायु

परिवहन- जब वायु अपरदन किए हुए चट्टान-चूर्ण को अपने साथ लेकर प्रवाहित होती है तो उसे परिवहन कहते हैं।

निक्षेपण- जब चट्टान-चूर्ण के साथ उड़ते हुए वायु के मार्ग में कोई अवरोधक  मिलता है तो उसकी वहन क्षमता कम जाती है और चट्टान-चूर्ण का जमा होने लगता है, जिसे निक्षेपण कहते हैं।

शुष्क वायु द्वारा निर्मित अपरदित स्थलाकृति

1. वात गर्त/अपवाहन बेसिन

2. ज्यूगेन

3. यारडांग

4. गारा

5. छत्रक शिला

6. भूस्तंभ

7. मरुस्थलीय खिड़की

8. मरुस्थलीय पूल या मेहराव

9. ड्राई कान्टर

10. मरुस्थलीय बेसिन/अपवाह बेसिन

11. पेडीप्लेन एवं इंसेलवर्ग

निक्षेपित स्थलाकृति

1. बालुका स्तूप

(i) बरखान

(ii) सीफ

2. उर्मिल मैदान

3. लोएस मैदान

आकस्मिक व भारी वर्षा से निर्मित स्थलाकृति

1. जलोढ़ पंख

2. जलोढ़ शंकु

3. बाजदा

4. बालसन

5. प्लाया

6. सेलीनॉस

7. पेडीमेंट/पेडीप्लेन

8.अंत: प्रवाही नदी

अपरदित स्थलाकृति

1. ज्यूगेन:-

        जब शुष्क प्रदेश में कठोर एवं मुलायम चट्टान क्षैतिज एवं वैकल्पिक रूप में पायी जाती है। यदि सतह पर कठोर चट्टान हो तो तापीय प्रभाव से उसमें दरारें पड़ जाती है। उन दरारों के माध्यम से वायु प्रविष्ट कर मुलायम चट्टानों के अपरदन प्रारम्भ कर देती है, जिससे दवातनुमा स्थलाकृति बनती है, उसे ज्यूगेन कहते है।

जैसे – USA के कोलरेडो, दक्षिण कैलिफोर्निया क्षेत्र में

2. यारडांग:- 
        कठोर एवं मुलायम चट्टान लम्बवत एवं वैकल्पिक रूप में हो तो शुष्क वायु चट्टान के ऊपरी भाग मुलायम चट्टानों का अपघर्षण के माध्यम से अपरदित कर देती है और कठोर चट्टान यथावत रह जाता है, इसे यारडांग कहते है।
3. गारा एवं छत्रक शिला:- 
        मरुस्थलीय भागों में यदि कठोर शैल के रूप में ऊपरी आवरण के नीचे कोमल शैल लंबवत रूप में मिलती है तो इस कारण पवन द्वारा निचले भाग में अत्यधिक अपघर्षण द्वारा आधार कटने लगता है जबकि उसका ऊपरी भाग अप्रभावित रहता है। इस आकृति को गारा एवं छत्रक शिला कहा जाता है। 
* यदि पवन एक ही दिशा से चलती है तो कटाव एक ही दिशा में होती है- गारा 
* पवन कई दिशाओं में- छत्रक शिला
4. भूस्तम्भ:- 
         शुष्क प्रदेशों में जहाँ पर असंगठित एवं कोमल शैल के ऊपर कठोर तथा प्रतिरोधी शैल का आवरण होता है, वहाँ कठोर शैलों के नीचे कोमल शैलों का अपरदन नहीं हो पाता है परंतु समीप के कोमल चट्टानों का अपरदन हो जाता है। जैसे- कालाहारी एवं कोलरैडो
5. मरुस्थलीय खिड़की तथा मरुस्थलीय मेहराव/पुल:- 
    मरुस्थलीय क्षेत्रों में कांग्लोमरेट चट्टानों की प्रधानता होती है। इन चट्टानों की सामान्य विशेषता है कि कठोर भाग के मध्य में मुलायम चट्टानें भी मिलती है। मुलायम चट्टानें अपरदित होने के बाद खिड़की जैसी आकृति का निर्माण होता है जिसे मरुस्थलीय खिड़की कहते है।  जैसे- पेंटागोनिया मरुस्थल
 
      मरुस्थलीय खिड़की के विस्तृत रूप को ही मरुस्थलीय मेहराव/पुल कहा जाता है
6. अपवाह बेसिन/वात गर्त:- 
        सतह के ऊपर असंगठित तथा कोमल शैलों  के ढीले कणों को उड़ा ले जाती है जिस कारण छोटे-छोटे गर्तों का निर्माण होता है, जिसे अपवाह बेसिन कहते हैं। जैसे- सहारा, कालाहारी, यूएसए के पश्चिमी शुष्क प्रदेश
7. पेडीप्लेन एवं इंसेलवर्ग:- इसके निर्माण में जलीय प्रक्रम का अधिक योगदान होता है। 
* एल.सी. किंग- मरुस्थलीय प्रदेश के अंतिम अवस्था में अपरदन एवं निक्षेपण के परिणामस्वरूप लगभग समतल मैदान को- पेडिप्लेन 
* जगह-जगह मिलने वाले कठोर चट्टानों (लम्बवत) को- इंसलबर्ग कहते है 
8. ड्राइकांटर:- पथरीले मरुस्थल में सतह पर पड़े शीलाखंडों पर पवन के अपरदन द्वारा शिलाखंड चतुष्फलक आकृति का बन जाता है तो उसे ड्राइकांटर कहते हैं।
निक्षेपित स्थलाकृति 
1.बालुका स्तुप:- 
        जब चलती हुई शुष्क वायु के मार्ग में कोई अवरोधक मिल जाता है तो इन्हीं अवरोधकों  से टकराकर शुष्क वायु धूलकण निक्षेपण करने की प्रवृत्ति रखती है जिससे बालुका स्तूप का निर्माण होता है। वेगनौल्ड महोदय ने बालुका स्तूप को दो भागों में बाँटा है-
* अनुप्रस्त बालुका स्तूप- बरखान
* अनुधैर्य- सीफ
2. बरखान:- इसमें वायु का निक्षेपण अवरोधक के दोनों किनारों पर होता है जिसके कारण अर्धचंद्राकार आकृति बन जाती है, जिसे बरखान कहा जाता है।
3. सीफ:- जब बरखान का एक बाँह की लंबाई बढ़ जाती है तो देखने पर हॉकी स्टिक के समान लगता है जिसे सीफ कहते हैं।
4. उर्मिल मैदान:- जब बालू एवं धूलकणों का निक्षेपण तरंगित मैदान के रूप में होता है तो उसे उर्मिल मैदान कहते है
5. लोएस का मैदान:- आर्द्रता ग्रहण करने के कारण शुष्क वायु वहन क्षमता खो देती है। जैसे- चीन के मंचूरियन प्रांत- टकलामकान तथा गोबी  मरुस्थल के मैदान बालू से निर्मित है
 
आकस्मिक या भारी वर्षा से निर्मित स्थलाकृति
1. बाजदा:- प्लाया और पर्वतीय अग्रभाग के मध्य मंद ढाल वाले मैदान को बाजदा कहते है। इसका निर्माण मलवा के निक्षेपण से होता है
2. बालसन:- रेगिस्तानी भागों में पर्वतों से गिरी बेसिन को वालसन कहते हैं।
3. प्लाया:- बालसन के नीचे गर्त में महीन बालू कण, घुलनशील चट्टानों और जलयुक्त अस्थायी झील को प्लाया कहते हैं।
4. सेलिनॉस:- जब प्लाया झील का जल वाष्पीकृत होकर उड़ जाता है तो प्लाया झील बालसन का हिस्सा बन जाता है।
* कभी-कभी प्लाया झील सूखने के बाद नमक की परत दिखाई देती है वैसी परिस्थिति में उसे सेलिनॉस कहते हैं।
5. I आकार की घाटी:- USA के कोलरेडो पठार पर- I आकार की घाटी – ग्रैंड कैनियन
6. पेडीमेंट/पेडीप्लेन:-
       जब किसी उत्थित भूखंड पर आकस्मिक वर्षा होती है तो उत्थित भूखंड के ढाल पर स्थित ऋतुक्षरित चट्टानें  बहते हुए जल के साथ नीचे गिर जाती है। फलत: उत्थित भूभाग का ऊपरी भाग पूर्णत: नग्न हो जाता है जिसे पेडीमेंट/ पेडीप्लेन कहा जाता है।
7. अंत: प्रवाही नदी:- 
         मरुस्थलीय प्रदेशों में जब तीव्र वर्षा होती है तो छोटी-छोटी सरिताओं का विकास होता है लेकिन यह नदियाँ समुद्र से जाकर नहीं मिलती है। इसीलिए इसे अंत: प्रवाही नदी कहते है

निष्कर्ष:-   उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि मरुस्थलीय अथवा शुष्क प्रदेशों में शुष्क वायु, आकस्मिक भारी वर्षा के द्वारा कई विशिष्ट अपरदित एवं निक्षेपित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

विश्व के मरुस्थलीय क्षेत्र



Read More:

  15. GLACIAL PROCESS AND LANDFORMS / हिमानी प्रक्रम और स्थलरुप

GLACIAL PROCESS AND LANDFORMS 

(हिमानी प्रक्रम और स्थलरुप)


विश्व में हिमानी के दो प्रमुख क्षेत्र है- 

(1) ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र (High mountainous regions)      

(2) ध्रुवीय क्षेत्र (Polar regions)

        नदी के समान प्रवाहित हो रहे हिम को हिमानी या हिमनद कहते है। नदियों की तरह हिमानी भी तीन प्रकार के कार्यों में संलग्न रहती है। 

(1) अपरदन (Erosion)

(2) परिवहन (Transportaion)

(3) निक्षेपण (Deposion)

     हिमानी अपरदन का कार्य कई तरह से सम्पादित करती है। जैसे-

(1) उत्पाटन (Plucking):- 

      जब हिमानी अपने मार्ग से गुरुत्वाकर्षण बल या हिमानी दबाव के कारण प्रवाहित होती है तो वैसी परिस्थिति में अगर कोई कठोर चट्टान मिल जाता है तो उसे हिमानी उखाड़कर फेंक डालती है, उसे उत्पाटन (Plucking) कहते है।

(2) तुषार अपरदन (Frost Erosion):- 

           जब ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में या ध्रुवीय क्षेत्रों में स्थित चट्टानों के संधि या दरारों में जल जमकर हिम के रूप में बदल जाता है तो हिम के आयतन बढ़ने से चट्टानों के ऊपर दबाव बल कार्य करने लगता है फलतः चट्टानें कमजोर होकर टूटने लगती है। इसे ही तुषार अपरदन (Frost Erosion) कहते है।

(3) अपघर्षण (Abrasion):-  

       हिमनद में छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते है। ये कंकड़ पत्थर ही अपरदन के यंत्र होते है। इन्हीं कंकड़-पत्थर की सहायता से हिमानी तलीय एवं क्षैतिज अपरदन का कार्य करती है।

(4) प्रसर्पण (Sweeping):-  

     वास्तव में नदी जल और हिमानी के गति में अंतर होता है। नदी जल में महीन तथा बारीक धूलकण नदी जल में लटककर और बड़े चट्टानी कण तली में लुढ़कते हुए चलते है। जबकि  हिमानी में सभी आकार के चट्टान एक ही साथ आगे बढ़ते है। जब हिम और सभी आकार के चट्टानी कण किसी ढ़ाल के सहारे एक ही साथ फिसलते हुए आगे बढ़ते है तो उसे प्रसर्पण कहते है।

(5) जलीय अपरदन (Water erosion):-

         हिमानी हिमरेखा (Snow line) के बाद पिघलना प्रारंभ हो जाती है जिसे अधोहिमानी (Subglacial) कहते है। अधोहिमानी में जहां एक ओर हिम के द्वारा अपरदन का कार्य होता है वहीं बहता हुआ जल भी अपरदन कार्यों में संलग्न रहती है। 

        जब हिमानी ढाल एवं गुरुत्वाकर्षण के सहारे आगे बढ़ती है तो उसमें मौजूद चट्टानी कणों को हिमोढ़ (Moraine) कहते है। हिमानी के द्वारा हिमोढ़ को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पर ले जाना, परिवहन कहलाता है। पुनः जब हिमानी पिघलने लगता है तो उसकी वहन क्षमता समाप्त हो जाती है जिसके फलस्वरूप हिमोढ़ का बड़े क्षेत्रों पर जमाव हो जाता है, जिसे निक्षेपण कहते है।

        हिमानी मुख्यतः तीन प्रकार के होते है:-

(1) पर्वतीय हिमानी/अल्पाइन हिमानी (Mountain Glaciers)

(2) महाद्वीपीय हिमानी (Continental Glaciers)

(3) पर्वतपदीय हिमानी (Piedmont Glaciers)

     पर्वतीय हिमानी का उदाहरण हिमालय पर्वत, आल्पस पर्वत, रॉकी एवं एंडिज पर्वत के ऊपरी भाग में मिलती है। 

(1) पर्वतीय हिमानी में गुरुत्वाकर्षण बल के कारण बर्फ ऊपर से नीचे की ओर आने की प्रवृति रखती है। 

(2) महाद्वीपीय हिमानी का प्रमाण ध्रुवीय क्षेत्रों में देखने को मिलता है। महाद्वीपीय हिमानी में हिम का प्रवाह बहुत ही मन्द होता है।

(3) पर्वतपदीय हिमानी का प्रमाण पेंटागोनिया के पठार पर मिलता है क्योंकि एंडिज पर्वत के पदीय भाग में स्थित होने के कारण इसे पर्वत पदीय हिमानी कहते है।

हिमानी के द्वारा निर्मित स्थलाकृति/Glacial Landforms

      स्थलाकृति के विकास में पर्वतीय & महाद्वीपीय हिमानी का मुख्य योगदान होता है।

      पर्वतीय हिमानी के द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृतियों का विकास होता है :-

पर्वतीय हिमानी से निर्मित स्थलाकृति/ Glacial Landforms Formed by Mountain Glaciers

(1) U-आकार की घाटी (U-Shaped Valley) & लटकती हुई घाटी (Hanging Valley)

(2) हिमगहवर/सर्क (Cirque)

(3) एरेट (Arete)

(4) कॉल (Col)

(5) पिरामिडल हॉर्न (Pyramidal Horn)

(6) अनुव्रती सोपान (Follow-up steps)

महाद्वीपीय हिमानी से निर्मित स्थलाकृति/ Landforms Formed by Continental Glaciers

(1) नुनाटक (Nunatak)

(2) रॉशमुतौनी (Roche Moutonnee)

(3) रॉक बेसिन (Rock Basins)

(4) टॉर्न (Tarn)

(5) अंगुलीनुमा झील (Finger Lake)

⇒ U-आकार की घाटी & लटकती हुई घाटी

        यह पर्वतीय हिमानी के द्वारा निर्मित एक अपरदित स्थलाकृति है। इसका अनुप्रस्थ काट U-आकार का होता है। जब पर्वतीय हिमानी ऊपरी भाग से नीचे की ओर खिसकती है तो हिम टुकड़ों के द्वारा तली पर एक समान अपरदन की क्रिया होती है। इसके अलावे हिम के द्वारा अपघर्षण का भी कार्य होता है। जिसके परिणामस्वरूप U-आकार की घाटी (U-Shaped Valley) विकसित होता है।

        जब कोई मुख्य हिमानी में सहायक हिमानी मिलती है तो उसमें भी छोटी U-आकार की घाटी विकसित होती है। लेकिन संगम स्थल पर मुख्य हिमानी की तुलना में सहायक हिमानी की तली ऊपरी भाग में लटका हुआ दिखाई देता है जिसके कारण उसे लटकती हुई घाटी कहते है।

⇒ हिमगहवर/सर्क/कोरी

        यह पर्वतीय हिमानी द्वारा निर्मित अपरदित स्थलाकृति है। इसका आकार  एक आरामकुर्सी के समान होता है। इसका निर्माण पर्वतपदीय क्षेत्र में होता है। क्योंकि जब ऊंचाई वाले क्षेत्रों से बर्फ (हिम) नीचे गिरती है तो हिम दबाव के कारण भूपटल का कुछ भाग अपरदित हो जाता है और अपरदन से आरामकुर्सी के समान गर्त का निर्माण होता है। इसी गर्त को हिमगहवर (Cirque) कहते है।

⇒ एरेट,कॉल तथा पिरामिडल हॉर्न

       जब किसी पर्वत के दोनों ढालों पर श्रृंखलाबद्ध अनेक सर्क का विकास हो जाय/ साथ ही कालांतर में दोनों ढालों पर विकसित सर्क आपस में मिल जाये तो ऐसी स्थिति में पहाड़ी के आर-पार अनुप्रस्थ घाटी का निर्माण हो जाता है। इन्हीं अनुप्रस्थ घाटियों को कॉल (Col) कहते है। इसकी तुलना दर्रा से भी की जाती है। दर्रा एवं कॉल में एक सामान्य अंतर यह है कि कॉल का निर्माण हिमानी अपरदन से होता है जबकि दर्रा का निर्माण नदी के अपरदन से होता है।

         दो कॉल के बीच स्थित कठोर चट्टान पिरामिड के समान दिखाई देते है जिन्हें पिरामिडल हॉर्न (Pyramidal Horn) कहा जाता है। जब कोई लम्बी पर्वतीय श्रृंखला के कटक पर स्थित मुलायम चट्टानों को हिमानी के द्वारा अपरदित कर दिया जाता है तो कठोर  चट्टानें एक श्रृंखला में या कंघी के समान दिखाई देते है। ऐसे ही कंघीनुमा पर्वतीय कटक को एरेट/अरेट (Arete) कहते है।

◆ स्वीटजरलैंड में मैटरहॉर्न पर्वत पर अरेट, पिरामिडल हॉर्न एवं कॉल का प्रमाण मिलता है।

कुमायूँ हिमालय में स्थित माना एवं नीति कॉल का उदाहरण है।

अनुवर्ती सोपान (Follow-up steps)

        यह एक सीढ़ीनुमा स्थलाकृति है। यह पर्वतीय हिमानी की लम्बवत घाटी है। अर्थात पर्वतीय हिमानी (स्रोत) से समुद्र तट (मुहाना) तक निर्मित हिमानी के अनुवर्ती घाटी को अनुवर्ती सोपान / हिमसोपान (Glacial Stairway) कहते है। अनुवर्ती सोपान की उत्पति के सम्बंध में तीन प्रमुख विचार प्रकट किए गए है।

प्रथम विचारजब हिमानी के मार्ग में कठोर एवं लम्बवत चट्टानें मिल जाती है तो हिमानी उसे अपरदन नहीं कर पाता है जिसके कारण सीढ़ीनुमा स्थलाकृति का विकास होता है।

दूसरा विचारधारा- जब कोई मुख्य हिमानी में आकर सहायक हिमानी मिलती है तो उस परिस्थित में हिम का मात्रा बढ़ जाने के कारण संगम स्थल से आगे तलीय अपरदन और बढ़ जाता है। पुनः जब एक और सहायक हिमानी मिलती है तो पुनः अपरदन में होने वाले वृद्धि से सोपानीकृत अनुवर्ती घाटी का विकास होता है।

तीसरे विचार- ऐसी सोपानीकृत अनुवर्ती घाटी का विकास भूतल उत्थान एवं धंसान से भी हो सकता है।

      अनुवर्ती सोपान का उदाहरण नार्वे, स्वीडन, आइसलैंड, ग्रीनलैण्ड में देखने को मिलता है।

महाद्वीपीय हिमानी से निर्मित स्थलाकृति/ Landforms Formed by Continental Glaciers

          महाद्वीपीय हिमानी में पर्वतीय हिमानी के समान घाटी का निर्माण नहीं होता है बल्कि विस्तृत क्षेत्र के हिम रेंगते हुए धीमी गति से गुरुत्वाकर्षण ढाल के अनुरूप आगे बढ़ते है। ऐसी स्थिति में महाद्वीपीय हिमानी के द्वारा कई स्थलाकृति का विकास होता है। 

       जब महाद्वीपीय हिमानी के मार्ग में कोई कठोर चट्टान या अवरोधक मिल जाता है तो हिमानी अपना मार्ग न बदलकर उसी कठोर चट्टान के ऊपर से पार कर जाता है जिसके कारण महाद्वीपीय हिमानी के बीच-बीच में उभरा हुआ भाग दिखाई देता है जिसे नुनाटक कहते है।

रॉशमुतौनी / भेड़शैलपीठ / मेशशिलापीठ

           यदि किसी महाद्वीपीय हिमानी के मध्य कठोर चट्टान की पहाड़ी मिल जाती है तो हिमनी अपना मार्ग न बदलकर उस कठोर चट्टान के ऊपर चढ़कर पार करने की प्रवृति रखती है जिधर से हिमानी चढ़ने की प्रवृति रखती है उधर वाला भाग अपघर्षण से चिकना हो जाता है। लेकिन पहाड़ी के शीर्ष पर पहुँचने के बाद हिमानी दूसरे ढाल पर गुरुत्वाकर्षण के कारण हिम टूटकर नीचे गिरती है और पहाड़ी के दूसरी ढाल पर उबड़-खाबड़ सतह के निर्माण करती है। जिसके कारण भेड़ के समान स्थलाकृति का विकास होता है जिसे रौशमुतौनी/भेड़शैलपीठ (Roche Moutonnee) कहते है।

रॉक बेसिन/ टॉर्न तथा अंगुलीनुमा झील

             यदि हिमनी के सतह पर कोई छोटी कठोर एवं उत्थित चट्टान मिलती है तो उसे हिमानी उखाड़ फेंकती है। चट्टानों के उखड़ जाने से जिस गर्त का निर्माण होता है उसे रॉक बेसिन (Rock Basins) कहते है। रॉक बेसिन के निर्माण होते ही उसमें बर्फ भर जाता है और हिमानी के प्रवाह की दिशा में उसका अग्र भाग अपरदित होकर टॉर्न का निर्माण करती है। जब टॉर्न का लम्बी अवधि तक अपरदन होता है तो अंगुलीनुमा झील का निर्माण होता है ऐसी स्थलाकृति का उदाहरण फिनलैण्ड और कनाडा में बड़े पैमाने पर देखने को मिलती है।

फियोर्ड (Fiords)

         यह भी हिमानी के द्वारा निर्मित एक अपरदित स्थलाकृति है। इसका निर्माण महाद्वीपीय एवं पर्वतीय दोनों हिमानी से होता है। फियोर्ड का निर्माण प्रायः समुद्रतलीय क्षेत्रों में होता है क्योंकि जब पर्वतीय या महाद्वीपीय हिमानी समुद्र में उतरती है तो किनारों पर अपरदन का कार्य अधिक होता है और ज्यों-ज्यों किनारे से समुद्र की ओर जाते है त्यों-त्यों तलीय अपरदन का कार्य कम होता है। फलतः फियोर्ड में किनारे में अधिक गहरा और समुद्र की ओर जाने पर उसकी गहराई घटते जाती है। ऐसी स्थलाकृति का प्रमाण नार्वे तट पर अधिक देखने को मिलता है। 

⇒ नार्वे के तट को फियोर्ड तट के नाम से जानते है।

⇒ विश्व के सबसे लंबा फियोर्ड सोगनी फियोर्ड है।

हिमानी के द्वारा निर्मित निक्षेपित स्थलाकृति/ Depositional Landforms Created by Glaciers

         अपरदन के अन्य दूत के समान हिमानी भी कई प्रकार के निक्षेपित स्थलाकृति का निर्माण करते है। जब हिमानी आगे की ओर बढ़ती है तो वह भी पर्याप्त मात्रा में चट्टान, धूलकण, गाद, बोल्डर क्ले इत्यादि को लेकर आगे बढ़ती है। हिमानी के द्वारा ले जाया जाने वाले मलवों के समूह को हिमोढ़ कहते है। हिमोढ़ के निक्षेपण से दो प्रकार के स्थलाकृति विकसित होती है :-

1. अस्तरित  स्थलाकृति (Unstratified Topography)

2. स्तरित स्थलाकृति (Stratified Topography)

             हिमनी अपरदन से बोल्डर क्ले का विकास बड़े पैमाने पर होता है जिनका स्तरीकरण संभव नहीं हो पाता है उससे विकसित स्थलाकृति को अस्तरित स्थलाकृति कहते है। 

              लेकिन जब हिमानी के मलवे आपस में चूना पत्थर, क्ले, गाद इत्यादि के कारण एक-दूसरे से जुड़ जाते है तो स्तरित स्थलाकृति का विकास होता है।

            अस्तरित स्थलाकृति का विकास हिमरेखा के ऊपरी भाग में जबकि हिमरेखा के नीचे स्तरित स्थलाकृति का विकास होता है।

⇒ हिमरेखा- ऐसी रेखा जहाँ से बर्फ पिघलकर हिम के साथ-साथ पानी भी प्रवाहित होने लगती है।

अस्तरित स्थलाकृति (Unstratified Topography)

        जब हिमानी अपने घाटी मार्ग से आगे की ओर बढ़ती है तो बड़े पैमाने पर हिमोढ़ का जमाव करते हुए आगे प्रवाहित होती है। जब हिमोढ़ का जमाव तलीय भाग में होता है तो तलीय हिमोढ़ (Ground Moraines) कहते है। जब हिमोढ़ का जमाव किनारों पर होता है तो उसे पार्श्व हिमो (Lateral Moraines) कहते है। जब दो हिमानी के मिलन बिंदु पर हिमोढ़ का जमाव होता है तो उसे मध्य हिमोढ़ (Medial Moraines) कहते है और जब हिमानी अपने मुहाना पर हिमोढ़ का जमाव करती है तो उसे अंतिम हिमोढ़ (Terminal Moraines) कहते है।

         अंतिम हिमोढ़ के बाद कभी-कभी हिमोढ़ का निक्षेपण उल्टे हुए नाव के समान होता है जिसे ड्रमलिन (Drumlin) या अंडों की टोकरी वाली स्थलाकृति कहते है। इसका अक्ष हिमनी प्रवाह की दिशा में होता है।

        जब महाद्वीपीय हिमानी आगे की ओर प्रवाहित होती है तो बड़े क्षेत्रों में या हजारों किमी. भूभाग में बोल्डर क्ले का निक्षेपण कर देती है जिससे निर्मित स्थलाकृति को टिल प्लेन (Till Plain or Till Sheet) कहते है।

अमेरिका का प्रेयरी मैदान और साइबेरिया का मैदान (रूस) टिल प्लेन का उदाहरण है।

 स्तरित स्थलाकृति (Stratified Topography)

          स्तरित स्थलाकृति का निर्माण हिम रेखा के बाहर होता है। ऐसी स्थलाकृति में बोल्डर क्ले एवं अन्य चट्टानी कण एक-दूसरे से जुड़ जाती है। स्तरित स्थलाकृति में सबसे प्रमुख अवक्षेप का मैदान, केम, केटल (Kettles), सन्दूर घाटी एवं एस्कर है।

         जब हिमरेखा के बाहर बर्फ पिघलना प्रारंभ होता है तो हिम के द्वारा लाये गए हिमोढ़ एवं क्ले का निक्षेपण बड़े क्षेत्रों में किया जाता है तो अवक्षेप मैदान (Outwash Plain) का निर्माण होता है।

         हिम रेखा के बाहर जब बर्फ पिघलने लगती है तो नदी के समान ही कई शाखाओं में बंटकर हिमजल उपसरिताओं में बहने लगती है। ये उपसरिताएँ ही सन्दूर घाटी (Sandur Valley) कहलाती है।

         संदूर घाटी के बीच-बीच में मिलने वाले डेल्टानुमा स्थलाकृति को केम (Kame) कहते है।

         कभी-कभी जब महाद्वीपीय हिमानी प्रवाहित होती है तो उसके मार्ग में मिलने वाला गर्त बर्फ से भर जाता है तथा उसके चारों ओर हिमोढ़ का जमाव हो जाता है। कालांतर में जब बर्फ पिघलता है तो चित्र के अनुरूप स्थलाकृति का विकास होता है। इसे केम-केटल स्थलाकृति कहते है।GLACIAL PROCESS AND LANDFORMS

      जब महाद्वीपीय हिमानी का बर्फ पिघलने लगता है तो हिमानी के तली पर जलोढ़ एवं हिमोढ़ का जमाव एक तटबंधनुमा स्थलाकृति के रूप में होता है, जिसे एस्कर (Easker) कहा जाता है। कभी-कभी एस्कर का आकार माला के समान हो जाता है, इसीलिए इसे मालाकार एस्कर (Garland eskar) भी कहा जाता है। 
निष्कर्ष (Conclusion):

        उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमानी के अपरदन एवं निक्षेपण से हिमरेखा के अंदर एवं बाहर कई स्थलाकृतियों का विकास होता है।



Read More:

  14. River Landforms / नदी द्वारा निर्मित स्थलाकृति

  14. River Landforms

(नदी द्वारा निर्मित स्थलाकृति)



River Landforms

        बहते हुए जल को नदी की संज्ञा दी जाती है। जहाँ से नदी निकलती है उसे स्रोत क्षेत्र और जहाँ नदी समुद्र में मिलती है उसे मुहाना कहते है। अपरदन के दूतों में बहता हुआ जल सबसे प्रमुख अपरदन का दूत है। अमेरिकी भूगोलवेत्ता डब्लु० एम० डेविस ने सबसे पहले नदी से निर्मित स्थलाकृतियों की विवेचना अपरदन चक्र सिद्धान्त के माध्यम से करने का प्रयास किया था।

          डेविस के अनुसार नदी द्वारा अपरदन का कार्य चक्रिय होता है। नदी हमेशा आधारतल तक अपरदन का कार्य करती है। आधारतल तक नदी अपरदन समाप्त करती है तो ही नई उत्थान की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। जिससे पुनः नया अपरदन चक्र प्रारम्भ होती है। नदी के द्वारा ऊपरी भाग में अपरदित और निचले भाग में निक्षेपित स्थलाकृति का निर्माण होता है। नदी निम्नलिखित अपरदित स्थलाकृति का निर्माण करती है।

1. नदी घाटी का विकास–

(i) I- आकार की घाटी 

(ii) V- आकार की घाटी 

(iii) गॉर्ज तथा कैनियन

2. जलप्रपात

3. उच्छल्लिका/क्षिप्रिका एवं जलगर्तिका & अवनमन कुण्ड 

4. नदी वेदिका

5. नदी विसर्प (River terraces)

6. समप्राय मैदान और मोनाडनॉक (Monadanox)

नदी घाटी का विकास– 

(i) I- आकार की घाटी तथा

(ii) V- आकार की घाटी 

      डेविस महोदय ने बतलाया कि उत्थान के तत्काल बाद लघु सरिताएँ ढ़ाल के अनुरूप बहने लगती है जिसके कारण तलीय अपरदन का कार्य तीव्र गति से होने लगता है जिसके कारण I- आकार की घाटी विकसित होती है। इसी घाटी में कुछ समय के बाद तलीय अपरदन कम और क्षैतिज अपरदन अधिक हो जाने के कारण V- आकर की घाटी का निर्माण होता है। 

            

(iii) गॉर्ज तथा कैनियन

      गॉर्ज तथा कैनियन दोनों ही V-आकार की घाटियों के रूप में होते है जिनमें किनारे की दीवाल अत्यंत खड़े ढ़ाल वाली होती है तथा चौड़ाई की अपेक्षा गहराई बहुत अधिक होती है। जब नदियाँ कठोर चट्टानों को काटती है तो निर्मित गहरी घाटी गॉर्ज तथा जब मुलायम चट्टानों को काटती है तो निर्मित गहरी घाटी कैनियन कहलाता है। जैसे- सिंधु नदी द्वारा निर्मित सिंधु गॉर्ज (जम्मू कश्मीर में गिलगिट के पास) तथा कोलरैडो नदी द्वारा निर्मित ग्रांड कैनियन (USA)।

2. जलप्रपात

      जब नदियाँ अधिक ऊँचाई से खड़े ढाल के ऊपरी भाग से नीचे की ओर गिरती है तो जलप्रपात का निर्माण करती है। इसमें कठोर एवं मुलायम चट्टान क्षैतिज व्यवस्थित होती है। उदाहरण भारत मे शरावती नदी पर निर्मित जोग जलप्रपात (कर्नाटक)।

3. उच्छल्लिका/क्षिप्रिका

      जब नदी अपने मार्ग से प्रवाहित हो रही हो और इस क्रम में इसके तल पर अगर कठोर चट्टानों एवं मुलायम चट्टानों लम्बवत व्यवस्थित हो तो मुलायम चट्टानों का तो तो अपरदन कर देती है लेकिन कठोर चट्टान के अपरदन न कर पाने के कारण चट्टानों पर जल उछलते हुए बहने की प्रवृति रखती है। इसे ही उच्छल्लिका/क्षिप्रिका कहते हैं। उदाहरण- USA का सेंट लौरेंस नदी पर स्थित नियाग्रा जलप्रपात विश्व का सबसे बड़ा Rapid  का उदाहरण है।

जलगर्तिका & अवनमन कुंड (Potholes and Plunge pools)

      नदी की तली में स्थित चट्टानों को जब नदी उखाड़कर फेंक देती है तो निर्मित गर्तों को जलगर्तिका (Potholes) कहते है। जब जलगर्तिका की गहराई तथा व्यास अधिक हो जाता है तो उसे अवनमन कुंड (Plunge pools) कहते है।

4. नदी वेदिका

        नदी की घाटी के दोनों किनारों पर स्थित जलस्तर में परिवर्तन के कारण या भूपटल के उत्थान एवं पतन के कारण सीढ़ीनुमा स्थलाकृति का विकास होता है जिसे नदी वेदिका की संज्ञा दी जाती है।

5. नदी विसर्प 

      जब नदी प्रौढ़ावस्था से गुजर रही होती है तो नदियाँ मोड़ लेकर बहने लगती है जिसे नदी विसर्प कहा जाता है। मोड़ लेती हुई नदी के जलस्तर में या आधारतल में किसी तरह का परिवर्तन होता है तब मोड़ के अंदर मोड़ विकसित होता है। इसे अधःकर्तित विसर्प कहते है।

6. समप्राय मैदान और मोनाडनॉक

        डेविस के अपरदन चक्र की अंतिम अवस्था में नदियों द्वारा लम्बवत अपरदन नहीं हो पाता है। निरपेक्ष तथा सापेक्ष उच्चावच दोनों न्यूनतम होते है। घाटियाँ उथली तथा अत्यधिक चौड़ी हो जाती है इस पर नदियाँ मियांडर बनाती हुई विस्तृत बाढ़ के मैदानों का निर्माण करती है, लगभग इस समतल मैदान को डेविस ने सम्प्राय मैदान (पेनिप्लेन) का नाम दिया है। इस सतह पर कठोर चट्टान के लम्बवत टुकड़े यत्र-तत्र दिखाई पड़ते है इन अवशिष्ट पहाड़ियों को ही डेविस ने मोनाडनॉक कहा है।

नदी द्वारा निर्मित निक्षेपित स्थलाकृति

नदी  निम्नलिखित निक्षेपित स्थलाकृतियों का निर्माण करती है-

1. जलोढ़ शंकु

2. जलोढ़ पंख

3. प्राकृतिक तटबन्ध

4. बाढ़ का मैदान

5. गोखुर झील (Ox-bow lake)

6. डेल्टा

1. जलोढ़ पंख और जलोढ़ संकु-

      पहाड़ी भाग में नदियाँ संकीर्ण एवं ढलवाँ भाग को छोड़कर ज्यों ही मैदानी भाग में प्रवेश करती है तो ढ़ाल में कमी होने के कारण नदी जल की गति घट जाती है। जिसके कारण पहाड़ी क्षेत्र से लाये गए मलवा का निक्षेपण प्रारंभ हो जाता है। बड़े आकार के चट्टानों के निक्षेपण अगले भाग में होता है। साथ ही छोटी-छोटी सरिताएँ मार्ग बदलते हुए इधर-उधर प्रवाहित होते रहती है जिस कारण शंकुनुमा स्थलाकृति का निर्माण होता है। इसे जलोढ़ शंकु कहते है। जैसे- शिवालिक पर्वत के दक्षिणी ढ़ाल पर।

      कई जलोढ़ शंकु जब आपस में मिल जाते है तब जलोढ़ पंख का निर्माण होता है।  

जलोढ़ पंख

2. प्राकृतिक तटबंध और बाढ़ का मैदान

      वर्षा ऋतु में जब बाढ़ आती है तो नदी जल के साथ लाये गए मलवा को नदी किनारे पर  समतल क्षेत्र में फैला देती है जिससे एक चौरस मैदान का निर्माण होता है, उसे जलोढ़ मैदान या बाढ़ का मैदान कहते है। अगर बाढ़ के दिनों में नदी के जल के प्रवाह में अचानक वृद्धि हो जाये तो मैदानी क्षेत्र में पहले से फैले पानी स्थिर रह जाते है, जिसके कारण नदी के किनारों पर एक उत्थित स्थलाकृति का निर्माण होता है, जिसे प्राकृतिक तटबंध कहते है। गंगा नदी के द्वारा पटना के पास, ब्रह्मपुत्र नदी के द्वारा गुवाहाटी के पास, चीन का ह्वांगहो नदी और गुजरात के पास, ताप्ती नदी प्राकृतिक तटबंध का निर्माण करती है। 

3. गोखुर झील-

               जब नदियाँ मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है तो मोड़ लेकर बहने लगती है जिसे विसर्प (Meander) कहते है।                         

            कालान्तर में एक समय ऐसा आता है जब नदी के दो मोड़ आपस में मिल जाते है और मुड़ा हुआ भाग अलग हो जाता है, चूंकि इसकी आकृति गाय के खुर के समान होता है, इसीलिए इसे गोखुर झील कहा जाता है। गंगा के मैदानी क्षेत्र में इसके कई प्रमाण मिलते है। 

4. डेल्टा-

      जब नदी जल समुद्र के शांत पानी में प्रवेश करती है तो नदी का प्रवाह रुक सा जाता है जिसके कारण नदी के मुहाने पर मलवा के निक्षेपण से त्रिभुजाकार स्थलाकृति का निर्माण होता है जो डेल्टा कहलाता है। 

• डेल्टा शब्द की उत्पति मिस्र से हुई है।

• डेल्टा शब्द का प्रथम प्रयोग ‘हेरोडोटस’ के द्वारा किया गया था। 

• डेल्टा आकार के दृष्टिकोण से यह कई प्रकार का होता है-

         चापाकार डेल्टा (नील नदी का डेल्टा, गंगा ब्रह्मपुत्र का डेल्टा), पंजाकर डेल्टा (मिसौरी तथा मिसीसिपी का डेल्टा), एश्चुअरी डेल्टा (इसका निर्माण जलमग्न नदियों के मुहाने पर एश्चुअरी के किनारों पर जमाव के कारण होता है- भारत की नर्मदा एवं ताप्ती नदियाँ)

निष्कर्ष

           उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि बहते हुए जल से आर्द्र प्रदेश में विशिष्ट अपदनात्मक एवं निक्षेपणात्मक स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।


Read More:

13. NORMAL CYCLE OF EROSION / सामान्य अपरदन चक्र का सिद्धान्त – By W.M. DEVIS

13. NORMAL CYCLE OF EROSION

(सामान्य अपरदन चक्र का सिद्धान्त – By W.M. DEVIS)



NORMAL CYCLE OF EROSION

    जब समुद्रतल से ऊपर उठा हुआ कोई भी भूभाग बाह्य शक्ति या अपरदन के दूतों  के द्वारा काँट- छाँट कर एक अकृतिविहीन समतल मैदान का निर्माण किया जाता है तो इस समयावधि को अपरदन चक्र कहते है।

     पृथ्वी का भूपटल दृढ़ भूखण्डों से निर्मित है जिसे प्लेट कहते है। पृथ्वी के भूपटल पर आंतरिक एवं बाह्य दो प्रकार की शक्तियाँ सतत कार्यरत रहती है। आंतरिक शक्तियों में ज्वालामुखी, भूकम्प एवं भूपटल को विरूपित करने वाले अन्य शक्ति (जैसे- संवहन तरंग) को शामिल करते है। जबकि बाह्य शक्तियों में जलवायु, बहता हुआ जल, भूमिगत जल, हिमानी, शुष्क वायु, समुद्री तरंग, इत्यादि को शामिल करते है।

     आंतरिक शक्तियाँ भूपटल में विषमता (उत्थान, धंसान, वलन) उत्पन्न करती है । जबकि बाह्य शक्तियां भूपटल में उतपन्न विषमता को समाप्त कर समतल मैदान के रूप में बदलने का प्रयास करती है अर्थात बाह्य शक्तियां  प्राकृतिक कैंची के समान है जो अपरदन के माध्यम से धरातल को अपरदित कर समतल करते रहती है

        अपरदन चक्र की संकल्पना सर्प्रथम स्कॉटलैंड के भूगोलवेत्ता जेम्स हटन ने प्रस्तुत किया था। इन्होनें भूपटल का भूवैज्ञानिक अध्ययन कर अपना मत प्रस्तुत किया कि “भूपटल पर न तो आदि का लक्षण है और न ही अंत की कोई आशा” जेम्स हटन के इसी विचार ने अपरदन चक्र की संकल्पना को जन्म दिया। जेम्स हटन के बाद अमेरिकी भूगोलवेत्ता W. M. डेविस और जर्मन भूगोलवेत्ता पैंक ने अपरदन चक्र पर अलग-अलग मत प्रस्तुत किया।

      प्रारम्भ में डेविस महोदय ने “सामान्य अपरदन चक्र सिद्धान्त” प्रस्तुत किया। बाद में जब उनकी आलोचना होने लगी तो उन्होनें कहा कि जब पहले से एक अपरदन चक्र चल रहा हो तो बीच में आंतरिक एवं बाह्य शक्तियां आधार तल में परिवर्तन ला सकती है। जिसके कारण पूर्व का अपरदन चक्र बाधित हो जाता है और नवीन अपरदन चक्र प्रारम्भ हो जाता है। इस तरह किसी भी भौगोलिक क्षेत्र में एक से अधिक अपरदन चक्र के स्थलाकृति का प्रमाण मिलने वाले क्षेत्र को “बहुचक्रिय स्थलाकृति क्षेत्र” से सम्बोधित किया।

      इस तरह डेविस को बहुचक्रीय  स्थलाकृति की संकल्पना प्रस्तुत करने का श्रेय जाता है। कालान्तर में जर्मन भूगोलवेत्ता वाल्थर पैंक और एल्बर्ट पैंक (फादर) ने डेविस के सामान्य अपरदन चक्र सिद्धान्त का आलोचना करते हुए संशोधित एवं आधुनिक अपरदन चक्र का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इस तरह आधुनिक स्थलाकृति विज्ञान का जन्मदाता पैंक (फादर- बेटा) को माना जाता है।

डेविस का सामान्य अपरदन चक्र 

          डेविस का सामान्य अपरदन चक्र सिद्धान्त भौगोलिक चक्र का सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। अमेरिकी भूगोलवेत्ता W. M. डेविस ने 1889 ई० में “Geographical Essay” नामक पुस्तक में अपरदन चक्र सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

          डेविस ने अपरदन चक्र सिद्धान्त को परिभाषित करते हुए कहा कि “अपरदन चक्र समय की वह अवधि है जिसके अंतर्गत एक उत्थित भूखण्ड अपरदन क्रिया द्वारा प्रभावित होकर एक आकृतिविहीन समतल मैदान का निर्माण करती है।”  

     डेविस ने बताया कि किसी समतल भूखण्ड के उत्थान के बाद उस पर तीन कारकों का प्रभाव पड़ता है –

(i) संरचना (Structure)

(ii) प्रक्रम (Process) और

(iii) समय (Time or Stage)।

       इसी आधार पर डेविस ने यह परिकल्पना प्रस्तुत किया कि किसी भौगोलिक क्षेत्र का “भूदृश्य संरचना, प्रक्रम और समय का फलन होता है।” A landscape is a function of structure, process and time इस परिकल्पना को डेविस का त्रिकट (Trio of Devis) के नाम से जानते है। 

       अपरदन  चक्र आर्द्र प्रदेश में, शुष्क प्रदेश में, चुना पत्थर प्रधान क्षेत्रो में, समुद्र तलीय क्षेत्र में,एवं ध्रुवीय क्षेत्रों में सतत चलता रहता है। डेविस ने अपना सिद्धान्त आर्द्र प्रदेश के संदर्भ में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि आर्द्र प्रदेश में बहता हुआ जल/नदी अपरदन का दूत होता है। बहता हुआ जल सम्पूर्ण प्रदेश को अपरदन क्रिया से प्रभावित करता है और प्रदेश में अपरदन चक्र को संचालित करता है। आर्द्र प्रदेश में अपरदन की क्रिया चक्रीय रूप से सक्रिय रहती है।

      डेविस ने अपरदन चक्र की तुलना मानव के जीवन चक्र से किया है। जैसे एक मानव जन्म के बाद युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था से होकर गुजरते हुए अपने जीवन लीला को समाप्त करता है और पुनः जन्म लेता है ठीक उसी प्रकार से सामान्य अपरदन चक्र उपरोक्त तीनों अवस्थाओं से होकर गुजरती है। उन्होंने पुनर्जन्म को पुनरुत्थान से तुलना किया है। 

मान्यताएँ (Assumptions):-

     डेविस का अपरदन  चक्र सिद्धांत निम्नलिखित तीन मान्यताओं पर आधारित है-

1. अपरदन चक्र के लिए उत्थान अति आवश्यक है तथा उत्थान में समय बहुत कम लगता है।

2. जब उत्थान के कार्य पूरा हो जाता है तब अपरदन का कार्य प्रारंभ होता है।

3. उत्थित भूखण्ड में तीव्र ढ़ाल होती है जिसके कारण उसमें अनियमितताएँ आती है तथा बहता हुआ जल अनेक स्थलाकृति को जन्म देती है।

          डेविस के अनुसार जो भी स्थलखंड तीन मान्यताओं को पूरा करती है वहाँ पर अपरदन चक्र सक्रिय रहता है। किसी भी प्रदेश का अपरदन चक्र निम्नलिखित अवस्थाओं से पूरा होती है:-

(1) युवावस्था/तरुणावस्था (Youth Stage)

(2) प्रौढावस्था (Mature Stage)

(3) वृद्धावस्था (Old Stage)

          उपरोक्त तीनों अवस्थाओं का निम्नलिखित विशिष्टाएँ है:-NORMAL CYCLE OF EROSION

 (1) युवावस्था (Youth Stage)

         युवावस्था में भूपटल के उत्थान के बाद अपरदन की क्रिया प्रारंभ हो जाती है। इसीलिए इस अवस्था को अपरदन की अवस्था कहते है। युवावस्था में निम्नलिखित विशिष्ट स्थलाकृतिक का विकास होता है। 

• सरिताएँ I- आकर की घाटी का निर्माण करती है।

• छोटे-छोटे सरिताओं का विकास होता है।

• युवावस्था में तलीय कटान अधिक और क्षैतिज कटान बहुत कम होता है जिससे सँकरी एवं गहरी घाटी (गॉर्ज) का विकास होता है।

• क्षैतिज कटान कम होने के कारण जलविभाजक रेखा चौड़ी होती है।

• इस अवस्था में सरिता अपहरण की घटना होती है। जिसके कारण जगह-जगह पर मृत नदी घाटी या सुस्त नदी घाटी दिखाई देता है।NORMAL CYCLE OF EROSION• तलीय अपरदन के कारण उच्छल्लिका (Rapids) का निर्माण होता है। उच्छल्लिका का निर्माण उस वक्त होता है जब नदी मार्ग के नीचे कोई लम्बवत कठोर चट्टान मिलती है। जब नदी के नीचे मिलने वाला कठोर चट्टान पूर्णतः क्षैतिज होता है तो जलप्रपात का निर्माण होता है।

• अगर नदी मार्ग में मिलने वाला कठोर चट्टान छोटा एवं हल्का हो तो उसे नदी उखाड़कर फेंक देती है और जलगर्तिका का निर्माण करती है।NORMAL CYCLE OF EROSION

          इस अवस्था के प्रारम्भ में उच्चावच कम होती है। लेकिन अवस्था के अंत में तलीय कटान के कारण उच्चावच अधिकतम हो जाती है।

(2) प्रौढ़ावस्था (Mature Stage)

            प्रौढ़ावस्था को दो भागों में बाँटा जाता है।

(i) प्रारम्भिक प्रौढ़ावस्था

(ii) अंतिम प्रौढ़ावस्था

     प्रारम्भिक प्रौढ़ावस्था में  क्षैतिज अपरदन का कार्य तेजी से होने लगता है और तलीय अपरदन कम होने लगता है। क्षैतिज अपरदन से V– आकार का घाटी का निर्माण होता है। जल विभाजक रेखा को चौड़ाई घटने लगता है। 

      अंतिम प्रौढ़ावस्था में V-आकर की घाटी और खुलने लगती है। जल विभाजक की  चौड़ाई में और कमी आने लगती है। अंतिम प्रौढ़ावस्था में अपरदन और निक्षेपण दोनों साथ-साथ होती है। इसीलिए उच्चावच और ढ़ाल में कमी आने लगती है। तलीय अपरदन न्यून हो जाता है। कम ढ़ाल के कारण नदियाँ गाद लेकर प्रवाहित होने लगती है। अंतिम प्रौढ़ावस्था में नदियाँ बाढ़ का मैदान गोखुर झील और प्राकृतिक बांध का निर्माण करती है। इन स्थलाकृतियों को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है। NORMAL CYCLE OF EROSION(3) वृद्धावस्था (Old Stage)

       डेविस ने बताया कि वृद्धावस्था में केवल निक्षेपण का कार्य होता है। नदियाँ वितरिका में बँटने लगती है। जल विभाजक की चौड़ाई न्यूनतम हो जाती है। “खुली हुई V-आकार की घाटी” का निर्माण करती है। मुहाना पर डेल्टा का निर्माण होता है। वृद्धावस्था के अंत में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है जिसे समप्राय मैदान (Peneplain) कहते है। समप्राय मैदान में कहीं कहीं कठोर चट्टाने दिखाई देती है। जिसे मोनाडनौक (Monadnock) कहते है।

    डेविस ने अपरदन चक्र के विभिन्न अवस्थाओं में बनने वाले घाटी, समप्राय मैदान, मोनाडनौक और अवस्था का नीचे के मॉडल से समझाया है।NORMAL CYCLE OF EROSION

         डेविस के अनुसार जब कोई उत्थित भौगोलिक भूखण्ड वृद्धावस्था से गुजर रहा होता है तो तभी उसमें पुनरुत्थान की क्रिया होती है तो उसके बाद पुनः नवीन अपरदन चक्र प्रारम्भ होता है। डेविस ने पुनरुत्थान की क्रिया को मानव के पुनर्जन्म से तुलना किया था। 

आलोचना (Criticism)

      डेविस के अपरदन चक्र सिद्धांत की कई आधारों पर आलोचना की गई है:-

1. डेविस ने माना कि उत्थान के बाद अपरदन होता है तो इस पर प्रश्न उठाया जाता है कि क्या भूखण्ड के उत्थान होने तक अपरदन के दूत निष्क्रिय रहते है।

2. डेविस ने बताया कि उत्थान में समय बहुत कम लगता है लेकिन वास्तव में उत्थान बहुत लंबी अवधि तक चलने वाली क्रिया है। 

3. डेविस ने यह भी कहा था कि जलखण्ड के उत्थान हो जाने के बाद लंबे समय तक स्थिर है लेकिन यह मान्य नहीं है।

4. डेविस ने यह नहीं बताया कि भूखंडों का उत्थान क्यों होता है?

5. जर्मन विद्वान वाल्थर पेंक ने कहा है कि कोई भी अपरदन चक्र अवस्था का फलन नहीं होता है बल्कि दशाओं (Phase) का फलन होता है। 

6. डेविस ने एक भी समप्राय मैदान का उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया है और न ही वैसे क्षेत्रों का उदाहरण दिया है जहां पर अपरदन चक्र चल रही हो। ऐसे में यह सिद्धान्त काल्पनिक जान पड़ता है।

7. जर्मन विद्वानों ने इसके नामाकरण पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

8. जर्मन विद्वान ओमाल ने कहा है कि यह एक अत्यंत सरलीकृत परिकल्पना है।

निष्कर्ष

         इन आलोचनाओं के बावजूद डेविस के सिद्धांत को व्यापक मान्यता प्राप्त है क्योंकि इस दिशा में उसके द्वारा किया गया प्रथम प्रयास था। बाद में डेविस के ही अपरदन चक्र सिद्धान्त को आधार मानकर पेंक ने अपना विचार प्रकट किया।



Read More:

  5. Isostasy / भूसंतुलन /समस्थिति 

5. Isostasy 

भूसंतुलन /समस्थिति


Isostasy⇒Isostasy

            भूसंतुलन भूगोल की एक ऐसी संकल्पना है जो भूपटल के विभिन्न स्तंभों के मध्य पाये जाने वाले संतुलन को व्याख्या करता है। भूसंतुलन का सामान्य अर्थ  “परिभ्रमण करती हुई पृथ्वी के ऊपर उभरे हुये क्षेत्र (जैसे-पर्वत, पठार, मैदान) एवं नीचे स्थित क्षेत्रों  (सागर, झील) में भौतिक एवं यांत्रिक स्थिरता भूसंतुलन कहलाता है।”

     भूसंतुलन आंग्ल भाषा में ‘Isostasy या Equilibrium’ कहलाता है। Isostasy शब्द ग्रीक भाषा के Isostasius से बना है जिसका तात्पर्य समस्थिति होता है। आइसोस्टैसी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1889 ई० में अमेरिकी भूवैज्ञानिक C.F. डटन ने किया था। इन्होंने कहा था कि समस्थिति के कारण ही पर्वत, पठार, मैदान और समुद्र साथ-साथ स्थित है। बहिर्जात बल पर्वतों से मिट्टी काट-काट कर समुद्र एवं मैदान में निक्षेपित करते रहते हैं। इसीलिए मैदान एवं समुद्र तली का भार अधिक तथा पर्वतों के भार कम होते है। भार में कमी या अधिकता के कारण भूगर्भ के भूपटल पर दबाव समान रूप से नहीं पड़ता है। समस्थिति इसी दबाव के विभिन्नता को संतुलन बनाये रखने में मदद करता है।

        डटन ने बताया कि जिस रेखा के सहारे भूपटलीय संतुलन कायम रहता है उसे ‘समदबाव तल’ (Level of Uniform Pressure) अथवा ‘समतोल तल’ (Isotatic Level) या ‘क्षतिपूर्ति तल’ (Level of Compensation) कहते है।

        ऑर्थर होम्स महोदय ने भूसंतुलन की व्याख्या करते हुए कहा है कि “संतुलन की वह दशा जो भूपटल पर विभिन्न ऊँचाई वाले पर्वत, पठार, मैदान अथवा सागरीय नितल के मध्य पायी जाती है, भूसंतुलन कहलाता है।”

भूसंतुलन सिद्धांत का बुनियाद

      भूकम्पीय तरंगो के अध्ययन से यह सिद्ध हो चुका है कि पृथ्वी के विभिन्न भागों के घनत्व भिन्न-भिन्न है। इनकी पुष्टि भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा भी किया गया है। 1859 ई० में गंगा सिंधु मैदान के मध्य में अक्षांश ज्ञात करते समय दो विधियों को प्रयोग में लाया गया:-

 (l) साहुल विधि

 (ll) त्रिभुजीकरण विधि          

         यह अक्षांशीय मापन का कार्य कल्याण एवं कल्याणपुर नामक स्थान पर किया जा रहा था। इन दोनों स्थानों पर उपरोक्त दोनों विधियों द्वारा आये परिणाम में भारी अंतर था। यह अंतर 5.236 सेकंड बताया गया। इस अंतर का कारण बताते हुए विद्वानों ने बताया कि साहुल को हिमालय पर्वत अपनी ओर आकर्षित कर रही है लेकिन पुनः यह प्रश्न उठाया गया कि अगर हिमालय साहुल को अपनी ओर आकर्षित कर रही है तो हिमालय जितना विशाल है उस दृष्टि से आकर्षण और अधिक होना चाहिए तथा अंतर 15 सेकेंड से भी अधिक होना चाहिए। कालांतर में इसी जटिल तथ्यों की व्याख्या भूसंतुलन से करने का प्रयास किया गया। बताया गया कि हिमालय के नीचे स्थित चट्टानों के घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व से भी कम है। जबकि समुद्र नितल का घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व से अधिक है। यही कारण है कि दोनों के बीच संतुलन की स्थिति कायम है। भूसंतुलन को स्पष्ट करने हेतु अनेक मत प्रतिपादित किये गये है:-

(1) एयरी का मत

(2) प्रौट का मत

(3) हिस्कानेन का मत

(4) जौली का मत

(1) एयरी का मत

       1859 ई० में एयरी ने अपना मत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार “भूपटल के प्रत्येक स्तम्भ का घनत्व समान है, जो भाग जितना ऊँचा है वह उसी अनुपात में भूगर्भ में घुसा हुआ है। अर्थात जो भाग अधिक ऊंचा है उसका अधिक भाग और जो भाग कम ऊँचा है उसका कम ही भाग भूगर्भ में घुसा हुआ है।”

           एयरी महोदय ने पृथ्वी के विभिन्न भू-स्तंभों की तुलना जल में तैरते हुए हिमशीलाखंडों से किया है। उन्होंने अपने मत का व्याख्या करने हेतु आर्कमिडीज के सिद्धान्तों का सहारा लिया है। अर्कमिडीज के अनुसार “कोई भी तैरती हुई वस्तु अपनी मात्रा के समतुल्य द्रव्य को नीचे से हटा देती है”। हिम के संबंध में कहा कि “हिम जब पानी के ऊपर तैर रहा होता है तो उसका 1/9 भाग जल के ऊपर तथा शेष 8/9 भाग जल में डूबा रहता है।”

          धरातल के प्रत्येक भाग के लिए उसका 8 गुणा भाग धरातल के नीचे धंसा रहता है। इसे  सिद्ध करने के लिए एयरी ने एक प्रयोग के माध्यम से प्रदर्शित किया है। एयरी ने भूपटल के विभिन्न भागों की तुलना लौह धातु के छोटे-बड़े टुकड़ों से किया है। उन्होंने बताया कि जब लोहे के विभिन्न ऊँचाई वाले टुकड़े को द्रव में डुबोया जाता है तो जिस लोहे के टुकड़े की ऊँचाई अधिक होता है उसका उतना अधिक भाग द्रव में डूबा रहता है और जो लोहा का टुकड़ा कम ऊँचा रहता है उसका उतना ही कम भाग द्रव में डूबा रहता है।

Isostasy

आलोचना

      अगर एयरी के मत को सही मान लिया जाय तो इनके अनुसार जो भाग जितना ऊँचा होगा उसका उतना ही भाग धरातल के अंदर घुसा हुआ होगा। जैसे -अगर हिमालय की ऊँचाई को आधार बनाया जाय तो 2 लाख 70 हजार फीट गहरा जड़ होना चाहिए लेकिन दूसरी ओर यह भी ज्ञात है कि धरातल के नीचे जाने पर प्रति 32 मीटर की गहराई पर 1°C तापमान बढ़ जाती है। इस प्रकार हिमालय की इतनी गहरी जड़ धरातल के अंदर अति उच्च तापमान के कारण यथावत नहीं रह सकती। अतः इनका विचार भ्रामक है।

       एयरी के मत का दूसरा आलोचना यह है कि पृथ्वी के सभी भू-स्तंभों का औसत घनत्व एक समान है जबकि भूकम्पीय तरंगो के अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि पृथ्वी के विभिन्न स्तम्भों का घनत्व अलग-अलग है।

निष्कर्ष:

       एयरी के द्वारा भूसंतुलन के दिशा में किया गया यह प्रथम प्रयास था। उनके मत को “Uniform Density with Varying Depthness” (एक समान घनत्व के साथ बदलता हुआ गहराई) नामक सिद्धांत से भी जानते है। दूसरी एयरी के मत से यह भी स्पष्ट हुआ कि पहाड़ों के जड़ें होते है। इस तरह एयरी के विचार में कुछ खामियों के बावजूद विशेष महत्व रखता है।

प्रौट के मत

           प्रौट महोदय ने अपना विचार Royan Geography of Landform (1859 ई०) में प्रस्तुत किया था। उन्होंने कल्याण एवं कल्याणपुर के बीच साहुल एवं त्रिभुजीकरण विधि से किये गए मापन के परिणाम में आये अंतर के संबंध में विचार प्रकट करते हुए कहा कि पृथ्वी के सभी भू-स्तंभो का घनत्व एक समान नहीं है बल्कि अलग-अलग है। जैसे- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व पठारी चट्टानों के घनत्व से कम है। पठारी चट्टानों का घनत्व मैदानी चट्टानों के घनत्व से कम है और मैदानी चट्टानों के घनत्व समुद्री भूपटल के घनत्व से कम है।

          प्रौट महोदय ने बताया कि पृथ्वी का सभी भू-स्तंभ एक क्षतिपूर्ति रेखा के सहारे एक-दूसरे के परिपेक्ष्य में संतुलित है। उन्होंने ऊँचाई और घनत्व के बीच व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध  बताया अर्थात पृथ्वी के ऊपर स्थित भू-स्तंभ का घनत्व भले ही अलग-अलग हो लेकिन सभी भू-स्तंभ एक समान गहराई के साथ भूपृष्ठ में धँसे हुए है। इसे स्पष्ट करने के लिए उन्होंने निम्नलिखित प्रयोग के माध्यम से पुष्टि करने का प्रयास किया है:-

चित्र: प्रौट का भू-संतुलन

         प्रौट अपने मत (Varying Density With Uniform Depth) को उपरोक्त चित्र के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि पृथ्वी के विभिन्न भू-स्तंभ के घनत्व अलग-अलग है और चित्रानुसार ही एक क्षतिपूर्ति रेखा के सहारे सभी भू-स्तंभ संतुलित है।            

आलोचना

    बहुत से विद्वानों ने प्रौट के विचारों का आलोचना करते हुए कहा कि इनका मत एयरी के मत का ही संशोधित रूप है। कुछ विद्वानों ने यह भी कहा है कि भूपटल के विभिन्न भू-स्तंभ उस तरह से नहीं है जैसा कि विभिन्न धातुओं का उदाहरण देकर प्रौट ने बताया है। फिर भी इन आलोचनाओं के बावजूद क्षतिपूर्ति रेखा और विभिन्न घनत्व के निर्मित भू-स्तंभ भूसंतुलन संकल्पना की सराहनीय कदम है।                                                  

हिस्कानेन  का मत

        1933 ई०  में भूसंतुलन के संबंध में हिस्कानेन  अपना अवधारणा प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने एयरी तथा प्रौट के विचारों को संगठित रूप से प्रदर्शित किया। हिस्कानेन ने बताया कि समुद्री भूपटल की चट्टानों का घनत्व ऊँचे उठे हुए भूभाग से अधिक होता है। इन्होंने यह भी अनुमान लगाया कि भूपटल के प्रत्येक स्तंभों में भी अलग-अलग गहराई पर घनत्व में परिवर्तन होता रहता है। इसके अतिरिक्त विभिन्न स्तम्भों का घनत्व एवं उनकी लंबाई भी भिन्न-भिन्न होती है। इस अनुमान के आधार पर हिस्कानेन ने पुनः बताया कि अधिक घनत्व वाले भूस्तम्भ का लंबाई कम होगा और कम घनत्व वाले भूस्तम्भ की लंबाई अधिक होगी तथा भिन्न-भिन्न गहराई पर  भूस्तम्भों का घनत्व भी भिन्न-भिन्न होगी। लेकिन एक भू-स्तम्भ के नीचे जाने पर घनत्व बढ़ता जाएगा।

             इस तरह हिस्कानेन के मत से पर्वतों के जड़ की व्याख्या होती ही है साथ ही भू-स्तम्भों के विभिन्न भागों में घनत्व की विभिन्नता का भी समाधान प्रस्तुत करता है।

जौली का मत

         1925 ई०में जौली महोदय ने भूसंतुलन सिद्धान्त का प्रतिपादन कर यह स्पस्ट किया कि क्षतिपूर्ति तल की गहराई 100 KM  है। जौली के अनुसार भूपटल के ऊपरी भाग का घनत्व 2.7 है। इसके नीचे 16 KM गहरी पट्टी है। जिसमें पदार्थों के घनत्व में विभिन्नता पायी जाती है। इसका कारण औसत घनत्व 3 है। इसी 16 KM पट्टी के ऊपर कम घनत्व के पदार्थ पाये जाते है जिस प्रकार बर्फ पानी में तैरता हुआ अपने वजन के बराबर पानी हटाता है। ठीक उसी प्रकार महाद्वीपीय एवं महासागरीय भूपटल सीमा के ऊपर तैर रहे है।

              ये दोनों भूपटल अपने अपने वजन के अनुरूप भूपटल के नीचे स्थित सीमा के पदार्थों को विस्थापित करते है और एक-दूसरे के परिपेक्ष्य में संतुलित रहते है।

Isostasy

        भूसंतुलन का सिद्धांत कुछ संदर्भों में सही प्रतीत होता है। लेकिन कुछ ऐसे भी प्रमाण मिले हैं जो भूसंतुलन सिद्धात के आधार पर व्याख्या नहीं किया जाता है। ऐसे में इस सिद्धांत पर प्रश्न चिन्ह खड़े किए जाते है। फिर भी पृथ्वी के विभिन्न भू-स्तम्भों के मध्य पाया जाने वाला संतुलन का व्याख्या करने में यह सिद्धांत सक्षम है।


Read More:

4. Convection Current Theory of Holmes / होम्स का संवहन तरंग सिद्धांत

4. Convection Current Theory of Holmes

(होम्स का संवहन तरंग सिद्धांत)


Convection Current Theory of Holmes 

होम्स का संवहन तरंग सिद्धांत⇒Convection Current Theory of Holmes                            

           संवहन तरंग सिद्धांत सर्वप्रथम अर्थर होम्स ने सन 1928-29 में प्रतिपादित किया। इस सिद्धांत के माध्यम से उन्होंने भूपटल की विभिन्न आकृतियों की उत्पत्ति की समस्या को स्पष्ट करने का प्रयास किया। संवहन तरंग सिद्धांत को प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत भी मान्यता प्रदान करता है। होम्स एवं प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत के अनुसार भूपटल के नीचे संवहन तरंग चल रही है। उठते हुए संवहन तरंग के कारण भूपटल या प्लेट का उत्थान होता है जबकि गिरते हुए संवहन तरंग के कारण भूसन्नति का निर्माण होता है।

       उन्होंने पृथ्वी की आंतरिक संरचना को मुख्यतः दो मण्डलों में विभाजित किया है- पहले मण्डल का नाम क्रस्ट और दूसरे का अध: स्तर दिया।

      क्रस्ट की रचना सियाल तथा सिमा के ऊपरी हिस्से से और अध: स्तर की रचना सीमा के निचले हिस्से से हुई है। संवहनीय तरंगों की उत्पत्ति चट्टानों में स्थित रेडियो-सक्रिय पदार्थों (यूरेनियम, थोरियम, रेडियम आदि) पर आधारित होती है। यद्यपि पृथ्वी के ऊपरी भाग में भी रेडियो सक्रिय पदार्थ अधिक मात्रा में पाए जाते हैं परंतु विकिरण द्वारा इस ताप का ह्रास होता रहता है। जबकि आंतरिक भाग में रेडियो सक्रिय पदार्थ कम होते हैं परंतु उनसे उत्पन्न ताप का संचयन होता रहता है जिसके कारण अत्यधिक तापमान हो जाता है। परिणामस्वरूप पृथ्वी के गर्भ में संवहन तरंगें उत्पन्न होकर ऊपर की ओर चलने की प्रवृत्ति रखती है। पृथ्वी के भूपटल के नीचे पहुँचने पर इनकी निम्नलिखित दो स्थितियाँ होती है –

(i) जिस स्थान पर दो संवहन तरंग अलग होकर एक-दूसरे के विपरीत दिशा में प्रवाहित होती है वहाँ फैलाव होने से तनाव की शक्ति पैदा होती है। जिसके कारण स्थल भाग दो खंडों में विभक्त होकर विपरीत दिशाओं में हट जाते हैं तथा बीच वाले खुले भाग में सागर का निर्माण हो जाता है। इस प्रकार महाद्वीपों में प्रवाह होता है।

(ii) जिस स्थान पर दो केंद्रों से ऊपर उठने वाली संवहनीय तरंगे पृथ्वी की भूपर्पटी के नीचे पँहुचने के बाद मुड़कर क्षैतिज दिशा में प्रवाहित होकर एक-दूसरे से मिलती है तो अभिसरण के कारण दबाव की शक्ति उत्पन्न होती है, परिणामस्वरूप धरातल में होने वाले अवतलन से भूसन्नति का निर्माण होता है।

पर्वत निर्माण की प्रक्रिया:-

     महाद्वीपों तथा महासागरों दोनों के नीचे संवहनीय तरंगों की उत्पत्ति होती है लेकिन महाद्वीपों के नीचे से उठने वाले संवहनीय तरंग अधिक तीव्र होती है क्योंकि महाद्वीपों की चट्टानों में रेडियो-सक्रिय पदार्थ अधिक होते हैं संवहन तरंगों की उत्पत्ति कई केंद्रों से होती है तथा यह उत्पत्ति केंद्र बदलते रहते हैं। महाद्वीपों तथा महासागरों के नीचे से उठने वाली आरोही संवहन तरंग जब जलमग्न तट के नीचे मिलकर मुड़ती है तो संपीडन के कारण इस भाग का अवतलन होता है तथा भूसन्नति का निर्माण होता है।

       इस तरह भूसन्नति की स्थिति गिरते स्तंभ के ऊपर या अवरोही तरंगों के ऊपर होती है। आरोही तरंगे महाद्वीपों तथा महासागरीय तली के नीचे कुछ भागों को उच्च तापक्रम के कारण पिघलाकर उन्हें भूसन्नति में जमा करने लगती है। इस तरह महाद्वीपीय परत पतली होने लगती है। लगातार संपीड़न तथा तलछटीय निक्षेप के कारण भूसन्नति में निरंतर धँसाव होता रहता है। संवहनीय तरंगों की क्रिया चक्रीय होती है तथा इसी के दौरान भूसन्नति का निर्माण, पर्वत की उत्पत्ति तथा उसका उत्थान होता है।

     संवहन धाराओं के द्वारा पर्वत निर्माण की प्रक्रिया को समझाते हुए होम्स ने निम्नलिखित तीन अवस्थाओं  का जिक्र किया है-

1. प्रथम अवस्था (भूसन्नति निर्माण की अवस्था)-

◆ प्रथम अवस्था का समय सबसे लंबा होता है, जिसके अंतर्गत दो केंद्रों से आने वाली संवहनीय तरंगे मिलकर जलमग्न तटों के नीचे भूसन्नति का निर्माण करती है।

◆ इस अवस्था में तरंगे लगातार तीव्र होती जाती है।

◆ इस अवस्था में भूसन्नति में तलछटीय जमाव होता रहता है, जिससे भूसन्नति की तली निरंतर धँसती जाती है।

◆ पृथ्वी की आंतरिक तापमान तथा मलबों के दबाव के कारण गहराई वाले पदार्थ गर्म होने लगते हैं, फलस्वरूप उनका घनत्व बढ़ता जाता है तथा उसका पुनः धँसाव होता है। इस प्रकार कुछ ताप रूपांतरण के समय खर्च हो जाता है जिससे ताप का अधिक संचय नहीं हो पाता है।

2. द्वितीय अवस्था (पर्वत निर्माण की अवस्था)-

◆ द्वितीय अवस्था का अल्प समय होता है।

◆ इस अवस्था में संवहनीय तरंगों की गति काफी तीव्र हो जाती है, जिसका मुख्य कारण गिरते स्तंभ में ठंडे पदार्थों का अवतलन तथा उठते स्तंभ में तप्त पदार्थों का प्रवाहित होना है।

◆ महाद्वीपों तथा महासागरों की ओर से आने वाली तरंगें तीव्र गति से मिलकर नीचे मुड़ती है जिससे भूसन्नति के मलबे पर संपीडनात्मक बल लगता है, फलस्वरुप भूसन्नति का मलबा वलित होकर पर्वतों का निर्माण करती है।

3. तृतीय अवस्था (पर्वत उत्थान की अवस्था)-

      अंतिम अवस्था में संवहनीय तरंगे क्रमशः कमजोर होने लगती है जिसका प्रमुख कारण गिरते स्तम्भ में गर्म पदार्थों का अंत तथा उठते स्तम्भ में ठंडे पदार्थों का उठना है। धीरे-धीरे समस्त उठता स्तंभ ठंडा हो जाता है जिसके कारण संवहन तरंगे समाप्त होने के साथ ही उनकी समस्त प्रक्रिया भी समाप्त हो जाती है। इसके निम्नलिखित परिणाम होते हैं :-

(i) निक्षेपण के समाप्त हो जाने से गिरते स्तम्भ के ऊपर दबाव कम हो जाता है, जिसके कारण गिरते स्तंभ के पदार्थ धीरे-धीरे उठने लगते हैं तथा पर्वतों में उत्थान प्रारंभ हो जाता है।

(ii) दबाव के कम हो जाने से भारी पदार्थ जो नीचे दब गए थे, अब ऊपर उठने लगते हैं जिससे पर्वतों में पुन: उत्थान होने लगता है।

     इस प्रकार इस सिद्धांत के आधार पर पर्वत निर्माण की अवस्था भली-भाँति स्पष्ट हो जाती है।

आलोचना:-

        इस सिद्धांत में निम्नलिखित दोष पाए जाते हैं-

◆ उठते तथा गिरते स्तंभ की धारणा संदेहास्पद है।

◆ संवहन तरंगे पृथ्वी के अंदर ताप-प्रवणता तथा रेडियो-सक्रिय पदार्थों पर आधारित है, जिनके विषय में जानकारी बहुत कम है।

◆ क्रस्ट के नीचे संवहन तरंगों का क्षैतिज प्रवाह संदेहास्पद है।

◆ रूपांतरण द्वारा भारी पदार्थों का नीचे की ओर धँसाव एक भ्रामक समस्या है।

◆ इस सिद्धांत के अनुसार संवहन तरंगों का उत्पत्ति महाद्वीपों के नीचे कुछ सीमित केंद्रों पर ही होगा। यदि इन तरंगों की उत्पत्ति के लिए आवश्यक दशाएँ प्राप्त है तो तरंगों की उत्पत्ति प्रत्येक स्थान पर क्यों नहीं होता है। यदि यह संभव है तो समस्त महाद्वीप कई टुकड़ों में विभक्त हो जाएंगे तथा समस्त ग्लोब पर केवल सागरीय क्षेत्र ही होगा। इस तरह यह सिद्धांत संवहन तरंगों के विषय में गलत विवरण प्रस्तुत करता है।

◆ आरोही तरंगे क्रस्ट के नीचे मुड़कर क्षैतिज रूप से न चलकर ऊपर भी चल सकती है। ऐसी स्थिति में तरंगे भूपटल को तोड़कर भयंकर विस्फोट से धरातल पर ज्वालामुखी क्रिया को जन्म देगी न कि तनाव द्वारा सागर का निर्माण करेगी।

निष्कर्ष:

      इस प्रकार स्पष्ट है कि संवहन तरंग सिद्धांत कई आलोचनाओं के बावजूद काफी महत्वपूर्ण सिद्धांत है क्योंकि इसके माध्यम से भूपटल की आकृतियों की उत्पत्ति की समस्या का समाधान किया जा सकता है। यह सभी प्रकार के पर्वतों की उत्पत्ति एवं उनके विकास का वैज्ञानिक विश्लेषण भी करता है।



Read More:

3. GEOSYNCLINE OROGEN THEORY-KOBER (भुसन्नत्ति पर्वतोत्पत्ति सिद्धांत-कोबर)

3. GEOSYNCLINE OROGEN THEORY-KOBER


        कोबर महोदय ने मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति के सम्बंध में भूसन्नति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। इस संकल्पना के विकास का प्रथम प्रयास हॉल और डाना महोदय द्वारा किया गया, लेकिन एक सिद्धांत के रूप में इस संकल्पना का प्रतिपादन सर्वप्रथम हॉग महोदय द्वारा किया गया। कोबर ने वलित पर्वतों की उत्पत्ति के संबंध में भू-सन्नति सिद्धांत का प्रतिपादन किया। कोबर के अनुसार भूपटलीय चट्टानें लचीली होती है, जब चट्टानों पर दबाव शक्ति कार्य करती है तो भूपटलीय चट्टानें मुड़कर भुसन्नति या मोड़दार पर्वत का निर्माण करती है। 

       भू-सन्नतियां लंबे, संकरे तथा उथले जलीय भाग होती है, जिनमें तलछटीय निक्षेप के साथ-साथ तली में धंसाव होता है। वर्तमान समय में प्राय: सभी विद्वानों की यह मान्यता है कि प्राचीन और नवीन वलित पर्वतों का आविर्भाव भू-सन्नतियाँ से हुआ है। जैसे- रॉकी भूसन्नति से रॉकी पर्वत, यूराल भू-सन्नति से यूराल पर्वत तथा टेथिस भू-सन्नति से महान हिमालय पर्वतों का निर्माण हुआ। भू-सन्नतियों का पर्वत निर्माण से संबंध होने के कारण कोबर ने इन्हें ‘पर्वत निर्माण स्थल’ या “पर्वतों का पालना” (Orogen) कहा है।

कोबर का भूसन्नति सिद्धांत

           वास्तव में उनका मुख्य उद्देश्य प्राचीन दृढ़ भूखंडों तथा भू-सन्नतियों (Geosyncline) में संबंध स्थापित करना था। इनका सिद्धांत संकुचन शक्ति पर आधारित है। पृथ्वी में संकुचन होने से उत्पन्न बल से अग्रदेशों में गति उत्पन्न होती है, जिससे प्रेरित होकर सम्पिडनात्मक बल के कारण भूसन्नति का मलवा वलीत होकर पर्वत का रूप धारण करता है। जहाँ पर आज पर्वत है, वहां पर पहले भू-सन्नतियां थी, जिन्हें कोबर ने पर्वत निर्माण स्थल बताया। इन भू-सन्नतियों के चारों ओर प्राचीन दृढ़ भूखण्ड (क्रैटोजेन) को ‘अग्रदेश’ बताया है, कोबर के अनुसार भूसन्नतिया लंबे तथा चौड़े जलपूर्ण गर्त थी।

         प्रत्येक भूसन्नति के किनारे पर दृढ़ भूखंड होते हैं, जिन्हें कोबर ने अग्रदेश (Foreland) बताया। इन दृढ़ भूखंडों के अपरदन से प्राप्त मलवा का नदियों द्वारा भूसन्नति में धीरे-धीरे जमा होता रहता है। अवसादों के जमाव के कारण भार में वृद्धि होने से भूसन्नति की तली में निरंतर धंसाव होता जाता है, इसे अवतलन की क्रिया कहते हैं। इन दोनों क्रियाओं के लंबे समय तक चलते रहने के कारण भूसन्नति में मलबों का जमाव अत्यंत गहराई तक हो जाती है तथा अधिक मात्रा में मलबा का निक्षेप हो जाता है। 

     जब भूसन्नति भर जाती है तो पृथ्वी के संकुचन से उत्पन्न क्षैतिज संपीडनात्मक बल के कारण भूसन्नति के दोनों अग्रदेश एक-दूसरे की ओर खिसकने लगते हैं। इसे पर्वत निर्माण की अवस्था कहते हैं। भूसन्नति के दोनों किनारों पर दो पर्वत श्रेणियों का निर्माण होता है, जिन्हें कोबर ने ‘रेन्डकेटेन’ (Rendketten) नाम दिया है। यदि संपीड़न का बल सामान्य होता है तो केवल किनारे वाले भाग ही वलित होते हैं तथा बीच का भाग वलन से अप्रभावित रहता है। इस अप्रभावित भाग को कोबर ने स्वाशिनवर्ग की संंज्ञा प्रदान की है, जिसे सामान्य रूप में मध्य पिंड (Median Mass) कहा जाता है। जब संपीडन का बल सर्वाधिक सक्रिय होता है तो भूसन्नति का संपूर्ण मलबा वलित होकर एक जटिल पर्वतमाला के रूप में परिवर्तित हो जाता है, जिसे नार्बे (Narbe) कहते है। ऐसी स्थिति मध्यपिंड का निर्माण नहीं होता है।

GEOSYNCLINE OROGEN THEORY-KOBER

        कोबर ने अपने विशिष्ट मध्य पिंड के आधार पर विश्व के वलित पर्वतों की संरचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। टेथीस भूसन्नति के उत्तर में यूरोप का स्थलीय भाग तथा दक्षिण में अफ्रीका का दृढ़ भूखण्ड था। इन दोनों अग्रदेशों के आमने-सामने सरकने के कारण अल्पाइन पर्वत श्रृंखला का निर्माण हुआ। अफ्रीका के उत्तर की ओर सरकने के कारण बेटीक कार्डिलरा, पेरेनिज प्राविन्स श्रेणियां, मुख्य आल्प्स, कार्पेथियंस, बाल्कन पर्वत तथा काकेशस का निर्माण हुआ।

   कोबर ने कई उदाहरणों के द्वारा अपने सिद्धांत को पुष्ट भी किया है। जैसे- हिमालय तथा कुनलून के बीच तिब्बत का पठार, टॉरस श्रेणी एवं पौंटिक श्रेणी के मध्य अनातोलिया का पठार, एल्बुर्ज एवं जैग्रोस पर्वत के मध्य ईरान का पठार, पिरेनीज श्रेणी (यूरोप) और एटलस पर्वत (अफ्रीका) के बीच भूमध्य सागर मध्यपिंड के रूप में है। इस तरह कोबर ने अपने सिद्धांत में मध्य पिंड की कल्पना करके पर्वतीकरण को उचित ढंग से समझाने का प्रयास किया है तथा मध्य पिंड की यह कल्पना कोबर के विशिष्ट पर्वत निर्माण स्थल की अच्छी तरह व्याख्या करती हैं। 

           हिमालय के निर्माण के विषय में कोबर ने बताया है कि पहले टेथि सागर था जिसके उतर में अंगारालैंड तथा दक्षिण में गोंडवाना लैंड अग्रदेश के रूप में थे। इयोसीन युग में दोनों आमने-सामने सरकने लगे, जिस कारण टेथिस के दोनों किनारों पर तलछट पर वलन पड़ने से उत्तर में कुनलुन पर्वत तथा दक्षिण में हिमालय की उत्तरी श्रेणी का निर्माण हुआ तथा दोनों के बीच तिब्बत का पठार मध्य पिंड के रूप में बचा रहा। आगे चलकर मध्य हिमालय तथा लघु शिवालिक श्रेणियों का भी निर्माण हुआ।

आलोचना

     यद्यपि कोबर महोदय ने पर्वतों के निर्माण को भली-भांति समझाने का प्रयास किया तथापि उसके भुसन्नत्ति सिद्धान्त में कुछ दोष पाये जाते है, जिनका उल्लेख निम्नलिखित है।-

1. पर्वतों के निर्माण के लिये पृथ्वी के सिकुड़ने से पैदा होने वाले जिस बल का वर्णन कोबर ने किया है, वह अपर्याप्त है।

2. कोबर के अनुसार भुसन्नत्ति के दोनों किनारे सरकते है जबकि स्वेस का मतानुसार भुसन्नति का एक ही किनारा सरकता है।

3. कोबर के सिद्धान्त से पूर्व-पश्चिम दिशा में फैले हुए पर्वतों (हिमालय,आल्पस) का स्पष्टीकरण तो हो जाता है, परन्तु उत्तर-दक्षिण दिशा में फैले पर्वतों (रॉकी, एंडिज) का स्पष्टीकरण नहीं हो पाता है।



Read More:

2. Best Internal Structure of The Earth / पृथ्वी की आंतरिक संरचना

Internal Structure of The Earth

(पृथ्वी की आंतरिक संरचना)

पृथ्वी की आंतरिक संरचना⇒Internal Structure of The Earth               

          पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवं भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

⇒ सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः प्रत्येक 32 मी० की गहराई पर 1℃  तापमान में बढ़ोतरी होती है।

      स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

चित्र: स्वेस के अनुसार पृथ्वी की आंतरिक संरचना

(1) सियाल (SIAL) 

       पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SIMA)

    स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NIFE)

      पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना

(Internal Structure of the Earth Based on Seismic Evidence):-

     भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सबसे अधिक वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। जिसके अनुसार पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा गया है-

1. भूपर्पटी (Crust)

2. भू-प्रावर (Mantle)

3. क्रोड (Core)

(1) भूपर्पटी (Crust):-

      यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% Crust में शामिल है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है। महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है। इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

★ भूपर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है। यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग, द्वितीयक तरंग, सतही तरंग, P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:-

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

       महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला/खुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है। महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टाने पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

(2) भू-प्रावार (Mantle):-

       भू-प्रावार की मोटाई मोहो असम्बद्धता से 2900 KM तक है। पृथ्वी के कुल आयतन का 83% और कुल द्रव्यमान का 68% भाग भूप्रावार में शामिल है। यह अधिक तापमान के कारण पिघली हुई अवस्था (द्रव) के समान है। भूप्रावार पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग  तो संचरित होती है लेकिन द्वितीयक तरंग विलुप्त हो जाती है। इसका निर्माण सिलिकन & मैग्नेशियम जैसे तत्वों से हुआ है। भूप्रावार का घनत्व 3 से 5.5 तक मानी जाती है। 

★ भूपर्पटी और भूप्रावार के बीच एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे मोहोअसम्बद्धता (Moho Discontinuty) कहते है।

★ क्रस्ट और मेंटल के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमण्डल/लिथोस्फेयर कहा जाता है।

★ स्थलमण्डल के नीचे वाले मण्डल को दुर्बलमण्डल (Aestheno Sphere) कहते है। होम्स ने बताया कि दुर्बलमण्डल में ही संवहन तरंगे चलती है। ये तरंगे इतनी शक्तिशाली होती है जो स्थलमण्डल को तोड़ने एवं मोड़ने की क्षमता रखती है।

(3) क्रोड(Core)/अंतरतम:-   

       यह पृथ्वी का केंद्रीय भाग है। इसका घनत्व -10 से 13.6 g/cm3 है। पृथ्वी के कुल आयतन का 16% एवं द्रव्यमान का 32% भाग क्रोड में शामिल है। क्रोड पृथ्वी का वह मण्डल है जसमें केवल प्राथमिक तरंगे गुजरती है। यह मण्डल निकेल & लोहा से निर्मित है। इसी कारण से पृथ्वी में चुम्बकीय गुण है। क्रोड अत्याधिक दबाव के कारण ठोस भाग के रूप में परिणत हो चुका है। क्रोड की औसत मोटाई 3471 KM है। Mantle और Core के बीच में एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे गुटेनबर्ग असम्बद्धता कहते हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को नीचे के चित्रों में भी देखा जा सकता है।

निष्कर्ष:- 

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संबंध में भूकम्पीय तरंग सबसे अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।


MCQs/UGC NET/JRF Quick Revision

1. पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने के लिए प्रत्यक्ष प्रमाणों की तुलना में अप्रत्यक्ष प्रमाण अधिक महत्वपूर्ण क्यों हैं?

Why are indirect evidences more important than direct evidences for understanding Earth’s interior?

(A) पृथ्वी के केंद्र तक प्रत्यक्ष रूप से पहुँचना संभव नहीं है / Direct access to Earth’s center is not possible

(B) सभी प्रत्यक्ष प्रमाण गलत हैं / All direct evidences are incorrect

(C) केवल surface rocks ही उपलब्ध हैं / Only surface rocks are available

(D) पृथ्वी की सतह पर कोई शैल नहीं मिलती / No rocks are found at the surface

Answer: (A)

2. निम्न में से कौन-सा पृथ्वी के आंतरिक भाग का सबसे महत्वपूर्ण अप्रत्यक्ष प्रमाण है?

Which is one of the most important indirect evidences of Earth’s interior?

(A) Seismic waves

(B) River sediments

(C) Atmospheric pressure

(D) Ocean tides

Answer: (A)

3. भूकंपीय तरंगों के संदर्भ में कौन-सा कथन सही है?

Which statement is correct regarding seismic waves?

(A) P-waves केवल solids में चलती हैं।

(B) S-waves केवल solids में propagate करती हैं।

(C) दोनों P और S waves केवल liquids में चलती हैं।

(D) S-waves gases में सबसे तेज चलती हैं।

Answer: (B)

4. P-wave और S-wave के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर क्या है?

What is the most important difference between P-waves and S-waves?

(A) P-waves compressional होती हैं, जबकि S-waves shear/transverse होती हैं।

(B) P-waves केवल liquids में चलती हैं।

(C) S-waves solids और liquids दोनों में समान रूप से चलती हैं।

(D) दोनों की प्रकृति बिल्कुल समान है।

Answer: (A)

5. यदि किसी पृथ्वी के आंतरिक layer में S-waves प्रवेश नहीं करती हैं, तो इससे क्या संकेत मिलता है?

If S-waves do not pass through a particular layer of Earth, what does this indicate?

(A) वह layer पूर्णतः solid है।

(B) वह layer liquid या shear waves को support न करने वाली अवस्था में है।

(C) वहाँ pressure शून्य है।

(D) वहाँ कोई पदार्थ नहीं है।

Answer: (B)

6. पृथ्वी के बाह्य क्रोड (Outer Core) के liquid होने का प्रमुख भूकंपीय प्रमाण क्या है?

What is the major seismic evidence for the liquid nature of Earth’s outer core?

(A) S-waves का outer core से होकर न गुजरना

(B) P-waves का mantle में न जाना

(C) Surface waves का समाप्त होना

(D) केवल gravity anomalies

Answer: (A)

7. पृथ्वी के आंतरिक क्रोड (Inner Core) के solid होने के समर्थन में कौन-सा प्रमाण महत्वपूर्ण है?

Which evidence supports the solid nature of Earth’s inner core?

(A) Inner core में S-wave-related behavior और seismic-wave observations

(B) Ocean currents

(C) Atmospheric circulation

(D) Surface temperature

Answer: (A)

8. पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संदर्भ में Mohorovičić Discontinuity (Moho) किसे अलग करती है?

What does the Mohorovičić Discontinuity (Moho) separate?

(A) Crust और mantle

(B) Mantle और outer core

(C) Outer core और inner core

(D) Lithosphere और atmosphere

Answer: (A)

9. Gutenberg Discontinuity किसके बीच स्थित है?

The Gutenberg Discontinuity occurs between:

(A) Crust और mantle

(B) Mantle और outer core

(C) Outer core और inner core

(D) Lithosphere और asthenosphere

Answer: (B)

10. Lehmann Discontinuity मुख्यतः किससे संबंधित है?

Lehmann Discontinuity is mainly associated with:

(A) Crust–mantle boundary

(B) Mantle–outer core boundary

(C) Outer core–inner core boundary

(D) Lithosphere–asthenosphere boundary

Answer: (C)

11. पृथ्वी की औसत त्रिज्या लगभग कितनी है?

What is the approximate mean radius of the Earth?

(A) 3,371 km

(B) 5,371 km

(C) 6,371 km

(D) 8,371 km

Answer: (C)

12. पृथ्वी की आंतरिक संरचना को रासायनिक आधार पर मुख्यतः किन layers में विभाजित किया जाता है?

On a compositional basis, Earth is mainly divided into which layers?

(A) Sial, Sima और Nife

(B) Lithosphere, Atmosphere और Hydrosphere

(C) Troposphere, Stratosphere और Mesosphere

(D) Ocean, Continent और Island

Answer: (A)

13. पृथ्वी की आंतरिक संरचना के mechanical/rheological classification में कौन-सा समूह अधिक उपयुक्त है?

Which is more appropriate in the mechanical/rheological classification of Earth’s interior?

(A) Lithosphere, Asthenosphere, Mesosphere, Outer Core, Inner Core

(B) Crust, River, Ocean, Atmosphere

(C) Mantle, Ocean, Glacier, Soil

(D) Core, Troposphere, Biosphere, Hydrosphere

Answer: (A)

14. Lithosphere की सबसे उपयुक्त विशेषता क्या है?

What is the most appropriate characteristic of the lithosphere?

(A) यह पूरी तरह molten layer है।

(B) यह केवल liquid core है।

(C) यह केवल oceanic crust से बनी है।

(D) यह rigid outer shell है जिसमें crust और uppermost mantle शामिल होते हैं।

Answer: (D)

15. Asthenosphere के संदर्भ में कौन-सा कथन अधिक उपयुक्त है?

Which statement is most appropriate regarding the asthenosphere?

(A) यह relatively weak/ductile zone है जो lithosphere के नीचे स्थित है।

(B) यह Earth’s inner core का दूसरा नाम है।

(C) यह atmosphere की सबसे निचली layer है।

(D) यह पूर्णतः rigid zone है।

Answer: (A)

16. Plate tectonics में Asthenosphere का महत्व मुख्यतः किस कारण है?

Why is the asthenosphere important in plate tectonics?

(A) इसकी relative ductility lithospheric plates के movement को facilitate करती है।

(B) यह पूरी तरह solid और immobile है।

(C) यह Earth’s magnetic field को directly generate करती है।

(D) यह केवल oceanic water store करती है।

Answer: (A)

17. Continental crust और oceanic crust के बीच कौन-सा अंतर सही है?

Which difference between continental and oceanic crust is correct?

(A) Oceanic crust सामान्यतः thicker और less dense होती है।

(B) दोनों की thickness और density बिल्कुल समान है।

(C) Continental crust सामान्यतः thicker और less dense होती है।

(D) Continental crust हमेशा basaltic होती है।

Answer: (C)

18. Oceanic crust का प्रमुख compositional association किससे है?

Oceanic crust is primarily associated compositionally with:

(A) Basaltic rocks

(B) Granitic rocks only

(C) Limestone only

(D) Coal

Answer: (A)

19. Continental crust का सामान्यतः कौन-सा rock association अधिक प्रसिद्ध है?

Which rock association is commonly associated with continental crust?

(A) केवल basaltic composition

(B) Granitic/felsic composition

(C) केवल ultramafic composition

(D) केवल metallic composition

Answer: (B)

20. पृथ्वी की सबसे मोटी आंतरिक layer कौन-सी है?

Which is the thickest major compositional layer of Earth?

(A) Crust

(B) Mantle

(C) Outer Core

(D) Inner Core

Answer: (B)

21. Mantle की प्रमुख mineralogical composition में कौन-सा तत्व समूह अधिक महत्वपूर्ण है?

Which elemental group is particularly important in the mantle’s composition?

(A) Magnesium और iron-rich silicate minerals

(B) केवल gold और silver

(C) केवल carbon

(D) केवल sodium chloride

Answer: (A)

22. Core की composition के संदर्भ में कौन-सा कथन अधिक स्वीकार्य है?

Which statement is more acceptable regarding the composition of the core?

(A) Iron और nickel सहित metallic elements का प्रमुख योगदान है।

(B) यह केवल silicate rocks से बना है।

(C) यह केवल water से बना है।

(D) इसमें कोई metallic element नहीं है।

Answer: (A)

23. पृथ्वी के केंद्र की ओर density बढ़ने का मुख्य कारण क्या है?

What is a major reason for increasing density toward Earth’s center?

(A) Increasing pressure और denser materials का concentration

(B) Gravity का समाप्त होना

(C) Temperature का हमेशा कम होना

(D) Water content का अत्यधिक बढ़ना

Answer: (A)

24. पृथ्वी के आंतरिक भाग में pressure के बारे में कौन-सा कथन सही है?

Which statement is correct about pressure inside Earth?

(A) Depth के साथ pressure हमेशा घटता है।

(B) Center पर pressure शून्य होता है।

(C) सामान्यतः depth के साथ pressure बढ़ता है।

(D) Pressure केवल crust में पाया जाता है।

Answer: (C)

25. पृथ्वी के अंदर तापमान के संबंध में सामान्य प्रवृत्ति क्या है?

What is the general trend of temperature inside Earth?

(A) Depth के साथ सामान्यतः तापमान बढ़ता है।

(B) Depth के साथ तापमान हमेशा घटता है।

(C) पूरे Earth में temperature समान है।

(D) Core का तापमान surface से कम है।

Answer: (A)

26. Geothermal gradient का अर्थ क्या है?

What is meant by geothermal gradient?

(A) Depth के साथ temperature में परिवर्तन की दर

(B) Latitude के साथ rainfall में परिवर्तन

(C) Longitude के साथ pressure का परिवर्तन

(D) Surface पर gravity का absolute value

Answer: (A)

27. निम्न में से कौन-सा पृथ्वी के आंतरिक भाग की जानकारी का अप्रत्यक्ष स्रोत नहीं है?

Which is NOT an indirect source of information about Earth’s interior?

(A) Seismic waves

(B) Gravity anomalies

(C) Magnetic field

(D) Deep borehole observations

Answer: (D)

28. Gravity anomalies पृथ्वी के आंतरिक भाग के बारे में क्या संकेत दे सकती हैं?

What can gravity anomalies indicate about Earth’s interior?

(A) Subsurface density variations

(B) केवल atmospheric humidity

(C) केवल ocean salinity

(D) केवल rainfall distribution

Answer: (A)

29. Earth’s magnetic field का अस्तित्व किस प्रकार के internal process से विशेष रूप से जुड़ा है?

Earth’s magnetic field is particularly associated with which internal process?

(A) Crust में rainfall

(B) Outer core में electrically conducting fluid की motion

(C) Mantle में केवल solidification

(D) Atmosphere में cloud formation

Answer: (B)

30. Geodynamo theory के अनुसार Earth’s magnetic field मुख्यतः किससे संबंधित है?

According to the geodynamo theory, Earth’s magnetic field is mainly related to:

(A) Electrically conducting fluid motion in the outer core

(B) केवल crustal weathering

(C) केवल ocean currents

(D) केवल atmospheric circulation

Answer: (A)

31. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1. P-waves solids और liquids दोनों से गुजर सकती हैं।

2. S-waves liquids से नहीं गुजरती हैं।

3. P-waves, S-waves की तुलना में generally faster होती हैं।

सही विकल्प चुनिए:

(A) केवल 1

(B) 1 और 2

(C) 2 और 3

(D) 1, 2 और 3

Answer: (D)

32. निम्नलिखित में से कौन-से पृथ्वी के आंतरिक भाग के अध्ययन के indirect evidences हैं?

1. Seismic waves

2. Gravity

3. Geomagnetism

4. Meteorites

(A) केवल 1 और 2

(B) 1, 2 और 3

(C) 2, 3 और 4

(D) 1, 2, 3 और 4

Answer: (D)

33. निम्नलिखित में से कौन-से पृथ्वी की compositional layers हैं?

1. Crust

2. Mantle

3. Core

4. Asthenosphere

(A) केवल 1 और 2

(B) 1, 2 और 3

(C) 2, 3 और 4

(D) 1, 2, 3 और 4

Answer: (B)

34. Assertion (A): S-waves outer core से होकर नहीं गुजरती हैं।

Reason (R): S-waves को propagate करने के लिए shear strength वाला medium चाहिए, जबकि outer core predominantly liquid है।

(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।

(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R सही व्याख्या नहीं है।

(C) A सही है, R गलत है।

(D) A गलत है, R सही है।

Answer: (A)

35. Assertion (A): पृथ्वी के center की ओर density सामान्यतः बढ़ती है।

Reason (R): Increasing pressure तथा denser metallic materials का concentration interior में अधिक है।

(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।

(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R सही व्याख्या नहीं है।

(C) A सही है, R गलत है।

(D) A गलत है, R सही है।

Answer: (A)

36. Assertion (A): Oceanic crust सामान्यतः continental crust से अधिक dense होती है।

Reason (R): Oceanic crust में basaltic/mafic composition का प्रभुत्व होता है।

(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।

(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R सही व्याख्या नहीं है।

(C) A सही है, R गलत है।

(D) A गलत है, R सही है।

Answer: (A)

37. Assertion (A): Lithosphere और Asthenosphere की mechanical properties अलग होती हैं।

Reason (R): Lithosphere relatively rigid है, जबकि Asthenosphere comparatively weak/ductile behavior प्रदर्शित करती है।

(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।

(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R सही व्याख्या नहीं है।

(C) A सही है, R गलत है।

(D) A गलत है, R सही है।

Answer: (A)

38. निम्नलिखित का सही मिलान कीजिए:

सूची-I सूची-II
A. Moho 1. Crust–Mantle boundary
B. Gutenberg 2. Mantle–Outer Core boundary
C. Lehmann 3. Outer Core–Inner Core boundary
D. Asthenosphere 4. Weak/ductile zone

(A) A-1, B-2, C-3, D-4

(B) A-2, B-1, C-4, D-3

(C) A-1, B-3, C-2, D-4

(D) A-4, B-2, C-3, D-1

Answer: (A)

39. निम्नलिखित का सही मिलान कीजिए:

सूची-I सूची-II
A. P-wave 1. Compressional
B. S-wave 2. Shear
C. Surface wave 3. Near-surface propagation
D. Geodynamo 4. Magnetic field generation
(A) A-1, B-2, C-3, D-4

(B) A-2, B-1, C-4, D-3

(C) A-3, B-2, C-1, D-4

(D) A-4, B-3, C-2, D-1

Answer: (A)

40. निम्न में से कौन-सा गलत सुमेलित है?

Which is incorrectly matched?

(A) Moho – Crust-Mantle boundary

(B) Gutenberg – Mantle-Core boundary

(C) Lehmann – Outer Core-Inner Core boundary

(D) Asthenosphere – Rigid metallic inner core

Answer: (D)

41. निम्न में से कौन-सा गलत सुमेलित है?

Which is incorrectly matched?

(A) P-wave – Primary wave

(B) S-wave – Secondary wave

(C) P-wave – Shear wave

(D) S-wave – Transverse wave

Answer: (C)

42. यदि किसी seismic wave की velocity अचानक बढ़ जाती है, तो यह किसकी ओर संकेत कर सकता है?

If the velocity of a seismic wave suddenly increases, what may it indicate?

(A) Material properties/density या rigidity में परिवर्तन वाली discontinuity

(B) पृथ्वी के rotation का रुकना

(C) केवल atmospheric pressure में परिवर्तन

(D) केवल rainfall में परिवर्तन

Answer: (A)

43. Seismic wave velocity मुख्यतः किन factors से प्रभावित होती है?

Seismic wave velocity is mainly influenced by which factors?

(A) केवल rainfall

(B) केवल latitude

(C) Elastic properties, density, pressure और temperature

(D) केवल ocean currents

Answer: (C)

44. पृथ्वी के आंतरिक भाग में seismic waves के refraction और reflection का अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है?

Why are refraction and reflection of seismic waves important in studying Earth’s interior?

(A) इससे internal boundaries और material changes का अनुमान लगाया जा सकता है।

(B) इससे केवल surface rainfall ज्ञात होती है।

(C) इससे केवल atmospheric composition ज्ञात होती है।

(D) इससे केवल ocean depth ज्ञात होती है।

Answer: (A)

45. यदि P-wave किसी boundary पर refract होती है और velocity में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देता है, तो इसका सबसे उपयुक्त interpretation क्या होगा?

If a P-wave refracts at a boundary and shows a marked change in velocity, what is the most appropriate interpretation?

(A) वहाँ material properties में बदलाव वाली internal discontinuity हो सकती है।

(B) वहाँ atmosphere समाप्त हो गया है।

(C) वहाँ gravity समाप्त हो गई है।

(D) वहाँ कोई material मौजूद नहीं है।

Answer: (A)

46. पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संदर्भ में shadow zone किससे संबंधित है?

In the context of Earth’s internal structure, what is a seismic shadow zone associated with?

(A) कुछ angular distances पर seismic waves के direct arrival का अभाव/कमजोरी

(B) केवल solar eclipse

(C) केवल atmospheric shadow

(D) केवल oceanic tides

Answer: (A)

47. P-wave shadow zone का प्रमुख कारण क्या है?

What is a major cause of the P-wave shadow zone?

(A) Atmosphere का पूर्ण अभाव

(B) केवल continental drift

(C) Core boundary पर strong refraction और outer core की seismic properties

(D) केवल ocean currents

Answer: (C)

48. Meteorites को पृथ्वी के interior के अध्ययन में उपयोगी क्यों माना जाता है?

Why are meteorites considered useful in studying Earth’s interior?

(A) वे Solar System के प्रारंभिक पदार्थ और planetary composition के बारे में clues प्रदान कर सकते हैं।

(B) वे सीधे Earth’s core से बाहर आते हैं।

(C) वे केवल atmospheric gases से बने हैं।

(D) उनका Earth की composition से कोई संबंध नहीं है।

Answer: (A)

49. यदि किसी planet के interior में S-waves का एक बड़े क्षेत्र में propagation नहीं होता, तो सबसे तार्किक inference क्या होगा?

If S-waves do not propagate through a large internal region of a planet, what is the most logical inference?

(A) पूरा planet gaseous है।

(B) उस region में liquid या बहुत कमजोर shear strength वाला material हो सकता है।

(C) उस planet में gravity नहीं है।

(D) वहाँ temperature शून्य है।

Answer: (B)

50. पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के लिए सबसे व्यापक और वैज्ञानिक approach कौन-सा है?

Which is the most comprehensive scientific approach for studying Earth’s internal structure?

(A) केवल surface rocks का अध्ययन

(B) केवल volcanic eruptions का अध्ययन

(C) Seismology + gravity + geomagnetism + heat flow + meteorites + geological evidence का संयुक्त अध्ययन

(D) केवल atmospheric observations

Answer: (C)

UGC NET/JRF Quick Revision

Concept Key Point
Crust पृथ्वी की सबसे बाहरी compositional layer
Mantle सबसे मोटी major compositional layer
Core मुख्यतः metallic, Fe-Ni rich
Outer Core Predominantly liquid
Inner Core Predominantly solid
Moho Crust–Mantle boundary
Gutenberg Mantle–Outer Core boundary
Lehmann Outer Core–Inner Core boundary
P-Wave Compressional, fastest body wave
S-Wave Shear, liquids में propagate नहीं करती
Lithosphere Rigid outer mechanical layer
Asthenosphere Relatively weak/ductile zone
Geothermal Gradient Depth के साथ temperature change
Gravity Anomaly Subsurface density variation
Geomagnetism Earth’s magnetic field से संबंधित
Geodynamo Outer core में conducting fluid motion
Shadow Zone Seismic-wave behavior से संबंधित
Meteorites Planetary/Solar System composition के clues

Read More:

8.  AIRMASS (वायुराशि)

8.  AIRMASS (वायुराशि)



AIRMASS (वायुराशि)

नोट:-
c = महाद्वीपीय (Continental)
m = महासागरीय (Maritime)
P = ध्रुवीय (Polar)
T = उष्ण कटिबंधीय (Tropical)
s =  स्थिर (Stable)
u = अस्थिर (Unstable)
k = ठंडी (Kant or Cold)
w = गर्म (Warm) 

संकल्पना

     वायुराशि जलवायु विज्ञान की अध्ययन की एक प्रमुख घटक मानी जाती है। वायुराशि की संकल्पना को जलवायु विज्ञान में लाने का श्रेय टॉर, बर्गरान, जे.बर्कनीज और सोलबर्ग को जाता है। इस संकल्पना का विकास 20वीं शताब्दी के तीसरे दशक में किया गया था

      वायुराशि को भिन्न-भिन्न जलवायुवेताओं ने परिभाषित करने का प्रयास किया है जिनमें ट्रीवार्था, डी. पैटरसन और जे. क्रिचफील्ड का नाम उल्लेखनीय है। ट्रीवार्था महोदय ने वायुराशि को परिभाषित करते हुए कहा “वायुराशियाँ वायुमंडल का ही एक ऐसा सुविस्तृत अंश है जिसका ताप एवं आर्द्रता संबंधी विशेषता लगभग समान होता है।” ट्रीवार्था की ही परिभाषा को सर्वमान्य परिभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है। इनके परिभाषा की व्याख्या करते हुए कहा जाता है कि किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में समान भौतिक विशेषताओं के साथ उपस्थित वायुपूँज को वायुराशि कहते हैं। यहाँ समान भौतिक विशेषता का तात्पर्य वायु के तापमान, आर्द्रता एवं स्थिरता जैसे गुणों से होता है। जहाँ इन गुणों में एकाएक असमानता प्रकट होती है वहीं वायुराशि की सीमा समझी जाती है। किसी भी वायुराशि की भौतिक गुण स्रोत क्षेत्र, सतह की विशेषता, निम्न अथवा उच्च अक्षांशीय क्षेत्र में गमन एवं समय पर निर्भर करता है।

वायुराशि की विशेषताएँ

       वायुराशियाँ की निम्नलिखित विशेषताएँ होती है-

◆ किसी भी वायुराशि में समताप एवं समदाब रेखाएँ एक-दूसरे के समानांतर होती है। इस स्थिति को जलवायु विज्ञान में बैरोट्रैपिक से संबोधित किया जाता है।

◆ अगर किसी वायुराशि में समदाब एवं समताप रेखाएँ एक-दूसरे को काटने लगती है तो उस स्थिति को जलवायु विज्ञान में बैरोक्लिनिक  स्थिति से संबोधित करते हैं। 

बैरोक्लिनिक  स्थिति

◆ वायुमंडल के निचले भाग में उच्च वायुदाब के क्षेत्र वायुराशि की उत्पत्ति के स्रोत क्षेत्र होते हैं और निम्न वायुदाब के क्षेत्र वायुराशि के लक्षण होते हैं।

◆ स्रोत क्षेत्र में वायुराशि में ऊर्ध्वाधर गमन की स्थिति होती है। इसलिए स्रोत क्षेत्र की वायुराशि को स्थिर वायुराशि कहते है। इसमें क्षैतिज गतिशीलता पायी जाती है। ज्यों-ज्यों कोई भी वायुराशि अपने स्रोत क्षेत्र से दूर जाती है त्यों-त्यों उसके भौतिक विशेषता में परिवर्तन आता जाता है। जैसे-

(i) स्रोत क्षेत्र में वायु प्रतिचक्रवात के स्थिति में रहती है तथा वायु ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृत्ति रखती हैं जबकि स्रोत क्षेत्र से दूर जाती हुई वायुराशि में वायु क्षैतिज रूप से गमन करती है तथा प्रति चक्रवात की स्थिति नहीं रहती।

(ii) स्रोत क्षेत्र की वायुराशि में तापमान कम, आर्द्रता का अभाव एवं दृश्यता अधिक होती है जबकि लक्ष्य क्षेत्र की ओर जाती हुई वायुराशि में भौतिक विशेषताएँ अक्षांश, धरातलीय स्थिति, स्रोत क्षेत्र से दूरी और समय जैसे कारकों पर निर्भर करती है।

◆ स्रोत क्षेत्र के वायुराशि में बादल एवं वर्षण का अभाव होता है। जबकि स्रोत क्षेत्र से आती हुई वायुराशि में उपरोक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है।

◆अगर क्षैतिज रुप से गमन करती हुई वायुराशि निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर जाती है तो उसका तापमान धीरे-धीरे घटता है। जबकि उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर आने वाले वायुराशि की तापमान बढ़ती है। जिसके कारण कई प्रकर के मौसमी परिवर्तन होते हैं। जैसे- दृश्यता में परिवर्तन होता है। बादल का निर्माण एवं वर्षण का कार्य होता है।

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि अलग-अलग वायुराशियों के अलग-अलग भौतिक विशेषताएँ होती हैं। ये विशेषताएँ धरातल की विशेषता, अक्षांश जैसे कारकों पर निर्भर करती हैं।

वायुराशियों का वर्गीकरण

          विभिन्न भूगोलवेत्ताओं ने वायुराशि को भिन्न-2 प्रकार से वर्गीकृत करने का प्रयास किया है। सामान्य तौर पर वायुराशियों का वर्गीकरण चार आधार पर किया जाता है-

(1) वायुराशि की उत्पत्ति क्षेत्र के आधार पर

(2) उत्पति क्षेत्र की धरातलीय विशेषता के आधार पर

(3) वायुराशि की तापीय विशेषता के आधार पर

(4) वायुराशि की स्थिरता एवं अस्थिरता के आधार पर

वायुराशि को उत्पत्ति क्षेत्र के आधार पर दो भागों में बाँटते है-

(i) उष्ण कटिबंधीय वायुराशि

(ii) ध्रुवीय वायुराशि

     उष्ण कटिबंधीय वायुराशि उत्पत्ति निम्न अक्षांशीय क्षेत्रों/उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में होती है। ऐसी वायुराशि को अंग्रेजी के बड़े अक्षर T के द्वारा दर्शाया जाता है।     

    ध्रुवीय वायुराशि की उत्पत्ति उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में होती है। इसे अंग्रेजी के बड़े अक्षर P के द्वारा प्रदर्शित करते हैं।

     उत्पत्ति क्षेत्र की धरातलीय विशेषता के आधार पर वायुराशि को पुनः दो भागों में बाँटते है:-

(i) महासागरीय वायुराशि

(ii) महाद्वीपीय वायुराशि

    महाद्वीपीय वायुराशि को अंग्रेजी के छोटे अक्षर c और महासागरीय वायुराशि को m के द्वारा निरूपित करते हैं।

    साधारणत: कोई भी वायुराशि अपने स्रोत क्षेत्र से उत्पन्न होकर लक्ष्य क्षेत्र की ओर गमन करने की प्रवृत्ति रखती है। इसे ऊष्मा गति परिवर्तन भी कहते हैं। निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर जाने वाली वायुराशि धीरे-धीरे ठंडा होने की प्रवृत्ति रखती है जबकि उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर आने वाली वायु गर्म होने की प्रवृत्ति रखती है। गर्म वायुराशि के लिए अंग्रेजी के छोटा अक्षर w और ठंडी वायुराशि के लिए अंग्रेजी के छोटा अक्षर k का प्रयोग किया जाता है

     अधिकांश मौसम वैज्ञानिक उपरोक्त तीनों आधार पर ही वायुराशि के वर्गीकरण को औचित्यपूर्ण मानते हैं लेकिन कुछ मौसम वैज्ञानिक वायुराशि की स्थिरता एवं अस्थिरता के आधार पर भी वायुराशि को दो भागों में बाँटते हैं:-

(i)  स्थिर वायुराशि

(ii) अस्थिर वायुराशि

     स्थिर वायुराशि के लिए अंग्रेजी के छोटे अक्षर  s और अस्थिर वायुराशि के लिए अंग्रेजी के छोटा अक्षर u का प्रयोग किया जाता है।

     उपरोक्त सभी अक्षरों को मिलाकर जैकोब एवं  जक्रेन्स  महोदय ने वायुराशि का एक संशोधित वर्गीकरण प्रस्तुत किया जिसे नीचे के फलों चार्ट में देखा जा सकता है।

वायुराशियों के वर्गीकरण में यदि मौसमी विशेषताओं को छोड़ दिया जाए तो मुख्य रूप से चार वायुराशि मानी जाती है –

(1) महाद्वीपीय ध्रुवीय वायुराशि (cP)

(2) महासागरीय ध्रुवीय वायुराशि (mP)

(3) महाद्वीपीय उष्ण कटिबंधीय वायुराशि (cT)

(4) महासागरीय उष्ण कटिबंधीय वायुराशि (mT)

वायुराशियों की उत्पत्ति

    वायुराशियों की उत्पत्ति की व्याख्या हेडली कोशिका के माध्यम से करते हैं। धरातल पर अवस्थित सभी उच्च वायुदाब के क्षेत्र ही वायुराशि के स्रोत क्षेत्र या स्थिर वायुराशि के क्षेत्र होते हैं। ज्यों ही स्रोत क्षेत्र से वायुराशियाँ अपने लक्ष्य क्षेत्र की ओर गमन करती है त्यों ही प्रचलित वायु या अस्थिर वायुराशि को जन्म देती है। अस्थिर वायुराशियाँ ही अक्षांशीय एवं धरातलीय विशेषता को ग्रहण कर गौण वायुराशियों को जन्म देती है।

प्रमुख वायुराशियों का वितरण, संचलन एवं मौसमी विशेषताएँ

      मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार वायुराशियाँ मुख्यतः चार प्रकार की होती है। शेष वायुराशियों को गौण वायुराशि कहा जाता है। प्रमुख वायुराशियों की वितरण, संचालन एवं उसमें विशेषताएँ निम्नलिखित प्रकार से हैं-

(1) महाद्वीपीय ध्रुवीय वायुराशि (cP)

       इस वायुराशि का वास्तविक फैलाव उतरी अमेरिका के उत्तरी एवं मध्यवर्ती भाग में, ग्रीनलैण्ड और साइबेरिया क्षेत्र में पायी जाती है। उत्तरी अमेरिका में जाड़ें की ऋतु में सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण इस वायुराशि का फैलाव महान झील तक हो जाता है। गर्मी की ऋतु में सूर्य के उत्तरायण होने के कारण यह वायुराशि हडसन की खाड़ी तक स्थानांतरित हो जाती है।  

       ध्रुवीय महाद्वीपीय वायुराशि के कारण मौसम में व्यापक बदलाव देखी जाती है क्योंकि यह ठंडी वायुराशि का स्रोत क्षेत्र है। शीत ऋतु में बर्फीली हवाओं को जन्म देती है। ध्रुवीय महाद्वीपीय वायुराशि धरातल पर बैठ कर दो दिशाओं में बहती है।

(i) उ०-पूर्व से द०-पश्चिम की ओर

(ii) द०-प० से उ०-पूर्व की ओर

       उत्तर-पूर्व से द० पश्चिम की ओर चलने वाली ध्रुवीय महाद्वीपीय हवाएँ USA के दक्षिणी भाग तक तापमान में भारी गिरावट लाती है। इससे कड़ाके की सर्दी पड़ती है। बर्फीली हवाएँ चलती है। मौसम कष्टदायक बन जाता है। पाला पड़ने से कपास, आलू, प्याज, तम्बाकू जैसे फसलें बर्बाद हो जाती है। जब यह वायुराशि बर्फ से युक्त होती है तो ब्लिजार्ड और नॉर्थन जैसे स्थानीय हवा को जन्म देती है।

     लेकिन जो वायुराशि द-प० से उ०-पूरब दिशा की ओर जाती है तो वह समुद्री सतह से ताप एवं आर्द्रता ग्रहण करने की प्रवृति रखती है। लेकिन स्रोत क्षेत्र छोड़ने के कुछ देर बाद अक्षांशीय प्रभाव पड़ने लगता है जिसके कारण संघनन क्रिया के द्वारा तटीय क्षेत्रों में कुहरा का निर्माण करती है जिससे दृश्यता बहुत कम हो जाती है। कभी-कभी ठण्डी हवा एवं कुहरा भरे वातावरण के कारण बूँदा-बाँदी वर्षा भी होती है। न्यूफाउंडलैंड के पास विश्व का सबसे घना कुहरा का निर्माण इसी के कारण होता है।

       साइबेरिया प्रदेश की ध्रुवीय वायुराशि की हवाएँ मुख्यतः प्रशांत महासागर की ओर जाती है जिसके कारण रूस का सखालिन द्वीप जापान के होकैडो एवं होंशू द्वीप के पश्चिमी तट पर कड़ाके की सर्दी उत्पन्न करती है। इसी क्षेत्र की वायुराशि में भी ऋतु बदलाव एवं संकुचन देखा जाता है। शीत ऋतु में यह वायुराशि दक्षिण की ओर फैल कर भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुँच जाती है जिसके कारण शीत ऋतु में उत्तर भारत में शीतलहरी का आगमन होता है।

(2) महासागरीय ध्रुवीय वायुराशि (mP)

      महासागरीय ध्रुवीय वायुराशि का फैलाव मुख्यतः उत्तरी अटलांटिक महासागर और आर्कटिक महासागर के ऊपर होता है। यहाँ चलने वाली वायु को महासागरीय ध्रुवीय वायु भी कहा जाता है। इसकी दिशा दक्षिण-पश्चिम की ओर होती है। चूँकि यह हवा समुद्र के ऊपर से होकर गुजरती है इसलिए इसके तापमान आर्द्रता इत्यादि में वृद्धि क्रमबद्ध तरीके से होती है। यह पछुआ हवा से मिलकर शीतोष्ण चक्रवात को जन्म देती है। पश्चिमी यूरोप की जलवायु इसी वायुराशि से नियंत्रित होती है। 

(3) महाद्वीपीय उष्ण कटिबंधीय वायुराशि (cT)

     यह वायुराशि वाणिज्यिक एवं पछुआ हवा को जन्म देती हैं। इस वायुराशि की उत्पत्ति दोनों गोलार्द्धों में महाद्वीपों के ऊपर 30° से 35° अक्षांश के बीच होता है। इससे चलने वाली हवाएँ उच्च एवं निम्न दोनों अक्षांश की ओर जाती है। उच्च अक्षांश की ओर जाने वाली हवाओं की आर्द्रता में तो वृद्धि होती है लेकिन कुछ दूरी तय करने के बाद उसके ताप में गिरावट आती है। तापीय गिरावट के कारण बादलों का निर्माण होता है। कभी-कभी बूँदा-बूँदी वर्षा भी होती है। निम्न अक्षांश की ओर जाने वाली वायु और अधिक आर्द्रता एवं ताप ग्रहण कर कभी-कभी उष्णकटिबंधीय चक्रवात को जन्म देती है। विषुवतीय क्षेत्रों में जाकर अंतर उष्ण अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का निर्माण करती है।

(4) महासागरीय उष्ण कटिबंधीय वायुराशि (mT)

    महासागरीय उष्ण वायुराशि का जन्म महासागरीय सतह पर 30° से 35° अक्षांश के बीच होता है। यह हवाएँ उच्च एवं निम्न अक्षांश की ओर चला करती है। उच्च अक्षांश की ओर जाने वाली महासागरीय उष्ण वायुराशि महासागरीय ध्रुवीय वायुराशि से मिलकर शीतोष्ण चक्रवात को जन्म देती है। शीतोष्ण चक्रवात में 4 तरह के वाताग्र का निर्माण होता है जिसके कारण प्रत्येक वाताग्र में अलग-अलग मौसमी परिस्थितियाँ को जन्म देती है।

     निम्न अक्षांश की ओर चलने वाले महासागरीय उष्ण वायुराशि विषुवतीय क्षेत्रों में जाकर डोलड्रम/शांत पेटी का निर्माण करती है। शांत पेटी में वायु स्थिर रूप से ऊपर की ओर जाने की प्रवृत्ति रखती है। यहां दोपहर के बाद प्रतिदिन संवहनीय वर्षा होती है।

निष्कर्ष:-

         इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि अलग-अलग वायुराशियों की क्षेत्रीय वितरण, संचालन और मौसमी विशेषताओं  में काफी विभिन्नताएँ पाई जाती है।


Read More:-

7. Cause and Effect of Global Warming (भूमंडलीय उष्मण के कारण एवं परिणाम)

7. Cause and Effect of Global Warming 

(भूमंडलीय उष्मण के कारण एवं परिणाम)


Cause and Effect of Global Warming 

भूमंडलीय उष्मण के कारण एवं परिणाम⇒Cause and Effect of Global Warming

           भू-मंडल के निरंतर बढ़ते हुए तापमान को ‘भूमंडलीय उष्मण’ कहा जाता है। इसे ‘ग्लोबल वार्मिंग’ या ‘वैश्विक तापन’ के नाम से भी जाना जाता है। भूमंडलीय उष्मण वर्तमान समय की प्रमुख विश्वव्यापी पर्यावरणीय समस्या है। वायुमंडल में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड गैस पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने वाली प्रमुख गैस है। इसके अलावा मिथेन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, नाइट्रस ऑक्साइड, हैलोन आदि ग्रीन हाउस गैसें भी भूमंडलीय उष्मण वृद्धि में योगदान देती है। ये गैसें दीर्घ तरंगी पार्थिव विकिरण को वायुमंडल से बाहर जाने से रोक देती है। परिणाम स्वरूप तापमान बढ़ने से पृथ्वी का ताप संतुलन बिगड़ जाता है। भूमंडलीय तापमान में इस वृद्धि को ही वैज्ञानिक शब्दावली में ‘ग्लोबल वार्मिंग’ करते हैं।

         सौर विकिरण ऊर्जा का लगभग 51% भाग लघु तरंगों के रूप में वायुमंडल को पार कर पृथ्वी के धरातल पर पहुंचता है। पृथ्वी का वायुमंडल लघु तरंग सौर्यीक विकिरण के लिए पारदर्शी होता है। अतः सौर विकरण बिना किसी रूकावट के धरातल पर पहुँचता है।लघु तरंगें पृथ्वी से टकराकर ऊष्मा में परिवर्तित हो जाती है। यह ऊष्मा दीर्घ तरंगों को अवशोषित कर लेती है तथा ऊष्मा की तरंगों को वायुमंडल से बाहर जाने से रोक देती है।

      पार्थिव विकिरण (दीर्घ तरंग) अवरुद्ध हो जाने से पृथ्वी के धरातल का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। ऐसी अवस्था में वायुमंडल ‘ग्रीन हाउस’ के शीशे की भाँति काम करता है और पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हो जाती है। इसे ‘ग्रीन हाउस प्रभाव’ कहा जाता है।Cause and Effect of Global Warming

       निरंतर बढ़ता हुआ सान्द्रण भूमंडलीय तापमान में वृद्धि के लिए उत्तरदायी है। 1861 के बाद पृथ्वी के तापमान में निरंतर वृद्धि हो रही है क्योंकि 1861 से तापमान संबंधी उपकरणों द्वारा अंकित विश्वसनीय आँकड़े उपलब्ध है। ग्लोबल वार्मिंग के संबंध में उचित जानकारी प्राप्त करने हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1988 में ‘Inner Governmental Pannel on Climate Change (IPCC) का गठन किया।

         1995 ई० में UNO द्वारा गठित IPCC के अंतर्गत दो हजार वैज्ञानिकों ने वैश्विक तापमान के संबंध में आँकड़े एकत्रित किये जिससे यह साबित हुआ कि विश्व के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार 1861 से 1990 तक पृथ्वी का औसत तापमान में 0.6℃ की वृद्धि हुई जो 2020 तक बढ़कर 1.5℃ तक होने की संभावना है। WHO के अनुसार 1900-1990 के बीच विश्व के तापमान में 0.5℃ तापमान में वृद्धि हुई है। विश्व में तापमान बढ़ने के अगर यही प्रवृत्ति रही तो 2050 ई० तक विश्व का औसत तापमान बढ़कर 19℃ हो जाने की संभावना है।

        वैश्विक तापन कोई नई घटना नहीं है। भूगर्भिक काल के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि कार्बोनिफेरस युग और प्लेस्टोसीन युग में कई बार हिमयुग एवं अंतर हिमानी का युग आया। हिमयुग के दौरान तापमान में कमी आ जाती थी और अंतरहिमयुग में तापमान में बढ़ोतरी हो जाती थी। लेकिन ये सभी प्रक्रियाएँ प्राकृतिक कारकों द्वारा नियंत्रित होती थी। लेकिन वर्तमान समय में हो रहे तापमान में वृद्धि मानव क्रिया की प्रतिक्रिया के फलस्वरुप हो रहा है। वैश्विक तापन किसी एक कार्य का परिणाम नहीं है बल्कि अनेक अंतर क्रियाओं की देन है।

भूमंडलीय उष्मण के कारण: 

       भूमंडलीय उष्मण के कई कारण हैं। इनमें प्रमुख कारण निम्नवत है-

(i) ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि,

(ii) वनीय ह्रास,

(iii) ताप विद्युत संयंत्रों की स्थापना,

(iv) ओजोन परत में छिद्रीकरण,

(v) एलनीनो जलधारा,

(vi) निर्माण कार्य,

(vii) जीवाश्म ईंधनों का दहन,

(viii) औद्योगिकरण,

(ix) नगरीकरण,

(x) जनसंख्या में वृद्धि इत्यादि।

(i) ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि-

            भूमण्डलीय उष्मण के लिए मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, हेलोन इत्यादि गैसें उत्तरदायी है। इन गैसों का सान्द्रण वायुमंडल में निरंतर बढ़ता जा रहा है। ये गैसें वायुमंडल में ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करती है। परिणामस्वरूप पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है। ग्रीन हाउस गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा भूमंडलीय ऊष्मण के लिये सर्वाधिक उत्तरदायी हैं।

       वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड बड़ी मात्रा में जीवाश्म ईंधन के जलने से, परिवहन साधनों से, औद्योगिकरण एवं नगरीकरण से, बढ़ती हुई जनसंख्या से प्राप्त हो रहा है। औद्योगिक क्रांति के पूर्व प्रतिवर्ष 2.8 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता था और उसका भी 30% भाग समुद्री वातावरण द्वारा अवशोषित कर लिया जाता था। 1997 में यह मात्रा बढ़कर 5.5 बिलियन टन प्रतिवर्ष हो गया। 2050 में इसका उत्सर्जन बढ़कर 5.6 बिलियन टन हो जाने की संभावना है। समुद्री वातावरण द्वारा इसकी अवशोषण की मात्रा नियत होने के कारण वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से वैश्विक तापन की समस्या उत्पन्न हुई है।

(ii) वनीय ह्रास-

      पेड़-पौधों कार्बन डाइऑक्साइड के अच्छे अवशोषक होते हैं। अर्थात पेड़-पौधे कार्बन डाइऑक्साइड भोजन निर्माण के दौरान ग्रहण करते हैं और ऑक्सीजन का उत्सर्जन करते हैं लेकिन जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के साथ वनों की अंधाधुंध कटाई ने विकट पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं।

      आवास एवं कृषि योग्य भूमि में विस्तार के कारण बीसवीं शताब्दी में उष्णकटिबंधीय वनों का तीव्र गति से ह्रास हुआ। भारत में प्रतिवर्ष अनुमानत: 17 लाख हेक्टेयर वनों की कटाई हो रही है। फलत: वनीय ह्रास के कारण कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण घटने से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ते जा रही है। इसके कारण भूमंडलीय ऊष्मण में वृद्धि हो रही है।

(iii) तापविद्युत संयंत्रों की स्थापना-

       विश्व में बढ़ती हुई विद्युत ऊर्जा की माँग एवं पूर्ति हेतु काफी संख्या में तापीय संयंत्रों की स्थापना की गई है। इन संयंत्रों में वृहत पैमाने पर जीवाश्म ईंधन का प्रयोग विद्युत उत्पादन हेतु किया जाता है। इसके कारण इससे भारी मात्रा में CO2, CO, NO2, NO, SO2, इत्यादि हानिकारक गैस उत्सर्जित होते हैं। ये सभी गैसें तापमान में वृद्धि के लिए उत्तरदायी माने जाते हैं।

(iv) ओजोन परत में छिद्रीकरण- 

       ओजोन परत के छिद्रीकरण से तात्पर्य वायुमंडल की ओजोन परत में ओजोन नामक विशिष्ट गैस की कमी हो जाने से है। ओजोन एक त्रि-परमाण्विक गैस है जिसमें ऑक्सीजन के 3 परमाणु (O3) होते हैं। ओजोन समताप मंडल में धरातल से 20 से 35 किलोमीटर की ऊँचाई तक सर्वाधिक पाई जाती है। इसी भाग को ‘ओजोन परत’ कहा जाता है।

      यह परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी के वायुमंडल में आने से रोक कर सुरक्षा कवच की तरह कार्य करती है किंतु विगत कुछ दशकों से मानवीय क्रियाकलापों द्वारा उत्सर्जित हानिकारक रसायनों जैसे- क्लोरोफ्लोरोकार्बन, नाइट्रस ऑक्साइड, कार्बन टेट्राक्लोराइड, क्लोरोफॉर्म और क्लोरीन इत्यादि के कारण ओजोन परत पतली होती जा रही है। जिसे ‘ओजोन छिद्रीकरण’ कहते हैं। ओजोन छिद्रीकरण भूमंडलीय उष्मण का एक प्रमुख कारण माना जाता है। 

(v) एलनीनो जलधारा- 

       अलनीनो उपसतही गर्म जलधारा है जो पेरू के तट से उत्पन्न होता है और विषुवत रेखा के सहारे पूर्वी अफ्रीका के तट तक फैल जाता है। इसके कारण समुद्र का तापमान 3℃ से 6℃ तक बढ़ जाता है। 1998 के पूर्व अलनीनो का प्रभाव चक्रीय रूप से 4 वर्ष के बाद दिखाई देता था। लेकिन 1998 के बाद इसका प्रभाव प्रत्येक वर्ष देखा जा रहा है। 

(vi) निर्माण कार्य- 

         बढ़ती हुई जनसंख्या के मद्देनजर लगातार निर्माण का कार्य जारी है। अर्थात शहर के नाम पर सीमेंट और कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं। यह ऐसे जंगल है जिनमें वृक्ष का अभाव है। इसके कारण ये थोड़ी सी ताप प्राप्त कर स्थानीय वातावरण को गर्म कर देते हैं। जैसे- वर्ष 1998 में शिकागो नगर का तापमान 50℃ पहुँच गया। वर्ष 2004 में फ्रांस के कई नगरों का तापमान इतना अधिक बढ़ गया कि लगभग 200 लोग लू लगने से मर गए।

         उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त जीवाश्म ईंधनों का दहन, औद्योगिकरण, नगरीकरण, उपभोक्तावादी जीवन, जनसंख्या वृद्धि इत्यादि के कारण भी भूमंडलीय उष्मण में वृद्धि हो रही है।

भूमण्डलीय उष्मण के परिणाम:- 

          भूमंडलीय उष्मण वर्तमान शताब्दी की सबसे बड़ी पर्यावरणीय समस्या है। 3 फरवरी 2007 में आई.पी.सी.सी. द्वारा जारी की गई विश्वसनीय रिपोर्ट में भूमंडलीय उष्मण के कारण उत्पन्न भयानक परिणामों की ओर संकेत किया गया है। इसके कारण पृथ्वी के वातावरण पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ सकते है:-

(i) समुद्री जल स्तर में वृद्धि- भूमंडलीय उष्मण के कारण ध्रुवीय क्षेत्रों तथा पर्वतीय हिमनदों के पिघलने से समुद्री जल स्तर के ऊपर उठने की आशंका है। इसके कारण तटीय इलाके जलमग्न हो जाएगे।

(ii) समुद्री जीवों पर संकट- तापमान वृद्धि का बुरा प्रभाव समुद्री जीवों पर भी पड़ेगा। उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव पर रहने वाले सील, पेंग्विन, व्हेल आदी समुद्री जीवों के नष्ट हो जाने की आशंका है।

(iii) जलवायु परिवर्तन- तापमान में वृद्धि के कारण मौसम में लगातार अभूतपूर्व परिवर्तन हो रहे हैं। परिणामस्वरूप अनावृष्टि, अतिवृष्टि, अकाल, लू और गर्म हवाओं का प्रकोप बढ़ने की संभावना है।

(iv) जमीन की उर्वरता में कमी- भू-मंडलीय उष्मण के कारण जमीन की उर्वरता घटने की आशंका है। परिणामस्वरूप फसल उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

(v) जैव विविधत का ह्रास- पृथ्वी के बढ़ते तापमान के कारण जैव-विविधता का ह्रास होने की आशंका है। कई जीव-जंतु और वनस्पतियाँ जलवायु परिवर्तन के कारण विलुप्त हो जाएगे।

(vi) प्रवाल भित्तियों का क्षरण- तापमान में बढ़ोतरी और असमान परिवर्तन के कारण विश्व प्रसिद्ध प्रवाल भित्तियाँ कुछ दशकों में नष्ट हो जायेंगे।

(vii) पर्वतीय हिमनदों का सिकुड़ना- तापमान में वृद्धि के कारण पर्वतीय हिमनद निरंतर पिघलते जा रहे हैं। जिन नदियों का उद्गम स्रोत पर्वतीय हिमनद है, उनमें भयंकर बाढ़ आने की आशंका है तथा हिमनद के नष्ट हो जाने से सदावाहिनी नदियों के सूखने का अंदेशा है। हिमालय क्षेत्र में कई हिमनद सिकुड़ते जा रहे हैं।

(viii) मानव स्वास्थ्य को खतरा- तापमान वृद्धि से मानव स्वास्थ्य को भी गंभीर खतरा है। जलवायु में परिवर्तन के कारण मध्य एवं उच्च अक्षांशों में कई जल जनित और कीटाणु जनित रोगों के फैलने की आशंका है। त्वचा कैंसर एवं आंखों से संबंधित बीमारियाँ बढ़ेंगी।

(ix) पारिस्थितिक असंतुलन- भूमंडलीय उष्मण के कारण पृथ्वी पर अवस्थित सभी पारिस्थितिक तंत्र में असंतुलन बढ़ रही है। परिणाम स्वरूप समस्त जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा।

(x) दावानल में वृद्धि- वैश्विक तापन के कारण दावानल में वृद्धि की संभावना है। USA के कैलिफोर्निया क्षेत्र, आस्ट्रेलिया तथा इंडोनेशिया के जंगलों में यह समस्या प्रतिवर्ष उत्पन्न होने लगी है।

(xi) ऊर्जा संकट- तापमान में वृद्धि के कारण मध्य अक्षांशीय प्रदेशों में एयर कंडीशनर, पंखा, कूलर आदि के अधिक प्रयोग से विद्युत खपत बढ़ेगी, जिससे ऊर्जा संकट उत्पन्न हो जाएगी।

भूमंडलीय उष्मण को नियंत्रित करने के उपाय:-

        भूमंडलीय उष्मण के नियंत्रण को लेकर विश्व स्तर  पर कई सम्मेलन और समझौते हुए जिनमें प्रथम विश्व सम्मेलन (1972) मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, (1987) पृथ्वी सम्मेलन, रियो डे जेनरियो (1992), क्योटो संधि (1997 व 2005), कोपनहेगन 2009 इत्यादि प्रमुख है। वर्ष 1997 में आयोजित क्योटो संधि 141 देशों द्वारा स्वीकार की गई कि 34 औद्योगिक राष्ट्रों का ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन वर्ष 1990 के स्तर से 5.2 प्रतिशत कम करना है। किंतु इस दिशा में कोई ठोस परिणाम दिखाई नहीं दिए। अमेरिका जो सबसे ज्यादा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करता है, स्वंय अपना हाथ पीछे खींचता नजर आ रहा है।

         भूमंडलीय उष्मण को कम करने की दिशा में निम्नलिखित कदमों के पहल की आवश्यकता है:-

(i) वनों की कटाई रोकते हुए भूमंडल के 33% भूभाग पर सघन वृक्षारोपण किया जाए ताकि अधिक उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण वृक्षों द्वारा किया जा सके।

(ii) कार्बन डाइऑक्साइड गैस का उत्सर्जन कम-से-कम किया जाए।

(iii) जनसंख्या तीव्र वृद्धि पर प्रभावी अंकुश लगाई जाए।

(iv) क्लोरो फ्लोरो कार्बन का उत्सर्जन कम-से-कम किया जाए, साथ ही इसके विकल्प की खोज की जाए।

(v) उर्जा प्रदूषण रहित तकनीकों का विकास हो और इसके अनुसंधान की ओर ध्यान दिया जाए।

(vi) प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग तथा वैकल्पिक स्रोत का विकास किया जाए।

(vii) पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने हेतु जन सहभागिता कार्यक्रमों को संचालित किया जाए।

(viii) अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ठोस और कारगर कानून बनाकर उसका दृढ़ता से अनुपालन किया जाए।

       अर्थात प्रत्येक विकसित और विकासशील दोनों देशों को मिलकर इस पर नियंत्रण रखना होगा। यदि समय रहते इस पर काबू नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हम सभी इससे झुलस जाएंगे और जल प्रलय की विभीषिकाओं से बच नहीं पाएंगे।

निष्कर्ष:-

       उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी का बढ़ता हुआ तापमान वर्तमान विश्व की सबसे गंभीर पर्यावरणीय समस्या है। यह समस्या मानवीय क्रियाकलापों की देन है। बेशक विकास की धारा को मोड़ा नहीं जा सकता है किंतु इसे मानवीय हित में इतना नियंत्रित तो अवश्य किया जा सकता है कि जिससे पृथ्वी पर मंडरा रहे इस गंभीर संकट को दूर किया जा सके। ऐसे विकास का कोई औचित्य नहीं है जिस कारण मानव अस्तित्व खतरे में पड़ जाए। पृथ्वी मानव के अलावा असंख्य जीव-जंतुओं एवं वनस्पतियों का भी घर है। अतः मानव को अपनी करतूतों पर लगाम लगानी चाहिए तथा “जियो और जीने दो” के सिद्धांत का पालन करते हुए पर्यावरण सुरक्षा में जुट जाना चाहिए।


Read More:-
error: