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3. जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत

3. जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत


जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत⇒ 

            जनसंख्या वृद्धि एक जैविक प्रक्रिया है जो समय और स्थान के संदर्भ में प्रभावित होता है। जनसंख्या वृद्धि का संबंध जन्म दर और मृत्यु दर से है। जन्म दर और मृत्यु दर का संबंध किसी भी देश के सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से जुड़ा हुआ है। जन्म दर एवं मृत्यु दर का सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के बीच मिलने वाला सह-संबंध का अध्ययन “जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत” कहलाता है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन अमेरिकी समाजशास्त्री के विलियम थॉम्पसन ने 1929 ई० में और 1945 ई० में नोटेस्टीन ने इसमें संशोधित किया। जबकि 1975 ई० में क्लार्क महोदय ने और 1978 ई0 में हेगेट महोदय ने इस सिद्धांत को जनसंख्या वृद्धि का विश्लेषण करने वाला एक यथार्थवादी सिद्धांत बताया।

                थाम्पसन और नोटेस्टीन ने बताया कि जनसंख्या वृद्धि तथा किसी भी देश का सामाजिक आर्थिक दर एक ही सिक्के के दो पहलू है। जैसे-अगर किसी देश के जनसंख्या वृद्धि दर उच्च है तो इसका तात्पर्य है कि वहाँ का आर्थिक-सामाजिक स्तर विकासशील या अति पिछड़े दौड़ से गुजर रहा है। दूसरी ओर यदि जनसंख्या वृद्धि दर अति न्यून है तो इसका तात्पर्य है कि उस देश का आर्थिक सामाजिक स्तर काफी विकसित अवस्था में है। 

              थॉम्पसन और नोटेस्टीन ने बताया कि जनसंख्या वृद्धि एक गत्यात्मक पहलू है जो कि समय और स्थान के संदर्भ में परिवर्तित होते रहता है।
      उपरोक्त मान्यताओं को तार्किक ढंग से प्रस्तुत करते हुए इन्होंने समय और स्थान के संदर्भ में चार अवस्थाओं का उल्लेख किया है-

(i) प्रथम अवस्था⇒ इस अवस्था में उच्च विलचन की प्रवृति पायी जाती है। जन्म दर 40-50 व्यक्ति/हजार, मृत्यु दर 40-50 व्यक्ति / हजार और प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि दर -10 से +10 तक हो सकता है।

       प्रथम अवस्था से गुजरने वाले देश की आर्थिक-सामाजिक स्थिति काफी पिछड़ी होती है। ऐसे देशों में निरक्षरता, गरीबी, बेरोजगारी, रुढ़िवादी धर्म, परम्परागत सामाजिक विशेषता का बोलवाला होता है।

            अधिकतर देश वर्तमान समय में प्रथम अवस्था से मुक्त हो चुके हैं। फिर भी मध्य अफ्रीकी देश रुवान्डा, बुरुण्डी, युगाण्डा, द०-पूर्व एशिया के कम्बोडिया एवं लाओस में यह अवस्था पायी जाती है। यद्यपि भारत इस अवस्था में शामिल नहीं है तथापि भारत के कई क्षेत्र आज भी इस अवस्था के दौर से गुजर रहे हैं। जैसे- भारत के कई जनजातीय समूह, इसी अवस्था से गुजर रहे हैं।

(ii) दूसरा अवस्था⇒ दूसरा अवस्था को जनसंख्या विस्फोट की अवस्था भी कहते है। इस अवस्था में जन्म दर 30-40 व्यक्ति प्रति हजार, मृत्यु दर 15-20 व्यक्ति/हजार और जनसंख्या वृद्धि दर 15 से 25 व्यक्ति प्रति हजार प्रतिवर्ष होता है।

         दूसरा अवस्था विकासशील देशों के आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों का उल्लेख करता है। ये वे देश हैं जिन्होंने मृत्यु दर पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है लेकिन सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के कारण जन्मदर पर संतोषजनक नियंत्रण स्थापित नहीं किया है।

        अधिकतर द० एशियाई देश, द०-पूर्वी एशिया के देश, लेटिन अमेरिका और अधिकतर अफ्रीकी देश इसके उदाहरण है। थॉम्पसन ने यह भी बताया था कि इस अवस्था में वैसे देशों को रखा जाना चाहिए जिनका जनसंख्या वृद्धि दर 2% से अधिक है। अगर भारत के सन्दर्भ में विश्लेषण किया जाय तो स्पष्ट होता है कि भारत में जन्म दर और मृत्यु दर दूसरी अवस्था के अनुकूल है। जबकि वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर 1.64% हो गया है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत के तीसरी अवस्था के चौखट पर खड़ा है।

(iii) तीसरी अवस्था⇒ तीसरी अवस्था को जनसंख्या वृद्धि में क्रमिक परिवर्तन की अवस्था कहते है। तीसरा अवस्था में जन्मदर 16-20 व्यक्ति / हजार, मृत्युदर 10-15 व्यक्ति/हजार, जनसंख्या वृद्धि दर 1-10 व्यक्ति प्रति हजार प्रतिवर्ष होता है।

            तीसरी अवस्था में वैसे देशों को शामिल किया जाता है जिन्होंने जन्म दर और मृत्यु दर पर संतोषजनक नियंत्रण स्थापित कर लिया है तथा हाल के वर्षों में तीव्र गति से आर्थिक विकास का कार्य किया है। तीसरी अवस्था में पूर्वी यूरोपीय देश, मध्य एशियाई देशों को शामिल करते हैं। इसके अलावे ताईवान, द. अफ्रीका, पूर्तगाल, क्यूबा, द. कोरिया इत्यादि इसी अवस्था के उदहारण है। कुछ विद्वान भारत और श्रीलंका को भी इसी अवस्था में शामिल करते हैं।

(iv) चौथी अवस्था⇒ चौथी अवस्था को निम्न विचलन की अवस्था कहते हैं। चौथी अवस्था में जन्म दर 6-8, मृत्यु दर से 6 से 8 और प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि दर 0-2 व्यक्ति / हजार प्रतिवर्ष होता है।
                चौथी अवस्था में उन देशों को शामिल करते हैं जहाँ सामाजिक-आर्थिक अवस्था काकी उन्नत है, साक्षरता 100% पहुंच चुका है। औद्योगिकीकाण तथा नगरीकरण बड़े पैमाने पर हुआ है। इस अवस्था में पश्चिमी यूरोप, पुर्तगाल को छोड़कर आंग्ल अमेरिका, USA और कनाडा, अस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापूर, जापान को शामिल करते हैं। अर्थात ये विकसित होते हैं।

             जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत का प्रशंसा करते हुए क्लार्क महोदय ने एक पाँचवी अवस्था का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार पाँचवी अवस्था अति विकसित देशों की अवस्था है। इस अवस्था में वैसे देशों को शामिल करते हैं जहाँ जन्म दर की तुलना में मृत्यु दर अधिक है तथा जन्म दर और मृत्यु दर अति न्यून है। वैसे सामाजों में परिवार एवं विवाह, जैसी संस्थाएँ कमजोर हो चुकी है।

            समाज पूर्ण रूप से भौतिकतावादी बन चुका है। जनसंख्या वृद्धि दर ऋणात्मक हो चुका है। इस अवस्था को क्लार्क महोदय ने प्रजातीय संहार की अवस्था से सम्बोधित किया है। पश्चिमी जर्मनी, स्वीडेन, नार्वे, आइसलैण्ड, स्वीटजरलैण्ड इसी अवस्था से गुजर रहे हैं। क्लार्क ने ऐसे देशों को चेतावनी देते हुए कहा कि आप जल्द से जल्द जनसंख्या वृद्धि के लिए अनुकूल कार्यक्रम चलाये।
                हेगेट महोदय ने जनसांख्यिकीय संक्रमण सिद्धांत को एक मॉडल से समझाने का प्रयास किया है।

जनसांख्यिकीय संक्रमण का

जनसांख्यिकी मॉडल (हेगेट)

 BR- जन्म दर, DR- मृत्यु दर

अवस्था- समय का द्योतक है।

       ऊपर के तथ्यों एवं मॉडल के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि जनसांख्यिकी संक्रमण का सिद्धांत स्थान और समय के संदर्भ में दिया गया है और बताया गया है कि जन्म दर, मृत्यु दर और जनसंख्या वृद्धि दर सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से संबंधित है। इसे कुछ उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे-1750-1760 ई० तक ब्रिटेन प्रथम अवस्था से, 1760-1850 ई० तक द्वितीय अवस्था से 1850-1900 ईo तक तृतीय अवस्था से और 1900 ई० के बाद यह चौथी अवस्था के दौर से गुजर रहा है।

                 भारत के संदर्भ में अशोक मिश्रा ने विश्लेषण करते हुए कहा है कि भारत 1931 ई० तक प्रथम अवस्था में, 1931 से 1991 ई० तक द्वितीय अवस्था में और 1991 के बाद तृतीय अवस्था से गुजार रहा है।

जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत की अलोचना

             जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत की कई आधार पर आलोचना की गई है। जैसे-

(1) अगर चीन के सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति को देखा जाय तो वह अभी भी दूसरी अवस्था के दौर से गुजर रहा है। लेकिन प्रशासनिक प्रतिबद्धता को दिखाते हुए जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण कर तृतीय अवस्था में पहुँच चुका है। इसका तात्पर्य है कि जन्म दर और मृत्यु दर एवं जनसंख्या वृद्धि दर का संबंध न केवल आर्थिक सामाजिक परिस्थितियों से है बल्कि अन्य कारकों से भी है।

(2) मध्य-पूर्व के पेट्रोलियम उत्पादक देश के संदर्भ में अगर इस सिद्धांत की विवेचना की जाय तो पाते है कि ये देश सामाजिक दृष्टिकोण से अभी भी मध्ययुगीन, रुढ़िवादी एवं बर्बर की अवस्था से गुजर रहे हैं। लेकिन पेट्रो डॉलर के कारण आर्थिक स्थिति विकसित देशों से कम नहीं है। अत: ऐसे देशों को किस अवस्था में रखा जाय स्पष्ट रूप से व्याख्या नहीं किया जा सकता।

(3) पूर्वी यूरोपीय जैसे देशों में भी यह मॉडल सही ढंग से लागू नहीं हो पाया क्योंकि यहाँ की आर्थिक स्थिति तीसरा अवस्था का घोत्तक और जनसंख्या वृद्धि चौथी अवस्था का घोत्तक है।

(4) इसकी आलोचना इस आधार पर भी की जाती है कि वर्तमान समय मे विश्व का कोई भी देश नहीं है जो प्रथम अवस्था की दौर से गुजर रहा है।

निष्कर्ष:

    उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि इस सिद्धांत की आलोचना कई आधारों प की गई है। इसके बावजूद यह सिद्धांत विश्व के अधिकतर देशों प लागू होता है। इस तरह इस सिद्धांत की मौलिकता आज भी बनी हुई है।

 

2. मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत (Marx’s population theory)

2. मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत

(Marx’s population theory)


मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत ⇒मार्क्स का जनसंख्या सिद्

                मार्क्स को साम्यवादी चिन्तन का जन्मदाता माना जाता है। इन्होंने 1867 ई० में जनसंख्या पर अपना विचार प्रकट किया था। मार्क्स के पहले जितने भी विद्वान थे उन्होंने जनसंख्या वृद्धि को जैविक प्रक्रिया मानते थे। जबकि मार्क्स ने पहली बार जनसंख्या वृद्धि को सामाजिक संकल्पना पर आधारित माना।

             कार्ल मार्क्स अपने साम्यवादी चिन्तन में कहा था कि पूरी दुनिया दो वर्गों में विभाजित है- “एक अमीर वर्ग और दूसरा गरीब वर्ग”। उनके अनुसार अमीरों का वर्ग हमेशा सम्पति एकत्रित में लगा रहता है। अमीर वर्ग कम से कम श्रमिक का उपयोग कर अधिक से अधिक उत्पादन करना चाहता है। तकनीक के प्रयोग पर अधिक से अधिक जोर देता है। वह श्रमिकों को कम-से-कम मजदूरी देकर अधिक औद्योगिक उत्पादन कर अधिक से अधिक लाभ कमाना चाहता है। इस तरह उसके पास समय अभाव के कारण जनसंख्या वृद्धि का मौका नहीं मिल पाता है।

            दूसरी तरफ समाज का वह वर्ग जो गरीबी से गुजर रहा है। उनमें निराशा का वातावरण होता है। जीविका उपार्जन हेतु श्रम के अलावे कोई दूसरा उपाय नहीं दिखता है। अत: गरीब वर्ग ज्यादा से ज्यादा धन एकत्रित करने हेतु श्रम का एकत्रीकरण शुरू कर देता है। फलतः जनसंख्या वृद्धि स्वाभाविक रूप से बढ़ते रहती है।
                मार्क्स ने मजदूरी और जन्म दर एवं मृत्यु दर के बीच प्रतिकूल सह सम्बन्ध पाया है।

मजदूरी ∝ 1 ⁄  जन्म एवं मृत्यु दर
                 उपरोक्त सूत्र के आधार पर उन्होंने बताया कि कम मजदूरी भी जनसंख्या विस्फोट की स्थिति उत्पन्न करती है। जब जनसंख्या का विस्फोट हो जाता है तो उस विस्फोटित जनसंख्या के सामने चार प्रकार की समस्या उत्पन्न होती है-
(1) बेरोजगारी
(2) कुपोषण
(3) गरीबी और
(4) कष्टकर जीवन

                   उपरोक्त समस्याएँ गरीब एवं श्रमिक वर्ग को बेचैन कर देती है, जिसके कारण वर्ग संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। मार्क्स ने बताया कि वर्ग संघर्ष से ही सभी आर्थिक, सामाजिक समस्याओं का समाधान होता है। धन सही रूप से समाज में वितरण हो जाता है। वर्ग संघर्ष में कई लोग मारे जाते हैं जिससे जनसंख्या में कमी आती है।

मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत का आलोचना

                   मार्क्स के द्वारा प्रस्तुत जनसंख्या वृद्धि सिद्धांत की कई आधारों पर आलोचना की गई है। जैसे:-

(1) मार्क्स ने धर्म, विश्वास एवं जैविक प्रक्रिया को जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण नही माना है। जबकि क्लार्क महोदय के अनुसार जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण धर्म है, जबकि जननांकी संक्रमण सिद्धांत के अनुसार जनसंख्या वृद्धि का मूल कारण जैविक प्रक्रिया है।

(2) मार्क्स के अनुसार बढ़ती जनसंख्या से मजदूरी में सापेक्षिक कमी आती है। जबकि वास्तव में यह एक गलत अवधारणा है, क्योंकि लोक कल्याणी राज्यों में मजदूरी का निर्धारण लोग स्वयं नहीं करते हैं, यह सरकार के द्वारा किया जाता है।

(3) मार्क्स के अनुसार निजी सम्पत्ति और पूँजीपति समाज का विकास ही अप्रत्यक्ष रूप से जनसंख्या विस्फोट का कारण है लेकिन पश्चिमी यूरोप के संदर्भ में यह अवधारणा गलत साबित होती है।

(4) ड्यू मॉन्ट (फांसीजी)⇒

        द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में अभिवृद्धि हुई है। इसके साथ ही साक्षरता में भी वृद्धि हुई है। समाज में चाहे अमीर हो या गरीब यह भावना पनपी है कि नियोजित और छोटा जीवन अधिक से अधिक खुशहाली ला सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि जनसंख्या वृद्धि अमीरी & गरीबी से जुड़ी हुई नहीं है।

(5) अधिकतर विकासशील देशों में ऐसा देखने से लगता है कि अप्रत्याशित जनसंख्या वृद्धि का संबंध निम्न मजदूरी है। लेकिन यह वास्तव में यह निम्न मजदूरी से जुड़ा हुआ नहीं है बल्कि निम्न स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा हुआ है अर्थात् निम्न स्वास्थ्य का स्तर होने के कारण बच्चों के जीवित रहने की गारंटी नहीं होती है। फलत:, सामान्य व्यक्ति अधिक से अधिक बच्चा चाहता है।

निष्कर्ष :

           उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद इनकी अवधारणा उचित जान पड़ती है क्योंकि कहीं न कहीं गरीबी, बेरोजगारी और जनसंख्या में सह-संबंध है। एडम स्मिथ ने कहा है कि गरीबी जनसंख्या वृद्धि के लिए उपयुक्त वातावरण निर्माण करती है। मार्क्स के द्वारा व्यक्त यह विचार व्यक्त किया गया कि बढ़ती हुई जनसंख्या राष्ट्र की संपत्ति होती है। यह भी सापेक्षिक रूप से सही प्रतीत होता है। जैसे -भात में ही कुछ समय पहले तक जनसंख्या वृद्धि को एक अभिशाप के रूप में माना जाता था। जबकि Out Soursing, BPO, सूचना क्रांति के आगमन ने भातीय जनसंख्या को संसाधन के रूप में बदल दिया है।

 

6. संघवाद

6. संघवाद या संघवाद का भौगोलिक आधार


संघवाद ⇒ 

            संघवाद दो शब्दों के मिलने से बना है प्रथम-संघ और दूसरा- वाद। संघ का तात्पर्य एकजूट होने से है। जबकि वाद का तात्पर्य विचारधारा से है। जब राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में व्यक्ति, समूह या राज्य आपस में एकजूट होकर विचारधारा को जन्म देते हैं, तो उसे संघवाद कहा जाता है।

विशेषता
             संघवाद एक नाजुक समझौता है जो किसी भौगोलिक प्रदेश में निवास करने वाले जनसंख्या की भावनाओं को ध्यान में रखकर राष्ट्र आधारित राज्य की संकल्पना विकसित की जाती है।

संघीय व्यवस्था को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारक:

(1) प्राकृतिक –

(i) उच्चावच

(ii) पर्वत

(iii) जलवायु

(iv) मृदा

(2) मानवीय कारक –

(i) प्रजातीय विविधता

(ii) भाषाई विविधता

(iii) सामाजिक, धार्मिक एवं ऐतिहासिक विविधता

उत्पत्ति

              भौगोलिक विविधताओं के चलते ही कुछ राज्य आपस में समझौता कर संघीय व्यवस्था को जन्म देते हैं। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते है तो वे अस्थिर, कमजोर राष्ट्र बन जाते हैं। अगर कोई राज्य का भाग अलग-2 भौगोलिक क्षेत्रों में स्थित हो तो वहाँ संघीय व्यवस्था को बनाये रखना मुश्किल हो जाता है। जैसे- 1947 ई० में भारतीय उपमहाद्वीप पर भारत एवं पाकिस्तान नामक दो देशों का जन्म हुआ। लेकिन पाकिस्तान दो भागों में विभक्त था। एक पूर्वी पाकिस्तान और दूसरा पश्चिमी पाकिस्तान कहलाता था। भौगोलिक दूरियों के कारण ही पूर्वी पाकिस्तान पश्चिमी पाकिस्तान के साथ एकीकृत नहीं रह सका। फलत: 1971 ई० में ही वह टूट गया।

अध्ययन

                राजनीतिक भूगोल में संघवाद का अध्ययन कई भूगोलवेताओं ने किया है। इनमें O.H. स्पेट, प्रेसकॉट, ब्लिज, पाण्ड्स, R.D. दीक्षित इत्यादि का नाम उल्लेखनीय है।

संघवाद के विकास की अवस्था

                  संघवाद अचानक विकसित होने वाली राजनैतिक घटना नहीं है। बल्कि संघवाद का विकास कई अवस्थाओं से गुजने के बाद होता है। इसे नीचे के फ्लो चार्ट में देखा जा सकता है।

एलायंस
   ⇓
लीग
   ⇓
कानफेडरेशन
   
फेडरेशन (संघीय व्यवस्था)
   
एकात्मक राज्य

संघवाद के प्रकार

           संघवाद दो प्रकार के होता है-

(1) एकात्मक राज्य 

(2) संघात्मक राज्य

संघवाद के विशेषताएँ

(1) एकात्मक राज्यों का विकास छोटे राज्यों में होता है। जबकि संघात्मक राज्यों का विकास बड़े राज्यों में होता है।

(2) एकात्मक राज्य में प्रशासन का एक केन्द्र बिन्दु होता है। जबकि संघात्मक राज्य में प्रशासन पदानुक्रमित होता है।

(3) एकात्मक राज्य में राज्य की सीमा अत्यंत ही कमजोर होती है। जबकि राज्य में राज्य की सीमाएँ स्पष्ट और मजबूत होती है।

(4) संघीय व्यवस्था में सरकार का गठन दो स्तर पर होता है-

(i) केन्द्र सरकार और

(ii) राज्य सरकार

                   जबकि एकात्मक राज्य में सरकार का गठन एक स्तर पर होता है।

छोटे देशों में मात्र स्वीटजरलैण्ड ऐसा देश है जहाँ पर संघीय व्यवस्था का विकास हुआ है क्योंकि यह देश सात पहाड़ियों के कारण सात भाग में विभक्त है और प्रत्येक भाग की निवासियों की अलग-2 पहचान और अभिव्यक्ति है। दूसरी ओर बड़े-2 देशों में संघीय व्यवस्था का ही विकास हुआ है। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में वृहत क्षेत्रफल के कारण, जर्मनी और नाइजीरिया में वृहत जनसंख्या के कारण, भारत और USA में वृहत जनसंख्या एवं वृहत क्षेत्रफल के कारण संघीय व्यवस्था का विकास हुआ।

                       किसी भी देश में संघीय व्यवस्था निम्न तथ्यों पर भी निर्भर करती है:-

(i) केन्द्रीय सरकार कितना दूरदर्शी है।

(ii) प्रादेशिक भावना का स्तर क्या है?

(iii) केन्द्र सरकार कितना कठोर या लचीला है?

(iv) आम जनता के द्वारा उठायी गई माँगों को सरकार कितना तरजीह देते है।

निष्कर्ष

          इस तह उपरोक तथ्यों से स्पष्ट है कि भौगोलिक दृष्टिकोण से विविधता रखने वाले राष्ट्रों में संघवाद का विकास हुआ है।

(नोट – संघ = किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति हेतु एकजुट होना
वाद = विचारधारा)

संघवाद या संघवाद का भौगोलिक आधार

5. राष्ट्र एवं राज्य की संकल्पना / Concept of nation and state

5. राष्ट्र एवं राज्य की संकल्पना

(Concept of nation and state)


राष्ट्र एवं राज्य की संकल्पना⇒

               राष्ट्र एवं राज्य राजनीतिक भूगोल का दो अलग-2 संकल्पनाएँ हैं। लेकिन कई तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि राष्ट्र एवं राज्य एकीकृत संकल्पनाएँ भी है। राष्ट्र और राज्य के बीच में भूगोलवेताओं ने निम्नलिखित अन्तर बताया है:-

(1) राज्य एक ऐसी संकल्पना है जिसके पास एक निश्चित भूभाग होता है, जिसकी सीमाएँ निर्धारित होती हैं। जबकि राष्ट्र एक ऐसी संकल्पना जिसके पास न अपना कोई भी भूभाग होता और न ही सीमा निर्धारित होती है। एक राष्ट्र से संबंधित लोग कई राज्यों में बिखरे होते हैं। जैसे-1948 ई० के पहले यहूदियों का कोई राज्य नहीं था। वे पश्चिमी यूरोपीय देश एवं मध्य एशिया के कई देशों में बिखरे हुए थे। अमेरिका की सहायता से फिलीस्तीन को विभाजित कर जब इजराइल रूपी राज्य का निर्माण किया गया तो यहूदियों को एक राज्य मिला।

              इसी तरह भारत के सिख समाज एक राष्ट्र के रूप में संगठित है। लेकिन उनके पास अभी कोई राज्य नहीं है।
(2) राज्य के चार प्रमुख तत्व माने जाते- (i)भूभाग (ii) जनसंख्या (iii) सरकार और (iv) संप्रभुता। जबकि राष्ट्र के पास न कोई भूभाग होता है और न ही कोई संप्रभु सरकार होती है।
(3) राज्य के पास निश्चित संसाधन होते हैं और उस पर उसका कानूनी अधिकार होता है। जबकि राष्ट्र के पास कोई संसाधन नहीं होता है।
(4) राज्य एक समझौते के तहत विकसित होते हैं, जबकि राष्ट्र स्वतः विकसित होते हैं।
(5) राज्य के विकास के लिए एक निश्चित जनसंख्या आवश्यक है, जबकि राष्ट्र का विकास एक व्यक्ति से भी हो सकता है।
(6) एक राज्य एक पूर्णतः राजनैतिक संकल्पना है जबकि राष्ट्र भावनात्मक एवं सांस्कृतिक संकल्पना है।
(7) एक राष्ट्र के लोग एक-दूसरे पर गर्भ महसूस करते हैं।

         इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट होता है कि राष्ट्र एवं राज्य दोनों अलग-2 संकल्पनाएँ हैं। वर्तमान समय में अगर राष्ट्र आधारित राज्य का विकास किया जाता है तो वह सर्वोत्तम भूराजनैतिक संकल्पना मानी जाती है। राष्ट्र आधारित राज्य बनाने हेतु निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं।

राष्ट्र आधारित राज्य बनाने के उपाय:-
(i) औद्योगिकीकरण और नगरीकण को बढ़ावा दिया जाए।
(2) पर्यटन, संचार माध्यम एवं परिवहन साधनों का विकास बड़े पैमाने पर किया जाय।
(3) सामाजिक संचार का विकास किया जाय।
(4) “हम सब एक हैं।” की भावना का प्रचार-प्रसार किया जाय।
(5) आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक अंतर-निर्भरता को बढ़ायी जाय।
(6) शिक्षा के स्तर को बढ़ाया जाय।
(7) अन्तरजातीय और अन्तरधार्मिक विवाह का प्रचलन बढ़ाया जाय।
(8) साम्प्रदायिक संगठनों को समाप्त कर दिया जाय।
(9) प्राचीन एवं विवाद‌ग्रस्त धार्मिक स्थलों को राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित कर दिया जाय।
(10) एकल सरकार, एकल संविधान, समान नागरिक संहिता, विधि का कानून लागू किया जाय।

राष्ट्र एवं राज्य की संकल

समस्याएँ
             राष्ट्र आधारित राज्य के विकास के दिशा में कई समस्याएँ अवरोधक के रूप में कार्य करती हैं। जैसे-
(i) जातिवाद
(ii) प्रजातिवाद
(iii) सम्प्रदायवाद
(iv) रंगभेद
(v) भाषाई विविधता
(vi) सांस्कृतिक विविधता
(v) विदेशी घुसपैठ
(vi) गरीबी एवं बेरोजगारी
(vii) निरक्षरता एवं चेतना का अभाव
(viii) क्षेत्रवाद
(ix) आतंकवाद

विशेषताएँ
             राष्ट्र आधारित राज्य का निर्माण करना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसकी निम्नलिखित विशेषताएँ होती है:-
(i) यह धीमी गति से चलने वाली प्रक्रिया है।
(ii) इसका विकास राजनीतिक चेतनाओं द्वारा किया जा सकता है। इसमें समाज के नेताओं की भूमिका अधिक होती है।
(iii) इसे सुनियोजित तरीके से विकसित किया जा सकता है।
(iv) इसमें भौगोलिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।
(v) सामाजिक सुरक्षा, विकास की संभावना, पारस्पारिक निर्भरता इत्यादि इस प्रक्रिया को समुचित तरीके से आगे बढ़ाते हैं।

निष्कर्ष
            इस तरह उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि राष्ट्र एवं राज्य दो अलग-2 संकल्पा होने के बावजूद एक-दुसरे से अन्तरसंबंधित है। वर्तमान समय में प्रत्येक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में संलग्न है। राजनीतिक भूगोल में यह संकल्पना व्यक्त की जा रही है कि सभी राष्ट्र आपस में मिलकर विश्वगृह्यता (Cosmopolitant) के रूप में विकसित हो रहे हैं।

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