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8. मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)

8. मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)


 मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)⇒

          ग्लोब पर स्थित अक्षांश और देशान्तर रेखाओं के जाल को समतल कागज पर प्रक्षेपित करने की तकनीक को मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection) कहते हैं।

परिभाषा

स्टीयर्स⇒ ग्लोब की अक्षांश या देशान्तर रेखाओं को सपाट कागज पर प्रदर्शित करने की विधि को मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection) कहते हैं।

इरविन रेज⇒ अक्षांश वृत्तों तथा याम्योत्तर रेखाओं (Meridian) का कोई व्यवस्थित क्रम जिस पर मानचित्र बनाया जा सके प्रक्षेप कहा जाता है।

मैक हाउस⇒ पृथ्वी के अक्षांश वृतों और याम्योत्तर रेखाओं का रेखा जाल के रूप में समतल पर प्रदर्शन प्रक्षेप कहलाता है।

जॉन बीगॉट⇒ ग्लोब की अक्षांश और देशान्तर रेखाओं को कागज पर प्रदर्शित करने की विधि को मानचित्र प्रक्षेप कहते हैं।

मानचित्र प्रक्षेप की आवश्यकता क्यों

        मानचित्र का प्रदर्शन ग्लोब और समतल कागज पर प्रदर्शित करते हैं। लेकिन ग्लोब की तुलना में मानचित्रों का समतल कागज पर प्रदर्शन कई अर्थों में भिन्नता रखता है। जैसे-

(1) ग्लोब पर बने मानचित्र को एक बार में समस्त भाग को नहीं देखा जा सकता। लेकिन समतल कागज पर मानचित्र को एक बार में समस्त भाग को देखा जा सकता है।

(2) ग्लोब पर स्थित दो स्थानों के बीच की दूरी मापना एक कठिन कार्य है जबकि समतल कागज पर यह काम आसानी से किया जा सकता है।

(3) ग्लोब को मानचित्र की तरह मोड़ा नही जा सकता है।

(4) पृथ्वी के छोटे-2 भागों को अलग-2 ग्लोब पर नहीं बनाया जा सकता है।

(5) मानचित्र की तुलना में ग्लोब का रख-रखाव और उसके एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने और ले जाने में अधिक कठिनाई होती है।

अक्षांश (Latitude) या Parallel

        पृथ्वी के केन्द्र पर बनाये गये उदग्र (Vertical) कोणीय मान को अक्षांश कहते हैं। दूसरे शब्दों में ग्लोब पर किसी स्थान तथा विषुवतरेखा के मध्य कोणीय दूरी को उस स्थान का आक्षांश कहते हैं। यह कोणीय दूरी ग्लोब के केन्द्र से मापी जाती है। 

➤ सामान्य परिभाषा के अनुसार ग्लोब पर पूरब से पश्चिम दिशा की ओर खींची गयी काल्पनिक रेखा को अक्षांश रेखा कहते हैं।

ग्लोब पर समान आक्षांश वाले बिन्दुओं को मिलाने वाले काल्पनिक वृत्तों को आक्षांश वृत्त कहा जाता है। विषुवत रेखा पूर्ण वृहत् वृत्त (Great Circle) होती है तथा शेष समस्त आक्षांश वृत्त लघु वृत्त होते हैं।

वृहत वृत्त:-

      वृहत वृत्त वह रेखा होती है जो गोलाकार पृथ्वी को दो समान परिधियों वाले गोलाद्धों में विभाजित करती है। पृथ्वी पर सभी देशान्तरों (Meridians) के अतिरिक्त भूमध्य रेखा/विषुवत रेखा एक वृहत वृत्त भी है।

भूमध्यरेखा पृथ्वी के मध्य से होकर गुजरने वाली अक्षांश रेखा है। इसे विषुवत रेखा या  0° अक्षांश भी कहते हैं। इस पर वर्ष भर दिन-रात बराबर होते हैं। इसलिए इसे विषुवत रेखा कहते हैं।

विषुवत रेखा वृहत् वृत का उदाहरण है क्योंकि यह पृथ्वी को दो बराबर भागों में बाँटती है।

भूमध्यरेखा पृथ्वी को दो गोलार्द्धों (उत्तरी और दक्षिणी) में विभक्त करती है।

अक्षांश रेखाओं का मान न्यूनतम 0º और अधिकतम 90º होता है।

उत्तरी गोलार्द्ध में खीची गई अक्षांश रेखा को N के द्वारा और दक्षिणी गोलार्द्ध में खींची गई  रेखा को S के द्वारा निरुपित करते है।

अश्व अक्षांश (Horse Latitude):-

       30° से 35° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश के मध्य स्थित पेटी को अश्व अक्षांश कहा जाता है। इसे उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी (Subtropical High Pressure Belt) भी कहते हैं। इसके बनने का कारण इन अक्षांशो के मध्य प्रतिचक्रवातों का उत्पन्न होना है।

0º अक्षांश⇒ भूमध्यरेखा या विषुवत रेखा (Equator)

23½º N अक्षांश⇒ कर्क  रेखा (Tropic of Cancer)

23½º S अक्षांश⇒ मकर रेखा (Tropic of Capricorn)

66½º N अक्षांश⇒ आर्कटिक वृत्त

66½º S अक्षांश⇒ अण्टार्कटिक वृत

90º N⇒ उतरी ध्रुव

90º S⇒ दक्षिणी ध्रुव

➤ 23½° से 66½° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य स्थित क्षेत्र को शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र कहते हैं। यहाँ पर वर्ष भर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं।

➤ प्रति 1° पर एक अक्षांश निर्मित होता है। विषुवत रेखा से ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर जाने पर अक्षांशीय वृत्त का आकार छोटा होता जाता है, जो ध्रुवों पर अंततः एक बिन्दु में परिवर्तित हो जाता है।

➤ 90° अक्षांश एक बिंदु के रूप में पाया जाता है, जिसे ध्रुव (Pole) कहते हैं। 90° उत्तरी अक्षांश को उत्तरी ध्रुव (North Pole) तथा 90° दक्षिण अक्षांश को दक्षिणी ध्रुव (South Pole) के नाम से जाना जाता है।

➤ 66½° से 90° उत्तरी अक्षांशों के मध्य स्थित क्षेत्र को ध्रुवीय क्षेत्र (Polar Region) कहते हैं। यहाँ 6 महीने का दिन तथा 6 महीने की रात होती है।

भूमध्य रेखा की परिधि की आधी लम्बाई 60° अक्षांश रेखा पर प्राप्त होती है।

90° अक्षांश रेखा एक बिन्दु के समान होती है।

सभी अक्षांश रेखा (90º को छोड़कर) देशान्तर रेखा को समकोण पर काटती है।

सभी अक्षांश रेखाएँ एक-दूसरे के समान्तर और समान दूरी पर अवस्थित होते हैं।      

किसी भी स्थान का अक्षांश रेखा का निर्धारण Pole Star से आने वाली किरण और चक्षु अक्ष के बीच बने कोणीय माप के द्वारा निर्धारित करते हैं।

ग्लोब पर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 179 है।

नोट: यदि अक्षांश रेखाओं को 1° के अंतराल पर खींचते हैं, तो उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों में 89-89 अक्षांश रेखाएँ होंगे। इस प्रकार विषुवत रेखा को लेकर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 179 होगी क्योंकि दोनों ध्रुव एक बिंदु के रूप में है न कि रेखा या वृत्त के रूप में।

मानचित्र पर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 181 है।

नोट: यदि अक्षांश रेखाओं को 1° के अंतराल पर खींचते हैं, तो उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों में 90-90 अक्षांश रेखाएँ होंगे। इस प्रकार विषुवत रेखा को लेकर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 181 होगी क्योंकि दोनों ध्रुव मानचित्रों पर एक रेखा के रूप में होती है न कि बिंदु के रूप में।

अक्षांशों की कुल संख्या 180 है।

नोट: यदि अक्षांशों को 1° के अंतराल पर खींचते हैं, तो उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों में 90-90 अक्षांश होंगे। यहाँ विषुवत रेखा का मान 0 अक्षांश होगा, इस प्रकार कुल अक्षांशों की संख्या 180 होगी क्योंकि दोनों ध्रुवों का अंश 90º मानचित्र या ग्लोब पर होगा, यहाँ पर एक रेखा या बिंदु के रूप में नहीं होगा।

 प्रति 1º की अक्षांशीय दूरी लगभग 111 Km के बराबर होती है जो पृथ्वी के गोलाकार होने के कारण भूमध्यरेखा से ध्रुवों तक भिन्न-भिन्न मिलती है। अर्थात् दो अक्षांशों के बीच की दूरी 111 किमी० होती है।

मानचित्र प्रक्षेप

देशान्तर या याम्योत्तर (Longitude)

      ग्लोब पर प्रमुख याम्योत्तर (Prime meridian) तथा किसी दिये गये स्थान के मध्य की कोणीय दूरी को उस स्थान का देशान्तर कहते हैं। यह दूरी ग्लोब के ध्रुवीय अक्ष से मापी जाती है।

⇒ दोनों ध्रुवों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा को देशान्तर रेखा कहते हैं।

⇒ देशान्तर रेखा हमेशा उत्तर से दक्षिण दिशा में खींची जाती है।

⇒ दो देशान्तर रेखाओं के बीच में विषुवत रेखा पर अधिकतम दूरी होती है जबकि ध्रुवों की ओर जाने पर दोनों देशान्तर रेखाओं के बीच दूरी घटते जाती है।

⇒ देशान्तर रेखाएँ पृथ्वी के केन्द्र पर क्षैतिज तल में बनाया गया कोण को व्यक्त करता है।

⇒ देशान्तर रेखाओं का न्यूनतम मान 0º और अधिकतम मान 180° होता है।

⇒ इस तरह कुल  देशांतर रेखाओं की संख्या ग्लोब पर 360 और मानचित्र पर 361 होती है।

⇒ 0º देशान्तर रेखा को प्रधान मध्यान्ह / प्रधान याम्योत्तर रेखा (Prime Meridian) कहा जाता है। जबकि 180°  देशांतर रेखा को अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहते हैं।

⇒ 0° देशान्तर रेखा पृथ्वी को दो भागों में बाँटती है – (i) पूर्वी गोलार्द्ध और (ii) पश्चिमी गोलार्द्ध।

⇒ पूर्वी गोलार्द्ध के देशान्तर रेखा को E के द्वारा और पश्चिमी गोलार्द्ध के देशान्तर रेखा को W के द्वारा विरूपित करते हैं।

⇒ 1889 ई0 में वाशिंगटन बैठक के दौरान यह निर्णय लिया गया कि 0° देशान्तर रेखा लंदन के एक मुहल्ला ग्रीनवीच में स्थित “रॉयल ज्योग्रफिकल सोसाइटी” के कैम्पस में स्थित एक Pointer से होकर गुजरती है। शेष सभी देशान्तर रेखाओं को पूरब एवं पश्चिम में इसके अनुरूप ही खींचते हैं।

भूग्रि(The Earth Grid):-

          किसी प्रक्षेप चना में एक निश्चित मापनी पर अक्षांश और देशान्तर रेखाओं के रेखा जाल को भूग्रिड कहते हैं।


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 7. मानचित्र का विवर्धन एवं लघुकरण

7. मानचित्र का विवर्धन एवं लघुकरण



 मानचित्र का विवर्धन एवं लघुकरण⇒

              किसी भी मानचित्र या उसके किसी भाग के Scale को बदलकर बड़ा या छोटा करना मानचित्र विवर्धन या लघुकरण कहलाता है।

मानचित्र का विवर्धन

⇒ मानचित्र का विवर्धन एवं  लघुकर हेतु तीन विधियाँ अपनायी जाती है।

(1) वर्ग विधि (Square Method)

मानचित्र का विवर्धन

Q. यदि 100 से 30km के पैमाने पर बने मानचित्र को 3 गुणा बढ़ा दिया जाता है तो बढ़े हुए मानचित्र का प्रदर्शक भिन्न (मापनी) क्या होगा?

हल:- प्रश्नानुसार

1 Cm = 30 Km

मूल मानचित्र का पैमाना  = 1Cm = 30Km

1Cm = 30x1000x100

         = 300000

अतः

मानचित्र का विवर्धन

       अतः नया मानचित्र का पैमाना = 1 : 1000000

Q. 10Cm = 30Km पैमाने से बने एक मानचित्र को आकार में 9 गुणा वर्धित किया  गया है तो नये मानचित्र का पैमाना क्या होगा?

मानचित्र का विवर्धन

अत: नया मानचित्र का पैमाना = 1:1000000

नोट: वर्ग विधि (Square Method) में मापनी के अनुपात को इकाई संख्या में बनाये रखने के लिए वर्गमूल निकाला जाता है।

(2) सम त्रिभुज विधि (Similar Triangle Method)

           इस विधि से संकुचित क्षेत्र जैसे- सड़क, रेलमार्ग, नदी, नहर इत्यादि का लघुकरण एवं विवर्धन किया जाता है।

(3) यांत्रिक विधि (Mechanical Method)

            यांत्रिक विधि में मानचित्र का लघुकरण एवं विवर्धन हेतु अलग-2 यंत्र का प्रयोग करते हैं। जैसे-

(i) अनुपातिक कम्पास

(ii) पेन्टोग्राफ

(iii) इडियोग्राफ

(iv) फोटो स्टेट

(v) कैमरा ल्यूसीडा

(vi) फोटोग्राफी कैमारा

       पेंटोग्राफ और इडियोग्राफ के द्वारा मानचित्र का लघुकरण एवं विवर्धन खर्चीला होता है। लेकिन ये दोनों समरूप त्रिभुज विधि के द्वारा मानचित्र को लघुकरण या विवर्धन करता है।

⇒ स्टेनले महोदय के द्वारा निर्मित मानचित्र का लघुकरण एवं विवर्धन करने हेतु पेन्टोग्राफ को उपयुक्त माना जाता है।

⇒ कैमरा ल्यूसीडा का प्रयोग Wall Map को छोटा या बड़ा करने में प्रयुक्त होता है।

मानचित्र पर दूरी का मापन

         इसके लिए तीन विधि हैं:-

(i) यांत्रिक विधि⇒ मानचित्र पर दूरी मापने के लिए रोटोमीटर या ओपीसोमीटर का प्रयोग करते हैं।

(ii) अगर मानचित्र पर कोई नदी, नहर, सड़क टेढ़ी-मेढ़ी हो तो धागे की सहायता से दूरी का मापन कर मापनी पर दिखाये गये अनुपात के आधार पर लम्बाई ज्ञात कर लेते हैं।

(iii) तीसरी विधि⇒ इस विधि के द्वारा दो सीधी स्थानों की दूरी Divider के माध्यम से ज्ञात कर मापनी के माध्यम से वास्तविक दूरी को ज्ञात करते हैं।

मानचित्र पर क्षेत्रफल का मापन

            मानचित्र का क्षेत्रफल ज्ञात करते हेतु निम्नलिखित विधि एक प्रयोग होता है। 

(i) गणितीय विधि

(ii) ग्राफीय विधि

(iii) प्लेनीमीटर विधि⇒ यह मानचित्र का क्षेत्रफल ज्ञात करने हेतु सबसे उपयुक्त विधि है। इसका आविष्कार श्री. जे. टेन्सलर ने किया था।

          वर्तमान में हैचर के द्वारा निर्मित प्लेनीमीटर को सबसे उपयुक्त माना जाता है।


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6. भूगोल में मापनी (Scale)

6. भूगोल में मापनी एवं मापनी के प्रकार



भूगोल में मापनी एवं मापनी के प्रकार 

⇒ मापनी (Scale) के द्वारा मानचित्र पर के दूरी और धरातल पर के दूरी के बीच सह-संबंध स्थापित किया जाता है।

⇒ मापनी में धरातलीय दूरी को कम करके प्रदर्शित किया जाता है, अर्थात् मानचित्र पर वास्तविक धरातल पर के सापेक्षिक दूरी और वास्तविक दूरी के अनुपात को मापनी कहते हैं। इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। जैसे- अगर धरती पर के वास्तविक दूरी 5km को 1Cm के रूप में दिखलायी जाती है तो मापनी का मान 1Cm = 5Km होगा।

     मापक को विभिन्न विद्वानों ने परिभाषित करने का प्रयास किया है। प्रमुख विद्वानों की परिभाषाएँ यहाँ दी जा रही हैं-

स्ट्रेलर के अनुसार, “मापक धरातल की वास्तविक दूरी तथा मानचित्र पर प्रदर्शित दूरी के पारस्परिक अनुपात को कहते हैं”।

(Scale is the ratio between map distance and the actual ground distance that the map represents.)

मोंकाहाउस एवं विलकिन्सन के अनुसार, “मापक मानचित्र पर प्रदर्शित की गई किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की दूरी तथा धरातल पर उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की दूरी के पारस्परिक सम्बन्ध को प्रकट करता है, चाहे वे कथन द्वारा जैसे 1″ = 1 मील या प्रदर्शक भिन्न द्वारा जैसे प्र भि. 1/63360, प्रकट किया गया है।”

(Scale denotes the relationship which the distance between any two points on the map bears to the corresponding distance on the ground, expressed either in words as one inch to one mile or as a representative fraction R.F. 1/63360.)

कनेटकर एवं कुलकर्णी के अनुसार, “किसी मानचित्र या ड्राइंग का मापक, मानचित्र या ड्राइंग की प्रत्येक दूरी तथा उससे सम्बन्धित धरातल की दूरी के निश्चित अनुपात को कहते हैं।” 

(The scale of a map or drawing is the fixed proportion in which every distance on the map or drawing bears to the corresponding distance on the ground.)

आर० एल० सिंह के अनुसार, “धरातल की वास्तविक दूरी तथा उसकी मानचित्र पर प्रदर्शित दूरी के सम्बन्ध को मापक कहते हैं।”

मापक का महत्व (Importance of Scale)-

⇒ मापक के माध्यम से छोटे क्षेत्रों को बड़े आकार में तथा बड़े क्षेत्रों को छोटे आकार में मानचित्रों के द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।

⇒ मापक द्वारा किसी भी मानचित्र में दो स्थानों (बिन्दुओं) के मध्य धरातल की वास्तविक दूरी ज्ञात  की जा सकती है। 

⇒ मापक के माध्यम से एक मानचित्रकार अपने उद्देश्य के अनुसार किसी भी क्षेत्र का छोटा या बड़ा मानचित्र तैयार कर सकता है।

    इस प्रकार मापक मानचित्र का प्राण माना जाता है। इसके बिना मापक का कोई महत्व नहीं होता है। बिना मापक के बनाए गए मानचित्र को रेखा मानचित्र (Sketch Map) कहा जाता है। इसको सहायता से भी धरातल के प्रत्येक भाग का प्रदर्शन कागज पर किया जा सकता है। मानचित्र के उपयुक्त मापक चुनते समय (i) कागज तथा (ii) मानचित्र की रचना करने का उद्देश्य आदि पर विशेष निर्भर रहना पड़ता है।

भूगोल में मापनी

Or 1Cm = 5x1000m x 100Cm 

Or 1Cm = 500000Cm 

RF = 1 : 500000

भूगोल में मापनी के प्रकार

(A) आकार के आधार पर मापनी दो प्रकार का होता है:-

(i) लघु मापनी (Small Scale) 

(ii) दीर्घ मापनी (Large Scale)

(i) लघु मापनी (Small Scale) 

⇒ लघु मापनी में वास्तविक दूरी को मील या किमी० के रूप में और मानचित्र के दूरी को इंच या सेमी० के रूप में प्रदर्शित करते हैं।

जैसे – 1″ = 50 मील

1 Cm = 50 km

⇒ लघु मापनी पर धरातल के वास्तविक दूरी को मानचित्र पर छोटे से इकाई के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार के मापनी का प्रयोग एटलस और दीवार मानचित्र में किया जाता हैं।

(ii) दीर्घ मापनी (Large Scale)

⇒ दीर्घ मापनी में धरातल के छोटे-2 दूरियों को बड़े इकाई में प्रदर्शित किया जाता है। जैसे – 1Cm = 500cm।

⇒ दीर्घ मापनी का प्रयोग भूसम्पत्ति मानचित्र (Cadastral Map), स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographic Map), सैनिकों के द्वारा प्रयोग किये जाने वाले मानचित्र इत्यादि में किया जाता है।

नोट : भूसम्पति मानचित्र (Cadastral Map) की मापनी सबसे बड़ी होती है। इसके पश्चात क्रमश: स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographic Map), दीवारी मानचित्र (Wall Map, एटलस मानचित्र (Atlas Map)) का स्थान आता है। (CTWA)

मानचित्र मापनी प्रदर्शित करने की विधि

         मानचित्र पर मापनी को तीन प्रकार से प्रदर्शित किया जाता है-

(1) कथनात्मक विधि (Statement Method)

⇒ कथनात्मक विधि के द्वारा मापनी को शब्दों के रूप में लिखा जाता है। जैसे 1Cm = 1Km

⇒कथनात्मक विधि का प्रयोग प्राय: भूसम्पत्ति मानचित्र, भवन प्लान वाले मानचित्र में किया जाता है।

(2) आलेखी विधि / रैखिक विधि (Graphical or Linear Method)

          एक सीधी रेखा को कई समान भागों में विभाजित कर उस पर वास्तविक दूरी को अंकों के रूप में प्रदर्शित कर दिया जाता है।

इस मापनी के दो भाग होते हैं-

(i) Primary Division वाले भाग

(ii) Secondery Division वाले भाग

            इस मानी के द्वारा मानचित्र पर km, m और Cm के रूप में एक साथ दूरियों को ज्ञात कर सकते है।

मापनी

(3) प्रतिनिधि भिन्न विधि (Representative Fraction Or R.F. Method)

⇒ प्रतिनिधि भिन्न विधि के द्वारा मानचित्र के दूरी को और वास्तविक दूरी को एक रूप में प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ भिन्न में अंश और हर होता है, Numenator (अंश) और  Denominator (हर) के रूप में प्रदर्शित जाता किया जाता है।

⇒ अंश मानचित्र पर के इकाई दूरी को व्यक्त करता और हर पृथ्वी पर के वास्तविक दूरी को व्यक्त करता है।

⇒ मानचित्र एवं धरात‌ल पर मापी गई दूरियों के अनुपात को  प्रतिनिधि भिन्न (R.F.) कहते है।

⇒ R. F. को हमेशा अनुपात के रूप में प्रदर्शित करते हैं।

⇒ मानचित्र पर के दूरी को हमेशा ईकाई (1) रूप में प्रदर्शित करते हैं।

⇒ R.F. विधि का सबसे बड़ी विशेषता यह है कि किसी भी देश में भाषा ज्ञान के बिना प्रयुक्त कर सकते हैं।

⇒ R.F. विधि का सबसे बड़ा दोष यह है कि जब मानचित्र को बड़ा या छोटा किया जाता है, तो अनुपात में दोष उत्पन्न हो जाता है।

नोट :

 1 Cm = 10 mm 

100 Cm = 1 m 

1000 m = 1 km

8/5 Km = 1 मील 

1″ = 2.54 Cm

TMC = Trilian cubic meter

R.F = Map Distance/ Ground Distance 

1 Km = 1,00000 cm (1000 m x 100 Cm) 

1 मील =  63,360″ (1760 गज x 3 फीट x 12 इन्च)

1 मील = 1760 गज (5280 फीट)

1 गज = 3फीट (36″ = 12″ × 3 फीट)

1 फीट = 12″

1 मील = 8 फर्लांग

भूगोल में मापक के अनुप्रयोग

(Applications of Scale in Geography)

1. मानचित्रण (Cartography):-

    मापक का सबसे महत्वपूर्ण अनुप्रयोग मानचित्र निर्माण में होता है। इसके माध्यम से पृथ्वी की वास्तविक दूरी एवं क्षेत्रफल को निश्चित अनुपात में छोटा करके कागज पर प्रदर्शित किया जाता है। उपयुक्त मापक के चयन से मानचित्र अधिक सटीक, स्पष्ट एवं विश्वसनीय बनता है तथा विभिन्न प्रकार के विषयगत (Thematic) मानचित्र तैयार किए जा सकते हैं।

2. स्थलाकृतिक सर्वेक्षण (Topographical Survey):-

    स्थलाकृतिक मानचित्रों के निर्माण में मापक का विशेष महत्व है। इसके माध्यम से पर्वत, पठार, घाटी, नदी, ढाल, ऊँचाई तथा अन्य भू-आकृतियों का सही एवं विस्तृत निरूपण किया जाता है। सर्वेक्षण कार्यों में मापक के प्रयोग से धरातलीय विशेषताओं का सटीक मापन एवं विश्लेषण संभव होता है।

3. क्षेत्रीय नियोजन (Regional Planning):-

     क्षेत्रीय नियोजन में मापक का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों के संसाधनों, जनसंख्या, परिवहन, भूमि उपयोग तथा विकास की योजनाएँ तैयार करने में किया जाता है। उपयुक्त मापक वाले मानचित्र क्षेत्रीय असमानताओं का अध्ययन करने तथा संतुलित क्षेत्रीय विकास की योजना बनाने में सहायक होते हैं।

4. नगर नियोजन (Urban Planning):-

     नगर नियोजन में बड़े मापक (Large Scale) वाले मानचित्रों का उपयोग किया जाता है। इनके माध्यम से सड़कों, भवनों, आवासीय क्षेत्रों, औद्योगिक क्षेत्रों, पार्कों, जलापूर्ति, सीवरेज तथा अन्य सार्वजनिक सुविधाओं की योजनाएँ वैज्ञानिक ढंग से तैयार की जाती हैं। इससे नगरों का सुव्यवस्थित एवं सतत विकास संभव होता है।

5. कृषि नियोजन (Agricultural Planning):-

     कृषि भूगोल में मापक का उपयोग भूमि उपयोग, मृदा वितरण, सिंचाई नेटवर्क, फसल क्षेत्र, कृषि उत्पादन तथा कृषि विकास योजनाओं के निर्माण में किया जाता है। बड़े मापक वाले मानचित्र किसानों एवं योजनाकारों को खेतों की वास्तविक स्थिति एवं संसाधनों का सही आकलन करने में सहायता प्रदान करते हैं।

6. परिवहन योजना (Transport Planning):-

     रेलमार्ग, सड़क मार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग, हवाई अड्डे तथा जलमार्गों की योजना एवं निर्माण में मापक अत्यंत उपयोगी होता है। इसके माध्यम से मार्गों की वास्तविक दूरी, दिशा तथा संपर्क का सही निर्धारण किया जाता है, जिससे परिवहन प्रणाली अधिक प्रभावी एवं सुगम बनती है।

7. रक्षा एवं सैन्य उपयोग (Defence and Military Applications):-

    सैन्य कार्यों में बड़े एवं मध्यम मापक वाले मानचित्रों का व्यापक उपयोग किया जाता है। सीमाओं की निगरानी, सैन्य ठिकानों की स्थापना, सैनिकों की आवाजाही, युद्ध रणनीति तथा सुरक्षा योजनाओं के निर्माण में मापक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सटीक मापक राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है।

8. पर्यावरण अध्ययन (Environmental Studies):-

    वन क्षेत्र, नदी बेसिन, जलग्रहण क्षेत्र, जैव विविधता, भूमि क्षरण, प्रदूषण तथा प्राकृतिक संसाधनों के अध्ययन में मापक का व्यापक उपयोग किया जाता है। इससे पर्यावरणीय परिवर्तनों का विश्लेषण, संसाधनों का संरक्षण तथा सतत विकास की योजनाएँ तैयार करने में सहायता मिलती है।

9. GIS एवं Remote Sensing:-

   आधुनिक भूगोल में भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) एवं सुदूर संवेदन (Remote Sensing) के अंतर्गत मापक का अत्यधिक महत्व है। डिजिटल मानचित्रों का निर्माण, स्थानिक (Spatial) विश्लेषण, उपग्रह चित्रों की व्याख्या तथा विभिन्न भौगोलिक सूचनाओं के एकीकरण में उपयुक्त मापक का प्रयोग किया जाता है, जिससे अधिक सटीक एवं विश्वसनीय परिणाम प्राप्त होते हैं।

10. आपदा प्रबंधन (Disaster Management):-

    बाढ़, भूकंप, भूस्खलन, चक्रवात, सूखा तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम क्षेत्रों की पहचान एवं प्रबंधन में मापक का महत्वपूर्ण योगदान है। विभिन्न मापकों वाले मानचित्रों की सहायता से संवेदनशील क्षेत्रों का विश्लेषण, राहत एवं बचाव कार्यों की योजना तथा आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction) की रणनीतियाँ तैयार की जाती हैं।



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 5. भौगोलिक सूचना तंत्र क्या है

 5. भौगोलिक सूचना तंत्र क्या है



भौगोलिक सूचना तंत्र⇒

                भौगोलिक सूचना तंत्र भौगोलिक आँकड़ों एवं सूचनाओं के संग्रहण, विश्लेषण और मानचित्रण का एक कम्प्यूटर आधारित तकनीक है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में सूचना तकनीक (IT) कहते हैं।

भौगोलिक सूचना तंत्र

⇒ भूगोलवेत्ता मार्बल ने इसे परिभाषित करते हुए कहा “GIS क्षेत्रीय सूचना संग्रहण, विश्लेषण एवं प्रदर्शन का एक तंत्र है।” 

⇒ क्लार्क महोदय ने कहा है कि “भौगोलिक सूचना तंत्र विभिन्न सूचनाओं के एकत्रीकरण, संग्रहण, विश्लेषण और प्रदर्शन का कम्प्यूटर आधारित तंत्र है।”

⇒ गुडचाइल्ड के अनुसार “GIS विभिन्न क्षेत्रीय सूचनाओं का भौगोलिक तथ्यों से संबंधित समस्याओं का समाधान करने वाला एक उन्नत तकनीक है।”

⇒ GIS भूगोल, भूविज्ञान, मानचित्रकला, सुदूर संवेदन तकनीक, वायु फोटोग्राफी, सर्वेक्षण, सांख्यिकी और कम्प्यूटर विज्ञान से संबंधित एक समेकित तकनीक है।

भौगोलिक सूचना तंत्र का उद्देश्य

(1) विभिन्न प्रकार के भौगोलिक आकड़ों का संग्रहण, विश्लेषण और प्रदर्शन किया जाता है।

(2) सूचनाओं को विश्लेषित कर उसे आसान बनाता है।

(3) आकड़ों  के विश्लेषण के आधार पर नियोजन तथा निर्णय की प्रक्रिया को अधिक तार्किक और वैज्ञानिक बनाता है।

(4) कम्प्यूटर आधारित समन्वित तकनीक की उपलब्धता से समय और धन की बचत करता है।

भौगोलिक सूचना तंत्र के प्रयोग के क्षेत्र

(1) यह सम्पति मानचित्र, परिवहन मानचित्र बनाने में उपयोगी है।

(2) यह कृषि, उद्योग, नगर स्थानीकरण में मदद करता है।

(3) विभिन्न दुर्घटनाओं का मानचित्रण कर सकते है।

(4) जनसंख्या का मानचित्रण एवं विश्लेषण कर सकते है।

(5) भूमि उपयोग के नियोजन एवं प्रबंधन में मदद करता है।

(6) पर्यावरण के विश्लेषण में मदद करता है।

(7) धरातल के स्वरूप का विश्लेषण करता है।

(8) GIS कम्प्यूटर रूपीय यंत्र के माध्यम से संचालित होता है। इसे डडले स्टाम्प ने भौगोलिक सूचना तंत्र का सुनहला बछड़ा (Golden Caw) कहा है।

           जब कई कम्प्यूटर आपस में तार या किसी अन्य युक्ति से जुड़ जाते है तो उसे Network या Internet (इंटरनेट) कहते हैं।

मोटे तौर पर कम्प्यूटर के सभी सामाग्री को दो भागों में बाँटते है:-

(1) हार्डवेयर

(2) सॉफ्टवेयर

(1) हार्डवेयर

प्रमुख हार्डवेयर उपकरण:-

(i) डिक्स ड्राइव

(ii) डिजिटर

(iii) प्लॉटर

(iv) स्कैनर,

(v) भ्यूजुअल डिस्प्ले यूनिट

(vi) की बोर्ड

(vii) माउस

(viii) वेब कैमरा

(ix) CPU

(x) मोडेम

(1) पेन ड्राइव

(2) सॉफ्टवेर

         भौगोलिक रेखाचित्रण एवं मानचित्रण के लिए कई सॉफ्टवेयर बाजार में उपलब्ध है। जैसे-

(i) SYMVV

(ii) RGRIG

(iii) SYMAP

(iv) LOTUS

(v) HG

(vi) BASIC

(vii) ILWLS

(viii) ANCVIEW

(ix) OSIRIS

नोट: CPU = सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट

ALU = अर्थमेटिक लोजिक यूनिट

TALLY = यह एक ऐसा सॉफ्टवेय है जिसका प्रयोग वाणिज्य के क्षेत्र में किया जाता है।

फोरटन और C++ = ये दोनों ऐसे Software है जिसका प्रयोग व्यापार एवं वाणिज्य में किया जाता है।

पास्कल= वैज्ञानिक विषयों के अध्ययन हेतु प्रयुक्त होता है।

फोटोसॉफ्ट= इसमें चित्र बनाने का कार्य होता है।


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4. प्रमुख भौगोलिक यंत्र

4. प्रमुख भौगोलिक यंत्र



प्रमुख भौगोलिक यंत्र⇒

                      भूगोल में प्रमुख भौगोलिक यंत्र से जो कि भिभिन्न प्रतियोगिताओं में बार-बार पूछे जाते है वे निम्नलिखित है- 

(1) प्लैनीमीटर⇒ मानचित्र पर क्षेत्रफल मापने वाला यंत्र

प्रमुख भौगोलिक यंत्र

(2) पेन्टोग्राफ/ इंडीगोग्राफ/ इपिस्कोप / पेंटोग्राफिक कैमरा⇒ मानचित्रों का विवर्धन एवं लघुकरण करने वाला यंत्र

(3) क्लाइनोमीटर⇒ भूतल पर कोण एवं  ढाल मापने का यंत्र

(4) पैरेलैक्स⇒ फोटोग्राफ के आधार पर ऊँचाई नापता है।

(5) ओपिसोमीटर⇒  मानचित्रों पर दूरियों के मापन हेतु प्रयुक्त यंत्र

(6)  रेनगेज⇒ वर्षा मापने वाला यंत्र

(7) हाईग्रोमीटर⇒ वायु में उपस्थित आर्द्रता मापने वाला यंत्र

(8) इग्रोग्राफ⇒ मौसमी दशाएँ, शुद्ध क्षेत्रफल, शास्यकाल आदि एक साथ दर्शाएँ जाने वाले ग्राफ

(9) रिक्टर स्केल⇒ भूकंप के झटके मापने में रिक्टर स्केल का प्रयोग होता है।

(10) नेफ्रोस्कोप⇒ बादलों की दिशा और गति मापने वाला यंत्र

(11) सिस्मोग्रफ⇒ भूकंप की तीव्रता मापने वाला यंत्र

(12) मोह पैमाना (Moh’s Scale)⇒ चट्टानों की कठोरता मापने वाला यंत्र

(13) हाईग्रोग्राफ⇒ वायु में आपेक्षिक आर्द्रता मापने वाला यंत्र

(14) पायरोमीटर⇒ उच्च तापमान मापने वाला यंत्र

(15) साइनोमीटर⇒ आकाश के नीलापन का मापने वाला यंत्र

(16) एक्टिनेमीटर⇒ विकिरण की तीव्रता मापने वाला यंत्र

(17) एनिमोमीटर⇒ पवन की गति मापने वाला यंत्र

(18) ओक्टास⇒ मेघाच्छादन की मात्रा मापने वाला यंत्र

(19) करेंटमीटर⇒ जलप्रवाह मापने वाला यंत्र

(20) इवैपोरीमीटर / एटमोमीटर जलवाष्प मापने वाला यंत्र अर्थात एक वैज्ञानिक उपकरण है जो एक निश्चित समय में किसी नम सतह से वायुमंडल में होने वाले जल के वाष्पीकरण (Evaporation) या वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) की दर को मापता है। 

(21) स्पीडोमीटर/ओडोग्राफ/ ओडोमीटर⇒ वाहन की गति मापने वाला यंत्र

(22) बैरोमीट वायुदाब मापने का यंत्र

(23) फैदोमीट समुद्र की गहराई मापने वाला यंत्र



1. ओपीसोमीटर का प्रयोग किया जाता है-

(a) क्षेत्रफल मापन में

(b) दूरी मापन में

(c) दिशा मापन में

(d) प्रवणता मापन में

[read more] (b) दूरी मापन में [/read]

2. सापेक्षिक आर्द्रता के मापन हेतु किस उपकरण का प्रयोग किया जाता है?

(a) हाइड्रोमीटर

(b) बैरोमीटर

(c) हाइग्रोमीटर

(d) मैनोमीटर

[read more] (c) हाइग्रोमीटर [/read]

3. उच्च तापमान के मापन हेतु किस उपकरण का प्रयोग किया जाता है?

(a) साइनोमीटर

(b) पायरोमीटर

(c) एक्टिनोमीटर

(d) लाइसीमीटर

[read more] (b) पायरोमीटर [/read]

4. आकाश के नीलापन का मापन किस भौगोलिक यंत्र द्वारा किया जाता है?

(a) साइनोमीटर

(b) क्लाइनोमीटर

(c) एक्टिनोमीटर

(d) पायरोमीटर

[read more] (a) साइनोमीटर [/read]

5. विकिरण की तीव्रता के मापन हेतु किस उपकरण का प्रयोग किया जाता है?

(a) क्रोनोमीटर

(b) एक्टिनोमीटर

(c) वेनट्यूरीमीटर

(d) क्लाइनोमीटर

[read more] (b) एक्टिनोमीटर [/read]

6. पवन की गति निम्नलिखित में से किस यंत्र से मापी जाती है?

(a) बैरोमीटर

(b) एनीमोमीटर

(c) विण्डवेन

(d) रोटामीटर

[read more] (b) एनीमोमीटर [/read]

7. भूकम्पीय तरंगों का मापन निम्नलिखित में से किस यंत्र द्वारा किया जाता है?

(a) बैरोग्राफ

(b) सीस्मोग्राफ

(c) क्लाइमोग्राफ

(d) इर्गोग्राफ

[read more] (b) सीस्मोग्राफ [/read]

8. ओक्टास मापनी का प्रयोग किसके मापन के लिए किया जाता है?

(a) वायुमण्डलीय आर्द्रता

(b) मेघाच्छादन की मात्रा

(c) ओस जमाव का स्तर

(d) सौर प्रकाश की मात्रा

[read more] (b) मेघाच्छादन की मात्रा [/read]

9. निम्नलिखित में कौन सुमेलित नहीं है?

(a) इवैपोरीमीटर- जलवाष्प मापन

(b) करेण्टमीटर- जलप्रवाह मापन

(c) एटमोमीटर- दो स्थानों के मध्य दूरी का मापन

(d) रोटामीटर- जलीय आर्द्रता मापन

[read more] (c) एटमोमीटर- दो स्थानों के मध्य दूरी का मापन [/read]

10. मानचित्रों के विवर्धन एवं लघुकरण के लिए निम्न में से किस यंत्र का प्रयोग किया जाता है?

(a) पैण्टोग्राफ

(b) इपीस्कोप

(c) पैण्टोग्राफिक कैमरा

(d) इनमें से सभी

[read more] (d) इनमें से सभी [/read]

11. कैलोरीमीटर से क्या मापा जाता है?

(a) तापमान

(b) ऊष्मा की मात्रा

(c) अवशोषण

(d) रंग

[read more] (b) ऊष्मा की मात्रा [/read]

12. निम्नलिखित में कौन सुमेलित नहीं है?

(a) मानचित्र पर दो स्थानों के मध्य की दूरी- ऑपिसोमीटर

(b) मानचित्र पर क्षेत्रफल (Area)- प्लैनीमीटर

(c) ज्वालामुखी लावा का तापमान- पायरोमीटर

(d) सौर्य विकिरण की मात्रा- क्रोनोमीटर

[read more] (d) सौर्य विकिरण की मात्रा- क्रोनोमीटर [/read]

13. मोह पैमाना (Moh’s Scale) से निम्न में से किसका मापन किया जाता है?

(a) मृदा स्तरों की मोटाई

(b) मृदा जल की मात्रा

(c) चट्टानों की कठोरता

(d) मृदा में अम्लीयता की मात्रा

[read more] (c) चट्टानों की कठोरता [/read]

14. नेफोमीटर (Nephometer) से निम्नलिखित में से किसका मापन किया जाता है?

(a) वर्षा की मात्रा

(b) बादलों की दिशा व गति

(c) सागरीय लवणता की मात्रा

(d) इनमें से सभी

[read more] (b) बादलों की दिशा व गति [/read]

15. ब्यूफोर्ट स्केल पर निम्न में से क्या दर्शाया जाता है?

(a) भूकम्पीय तरंगों की गति

(b) पवन की गति

(c) बहते हुए जल की गति

(d) इनमें से सभी

[read more] (b) पवन की गति [/read]

16. ‘टी’ मापक (T-Scale) पर निम्न में से किसका मापन किया जाता है?

(a) भूकम्पीय तरंगें

(b) चक्रवातों की शक्ति

(c) पवनों की गति

(d) ज्वालामुखी उद्‌गार से निःसत

[read more] (b) चक्रवातों की शक्ति [/read]

17. लाइसोमीटर से निम्न में से किसका मापन किया जाता है?

(a) वायुमण्डलीय आर्द्रता

(b) मेघों की दिशा तथा गति

(c) सौर विकिरण की मात्रा

(d) मृदा से होकर नीचे जाने वाली अन्तःस्रावी जल की मात्रा

[read more] (d) मृदा से होकर नीचे जाने वाली अन्तःस्रावी जल की मात्रा [/read]

18. निम्नलिखित में कौन सुमेलित नहीं है?

(a) बाथीमीटर- समुद्री गहराईयाँ

(b) एस्ट्रोलैब- ग्रहों एवं तारों की ऊँचाईयाँ

(c) एक्टिनोमीटर- पदार्थों की शीतलता

(d) पायरोमीटर- दूरस्थ वस्तुओं का उच्च तापमान

[read more] (c) एक्टिनोमीटर- पदार्थों की शीतलता [/read]

19. इर्मोग्राफ (Ergograph) पर निम्न में से किसका सम्बन्ध प्रदर्शित किया जाता है?

(a) जलवायविक दशाएँ एवं फसलों का वर्धन काल

(b) आर्द्र बल्ब तापमान एवं आर्द्रता

(c) तापमान एवं वार्षिक वर्षा

(d) सापेक्ष आर्द्रता एवं तापमान

[read more] (a) जलवायविक दशाएँ एवं फसलों का वर्धन काल [/read]

20. सापेक्षिक आर्द्रता को निम्नलिखित में से किस ग्राफ पर दिखाया जाता है?

(a) बैरोग्राफ

(b) हीदरग्राफ

(c) क्लाइमोग्राफ

(d) हिप्सोमेट्रिक ग्राफ

[read more] (c) क्लाइमोग्राफ [/read]

21. मानचित्र पर दूरियों को मापने के लिए निम्न में से किस यन्त्र का प्रयोग किया जाता है?

(a) पौनीमीटर

(b) रोटामीटर

(c) ऑपिसोमीटर

(d) रेल्यूरोमीटर

[read more] (c) ऑपिसोमीटर [/read]

22. हाइग्रोमीटर के उपयोग की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या करता है-

(a) जल की शुद्धता मापने हेतु

(b) वायुमण्डलीय दाब मापने हेतु

(c) तरल पदार्थों की गति

(d) वायु में आर्द्रता मापने हेतु

[read more] (d) वायु में आर्द्रता मापने हेतु [/read]

23. मौसमी दशाएँ, शुद्ध क्षेत्रफल, शस्यकाल आदि एक साथ दर्शाए जा सकते हैं-

(a) हीदरग्राफ पर

(b) क्लोइमोग्राफ पर

(c) इर्गोग्राफ पर

(d) बैण्डग्राफ पर

[read more] (c) इर्गोग्राफ पर [/read]

24. रिक्टर स्केल का प्रयोग किसके मापने में किया जाता है?

(a) समुद्र की दिशा

(b) इनमें से कोई नहीं

(c) समुद्र की गहराई

(d) भूकम्प के झटके

[read more] (d) भूकम्प के झटके [/read]

25. रिक्टर स्केल निम्नलिखित की तीव्रता मापता है-

(a) भूकम्प

(b) समुद्री गहराई

(c) वायु

(d) शरीर ऊष्मा

[read more] (a) भूकम्प [/read]

26. रिक्टर पैमाने पर निम्नलिखित में से किसको मापा जाता है?

(a) रॉकेट के उड़ने के 5 मिनट पश्चात् उसकी गति

(b) तड़ित झंझा की प्रबलता

(c) भूकम्प की तीव्रता

(d) लॉन टेनिस में खिलाड़ी द्वारा मारे गये गेंद की गति

[read more] (c) भूकम्प की तीव्रता [/read]

27. बादलों की दिशा एवं गति को मापने वाला यंत्र कहलाता है-

(a) एनीमोमीटर

(b) रेनगेज

(c) नेफोस्कोप

(d) हाइग्रोमीटर

[read more] (c) नेफोस्कोप [/read]

28. वायु में आपेक्षिक आर्द्रता मापन हेतु प्रयुक्त उपकरण है-

(a) हाइग्रोग्राफ

(b) हाइड्रोग्राफ

(c) पैन्टोग्राफ

(d) बैरोग्राफ

[read more] (a) हाइग्रोग्राफ [/read]

29. सीस्मोग्राफ क्या रिकार्ड करता है?

(a) हृदय की धड़कन

(b) वायुमण्डल का दबाब

(c) भूकम्प की तीव्रता

(d) इनमें से कोई नहीं

[read more] (c) भूकम्प की तीव्रता [/read]



नोट:  प्रमुख भौगोलिक यंत्र को और विस्तार से जाने



(1) प्लैनीमीटर (Planimeter)

✍️ यह मानचित्र पर किसी अनियमित क्षेत्र का क्षेत्रफल मापने का यंत्र है।

✍️ कृषि भूमि, वन क्षेत्र, झील आदि का क्षेत्रफल ज्ञात करने में प्रयोग होता है।

✍️ यह मानचित्रीय मापन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपकरण है।



(2) पेन्टोग्राफ / इंडीगोग्राफ / इपिस्कोप / पेंटोग्राफिक कैमरा

✍️ इनका उपयोग मानचित्रों के विवर्धन (Enlargement) एवं लघुकरण (Reduction) के लिए किया जाता है।

✍️ पेन्टोग्राफ एक यांत्रिक यंत्र है, जबकि इपिस्कोप व कैमरा प्रकाशीय विधि पर आधारित हैं।

✍️ सर्वेक्षण एवं मानचित्रण में अत्यधिक उपयोगी।



(3) क्लाइनोमीटर (Clinometer)

✍️ इसका प्रयोग ढाल (Slope) और कोण (Angle) मापने में किया जाता है।

✍️ पहाड़ी क्षेत्रों, सड़कों, नहरों की ढाल मापने में उपयोगी।

✍️ भौतिक भूगोल में अत्यंत महत्वपूर्ण यंत्र।



(4) पैरेलैक्स (Parallax)

✍️ फोटोग्राफ या वायुचित्रों के आधार पर ऊँचाई (Height) मापने की विधि।

✍️ यह कोई यंत्र नहीं बल्कि फोटोग्रामेट्री की तकनीक है।

✍️ पर्वत, भवन, वृक्ष आदि की ऊँचाई ज्ञात करने में प्रयोग।



(5) ओपिसोमीटर (Opisometer)

✍️ मानचित्र पर घुमावदार रेखाओं (नदी, सड़क, रेलवे लाइन) की दूरी मापने का यंत्र।

✍️ इसे कर्व मीटर भी कहते हैं।



(6) रेनगेज (Rain Gauge)

✍️ यह वर्षा की मात्रा मापने का यंत्र है।

✍️ वर्षा को मिलीमीटर या सेंटीमीटर में मापा जाता है।

✍️ मौसम विज्ञान में प्रमुख उपकरण।



(7) हाईग्रोमीटर (Hygrometer)

✍️ वायु में उपस्थित आर्द्रता (Humidity) मापने का यंत्र।

✍️ यह आर्द्रता की मात्रा बताता है, पर रिकॉर्ड नहीं करता।



(8) इग्रोग्राफ (Agrograph)

✍️ यह एक संयुक्त ग्राफ है जो एक साथ मौसमी दशाएँ, शुद्ध क्षेत्रफल, शस्यकाल (Crop Season)
दर्शाता है।

✍️ कृषि भूगोल में प्रयोग होता है।



(9) रिक्टर स्केल (Richter Scale)

✍️ भूकंप के झटकों की तीव्रता (Magnitude) मापने की मापनी।

✍️ यह लॉगरिदमिक स्केल है।

✍️ प्रत्येक अंक 10 गुना अधिक तीव्रता दर्शाता है।



(10) नेफ्रोस्कोप (Nephroscope)

✍️ बादलों की दिशा और गति मापने का यंत्र।

✍️ मौसम पूर्वानुमान में सहायक।



(11) सिस्मोग्राफ (Seismograph)

✍️ भूकंप की तरंगों को रिकॉर्ड करने वाला यंत्र।

✍️ यह भूकंपीय तरंगों का ग्राफ बनाता है।

✍️ सिस्मोलॉजी का प्रमुख उपकरण।



(12) मोह पैमाना (Moh’s Scale)

✍️ चट्टानों एवं खनिजों की कठोरता (Hardness) मापने की मापनी।

✍️ इसमें 1 से 10 तक के खनिज होते हैं।

✍️ उदाहरण: टैल्क (1), हीरा (10)



(13) हाईग्रोग्राफ (Hygrograph)

✍️ यह वायु की आपेक्षिक आर्द्रता को लगातार रिकॉर्ड करने वाला यंत्र।

✍️ हाईग्रोमीटर से अधिक उन्नत।



(14) पायरोमीटर (Pyrometer)

✍️ अत्यधिक उच्च तापमान मापने का यंत्र।

✍️ भट्टियों, ज्वालामुखी, उद्योगों में उपयोग।



(15) साइनोमीटर (Cyanometer)

✍️ आकाश के नीलापन (Blue Colour of Sky) को मापने का यंत्र।

✍️ वायुमंडलीय अध्ययन में प्रयोग।



(16) एक्टिनेमीटर (Actinometer)

✍️ सूर्य से प्राप्त विकिरण की तीव्रता मापने का यंत्र।

✍️ जलवायु अध्ययन में सहायक।



(17) एनिमोमीटर (Anemometer)

✍️ पवन की गति मापने का यंत्र।

✍️ मौसम विज्ञान का अत्यंत महत्वपूर्ण उपकरण।



(18) ओक्टास (Oktas)

✍️ आकाश में मेघाच्छादन की मात्रा मापने की इकाई।

✍️ 0 से 8 के पैमाने पर मापा जाता है।



(19) करेंटमीटर (Current Meter)

✍️ नदी या जलधारा के जलप्रवाह की गति मापने का यंत्र।

✍️ जल संसाधन अध्ययन में उपयोग।



(20) इवैपोरीमीटर (Evaporimeter)

✍️ वाष्पीकरण (Evaporation) की मात्रा मापने का यंत्र।

✍️ कृषि एवं जलवायु अध्ययन में उपयोगी।



(21) स्पीडोमीटर / ओडोग्राफ / ओडोमीटर

✍️ वाहन की गति और चली हुई दूरी मापने वाले यंत्र।

✍️ परिवहन में सहायक।



(22) बैरोमीटर (Barometer)

✍️ वायुदाब (Atmospheric Pressure) मापने का यंत्र।

✍️ मौसम परिवर्तन की भविष्यवाणी में अत्यंत महत्वपूर्ण।



(23) फैदोमीटर (Fathometer)

✍️ समुद्र की गहराई मापने का यंत्र।

✍️ नौपरिवहन एवं समुद्र विज्ञान में उपयोग।

16. विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल (World: Cultural Region/Realm)

16. विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल

(World: Cultural Region/Realm)



विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल⇒

प्रश्न प्रारूप 

Q.1. विश्व के वृहत सांस्कृतिक परिमंडल

Q.2. संसार के सांस्कृतिक प्रदेश

Q.3. सांस्कृतिक प्रदेश से आप क्या समझतें है? विश्व को सांस्कृतिक प्रदेशों में वर्गीकृत करने वाले आधार को स्पष्ट करें तथा सर्वमान्य वर्गीकरण की योजना प्रस्तुत करते हुए प्रत्येक के विशेषता लिखें।

(नोट : संस्कृति– रीति-रीवाज, परम्परा, सभ्यता, धर्म, विश्वास, पोशाक, खान-पान, रहन-सहन, संगीत कला, वास्तुकला, चित्रकला, साहित्य, रंगमंच के समुच्च को संस्कृति कहते हैं।)

विश्व के सांस्कृतिक प्रद

विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल

            मानव भूगोल में संस्कृति का अध्ययन एक अनिवार्य घटक है क्योंकि संस्कृति की उत्पत्ति, विकास और निर्धारण में पर्यावरण की भूमिका महत्वपूर्ण है। अलग-2 पर्यावरण में अलग-2 संस्कृतियों का विकास हुआ है। संस्कृति के आधार पर भौगोलिक प्रदेशों का निर्धारण करना सांस्कृतिक प्रदेश कहलाता है। ब्लाश महोदय ने कहा कि “सांस्कृतिक प्रदेश वह भौगोलिक क्षेत्र है जिसकी सांस्कृतिक दृश्यावली आस-पास के क्षेत्रों से भिन्न होती है।

           संस्कृति मानव की जीवनशैली को कहते हैं। मानव के जीवनशैली में रीति-रिवाज, परम्परा, सभ्यता, धर्म, विश्वास, पोशाक, खान-पान, संगीतकला, वास्तुकला, चित्रकला, साहित्य, नृत्यकला, इत्यादि को शामिल करते हैं। मानव के जीवन शैली में शामिल उपरोक्त तत्वों के समुच्च को संस्कृति कहते हैं। अलग-2 भौतिक पर्यावरण में अलग-2 प्रकार के सांस्कृतिक प्रदेश का विकास हुआ है। इन्हीं विविधताओं को ध्यान में रखकर कई इतिहासकार, मानवशास्त्री एवं भूगोलवेता विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश का निर्धारण करने का प्रयास किया है।

        भूगोल में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त सांस्कृतिक प्रदेश का वर्गीकरण ब्रोक एवं बेल महोदय के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। इन दोनों की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम “A Geography of Mankind” है। इस पुस्तक में ब्रोक ने 8 संस्कृति के तत्वों को आधार मानकर सांस्कृतिक प्रदेश का निर्धारण करने का प्रयास किया है। जैसे- (1) धर्म (2) भाषा (3) लोककार्य (4) प्रजातीय संरचना (5) आर्थिक क्रिया (6) खान-पान (7) लोक संगीत और (8) सामाजिक विश्वास एवं मान्यताएँ।

          ब्रोक के अनुसार सभी चरों/घटकों के आधार पर स्वतंत्र रूप से अनेक सांस्कृतिक प्रदेश विकसित किये जा सकते हैं। लेकिन, सभी को मिलाकर के सांस्कृतिक प्रदेश का निर्धारण किया जा सकता है। ब्रोक महोदय ने संश्लिष्ट विधि (सभी को मिलाकर) का प्रयोग करते हुए विश्व को चार प्रमुख और दो लघु सांस्कृतिक प्रदेश में वर्गीकृत किया है:-

विश्व के वृहत / प्रमुख सांस्कृतिक प्रदेश

(1) ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश

(2) इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश

(3) इंडिक सांस्कृतिक प्रदेश

(4) पूर्वी एशियाई या बौद्ध सांस्कृतिक प्रदेश

विश्व के लघु सांस्कृतिक प्रदेश

(i) मिजो अफ्रिकन एवं जनजातीय सांस्कृतिक पदेश

(ii) दक्षिण-पूर्वी एशियाई संक्रमण सांस्कृतिक प्रदेश

             इन सांस्कृतिक प्रदेश के नामाकरण से स्पष्ट होता है कि सांस्कृतिक प्रदेश के निर्धारण में धर्म की भूमिका सर्वाधिक है। धर्म के आधार पर ही ईसाई प्रधान और इस्लामिक प्रधान संस्कृति का नामाकरण किया गया है। जबकि अन्य सांस्कृतिक प्रदेश का नामकरण स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया गया है।

विश्व के सांस्कृतिक प्रदेशों की विशेषता

(1) ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश

             ईसाई प्रधान संस्कृति का विकास विश्व के वृहत भौगोलिक क्षेत्रों में हुआ है। ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश का विकास उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और साइबेरियाई क्षेत्रों में हुआ है। इन सभी क्षेत्रों में ईसाई धर्म का बोलवाला है। लेकिन इनमें भी कई आन्तरिक विविधताएँ पायी जाती हैं। इन विविधताओं को आधार मानते हुए पुन: इसे 7 उप सांस्कृतिक प्रदेश में बाँटते हैं।

जैसे:-

(i) पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

(ii) पूर्वी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश 

(iii) दक्षिणी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

(iv) आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश 

(v) लैटिन अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश

(vi) अस्ट्रेलिया-न्यूजीलैण्ड सांस्कृतिक प्रदेश 

(vii) अफ्रीकन सांस्कृतिक प्रदेश

(i) पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

         पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश में प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग निवास करते हैं जो प्रत्येक धार्मिक मान्यता को वैज्ञानिक तर्क और महत्त्व के दृष्टिकोण से देखते हैं। ये लोग अंधविश्वासी नहीं होते हैं। यूरोप में पुनर्जागरण का श्रेय इन्हीं को जाता है। विश्व में पहली बार औद्योगिक क्रांति का जन्म इसी प्रदेश में हुआ। जीवन शैली पर नगरीकरण एवं वाणिज्यिककरण का व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है। इनके प्रभाव के कारण ही सामाजिक एवं धार्मिक मूल्यों क पतन हुआ है। परिवार एवं विवाह जैसी संस्थाएँ कमजोड़ हुई है। व्यक्तिवाद का विकास अधिक हुआ है। मानव के जीवन पर धर्म का प्रभाव कम और आर्थिक कार्यों का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। अपने साहस एवं तर्क के आधार पर विश्व के कई क्षेत्रों में स्थानान्तरित होकर बड़े-2 उपनिवेशों की स्थापना किया है। 

(ii) पूर्वी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

          पूर्वी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश में वर्तमान CIS (Common-wealth of Indipendent state) में शामिल प्रदेशों को रखा जाता है। इस सांस्कृतिक प्रदेश को समय के आधार पर तीन भागों में बाँटते हैं-

(a) अक्टूबर क्रांति के पूर्व का सांस्कृतिक भूदृश्य- उस वक्त यहाँ कैथोलिक धार्मिक मान्यताओं का प्रभाव था। अधिकतर बस्तियाँ चर्च के इर्द-गिर्द बसी थी। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था था। भूमिपतियों के द्वारा कृषकों का शोषण किया जाता था।

(b) अक्टूबर क्रांति के बाद पूर्वी यूरोप की सांस्कृतिक भूदृश्य- अक्टूबर क्रांति के बाद इस क्षेत्र में गत्यात्मक परिवर्तन देखा गया। अक्टूबर क्रांति के पूर्व सोवियत संघ का उदय हुआ जिसके कारण इन क्षेत्र में साम्यवादी दर्शन का विकास हुआ जिसमें धर्म को ‘विष’ से तुलना किया गया। आर्थिक एकीकरण को बढ़ाना दिया गया। 65 वर्षों तक साम्यवाद का दर्शन यहाँ कायम रहा।

(c) ग्लास्नोस्ट पेरिस्तोत्रिक के बाद का पूर्वी यूरोप- इन दोनों संकल्पना के जन्मदाता गोर्बाचेव है जिसका तात्पर्य खुलापन एवं उदारीकरण है। इसके कारण वहाँ से साम्यवादी दर्शन का प्रभाव समाप्त हो गया। चुले एवं उदार अर्थव्यवस्था के आगमन से नवीन सांस्कृतिक भूदृश्य का विकास हो रहा है। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले समय में यह सांस्कृतिक प्रदेश पश्चमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश का हिस्सा बन जायेगा ।

(iii) दक्षिण यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

        यहाँ के जीवन शैली पर कैथोलिक धर्म और बेटिकन सिटी का प्रभाव अधिक रहा है। इटली, स्पेन, पुर्तगाल, यूनान इसके प्रतिनिधि राष्ट्र है। यहाँ लैटिन भाषा बोली जाती है। अर्थव्यवस्था में कृषि एवं पशुपालन का योगदान अधिक है। यहाँ कभी अंधविश्वास का इतना अधिक बोलवाला था कि चर्चों से स्वर्ग के टिकट दिये जाते थे। इस प्रदेश के लोगों ने दक्षिण अमेरिका में जाकर अपने उपनिवेश का स्थापना किया। 

(iv) आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश

       आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश की तुलना पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश से की जा सकती है, क्योंकि यहाँ के लोग भी प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग है। यहाँ काकेसाइड प्रजाति के लोग बसे हैं। भाषा एवं संस्कृति के अन्य घटक पश्चिम यूरोप से आंग्ल अमेरिका में आयात किये गये हैं। लेकिन आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश से इस माइने में भिन्न है कि पश्चिम यूरोप में उद्योग एवं खनन जैसे आर्थिक गतिविधियों का वर्चस्व है जबकि आंग्ल अमेरिका में उद्योग, खनन एवं कृषि कार्यों का महत्त्व अधिक है।

(v) लैटिन अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश 

            ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश में यह विकासशील सांस्कृतिक प्रदेश का उदाहरण है। यहाँ नीग्रोइड प्रजाति के लोग निवास करते हैं। गरीबी एवं पिछड़ेपन की समस्या अधिक है। यहाँ कैथोलिक धर्म और लैटिन का आयात दक्षिण यूरोप से किया गया है। पुर्तगाल, स्पेन के लोग सोना ही खोज में अपने क्रोस (#) लेकर पहुँच गये। समाज में आज भी जनाजातिय संस्कृति का बोलबाला है।

(vi) आस्ट्रेलियाई – न्यूजीलैण्ड सांस्कृतिक प्रदेश

         इस सांस्कृतिक प्रदेश का विकास अब यूरोपीय लोगों के द्वारा किया गया है जो औपनिवेशिक देशों के आजाद होने के बाद बेघर हो गये थे। यहाँ प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग रहते हैं। यहाँ की भाषा अंग्रेजी और प्रजाति काकेसाइड है। आर्थिक दृष्टिकोण से पश्चिम यूरोप और आंग्ल अमेरिका के सदृश्य है। ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि एवं उद्योग पर आधारित है। जबकि न्यूजीलैण्ड की अर्थव्यवस्था वाणिज्यिक पशुपालन पर आधारित है। 

(vii) अफ्रीकी सांस्कृतिक प्रदेश

           अफ्रीका महाद्वीप में ईसाई संस्कृति यो क्षेत्रों में देखी जाती है- (a) दक्षिण अफ्रीका के केप प्रान्त और (b) पूर्वी अफ्रीका के उच्च भूमि पर। इन दोनों क्षेत्रों में पश्चिमी यूरोप के काकेसाइड प्रजाति के प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग आकर बसे हैं। केपप्रान्त के लोगों ने कृषि उद्योग और व्यापार का विकास किया है जबकि पूर्वी अफ्रीका में बगानी कृषि एवं खनन कार्यों के आधार पर निर्माण किया है सांस्कृतिक भूदृश्य का निर्माण किया है।

        अतः उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि ईसाई संस्कृति का व्यापक क्षेत्र में विकास हुआ है। कई लघु सांस्कृतिक प्रदेश मिलकर एक एकीकृत ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश का निर्माण करते हैं।

(2) इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश

         इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश का विकास मरुस्थलीय एवं अर्द्ध मरुस्थलीय क्षेत्रों में हुआ है। इसका विस्तार दक्षिण में सहारा मरुस्थल, उत्तर में मध्य एशिया, पूर्व में ब्लूचिस्तान से लेकर पश्चिम में तुर्की तक हुआ है। इसी प्रदेश में मक्का एवं मदीना अवस्थित है जहाँ इस्लाम धर्म का उदय हुआ। इस संस्कृति पर पर्यावरण का प्रभाव अध्याधिक पड़ा है। पर्यावरण के ही कारण यहाँ भूगोल, गणित, खगोल विज्ञान, मानचित्रकला इत्यादि का विकास हुआ है। जल की कमी के कारण जल का मितव्ययी उपयोग, खाद्य पदार्थो की कमी के कारण खान-पान में माँस का प्रयोग एवं लम्बे समय तक उपवास रखने की परंपरा प्रारंभ हुई है। मक्का की ओर मुँह करके नवाज पढ़ते हैं। धूल से बचने हेतु बुर्का और साफा का प्रयोग करते हैं। परम्परागत रूप से यह घुमक्कड़ जनजातियों का क्षेत्र है। वनस्पति का अभाव होता है। बाहर का जीवन अल्याधिक कठोर एवं प्रतिस्पर्द्धा से युक्त होते है। इसलिए महिलाओं को चार दीवारी में रखा जाता है। यह सांस्कृतिक प्रदेश के धर्म शिया और सुन्नी में विभक्त हैं। सुन्नी परम्परावादी होते हैं जबकि शिया आधुनिक एवं तर्क में विश्वास करते हैं। इनके जीवन शैली पर कुरान का प्रभाव अधिक देखा जाता है। हाल के वर्षो में इन क्षेत्रों में पेट्रोलियम खनिज मिलने के कारण श्रमिक, तकनीक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आगमन हुआ है। पेट्रो-डॉलर जैजी संकल्पना का विकास हुआ है। OPEC जैसे संगठन तेल के मूल्यों पर नियंत्रण स्थापित कर विश्व के सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।

(3) इण्डिक सांस्कृतिक प्रदेश

        इण्डिक सांस्कृतिक प्रदे का विकास मुख्यत दक्षिण एशिया में हुआ है। यहाँ हिन्दू धर्मावलम्बी है के अलावे अनेक धर्म के लोग निवास करते हैं। विश्व में सर्वाधिकक हिन्दू, मुसलमान, सिख और जैन समुदाय के लोग यहाँ रहते हैं। यह अभूतपूर्व सहिष्णुता का प्रदेश है। यहाँ धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, इसलिए इस प्रदेश को धान प्रधान संस्कृति (Paddy Cultures) कहते हैं। यहाँ की सम्पूर्ण जीवनशैली मानासून के इर्द-गिर्द घूमती है। इसलिए इसे मानसूनी सांस्कृतिक प्रदेश भी कहते हैं। यहाँ ग्रामीण जीवनशैली, बैलगाड़ी, परम्परागत हल, धान की कृषि, मानसूनी जलवायु इत्यादि मिलकर इंण्डिक संस्कृति को जन्म देते हैं। इस प्रदेश में कई क्षेत्रीय भाषाएँ जैसे, बंगाली, तमिल, तेलगू, कन्नड इत्यादि बोली जाती है। यहाँ कई प्रकार के लिखित प्रजातियों का विकास हुआ है। इसलिए इस प्रदेश को “मेल्टिंग पॉट ऑफ रेस” (Melting Pot of Race) का क्षेत्र भी कहते हैं। यहाँ के लोग धोती, कुर्ता, गमछा, साड़ी, लहंगा आदि जैसे वस्त्र धारण करते हैं। लोक संस्कृति में प्राकृतिक तत्व की प्रचुरता अधिक मिलती हैं।

        इस तरह इ‌ण्डिक संस्कृति पूरे विश्व में अलग पहचान रखती है।

(4) बौद्ध या पूर्वी एशियाई सांस्कृतिक प्रदेश⇒

      इस सांस्कृतिक प्रदेश का विकास जापान, चीन, ताइवान, मंगोलिया वियतनाम जैसे देशों में हुआ है। इस प्रदेश को पुनः दो भागों में बाँटते हैं:- (i) चीनी सांस्कृतिक प्रदेश (ii) जापानी सांस्कृतिक प्रदेश

          चीनी सांस्कृतिक प्रदेश में साम्यवाद प्रभाव से धार्मिक प्रभाव कम हुआ है, लेकिन सर्वत्र सांस्कृतिक एकरूपता में वृद्धि हुई है। हाल के वर्षों में खुलेपन एवं उदारीकरण के कारण चीन में भी श्रम, तकनीक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आगमन हुआ है। इससे जबड़दस्त औद्योगिकीकरण, नगरीकरण इत्यादि को बढ़ावा मिला है। 

      बौद्ध संस्कृति में जापान का सांस्कृतिक प्रदेश औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, वाणिज्यिकरण और प्रजातांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। जापान एकमात्र ऐसा देश है जिसके पास प्राकृतिक संसाधन नगण्य है फिर भी विश्व का विकसित राष्ट्र है। यहाँ की लोक संस्कृति मे राष्ट्रीयता का प्रभाव अधिक देखा जाता है।

अप्रत्यक्ष रूप से चीनी और जापानी सांस्कृतिक प्रदेश पर मानसूनी संस्कृति या इण्डिक इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश का प्रभाव देखा जा सकता है क्योंकि यहाँ भारत से ही बौद्ध धर्म आयात होकर आया है और द्वितीय इण्डिक संस्कृति के सामन ही मानसूनी जलवायु का प्रभाव है।

        विश्व के लघु सांस्कृतिक प्रदेश 

(i) दक्षिणी-पूर्वी एशियाई सांस्कृतिक प्रदेश

      इस संस्कृति का विकास इण्डोनेशिया, वियतनाम, थाइलैण्ड, म्यांमार, लाओसा, कंबोडिया जैसे देशों में हुआ है। यह प्रदेश प्रजातीय दृष्टिषेण से बौद्ध सांस्कृतिक प्रदेश नहीं हैं जबकि संस्कृति है दृष्टिकोण से इण्डिक संस्कृति से नजदीक है।

(ii) मिजो अफ्रीकन सांस्कृतिक प्रदेश

        इस संस्कृति का विकास मध्य अफ्रीका एवं विश्व के अनेक जनजातीय प्रदेशों में हुआ है। यहाँ के लोग प्रकृतिवादी, टोटेमवादी, अंधविश्वासी ज्यादा होते हैं। प्राथमिक-आर्थिक क्रिया कलाप में दक्ष होते हैं। प्राय: घुमक्कड जीवन शैली को जीते हैं। गरीबी, बेरोजगारी जैसे समस्याओं का बोलावाला है। 

निष्कर्ष: इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश विशिष्ट भौगोलिक पर्यावरण के कारण ही अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं।


15. फ्रांसीसी भूगोलवेताओं का भूगोल में योगदान

15. फ्रांसीसी भूगोलवेताओं का भूगोल में योगदान



फ्रांसीसी भूगोलवेताओं का भूगोल में योगदान⇒

प्रश्न प्रारूप
Q. भूगोल की विभिन्न शाखाओं के विकास में फ्रांसीसी भूगोलवेताओं के योगदान की समीक्षा कीजिए।

              20वीं शताब्दी के फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने भूगोल की सभी शाखाओं को विकसित करने का प्रयास किया लेकिन मानव भूगोल एवं प्रादेशिक भूगोल पर विशेष जोर दिया था। फ्रांस में मूलत: उच्च कोटि के मानव भूगोलवेता बड़ी संख्या में सामने उभरकर आये। फेब्रे, ब्लाश, लीप्ले, जीन ब्रून्श, डिमांजिया, डि मार्टोनी, चोर्ले जैसे भूगोलवेताओं का नाम उल्लेखनीय है। इसके अलावे गालो, ब्लेन्चार्ड, सीगफ्रायड जैसे भूगोलवेताओं ने राजनीतिक भूगोल के विकास में योगदान दिया।

फ्रांसीसी भूगोलवेताओं

               जर्मनी की तुलना में यहाँ भूगोल का विकास देरी से हुआ। जर्मनी में जहाँ नियतिवाद का समर्थन करने वाले भूगोलवेता अधिक उभरे वहीं फ्रांस में संभववाद का समर्थन करने वाले भूगोलवेता उभरकर सामने आये। इसके पीछे कई कारण थे।
(1) फ्रांस में संभववाद का समर्थन करने वाले जो भी भूगोलवेता उभरकर सामने आये उन सभी का शैक्षणिक पृष्ठभूमि इतिहास से संबंधित थी।
(2) फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने यह प्रत्यक्ष रूप से अपने आँखों से देखा कि किस तरह मानव ने बड़े-2 महानगरों, ट्रांस साइबेरियन रेलवे और बड़े-2 उद्योगों की स्थापना कर प्रकृति पर विजय प्राप्त किया है।

          उपरोक्त दो कारकों का प्रभाव फ्रांसीसी भूगोलवेताओं के चिन्तन पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। फ्रांस में विकसित भूगोल को पुष्ट करने का प्रयास कई भूगोलवेताओं द्वारा किया गया है। जैसे-
(1) एलिसी रेकलस ⇒ इन्होंने 1875 ई० से 1894 ई० के बीच ‘विश्व का नवीन भूगोल’ नामक पुस्तक की रचना की। यह पुस्तक रिटर के द्वारा लिखित ‘अर्डकुण्डे’ के समकक्ष माना जाता है। रेकलस के इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद ‘पृथ्वी एवं उनके निवासी’ (Earth and its Inhavitent) के रूप में किया गया है।

(2) फेब्रे⇒ फेब्रे को भूगोल में संभववाद का जन्मदाता माना जाता है क्योंकि इन्होंने ही सबसे पहले ‘संभववाद’ शब्द का प्रयोग किया था।

(3) बिडाल डि-ला-ब्लाश (1845-1918 ई०)⇒  फ्रांस में आधुनिक भूगोल का विकास करने का श्रेय ब्लाश को जाता है। फ्रांस में रहते हुए इन्होंने भूगोल पर चिन्तन का कार्य किया। इसका परिणाम यह हुआ कि फ्रांस में उनके कई शिष्य उभरकर सामने आये। एक समय आलम यह था कि फ्रांस का शायद ही कोई ऐसा विद्यालय या विश्वविद्यालय हो जहाँ पर उनका शिष्य शिक्षक के रूप में कार्यरत नहीं हो।

             ब्लाश को मानव भूगोल का संस्थापक माना जाता है। वे नियतिवाद के घोर विरोधी और संभववाद के समर्थक थे। ब्लाश ने कहा कि भूगोल में प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों दृश्यों का अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने भूगोल के कुल 6 लक्षणों / विशेषताएँ बतलाये।

(1) भूगोल में पार्थिव घटनाओं की एकता का अध्ययन होता है।

(2) पार्थिव घटनाएँ विभिन्न प्रकार के समायोजन या परिवर्तन का परिणाम है।

(3) भूगोल स्थानों का वैज्ञानिक अध्ययन करने वाला विषय है।

(4) पार्थिक घटनाओं का विश्लेषण करने हेतु वैज्ञानिक विधि का अपनाया जाना चाहिए।

(5) मानव के द्वारा अपने पर्यावरण में किये जा रहे परिवर्तन का अध्ययन आवश्यक है।

(6) पर्यावरण के सभी तत्वों का समाकलन एवं विश्लेषण भूगोल में आवश्यक है।

         ब्लाश क्षेत्रीय भूगोल / प्रादेशिक भूगोल में विश्वास करते थे। उन्होंने 1903 ई० में फ्रांस का भूगोल नामक पुस्तक का प्रकाशन किया। जिसमें उन्होंने लघु समरूप प्रदेश की संकल्पना विकसित किया। पुन: उन्होंने भौगोलिक प्रदेश को परिभाषित करते हुए कहा कि “प्रदेश एक ऐसी क्रियान्वित प्रणाली है जहाँ की असमान दिखाई देने वाली कई वस्तुएं आपस में जुड़े होते हैं और कालान्तर में एक विशिष्ट पहचान देते हैं।”

         ब्लाश मानव को एक क्रियाशील प्राणी मानते थे। इसके आधार पर उन्होंने अपना समर्थन संभववाद की ओर प्रकट किया। उनका मानना था कि मानव अपने विवेक से वातावरण के विभिन्न तत्वों का प्रयोग करता है। वे प्रकृति को एक सलाहकार से अधिक कुछ नहीं मानते थे। ब्लाश महोदय ने जैविक प्रदेशों की व्याख्या करने हेतु “जेनरा-डी-बाइस” की भी संकल्पना प्रस्तुत किया था।
         इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ब्लाश फ्रांस के एक विलक्षण भूगोलवेता थे।

(4) जीन ब्रून्श (1869-1930 ई०)⇒ जीन ब्रून्श ब्लाश के ही शिष्य थे। इन्होंने ‘डकैत अर्थव्यवस्था’  Robber Economy की संकल्पना विकसित किया जिसमें उन्होंने संभववाद का समर्थन करते हुए कहा कि मानव दिन-दहाड़े प्रकृति के गर्भ से खनिजों को निकालता रहता है और प्रकृति मौन बनी रहती है। ब्रून्श ने भौगोलिक तथ्यों के अध्ययन  हेतु दो सिद्धांतों का प्रतिपादन किया-

(1) क्रियाशीलता का सिद्धांत

(2) अंतर संबंधों का सिद्धांत

            पुन: ब्रून्श महोदय ने मानव भूगोल के विषय क्षेत्र को तीन वर्गों में विभक्त किया है-

(i) प्रथम वर्ग- इसमें मिट्टी के अनुत्पादक प्रयोग, जैसे- मकान, सड़क इत्यादि के अध्ययन को शामिल किया है।
(ii) दूसरा वर्ग– इसमें वनस्पति और जन्तु जगत पर मानव विजय से संबंधित तथ्यों को शामिल किया है।
(iii) तीसरा वर्ग- इसमें मिट्टी का वर्गीकरण उपयोग, पौधों एवं पशुओं का विनाश और खनिजों का शोषण जैसे तत्वों को शामिल किया है।
          जीन ब्रून्श ने भौगोलिक चिंतन को प्रस्तुत करने के लिए 1920 ई० में ‘ह्यूमन जियोग्राफी डी ला फ्रांस’ नामक पुस्तक प्रस्तुत किया। इस पुस्तक के प्रथम खंड में प्रादेशिक भूगोल पर प्रकाश डाला गया है।
(5) अल्बर्ट डिमांजिया (1872-1940 ई०)⇒ डिमांजिया भी ब्लाश के सर्वोत्तम शिष्यों में से एक थे। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘मानव भूगोल की समस्या’ है। उन्होंने ग्रामीण बस्तियों पर शोध विशेष रूप से किया है। यह भी संभववाद के समर्थक के। इस तथ्य का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा है कि मानव सतत् अपने प्रयास से वातावरण को परिमार्जित और रूपांतरित करता रहता है। डिमांजिया भूमि का वर्गीकरण भी प्रस्तुत किया है, जिसकी प्रशंसा फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने मुख्य रूप से किया है।
(6) डि मार्टोनी (1873-1955 ई०)⇒ डि मार्टोनी ब्लाश का और दामाद दोनों था। इसकी रूची भौतिक भूगोल में अधिक थी। इन्होंने आल्पस पर्वत पर होने वाले हिमनद से अपरदन और उससे निर्मित स्थलाकृतियों का विस्तार से अध्ययन किया है। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम भूगोल भूगोल है।
(7) ब्लैंचार्ड⇒ ब्लैंचार्ड का अध्ययन मूलत: नगरीय भूगोल से सम्बंधित है। इन्होंने फ्रांस में ‘स्कूल ऑफ अरबन ज्योग्रफर’ नामक संस्था की भी स्थापना की। उन्होंने ‘फ्रेंच आल्पस’ पुस्तक की रचना की जिसमें ग्रामीण घरों के प्रकारों पर विशेष रूप से प्रकाश डाला।
(8) सीगफ्रायड⇒ यह फ्रांस का एक मात्र ऐसा भूगोलवेता है जिसकी रुची राजनीतिक भूगोल और चुनाव भूगोल में था। उन्होंने अपने विचारों को फ्रांस का राजनैतिक भूगोल नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया। सिगफ्रायड राज्यों के सीमा का निर्धारण हेतु कई तकनीकों का विकास किया।
(9) एम.शोरे⇒ एम. शोरे का मुख्य योगदान औपनिवेशिक भूगोल में रहा है। इन्होंने उपनिवेश बनाने वाले देशों और बनने वाले देशों की विशेषता और प्रक्रिया पर विशेष रूप से प्रकाश डाला है। औपनिवेशिक भूगोल में डुबॉय जैसे भूगोलवेता का भी विशिष्ट योगदान रहा है।
(10) गालो⇒ आधुनिक भूगोलवेताओं में एक महान भूगोलवेता रहा है। इन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उत्तरी-पूर्वी फ्रांस, मध्य यूनान और स्वेज नहर का अध्ययन किया है।
       उपरोक्त भूगोलवेताओं के अलावे भी ऐसे कई भूगोलवेता हैं जिन्होंने फ्रांसीसी भूगोल के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जैसे- गॉट मैन नामक भूगोलवेता ने ‘मेगैलोपोलिश’ (Magalopolis) शब्द का प्रयोग किया। चोर्ले महोदय ने भूगोल में मॉडल निर्माण पर प्रकाश डाला। जे. अन्सेल महोदय ने राजनीतिक भूगोल में योगदान दिया।
निष्कर्ष – इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने भूगोल के विभिन्न शाखाओं को विकसित करने में अपना विशिष्ट योगदान दिया है। लेकिन मानव भूगोल, राजनीतिक भूगोल, नगरीय भूगोल इत्यादि के विकास पर इनका विशेष योगदान रहा है।
उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

        भौगोलिक ज्ञान के विकास में फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं का अतुलनीय योगदान है। फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं ने अनेक नई संकल्पनाओं का प्रतिपादन किया तथा अनेक पूर्ववर्ती संकल्पनाओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया। मानव भूगोल व प्रादेशिक भूगोल के क्षेत्रों में फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं ने जितना योगदान किया हैं उतना विश्व के किसी अन्य देश के भूगोलवेत्ताओं ने नहीं किया। ब्लाश (Blache), ब्रून्स (J. Brunches), डिमांजियाँ (Demangeon), गालो (Gallois), ब्लैचार्ड (Blanchard), डि-मार्तोनी (De-Mortonne), चोर्ले (Chorley) आदि फ्रांसीसी भूगोल के क्षितिज पर दीप्तिमान भूगोलवेत्ता हैं। फ्रांस में जिन भौगोलिक विचारधाराओं को बल मिला, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं:-

(i) मानव भूगोल (Human Geography):–

       मानव भूगोल के विकास में फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं का किसी भी अन्य देश के भूगोलवेत्ताओं से अधिक योगदान है। व्लाश, ब्रूस, डिमांजियां, आदि मानव भूगोल के सर्वप्रमुख विद्वान थे।

     ब्लाश ने Principles of Human Geography ग्रन्थ लिखा। इसमें संसार की जनसंख्या के वितरण, घनत्व व प्रवसन, मानव अधिवास, मानव वातावरण सम्बन्ध, आदि पर प्रकाश डाला गया है। ब्लाश को सम्भववाद का प्रवर्तक माना जाता है।

    जीन ब्रूस मानव भूगोल का दूसरा प्रमुख विद्वान था। इसकी पुस्तक ‘मानव भूगोल’ (Geographie-Humanie) 1910 में प्रकाशित हुई। ब्रूस ने मानव भूगोल के तथ्यों का यथार्थ विभाजन प्रस्तुत किया था। ब्रूस ने परिवर्तनशीलता के सिद्धान्त (Principle of Activity) व अन्तर्क्रिया सिद्धान्त (Principle of Interaction) का प्रतिपादन किया। ब्रूस का अन्तर्क्रिया सिद्धान्त ब्लाश के पार्थिव एकता के सिद्धान्त पर आधारित था।

     डिमांजियां ने ‘मानव भूगोल की समस्याएँ’ (Problems of Human Geography) लिखी। इसमें मानव भूगोल की परिभाषा दी गई है व विषय क्षेत्र पर भी प्रकाश डाला गया है।

(ii) सम्भववाद (Possibilism):-

      इस विचारधारा का जन्म फ्रांस में हुआ। ब्लाश इसका प्रवर्तक माना जाता है। फेब्रे (Febre), ब्रूस (Brunhes), डिमांजियां (Demangeon) व ब्लैचार्ड (Blanchard) इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक थे।

      सम्भववाद की विचारधारा, वातावरण निश्चयवाद की विरोधी विचारधारा है। सम्भववाद के समर्थकों का मत है कि मानव अपने कार्यकलापों के लिए स्वतन्त्र होता है। उस पर प्रकृति का कोई नियन्त्रण नहीं होता। दूसरे शब्दों में, मानव प्रकृति से अधिक शक्तिशाली है। मानव प्रकृति के नियन्त्रण में नहीं है, वरन् प्रकृति मानव के नियन्त्रण में है।

(iii) प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography):-

     फिलिप बुआचे (Phillippe Buache) प्रथम भूगोलता था, जिसने राजनीतिक सीमाओं के आधार पर किए जाने वाले भौगोलिक अध्ययनों का विरोध किया। उसने कहा कि हमें आंकड़ों का एकत्रीकरण व भौगोलिक अध्ययन प्राकृतिक सीमाओं पर करना चाहिए। उसके अनुसार नदी द्रोणियां सर्वोत्तम प्राकृतिक सीमाएँ हैं।

     इसी आधार पर फ्रांस में प्रादेशिक भूगोल का विकास हुआ यश गालो दि मर्तीनी, आदि ने इस विचारधारा को महत्वपूर्ण आश्रय दिया। प्रादेशिक भूगोल के विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ‘विश्व भूगोल’ (Geographie Univer selle) नामक ग्रन्थमाला ने अदा की। इसकी योजना ब्लाश ने तैयार की थी, परन्तु उसकी मृत्यु के बाद गालो ने यह कार्य सम्भाला। यह ग्रन्थमाला वैज्ञानिक शुद्धता के साथ उत्कृष्ट शैली में लिखी गई थी।

(iv) भौतिक भूगोल (Physical Geography):-

       फ्रांस में भौतिक भूगोल का भी पर्याप्त विकास हुआ। दि मर्तोनी सर्वप्रमुख भौतिक भूगोलवेत्ता था। उसने 1909 में भौतिक भूगोल की प्रथम पाठ्य पुस्तक (Traite de Geographie Physique) प्रकाशित की। उसने आल्पस मध्य यूरोप तथा फ्रांस का भौतिक भूगोल भी लिखा। ब्लैँचाई ने 1938 में आल्पस का भौतिक भूगोल प्रकाशित कराया। बौलिंग (Bauling) ने फ्रांस के मध्यवर्ती पठार का भौतिक भूगोल लिखा।

(vi) राजनीतिक भूगोल (Political Geography):-

       सीगफ्रीड (Siegfried) व असेल (J. Ancel) के नेतृत्व में फ्रांस में राजनीतिक भूगोल का विकास हुआ। सीगफ्रीड ने फ्रांस में राजनीतिक दलों और चुनावों में भौगोलिक कारकों का विश्लेषण किया था। उसने राजनीतिक भूगोल पर अनेक वक्तव्य दिए थे तथा पुस्तकें प्रकाशित कीं। अन्सेल ने ‘यूरोप का राजनीतिक भूगोल’ तीन ग्रन्थों में प्रकाशित किया था।

(vii) औपनिवेशिक भूगोल (Colonial Geography):-

      डुबोइस (M. Dubois), पेरिस में, 1892 में, औपनिवेशिक भूगोल का प्रथम प्रोफेसर था। 1902 में औपनिवेशिक भूगोल का अध्ययन पेरिस के अतिरिक्त सियोन्स, मार्सली, बोर्डियो काएन, टूलाउज, आदि विश्वविद्यालयों में भी फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं के सहयोग से होने लगा था।

  औपनिवेशिक भूगोल प फ्रांसीसी विचारधारा की सर्वोत्तम पुस्तक डिमांजियां की ‘ब्रिटिश साम्राज्य’ (L’ Empire Britamnique) 1923 में प्रकाशित हुई थी। बर्नार्ड, गौतियर, ट्रेश, गोरो, मोनोड, रोबीक्युएन, आदि अन्य मुख्य औपनिवेशिक भूगोलवेत्ता थे।


 13. अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट का भूगोल के विकास में योगदान

 13. अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट का भूगोल के विकास में योगदान




अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट

प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल के विकास में अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट द्वारा दार्शनिक तथा विधितंत्र योगदान का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।

          अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट एक महान जर्मन भूगोलवेता था। जिसका जन्म 1769 ई० में और मृत्यु 1859 ई० में हुआ। हम्बोल्ट छायावादी युग (1800-59 ई०) का भी महान भूगोलवेता था। इनके समकालीन जर्मनी में रिटर और हॉर्टशोन जैसे महान भूगोलवेत्ता तथा शिलर और गेटे जैसे साहित्यकार भी सक्रिय थे।

अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्टअलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट की जीवनी

        अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट को आधुनिक भूगोल का जन्मदाता माना जाता है। हेटनर महोदय ने कहा है कि आधुनिक भूगोल की शुरुआत 1799 ई० से माना जाना चाहिए क्योंकि हम्बोल्ट ने इसी वर्ष विश्व प्रसिद्ध द० अमेरिका की यात्रा पर निकला था। हम्बोल्ट का जन्म बर्लिन में एक करोड़पति के घर में हुआ था। इसकी शिक्षा-दीक्षा जर्मनी के बड़े-2 विद्यालय एवं विश्वविद्यालयों में हुई थी। इसने फ्रैंकफर्ट विश्व विद्यालय में वनस्पतिशास्त्र, गाटिंगन विश्वविद्यालय में भूगर्भशास्त्र का अध्ययन किया।

       1789 ई० में हम्बोल्ट ने बैसाल्ट के उद्भव पर भूगोल लिखा जिसकी सर्वत्र चर्चा हुई। किशोरावस्था में ही जॉर्ज फोस्टर के साथ हॉलैंड, बेल्जियम, फ्रांस और इंगलैंड का यात्रा कर चुका था। अक्सर हम्बोल्ट अपने बड़े भाई विल्हेम वॉन हम्बोल्ट से मिलने स्वीट्जरलैण्ड के ‘जेना’ नगर में आता जाता रहता था। अर्थात हम्बोल्ट के जीवन में यात्रा की नींव बचपन में ही रख दी गई थी। हम्बोल्ट अपने जीवन में लगभग 60,000 मील की यात्रा किया। इस यात्रा के दौरान उसने प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से जो अनुभव किया उसे ‘Cosmos’ नामक पुस्तक में लिपिबद्ध कर पूरे विश्व में अपनी पहचान स्थापित कर दिया। 

हम्बोल्ट की यात्राएँ

        1799 ई० में हम्बोल्ट के द्वारा की गई यात्रा का अगर विश्लेषण की जाय तो स्पष्ट होता है कि उसने अपनी यात्रा का प्रारंभ किरुना (स्पेन) नामक बंदरगाह से किया था। स्पेन से चलकर वह सबसे पहले बेनेजुएला के कुमाना बंदरगाह पर उतरा। हम्बोल्ट वेनेजुएला में बहनेवाली औरिनिको नदी के सहारे आमेजन नदी के स्रोत क्षेत्र पहुँचा और आमेजन नदी के स्रोत क्षेत्र का खोज किया।         

        आमेजन नदी के स्रोत क्षेत्र खोजे जाने के बाद वह क्यूबा लौट आया। पुन: हम्बोल्ट लौटकर मैग्डालिना घाटी के सहारे एण्डीज पर्वत के ऊपर चढ़ाई किया। एण्डीज पर्वत पर चढ़ने के क्रम में वह चिम्बराजो चोटी पर चढ़ाई किया था, चिम्बराजो के क्रेटर में उत्तरा और बैसाल्ट का अध्ययन किया। चिम्बराजो पर चढ़ाई करने के बाद क्वीटो घाटी के सहारे पेरू की राजधानी लीमा पहुँचा। पेरू के तट पर उसने पेरू की ठण्डी जलधारा का खोज किया और उसका नामाकरण अपने नाम पर किया।

      हम्बोल्ट पेरू के तट पर गवानो पक्षी का विशिष्ट रूप से अध्ययन किया। लीमा के बाद एकापुल्का बंदरगाह से होते हुए वह मैक्सिको पहुँचा और सलाह दिया कि प्रशान्त महासागर और अटलांटिक महासागर जोड़ने के लिए पनामा नहर का निर्माण किया जाए। मैक्सिको से पूरब क्यूबा की राजधानी हवाना और हवाना से USA के प्रसिद्ध नगर फिलाडेल्फीया और वाशिंगटन का यात्रा किया। पुनः वाशिंगटन से वह पेरिस लौट आया और पेरिस में ही वह बस गया।

       पुनः 1827 ई० में रूसी सरकार के निमंत्रण पर  यूराल पर्वत, साइबेरिया और अल्टाई पर्वत श्रृंखला का यात्रा किया। इस यात्रा के लौटने के बाद ही उसने अपने ‘Cosmos’ नामक पुस्तक की रचना प्रारंभ किया। हम्बोल्ट के जीवन पर श्रीमती कैरोलीन फान वाल्सगाने के इस कथन का जबरदस्त प्रभाव था। जैसे- पृथ्वी के एक-एक तत्व परस्पर एक-दूसरे से गुथे हुए हैं। प्रत्येक तत्व एक-दूसरे को जीता और जीलाता है।” हम्बोल्ट ने अपने यात्रा के दौरान इस कथन का प्रत्यक्ष दर्शन किया था और इसे सत्य माना।

अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट के दर्शन एवं विधितंत्र

          अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट ने भूगोल के दर्शन एवं अध्ययन विधि या विधितंत्र में निम्नलिखित योगदान दिया है।

    हम्बोल्ट अपनी पुस्तक ‘कॉसमास’ में सात प्रकार की संकल्पना विकसित की हैं:-

(1) पृथ्वी के सतह का अध्ययन मानवीय अधिवास के रूप में करते हैं।

(2) भूगोल का अध्ययन क्षेत्रीय वितरण के रूप में करते हैं।

(3) सामान्य भूगोल ही भौतिक भूगोल है।

(4) भूगोल का मुख्य उद्देश्य भौतिक वातावरण मानवीय संबंधों का अध्ययन होना चाहिए।

(5) भूगोल में पृथ्वी के सभी घटकों का अध्ययन किया जाना चाहिए। 

(6) भूगोल में क्रमबद्ध पद्धति का विकास किया जाना चाहिए।

(7) भूगोल प्रकृति के एकता का भी अध्ययन करता है।

           हम्बोल्ट के द्वारा विकसित उपरोक्त 7 संकल्पनाओं के अलावे भी उसने कई और दर्शन विकसित किए। जैसे उसने कहा कि प्रकृति जीवन्त समष्टि हैं। उसने इसे अन्योन्याश्रिता के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है। उसने कहा है कि मुझे आमेजन के वनों में विचरण करते हुए एण्डीज पर्वत पर चढ़ाई करते हुए इसका सदा बोध होता रहा कि सम्पूर्ण प्रकृति एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक बसा हुआ है तथा उन सबमें एक ही आत्मा से अनु-प्रामाणिक है।

            हम्बोल्ट ने भूदृश्य की संकल्पना प्रस्तुत करते हुए कहा है कि “एक ही जीवंत समष्टि (आत्मा) भूतल के विभिन्न भागों में विभिन्न रूपों में प्रकट होती है जिसकी अपनी विशिष्टता होती है।” इसी संदर्भ में उन्होंने “वन लाइफ” एक जीवन की संकल्पना प्रस्तुत किया।

          हम्बोल्ट पार्थिव एकता की संकल्पना को समझाने के लिए ‘वाटर फ्लाई संकल्पना’ प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने कहा है कि एक तितली विषुवतीय प्रदेश में अपना पंख हिलाती है तो इसका असर संपूर्ण विश्व के जलवायु पर पड़ता है।

          हम्बोल्ट वेनेजुएला के वेलेन्सिया झील के सूखने का कारण बताया कि इस झील के किनारे में अवस्थित वनों का तेजी से कटाव किये जाने के कारण यह झील सूख रहा है।

         हम्बोल्ट ने बताया कि भौगोलिक तथ्यों का अध्ययन प्रत्यक्ष रूप से अपने ज्ञानेन्द्रियों से अनुभव करके किया जाना चाहिए। यही कारण है कि इनके अध्ययन की पद्धति को प्रत्यक्ष अनुभव परक कहा जाता है। पुन: इन्होंने बताया कि भौगोलिक तत्त्वों का विकास आगमानात्मक (Inductive) रूप से हुआ है। इससे लगता है कि इनके जीवन पर डार्विन के द्वारा विकसित जैव उद्दविकास के सिद्धांत का प्रभाव था।

           अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट को भूगोल में जलवायु विज्ञान, पादप भूगोल का श्रीगणेश करने का श्रेय जाता है। अर्थात हम्बोल्ट को जैव भूगोल का संस्थापक माना जाता है क्योंकि इन्होंने ही सर्वप्रथम विश्व की प्राकृतिक वनस्पति तथ फसलों का ऊँचाई तथा तापमान से सम्बन्ध को स्पष्ट किया था। उसने अपने यात्रा के दौरान समताप रेखा (Isotherm) पहली बार खींचने का प्रयास किया था। हम्बोल्ट अपनी पुस्तक को कई खण्डों में बाँटकर लिखा है। इसका सबसे अन्तिम खण्ड 1859 ई० में पूरा किया। पूरे जीवन में उसने लगभग 40 ग्रंथ लिखे। 

आलोचना

   हम्बोल्ट मूलतः नियतिवादी दर्शन का समर्थक था जिसमें उसने प्रकृति की श्रेष्ठता को स्वीकार किया था। इसी विचारधारा के विरोध में फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने मानव की श्रेष्ठता को स्वीकार करते हुए संभववाद की संकल्पना का विकास किया। इस तरह भूगोल में नियतिवाद बनाम संभववाद का द्वैतवाद का प्रारंभ हुआ। 

निष्कर्ष 

        इस तरह उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हम्बोल्ट एक महान भूगोलवेता था। इसके विचारधारा से निश्चित रूप से कई द्वैतवाद का विकास हुआ। लेकिन हम्बोल्ट का उद्देश्य भूगोल को विभाजित करना नहीं था बल्कि उसके प्रत्येक अंगों का सम्पूर्ण विकास करना था।

नोट : हम्बोल्ट ने प्राकृतिक प्रदेश की आधारभूत समरसता को “जुसामेनहैंग” की संज्ञा दी।

12. जर्मन भूगोलवेत्ताओं का योगदान

12. जर्मन भूगोलवेत्ताओं का योगदान




जर्मन भूगोलवेत्ताओं का योगदान⇒

                     आधुनिक भूगोल के विकास का श्रेय यूरोपीय चिंतकों को जाता है। यूरोप में भूगोल के विकास को दो काल में बाँटा जा सकता-

(1) पुनर्जागरण काल के पूर्व का भूगोल

(2) पुनर्जागरण काल के बाद का भूगोल

        यूरोप में पुनर्जागरण के साथ ही वैज्ञानिक चिन्तन शुरू हुआ जिसका प्रभाव लगभग सभी विषयों पर पड़ा। पुनः जब इंगलैण्ड में औद्योगिक क्रांति हुई तो इस क्रांति का प्रभाव अन्य विषयों पर पड़ा। वैज्ञानिक चिन्तन और औद्योगिक क्रांति का परिणाम था कि भूगोल जैसे विषय में भी गत्यात्मकता का आगमन हुआ। पुनर्जागरण काल के पहले भूगोल में यूनानी और रोमन भूगोलवेताओं का विशेष योगदान था जबकि पुनर्जागरण काल के बाद जर्मन, फ्रांसीसी और ब्रिटिश भूगोलवेताओं का विशिष्ट योगदान रहा है। 

जर्मन भूगोलवेत्ताओं

    उपरोक्त चिन्तनों में जर्मनी भूगोलवेताओं को आधुनिक चिंतन विकसित करने का श्रेय जाता है। जर्मनी में भूगोल के अध्ययन की शुरुआत 18वीं शताब्दी के पूर्व से माना जाता है क्योंकि इसी काल में भूगोल का अध्ययन विद्यालय स्तर पर किया जाने लगा था। प्रारंभिक जर्मन भूगोलवेताओं में इमैनुएल काण्ट तथा फॉस्टर जैसे भूगोलवेताओं का विशिष्ट योगदान रहा है। क्योंकि इन दोनों ने पहली बार उच्च शिक्षण संस्थानों में भौगोलिक अध्ययन पर विशेष जोर दिया। काण्ट महोदय की विशेष रुची खगोल विज्ञान अध्ययन में थी जबकि फॉस्टर की विशेष रुची भूआकृति विज्ञान में था। अत: भूगोल में खगोलशास्त्र और भूआकृति विज्ञान के विकास का श्रेय काण्ट और फॉस्टर को जाता है।

       प्रारंभ में भूगोल का अध्ययन इतिहास के अन्तर्गत किया जाता था। भूगोल को इतिहास से अलग करने का श्रेय इमैनुएल काण्ट को जाता है क्योंकि इन्होंने ही सबसे पहले बताया कि किसी भी घटना का अध्ययन स्थान (space) और काल के संदर्भ में किया जाता है। समय के संदर्भ में किसी भी घटना का अध्ययन इतिहास कहलाता है जबकि स्थान के संदर्भ में किसी भी घटना का अध्ययन भूगोल कहलाता है। पुनः काण्ट एवं फॉस्टर ने भूगोल में कई नवीन चिंतन को प्रस्तुत किया है। लेकिन इन दोनों ने ही मिलकर जर्मनी के उच्च शिक्षण संस्थानों में भूगोल को एक विषय के रूप में मान्यता नहीं दिलवा सके।

       वास्तव में आधुनिक भूगोल का जन्मदाता हम्बोल्ट और रिटर को माना जाता है। ये दोनों भूगोलवेत्ता एक-दूसरे के समकालीन थे। हम्बोल्ट का जन्म 1769 ई० में हुआ था जबकि रिटर का जन्म 1779 ई० हुआ था लेकिन दोनों की मृत्यु एक ही वर्ष 1859 ई० हुई थी। ये दोनों भूगोलवेता आधुनिक भूगोल के विकास के पोषक थे। लेकिन दोनों के दृष्टिकोण अलग-2 था। सामान्यता दोनों के दृष्टिकोण में अन्तर भूगोल के विधितंत्र से संबंधित था।

     जैसे:- हम्बोल्ट का मानना था कि भूगोल का विकास Inductive Method (आगमानात्मक विधि) से हुआ। जबकि रिटर के अनुसार Deductive Method (निगमानात्मक विधि) से हुआ है। इन दोनों के मौलिक विचार में अन्तर का प्रमुख कारण दोनों के अलग-2 जीवन का पृष्ठ भूमि था। जैसे- हम्बोल्ट बर्लिन के एक करोड़पति बाप का इकलौता बेटा था। जबकि रिटर एक गाँव से आने वाला गरीब गड़ेडिया का बेटा था।

       हम्बोल्ट की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। इसलिए उसने शुरू से वैज्ञानिक विषय की पढ़ाई की और वैज्ञानिक चिन्तन का विकास किया। जबकि रिटर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। इसलिए दर्शनशास्त्र जैसे मानविकी विषय का अध्ययन किया। इसलिए वह ईश्वरवादी विचारों पर जोर दिया।

      हम्बोल्ट ने अपना वैज्ञानिक विचार “Cosmos” नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया जबकि रिटर ने ‘अर्डकुण्डे’ नामक पुस्तक में अपना चिंतन प्रस्तुत किया। हम्बोल्ट विश्व के यात्रा करने के बाद अपना विचार प्रस्तुत किया। उसने अपने जीवन काल में 60,000 मील से भी अधिक यात्रा की। दूसरी ओर रिटर को आरामकुर्सी पर बैठने वाला चिंतक माना जाता है।

         हम्बोल्ट ने अपनी यात्रा के दौरान अमेजन नदी के उद्गम स्थल की खोज की। यूरोप का वह पहला व्यक्ति बना जो एण्डीज पर्वत को पार कर पेरू की ठण्डी जलधारा की खोज की। यहाँ तक की चिम्बराजो ज्वालामुखी के क्रेटर में उतरकर बैसाल्टिक चट्टानों का अध्ययन किया। यात्रा के दौरान हमबोल्ट अपने नाव पर एक प्रयोगशाला भी लेकर चलता था। अपने यात्रा के दौरान विभिन्न स्थानों का तापमान का मापन किया और उसके बाद पहली बार समताप रेखा खींचा।

      पुन: हमबोल्ट मैक्सिको और न्यूयार्क की यात्रा करते हुए यूरोप पहुँचा। यूरोप में आने के बाद रूस के जार (राजा) के अनुरोध पर पुन: उसने यूराल पर्वत और साइबेरियाई क्षेत्र की यात्रा की। वहीं दूसरी ओर रिटर महोदय ने जर्मनी में रहकर विभिन्न प्रकार के भौगोलिक सूचनाओं को एकत्रित कर चिन्तन एवं लेखन का कार्य किया।

         हम्बोल्ट अपनी पुस्तक कॉसमॉस में सात संकल्पना विकसित किये हैं।-

(1) पृथ्वी के धरातल का अध्ययन ‘मानवीय अधिवास’ के रूप में किया जाना चाहिए।

(2) भूगोल का अध्ययन क्षेत्रीय वितरण के रूप में किया जाना चाहिए।

(3) भौतिक भूगोल ही सामान्य भूगोल है।

(4) भौगोलिक अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य भौतिक भूगोल और मानवीय संबंधों के अध्ययन होना चाहिए।

(5) भूगोल में पृथ्वी के सभी घटकों का अध्ययन होना चाहिए।

(6) भूगोल में क्रमबद्ध अध्ययन पर जोर दिया जाना चाहिए।

(7) भूगोल के सभी घटक एक-दूसरे से जुड़े हुए है। इसे पार्थिव एकता का सिद्धांत भी कहते हैं।

          रिटर ने अपने अध्ययन में हम्बोल्ट के अधिकार संकल्पना को शामिल किया लेकिन दो संकल्पना में रिटर के मत भिन्न था। जैसे:- रिटर के क्रमबद्ध अध्ययन के स्थान पर प्रादेशिक अध्ययन पर विशेष जोर दिया। वहीं प्रकृति या पृथ्वी के स्थान पर मानव के अध्ययन पर इसने विशेष जोर दिया। लेकिन वास्तव में ये दोनों ही भूगोलवेत्ता नियतिवाद के समर्थक थे।

          रैटजल अगले महान जर्मन भूगोलला थे। जिन्हें ‘मानव भूगोल’ शुरुआत करने का श्रेय जाता है। इन्होंने भूगोल में “भौतिक भूगोल बनाम मानव भूगोल” का द्वैतवाद शुरू किया। इन्होंने नियतिवाद के स्थान पर पर्यावरण नियतिवाद की संकल्पना विकसित किया। इन्हें भूगोल में राजनीतिक भूगोल और सांस्कृतिक भूदृश्य संकल्पना विकसित करने का श्रेय जाता है। राजनीतिक भूगोल में उन्होंने कहा है कि कोई भी राज्य या समाज जैविक उद्दविकास के समान ही अनेक अवस्थाओं से गुजरकर विकसित होते हैं।”

      इसी तरह से संस्कृतिक भूदृश्य में उन्होंने बताया कि “अलग-अलग वातावरण में अलग-अलग रहन-सहन, खान-पान पोषक, विश्वास, भाषा इत्यादि का विकास होता है। जिससे अलग-2 सांस्कृतिक भूदृश्य विकसित होते हैं। “ रैटजेल ने कई पुस्तकों की भी रचना की। जैसे- “एंथ्रोपोज्योग्रफिया”, “पॉलिटिकल ज्योग्रफी”  और “प्रिंसिपुल ऑफ ह्यूमैन ज्योग्रफी”। रैटजेल ने अपने चिंतन पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि “मैने यात्रा की रेखा खींची और उसके बाद मैने वर्णन किया यही मेरा भूगोल है।” उन्होंने यह भी कहा है कि भूगोल एक वर्णात्मक विषय है। पुनः उन्होंने कहा है कि भूगोल में विश्लेषण पर विशेष जोर दिया जाना चाहिए।

        उपरोक्त भूगोलवेताओं के अलावे कई और ऐसे भूगोलवेत्ता हुए जिन्होंने भूगोल में व्यकिगत योगदान देकर भौगोलिक चिन्तन के विकास को समृद्ध किया है। रीचथोपेन महोदय ने भूगोल में क्षेत्रीय विज्ञान को जन्म दिया। वहीं हेटनर महोदय ने मानव भूगोल, विश्व का ‘वृहत प्रादेशिक भूगोल, भूगोल का इतिहास, लक्षण और विधि’ नामक पुस्तक में स्थलाकृतिक विज्ञान और विभिन्न प्रदेशों का अध्ययन विकसित किया।

      जैलेन महोदय ने ‘भूराजनीति का सिद्धांत’ विकसित किया। जिसमें बताया कि “कोई भी राज्य भूमि की राजनीति करता है।” जैलेन के इस विचारधारा को सबसे अधिक समर्थन हिटलर और उसके सेनापति कार्ल हाउशोफर के द्वारा प्राप्त हुआ। कार्ल हाउशोफर ने भूराजनीति के अध्ययन हेतु “इन्स्टीच्यूट ऑफ ज्यो पोलिटिक्स स्कूल” की स्थापना करवायी।

         जर्मन भूगोलवेता में अल्बर्ट पेंक और बाल्थर पेंक जैसे भूगोलवेत्ता प्रमुख हैं, जिन्होंने अमेरिकी भूगोलवेत्ता डेविस के द्वारा प्रस्तुत सामान्य अपरदन चक्र सिद्धांत के विरोध में ‘आधुनिक एवं वैज्ञानिक अपरदन चक्र का सिद्धांत’ प्रस्तुत किया। इसी तरह वॉन थ्यूनेन ने कृषि स्थानीयकरण का सिद्धांत, बेबर ने औधोगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत, क्रिस्टॉलर ने केन्द्रीय स्थल का सिद्धांत प्रस्तुत कर जर्मन भौगोलिक चिन्तन को समृद्ध किया है।

निष्कर्ष

       इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि आधुनिक भूगोल के विकास में जर्मन भूगोलवेत्ताओं का विशिष्ट योगदान रहा है। इनके योगदान को आज भी विश्व के कई देशों में न केवल मान्यता प्राप्त है बल्कि उसका अध्ययन भी किया जाता है।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

       आधुनिक वैज्ञानिक भूगोल की स्थापना में जर्मनी को प्रथम स्थान दिया जाता है। वहाँ अठारहवीं सदी (कान्ट के समय) से ही भूगोल में आधुनिकता एवं वैज्ञानिकता की नींव पड़ चुकी थी। कान्ट ने सर्वप्रथम भूगोल के लिए कुछ नियमों का प्रतिपादन किया, इस प्रकार यद्यपि उन्होंने भूगोल में वैज्ञानिकता की आधारशिला रखी, परन्तु भूगोल की वास्तविक रूपरेखा उन्नीसवीं सदीं में हम्बोल्ट (Humbolt) व रिटर (C. Ritter) ने तैयार की।

       कान्ट, रिटर, रेटजेल, हम्बोल्ट, रिचथोफेन व हेटनर जैसे भूगोलवेत्ताओं ने वातावरण निश्चयवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। रिचथोफेन तथा हेटनर ने भूगोल को क्षेत्रवर्णी विज्ञान के रूप में समझाने का प्रयत्न किया। जर्मनी के वर्तमान भूगोलवेत्ताओं ने लैण्डशाफ्ट (Landchaft) की विचारधारा का समर्थन किया। भू-राजनीति की विचारधारा का उदय जर्मनी में ही हुआ। हम्बोल्ट ने क्रमबद्ध व रिटर ने प्रादेशिक भूगोल का प्रतिपादन किया। इसी प्रकार की अनेक विचारधाराएँ जर्मन भूगोलवेत्ताओं ने प्रतिपादित की। प्रमुख विचारधाराओं का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:-

(i) वैज्ञानिक भूगोल (Scientific Geography):-

      अठारहवीं सदी में रीनहॉल्ड फॉर्स्टर तथा जार्ज फॉर्स्टर ने वैज्ञानिक ढंग से पृथ्वी के विभिन्न भागों के भौगोलिक तथ्यों के प्रेक्षण (Observations) किए। उन्होंने तथ्यों को एकत्र किया, उनकी तुलना की, वर्गीकरण किया-इस वर्गीकरण में तथ्यों का सामान्यीकरण (Generalization) किया और उनकी कारणात्मक व्याख्याएं लिखीं। उन्होंने भौगोलिक सामग्री का वैज्ञानिक विवेचन किया। इस प्रकार रीनहॉल्ड फॉर्स्टर प्रथम विधितन्त्रीय भूगोलवेत्ता था। जॉर्ज फॉर्स्टर ने उसका अनुसरण किया। कान्ट ने भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान किया। इनके द्वारा तैयार आधार (Foundation) पर ही उत्तरकालीन भूगोलवेत्ताओं ने वर्तमान भूगोल के भव्य भवन का निर्माण किया।

(ii) क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography):-

       रीनहॉल्ड फॉर्स्टर, जॉर्ज फॉर्स्टर व कान्ट ने क्रमबद्ध भूगोल में काफी योगदान किया, परन्तु क्रमबद्ध भूगोल का सबसे महान भूगोलवेत्ता हम्बोल्ट था। वस्तुतः वर्तमान भूगोल का संस्थापक व प्रवर्तक हम्बोल्ट को ही माना जाता है। उसकी प्रसिद्ध ग्रन्थमाला कॉसमॉस (Cosmos) में क्रमबद्ध भूगोल है। हम्बोल्ट ने दो ग्रन्थ ‘मध्य एशिया’ (Vol. 1 & Vol. 2) फ्रांसीसी भाषा में प्रकाशित कराए।
(iii) वातावरण निश्चयवाद (Environmental Deter- minism):-

     वातावरण निश्चयवाद का जन्म जर्मनी में हुआ। रिटर, रेटजेल व हम्बोल्ट का इसमें मुख्य योगदान था। इस विचारधारा में मानवीय क्रियाओं को प्रकृति द्वारा नियंत्रित बताया गया था।

(iv) भूगोल : क्षेत्रवर्णी विज्ञान (Geography: Chorological Science):-

      भूगोल को क्षेत्रवर्णी विज्ञान के रूप में प्रतिपादित करने का श्रेय जर्मन भूगोलवेत्ताओं को ही है। रिचथोफेन व हेटनर का इसमें विशेष योगदान था। इन्होंने भूगोल के अध्ययन क्षेत्र की व्याख्या की थी तथा अन्य क्रमबद्ध विज्ञानों के साथ भूगोल के सम्बन्धों का संश्लेषण किया था:

     “Geography is a Chorological Science of the earth’s surface, of the science of earth areas in terms of their differences and their spatial relations.” -Hatner

(v) भू-राजनीति (Geo-Politics):-

     ‘भू-राजनीति’ शब्द यद्यपि एक स्वीडिश भूगोलवेत्ता द्वारा प्रस्तावित था, परन्तु इसके पूर्व ही रेटजेल के ‘राजनीतिक भूगोल’ से इसका बीजारोपण हो चुका था। सूपान (Supan) की पुस्तक ‘सामान्य राजनीतिक भूगोल के मार्गदर्शक सिद्धान्त’ 1922 में प्रकाशित हुई।

        द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व व युद्ध के समय जर्मन लोगों ने अपनी जातीय व सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा किया था। इसी आधार पर रहने के स्थान का नारा लगाया। इसी के परिणामस्वरूप भू-राजनीति का विकास हुआ।

       इस क्षेत्र में कार्ल हाशोफर (Karl Haushofer) अत्यन्त प्रभावशाली था। उसने अपनी भू-राजनीति की विचारधारा को अपनी पुस्तक ‘मीन कैम्फ’ (Mein Kampf) में प्रस्तुत किया था।

(vi) प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography):-

        प्रादेशिक भूगोल का विकास रिटर द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ ‘अर्डकुण्डे’ से हुआ। रेटजेल के ‘मानव भूगोल’ व ‘मानव जाति का इतिहास’ आदि ग्रन्थों में विभिन्न देशों व प्रदेशों के अध्ययन किए गए थे। वॉन रिचथोफेन के ग्रन्थों में चीन के प्रादेशिक वर्णन मानचित्रों के साथ दिए गए थे।

       1925 में जर्मन सरकार ने अनेक भूगोलवेत्ताओं को खर्चा देकर भौगोलिक अन्वेषणों के लिए विदेश भेजा। लौटकर उन्होंने वहाँ के प्रादेशिक वर्णन लिखे।

(vii) अवस्थिति सिद्धान्तों का प्रतिपादन (Location theories):-

       जर्मनी में अनेक अवस्थिति सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया-

(क) वॉन थूनेन का कृषिवलय सिद्धान्त-

    वॉन थूनेन ने कृषि के स्थानीकरण का सिद्धान्त प्रस्तुत किया था। कोई भी कृषक वही फसल उत्पन्न करता है जिससे उसे सर्वाधिक लाभ होता है। किसी नगर के चारों ओर कृषि फसलों का स्थानीयकरण सकेन्द्रीय वृत्त खण्डों के रूप में होगा। प्रथम वलय में शाक, दुग्ध; द्वितीय में ईंधन की लकड़ी का उत्पादन, तृतीय में खाद्यान्न उत्पादन बिना परती भूमि छोड़े, चतुर्थ में खाद्यान्न परती भूमि छोड़कर व पंचम वलय में चरागाह होगा। वॉन थूनेन ने परिवहन लागत को बहुत अधिक महत्व दिया था।

(ख) वेबर का उद्योग अवस्थिति सिद्धान्त-

       अल्फ्रेड वेबर (Alfred Weber) जर्मन अर्थशास्त्री था। 1909 में उसने उद्योगों की अवस्थिति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। वेबर ने किसी उद्योग की स्थापना में परिवहन लागत, श्रम व एकत्रीकरण के प्रभाव को प्रदर्शित किया है।

(ग) क्रिस्ट्रालर के केन्द्रीय स्थिति सिद्धान्त-

      वाल्टर क्रिस्ट्रालर (Walter Christraller) आर्थिक भूगोलवेत्ता था। उसने नगरों व व्यापारिक केन्द्रों पर परिवहन, पारस्परिक क्रिया तथा मध्यवर्ती अवसर के प्रभावों व उनके परिणामों को विश्लेषित किया है।

(viii) लैण्डशॉफ्ट का अध्ययन (Study of Landchaft):-

     जर्मन विचारधारा के अनुसार भूगोल वह विज्ञान है, जिसमें ‘लैण्डशॉफ्ट’ का अध्ययन होता है। ‘लैण्डशॉफ्ट’ जर्मन भाषा का शब्द है। इसका अर्थ दृश्य, प्रदेश व प्रदेश की विशेषताएं हैं।

(ix) भूगोल की शाखाओं का विशेषीकरण (Specialization of Branches of Geography):-

      अठारहवीं सदी में ही कान्ट ने भूगोल की शाखाओं का वर्गीकरण कर दिया था। उन्नीसवीं सदी में रिटर व हम्बोल्ट ने इसको और अधिक स्पष्ट किया। साथ ही उन्होंने इसका विशेषीकरण करना भी प्रारम्भ किया। बीसवीं सदी के मध्य से इस दिशा में विशेष कार्य किया गया है। भूगोल की शाखाओं का विशेषीकरण इस प्रकार किया गया है कि प्रत्येक शाखा एक स्वतंत्र विज्ञान भी हो गई है। जैसे जलवायु विज्ञान, मृदा विज्ञान, भू-भौतिकी, भू-गणित, स्वास्थ्य भूगोल, कृषि भूगोल, परिवहन भूगोल, सैन्य भूगोल, आचरण भूगोल, वाणिज्य भूगोल, आदि।

11. मानवतावादी भूगोल या मानवतावाद एवं कल्याण उपागम 

11. मानवतावादी भूगोल या मानवतावाद एवं कल्याण उपागम



मानवतावादी भूगोल ⇒

         भूगोल के विषय वस्तु को विकसित करने के लिए अनेक उपागम विकसित किये गये। भूगोल में इस उपागम की शुरूआत 1960-70 के दशक के बीच माना जाता है। ‘मानवतावादी’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सन् 1976 में ‘तुआन’ ने किया था। भूगोल में इस उपागम का जन्म मात्रात्मक भूगोल, प्रत्यक्षवाद और क्षेत्रीय विश्लेषण जैसे उपागम के विरुद्ध हुआ। यह उपागम मात्रात्मक क्रान्ति के विरुद्ध है क्योंकि मात्रात्मक क्रांति में मानवीय विषय तथा मानवीय मुद्दे (जैसे- मानवीय मूल्य, प्रथा, परम्परा, सामाजिक संस्था, सौंदर्य, बोध, प्रेम, घृणा) जैसे तथ्यों का अध्ययन नहीं करता है जबकि ये भूगोल के ही विशिष्ट विषय-वस्तु है।

           मानवतावादी भूगोल प्रत्यक्षवाद के भी विरुद्ध है क्योंकि प्रत्यक्षवाद उन्हीं तथ्यों का अध्ययन करता है जिसे आँखों से देखा जा सके। लेकिन मानवतावाद एवं कल्याणकारी उपागम वैसे तथ्यों का अध्ययन करता है जिसे मात्र अनुभव किया जा सके।

मानवतावादी भूगोल

        मानवतावाद एवं कल्याणकारी भूगोल की एक ऐसी उपागम है जिसके अंतर्गत निम्नलिखित तथ्यों के ऊपर ध्यान केन्द्रित किया जाता है।

(1) यह उपागम मानव को एक सक्रिय एवं केन्द्रीय उपागम मानते हुए भूगोल का अध्ययन करता है। यह उपागम मानव के विभिन्न संस्थाओं, मानवीय जागरूकता, मानव की क्रियाशीलता, मानव की बौद्धिकता इत्यादि का अध्ययन करता है।

(2) यह उपागम भूगोल का अध्ययन सम्पूर्णता से करके मानव कल्याण की दिशा निर्धारित करना चाहता है।

(3) यह एक ऐसा दर्शन है, जो वैज्ञानिक जाँच के पूर्व विश्व के रहस्यों को उद्घाटित करता है।

(4) मानवतावादी भूगोल किसी स्थान या स्थलाकृति का केवल मूर्त अध्ययन नहीं करता है बल्कि उसके कार्य एवं कारण का भी अध्ययन करता है।

           भूगोल में मानवतावादी भूगोल एवं कल्याणकारी भूगोल शुरुआत करने का श्रेय इमैनुएल काण्ट को जाता है। इसके अलावे फ्रांसीसी भूगोलवेता फेब्रे एवं ब्लाश भी इसके बड़े समर्थक रहे हैं। आधुनिक संदर्भ में गुल्के एनी बंटीमर और यी-फू तुआन जैसे भूगोलवेता इसके सबसे बड़े समर्थक रहे हैं। इसके अलावे व्यवहारवादी भूगोल / आचारपरक भूगोलवेता विलियम किर्क, फेनोमेनोलोजी के समर्थक कार्लसावर एवं टेल्फ जैसे भूगोलवेता भी इसके समर्थक रहे हैं।

           गुल्के महोदय ने इस उपगम का समर्थन करते हुए कहा है कि “मानसिक क्रियाशीलता का नियंत्रण पदार्थ एवं क्रियाशीलताओं से नहीं हो सकता वरन विश्व को अप्रत्यक्ष रूप से विचारों को जाना जा सकता है जो अन्त: व्यक्ति के विषयगत अध्ययन पर आधारित होता है। जैसे-

          एनीबंटीगर अपने पुस्तक “The challange of Geographic Humanic in Humanistic Geographic” में कहा है कि “किसी घटना तथा वहाँ के लोगों का अध्ययन उनके निकट जाकर किया जाना चाहिए न कि दूर हटकर तभी उनके समस्याओं को जानकर आप कल्याण की बात कर सकते हैं।

मानवतावादी भूगोल

यी-फू तुआन

     यी-फू तुआन महोदय ने अपने पुस्तक “Geography, Phenomenology & the study of Human Nature” में कहा है कि मानवतावाद एवं कल्याणकारी उपागम मानव भूगोल का दर्पण है जो मानव अस्तित्व तथा जीवन के सार को बताता है। इस तरह मानवतावाद एवं कल्याणकारी उपागम को विकसित करने में कई भूगोलवेताओं का योगदान रहा है।

       यह एक ऐसा उपागम है जो भौतिक भूगोल एवं मानव भूगोल के बीच अन्तर स्थापित करता है तथा जो केवल सहयोगी अवलोकन पर विशेष ध्यान देता है। लेकिन सहयोगी अवलोकन के आधार पर भूगोल में सिद्धांत का निर्माण, निष्कर्ष निकालते का कार्य इत्यादि नहीं किया जा सकता। मानवतावादी भूगोल, भूगोल के विधितंत्र से संबंधित नहीं है बल्कि मानव भूगोल को समझते हेतु एक नई दृष्टिकोण देता है।

आलोचना

           मानवतावाद एवं कल्याकारी उपागम का कई आधारों पर आलोचना भी की जाती है। जैसे:-

(i) यह मानवीय गुणों के प्रति अत्याधिक संवेदनशील होता है।

(ii) यह उपागम मॉडल निर्माण, सिद्धांत निर्माण, स्थानीयकाण विश्लेषण, भूमि उपयोग जैसे तथ्यों के समझने या व्याख्या करने में मदद नहीं करता है।

(iii) 1976 ई० में इन्द्रीकीन महोदय ने इसका आलोचना करते हुए कहा है कि यह एक उपदेश देने वाला उपागम है न कि मात्रात्मक क्रांति जैसे अन्य उपागम की तरह मानव भूगोल के अध्ययन का वैकल्पिक प्रारूप प्रस्तुत करता है।



22. प्रमुख सममान रेखाएँ

22. मानचित्रों पर दर्शाएँ जाने वाली प्रमुख सममान रेखाएँ


प्रमुख सममान रेखाएँ⇒

सममान रेखाएँ या आइसोप्लेथ (Isopleth):- मानचित्रों पर किसी वस्तु के समान मूल्य या घनत्व वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखाएँ को सममान रेखाएँ कहा जाता है। जैसे- समताप रेखा, सममेघ रेखा, समवर्षा रेखा, समदाब रेखा इत्यादि।

(नोट : सम = बराबर, मान = मूल्य अर्थात मानचित्र पर किसी तत्व या वस्तु के समान मूल्य / घनत्व) 

प्रमुख सममान रेखाएँ

मानचित्रों पर दर्शाएँ जाने वाली प्रमुख सममान रेखाएँ:

1. आइसोनीफ (Isonif)⇒ समान हिम वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोनीफ कहते है।

2.  सममेघ रेखा या आइसोनेफ (Isoneph)⇒ समान मेघ आच्छादन वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोनेफ कहते है।

3. आइसो बाथ (Isobath)⇒ समुद्र के अंदर समान गहराई वाले स्थानों को मिलाकर खींचे जाने वाली रेखा को आइसो बाथ कहते है।

4. आइसो ब्रांट (Isobront)⇒ एक समान समय पर तूफान आने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

5. समपवनवेग रेखा या आइसोटैक (Isotach)⇒ मौसम मानचित्र पर पवन की समान गति वाले स्थानों को मिलाकर खींची गई रेखा।

6. समताप रेखा (Isotherm)⇒ समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

7. आइसोपैच (Isopach)⇒ हिमानी अथवा चट्टानों के समान मोटाई वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

8.  समकाल रेखा या आइसोक्रोन (Isochrone)⇒ किसी बिंदु से एक समान समय में तय कि गई दूरी वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

9. समदिक्पाती रेखा (Isogone)⇒ समान चुंबकीय झुकाव वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

10. समलवणता रेखा (Isohaline)⇒ समुद्री जल में खारेपन की समान मात्रा मात्रा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा

11. आइसोरेमे (Isoraime)⇒पाला गिरने की समान मात्रा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

12. आइसोस्टेड (Isostade)⇒ समान अधिवासीय संख्या को मिलाने वाली रेखा।

13. समभूकंपीय (Isoseismal)⇒ भूकंपीय तीव्रता की समानता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

14. सहभूकंप रेखा या होमोसिस्मल (Homoseismal) ⇒ भूकंप के एक ही समय आने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

15. आइसोथेरे (Isothere)⇒ ग्रीष्मकाल के समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

16. समदाब रेखा (Isobars)⇒ समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

17. इसालोबार (Isallobar)⇒ एक विशिष्ट अवधि में वायुमंडलीय दबाव में होने वाले समान परिवर्तन के स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

18. आइसोहेल (Isohel)⇒ सूर्य के प्रकाश की समान अवधि वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

19. समोच्च रेखा या आइसोहाइप (Contour lines or Isohypes)⇒ समुद्र तल से समान ऊँचाई वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

20. आइसोपाइकनिक (Isopycnic)⇒ मानव जनसंख्या के समान घनत्व वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

21. आइसोकाइनेटिक (Isokinetic)⇒ समान पवन वेग के स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

22. समवर्षा रेखा (Isohytes)⇒ वर्षा की समान मात्रा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

23. आइसोमेर (Isomer)⇒ वर्षा की वार्षिक मात्रा की प्रतिशत के रूप में व्यक्त की जाने वाली उसकी औसत मासिक मात्रा के स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

24. आइसोपाथ (Isopath)⇒ भूगर्भिक अथवा भू भौतिक परत की समान मोटाई वाले बिंदुओं को मिलाने वाली रेखा।

25. आइसोसिस्ट (Isoseist)⇒ समान भूकंपीय लहरों को एक समय में ही अनुभव करने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

26. आइसोटालेंटोज (Isotalantose)⇒ औसत मासिक तापांतर की समानता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

27. आइसोइकेते (Isoikete)⇒ लोगों केहने योग्य निवास की समान मात्रा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

28. आइसोफीन (Isophene)⇒ समान मौसमी घटनाओं को दर्शाने वाली रेखा।

29. आइसोथर्मो बाथ (Isothermobath)⇒ सागरीय जल की गहराई के अनुसा समान ताप वाले बिंदुओं को मिलाने वाली रेखा।

30. आइसोचाइम (Isochime)⇒ औसत शीत की तापमान की समानता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

31. आइसोफाइट (Isophite) ⇒ वनस्पतियों की समान ऊंचाई अथवा समान ऊंचाई वाले वनस्पति के स्तरों को मिलाने वाली रेखा।

32. आइसोप्रैक्ट (Isopract)⇒ मानव जनसंख्या के समान वितरण वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।



1. मानचित्र पर बनायी गई वे रेखाएँ जो समुद्र से बराबर ऊँचाई वाले स्थानों को मिलाते हैं, क्या कहलाती है?

(a) आइसोबार

(b) आइसोथर्म

(c) आइसोटोप

(d) कन्टूर

[read more] (d) कन्टूर [/read]

2. मानचित्र पर वर्षा का वितरण दिखाने के लिए किस रेखा का प्रयोग किया जाता है?

(a) आइसोहाइट

(b) आइसोथर्म

(c) आइसोबार

(d) आइसोहेलाइन

[read more] (a) आइसोहाइट [/read]

3. सामान जनसंख्या घनत्व वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखाएँ है-

(a) आइसोप्रैक्ट

(b) आइसोडोपेन

(c) आइसोटैक

(d) आइसोपाइक्निक

[read more] (d) आइसोपाइक्निक [/read]

4. महासागरीय एवं सागरीय भागों में लवणता की समान मात्रा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा निम्न में से किस नाम से जानी जाती है?

(a) आइसोबाथ

(b) आइसोहेल

(c) आइसोसैलाइन

(d) आइसोहैलाइन

[read more] (d) आइसोहैलाइन [/read]

5. समान मेघाच्छन्नता को मिलाने वाली रेखा क्या कहलाती है?

(a) आइसोनिफ

(b) आइसोनेफ

(c) आइसोराइम

(d) आइसोफेन

[read more] (b) आइसोनेफ [/read]

6. समान चुम्बकीय झुकाव वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा क्या कहलाती है?

(a) आइसोबाथ

(b) आइसोब्राण्ट

(c) आइसोगोनल

(d) आइसोक्रोन

[read more] (c) आइसोगोनल [/read]

7. आइसोथर्म नामक रेखाएँ मानचित्र पर उन स्थानों को दर्शाने के लिए बनायी जाती है जहाँ पर-

(a) एकसमान तापमान रहता है

(b) एकसमान दबाब रहता है

(c) एकसमान लवणता रहती है

(d) एकसमान उँचाई होती है

[read more] (a) एकसमान तापमान रहता है [/read]

8. आइसोबार (Isobar) मानचित्र पर उन स्थानों को दर्शाने के लिए खींची गई रेखाएँ हैं, जहाँ पर-

(a) एक जैसा वायुमंडलीय दाब हैं

(b) एक जैसा तापमान है

(c) एक जैसा ऊँचाई है

(d) एक जैसा लवणता है

[read more] (a) एक जैसा वायुमंडलीय दाब हैं [/read]

9. आइसोहेल (Isohel) रेखाओं द्वारा क्या प्रदर्शित किया जाता है?

(a) समान वर्षा

(b) समान धूप

(c) समान ऊँचाई

(d) समान हिमपात

[read more] (b) समान धूप [/read]

10. विश्व मानचित्र पर एक ही समदिकपाती रेखा पर स्थित दो स्थानों पर समान होगा-

(a) भू-प्रदूषण

(b) भूकम्पीय क्रिया

(c) मेघाच्छादन

(d) चुम्बकीय विचलन

[read more] (d) चुम्बकीय विचलन [/read]

11. एकसमान समय पर तूफान आने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा क्या कहलाती है?

(a) आइसोसीस्मल

(b) आइसोकाइम

(c) आइसोब्राण्ट

(d) आइसोक्लाइन

[read more] (c) आइसोब्राण्ट [/read]

12. समुद्र के अन्दर समान गहराई वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा कहलाती है-

(a) आइसोबार

(b) आइसोबाथ

(c) आइसोथर्म

(d) आइसोक्रोन

[read more] (b) आइसोबाथ [/read]

13. सूर्यातप के समान अवधि वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा क्या कहलाती है?

(a) आइसोहेल

(b) आइसोनिफ

(c) आइसोक्रोन

(d) आइसोहाइप

[read more] (a) आइसोहेल [/read]

14. समान हिमपात वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखाएँ क्या कहलाती है?

(a) आइसोनेफ

(b) आइसोहाइट

(c) आइसोनिफ

(d) आइसोब्राण्ट

[read more] (c) आइसोनिफ [/read]

15. किसी प्रदेश में समान भाषा वाले स्थानों को वर्गीकृत करने वाली सीमा रेखा क्या कहलाती है?

(a) आइसोपाइक्निक

(b) आइसोफाइट

(c) आइसोडाइन

(d) आइसोग्लॉस

[read more] (d) आइसोग्लॉस [/read]

16. भूकम्पीय तीव्रता की समानता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा क्या कहलाती है ?

(a) आइसोगोनल

(b) होमोसिस्मल

(c) आइसोसिस्मल

(d) आइसोकायनेटिक

[read more] (c) आइसोसिस्मल [/read]

17. भूकम्प के एक ही समय पर आने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा क्या कहलाती है?

(a) आइसोसिस्मल

(b) होमोसिस्मल

(c) आइसोब्राण्ट

(d) आइसोगोनल

[read more] (b) होमोसिस्मल [/read]

18. महासागरों व सागरों की लवणीयता को मानचित्र पर प्रदर्शित करने वाली रेखाएँ क्या कहलाती है?

(a) आइसोथर्म

(b) आइसोबार

(c) आइसोहेलाइन

(d) आइसोहाइट

[read more] (c) आइसोहेलाइन [/read]

19. आइसोबाथ रेखाएँ प्रदर्शित करती है-

(a) समान वर्षा वाले क्षेत्र

(b) समान बादल वाले क्षेत्र

(c) समान वायुदाब वाले क्षेत्र

(d) समुद्र तल के समान गहराई वाले क्षेत्र

[read more] (d) समुद्र तल के समान गहराई वाले क्षेत्र [/read]

20. मानचित्र में वे रेखाएँ जहाँ दाब सम हो, कहलाती है-

(a) देशान्तर रेखाएँ

(b) अक्षांश रेखाएँ

(c) समदाब रेखाएँ

(d) समस्थानिक

[read more] (c) समदाब रेखाएँ [/read]

21. मानचित्र पर आइसोहाइप्स रेखाओं द्वारा निम्न में से किसका प्रदर्शन किया जाता है?

(a) समान वर्षा की मात्रा

(b) पवन की समान गति वाले स्थान

(c) मेघाच्छादन के समान क्षेत्र

(d) समुद्रतल से समान ऊँचाई

[read more] (d) समुद्रतल से समान ऊँचाई [/read]

KVS PGT SOLVED EXAM PAPER

KVS PGT SOLVED EXAM PAPER



KVS PGTKVS PGT का भूगोल के विगत वर्षों के प्रमुख प्रश्नोत्तर

1. भारत में भू-राजस्व अभिलेखों के अनुसार, ‘फसलें चीरी और काटी जाती हैं’ को निम्नलिखित में से किस भू-उपयोग वर्ग के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है?
(A) पेड़ की फसलें और कब्रगाहें
(B) खेती योग्य बंजर भूमि
(C) शुद्ध बोया क्षेत्र
(D) परती भूमि
उत्तर- (C) शुद्ध बोया क्षेत्र

2. उपसौर के दौरान सूर्य और पृथ्वी के बीच निम्नलिखित में से कौन सी उचित दूरी है?
(A) 146 मिलियन किमी.
(B) 147 मिलियन किमी.
(C) 148 मिलियन किमी.
(D) 150 मिलियन किमी.
उत्तर- (B) 147 मिलियन किमी. (KVS PGT 2023)

3. विश्व की प्रमुख विवर्तनिक प्लेटों को दर्शाने वाली निम्नलिखित में से कौन-सी संख्या सही है?
(A) 6
(B) 7
(C) 8
(D) 9
उत्तर- (B) 7

4. सौर ऊर्जा के निम्नलिखित आंकड़ों में से कौन-सा (कैलोरी प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्रति मिनट) पृथ्वी के वायुमंडल के शीर्ष पर प्राप्त औसत को सही ढंग से दर्शाता है?
(A) 1.94
(B) 1.84
(C) 2.94
(D) 2.84
उत्तर- (A) 1.94

5. चंबल नदी निम्नलिखित में से किस राज्य समूह से होकर बहती है?
(A) उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश
(B) उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान
(C) उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़
(D) राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार
उत्तर- (B) उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान

6. निम्नलिखित में से कौन-सा ढलान प्रोफाइल सही है जब समोच्च अपने उच्च मूल्यों पर एक-दूसरे से दूर होते हैं?
(A) उत्तल ढलान
(B) अवतल ढलान
(C) समान ढलान
(D) लहरदार ढलान
उत्तर- (C) समान ढलान

7. समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा कहलाती है-
(A) आइसोहेल
(B) इसोहायत
(C) आइसोबार
(D) आइसोथर्म
उत्तर- (C) आइसोबार

8. वायुमंडलीय गैसों के प्रतिशत के बढ़ते क्रम में निम्नलिखित में से कौन-सा सही क्रम है?
(A) हीलियम, क्सीनन, कार्बन डाइऑक्साइड और आर्गन
(B) ऑक्सीनन, हीलियम, कार्बन डाइऑक्साइड और आर्गन
(C) हीलियम, कार्बन डाइऑक्साइड, क्सीनन और आर्गन
(D) क्सीनन, कार्बन डाइऑक्साइड, हीलियम और आर्गन
उत्तर- (A) हीलियम, ऑक्सीनन, कार्बन डाइऑक्साइड और आर्गन

9. मेरियाना ट्रेंच निम्नलिखित में से किस महासागर में स्थित है?
(A) उत्तरी अटलांटिक महासागर
(B) हिंद महासागर
(C) दक्षिण अटलांटिक महासागर
(D) पश्चिमी प्रशांत महासागर
उत्तर- (D) पश्चिमी प्रशांत महासागर

10. निम्नलिखित में से कौन-सा प्रतिशत भूपर्पटी पर सिलिकन के निर्माण के लिए सही है?
(A) 22.72
(B) 27.72
(C) 25.72
(D) 30.72
उत्तर – (B) 27.72

11. फ्रांस द्वारा प्रवर्तित SPOT कार्यक्रम में निम्नलिखित में से किस देश का महत्वपूर्ण योगदान रहा है?
(A) जर्मनी
(B) यू.एस.ए.
(C) बेल्जियम
(D) रूस
उत्तर – (C) बेल्जियम

12. निम्नलिखित में से किसने समुद्र तल प्रसार की अवधारणा प्रस्तावित की थी?
(A) बुलार्ड
(B) मैकेंजी
(C) हैरिहेस
(D) मॉर्गन
उत्तर – (C) हैरिहेस

13. ‘अंडे की स्थलाकृति की टोकरी’ निम्नलिखित में से किस भू-आकृतिक प्रक्रिया द्वारा बनाई गई है?
(A) नदी कार्य
(B) हिमानी द्वारा
(C) वायु जनित
(D) समुद्र की लहर द्वारा
उत्तर- (B) हिमानी कार्य

14. सड़क वर्गीकरण की पुरानी योजना के तहत, राष्ट्रीय राजमार्ग-1 निम्नलिखित शहरों में से किस एक को जोड़ता है?
(A) अंबाला-मुरादाबाद
(B) अमृतसर-लखनऊ
(C) अमृतसर- दिल्ली
(D) दिल्ली – हैदराबाद
उत्तर- C) अमृतसर- दिल्ली

15. नर्मदा-तापी द्रोणी निम्न में से किस राज्य से होकर गुजरती है?
(A) महाराष्ट्र – मध्य प्रदेश
(B) महाराष्ट्र – छतीसगढ़
(C) मध्य प्रदेश – गुजरात
(D) मध्य प्रदेश – राजस्थान
उत्तर- (C) मध्य प्रदेश – गुजरात

16. निम्नलिखित भू-आकृतियों में से कौन-सा बहु-चक्रीय अपरदन प्रक्रियाओं का सुराग प्रदान करता है?
(A) नदी वेदिकाएं
(B) गॉर्ज
(C) नदी विसर्प
(D) डेल्टा
उत्तर- (A) नदी वेदिकाएं

17. पौधों को खाने वाले जंतुओं के लिए निम्नलिखित में से किस शब्द का प्रयोग किया जाता है?
(A) प्राथमिक उपभोक्ता
(B) द्वितीयक उपभोक्ता
(C) अपघटक
(D) उत्पादक
उत्तर- (A) प्राथमिक उपभोक्ता

18. निम्नलिखित में से किसने अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में ‘स्थिति त्रिभुज’ की अवधारणा पेश की?
(A) ए. वेबर
(B) टी. प्लेंडर
(C) ई.एम. हूवर
(D) ए. लॉश
उत्तर- (A) ए. वेबर

19. ‘नव नियतिवाद’ के संस्थापक कौन थे?
(A) सी. डार्विन
(B) एफ. रेटजेल
(C) ई.सी.सेम्पल
(D) जी. टेलर
उत्तर – (D) जी. टेलर

20. निम्नलिखित राज्यों में से किस एक ने 2001-2011 के दौरान भारत में जनसंख्या की सबसे कम दशकीय वृद्धि दर्ज की?
(A) पंजाब
(B) अरुणाचल प्रदेश
(C) नागालैंड
(D) मध्य प्रदेश
उत्तर- (C) नागालैंड

21. निम्नलिखित में से किस चट्टान में क्रिस्टलीकरण देखा जाता है?
(A) कांग्लोमरेट
(B) शेल
(C) चूना पत्थर
(D) बेसाल्ट
उत्तर- (A) कांग्लोमरेट

22. निम्नलिखित में से किस महासागर में मालदीव द्वीप समूह स्थित हैं?
(A) उत्तरी अटलांटिक महासागर
(B) हिंद महासागर
(C) प्रशांत महासागर
(D) दक्षिण अटलांटिक महासागर
उत्तर- (B) हिंद महासागर

23. भारत का निम्नलिखित में से कौन-सा राज्य तीन देशों की सीमा को स्पर्श करता है?
(A) हिमाचल प्रदेश
(B) सिक्किम
(C) उत्तराखंड
(D) मिजोरम
उत्तर- (B) सिक्किम

24. 2011 की जनगणना के अनुसार निम्न में से किस राज्य का जनसंख्या घनत्व सबसे अधिक है?
(A) सिक्किम
(B) अरुणाचल प्रदेश
(C) जम्मू और कश्मीर
(D) मिजोरम
उत्तर- (C) जम्मू और कश्मीर

25. विश्व के निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में अधिकतम सूर्यातप प्राप्त होता है?
(A) भूमध्यरेखीय क्षेत्र
(B) उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र
(C) समशीतोष्ण क्षेत्र
(D) उप-ध्रुवीय क्षेत्र
उत्तर – (A) भूमध्यरेखीय क्षेत्र

26. बस्तियों के संगठन के लिए क्रिस्टालर के सेंट्रल प्लेस मॉडल में K = 3 सिद्धांत निम्नलिखित में से किस एक द्वारा दर्शाया गया है?
(A) बाजार सिद्धांत
(B) परिवहन सिद्धांत
(C) प्रशासनिक सिद्धांत
(D) आर्थिक सिद्धांत
उत्तर – (A) बाजार सिद्धांत

27. यूरोप के लिए रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट प्रोग्राम के तहत SPOT-1 लॉन्च करने के लिए निम्नलिखित में से कौन सी तारीख सही है?
(A) जून 2014
(B) सितंबर 1993
(C) जनवरी 1990
(D) फरवरी 1986
उत्तर – (D) फरवरी 1986

28. पृथ्वी पर उपोष्णकटिबंधीय उच्च दाब पेटी को ……… के रूप में भी जाना जाता है?
(A) डोलड्रम्स
(B) अश्व अक्षांश
(C) व्यापार पवन क्षेत्रों
(D) पश्चिमी
उत्तर – (B) अश्व अक्षांश

29. हिमालय के निम्नलिखित में से किस संभाग की लंबाई पूर्व से पश्चिम की ओर अधिकतम है?
(A) कुमाऊं
(B) भूटान
(C) नेपाल
(D) पंजाब
उत्तर – (C) नेपाल

30. तीस्ता नदी निम्नलिखित में से किस एक की प्रमुख सहायक नदी है?
(A) ब्रह्मपुत्र
(B) गंगा
(C) कोसी
(D) गंडक
उत्तर – (A) ब्रह्मपुत्र

31. जब जमीन पर दो स्थान 500 किमी दूर होते हैं और उन्हें मानचित्र पर 25 सेमी द्वारा दिखाया जाता है, तो निम्नलिखित में से कौन सा प्रतिनिधि अंश मानचित्र के पैमाने का प्रतिनिधित्व करता है?
(A) 1: 2000
(B) 1: 20,000
(C) 1: 200,000
(D) 1: 2,000,000
उत्तर – (D) 1: 2,000,000

32. निम्नलिखित में से किसने “द स्टडी ऑफ लैंडफॉर्म्स” पुस्तक लिखी है?
(A) आर्थर होम्स
(B) आर.जे. स्मॉल
(C) एम.जे. सेल्बी
(D) सी.ए.एम. किंग
उत्तर – (B) आर.जे. स्मॉल

33. शुद्ध प्रकाश संश्लेषण के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा सही है?
(A) पौधे में कुल प्रकाश संश्लेषण + पानी
(B) पौधे में कुल प्रकाश संश्लेषण – पानी
(C) कुल प्रकाश संश्लेषण – श्वसन
(D) कुल प्रकाश संश्लेषण + श्वसन
उत्तर – (C) कुल प्रकाश संश्लेषण – श्वसन

34. कृष्णा नदी निम्नलिखित में से किस स्थान के पास से निकलती है?
(A) नासिक
(B) प्रवर
(C) महाबलेश्वर
(D) तलकावेरी
उत्तर – (C) महाबलेश्वर

35. लक्षद्वीप की राजधानी निम्नलिखित में से कौन-सी है?
(A) सिलवासा
(B) कवारत्ती
(C) अगरतला
(D) आइजोल
उत्तर – (B) कवारत्ती

36. ‘रुको और जाओ’ निश्चयवाद के प्रतिपादक कौन थे?
(A) ई.सी.सेम्पल
(B) जे. ब्रंच
(C) जी. टेलर
(D) ई. हंटिंगटन
उत्तर – (C) जी. टेलर

37. ग्रेट बैरियर रीफ ऑस्ट्रेलिया के निम्नलिखित में से किस राज्य के तट पर स्थित है?
(A) क्वींसलैंड
(B) दक्षिण ऑस्ट्रेलिया
(C) न्यू साउथ वेल्स
(D) विक्टोरिया
उत्तर (A) क्वींसलैंड

38. निम्नलिखित में से कौन सी श्रृंखला ‘पी’ भूकंपीय तरंगों के छाया क्षेत्र को दर्शाती है?
(A) 95 ̊ से 150 ̊
(B) 100 ̊ से 155 ̊
(C) 105 ̊ से 145 ̊
(D) 105 ̊ से 155 ̊
उत्तर – (C) 105 ̊ से 145 ̊

39. निम्नलिखित में से किस भूकंपीय तरंग में चट्टानों के कणों की आगे पीछे गति देखी जाती है?
(A) ‘पी’ तरंगें
(B) ‘एस’ तरंगें
(C) ‘एल’ तरंगें
(D) रेले (R) तरंगें
उत्तर – (A) ‘पी’ तरंगें

40. कैलीफोर्निया शीत धारा विश्व के निम्नलिखित तटीय क्षेत्रों में से किस एक से होकर गुजरती है?
(A) संयुक्त राज्य अमेरिका का पश्चिमी भाग
(B) दक्षिण अमेरिका का पश्चिमी भाग
(C) कनाडा का पूर्वी भाग
(D) ऑस्ट्रेलिया का पश्चिमी भाग
उत्तर – (A) संयुक्त राज्य अमेरिका का पश्चिमी भाग

41. निम्नलिखित में से किसने भूकंप के ‘प्रत्यास्थ प्रतिक्षेप सिद्धांत’ को प्रतिपादित किया?
(A) एल ग्रीन
(B) जेम्स जीन्स
(C) हैरी हेस
(D) एच.एफ.रीड
उत्तर – (D) एच.एफ.रीड

42. एक महत्वपूर्ण तेलधारी माराकाइबो बेसिन निम्नलिखित में से किस देश में स्थित है?
(A) ईरान
(B) सऊदी अरब
(C) वेनेजुएला
(D) यू.एस.ए
उत्तर – (C) वेनेजुएला

43. सुनामी आपदा निम्नलिखित में से किस महीने में हुई, जिससे भारत को भारी नुकसान हुआ?
(A) जनवरी 2003
(B) दिसंबर 2003
(C) दिसंबर 2004
(D) दिसंबर 2005
उत्तर – (C) दिसंबर 2004

44. निम्नलिखित में से कौन-सी मिट्टी महाराष्ट्र राज्य के बड़े हिस्से पर हावी है?
(A) लाल मिट्टी
(B) लेटराइट मिट्टी
(C) काली मिट्टी
(D) ग्रे मिट्टी
उत्तर – (C) काली मिट्टी

45. बोमडी-ला दर्रा भारत के निम्नलिखित में से किस राज्य में स्थित है?
(A) सिक्किम
(B) जम्मू और कश्मीर
(C) अरुणाचल प्रदेश
(D) हिमाचल प्रदेश
उत्तर – (C) अरुणाचल प्रदेश

46. निम्नलिखित में से कौन से देश ‘डूरंड रेखा’ से अलग होते हैं?
(A) भारत और पाकिस्तान
(B) भारत और अफगानिस्तान
(C) भारत और चीन
(D) चीन और रूस
उत्तर – (B) भारत और अफगानिस्तान

47. निम्नलिखित में से कौन सा क्षोभमंडल में तापमान की सामान्य गिरावट दर का प्रतिनिधित्व करता है?
(A) 6.5 ̊ सी/किमी
(B) 5.5 ̊ सी/किमी
(C) 6.0 ̊ सी/किमी
(D) 5.0 ̊ सी/किमी
उत्तर – (A) 6.5 ̊ सी/किमी (KVS PGT 2023)

48. शिलाकरण की प्रक्रिया निम्नलिखित में से किस चट्टान में पाई जाती है?
(A) गैब्रो
(B) चूना पत्थर
(C) पेगमेटाइट
(D) बेसाल्ट
उत्तर – (B) चूना पत्थर

49. निम्नलिखित में से किस राज्य में कांडला बंदरगाह स्थित है?
(A) केरल
(B) महाराष्ट्र
(C) गुजरात
(D) तमिलनाडु
उत्तर – (C) गुजरात

50. भारतीय उपमहाद्वीप में विषुवतीय पछुआ पवनें किस महीने में स्थापित होती हैं?
(A) दिसंबर
(B) फरवरी
(C) जून
(D) अक्टूबर
उत्तर – (C) जून

51. सरगासो समुद्र निम्नलिखित में से किस महासागर में सुविकसित है?
(A) उत्तर प्रशांत महासागर
(B) दक्षिण प्रशांत महासागर
(C) उत्तर अटलांटिक महासागर
(D) दक्षिण अटलांटिक महासागर
उत्तर – (C) उत्तर अटलांटिक महासागर

52. माध्यमिक गतिविधियों में लगे श्रमिकों को निम्नलिखित में से किसके द्वारा जाना जाता है?
(A) ब्लू कॉलर
(B) लाल कॉलर
(C) सफेद कॉलर
(D) गोल्डन कॉलर
उत्तर – (A) ब्लू कॉलर

53. भूमध्यसागरीय क्षेत्र में निम्नलिखित में से कौन-सी फसल का सर्वाधिक प्रभुत्व है?
(A) खाद्यान्न फसलें
(B) वाणिज्यिक फसलें
(C) औद्योगिक फसलें
(D) फलों की फसलें
उत्तर – (D) फलों की फसलें

54. निम्नलिखित में से कौन सा अनुपात ‘समुद्री लहर वेग’ का प्रतिनिधित्व करने के लिए सही है?
(A) तरंग ऊँचाई से तरंग लम्बाई तक
(B) तरंग ऊंचाई से तरंग अवधि तक
(C) तरंग लंबाई से तरंग अवधि तक
(D) तरंग लंबाई से तरंग ऊँचाई तक
उत्तर – (C) तरंग लंबाई से तरंग अवधि तक

55. 2011 की जनगणना के अनुसार निम्न में से किस केंद्र शासित प्रदेश की साक्षरता दर सबसे कम है?
(A) दादरा और नगर हवेली
(B) लक्षद्वीप
(C) पुडुचेरी
(D) दमन और दीव
उत्तर – (A) दादरा और नगर हवेली

56. बाबाबुदन पहाड़ियाँ निम्नलिखित में से किस राज्य में स्थित हैं?
(A) महाराष्ट्र
(B) कर्नाटक
(C) तमिलनाडु
(D) केरल
उत्तर – (B) कर्नाटक

57. भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के तहत GSAT-6A को लॉन्च करने के लिए निम्नलिखित में से कौन सी तारीख सही है?
(A) 29 मार्च 2018
(B) 15 अप्रैल 2010
(C) 2 सितंबर 2007
(D) 10 अप्रैल 1982
उत्तर – (A) 29 मार्च 2018

58. एस्थेनोस्फीयर में भूकंपीय तरंगों के वेग में कमी के लिए निम्नलिखित में से कौन सा कारण सबसे उपयुक्त है?
(A) घनत्व में कमी
(B) घनत्व में वृद्धि
(C) गहराई में परिवर्तन
(D) पदार्थ की अवस्था में परिवर्तन
उत्तर – (D) पदार्थ की अवस्था में परिवर्तन

59. “निरंतर अनुपात के सिद्धांत” द्वारा समुद्र-जल की लवणता की गणना करने के लिए निम्नलिखित में से किस लवण को आमतौर पर ध्यान में रखा जाता है?
(A) क्लोरीन
(B) सोडियम
(C) मैग्नीशियम
(D) सल्फेट
उत्तर- (A) क्लोरीन

60. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय 2012 द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार निम्नलिखित में से किस राज्य में सड़कों का घनत्व सबसे अधिक है?
(A) त्रिपुरा
(B) पश्चिम बंगाल
(C) केरल
(D) कर्नाटक
उत्तर- (C) केरल

61. भूगोल के पिता कहे जाने वाले भूगोलवेता इरैटोस्थनीज निम्लिखित में से कहाँ का निवासी था-
(A) अरब
(B) यूनान
(C) रोमन
(D) भारतीय
उत्तर – (B) यूनान (KVS PGT 2023)

62. कोपेन के जलवायु वर्गीकरण के अनुसार उत्तर प्रदेश की जलवायु है-
(A) Aw
(B) As
(C) Amw
(D) Cwg
उत्तर – (D) Cwg (KVS PGT 2023)

63. नोकरेक राष्ट्रीय उद्यान स्थित है-
(A) मध्य प्रदेश
(B) अरुणाचल प्रदेश
(C) मेघालय
(D) असम
उत्त – (C) मेघालय (KVS PGT 2023)


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