Zenithal Projection
(खमध्य प्रक्षेप)
|
Zenithal Projection (खमध्य प्रक्षेप)⇒
⇒ Zenithal प्रक्षेप में ग्लोब को किसी एक बिन्दु पर समतल कागज स्पर्श करते हुए कल्पना करके भूग्रिड प्रक्षेपित किया जाता है।
⇒ समतल कागज ग्लोब को जिस बिन्दु पर स्पर्श करता है उस बिन्दु को प्रक्षेप केन्द्र (Projection Point) कहते हैं।
⇒ ग्लोब में जिस बिन्दु पर प्रकाश स्थित होता है, उस बिन्दु को नेत्र स्थान या उत्पत्ति बिन्दु कहते हैं।
⇒ Zenithal प्रक्षेप में सभी अक्षांश रेखाएँ संकेन्द्रीय होती है तथा सभी देशान्तर रेखाएँ केन्द्र से निकलने वाली एक सरल रेखा के समान होती है।
⇒ Zenithal प्रक्षेप पर पृथ्वी के केवल आधे भाग को प्रदर्शित किया जा सकता है।
⇒ नेत्र की स्थिति के आधार पर और प्रक्षेपण तल या समतल कागज के स्थिति के आधार पर इस प्रक्षेप को दो भागों में बाँटते हैं।

Zenithal Projection
(1) नेत्र की स्थिति या प्रकाश स्रोत की स्थिति के आधार पर
नेत्र की स्थिति के आधार पर पुन: इस प्रक्षेप को तीन भागों में बाँटते हैं।
(i) Gnomonic Porojection (केन्द्रक या नोमॉनिक प्रक्षेप)
⇒ इसमें प्रकाश का स्रोत ग्लोब के केन्द्र में होता है।
⇒ 60º-90° अक्षांश के बीच के क्षेत्र को प्रदर्शित करने के लिए उपयोगी है।
⇒ अर्थात ध्रुवीय क्षेत्रों जैसे आर्कटिक और अण्टार्कटिका का प्रदर्शन के लिए उपयोगी है।
(ii) Stereographic Porojection (त्रिविम प्रक्षेप)
⇒ Stereographic प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत ग्लोब के परिधि पर स्थित माना जाता है।
⇒ यह एक ऐसा प्रक्षेप है जिनमें एक ही गोलार्द्ध के ध्रुव एवं विषुवत रेखा दोनों को दिखाया जाता है।
⇒ चूँकि इसमें एक ही गोलार्द्ध के ध्रुव एवं विषुवत रेखा का प्रदर्शन साथ-2 होता है। इसलिए इस प्रक्षेप को त्रिविम प्रक्षेप कहते हैं।
⇒ त्रिविम प्रक्षेप किसी भी गोलार्द्ध के फसलों के उत्पादन को प्रदर्शित करने के लिए उपयोगी मानी जाती है।
(iii) Orthographic Porojection (लम्बकोणीय प्रक्षेप)
⇒ लम्बकोणीय प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत अनन्त पर होता है। यह प्रक्षेप गोलीय मानचित्र के लिए तथा आकाश में तारों की स्थिति के प्रदर्शन हेतु उपयुक्त माना जाता है।
(2) प्रक्षेपण तल के स्थिति के आधार पर (Zenithal Projection)
प्रक्षेपण तल के स्थिति के आधार पर Zenithal Projection तीन प्रकार के होते हैं-
(i) Polar Zenithal Projection (ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप)
⇒ Polar Zenithal Projection में समतल कागज ध्रुव को स्पर्श करते हुए रखा जाता है।
⇒ इस प्रक्षेप में ध्रुव को केन्द्र मानकर समान दूरी के अन्तर पर संकेन्द्रीय अक्षांश वृत खीचे जाते हैं।
⇒ यह प्रक्षेप आर्कटिक क्षेत्रों एवं ध्रुवीय क्षेत्रों में नौसंचालन के लिए उपयोगी माना जाता है।
⇒ इसमें ध्रुव को एक बिन्दु के रूप में प्रकट किया जाता है।
⇒ प्रत्येक देशान्तर पर मापनी शुद्ध होता है।
⇒ ध्रुव से विषुवत रेखा की ओर जाने पर अक्षांश पर मापनी अशुद्ध होने लगती है।
⇒ Polar Zenithal Projection समदूरस्थ का गुण होता है।
(ii) Equatorial Zenithal Projection (विषुवतीय खमध्य प्रक्षेप)
⇒ इसमें प्रक्षेपण तल को विषुवत रेखा से स्पर्श करते हुए खींचा जाता है।
⇒ भूमध्यरेखीय क्षेत्र के वायुमार्ग और नौसंचालन से संबंधित मानचित्रों के लिए उपयोग है।
(iii) Oblique Zenithal Projection (तिर्यक खमध्य प्रक्षेप)
⇒ इसमें प्रक्षेपण तल को 60° अक्षांश रेखा से स्पर्श करते हुए रखा जाता है। अर्थात इसमें स्पर्शी बिन्दु विषुवत रेखा एवं ध्रुव के मध्य स्थित माना जाता है।
नोट: लैम्बर्ट महोदय ने ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप में गणितीय विधि से संशोधन कर एक ऐसा प्रक्षेप बनाया जिसमें समक्षेत्रफल का गुण था। ऐस प्रक्षेप को लैम्बर्ट प्रक्षेप भी कहते हैं। इस प्रकार के प्रक्षेप में ध्रुवीय क्षेत्रों के वितरण मानचित्र बनाने हेतु उपयोगी माना जाता है।
इस प्रकार के प्रक्षेप में ध्रुव से भूमध्य रेखा की ओर जाने पर भूमध्य रेखा पर मापनी घटने लगती है लेकिन अक्षांश रेखा पर मापनी का मान बढ़ने लगती है। इसीलिए यह एक समक्षेत्र प्रक्षेप कहलाता है।
ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप
(Polar Zenithal Equidistant Projection)
|
ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप एक Zenithal/Azimuthal प्रक्षेप है, जिसमें प्रक्षेपण तल को पृथ्वी के किसी एक ध्रुव (उत्तरी या दक्षिणी) पर स्पर्श करता हुआ माना जाता है। इस प्रक्षेप में ध्रुव केंद्र का कार्य करता है। सभी अक्षांश वृत्त ध्रुव को केंद्र मानकर समान दूरी पर बनाए गए सकेंद्र (Concentric) वृत्त होते हैं, जबकि देशांतर रेखाएँ ध्रुव से निकलने वाली सरल सीधी रेखाओं के रूप में समान कोणीय अंतराल पर अंकित की जाती हैं।
इस प्रक्षेप द्वारा एक समय में केवल एक ही गोलार्ध (उत्तरी अथवा दक्षिणी) का प्रदर्शन किया जा सकता है। इसकी विशेषता यह है कि केंद्र (ध्रुव) से सभी स्थानों की दूरी सही (Equidistant) रहती है, इसलिए ध्रुवीय क्षेत्रों के मानचित्रण में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है। इस प्रक्षेप के निर्माण की गणितीय विधि एवं आलेखी (Graphical) विधि मूलतः समान होती हैं।
उदाहरण-
उत्तरी गोलार्ध के लिए एक ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप का निर्माण कीजिए।
मापनी (Scale): 1 : 200,000,000,
रेखान्तराल (Interval): 30°,
प्रदर्शित क्षेत्र: उत्तरी गोलार्ध (0° से 90° उत्तरी अक्षांश)
प्रक्षेप निर्माण की विधि (Method of Construction):-
According to the given scale:
(1) Radius of the Globe (R):
R = 635,000,000/200,000,000
= 3.17 cm
(2) Length of the Arc for 30° Latitude:
Arc Length = 2πR×30∘/360∘
=1.66 cm
(3) Radius of the 0° Latitude (Equator) in the Projection (90° Arc):
Since the distance from the North Pole to the Equator is 90°,
r = 2πR×90∘/360∘
r = 4.98 cm
Thus, the radius of the projection (Equator) is 4.98 cm.

ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप के निर्माण के लिए सबसे पहले AB तथा CD नामक दो परस्पर लम्बवत् (Perpendicular) सरल रेखाएँ खींची जाती हैं, जो N बिंदु पर एक-दूसरे को प्रतिच्छेद करती हैं। N बिंदु प्रक्षेप में उत्तरी ध्रुव (North Pole) को प्रदर्शित करता है।
इसके बाद NB रेखा पर 1.66 सेमी की समान दूरी पर क्रमशः E, F तथा B बिंदु अंकित किए जाते हैं। अब N को केंद्र मानकर NE, NF तथा NB त्रिज्याओं से तीन संकेन्द्र (Concentric) वृत्त बनाए जाते हैं। ये वृत्त क्रमशः 60° उत्तरी अक्षांश, 30° उत्तरी अक्षांश तथा 0° (भूमध्य रेखा) का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रकार प्रक्षेप की कुल त्रिज्या (NB) 4.98 सेमी होती है।
इसके पश्चात N बिंदु पर चाँदे (Protractor) की सहायता से 30° के अंतराल पर कुल 12 विकिरणीय (Radial) सरल रेखाएँ खींची जाती हैं। ये रेखाएँ प्रक्षेप में 30° के अंतराल पर देशांतर रेखाओं को प्रदर्शित करती हैं। अंत में सभी अक्षांश वृत्तों एवं देशांतर रेखाओं पर उनके संबंधित अंश (Degrees) अंकित कर प्रक्षेप को पूर्ण किया जाता।
पहचान (Identification):-
1. अक्षांश वृत्त ध्रुव को केंद्र मानकर बनाए गए संकेन्द्र वृत्त होते हैं तथा इनके बीच की दूरी समान रहती है।
2. देशांतर रेखाएँ ध्रुव से निकलने वाली विकिरणीय सरल रेखाएँ होती हैं, जो समान कोणीय अंतराल पर स्थित रहती हैं।
3. सभी अक्षांश वृत्त एवं देशांतर रेखाएँ एक-दूसरे को समकोण (90°) पर प्रतिच्छेद करती हैं।
4. इस प्रक्षेप में ध्रुव एक बिंदु के रूप में प्रदर्शित होता है।
गुणधर्म (Properties):-
1. अक्षांश वृत्तों को वास्तविक दूरी पर अंकित करने के कारण प्रत्येक देशांतर रेखा पर मापनी (Scale) शुद्ध रहती है।
2. ध्रुव के निकट विकृति न्यूनतम तथा भूमध्य रेखा की ओर अधिकतम होती है।
3. यह प्रक्षेप ध्रुवीय क्षेत्रों के मानचित्रण के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।
4. अक्षांश वृत्तों को वास्तविक दूरी पर प्रदर्शित किया जाता है, इसलिए प्रत्येक देशांतर रेखा पर मापनी (Scale) शुद्ध रहती है।
5. ध्रुव से भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर मापनी में क्रमिक वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए, 75° अक्षांश पर लगभग 1.2%, 60° अक्षांश पर लगभग 4.5% तथा 45° अक्षांश पर लगभग 11.0% मापनी बढ़ जाती है। इससे स्पष्ट है कि भूमध्य रेखा की ओर विकृति (Distortion) क्रमशः बढ़ती जाती है।
6. यह यथाकृतिक (Orthomorphic/Conformal) प्रक्षेप नहीं है, फिर भी 90° से 60° उत्तरी अक्षांश के मध्य क्षेत्रों की आकृति अपेक्षाकृत शुद्ध रहती है। 60° अक्षांश से भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर क्षेत्रों की आकृति पूर्व–पश्चिम दिशा में लंबी (Elongated) दिखाई देने लगती है।
7. इस प्रक्षेप में क्षेत्रफल (Area) वास्तविक रूप में प्रदर्शित नहीं होता, परंतु ध्रुव (केंद्र) से विभिन्न स्थानों की दूरी तथा दिशा (Distance and Direction) सही रहती है।
8. इस प्रक्षेप में अधिकतम केवल एक गोलार्ध (ग्लोब का आधा भाग) ही प्रदर्शित किया जा सकता है।
उपयोग (Uses):-
ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप मुख्यतः आर्कटिक एवं अंटार्कटिक क्षेत्रों के सामान्य उद्देश्य वाले मानचित्रों के निर्माण में उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त ध्रुवीय अन्वेषण (Polar Exploration), ध्रुवीय नौवहन (Polar Navigation), विमानन मार्गों (Air Routes) तथा ध्रुवीय वैज्ञानिक अध्ययनों से संबंधित मानचित्रों के निर्माण में भी इसका व्यापक उपयोग किया जाता है।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य: इस प्रक्षेप की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ध्रुव से दूरी (Distance) और दिशा (Direction) सही रहती है, इसलिए यह ध्रुवीय क्षेत्रों के मानचित्रण के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।
Polar Zenithal Equal-Area Projection
ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप |
परिचय (Introduction):
ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप (Polar Zenithal Equal-Area Projection) एक समक्षेत्र (Equal-Area) अथवा असंदर्श (Non-Conformal) प्रक्षेप है, जिसमें मानचित्र पर प्रदर्शित क्षेत्रों का क्षेत्रफल वास्तविक अनुपात में बना रहता है।
इस प्रक्षेप का विकास सर्वप्रथम प्रसिद्ध मानचित्रकार जे. एच. लैम्बर्ट (J. H. Lambert) ने किया था। इसी कारण इसे लैम्बर्ट का ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप (Lambert’s Polar Zenithal Equal-Area Projection) भी कहा जाता है।
इस प्रक्षेप में प्रक्षेपण तल को ध्रुव पर स्पर्श करता हुआ माना जाता है तथा इसका निर्माण अपेक्षाकृत सरल होता है। यह विशेष रूप से ध्रुवीय क्षेत्रों के वितरण मानचित्रों के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।
उदाहरण (Example)-
1 : 200,000,000 की मापनी पर उत्तरी गोलार्ध का ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप बनाइए। प्रक्षेप में देशान्तर एवं अक्षांश का अंतराल 30° रखा जाए।
आलेखी विधि (Graphical Method)-
दिए गए पैमाने के अनुसार पृथ्वी के लघुकृत गोले का अर्द्धव्यास (R) निम्न प्रकार ज्ञात किया जाता है-
R = 635000000/200000000
=3.17 सेमी

इसके लिए सबसे पहले 3.17 सेमी त्रिज्या लेकर वृत्त का एक चतुर्थांश (Quadrant) बनाया जाता है। चतुर्थांश की त्रिज्या पर 30° एवं 60° के कोण अंकित कर संबंधित बिंदुओं को वृत्त के दूसरे सिरे से मिलाया जाता है, जिससे आवश्यक जीवाएँ (Chords) प्राप्त होती हैं।
अब दो परस्पर लम्बवत् रेखाएँ EF तथा GH खींची जाती हैं, जो N बिंदु पर एक-दूसरे को समकोण पर काटती हैं। N बिंदु प्रक्षेप में उत्तरी ध्रुव का प्रतिनिधित्व करता है।
इसके पश्चात N को केंद्र मानकर तथा प्राप्त जीवाओं AB, AC एवं AD को त्रिज्या मानते हुए तीन संकेन्द्र वृत्त बनाए जाते हैं। ये क्रमशः भूमध्य रेखा (0°), 30° उत्तर तथा 60° उत्तर अक्षांश को प्रदर्शित करते हैं।
अंत में N बिंदु पर चाँदे (Protractor) की सहायता से 30° के अंतराल पर कुल 12 विकिरणीय सरल रेखाएँ खींची जाती हैं। ये रेखाएँ देशांतर रेखाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके बाद सभी अक्षांश वृत्तों एवं देशांतर रेखाओं पर उनके संबंधित अंश (Degrees) अंकित कर प्रक्षेप को पूर्ण किया जाता।
पहचान (Identification):-
1. इस प्रक्षेप में अक्षांश वृत्त ध्रुव को केंद्र मानकर बनाए गए संकेन्द्र (Concentric) वृत्त होते हैं।
2. देशांतर रेखाएँ ध्रुव से निकलने वाली विकिरणीय (Radial) सरल रेखाएँ होती हैं, जो समान कोणीय अंतराल पर स्थित रहती हैं।
3. सभी अक्षांश वृत्त एवं देशांतर रेखाएँ एक-दूसरे को समकोण (90°) पर प्रतिच्छेद करती हैं।
4. ध्रुव से भूमध्य रेखा की ओर जाने पर अक्षांश वृत्तों के बीच की दूरी क्रमशः कम होती जाती है, जो इस प्रक्षेप की प्रमुख पहचान है।
गुणधर्म (Properties):-
1. ध्रुव से भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर देशांतर रेखाओं की मापनी (Scale) धीरे-धीरे घटती जाती है, किंतु 60° से 90° अक्षांश के मध्य यह परिवर्तन बहुत कम होता है।
2. जहाँ देशांतर रेखाओं की मापनी घटती है, वहीं अक्षांश वृत्तों की मापनी समान अनुपात में बढ़ती है। इस संतुलन के कारण पूरे प्रक्षेप में क्षेत्रफल (Area) वास्तविक बना रहता है, इसलिए इसे समक्षेत्र प्रक्षेप (Equal-Area Projection) कहा जाता है।
3. इस प्रक्षेप में केवल एक गोलार्ध (उत्तरी या दक्षिणी) का ही मानचित्र बनाया जा सकता है।
4. अन्य खमध्य (Zenithal) प्रक्षेपों की भाँति ध्रुव से सभी दिशाएँ (Directions) सही प्रदर्शित होती हैं।
5. ध्रुवीय क्षेत्रों की आकृति अपेक्षाकृत शुद्ध रहती है, जबकि भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर आकृतियों में विकृति (Distortion) धीरे-धीरे बढ़ने लगती है।
उपयोग (Uses):-
ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप मुख्यतः ध्रुवीय क्षेत्रों के वितरण मानचित्र (Distribution Maps) बनाने में प्रयुक्त होता है।
चूँकि इसमें क्षेत्रफल वास्तविक (Equal Area) रहता है तथा ध्रुवीय भागों की आकृति भी लगभग शुद्ध रहती है, इसलिए इसका उपयोग जलवायु, वनस्पति, हिमावरण, जनसंख्या वितरण, प्राकृतिक संसाधनों के वितरण तथा अन्य विषयगत (Thematic) मानचित्रों के निर्माण में व्यापक रूप से किया जाता है।
यह प्रक्षेप ध्रुवीय अनुसंधान एवं भौगोलिक विश्लेषण के लिए भी अत्यंत उपयोगी माना जाता है।
Read More: