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9. अतिवादी भूगोल या क्रांतिकारी उपागम / उग्र सुधारवाद / Radical Geography

          9. अतिवादी भूगोल या क्रांतिकारी उपागम / उग्र सुधारवाद

(Radical Geography)



 अतिवादी भूगोल ⇒

            अतिवादी भूगोल को उग्र सुधारवाद या अमूल्य चुल परिवर्तनवादी क्रांतिकारी उपागम के नाम से जानते है। अतिवादी भूगोल का जन्म 1960-70 ई० के दशक में USA में हुआ। भूगोल में अतिवाद का उदय मात्रात्मक क्रांति और स्थानिक विश्लेषण के विरोध में हुआ। यह साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित है लेकिन इसका उद‌य साम्यवादी या समाजवादी देशों में न होकर पूँजीवादी देश USA में हुआ है। अतिवादी भूगोल के विचारधारा को विकसित करने में अमेरिका के क्लार्क विश्वविद्यालय और वहाँ से प्रकाशित होने वाला पत्रिका ‘एंटीपोड’ का विशेष योगदान है। व्यक्तिगत रूप से डेविड हार्वे और जे.आर. पीट जैसे भूगोलवेताओं का योगदान रहा है।

अतिवादी भूगोल

         USA में अतिवादी विचारधारा का जन्म उस समय हुआ जब अमेरिकी समाज में वियतनाम युद्ध में पराजय के कारण निराशा, सामाजिक विषमता, अन्याय, जातीय तनाव, गरीबों के प्रति सत्ताधारियों की नकारात्मक दृष्टिकोण तथा मार्क्सवाद के प्रति उदासीनता का वातावरण था। अमेरिका में वैसे भौगोलिक विचारक जिन्होंने आर्थिक विषमता, उत्पादक व्यवस्था और मानव-वातावरण संबंध के विश्लेषण करने के लिए जिस विचारधारा को जन्म दिया उसे अतिवादी भूगोल कहते हैं। अतिवादी भूगोल समय के संदर्भ में सामाजिक विषमता को दूर करने का प्रयास करता है।

            अतिवादी विचारधारा मात्रात्मक क्रांति के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत को सार्वभौमिक नहीं मानता है क्योंकि इसके द्वारा विकसित किये गए नियम एक निश्चित समाज को एक निश्चित आस्था को बताता है जबकि सामाजिक व्यवस्था में सामाजिक रूप से निरंतर परिवर्तन होता रहा है।

जैसे-

पाषाणकाल→नवपाषाणकाल→ सामंतवाद→ पूँजीवाद→समाजवाद→ साम्यवाद

          अतिवादी विचारधारा इसीलिए तत्कालिक सिद्धांतों एवं नियमों को एकांकी मानता है।

अतिवादी विचारधारा आचारपरक भूगोल पर प्रहार करते हुए कहते हैं कि आपको केवल मानव के व्यवहार उसके इच्छा, अनुभूति को समझकर केवल संतुष्ट नहीं होना चाहिए बल्कि मानव के समस्त व्यवहारों की समझकर समाजिक समस्याओं को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इस तरह अतिवादी विचारधारा आचारपरक भूगोल से भिन्न हो जाता है।

         भूगोल में प्रत्यक्षवादी दर्शन ही काफी लोकप्रिय रहा है। यह दर्शन हमेशा प्रत्यक्ष रूप से किसी घटना को देखकर उसे समझने का प्रयास करता है। जबकि अतिवादी भूगोल के समर्थक परिवर्तन की बात करते हैं और समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं।

        पूँजीवादी देशों में पनपे अतिवादी भूगोल के कारण वहाँ के समाज पर जबड़दस्त प्रभाव पड़ा। इसी विचारधारा से प्रभावित होकर पूँजीवादी देशों में कई प्रकार के सामाजिक कल्याण के कार्यक्रम प्रस्तुत किए गये। उत्पादन के साधन में समाज के प्रत्येक वर्ग का हिस्सा सुनिश्चित करने हेतु कई संस्थागत एवं रचनात्मक कदम उठाये गये। जिसके कारण पूँजीवादी देशों में अमीरी एवं गरीबी जैसे सामाजिक विषमताओं में कमी आयी है। अमेरिका जैसे देशों में भी कोटा प्रणाली, आरक्षण प्रणाली जैसे संकल्पनाओं का अभ्युदय हुआ।

आलोचना

         अतिवादी विचारधारा की भी कई आधार पर आलोचना की जाती है। जैसे- अतिवादी विचारधारा किसी घटना का सामयिक विश्लेषण पर अधिक जोर देता है। अत: इसके कारण ये काफी नजदीक हो जाता है जबकि भूगोल स्थानिक विश्लेषण करने वाला विषय है।

          इसी तरह अतिवादी विचारधारा भूगोल के परम्परागत सिद्धांतों एवं विश्लेषण करने की तकनीक परित्याग कर देता है जो पूर्ण रूप में अतिशयोक्ति नहीं है।

निष्कर्ष

         निष्कर्षतः जा सकता है कि मात्रात्मक कांति, व्यावहारात्म्क क्रांति,  प्रत्यक्षवादी दर्शन, भूगोल को मानवीय समस्याओं के समाधान से दूर रखकर इसके आधार को ही समाप्त कर रहे थे लेकिन अतिवादी भूगोल ने सामाजिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर भूगोल में नई दृष्टि का सूत्रपात्र किया।


 8. अवस्थिति विश्लेषण या स्थानीयकरण विश्लेषण (Locational Analysis)

 8. अवस्थिति विश्लेषण या स्थानीयकरण विश्लेषण

(Locational Analysis)


अवस्थिति विश्लेषण (Locational Analysis)⇒

              मानव भूगोल में अवस्थिति विश्लेषण एक महत्वपूर्ण संकल्पना है जो इस तथ्य का विश्लेषण करता है कि आर्थिक कार्यों का सकेन्द्रण किस स्थान पर किया जाना चाहिए। अवस्थिति विश्लेषण में यह कहा गया है कि सामाजिक आर्थिक कार्यों का संकेन्द्रण उसी स्थान पर होता रहा है जहाँ पर भौगोलिक परिस्थितियाँ अनुकूलित होती है। सामाजिक आर्थिक कार्यों के संकेन्द्रण पर भौगोलिक कारकों के अलावे मानवीय कारकों का भी प्रभाव पड़ता है। अगर मानवीय कारकों के आधार पर किसी स्थान पर कृत्रिम रूप से सामाजिक-आर्थिक कार्यो का सकेन्द्रण किया जाता है तो वे दीर्घकालिक नहीं हो पाते हैं। ऐसे में इन कार्यों के स्थानीकरण हेतु कई भूगोलताओं ने सैद्धांतिकरण करने का प्रयास किया है। इन्हीं सम्पूर्ण गतिविधियों को स्थानीयकरण विश्लेषण कहते हैं।

                        इस प्रकार अवस्थिति विश्लेषण की अवधारणा का विकास और अनुप्रयोग भूगोल विषय में 1950 के दशक के बाद आयी मात्रात्मक क्रान्ति और स्थानिक विश्लेषण के विकास के दौरान हुआ था और इसी काल में “अवस्थिति” और “स्थान” में अंतर स्पष्ट करने पर बल काफी दिया गया था। इस अवधारणा के विकास में यी फू तुआन और पीटर हैगेट इत्यादि भूगोलवेताओं का योगदान महत्वपूर्ण रहा है।अवस्थिति विश्लेषण

             भूगोल में अब तक जितने भी स्थानीयकरण के संबंध में विचार प्रस्तुत किए गए हैं। उन्हें दो भागों में बाँट सकते

(1) द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व का विश्लेषण

(2) द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का विश्लेषण

             (1) भूगोल में द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व स्थानीयकारण के संबंध में जो विचार प्रकट किये गये वे अनुभावाश्रित विधि पर आधारित थे। जैसे वॉन थ्यूनेन महोदय के कृषि अवस्थिति का सिद्धांत अपने अनुभव के आधार पर प्रस्तुत किया था। उन्होंने दक्षिण जर्मनी में किये गये अध्ययन के दौरान पाया कि नगरों का प्रभाव ग्रामीण जीवन पर पड़ता है और ग्रामीण लोग नगरों में माँग के अनुरूप ही कृषि स्थानीयकरण का कार्य करते हैं।

               इसी तरह बेबर एवं हुबर महोदय ने भी औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत अपने अनुभव के आधार पर प्रस्तुत किया। बेबर महोस्य ने अपने औद्योगिक स्थानीयकरण के सिद्धांत में परिवहन लागत को ध्यान में रखते हुए यह विचार प्रकट किया कि न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान ही अधिकतम लाभ देने वाला स्थान होता है। इसलिए न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान पर ही उद्योगों की स्थापना की जानी चाहिए। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि वजन ह्रास वाले उद्योग (चीनी उद्योग, कागज उद्योग) की स्थापना कच्चे माल के क्षेत्र में, वृद्धि वाले उद्योग ( बेकरी उद्योग, विस्कुट, पॉव रोटी, फ्रूट ब्रेड) की स्थापना बाजार क्षेत्र में और समभार उद्योग (वस्त्र उद्योग) की स्थापना कहीं भी की जा सकती है।

                 द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व भी मात्रात्मक क्रान्ति के आधार पर ग्रामीण-नगरीप बस्ती के वितरण या अवस्थिति विश्लेषण किया है। इसमें उन्होंने बताया हैं कि जिन स्थानों पर द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों  का संकेन्द्रण अधिक का होता है। उस स्थान को केन्द्रीय स्थल कहा है। इसी केन्द्रीय स्थान के चारों ओर कई पदानुक्रम में षष्टकोणीय मॉडल के आधार पर ग्रामीण बस्तियों का वितरण होता है।

             (2) द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मात्रात्मक विधि और आचारपरक विधि पर अवस्थिति विश्लेषण बड़े पैमाने पर किया जाने लगा जिनके कारण स्थानीयकारण का विश्लेषण में गत्यात्मक परिवर्तन आया। मात्रात्मक क्रांति के आगमन से भूगोल मे नवीन सिद्धांत एवं मॉडल के निर्माण का युग प्रारंभ हुआ। जैसे- गुरुत्वाकर्षण मॉडल के आधार पर ग्रामीण-नगरीय उपांत क्षेत्र, नगर प्रभाव क्षेत्र तथा नगर के अन्तर्गत विकसित होने वाले केन्द्रीय बाजार जिला का सीमांकन किया गया।

           जॉन बुश महोदय ने दूरी ह्रास मॉडल से यह बताया कि नगर केन्द्र में ज्यादा-से-ज्यादा लोग निवास करना चाहते हैं और ज्यों-2 नगर के केन्द्र से दूरी में वृद्धि होती है त्यो-2 जनसंख्या में कमी आते जाती है।

             निकटतम पड़ोसी विश्लेषण विधि के द्वारा भी बस्ती भूगोल में कई संकल्पनाएँ विकसित किए गए। सांख्यिकी विधि उपयोग कर विकसित किये गये विचारों को तीन भागों में बाँटते है जिसे (i) गुच्छेदार (ii) यत्र तंत्र और (iii) सामान्य वितरण में वर्गीकृत करते हैं।

          मात्रात्मक क्रांति के आगमन से अवस्थिति विश्लेषण में वैज्ञानिकता का आगमन तो हुआ लेकिन विश्लेषण में दृढ़ता का भी विकास हुआ। अत: इसके विरोध में आचारपरक विधितंत्र का विकास हुआ। आचारपरक विधितंत्र के आधार पर हेगर स्ट्रेन ने नव-उत्पाद विसरण का सिद्धांत, हॉटलीन, फेटर इत्यादि ने औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इस तरह भूगोल में स्थानीयकरण के विश्लेषण हेतु कई तरह के विचार प्रस्तुत किये गए।

निष्कर्ष      

         उपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि वर्तमान समय में सामाजिक-आर्थिक कार्यों के अवस्थिति विश्लेषण मूल रूप से मात्रात्मक एवं आचारपरक विधितंत्र पर किया जा रहा है। मात्रात्मक विधितंत्र विश्लेषण से स्थानीयकरण में सैद्धांतिकरण का विकास होता है वहीं आचारपरक क्रांति उसे व्यवहारिकता प्रदान करती है।

7. भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का विकास / Development of Quantitative Revolution in Geography

 7. भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का विकास




भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का विकास⇒

भूगोल में मात्रात्मक क्र (नोट:- क्रांति ⇒ किसी भी विषय वस्तु में त्वरित परिवर्तन को क्रांति कहते है। मात्रात्मक क्रांति = परमाणीकरण)

        भूगोल में गणित एवं सांख्यिकी के तथ्यों का प्रयोग करना मात्रात्मक क्रांति कहलाता है। मात्रात्मक क्रांति का स्रोत गणित एवं सांख्यिकी जैसे विषय है। जबकि लक्ष्य प्रारंभ में केवल मानव भूगोल था। लेकिन वर्तमान में गणित एवं सांख्यिकी के तथ्यों का प्रयोग मानव भूगोल के अलावे भौतिक भूगोल और Cartography (चित्रात्मक भूगोल) में किया जाने लगा है।

    भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का आगमन मूल रूप से विधितंत्र एवं विषय वस्तु में हुआ है। गणित एवं सांख्यिकी के तथ्यों के प्रयोग से त्वरित परिवर्तन हुआ जिसके कारण भूगोल में वैज्ञानिकता, तर्क, वस्तुनिष्ठता का आगमन हुआ। इस सम्पूर्ण गतिविधि को मात्रात्मक क्रांति से संबोधित करते हैं।

      भूगोल में मात्रात्मक क्रांति लाने का श्रेय अमेरिकी भूगोलवेता जिफ को जाता है क्योंकि इन्होंने 1949 ई. में सांख्यिकी के कोटि(क्रम) आकार सह-संबंध तकनीक का प्रयोग कर USA के नगरों का अध्ययन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि ज्यों-2 कोटि वृद्धि होती है त्यों-2 नगरों के आकारिकी में परिवर्तन होता है। जिन क्षेत्रों में कोटि और आकार के बीच में यह संबंध पाये जाते हैं वह स्वस्थ्य आर्थिक विकास का घोतक है और जहाँ पर यह संबंध नहीं पाया जाता है वह अस्वास्थ्य आर्थिक विकास का घोतक है।

                भूगोल में गणित एवं सांख्यिकी से आयात कर जिन तकनीकों का प्रयोग किया गया उसे दो भागों में बाँटते हैं-

(1) अनुमोदनात्मक तकनीक

(2) विवरणात्मक तकनीक

        अनुमोदनात्मक तकनीक के तहत किसी सिद्धांत या परिकल्पना की जाँच करते हैं। इसके तहत सांख्यिकी में प्रयोग होने वाले Simple रिग्रेशन, लीनियर रिग्रेशन, संभाव्यता (Probablity), t- test, Chi- square, Index इत्यादि का प्रयोग करते हैं।

        विवरणात्मक तकनीक के अन्तर्गत सामाजिक आर्थिक आकड़ों को इकट्ठा किया जाता है और उसका औसत माध्य, मध्यिका, बहुलक, अपसरण, मानक विचलन इत्यादि का प्रयोग कर सार निकालने का प्रयास करते हैं।

भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का इतिहास

       द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका के द्वारा गिराये गये परमाणु बम ने सभी मानवीकी विषय के ऊपर प्रश्न चिह्न लगा दिए थे। कला क्षेत्र के विद्वान विज्ञान से भयभीत होने लगे थे। कई विश्वविद्यालयों में मानवीकी विषय में विद्यार्थियों की सीटें खाली रहने लगी। फलतः सामाजिक विज्ञान के विद्वानों ने 1949 ई० में अमेरिका के प्रीस्टन विश्वविद्यालय के प्रांगण में एक सम्मेलन बुलवाया। इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि मानवीकी विषय के विधितंत्र को तार्किक एवं वैज्ञानिक बनाया जाय। इन विषयों में वैसे विषयवस्तु को शामिल किया जाय जो मानव के लिए उपयोगी हो।

      अगर इन उद्देश्यों को पूरा करता है तो विज्ञान से हमें डरने की आवश्यकता नहीं है बल्कि उसके तकनीक को मानवीकी विषय में प्रयोग करने की आवश्यकता है अर्थात इसी सम्मेलन के बाद अंतर विषयक अध्ययन पर अधिक जोर दिया जाने लगा। इसी अन्तर विषयक अध्ययन के फलस्वरूप भूगोल में मात्रात्मक क्रांति की शुरुआत हुई। भूगोल में इसके विकास के इतिहास को चार चरणों में बाँटकर अध्ययन करते हैं।

(1) प्रथम चरण (1950-58)

            प्रथम चरण का काल 1950- 58 ई० तक रहा। इस चरण में जिफ, नेल्सन, बेरी, हार्टशोन और बंगी जैसे भूगोलवेतओं ने गणितीय एवं सांख्यिकीय तकनीक का प्रयोग किया। प्रथम चरण में अवलोकन विधि, प्रश्नावली विधि, अनुसूची विधि और प्रतिदर्श / नमूना विधि से प्राथमिक आँकड़े इक्कठे किये जाने लगे। प्राप्त आँकड़ों को वर्गीकृत एवं सारणीकरण किया जाने लगा। माध्य, माध्यिका, बहुलक, मानक विचलन इत्यादि का प्रयोग कर प्राप्त आकड़ों का सार संग्रह निकालने का प्रयास किया गया।

(2) दूसरा चरण (1956-68 ई०)

          द्वितीय चरण में एकरमैन, बेरी, स्पीयर्स मैन और पीयरसन जैसे भूगोलवेताओं ने सांख्यिकी तकनीक का प्रयोग प्रारंभ किया। द्वितीय चरण में कोटि आकार सह संबंध रिग्रेशन, सूचकांक जैसे तकनीक का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया गया। इन तकनीकों के प्रयोग से भूगोल के विभिन्न घटकों के बीच सहसंबंध स्थापित कर तथ्यों का विश्लेषण किया जाने लगा।

(3) तीसरा चरण (1968-78 ई०)

         तीसरा चरण में सोर्ले, हेगेट, इबान्स, इरासी, मॉर्स जैसे भूगोलवेताओं ने भौगोलिक तथ्यों की व्याख्या हेतु बहुचरण विश्लेषण विधि, नजदीकी पड़ोसी सांख्यिकी विधि जैसे तकनीक का प्रयोग हुआ।

(4) चौथा चरण (1978 के बाद से अब तक)

          चौथा चरण में भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का प्रयोग अपने चरम अवस्था में पहुँच गया। इस चरण में भौगोलिक तथ्यों का विश्लेषण, वर्गीकरण, चित्र निर्माण करने में कम्प्यूटर, कृत्रिम उपग्रह, सुदूर संवेदन प्रणाली इंटरनेट, वायु फोटोग्राफी इत्यादि का प्रयोग किया जाने लगा। इन आधुनिक तकनीकों के माध्यम से प्राप्त किये गये आँकड़ों को विश्लेषण करने हेतु GIS (भौगोलिक सूचना तंत्र) का विकास किया गया है। ब्रिटिश भूगोलवेता डडले स्टम्प ने सही कहा है कि “वर्तमान समय में मात्रात्मक क्रांति का सुनहरा बछड़ा कम्प्यूटर है।”

भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का महत्व / प्रभाव

          मात्रात्मक क्रांति के प्रयोग से भूगोल पर कई प्रकार के प्रभाव पड़े। जैसे:-

(1) मात्रात्मक कांति के प्रयोग से भूगोल में तार्किकता एवं वैज्ञानिकता का आगमन हुआ। इनके आगमन से भौगोलिक तथ्यों की वस्तुनिष्टता का आगमन हुआ।

(2) भूगोल में प्राथमिक आँकड़ों, संग्रहण, विश्लेषण और सार संग्रह निकला जाने लगा।

(3) मात्रात्मक क्रांति के पूर्व भूगोल का अध्ययन अनुभावाश्रित, वर्णात्मक और चित्रात्मक भा लेकिन मात्रात्मक कांति से भौगोलिक तथ्यों का अध्ययन प्रत्यक्ष रूप से किया जाने लगा। भूगोल में चित्र द्विआयामी से त्रिआयामी बनने लगे।

(4) भूगोलवेताओं में सांख्यिकी के ज्ञान होने के कारण इनकी माँग नियोजन एवं विकास कार्यों में होने लगा।

(5) सांख्यिकी के प्रयोग से भौगोलिक तथ्यों बीच सह-संबंध स्थापित कर उनका प्रदेशीकरण किया जाने लगा। जैसे- कृषि भूगोल में बीबर एवं डोई ने फसल संयोजन प्रदेश का निर्धारण किया। सांख्यिकी तथ्यों का प्रयोग कर अलीगढ़ विश्वविद्यालय के प्रो० एम.एस. सफी ने भारत के फसल संयोजन का निर्धारण किया।

(6) मात्रात्मक क्रांति के प्रयोग से भूगोल में मॉडल का निर्माण, सिद्धांतों का निर्माण और परिकल्पनाओं का निर्माण किया जाने लगा। हैगेट एवं सोर्ले को मॉडल निर्माण का चैम्पियन कहा जाता है। बेबर महोदय ने औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत सांख्यिकी के नियमों पर ही प्रस्तुत किया था।

(7) नगरीय भूगोल में जनसंख्या भूगोल में, आर्थिक भूगोल में, परिवहन भूगोल में, आपदा प्रबंधन में, मौसम पूर्वानुमान में आज सांख्यिकी विधियों का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा हैं।

आलोचना

          मात्रात्मक क्रांति का कई भूगोलवेताओं ने आलोचना किया है। जैसे:-

(1) डडले स्टम्प महोदय ने कहा है कि भूगोल का अध्ययन वर्णात्मक एवं चित्रात्मक विधि से करना उपयुक्त है न कि मात्रात्मक विधि से अध्ययन किया जाना चाहिए।

(2) कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि मात्रात्मक क्रांति का प्रारंभ 1950 ई० से नहीं हुआ है बल्कि भूगोल में सांख्यिकी तथ्यों का प्रयोग इसके पूर्व काल से होता रहा है। हार्वे महोदय ने अपने पुस्तक Explanation in Geography में इसका आलोचना करते हुए कहा कि मात्रात्मक क्रांति अपने चरम अवस्था में पहुँच चुका है। अत: इसमें धीरे-2 ह्रास की प्रवृति प्रारंभ हो चुकी है।

(3) 1950 ई० में ‘आर्थिक भूगोल’ नामक पत्रिका USA से प्रकाशित होती थी। इस पत्रिका में बेरी महोदय ने सांख्यिकी के प्रयोग का समर्थन किया जबकि स्पेट महोदय ने आलोचना करते हुए कहा कि भूगोलवेताओं में सांख्यिकी सोच-विचार का अभाव होता है। ऐसे में अगर सांख्यिकी के कम जानकार व्यक्ति इसका प्रयोग करता है तो नाकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।

(4) मात्रात्मक क्रांति के माध्यम से मानव के भावनात्मक पहलू, व्याहारिकतावाद, मानवतावाद, कल्याणकारी भूगोल के तथ्यों का विश्लेषण संभव नहीं है।

(5) वर्तमान समय में मात्रात्मक क्रांति वाहक कम्प्यूटर एवं इंटरनेट है। आज इनके माध्यम से सूचना प्रदूषण फैलाने का दौर प्रारंभ हो चुका है।

निष्कर्ष

           इन सीमाओं के बाबजूद मात्रात्मक क्रांति एक वैज्ञानिक विषय बना दिया है। यह उपलब्धि कुछ खामियों के बावजूद क्रान्ति के समतुल्य है।



भूगोल में मात्रात्मक क्रांति पर उत्तर लिखने का दूसरा तरीका



भूगोल में मात्रात्मक क्रांति

(Quantitative Revolution in Geography)

(नोट: क्रांति = त्वरित परिवर्तन, उत्परिवर्तन = अचानक परिवर्तन, आंदोलन = मंद परिवर्तन)

प्रारूप

1. परिचय

2. मात्रात्मक क्रांति का उद्देश्य / लक्ष्य

3. मात्रात्मक क्रांति में प्रयुक्त तकनीक

  3.1 विवराणात्मक तकनीक

  3.2 अनुमोदनात्मक तकनीक

4. मात्रात्मक क्रांति का इतिहास

5. मात्रात्मक क्रांति का प्रभाव / महत्त्व

6. आलोचना

7. निष्कर्ष

1. परिचय

         मात्रात्मक क्रांति दो शब्दों के मिलने से बना है। प्रथम-मात्रा और द्वितीय क्रांति। मात्रा का तात्पर्य गणित या सांख्यिकी ये है। जबकि क्रांति का तात्पर्य त्वरित परिवर्तन से है। अतः भूगोल में सांख्यिकी के आगमन से उसके तथ्यों में जो वैज्ञानिक एवं त्वरित परिवर्तन हुआ उस परिवर्तन को ही मात्रात्मक क्रांति कहते है।

           द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व भौगोलिक तथ्यों के अध्ययन की विधि परम्परागत थी जिसके तहत भौगोलिक तथ्यों का अध्ययन अनुभव और मानचित्र के आधार पर किया जाता था। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मात्रात्मक क्रांति के आगमन ने भौगोलिक तथ्यों के अध्ययन की पद्धति को ही बदल दिया है। इस विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मात्रात्मक क्रांति का स्रोत क्षेत्र गणित का उपभाग सांख्यिकी रहा है जबकि लक्ष्य क्षेत्र मानव भूगोल रहा है।

      वस्तुतः द्वितीय विश्व के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराया गया बम न केवल दो नगरों पर गिराया गया बम था बल्कि सम्पूर्ण मानवीय चिंतन पर किया गया अद्यात था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मानविकी विषय के विद्वानों ने देखा कि अगर विज्ञान चाहे तो सम्पूर्ण दृष्टि का विनाश कुछ ही क्षण में कर सकता है। इस वैज्ञानिक और तकनीकी विकास पर आधारित चिन्तव ने विश्व के सभी सामाजिक विज्ञान के समक्ष उपयोगिता पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया।

      अतः 1949 ई०  में USA के प्रीस्टन विश्वविद्यालय ने सभी मानविकी एवं वैज्ञानिक विषयों से सम्बंधित विद्वानों का सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि मानविकी विषय को विज्ञान की विषय से डरना नहीं चाहिए बल्कि सामाजिक विज्ञान के विधितंत्र में परिवर्तन लाकर उसे वैज्ञानिक तथा विश्वसनीय बनाया जाना चाहिए। इसी निर्णय का परिणाम था कि मानव भूगोल में सांख्यिकी के तकनीक के उपयोग पर जोर दिया गया और भूगोल को ‘अन्तरविषयक’ विषय बनाने का प्रयास किया गया।

         भूगोल में मात्रात्मक तकनीक का प्रयोग करने का प्रथम श्रेय अमेरिकी भूगोलवेता जे.के.जिफ को जाता है क्योंकि इन्होंने ही 1949 ई० में सांख्यिकी के ‘कोटि-आकार-सह-संबंध‘ तकनीक का प्रयोग कर यू.एस.ए. के नगरों का अध्ययन किया।

 2. भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का प्रमुख उद्देश्य / लक्ष्य

(i) वर्णात्मक भूगोल को वैज्ञानिक बनाना।

(ii) भौगोलिक तथ्यों की वैज्ञानिक तथा तार्किक व्याख्या करना।

(iii) साहित्यिक भाषा की जगह गणितीय भाषा का उपयोग।

(iv) अवस्थिति वर्ग के बारे में परिशुद्ध कथन करना।

(vi) परिकल्पना के लिए मॉडल, नियमों तथा सिद्धांतों का सूत्रण करना।

(vii) भूगोल की क्रिया पद्धति को वस्तुनिष्ठ तथा वैज्ञानिक बनाना।

3. मात्रात्मक क्रांति में प्रयुक्त तकनीक

            मानव भूगोल में मात्रात्मक क्रांति से संबंधित अपनायी तकनीक को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

3.1  विवराणात्मक तकनीक

      इसमें सामाजिक-आर्थिक आंकडों का संग्रह कर निष्कर्ष निकाला जाता है और उनका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। यह औसत, माध्य, माध्यिका, बहुलक, अपसरण, मानक विचलन जैसे सांख्यिकीय तकनीक पर किया जाता है।

3.2  अनुमोदनात्मक तकनीक  

     इस तकनीक के द्वारा मानव भूगोल में विकसित किया गया सिद्धांत या परिकल्पना की वैज्ञानिक जाँच की जाती है। जैसे: इसके लिए सिम्पल रिग्रेशन (प्रतिगमन), लीनियर रिग्रेशन, संभाव्यता (Probability) जैसे तकनीक प्रयोग करते हैं।

4. भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का इतिहास

            भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का विकास अचानक नहीं हुआ बल्कि कई अवस्थाओं से गुजरने के बाद हुआ है।

चरण काल प्रयुक्त सांख्यिकीय तकनीक प्रमुख विद्वान एवं एजेंसी
पहला 1950-58 नमूना विधि, मानक विचलन, माध्य, माध्यिका, बहुलक बेरी, बंगी, हार्टशोन, जिफ, हार्वे, एकरमैन एवं नेल्सन
दूसरा 1958-68 को-रिलेशन, रिग्रेशन, सूचकांक बेरी, स्पीयर्समैन, पीयर्सन
तीसरा 1968-78 बहुचर विधि, विश्लेषण विधि, नजदीकी पड़ोसी सांख्यिकी विधि चोर्ले, हैगेट, इबान्स, मोसर, एल.सी.किंग, इराशी, स्कॉट
चौथा 1978 से अबतक कम्प्यूटर, GIS, एरियल फोटोग्राफी पर आधारित तकनीक IRS नासा, इसरो, यूरोपीय स्पेस एजेंसी

5. मात्रात्मक क्रांति का प्रभाव एवं महत्व

         भूगोल में मात्रात्मक क्रांति के आगमन से कई प्रकार के प्रभाव पड़े। जैसे:

(i) भूगोलवेता स्वंय प्राथमिक आंकड़ों का संग्रहण तथा उसका विश्लेषण करने लगे।

(ii) मानव भूगोल में कई नवीन सिद्धांत, परिकल्पना एवं मॉडल का विकास किया गया।

(iii) मात्रात्मक क्रांति ने मानव भूगोल को एक वैज्ञानिक विषय बना दिया।

(iv) भूगोलवेताओं में सांख्यिकी का ज्ञान होने के कारण नियोजन के कार्यों में इनकी माँग बढ़ गयी।

(v) मानचित्र के गुणों एवं स्तर में वृद्धि हुई।

(vi) प्रदेश एवं नगरों का वर्गीकरण, प्रादेशिकरण एवं नियोजन में वैज्ञानिकता का आगमन हुआ।

(vii) जटिल आर्थिक-सामाजिक चरो विश्लेषण कर भूगोल में भविष्यवाणी की जाने लगी।

(viii) भूगोल में ‘रैंक साइज’ नियम के आधार पर जनसंख्या भूगोल, नगरीय भूगोल का अध्ययन किया गया।

(ix) स्टैण्डर्ड डिविएशन के आधार पर बीबर एवं डोई ने फसल संयोजन, केन्द्रीय स्थल सिद्धांत और कई स्थानीयकरण के सिद्धांत विकसित किये गये।

6. आलोचना

        मात्रात्मक  क्रांति ही आलोचना कई भूगोलवेताओं द्वारा की गई है। जैसे:-

(i) स्पेट महोदय ने कहा कि एक भूगोलवेता में सांख्यिकी पर आधारित सोच और विचार का अभाव होता है। ऐसी स्थिति में अगर वह प्रयोग करता है तो परिणाम गलत आ सकते हैं।

(ii) डडले स्टाम्प महोदय ने इसका आलोचना करते हुए कहा है कि “कम्प्यूटर मात्रात्मक क्रांति का सुनहला बछड़ा है।”  पुन: उन्होंने कहा कि भूगोल के परम्परागत तकनीक ही सर्वोत्तम तकनीक है।

(iii) व्यावहारवादियों ने इसका आलोचना करते हुए कहा है कि मात्रात्मक क्रांति भावात्मक पहलू एवं मानवीय मूल्यों के विश्लेषण करने में सक्षम नहीं हैं।

(iv) हार्वे महोदय ने कहा कि मात्रात्मक क्रांति अपने चरम अवस्था को प्राप्त कर चुका है। अब धीरे-2 इसमें ह्रास की प्रवृत्ति देखी जा रही है।

7. निष्कर्ष

           उपरोक्त सीमाओं के बावजूद मात्रात्मक क्रांति ने मानव भूगोल को एक वैज्ञानिक विषय बनाने में अभूतपूर्व योगदान दिया है। अवः भूगोल में विकसित अन्य चिन्तन को इसकी आलोचना न कर इसके विश्लेषणात्मक क्षमता को देखा जाना चाहिए।

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