Archives June 2023

23. एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina) क्या है?

23. एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina) क्या है?


एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina)

एलनिनो

          एल निनो एक स्पेनिश शब्द है जिसका अर्थ है नवजात ईसा मसीह (Child Christ)। यह नाम इसको इसलिए दिया गया है, क्योंकि इस घटना का आगमन क्रिसमस के समय होता है।

       यह एक जलवायु सम्बन्धी (Weather phenomena) प्रक्रिया है, जिसके फलस्वरूप हवा उल्टी दिशा में बहने लगती है। ऐसा प्रत्येक दो से सात वर्ष बाद होता है। इसके अन्तर्गत दक्षिण अमेरीका से एशिया की ओर प्रशान्त महासागर के ऊपर से बहने वाली हवाएं उलटकर एशिया से दक्षिण अमेरीका की ओर बहने लगती हैं।

         इस प्रकार एशिया में वर्षा पहुंचाने के बजाय ये हवाएं इस वर्षा को दक्षिण अमेरीका की ओर ले जाती हैं जिससे दक्षिण अमेरीका और उसके आस-पास के प्रशान्त महासागर में घनघोर वर्षा होने लगती है और वहां बाढ़ आ जाती है और दूसरी ओर एशिया के विभिन्न देश जैसे भारत, इण्डोनेशिया और यहां तक कि ऑस्ट्रेलिया में भी वर्षा न होने के कारण सूखा पड़ जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि एल निनो के कारण दक्षिण एशिया का मानसून बुरी तरह प्रभावित होता है।

        एल निनो का कारण है, दक्षिण अमेरीका के पूर्वी प्रशान्त महासागर से लगे किनारों पर पानी का ठण्डे होने के स्थान पर गर्म हो जाना, जो मुख्यतः पेरू के किनारे समुद्र में होता है। यह गर्म जल धीरे-धीरे पश्चिम की ओर प्रशान्त महासागर में फैल जाता है।

        इस प्रकार जल के गर्म हो जाने के कारण दक्षिण प्रशान्त महासागर के ऊपर एक कम दबाव का क्षेत्र बन जाता है। (जहां पर अन्यथा जल के ठण्डे होने के कारण अधिक दबाव का क्षेत्र होना चाहिए था।) तथा इस कम दबाव के क्षेत्र को सन्तुलित करने के लिए इण्डोनेशिया के पास एक अधिक दबाव का क्षेत्र (जहां पर अन्यथा एक कम दबाव का क्षेत्र होना चाहिए था।) बन जाता है। इस प्रकार दबाव क्षेत्रों की अदला-बदली के कारण प्रशान्त महासागर के ऊपर बहने वाली हवाओं की दिशा उलट जाती है।

      मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल निनो की घटना इस दशक में पहले की तुलना में अधिक हो रही है और साथ ही इसकी तीव्रता भी पहले से अधिक है। इसका कारण वे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को मानते हैं। विश्व भर में बढ़ते प्रदूषण, ग्रीन हाउस प्रभाव और ओजोन परत की क्षति के कारण पृथ्वी की जलवायु में भारी परिवर्तन हो रहे हैं।

     एल निनो का एक चक्र समाप्त होने पर इसमें होने वाली घटनाओं के ठीक विपरीत एक और घटना होती है जिसेला निना’ (La Nina) कहा जाता है। ‘ला निना’ के समय प्रशान्त महासागर का जल पुनः ठण्डा हो जाता है। इस प्रका ‘ला निना’, एल निनो के जलवायु पर होने वाले प्रभावों को विपरीत दिशा में मोड़ देता है और वातावरण में पुनः स्थिरता को स्थापित करता है।


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19. अरब भूगोलवेत्ताओं का योगदान (Contribution by Arab scholars)

19. अरब भूगोलवेत्ताओं का योगदान

(Contribution by Arab scholars)


अरब भूगोलवेत्ताओं का योगदान

           700 A. D. से 1100 A. D. तक का समय अरबी भूगोलवेत्ताओं का समय माना जाता है। इस समय जबकि यूरोपीय ईसाई राष्ट्र भूगोल को अवनति की ओर धकेल रहे थे, अरबी भूगोलवेत्ता न केवल भूगोल के चिरसम्मत शास्त्रीय कालीन ज्ञान की रक्षा क रहे थे वरन् उसकी उत्तरोत्तर वृद्धि के लिए भी प्रयत्न कर रहे थे।

        पूर्ववर्ती अन्धकार युग में भूगोल के पथ भ्रष्ट हो जाने का सर्वप्रमुख कारण था, भूगोल पर धर्म का आरोपण। अरब भूगोलवेत्ता भी यद्यपि भूगोल को धर्म के पंजे से पूर्णतः मुक्त तो नहीं कर सके तथापि उन्होंने उसके प्रभाव को कम अवश्य किया। उन्होंने तर्क शक्ति के आधार पर धर्म को भूगोल में स्थान दिया। धर्म के प्रभाव के कारण उनके कार्य पूर्णतः तो वैज्ञानिक नहीं थे, परन्तु काफी हद तक वैज्ञानिक थे।

       अरबी भूगोलवेत्ताओं द्वारा भूगोल में यह महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए उनको प्रेरित करने वाले कारकों में अरब साम्राज्य की स्थिति व विस्तार, उसकी यूनानी सभ्यता के देशों पर विजय, यातायात मार्गों का विकास, भारत से सम्पर्क, व्यापार में उन्नति व मरुस्थलीय वातावरण प्रमुख थे। अरब भूगोलवेत्ताओं ने जो योगदान भूगोल के क्षेत्र में किए वे संक्षेप में इस प्रकार हैं :

(1) प्राचीन भौगोलिक ज्ञान की रक्षा:-

            अरब भूगोलवेत्ताओं का कार्य अन्धकार युग के तुरन्त बाद प्रारम्भ होता है। परिणामतः इनको अनेक भ्रामक धारणाओं से भूगोल को मुक्ति दिलानी पड़ी। साथ ही इन्होंने प्राचीन शास्त्रीय कालीन ज्ञान को भी जीवित रखा। अरस्तु, टॉलमी, स्ट्रैबो, आदि भूगोलवेत्ताओं का सतत परिश्रम से अध्ययन किया व उनके ग्रन्थों का अरबी भाषा में अनुवाद किया। अन्वेषण कार्य किए तथा मौलिक ग्रन्थों की रचना की। 776 A. D. में अरब में अब्बासी वंश का साम्राज्य था। उस समय खलीफा का प्रशासनिक कार्यालय दमिश्क (सीरिया) में था जिसे बदलकर बगदाद में ले जाया गया। यहां पर यूनानी व अरब सभ्यताओं का मेल हुआ जिससे भौगोलिक ज्ञान के प्रसार में सहायता मिली। 

अरब भूगोलवेत्ताओं का योग

टॉलमी

(2) गणित में विशेष प्रगति:-

        अरब भूगोलवेताओं ने पृथ्वी के आकार को निश्चित करने के अनेक प्रयास किए थे। मानचित्र बनाने के लिए कुछ प्रक्षेपों की गणनाएं की गई थी।

         बगदाद में गणितीय भूगोल का काफी विकास किया गया था। भू-सर्वेक्षण के लिए पृथ्वी की आकृति (Shape) और आकार (Size) निश्चित करने के लिए मानचित्रों के निर्माण और परिवहन आदि के लिए गणितीय भूगोल का प्रयोग किया जाता था। शीराज (ईरान), काहिरा (मिस्र), टॉलेडो (स्पेन) में खगोलिकी तथा गणित के उच्च अध्ययन किए गए थे।

        अल-खालिजामी, अल हबीब, इब्ने यूनुस, अब्दुल रहमान, अल अजीज, आदि भूगोलवेत्ताओं ने गणितीय भूगोल में विशेष योगदान किया। अल इदरीसी ने पृथ्वी की परिधि 22,900 मील मानी थी। उसने पृथ्वी की जलवायु प्रदर्शित करने के लिए 60 मानचित्र बनाए थे।

(3) खगोलिकी में प्रगति:-

           इस काल में खगोलिकी के क्षेत्र में भी विशेष प्रगति हुई । फलक यन्त्र की सहायता से नक्षत्रों की गति, चन्द्रग्रहण व सूर्यग्रहण की दशाओं, पृथ्वी की विषुवतरेखीय स्थितियों तथा सूर्य व चन्द्र की राशियों के सन्दर्भ में खोज कार्य किए गए। खगोलिकी में प्रगति के लिए तीन तथ्य विशेष रूप से उत्तरदायी हैं-

(i) अरब का मरुस्थलीय एवं अर्धमरुस्थलीय वातावरण जहां रात्रि में आकाश स्वच्छ रहता है, जिससे खगोलिकीय वेधों (Astronomical observations) में सहायता मिलती है।

(ii) पूर्ववर्ती कालों में खगोलिकीय यन्त्रों का आविष्कार हो चुका था। यूनान व रोम से भी इस सम्बन्ध में काफी ज्ञान प्राप्त हुआ था।

(iii) अरबी भूगोलवेत्ताओं के भारत से अच्छे सम्बन्ध थे, भारत में इस क्षेत्र में पर्याप्त विकास हो चुका था।

        इस क्षेत्र में अल-ममून, अल फर्घानी, अल वतानी व अल खालिजामी आदि भूगोलवेत्ताओं ने विशेष योगदान किया।

(4) अक्षांश व देशान्तर रेखाओं की शुद्ध गणना:-

           टॉलमी के समय की अपेक्षा इस युग में पृथ्वी के अक्षांशों व देशान्तरों की दूरियों को अरब विद्वानों ने अधिक शुद्धता के साथ निश्चित कर दिया था। पूर्ववर्ती अन्धकार युग की प्रवृत्ति के विपरीत मुसलमानों के तीर्थ स्थान मक्का की स्थिति के सन्दर्भ में पृथ्वी के निर्देशकों को शुद्धता के साथ निश्चित करने की प्रेरणा इन विद्वानों को अपने धर्म से मिली, ताकि दूरस्थ क्षेत्रों में निवास करने वाले मुसलमानों की दोपहर की नमाज एक साथ हो सके। मक्के में जब दोपहर के बारह बजते थे तभी सब मुसलमान अपने स्थानीय नमाज पढ़ते थे। इसके अतिरिक्त देश में एक मस्जिद बनाई जाती थी, उनका निर्माण इस प्रकार किया जाता था कि का मूँह मक्का की ओर रहे। इस प्रकार धार्मिक रीति रिवाजों से भी देशान्तरों व दिशाओं का शुद्ध ज्ञान करने में सहायता मिली।

(5) भौगोलिक ग्रन्थों का विकास:-

          मध्य युग में वर्णनात्मक भूगोल का भी प्रचलन हो गया था। भ्रमण कार्य लोगों के लिए रुचिकर हो गया था। यह धार्मिक, व्यापारिक या ज्ञानार्जन के दृष्टिकोण से होता था। यात्रियों ने उस समय पूर्व दिशा में देखे हुए व बिना देखे स्थानों के वर्णन विभिन्न नगरों, मार्गों, बीच की दूरियों, उत्पादन, व्यापार, समाज व्यवस्था आदि के परिप्रेक्ष्य में किए।

          वर्णनात्मक भूगोल पर खलीफाओं के संरक्षण में जो ग्रन्थ लिखे गए उनमें अरब साम्राज्य, भारत, मध्य एशिया व अरब के प्रादेशिक वर्णन बहुत श्रेष्ठ थे। सर्वाधिक संख्या में ग्रन्थ अल इदरीसी ने लिखे, जो वैज्ञानिक ढंग से की गई सविस्तार प्रादेशिक व्याख्या के लिए प्रशंसनीय हैं।

(6) भौगोलिक शिक्षा के केन्द्र:-

       अरब साम्राज्य में भौगोलिक ज्ञान को विकसित करने के लिए सात केन्द्र थे- येरूसलम, काहिरा, टॉलेडो, कुस्तुनतुनिया, दमिश्क, शीराज। हारू-अल रशीद ने बगदाद में एक संस्था की स्थापना की जिसमें भाषा विशेषज्ञों द्वारा यूनानी, रोमन व भारतीय ग्रन्थों के अनुवाद होते थे।

(7) मानचित्र कला:-

          पूर्ववर्ती अन्धकार युग में ईसाई धर्म के प्रभाव से मानचित्रों का वास्तविक परिचय ही समाप्त हो गया था। अरबी भूगोलवेत्ताओं ने उन्हें पुनर्स्थापित किया। उन्होंने टॉलमी व स्ट्रैबो,आदि भूगोलवेत्ताओं के मानचित्रों को संशोधित रूप में प्रस्तुत किया। ये मानचित्र पूर्ववर्ती मानचित्रों से अधिक शुद्ध, परन्तु वास्तविकता से दूर थे, परन्तु ये सजावटी मानचित्र उच्चकोटि के थे।

          इस काल में विभिन्न मानचित्र प्रक्षेपों का निर्माण किया गया। स्कूलों में भूगोल पढ़ाने के लिए मानचित्रावलियों का निर्माण किया गया। इदरीसी इस काल का प्रमुख मानचित्रकार था। उसने अपने मानचित्रों को सजावट तो उच्चकोटि की प्रदान की थी, परन्तु उसमें तथ्यों का अभाव था।

(8) अनुवाद कार्य:-

         इस विधा पर सर्वप्रथम अरबी भूगोलवेत्ताओं ने ही कार्य किया। इस कार्य से ही उन्होंने प्राचीन भौगोलिक ज्ञान की रक्षा की। अनुवाद कार्य का प्रमुख केन्द्र बगदाद था। सर्वप्रथम अल-बातरीक (Al-Batriq) ने ट्रॉलमी के अल्मागेस्ट का अनुवाद अबी भाषा में किया। उसने ही गैलेव हिप्पोक्रेट्स के ग्रन्थों का भी अनुवाद किया। अरस्तु व स्ट्रैबो के ग्रंथों का अनुवाद किया गया।

(9) भौगोलिक शब्द-कोश:-

            भौगोलिक शब्द-कोश का निर्माण करके अरब भूगोलवेत्ताओं ने भौगोलिक ज्ञान के समृद्ध होने का परिचय था। महत्वपूर्ण शब्दकोश का निर्माण इब्नयाकूत ने किया। इब्न फिदा ने सामान्य ज्ञान कोश का निर्माण किया। अलबरूनी, इब्ने-सिना, जकाउट (Jakout) व अल-बाकरी ने भी इस क्षेत्र में सराहनीय योगदान दिया।

निष्कर्ष: 

      इस प्रकार स्पष्ट है कि अरब भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यद्यपि उनके कार्य वैज्ञानिक दृष्टि से अधिक शुद्ध नहीं थे, तथापि उनमें सत्यता का पुट था। उनके कार्य इसलिए और भी अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनका काल अन्धकार युग के तुरन्त बाद प्रारम्भ होता है। भूगोल पर अन्धका का पर्दा उठाकर उसको सही दिशा प्रदान करना ही इन भूगोलवेत्ताओं का सबसे बड़ा कार्य है।

18. प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास (Development of Geographical ideas in Ancient India)

18. प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास


प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास

             प्राचीन भारत की कई हजार वर्ष ईसा पूर्व की संस्कृति व नगरीय निर्माण कला के अवशेष देखकर आज विकसित पाश्चात्य देशों के महान विद्वान भी असमंजस की स्थिति में आ जाते हैं। पुरातनकालीन भारतीय भौगोलिक ज्ञान का विवरण विभिन्न स्थलों की खुदाई से प्राप्त सामग्री तथा तत्कालीन विभिन्न ग्रन्थों से प्राप्त होता है।

         प्राचीनकालीन भारतीय भौगोलिक ज्ञान को संक्षेप में निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है:-

(1) सौरमण्डलीय ज्ञान:-

          प्राचीन काल में ही ब्रह्माण्ड विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने पर्याप्त उन्नति कर ली थी। सूर्य, चन्द्र व पृथ्वी के सम्बन्धों, ऋतु परिवर्तनों, दिवस-रात्रि, उषः, मध्याह्न अपरान्ह, आदि के प्रसंग ऋग्वेद, यजुर्वेद व अथर्ववेद में, बहुत से मन्त्रों में आते है। पृथ्वी, अन्तरिक्ष के वर्णन तथा मृगशिरा, कृत्तिका, चित्रा, रेवती आदि सत्ताईस नक्षत्रों के वेदों व ब्रह्माण्ड ग्रन्थों में पढ़े जा सकते हैं। विषुव दिवस (Equatorial Day) का उल्लेख वेदों में अनेक स्थानों पर है। सौर वर्ष (Solar Year), सौर मास (Solar Month), आदि की गणनाओ, सत्ताइस नक्षत्रों की चालों और सूर्य नक्षत्रों की गणनाओं के आधार पर वैदिक ज्योतिष का प्रतिपादन किया गया।

        ईसा की पांचवीं सदी से सातवीं सदी तक भारतीय विद्वानों ने खगोलीय भूगोल (Astronomical Geography) में बहुत उन्नति की। इसी काल में आर्यभट्ट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, आदि विख्यात गणितज्ञ थे। इनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों में ‘सूर्य सिद्धान्त’ प्रमुख है।

प्राचीन भारत में भौगोलिक

आर्यभट्ट

            प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में पृथ्वी की उत्पत्ति पर भी प्रकाश डाला गया है। ऋग्वेद के मन्त्रों से अनुमान लगाया गया है कि आर्यों ने पृथ्वी के पिघले रूप की कल्पना की थी, जिसे आज सभी स्वीकार करते हैं। रामायण-महाभारत में भूचाल तथा ज्वालामुखी के प्रसंग हैं। “जब शक्तिशाली गज थक कर सिर हिलाता है, तब भूचाल आता है।’ यही कारण बताया गया है भूचाल का। महाभारत में ज्वालामुखी पर्वत के उभार की चर्चा है- “पृथ्वी अपने सातों महाद्वीपों के साथ उठ गई, जिसके साथ पर्वत, नदियां, वन, आदि भी ऊंचे उठ गए।’

        पुराणों में महाद्वीपों व पर्वतों की उत्पत्ति विषयक कल्पनाएं की हैं- ‘पृथ्वी महासागर में एक बृहत् नौका के रूप में तैरती है। ब्रह्मा ने पृथ्वी का समतलन किया व उसे सात द्वीपों में विभक्त किया।’ इससे पृथ्वी के तैरने की वर्तमान संकल्पना (सियाल के बने महाद्वीप सीमा पर तैरते हैं) के समकक्ष विचारधारा का अनुमान होता है। पृथ्वी की आयु की कल्पना भी प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में की गई है। ‘मनुस्मृति’ उल्लेख है कि पृथ्वी अब तक 1,96,91,03,000 वर्ष पूर्ण कर चुकी है। समकालीन विद्वान भी पृथ्वी की आयु करीब दो अरब मानते हैं। रामायण में सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण की भी चर्चा है। इसके कारण राहु-केतु बताए गए हैं। सौरमण्डल के अन्य ग्रहों- मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, आदि की चर्चा भी कई स्थलों पर है।

(2) वायुमण्डलीय ज्ञान:-

          ऋग्वेद के अध्ययन से पता चलता है कि उस समय के आर्यों को वायुमण्डल के सम्बन्ध में अच्छा ज्ञान था। उन्होंने वर्ष को छः ऋतुओं में विभक्त किया था। मन्त्रों में 49 से 63 प्रकार की पवनों की चर्चा है। वाल्मीकि रामायण में बादलों का वर्णन है। इसमें तीन प्रकार के बादल व सात प्रकार की पवन की चर्चा है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में,  विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा का वितरण समझाया गया है जो आज के वितरण के अनुकूल है। कृषि तथा वर्षा का सम्बन्ध स्थापित करते हुए कौटिल्य ने लिखा है- कुछ ऐसे बादल होते हैं जो क्रमशः सात दिन तक वर्षा करते हैं, 80 ऐसे हैं जिनमें कम वर्षा होती है, 60 ऐसे होते हैं जो खेतों को जोतने योग्य बनाते हैं। कौटिल्य ने वर्षा मापक यन्त्र भी तैयार किया था।

(3) जलमण्डलीय ज्ञान:-

            वैदिक मन्त्रों में महासागरों का वर्णन है। सामवेद तथा अथर्ववेद में महासागरों की संख्या 4 बताई गई है, परन्तु अन्य वेदों में इनकी संख्या 7 बताई गई है। सामवेद में महासागरों में जल के उठने का वर्णन मिलता है, जिससे ज्वार-भाटा की कल्पना की जा सकती है। रामायण में कई स्थानों पर ज्वार-भाटा का उल्लेख है, इसका कारण चन्द्रमा बताया गया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मूंगा, मोती की चर्चा है। महासागरों में किन स्थानों पर ये मिलते हैं, इसका भी विस्तृत वर्णन ग्रन्थ में पढ़ा जा सकता है।

(4) स्थलमण्डलीय ज्ञान (सामान्य भौगोलिक वर्णन):-

       प्राचीन काल के स्थलमण्डलीय ज्ञान को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है-

(i) भौतिक भूगोल- भौतिक भूगोल विषयक ज्ञान में पर्वतों, नदियों व वनस्पति का वर्णन मिलता हैं:-

(क) पर्वत- पुराणों के अनुसार संसार की समस्त पर्वत श्रृंखलाएं पामीर (मेरु) के चारों ओर जाती हैं। पर्वतों को पांच प्रकारों में विभक्त किया गया है- मध्य पर्वत (मेरु), विषकम्भ पर्वत (जो मेरु के चतुर्दिक विस्तृत हैं), वर्ष पर्वत (विभिन्न देशों की कुल पर्वत (मुख्य पर्वत श्रृंखलाएं) तथा मर्यादा पर्वत (सीमा पर स्थित पर्वत)।

         भारत के पर्वतों का पुराणों में विस्तृत वर्णन है। इनमें महेन्द्र (पूर्वी घाट), मलय (पश्चिमी घाट का दक्षिणी भाग), सह्य (पश्चिमी घाट का उत्तरी भाग), रिक्ष (मध्य विंध्य), आदि प्रमुख है।

(ख) नदियां- वेदों में नदियों के विस्तृत वर्णन हैं। वेदों व उपनिषदों में अफगानिस्तान, पंजाब व गंगा-यमुना क्षेत्र की नदियों का वर्णन है। पुराणों के अनुसार मेरु (पामीर) के दिशाओं में नदियां प्रवाहित होती हैं। दक्षिण की ओर गंगा, पश्चिम की ओर चक्षु, पूर्व की और सीता व उत्तर की ओर भद्रसोन नदी बहती है। मार्कण्डेय पुराण में भारतीय नदियों का विस्तृत वर्णन है। गंगा की उत्पत्ति का विस्तृत वर्णन है। अन्य नदियों में यमुना, गोदावरी, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी, कृष्णा व ताम्रपर्णी का विशेष वर्णन है।

(ग) वनस्पति- मार्कण्डेय पुराण में विभिन्न प्रकार की वनस्पति का वर्णन मिलता है। तत्कालीन फसलों का भी वर्णन है। शिव पुराण में दुग्ध वृक्ष (रबर) का प्रसंग है।

(ii) मानव भूगोल विषयक ज्ञान-

          ऋग्वेद में पृथ्वी पर पांच प्रकार के लोगों के निवास का वर्णन है। इनमें असुर तथा दास भी सम्मिलित हैं। वाजसनेयि संहिता में चार वर्णों का उल्लेख है: ब्राह्मण्ड, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र। रामायण में अनेक भारतीय आदिम जातियों के वर्णन है। इनमें राक्षस, वानर, निषाद, किन्नर, सावर, गन्धर्व, नाग, असुर, देव, आदि जातियां मुख्य हैं। विदेशी जातियों में शक एवं यवनों को गौर वर्ण की जातियां कहा गया है। राक्षसों का रंग काला व रूप भयानक बताया गया है।

         महाभारत में भी अनेक जातियां, उनके रूप-रंग, विवाह पारिवारिक सम्बन्धों आदि के वर्णन है। मनु के धर्म शास्त्र में आठ प्रकार के विवाह बताए गए हैं: ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, असुर, गन्दर्व, पैशाच व राक्षस। इनमें से छः को सामाजिक समर्थन प्राप्त था। कौटिल्य ने भी विवाह पद्धति व स्त्री-पुनर्विवाह की चर्चा की है।

(iii) सांस्कृतिक भूगोल विषयक ज्ञान-

          प्राचीन समय से ही कृषि भारतीयों का मुख्य व्यवसाय रहा है। अथर्ववेद में वर्णन है कि कृषि में किन सावधानियों की आवश्यकता होती है। ऋग्वेद में खेत जोतने का आदेश दिया गया है। पातञ्जलि के महाभाष्य में फसलें बोने की विधियों, कृषि क्षेत्रों, बीजों व अनाज भण्डारण का वर्णन है। पाणिनि प्रातञ्जलि व मनु ने भूमि का वर्गीकरण भी किया है। बाढ़ से प्रभावित भूमि द्वारा अनुपयोगी भूमि ऊसर, पशुचारण के लिए प्रयुक्त भूमि गोचर व जोतने योग्य भूमि (शील्य) कही गई। पातञ्जलि ने फसलों के प्रादेशिक वितरण का भी वर्णन किया है। सिंचाई के साधनों पर भी प्रकाश डाला गया है। कुएं व तालाब सिंचाई के प्रमुख साधन थे।

           प्राचीन भारत में विभिन्न उद्योग धन्धे भी पर्याप्त विकसित अवस्था में थे। वर्तन, वस्त्र निर्माण, सिक्के, आभूषण आदि सम्बन्धी उद्योगों का वर्णन वेदों में है। भवन निर्माण, काष्ट शिल्प, मृतिका शिल्प, लौह शिल्प भी इस समय अपनी उन्नति की चरम सीमा पर थे। दिल्ली में कुतुबमीनार के समीप स्थापित जंगरहित लौह स्तम्भ, जो कि गुप्त काल में निर्मित बताया जाता है, भारतीय लौह-शिल्पियों की दक्षता का प्रमाण हैं।

         परिवहन मार्ग भी प्राचीन भारत में अच्छी अवस्था में थे। ब्रह्माण्ड पुराण में दस प्रका की सड़कों का वर्णन है: दिशा मार्ग, ग्राम मार्ग, सीमा मार्ग, राज, पथ, शाखा रथ्या, रथोपरथ्या, उपरथ्या, जंघापथ, गृहान्तपथ तथा धृति मार्ग।

          विदेशी व्यापार भी प्राचीन काल से भारतीय विशेषता है। विष्णु पुराण में कम्बोज के घोड़ों तथा मत्स्य पुराण में नेपाल के कम्बलों का उल्लेख है।

        अधिवास सम्बन्धी ज्ञान भी प्राचीन भारतीय साहित्य से प्राप्त होता है। मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की खुदाई से प्राचीन भारतीय नगर नियोजन व भवन निर्माण कला का परिचय मिलता है। मानवीय बस्तियों का वर्गीकरण ‘मायामतम’ में किया गया है।

(iv) राजनीतिक व प्रादेशिक भूगोल विषयक ज्ञान-

           वैदिक साहित्य में भारतीय जनपद प्रदेशों के वर्णन हैं। इनमें काशी, कोशल, मगध, पांचाल, विदर्भ, सौराष्ट्र व आन्ध्र प्रमुख थे।

निष्कर्ष:          

         उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्राचीन काल में भारतीय भौगोलिक ज्ञान उच्चकोटि का था परन्तु दुर्भाग्य की बात है कि भौगोलिक विचारधाराओं के विकास के इतिहास में उसे स्थान नहीं दिया गया है।

17. 19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास

17. 19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास


19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास

           वर्तमान समय में भूगोल का जो वैज्ञानिक स्वरूप उभर कर सामने आया है, वह वस्तुतः उन्नीसवीं शताब्दी की ही देन है। यह वह युग था, जिनमें हम्बोल्ट (Humboldt), रिटर (Ritter) व रेटजेल (Ratzel) जैसे महान भूगोलवेत्ताओं ने भौगोलिक तथ्यों को भलीभांति संगठित करके प्रस्तुत किया था। उन्होंने भूगोल को परिभाषित किया व उसकी विषय वस्तु को निर्धारित किया। यद्यपि इसके युग से पूर्व के भूगोलवेत्ताओं के अध्ययन में वैज्ञानिक छाप थी, परन्तु उनमें वैज्ञानिकता कम व दार्शनिकता अधिक थी। इसी युग में वस्तुतः वैज्ञानिक भूगोल की स्थापना हुई। इसका श्रेय जर्मनी के तीन महान भूगोलवेत्ताओं (हम्बोल्ट, रिटर व रेटजेल) को है। इनके द्वारा जो भी ग्रन्थ प्रकाशित किए गए, उनमें अन्वेषण की विधियों, अभिलेखों तथा वर्णनों की सूक्ष्मता देखने को मिलती है। बीसवीं सदी का भूगोल इसी सूक्ष्मता व शुद्धता के आधार पर विकसित हुआ।

         इस युग के भूगोलवेत्ताओं का भूगोल में योगदान संक्षेप में प्रस्तुत है:-

(1) हम्बोल्ट (Alexander Von Humboldt):-

         हम्बोल्ट बहुमुखी प्रतिभाशाली वैज्ञानिक था। भूगोल में उसके योगदान का मूल्यांकन करना कोई हंसी-खेल नहीं। बनस्पति विज्ञान, भू-विज्ञान, भौतिकी, रसायन विज्ञान, शरीर रचना विज्ञान, शरीर क्रिया विज्ञान, इतिहास, भूगोल, आदि क्षेत्रों में हम्बोल्ट का योगदान रहा है। बहुत से विज्ञान इस बात के लिए उसके ऋणी हैं कि उसने उनको नए तथ्य व नई सूझें प्रदान की थीं, परन्तु भूगोल का तो वह एक जन्मदाता था।

      हम्बोल्ट की सबसे प्रसिद्ध रचना कॉसमॉस (Cosmos) है। इसमें सम्पूर्ण विश्व का प्रादेशिक वर्णन विस्तार से किया गया है। इसमें पांच खण्ड हैं। यह ग्रन्थ लिखने में हम्बोल्ट को सत्रह वर्ष का समय लगा था। हम्बोल्ट का दूसरा प्रसिद्ध ग्रन्थ मध्य एशिया (Asia Centrale) है। यह जर्मन भाषा में 1843 में दो खण्डों में प्रकाशित हुआ था।

    हम्बोल्ट ने प्रारम्भ से ही यात्राओं में रुचि प्रदर्शित की थी। उसने प्रथम यात्रा 1799 में प्रारम्भ की थी। वह जहाँ भी जाता था, कुछ यन्त्र प्रेक्षण के लिए अपने साथ-साथ रखता था।

       हम्बोल्ट ने भूगोल मे सात संकल्पनाओं का भी प्रतिपादन किया था। ये संकल्पनाएं थी-

(i) पृथ्वी तल का मानव निवास के रूप में अध्ययन,

(ii) भूगोल संसार में स्थानिक वितरणों का विज्ञान,

(iii) सामान्य भूगोल ही भौतिक भूगोल है,

(iv) भूगोल सम्बन्धों का अध्ययन है,

(v) सांसारिक दृश्य घटनाओं का अध्ययन है,

(vi) प्रकृति की एकता का अध्ययन तथा

(vii) दृश्य घटनाओं की विषमांगता का अध्ययन

        हम्बोल्ट ने भूगोल के अध्ययन के लिए कई विधियाँ अपनाई जैसे- आनुभविक, तुलनात्मक, कार्टोग्राफिक, क्रमबद्ध, आदि।

(2) रिटर (Carl Ritter):-

         रिटर का जन्म 1779 में हुआ था। भूगोल को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने वाले आधार स्तम्भों में रिटर भी एक था।

     रिटर का सर्वप्रमुख ग्रन्थ एर्डकुण्डे (Erdkunde) था। इसके अतिरिक्त ‘यूरोप का भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांख्यिकीय चित्रण’ भी रिटर का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। यह रिटर का प्रथम ग्रन्थ था।

       1828 में रिटर ने भौगोलिक ज्ञान के प्रचार व प्रसार के लिए एक भौगोलिक समिति की स्थापना की थी। वह जीवन पर्यन्त, 31 वर्ष तक इसका अध्यक्ष रहा था।

       रिटर की विचारधारा पर हम्बोल्ट का बहुत प्रभाव था, हम्बोल्ट से रिटर की मुलाकात 1827 में हुई। दोनों ने मिलकर भूगोल के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया।

          रिटर वातावरण निश्चयवाद (Environmental Determinism) का समर्थन करता था। वह पृथ्वी तल के वर्णन मात्र को भूगोल नहीं मानता था। उसका मत था कि इस अध्ययन में मानव की मुख्य भूमिका होनी चाहिए। रिटर प्रकृति की एकता में विश्वास करता था। प्रादेशीकरण की विचारधारा का रिटर ने समर्थन किया था।

          रिटर ने भूगोल के अध्ययन के लिए कई विधियां अपनाई। इनमें अधिकांश हम्बोल्ट की विधियों के समान थीं-आनुभविक, तुलनात्मक व मानचित्रण इसके अतिरिक्त रिटर ने विश्लेषणात्मक व संश्लेषणात्मक विधि भी अपनाई।

(3) रेटजेल (Friedrich Ratzel 1844-1904):-

     उन्नीसवीं सदी के अन्तिम समय में जर्मनी के भौगोलिक क्षेत्र में रेटजेल ने शासन किया। भूगोल में मानव के स्थान को स्थायी बनाने का कार्य रेटजेल ने किया, अतः उसे मानव भूगोल का जन्मदाता (Father of Human Geography) कहा जाता है।

     एन्थ्रोपोज्योग्राफी (Anthropogeographic) रेटजेल की सबसे महत्वपूर्ण रचना है। यह ग्रन्थ 1882 में प्रकाशित हुआ था। इस ग्रन्थ से ही वस्तुतः मानव भूगोल का जन्म हुआ।

रेटजेल ने स्वयं यात्राएं करके आनुभविक विधि से भौगोलिक ज्ञान का एकत्रीकरण किया था। रेटजेल ने ही लिखा है:

“I travelled, I sketched, I described. Thus, I was led to the description of nature.”

       रेटजेल का दूसरा प्रमुख ग्रन्थ ‘राजनीतिक भूगोल’ (Politische geographie) था, यह दो खण्डों में क्रमशः 1897 व 1903 में प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त रेटजेल ने कई अन्य पुस्तकें लिखी। भौमिकी (Geology) मानव जातिशास्त्र (Ethnography), जीव विज्ञान (Biology), भौतिक भूगोल (Physical Geography), आदि पर अनेक लेख लिखे।

         रेटजेल ने मानव व वातावरण के सम्बन्धों का अध्ययन किया था तथा वातावरण निश्चयवाद (Environmental determinism) का प्रतिपादन किया था।

(4) फ्रोबेल (Frobel):-

         फ्रोबेल की विचारधारा हम्बोल्ट व रिटर की विचारधारा से मेल नहीं खाती थी। उसने रिटर की आलोचना की थी तथा उससे ‘तुलनात्मक’ (Comparative) शब्द का स्पष्टीकरण मांगा था, परन्तु रिटर उसे सन्तुष्ट न कर सका था। फ्रोबेल का मत था कि विभिन्न अवयवों की तुलना, जैसे एक पर्वत की दूसरे पर्वत से, एक नदी की दूसरी नदी से की जा सकती है, परन्तु किसी सम्पूर्ण प्रदेश की तुलना दूसरे सम्पूर्ण प्रदेश से करना उचित नहीं है। फ्रोबेल ने भूगोल को परिभाषित किया था :

          “Geography” he claimed, “was a natural science, concerned with the earth’s surface, studied in a systematic way, i. e. taking in form, relief, climate, vegetation, animal and man; attempting throughout to make clear the interrelation of the various factors.”

          इस प्रकार फ्रोबेल ने भूगोल के अध्ययन क्षेत्र को सीमित करके मात्र भौतिक भूगोल बताया।

(5) पेशेल (Oscar Peshcel):-

           पेशेल जर्मनी में भूगोल का प्रथम प्रोफेसर था। वह भौगोलिक पत्र (Das Ausland) का सम्पादक भी था। इसमें विदेशी भूगोलवेत्ताओं के लेख प्रकाशित होते थे। पेशेल ने विभिन्न क्षेत्रों की तुलना की तथा तुलनात्मक भूगोल का विकास किया। पेशेल ने, जिसने भौतिक भूगोल का आधार तैयार किया था, भूगोल में मानव को अधिक महत्व नहीं दिया था।

(6) रिचथोफेन (Ferdinand von Richthofen) (1833-1905):-

         रिचथोफेन मूलतः भौमिकीविद (Geologist) था। वह बोन, बर्लिन व लीपजिंग विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक रहा था। बाद में इन्हीं विश्वविद्यालयों में भूगोल का प्रोफेसर रहा। ‘बर्लिन ज्योग्राफीकल सोसाइटी’ का कई वर्षों तक वह अध्यक्ष रहा था।

19वीं शताब्दी के दौरान भूगो

रिचथोफेन

          रिचथोफेन ने चीन में प्रेक्षण किए थे। चीन पर उसकी ग्रन्थमाला पांच खण्डो में प्रकाशित हुई थी। इसमें प्रथम खण्ड पर ही उसे ‘रॉयल ज्योग्राफिकल सोसाइटी’ का पदक मिला था। उसने चीन की एक एटलस भी प्रकाशित की थी।

          रिचथोफेन की मुख्य देन भौतिक भूगोल के क्षेत्र (भू-आकृति विज्ञान) में है। उसने तुलनात्मक भूगोल की स्थापना की थी।

         भूगोल को रिचथोफेन ने क्षेत्रवर्णी विज्ञान (Chorological Science) बताया था। इसमें पृथ्वी तल पर पाए जाने वाली भिन्नताओं का अध्ययन होता है।

        रिचथोफेन ने प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) और सामान्य भूगोल (General Geography) में अन्तर स्पष्ट किया था। उसने बताया था कि प्रादेशिक भूगोल में किसी तथ्य विशेष के पृथ्वी पर वितण का अध्ययन करते हैं।

24. पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत

24. पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत



पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत

         बाल्टर पेंक प्रमुख भू-आकृतिक जर्मन वैज्ञानिक थे। उन्होंने डेविस के अपरदन चक्र सिद्धांत के आलोचना के क्रम में अपरदन चक्र का वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत किया जो पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत के रूप में जाना जाता है। यह डेविस के सिद्धांत की तुलना में अधिक वैज्ञानिकता पर आधारित है। इसमें भू-आकृतिक प्रक्रम की वैज्ञानिक संकल्पना का उपयोग किया गया है।

      पेंक ने डेविस की तरह ही आर्द्र प्रदेशो में प्रवाहित जल या नदियों को अपरदन का प्रमुख कारक मानते हुए अपरदन चक्र का सिद्धांत दिया। इसके अनुसार किसी भी प्रदेश में उत्थान की प्रकिया प्रारम्भ होने के साथ ही अपरदन के कारक सक्रिय हो जाते है। अपरदन का कार्य तब तक घटित होता रहता है, जब तक आधार तल की प्राप्ति न हो जाए।

     आर्द्र प्रदेशो में मुख्य नदी के साथ ही जब सहायक नदियाँ भी आधार तल को प्राप्त कर लेती है तब एक अपरदन चक्र पूर्ण होता है और अंतिम रूप से लगभग समतलप्राय मैदान (इनड्रम्प) का विकास होता है। यहाँ जल विभाजक के अवशेष इन्सेलबर्ग के रूप में रह जाते है।

       पेंक ने उत्थान व अपरदन की सम्मिलित अवधि को अपेक्षाकृत अधिक लम्बे समय तक घटित होने वाली क्रिया माना जबकि केवल अपरदन के समय को अपेक्षाकृत छोटा माना। पेंक ने निम्न सूत्र का प्रतिपादन किया-

स्थलरुप- उत्थान की प्रावस्था, दर और निम्नीकरण का प्रतिफल होता है।

      इस सूत्र के अनुसार अपरदन की प्रक्रिया विभिन्न प्रावस्था में घटित होती है और प्रत्येक प्रावस्था में उत्थान और अपरदन का विशिष्ट दर होता है। इसी अनुरूप ऊंचाई एवं उच्चावच विषमता में कमी आती है अर्थात निम्नीकरण होता है।

      पेंक ने अपरदन चक्र की पाँच प्रावस्था को बताया। प्रथम तीन प्रावस्था में उत्थान एवं अपरदन दोनों साथ-साथ घटित होते है। अंतिम दो प्रावस्था में केवल अपरदन की क्रिया घटित होती है।

(i) प्रथम प्रावस्था में प्रदेश की ऊंचाई एवं उच्चावच दोनों में वृद्धि हुई है। उंचाई में वृद्धि का कारण उत्थान की दर का अपरदन के दर की तुलना में अधिक होना है, जबकि उच्चावच में वृद्धि का कारण नदियों द्वारा तलीय कटाव की अधिकता है।

(ii) दूसरी प्रावस्था में भी अपरदन की तुलना में उत्थान की दर अधिक होने के कारण ऊंचाई में वृद्धि होती है, लेकिन उच्चावच स्थिर रहता है।

(iii) तीसरी प्रावस्था में उत्थान और अपरदन दोनों के दर समान होते है, अतः ऊंचाई में वृद्धि रुक जाती है जबकि घाटी की उपरी एवं निचले भाग में अपरदन की दर सामान्य होने के कारण उच्चावच स्थिर रहता है।

(iv) चौथी प्रावस्था में उत्थान का प्रभाव समाप्त हो जाने और नदियों द्वारा तलीय कटान के साथ क्षैतिज कटान के प्रभाव से ऊंचाई में कमी आने लगती है, लेकिन घाटी के उपरी और निचले भाग में अपरदन की दर समाप्त होने के कारण उच्चावच स्थिर बना रहता है।

(v) पांचवी अवस्था में क्षैतिज अपरदन की अधिकता, निक्षेपण का प्रभाव तथा तलीय कटान भी लगभग समाप्त हो जाने के कारण ऊंचाई एवं उच्चावच दोनों में कमी आने लगती है। अंततः इन्ड्रम्प जैसी समप्राय मैदान का निर्माण होता है। इसके साथ ही अपरदन का एक चक्र पूर्ण हो जाता है।

पेंक का अपरदन चक्र

           पेंक ने अपरदन चक्र की संकल्पना में ढालों के विकास को पर्याप्त महत्व दिया और ढाल प्रतिस्थापन सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

पेंक का ढाल प्रतिस्थापन सिद्धांत-

       इसके अनुसार अपरदन चक्र की प्रक्रिया में एक ढाल का दूसरे ढाल में प्रतिस्थापन होता रहता है। सर्वप्रथम उत्तल ढाल का निर्माण होता है जिसका प्रतिस्थापन समढाल में और पुनः समढाल का प्रतिस्थापन अवतल ढाल में हो जाता है।
      जब कई अवतल ढाल परस्पर मिलते है तब इंड्रम्प का विकास होता है। इन ढालो के मध्य में भी जल विभाजक इन्सेलबर्ग के रूप में रह जाते है।

निष्कर्ष:

      इस प्रकार स्पष्ट है की पेंक का अपरदन चक्र मॉडल डेविस के अपरदन चक्र मॉडल की तुलना में अधिक वैज्ञानिक अवधारणा पर आधारित है। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत ने भी पेंक के मॉडल को ही वैज्ञानिक माना। इसी कारण पेंक के मॉडल को अधिक मान्यता प्राप्त है।

नोट:

वाल्टर पेंक  के अनुसार:

        अपरदन चक्र में पाँच चरण होते हैं-

1. प्राइमारम्प (Primarampf)

2. आफस्टीजेंडे इंट्वीकलुंग  (Aufteingende entwickelung)

3. ग्लीचफोर्मिंगे इंट्वीकलुंग (Gleichforminge entwickelung )

4. आबस्टीजेंडे इंट्वीकलुंग (Absteigende entwickelung)

5. इंड्रम्प (Endrufmpf)

1. प्राइमारम्प:-

पेंक के अनुसार प्रारंभ में एक विशेषताहीन सतह होती है जिसे पेंक ने “प्राइमारम्प” या “प्राथमिक पेडप्लेन” कहा।

यह भू-आकृति विकास का एक पूर्व चरण है।

इस चरण में भू-आकृतियों के विकास के बिना एक परिदृश्य मौजूद होता है।

इस अवस्था में कोई पहाड़ नहीं।

भू-आकृतियों का ऊपरी वक्र और निचला वक्र समान होता है।

2. आफस्टीजेंड इंट्वीकलुंग :-

भू-आकृतियाँ विकसित होने लगती हैं।

पहाड़ अचानक उठने लगते  हैं।

घाटियाँ गहरी होने लगती है और संकरी घाटियाँ का निर्माण करती हैं।

उच्चावच बढ़ने लगती है और उत्तल तथा मुक्त ढाल का विकास होता हैं।

ऊपरी वक्र और निचले वक्र के बीच की ढाल बढ़ती जाती है।

इस चरण में अंतर्जात बल से कम बहिर्जात बल लगते है।

3. ग्लीचफोर्मिंगे इंट्वीकलुंग :-

        इस चरण में तीन भाग होते हैं।

पहले चरण में उत्थान अपरदन से ज्यादा होता है।

सबसे ऊंची चोटी ऊपरी वक्र में बनती हैं।

दूसरा चरण  में उत्थान और अपरदन लगभग बराबर होते है।

अंतिम चरण में उत्थान की प्रक्रिया कम हो जाती है। धीरे-धीरे घाटी चौड़ा होने लगता है और पर्वत की ऊँचाई भी कम होने लगते हैं।

4. आबस्टीजेंड इंट्वीकलुंग :-

शिखर या ऊपरी वक्र तेजी से मिटता है।

नदी श्रेणीबद्ध (ग्रेडेड) हो जाती है और उत्तल तथा मुक्त ढाल रेक्टिलिनियर ढलानों में परिवर्तित हो जाते है।

इस चरण में शंक्वाकार आकार का इंसेलबर्ग बनता है।

5. इंड्रम्प:-

भू-आकृति का विकास रुक जाता है।

पेडिप्लेन अंत में बनता है।

भू-आकृतियों के ऊपरी भागों में कुछ अपरदन होता है और अपरदित पदार्थ भू-आकृतियों के निचले भाग में जमा हो जाता है।

नोट: 

आफस्टीजेंड इंट्वीकलुंग का अर्थ है- बढ़ती दर से विकास।
ग्लीचफोर्मिंगे इंट्वीकलुंग का अर्थ है- समान दर से विकास।
अबस्टीजेंड इंट्वीकलुंग का अर्थ है- घटती द से विकास।


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23. डेविस और पेंक के अपरदन चक्र सिद्धांत का तुलनात्मक अध्ययन करें।

23. डेविस और पेंक के अपरदन चक्र सिद्धांत का तुलनात्मक अध्ययन करें।


डेविस और पेंक के अपरदन चक्र सिद्धांत का तुलनात्मक अध्ययन

    अमेरिकी भूगोलवेता डेविस की और जर्मन भूगोलवेता बाल्टर पेंक को “आधुनिक स्थलाकृति विज्ञान” का जन्मदाता माना जाता है। 1889 ई० में डेविस ने ‘ज्योग्राफिकल एसेज’ नामक पुस्तक में जबकि बाल्टर पेंक ने 1924 ई० में अनुसंधान प्रपत्र में “मॉरफोलोजिकल एनालिसिस ऑफ लैण्डफॉर्म” नामक शीर्षक से अपरदन चक्र का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इन दोनों के विचारों का तुलनात्मक अध्ययन दो शीर्षकों में बाँटकर करते हैं। जैसे- समानता और असमानता।

समानताएँ

(i) दोनों ने अपना अपरदन चक्र का सिद्धांत आर्द्र प्रदेश के संदर्भ में प्रस्तुत किया।

(2) दोनों के अनुसार अपरदन चक्र के प्रारंभ में अपरदन का कार्य तेजी से और बाद में निक्षेपण का कार्य तेजी से होता है।

(3) दोनों ने अपरदन चक्र की तुलना मानव के जीवन चक्र से किया। जैसे- जिस प्रकार से मानव जीवनचक्र का पाँच अवस्था होता है और पुनर्जन्म के बाद नयी जीवन चक्र प्रारंभ होता है। ठीक उसी तरह एक अपरदन चक्र समाप्त होता है और पुनरुत्थान के बाद दूसरा अपरदन चक्र प्रारंभ होता है।

(4) दोनों विद्वानों ने बताया कि अपरदन चक्र प्रारंभ होने के लिए उत्थान अति आवश्यक है।

(5) दोनों ने बताया कि बहते हुए जल के द्वारा अपरदन का कार्य आधारतल (S.L.) तक होता है।

(6) दोनों वैज्ञानिकों ने यह प्रकट किया कि अपरदन चक्र के अन्त में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है।

असमानताएँ:-

         वास्तव में डेविस एवं पेंक का विचार समानता के लिए नहीं बल्कि असमानता के लिए जानी जाती है। दोनों के विचारों को चार आधार पर अन्तर स्थापित किया जा सकता है-

(1) उत्थान के संदर्भ में

(2) समय के संदर्भ में

(3) ढाल विकास के संदर्भ में

(क) समप्राय मैदान के संदर्भ में

(1) उत्थान के संदर्भ में

          दोनों विद्वानों ने अपरदन चक्र की शुरूआत के लिए उत्थान को अनिवार्य माना है। लेकिन उत्थान की प्रक्रिया और स्थलाकृति पर उसके प्रभाव के संदर्भ में अलग-2 विचार है। जैसे- डेविस ने कहा कि उत्थान के बाद अपरदन होती है, जबकि पेंक के अनुसार उत्थान के साथ-2 अपरदन का कार्य चलता है। डेविस के अनुसार उत्थान में समय बहुत कम लगता है, इसलिए यह कार्य तीव्र गति से सम्पन्न होती है जबकि पेंक के अनुसार उत्थान में समय बहुत अधिक लगता है, इसलिए उत्थान का कार्य मंद गति से होती है। डेविस के अनुसार उत्थान का कार्य एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है जबकि पेंक के अनुसार यह एक अनियमित प्रक्रिया है।

परीक्षण

       डेविस और पेंक के उत्थान के संबंध में व्यक्त किये गए विचारों का अगर परीक्षण किया जाय तो स्पष्ट होता है कि पेंक का विचार अधिक वैज्ञानिक है। होम्स के द्वारा प्रस्तुत संवहन तरंग सिद्धांत और प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत पेंक के विचारों को समर्थन करते हैं।

      डेविस और पेंक ने उत्थान और अपरदन के संदर्भ में जो मॉडल प्रस्तुत किया है उसमें भी स्पष्ट रूप से अन्तर दिखाई देता है।

डेविस और पेंक

नोट:

⇒ युवावस्था- केवल अपरदन का कार्य होता है।

⇒ प्रौढावस्था- अपरदन + निक्षेपण दोनों का कार्य होता है।

⇒ वृद्धावस्था- केवल निक्षेपण का कार्य होता है।

(2) समय के संदर्भ में:-

       दोनों विद्वानों ने अपना अपरदन चक्र का सिद्धांत समय के संदर्भ में प्रस्तुत किया है। लेकिन डेविस ने अपरदन चक्र तीन अवस्थाओं में और पेंक पाँच दशाओं (Phases) में वर्गीकृत किया है।

       डेविस ने बताया कि अपरदन चक्र के दौरान स्थलाकृतियों के निर्माण में 5 अपरदन दूत (नदी, शुष्क पवन, हिमानी, समुद्री तरंग, भूमिगत जल) का प्रभाव पड़ता है। जबकि पेंक के अनुसार अपरदन चक्र बाह्य अपरदन दूत के अतिरिक्त आन्तरिक कारक के सहभागिता से संचालित होती है।

          डेविस के अनुसार युवास्था में तलीय अपरदन अधिक होती है, जिसके कारण उच्चावच में तेजी से वृद्धि होती है। जलविभाजक रेखा चौड़ा होता है। प्रौढ़ावस्था में क्षैतिज अपरदन अधिक होती है। जिससे V-आकार की घाटी विकसित होती है। जलविभाजक की चौड़ाई कम होने लगती है। फलतः उच्चावच में भी कमी आने लगती है। वृद्धावस्था में अपरदन का कार्य समाप्त हो जाता है जिसके कारण इस अवस्था में केवल निक्षेपण का कार्य होता है। उच्चावच और जल-विभाजक अति न्यून रह जाती है। पेंक के अनुसार स्थलाकृतियों का विकास 5 दशाओं में सम्पन्न होता है। प्रत्येक दशा के विशेषताओं का उल्लेख नीचे के तालिका में किया गया है-

दशा/अवस्था उत्थान सापेक्षिक ऊँचाई उच्चावच
प्रथम सक्रिय वृद्धि वृद्धि
द्वितीय सक्रिय ह्रास स्थिर
तृतीय सक्रिय स्थिर स्थिर
चतुर्थ स्थिर या समाप्त स्थिर स्थिर
पंचम निष्क्रिय तीव्र ह्रास  ह्रास

        उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि समय के संदर्भ में दोनों के विचार में कई मौलिक अन्तर हैं।

(3) ढाल के संदर्भ में:-

         डेविस का सिद्धांत ढाल ह्रास का सिद्धांत कहलाता है जबकि पेंक का सिद्धांत ढाल प्रतिस्थापना का सिद्धांत कहलाता है। डेविस ने बताया कि उत्थान के बाद ढाल अति तीव्र होती है जिसके कारण I-आकार की घाटी विकसित होती है। उसके बाद नदी घाटी के दीवारों का क्रमिक ह्रास होता है।

        प्रौढ़ावस्था में क्षैतिज अपरदन के कारण नदी घाटी के दीवारों का तेजी से कटाव होता है जिसके कारण ढाल में पुनः कमी आती है और V- आकार की घाटी विकसित होती है। वृद्धावस्था में क्षैतिज अपरदन और अधिक हो जाने पर  खुली V- आकार की घाटी विकसित होती है जिसके कारण जल-विभाजक रेखा उत्तल ढाल के समान और नदी घाटी अवतल ढाल के समान दिखाई पड़ती है।

       पेंक के अनुसार ढाल प्रतिस्थापन होता है न कि क्रमिक ह्रास होता है। उन्होंने बताया कि अपरदन चक्र के दौरान तीन प्रकार के ढाल विकसित होते हैं-

(i) उत्तल ढाल- इसे उन्होंने आफस्टीजेंड इन्टवकलुंग से संबोधित किया।

(ii) समढाल- इसे उन्होंने ग्लीचफोर्मिंग इन्टवकलुंग से सम्बोधित किया।

(iii) अवतल ढाल- इसे उन्होंने अबस्टीजेंड इन्टवकलुंग से सम्बोधित किया।

         उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि ढाल के संदर्भ में व्यक्त किये गये विचार में सबसे ज्यादा वैज्ञानिक पेंक का विचार है।

नोट :

आफस्टीजेंड इन्टवकलुंग का अर्थ है- बढ़ती दर से विकास।
ग्लीचफोर्मिंगे इन्टवकलुंग का अर्थ है- समान दर से विकास।
अबस्टीजेंड इन्टवकलुंग का अर्थ है- घटती द से विकास।

(4) समप्राय मैदान के संदर्भ में:-

           दोनों ने अपरदन चक्र के अन्त में लगभग समतल मैदान विकसित होने की संकल्पना प्रस्तुत की है। इसे डेविस ने समप्राय मैदान से सम्बोधित किया है। जबकि पेंक ने लगभग समतल मैदान को Endrumpf (इन्ड्रम्प) और Primarumpf (प्राइमारम्प) से सम्बोधित किया है। पेंक ने बताया कि एक अपरदन चक्र के अन्त में विकसित होने वाला लगभग समतल मैदान (Endrumpf) कहलाता है। लेकिन जब दूसरा अपरदन चक्र प्रारम्भ होता है तो अपरदन चक्र के पूर्व विकसित समतल मैदान को Primarumpf (प्राइमारम्प) कहते हैं। 

          डेविस ने बताया कि समप्राय मैदान में कहीं-कहीं कठोर चट्टानें दिखाई देती हैं, उसे मोनाडनॉक कहा जाना चाहिए। जबकि पेंक ऐसे कठोर चट्टानों को इन्सेलवर्ग से सम्बोधित किया है।

निष्कर्ष:

       उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि कुछ समानताओं के बावजूद उनके चिन्तन में कई मौलिक विषमताएँ है। ये विषम‌ताएँ ही आधुनिक भू-आकृतिक विज्ञान के आधार का कार्य किया है।


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22. भूदृश्य संरचना, प्रक्रिया और अवस्था का फलन है। का व्याख्या करें।

“भूदृश्य संरचना, प्रक्रिया और अवस्था का फलन है।” का व्याख्या करें।


“भूदृश्य संरचना, प्रक्रिया और अवस्था का फलन है।”

           अमेरिकी भूगोलवेता डेविस ने 1889 ई० में “अपरदन चक्र का सिद्धांत” प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने भूदृश्य को संरचना, प्रक्रिया और अवस्था का फलन या परिणाम बताया।

        उपरोक्त कथन में प्रयुक्त भूदृश्य का तात्पर्य ऐसे भौगोलिक प्रदेश से है जिसमें विभिन्न प्रकार के स्थलाकृतियों का समूह पाया जाता है। विभिन्न प्रकार के स्थलाकृतियों की समूह आपस में मिलकर विशिष्ट भूदृश्य का निर्माण करते हैं। जैसे- गंगा का मैदान एक विशिष्ट भूदृश्य है। जिसमें गोखुर झील, प्राकृतिक बाँध, नदी विसर्प, बाढ़ का मैदान, टाल, चौर, जल्ला जैसे स्थलाकृति मिलते है।

        इस कथन में उन्होंने बताया है कि भूदृश्य पर संरचना, प्रक्रम और अवस्था का प्रभाव पड़ता है। इन प्रभावों को नीचे के शीर्षकों में देखा जा सकता है:-

(1) भूदृश्य के विकास में संरचना का प्रभाव:-

           डेविस ने बताया कि संरचना का तात्पर्य किसी भी भौगोलिक क्षेत्र के भूगर्भिक काल, भूगर्भिक विकास, भूगर्भिक ढाल, चट्टानों की व्यवस्था और चट्टानों की कठोरता से है।

         डेविस ने यह भी बताया कि कहीं भी अपरदन चक्र की शुरुआत भूगर्भिक उत्थान के बाद ही होता है। इससे अपने-आप स्पष्ट होता है कि भूदृश्य के विकास के लिए भूगर्भिक विकास आवश्यक है। पेंक महोदय ने बताया था कि उत्थान के साथ-2 अपरदन की क्रिया चलती है जिसके कारण अनेक स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

        भूदृश्य के विकास पर भूगर्भिक आयु या चट्टानों की आयु का भी प्रभाव पड़ता है। जैसे- अधिक आयु के कारण चट्टानें मृत हो जाती हैं जिनका अपरदन आसानी से संभव है। दूसरी ओर कम उम्र की चट्टानें, सुदृढ़ और संगठित रहती है। फलत: उनका अपरदन तेजी से संभव नहीं हो पाता है। जैसे- भारत का अरावली पर्वत धारवाड़ युग का बना हुआ है। जबकि दक्कन का पठार क्रिटेशियस युग का बना हुआ है। अधिक समय बीत जाने के कारण अरावली अवशिष्ट पर्वत में बदल चुका है। जबकि दक्कन के पठार पर अभी भी कठोर चट्टानें भूगर्भ में पाये जाते हैं।

       भूदृश्य के विकास पर भूगर्भिक ढाल का भी प्रभाव पड़ता है। जैसे- तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों के नदियों में I-आकार की घाटी, गॉर्ज, दर्रा, उच्छलिका (क्षिप्रिका), जलप्रपात इत्यादि का निर्माण होता है। जबकि मंद ढाल वाले क्षेत्रों में नदी दोआब, बाढ़ का मैदान, प्राकृतिक बाँध, विसर्प, डेल्टा इत्यादि का निर्माण होता है।

         भूदृश्य के विकास पर चट्टानों की व्यवस्था का भी प्रभाव पड़ता है। जैसे-मरुस्थलीय क्षेत्रों में अगर कठोर एवं मुलायम चट्टानें वैकल्पिक एवं लम्बवत रूप से अवस्थित हो तो यारदांग और क्षैतिज स्थित हो तो ज्यूगेन नामक स्थलाकृति का निर्माण करते हैं।

       भूदृश्य के व्यवस्था पर चट्टानों की कठोरता का भी प्रभाव पड़ता है। जैसे- चुना प्रधान वाले क्षेत्रों में चट्टानें जल में घुलनशील होती है। जिसके कारण घोल रन्ध्र, विलयन रन्ध्र, युवाला, पोल्जे, पोनोर स्थलाकृतियों का निर्माण होता है। इसी तरह जिन क्षेत्रों में बलुआ पत्थर, ग्रेनाइट, बैसाल्ट जैसे कठोर चट्टानें मिलती है, वहाँ पर अपरदन का कार्य नगण्य होता है। फलत: सपाट या उबड़-खाबड़ भूदृश्य का विकास होता है।

          इस तरह स्पष्ट है कि भूदृश्य के निर्माण पर संरचना का जबड़दस्त प्रभाव पड़ता है।

(2) भूदृश्य पर प्रक्रम का प्रभाव:-

        डेविस महोदय ने बताया कि प्रक्रम का तात्पर्य स्थलाकृति निर्माण करने वाले कारकों से है। डेविस ने कहा कि स्थलाकृतिक के निर्माण में अपरदन के पाँचों दूत जैसे बहता हुआ जल, हिमानी, शुष्क वायु, समुद्री तरंग और भूमिगत जल का प्रमुख योगदान है। लेकिन पेंक के अनुसार स्थलाकृति निर्माण में बाह्य कारकों के साथ-2 आन्तरिक कारकों का योगदान होता है। जैसे- आन्तरिक भूसंचलन के कारण धरातल में विषमताएँ उत्पन्न होती हैं। जैसे- उत्थान की क्रिया से विषम ढाल का निर्माण होता है। और बाह्य क्रिया (पाँचों अपरदन के दूत) सक्रिय होकर नई-2 स्थलाकृतियों का निर्माण करते हैं। स्पष्ट है कि प्रक्रम के तहत आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार के क्रियाओं को शामिल करते हैं। बाह्य कारक के द्वारा अपरदन एवं निक्षेपण दोनों कार्य सम्पन्न किये जाते हैं। किसी भी अपरदन दूत की अपरदनात्मक क्षमता मौजूद धूणकण, जल की मात्रा, गति, ढाल की तीव्रता इत्यादि पर निर्भर करती है।

           डेविस ने बताया कि आन्तरिक भूसंचलन के कारण पहले उत्थान होता है उसके बाद अपरदन की क्रिया आरंभ होती है। जबकि पेंक ने कहा कि उत्थान एवं अपरदन की क्रिया साथ-साथ चलती है। अपरदन के पाँचों दूत निम्नलिखित स्थलाकृतियों को जन्म देते हैं-

अपरदन के दूत प्रभावित क्षेत्र अपरदनात्मक स्थलाकृति  निक्षेपात्मक स्थलाकृति 
(i) बहता हुआ जल  आर्द्र प्रदेश I एवं V आकार की घाटी, जलप्रपात, गॉर्ज, कैनिय, क्षिप्रिका, मोनाडनॉक, समप्राय मैदान डेल्टा, प्राकृतिक बांध, बाढ़ का मैदान
(ii) शुष्क जलवायु मरुस्थलीय प्रदेश  गारा, यारदांग, ज्यूगेन लोएस, बालुका स्तूप 
(iii) हिमानी पर्वतीय चोटी  एवं ढाल, ध्रुवीय प्रदेश  U-आकार की घाटी, लटकती घाटी, सर्क, रॉक बेसिन ड्रमलिन, एस्कर, टील मैदान
(iv) समुद्री तरंग तटीय प्रदेश  समुद्री क्लिफ, समुद्री मेहराव स्पीट, टोम्बोलो
(v) भूमिगत जल कार्स्ट प्रदेश घोलरंध्र, युवाला, पोल्जे, डोलाइन स्टैलेक्टाइट, स्टैलेग्माइट, कन्दरा स्तम्भ

           उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूदृश्य के निर्माण में प्रक्रम का भी प्रभाव पड़ता है।

प्रक्रम

गॉर्ज या कैनियन

भूदृश्य संरचना

V-आकार की घाटी

(3) भूदृश्य के निर्माण में अवस्था का प्रभाव:-

          यहाँ पर अवस्था का तात्पर्य समय से है। डेविस के अनुसार अपरदन चक्र के दौरान स्थलाकृतियों का विकास तीन अवस्था में होता है- (i) युवावस्था, (ii) प्रौढ़ावस्या और (iii) वृद्धावस्था।

        सामान्य रूप से युवावस्था में अपरदन, प्रौढ़ावस्था में अपरदन एवं विक्षेपण और वृद्धावस्था में केवल निक्षेपण का कार्य होता है। डेविस के अनुसार इन अवस्थाओं की सीमा निर्धारित नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह चट्टानों की आयु, धरातल के ढाल एवं ऊँचाई, अपरदन के दूतों की क्षमता इत्यादि पर निर्भर करती है। अतः अवस्था की पहचान समय के आधार पर नहीं बल्कि स्थलाकृति के आधार पर किया जाता है। जैसे-

अवस्था विशेषता एवं स्थलाकृति
(i) युवावस्था

I-आकार की घाटी, बंद V-आकार की घाटी, गॉर्ज, कैनियन, क्षिप्रिका, जलप्रपात, सरिता अपहरण, बेमेल विसर्प (Misfit or Unfit Meander), जल विभाजक चौड़ा, तलीय अपरदन अधिक, उच्चावच अधिकतम।

(ii) प्रौढ़ावस्था

गोखुर झील, विसर्प, क्षैतिज अपरदन, अपरदन एवं निक्षेपण का कार्य साथ-2।

(iii) वृद्धावस्था मोनाडनॉक, समप्राय मैदान, खुली V-आकार की घाटी, उच्चावच न्यूनतम, जलविभाजक सबसे कम, केवल निक्षेपण का कार्य।

निष्कर्ष

        उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूदृश्य के विकास पर अवस्था का भी प्रभाव पड़ता है। डेविस महोदय ने उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ठीक ही कहा था कि “भूदृश्य संरचना, प्रक्रम और अवस्था का फलन होता है।”

नोट: 

चौर- नदी का पुराना मार्ग,

जल्ला- जहाँ सालोभर पानी रहता है


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21. बहुचक्रीय स्थलाकृति

21. बहुचक्रीय स्थलाकृति

(Poly or Multi Cycle Topography)



बहुचक्रीय स्थलाकृति

     बहुचक्रीय स्थलाकृति को पुनर्युवनित भूआकृति या नवोन्मेष के नाम से जानते हैं। इस शब्द का प्रथम प्रयोग डेविस महोदय ने किया था। प्रारंभ में उन्होंने एक चक्रीय अपरदन चक्र का सिद्धांत प्रस्तुत किया। लेकिन जब इनकी आलोचना होने लगी तो बहुचक्रीय अपरदन चक्र का सिद्धांत प्रस्तुत किया। डेविस ने बताया कि एक चक्रीय अपरदन चक्र वहीं पर चल सकता है। जहाँ पर:-

(i) समुद्र तल या आधारतल में लम्बी समय तक परिवर्तन नहीं हो रहा हो।

(ii) भूसंचलन की क्रिया नहीं हो रहा हो।

(iii) जलवायु के दशाओं में परिवर्तन नहीं हो रहा हो।

        तीनों ही कारकों का लम्बे समय तक स्थिर रहना असंभव है। वस्तुतः भूसंचलन या जलवायु परिवर्तन आने से आधारतल में परिवर्तन होने से पूर्व से चले आ रहे अपरदन चक्र की क्रिया बाधित होती है और नवीन अपरदन चक्र की क्रिया प्रारंभ होती है। नवीन अपरदन चक्र से निर्मित स्थलाकृति साथ-साथ में मिलने लगती है। इसलिए इसे बहुचक्रीय स्थलाकृति कहते हैं। छोटानागपुर का पठार, मेघालय का पठार, स्कैन्डिनेविया का पठार और अपलेशियन क्षेत्र में बहुचक्रीय स्थलाकृति का प्रमाण मिलता है।

         आधारतल में परिवर्तन लाने वाले कारकों को नवोन्मेष कहते हैं। नवोन्मेष के कारण कोई भी भूखण्ड का पुनरुत्थान होता है जिसे पुनर्युवनित कहते हैं। नवोन्मेष या पुनर्युवनित कारकों से निर्मित स्थलाकृति को नवोन्मेष या पुनर्युवनित स्थलाकृति कहते हैं।

       किसी भी प्रदेश में नवोन्मेष की तीन संभावना है-

(i) आन्तरिक क्रिया के द्वारा नवोन्मेष

(ii) बाह्य क्रिया के द्वारा नवोन्मेष

(ii) स्थैतिक नवोन्मेष

        आन्तरिक क्रिया के अन्तर्गत भूसंचलन को शामिल करते हैं। भूसंचलन के कारण भूखण्डों का पुनरुत्थान हो सकता है। जिससे नवीन अपरदन चक्र प्रारंभ होता है।

आतंरिक बल के कारण नवोन्मेष या गतिक नवोन्मेष

        बाह्य नवोन्मेष में जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों को शामिल करते हैं।

बाह्य क्रिया द्वारा नवोन्मेष या सुस्थैतिक नवोन्मेष

       कभी-2 बिना आधारतल में परिवर्तन के भी अपरदन की गति में परिवर्तन होता है। जैसे- अगर किसी कारणवश बहता हुआ जल में कंकड़-पत्थर, बालू, जैसे जलोढ़ पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है तो तलीय अपरदन एवं क्षैतिज अपरदन में वृद्धि हो जाती है जिसे स्थैतिक नवोन्मेष कहते हैं।

स्थैतिक नवोन्मेष

बहुचक्रीय स्थलाकृति के प्रमाण:-

           किसी भौगोलिक प्रदेश में बहुचक्रीय स्लाथाकृतियों की पहचान 5 प्रकार के स्थलाकृतियों से करते हैं।

(1) निक प्वाइंट

(2) नदी वेदिकाएं (River Terraces)

(3) अध: कर्ति विसर्प (INCISED OR ENTRENCHED MEANDERS)

(4) संगत शिखर

(5) अपरदन सतह

(1) निक प्वाइन्ट

         जब किसी नदी मार्ग का ऊपरी भाग उठ जाय या निचली भाग धँस जाय तो धँसान या उत्थान रेखा के सहारे तीव्र ढाल का विकास होता है। ऐसे तीव्र ढाल वाले रेखा को निक प्वाइन्ट कहते हैं। ऐसे ढाल पर नदी का पानी तेजी से नीचे गिरने लगता है जिससे जलप्रपात का निर्माण होता है।

उत्थान से निर्मित निक प्वाइंट

धंसान से निर्मित निक प्वाइंट

(2) नदी वेदिका

         अगर नदी का अनुप्रस्थ काट लेते हैं तो नदी का किनारा सीढ़ी के समान दिखाई देता है।

जैसे:-

बहुचक्रीय स्थलाकृति

           जब नदी वृद्धावस्था के दौर से गुजरती है तो V-आकार की घाटी का निर्माण करती है। लेकिन जब वृद्धावस्था के दौरान ही पुनरुत्थान की क्रिया होती है तो तलीय अपरदन में वृद्धि से कम खुली हुई V-आकार की घाटी का निर्माण होता है। जिसके कारण घाटी के अन्दर घाटी का निर्माण होता है जिसे नदी वेदिका कहते हैं। जैसे- वोल्गा नदी और दामोदर नदी घाटी में।

(3) अद्य: कर्तिक विसर्प

        अन्तिम प्रौढ़ावस्था में नदी मोड़ लेकर बहती है जिसे विसर्प कहते है। जब पुनरुत्थान की क्रिया होती है तो नदी के मोड़ पर तलीय अपरदन की वृद्धि से मोड़ पर घाटी के अन्दर मोड़ लेती हुई घाटी विकसित होती है। जिसे अध: कर्तिक विसर्प कहते हैं। जैसे- हजारीबाग के पठार पर दामोदर नदी कई अध: कर्तिक विसर्प का निर्माण की है।

(4) संगत शिखर

          अगर किसी भौगोलिक क्षेत्र में सभी पर्वतों की चोटियाँ समान ऊँचाई रखने वाली होती है तो उसे संगत शिखर कहते हैं। संगत शिखर का निर्माण अलग-2 काल में भूपटल के उत्थान एवं धँसान से होता है। दो संगत शिखर वाले पर्वतों के बीच में बहने वाली नदी घाटी संकरी होती है। इसका प्रमाण स्कॉटलैण्ड के स्कैन्डिनेवियन पर्वतीय क्षेत्र में देखा जा सकता है।

(5) अपरदन सतह

        डेविस ने अपरदन चक्र सिद्धांत में बताया कि अपरदन चक्र के अंतिम अवस्था में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है जिसे समप्राय मैदान या अपरदन सतह कहते हैं। जैसे-छोटानागपुर का पठार एक उत्थित समप्राय मैदान का उदाहरण है। इस पठार पर तीन बार हुए उत्थान का प्रमाण मिलता है। जिसके कारण पात का पठार, राँची का पठार, कोडरमा या हजारीबाग का पठार नामक अपरदन सतह का निर्माण हुआ है।

निष्कर्ष

      उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उपरोक्त 5 प्रकार के स्थलाकृतियों द्वारा नवोन्मेष: पुनर्युवनित प्रक्रिया की पहचान की जा सकती है। 

नोट: 

नवोन्मेष / पुनर्युवन:- एक सक्रिय चक्र में बाधा उत्पन्न होने पर स्थलखण्ड पर नये चक्र का प्रारंभ होना नवोन्मेष पुनर्युवन कहलाता है।

बहुचक्रीय स्थलाकृति:- एक से अधिक अपरदन चक्रों द्वारा निर्मित स्थलाकृति को बहुचक्रीय स्थलाकृति कहा जाता है।

    नवोन्मेष तीन प्रकार के होते है:-

(i) गत्यात्मक नवोन्मेष, जैसे- स्थलखण्ड का उत्थान

(ii) सुस्थैतिक नवोन्मेष, जैसे- साग तल का नीचा होना

(iii) स्थैतिक नवोन्मेष, जैसे- नदी के बोझ में कमी, नदी अपहरण, अधिक वर्षा से नदी जल में वृद्धि होना।




उत्तर लिखने का दूसरा तरीका




बहुचक्रीय स्थलाकृति

          जब नवीन अपरदन चक्र और पूर्व  के अपरदन चक्र से निर्मित स्थलाकृति साथ-साथ में मिलने लगती है तो उसे बहुचक्रीय स्थलाकृति कहते है। इसका प्रमाण छोटानागपुर का पठार, मेघालय का पठार, स्कैन्डिनेविया का पठार और अपलेशियन क्षेत्र में मिलता है। बहुचक्रीय अपरदन चक्र का सिद्धांत सर्वप्रथम डेविस महोदय ने दिया था।

           नवोन्मेष या पुनर्युवनित कारकों से निर्मित स्थलाकृति को नवोन्मेष या पुनर्युवनित स्थलाकृति कहते है। इसे बहुचक्रीय स्थलाकृति के नाम से भी जानते है।

नवोन्मेष के प्रकार 

             किसी भी प्रदेश में नवोन्मेष की तीन प्रकार की संभावनाएँ होती है जिसे चित्रों द्वारा समझा जा सकता है-

(1) गतिक नवोन्मेष

(2) सुस्थैतिक नवोन्मेष

(3) स्थैतिक नवोन्मेष

बहुचक्रीय स्थलाकृति के प्रमाण

(1) निक प्वाइंट-

            जिस तीव्र ढाल के सहारे नदी मार्ग का उत्थान या धंसान होता है, उसे निक प्वाइंट कहते है।

(2) नदी वेदिका-

            जब नदी के वृद्धा अवस्था में पुनरुत्थान होता है और इसके बाद घाटी के अन्दर घाटी घाटी का निर्माण होता है, जिसे नदी वेदिका कहते है।

(3) अद्य: कर्तिक विसर्प-

           अंतिम प्रौढावस्था में नदी मोड़ लेकर बहती है इस अवस्था में जब पुनरुत्थान होता है तो नदी विसर्प के अन्दर विसर्प का निर्माण करती है तो उसे अद्य: कर्तिक विसर्प कहते है।

(4) संगत शिखर-

            अगर किसी भौगोलिक क्षेत्र में सभी पर्वतों की चोटियाँ समान ऊँचाई रखने वाली होती है तो उसे सांगत शिखर कहते है।

(5) अपरदन सतह/ उत्थित समप्राय मैदान- 

              डेविस ने अपरदन चक्र सिद्धांत में बताया कि अपरदन चक्र के अन्तिम अवस्था में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है जिसे समप्राय मैदान या अपरदन सतह कहते है।

निष्कर्ष:

          उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उपरोक्त 5 प्रकार के स्थलाकृतियों द्वारा नवोन्मेष या पुनर्युवनित प्रक्रिया की पहचान की जा सकती है।



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20. Peneplain (समप्राय मैदान)

20. समप्राय मैदान (Peneplain)


समप्राय मैदान (Peneplain)⇒

           समप्राय मैदान (Peneplain) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम अमेरिकी भूगोलवेत्ता डेविस ने किया था। उन्होंने बताया कि आर्द्र प्रदेश में बहता हुआ जल अपरदन का प्रमुख दूत होता है। बहता हुआ जल अपरदन चक्र के अन्तिम अवस्था में एक लगभग समतल मैदान का निर्माण करती है जिसे समप्राय मैदान कहते है। इस तरह डेविस ने स्पष्ट किया कि समप्राय मैदान के विकास के लिए भूमि का उत्थान और उस पर अपरदन चक्र का सक्रिय होना आवश्यक है। 

     पेंक के अनुसार अपरदन चक्र के अन्तिम अवस्था में जो समप्राय मैदान विकसित होते हैं उसे इन्ड्रम्प और प्राइमारम्प कहते हैं। इन्ड्रम्प अपादन चक्र की अन्त में बनने वाला समप्राय मैदान है जबकि प्राइमारम्प उत्थान के पूर्व की अवस्था है।

       क्रीकमे महोदय ने समप्राय मैदान को परिभाषित करते हुए कहा यह एक ऐसा मैदान है जिसमें अपरदन एवं निक्षेपण दोनों कार्यों से निर्मित होता है। क्रीकमे ने अपनी संकल्पना सवाना प्रदेश के संदर्भ में प्रस्तुत किया और इन्होंने समप्राय मैदान को पैनप्लेन (Panplain) से सम्बोधित किया।

        L.C. किंग महोदय ने बताया कि समतल मैदान के साथ जब कहीं कठोर चट्टानें मिलती हैं तो वैसे भूभाग को समप्राय मैदान कहते हैं। इनके अनुसार समप्राय मैदान का निर्माण केवल अपरदन से होता है। L.C. किंग ने समप्राय मैदान को पेडीप्लेन (Pediplain) से सम्बोधित किया है। इन्होंने अनी संकल्पना मरुस्थलीय क्षेत्र के संदर्भ में प्रस्तुत किया था।

Peneplainसमप्राय मैदान की विशेषताएँ:-

(1) यह लगभग समतल मैदान होता है।

(2) V- आकार की घाटी अत्यन्त खुली हुई होती है।

(3) उच्चावच अत्यन्त न्यून होता है।

(4) जलविभाजक के स्थान पर कठोर चट्टानें लम्बवत दिखाई देती हैं जिसे डेविस ने मोनैडनॉक और पेंक एवं L.C. किंग ने इन्सेलबर्ग से सम्बोधित किया है।

(5) समप्राय मैदान में बहने वाली मुख नदी अपने आधार तल को प्राप्त कर होती है। जबकि पेंक के अनुसार इन्ड्रम्प सम्प्राय मैदान में मुख नदी और प्राइमारम्प अवस्था में मुख्य नदी के साथ-2 सहायक नदियाँ भी अपने आधारतल को प्राप्त कर लेती है।

समप्राय मैदान के प्रकार:-

          समप्राय मैदान चार प्रकार के होते हैं।

(1) स्थानीय समप्राय मैदान- प्रमाण नहीं

(2) प्रादेशिक समप्राय मैदान- प्रमाण नहीं

(3) उत्थित समप्राय मैदान- छोटानागपुर का पठार, स्कैण्डेनेवियन का पठार

(4) अध्यारोपित समप्राय मैदान- SHEMAN क्षेत्र (USA)

          अंतिम दो समप्राप्त मैदान का प्रमाण मिलता है। लेकिन, प्रथम दो का प्रमाण नहीं मिला है। छोटानागपुर का पठार और स्कैण्डेनेविय‌न पठार उत्थित समप्राय मैदान के उदाहरण है जबकि USA के वायोमिंग राज्य में स्थित SHEMAN क्षेत्र अध्यारोपित समप्राय मैदान का उदाहरण है।

           चूँकि स्थानीय और प्रादेशिक समप्राय मैदान का प्रमाण नहीं मिलता है। इसलिए समप्राय मैदान की संकल्पना की कटु आलोचना की जाती है। स्थलाकृतिक वैज्ञानिकों का कहना है कि यह एक कोरी कल्पना है। लेकिन डेविस महोदय ने कहा कि यदि समुद्रत लम्बी अवधि तक स्थिर हो तो स्थानीय प्रादेशिक समप्राय मैदान भी विकसित होंगें। वर्तमान में समुद्रतल की आयु 5½ हजार वर्ष है। इतने कम समय में समप्राय मैदान का विकास संभव नहीं है।

निष्कर्ष:

     उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद अपदन की प्रवृत्ति यह इशारा करती है कि अपरदन चक्र के अन्तिम अवस्था में लगभग समतल मैदान या समप्राय मैदान का विकास होता है।


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17. The application of G.P.S. (जी.पी.एस. के उपयोग)

The application of G.P.S.

(जी.पी.एस. के उपयोग)


The application of G.P.S.

(जी.पी.एस. के उपयोग)⇒

      विश्व स्थिति प्रणाली एक बहु-उद्देश्यीय प्रणाली है। यह तकनीक आर्थिक रूप से मितव्ययी तथा स्थिति निर्धारण में दुरुस्त है। इसमें अन्य विषय को विचारने की क्षमता है। जी.पी.एस. का उपयोग प्रत्येक मौसम में किसी भी समय निरन्तर रूप से किया जा सकता है। ज्योडेसी (Geodesy), सर्वेक्षण (Surveying), नौसंचालन (Navigation) तथा कई अन्य क्षेत्रों में जी.पी.एस. अपार सम्भावनाओं का पता लगाता है।

            विभिन्न सर्वेक्षण की विधियों का अलग-अलग उद्देश्यों के लिये इसमें प्रयोग किया जाता है। इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह विभिन्न सूचनाओं एवं अनेक प्रकार की जानकारियों को एक प्रणाली में संगठित करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है जिसे संगठित प्रणाली (Integrated System) कहते हैं। जी.पी.एस. की विभिन्न अवलोकन विधियाँ वास्तविक स्थिति (Absolute Positioning), सापेक्षिक स्थिति (Relative Positioning) इत्यादि हैं।

        जी.पी.एस. निर्देशांक प्रणाली एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) दोनों मानचित्रों की सहायता से नौसंचालन सुविधायें प्राप्त की जा सकती हैं। वर्तमान समय में तेजी से भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) एवं सुदूर संवेदनअध्ययनों में जी.पी.एस. साधन के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। विस्तृत गुणात्मक सूचनाओं को एकत्र करने सुदूर संवेदन से प्राप्त आँकड़ों के भू-सत्यापन के लिये जी.पी.एस. रिसीवर का उपयोग अति तेजी से बढ़ रहा है।

         विभिन्न उद्देश्यों के लिये सर्वेक्षण की अलग-अलग विधियाँ प्रयोग की जाती है। अवलोकन विधि के दौरान जी.पी.एस. रिसीवर को स्टेटिक, आभासी-काइनेमेटिक तथा काइनेमेटिक मोड में प्रयोग किया जाता है। इन अलग-अलग मोड के विवरण तथा परिणाम का जी.पी.एस. सर्वेक्षण, भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा सम्पन्न किया गया है जिनको तिन रूप में समझाया जा सकता है-

स्टेटिक मोड (Static Mode):-

          स्टेटिक मोड को स्थिर विधि कहते हैं। इसे सापेक्षिक स्टेटिक मोड भी कहते हैं। इसके अन्तर्गत दो या दो से अधिक स्थानों पर एक साथ निरन्तर 3 से 4 घंटे से अवलोकन किया जाता है तथा आँकड़ों की प्रक्रिया के पश्चात् निर्देशांक ज्ञात किये जाते हैं। भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने देश के विभिन्न भागों में जी.पी.एस. तकनीक से सर्वेक्षण कर ज्योडेटिक नियंत्रण बिन्दुओं को स्थापित किया है। अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान, पंजाब तथा अण्डमान निकोबार द्वीप में नियंत्रण बिन्दु स्थापित किये गये हैं। पुन: IRS-IC उपग्रह को इस तकनीक से जोड़ने के लिये हरियाणा, दिल्ली, उत्तरांचल तथा महाराष्ट्र में भू-नियंत्रण बिन्दुओं को निर्धारित किया गया है।

          अवलोकन से प्राप्त परिणामों को स्टेटिक मोड में लिया गया है तथा परिणाम शुद्ध पाये गये हैं। इन परिणामों की शुद्धता 5PPm या इससे भी ऊपर है। इससे यह भी प्रमाणित होता है कि जी.पी.एस. आर्थिक दृष्टि से भी काफी उपयुक्त है तथा साधाण विधियों से 3 गुना तीव्र है।

The application of G

आभासी काईनेमेटिक मोड (Pseudo Kinematic Mode):-

        आभासी काइनेटिक मोड के अन्तर्गत रौवर रिसीवर का प्रयोग किया जाता है। इसके प्रत्येक स्टेशन पर अवलोकन करने में कम से कम समय 4 से 8 मिनट लगता है। इस क्रिया को लगभग एक घंटे से भी अधिक समय तक लगातार करते रहते हैं।

        ठीक इसके विपरीत एक दूसरा रिसीवर भी किसी अन्य सेवक स्टेशन पर प्रयोग किया जाता है जिसको पूर्व से ही ज्ञात स्टेशन पर निश्चित कर दिया जाता है। फिल्ड स्टेशन में गणनाओं का अवलोकन बार-बार करने से उपग्रह ज्यामिति परिवर्तन स्वरूप को भी ज्ञात किया जा सकता है। इस प्रकार से अनिश्चित अवस्था (Amleiguity) परिणामों का समाधान होता है। आभासी-काइनेमिटिक सर्वेक्षण से पूर्व निश्चित स्टेशन (Fixed Station) से एक आधार रेखा की आवश्यकता होती है जिससे उस क्षेत्र की स्थिति निर्धारण किया जा सके। स्थिर सापेक्षिक मोड से एक घंटे का जी.पी.एस. अवलोकन करना आवश्यक है।

काइनेमेटिक मोड (Kinematic Mode):-

        सर्वेक्षण कार्य में इस विधि का स्वतंत्र रूप से प्रयोग किया जाता है। किसी ज्ञात स्टेशन या आधार स्टेशन पर स्टेशनरी रिसीवर का प्रयोग किया जाता है। घुमाने वाले रिसीवरों द्वारा 4 से अधिक उपग्रहों से निरन्तर सिंगनल लॉक (Signal Lock) होता रहता है। कुछ रिसीवर अवलोकन बिन्दुओं के मध्य घूमते रहते हैं।

            भू-मापन की प्रक्रिया के बाद एकल आवृत्ति (Single Frequency) जी. पी. एस. में एक अवलोकन का उपयोग किया जाता है। X, Y Z प्रणाली के निर्देशांक व अक्षांश, देशान्तर तथा ऊँचाइयों की गणना की जाती है जो किसी भी स्टेशन के स्थिर निर्देशांक होते हैं। अक्षांश तथा देशान्तर को समतल आयताकार प्रणाली में परिवर्तित किया जाता है जो कि ट्रैवर्स मर्केटर प्रक्षेप (Traverse Marcater Projection-TMP) में निर्मित होते हैं।

1. जी. पी. एस. का विश्व व्यापी उपयोग (Global Use of G.P.S)

(i) नौसंचालन (Navigation):-

      सभी के वायुयानों तथा पानी के जहाजों में मार्ग नौसंचालन के लिये जी.पी.एस. का उपयोग किया जा सकता है। इसमें शुद्धता का विशेष महत्व नहीं है। लगभग 100 मी० तक की शुद्धता भी इस प्रयोग को प्रभावित नहीं करती है।

(ii) सर्वेक्षण (Surveying):-

         जी.पी.एस. विश्व स्तरीय उपयोग के ज्योडेसी के लिये एक शक्तिशाली साधन है। पृथ्वी के परिभ्रमण तथा प्लेट विवर्तन जैसे ग्लोबल भू-गतिशील घटनाओं से प्रबोधन के लिये अति दूर आधार रेखा इन्टरफरोमेटरी (Very Long Baselining Interferomatry-VLBI) तथा उपग्रह लेजर रेन्डिंग (Satellite Laser Ranging-SLR) तकनीकियों का उपयोग किया जाता है। जी.पी.एस इन तकनीकियों का स्थान ले रहा है तथा इनको बदलने का भी कार्य कर रहा है। इसका उपयोग भी प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है तथा परम्परागत तकनीक धीरे-धीरे सिमट रही हैं ज्योडेटिक समस्याओं के लिये जी.पी.एस. अति प्रभावशाली समाधान प्रस्तुत करता है।

(iii) समय तथा दूर संचार (Timing and Communication):-

        उपग्रह प्रणाली के एक अन्तर्गत सही समय को दर्शाने वाली घड़ी जी.पी.एस. के विश्व स्तर पर प्रयोग को दर्शाता है। पूरे विश्व में समय को शुद्ध रूप से निर्धारित किया जा सकता है। उच्च शुद्ध समय के कई उपयोग हैं जैसे कि भूकम्प तरंगों का प्रबोधन (Monitoring) तथा अन्य भू-भौतिकीय मापन। किसी ज्ञात स्टेशन पर केवल एक उपग्रह से ही जी. पी. एस. रिसीवर 0.1 माइक्रोसेकंड तक शुद्ध समय को प्रदर्शित करता है। कई अन्य परिष्कृत तकनीकियों के आ जाने से अब मोनोसेकंड के गुना शुद्ध समय को दर्शाया जा सकता है।

2. जी.पी.एस. का क्षेत्रीय उपयोग (Regional Uses of GPS):-

          संसाधनों के प्रबोधन, यातायात प्रबन्धन, संरचनात्मक प्रबोधन तथा कई प्रकार के स्वचलन कार्यों में जी.पी.एस. का उपयोग सफलता पूर्वक किया जा सकता है। नौसंचालन में एस.ए. (SA) का उपयोग किया जा सकता है। यह तकनीक हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण के लिये भी उपयोग हो रही है।

प्रश्न प्रारूप

Q. जी.पी.एस. के उपयोग प प्रकाश डालें।

(Throw light on the application of G.P.S.)



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10. Projection / प्रक्षेप

10. Projection / प्रक्षेप



Projection / प्रक्षेप

             गोलाकार पृथ्वी (Spherical Earth) के किसी भूभाग को समतल सतह पर ज्यामितीय विधियों के द्वारा प्रदर्शित करने की विधि को प्रक्षेप कहते हैं। वृहत मापनी पर बने मानचित्र, यथाआकृतिक प्रक्षे (Orthographic Projection) पर निर्मित होते हैं जबकि प्रायः वायु फोटोचित्र केंद्रीय प्रक्षेप (Central Projection) पर निर्मित होते हैं।

           यथाआकृतिक प्रक्षेप में किसी भी भाग की वही आकृति आती है जो उस क्षेत्र की ग्लोब पर है परन्तु केंद्रीय प्र में ऐसा प्रत्येक भाग में संभव नहीं है। ऊर्ध्वाधर वायु फोटोग्राममिति की आदर्श दशा यह हो सकती है यदि वायु फोटोग्राफी किया जाने वाला धरातल समतल तथा क्षैतिज रूप से समतल हो तो वायु फोटोचित्र ज्यामितीय रूप से वैसे ही होते हैं जैसे कि उस क्षेत्र के मानचित्र परन्तु प्रत्येक भूभाग में ऐसा संभव नहीं है। इसलिए कैमरा अक्ष के झुकाव (Tilt) तथा की धरातल की उच्चावचन विभिन्नताओं के कारण वायु फोटोचित्र ज्यामितीय रूप से उस क्षेत्र के मानचित्रों की तुलना में भिन्न होते हैं।

             वायु फोटोबिम्ब निर्वचन में प्रयोग की जाने वाली ज्यामितीय विधियों के आधार पर वायु फोटोबिम्ब के प्रक्षेपों के निम्न तीन प्रकार हैं-

प्रक्षेपों के प्रकार (Types of Projection)

1. समानान्तर प्रक्षेप (Parallel Projection)

2. लम्बकोणीय प्रक्षेप (Orthographic Projection)

3. प्रक्षेप (Central Projection)

1. समानान्तर प्रक्षेप (Parallel Projection):-

       इस प्रक्षेप में प्रक्षेपित किरणें, समानान्तर होती हैं। निम्न दिये गये उदाहरण में ABC त्रिभुज को LL रेखा पर प्रक्षेपित किया है जिसका प्रक्षेपण त्रिभुज abc है। चित्र से स्पष्ट है कि प्रक्षेपित किरण Aa Bb, Cc एक दूसरे के समानान्तर हैं।

Projection

Geometry of Photograph

2. लम्बकोणीय प्रक्षेप (Orthographic Projection):-

        इस दिशा में त्रिभुज ABC की किरणों को LL रेखा पर प्रक्षेपित किया गया है। (चित्र B) त्रिभुज की सभी किरणें LL रेखा पर समकोण बनाती हैं। यह समानान्तर प्रक्षेप की एक दशा है। एक निश्चित मापक पर बने मानचित्र लम्बकोणीय प्रक्षेप पर होते हैं।

           इस प्रक्षेप का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें दूरियाँ, कोण तथा क्षेत्र सभी किसी लक्ष्य के उच्चावचन अंतरों से स्वतंत्र होते हैं।

3. केंद्रीय प्रक्षेप (Central Projection):-

              उपर के चित्र C में केंद्रीय प्रक्षेप को दर्शाया गया है। इस प्रक्षेप में त्रिभुज ABC की सभी प्रक्षेपित किरणें Aa, Bb तथा Cc एक बिन्दु 0 से गुजरती है जिसको प्रक्षेप केंद्र (Projection Centre) या संदर्श केंद्र (Perspective Centre) कहते हैं। लेंस प्रणाली द्वारा (जिसे O बिन्दु माना गया है) प्रक्षेपित बिम्ब को केंद्रीय प्रक्षेप के रूप में पेश किया गया है। संदर्श केंद्र एवं लक्ष्य (Object) के मध्य का तल (Plane) पोजिटिव तल (Positive Plane) है। लेंस को एक संदर्श केंद्र के रूप में लिया गया है। सामान्यतः वायु कैमरों में दो संदर्श केंद्र होते हैं-

(i) बाह्य (External) संदर्श केंद्र तथा

(ii) आन्तरिक (Internal) संदर्श केंद्र

प्रधान दूरी (Principal Distance)-

         आंतरिक संदर्श केंद्र (Internal Perspective Centre) से फोटो तल की लम्बवत दूरी को प्रधान दूरी कहते हैं। फोटोतल पर लम्बवत दूरी का आधार प्रधान बिन्दु (Principal point) कहलाता है।

फिडूसियल निशान (Fiducial Mark)-

         उत्तम श्रेणी के समायोजित कैमरे द्वारा खींचे गये फोटोचित्रों के चारों किनारों के मध्य या विकर्ण रूप में चारों किनारों पर ‘V’ आकार के निशान लगे होते हैं जिन्हें फिडूसियल निशान (Fiducial Marks) कहते हैं। इनको सूचक चिह्न (Index Mark) भी कहते हैं। इनकी संख्या 4 होती है। ये कैमरे लेंस के साथ स्थाई रूप से कटे रहते हैं जो निगेटिव पर विम्ब बनाते हैं। ये बिम्ब फोटोग्राफ पर अंकित हो जाते हैं। इनके द्वारा प्रधान बिन्दु का निर्धारण किया जाता है।

प्रधान बिन्दु (Principal Point)-

          फोटोचित्र पर चारों फिडूसियल निशानों के प्रतिच्छेदन (Intersection) बिन्दु को प्रधान बिन्दु कहते हैं। इनके द्वारा फोटोचित्र आन्तरिक दिविन्यास (Orientation) आवश्यकता की पूर्ति की जाती है।

साहुल बिन्दु (Plumb Point)-

        संदर्श केंद्र से सीधे नीचे की ओर खड़ी उर्ध्वाधर रेखा जब फोटो तल पर मिलती है तो इस बिन्दु को साहुल बिन्दु कहते हैं।

टिल्ट (झुकाव/Tilt)- टिल्ट का अर्थ है झुकाव। कैमरे के ऑप्टिकल (Optical Axis) तथा साहुल रेखा (Plumb Line) के मध्य जो कोण बनता है उसे झुकाव अथवा झुकाव कोण कहते हैं।

        इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि यह धरातल तल (Ground Plane) तथा फोटो तल (Photo Plane) के मध्य का कोण झुकाव कोण है। इसे निम्न चित्र में समझाया गया है। खड़े रूप में कैमरा अक्ष के विचलन कोण को कोण कहते हैं।

टिल्ट (झुकाव

Tilt

           इस प्रकार झुकाव के दो प्रमुख घटक (Components) है। पहला उड़ान दिशा X अक्ष की तथा दूसरा उड़ान दिशा के खड़े रूप में Y की ओर। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि झुकाव को दो दिशाओं की ओर निर्धारित किया जाता है।

(i) पहला घटक ‘Y’ अक्ष के बारे में है। जब झुकाव उड़ान दिशा (X अक्ष) की ओर है तो इसे अनुदैर्ध्य (Lontigudinal) या ‘X’ झुकाव या अग्र (Fore) या प्रवण (Apt) टिप (Tip) झुकाव कहा जाता है। इसे  Φ(फाई Phi) के द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है।

(ii) दूसरा घटक ‘X’ अक्ष के बारे में है। जब झुकाव ‘Y’ दिशा की ओर खड़े रूप में होता है तो उसे पार्श्विक झुकाव (Lateral Tilt) या ‘Y’ झुकाव या साधारण कहा जाता है। इसे ω (ओमेगा Omega) के द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है।

नादिर बिन्दु (Nadir Point)-

           नीचे के चित्रों में संदर्श विन्दु 0 से एक खड़ी रेखा ON पर बिन्दु ‘n’ पर मिलती है जिसे फोटो अधोबिन्दु (Nadir Point) कहते हैं तथा भूमि पर बिन्दु ‘N’ भूमि अधोबिन्दु (Nadir Point) कहलाता है।

नादिर बिन्दु

Photo Nadir Point

फिडूसियल केंद्र (Fiducial Centre)-

      फोटो तल पर संदर्श बिन्दु (O) से साहुल रेखा का पाद या आधार (p) प्रधान बिन्दु (Principal Point) कहलाता है। इस प्रकार संदर्श बिन्दु (O) तथा प्रधान बिन्दु (p) के मध्य की खड़ी दूरी प्रधान दूरी (Principal Distance) कहलाती है।

प्रधान दूरी (Principal Distance)-

         जैसा कि पहले स्पष्ट किया जा चुका है कि फोटोग्राफ में प्रधान बिन्दु की स्थिति का निर्धारण फिडूसियल चिह्नों के प्रतिच्छेदन बिन्दु से की जाती है। फिडूसियल अक्ष के प्रतिच्छेदन बिन्दु को फिडूसियल केंद्र भी कहते हैं।

फोटो झुकाव के कारण (Reasons for Photo Tilt)

        विभिन्न दिशाओं में झुकाव होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

1. वायुमण्डलीय दशा (Atmoshperic Conditions)

2. पायलेट की गलती के कारण (Human Error of the Pilot)

3. कैमरे की त्रुटि के कारण (Imperfection of Camera)

           टिल्ट अथवा झुकाव के प्रभाव से फोटो बिम्ब विकृत हो जाता है।

दोलन (Swing)-

       दोलन फोटोतल पर मापा जाने वाला एक कोण है जो कि उड़ान दिशा की ओर फिडूशियल अक्ष तथा वास्तविक उड़ान रेखा के मध्य में बनता है। इस कोण को λ(कापा Kappa) द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है।

प्रक्षेप

Swing

समकेंद्र (Isocentre)-

      झुकाव के कोण का अर्द्ध विभाजन फोटो तल के समकेंद्र पर प्रतिच्छेदन करता है जिसे फोटो समकेंद्र (Photo Isocentre) कहते हैं। जब यह अर्द्ध विभाजक भूमि तल पर मिलता है तो इसे भूमि समकेंद्र (Ground Isocentre) कहते हैं। इन बिन्दुओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यदि धरातल समतल होता है तो इन बिन्दुओं पर कोण शुद्ध होते हैं।

प्रश्न प्रारूप

Q. प्रक्षेप से क्या आशय है? इसके प्रकार की विवेचना करें।

(What do you mean Projection? Discuss its types.)



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14. भू-सन्दर्भ / The Geo-Referencing System

14. भू-सन्दर्भ

(The Geo-Referencing System)


भू-सन्दर्भ⇒

          धरातलीय सूचनाओं को नियंत्रित रूप से संचालित करने की नितान्त आवश्यकत होती है जिससे धरातलीय दूरियाँ, बसाव स्थिति एवं दिशा एक-दूसरे से सम्बन्धित रह सके। इसके लिए धरातलीय सन्दर्भ प्रणाली (Geo-Reference System) को स्थापित करने की आवश्यकता होती है। जैसा कि ज्ञात है कि सभी धरातलीय सूचनायें मानचित्रों में दर्शाई जाती हैं। मानचित्र का मुख्य कार्य वास्तविक संसार की आकृतियों को उनकी बसाव स्थिति के अनुरूप दर्शाना होता है। भौगोलिक बसाव स्थिति को ही भू-सन्दर्भित (Geo-Referencing System) प्रणाली कहते हैं। मानचित्र ज्यामितीय विशेषतायें लिए हुये होते हैं।

           सुदूर संवेदन से प्राप्त घरातलीय सूचनाओं के प्रतिविम्ब बिना प्रक्षेपों के होते हैं। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता है कि सुदूर संवेदन से प्राप्त प्रतिविम्बों में मानचित्र जैसी ज्यामितीय विशेषतायें होती हैं। सभी सुदूर संवेदन उत्पादों को धरातलीय बसाव स्थितियों के अनुरूप व्यवस्थित करना अति आवश्यक होता है। भौगोलिक बसाव स्थिति को निर्देशांकों Coordinated) की सहायता से प्रदर्शित किया जाता है।

       “किसी निश्चित निर्देशांक प्रणाली की रूपरेखा के अनुरूप वास्तविक संसार की आकृतियों को दर्शाना भू-सन्दर्भ प्रणाली कहलाती है।”

         दूसरे शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है कि- “अव्यवस्थित सुदूर संवेदन आँकड़ों को भू-धरातलीय (Geo-Spatial) आँकड़ों में परिवर्तन करना ही भू-सन्दर्भ प्रणाली कहलाती है।”

         यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि धरातलीय सन्दर्भ प्रणाली (Spatial Reference System) एवं भौगोलिक सन्दर्भ प्रणाली (Geo-graphical Reference System) दोनों एक ही हैं जिन्हें साधारण रूप से Geo-Referencing कहा जाता है। ये दोनों ही धरातलीय मापन से सम्बन्धित हैं।

भू-सन्दर्भ प्रणाली के उद्देश्य

           सुदूर संवेदन द्वारा ली गई इमेज में किसी पिक्सल की स्थिति तथा उसी पिक्सल तत्व की धरातल पर वास्तविक स्थिति के अनुपातिक सम्बन्ध को स्थापित करना ही भू-सन्दर्भ प्रणाली का प्रमुख उद्देश्य है।

          दूसरे शब्दों में भू-सन्दर्भ का उद्देश्य धरातलीय आकृतियों को उनकी बसाव स्थिति के अनुरूप दर्शाने के लिए एक ऐसी रूप रेखा तैयार की जाती है जिस प्रारूप के अन्तर्गत वास्तविक संसार की आकृतियों का उचित मापन (Measurement), संग्रहण (Recording), परिकलन (Computition), तथा विश्लेषण (Analysis) किया जा सके।

भू-सन्दर्भ की संकल्पना (Concept of Geo-Referencing)

           वास्तव में यदि व्यवहारिक रूप से देखा जाय तो भू-सन्दर्भ एक ऐसी संकल्पना एवं तकनीकि है जो पृथ्वी के गोलाकार असमतल धरातल को समतल मानचित्र पर सफलतापूर्वक मापन कर परिवर्तित करता है। यह निर्देशांक प्रणाली के द्वारा ही सम्भव है। इसके द्वारा आकृतियों का उचित मापन एवं दृश्याँकन अति सुगम हो जाता है।

             यद्यपि मानचित्र भी धरातलीय सूचनाओं का आधार है परन्तु मानचित्र आँकड़ों की अपेक्षा भिन्न सूचनायें रखते है। भू-सन्दर्भ की विशेषताओं के कारण ही यह अन्य सूचना एकत्र करने वाली प्रणालियों से भिन्न है। पृथ्वी की भौतिक आकृति को गणितीय विधियों के द्वारा समतल सतह पर प्रदर्शित करने की संकल्पना का अनुमान ज्योड़ (Geiod) एवं गोलाभ (Ellipsoid) परिभाषा से लगाया जा सकता है जो कि भू-सन्दर्भ प्रणाली की संकल्पना का मूलाधार है।

              प्रायः सुदूर संवेदन आँकड़ों से तैयार की गई इमेज की DN मानों में लिया जाता है। DN मान बिना किसी सूचना या नाम चिप्पी के होते हैं जो धरातल के विभेदन (Resolution) का एक लघु रूप होता है। प्रत्येक DN मान की एक ज्यामितीय स्थिति होती है। ज्यामिमितय सम्बन्ध से अभिप्राय है कि घरातल के बिन्दुओं तथा इमेज बिन्दुओं के मध्य समानुपातिक सम्बन्ध होना। किसी पिक्सल की स्थिति को धरातल की स्थिति में परिवर्तित किया जा सकता है। धरातल की स्थिति को 3D निर्देशांक प्रणाली (3D Co-ordinate system) में या मानचित्र प्रक्षेप में 2D निर्देशांक प्रणाली (2D Co-ordinate System) के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।

          इस प्रकार किसी भी बिम्ब (Image) को भू-सन्दर्भित करने से दो समस्याओं का हल एक साथ निकाला जा सकता है-

(i) जिस आकृति की विम्ब (Image) में पहचान की जानी है उसके मानचित्र के निर्देशांक प्राप्त किये जा सकते हैं।

(ii) सुदूर संवेदन बिम्बों के ज्यामितीय विकारों (Distortions) को तभी शुद्ध किया जा सकता है जब उसके किसी पिक्सल को मानचित्र के निर्देशांकों के अनुरूप ढाल दें। इस प्रकार के निर्देशांक रुपान्तरण को भू-सन्दर्भित (Geo-Referencing) कहा जाता है। सुदूर संवेदन एवं जी.आई.एस. में किसी भी रास्टर आधारित भौगोलिक डाटा प्रक्रिया का यह सबसे पहला कदम होता है, तभी डाटा शुद्ध सन्दर्भित माना जाता है।

भू-सन्दर्भ के उपागम (Approaches of Geo-Referencing)

          रास्टर आधारित आँकड़ों के प्रक्रियन (Process) में निम्न दो प्रमुख उपागमों के द्वारा किसी बिम्ब को भू-सन्दर्भित किया जाता है-

(i) बिम्ब का मानचित्र में शुद्धीकरण (Image to Map Rectification)

(ii) बिम्ब से बिम्ब में पंजीकरण (Image to Image Rectification)

(i) बिम्ब का मानचित्र में शुद्धीकरण-

            किसी बिम्ब को, मानचित्र निर्देशांक प्रणाली में परिवर्तित करने या शुद्ध करने की प्रक्रिया को बिम्ब का मानचित्र में शुद्धीकरण कहलाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि रास्टर बिम्ब में पंक्ति व कॉलम निर्देशांकों को मानचित्र के X व Y निर्देशांकों में रूपान्तरण किया जाता है। बिम्ब को निम्न दो अन्तर सम्बन्धित परिचालन प्रक्रिया के अन्तर्गत शुद्ध किया जाता है-

(a) Spatial Interpolation by Co-ordinate Transformation

(b) Attribute Interpolation by Resampling

(ii) बिम्ब का विम्ब से पंजीकरण-

         इसका अभिप्राय यह है कि शुद्ध किये गये बिम्ब से किसी नये विम्ब को शुद्ध करना है। पूर्व में जो बिम्ब मानचित्र निर्देशांक की सहायता से शुद्ध किया गया है उसकी सहायता से अशुद्ध बिम्ब को शुद्ध की जाने वाली प्रक्रिया बिम्ब में पंजीकरण कहलाता है। जी.आई.एस. में सामान्यतः एक रास्टर बिम्ब से दूसरे रास्टर बिम्ब में पंजीकरण किया जाता है।

भू-सन्दर्भ की प्रक्रिया (Process of Geo-Referencing)

              सुदूर संवेदन एवं जी.आई.एस. में रास्ट डाटा को किसी निश्चित मानचित्र निर्देशांक प्रणाली में भू- सन्दर्भित करना अति आवश्यक होता है। मूलरुप से रास्टर डाटा का भू-सन्दर्भित करना रास्टर सतह (layer) की संकल्पना है। रास्टर बिम्ब को X (Horizental) एवं Y (Vertical) लघु ग्रीड सेलों के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। किसी भी डाटा सेल की स्थिति पंक्ति एवं कॉलम के द्वारा सन्दर्भित होती है। सेल का न्यूनतम आकार मापन की सूक्ष्म इकाई होती है। किसी भी सेल की स्थिति उसकी पंक्ति संख्या एवं कॉलम संख्या से पहचानी जा सकती है। पंक्ति का प्रारम्भ धनात्मक दिशा नीचे की ओर एवं कॉलम दाहिने ओर को इशारा करते हैं

भू-सन्दर्भ

प्रश्न प्रारूप

Q. भू-सन्दर्भ प्रणाली पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Geo-referencing System.)



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