Archives March 2023

12. अजब-गजब

12. अजब-गजब


 अजब-गजब⇒

            इस देश में सब कुछ अजब-गजब हो रहा है। हमको तो लगता है कि यह देसे है अजब और गजब लोगों का।

         तो, हम कह रहे थे… कह कहाँ रहे थे। कहेंगे तो अब। देखिये जी, यहाँ नेता और जनता का संबंध वैसा है, जैसा दूध के साथ पानी का पगार के साथ घूस का। बाजार के साथ महँगाई का। आलू के साथ झुलसा रोग का…। अब ये एक-दूसरे से पूछकर तो अपना काम नहीं करेगा न।

          झुलसा रोग आलू से पूछकर आयेगा क्या? न महँगाई बाजार से पूछकर आया करेगी और न ही घूस पगार के बारे में पूछताछ करेगी। और पानी तो दूध का लंगोटिया यार है, फिर पूछने की क्या जरूरत है?

अजब-गजब

         लेकिन नहीं…नेतागिरी में ऐसा नहीं होता। आप वाले जनता से पूछकर ही हर्र-हुर्र कर रहे हैं। कहाँ झाडू मारना है कहाँ नहीं, जनता से ही पूछेंगे। जनता ने सरकार बनाने के लिए थोड़े न वोट दिया, वो तो सिर्फ राइट टू पूछने के वास्ते दिया था। सरकार बनाएँ कि नहीं, बड़ी कोठी तथा सुरक्षा लें कि नहीं, लाल बत्ती जलाएँ कि नहीं-सब काम केजरीवाल ने जनता से पूछकर ही किया न। जनता भी ‘पुछवाकर तृप्त। उधर, राहुल गांधी की सारी उमर मम्मी से पूछने में ही घिस रही है।

          गरीब के घर का खाना पचा लेंगे, लेकिन जब गरीब को अपने घर खाने पर बुलाना हो तो मम्मी से ही पूछेंगे। तो, प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी लेनी है कि नहीं, यह भी तो मम्मीजी से पूछकर ही तय करेंगे न। लेकिन सबका गुरु निकले नरेन्द्र भाई। गुरुई में तो उन्होंने अपने ‘गुरुओं’ का गुड़ गोबर का दिया। और पूछने के मामले में सबको पछाड़ डाला। इसलिए कि खुद ही जनता से पूछते हैं और खुदहि जवाब देते परन्तु मंच पर से पूछते जरूर हैं, ताकि जनता ये न बूझे कि पूछा नहीं…।

       तो, है न यह अजब-गजब? अब तो घोड़ा भी घास से पूछकर ही चरा करेगा। चोर कोतवाल से पूछेगा कि चोरी कर लें? और तो औ, राजा प्रजा से पूछेगा कि हम भी थोड़ा-बहुत ‘अराजक’ हो लें-तुम्हारी तरह?

स्रोत: दे दे राम, दिला दे राम !, (विरेन्द्र नारायण झा)

11. सकारात्मक विचारों का प्रभाव

11. सकारात्मक विचारों का प्रभाव


सकारात्मक विचारों का प्रभाव⇒

           सकारात्मक विचारों का भी मन, मस्तिष्क, शरीर तथा समस्याओं के हल की दिशा में इतना अनुकूल प्रभाव पडता है कि वह चमत्कार जैसा ही लगता है। विधेयक विचार यदि ईश प्रार्थना से संयुक्त हो जाए तो यह दैवी शक्ति का प्रवाह बन जाता है, जिसमें चिंताएं, व्याकुलताएं, रोग, शोक, आधि- व्याधि सभी प्रवाहित हो जाते हैं।

              सकारात्मक विचार ईश प्रार्थना से संयुक्त हो या दृढ़ मनोबल से- दोनों का शुभ फल अवश्य मिलता है। प्राकृतिक चिकित्सा के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. हेनरी लिट्ठर ने भी अपनी पुस्तक ‘प्रैक्टिस ऑफ थेराप्यूटिक्स’ में लिखा है-‘मनोभावों में इतना सामर्थ्य है कि उनके द्वारा कोई रोगी स्वयं को पूर्ण स्वस्थ और कोई स्वस्थ व्यक्ति विकृत विचार आरोपण व निषेधात्मक चिंतन द्वारा अपने को अशक्त, असमर्थ तथा रुग्ण बना सकता है।

सकारात्मक विचारों का प्र

             श्रीमती मर्टिल फिल्मोर प्रायः बीमार रहा करती थी। दवा खाते-खाते टूट चुकी थी। डॉक्टर भी अब और कुछ कर सकने में अपने को असक्षम समझ रहे थे। एक बार श्रीमती मर्टिल अपने पति चार्ल्स फिल्मोर के साथ एक आध्यात्मिक भाषण सुनने गई।

          भाषण के एक वाक्य को उसके मन ने दृढ़ता से पकड़ लिया ‘I am child of God and therefore I do not inherit sickness.’ ‘मैं ईश्वर की संतान हूं, अतः मुझमें कोई रोग नहीं।’ मन हमेशा इस बात की आवृत्ति करता रहता। इस बात पर उसे इतना अधिक विश्वास हो गया कि उसका जीवन बदल गया। वह स्वास्थ्य के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती और पोषक (Positive) विचारों के द्वारा अपने में शक्ति भी भरती रहती। फलतः वह पूर्ण स्वस्थ हो गई।

             श्री कैस्के जन्म से पंगु था। वह चल नहीं सकता था। श्रीमती मर्टिल फिल्मोर से प्रेरित होकर वह ईश्वर विश्वास से अभिभूत हो पोषक विचारों को पोषित करने लगा। वह बारंबार इस विचार की आवृत्ति करता कि उस पर परमात्मा की असीम कृपा बरस रही है। प्रभु कृपा से अब वह स्वस्थ होता जा रहा है, उसके पैर अच्छे होते जा रहे हैं। उसके पैर सभी कार्य करने में सक्षम हो गए हैं, वह चल सकता है, दौड़ सकता है इत्यादि। फलतः वह भी स्वस्थ हुआ।

         प्रसिद्ध चिकित्सक हीलर अलबई क्लिक की पुरानी पेट पीड़ा मन की शुभ भावनाओं ने शांत कर दी।

        प्रसिद्ध चिकित्सक रिबेका ने मधुमेह (डायबिटिज) रोग को निर्मूल करने की दवा बताई ‘सकारात्मक विचार।’ रिबेका के शब्दों में, ‘इस रोग को निर्मूल करने की एकमात्र दवा है प्रेम और मन का सदा निश्चित और प्रसन्न रहना।’

      एलिस न्यूटन नाम की स्त्री पेट के कैंसर से बुरी तरह पीड़ित थी, उसका उदर फूला हुआ था। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। वह ईश प्रार्थना के साथ पोषक विचारों में जुट गई और अंततः रोगमुक्त हुई। भारत में तो ऐसे उदाहरण आए दिन देखने को मिलते हैं।

        अब तो यह स्पष्ट परिलक्षित हो गया कि शुभ औ विधेयक विचारों की शुभ परिणति एवं अशुभ और निषेधात्मक विचारों के घातक परिणाम होते हैं।

        आप चिंतन की प्रक्रिया द्वारा प्रभु की शांति, निर्विकारिता, प्रज्ञावानतादि को निश्चय ही अपने में उभार सकते हैं। व्यक्ति का चिंतन उसके शरी, स्वास्थ्य और क्रियाशक्ति पर आश्चर्यजनक ढंग से प्रभाव डालता है। चिंतन से अंतर्मन के साथ-साथ बाह्य जगत भी प्रभावित और परिवर्तित होता है। अतएव स्वसंकेत (ओटो सजेशन) द्वारा अपने भीतर स्थित ईश्वरीय गुणों को उभारें, प्रकट करें।

स्रोत: चिंता क्यों?

10. नकारात्मक विचारों से कैसे उबरें?

10. नकारात्मक विचारों से कैसे उबरें?


नकारात्मक विचारों से कैसे उबरें?

                यह तो नकारात्मक विचारों का प्रभाव हुआ। अतः आप नकारात्मक विचारों को अपने पर हावी न होने दें। जब कभी आपको लगे कि आप पर नकारात्मक विचारों का आक्रमण हो रहा है, तब आप तत्काल सावधान हो जाएं। नकारात्मक विचारों को हटाने के एक-दो सुझाव प्रस्तुत हैं-

1. आप दो-चार गहरा श्वास लें और छोड़ें। इन श्वासों का अनुभव करें। तदुपरांत आंखें बंद कर लें और आते-जाते श्वासों को गहराई से अनुभव करें। श्वासों से भली प्रकार जुड़ जाएं। आपके मन की आंखों को धोखा देकर एक भी श्वास आने-जाने न पाए। आप सावधानीपूर्वक हर आते-जाते श्वास का अनुभव और आनंद लें। यदि कोई विचार आपको परेशान कर रहा हो तो आत्मविश्वास के साथ मन को आदेश दे, ऐ मन! चुप हो जाओ। शांत हो जाओ। अभी मैं आनन्द सरोवर में तैराकी कर रहा हूं। ॐ शांति! ॐ आनंद! ॐ प्रसन्नता! ॐ आह्लाद !

2. नकारात्मक भाव संवेग यथा-क्रोध, चिढ़, द्वेष, नफरत, क्षोभ, आक्रोश आदि पर नियंत्रण भी जरूरी है। आप सावधान रहें कि ये दुष्ट संवेग आपके भीतर प्रवेश न कर पाएं और यदि प्रवेश कर भी जाएं तो ठहर न पाएं। इसके लिए एक दो पहलू पर ध्यान दें। याद रखें, सभी व्यक्तियों की सोच, रूचि व आदतें भिन्न-भिन्न होती है। अतः जो जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार करें। यदि आप उसकी सोच या आदतों पर अपने विचार थोपने का प्रयत्न करेंगे तो वह कुछ ऐसा कह सकता है, जिससे आप क्षुब्ध हो जाएं। अतः शांति और रिश्तों में मधुरता के लिए शांत मौन ही बेहतर है।

नकारात्मक विचारों से

3. दूसरों के अपशब्दों को नजर अंदाज करना सीखे, इससे व्यर्थ के कलह-अशांति से सहज ही बच जाएंगे।

4. जहां तर्क-वितर्क में बहसा-बहसी की संभावना हो रही हो तो वहां से कुछ समय के लिए हट जाएं, इससे नकारात्मक भाव-संवेगों से आपका बचाव हो सकेगा।

5. नकारात्मक भाव-संवेगों के उभार पर भी आप हिम्मत न हारें, इससे मुक्त होने के लिए आप अपने ध्यान को अन्यत्र लगाने का प्रयास करें। नाक से लम्बा श्वास लेकर झटके के साथ मुंह से श्वास फेंक दें। ऐसा आठ-दस बार करें।

6. जहां जाने से, जिसके साथ रहने से, जिसकी बात सुनने से तनाव बढ़ता हो, वहां से नम्रतापूर्वक दूरी बनाए रखना ही बुद्धिमत्ता है।

7. याद रखें, दुख – तनाव अभाव में कम और स्वभाव में अधिक होता है। स्वभाव को विधेयक बनाएं और दुख-तनाव से मुक्ति पाएँ।

8. चिंता या तनाव के उद्रेक में किसी पुरानी और आनंददायक घटना या बात याद करें। ऐसा अनुभव करें, जैसे वह वर्तमान में ही घटित हो रही है। घटना इस तरह सिलसिलेवार याद करें कि चिंता-तनाव का मन में प्रवेश पाना असम्भव हो जाए।

9. तनाव का अहसास होते ही श्वासों के साथ प्रभु सुमिरण में लग जाएं। प्रभु की स्नेहिल छत्रछाया सदैव आपके सिर पर है, इसे बार-बार बोलें और इसका अनुभव करें। जैसे प्रह्लाद के सिर पर नरसिंह भगवान बड़े ही प्रेम और ममता से अपना हाथ फेरे थे, उसी तरह दयालु प्रेमिल प्रभु बड़े ही लाड़-दुलार से आपके सिर पर हाथ फेर रहे हैं, इसे अनुभव कर भावविभोर हो जाएं। ज्ञान, वैराग्य, भक्ति भरा कोई भजन गुनगुनाने लगें।

कहा भी गया है-

महाविपत्तौ संसारे यः स्मरन्मधुसूदनम्।

विपत्तौ तस्य सम्पत्तिर्भवेदित्याह शंकरः।।     देवी भा. पु. ९/४०/४१

             अर्थात् ‘जो पुरुष महाविपत्ति के अवसर पर भगवान का स्मरण करता है, उसके लिए वह विपत्ति संपत्ति हो जाती है, ऐसा शंकर जी का वचन है।’

स्रोत: चिंता क्यों ?

9. नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव

9. नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव


नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव⇒

            नकारात्मक विचारों का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका स्पष्ट रूप उजागर हुआ फ्रांस में मृत्युदंड पाए एक व्यक्ति पर इसका परीक्षण किया गया। उसे एक स्थान पर लिटाकर उसकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई। उसे सुनाकर कहा गया, तुम्हारे शरीर की नसों को काटकर इतना अधिक रक्तस्राव कराया। जाएगा कि स्वतः तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।

नकारात्मक विचारों

            किसी नुकीली वस्तु को हाथ की नसों पर इस तरह फेरा गया की लगे नसें काट डाली गई हैं, साथ ही शीतोष्ण जल की धारा को धीरे-धीरे हाथ के पास इस प्रकार गिराया जाने लगा कि लगे कि सारा शरीर खून से भींगकर लथ-पथ हो रहा हो। कहा जाने लगा-‘ओह! कितना अधिक रक्त स्राव हो रहा है। लग रहा है जैसे शरीर खून के ही सैलाब में पड़ा हुआ हो। संपूर्ण शरीर रक्त से लाल होता जा रहा है। हाय-हाय ! शरीर के चारों ओर खून ही खून दीख रहा है।’

            जैसे-जैसे इन बातों को दुहराया जाता, तदनुरूप चिंतन करते हुए कैदी की छटपटाहट भी बढ़ती जाती। कुछ देर बाद पुनः कहा गया, ‘ओह! शरीर का तो लगभग सारा खून निकल चुका है। चेहरा स्याह पड़ता जा रहा है। अब यह नहीं बच सकता। किसी हालत में नहीं बच सकता।’ इतना सुनना था कि सचमुच कैदी तड़पकर मर गया।

         आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि न व्यक्ति की नसें काटी गई थी, न खून बहा था। निषेधात्मक विचारों का मानव पर प्रभाव जानने के लिए बिना कुछ हुए ही उसे अहसास कराने का प्रयत्न किया गया था कि नसें काट डाली गई हैं और काफी मात्रा में खून बह रहा है। इसके लिए व्यक्ति को बार-बार झूठ ही कहा जा रहा था कि अत्यधिक खून बह जाने के कारण वह मरणासन्न होता जा रहा है। व्यक्ति ने इसे सत्य समझा औ असका अंतस् निषेधात्मक विचारों से भता गया। फलतः उसने दम तोड़ दिया।

स्रोत: चिंता क्यों

8. चिंतन का चमत्कार

8. चिंतन का चमत्कार


चिंतन का चमत्कार⇒

             चितन में इतनी अद्भुत क्षमता है कि इसके द्वारा व्यक्ति अपने-आपको आसमान से धरती पर, धरती से पाताल तक तथा पाताल से धरती पर एवं धरती से आसमान की अगम ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है। इस रहस्य को जानकर उत्कृष्ट एवं विधेयक चिंतन को ही प्रश्रय दें।

चिंतन का चमत्कार

              चिंतन मस्तिष्क, मन और शरीर सभी को प्रभावित करता है। अगर तीन व्यक्तियों, जिसमें एक क्रोध से थर-थर कांप रहा हो या किसी चिंता से हाल-बेहाल हो, दूसरा शांत और प्रसन्न हो तथा तीसरा परमात्मा के गंभीर ध्यान में मग्न हो, के मस्तिष्क का E.E.G. लिया जाए तो तीनों के मस्तिष्क में उठने-गिरने वाली तरंगों में स्पष्ट विभिन्नता परिलक्षित होगी।

शरीर के विभिन्न अंगों की भिन्न-भिन्न अंतःस्त्रावी ग्रंथियां- चिंता, क्रोध, घृणा, लोभ, कामुकता, द्वेष, तनाव आदि के समय एक विशेष प्रकार के जहर का स्राव करने लग जाती हैं। यह स्राव स्वस्थ शरीर और स्वस्थ चिंतन दोनों के लिए घातक है।

             इस पर वैज्ञानिकों ने खोज किया। प्रसन्नता की अधिकता में गिरे हुए अश्रुओं तथा दुख तनाव में बहे अश्रुओं, दोनों का निरीक्षण किया गया तो पाया गया कि दुख एवं तनाव में बहे अश्रु गर्म थे तथा उसमें शरीर के लिए हानिकाक तत्त्व भारी मात्रा में विद्यमान थे। सके विपरीत प्रसन्नता में गिरे अश्रु अपेक्षाकृत ठंढे थे तथा उसमें शरीर एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी तत्त्वों का समावेश था।

स्रोत: चिंता क्यों

7. परिस्थितियां परिवर्तनशील

7. परिस्थितियां परिवर्तनशील


परिस्थितियां परिवर्तनशील

      याद रखें, परिस्थितियां परिवर्तनशील हैं। भगवान राम को देखें, जब उन्हें वनवास मिला तो संपूर्ण अयोध्यावासी रो उठे। सीता और लक्ष्मण के साथ राम वन की ओर प्रस्थान कर रहे हैं, यह सुनकर संपूर्ण अयोध्या में हाहाकार मच गया। सब-के-सब उनके रथ के पीछे रोते-कलपते चलने लगे। शोकविह्वल प्यारे प्रजावासियों को जब राम ने काफी समझाया बुझाया, तब कहीं सब वापस लौटे।

परिस्थितियां परिवर्तनशी

         परिस्थितियां बदलीं। राम जानकी जी को रावण से छुड़ाकर लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौट आए हैं। कल जिस अयोध्यावासियों के लिए भगवान राम, सीता और लक्ष्मण प्राण थे-आज निंदनीय हैं। एक धोबी मां जानकी पर आक्षेप लगा रहा है, यह सुनकर मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने गुप्तचरों को ज्ञात करने भेजा, ‘इस संबंध में अन्य प्रजाजनों की क्या प्रतिक्रिया है?’ गुप्तचरों ने सूचना दी- ‘बहुसंख्यक जनता धोबी की बातों से सहमत है।’

          देखिए, वह मान जो वन जाते समय था, आज नहीं है। पुनः दृश्य बदला। मां जानकी धर्म और सत्य के प्रताप से भूगर्भ में समा गईं। अयोध्यावासी पश्चात्ताप और ग्लानि से भर उठे। अंततः उन्होंने सीताजी को देवी समझ अपने हृदयासीन किया। जो अपमान था, वह भी गुजर गया।

दुःख लेने जावै नहीं, आवा आचाबूच।

सुख का पहरा होयगा, दुःख करेगा कूच।।     (कबीर साखी दर्पण, भाग-२)

         अर्थात् ‘दुख लेने कोई जाता नहीं। वह अचानक ही आता है, किंतु वह स्थायी नहीं है। जब सुख का पहरा आएगा, तब दुख स्वतः चला जाएगा।’

महाभारत के शांति पर्व १७४/१९ में भी कहा गया है-

सुखस्यानन्तरं दुख दुखस्यानन्तरं सुखम्।

सुखदुखं मनुष्याणां चक्रवत् परिवर्तते ।।

         अर्थात् ‘सुख के पश्चात् दुख औ दुख के पश्चात् सुख होता है। यह शाश्वत नियम है। मनुष्यों के सुख-दुख पहिये की भांति घूमते रहते हैं।

     इस रहस्य को जानकर अहंकार और तनाव दोनों से ऊपर उठकर शांत और आनंदमग्न जीवन जीने की कला सीख लें। याद रखें, समस्या का समाधन चिंता नहीं है। जिंदगी के किसी मोड़ पर यदि आप किसी समस्या से घिर गए हों, विकट परिस्थितियां सामने खड़ी हो, अपमान, गरीबी, दुख, रोग, कष्ट से आप परेशान हों, फिर भी न घबराएं। पुनः याद रखें, ‘यह भी गुजर जाएगा।’

         व्यावहारिक दृष्टि से भी सोचें तो किसी समस्या का समाधान चिंता नहीं है। चिंता से समस्याएं बढ़ती हैं, घटती नहीं। यदि आप चिंताग्रस्त रहते हों तो न आप सही तरीके से कुछ सोच सकते हैं, न अच्छी योजना बना सकते हैं, न ही अपनी कार्यशक्ति को समस्याओं से उबरने के मार्ग में सही ढंग से नियोजित कर सकते हैं । इतनी हानि उठाने के बाद भी तो समस्याएं ज्यों-की -त्यों बनी रहती है।

          जैसे मान लिया किसी प्रतिकूल व्यक्ति, वस्तु परिस्थिति से आपको सामना करना पड़ रहा हो और आप काफी परेशान हों, चिंतित हों, व्यथित हों, उद्विग्न हों, रोते-रोते आंखें सूजा ली हों, रात की नींद उड़ा ली हों, भोजन न रुचता हो, किसी काम में मन न लगता हो, मन-मस्तिष्क चिड़चिड़ा सा हो गया हो, थकावट और सुस्ती ने आ घेरा हो तो आप ही बताइए इससे फायदा क्या हुआ?

        क्या परिस्थितियां बदल गई? ऋण चुक गया? समस्याएं मिट गई? कुछ भी तो नहीं हुआ। यदि ऐसा हो तो खूब चिंतित होइए, खूब परेशान होइए, रात-रात भर जागिए, खाना-पीना छोड़ दीजिए, खूब रोइए, सिर पटक-पटक कर फोड़ डालिए, दो-चार टांके भी लगेगें तो क्या हर्ज है शायद परिस्थितियां बदल जाएं, समस्याएं टल जाएं।

            सोचिए, सिर फोड़ लेने से, रोने से, चिंतित होने से न तो परिस्थितियां बदलती हैं और न ही समस्यों का समाधान ही होता है तो फिर चिंता क्यों? तनाव क्यों, परेशानी क्यों? लाभ क्या? कुछ भी नहीं बस हानि-ही-हानि । एक तो बाहर चिंता का कारण ज्यों-का-त्यों बना रहा और दूसरा अंदर से अशांत, विक्षिप्त, दुखी हुआ गया सो अलग।

             ठीक ही कहा गया है- ‘मनुष्य के जीवन में अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियां आती रहती हैं। इसके लिए शोक या चिंता करना उचित नहीं, क्योंकि परिस्थितियों को अनुकूल करने की शक्ति न शोक में है न चिंता में है, यह युक्तियुक्त उद्योग से ही अनुकूल होती है।’-शातातप

          वणिकों से शिक्षा लें। एक चीज में घाटा होने पर वे सभी चीजों को घाटा में नहीं बेच देते। मान लिया जाय, किसी दुकानदार को गेहूँ में घाटा लग रहा है तो वह दाल, मसाला, चावल, चीनी इत्यादि को शौक से घाटा में नहीं बेच देता। उसी तरह अगर बाहर प्रतिकूल परिस्थितियों से सामना करना पड़ रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं कि अंदर की शांति को भी खोकर दुगुनी क्षति उठाने की मूर्खता की जाय। आप कम-से-कम अंदर की क्षति को तो रोकने में पूर्ण समर्थ हैं।

            बाहर के सुख-दुख, लाभ-हानि, अनुकूलता-प्रतिकूलता भले ही भाग्य के खेल हों, परंतु अंदर की अशांति, चिंता-तनाव आदि आपकी नासमझी है। आप इससे उबरकर हर परिस्थिति में शांत और प्रसन्न रहकर मुस्करा सकते हैं।

              जो व्यक्ति समस्याओं के सामने आने पर भी मुस्कराता रहता है और अपना साहस नहीं छोड़ता, उसे छोड़कर समस्याएं भाग खड़ी होती हैं। इसके विपरीत जो समस्याओं के समक्ष हिम्मत हार बैठता है और अपनी सूरत रोनी-सी बना लेता है, समस्याएं उस पर चारों तरफ से आक्रमण करती रहती है।

             किसी ने ठीक ही कहा है, ‘तुम उदास रहते हो तो दुख तुम्हें चारो तरफ से घेर कर तुम पर टूट पड़ता है। तुम मुस्करा देते हो तो दुख तुम्हें छोड़कर कमरे से बाहर दरवाजे के पास ठिठक कर खड़ा हो जाता है। अगर तुम खिलखिला कर हंस पड़ते हो तो दुख तुम्हें छोड़कर दूर भाग जाता है। अतः दुखमुक्त होना चाहो तो प्रसन्न हने की कला सीखो।

स्रोत: चिंता क्यों

6. यह भी गुजर जाएगा

6. यह भी गुजर जाएगा


यह भी गुजर जाएगा

              एक राजा था। उसने अपने राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि कोई ऐसा सूत्र बतलावे जो दुःख-सुख, लाभ-हानि, जीवन-मरण, आया, जीत-हार, अपने-पराये सभी परिस्थितियों में समान लाभदायी हो। महीनों बीत गए। किसी के दिमाग में ऐसा सूत्र नहीं जो सभी परिस्थितियों में समान लाभदायी हो। राजा जंगल की ओर बढ़ गया। कुछ दूर जाने पर एक संत एक पेड़ के नीचे बैठे दिखाई दिए। राजा की आंखों में आशा की ज्योति चमकी। उन्होंने संत के चरणों में नतमस्तक हो नम्रतापूर्वक अपने प्रश्न को श्रीचरणों में निवेदन किया।

यह भी गुजर जाएगा

            महात्मा हंसे। एक कागज पर कुछ लिखकर उसे एक ताबीज में बंद कर राजा के गले में पहनाते हुए बोले-‘वत्स! यह सूत्र सभी अवसरों में समान लाभदायी है। जब कभी अवसर आए, इससे लाभ ले लेना। ‘

          संतचरणों में नतमस्तक हो राजा अपने राज्य लौट आया। ताबीज गले में लटकती रही और राजा राज्यकार्य में व्यस्त रहा। समय व्यतीत होता गया। दो वर्ष बीत गए। एक बार पड़ोसी देश के राजा ने उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया। सेनाएं तैयार न थीं, अतः घबराए हुए उसके सैनिकों को रौंदती हुई पड़ोसी देश की सेना राजमहल में प्रवेश कर गई। परेशान राजा भयभीत हो प्राण रक्षा के उद्देश्य से भाग निकला। पीछे-पीछे शत्रु सेना और आगे-आगे घोड़े पर सवार राजा।

           किंकर्तव्यविमूढ राजा बेतहाशा घोड़े को दौडाए जा रहा था। अचानक घोड़ा बिदका और ठिठककर रूक गया। सामने एक गहरा खड्ड था। खड्ड लांघना कठिन था। भयभीत राजा शीघ्रता से पास की झाड़ी में जा छुपा। पसीने से लथपथ वह थर-थर कांप रहा था कि सहसा उसे ताबीज का ख्याल आया। ताबीज खोला तो उसमें रखे पूर्जे में एक छोटा सा वाक्य लिखा था-‘यह भी गुजर जाएगा।’

            पढ़कर राजा सोचने लगा- ‘सचमुच आज तक न जाने जीवन में क्या-क्या आया, क्या-क्या देखा, क्या-क्या पाया- लेकिन कुछ भी ठहरा नहीं, गुजरते चला गया। मान-अपमान, सुख-दुख, अच्छा-बुरा कितना कुछ आया, किंतु सब-के-सब गुजरते चला गया। घबराहट कुछ कम हुई। उसे विश्वास हो गया, निश्चय ही ‘यह भी गुजर जाएगा।’

             अब तक वह परेशान था, भयभीत था, घटना का नायक भोक्ता था, अब वह द्रष्टा है, शांत, निश्चित, प्रसन्न। सचमुच कुछ ही देर बाद दुश्मन के घोड़ों की टापों की आवाज कम होने लगी। शायद दुश्मन रास्ता भटक गए थे। राजा श्रद्धा-भक्तिपूर्वक ताबीज पहना और वहाँ से निकल पड़ा। कुछ दिन बाद पुनः सैन्य संगठन कर वह शत्रुओं पर धावा बोल दिया और अंततः विजयी हुआ।

दृश्य का परिवर्तन

           अब उसके राज्य में चारों ओर खुशियाँ मनाई जा रही है। दीपमालाएँ सजाई गई हैं। राजमहल सजाया गया है। चारो ओर उत्सव का-सा वातावरण है। विजयी राजा अपने महल की ओर लौट रहा है। सभी उनपर फूलों की वर्षा कर रहे है। महल के पास आकर राजा सहसा रुक गया। ताबीज निकाला और पढ़ा-‘यह भी गुजर जाएगा।’ राजा हंसने लगा।

लोग पूछे-‘आप हंस क्यों रहे हैं?”

राजा ने कहा-‘हंसने की ही तो बात है। यहाँ कुछ भी नहीं ठहरता, सभी गुजर जाते हैं। काल की वेगवती धारा में सब बहे जा रहे हैं लेकिन… !” सहसा राजा कुछ गंभीर हो गया और सोचने लगा-‘क्या इस गुजरने वाली भीड़ में न गुजरने वाला कोई स्थायी तत्त्व नहीं है? और यदि है तो उसे ढूंढना चाहिए।’

         राजा पुनः संत के पास गया और अपनी जिज्ञासा को संत चरणों में निवेदित किया।

संत बोले, ‘न गुजरने वाला स्थायी तत्त्व कहीं खो नहीं गया है, जो उसे ढूंढोगे। वह तो नित्य प्राप्त है। गुजरने वाली वस्तु से संबंध न जोड़, इसका भोक्ता न बन, द्रष्टा बन जा, स्वयं अविनाशी तत्त्व का बोध हो जाएगा। वह अविनाशी न गुजरने वाला तत्त्व तू ही है।’

          राजा सुखी हो गया। राज्य किया पर द्रष्टा बनकर। ‘यह भी गुजर जाएगा’– इस बोध को पाकर वह सुख में ‘अहंकार और राग’ तथा दुख में ‘तनाव और द्वेष’ दोनों से ऊपर उठकर ‘स्व’ में स्थित हो आनंदमग्न हो गया।

        ठीक ही कहा गया है, ‘यदि जीवन है तो सुख एवं दुख, उन्नति या विपत्ति का क्रम बना ही रहता है। इस विश्व में कोई ऐसा नहीं हुआ, जिस पर विपत्ति नहीं आई हो। अतः इस पर चिंता करना व्यर्थ है विपत्ति का निस्ताण धैर्य एवं युक्तिपूर्ण पौरुष से होता है, चिंता से नहीं।’– महात्मा विदूर

         इसलिए सद्गुरु कबीर साहब कहते हैं-

कबीर मैं तबही डरूँ, जो मुझ ही में होय।

मीच बुढ़ापा आपदा, सब काहु को जोय।।       – (कबीर साखी दर्पण, भाग-२)

         अर्थात् ‘ कबीर साहब कहते हैं, मैं तब डरूं जब केवल मुझमें ही होता हो, परंतु मृत्यु, बुढ़ापा, आपदा तो सब किसी में देखा जाता है। फिर दुख और डर कैसा?”

स्रोत:चिंता क्यों

5. आपका मददगार आप स्वयं हैं

5. आपका मददगार आप स्वयं हैं


आपका मददगार आप स्वयं हैं⇒

             आप सोचते हैं, कोई दृश्य-अदृश्य मददगार आवे जो आपको संकट से मुक्त करे। आप मददगार दूर कहां ढूंढते हैं? मददगार तो आपके पास है। आप ही अपने मददगार हैं। आपकी जीवटता, साहस, धैर्य और किसी भी पहलू को विधेयक रूप में देखने- विचारने की प्रवृत्ति ही आपका सच्चा मददगार है।

          निराशा के स्थान पर आशा, भय के स्थान में निर्भयता, हतोत्साह के स्थान पर उमंग और विश्वास, अकर्मण्यता के स्थान पर कर्मठता, भूत-भविष्य के व्यर्थ की चिंताओं में सिर खपाने के स्थान पर वर्तमान को सुनहला बनाने के संकल्प को अपनाइए। यह आपके जीवन को आनंद और सफलताओं से साराबोर कर देगा। विधेयक विचारों के अंतर्गत पुनः रामबाण चार सूत्र दिए जाते हैं, जिसे अपनाने पर निश्चय ही आप आशातीत शांति पाएंगे-

आपका मददगार आप स्वयं हैं

1. चिंताजन्य परिस्थिति का ईमानदारीपूर्वक विश्लेषण कीजिए और पता लगाइए कि यदि आप असफल हुए तो कौन-सा अनिष्ट घटित हो सकता है।

2. संभावित अनिष्ट को निर्भयतापूर्वक स्वीकार कर लीजिए। अपनी परिस्थति को यथावत स्वीकार कर लेने की हिम्मत रखना किसी भी दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम प विजय पाने का पहला चमत्कारिक कदम है।

3. तदुपरांत शांतिपूर्वक विचार करें कि स्वीकृत अनिष्ट से उबरने के कौन-कौन से उपाय हो सकते हैं। गहन चिंतन-मनन से जो उपाय आपको दिखते हैं, उन्हें किसी पन्ने पर नोट करें।

4. उन लिखे उपायों में से मंथन करके सर्वश्रेष्ठ उपाय को ढूंढ निकालिए और अपने समस्त सामर्थ्य के साथ; आत्मविश्वास, उत्साह, कर्मठता के साथ उसमें जुट जाइए। मन में संकल्प लाइए कि जो होगा उसे सहर्ष झेल लेंगे, पर बिना युद्ध किए (अनिष्ट, असफलता पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न किए बिना) हार नहीं मानेंगे।

            उपरोक्त सूत्रों को अपनाते के साथ आप तत्काल शांति, उत्साह और जोश का अनुभव करेंगे। किसी अनिष्ट की आशंका से कांपते रहने की अपेक्षा डटकर उसका सामना करना श्रेष्ठ है।

स्रोत: चिंता क्यों

4. जो बांटोगे वही पाओगे

4. जो बांटोगे वही पाओगे


जो बांटोगे वही पाओगे

जो बांटोगे वही पाओगे

             जो पाना चाहते हैं, उसे बांटना शुरू कर दें। एक दोहा है-

सब सन्तन के एक मत, बात कही है दोय।

सुख देवे सुख होत है, दुख देवे दुख होय।।

              अर्थात् दूसरों को सुख देने पर स्वयं सुख मिलता है और दूसरों को दुख देने पर दुख। अतएव सुख चाहते हैं तो सुख बांटना शुरू कर दें, दुखियों की मदद करें, गिरते को सहारा दें। धन चाहते हैं तो इसे मिथ्या भोग-विलास से बचाकर धर्मार्थ, लोकहितार्थ उत्सर्ग करना सीखें। मान चाहते हैं तो मान देना सीखें। आपत्ति-विपत्ति में दूसरों की मदद चाहते हैं तो आपत्ति-विपत्ति में पड़े लोगों की यथाशक्ति मदद करना सीखे। विवेक-बुद्धि का विकास चाहते हैं तो प्राप्त बुद्धि से लोगों को ज्ञान और सहारा देना सीखें। क्षमा चाहते हों तो क्षमा करना सीखें। नित्य जीवन की इच्छा है तो प्राप्त जीवन को सद्प्रयोजनों में सन्नद्ध करना सीखें।

             अधिकारों को गौण एवं कर्तव्यों को प्रधान जाने। माता-पिता, परिवार, बच्चे, समाज, राष्ट्र, स्वधर्म के प्रति निर्धारित अपने कर्तव्यों को स्वार्थ तले कुचल न डालें। अपने कर्तव्यों-दायित्वों को सभी के प्रति ठीक-ठीक निर्वहण करें।

             विवेक को विकसित करें। अमूल्य मानव तन का उद्देश्य परिवार बढ़ाने, भोग भोगने और शरीर पोषण तक सीमित नहीं है। ऐसा तो सभी पशु-पक्षी, कीट-पतंगे भी करते हैं। यदि इतना ही कर्तव्य होता तो भगवान मानव को पशुओं से विलक्षण विवेक बुद्धि, अगणित प्रतिभासम्पन्न एवं सत्यासत्य निर्णय की क्षमता से युक्त क्यों बनाते?

              इस विलक्षण बुद्धि और प्रतिभा का दुरुपयोग पशुवत् जीवन जीकर न करें। आप स्वतंत्र हैं कि प्राप्त जीवन सम्पदा का दुरुपयोग कर नर से नरपशु बन जाएं या इसका सदुपयोग कर नर से नारायण; जीवत्व से शिवत्व की ओर अग्रसर हों या जीवत्व से शवत्व की ओर।

               याद रखें-जो चिंतन और चरित्र मानवीय गरिमा के अनुरूप हो और नर से नारायण बनने के क्रम में प्रेरित करता हो, वही धर्मसम्मत एवं सुखदायी है तथा जो नर से नारायण की दिशा में न ले जाकर नर से नरपिशाच, नरपशु बनाता हो, वह अधर्म और दुखदायी है, चाहे शास्त्रसम्मत ही क्यों न दिखता हो।

             अतएव विवेक बुद्धि के द्वारा मानव से महामानव तथा नर से नारायण बनने के क्रम में ही अपने चिंतन और आचरण का विकास करें। रात्रिशयन के पूर्व एक बार मनोविश्लेषण अवश्य कर लें कि आज आपके चिंतन और चरित्र से किसका पोषण हुआ असुरत्व-पशुत्व का या देवत्व-मनुजत्व का। चुन-चुन कर अपने दुर्गुणों-दुष्प्रवृत्तियों का मूलोच्छेद करें औ संपूर्ण सद्गुणों को अपने में अभिवर्धन।

स्रोत : चिंता क्यों करें 

General Geography Capsule 4

General Geography Capsule 4

सामान्य भूगोल


General Geography Capsule 4

एक नजर में इसे जरुर पढ़ें

1.  क्षुद्र ग्रह स्थित है-

उत्तर- मंगल और वृहस्पति ग्रह के बीच

2. सूर्य के उतरायन और दक्षिणायन की सीमा को कहते है-

उत्तर- संक्राति (कर्क और मकर संक्रांति)

3. भारत वर्ष की जल क्षेत्र सीमा (प्रादेशिक) फैली हुई है-

उत्तर-  12 नॉटिकल मील तक

4. 1 नॉटिकल मील (समुद्री मील) बराबर होता है-

उत्तर-  1.852 किमी.

5. किसी स्थान पर दो ज्वारों के बीच का अंतराल होता है-

उत्तर-  12घंटा 26 मिनट

6. ज्वार के कितने समय बाद भाटा आता है-

उत्तर-  6घंटा 13 मिनट

7. ज्वार-भाटा उत्पन्न होने का कारण है-

उत्तर- सूर्य एवं चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण शक्ति

8. सीस्मोग्राफ (भूकंपमापी) की खोज किसने किया था-

उत्तर- जॉन मिल ने

9. पृथ्वी पर जल भाग है-

उत्तर- 71 %

10. महासागरों की औसत गहराई है-

उत्तर- 4000 मी०

11. समुद्री तल की औसत लवणता होती है-

उत्तर- 35 ‰ (प्रति हजार ग्राम)

12. सर्वाधिक लवणता पायी जाती है-

उत्तर- तुर्की के वॉन झील में (330‰)

13. पृथ्वी पर जलमंडल का स्वच्छ जल क्षेत्र है-

उत्तर- 2.7 भाग

14. समुद्री लवणता में सर्वाधिक मात्रा में पाया जाने वाला तत्व है-

उत्तर- सोडियम क्लोराइड

15. लवणता के संघटकों में सबसे ज्यादा मिलने वाला तत्व है-

उत्तर- क्लोरीन

16. पृथ्वी के चारों ओर का गैसीय आवरण कहलाता है-

उत्तर- वायुमंडल

17. वायु हैं-

उत्तर- गैसों का मिश्रण

18.  वायुमंडल में सर्वाधिक मात्रा में पाई जाने वाली गैस है-

उत्तर- नाइट्रोजन (78.03%)

19. वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा होती है-

उत्तर- 0.03%

20. वायुमंडल में सर्वाधिक मात्रा में विद्यमान अक्रिय गैस है-

उत्तर- आर्गन (0.93)

21. वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा होती है-

उत्तर- 5%

22. पृथ्वी पर पहुँचने वाली सौर विकिरण की मात्रा है-

उत्तर- 51%

23. वायुमंडल की सबसे निचली परत है-

उत्तर- क्षोभमण्डल

24. वायुमंडल की सबसे बाहरी परत है-

उत्तर- बहिर्मंडल

25. मौसम परिवर्तन से संबंधित सभी घटनाएँ घटित होती है-

उत्तर- क्षोभमण्डल

26. क्षोभमंडल की ऊंचाई (मोटाई) में वृद्धि होती है-

उत्तर- ग्रीष्म ऋतु में

27. क्षोभ मंडल में उपर जाने पर प्रति 165 मी. की ऊँचाई पर ताप घटता है-

उत्तर- 1ºC

28. क्षोभ मंडल में प्रति 1 किमी. की ऊँचाई पर जाने पर ताप घटता है-

उत्तर- 6.5ºC

29. क्षोभमंडल का विस्तार ध्रुवों तथा विषुवत रेखा पर होती है-

उत्तर- क्रमशः 8 किमी. तथा 18 किमी.

30. सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों से रक्षा करती है-

उत्तर- ओजोन परत

31. पृथ्वी का ‘रक्षा कवच’ कहा जाता है-

उत्तर- ओजोन परत को

32. ओजोन परत को नष्ट करने वाली गैस है-

उत्तर- क्लोरो-फ्लोरोकार्बन

33. वातावरण तथा जीवमंडल के बीच का संबंध कहलाता है-

उत्तर- पारिस्थितिकी (Ecosystem)

34. जेट विमान तथा हवाई जहाज उड़ते है-

उत्तर- समताप मण्डल में

35. रेडियो तथा संचार उपग्रह किस मण्डल से संचारित होते हैं-

उत्तर- आयन मण्डल

36. उल्का से संबंधित अधिकांश घटनाएँ होती है-

उत्तर- मध्यमण्डल में

37. अंतरिक्ष यात्री तथा उपग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते है-

उत्तर- बहिर्मंडल में

38. बहिर्मंडल की प्रधान गैसें है-

उत्तर- हीलियम और हाइड्रोजन

39. पृथ्वी के ताप को बनाये रखता है-

उत्तर- जलवाष्प तथा CO2

40. वायु में जल की उपस्थिति कहलाती है-

उत्तर- आर्द्रता

41. वायुमंडल की आर्द्रता की माप की जाती है-

उत्तर- हइग्रोमीटर

42. ग्रीन हाउस गैसें है-

उत्तर-  CO2 तथा क्लोरोफ्लोरोकार्बन 

43. सागर तल से समान वायुदाब वाले क्षेत्रों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा कहलाती है-

उत्तर-  समदाब रेखा

44. वायुमंडलीय दाब को मापने वाला यंत्र कहलाता है-

उत्तर-  बैरोमीटर

45. किसी भी देश का मानक समय  का निर्धारण ग्रीनवीच मीन टाइम से कितने गुणक पर किया जाता है-

उत्तर- आधे घंटे के गुणक पर

46. सबसे अधिक समय जोन किस देश में बनाया गया है-

उत्तर- रूस

47. विश्व का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी पर्वत है-

उत्तर- कोटापैक्सी (इक्वाडो)

General Geography Capsule 4

कोटापैक्सी

48. अंत: सागरीय भूकम्पों द्वारा उत्पन्न लहरों को जापान में कहा जाता है-

उत्तर- सुनामी

49. विश्व की सबसे लम्बी रिफ्ट घाटी है-

उत्तर- जॉर्डन नदी घटी

50. आगरा का किला तथा दिल्ली का लाल किला किस अवसादी चट्टानों से निर्मित है-

उत्तर- बलुआ पत्थर 

General Geography Capsule 3

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सामान्य भूगोल


General Geography Capsule 3

एक नजर में इसे जरुर पढ़ें

1. सूर्य और पृथ्वी की बीच की दूरी अधिकतम (15.2 करोड़ किमी०) अर्थात अपसौर होती है-

उत्तर- 4 जुलाई को

2. सूर्य और पृथ्वी की बीच की दूरी न्यूनत्तम (14.73 करोड़ किमी०) अर्थात उपसौर होती है-

उत्तर- 3 जनवरी को

3. उपसौरिक एवं अपसौरिक को मिलाने वाली रेखा कहलाती है-

उत्तर- एपसाइड रेखा

4. वर्तमान भूगोल का जनक किसे कहा जाता है-

उत्तर- हम्बोल्ट को

5. व्यवस्थित भूगोल का जनक किसे कहा जाता है-

उत्तर- इरैटोस्थनीज

6. सूर्य प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में समय लगता है-

उत्तर-  लगभग 8 मिनट

7. सौर ज्वाला को उत्तरी ध्रुव पर कहा जाता है-

उत्तर- आरोरा बोरियालिस

8. सौर ज्वाला को दक्षिणी ध्रुव पर कहा जाता है –

उत्तर- आरोरा ऑस्ट्रेलिस

9. पृथ्वी अपने अक्ष पर कितने कोण पर झुकी हुई है-

उत्तर- 23½º

10. ग्लोब पर उत्तर से दक्षिण की ओर खीची जाने वाली काल्पनिक रेखा है-

उत्तर- देशांतर रेखा

11. ग्लोब पर पश्चिम से पूरब की ओर खींची गई काल्पनिक रेखा है-

उत्तर- अक्षांश रेखा

12. दो अक्षांश रेखाओं के मध्य दूरी होती है-

उत्तर- 111 किमी०

13. विषुवत रेखा पर दो देशान्तर रेखाओं के मध्य दूरी होती है-

उत्तर- 111.32 किमी०

14. दो देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी को कहा जाता है-

त्तर- गोरे

15. ग्लोब पर देशान्तर रेखाओं की कुल संख्या होती है-

उत्तर- 360

16. ग्लोब पर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या होती है-

उत्तर- 179 

17. पृथ्वी एक घंटे में घुमती है-

उत्तर- 15देशांतर

18. 23½ उत्तरी अक्षांश  रेखा कहलाता है-

उत्तर- कर्क रेखा

19. 23½ दक्षिणी अक्षांश रेखा कहलाता है-

उत्तर- मकर रेखा

20. 66½ उत्तरी अक्षांश रेखा कहलाता है-

उत्तर- आर्कटिक रेखा

21. 66½ दक्षिणी अक्षांश  रेखा कहलाता है-

उत्तर- अंटार्कटिक रेखा

22. 1° देशान्तर के बीच का अंतर होता है-

उत्तर- 4 मिनट 

23. पृथ्वी को 1° देशान्तर पार करने में समय लगता है-

उत्तर- 4 मिनट

24. कर्क संक्रांति (उत्तरी अयनांत) एवं मकर संक्रांति (दक्षिणी अयनांत) होता है-

उत्तर- क्रमशः 21जून तथा 22 दिसंबर को

25. 0° से 30° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य का भाग कहलाता है-

उत्तर- उष्णकटिबंधीय क्षेत्र

26. 0° अक्षांश तथा 0º देशान्तर रेखा स्थित है-

उत्तर- अटलांटिक महासागर में

27. 45º से 66½º उत्तरी और दक्षिणी अक्षांशों के मध्य का भाग कहलाता है-

उत्तर- शीतोष्ण कटिबंधीय

28. 0° से 5° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश का क्षेत्र कहलाता है-

उत्तर- डोलड्रम या शांत पेटी

29. 40º  दक्षिणी अक्षांश (पछुआ पवन) का क्षेत्र कहलाता है-

उत्तर- गरजता चलीसा

30. 50º  दक्षिणी अक्षांश (पछुआ पवन) का क्षेत्र कहलाता है-

उत्तर- प्रचण्ड पचासा

31. 60º  दक्षिणी अक्षांश (पछुआ पवन) का क्षेत्र कहलाता है-

उत्तर- चीखता साठा

32. जब ‘पृथ्वी’ सूर्य और चन्द्रमा के बीच आ जाती है, तो होता है-

उत्तर- चन्द्रग्रहण

33. जब ‘चन्द्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है, तो होता है-

उत्तर- सूर्यग्रहण

34. पूर्ण सूर्यग्रहण हमेशा होता है-

उत्तर- अमावस्या के दिन

35. पूर्ण चन्द्रग्रहण हमेशा होता है-

उत्तर- पूर्णिया के दिन

36. सम्पूर्ण पृथ्वी पर दिन-रात बराबर होता है-

उत्तर- क्रमशः 21 मार्च तथा 22 दिसंबर को

37. पृथ्वी पर दिन-रात किस गति के कारण होता है-

उत्तर-  घुर्णन गति

38. पृथ्वी के मध्य से होकर जाने वाली अक्षांश रेखा है-

उत्तर- विषुवत या भूमध्यरेखा

39. विषुवत रेखा पर दिन और रात की अवधि होती है-

उत्तर- बराबर

40. वसंत विषुव (Vernal Equinox) तथा शरद विषुव (Autumn Equinox) कहलाता है-

उत्तर- क्रमशः 21 मार्च और 23 दिसंबर

41. 0° देशान्तर को कहा जाता है-

उत्तर- प्रधान देशांतर रेखा या ग्रीनवीच रेखा 

42. 0º देशान्तर रेखा (ग्रीनवीच मीन टाइम) स्थित है-

उत्तर- इंग्लैण्ड में

43. भारत का मानक समय, जो प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) के नैनी से गुजरती है-

उत्तर- 82½º पूर्वी देशांतर रेखा को

44. भारतीय मानक समय तथा ग्रीनवीच समय के मध्य अंतर है-

उत्तर- 5 घंटा 30 मिनट आगे

45. अंतराष्ट्रीय तिथि रेखा माना गया है-

उत्तर- 180º देशांतर रेखा को 

46. 180° देशान्तर को वाशिंगटन सभा में अंतराष्ट्रीय तिथि रेखा माना गया-

उत्तर- 1884 ई० में

47. अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के समानान्त स्थित है-

उत्तर- बेरिंग जल संधि

General Geography Capsule 3

बेरिंग जल संधि

48. पृथ्वी पर सबसे लम्बा दिन उत्तरी गोलार्द्ध तथा दक्षिण गोलार्द्ध में होता है-

उत्तर- क्रमशः 21 जून तथा 22 दिसंबर 

49. पृथ्वी पर सबसे छोटा दिन उत्तरी गोलार्द्ध तथा दक्षिण गोलार्द्ध में होता है-

उत्तर- क्रमशः 22दिसंबर तथा 21 जून को 

50. विश्व ग्लोब के निर्माता है-

उत्तर- मार्टिन बैहम 

General Geography Capsule 2

General Geography Capsule 2

सामान्य भूगोल


General Geography Capsule 2

एक नजर में इसे जरुर पढ़ें

1.  नील नदी का उद्दगम स्थल है-

उत्तर- विक्टोरिया झील

2. आस्वान बाँध निर्मित है-

उत्तर- नील नदी पर

3. विश्व की सबसे बड़े हीरे की खान है-

उत्तर- किम्बरले खान (अफ्रीका)

4. अफ्रीका के उष्णकटिबंधीय घास के मैदान को कहा जाता है-

उत्तर- सवाना

5. अफ्रिका के शीतोष्ण कटिबंधीय घास के मैदान को कहा जाता है-

उत्तर- वेल्ड  

6. अटाकामा मरुस्थल स्थित है-

उत्तर- चिली (दक्षिण अमेरिका) में

7.  मकरान किस देश के समुद्रतट का भौगोलिक नाम है-

उत्तर- पाकिस्तान

8. एण्डीज पर्वतमाला (द० अमेरीका) की सबसे ऊँची चोटी है-

उत्तर- एकांकागुआ

9. दक्षिणी अमेरिका का सबसे बड़ा नगर है-

उत्तर- ब्यूनस आयर्स

10. सारगैस सागर अवस्थित है-

उत्तर- उत्तरी अतलांतिक महासागर में

11. अर्द्धमहासागर कहा जाता है-

उत्तर- हिन्द महासागर को

12. टॉरनेडो नामक भयंकर चक्रवात आती है-

उत्तर- USA के मिसीसिपी घाटी में

13. जापान सागर तथा चीन सागर के समीपवर्ती भाग में आने वाला चक्रवात कहलाता है-

उत्तर- टायफून

14. कर्क रेखा, विषुवत रेखा एवं मकर रेखा तीनों किस महादेश से होकर गुजरती है-

उत्तर-  अफ्रीका महादेश से

15. एशिया महाद्वीप को यूरोप महाद्वीप से अलग करता है-

उत्तर- काकेशस पर्वत

16. विश्व की प्रसिद्ध मक्का मंडी है-

उत्तर- सेंट लुईस (USA) में

17. ब्लैक फॉरेस्ट पर्वत (जर्मनी) उदाहरण है-

उत्तर- भ्रंशोत्थ पर्वत का 

18. बोर्निया द्वीप स्थित है-

उत्तर- प्रशांत महासागर में

19. ‘भूमध्य सागर की कुंजी’ कहा जाता है-

उत्तर-  जिब्राल्टर जलसन्धि को

20. भूगोल का पिता कहा जाता है-

उत्तर-  हिकेटियस को

21 एशिया एवं यूरोप के बीच सीमा निर्धारण का कार्य करता है-

उत्तर-  यूराल पर्वत

22. स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी स्थित है-

उत्तर- लिपारी द्वीप (इटली) में

23. ‘रोटी की डलिया’ कहलाता है-

उत्तर- युक्रेन (यूरोप)

24. विश्व में गंधक उत्पादन में अग्रणी देश है-

उत्तर- USA

25. मृतसागर अवस्थित है-

उत्तर- जॉर्डन एवं इजरायल के बीच

26. ‘पूर्व का मोती’ कहा जाता है-

उत्तर- श्रीलंका को

27. रूर घाटी स्थित है-

उत्तर- जर्मनी में

28. नई दुनिया के नाम से जाना जाने वाला महाद्वीप है-

उत्तर- उत्तरी अमेरिका

29. मिस्ट्रल स्थानीय पवन है-

उत्तर-  स्पेन एवं फ़्रांस की (ठंडी पवन)

30. मैस्ट्रेल स्थानीय पवन है-

उत्तर- उतरी इटली  की (ठंडी पवन)

31. ‘येलोस्टोन पार्क स्थित है-

उत्तर- USA में

32. विश्व का सबसे व्यस्त नहर है-

उत्तर- कील नहर

33. विश्व की सबसे व्यस्त व्यापारिक नदी है-

उत्तर- राईन नदी

34. विश्व का सर्वाधिक विश्वासघाती नदी है-

उत्तर- हांगहो नदी

35. स्वेज नहर का निर्माण हुआ था-

उत्तर- 1869 ई० में

36. स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण हुआ था-

उत्तर- 1956 ई० में

37. पनामा नहर का निर्माण हुआ था-

उत्तर- 1914 ई० में 

38. कलाहारी मरुस्थल स्थित है-

उत्तर- बोत्सवाना (द०-प० अफ्रीका)

39. बेलग्रेड तथा वियना स्थित है-

उत्तर- डेन्यूब नदी के किनारे

40. रोम किस नदी के किनारे स्थित है-

उत्तर- टाईबर नदी

41. बद्दू जनजाति निवास करती है-

उत्तर- अरब के रेगिस्तान में

42. एशिया की सबसे लम्बी नदी का नाम है-

उत्तर- यांगटीसीक्यांग

43. संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान है-

उत्तर- मसिनराम (मेघालय)

44. एशिया का सबसे बड़ा मरूस्थल है-

त्त– गोबी (मंगोलिया)

General Geography Capsule 2

गोबी मरुस्थल

45. एशिया का सबसे गर्म स्थल है-

उत्तर- जैकोबाबाद (पकिस्तान)

46. लॉस एजिल्स (अमेरिका) प्रसिद्ध है-

त्तर- फिल्म उद्योग के लिए

47. विश्व में सबसे बड़ा मांस निर्यातक देश है-

उत्तर- अर्जेंटीना

48. विश्व में चावल तथा गेहूँ का प्रमुख उत्पादक देश है-

उत्तर- चीन

49. विश्व में लोहा तथा मैंगनीज का प्रमुख उत्पादक देश है-

उत्तर- युक्रेन

50. विश्व में पारा उत्पादक प्रमुख देश है-

उत्तर- स्पेन

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