Archives 2023

 6. New Determinism (नवनियतिवाद)

New Determinism

 नवनियतिवाद



नवनियतिवाद

नोट : नवनियतिवाद = नव पर्यावरणवाद (New-Environmentalism) = संभावनावाद (Probabilism)

       नवनियतिवाद संकल्पना को विकसित करने का श्रेय अमेरिकी भूगोलवेत्ता ग्रिफिथ टेलर को जाता है। उन्होंने अपनी ही संकल्पना को 1920 ई० में प्रकाशित पुस्तक ’20वीं शताब्दी का भूगोल’ में प्रस्तुत किया। इस संकल्पना को ‘वैज्ञानिक निश्चयवाद’ या ‘रुको और जाओ नियतिवाद’ भी कहा जाता है। नव नियतिवाद के बड़े समर्थक O.H.K. स्पेट हुए जिन्होंने “भारत-पाकिस्तान का भूगोल” नामक पुस्तक में नवनियतिवाद को ‘लगभग संभववाद’ (Near Possibilism) से संबोधित किया।

        अमेरिकी भूगोलवेत्ता कार्लसावर ने टेलर की संकल्पना को “वर्तमान का संभववाद” और टैथम महोदय ने “क्रियात्मक संभववाद” से संबोधित किया है।

       नियतिवादी संकल्पना में जहाँ मानव को प्रकृति का दास या गुलाम बताया गया था वहीं संभववाद में मानव को स्वछंद प्राणी माना गया। इससे भूगोल में विभाजन के समस्या उत्पन्न हो गयी। इन स्थिति में ग्रिफिथ टेलर ने दोनों की आलोचना करते हुए नवनियतिवाद की संकल्पना प्रस्तुत की।

          नवनियतिवाद की संकल्पना में यह बताया गया कि प्रकृति एवं मानव दोनों श्रेष्ठ है और दोनों ही एक-दूसरे के पूरक है। मानव के बिना प्रकृति अपने आप में अर्थहीन है जबकि प्रकृति के बिना मानव का अस्तित्व संभव नहीं है।

New Determinism

         टेलर के नवनियतिवाद को आज काफी व्यवहारिक माना जाता है क्योंकि इसमें एक ओर मानव के सृजन शक्ति को स्वीकार किया गया तो वहीं दूसरी ओर मानव के ऊपर प्राकृतिक प्रभाव को स्वीकार किया गया। उनका मानना था कि मानव प्रकृति के गोद में ही बैठकर तथा उसके साथ अनुकूलन स्थापित कर अपना संवर्द्धन एवं संरक्षण करता है।

उदाहरण / तर्क

           टेलर ने नवनियतिवाद संकल्पना को कई उदाहरण से पुष्ट करने का प्रयास किया है। जैसे उन्होंने कहा कि अगर मानव कठोर श्रम एवं विशाल पूँजी खर्च करके अण्टार्कटिका जैसे क्षेत्र में उष्ण कटिबंधीय पौधा उगा ले तो यह व्यवहारिक होगा क्या? कोई भी सामान्य व्यक्ति इसके उत्तर में नाकारात्मक जबाव देगा। अतः मानव के लिए विकास का कार्य करना वहीं पर उपयुक्त होगा जहाँ पर प्रकृति उसे सहयोग करती है।

           टेलर महोदय नियतिवादी संकल्पना की पुष्टि हेतु आस्ट्रेलिया का उदाहरण दिया। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया को दो भागों में बाँटा- उन्होंने पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया को निर्जन ऑस्ट्रेलिया और पूर्वी ऑस्ट्रेलिया को आर्थिक ऑस्ट्रेलिया से संबोधित किया। निर्जन आस्ट्रेलिया वह है जहाँ मनुष्य प्रकृति के सामने विवश है क्योंकि प्रकृति मानव अधिवास के लिए यहाँ समर्थन नहीं करती है। वहीं आर्थिक आस्ट्रेलिया में मानव बड़े पैमाने पर आधिवासित होते हैं क्योंकि प्रकृति उन्हें समर्थन प्रदान करती है।

              टेलर महोदय के इस बुद्धिमत्तापूर्ण तर्क एवं उदाहरण की भूरी-2 प्रशंसा पूरी दूनियाँ में की गई क्योंकि उन्होंने यह भी कहा था कि मानव को सर्वप्रथम प्रकृति का अवलोकन करना चाहिए उसके बाद योजनाओं का निर्माण करना चाहिए तथा अन्त में प्रकृति को प्रतिष्ठा देते हुए आगे बढ़‌ना चाहिए। इसी तर्क के आधार पर उनकी संकल्पना को “रुको और जाओ नियतिवाद” भी कहते हैं। आज पूरे विश्व में नवनियतिवाद की अवधारणा पर ही टिकाऊ विकास या सतत् विकास या संपोषणीय विकास की अवधारणा विकसित हुई।

निष्कर्ष

        इस तरह उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि टेलर के कार्यों के कारण भूगोल नियतिवाद एवं सम्भववाद नामक दो विचारधाराओं में बंटने से बच गया और नवनियतिवाद की नई संकल्पना ने पूरे विश्व के भूगोलवेताओं को समन्ययवादी दृष्टिकोण विकसित करने में मदद किया।



नवनियतिवाद पर नोट्स दूसरे तरीके से भी इस प्रकार लिखा जा सकता है



नवनियतिवाद (New Determinism)

         मानव और पर्यावरण के बीच में सदियों से संतुलित संबंध रहा है। इन संबंधों की व्याख्या करने हेतु चिन्तन भूगोल में नियतिवाद, संभववाद और नवनियतिवाद की संकल्पना विकसित की गई है। प्रकृति और मानव के बीच संबंधों की व्याख्या करते हुए नियतिवादियों ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि मानव की तुलना में प्रकृति श्रेष्ठ है। मानव प्रकृति का दास या गुलाम है। वहीं संभववादियों ने मानव को श्रेष्ठ बताते हुए यह मत प्रतिपादित किया कि मानव के सामने प्रकृति बौना है।

           आज वैज्ञानिक युग में चारों ओर मानवीय विजयी की पताका लहराया जा रहा है। भूगोल के विषय वस्तु में इस प्रकार के अतिवादी विचारधारा से भूगोल में विभाजन की खतरा उत्पन्न हो गई। ऐसी स्थितियों में भूगोल विभाजित न हो जाये इसलिए ग्रिफिथ टेलर जैसे भूगोलवेता ने नवनियतिवाद जैसे संकल्पना को जन्म दिया।

            टेलर के द्वारा प्रस्तुत नवनियतिवाद के विचारधारा को नव निश्चयवाद या वैज्ञानिक निश्चयवाद या रुको और जाओ निश्चयवाद के नाम से जानते हैं। टेलर ने अपना विचारधारा 1920 ई० में “20वीं शताब्दी का भूगोल” में प्रस्तुत किया। टेलर के द्वारा प्रतिपादित यह विचारधारा समझौतावाद पर आधारित है। लेकिन वर्तमान समय में प्रकृति तथा मानव के बीच संबंधों का व्याख्या करने वाला यह सर्वोत्तम सिद्धांत है।

          नवनियतिवाद में नियतिवादियों और संभववादियों दोनों के स्वतंत्र उड़ान को रोकने का प्रयास किया गया है। इस सिद्धांत में मानव की सृजन शक्ति को एक ओर स्वीकार किया गया है तो वहीं दूसरी ओर मानव के उपर प्राकृतिक प्रभाव को भी स्वीकार किया गया है।

         टेलर ने स्पष्ट रूप से कहा है कि मानव और प्रकृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं है बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। टेलर ने अपनी पुस्तक में अनेक तर्कों के द्वारा अपने विचारों को पुष्ट करने का प्रयास किया है। जैसे उनकी मान्यता यह रही है कि मानव प्राकृतिक परिवेश में रहते हुए अपने आपको अनुकूलित करता है तथा दूसरी ओर अनुकूलन में प्रकृति मानव का सहयोग देता है।

         दूसरी ओर संभवादियों पर उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि मानव कठोर श्रम एवं विशाल पूँजी खर्च करके अण्टार्कटिका में उष्ण कटिबंधीय पौधा उत्पन्न कर ले तो क्या यह सामान्य जनता के लिए व्यावहारिक होगा। अतः मानव के विकास की सीमाएँ होती हैं। प्राकृतिक परिवेश उन्हें अवश्य रुप से प्रभावित करती है और मानव प्रकृति को सहयोग देती है।

           टेलर ने ऑस्ट्रेलिया की व्याख्या करते हुए कहा है कि ऑस्ट्रेलिया मूल रूप से दो भागों मे विभक्त है।

1. निर्जन आस्ट्रेलिया

2. विकसित आस्ट्रेलिया

           आस्ट्रेलिया का पश्चिमी भाग निर्जन क्षेत्र है क्योंकि प्रकृति मानव को अधिवास के लिए सहयोग नहीं करती है। वहीं दूसरी ओर अस्ट्रेलिया का पूर्वी भाग विकसित है क्योंकि प्रकृति वहाँ पर मानव को अधिवास के लिए सहयोग करती है। इससे स्पष्ट होता है कि मानव अपने विवेक का प्रयोग करते हुए प्रकृति के साथ सामांजस्य बनाने का प्रयास करती है।

         टेलर के नवनियति विचारधारा को “रुको और जाओ विचारधारा” भी कहते हैं क्योंकि इसके तहत उन्होंने कहा है कि विवेक युक्त व्यक्ति सबसे पहले रुककर प्रकृति का अवलोकन करता है उसके बाद प्रकृति को प्रतिष्ठा देते हुए योजनाओं का निर्माण कर आगे बढ़ने का प्रयास करती है।

          टेलर के इस विचारधारा को भूरी-भूरी प्रशंसा की गई। स्पेट महोदय ने अपनी पुस्तक “भारत और पाकिस्तान का भूगोल” में इनके विचारधारा को ‘लगभग संभववाद’ से सम्बोधित किया। इसी तरह अमेरिकी भूगोलवेत्ता कार्ल सावर ने ‘वर्तमान का नियतिवाद’ से सम्बोधित किया।

        टैथम जैसे अमेरिकी भूगोलवेत्ता ने नवनियतिवाद का समर्थन करते हुए “क्रियात्मक संभववाद” से संबोधित किया है। इस विचारधारा के उत्पन्न होने के बाद USA के क्लार्क विश्वविद्यालय में इस विचार को सर्वाधिक मान्यता प्रदान किया गया क्योंकि यह एक ऐसी विचारधारा थी जो मानव और प्रकृति को एक-दूसरे का पूरक मानता है। अत: आधुनिक संदर्भ में नवनियतिवाद को ही सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है।

निष्कर्ष:

      इस प्रकार नवनियतिवाद एक व्यावहारिक (Practical) सिद्धांत है जो मानव और प्रकृति के बीच संतुलित संबंध को दर्शाता है। यह आधुनिक भूगोल में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह सतत विकास (Sustainable Development) की अवधारणा से जुड़ा है।



YOU TUBE LINK https://youtu.be/z84vJuaA2dE

Read More:-

 5. Determinism vs Possibilism (नियतिवाद बनाम सम्भववाद)

 Determinism vs Possibilism

नियतिवाद बनाम सम्भववाद 




नियतिवाद बनाम सम्भववाद (Determinism vs Possibilism)

          नियतिवाद बनाम सम्भववाद भूगोल में तृतीय चरण का द्वैतवाद है जो विषय वस्तु से जुड़ा हुआ है। नियतिवाद में प्रकृति को श्रेष्ठ और मनुष्य को प्रकृति का दास माना गया है। दूसरी ओर नियतिवाद के विरोध में संभववाद का उदय हुआ है। संभववाद में मानव को श्रेष्ठ माना गया है और कहा गया है कि मानव प्रकृति का दास नहीं है बल्कि वह प्रकृति के अन्दर रहकर संभावनाओं का सृजन करता है।

Determinism vs Possibilism

नियतिवाद का विकास

              मानव सभ्यता के प्रारंभ से लेकर हजारों वर्षों तक इसी विचारधारा का वर्चस्व रहा। नियतिवाद के विकास का श्रेय हम्बोल्ट और रीटर को जाता है लेकिन वास्तविकता यह है कि भूगोल में नियतिवादी चिन्तन का विकास ग्रीक और रोमन भूगोल के विकास के समय में हुआ था।

⇒ इस संदर्भ में हिप्पोक्रेटस का कार्य सर्वाधिक उल्लेखनीय है। इनके द्वारा लिखित पुस्तक “Airs, Waters & Places” में यह बताया गया कि मैदानी प्रदेश मानवीय अधिवास के लिए अधिक अनुकूल है जहाँ जल एवं वायु उपलब्ध हो।

⇒ मध्ययुगीन चिंतकों में बेदिन तथा माण्टेस्क्यू ने नियतिवाद का समर्थन करते हुए कहा है कि जलवायु, उच्चावच एवं मिट्टी मानवीय संस्कृति के विकास का आधार है।

⇒ आधुनिक समय में हम्बोल्ट तथा रीटर क्रमश: ‘Cosmos’ एवं ‘Erdkunde’ नामक पुस्तकों के माध्यम से इस चिन्तन को विकसित किया।

⇒ हम्बोल्ट ने ‘Cosmos’ में मानव को एक भौतिक कारक माना है और कहा कि “Physical geography is general Geography”

⇒ यद्यपि रीटर के प्रादेशिक उपागम के अन्तर्गत मानवीय अध्ययन को अनिवार्य बताया। लेकिन वे स्वतंत्र अध्ययन को भूगोल की आवश्यकता नहीं बताया। वे मूलतः ईश्वरवादी और प्रकृतिप्रेमी थे।

⇒ इस प्रकार दोनों ने उपागम के मतभेद के बावजूद नियतवादी चिन्तन का समर्थन किया।

⇒ ब्रिटिश इतिहासकार बकेल द्वारा भी अपनी “History of Civilisation in England” पुस्तक में सभ्यता के विकास का आधार वातावरण को मानते हुए कहा है कि वे भौगोलिक प्रदेश आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न है जहाँ जलवायु, खाद्य संसाधन तथा मृदा माननीय आवश्यकताओं के दृष्टि से अनुकूल है।

⇒ ब्रिटिश भूगोलवेता लेप्ले ने स्थान, कार्य और संस्कृति की संकल्पना प्रस्तुत की। इनके अनुसार स्थान अर्थात् वातावरण मानवीय कार्यो का निर्धारण करता है और कार्य ही लोकसंस्कृति का।

Place → Work → folk

(स्थान)    (कार्य)   (संस्कृति)

         जैसे- गंगाघाटी में मनुष्य मुख्यतः कृषि कार्य ही कर सकता है, वह चाह कर भी यहाँ खनन नहीं कर सकता क्योंकि यहाँ खनिज तो है ही नहीं।

⇒ अमेरिकी भूगोलवेता में डेविस, हटिंग्टन तथा मिस सेम्पल नियतिवाद के महान समर्थकों में थे।

⇒ हटिंग्टन और मिस सेम्पल वातावरणीय नियतिवाद पर जोर दिया। जैसे- मानवीय क्रियाओं पर पर्वतीय वातावरण का प्रभाव पड़ता है न कि मनुष्य का प्रभाव पर्वत पर पड़ा हैं।

⇒ मिस सेम्पल ने “Influences of Geopraphic Environment” में लिखा है “Man is the Product of Environment”

⇒ मिस सेम्पल के कार्य को नियतिवाद के क्षेत्र में अन्तिम महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है क्योंकि 20वीं शताब्दी के प्रारंभ से ही फ्रांसीसी भूगोल का उदय हो चुका था, जो संभववादी संकल्पना के पक्षधर थे। इस तरह नियतिवादी संकल्पना का आलोचना प्रारंभ हो गया क्योंकि प्राकृतिक शक्तियों के साथ-2 मानवीय क्रियाओं का भी महत्व बढ़ गया।

आलोचनाएँ

⇒ नि:संदेह यह सत्य है कि वातावरण मानव को प्रभावित करता है। परन्तु, मानव भी वातावरण में परिवर्तन ला सकता है।

⇒ मनुष्य की शारिरीक गुणों पर वातावरण की अपेक्षा वंशानुगत प्रभाव होता है।

⇒ समान वातावरण में भी जीवनशैली में विभिन्नता पायी जाती है।

⇒ मनुष्य ने विज्ञान में प्रगति कर प्रकृति के कई क्षेत्रों पर विजय पाई है।

⇒ वातावरण की प्रतिकूलता के बावजूद कृषि मनुष्य उत्पादन कर रहा है। जैसे-पंजाब व कैलीफोर्निया में चावल की खेती।

⇒ मनुष्य ने प्रतिकूलता के बावजूद जापान को औद्योगिक राष्ट्र बनाया। यह औद्योगिक क्रांति मनुष्य की श्रेष्ठता स्थापित करता है और यही श्रेष्ठता संभववाद का आधार है।

       इस प्रकार नियतिवाद को 20वीं शताब्दी में नकार दिया गया तथा इसके स्थान पर संभववाद का प्रतिपादन हुआ जिसमें प्रकृति के प्रभावों को भी दिखाया गया। इसे पूर्णतः नहीं नकारा गया क्योंकि मनुष्य प्रकृति पर निर्भर है और प्रकृति पर भी मनुष्य के कुछ हस्तक्षेप है। दोनों के बीच एक संक्रमण रेखा है मगर विभाजक रेखा नहीं।

सम्भववाद का विकास

     सम्भववाद का उदय नियतिवाद के विरोध में हुआ। सम्भववाद में जहाँ मानव को श्रेष्ठ बताया गया है वहीं नियतिवाद में प्रकृति को श्रेष्ठ बताया गया है। नियतिवाद में मानव को प्रकृति का दास बताया गया तथा मोम का पुतला कहा गया है। इतना ही नहीं प्रकृति मानव को अपनी इच्छानुसार ढाल सकती है। वहीं सम्भववाद में कहा गया है कि मानव प्रकृति पर विजय पा सकता है। मानव प्रकृति को नियंत्रित कर सकता है। मानव प्रकृति के द्वारा खड़ा किए गए अवरोधों को पार कर सकता है। प्रकृति ज्यादा-से-ज्यादा सलाहकार हो सकता है, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।

सम्भववाद के उदय का कारण

      नियतिवाद का उद‌य जर्मनी में हुआ जबकि संभववाद का उदय फ्रांस में हुआ। फ्रांस में संभववाद के उदय के कई कारण है। जैसे-

(i) औद्योगिक क्रांति का प्रभाव⇒ फ्रांसीसी भूगोलवेताओं पर औद्योगिक क्रांति का प्रभाव था जिसमें भूगोलवेताओं ने देखा कि मानव बड़े-2 कलकारखाने स्थापित कर बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन करता है।

(ii) इतिहास के घटनाओं का प्रभाव⇒ फ्रांस में अधिकांश भूगोलवेताओं इतिहास के घटनाओं के प्रभाव में थे जिसके कारण लोगों में उन्होंने मानवीय श्रेष्ठता की संकल्पना विकसित किया।

(iii) महानगरों का विकास⇒ फ्रांसीसी विद्वानों ने देखा कि मानव सामूहिक अधिवास करते हुए महानगरों को विकसित कर लिया है। इन महानगरों में सर्वत्र मानवीय श्रेष्ठता दिखाई देती है न कि प्रकृति। द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व ही पेरिस और लंदन जैसे नगर महानगरों में बदल चुके थे।

(iv) महाद्वीपीय रेलवे का विकास⇒ फ्रांसीसी भूगोलवेताओं के ऊपर महाद्वीपीय रेलवे का भी प्रभाव था। जैसे-लोगों ने यह देखा था कि प्रकृति ने दूरी और अनेक प्रकार के अवरोध खड़ा कर दिया। मानव को मानव से अलग कर दिया था लेकिन मानव दूरियों को पाटने के लिए सभी अवरोधों को पार कर महाद्वीपीय रेलवे का विकास किया जो प्रकृति पर विजय का अद्‌भूत उदाहरण है।

(v) वाणिज्य एवं व्यापार⇒ मानव अपने बलबूते कई देशों को गुलाम बनाने में सफल हुआ था वैश्विक वाणिज्य एवं व्यापार का विकास कर भावन ने अपनी श्रेष्ठता साबित कर दो।

       उपरोक्त कारणों के ही कारण 19वीं शताब्दी के अन्त आते-आते नियतिवादी चिन्तन पर प्रश्न चिन्ह लगने लगा। भौगोलिक चिन्तन के क्षेत्र में संभववाद का उदय 1900-20ई० तक हुआ। सम्भववाद को व्यवस्थित रूप से विकसित करने का श्रेय फेब्रे, ब्लाश, ब्रूंश, डिमांजिया, किरचॉफ, जिमरमैन, कार्लसावर, टैथम, ईसा बोमेन जैसे भूगोलवेताओं से जाता है।

          “सम्भववाद” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग इतिहासकार फेब्रे महोदय ने किया था उन्होंने अपनी पुस्तक “इतिहास की भौगोलिक प्रस्तावना” में लिखा है कि “मानव एक पशु के समान नहीं है बल्कि मानव एक भौगोलिक रूप है वह अपनी सोच के आधार पर प्रकृति के नियमों में एवं रचनाओं की विवेचना करता है तथा उसमें परिवर्तन लाता है।”

             भूगोल में सम्भववाद के सबसे बड़े समर्थक विडॉल डी ला ब्लाश हुए। ब्लाश न केवल मानव को श्रेष्ठ बताया बल्कि यह भी कहा कि प्रकृति की भूमिका अधिक-से-अधिक सलाहकार की हो सकती है। मानव प्रकृति की सलाह मान भी सकता या नहीं भी। ब्लाश के इस चिन्तन का इतना व्यापक प्रभाव फ्रांसीसी भूगोलवेता पर पड़ा था कि वहाँ डीमोरटोनी को छोड़कर कोई भी विद्वान नियतिवाद समर्थक नहीं निकला।

                पॉल वाइडल डि लॉ ब्ला के एक शिष्य जीन ब्रूंश महोदय थे। उन्होंने ‘डकैत अर्थव्यवस्था‘ की संकल्पना (Robber Economy) प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने सम्भववाद का समर्थन करते हुए कहा कि मानव दिन-दहाड़े पृथ्वी के गर्भ से खनिज को बाहर निकाल लेता है और पृथ्वी मूक बनी रहती है। उन्होंने यह भी कहा कि मानव भूतल पर निवास करता है तथा अपने परिवेश में रहकर कार्य करता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मानव प्रकृति का दास है।

              ब्लाश के दूसरे शिष्य डिमांजिया थे जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया और इजराइल के शुष्क प्रदेशों में विकसित मानवीय गतिविधि जैसे कृषि, उद्योग को देखकर यह तर्क प्रस्तुत किया कि मानव आस्ट्रेलिया और इजराइल के शुष्क प्रदेशों में भी अपनी परचम (विजयी पताका) लहरा चुका है।

         दो अन्य भूगोलवेता किरचॉफ एवं ब्लेंचार्ड ने सम्भववाद का समर्थन किया। किरचॉफ ने यहाँ तक कहा कि मानव कोई मशीन नहीं है कि उसे रिमोट कंट्रोल के द्वारा नियंत्रित किया जा सके। इसी तरह ब्लेंचार्ड महोदय ने नगरीय भूगोल पर शोध करके यह बताया कि नगरों पर ज्यादा मानवीय इच्छाओं का प्रभाव होता है।

       अमेरिका में जिमरमैन कार्लसावर और ईसा बोमैन जैसे संभववादी भूगोलावेता जन्म लिये। जिमरमैन ने कहा कि “संसाधन होते नहीं, बनते हैं।” इनके ही तर्कों का समर्थन करते हुए जापान के पूर्व प्रधानमंत्री टनाका ने कहा कि “जापान का सबसे बड़ा संसाधन उसके पास कोई भी प्राकृतिक संसाधन न होना है।”

          अमेरिकी भूगोल‌वेता ईसा बोमेन ने भी जिमरमैन के समान तर्क प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी कहा कि विकास कर रहे मानव और उसके समाज के स्वरूप भौतिक कारक सुनिस्चित नहीं करता बल्कि मानव अपने प्रयास से उसके स्वरूप के निर्धारण करता है।

          अमेरिकी भूगोलवेता कार्लसावर ने कहा कि पृथ्वी के तल पर सांस्कृतिक भूदृश्य के विकास में प्रकृति का योगदान नहीं होता है बल्कि मानव स्वयं सांस्कृतिक भूदृश्य का निर्माण करता है। लेकिन उन्होंने “Morphology and Lamd Soap” नामक शोध लेख में यह स्वीकार किया कि प्राकृतिक परिवेश जनित शक्तियाँ मानव को सामान्य रूप से प्रभावित करती है। इसीलिए उन्होंने कहा था कि सम्भववाद के स्थान पर सांभाव्यवाद की संकल्पना विकसित किया जाए।

            इनके संकल्पना को समर्थन करते हुए प्रसिद्ध पारिस्थैतिक वैज्ञानिक बोरो ने “मानव पारिस्थतिकी” (Human Ecology) की संकल्पना विकसित किया जिसमें बताया गया कि “प्रकृति मानव को प्रभावित करता है और मानव प्रकृति को प्रभावित करता है।”

निष्कर्ष

        इस प्रकार फ्रांसीसी चिन्तकों ने जर्मन चिन्तकों के समक्ष एक नवीन चिन्तन प्रस्तुत किया अर्थात नियतिवादी के विरोध में सांभाव्यवाद की संकल्पना प्रस्तुत किये। जिसके कारण भूगोल में द्विविभाजन का संकट उत्पन्न हो गया है। बाद में ग्रिफिथ टेलर जैसे भूगोलवेताओं के प्रयास से इस विभाजन को रोका गया और यह बताया गया कि नियतिवाद और सम्भववाद की संकल्पना को दो अलग-अलग संकल्पना नहीं माना जाय बल्कि दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू माना जाय। इनके प्रयास से भूगोल में नियतिवाद बनाम सम्भववाद नामक द्वैतवाद का उदय हुआ।

4. सम्भववाद / Possibilism

सम्भववाद 

Possibilism

सम्भववाद / Possibilism⇒

सम्भववाद

             सम्भववाद का उदय नियतिवाद के विरोध में हुआ। सम्भववाद में जहाँ मानव को श्रेष्ठ बताया गया है वहीं नियतिवाद में प्रकृति को श्रेष्ठ बताया गया है। नियतिवाद में मानव को प्रकृति का दास बताया गया तथा मोम का पुतला कहा गया है। इतना ही नहीं प्रकृति मानव को अपनी इच्छानुसार ढाल सकती है। वहीं सम्भववाद में कहा गया है कि मानव प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकता है अर्थात मानव प्रकृति को नियंत्रित कर सकता है तथा मानव प्रकृति के द्वारा खड़ा किए गए अवरोधों को पार कर सकता है। प्रकृति ज्यादा-से-ज्यादा सलाहकार हो सकता है, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।

सम्भववाद के उदय का कारण

              नियतिवाद का उद‌य जर्मनी में हुआ जबकि संभववाद का उदय फ्रांस में हुआ। फ्रांस में संभववाद के उदय के कई कारण है। जैसे-

(i) औद्योगिक क्रांति का प्रभाव⇒ फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं पर औद्योगिक क्रांति का प्रभाव था जिसमें भूगोलवेत्ताओं ने देखा कि मानव बड़े-2 कल कारखाने स्थापित कर बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन करता है।

(ii) इतिहास के घटनाओं का प्रभाव⇒ फ्रांस में अधिकांश भूगोलवेत्ताओं इतिहास के घटनाओं के प्रभाव में थे जिसके कारण लोगों में उन्होंने मानवीय श्रेष्ठता की संकल्पना विकसित किया।

(iii) महानगरों का विकास⇒ फ्रांसीसी विद्वानों ने देखा कि मानव सामूहिक अधिवास करते हुए महानगरों को विकसित कर लिया है। इन महानगरों में सर्वत्र मानवीय श्रेष्ठता दिखाई देती है न कि प्रकृति। द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व ही पेरिस और लंदन जैसे नगर महानगरों में बदल चुके थे।

(iv) महाद्वीपीय रेलवे का विकास⇒ फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं के ऊपर महाद्वीपीय रेलवे का भी प्रभाव था। जैसे-लोगों ने यह देखा था कि प्रकृति ने दूरी और अनेक प्रकार के अवरोध खड़ा कर दिया। मानव को मानव से अलग कर दिया था लेकिन मानव दूरियों को पाटने के लिए सभी अवरोधों को पार कर महाद्वीपीय रेलवे का विकास किया जो प्रकृति पर विजय का अद्‌भूत उदाहरण है।

(v) वाणिज्य एवं व्यापार⇒ मानव अपने बलबूते कई देशों को गुलाम बनाने में सफल हुआ था वैश्विक वाणिज्य एवं व्यापार का विकास कर मानव ने अपनी श्रेष्ठता साबित कर दी।

       उपरोक्त कारणों के ही कारण 19वीं शताब्दी के अन्त आते-आते नियतिवादी चिन्तन पर प्रश्न चिन्ह लगने लगा। भौगोलिक चिन्तन के क्षेत्र में संभववाद का उदय 1900-20ई० तक हुआ। सम्भववाद को व्यवस्थित रूप से विकसित करने का श्रेय फेब्रे, ब्लाश, ब्रूंश, डिमांजिया, किरचॉफ, जिमरमैन, कार्लसावर, टैथम, ईसा बोमेन जैसे भूगोलवेताओं को जाता है।

         “सम्भववाद” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग इतिहासकार फेब्रे महोदय ने किया था उन्होंने अपनी पुस्तक “इतिहास की भौगोलिक प्रस्तावना” में लिखा है कि “मानव एक पशु के समान नहीं है बल्कि मानव एक भौगोलिक रूप है वह अपनी सोच के आधार पर प्रकृति के नियमों में एवं रचनाओं की विवेचना करता है तथा उसमें परिवर्तन लाता है।”

          भूगोल में सम्भववाद के सबसे बड़े समर्थक विडॉल डी ला ब्लाश हुए। ब्लाश न केवल मानव को श्रेष्ठ बताया बल्कि यह भी कहा कि प्रकृति की भूमिका अधिक-से-अधिक सलाहकार की हो सकती है। मानव प्रकृति की सलाह मान भी सकता या नहीं भी। ब्लाश के इस चिन्तन का इतना व्यापक प्रभाव फ्रांसीसी भूगोलवेता पर पड़ा था कि वहाँ डी-मोरटोनी को छोड़कर कोई भी विद्वान नियतिवाद समर्थक नहीं निकला।

          पॉल वाइडल डि लॉ ब्लाश के एक शिष्य जीन ब्रूंश महोदय थे। उन्होंने ‘डकैत अर्थव्यवस्था (Robber Economy) की संकल्पना प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने सम्भववाद का समर्थन करते हुए कहा कि मानव दिन-दहाड़े पृथ्वी के गर्भ से खनिज को बाहर निकाल लेता है और पृथ्वी मूक बनी रहती है। उन्होंने यह भी कहा कि मानव भूतल पर निवास करता है तथा अपने परिवेश में रहकर कार्य करता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मानव प्रकृति का दास है।

       ब्लाश के दूसरे शिष्य डिमांजिया थे जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया और इजराइल के शुष्क प्रदेशों में विकसित मानवीय गतिविधि जैसे कृषि, उद्योग को देखकर यह तर्क प्रस्तुत किया कि मानव आस्ट्रेलिया और इजराइल के शुष्क प्रदेशों में भी अपनी परचम (विजयी पताका) लहरा चुका है।

         दो अन्य भूगोलवेत्ता किरचॉफ एवं ब्लेंचार्ड ने सम्भववाद का समर्थन किया। किरचॉफ ने यहाँ तक कहा कि मानव कोई मशीन नहीं है कि उसे रिमोट कंट्रोल के द्वारा नियंत्रित किया जा सके। इसी तरह ब्लेंचार्ड महोदय ने नगरीय भूगोल पर शोध करके यह बताया कि नगरों पर ज्यादा मानवीय इच्छाओं का प्रभाव होता है।

       अमेरिका में जिमरमैन, कार्लसावर और ईसा बोमैन जैसे संभववादी भूगोलावेत्ता जन्म लिये। जिमरमैन ने कहा कि “संसाधन होते नहीं, बनते हैं।” इनके ही तर्कों का समर्थन करते हुए जापान के पूर्व प्रधानमंत्री टनाका ने कहा कि “जापान का सबसे बड़ा संसाधन उसके पास कोई भी प्राकृतिक संसाधन न होना है।”

     अमेरिकी भूगोल‌वेत्ता ईसा बोमेन ने भी जिमरमैन के समान तर्क प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी कहा कि विकास कर रहे मानव और उसके समाज के स्वरूप भौतिक कारक सुनिश्चित नहीं करता बल्कि मानव अपने प्रयास से उसके स्वरूप के निर्धारण करता है।

      अमेरिकी भूगोलवेत्ता कार्लसावर ने कहा कि पृथ्वी के तल पर सांस्कृतिक भूदृश्य के विकास में प्रकृति का योगदान नहीं होता है बल्कि मानव स्वयं सांस्कृतिक भूदृश्य का निर्माण करता है। लेकिन उन्होंने The Morphology of Landscape (भूदश्य की आकारिकी), 1925, नामक शोध लेख में यह स्वीकार किया कि प्राकृतिक परिवेश जनित शक्तियाँ मानव को सामान्य रूप से प्रभावित करती है। इसीलिए उन्होंने कहा था कि संभववाद के स्थान पर सांभाव्यवाद की संकल्पना विकसित किया जाए।

     इनके संकल्पना को समर्थन करते हुए प्रसिद्ध पारिस्थैतिक वैज्ञानिक बोरो ने “मानव पारिस्थतिकी” (Human Ecology) की संकल्पना विकसित किया जिसमें बताया गया कि “प्रकृति मानव को प्रभावित करता है और मानव प्रकृति को प्रभावित करता है।”

निष्कर्ष

      इस प्रकार फ्रांसीसी चिन्तकों ने जर्मन चिन्तकों के समक्ष एक नवीन चिन्तन प्रस्तुत किया अर्थात नियतिवादी के विरोध में सम्भववाद की संकल्पना प्रस्तुत किये। जिसके कारण भूगोल में द्विभाजन का संकट उत्पन्न हो गया है। बाद में ग्रिफिथ टेलर जैसे भूगोलवेत्ताओं के प्रयास से इस विभाजन को रोका गया और यह बताया गया कि नियतिवाद और सम्भववाद की संकल्पना को दो अलग-अलग संकल्पना नहीं माना जाय बल्कि दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू माना जाय। इनके प्रयास से भूगोल में नियतिवाद बनाम सम्भववाद नामक द्वैतवाद का उदय हुआ।



सम्भववाद को दूसरे तरीके से इस प्रकार भी लिखा जा सकता है-



 संभववाद

           नियतिवाद के अनुसार “मानव प्रकृति का दास है” या “मानव मोम का पुतला है जिसे प्रकृति इच्छानुसार ढालती है।” इसी के प्रतिक्रिया स्वरूप एक विचारधारा का उदय हुआ जिसे संभववाद कहा गया। अतः संभववाद “मानव की प्रकृति पर विजय, मानव द्वारा प्रकृति पर नियन्त्रण, मानव का सर्वत्र चयन की सुविधा जैसे अर्थों का समाहित किये हुए हैं।” 19वीं शताब्दी के अंत तक नियतिवादी चिंतन पर प्रश्न चिन्ह लगने लगा था। इसका प्रमुख कारण फ्रांस में भूगोल का उदय होना था फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं पर औद्योगिक क्रांति और इतिहास के घटनाओं का स्पष्ट प्रभाव था।

      इन दो पृष्ठभूमियों के कारण फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं के नियतिवादी दृष्टिकोण को अस्वीकार किया और सम्भववादी दृष्टिकोण का विकास किया। 

      भौगोलिक चिंतन के क्षेत्र में संभववाद की शुरूआत 1900 से 1920 ई० के मध्य हुआ। संभववाद में “मानवीय श्रेष्ठता” को स्वीकार किया गया है। फ्रांसीसी चिंतकों ने संभववाद के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया कि औद्योगिक क्रांति के बाद प्रकृति की श्रेष्ठता कमजोर हो चुकी है। क्योंकि मनुष्य ने अपने बलबूते उपनिवेश, महाद्वीपीय रेलवे मार्ग, महानगरों तथा वाणिज्य-व्यापार आदि का विकास किया है। ये सभी मानवीय श्रेष्ठता के द्योतक हैं। अतः भूगोल में प्रकृति को नहीं मानव को अध्ययन का केन्द्रीय बिंदु माना जाना चाहिये। 

     संभववादी चिंतन को व्यवस्थित रूप देकर विकसित करने का श्रेय फेब्रे, ब्लाश, जीन ब्रूस आदि फ्रांसीसी विद्वानों  को है। इसके अतिरिक्त किरचॉफ, ईशा बोमेन, टैथम, कार्ल सवार और जिमरमैन आदि के नाम भी उल्लेखनीय है।

       इतिहासकार फेब्र को संभववाद का जनक माना जाता है, क्योंकि सर्वप्रथम इन्होंने ही संभववाद शब्द का प्रयोग किया था। इन्होंने अपने पुस्तक “इतिहास की भौगोलिक प्रस्तावना” में लिखा है कि मानव एक भौगौलिक दूत है, पशु नहीं है, वह सर्वत्र पृथ्वी की रचना की विवेचना में एवं उसके परिवर्तनशील भौगोलिक तत्वों के अभीव्यक्तियों में अपना योगदान देता है। इसलिए मानव का अध्ययन करना भूगोल का महत्वपूर्ण कर्तव्य है।

        भूगोल में संभववाद के सबसे  बड़े समर्थक ब्लाश ने न केवल मनुष्य को श्रेष्ठ कहा बल्कि यह भी बताया है की प्रकृति की भूमिका अधिक से अधिक एक सलाहकार के रूप में हो सकती है। मानव उनके बात को मान भी सकते है और नहीं भी मान सकते है। इन्होंने Genres-de-vie की संकल्पना भी इसी संदर्भ में प्रस्तुत किया था।

        ब्रूंश नामक फ्रांसीसी विद्वान ब्लाश के माने हुये शिष्य थे। इसने माना कि मानव भूतल पर निवास करता है साथ ही वह अपने परिवेश में रहकर काम करता है, परन्तु इसका अर्थ कदापि नहीं कि वह वातावरण का दास है। वास्तव में वह जब तक जीवित है क्रिया-प्रतिक्रिया करता रहता है। इन्होंने सर्वप्रथम मानव भूगोल को भूगोल के अध्ययन के लिये एक व्यवस्थित उपागम के रूप में संभववाद को स्पष्ट किया था। Robber Economy Concept इसी पर था। जिसमें कहा कि मानव दिन दिहाड़े पृथ्वी के गर्भ से खनिज संसाधन का दोहन कर रहा है।

        डिमाजियाँ भी ब्लाश के शिष्य थे। इन्होंने भी संभववाद का समर्थन किया। संभववाद को उन्होंने आस्ट्रेलिया तथा इजरायल के शुष्क प्रदेशों में मानव के अथक प्रयास एवं सफलता का उदाहरण से पुष्ट करने का प्रयास किया है।

       दो अन्य भूगोलवेत्ता किरचॉफ एवं ब्लैन्चार्ड ने भी संभववाद का समर्थन किया। किरचॉफ ने कहा है कि मानव ऐसी मशीन नहीं है जिसकी कोई अपनी इच्छा नहीं है। इसी भाँति ब्लैन्चार्ड ने भी नगरीय भूगोल के विधितंत्र पर शोध लेख एवं अन्य वर्णन प्रस्तुत करते हुये मानवीय प्रभावों का बहुत महत्व दिया।

         अमेरिकी चिंतक जिमरमैन, ईशा बोमेन एवं कार्ल सावर ने संभववादी विचार को अभूतपूर्व समर्थन दिया। जिमरमैन ने यहाँ तक लिखा है कि “संसाधन होते नहीं बनते हैं। संसाधन को बनाने का कार्य मानव करता है, इसलिये मानव प्रमुख है। जिमरमैन ने एक मॉडल के द्वारा इसकी पुष्टि की है-

प्रकृति (Nature)

प्राकृतिक तत्व (Natural Elements)

मानव की आवश्यकता (Human Need)

मानव का ज्ञान + तकनीक (Knowledge & Technology)

उपयोगिता (Utility)

संसाधन (Resource)

         इस मॉडल के आधार पर यह बताने का प्रयास किया है कि मानवीय अध्ययन को ही केन्द्रीय स्थान दिया जाना चाहिये। 

     ईशा बोमन ने भी लगभग इसी प्रकार की बात कही है। इनके अनुसार विकासशील मानव समाज की प्रकृति एवं उसके स्वरूप को भौतिक परिवेश ही सुनिश्चित नहीं करता है बल्कि मानव अपने प्रयास से धरातल पर नवीन तत्व के निर्माण को क्षमता रखता है।

         कार्ल सावर ने भूतल पर सांस्कृतिक विकास में प्राकृतिक परिवेश के हावी होने की बात को स्वीकार नहीं किया। उसने The Morphology of Landscape नामक अन्य लेख ने बताया कि प्राकृतिक परिवेश जनित शक्ति के प्रभाव को सामान्य रूप से स्वीकार तो किया जा सकता है परंतु संभववादी इससे पूर्णतया सहमत नहीं हैं कि परिवेश मानव को पूर्ण रूप से प्रभावित करता है, उसके अनुसार प्रकृति की कुछ सीमाएँ अवश्य निर्धारित करती हैं, परन्तु वहाँ भी मानव के लिये सम्भावनाएँ एवं चयन की सुविधाएं है। इसी तरह प्रसिद्ध पारिस्थैतिक विज्ञानी बोरो ने पर्यावरण की अपेक्षा मनुष्य पारिस्थैतिकी (Human Ecology) की अधिक महत्व दिया। मेकिंडर ने तो यहां तक कहा कि मानव भूगोल ही सामान्य भूगोल है। भूगोल में मानव को अधिक महत्व मिलने लगा। मानव भूगोल की शाखा का विस्तार हुआ। 

     इस प्रकार फ्रांसीसी चिंतकों ने जर्मनी चिन्तकों के लिये एक वैकल्पिक चिन्तन प्रस्तुत कर द्वैतवाद की स्थिति उत्पन्न कर दी। फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं के संभववादी चिंतन ने विश्व भूगोल को दो वर्गों में विभाजित कर दिया अर्थात जर्मनी और फ्रांस में अलग-अलग प्रकार से भूगोल का अध्ययन होने लगा। इससे भूगोल के शैशवावस्था में ही विधितंत्र में विभाजन का खतरा उत्पन्न हो गया। बाद में विभाजन को रोकने हेतु टेलर महोदय ने नवनियतिवाद की संकल्पना विकसित की। 

आलोचना

      संभववाद की सर्वाधिक आलोचना कट्टर नियतिवादियों द्वारा की गयी। बाद में यह आलोचना संभववादियों द्वारा दोहरे वक्तव्य दिये जाने के कारण भी हुई। सेम्पुल ने संभवत: ऐसे ही वक्तव्यों को देखकर चुटकी लेते हुये लिखी है कि “मानव अपनी प्रकृति विजय को डींगे हाँकता-फिरता है, जबकि प्रकृति मौन रहकर भी निरन्तर मानव पर निश्चित प्रभाव डालती रहती है।” 

   दूसरी आलोचना यह है कि संभववाद भौगोलिक पर्यावरण के अध्ययन को प्रोत्साहन नहीं देता है बल्कि यह भूगोल में Anthropocentric को बढ़ावा देता है। 

       टेलर ने संभववाद का आलोचना करते हुये लिखा कि भूगोल का कार्य प्राकृतिक वातावरण का अध्ययन और उसका मानव पर प्रभावों का अध्ययन करना है, मानव अथवा सांस्कृतिक भूदृश्य से सम्बन्धित सभी समस्याओं का अध्ययन करना नहीं।



नोट:

♣ Genres-de-vie की संकल्पना फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता पॉल विडाल डी ला ब्लाश (Paul Vidal de la Blache) द्वारा प्रतिपादित की गई थी।

       इसका शाब्दिक अर्थ है – “जीवन-शैली” (Way of Life)। अर्थात् Genres-de-vie से आशय किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाले लोगों की जीवन पद्धति, आजीविका के साधन, सामाजिक व्यवहार, परंपराएँ और पर्यावरण के साथ उनका सामंजस्य से है।

✍️ यह संभववाद (Possibilism) से संबंधित है।

✍️ मनुष्य प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुसार अपनी जीवन-शैली विकसित करता है।

✍️ समान भौगोलिक परिस्थितियों में रहने वाले लोगों की जीवन-पद्धति प्रायः समान होती है।

✍️ उदाहरण: मरुस्थलीय क्षेत्र में ऊँट पालन, ध्रुवीय क्षेत्र में मछली पकड़ना आदि।

       अतः Genres-de-vie मानव और पर्यावरण के पारस्परिक संबंध को समझाने की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है।

YOU TUBE LINK – https://youtu.be/Hzlu7wVDSYM

Read More:-

3. नियतिवाद या निश्चयवाद या पर्यावरणवाद / Determinism or Environmentalism

3. नियतिवाद या निश्चयवाद या पर्यावरणवाद

(Determinism or Environmentalism)




नियतिवाद या निश्चयवाद या पर्यावरणवाद⇒   

      भूगोल में कई प्रकार के द्वैतवाद का विकास हुआ है। इनमें नियतिवाद बनाम सम्भववाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यह द्वैतवाद भूगोल के विषयवस्तु से संबंधित है। यूरोप में जब आधुनिक भूगोल का विकास हुआ तो जर्मन भूगोलवेताओं ने नियतिवाद दृष्टिकोण अपनाया। नियतिवादी का तात्पर्य है- भूगोल में प्रकृति की श्रेष्ठता को महत्वपूर्ण मानना। जर्मन विद्वानों के विरुद्ध फ्रांस में संभववाद का उदय हुआ।

       फ्रांसीसी विद्वान भूगोल में मानव के अध्ययन पर अधिक जोर देते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि जर्मनी और फ्रांस में भूगोल में विषय वस्तु को लेकर द्वंद छिड़ गया। यह द्वन्द द्विविभाजन का रूप धारण कर लिया। कालांतर में टेलर महोदय ने नियतिवादियों एवं सम्भववादियों की आलोचना करते हुए तार्किक तरीके  से नवनियतिवाद की संकल्पना प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने बताया कि नियतिवाद और संभववाद दोनों अलग-2 पहलू नहीं है, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू है। अर्थात नियतिवाद और सम्भववाद को नियतिवाद बनाम सम्भववाद के रूप में देखा जाना चाहिए।नियतिवाद या निश्चयवादनियतिवाद

     भूगोल में मानव एवं पर्यावरण के बीच संबंधो का अध्ययन हेतु अनेक पद्धति एवं वैचारिक सम्प्रदाय का विकास हुआ। उनमें से एक विचार निश्चवादी के नाम से जाना जाता है। भूगोल में द्वितीय विश्वयुद्ध तक निश्चयवादी विचार का प्रभाव बना रहा। निश्चयवादी विचार का तात्पर्य है- समय का इतिहास, सभ्यता, जीवनशैली, संस्कृति एवं राष्ट्र की सभी धारणाएँ पर्यावरण के द्वारा निर्धारित एवं संचालित होती है।

सिद्धांत- नियतिवादी संकल्पना मानव को एक निष्क्रिय अभिकर्ता या मोम का पुतला मानता है जिस पर भौतिक तत्व क्रियाशील रहते हैं और उसके व्यवहार तथा निर्णय लेने की प्रवृति को भी नियंत्रित करती है।

नियतिवाद या निश्चयवाद के समर्थन में तर्क

      नियतिवाद की सर्वप्रथम व्याख्या करने का कार्य यूनानी एवं रोमन भूगोलवेताओं ने किया। हिप्पोक्रेटस, अरस्तु, यूथीडेड्स, जोनोफोन जैसे भूगोलवेताओं ने बताया कि भौगोलिक अवस्थिति, पर्यावरणीय अनुकूलता के कारण ही एथेंस नगर को पूरे दुनिया में विशिष्ट महत्त्व प्राप्त है।

(1) हिप्पोक्रेटस ने अपनी पुस्तक एक वायु, जल और स्थान” में बताया है कि माननीय अधिवास वायु, जल, और स्थान के द्वारा ही निर्धारित होते हैं। उन्होंने बताया कि नील नदी घाटी क्षेत्र में सघन जनसंख्या इसलिए पायी जाती है कि वहाँ कृषि कार्य के लिए मानव तथा अधिवास के लिए जल, वायु, और स्थान काफी अनुकूल है।

(2) अरस्तू महोदय ने बताया कि शीत प्रदेश में निवास करने वाले निवासी साहसी और उष्ण प्रदेश में निवास करने वाले निवासी आलसी और डरपोक होते हैं। शीत प्रदेश के निवासी हमेशा शासक होते हैं और उष्ण प्रदेश के निवासी शोसित होते हैं। इसी कारण से नियति (प्रकृति) के द्वारा शोषित एवं शासक वर्गो का निर्धारण होता है।

(3) रोमन भूगोलवेता स्ट्रेबो ने बताया कि ढाल, उच्चावच और जलवायु ये सभी प्रकृति प्रदत है। ये तीनों कारक मिलकर मावन के जीवन शैली को विकसित करते हैं।

(4) मध्ययुगीन चिंतकों में बोल्डिंग, मोटेस्क्यू ने बताया कि मानवीय, अधिवास और उसके कार्यकलाप का निर्धारण भौतिक कारक  जैसे- जलवायु, उच्चावच और मृदा के द्वारा निर्धारित होता है। मोंटेस्क्यू ने यहाँ तक बताया कि उपरोक्त तीनों कारकों के द्वारा मानवीय संस्कृति भी निर्धारित होती है।

     निश्चयवादी विचार के विकास में अरब भूगोलवेता जैसे- अलबरुनी, अलमसूदी, इब्न हॉकल, अल इदरिसी, इब्न खाल्दून ने इस विचार को पुष्ट किया।

(5) अलमसूदी ने उत्तर भारत का अध्ययन करके बताया था कि जहाँ पर पर्याप्त मात्रा में भूमिगत जलस्तर उपलब्ध हो वहाँ के लोग हमेशा प्रसन्नचित और विनोदपूर्ण होते है और जबकि शुष्क प्रदेश के निवासी काफी असंतुलित होते हैं।

(6) जर्मन भूगोलवेता काण्ट महोदय ने बताया कि उष्ण प्रदेश के निवासी सुस्त और भिरू होते हैं जबकि शीत प्रदेश के निवासी साहसी और प्रतिज्ञ होते हैं।

* आधुनिक भूगोल में नियतिवादी चिंतन के विकास में जर्मन भूगोलवेता हमबोल्ट के कॉसमोस और रीटर के Erdkunde नामक पुस्तक का विशेष योगदान है। इन दोनों विद्वानों ने न केवल प्रकृति की श्रेष्टता को स्थापित किया वरन् भौतिक भूगोल को ही मुख्य भूगोल माना।

(7) रीटर महोदय ने यहाँ तक बताया कि मानव के शरीर की बनावट, शारिरीक गठन और स्वास्थ्य कई पर्यावरणीय विभिन्नता के कारण ही उत्पन्न होती है।

(8) हमबोल्ट ने बताया कि पर्वतीय प्रदेश के लोगों की जीवनशैली मैदानी क्षेत्र के निवासियों की जीवनशैली से भिन्न होता है।

(9) डार्विन ने अपने पुस्तक “Origin of species” में प्राकृतिक चयन का सिद्धांत प्रस्तुत किया जिसमें बताया कि जीवों के उद्द्विकासीय प्रक्रिया को प्राकृतिक कारण ही निर्धारित करते हैं। जो जीव प्रकृति के साथ अनुकूलन स्थापित कर लेते हैं, वे जीवित रह पाते हैं और जो अनुकूलन स्थापित नहीं कर पाते हैं उन्हें प्रकृति परित्याग कर देती हैं।

    डार्विन के सिद्धांत से प्रभावित होकर रैटजेल महोदय ने नियतिवाद के स्थान पर पर्यावरणवाद की संकल्पना प्रस्तुत की। नियतिवाद संकल्पना के तहत मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रकृति के समस्त घटकों के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। जबकि पर्यावरणवाद के तहत प्रकृति के कुछ निश्चित घटकों के प्रभाव का ही विश्लेषण किया जाता है।

          पारिस्थितिक वैज्ञानिक बक्क्ल महोदय ने अपनी पुस्तक “इंगलैंड में सभ्यता का इतिहास” नामक पुस्तक में मानवीय कार्यों का निर्धारक प्रकृति को माना और बताया कि धन का संग्रह तथा उसका विवरण इत्यादि भी जलवायु, मृदा जैसे कारकों पर निर्भर करती है।

      फ्रांसीसी भूगोल लैप्ली ने Place – Work – Folk (स्थान-कार्य-लोकपरम्परा/ संस्कृति) नामक संकल्पना का विकास किया जिसमें उन्होंने बताया कि स्थान कार्य को निर्धारित करता है और कार्य लोक संस्कृति को निर्धारित करता है। इसी तरह लैमोलिन महोदय ने यह बताया कि समाज का सौंदर्यीकरण वातावरण के द्वारा ही किया जाता है।

       कई अमेरिकी भूगोलवेत्ताओं ने भी नियतिवादी संकल्पना का समर्थन किया। डेविस महोदय ने “Geographical Essay” नामक पुस्तक में भूदृश्य के विकास पर जलवायु जैसे कारकों को महत्त्वपूर्ण माना।

     अमेरिकी भूगोलवेत्ता मिस सेम्पल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Influence of Geographic Environment” (भौगोलिक वातावरण का प्रभाव) में अनेक प्रकार के तथ्यों से नियतिवाद का समर्थन किया। उन्होंने इस पुस्तक में “मानव को धरातल की उपज” बताया। उन्होंने यह भी कहा कि “मानव मोम का पुतला है।” इसे प्रकृति जब चाहे तब चुट‌कियों से मसल सकती है। इस तरह मिस सेम्पल को नियतिवाद का कट्टर समर्थक माना जाता है। इसकी पुस्तक नियतिवाद के समर्थन में लिखा गया अंतिम पुस्तक था।

        उपरोक्त भूगोलवेत्ताओं के अलावे ब्रिटिश भूगोलवेत्ता मैकिण्डर, चिशोल्म, हबर्टसन, रॉबर्टमिल, बोमेन जैसे भूगोलवेत्ताओं ने भी नियतिवाद का समर्थन किया। इन भूगोलवेत्ताओं ने यूरोप, अफ्रीका के कई देशों में अध्ययन कर अपने विचारों को पुष्टि किया। गैडीस महोदय ने यह बताया कि न्यून पोषण से ग्रसित मनुष्य को मलेरिया की बीमारी अधिक होती है। जैसे- भारत के लोग निरामिश भोजन कम करते है जिससे उनमें रोग-प्रतिरोधी क्षमता कम होती है। फलतः उनमें मलेरिया जैसी बीमारी होती है। जबकि माँस खाने वाले मनुष्यों में मलेरिया की बीमारी कम होती है।

आलोचना

      द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नियतिवादी की निम्नलिखित आलोचना किया जाने लगा:-

(i) कुछ विद्वानों ने यह कहा कि नियतिवादी एक पक्षीय विचार प्रस्तुत कर रहे हैं। जिसमें प्रकृति की भूमिका को बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत कर रहे हैं।

(ii) O.H.K. स्पेट महोदय में नियतिवादियों की आलोचना करते हुए कहा कि वातावरण अपने आप में अर्थहीन वाक्यांश है, बिना मानव के वातावरण का कोई अस्तित्व नहीं है।

(iii) हार्टशोन महोदय ने नियतिवाद की आलोचना करते हुए कहा कि इस संकल्पना को पूर्णत: त्याग देना चाहिए क्योंकि यह मानव और प्रकृति को अलग करता है।

(iv) नियतिवादी संकल्पना के सबसे आलोचक संभववादी भूगोलवेता हुए जिनमें फ्रांसीसी भूगोलवेता सबसे प्रमुख हैं।

(v) ब्लास महोदय ने कहा कि प्रकृति ज्यादा-से-ज्यादा सलाहकार की भूमिका निभा सकता है न कि निर्णायककर्ता हो सकता है।

(vi) ब्रूंश महोदय ने नियतिवाद की आलोचना करते हुए कहा कि मानव दिन-दहाड़े पृथ्वी के गर्भ से खनिज पदार्थों को निकाल रहा है और प्रकृति मौन बनी रहती है।

निष्कर्ष

      उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि नियतिवादी संकल्पना के कई कट्टर आलोचक हुए। फिर भी नियतिवादी के विरोध में ही संभववादी संकल्पना का अभ्युदय हुआ। फलत: नियतिवाद बनाम सम्भववाद नामक द्वैतवाद की शुरुआत हुआ जिसके फलस्वरूप भूगोल के विषय वस्तु को विस्तृत आयाम देने में काफी मदद मिली।



नियतिवाद या निश्चयवाद पर नोट्स लिखने का दूसरा तरीका  इस प्रकार है 



नियतिवाद या निश्चयवाद (Determinism)

       मानव और प्रकृति के बीच में सदियों से संतुलन का संबंध रहा है। लेकिन भूगोल में कुछ ऐसे विचारधारा विकसित हुए हैं जिसके तहत कुछ विद्वान प्रकृति को श्रेष्ठ मानते हैं। जबकि कुछ विद्वान मानव को श्रेष्ठ मानते हैं। वैसी विचारधारा जिसमें प्रकृति को श्रेष्ठ माना गया है वैसी विचारधारा को नियतिवाद से संबोधित करते हैं। प्रकृति में सबसे सक्रिय तत्व पर्यावरण होता है। पर्यावरण मानव को सबसे अधिक प्रभावित करता है।

      इसलिए इस विचारधारा को पर्यावरणवाद नाम से भी जानते हैं। प्रकृति के द्वारा घटित घटनाओं के संबंध में यह माना जाता है कि प्रकृति में जो भी घटनाएँ घट रही हैं। वे ईश्वर प्रदत और निश्चय है। इसलिए ऐसी विचारधारा को नियतिवाद या निश्वयवाद कहते हैं।

      निश्चयवाद एक ऐसा दर्शन है जो यह मानता है कि मानव एक निष्क्रिय अभिकर्ता या मोम का पुतला है। प्रकृति मानव के न केवल भौतिक विशेषताओं का बल्कि उसके समस्त सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक चिंतन को प्रभावित करता है। सामान्यत: भूगोल में इस दर्शन का अभिउदय जर्मनी में हुआ।

      नियतिवाद को विकसित करने में कई भूगोलवेताओं का योगदान रहा है। यहाँ तक जर्मन भूगोल विकसित होने के पूर्व कुछ यूनानी एवं रोमन भूगोलवेताओं ने भी इसकी पुष्टि की है। जैसे-यूनानी भूगोलवेत्ताओं वे हिप्पोक्रेटस, अरस्तू इत्यादि का नाम उल्लेखनीय है। हिप्पोक्रेटस ने अपनी पुस्तक “वायु, जल और स्थान” में लिखा है कि “मानवीय अधिवास मूलत: वायु, जल और स्थान जैसे भौतिक कारकों से निर्धारित होते हैं। उन्होंने नील नदी घाटी का उदा० देते हुए बताया है कि नील नदी घाटी में सघन जनसंख्या निवास करती है क्योंकि वहाँ के वायु, जल और स्थान मानव के लिए अनुकूलित है।”

            अरस्तू ने बताया है कि “शीत प्रदेश निवासी शाहसी, राजनैतिक संगठन बनाने में दक्ष और अपने पड़ोसियों पर शासन करने के लिए उपयुक्त होते हैं।” यहाँ तक कि एशिया के लोग इसीलिए कमजोर एवं डरपोक हैं और यूरोप के लोग उन्हें गुलामी के जंजीर में जकड़ लिया है।

          रोमन भूगोलवेता स्ट्रैबो ने अपनी पुस्तक “ढाल, उच्चावच और जलवायु” में लिखा है कि ढाल, उच्चावच और जलवायु प्रकृति के द्वारा प्रदत और ये तीनों ही तत्व मानव जीवन शैली को नियंत्रित करते हैं।

        मध्ययुगीत चिंतकों में बोल्डिंग, और मोण्टेस्क्यू ने बताया कि “मानव का अधिवास और उसका कार्यकलाप जलवायु, उच्चावच और मिट्टी के द्वारा नियंत्रित होती है।”

कई अरब भूगोलवेता भी नियतिवादी विचाराधार का समर्थन करते हैं। जैसे- अलमसूदी ने कहा है “उस भूमि में जहाँ जल की अधिकता पायी जाती है वहाँ के निवासी प्रफुल्लित और विनोदप्रिय होते हैं। जबकि शुष्क प्रदेश के निवासी असंतुलित (पागल) और अविनोदप्रिय होते हैं।”

         इतिहासकार जार्ज थाटन ने नियतिवाद विचारधारा को समर्थन करते हुए कहा है कि दो अलग-2 भौगोलिक प्रदेशों में निवास करने वाले निवासी में विभिन्नता भौगोलिक वातावरण के कारण ही उत्पन्न होता है।

          जर्मन भूगोलवेता इमैनुएल काण्ट ने दृढ़तापूर्वक कहा है कि उष्ण प्रदेश के निकासी सुस्त और भिरू (डरपोक) होते हैं जबकि शीत प्रदेश के लोग साहसी और दृढ़ होते हैं।

कई आधुनिक भूगोलवेता भी नियतिवाद के कट्टर समर्थक रहे हैं। जैसे-आधुनिक नियतिवाद विचारधारा विकसित करने का श्रेय हम्बोल्ट- और रीटर को जाता है। हम्बोल्ट ने इस विचारधारा का समर्थन “Cosmos” नामक पुस्तक में रीटर ने “अर्डकुण्डे” नामक पुस्तक में किया है।

       इन दोनों भूगोलवेत्ताओं ने न केवल मानव से प्रकृति को श्रेष्ठ मानते हैं बल्कि भौतिक भूगोल को ही मूल भूगोल मानते हैं। हम्बोल्ट ने तर्क देते हुए कहा है कि प्रकृति के ही कारण पर्वतीय प्रदेशों के निवासियों की जीवन पद्धति मैदान के लोगों से भिन्न होती है। इसी तरह रीटर ने कहा है कि भौतिक पर्यावरण ही मानव शरीर के गठन, बनावट और यहाँ तक ही स्वास्थ्य को भी निर्धारित करती है।

        जर्मन भूगोलवेत्ताओं में रेटजेल महोदय नियतिवाद के सबसे बड़े समर्थक रहे हैं। इन्होंने नियतिवाद के स्थान पर ‘वातावरणीय नियतिवाद’ शब्द का प्रयोग किया क्योंकि रैटजेल का मानना था कि मानव के ऊपर सम्पूर्ण प्रकृति का प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि वातावरण का प्रभाव अधिक पड़ता है।

        पारिस्थैतिक वैज्ञानिक वकेल ने अपनी पुस्तक सभ्यता का “सभ्यता का इतिहास इन इंगलैण्ड” में बताया है कि मानव की सभ्यता प्रकृति के द्वारा ही निर्धारित होती है उन्होंने बताया है कि धन का संग्रह और उनका वितरण की प्रक्रिया भी जलवायु, मिट्टी और खाधान्न आपूर्ति से प्रभावित होती है।

         फ्रांसीसी भूगोलवेता फैब्रिक लैप्ली ने Place-Work-folk (स्थान-कार्य-संस्कृति) संकल्पना विकसित किया। उन्होंने इस संकल्पना में नियतिवाद का समर्थन करते हुए कहा है कि स्थान कार्य का निर्धारक होता है और कार्य संस्कृति का निर्धारक होता है।

            लैमोलीन नामक भूगोलवेता ने नियतिवाद के समर्थन में तर्क देते हुए कहा है कि वातावरण के द्वारा समाज का सौन्दर्यी किया जाता है।

     अमेरिकी भूगोलवेत्ताओं में डेविस, हटिंग्टन एवं मिस सेम्पल इत्यादि भी नियतिवाद के समर्थक रहे हैं। हटिंग्टन ने “मानव भूगोल के सिद्धत” नामक पुस्तक में मानवीय कार्यों का विभाजन नियतिवादी दृष्टिकोण से किया है।

       नियतिवाद के सबसे कट्टर समर्थक मिस सेम्पल को माना जाता है। ये रैटजेल महोदय के शिष्या थी, इसलिए इनके विचारों पर रैटजेल का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इन्हें नियतिवाद का अंतिम भूगोलवेता भी माना जाता है। इन्होंने अपनी पुस्तक “Influence of geographic Environment” नियतिवाद के समर्थन में कई तर्क प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं “मानव पृथ्वीतल का उपज है।”

       पुनः वे कहती हैं “मानव प्रकृति का अभिकर्ता है।” उन्होंने संभववादियों पर चुटकी लेटे हुए लिखा है कि मानव अपने कार्यों का डींग हाँकता है लेकिन प्रकृति मौन रहकर अपने कार्यों को सम्पादित करते रहता है। यहाँ तक कि मानव मोम का एक पुतला है प्रकृति जब चाहे तब उसे चुट‌कियों से मसल सकती है।

            कई ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं भी नियतिवाद के समर्थक रहे हैं। जैसे कार्ल मेकेये ने सेटलैण्ड द्वीप का अध्ययन करते हुए बताया कि वातावरणीय प्रभाव के कारण ही यहाँ के घोड़ों की ऊँचाई 3.5 फीट रह गया है।

           गैडीस (ब्रिटिश) महोदय ने मानव के स्वास्थ पर पोषण के प्रभाव का अध्ययन किया है। उन्होंने बताया है कि किस क्षेत्र में कौन खाद्य पदार्थ मिलेगा प्रकृति स्वयं निर्धारित करती है। उन्होंने भारत का उदाहरण देते हुए कहा है कि भारत में मुसलमानों की तुलना में हिन्दुओं में मलेरिया की बीमारी अधिक होती है क्योंकि हिन्दू लोग निरामिश (vegetarian) होते हैं।

निष्कर्ष:

         इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि नियतिवादियों ने अपने-2 तर्कों के माध्यम नियतिवादी संकल्पना को पुष्ट करने का प्रयास किया है। यह संकल्पना भूगोल के विषय-वस्तु में द्वितीय विश्वयुद्ध तक विशेष मान्यता रखता था, लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मानव ने जिस रफ्तार से विकास कार्य किया है वह चौकाने वाला है। अत: कई आधारों पर नियतिवाद की आलोचना भी की जाती है। इसके सबसे बड़े आलोचक फांसासी भूगोलवेत्ता और संभवावादी रहे हैं।

        संभववादियों ने कहा है कि नियतिवाद एक एकांकी विचारधारा है जिसमें प्रकृति को महत्व अधिक दिया गया है और मानव को निष्क्रिय अभिकर्ता माना गया है जो गलत है।

      स्पेट महोदय ने नियतिवाद का आलोचना करते हुए कहा है कि प्रकृति या वातावरण अपने आप एक अर्थहीन वाक्यांश है। बिना मानव के वातावरण का कोई महत्व नहीं है।

      ऑस्ट्रेलियाई विद्वान वोल्फ गांग हारटेक ने जर्मनी के दक्षिण भाग में स्थित फ्रैंकफर्ट नगर के सीमान्त क्षेत्रों का अध्ययन करते हुए बताया है कि यहाँ भौतिक तत्वों की भूमिका नगण्य है। सर्वत्र मानवीय भूमिका का परचम लहरा रहा है।

        जर्मन भूगोलवेत्ता होर्टसोन ने कहा है कि नियतिवाद जैसे एकल विचारधारा मानव और प्रकृति को अलग-2 करते हैं। इससे भूगोल में विभाजन की खतरा उत्पन्न होती है। अत: भूगोलवेत्ताओं को ऐसे विचारधारा से बचना चाहिए।



YOU TUBE LINK-https://youtu.be/JfO3YSNgWnM

Read More:-

2. Dichotomy and Dualism (द्विविभाजन एवं द्वैतवाद)

Dichotomy and Dualism

द्विविभाजन एवं द्वैतवाद



Dichotomy and Dualism(नोट- द्वि, द्वै = दो, विभाजन = बँटवारा, वाद = विचारधारा)

             किसी विषय के कोई भी विषयवस्तु को लेकर दो प्रकार के विचार प्रस्तुत करना द्वैतवाद कहलाता है। जबकि किसी विषय के विषयवस्तु पर प्रस्तुत किया गया दो दृष्टिकोण में से किसी एक दृष्टिकोण को ही प्रमुख मान लेना द्विविभाजन कहलाता है अर्थात द्विविभाजन में दो प्रकार के स्वतंत्र विचारधारा प्रस्तुत किये जाते हैं। जबकि द्वैतवाद में किसी विषयवस्तु पर दो अन्तर संबंधित विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। द्विविभाजन का प्रमुख उद्देश्य किसी भी विषय-वस्तु को बाँटना है। जबकि द्वैतवाद का मुख्य उद्देश्य बिना बँटवारा किये हुए वाद-विवाद के आधार पर विषय को विकसित करना है।

      16वीं शताब्दी तक भूगोल में किसी भी प्रकार के द्विविभाजन एवं द्वैतवाद का आगमन नहीं हुआ था। भूगोल में द्विविभाजन को जन्म देने का श्रेय इमैनुएल काण्ट को जाता है क्योंकि इन्होंने ही भूगोल को इतिहास से अलग करने का कार्य किया था। काण्ट के अनुसार किसी भी विषयवस्तु का अध्ययन दो संदर्भों में किया जा सकता है। प्रथम समय के संदर्भ में और द्वितीय स्थान के संदर्भ में।

    समय के संदर्भ में किसी विषयवस्तु का अध्ययन करना इतिहास कहलाता है। जबकि स्थान के संदर्भ में किसी विषयवस्तु का अध्ययन भूगोल कहलाता है। इस तरह स्पष्ट होता है कि इमैनुएल काण्ट महोदय ने द्विविभाजन की संकल्पना को जन्म देकर भूगोल को इतिहास से पृथक करने का कार्य किया।

इमैनुएल काण्ट

          इमैनुएल काण्ट

         16वीं शताब्दी तक भूगोल में द्वैतवाद की कोई भी संकल्पना विकसित नहीं हुई। 17वीं शताब्दी में बर्नहार्ड वारेनियस ने पहली बार भूगोल के सामान्य भूगोल एवं विशिष्ट भूगोल में बाँटकर अध्ययन करने का प्रयास किया। लेकिन इनका उद्देश्य भूगोल को बाँटना नहीं था बल्कि भूगोल से संबंधित विषयवस्तु के अध्ययन को विकसित करना था। इस तरह वारेनियस के कार्य से भूगोल द्वैतवाद का श्रीगणेश हुआ।

बर्नहार्ड वारेनियस

बर्नहार्ड वारेनियस

        19 वीं शताब्दी में भूगोल के विषयवस्तु को लेकर पुनः द्वैविभाजन की स्थिति उत्पन्न हो गई क्योंकि कुछ भूगोलवेता भूगोल में केवल प्राकृतिक भूगोल के अध्ययन के पक्षधर थे तो कुछ भूगोलवेता केवल मानव भूगोल के अध्ययन के पक्षधर थे। हम्बोल्ट, रीटर, डेविस, पेंक, मिस सेम्पल इत्यादि प्राकृतिक भौतिक भूगोल के अध्ययन को समर्थन करते थे।

      वहीं ब्लाश, ब्रूंस, डिमांजिया, मैकिन्डर जैसे भूगोलवेता मानव भूगोल के अध्ययन के पक्षधर थे। इस तरह भूगोल द्विविभाजन के आगमन के कारण बँटने के कगार पर पहुँच गया। भूगोल में विभाजन की समस्या उत्पन्न न हो इसलिए द्वैतवाद पर अधिक जोर दिया जाने लगा। इस तरह भूगोल में विधितंत्र से संबंधित और भूगोल के विषयवस्तु को लेकर कई द्वैतवाद को जन्म देकर अध्ययन करने की परम्परा प्रारंभ हुई। जैसे:-

(1) सामान्य भूगोल बनाम विशिष्ट भूगोल

(2) भौतिक भूगोल बनाम मानव भूगोल

(3) सैद्धांतिक भूगोल बनाम व्यावहारिक भूगोल

(4) क्रमबद्ध भूगोल बनाम प्रादेशिक भूगोल

(5) नियतिवाद बनाम सम्भववाद

        द्विविभाजन एवं द्वैतवाद के कारण भूगोल के ऊपर मिश्रित प्रभाव देखा जा सकता है। द्विविभाजन के कारण कोई भी विषय बँटवारे के कगार पर पहुँच जाता है जबकि द्वैतवाद के कारण भूगोल के विषयवस्तु और उसके अध्ययन के तकनीक के विकास में मदद मिलती है। भूगोल के अलावे सभी कला विषय में द्विविभाजन एवं द्वैतवाद की समस्या उत्पन्न हुई है। भूगोल में अब द्विविभाजन एवं द्वैतवाद की घटना इतिहास की घटना माना जाने लगा है। भूगोल को इस समस्या से मुक्त करने का श्रेय टेलर, सावर, हार्टसोन, हरबर्टसन जैसे भूगोलवेताओं को जाता है।

निष्कर्ष

     निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि द्विविभाजन एवं द्वैतवाद से भूगोल के विषयवस्तु को विकसित करने में मदद अवश्य मिलती है लेकिन इनकी चरम परकाष्ठा भूगोल को विभाजित भी कर सकती है।

नोट :- हालाँकि यूनानी, रोमन और अरब भूगोलवेत्ताओं के लेखों में भी द्वैतवाद की धुंधली झलक मिलती है। हिरोडोटस ने जन-जातियों के विवरण के साथ-साथ उनकी प्राकृतिक परिस्थितियों का भी उल्लेख किया है। स्ट्रेबो का प्रादेशिक विवरण और टॉलमी का गणितीय भूगोल पर ध्यान भी ऐसे विवरण हैं जो द्वैतवादी हैं। हिप्पोक्रेट्स, अरस्तु जिनोफोन, आर्यभट्ट, अल-मसूदी और इब्नखाल्दून ने अनेक लोगों के जन-जीवन शैली को प्राकृतिक वातावरण के प्रभावों द्वारा उनको स्पष्ट बनाया है।



YOU TUBE LINK- https://youtu.be/2wHXXc-nQoQ

Read More:-

10. नगरीय वर्गीकरण

10. नगरीय वर्गीकरण


नगरीय वर्गीकरण⇒नगरीय वर्गीकरण

            नगरों का वर्गीकरण चार आधार पर किया जाता है:-

1. उत्पत्ति तथा विकास के आधार पर

2. स्थानीयकरण अथवा बसाव स्थान एवं बसाव स्थिति के आधार पर

3. कार्यों के आधार पर

2. जनसंख्या आकार के आधार पर

उत्पत्ति तथा विकास के आधार पर नगरों का वर्गीकरण 

          नगरों के उत्पत्ति और विकास के आधार पर वैज्ञानिक विश्लेषण अनेक विद्वानों के द्वारा किया गया है। इस दृष्टि से पैट्रिक गेडिस, ममफोर्ड एवं ग्रिफिथ टेलर के कार्य अधिक महत्व के है। 

          पैट्रिक गेडिस के अनुसार नगरों का विकास व पत्तन की छः अवस्थाएँ जाती है जिन्हें मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जा सकता है।

1. पैलियोटेकनीक वाले नगर में पुरानी अर्थव्यवस्था वाले नगर और

2. नियोटेकनीक नगर में नई अर्थव्यवस्था वाले नगर आते है।

                 टेलर ने नगरों के उत्पत्ति एवं विकास के आधार पर मानव जीवन चक्र से तुलना करते हुए सात अवस्थाओं की चर्चा की गई है-

1. पूर्व शैशवावस्था (Sub-infantile stage)⇒ इस अवस्था में मकानों के अंदर की दुकान फिर गली अथवा सड़क के दोनों ओर मकान तथा दुकान बनने लगते हैं।

2. शैश्वावस्था (Infantile stage)⇒ इस अवस्था में गलियों व सड़कों का कुछ सुधरा रूप दिखाई देने लगता है तथा बस्ती बढ़ने लगती है।

3. बाल्यवस्था (Juvenile stage)⇒ इस अवस्था में मुख्य सड़क के दोनों किनारों पर गलियों का निर्माण होना शुरू हो जाता है।

4. किशोरावस्था (Adolescent Stage)⇒ नगर में विभिन्न प्रकार के मकान दिखलाई देने शुरू हो जाते है। नगर अपना व्यापार-क्षेत्र अलग से बना लेते हैं।

5. प्रौढ़ावस्था (Mature Stage)⇒ इस अवस्था में नगर की प्रत्येक क्षेत्र में विभिन्नता आ जाती है। रिहाइशी क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्र, व्यापारिक क्षेत्रों का पृथक्कीकरण स्पष्ट दिखाई देने लगता है। मकानों की ऊंचाई बढ़ने लगती है।

6. उत्तर प्रौढावस्था (Late Mature Stage)⇒ इस अवस्था में नगर का विकास योजना के अनुसार होने लगता है।

7. वृद्धावस्था (Sensile Stage)- यह नगर की अंतिम अवस्था है जिसमें नगर उजड़ने लगता है। चित्तौड़, कन्नौज, फर्रुखाबाद, इस्फान (ईरान) इसी के उदाहरण हैं।

मैगापोलिस

               ममफोर्ड ने सामाजिक वातावरण को ध्यान में रखकर नगरों की छ: अवस्थाएँ बतायी हैं-

1. इओपोलिस

2. पोलिस

3. पट्रोपोलिस

4. मैगापोलिस

5. टायरेनोपोलिय

6. मेक्रोपोलिस

1. Eopolis- इस अवस्था में केंद्रीय स्थान पर नगर का विकास अपने शैशवकाल में होता है लेकिन नगर के आकार की पहचान नहीं हो पाती है।

2. Polis- इस अवस्था में जनसंख्या आकार बड़े हो जाते हैं तथा नगरीय आकार की पहचान संभव है। बड़े गाँव कस्बे का रूप धारण कर लेते है।

3. Metropolis- मुख्य नगर के आकार में पुनः वृद्धि होती है तथा इस पर निर्भर रहने वाले कई छोटी-छोटी नगरीय बस्तियाँ भी विकसित हो जाती है।

4. Megapolis- यह अवस्था नगर की चरम सीमा को बताती हैं। इसमें प्रादेशिक नगरीकरण की प्रवृत्ति होती है। आस-पास की ग्रामीण बस्तियों में भी नगरीय कार्यों की प्रधानता हो जाती है। अमेरिकन मेगापोलिस का विस्तार बोस्टन से लेकर बाल्टीकमोर तक हैं। रोर्टरडम-एम्सटर्डम मेगापोलिस। टोक्यो-योकोहामा-कवासाकी-कोबे मेगापोलिस इसके उदाहरण है।

5. Trynopolis- इस अवस्था में नगर की जनसंख्या में ह्रास प्रारंभ हो जाता है। नगरीय आकर्षण पर्याप्त नहीं रह जाता। इसे Diging Stage of City कहते है। लंदन और पेरिस इसके उदाहरण है।

6. Nekropolis- इस अवस्था में नगर का पूर्ण पत्तन हो जाता है।उजड़े हुए नगर की इस अवस्था में चारों ओर  भग्नावशेष दिखाई देने लगते है। हड़प्पा, कन्नौज, तक्षशिला इसके उदाहरण है।

बसाव-स्थान (Site) व बसाव-स्थिति (Situation) में अंतर व संबंध  

             बसाव-स्थान (Site) वास्तव में बसाव-स्थिति (Situation) का एक छोटा अंग है। ये दोनों मिलकर नगर की उत्पत्ति व विकास पर प्रभाव डालते हैं। नगर एवं गाँव दोनों प्रकार के बस्ती के लिए Site और Situation महत्व रखता। इनके बीच निम्नलिखित अंतर है-

(i) बसाव-स्थान व बसाव-स्थिति में सबसे पहले अंतर रैटजेल ने किया। उसने बर्लिन नगर का अध्ययन कर यह बताया कि यह नगर ऐसे बसाव-स्थान पर है जहाँ कि उसके बड़ा नगर बनने की संभावना नहीं थी, परंतु जर्मनी के उपजाऊ मैदान में इसकी बसाव-स्थिति ही इसके विकास का कारण बनी और यह एक बड़ा नगर बन गया।

(ii) बसाव स्थान भौतिक विशेषताओं पर अधिक बल देता है, जबकि बसाव-स्थिति में प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों परिस्थितियों पर ध्यान दिया जाता है।

(iii) बसाव-स्थान विशिष्टता रखने वाला होता है लेकिन बसाव-स्थिति व्यापक होती है।

(iv) नगर व गाँव दोनों प्रकार की बस्ती के लिए बसाव-स्थान का महत्व होता है लेकिन बसाव-स्थिति ही होती है, जो गाँव के आकार को वृद्धि प्रदान करके उसको नगर में परिवर्तित कर देती हैं।

(v) गंगा-यमुना नदियों का संगम तथा गंगा के अर्द्ध-वृत्ताकार मोड़ बसाव-स्थान की विशेषता है। जिन्होंने नगर को वर्तमान आकृति प्रदान की है। इन नदियों के बीच की भूमि बाढ़ से सुरक्षित होने के कारण बसाव-स्थिति की दृष्टि से उपयुक्त थी। बसाव-स्थिति की दृष्टि से नगर अपने चारों और विस्तृत उपजाऊ भूमि, अतिरिक्त कृषि उत्पादन, रेल व सड़क मार्गों का जंक्शन आदि सुविधाएँ रखता है।

            बसाव स्थान वह भू-भाग है जहाँ पर नगर बसा होता है। किसी नगर का विकास किस दिशा में होगा यह उसके बसाव स्थान पर निर्भर करता है। जैसे-यदि नगर किसी सड़क या नदी के किनारे बसा है तो उसकी आकृति लंबी होगी। बसाव स्थान के अंतर्गत उस स्थान को धरातलीय दशा, भूगर्भिक दशा, जलप्राप्ति आदि का अध्ययन करते हैं।

           नगर प्रारंभ में बसाव स्थान की आकृति के अनुरूप ही फैलना शुरू करता है। बाद में समय के साथ-साथ अपने आकार में वृद्धि कर लेता है। उन दिशाओं में फैलता है, जहाँ पर भूमि नगरीय विकास के लिए उपयुक्त होती है और यातायात मार्गों के सहारे बढ़ता है लेकिन यदि किसी नगर का बसाव-स्थान कुछ भौतिक असुविधाओं से युक्त है तो भी वहाँ पर नगर का विस्तार होता है ऐसा तब होता है, जब नगर स्थिति बसाव स्थिति को तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे स्थान पर भूमि की कीमत ऊँची होती हैं। इस प्रकार बसाव स्थान का तात्पर्य उस जगह से है जहाँ नगरीय आकारिकी का विकास होता है जबकि बसाव स्थिति का संबंध बसाव स्थल के चारों तरफ पाये जाने वाले प्राकृतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक वातावरण से है, जो नगर के विकास में सहायक होता है। दोनों ही कारक मिलकर नगरीय बस्ती का स्थानीयकरण करते हैं। इस कारण बसाव स्थान और बसाव स्थिति के आधार पर किया गया वर्गीकरण स्थानीयकरण के आधार पर किया गया वर्गीकरण माना जाता है।

भौगोलिक स्थानीयकरण के आधार पर नगरों का वर्गीकरण अथवा बसाव-स्थान तथा बसाव-स्थिति के आधार पर नगरों का वर्गीकरण

         भौगोलिक स्थानीय करण अर्थात बसाव-स्थल तथा बसाव स्थिति के अनुसार नगरों को दो प्रमुख भागों में बाँटते है-

(A) जलीय सुविधा के किनारें बसे नगर और

(B) जलीय सुविधा से दूर बसे नगर

(A) जलीय सुविधा के किनारे बसे नगर- इसे पुन: तीन भागों में बाँटते है:-

(a) नदी के किनारे बसे नगर- इसे पुन: छ: भागों में बाँटते है:- 

(i) जलप्रपात नगर-  जलप्रपात के सुविधा के कारण पर्यटन स्थल बन गया है। उदाहरण सागर (कर्नाटक), भेड़ाघाट, नियाग्रा।

(ii) मोड़ लेते हुए बसाव-स्थलीय नगर- यह बाढ़ से मुक्त नगर होता है।  जैसे -आगरा, जायरे का लिविंग स्टोन नगर।

(iii) संगम स्थल पर बसा नगर- जहाँ दो नदियों का संगम होता है वहाँ बसे नगर इसके तहत आते है। जैसे प्रयाग, अलकनंदा और भागीरथी के संगम पर वसा देवप्रयाग, स्वर्णरेखा और खरकई के संगम पर बसा जमशेदपुर।

(iv) ब्रिजटाउन या नदियों के  दोनों किनारों पर बसे नगर। जैसे लंदन (टेम्स) बुडापेस्ट (डेन्यूब), श्रीनगर (झेलम)  

(v) ज्वारीय नगर – ज्वारभाटा के जल से नदियों के मुहानो पर बंदरगाह बन जाते हैं जिससे समुद्र से दूर आंतरिक भाग में नगर बन जाते हैं। जैसे हुगली के किनारे कलकत्ता।

(vi) प्राकृतिक बाँध नगर- बाढ़ के मलबे से धरातलीय ऊंचाई में वृद्धि होती है तो प्राकृतिक बाँध बन जाता है।

उसी पर नगर बस जाते हैं। जैसे पटना, बुहांग वियना।

(b) झील के किनारे बसे नगर:- प्रायः झील के किनारे भी नगरों का विकास हो जाता है। इसके कई कारण है।

जैसे-

(i) पर्यटन के चलते- पुष्कर झील के किनारे पुष्कर नगर, इसी तरह नैनीताल को भी लिया जा सकता है।

(ii) औद्योगिक गतिविधि के चलते- कर्लोस (झील के किनारे), ग्रेटसाल्ट लेक (USA)।

(iii) नौकागम्य के कारण- महान झील के किनारे- क्लीवलैंड, बफैलो, कम्पाला (युगांडा), डलुथ आदि अस्थावान (कैस्पीयन पर), बोल्गा नदी के मुहाना पर बने झील पर बसे नगर।

(c) समुद्री प्रभाव से भी कई प्रकार के नगर विकसित होते हैं। जैसे-

(i) पुलीन नगर- यहाँ पर पर्यटन का विकास हो जाता है। जैसे मियामी बीच सिटी, कोयलम, दीघा (WB) आदि।

(ii) ज्वारनद-मुख नगर- ज्वारनद्मुख नगर प्राकृतिक बंदरगाह के कारण जैसे सूरत (ताप्ती के किनारे) नावें और स्वीडेन के सभी।

बंदरगाह- जैसे डंवर फिस्ट, गोटेंवर्ग (नार्वे)

(iii) लैगुन के किनारे बसे लैगुन नगर- जैसे आस्ट्रेलिया के टाउंसविले, भारत में कोचीन का विकास।

(iv) द्वीपीय नगर- द्वीपों पर संचार या जहाजरानी के कारण जैसे पोर्टब्लेयर।

(v) बंदरगाह नगर या जलमार्ग नगर- समुद्री जलमार्ग के सुविधाओं के कारण तट के किनारे प्राकृतिक बंदरगाह के अलावे कृत्रिम बंदरगाह भी विकसित किए जाते है। जैसे मद्रास।

(B) जलीय सुविधा से दूर बसे नगर- इसके भी छः प्रमुख वर्ग आते है। जैसे-

(1) सीमावर्ती नगर- सीमा के किनारे सामरिक महत्त्व के कारण जैसे राजौरी एवं पिथौरागढ़ आदि।

(ii) परिवहन मार्ग पर विकास  नगर- काठगोदाम (नैनीताल) परिवर्तन से बने नगर और योगेन्द्र नगर (HP)। 

(iii) धर्मिक नगर-  धार्मिक कारण से बने नगर  जैसे- अजमेर, वाराणसी। 

(iv) शैक्षणिक नगर- जैसे पिलानी, रुढ़की।

(v) क्रोड नगर- परिवहन मार्गों के संगम स्थल पर बसा नगर है। जैसे लंदन, पेरिस, शिकागो, पंडित दीन दयाल उपाध्याय नगर। 

(vi) सेवा केंद्र नगरीय बस्ती- मूलत: ग्रामीण क्षेत्रों की केन्द्रीय बस्ती होती है और आसपास के लोगों के बाजार सुविधा के लिए ग्रामीण बाजार बस्तियाँ विकसित होती है जैसे प्राय: हर देश के ग्रामीण क्षेत्र में। 

नगरों का कार्यिक वर्गीकरण

          यद्यपि नगरों का कार्य द्वितीयक और तृतीयक प्रकार का होता है लेकिन नगरों में कार्यिक विशेषता की प्रवृत्ति होती है। इसी विशेषता के आधार पर नगरों का कार्यिक वर्गीकरण किया जाता है। यह विशेषता उसकी भौगालिक वातावरण का परिणाम होता है। 

       कई भूगोलवेत्ताओं ने कार्यिक विशेषीकरण के आधार पर नगरों के वर्गीकरण का प्रयास किया है। कुछ विद्वानों का वर्गीकरण इस प्रकार से है-

1. मेकेंजी का वर्गीकरण- मेकेंजी ने कार्यिक विशेषता को आधार मानते हुए नगरों को दो भागों में बाँटा है-

(A) सक्रीय नगर (Active Town or Basic Town)- वैसे नगर जो उत्पादन कार्यों में संलग्न है अथवा नगरीय अर्थव्यवस्था को आर्थिक लाभ दे रहें हो।

(B) अक्रीय नगर (Passive or Non-Basic Town)- वैसे नगर जहाँ उत्पादन कार्य ठप्प पड़ गया हो अथवा नगरीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक योगदान न के बराबर दे रहें हों इसके तहत अधिवासी नगर, शिक्षा नगर, धार्मिक नगर आदि आते हैं।

2. जेलसन का वर्गीकरण-

(i) औधोगिक नगर-जैसे ऐसेन, बर्मिधम आदि।

(ii) खनन नगर- जैसे जोहान्सबर्ग, चुकियामाता, कालगुर्ली, टैक्सास आदि।

(iii) परिवहन एवं संचार नगर- जैसे शिकागों, कोवे, वेनिस, डुजोन मारसर्ली आदि। 

(iv) प्रशासनिक नगर- जैसे कैनबेरा, इस्लामाबाद, मास्को, पैकिंग, वाशिंगटन, हेग आदि।

(v) व्यवसायिक नगर

(vi) वित्त एवं बीमा नगर

(vii) मुद्रा व्यापार नगर

(vi) थोक व्यापार का केंद्रीय नगर

(ix) सेवा केंद्र वाला नगर

(x) विविध कार्यों का नगर- सैनिक  महत्व, स्वास्थ्य केंद्र, क्रीडा केंद्र, धार्मिक केंद्र आदि।

3. एस्कार्ट एंड मोसर का वर्गीकरण- भूगोलवेत्ता एस्कोट एवं मोसर ने बहुचरक विधि का प्रयोग करते हुए  ब्रिटिश नगरों को चौदह भागों में बाँटा है। इसके लिए उन्होंने 67 चरों का प्रयोग किया। इस आधार पर निम्नलिखित वर्गीकरण है-

(1) समुद्रतटीय स्वास्थ्य

(ii) वाणिज्यिक प्रशासनिक नगर 

(iii) रेलवे जंक्शन वाला नगर

(iv) वृहत बंदरगाह नगर

(v) सूती वस्त्र वाला नगर

(vi) औद्योगिक नगर

(vii) औद्योगिक सह वाणिज्यिक नगर

(viii) उपनगर

(ix) मिश्रित अधिवासी नगर

(x) नवीन मिश्रित अधिवासी नगर

(xi) हल्के उद्योग का नगर

(xii) पुराने औद्योगिक नगर

(xiii) नवीन औद्योगिक नगर

(xiv) नवीन औद्योगिक उपनगरनगरीय वर्गीकरण

          बहुचरक विधि के एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि सभी देशों के लिए समान चर और समान वर्गीकरण नहीं हो सकते है। जैसे ब्रिटेन में अनेक नगर सूती वस्त्रों के कारण बसे हैं। इस प्रकार की संभावनाएँ थाइलैंड, इंडोनेशिया जैसे देशों में नहीं हो सकता। अतः एस्कोट एवं मोसर ने यह बताया है कि सभी देशों को अपनी परिस्थितियों के अनुरूप अपने चरों का निर्धारण करना होगा। इसी आधार पर कार्यिक वर्गीकरण संभव है।

4. अशोक मित्रा का वर्गीकरण- भारतीय नगरों के कार्यिक वर्गीकरण हेतु अशोक मित्रा का कार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। कार्यिक विशेषता के आधार पर भारतीय नगरों को निम्नलिखित सात वर्गों में रखा है-

(i) उत्पादन नगर⇒

औद्योगिक नगर- बोकारो, टाटा, भिलाई, सिंदरी, हावड़ा

खनन केंद्र- धनबाद

तेल निकालने वाला नगर- डिगबोई

(ii) वाणिज्यिक और व्यापारिक नगर⇒ हापुड़, काठगोदाम, रक्सोल आदि।

(iii) प्रशासनिक नगर⇒ गांधी नगर, चण्डीगढ़, ईटानगर, भोपाल, भुवनेश्वर।

(iv) परिवहन नगर⇒ पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर, कालीकट, विशाखापट्नम।

(v) सांस्कृतिक नगर⇒ अजमेर, पुष्कर, काशी, मथुरा, गया, अमृतसर, मदुरई।

(vi) पर्यटन तथा स्वास्थ्यवर्धक नगर⇒ श्रीनगर, नैनीताल, शिमला, मसूरी, ऊँटी आदि।

(vii) विविध कार्यों का नगर⇒ भारत के सभी महानगर इसमें आएँगे जैसे- दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई आदि।

छावनियाँ- अंबाला, मेरठ, लैंसडॉन आदि

शिक्षा का केंद्र- शांति निकेतन, उज्जैन, सागर

विस्थापितों का नगर⇒ द० हस्तिनापुर

            इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि नगरीय वर्गीकरण में कार्यिक विशेषता को विशेष महत्व प्राप्त है क्योंकि इससे नगर नियोजन कार्यक्रम में विशेष सहायता मिली है।

जनसंख्या के आधार पर नगरों का वर्गीकरण

          जनसंख्या के आधार पर नगरों का वर्गीकरण में कार्यिक विशेषता को विशेष महत्व प्राप्त है क्योंकि इससे नगर नियोजन कार्यक्रम में विशेष सहायता मिलती है।

 जनसंख्या के आधार पर भी नगरों का वर्गीकरण का प्रयास किया गया है। इसके लिए विभिन्न देशों में अलग-अलग मानदंड अपनाये गये है। भारत, मलेशिया, थाईलैंड जैसे देशों में नगरीय मान्यता के लिए 5000 जनसंख्या का होना आवश्यक है लेकिन नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क जैसे देशों में मात्र 200 जनसंख्या उसका आधार है। पुन: नगरीय जनसंख्या को आधार माना जाए तो USA में वह कोई भी नगर महानगर है जिसकी जनसंख्या करीब 54 हजार है और उसके कई सहयोगी नगरीय बस्तियों का विकास हुआ है। भारत की स्थिति भिन्न है। यहाँ पर महानगरीय मान्यता के लिए सहायक नगरीय बस्तियों का होना आवश्यक नहीं लेकिन महानगर की जनसंख्या 10 लाख से अधिक हो सकती है। 

        अगर सभी देशों की सामान्य मान्यता को देखा जाए तो जनसंख्या आकार के आधार पर नगरीय बस्तियाँ निम्न प्रकार की होती है-

1. छोटे आकार के सेवा केंद्र- वह छोटी से-छोटी बस्ती जो गैर प्राथमिक कार्यों से जुड़ा हो। ऐसे केंद्रों के लिए आवश्यक नहीं कि वह मान्यता प्राप्त नगरीय बस्ती हों।

2. शहर- जिसकी जनसंख्या एक लाख से कम हो।

3. नगर- जिसकी जनसंख्या एक लाख एवं उससे अधिक हो।

4. महानगर- भारत में कोई भी नगरीय बस्ती महानगर है जिसकी जनसंख्या 10 लाख या उससे अधिक हैं लेकिन USA तथा जापान में कोई भी नगरीय बस्ती तब तक महानगर नहीं हो सकता जब तक कि उसका सहयोगी नगर न हो। वहाँ वस्तुतः सबसे बड़ी नग के लिए 50,000 जनसंख्या जरूरी है।


Read More:-

तुर्की तथा सीरिया के भूकंप @ 2023

तुर्की तथा सीरिया के भूकंप @ 2023


तुर्की तथा सीरिया के भूकंप

तुर्की तथा सीरिया के भूकं

तुर्की तथा सीरिया के भूकं

भूकंप के दो बड़े झटकों ने तुर्की एवं सीरिया में तबाही मचा दी। इस भूकंप से जहाँ लगभग 34000 से अधिक लोग मौत की नींद सो गए वहीं हजारों लोग घायल हो गए और कई तो मलबे में दब गये हैं। पहला भूकंप सीरियाई सीमा के पास स्थित गजियांतेप के नजदीक 6 फरवरी 2023 को आया था। रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 7.8 थी जिसे लगभग सुदूर ब्रिटेन तक महसूस भी किया गया। 9 घंटे बाद तुर्की में पुन: दूसरे भूकंप आया जिसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 7.5 थी। पुन: तुर्की में भूकंप के 36 घंटो बाद में लगभग 100 से ज्यादा भूकंप आया। हालांकि, यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे के भूकंप वैज्ञानिक सुसान हफ का कहना है कि इसमें चौंकने वाली बात नहीं है, कई बार आफ्टरशॉक मूल भूकंप से भी ज्यादा तीव्रता के भूकम्प आते है। वैज्ञानिकों को ऐसा लगता है कि यह भूकंप ”इंटरसेक्टिंग फॉल्ट” की वजह से आया है। यह स्थिति तब होती है जब एक टेक्टॉनिक प्लेट दूसरी टेक्टॉनिक प्लेट के ऊपर आने की कोशिश करती है। तुर्की सरकार के अनुसार इस तबाही में लगभग 3,450 से अधिक छोटी बड़ी इमारतें जमींदोज हो गईं। इनमें से कई तो आधुनिक इमारतें थीं जिनका निर्माण ढाँचे के ”पैनकेक मॉडल” के आधार पर किया गया था लेकिन यह मॉडल भूकंप के आगे नाकाम साबित हुआ।

⇒ ऐसे तो तुर्की तथा सीरिया के भूकंप आम बात है क्योंकि ये दोनों देश भूकंपीय क्षेत्र रूस से सटे सक्रिय क्षेत्र में स्थित है, जहाँ तीन टेक्टोनिक प्लेट पृथ्वी की सतह के नीचे लगातार एक-दूसरे से टकरा रही हैं। इन क्षेत्रों में भूकंपों के ऐतिहासिक रिकॉर्ड कम-से-कम दो हजार साल पुराने हैं। पूर्व में सत्रहवीं सदी में आए महाविनाशकारी भूकंप ने तुर्की के एक दर्जन से अधिक शहरों को समतल कर दिया था। इन भूकंपों की मेजबानी करने वाला ईस्ट एनाटोलियन फॉल्ट जोन अरब और एनाटोलियन टेक्टोनिक प्लेटों के बीच की सीमा पर है। ये टेक्टोनिक प्लेट प्रत्येक वर्ष लगभग 6 से 10 मिमी० की गति से एक-दूसरे से आगे लगातार बढ़ते जा हैं। ये प्लेट अक्सर एक-दूसरे को धक्का देते हैं। कभी-कभी टेक्टोनिक प्लेट एक-दूसरे के ऊपर चढ़ जाते हैं, जिसका असर सतह पर देखने के लिए मिलता है। हाल में आया भूकंप इसी का एक नमूना है।

⇒ भूकंप आज से नहीं बल्कि हजारों साल से आते रहे हैं। तुर्की में भूकंप आम हैं क्योंकि यह देश भूकंप की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में आता है। ऐसे क्षेत्र में जहाँ पृथ्वी की सतह के नीचे तीन टेक्टॉनिक प्लेटें लगातार एक-दूसरे के साथ घर्षण करती रहती हैं। लगभग दो हजार सालों से तुर्की भूकंप का सामना करता रहा आ है। 17वीं शताब्दी में तुर्की के कई शहर भूकंप से तबाह हो गए थे।

⇒ भूकंप अक्सर ”ईस्ट अनातोलियन फॉल्ट” जोन में आते हैं जो अरेबियन और अनातोलियन टेक्टॉनिक प्लेटों के मध्य में सीमा पर स्थित है। ये दोनों प्लेटें हर साल 6 से 10 मिमी० की गति से एक-दूसरे के पास आ रही हैं। इस क्षेत्र में उत्पन्न तन्यता का दबाव रुक रुक कर आए भूकंप के चलते धीरे-धीरे कम हुआ। यह सिलसिला बरसों-बरस चलता रहा। इसे देखते हुए हाल ही में आये भूकंप आश्चर्यजनक नहीं हैं। यह भी जाहिर है कि यहाँ अवसंरचना भी जोखिम के साए में है।

⇒ बीते करीब 2000 साल में हमने ऐसी इमारतों के निर्माण के बारे में बहुत कुछ सीखा है जो भूगर्भीय हलचल होने पर सुरक्षित रहें। लेकिन यह भी सच है कि इस क्षेत्र में तथा दुनिया के दूसरे हिस्सों में इमारतों का निर्माण प्रभावित करने वाले कई कारक भी हैं।

तुर्की तथा सीरिया के भूकं

बिल्डिंगों का घटिया निर्माण होना सबसे बड़ा कारक

ऐसा प्रतीत होता है कि ध्वस्त हुई कई इमारतें भूकंप की दृष्टि से पर्याप्त सुदृढ़ीकरण के बिना कंक्रीट से बनी थीं। इस क्षेत्र में इमारतों के भूकंप संबंधी कोड संकेत देते हैं कि इन इमारतों को इतना मजबूत होना चाहिए था कि वे भूकंप के तेज झटके सह लेतीं। ये झटके आम तौर पर भूमि में सामान्य गुरूत्व के 30 से 40 फीसदी अधिक होते हैं। ऐसा लगता है कि 7.8 और 7.5 तीव्रता के भूकंप की वजह से कंपन की दर गुरूत्व के 20 से 50 फीसदी के बीच रही। ”डिजाइन कोड” से कम तीव्रता की थर्राहट भी ये इमारतें नहीं सह पाईं। तुर्की और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में सुरक्षित इमारतों का निर्माण सुनिश्चित करना और भूकंप के मद्देनजर समुचित ”इमारत कोड” का पालन करना एक बड़ी समस्या है।

तुर्की तथा सीरिया के भूकं

इससे पूर्व में भी आये तुर्की में महा विनाशकारी भूकंप
1999ई० में इज्मित के समीप आए भूकंप ने करीब 17,000 लोगों की जान ली थी और लगभग 20,000 इमारतों को मिट्टी में मिला दिया था। 2011 में आए भूकंप ने सैकड़ों लोगों को मौत की नींद सुला दिया था। तुर्की के तत्कालीन प्रधानमंत्री रजब तैयब एर्दोआन ने तब मृतकों की अधिक संख्या के लिए इमारतों के गुणवत्ताहीन निर्माण को दोषी ठहराया था। उन्होंने कहा था ”नगर निकायों, ठेकेदारों, निरीक्षकों को देखना चाहिए कि उनकी लापरवाही इस हत्या की वजह है।”

तुर्की तथा सीरिया के भूकं

इमारतों का पुन: र्निर्माण सबसे बड़ी समस्या
तुर्की के अधिकारी यह जानते हैं कि कई इमारतें भूकंप को सह नहीं पाएंगी लेकिन यह समस्या उनके लिए समाधान से परे है। कई इमारतें बन चुकी हैं और भूकंप रोधी उपाय या तो महंगे हो सकते हैं या अन्य सामाजिक आर्थिक चुनौतियों के चलते उन पर प्राथमिकता से विचार नहीं किया गया। बहरहाल, इन इमारतों का पुनर्निर्माण इन्हें अधिक सुरक्षित बनाने का एक अवसर दे सकता है। तुर्की ने इमारतों को भूकंप रोधी बनाने के लिए 2019 में नए नियमन में पैनकेक मॉडल तय किए। इन नियमन का स्वागत तो किया गया लेकिन यह देखा जाना अभी बाकी है कि क्या इनसे इमारतों की गुणवत्ता में वास्तव में सुधार हो पाएगा?

तुर्की तथा सीरिया के भूकं

भूकंप और पर्यावरण
इतने कम अंतराल में एशिया में आए कई बड़े भूकंप से हमें कुछ तो सीखना ही होगा। पहले नेपाल, अफगानिस्तान और अब तुर्की तथा सीरिया में आया भूकंप यह संकेत है कि हमें नए सिरे से पर्यावरण को समझना होगा। पर्यावरण और भूकंप दो अलग-अलग विषय हो सकते हैं पर भूकंप की वजह से होने वाले नुकसान से पता चलता है कि पर्यावरण के प्रति हमारा व्यवहार कैसा हो गया है। भूकंप से अवसंरचना को जिस तरह नुकसान पहुंचा है उससे पर्यावरण को दूरगामी प्रभाव पड़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। इन प्रभावों की वजह से भी कई जगहों पर इमारतों का पुनर्निर्माण असुरक्षित हो सकता है। इसे देखते हुए जरूरी है कि कहां क्या निर्माण किया जाना है इस संबंध में योजना बनाकर निर्णय किए जाएं ताकि भविष्य में जोखिम का खतरा कम हो सके। सुरक्षित पर्यावरण भूकंपीय आपदाओं को तो नहीं रोक सकता पर इसकी तीव्रता से होने वाले बड़े नुकसानों को अवश्य कम कर सकता है। अब भूकंप का केंद्र चाहे कहीं भी हो पर अगर हम अपने ठिकानों को पारिस्थतिकीय रूप से सुरक्षित और बेहतर रखेंगे तो निश्चित रूप से हम एक हद तक इन भीषण विनाशकारी से अपने को सुरक्षित रख सकते हैं।

⇒ समय बीतने के साथ तुर्की और सीरिया में तबाही का दायरा बढ़ता जा रहा है। हालांकि भारत समेत दुनिया के कई देशों की टीमें यहाँ राहत-बचाव कार्यों में लगातार जुटी हुई हैं। वसुधैव कुटुंबकम को मानने वाले भारत संकट की इस घड़ी में तुर्की और सीरिया को मदद मुहैया करा रहा है और इस अभियान का नाम ऑपरेशन दोस्त दिया गया है।


स्रोत:

1. https://navbharattimes.indiatimes.com/world/rest-of-europe/what-was-reason-for-earthquake-in-turkey-has-erdogan-building-pancake-model-failed-during-kahramanmaras-earthquake/articleshow/97700434.cms

2. https://www.amarujala.com/columns/opinion/adding-to-the-environment-from-the-earthquake-hindi

3. https://www.aajtak.in/world/story/earthquake-in-turkey-syria-photos-of-turkey-earthquake-ground-situation-in-turkey-ntc-1631688-2023-02-07

9.  नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण / Functional Classification of Cities

9.  नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण

(Functional Classification of Cities)


नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण

           

       वह अधिवासीय क्षेत्र जहाँ मानव सामूहिक रूप से अधिवास करता है उस स्थान को बस्ती से सम्बोधित करते हैं। अगर किसी भी बस्ती की 2/3 जनसंख्या द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों में संलग्न हो तो वैसे बस्ती को नगरीय बस्ती से सम्बोधित करते हैं। द्वितीयक एवं तृतीयक कार्य भी कई प्रकार होते हैं। उन कार्यों के आधार पर नगरों का वर्गीकरण करना एक जटिल कार्य है। किस नगर में किस कार्य की महता अधिक है? इसके लिए अनुभावाश्रित विधि या सांख्यिकी विधि का प्रयोग किया जाता है।

      अशोक मिश्रा ने कार्यों के आधार पर भारतीय नगरों को सात वर्गों में बाँटा है। जैसे:-

(1) उत्पादन नगर

(2) व्यापारिक नगर

(3) राजनीतिक या प्रशानिक नगर

(4) सांस्कृतिक नगर

(5) मनोरंजनात्मक नगर

(6) परिवहन नगर  

(7) मिश्रित नगर

(1) उत्पादन नगर⇒ वैसे नगर जहाँ पर मुख्य रूप से उत्पादन का कार्य किया जाता है। उत्पादन के ये कार्य भी दो प्रकार के हो सकते हैं:-

(A) प्राथमिक उत्पादन के कार्य

(B) औद्योगिक उत्पादन के कार्य

     (A) प्राथमिक उत्पादन का कार्य करने वाले नगरों को पुनः 6 भागों में बाँटा जा सकता है:-

(a) खनन पर आधारित नग⇒ जैसे- झरिया (कोयला), खेतरी (ताम्बा), जादूगोडा (यूरेनियम) उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

(b) खनिज तेल उत्पादन करने वाले नगर ⇒ जैसे- असम का डिग्बोई, नूनमाटी, नरकटियागंज

(c) लकड़ी का कारोबार करने वाले नगर⇒ जैसे- काठ गोदाम, सहारनपुर (UP)

(d) मत्स्यन कार्य करने वाले नगर⇒ जैसे- तमिलनाडु का धनुषकोटी और रामेश्वरम्

(e) पशुपालन आधारित नगर ⇒ सोनपुर

(f) कृषि आधारित नगर⇒ भारत के अधिकांश कस्बाई नगर।

     (B) औद्योगिक उत्पादन करने वाले नगरों में कच्चे माल लाकर तैयार किया जाता है उसके बाद तैयार माल को बेचने का कार्य किया जाता है। भिलाई, दुर्गापुर, कुल्टी, बर्नपुर, सतना (MP), जमशेदपुर।

        औद्योगिक उत्पादन हेतु विभिन्न प्रकार की ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। अतः ऊर्जा उत्पादन के लिए अलग-2 ऊर्जा स्रोत पर अलग-2 संयंत्रों का विकास किया गया है और संयंत्रों के आस-पास नगरीय विकास को देखा जा सकता है। जैसे:

(a) नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन करने वाले नगर⇒ रावतभाटा (राजस्थान), नरौरा, कलपक्कम

(b) तापीय ऊर्जा पर आधारित नगर⇒ तालचर, संथालडीह (W.B), चन्द्रपुरा (बोकारों के पास), रामगढ़

(c) जलविद्युत पर आधारित नगर⇒ तिलैया, कुमारडुब्बी, मैथन, शिवसमुद्रम, इडुक्की

(d) खनिज तेल शोधन शाला पर आधारित नगर⇒ बरौनी, मथुरा, हल्दिया, जामनगर नगर, कोयली

(2) व्यापारिक नगर

                ऐसे नगर जहाँ पर व्यापारिक कार्य प्रमुख रूप से किये जाते हैं। इस तरह के नगरों का विकास दो स्थानों पर हुआ है।

(i) दो विभिन्न प्रकार के भौगोलिक विशेषता रखने वाले मिलन बिन्दु पर। जैसे: पर्वत तथा मैदान के मिलन बिन्दु पर हरिद्वार, कोंटासाहिब (उत्तराखंड)।

नोट :-

DAV ⇒ धौलीगंगा + अलकनंदा = विष्णुप्रयाग 

NAN ⇒ नंदाकिनी + अलकनंदा = नंदप्रयाग 

PAK ⇒ पिंडार + अलकनंदा = कर्णप्रयाग 

MAR ⇒ मन्दाकिनी + अलकनंदा = रुद्रप्रयाग 

BAD ⇒ भागीरथी + अलकनंदा = देवप्रयाग 

नगरों का कार्यात्मक वर्ग

         भारत में सभी नदियों के संगम स्थल पर धार्मिक नगर बसा हुआ है। जैसे- इलाहाबाद, वाराणसी, राजरप्पा।

मरुस्थल एवं उपजाऊ मैदान की मिलन बिन्दु पर : हनुमानगढ़, गंगानगर, जयपुर।

(ii) दो विभिन्न प्रकार के परिवहन साधनों के मिलन स्थान पर। जैसे:

(a) सड़‌क और रेलवे के मिलन बिंदु पर जैसे- बाजाल्दा (कश्मीर में उधमपुर जिला में)

(b) रेलवे मार्गो के जंक्शन पर जैसे- पंडित दीनदयाल उपाध्याय, कटनी, इटारसी।

(c) सड़‌कों के मिलन बिन्दु पर जैसे- झाँसी।

(3) राजनीतिक या प्रशासनिक नगर 

       वैसे नगर जहाँ पर मुख रूप से राजनीतिक एवं प्रशासनिक कार्य किये जाते हैं। जैसे- भारत के सभी राजधानी नगर। राजनीतिक एवं प्रशासनिक नगर को भी दो भागों में बाँटा जा सकता है:-

(i) किला नगर- जयपुर, उदयपुर, चितौड़‌गढ़, दरभंगा, जोधपुर।

(b) विशुद्ध रूप ने प्रशासनिक कार्य करने वाले नगर- दिसपुर, गाँधी नगर।

(4) सांस्कृतिक नगर

           प्राचीन काल से ही भारत में मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर इत्यादि के इर्द-गिर्द नगरों का विकास होता रहा है सांस्कृतिक नगर को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है:-

(i) धार्मिक नगर⇒ गया, मथुरा, वाराणसी, अयोध्या, देवघर।

(i) शैक्षणिक नगर⇒ नालंदा, विक्रमशीला, पिलानी, नेतरहाट, पटना, कोटा।

(iii) धार्मिक सह शैक्षणिक नगर⇒ प्रयागराज, वाराणसी, पटना।

(5) मनोरंजनात्मक नगर

      वैसे  नगर जहाँ प्राथमिक रूप से मनोरंजन के कार्य सम्पादित किये जाते हैं जो कई प्रकार के होते हैं। जैसे-

(i) पर्वतीय पर्यटक नगर ⇒ श्रीनगर, शिमला, मासुरी, दार्जलिंग, माऊण्ट आबू।

(ii) लैगून नगर ⇒ कोबलम, कुमारगम (केरल)

(iii) पुलिन नगर⇒ चेन्नई, पुरी, मुम्बई का जुहू बिच इत्यादि।

(6) परिवहन नगर

       ऐसे नगरों में परिवहन का कार्य मुख्य रूप से किया जाता है। जैसे:- डायमण्ड हार्बर, काल्का, पोर्ट द्वार (उतराखण्ड)

(7) मिश्रित नगर

       ऐसे नगरों में कई कार्य संपादित किये जाते हैं। कार्यों के आधार पर उन नगरों का पहचान कठिन हैं। वैसे नगर को मिश्रित नगर कहते है। उदा०- भारत के सभी महानगर इसके सर्वोत्तम उदाहरण है।

निष्कर्ष

           उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय नगरों को कार्यों के आधार पर कई भागों में बाँटा जाता है लेकिन कोई भी नगर विशुद्ध रूप से एक ही कार्य को संपादित नहीं करते हैं। ऐसे में बहुचर विश्लेषण विधि के आधार प नगरों का संश्लेषित वर्गीकरण प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।


Read More:-

11. नगरीय प्रभाव क्षेत्र / Urban Influence Area

11. नगरीय प्रभाव क्षेत्र


नगरीय प्रभाव क्षेत्र⇒

           नगरीय प्रभाव क्षेत्र का सामान्य तात्पर्य उस भौगोलिक प्रदेश से है जो किसी नगर के सीमा के बाहर अवस्थित है किंतु आर्थिक और सामाजिक कार्यों के लिए वह नगर पर निर्भर करता है। नगर भी कई प्रकार के कार्यों के लिए अपने आसपास के क्षेत्रों पर निर्भर करता है। जैफरसन महोदय ने उचित ही लिखा है कि नगर का विकास अपने आप नहीं होता है उनके विकास का आधार आसपास का ग्रामीण क्षेत्र निर्धारित करता है।

      गेडिज तथा स्मैल्स जैसे ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं की अवधारणा है कि नगर के बसाव स्थल (site) का विकास उसकी बसाव स्थिति (situation) पर निर्भर करता है। बसाव स्थिति ही नगर का प्रभाव क्षेत्र है।

नगरीय प्रभाव क्षेत्र

            नगरीय प्रभाव क्षेत्र शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग नॉर्दन महोदय ने पिछली शताब्दी के पाँचवें दशक के मध्य में किया था लेकिन उसके पूर्व भी नगरीय प्रभाव क्षेत्र का अध्ययन होता रहा था, लेकिन “नगरीय प्रभाव क्षेत्र” के बदले अमलैंड शब्द का अधिक प्रयोग होता था, यह जर्मन शब्द है जहाँ (अम) का अर्थ होता है चारों तरफ और लैंड का अर्थ भूमि अर्थात् नगर के चारों तरफ की भूमि जो नगर का प्रभाव क्षेत्र है। अमलैंड शब्द का विकास सर्वप्रथम एलिक्स महोदय द्वारा 1914 ई० में किया गया। इसके बाद इस शब्द का प्रयोग स्टेनली, डोड्ज, व्हिटेलसी और हैरिस जैसे विद्वानों ने किया।

        ब्रिटिश भूगोलवेत्ता ग्रीन ने नगरीय पृष्ठ (Urban Hinteland) प्रदेश शब्द का प्रारंभ में प्रयोग किया, लेकिन बाद में उन्होंने नगर प्रभाव क्षेत्र का प्रयोग किया। ब्रिटिश भूगोलवेत्ता स्मैल्स तथा गिल्बर्ट ने नगर क्षेत्र (Urban field) शब्द का प्रयोग किया लेकिन नगरीय भूगोल में द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व अमलैंड और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नगर प्रभाव क्षेत्र को सर्वाधिक मान्यता मिली।

       1970 के बाद नगरीय भूगोलवेत्ताओं द्वारा और मुख्यतः विकासशील देश के भूगोलवेत्ताओं द्वारा नगर प्रदेश शब्द का प्रयोग प्रमुखतया से किया जाता है। यद्यपि ये तीनों शब्द अमलैंड, नगर प्रभाव क्षेत्र, नगर प्रदेश एक ही संदर्भ में उपयोग किए जाते है लेकिन कार्यिक दृष्टि से तथा विधितंत्र के दृष्टि से उनमें अंतर है। अमलैंड शब्द का विकास नगर के कार्यों के प्रभाव पर आधारित है।

       नगरीय प्रभाव क्षेत्र का विकास गुरुत्वाकर्षण मॉडल पर आधारित है। जबकि नगर प्रदेश, नियोजन को ध्यान में रखकर प्रभाव क्षेत्र के बदले विकसित किया गया है। नगर प्रदेश के अंतर्गत न सिर्फ प्रभाव क्षेत्र आते है वरन् नगर को भी सम्मिलित किया जाता है।

सीमांकन की विधि:

          नगरीय प्रभाव क्षेत्र के सीमांकन की तीन प्रमुख विधियाँ है-

1. अनुभवाश्रित विधि

2. सांख्यिकी विधि

3. सांख्यिकी सह अनुभवाश्रित विधि

                द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व अनुभवाश्रित विधि की प्रधानता थी। इसके अंतर्गत नगर के कार्यों को आधार मानकर प्रमुख क्षेत्र सीमांकित किया जाता था। इस संदर्भ में अमेरिकी भूगोलवेत्ता हैरिस का कार्य महत्वपूर्ण है। उन्होंने अमेरिकी नगर (Salt Lake city) के अमलैंड का सीमांकन 12 कार्यिक चरों की मदद से किया था।

ये निम्नलिखित थे-

1. थोक व्यापार

2. खुदरा व्यापार

3. रेडियो प्रसारण (Radio Broad casting

4. बस सेवा (Bus service)

5. मंदिर परिसर (Temple Areas)

6. चिकित्सा सेवा (Medical service)

7. धार्मिक सेवा (Religious service)

8. प्रशासनिक सेवा (Administrative service)

9. समाचार पत्र का वितरण (News paper circulation)

10. शैक्षणिक सेवा (Educational service)

11. फल एवं सब्जी की उपलब्धता (Fruits and vegitables availability to the market)

12. अन्न (Grains)

            इन चरों को आधार मान कर नगर के प्रभाव क्षेत्र की बाहरी सीमा निर्धारित की गई। कई भारतीय भूगोलवेत्ताओं ने भी अनुभवाश्रित विधि का प्रयोग करते हुए भारतीय नगरों का सीमांकन किया है, लेकिन इनका कार्य द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ही संभव हो सका।

        वस्तुतः भारत में नगरीय भूगोल की पढ़ाई द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद प्रारंभ हुई। भारतीय भूगोलवेत्ताओं में R.L. Singh (B.H.U.) प्रथम थे, जिन्होंने 1955 में बनारस नगर का अमलैंड पाँच चरों की मदद से निर्धारित किया था। ये चर निम्नलिखित थे-

1. सब्जी आपूर्ति (Vegitable supply)

2. दूध आपूर्ति (Milk supply)

3. खाद्यान्न आपूर्ति (Grain supply)

4. बस सेवा (Bus service)

5. समाचार पत्र का वितरण (News paper circulation)

                 पुनः डॉ० उजागीर सिंह ने 1961 में KAVAL (A-ALLAHABAD, K-KANPUR, V-VARANASI, A-AGRA, L-LUCKNOW) नगरों के अमलैंड का सीमांकन किया। इसके लिए उन्होंने निम्नलिखित सात चरों का प्रयोग किया।

1. सब्जी आपूर्ति

2. दूध आपूर्ति

3. कॉलेज / विश्वविद्यालय (College service)

4. खाद्यान्न आपूर्ति

5. खुदरा व्यापार

6. थोक व्यापार

7. प्रशासनिक प्रभाव

        आर. एल. सिंह  की तुलना में यह ज्यादा विश्वसनीय कार्य था। यद्यपि इस विधि को व्यापक मान्यता प्राप्त थी लेकिन इसके साथ दो प्रमुख समस्याएँ थी-

         प्रथमत: एक ही नगर के लिए अलग-अलग भूगोलवेताओं द्वारा अलग-अलग प्रभाव क्षेत्र निर्धारित किया जा रहा था। इससे इस प्रकार की अध्ययन की विश्वसनीयता में कमी आती थी।

        इसकी दूसरी समस्या यह थी कि कई नगर कुछ कार्यों को व्यापक स्तर पर करते थे जबकि सही अर्थों में इसका प्रभाव क्षेत्र उतना वृहद और व्यापक नहीं होता है। वस्तुतः डॉ० बी० एल० सिंह ने इसी आलोचना को ध्यान में रखकर बनारस के धार्मिक कार्यों को आधार नहीं माना था।

      अतः द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मात्रात्मक क्रांति के प्रभाव में नगरीय भूगोलवेताओं ने गुरुत्वाकर्षण मॉडल का प्रयोग करते हुए नगर के प्रभाव क्षेत्र को सीमांकित करने का कार्य प्रारंभ किया।

       इस विधि के अंतर्गत यह माना गया कि नगर की जनसंख्या द्रव्यमान अथवा पिंड के समान है। जो भी पिंड जितना ही बड़ा होगा उसका गुरुत्वाकर्षण उतना ही अधिक होगा। नॉर्दन ने इस अवधारणा को विकसित किया कि नगर की जनसंख्या गुरुत्वाकर्षण का कार्य करती है।

      दूसरे नगरों  के द्रव्यमान के संदर्भ में बड़े नगरीय प्रभा क्षेत्र सीमांकित किया जा सकता है। रेली महोदय ने संशोधित गुरुत्वाकर्षण सूत्र विकसित किया जिसे भूगोलवेताओं ने व्यापक मान्यता दी। यह मॉडल इस प्रकार है-

P = MA X MB/d2

P = Point of Break सीमा 

MA= द्रव्यमान >MB

MB= द्रव्यमान <MA

d = दो द्रव्यमानों के बीच की दुरी 

           इस विधि को अपनाने से सीमांकित किये गये नगरीय क्षेत्र की उपयोगिता में वृद्धि होती है। नगर और प्रादेशिक नियोजकों द्वारा इसका प्रयोग किया जाने लगा। प्रसिद्ध भूगोलवेता प्रकाश राव का अनुसरण करते हुए एल०एन०सेन ने कर्नाटक के रायचूर जिला के केन्द्रीय बस्तियों का प्रमुख क्षेत्र के सीमांकन हेतु दिए गये सांख्यिकी विधि का प्रयोग किया था। जिसका सूत्र इस प्रकार है- 

 R = √T x A/U

R = Radius

T = Population of Town 

U = Total population of of the region

A =  Area of the region

            इसी विधि का प्रयोग प्रो० एल० ए० भट्ट ने भी हरियाणा के करनाल जिला के प्रभाव क्षेत्र के सीमांकन के लिए किया। लेकिन विकासशील देशों में डिकिंसन, हैगिस, और हैगेट द्वारा प्रदेश शब्द को 1970 के बाद अधिक मान्यता मिली है। नगर प्रदेश का सीमांकन मात्रात्मक सह अनुभवाश्रित विधि पर आधारित है।

         दूसरे शब्दों में यह विधि प्रदेश के लोगों के व्यवहार  तथा परिवहन साधनों के विकास को ध्यान में रखते हुए सांख्यिकी विधि द्वारा विकसित सीमाओं में आवश्यक संशोधन करता है। भारत में राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश का सीमांकन इसी विधि पर आधारित है।

       प्रथमतः गुरुत्वाकर्षण मॉडल के आधार पर सीमा निर्धारण के बाद कई चरों की मदद से उसमें आवश्यक संशोधित किया गया। वस्तुतः इस कार्य के लिए 8 चरों का प्रयोग किया गया। ये निम्नलिखित थे-

1. 1961 की जनगणना के अनुसार न्यूनतम जनसंख्या घनत्व 250 व्यक्ति वर्ग किमी०।

2. 1951-61 के दशक के न्यूनतम जनसंख्या वृद्धि दर 20%

3. कम-से-कम 30% कार्यिक जनसंख्या गैर-कृषि कार्यों में लगी हो।

4. वे सभी गाँव जो दिल्ली को प्रतिदिन दूध की आपूर्ति करते हैं।

5. वे सभी गांव जो दिल्ली के लिए प्रतिदिन ताजे सब्जी आपूर्ति करते हैं (1967)।

6. वे सभी बस्तियाँ जहाँ से प्रतिदिन कम-से-कम 1000 व्यक्ति बस द्वारा दिल्ली नगर आते है (1966)।

7.  वे सभी बस्तियाँ जहाँ से कम-से-कम 250 व्यक्ति रेल द्वारा दिल्ली नगर आते है (1966)।

8. वे सभी बस्तियाँ जहाँ से प्रतिदिन कम-से-कम 75 कॉल दिल्ली नगर आता है (1966)।

           इन चरों की मदद से गुरूत्वाकर्षण विधि द्वारा अपनाए गए सीमाओं में संशोधन किए गए। सामान्यतः यह पाया गया कि रेलमार्ग और सड़कमार्ग के किनारे प्रभाव क्षेत्र अधिक दूरी तक अवस्थित है। कुल मिलाकर इसके प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत 30242 वर्ग किमी० क्षेत्र आए। दिल्ली नगर से औसत दूरी 115 किमी० हुई और इस प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत 1981 की जनगणना के अनुसार दिल्ली के अतिरिक्त अन्य नगरीय बस्तियाँ और करीब 2000 ग्रामीण बस्तियाँ आई।

        फरीदाबाद, गुड़गांव, रोहतक, महेन्द्रनगर, सोनीपत और बहादुरगढ़ जैसी हरियाणा की बस्तियाँ इसके प्रभाव क्षेत्र में आई। राजस्थान का अलवर और यू०पी० का गाजियाबाद, बुंदेलखंड, मेरठ, हापुड़, मोदीनगर और दादर जैसी नगरीय बस्तियाँ इसके प्रभाव  में आये।

          दिल्ली नगर प्रदेश के सीमांकन से यह एक नियोजन प्रदेश के रूप में मान्यता पा चुका है। भारत के सभी महानगरों के लिए इस प्रकार का नगर प्रदेश सीमांकन और नियोजन की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है। विकासशील देशों के अधिकतर महानगरों के लिए भी यह प्रक्रिया अपनाई गई है। वस्तुतः वर्तमान समय में विकसित देशों में नगर प्रभाव क्षेत्र और विकासशील देशों में नगर प्रदेश शब्द को अधिक मान्यता प्राप्त है।

विशेषताएँ:

      भौगोलिक विशेषताओं की दृष्टि से नगर प्रभाव क्षेत्र को दो भागों में बाँटते हैं-

1. आंतरिक प्रभाव क्षेत्र (प्राथमिक अमलैंड)

2. बाह्य प्रभाव क्षेत्र (द्वितीयक अमलैंड)

1. आंतरिक प्रभाव क्षेत्र:-

        आंतरिक प्रभाव क्षेत्र को प्राथमिक अमलैंड और बाह्य प्रभाव क्षेत्र को द्वितीयक अमलैंड कहा गया है। आंतरिक प्रभाव क्षेत्र वह है जो मुख्य नगर से सतत् संबंध रखता है। यह नगर के तत्काल बाहर ग्रामीण क्षेत्र में नगरीय, उपनगरीय अथवा लगभग नगरीय भूदृश्य उत्पन्न करता है। अधिकतर भूगोलवेत्ताओं ने इसी प्रदेश को ग्रामीण-नगरीय उपांत कहा है।

      नियमतः यह ग्रामीण क्षेत्र है लेकिन व्यवहारिक तौर पर यह नगरीय क्षेत्र होता है। सामान्यतः इसके आकार तारे के समान होते हैं। नगर के बाहर निकलती हुई सड़को के दोनों तरफ निर्मित क्षेत्र ही ग्रामीण-नगरीय उपांत का निर्माण करते है।

       ग्रामीण-नगरीय उपांत का विकास मुख्यतः नगर में बढ़ते जनसंख्या दबाव का परिणाम होता है। जब नगरीय पारिस्थैतिकी असंतुलित होने लगती है तो नगर की सीमा के बाहर निर्मित क्षेत्र विकसित होने लगते है। इसमें मुख्यतः दो प्रकार के निर्मित क्षेत्र होते है-

1. उच्च आय वर्ग का क्षेत्र- उच्च आय वर्ग के लोग नगर के बहर आकर बस जाते है।  

2. उन कार्यों का विकास होता है जिसको अधिक भूमि चाहिए नगर में मूल्य अधिक होने के कारण वह कार्य नहीं होता है जैसे विश्वविद्यालय का निर्माण, प्रशानिक कार्य, औधोगिक संकुल का विकास इत्यादि। 

लेकिन विकासशील देशों में और मुख्यतः भारत में ग्रामीण-नगरीय उपांत के अंतर्गत दो अन्य निर्मित क्षेत्र होते है-

(i) उपस्तरीय अधिवासीय मकान- कम आय के वर्ग के लोग भी नगर के बाहरी क्षेत्र में भूमि खरीद कर किसी प्रकार मकान बनाते है।इसमें नगरीय विकास के नियमों के पालन नहीं होता है। अत: यह प्रारम्भ से ही देखने से मलिन बस्ती जैसा लगता है।  

(ii) नवीन निर्मित क्षेत्रों के मध्य पुराने गावों का होना कम आय वर्ग के लोगों का दबाव, नगरीय निर्मित क्षेत्र के अंतर्गत आने पर तेजी से बढ़ने लगता है। इसका परिणाम यह होता है कि उसके ग्रामीण पारिस्थैतिकी भी समाप्त हो जाते हैं और वे नगर बनने के पूर्व ही मलिन बस्ती बन जाते हैं।

         ग्रामीण-नगरीय उपांत की विशेषताओं का अध्ययन कई भूगोलवेत्ताओं ने विशेष रूप से किया है और पश्चिमी देशों के संदर्भ में R.F. Pahl का कार्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उन्होंने ग्रामीण-नगरीय उपांत की चार प्रमुख विशेषताएँ बताई है-

1. विलगाव

2. चयनित जनसंख्या का आगमन और

3. अभिगमन लोग प्रतिदिन मुख्य नगर जाते है और शाम को लौट आते है। परिणाम यह होता है कि दिन के समय जनसंख्या घनत्व कम होता है तथा रात्रि में जनसंख्या घनत्व अधिक हो जाता है।

4. भूमि का मिश्रित उपयोग- H.M. Mayor ने अमेरिकी नगरों के संबंध में बताया है कि ग्रामीण नगरीय उपांत एक संक्रमण क्षेत्र होता है जहां नगरीय भू-उपयोग में लगातार वृद्धि होती रहती है और उसी अनुपात में ग्रामीण भू-उपयोग में कमी आती है। उन्होंने यह भी लगा कि यहाँ भूमि के मूल्य में लगातार वृद्धि होती है।

       J.N.U. के प्रो० सुदेश नागिया ने 1976 में दिल्ली महानगर के ग्रामीण-नगरीय उपांत क्षेत्र का अध्ययन करते हुए इनकी निम्नलिखित छ: विशेषताएँ बताई है-

1. मलिन बस्तियाँ (Slums)

2. मिश्रित भू-उपयोग

3. कृषि भूमि में लगातार कमी आती है

4. नगरीय सुविधाओं का अभाव

5. बिखरे हुए निर्मित क्षेत्र

6. सांस्कृतिक मिश्रण का क्षेत्र (ग्रामीण-नगरीय संस्कृति के मिश्रण का क्षेत्र)

         ग्रामीण-नगरीय उपांत की ये विशेषताएँ विकासशील देशों के प्रायः सभी महानगरों में पाई जाती है।

निर्मित क्षेत्र और कार्यिक दृष्टि से ये नगर के अंग होते है प्रारम्भ में इसे नगर नियोजन के अंतर्गत सम्मिलित नहीं किया गया था लेकिन वर्तमान समय में नगर प्रदेश नियोजन  के अंतर्गगत इन प्रदेशों के भी नियोजित विकास को प्राथमिकता दी गई है। 

2. बाह्य प्रभाव क्षेत्र-

        बाह्य प्रभाव क्षेत्र मूलत: ग्रामीण क्षेत्र होता है। यह वही क्षेत्र होता है जहाँ रहने वाले लोग कुछ ही कार्यों के लिए केंद्रीय नगर पर निर्भर करता है। ऐसे कार्यों में प्रशासन, उच्च शिक्षा, थोक व्यापार, उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा, समाचार पत्र, इत्यादि प्रमुख है।

          अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इन क्षेत्रों के लोग स्थानीय बाज़ार में जाते है। वहाँ पदानुक्रमिक केन्द्रीय बस्तियों के अपने प्रभाव क्षेत्र होते है। लेकिन वे छोटे नगरीय बस्ती भी मुख्य नगरीय बस्ती पर अपने कार्यों के लिए निर्भर करता है। जैसे गौण नगरीय बस्तियाँ खुदरा व्यापार का कार्य करती है। उनका थोक व्यापार मुख्य केन्द्रीय बस्ती पर निर्भर करता है।

         वर्तमान समय में नगर प्रदेश नियोजन नीति के अंतर्गत इन प्रदेशों में भी  नगरीय सुविधाओं को विकसित कर ग्रामीण आवास की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है। विकासशील देशों में बाह्य नगर प्रभाव क्षेत्र ग्रामीण-नगरीय स्थानांतरण का कारण होता है।

     दिल्ली नगर पर बाह्य नगर प्रभाव क्षेत्र की जनसंख्या का सर्वाधिक दबाव था लेकिन वर्तमान समय में राजधानी नियोजन प्रदेश के अंतर्गत बाह्य क्षेत्रों में द्वितीयक और तृतीयक कार्यों का विकास किया जा रहा है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ग्रामीण-नगरीय स्थानांतरण प्रवृत्ति में कमी आई है। वास्तविकता यह है कि पिछले वर्षों के अंतर्गत दिल्ली महानगर में जनसंख्या का स्थानांतरण नगर प्रभाव क्षेत्र से कहीं अधिक अंतर प्रादेशिक प्रक्रियाओं से हुआ है।

निष्कर्ष:-

       ऊपर के तथ्यों और विश्लेषणों से स्पष्ट है कि अगर प्रभाव क्षेत्र का अध्ययन न सिर्फ भौगोलिक परिपेक्ष्य में आवश्यक है वरन् यह प्रादेशिक नियोजन के संदर्भ में भी आवश्यक है। अधिकतर विकासशील देशों में नगर आधारित प्रादेशिक नियोजन की नीति अपनाई गई है और उस कार्य में नगर प्रभाव क्षेत्र / नग प्रदेश का सीमांकन अनिवार्य है।


Read More:-

नई शिक्षा नीति में शिक्षा का विजन @ 2020

नई शिक्षा नीति में शिक्षा का विजन @ 2020



नई शिक्षा नीति में शिक्षा का विजन @ 2020⇒

परिचय

         नई शिक्षा नीति 2020 के तहत शिक्षा दृष्टि और प्रतिमान पर केंद्रित है जो भारत की संपूर्ण शिक्षा प्रणाली के पुनर्निर्माण, पुनर्गठन और पुनर्रचना का वादा करता है। इसका उद्देश्य प्राचीन शिक्षा प्रणाली और आधुनिक शिक्षा प्रणाली के जुड़वां मैट्रिक्स के बीच की खाई को पाटना है।

      यह एक ओर अपनी प्राचीन परंपरा में गहराई से निहित है और दूसरी ओर युवा पीढ़ी को एकीकृत शिक्षा की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, जहां मन, शरीर और आत्मा सभी एकजुट हो जाते हैं ताकि 21वीं सदी की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया जा सके। 

       “शिक्षा पूर्ण होने के लिए मानवीय होनी चाहिए, इसमें न केवल बुद्धि का प्रशिक्षण बल्कि हृदय का शोधन और आत्मा का अनुशासन शामिल होना चाहिए। किसी भी शिक्षा को पूर्ण नहीं माना जा सकता है यदि वह दिल और आत्मा की उपेक्षा करती है।”डॉ० एस० राधाकृष्णन

        एक देश की शिक्षा एक व्यक्ति और एक राष्ट्र के मानसिक विकास में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शिक्षा जड़ से अलग नहीं होती है बल्कि मूल पर फिर से विचार करने और राष्ट्र के भविष्य को फिर से बनाने के लिए आगे बढ़ने के लक्ष्यों का प्रसार करती है। शिक्षा का पहिया भौतिकवाद की परिधि पर नहीं बल्कि उससे परे कुछ घूमता है।

      शिक्षा का उद्देश्य सपना पैदा करना और उसे हासिल करना है और इसके बिना राष्ट्र निर्माण की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसलिए, शिक्षा समाज के हर वर्ग के लिए पूरा किया जाने वाला प्राथमिक लक्ष्य बन गया है और इस संबंध में, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय शिक्षा प्रणाली की जड़ पर फिर से विचार करके राष्ट्र की भावी पीढ़ी को सशक्त बनाने के लिए रोड मैप प्रदान करती है।

         प्राचीन भारतीय संस्कृति अपनी विरासत में बहुत समृद्ध है चाहे हम बौद्धिकता, आध्यात्मिकता, प्रबंधन, राजनीति, संस्कृति, परंपरा या शिक्षा पर ध्यान दें। भौतिकवादी जीवन के झोंके में हमारी पीढ़ी ऐसे जालों में उलझी हुई है कि उनकी आंखों के सामने धुंध के सिवा कुछ नहीं है। अब समय आ गया है कि हम अपनी दृष्टि को सत्य करें और पुराने को बदलें।

      अल्फ्रेड लॉर्ड टेनीसन के अनुसार, “पुराना आदेश नए को स्थान देता है, और ईश्वर कई तरह से खुद को पूरा करता है, कहीं ऐसा न हो कि एक अच्छी प्रथा दुनिया को दूषित कर दे।” इस संबंध में, नई शिक्षा नीति @ 2020 का रास्ता बनाती है। उपनिवेशवादियों की सदियों पुरानी थोपी गई शिक्षा नीति से प्रचलित शिक्षा व्यवस्था को मुक्त करना।

        भारतीय शिक्षा प्रणाली प्राचीन काल से चली आ रही है जब छोटे बच्चों को गुरुकुलों के प्राकृतिक परिवेश में पढ़ाया जाता था। छात्रों की आवश्यकता, क्षमता और रुचि के अनुसार गुरु उन्हें ज्ञान प्रदान करते थे और उन्हें संस्कृत से लेकर पवित्र शास्त्रों, साहित्य से लेकर विज्ञान और गणित से लेकर तत्वमीमांसा तक विभिन्न विषयों में प्रशिक्षित करते थे। यह माना जाता था कि शिक्षा ही एकमात्र तरीका है जो मनुष्य को ब्रह्मांड की अन्य प्रजातियों से अलग करती है। यह वह साधन था जिसके द्वारा गुरु अपने शिष्यों में वैसुधैव कुटुम्बकम (पूरी दुनिया एक परिवार है) के पवित्र विचार की कल्पना करने के लिए ज्ञान को सशक्त करते हैं।

      प्रमुख जोर इस बात पर दिया गया कि व्यक्ति का विकास ही राष्ट्र का विकास है। इसका मतलब है कि वृद्धि के बीज एक व्यक्ति के चरित्र में निहित हैं, जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था, “सभी ज्ञान का अंत चरित्र निर्माण होना चाहिए।”

        इस प्रकार हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक और मानसिक विस्तार पर ध्यान केंद्रित करती है। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को बौद्धिकता और आध्यात्मिकता के रत्नों से अलंकृत करना और चरित्र को निर्भीक और रचनात्मक ऊर्जा के स्पंदन से परिपूर्ण बनाना था। जैसे-जैसे गुरु-शिष्य प्रणाली पर समय का पहिया घूमता गया, वैसे-वैसे नालंदा, तक्षशिला, मनसा, उज्जैन और विक्रमशिला आदि जैसे विश्वविद्यालयों का उदय हुआ और उस समय की भारतीय शिक्षा प्रणाली को विश्वविख्यात किया।

       एक समय भारत विदेशी राष्ट्रीयताओं के छात्रों के लिए भी ज्ञान और ज्ञान का पालना बन गया था। यद्यपि यह सदाबहार ज्ञान वृक्ष समय के साथ-साथ आक्रमणकारियों और उपनिवेशवादियों द्वारा समान रूप से बिगाड़ा गया और नष्ट हो गया। हालाँकि, वे गुरुकुलों और आश्रमों के माध्यम से ज्ञान प्रदान करने की प्राचीन भारतीय प्रणाली की भावना को उखाड़ने में विफल रहे। नई शिक्षा नीति में शिक्षाआधुनिक शिक्षा प्रणाली

      मैकाले के एजेंडा(1835) का नाम लॉर्ड थॉमस बबिंगटन मैकाले के भारत में अंग्रेजी भाषा को बढ़ावा देने के प्रसिद्ध प्रस्ताव के नाम पर रखा गया है। उन्होंने प्रस्तावित किया कि भारत में औपनिवेशिक स्कूलों में अरबी, संस्कृत और फारसी के बजाय अंग्रेजी पढ़ाई जानी चाहिए।

     लॉर्ड मैकाले को भारत में ब्रिटिश या आधुनिक शिक्षा प्रणाली की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है, जिसने शिक्षा के पूर्ववर्ती गुरुकुल और आश्रम प्रणाली में जबरदस्त बदलाव लाए। इन एजेंडों का पहला उद्देश्य ब्रिटिश शासकों और उनके द्वारा शासित लाखों भारतीयों के बीच द्विभाषियों का एक वर्ग बनाना था।  दूसरा उद्देश्य व्यक्तियों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना था जो खून और रंग में भारतीय लेकिन मत, नैतिकता और बुद्धि में ब्रिटिश हो।

        भारत में आधुनिक स्कूली शिक्षा प्रणाली मूल रूप से इसी प्रस्ताव द्वारा लाई गई थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम (1835) को लागू किया जो लॉर्ड मैकाले द्वारा प्रस्तावित एजेंडों पर आधारित था। उत्तर प्रदेश हाई स्कूल और इंटरमीडिएट शिक्षा बोर्ड 1921 में भारत में स्थापित होने वाला पहला बोर्ड बन गया। हाई स्कूल और इंटरमीडिएट शिक्षा बोर्ड, राजपुताना 1929 में स्थापित होने वाली कतार में दूसरा बन गया।

         स्वतंत्रता के बाद 1952 में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की स्थापना की गई थी। यह भारत का पहला राष्ट्रीय स्तर का शिक्षा बोर्ड था।

       इसी तरह उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए 1818 में सेरामपुर कॉलेज की स्थापना की गई थी और भी कई लोग कतार में आए। जैसे- 1847 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की, 1857 में मुंबई विश्वविद्यालय, 1857 में मद्रास विश्वविद्यालय, 1857 में कलकत्ता विश्वविद्यालय, 1875 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, 1887 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय, 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, 1921 में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, 1922 में दिल्ली विश्वविद्यालय और कई अन्य लोगों को विभिन्न धाराओं में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए युवा भारतीयों को प्रोत्साहित करने और प्रेरित करने के लिए विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई थी।

भारत में वर्तमान शिक्षा प्रणाली

       भारत सरकार 1947 से भारत में साक्षरता दर में सुधार पर हमेशा ध्यान केंद्रित कर रही है। भारतीय संविधान के विभिन्न लेखों के तहत 5 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया है। शिक्षा प्रदान करने के विभिन्न तरीके अब उपलब्ध हैं, जैसे कि सरकारी स्कूल, सरकार द्वारा जोड़े गए निजी स्कूल, निजी स्कूल, अंतर्राष्ट्रीय स्कूल, आदि।

     शैक्षिक सांख्यिकीय वार्षिकी 2019 के अनुसार, लगभग 15,22,346 मान्यता प्राप्त प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च विद्यालय हैं। भारत में लगभग 1000 विश्वविद्यालय और 52,627 कॉलेज भी हैं जो भारत में उच्च शिक्षा की मांग को पूरा करते हैं। हालाँकि, सभी निजी स्कूल और कॉलेज भारत सरकार द्वारा इस आधार पर शासित होते हैं कि वे क्या पढ़ा सकते हैं और अन्य पहलुओं के साथ-साथ वे किस रूप में काम कर सकते हैं।

नई शिक्षा नीति में शिक्षा के विभिन्न स्तर और संरचनाएँ

       वर्तमान में, भारत में वर्तमान शिक्षा प्रणाली के केंद्रीय बोर्ड और अधिकांश राज्य बोर्ड विभिन्न स्कूल स्तरों पर शिक्षा के 10+2 ढांचे का समान रूप से पालन करते हैं। इसके बाद विश्वविद्यालय स्तर पर स्नातक और आगे की उच्च शिक्षा होती है। शिक्षा को निम्न स्तरों में विभाजित किया गया है:-

क्रम संख्या  शिक्षा के विभिन्न स्तरें सम्बंधित वर्ग 
1.
पूर्व प्राथमिक शिक्षा
1. प्री नर्सरी

2. नर्सरी

3. एलकेजी

4. यूकेजी

2.
प्राथमिक शिक्षा
⇒प्राथमिक शिक्षा के 
दो भाग हैं:-
1.  निम्न प्राथमिक (कक्षा I से IV तक) 

2. उच्च प्राथमिक (कक्षा V से VIII तक)

3.
माध्यमिक शिक्षा
1. कक्षा IX से X तक
4.
उच्च माध्यमिक शिक्षा
1. कक्षा XI से XII तक
5.
उच्च शिक्षा
1. स्नातक या स्नातक स्तर  के तहत 

2. पोस्ट ग्रेजुएट या मास्टर स्तर

3. डॉक्टरेट या पीएचडी स्तर

4. व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण

5. डिप्लोमा कार्यक्रम

राष्ट्रीय शिक्षा नीति और इसका विकास

      1947 के बाद से भारत सरकार साक्षरता दर बढ़ाने और अपने नागरिकों को शिक्षा के साथ सशक्त बनाने के लिए विभिन्न पहलों के साथ आगे आई। इस संबंध में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, उच्च शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय और भारत सरकार द्वारा यूजीसी अधिनियम 1956 के अनुसार एक सांविधिक निकाय स्थापित किया गया था, जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षा के मानकों का समन्वय, निर्धारण और रख रखाव करना था।

      1961 में भारत सरकार ने विभिन्न स्कूल स्तरों पर शिक्षा नीतियों को बनाने और लागू करने के लिए राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) का गठन किया। राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (1964-1966), जिसे लोकप्रिय रूप से कोठारी आयोग के नाम से जाना जाता है। यह भारत में शैक्षिक क्षेत्र के सभी पहलुओं की जांच करने, शिक्षा के एक सामान्य पैटर्न को विकसित करने और दिशा-निर्देशों की सलाह देने के लिए भारत सरकार द्वारा स्थापित एक तदर्थ आयोग था।

       भारत में शिक्षा के विकास के लिए 1968 में सरकार द्वारा पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीई) की घोषणा की गई थी। 1986 में दूसरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की गई थी जिसे 1992 में भारत सरकार द्वारा संशोधित किया गया था। 29 जुलाई 2020 को भारत सरकार ने तीसरी मंजूरी दिया जो कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) ने पिछले  राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NPE 1986) की जगह ली।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020

       29 जुलाई, 2020 को माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति 2020 की घोषणा की जिसमें 2040 तक भारतीय शिक्षा प्रणाली को बदलने की दृष्टि है। 34 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद एनईपी 2020 वृद्धिशील सुधार के बजाय शैक्षिक क्षेत्र में एक व्यवस्थित सुधार का वादा और आशा लेकर आया है।

      माननीय केंद्रीय मंत्री श्री जितेंद्र सिंह के अनुसार, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 का दोहरा उद्देश्य पिछली विसंगतियों को ठीक करना और वर्तमान वैश्विक रुझानों को ध्यान में रखते हुए समकालीन प्रावधानों को पेश करना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मुख्य फोकस 2020 शिक्षा के निम्नलिखित स्तंभों पर है:-

1. सामर्थ्य

2. अभिगम्यता

3. गुणवत्ता

4. इक्विटी

5. जवाबदेही – निरंतर सीखने को सुनिश्चित करने के लिए

     एनईपी 2020 भारत की 21वीं सदी की युवा पीढ़ी की चुनौतियों और जरूरतों से निपटने के लिए सबसे उपयुक्त समाधान है। एनईपी 2020 वर्तमान शैक्षिक ढांचे में पूर्ण सुधार और एक नई शिक्षा प्रणाली बनाने का प्रस्ताव करता है जो 21वीं सदी की शिक्षा के आकांक्षी उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद कर सकता है और भारतीय संस्कृति, परंपरा, शिक्षा और विरासत पर यूरोपीय प्रभाव का उत्तर प्रदान कर सकता है।

     पहले चरण में, NEP 2020 ने शिक्षा मंत्रालय के रूप में मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदल दिया ताकि शिक्षा और सीखने पर मुख्य ध्यान बहाल किया जा सके। यदि इसे लागू किया जाएगा और योजना के अनुसार पालन किया जाएगा तो नए मानदंड न केवल नियामक बाधाओं को कम करेंगे बल्कि शैक्षणिक संस्थानों को और अधिक स्वायत्तता को बढ़ावा देंगे और छात्रों को लाभान्वित करेंगे।

एनईपी 2020 के मुख्य उद्देश्य

      राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली के समान भारत-केंद्रित/पूर्वी शिक्षा प्रणाली को वापस लाने की कल्पना करती है जो सभी को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करती है। इसका उद्देश्य भारत की सतत शिक्षा को दुनिया में एक समान, जीवंत और सर्व-समावेशी ज्ञान प्रणाली में बदलना है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है।

      सरकार आजादी के बाद से जाति, पंथ, नस्ल, लिंग, रंग और समुदाय के बावजूद सभी के लिए शिक्षा सुनिश्चित करती है। इस संबंध में एनईपी 2020 आधुनिक और प्राचीन ज्ञान प्रणालियों के बीच की खाई को पाटने के लिए भारतीय शिक्षा प्रणाली में कई महत्वपूर्ण बदलावों का मार्ग प्रशस्त करता है। NEP 2020 के परिवर्तन, सुधार और उद्देश्य इस प्रकार हैं:

प्रत्येक छात्र की जरूरतों और रुचि को पहचानें और मजबूत करें,

समग्र विकास,

मूलभूत साक्षरता और अंकज्ञान,

शिक्षार्थियों के लिए लचीलापन,

हानिकारक पदानुक्रम को हटा दें,

बहु अनुशासन वाली पहुँच,

बहुभाषावाद को बढ़ावा देना,

जीवन कौशल को बढ़ावा देना,

नियमित रचनात्मक आकलन,

पूर्ण इक्विटी और समावेशन,

सीखने की प्रक्रिया के केंद्र के रूप में शिक्षक और संकाय,

अखंडता, पारदर्शिता और संसाधन दक्षता को बढ़ावा देना,

स्वायत्तता, सुशासन और अधिकारिता के माध्यम से नवाचार और लिंक से हटकर विचारों को प्रोत्साहित करना।

एनईपी 2020 के तहत स्कूलों में प्रमुख सुधार

वर्तमान ’10+2′ संरचना को ‘5+3+3+4’ के एक नए शैक्षणिक और पाठ्यचर्या संरचना द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना है।

 हर साल वार्षिक परीक्षाओं का कोई प्रावधान नहीं, छात्र अब केवल कक्षा 3, 5 और 8 में परीक्षा देंगे

कक्षा 10 और 12 की बोर्ड परीक्षाएं आयोजित की जाएंगी लेकिन छात्रों को साल में दो बार परीक्षा देने की अनुमति देकर परीक्षा को आसान बनाया जाएगा। परीक्षा में दो भाग होंगे, वस्तुनिष्ठ और वर्णनात्मक

सभी सार्वजनिक और निजी स्कूलों में सीखने के सार्वभौमिक मानक और नियम।

कक्षा 6 से व्यावसायिक शिक्षा और कोडिंग का परिचय।

शिक्षा का माध्यम कम से कम कक्षा 5 तक और अधिमानतः कक्षा 8 तक मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा होनी चाहिए।

केवल अंकों और ग्रेड के बजाय छात्रों के कौशल और क्षमताओं पर एक व्यापक रिपोर्ट के आधार पर एक 360-डिग्री समग्र प्रगति कार्ड।

पाठ्यक्रम की मूल अवधारणाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है।

अर्ली चाइल्डहुड केयर एजुकेशन (ईसीसीई) से माध्यमिक स्तर तक शिक्षा का सार्वभौमीकरण।

2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) प्राप्त करना।

प्रारंभिक बचपन के शिक्षकों (ईसीई), स्कूलों, शिक्षकों और वयस्क छात्रों के लिए नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा प्रस्तावित है।

स्कूल न जाने वाले बच्चों’ को शिक्षा की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए ओपन स्कूलिंग सिस्टम।

छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार और देखभाल के लिए परामर्शदाताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की तैनाती।

मध्याह्न भोजन योजना में नाश्ता भी शामिल किया जाएगा।

एनईपी 2020 के तहत उच्च शिक्षा में प्रमुख सुधार

विभिन्न प्रकार के प्रमाणपत्रों और डिग्री के साथ 4 साल की पाठ्यक्रम अवधि के दौरान कई निकास विकल्पों के साथ स्नातक स्तर पर समग्र और बहु-विषयक शिक्षा।

एम.फिल. (मास्टर ऑफ फिलॉसफी) पाठ्यक्रम बंद किए जाएं।

पीजी प्रोग्राम 1 या 2 साल के लिए हो सकते हैं।

जेईई मेन और एनईईटी के अलावा देश भर के विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए प्रवेश परीक्षा राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी द्वारा आयोजित की जाएगी।

क्रेडिट हस्तांतरण की सुविधा के लिए अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट की स्थापना की जाएगी।

वैश्विक मानकों के सर्वश्रेष्ठ बहु-विषयक शिक्षा के मॉडल प्रदान करने के लिए, बहु-विषयक शिक्षा और अनुसंधान विश्वविद्यालयों (एमईआरयू) की स्थापना की जाएगी।

एक मजबूत अनुसंधान संस्कृति को बढ़ावा देने और उच्च शिक्षा में अनुसंधान क्षमता के निर्माण के लिए नेशनल रिसर्च फाउंडेशन नामक एक शीर्ष निकाय की स्थापना की जाएगी।

निजी और सार्वजनिक संस्थानों के लिए नियमों, मान्यता और शैक्षणिक मानकों का एक ही सेट तैयार करके उच्च शिक्षा को विनियमित करने के लिए भारतीय उच्च शिक्षा परिषद (एचईसीआई) की स्थापना की जाएगी। एचईसीआई के चार स्वतंत्र कार्यक्षेत्र होंगे, अर्थात्-

1. चिकित्सा और कानूनी शिक्षा को छोड़कर, उच्च शिक्षा के नियमन के लिए राष्ट्रीय उच्च शिक्षा नियामक परिषद (एनएचईआरसी)।

2. मानक तय करने के लिए सामान्य शिक्षा परिषद (जीईसी)।

3. कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के वित्त पोषण और वित्तपोषण के लिए उच्च शिक्षा अनुदान परिषद (एचईजीसी)।

4. मान्यता के लिए राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद (एनएसी)।

एचईसीआई मौजूदा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की जगह लेगा।

15 वर्षों की अवधि में विश्वविद्यालय स्तर पर ‘संबद्धता प्रणाली’ को समाप्त करना।

2035 तक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) को मौजूदा 26.3% से बढ़ाकर 50% करना।

2040 तक उच्च शिक्षा में 3.5 करोड़ से अधिक सीटें जोड़ना।

उच्च शिक्षा संस्थानों को पूर्ण रूप से ऑनलाइन पाठ्यक्रम चलाने की अनुमति के साथ ऑनलाइन शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है और ऑनलाइन सामग्री की सीमा को बढ़ाकर 40% कर दिया गया है।

एनईपी 2020 के तहत शिक्षक शिक्षा में प्रमुख सुधार

शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता 4 वर्षीय एकीकृत बी.एड. होगी, 2023 तक डिग्री।

शिक्षक भर्ती प्रक्रिया को मजबूत करने और पारदर्शिता बनाए रखने पर अधिक जोर।

एनसीटीई द्वारा शिक्षक शिक्षा के लिए एक नई और व्यापक राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएफटीई) 2021 तैयार की जाएगी।

एनसीटीई शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक (एनपीएसटी) 2022 तैयार करेगा।

अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य

राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की स्थापना।

भारत के वंचित क्षेत्रों में कम प्रतिनिधित्व वाले समूहों के बीच शिक्षा में सुधार के लिए विशेष शिक्षा क्षेत्र (एसईजेड) की स्थापना।

महिलाओं और ट्रांसजेंडर बच्चों के लिए समान शिक्षा में सुधार और प्रदान करने के लिए लिंग समावेशन कोष।

छात्रों और शिक्षकों के बीच समान रूप से शिक्षा में प्रौद्योगिकी के उपयोग पर विचारों के मुक्त आदान-प्रदान की सुविधा के लिए राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच (एनईटीएफ) की स्थापना।

राष्ट्रीय मूल्यांकन केंद्र- ‘पारख‘ छात्र के समग्र विकास का आकलन करेगा।

राष्ट्रीय संग्रह में उपलब्ध प्राचीन पांडुलिपियों की समझ को बढ़ावा देने के लिए भारतीय अनुवाद और व्याख्या संस्थान और पाली, फारसी और प्राकृत के लिए राष्ट्रीय संस्थान/संस्थान जैसे नए भाषा संस्थानों की स्थापना।

सलाह के लिए एक राष्ट्रीय मिशन की स्थापना, राष्ट्रीय पुस्तक संवर्धन नीति, मूलभूत साक्षरता और संख्यात्मकता पर राष्ट्रीय मिशन।

धन की अनुपलब्धता के मुद्दों से निपटने के लिए जल्द से जल्द सकल घरेलू उत्पाद के वर्तमान 4.6% से 6% तक शिक्षा व्यय को बढ़ाना।

भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए शिक्षा के विभिन्न डिजिटल प्लेटफार्मों को बढ़ावा देकर शिक्षा योजना, शिक्षण, सीखने और मूल्यांकन में प्रौद्योगिकी का व्यापक उपयोग।

एनईपी 2020 का कार्यान्वयन: संभावनाएं और सीमाएँ            

          विश्वविद्यालय स्तर पर उच्च शिक्षा के संबंध में एनईपी (2020) एक लचीले पाठ्यक्रम के साथ व्यापक, बहु-विषयक, समग्र स्नातक शिक्षा की परिकल्पना करता है। यह विषयों का रचनात्मक संयोजन, व्यावसायिक शिक्षा का एकीकरण और उचित प्रमाणन के साथ कई प्रविष्टि और निकास बिंदु पर आधारित है। यह सतत विकास की दृष्टि और शिक्षा के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को एक वास्तविकता बना देगा।

      संयुक्त राज्य अमेरिका की 1987 की ब्रंटलैंड आयोग की रिपोर्ट में सतत विकास को “ऐसा विकास जो भविष्य की पीढ़ियों की अपनी जरूरतों को पूरा करने की क्षमता से समझौता किए बिना वर्तमान की जरूरतों को पूरा करता है” के रूप में वर्णित किया गया है।

       इस परिभाषा के आलोक में एनईपी 2020 शैक्षणिक प्रतिमानों के लक्ष्यों को पूरा करता है और एक प्राच्य स्पर्श के साथ शिक्षा के वैश्विक मानक प्रदान करता है। भारत के राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद के अनुसार- “उच्च शिक्षा संस्थानों पर भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाने की बड़ी जिम्मेदारी है। इन संस्थानों द्वारा बेंचमार्क के रूप में निर्धारित गुणवत्ता मानकों का अन्य संस्थानों द्वारा पालन किया जाएगा।

       नई शिक्षा नीति के मूल सिद्धांतों में छात्रों के बीच तार्किक निर्णय लेने, नवाचार और एकीकृत शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए रचनात्मकता और महत्वपूर्ण सोच को शामिल करना शामिल है। उन्होंने आगे कहा कि “एनईपी महत्वपूर्ण सोच और जांच की भावना को प्रोत्साहित करना चाहता है।

      नीति के प्रभावी कार्यान्वयन से तक्षशिला और नालंदा के समय के दौरान शिक्षा के एक महान केंद्र के रूप में भारत के गौरव को बहाल करने की संभावना है। “भागवत गीता” और कृष्ण-अर्जुन संवाद से प्रेरणा लेते हुए राष्ट्रपति ने शिक्षक और छात्र के बीच मुक्त संचार और चर्चा की अवधारणा को दोहराया।

      2018-19 के अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार महिलाओं के लिए सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) पुरुषों की तुलना में थोड़ा अधिक है। हालांकि, राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में और विशेष रूप से तकनीकी शिक्षा के केंद्रों में महिला छात्रों की हिस्सेदारी बेहद कम है।

        उच्च शिक्षा में इस तरह की लैंगिक असमानता एक बड़ी चुनौती है जिसे एक सर्व-समावेशी और न्यायसंगत राष्ट्र के दृष्टिकोण को सामने लाने के लिए ठीक किया जाना चाहिए। यह संस्थानों के प्रमुख की भूमिका को बढ़ाएगा जिसका प्रभाव शिक्षकों और छात्रों पर समान रूप से पड़ेगा। इसलिए संगठनों के प्रमुखों को इसके निर्माण की दृष्टि के अनुसार नीति को लागू करने में सक्रिय रुचि लेनी चाहिए।

        एनईपी 2020 के कार्यान्वयन के दौरान एक और चुनौती शिक्षण भाषाओं के स्तर पर आएगी। वर्तमान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि कोई भी भारतीय भाषा दूसरी से कम नहीं है, और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 सभी भारतीय भाषाओं को समान रूप से सीखने पर जोर देती है। भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची भारत की आधिकारिक भाषाओं को सूचीबद्ध करती है।

       हालांकि देश भर में कई सैकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं, आठवीं अनुसूची कुल 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषाओं के रूप में मान्यता देती है जो (1) असमिया, (2) बंगाली, (3) गुजराती, (4) हिंदी, (5) कन्नड़ (6) कश्मीरी, (7) कोंकणी, (8) मलयालम, (9) मणिपुरी, (10) मराठी, (11) नेपाली, (12) उड़िया, (13) पंजाबी, (14) संस्कृत, (15) सिंधी , (16) तमिल, (17) तेलुगु, (18) उर्दू (19) बोडो, (20) संथाली, (21) मैथिली और (22) डोगरी है। ये सभी एनईपी 2020 में शिक्षा के प्रारंभिक स्तर से पढ़ाए जाने वाले विषय के रूप में शामिल हैं।

       एक तरफ हमारे छात्रों के दिमाग को औपनिवेशिक चंगुल से मुक्त करने और उन्हें भारतीय भाषाओं को पढ़ाने के द्वारा एकीकृत शिक्षा के लक्ष्य की ओर प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। हालाँकि, दूसरी तरफ, संचार की वैश्विक भाषा के रूप में इसकी मान्यता के कारण अंग्रेजी भाषा को शुरू से सीखने के महत्व को कभी भी नकारा नहीं जा सकता है।

      आज के परिदृश्य में जब पूरी दुनिया वैश्वीकरण के तहत एक बड़ा परिवार बन रही है और वसुधैव कुटुम्बकम का विचार एक वास्तविकता बन रहा है, तो कक्षा 6 से अंग्रेजी भाषा पढ़ाना स्वागत योग्य कदम नहीं है। यह भविष्य में छात्रों के बीच आधुनिक वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में समस्या पैदा कर सकता है।

      1968 के राष्ट्रीय नीति संकल्प में प्रतिपादित तीन भाषा सूत्र ने हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और आधुनिक भारतीय भाषा (अधिमानतः दक्षिणी भाषाओं में से एक) और गैर-हिंदी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषा के अध्ययन पर जोर दिया। इस चुनौती से निपटने के लिए बोलने वाले राज्यों को एनईपी 2020 में शामिल किया जाना चाहिए।

       प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के अनुसार राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020, “लॉन्च होने के बाद से दो वर्षों में, पहुंच, इक्विटी, समावेशिता और गुणवत्ता के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कई पहलें शुरू की गई हैं, जैसा कि नीति के तहत निर्धारित किया गया है। नीति।” उन्होंने छात्रों को समग्र विकास की ओर अधिक उन्मुख बनाने के लिए एक हाइब्रिड शिक्षण पद्धति (ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों) के कार्यान्वयन पर जोर दिया।

      इससे पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री रमेश निशंक पोखरियाल ने उम्मीद जताई थी कि “नई शिक्षा नीति जुलाई 2020 में एनईपी पर बातचीत के दौरान देश की शिक्षा प्रणाली को विकेंद्रीकृत और मजबूत करेगी। मुख्य ध्यान हमारे देश में शिक्षा मानकों की गुणवत्ता में सुधार करना है।”

        आगे उन्होंने कहा कि नीति ने पहले ही विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में खुले परिसरों तक पहुंच प्रदान कर दी है जो भारत को एक सॉफ्ट पावर बनाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस संबंध में उन्होंने उद्धृत किया कि “एनईपी 2020 के कार्यान्वयन की प्रक्रिया में सभी बाधाओं को दूर किया जाना चाहिए और सभी हितधारकों के साथ संवाद स्थापित किया जाना चाहिए।” कार्यान्वयन प्रक्रिया के बारे में विचार-मंथन करने में सभी वर्गों का समर्थन अनिवार्य है।

निष्कर्ष       

        निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 सरकार द्वारा 34 साल पुरानी शिक्षा नीति के पुनर्निर्माण, पुनर्गठन और पुनर्रचना के लिए उठाया गया एक बहुत ही क्रांतिकारी कदम है। भारतीय शिक्षा प्रणाली की जड़ को वैदिक काल से पूर्व-मुगल काल के समय तक फिर से स्थापित करना और भारतीय शिक्षा प्रणाली में बहुत आवश्यक संशोधन को सामने लाना समय की मांग और आवश्यकता थी।

       एनईपी ने शिक्षा प्रणाली में परंपरा और बहु-विषयक दृष्टिकोण के बीच एक उचित संतुलन को सफलतापूर्वक बनाए रखा है। सभी सकारात्मक गुणों से युक्त एनईपी छात्रों को कौशल आधारित शिक्षा प्रदान करेगा, जिससे वे जीवन में सफलता की दौड़ में वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने में सक्षम होंगे। यह निस्संदेह एक अत्यधिक प्रगतिशील और महत्वाकांक्षी नीति है जिसका भारत अपनी युवा पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण के मार्ग में योगदान देने के लिए और अधिक सक्षम बनाने के लिए प्रतीक्षा कर रहा है।   

12. ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र / नगरीय सीमान्त क्षेत्र / ग्रामीण-नगरीय सांतत्य / Rural-Urban Fringe

12. ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र / नगरीय सीमान्त क्षेत्र / ग्रामीण-नगरीय सांतत्य


ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र के अर्थ⇒

            “ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र” का शाब्दिक अर्थ है- नगरों की सीमाओं पर स्थित वह क्षेत्र जहाँ ग्रामीण एवं नगरीय भूदृश्य की विशेषताएँ देखने को मिलती है। दूसरे शब्दों में उपान्त क्षेत्र वह क्षेत्र है जो नगर और ग्रामीण बस्ती के बीच में विकसित होते हैं तथा वहाँ पर नगरीय और ग्रामीण आर्थिक-क्रियाकलाप साथ-2 चलते रहती है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1942 ई० में बेहरबिन महोदय ने किया था।

            ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र को ग्रामीण नगरीय सांतत्य शब्द से संबोधित किया जाता है। इस संकल्पना में बताया गया है कि नगर के केन्द्र में विशुद्ध रूप से नगरीय संस्कृति होती है लेकिन ज्यों-2 नगर के केन्द्र से दूर जाते हैं त्यों-2 नगरीय संस्कृति या नगरीय विशेषता में कमी आते जाती है और ग्रामीण विशेषताएँ बढ़ने लगती हैं।

                  दूसरे शब्दों में ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र मुख्यतः दो शब्दों का संग्रह है- उसमें से एक ग्रामीण उपान्त क्षेत्र एवं दूसरा नगरीय उपान्त क्षेत्र है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ग्रामीण- नगरीय उपान्त अतिक्रमण क्षेत्र का प्रतीक है। यह नगर के चारों ओर एक ऐसी संक्रमण पेटी का प्रतिनिधित्व करता है जो न तो पूर्णतया ग्रामीण है और न ही पूर्णतया नगरीय। इस प्रकार के संक्रमण पेटी में ग्रामीण एवं नगरीय दोनों प्रकार का वातावरण देखने को मिलता है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्ष

                ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र वह भौगोलिक क्षेत्र है, जो नगर की प्रशासनिक प्रदेश की सीमा के बाहर है किन्तु नगरीय आकारिकी के विकास की प्रवृति जारी रहती है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र एक ऐसा गत्यात्मक क्षेत्र है जहाँ लगातार भू उपयोग में परिवर्तन की प्रवृति होती है अर्थात् कृषि क्षेत्र घटते जाते हैं और निर्मित क्षेत्र बढ़ते जाती है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र के प्रकार 

           ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र को दो भागों में बाँते हैं:-

(ii) प्रमुख उपान्त क्षेत्र

(ii) गौण उपान्त क्षेत्र

                प्रमुख उपान्त क्षेत्र वह है जहाँ पर नगरीय विशेषताओं का अनुपात अधिक है। और गौण उपान्त क्षेत्र वह है जहाँ पर ग्रामीण विशेषताओं का अनुपात अधिक है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र के विकास के कारण

(1) केन्द्रों उन्मुखी शक्तियों का सक्रिय होता⇒ चूँकि नगर के केन्द्र में भूमि का मूल्य और मकान का किराया बहुत अधिक होता है। जबकि उपान्त क्षेत्रों में भूमि का मूल्य और मकान का किराया कम होता है। इसलिए केन्द्रीय बस्ती के लोग बाहरी क्षेत्रों में बसने की प्रवृति रखते है।

               केन्द्रीय बस्ती में अधिवासीय क्षेत्रों की कमी और प्रदूषण ज्यादा होता है। इसलिए भी लोग बाहर की ओर जाकर बसने की प्रकृति रखते हैं। पुनः केन्द्रीय बस्ती में पार्क, खेल का मैदान, हवाई अड्‌डा, फर्म हाउस, शोरूम खोलने के लिए विस्तृत भूमि नहीं मिल पाती है जिसके कारण उपान्त क्षेत्रों का विकास होता है।

               केन्द्रीय बस्ती में प्रदूषण से संबंधित कड़े नियम लागू होते हैं लेकिन उपान्त क्षेत्रों में औद्योगिक इकाइयों के द्वारा प्रदूषणकारी पदार्थों के स्राव पर कोई रोक नहीं होता है इसलिए औद्योगिक इकाइयों प्रान्त क्षेत्रों में विकसित होकर इनके विकास में योगदान देते हैं।

(2) कर से बचने के लिए भी इस प्रदेश में औद्योगिक इकाइयों के विकसित होने से उपान्त क्षेत्र विकसित होता है।

(3) विकासशील देशों में ग्रामीण-स्थानान्तरित जनसंख्या उपान्त क्षेत्रों में भूमि का मूल्य कम होने के कारण निवास की प्रवृति रखती है जिसके कारण उपान्त क्षेत्रों का सतत विकास होता जाता है।

          कुछ कार्य नगरों के आन्तरिक भागों में संभव नहीं है। जैसे- सीवेज प्लांट का निर्माण, कचड़ा संग्रहण केन्द्र, कसाई खाना, श्मशान घाट, विस्फोटक पदार्थों के डिप्पो, माल गोडॉन इत्यादि का निर्माण संभव नहीं है। अत: इनका विकास नगर के बाहरी क्षेत्रों में ही उपयुक्त मानी जाती है। फलतः उपान्त क्षेत्रों का सतत विकास होता है।

(4) उपान्त क्षेत्र अभिगमन के क्षेत्र होते हैं जिसके कारण यहाँ पर तीव्र गति से चलने वाले परिवहन साधनों का विकास अधिक होता है। अत: सम्पन्न लोग केन्द्रीय बस्ती तक कम समय में तीव्र परिवहन साधन कर पहुँच जाते हैं जिसके कारण सम्पन्न लोग केन्द्रीय बस्ती से दू उपान्त क्षेत्र में अधिवासित होने की प्रवृति रखते है। इससे उपान्त क्षेत्रों का सतत् विकास होता है।

नगरीय उपान्त


Read More:-

13. ग्रामीण-नगरीय उपान्त की विशेषता तथा समस्याएँ

13. ग्रामीण-नगरीय उपान्त की विशेषता तथा समस्याएँ


ग्रामीण-नगरीय उपान्त की विशेषता⇒

                  ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेशों की विशेषताओं का अध्ययन कई भूगोलवेताओं ने किया है। इनमें आर. ई. पहल, उजागर सिंह, सुदेश नागिया इत्यादि का महत्वपूर्ण कार्य है। आर. ई. पहल के अनुसार विकसित देशों में ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्रों की निम्नलिखित विशेषताएं होती है-

(i) यहाँ अधिवासीय क्षेत्र विलगाव के नियम पर आधारित होता है।

(ii) यहाँ रखने वाले लोग आर्थिक-सांस्कृतिक कार्यों के लिए नगरों से जुड़े रहते हैं।

(iii) उपान्त प्रदेश में जगह-2 पर औद्योगिक प्रतिष्ठान, प्रशासनिक संस्थाएँ, शिक्षण संस्थान, शोरूम, वर्क शॉप, तथा विभिन्न आय के लोगों का अधिवासीय क्षेत्र दिखाई देता है।

(iv) उपान्त क्षेत्र चयनित जनसंख्या स्थानान्तरण का लक्ष्य क्षेत्र होता है क्योंकि नगर के केन्द्र में जनसंख्या दबाव अधिक होता है। प्रदूषण की समस्या होती है तथा अधिवासीय मकान और भूमि मँहगे होते हैं।

(v) उपान्त क्षेत्र जनसंख्या अभिगमन का क्षेत्र होता है। इन क्षेत्रों में दिन में जनसंख्या घनत्त्व घट जाती है और रात में जनसंख्या घनत्व बढ़ जाती है।

(vi) उपान्त क्षेत्र मिश्रित भूमि उपयोग के क्षेत्र होते हैं, अर्थात् खाली स्थानों में गहन कृषि का कार्य किया जाता है तो दूसरी ओर अधिवासीय कार्य भी साथ-2 किये जाते है।

(vii) कानून के दृष्टिकोण से उपान्त क्षेत्र ग्रामीण क्षेत्र होते हैं जबकि कार्य एवं जनसंख्या के दृष्टिकोण से नगर समान होते हैं।

(viii) विकसित देशों में उपांत क्षेत्र नियोजित होते हैं अर्थात् नगर नियोजन के साथ-2 उपान्त क्षेत्रों के नियोजन पर भी विशेष जोर दिया जाता है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त

         भारतीय नगरों के संदर्भ में 1961 ई० में पाँच नगर कानपुर, आगरा, वाराणसी, इलाहाबाद तथा लखनऊ (KAVAL) का अध्ययन करने के बाद ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्रों के विशेषताओं का चर्चा किया। जैसे :

(i) भूमि प्रयोग के दृष्टिकोण से यह सतत् परिवर्तन क्षेत्र होता है यानी कृषि भूमि में लगातार कमी आते जाती है और निर्मित क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी होते जाती है। यहाँ कार्यिक संरचना में भी तेजी से परिवर्तन होता है।

(ii) यहाँ लगातार घरों के आकार एवं प्रकार में परिवर्तन देखा जा सकता है।

(iii) यह मिश्रित अर्थव्यवस्था का क्षेत्र होता है।

(iv) उपान्त क्षेत्र में नगरीय सार्वजनिक सेवाओं का अभाव होता है क्योंकि यह क्षेत्र नगर प्रशासन अन्तर्गत नहीं आते हैं।

(v) उपान्त क्षेत्रों में नगरीय संस्कृति और नैतिकता का अभाव होता है।

              JNU के प्रो० सुदेश नागिया 1976 ई० में दिल्ली महानगरीय प्रदेश का अध्ययन करते हुए निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया हैं-

(i) उपांत क्षेत्र झुग्गी-झोपड़ी और गन्दी बस्ती के क्षेत्र होते हैं।

(ii) यह मिश्रित कृषि भूमि उपयोग का क्षेत्र होता है।

(iii) कृषि क्षेत्र की भूमि कम होती है लेकिन कृषि कार्यों की सघनता में वृद्धि होती है।

(iv) यहाँ नगरीय सुविधाओं का अभाव होता है।

(v) उपान्त क्षेत्र में सतत निर्माण की प्रक्रिया चलते रहती है।

(vi) उपान्त क्षेत्र में ग्रामीण एवं नगरीय संस्कृति साथ-2 मिलती है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेश के तीव्र फैलाव का कारण 

                 उपान्त क्षेत्रों के तीव्र फैलाव का दो प्रमुख कारण होते हैं:-

(i) विकसित देशों में CBD से जनसंख्या का चयनित स्थानान्तरण।

(ii) विकासशील देशों में ग्रामीण-नगरीय जनसंख्या के स्थानान्तरण का जमघट।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेश की समस्याएँ

              ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेश की निम्नलिखित समस्याएँ है:-

 (i) इसके तीव्र फैलाव के कारण यहाँ गंदी बस्तियों का विकास तेजी से होता है। लंदन, न्यूयार्क में एशियाई एवं निग्रो लोगों की गंदी बस्ती को घेटों से संबोधित करते हैं। जबकि दिल्ली के उपान्त क्षेत्रों में विकसित झुग्गी-झोपड़ी जे.जे. कोलनी के रूप में प्रसिद्ध है।

(ii) उपान्त क्षेत्रों में पूर्ण नगरीय विकास के पूर्व ही पर्यावरण असंतुलन की समस्याएँ पाई जाती है।

(ii) यहाँ अनियोजित विकास की समस्याएँ भी पायी जाती हैं।

(iii) सेवाओं एवं जन सुविधाओं का अभाव होता है। जैसे- पेयजल, सुलभ-शौचालय, मनोरंजन पार्क और स्वास्थ केन्द्र नहीं के बराबर मिलते हैं।

(v) उपांत क्षेत्रों में जल निकासी की भी गंभीर समस्या पायी जाती है।

(vi) सड़क एवं गलियों में प्रकाश प्रबंध नहीं होता है।

(vii) उपान्त क्षेत्र से बड़ी-2 एवं चौड़ी से चौड़ी सड़‌के तो अवश्य गुजरती है लेकिन सहायक लड़‌कों की स्थति दयनीय होती है।

(viii) इस प्रदेश में कई सामाजिक समस्याएँ भी होती है। जैसे- अशिक्षा, वेश्यावृति, प्रवजन, जनसंख्या वृद्धि, भूमि बेदखल, कर इत्यादि।

(ix) उपान्त क्षेत्र कई सांस्कृतिक समस्याओं से भी जूझ रहे होते हैं। इस प्रदेश में न तो नगरीय संस्कृति पायी जाती है और न हीं ग्रामीण संस्कृति।

(xi) उपान्त क्षेत्र में भूमि उपयोग संबंधी कोई नियंत्रण नहीं होता है।

निष्कर्ष:- इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ग्रामीण-नगरीय पान्त क्षेत्र बस्ती भूगोल की एक महत्वपूर्ण संकल्पना रहीं है। इस प्रदेश के विकास के कारण उनकी समस्याओं का अध्ययन करके ही संतुलित नगर नियोजन की संकल्पना विकसित की जा सकती है।

error: