Category OCENOGRAPHY (समुद्र विज्ञान)

20. Static Change in Sea Level (समुद्रतल में स्थैतिक परिवर्तन)

20. Static Change in Sea Level

(समुद्रतल में स्थैतिक/स्थायी परिवर्तन)


Static Change in Sea Level (समुद्रतल में स्थैतिक/स्थायी परिवर्तन)⇒Static Change in Sea Level

          समुद्री जल का तल (S.L.) समुद्री वातावरण का एक गत्यात्मक पहलू है। यद्दपि पृथ्वी तंत्र के कुल जल की मात्रा निश्चित है। लेकिन समय-समय पर जल के अवस्था में परिवर्तन के कारण समुद्रतल में भी परिवर्तन होता है। समुद्रतल का परिवर्तन कई कारकों का परिणाम है।

जैसे-

(i) हिम युग के आगमन से समुद्र तल में गिरावट आती है और जब ही युग की समाप्ति होती है तथा वातावरण का तापमान अधिक हो जाता है तो स्थलीय हिम पिघलकर समुद्र में आ जाते हैं और जल स्तर ऊँचा हो जाता है।

(ii) भूगर्भिक प्रक्रियाएँ भी समुद्र के जलस्तर में परिवर्तन लाते हैं। जैसे – अगर भूगर्भीय हलचल के कारण समुद्री नितल का उत्थान होता है तो जलस्तर गिरती है और जब धँसान होता है तो जलस्तर बढ़ती है। जैसे कई स्थलीय भूभागों पर समुद्री जीवाश्म के प्रमाण मिलते हैं जो यह बताता है कि कभी वहाँ पर समुद्री जल रहा होगा और जब वहाँ समुद्र रहा होगा तो निश्चित रूप से एक समुद्री जलस्तर भी रहा होगा। जब उस भूभाग का उत्थान हो जाता है तो समुद्र का जल स्तर नीचे की ओर खिसक जाता है। लेकिन यह एक सापेक्षिक घटना है।

अगर समुद्री तल का धँसान होता है तो जलस्तर नीचे चली जाती है और जब समुद्र नितल का उत्थान होता है तो समुद्र जलस्तर बढ़ जाता है।

(iii) विभिन्न जलवायु विज्ञान एवं समुद्री विज्ञान के वैज्ञानिकों ने समुद्रतल में होने वाले परिवर्तन को गत्यात्मक मानते हुए यह माना है कि समुद्र तल में परिवर्तन जल के आयतन में बढ़ोतरी या कमी से होती है।

       उपरोक्त तीनों कारकों में से प्रथम कारक ही समुद्र तल में परिवर्तन के लिए सबसे उत्तरदायी कारक है।

      विभिन्न अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि समुद्र तल में 110 से 140 मीटर तक परिवर्तन हुआ है। प्रायः सभी हिमयुग में समुद्र का तल 100 से 150 मीटर के बीच नीचे चले गए थे। प्लीस्टोसीन के अंतिम हिमानी युग के अंत में समुद्र का तल वर्तमान तल से 110 मीटर नीचे पहुँच गया था। फेयर ब्रिज के अनुसार “समुद्र तल में सतत् सूक्ष्म परिवर्तन होते रहते हैं।” लेकिन 1800 ई० के बाद में इसमें काफी स्थिरता आयी है लेकिन औद्योगिक क्रांति के बढ़ते प्रभाव के कारण 1970 के दशक से वातावरण में तापमान की बढ़ोतरी से समुद्र तल में भी होने लगी है। सामान्य नियम के अनुसार 1 डिग्री सेल्सियस वायुमंडलीय तापमान के बढ़ने से 0.55 mm समुद्र तल में वृद्धि होती है। विश्व जलवायु विज्ञान संस्था के अनुसार 1985 से 1997 ईo के बीच औसत तापमान में बढ़ोतरी 0.37 हुआ है।

परिणाम-

      अनेक पारिस्थैतिक वैज्ञानिकों के अनुसार 2030 ई० तक समुद्र तल में 3 मीटर तक वृद्धि हो सकती है ऐसी स्थिति में विश्व के कई द्वीपय देश पूर्णत: जलमग्न हो सकते हैं। मालदीप तथा दक्षिणी प्रशांत महासागर की कई के द्वीप समुद्र में डूब जाएँगे। कई तटीय महानगर जैसे मुंबई, न्यूयार्क, टोकियो, मक्सिको सिटी, रियो-द-जेनरियो पर संकट के बादल मँडराने लगे हैं। कई प्रवाल भित्ति जलमग्न हो जाएँगे अधिक समुद्री तल के परिवर्तन से जलवायु पर भी विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है। नदियों के मुहाने पर समुद्री ज्वार के कारण बाढ़ का प्रभाव बढ़ जाएगा। कई तटीय मैंग्रोव/ज्वारीय वनस्पति विलुप्त हो जाएँगे केवल बांग्लादेश में ही 1.5 करोड़ जनसंख्या को विस्थापित होना पड़ेगा। अर्थात समुद्र तल में हो रहे परिवर्तन का विनाशकारी प्रभाव अवश्य संभावी है।

उपाय-

     भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने ग्लोबल वार्मिंग और समुद्र तल में हो रहे बढ़ोतरी का अध्ययन करवाया है। इन दोनों के बीच पाए जाने वाले संबंध को देखते हुए एक आपातकालीन योजना बनाने का निर्णय लिया है। इस योजना के तहत लगभग एक करोड़ आबादी तटीय क्षेत्र से विस्थापित कर सुरक्षित स्थान पर बसाने का कार्य किया जा रहा है। इसी तरह विश्व के कई देश ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, समुद्र तल में हो रहे परिवर्तन नजर टिकाये हुए हैं। समुद्रतल में परिवर्तन न हो इसके लिए कई देशों ने शिखर बैठक कर पृथ्वी सम्मेलन के दस्तावेज पर, क्योटो प्रोटोकॉल पर, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर अपना सहमति व्यक्त किया है ताकि वायुमंडल को गर्म होने से बचाया जाए वहीं दूसरी ओर समुद्र तल में हो रहे परिवर्तन को रोका जाए।


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19. Effect of Ocean Currents (महासागरीय जल धाराओं का प्रभाव)

19. Effect of Ocean Currents

(महासागरीय जल धाराओं का प्रभाव)


Effect of Ocean Currents (महासागरीय जल धाराओं का प्रभाव)

Effect of Ocean Currents

महासागरीय जलधाराओं का प्रभाव कई क्षेत्रों पर पड़ता है जो निम्नलिखित है-

(i) मौसमी दशाओं पर प्रभाव- महासागरीय धाराएँ जिन तटीय भागों से होकर गुजरती है, वहाँ की मौसम संबंधी दशाओं में पर्याप्त संशोधन करती है। इसका प्रभाव सबसे अधिक तटीय भागों के तापक्रम पर होता है। यह प्रभाव लाभदायक एवं हानिकारक दोनों प्रकार का हो सकता है। गर्म जलधारायें जब ठंडे भागों में पहुँचती है तो वहाँ का तापमान कम नहीं होने देती है। या सर्दियों में उन्हें अपेक्षाकृत गर्म रखती है।

          उत्तर-पश्चिमी यूरोप के तटीय देशों की आदर्श जलवायु का राज गल्फस्ट्रीम का बढ़ा भाग उत्तरी अटलांटिक धारा ही है। सर्दियों में इन तटीय देशों (ग्रेट ब्रिटेन, नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क, हॉलैंड आदि) का तापक्रम अपेक्षाकृत अधिक रहता है। परंतु यही गल्फस्ट्रीम धारा यू.एस.ए.के तटीय भागों में ग्रीष्म काल में गर्म लहर(Heat Waves) को जन्म देकर तापक्रम को अचानक ऊँचा कर देती है जिसके कारण मौसम कष्टदायक हो जाता है। शरदकाल में भी पूर्वी यू.एस.ए. गल्फस्ट्रीम से लाभ नहीं उठा पाता, क्योंकि इस समय हवाएँ स्थल से जल की ओर चलती है।

(ii) ऊष्मा संतुलन पर प्रभाव- गर्म जलधाराएँ उष्णकटिबंधीय उच्च तापक्रम को उच्च अक्षांशों की ओर ले जाकर तापमान के वितरण में समानता लाने का प्रयास करती है। इस तरह पृथ्वी के क्षैतिज ऊष्मा संतुलन को स्थापित करने में गर्म जलधाराएँ पर्याप्त मदद करती है, क्योंकि निम्न अक्षांशों की अतिरिक्त ऊष्मा को उच्च अक्षांशों की ओर स्थानांतरित करती है।

(iii) हिमपात की स्थिति पर प्रभाव- इसके विपरीत ठंडी जलधाराएँ जहाँ से गुजरती है, वहाँ का तापक्रम अत्यंत नीचा कर देती है, जिसके कारण हिमपात की स्थिति आ जाती है। क्यूराइल, लैबराडोर, फॉकलैंड की ठंडी धाराएँ प्रभावित क्षेत्र में भारी हिमपात के लिए पूर्णतया जिम्मेदार है।

(iv) वर्षा पर प्रभाव एवं मरुस्थलों का विकास- गर्म धाराओं के ऊपर चलने वाले हवाएँ नमी धारण कर लेती है तथा प्रभावित क्षेत्रों को वर्षा प्रदान करती है। उदाहरण के लिए उत्तर-पश्चिमी यूरोप के तटीय भागों में उत्तरी अटलांटिक धारा तथा जापान के पूर्वी भाग में क्यूरोशियो धारा के कारण वर्षा होती है। उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट की वर्षा कुछ अंश तक गर्म धारा के कारण होती है। 

               इसके विपरीत ठंडी जलधाराएँ वर्षा रोकती है। उदाहरण के लिए दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी तट पर कालाहारी तथा दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर अटाकामा मरुस्थलों के विकास में क्रमशः बेंगुएला तथा पेरू (हंबोल्ट) की ठंडी धाराओं का हाथ है। 

(v) कोहरा/कुहरा(Fog) का उत्पन्न होना- गर्म तथा ठंडी धाराओं के मिलन स्थल पर कोहरा उत्पन्न होता है जो जलयानों के लिए खतरनाक होता है। न्यूफाउलैंड के पास लैबराडोर ठंडी धारा तथा गल्फस्ट्रीम गर्म धारा के मिलने से ताप व्यतिक्रम (Inversion of Temperature) होने से घना कुहरा पड़ता है। इसी तरह जापान के पास क्यूराइल(ओयाशियो) ठंडी धारा तथा क्यूरोशियो गर्म जलधारा के मिलने से भी उत्पन्न होता है।

(vi) मत्स्य उद्योग/समुद्री बैंकों पर प्रभाव- जलधाराएँ मछलियों के जीवित रहने के लिए आवश्यक तत्व, ऑक्सीजन, भोजन को वितरित करने का कार्य करती है। धाराओं द्वारा प्लैंकटन नामक और घास का लाया जाना मछलियों के लिए आदर्श स्थिति पैदा करता है।

          गल्फस्ट्रीम धारा द्वारा ययह प्लैंकटन न्यूफाउंडलैंड तथा उत्तर पश्चिमी यूरोप तट पर पहुँचाया जाता है जिसके कारण वहाँ पर मत्स्य उद्योग अत्यधिक विकसित हो गया है। परंतु पेरू तट पर एलनीनो धारा के कारण प्लैंकटन  अदृश्य हो जाने पर मछलियाँ मर जाती है और इस उद्योग को क्षति उठानी पड़ती है।

         शीत क्षेत्रों में पैदा होने वाली खाद्य मछलियाँ ठंडी धाराओं के साथ गर्म प्रदेशों में आ जाती है। गर्म और ठंडी धाराएँ भी मिलकर विभिन्न प्रकार की मछलियों को जन्म देती है।

(vii) समुद्री मार्ग व्यापार पर प्रभाव-  महासागरीय धाराएँ जलमार्गों को निश्चित करती है, जिसके सहारे व्यापारिक जलयानों का परिवहन किया जाता है। परंतु धाराओं का यह प्रभाव प्राचीनकाल में अधिक था क्योंकि वर्तमान समय में शक्ति चालित जहाज हवा तथा धाराओं की दिशा का परवाह नहीं करते। 

              जहाँ पर गर्म एवं ठंडी धाराएँ मिलती है वहाँ पर कुहरा पड़ता है जो कि सामुद्रिक जहाजों के परिवहन में बाधा उत्पन्न करती है। जैसे न्यूफाउंडलैंड तथा जापान के तट के पास इसी तरह के कुहरे के कारण जलयानों को अपार क्षति उठानी पड़ती है। ठंडी धाराओं द्वारा बड़ी-बड़ी हिम शिलाएँ निम्न अक्षांशों की ओर लायी जाती है जिनसे टकराने के कारण जलयान क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। गर्म धाराओं के कारण ठंडे स्थानों के बंदरगाह खुले रहते हैं।

निष्कर्ष: 

       उपर्युक्त तथ्यों के विवरण से स्पष्ट होता है कि महासागरीय जल धाराओं का मानव वातावरण एवं उनकी आर्थिक क्रियाकलापों पर व्यापक प्रभाव पड़ता है।


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18. Difference Between Current and Tides / महासागरीय जल धारा और ज्वार में अंतर

18. Difference Between Current and Tides

(महासागरीय जल धारा और ज्वार में अंतर)



Difference Between Current and Tides

महासागरीय जल धारा और ज्वार में अंतर⇒

         महासागरों एवं समुद्र का जल कभी शांत नहीं रहता। इनमें हमेशा विभिन्न प्रकार के गतियाँ होती रहती है। इन गतियों को मुख्यतः तीन भागों में बाँटते हैं-

(i) ज्वार-भाटा

(ii) जलधारा और

(iii) लहर

       इन सभी गतिओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ज्वार-भाटा माना जाता है, क्योंकि यह ऐसी गति है जिससे महासागर का संपूर्ण जल ऊपर से नीचे तक प्रभावित होता है। सागरीय गतियों में जलधाराएँ सर्वाधिक शक्तिशाली होती है क्योंकि इनके द्वारा सागरीय जल हजारों किलोमीटर तक वहा लिया जाता है।

महासागरीय जलधारा और ज्वार में अंतर

        महासागरीय जलधारा और ज्वार में अंतर निम्नलिखित आधार पर स्पष्ट कर रहे हैं-

(1) परिभाषा के आधार पर-

        महासागरीय नितल का ऊपरी जल एक निश्चित दिशा में प्रवाहित होने की गति को जलधारा कहते हैं। जबकि सूर्य तथा चंद्रमा की आकर्षण शक्तियों के कारण सागरीय जल के ऊपर उठने तथा नीचे बैठने को ज्वार-भाटा कहा जाता है।

(2) उत्पत्ति के आधार पर अंतर-

         महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति पृथ्वी की घूर्णन गति, गुरुत्वाकर्षण बल, वायु की दिशा, वायुदाब, तापमान आदि द्वारा होती है। जबकि ज्वार की उत्पत्ति चंद्रमा तथा सूर्य के आकर्षण बलों द्वारा होती है। 

(3) गति के आधार पर अंतर-

    समुद्री जलधाराओं में क्षैतिज गति पाई जाती है। जबकि ज्वार में लंबवत गति होती है। 

(4) समय के आधार पर अंतर-

       सागरीय जलधाराएँ सालोंभर गतिशील रहती है। जबकि ज्वार दिन एवं महीने के निश्चित समय अंतराल के बाद आते हैं।

(5) तापमान के आधार पर अंतर-

      महासागरीय धाराएँ तापमान के आधार पर दो प्रकार की होती है-

(i) गर्म जलधारा और

(ii) ठंडी जलधारा। जबकि ज्वार के साथ ऐसी बात नहीं है।

(6) जल एवं ऊष्मा के वितरण के आधार पर अंतर-

       महासागरीय जलधाराओं के द्वारा जल एवं ऊष्मा का महासागरों में क्षैतिज एवं लंबवत वितरण किया जाता है। जबकि ज्वार के कारण महासागरों में जल का स्थानांतरण नहीं होता बल्कि दोलन क्रिया द्वारा होती है। ज्वार के द्वारा ऊष्मा स्थानांतरण भी नहीं होता है। 

(7) जलवायु के प्रभाव के आधार पर अंतर-

      महासागरीय जलधाराएँ समुद्र तटीय भागों की जलवायु को प्रभावित कर वहाँ के तापमान या तो बढ़ा देती है या घटा देती है। जबकि ज्वार का जलवायु पर कोई अंतर नहीं पड़ता।

(8) प्रवाह के आधार पर अंतर-

      महासागरीय जलधाराएँ नदी के समान प्रवाहित होती है। जबकि ज्वार में जल का स्तर ऊपर उठता है।

(9) आर्द्रता ग्रहण करने के आधार पर अंतर-

     महासागरीय गर्म जल धाराएँ अपने ऊपर आर्द्रता के साथ चलती है। जबकि ज्वार अपने ऊपर आर्द्रता के साथ नहीं उठती है।

ज्वार भाटा के प्रभाव

      ज्वार-भाटा महासागरीय जल की एक ऐसी गति है जिसका प्रभाव मानव तथा पर्यावरण दोनों पर पड़ता है। यह ज्ञात है कि समुद्रों की अपेक्षा तटवर्ती क्षेत्रों में ज्वार का प्रभाव अधिक पड़ता है। ज्वार-भाटे का प्रभाव अन्य कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर पड़ता है। जैसे:-

(1) जलयानों के आगमन पर प्रभाव-

       समुद्रों में जलयानो के आगमन पर ज्वार-भाटे के प्रभाव को देखते हुए ज्वार-भाटे के समय और उससे उत्पन्न लहरों की ऊँचाइयों का पूर्वानुमान अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

(2) कचड़े के निस्तारण में सहायक-

       समुद्रों के तट पर स्थित महानगरों से निकलने वाले कचड़े को प्रायः सागर जल में डाल दिया जाता है जिससे पर्यावरण प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है। ज्वार-भाटा द्वारा इन कचड़ों को बहाकर दूर समुद्र में पहुँचा दिया जाता है। इस प्रकार कचड़े के निस्तारण में ज्वार-भाटा से बड़ी सहायता मिलती है। ज्वारीय तरंगों से बंदरगाहों में जमा होने वाले मलवे की सफाई होती रहती है। किंतु कहीं-कहीं ज्वारीय तरंगों के द्वारा पोताश्रयों एवं पत्तनों में भारी मात्रा में मलवे का निक्षेपण किया जाता है जिसे साफ करने के लिए काफी धन खर्च करना पड़ता है।

(3) मत्स्य उद्योग पर प्रभाव-

      ज्वार-भाटा मत्स्य उद्योग को भी प्रभावित करता है। ज्वारीय तरंगे विभिन्न प्रकार के प्लैंकटन के वितरण द्वारा मछलियों के लिए भोजन की आपूर्ति करने में सहायक होती है जिनसे उनकी संख्या में वृद्धि होती है। अनेकों तटों पर ज्वार-भाटा के फलस्वरुप विभिन्न प्रकार के छोटे-छोटे समुद्री जीव, शंख सीप तथा अनेक ऐसे पदार्थ बिखेर दिए जाते हैं। इन्हें चुनकर लोग अपना जीविकोपार्जन करते हैं।

(4) बंदरगाहों पर प्रभाव-

       ज्वार-भाटे से सर्वाधिक लाभ संसार के उन बड़े-बड़े बंदरगाहों को होता है जो समुद्र से कुछ दूर नदियों के किनारे बनाए गए हैं। कोलकाता, लंदन एवं अन्य ऐसे बंदरगाह तक बड़े मालवाही पोतों को ज्वार के समय जल स्तर ऊँचा होने पर पहुँचाया जाता है। ज्वारों के अभाव में ऐसे जहाजों को दूर समुद्र में खड़ा रहना पड़ता है तथा माल की ढुलाई में काफी व्यय पड़ता है।

(5) विद्युत उत्पादन में सहायक-

        ज्वारीय तरंगों की ऊँचाई का लाभ उठाते हुए आधुनिक तकनीकी के अनुप्रयोग द्वारा विद्युत उत्पादन किया जा सकता है। इनमें कोई संदेह नहीं कि कुछ तटों पर ज्वारीय तरंगों से विद्युत उत्पादन की विशाल संभावनायें पाई जाती है। किंतु इस दिशा में अभी सीमित प्रयास किए गए हैं। आशा की जाती है कि भविष्य में ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों की उपलब्धता क्षीण हो जाने पर समुद्र के तट पर बिजली उत्पन्न करने के लिए बड़ी संख्या में विद्युत शक्ति केंद्रों की स्थापना की जाएगी

(6) तटों के आकार-प्रकार पर प्रभाव-

      ज्वा-भाटा का तटों के आकार-प्रकार पर भी प्रभाव पड़ता है। ज्वारीय धाराएँ एवं तरंगे अपरदन, परिवहन तथा निक्षेपण क्रियाओं द्वारा तटों के स्वरूप परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान करती है।

निष्कर्ष:-

       उपर्युक्त तथ्यों के विवरण से स्पष्ट होता है कि ज्वार-भाटा का प्रभाव जलयानों के आवागमन, कचड़े की सफाई, मत्स्य उद्योग, बंदरगाह, विद्युत उत्पादन, तटों के आकार-प्रकार एवं पर्यावरण पर पड़ता है।



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17. Theories related to the origin of the coral reef / प्रवाल भित्ति के उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत

17. Theories related to the origin of the coral reef

(प्रवाल भित्ति के उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत)


Theories related to the origin of the coral reef 

प्रवाल भित्ति के उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत

             प्रवाल भित्ति की उत्पत्ति के संबंध में तीन प्रमुख सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं-

(1) अवतलन का सिद्धांत 

(2) स्थायी स्थल का सिद्धांत 

(3) हिमानी नियंत्रण का सिद्धांत

1. अवतलन का सिद्धांत

      अवतलन सिद्धांत को 1837 ई० में चार्ल्स डार्विन महोदय ने मार्शल द्वीप समूह के बिकनी द्वीप के संदर्भ में प्रस्तुत किया। कालांतर में अमेरिकी भूगोलवेत्ता 1883 में डाना, डेविस(1928), मोनार्ड(1964) इत्यादि ने सिद्धांत का समर्थन करते हुए कई प्रमाण प्रस्तुत किया। 

        अवतलन के सिद्धांत के अनुसार प्रारंभ में प्रवाल जीवों का विकास किनारे पर तटीय प्रवाल के रूप में होता है। लेकिन जब किसी कारणवश भूगर्भिक हलचल के कारण तटीय क्षेत्रों का धँसान प्रारंभ हो जाता है तो पॉलिप भोजन ग्रहण करने हेतु ऊपर की ओर विकसित होना शुरू हो जाते हैं, जिसके कारण धीरे-धीरे प्रवाल भित्तियों की मोटाई बढ़ने लगती है। फलत: तटीय प्रवाल भित्ति अवरोधक प्रवाल भित्ति का निर्माण होता है। अंततः जब संपूर्ण भाग का धँसान क्रिया पूर्ण हो जाती है तो कहीं कहीं पर  प्रवाल भित्ति रिंग के रूप में दिखाई देने लगते हैं जिसे वलयाकार प्रवाल भित्ति कहते हैं। 

        स्पष्ट है कि प्रवाल भित्तियों का विकास डार्विन के अनुसार क्रमिक रूप से होता है।सबसे पहले तटीय प्रवाल भित्ति ,उसके बाद अवरोधक प्रवाल भित्ति और अंत में वलयाकार प्रवाल भित्ति का विकास होता है। इसलिए अवतलन सिद्धांत को एक “उद्द्विदकासीय सिद्धांत” माना जाता है।
Theories related to the origin

सिद्धांत के पक्ष में प्रस्तुत प्रमाण

डाना, डेविस, मोनार्ड एवं स्वयं डार्विन महोदय ने अवतलन सिद्धांत प्रमाणित करने हेतु कई प्रमाण प्रस्तुत किए। डेविस महोदय ने अपना प्रमाण “कोरल रीफ प्रॉब्लम” नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया।

जैसे :-

(i) डार्विन ने कहा कि वलयाकार प्रवाल भित्ति वहीं पर विकसित हो रहे हैं जहाँ पर द्वीप का क्रमिक रूप से धँसान हो रहा है। इसे बिकनी द्वीप के संदर्भ में अध्ययन किया जा सकता है।

(ii) अवतलन/धँसान के कारण प्रवाल भित्ति की मोटाई और लैगून की गहराई में लगातार वृद्धि होती है लेकिन धँसान की क्रिया मंद होती है जबकि उससे तेज गति में प्रवाल का विकास होता है।

(iii) प्रवाल भितियों में अलग-अलग काल में निर्मित प्रवाल भित्तियों का स्तर पाया जाता है। जो अवतलन के पक्ष में सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है। सोनार नामक यंत्र से जब हवाई द्वीप का अध्ययन किया गया तो वहाँ 330 मीटर गहराई तक अवतलन का प्रमाण मिला।

(iv) बिकनी और फुनाफूटी पर 700 मीटर गहराई कुएँ की खुदाई कर अवतलन का प्रमाण ढूंढा गया।

(vi) जब यह स्पष्ट हुआ कि प्रवाल भित्तियों का निर्माण अवतलन से हुआ है तो प्रारंभ में यह अंदाज लगाया गया कि अवतलन वाले क्षेत्रों में पेट्रोलियम का संचित भंडार होना चाहिए। इसी अंदाज प्रवाली द्वीपों पर तेल कुओं की खुदाई की गई तो वहाँ से खनिज तेल का प्रमाण मिला।

आलोचना/दोष

(i) सोलोमन द्वीप और पलाऊ द्वीप मिलने वाले प्रवाल भित्तियों की व्याख्या अवतलन सिद्धांत से नहीं की जा सकती है।

(ii) डार्विन ने यह नहीं बताया कि समुद्री किनारों का अवतलन क्यों कब और कैसे हुआ।

(iii) कई ऐसे प्रवाल भित्ति है जिनका निर्माण धँसान वाले क्षेत्र में नहीं बल्कि उत्थान वाले क्षेत्रों में मिलते हैं। जैसे ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर।

(iv) यदि यह मान लिया जाए कि प्रवाल भित्तियों का क्रमिक विकास अवतलन से हो रहा है तो अब तक सभी प्रवाल भित्तियों को विलुप्त हो जाना चाहिए था।

(v) अवतलन सिद्धांत में बताया गया है कि प्रवाल भित्तियों का विकास क्रमिक रूप से होता है। इसका तात्पर्य है कि एक समय में एक ही स्थान पर एक ही प्रकार का प्रवाल भित्ति मिलना चाहिए। लेकिन कई क्षेत्र हैं जहाँ पर अनेकों प्रकार के प्रवाल भित्ति का प्रमाण मिलता है।

निष्कर्ष:

      उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अवतलन सिद्धांत कुछ प्रवाल भित्तियों की उत्पत्ति की सटीक व्याख्या करता है। वहीं कुछ प्रवाल भित्ति के संदर्भ में इसके द्वारा सटीक व्याख्या नहीं होती है। फिर भी प्रवाल भित्ति की उत्पत्ति की दिशा में किया गया प्रथम सैद्धांतिक कार्य के रूप में इसे मान्यता प्राप्त है।

2. स्थायी स्थल का सिद्धांत (Non Subsideence Theory)

      डार्विन के द्वारा प्रतिपादित अवतलन के सिद्धांत का खंडन करते हुए 1880 ई० में जॉनमर्रे ने प्रवाल भित्तियों के उत्पत्ति की व्याख्या करने हेतु स्थायी स्थल का सिद्धांत प्रस्तुत किया। मर्रे के अनुसार “प्रवाल भित्ति वैसे स्थानों पर मिलते हैं जहाँ पर अवतलन का कोई प्रमाण नहीं है। वे कहते हैं कि प्रवाली भित्ति समुद्र में वहीं पर विकसित होते है जहाँ पर स्थायी रूप से छिछला समुद्र या चबूतरा या डूबा हुआ द्वीप मिलते है। उनपर ही ये प्रवाली जीव विकसित होना प्रारंभ करते हैं ताकि समुद्री जल में लटके खाद्य पदार्थों का ग्रहण कर सके। ज्यों-ज्यों प्रवाली  जीवों की संख्या बढती जाती है, त्यों-त्यों प्रवाल भिति की मोटाई भी बढ़ती जाती है और अंततः समुद्रतल से ऊपर आकर वलयाकार प्रवाल भित्त्ति का निर्माण करते हैं।” प्रवाल प्रारंभ में लगभग तट से सटे सिकसित होने का प्रयास करते है लेकिन मृत प्रवाल के चुना पत्थर घुलने से लैगून की गहराई कम होती है तथा ज्यों-ज्यों प्रवाल की मोटाई बढ़ती है, त्यों -त्यों लैगून की गहराई भी घटती जाती है।

सिद्धांत के पक्ष प्रमाण

(1) मर्रे के अनुसार प्रवाल भित्ति की अधिकतम मोटाई 180 फीट तक होती है क्योंकि इसी गहराई तक अधिकतर चबूतरे समुद्र में डूबे हुए मिलते है। हिन्द और प्रशान्त महासागर में अनेक चतूबरों का प्रमाण मिलता है।

(2) मर्रे के सिद्धांत के पक्ष में लीकाण्टे, स्लूटर और सैम्पर जैसे भूगोलवेताओं ने भी इस सिद्धांत का समर्थन करते हुए कई प्रमाण इक्कठे किये हैं-

          इन विद्वानों के अनुसार प्रवाली जीवों के शरीर से प्राप्त चुनापत्थर के घुलने  से आरंभ में छिछले लैगून का विकास होता है लेकिन कालांतर में प्रवाल भित्ति की मोटाई बढ़ने के करण लैगून गहरा होता जाता है।

आलोचना

1. स्थायी स्थल सिद्धांत की सबसे बड़ी आलोचना लैगून की गहराई को लेकर है क्योंकि प्रवाल भित्ति की मोटाई बढ़ने से लैगून की की गहराई बढ़ती है बढ़ती है न कि घटती।

2. मर्रे के अनुसार अधिकतर समुद्री चबूतरे 180 फीट गहराई पर मिलते है। परन्तु ऐसा सर्वत्र होना असंभव है। कुछ विद्वानों ने यह प्रश्न उठाया है कि अगर कोई उसकी चबूतरा कम गहराई वाला मिलता है तो क्या उस पर प्रवाल का विकास नहीं हो सकेगा।

3. मर्रे के अनुसार प्रवालों के शरीर से प्राप्त चुनापत्थर जल में घुलननशील होते हैं। अगर इस तथ्य को मान लिया जाय तो सभी प्रवाल भिति जल में घुलकर विलुप्त हो जायेंगें। लेकिन ऐसा नही हो रहा है।

निष्कर्ष :

      यह कहा जाता है कि यह एक ऐसा सिद्धांत/परिकल्पना है जो वैज्ञानिक एवं तार्किक विश्लेषण से काफी दूर है।

3.  हिमानी नियंत्रण का सिद्धांत

      हिमानी नियंत्रण सिद्धांत को अमेरिकी भूगोलवेता रेगिनॉल्ड डेली ने 1915 ई० में प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत को उन्होंने हवाई द्वीप के प्रवाल भित्तियों के अध्ययन करने के बाद प्रस्तुत किया था। यह सिद्धांत स्थिर स्थल सिद्धांत का विकलित स्वरूप है। हिमानी नियंत्रण सिद्धांत के अनुसार विश्व के सभी प्रवाल भित्तियों का निर्माण प्लिस्टोसीन कल्प में हुए हिमानीयुग के दौरान और उसके बाद हुआ है।

         हिमानी नियंत्रण सिद्धांत के अनुसार प्लिस्टोसिन कल्प में जब हिमयुग आया तो समुद्र का जल स्तर 76 मी० तक नीचे चला गया और सभी समुद्री प्रवाल समुद्री तल के ऊपर आ गये तथा अधिक शीत वातावरण के कारण प्रवाल जीवित न रह सके। लेकिन कुछ प्रवाल जीवित रहे। समुद्र के जलस्तर नीचे गिरने के कारण तरंगों के द्वारा जगह-जगह पर किये गए अपरदन से कई समुद्री चबूतरों का विकास हुआ। जब हिमयुग समाप्त होने लगा तो समुद्र का जल स्तर भी बढ़ने लगा तथा समुद्र मे जो प्रवाली जीव बच गये थे वे नये चबूतरों पर आकर भोजन ग्रहण करने हेतु नया उपनिवेश स्थापित करने लगे। उसके बाद ज्यों-ज्यों समुद्र का तल बढ़ा त्यों-त्यों प्रवाल की भी मोटाई बढ़ने लगी।

       हिमानी नियंत्रण सिद्धांत के अनुसार प्रारंभ में लैगून की गहराई कम थी। लेकिन बाद में समुद्र में जल स्तर बढ़ने के करण लैगून की गहराई में बढोत्तरी हुई।

      इस तरह स्पष्ट होता है कि डेली महोदय ने प्रवाल भित्तियों की उत्पत्ति के संबंध में एक वैज्ञानिक एवं तार्किक सिद्धांत प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत की सबसे  बड़ी विशेषता यह है कि- 

1. प्रवाल भित्तियों के विकास की क्रिया को जलवायु परिवर्तन से जोड़ा।

2. इस सिद्धांत से प्रवाल भित्तियों की मोटाई बढ़ने के साथ-2 लैगून की गहराई भी बढ़ती है। इसका भी व्याख्या होता है। 

प्रमाण

  • प्रवाल भितियों में कई जगह जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। 
  • डेली ने अपने सिद्धांत में बताया कि प्रवाल भित्तियों के ऊपरी तल चपटे होते हैं, जो कि अध्ययन से ऐसा प्रमाणित हो चुका है।
  • लैगून की गहराई की उन्होंने प्रवाल भित्तियों के बढ़ते मोटाई से नहीं जोड़ा है बल्कि समुद्र के बढ़ते हुए जलस्तर से जोड़ा है जो एक सटीक तर्क है।

आलोचना

  • डेली के अनुसार समुद्र तल 76 मी० तक नीचे चला गया था। लेकिन अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि समुद्र के जलस्तर में इससे भी अधिक गिरावट आई थी।
  • समुद्र के जलस्तर गिरने के बाद समुद्र के तरंगों के द्वारा अपदन से नये चबूतरों का विकास हुआ होगा। इन नये चबूतरों पर कीचड़ भी पाये गये होंगें तो ऐसे में कीचड़युक्त चबूतरे पर पुन, प्रवाल कैसे विकसित हो सकते हैं।
  • डेविस महोदय ने इसका आलोचना करते हुए कहा कि पूरे विश्व का समुद्री जलस्तर एक समान ऊपर उठा है। ऐसे में बली लैगून की गहराई एक समान होना चाहिए लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है।
  • डेली के अनुसार हिमयुग में 76 मी० की गहराई पर चबूतरों का विकास हुआ था। इसका तात्पर्य है कि प्रवाल भित्तियों की मोटाई 76 मी० तक ही होना चाहिए। लेकिन विकनी द्वीप जैसे अनेक द्वीप है जो 180 मी० से अधिक गहरे है।

एक के बाद एक दो सिद्धांतों की तुना करना एक नजर में देखें-

निष्कर्ष

        उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि कोई भी एक सिद्धांत प्रवाल भित्ति की उत्पत्ति की व्याख्या करने में सक्षम नहीं है। अत: अलग-अलग स्थानों पर विकसित प्रवास भित्तियों की व्याख्या अलग-अलग सिद्धांतों से की जा सकती है। अगर ऐसा संभव नहीं है तो सभी सिद्धांतों को मिलाकर एक एकीकृत सिद्धांत प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।


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16. Coral Reaf (प्रवाल भित्ति)

16. Coral Reaf (प्रवाल भित्ति)


Coral Reaf (प्रवाल भित्ति)Coral Reaf

          समुद्र में कई प्रकार के जीव-जंतु पाए जाते हैं। उनमें से एक जीव का नाम पॉलिप है जिसके शरीर से चूना पत्थर चट्टानों का स्राव होता है। इसे मूँगा भी कहते हैं। यह झूंडों में अधिवासित होने की प्रवृत्ति रखता है। ये समुद्र के नितल पर भोजन की तलाश में इधर-उधर घूमते रहते हैं। ये भोजन की तलाश में छिछले समुद्री भाग पर जमा होने लगते हैं और भोजन ग्रहण करने के लिए एक-दूसरे पर चढ़ने लगते हैं जिसके कारण सबसे नीचे स्थित पॉलिप दबाव क्रिया के कारण मरने लगते हैं। 

       पॉलिप के मृत शरीर और उनके शरीर से निकले चूनापत्थर का निक्षेपण धीरे-धीरे छिछले समुद्री भूपटल पर जमा होने लगता है। घोंघा या मोलस्का, ब्रायोजोआ, कोरामेनिफेरा एवं अन्य हाइड्रोजोआ जैसे जीवों से प्राप्त पदार्थ चूना पत्थर के चट्टानों को जोड़ देते हैं जिसके कारण छिछले समुद्री भागों में गुंबदाकार या एक दीवाल के समान निक्षेपित स्थलाकृति बनती है, जिसे प्रवाल भित्ति कहते हैं।

प्रवाल भित्ति की विशेषताएँ

(1) प्रवाल भित्ति एक प्रकार के समुद्री जीवों के मरने एवं उनके निक्षेपण से निर्मित स्थलाकृति है।

(2) प्रवाल भित्ति का विकास विषुवतीय क्षेत्र को छोड़कर 35°N से 35°S अक्षांश के बीच होता है।

(3) उपयुक्त अक्षांशों में ही प्रवाल भित्ति का विकास छिछले सागरीय क्षेत्र में तथा तटीय भाग से थोड़ा दूर होती है।

(4) प्रवाल भित्ति प्राय: महाद्वीपों के पूर्वी तट पर विकसित होते हैं।

(5) प्रवाल भित्ति का आकार एक दीवार के समान या गुंबदाकार होता है।

(6) प्रवाल भित्ति और तट के बीच छिछले सागर मिलते हैं, जिसे लैगून कहते हैं।

भौगोलिक कारक/उपयुक्त परिस्थितिययाँ

(1) प्रवाल भित्ति के विकास हेतु 20 से 21℃ के बीच तापमान होना चाहिए। इसके लिए आदर्श वार्षिक तापमान 20℃ माना जाता है।

(2) प्रवाल भित्ति के विकास हेतु आदर्श गहराई 45 से 55 मीटर मानी जाती है क्योंकि इसी गहराई तक सूर्य की किरणें पहुंचती है। विभिन्न प्रकार के प्लैंकटन का विकास होता है।

(3) प्रवाल वहीं पर विकसित होते हैं जहां पर चूर मात्रा में प्लैंकटन मिलते हैं। प्रवाली जीव न तो अत्याधिक लवणता वाले और न ही अत्यधिक स्वच्छ जल में विकसित होते हैं इनके विकास हेतु 27 से 30 ‰ लवणता उपयुक्त मानी जाती है।

(4) प्रवाली जीवों के लिए कीचड़युक्त जल भी हानिकारक होता है। यही कारण है कि ये महाद्वीपों के किनारे से सटे विकसित नहीं होते बल्कि कुछ दूरी पर विकसित होते हैं।

(5) प्रवाल भित्ति का विकास तीव्र महाद्वीपीय ढालों पर नहीं होता क्योंकि उन ढालों पर न तो प्लैंकटन  स्थिर रह पाते हैं और न ही स्वयं पॉलिप झुंडो में अधिवास कर सकते हैं।

(6) प्रवाली जीवों का विकास प्राय: महाद्वीपों के पूर्वी तट पर होता है क्योंकि महाद्वीपों के पूर्वी तट पर विषुवतीय गर्म जलधारा का प्रभाव होता है जबकि पश्चिमी तट पर ठंडी समुद्री जलधारा के कारण ये विकसित नहीं हो पाते हैं।

(7) प्रवाल भित्तियों के विकास को प्रचलित हवा भी प्रभावित करती है। जैसे उत्तरी गोलार्ध में महाद्वीपों के पूर्वी तट पर वाणिज्य हवा समुद्र से स्थल की ओर चढ़ती है जबकि पश्चिमी तट पर स्थल से समुद्र की ओर उतरती है। इसी तरह की घटना दक्षिणी गोलार्ध में भी होती है। पूर्वी तटीय भागों में वाणिज्य हवा के द्वारा प्लैंकटन को दूर-दूर से लाकर तटीय भागों में जमा कर दिया जाता है जबकि पश्चिमी तट में वाणिज्यिक हवा तट से दूर ले जाने की प्रवृत्ति रखते हैं।

         उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि प्रवाल भित्ति विभिन्न प्रकार के भौगोलिक परिस्थितियों की देन है।

प्रवाल भित्ति के प्रकार (Types of Coral Reaf)

         महासागरों में मिलने वाली प्रवाल भित्तियों को निम्नलिखित दो वर्गों में विभाजित किया गया है-

I आकृति तथा उत्पत्ति के आधार पर वर्गीकरण

      आकृति तथा उत्पत्ति के आधार पर भित्तियों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है, जो निम्नलिखित हैं:-

(1) तटीय प्रवाल भित्ति (Fringing Coral Reaf)

(2) अवरोधक प्रवाल भित्ति (Barrier Coral Reaf)

(3) वलयाकार प्रवाल भित्ति (Atolls)

(1) तटीय प्रवाल भित्ति 

       तटीय प्रवाल भित्ति प्रायः तट के समानांतर विकसित होता है। इस प्रकार के प्रवाल भित्ति की मोटाई 50 से 55 मीटर तक होता है। लैगून अत्यंत छिछला होता है। लैगून की गहराई 1.5 से 3 मीटर तक होती है। ऐसे लैगून को Boot Channel कहते हैं। लैगून के सतह पर मृत पॉलिप इधर-उधर बिखरे पाए जाते हैं। तटीय प्रवाल भित्ति में तट के किनारे वाले प्रवाल भित्ति का ढाल मंद होता है जबकि समुद्र की ओर वाला ढाल तीव्र होता है। अंडमान निकोबार और अमेरिका के फ्लोरिडा तट पर तटीय प्रवाल भित्ति पाए जाते हैं।

(2) अवरोधक प्रवाल भित्ति 

        अवरोधक प्रवाल का विकास के तट समानांतर होता है लेकिन तटीय प्रवालों की तुलना में यह निम्न संदर्भों में भिन्न होता है। जैसे –

(i) इनमें प्रवाल भित्ति की मोटाई 55 मीटर से अधिक होता है। आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर मिलने वाला ग्रेट बैरियर रीफ की मोटाई 180 मीटर तक है। 

(ii) इसमें लैगून की गहराई भी अधिक होती है और अवरोधक प्रवाल भित्ति के द्वारा विकसित लैगून की गहराई 60 मीटर तक होती है। 

(iii) अवरोधक प्रवाल भित्ति के दोनों ढाल तटीय प्रवाल भित्ति की तुलना में अधिक होता है। सामान्यत: स्थल भाग की ओर वाला ढाल 15° से 20° और समुद्र की ओर वाला ढाल 45° तक होता है। ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड के पूर्वी तट पर विश्व की सबसे लंबी अवरोधक प्रवाल भित्ति पाई जाती है जिसकी लंबाई 1920 किलोमीटर और मोटाई 180 मीटर, न्यूनतम चौड़ाई 16 किलोमीटर, अधिकतम चौड़ाई 144 किलोमीटर है। यह तट से लगभग 32 किलोमीटर दूर स्थित है। अवरोधक प्रवाल भित्ति का प्रमाण न्यूकैलेडोनियन द्वीप समूह के पास भी मिलता है।

(3) वलयाकार प्रवाल भित्ति

       एटॉल प्रवाल भित्ति का विकास ज्वालामुखी द्वीपों के चारों ओर होता है। जब प्रवाल भित्ति धीरे-धीरे विकसित होकर समुद्र तल से ऊपर आ जाते हैं तो प्रवाल द्वीप का निर्माण करते हैं। वलयाकार/एटॉल प्रवाल भित्ति में मोटाई, लैगून की गहराई और ढाल तटीय और अवरोधक प्रवाल भित्ति की तुलना में अधिक होता है। वलयाकार प्रवाल भित्ति भी कई प्रकार के होते हैं। जैसे –

(i) वैसा वलयाकार प्रवाल भित्ति जिसके मध्य में लैगून दिखता हो। जैसे : लक्ष्यद्वीप।

(ii) वैसा वलयाकार प्रवाल भित्ति जिसके मध्य में लैगून एवं छोटे-छोटे द्वीप दोनों मिलते हो। प्रशांत महासागर के अधिकतर प्रवाल भित्ति इसी प्रकार के हैं। 

(iii) वैसा प्रवाल भित्ति  जिसके मध्य में लैगून का अभाव हो। जैसे : हवाई द्वीप।

II स्थिति के आधार पर वर्गीकरण

          स्थिति के आधार पर वर्गीकरण स्थिति के आधार पर प्रवाल भित्तियों को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया गया है-

1. उष्ण कटिबंधीय प्रवाल भित्तियाँ (Tropical Coral Reefs):

      उष्ण कटिबंधीय प्रवाल भित्तियों का अक्षांशीय विस्तार 25° उत्तरी अक्षांश से 25° दक्षिणी अक्षांश तक पाया जाता है। इन अक्षांशों के मध्य प्रवालों के लिए आवश्यक भौतिक दशाएँ आसानी से उपलब्ध होती रहती है। प्रशान्त महासागर, अटलांटिक महासागर तथा हिन्द महासागर में महाद्वीपों तथा छोटे-छोटे द्वीपों के निकट प्रवाल भित्ति अधिकता में पायी जाती है। महाद्वीपों के पूर्वी भाग में जहाँ उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र स्थित है, प्रवाल जीव अपनी भित्तियों की रचना करने में अधिक सफल होते हैं। उत्तरी तथा दक्षिणी अमरीका, अफ्रीका तथा आस्ट्रेलिया महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में प्रायः ठण्डी धाराओं के बहने के कारण समुद्र के जल के तापमान में कमी आ जाती है तथा प्रवाल जीव मर जाते हैं।

     इसके विपरीत महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में गर्म धाराओं के बहने से प्रवालों का प्रमुख भोजन कैल्शियम अर्थात् चूना अधिक मात्रा में उत्पन्न होता है, जिसके कारण प्रवाल जीव अपने विकास में उन्नतोत्तर वृद्धि करते रहते हैं। प्रवाल जीवों के लिए अत्यधिक तापमान हानिकारक होता है। इसलिए भूमध्य रेखा तथा इसके आस-पास प्रवाल जीव नहीं पाये जाते हैं। प्रशान्त महासागर के पश्चिमी तथा मध्य भाग में प्रवाल भित्तियाँ पाई जाती हैं। इन भागों में स्थित ज्वालामुखियों पर भी प्रवाल जीव अपनी भित्ति का निर्माण आरम्भ कर देते हैं। उष्ण कटिबंधीय प्रवाल भित्तियाँ भूगर्भ में होने वाली विभिन्न प्रकार की गतियों में भी उत्पन्न हो जाती हैं। महासागरीय धरातल भूगर्भ की गतियों के कारण 100 फीट तक ऊंचे उठ जाते हैं। कहीं-कहीं यह 400 फीट तक ऊंचा उठ गया है जिसे अपनी अलग-अलग परिस्थिति के कारण विभिन्न नामों से जाना जाता है।

2. सीमान्त प्रदेशीय प्रवाल भित्तियाँ (Marginal Belt Coral Reefs):

     सीमान्त प्रदेशीय प्रवाल भित्तियों का अक्षांशीय विकास 25° उत्तरी अक्षांश से 30° दक्षिणी अक्षांश तक विस्तृत है। लेकिन ये प्रवाल भित्तियाँ प्राचीन समय में पायी जाती थी। प्लीस्टोसीन हिमयुग में समुद्र के जल की सतह नीची हो जाने के कारण विकासोन्मुखी प्रवाल भित्तियों के प्रवाल अपनी जान गंवा बैठे। इनके साथ-साथ प्रवाल भित्तियाँ भी धीरे-धीरे समाप्त हो गई। वर्तमान समय में ये प्रवाल भित्तियाँ बहुत पुराने टापू के रूप में पाई जाती है। इनमें से अनेक प्रवाल भित्तियाँ महासागरों में जल की सतह से कुछ ही नीचे काफी बड़े-बड़े चबूतरे के रूप में दिखलाई देती है। उदाहरण के लिए बरमूदा, बहामा तथा हवाई द्वीप आदि चबूतरे स्पष्ट रूप से दिखलाई देते हैं। किसी समय जब समुद्र के पानी का तल बढ़ जाता है तो प्रवाल जीव इन चबूतरों पर अपनी भित्तियों का निर्माण करना प्रारम्भ कर देते हैं। इस प्रकार की प्रवाल भित्तियाँ कम संख्या में मिलती हैं। उदाहरण के लिए छोटी एण्डीलीज की प्रवाल भित्तियाँ आदि।

प्रवाल भित्ति के उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत

        प्रवाल भित्ति की उत्पत्ति के संबंध में तीन प्रमुख सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं-

(1) अवतलन का सिद्धांत 

(2) स्थायी स्थल का सिद्धांत 

(3) हिमानी नियंत्रण का सिद्धांत

 अवतलन का सिद्धांत 

     अवतलन सिद्धांत को 1837 ई० में चार्ल्स डार्विन महोदय ने मार्शल द्वीप समूह के बिकनी द्वीप के संदर्भ में प्रस्तुत किया। कालांतर में अमेरिकी भूगोलवेत्ता 1883 में डाना, डेविस(1928), मोनार्ड(1964) इत्यादि ने सिद्धांत का समर्थन करते हुए कई प्रमाण प्रस्तुत किया।

         अवतलन के सिद्धांत के अनुसार प्रारंभ में प्रवाल जीवों का विकास किनारे पर तटीय प्रवाल के रूप में होता है। लेकिन जब किसी कारणवश भूगर्भिक हलचल के कारण तटीय क्षेत्रों का धँसान प्रारंभ हो जाता है तो पॉलिप भोजन ग्रहण करने हेतु ऊपर की ओर विकसित होना शुरू हो जाते हैं, जिसके कारण धीरे-धीरे प्रवाल भित्तियों की मोटाई बढ़ने लगती है। फलत: तटीय प्रवाल भित्ति अवरोधक प्रवाल भित्ति का निर्माण होता है। अंततः जब संपूर्ण भाग का धँसान क्रिया पूर्ण हो जाती है तो कहीं कहीं पर  प्रवाल भित्ति रिंग के रूप में दिखाई देने लगते हैं जिसे वलयाकार प्रवाल भित्ति कहते हैं। 

        स्पष्ट है कि प्रवाल भित्तियों का विकास डार्विन के अनुसार क्रमिक रूप से होता है।सबसे पहले तटीय प्रवाल भित्ति ,उसके बाद अवरोधक प्रवाल भित्ति और अंत में वलयाकार प्रवाल भित्ति का विकास होता है। इसलिए अवतलन सिद्धांत को एक “उद्द्विदकासीय सिद्धांत” माना जाता है।

सिद्धांत के पक्ष में प्रस्तुत प्रमाण

        डाना, डेविस, मोनार्ड एवं स्वयं डार्विन महोदय ने अवतलन सिद्धांत प्रमाणित करने हेतु कई प्रमाण प्रस्तुत किए। डेविस महोदय ने अपना प्रमाण “कोरल रीफ प्रॉब्लम” नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया।

जैसे :-

(i) डार्विन ने कहा कि वलयाकार प्रवाल भित्ति वहीं पर विकसित हो रहे हैं जहाँ पर द्वीप का क्रमिक रूप से धँसान हो रहा है। इसे बिकनी द्वीप के संदर्भ में अध्ययन किया जा सकता है। 

(ii) अवतलन/धँसान के कारण प्रवाल भित्ति की मोटाई और लैगून की गहराई में लगातार वृद्धि होती है लेकिन धँसान की क्रिया मंद होती है जबकि उससे तेज गति में प्रवाल का विकास होता है।

(iii) प्रवाल भितियों में अलग-अलग काल में निर्मित प्रवाल भित्तियों का स्तर पाया जाता है। जो अवतलन के पक्ष में सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है। सोनार नामक यंत्र से जब हवाई द्वीप का अध्ययन किया गया तो वहाँ 330 मीटर गहराई तक अवतलन का प्रमाण मिला।

(iv) बिकनी और फुनाफूटी पर 700 मीटर गहराई कुएँ की खुदाई कर अवतलन का प्रमाण ढूंढा गया।

(vi) जब यह स्पष्ट हुआ कि प्रवाल भित्तियों का निर्माण अवतलन से हुआ है तो प्रारंभ में यह अंदाज लगाया गया कि अवतलन वाले क्षेत्रों में पेट्रोलियम का संचित भंडार होना चाहिए। इसी अंदाज प्रवाली द्वीपों पर तेल कुओं की खुदाई की गई तो वहाँ से खनिज तेल का प्रमाण मिला।

आलोचना/दोष

(i) सोलोमन द्वीप और पलाऊ द्वीप मिलने वाले प्रवाल भित्तियों की व्याख्या अवतलन सिद्धांत से नहीं की जा सकती है। 

(ii) डार्विन ने यह नहीं बताया कि समुद्री किनारों का अवतलन क्यों कब और कैसे हुआ। 

(iii) कई ऐसे प्रवाल भित्ति है जिनका निर्माण धँसान वाले क्षेत्र में नहीं बल्कि उत्थान वाले क्षेत्रों में मिलते हैं। जैसे ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर। 

(iv) यदि यह मान लिया जाए कि प्रवाल भित्तियों का क्रमिक विकास अवतलन से हो रहा है तो अब तक सभी प्रवाल भित्तियों को विलुप्त हो जाना चाहिए था। 

(v) अवतलन सिद्धांत में बताया गया है कि प्रवाल भित्तियों का विकास क्रमिक रूप से होता है। इसका तात्पर्य है कि एक समय में एक ही स्थान पर एक ही प्रकार का प्रवाल भित्ति मिलना चाहिए। लेकिन कई क्षेत्र हैं जहाँ पर अनेकों प्रकार के प्रवाल भित्ति का प्रमाण मिलता है।

निष्कर्ष :

       उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अन्तः सागरीय रूपों में प्रवाल भित्तियों का अलग विशिष्ट महत्व है। यद्यपि अवरोधक तथा वलयाकार प्रवाल भित्तियों के निर्माण की समस्या अत्यन्त जटिल है। इसके संबंध में अनेक विद्वानों ने अपने-अपने मतों का प्रतिपादन किया है लेकिन आज भी डार्विन तथा डाना के अवतलन सिद्धांत को अधिक महत्वपूर्ण माना है।


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15. Tides / ज्वार भाटा

15. Tides (ज्वार भाटा)


ज्वार भाटा (Tides)⇒

            समुद्री जल में कई प्रकार की गतियाँ पाई जाती है। जैसे- लहर, जलधारा, ज्वार-भाटा। सर्वप्रथम मर्रे महोदय ने ज्वार-भाटा को परिभाषित करते हुए कहा- “सूर्य और चंद्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण समुद्री तल के नियमित रूप से ऊपर उठने और नीचे बैठने की क्रिया को ज्वार-भाटा कहते हैं।” मर्रे की इस परिभाषा से यह स्पष्ट नहीं होता है कि एक दिन में समुद्री तल कितनी बार ऊपर उठता है और कितनी बार नीचे गिरता है। अतः इस समस्या को मारमर महोदय ने अपनी परिभाषा में दूर करते हुए कहा “समुद्र का जल प्रतिदिन दो बार ऊपर उठता है और दो बार नीचे गिरता है तथा आकर्षण के फलस्वरूप समुद्र तल के ऊपर उठने तथा आगे बढ़ने को ज्वार तथा समुद्री तल के नीचे उतरने और पीछे की ओर हटने को भाटा कहते है।” इस प्रकार स्पष्ट है कि नियमित रूप से समुद्री जल का ऊपर उठना और नीचे बैठना ही ज्वार भाटा कहलाता है।

        ज्वार-भाटा के संबंध में मानव प्राचीन काल से ही जानने को उत्सुक रहा है। सर्वप्रथम हेरोडोटस एवं पीथियस ने ज्वार-भाटा का संबंध चंद्रमा से बताया था। उसके बाद में रोमन भूगोलवेत्ता प्लिनी ने ज्वार-भाटा का विस्तृत अध्ययन किया। 17वीं शताब्दी में न्यूटन महोदय ने गुरुत्वाकर्षण शक्ति का न केवल खोज किया बल्कि ज्वार-भाटा की उत्पत्ति के संबंध में 1667 ई० में संतुलन का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसी तरह 1755 ई० में लाप्लास ने गतिक सिद्धांत, 1833 ई० में विलियम वेवेल के प्रगामी तरंग सिद्धांत और आगे चलकर हैरिस महोदय ने 1928 ई०  दोलन सिद्धांत या स्थायी तरंग सिद्धांत प्रस्तुत किया।

ज्वार-भाटा की विशेषता

             ज्वार-भाटा सागरीय जल की लंबवत गति है। जिसकी पहचान केवल तट पर ही की जा सकती है। ज्वार-भाटा को तटीय भागों में नियमित रूप से प्रतिदिन देखा जा सकता है। समुद्र के किनारे किसी एक स्थान पर कोई व्यक्ति खड़ा है तो उसे 24 घंटे में दो बार समुद्र का जल ऊपर उठते हुए और दो बार नीचे बैठते हुए प्रतीत होता है। ज्वार-भाटा की उत्पत्ति पर पृथ्वी के घूर्णन गति और चंद्रमा के परिभ्रमण गति का प्रभाव पड़ता है। दो ज्वार या दो भाटा के बीच समय अंतराल नियत होता है। जैसे एक ज्वार अगर आज समुद्र के किनारे 10:00 बजे सुबह आई हो तो अगले दिन ज्वार ठीक 10:00 बजे नहीं आएंगे बल्कि 52 मिनट देर से आती है। दो क्रमबद्ध ज्वार के बीच 26 मिनट का अंतर होता है जबकि दो क्रमबद्ध ज्वार और भाटा के बीच 13 मिनट का अंतर होता है। इसका प्रमुख कारण पृथ्वी और चंद्रमा की स्थिति में क्रमश: घूर्णन एवं परिभ्रमण गति से उत्पन्न देशांतरीय विषमता है। अतः इसी विषमता के कारण किसी भी देशांतर पर 24 घंटे के बाद जो ज्वार-भाटा आता है, वह 52 मिनट की देरी से आता है और यह देर होने का क्रम 27 दिन तक चलता रहता है। पृथ्वी पर एक समय में दो विपरीत देशांतरों पर आकर्षण बल के कारण ज्वार उत्पन्न होता है और ठीक उसी समय समकोणिक देशांतर पर भाटा उत्पन्न होता है।

ज्वार उत्पादक शक्तियॉं

        ज्वार उत्पन्न करने वाले शक्तियों में सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण शक्ति का महत्वपूर्ण योगदान है। सर्वप्रथम न्यूटन महोदय ने स्पष्ट किया कि अंतरिक्ष में स्थित सभी ग्रह, नक्षत्र एवं तारे गुरुत्वाकर्षण शक्ति के द्वारा एक-दूसरे के परिपेक्ष्य में संतुलित है तथा एक-दूसरे को आकर्षित कर रहे हैं। न्यूटन अपने गुरुत्वाकर्षण का नियम ने बताया है कि “दो पिंडों के बीच में आकर्षण शक्ति उनके द्रव्यमान के गुणनफल का समानुपाती एवं दूरी के वर्ग का व्युत्क्रमानुपाती होता है।” अर्थात जो पिण्ड जितना बड़ा होगा उसका आकर्षण शक्ति भी उतना ही अधिक होगा। इसके साथ ही जो पिंड जितना नजदीक होगा उसका भी आकर्षण बल उतना अधिक होगा। अतः इसी कारण से पृथ्वी पर सूर्य की तुलना में चंद्रमा के आकर्षण बल का प्रभाव अधिक रहता है क्योंकि चंद्रमा सूर्य की तुलना में कम द्रव्यमान भले ही रखता है लेकिन सूर्य की तुलना में पृथ्वी से काफी नजदीक है। 

        चंद्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है जिसका व्यास पृथ्वी के व्यास का 1/3 भाग है। यह पृथ्वी का परिक्रमा लगभग 27 दिन में कर लेता है। चंद्रमा और पृथ्वी के केंद्र के बीच की दूरी 3.84 लाख किलोमीटर है। लेकिन दोनों के सतह के बीच की दूरी 3.776 लाख किलोमीटर है। इससे स्पष्ट है कि चंद्रमा के सामने पृथ्वी की धरातलीय सतह वाले भाग के ठीक पीछे से चंद्रमा का धरातल 3.904 किलोमीटर दूर रहता है। पृथ्वी का वह भाग जो चंद्रमा के सामने पड़ता है, चंद्रमा के आकर्षण शक्ति से सर्वाधिक प्रभावित होता है। जबकि पीछे वाला भाग चंद्रमा की आकर्षण शक्ति से सबसे कम प्रभावित होता है। चंद्रमा के सामने वाला पृथ्वी का समुद्री जल चंद्रमा की ओर खींचा जाता है और ज्वार की स्थिति उत्पन्न करता है। जबकि ठीक उसके विपरीत वाले भाग में अपसारी के कारण भी ज्वार की स्थिति उत्पन्न होती है। चंद्रमा के सामने और उसके विपरीत भागों के बीच समकोण पर आकर्षण बल के कम प्रभाव के कारण जल का सतह नीचा ही रह जाता है। जिसके कारण वहाँ भाटा की स्थिति उत्पन्न होती है।

        चंद्रमा की परिक्रमण दिशा और पृथ्वी की घूर्णन दिशा एक समान है तथा चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा कर रही है। जब पृथ्वी 24 घंटे के घूर्णन गति के बाद पुनः चंद्रमा के सामने आती है तो चंद्रमा अपने परिक्रमण पथ पर 52 मिनट आगे बढ़ जाता है। फलत: पृथ्वी की नियत देशांतर को चंद्रमा के सम्मुख आने में 52 मिनट की देरी हो जाती है। इसी देर होने के कारण एक देशांतर पर ज्वार 24 घंटे के बाद 52 मिनट के देर से आती है।

ज्वार के प्रकार

        समुद्रीवेत्ताओं ने ज्वार के कई प्रकार बताया है। जैसे-

(1) दीर्घ / वृहत ज्वार (Spring Tide)

(2) लघु ज्वार

(3) दैनिक ज्वार

(4) मिश्रित ज्वार

(5) अपभू एवं उपभू ज्वार (Apogean & Perigean Tides)

(6) अयनवृतीय ज्वार & भूमध्यरेखीय ज्वार (Tropical Tides & Equatorial Tides)

(1) दीर्घ / वृहत ज्वार (Spring Tide)- यह पूर्णमासी (Full Moon) और अमावस्या (New Moon) के दिन आता है क्योंकि इन दोनों दिनों में सूर्य चंद्रमा और पृथ्वी तीनों एक सीधी रेखा में स्थित होते हैं। इस स्थिति को यूति-वियुति (Syzygy) कहा जाता है। पूर्णिमा के दिन वियुति (Opposition) कहते  हैं। जबकि अमावस्या के दिन यूति (Conjuction) की स्थिति उत्पन्न होती है।

      अमावस्या एवं पूर्णिमा के दिन सूर्य और चंद्रमा एक सीधी में होते हैं जिसके कारण समुद्री जल पर दोनों क्षेत्रों के आकर्षण बल कार्य करते हैं जिसके कारण प्रतिदिन आने वाले सामान्य ज्वार की तुलना में 20% अधिक जल ऊपर उठ जाता है। इसे ही “दीर्घ ज्वार” कहते हैं।

(2) लघु ज्वार-  प्रत्येक महीने शुक्ल  एवं कृष्ण पक्ष की सप्तमी एवं अष्टमी के रात में सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक-दूसरे के समकोण की स्थिति में होते हैं जिसके कारण दोनों के आकर्षण बल का प्रभाव एक साथ नहीं पड़ पाता है जिसके कारण एक देशांतर पर आने वाला प्रतिदिन के समान ज्वार की तुलना में 20% कमी जल ऊपर उठ पाता है। इसीलिए इसे लघु ज्वार करते हैं।

(3) दैनिक ज्वार- किसी स्थान पर एक दिन में आने वाले एक ज्वार और एक भाटा को दैनिक ज्वार कहते हैं। दैनिक ज्वार ही है जो 24 घंटे के बाद अगले दिन 52 मिनट देर से आती है। मैक्सिको की खाड़ी, फिलीपींस और आलास्का के तट पर आने वाले दैनिक ज्वार को देखा जा सकता है। 

अर्द्ध दैनिक ज्वार (Semi Daily Tides)- कई स्थानों पर 24 घंटे में दो बार ज्वार और दो बार भाटा आता है। एक बार आने के बाद 12 घंटे 26 मिनट बाद आने वाली ज्वार को अर्द्ध दैनिक ज्वार कहते हैं।

(4) मिश्रित ज्वार- दैनिक ज्वार और अर्द्ध दैनिक ज्वार को मिश्चित ज्वार कहते हैं। किसी भी स्थान पर भिन्न ऊंचाई वाले ज्वार को भी मिश्रित ज्वार कहते हैं।

(5) अपभू एवं उपभू ज्वार (Apogean & Perigean Tides)- 

      जब चंद्रमा पृथ्वी से सबसे निकट (3.54 किमी०) होती है तो उसे उपभू (Perigean) और जब सबसे दूर (4.07 किमी०) में स्थित होती है तो उसे अपभू (Apogean) कहते हैं। 

        उपभू की स्थिति में उत्पन्न ज्वार को उपभू ज्वार (Perigean Tides) और अपभू (Apogean Tides) की स्थिति में उत्पन्न ज्वार को अपभू कहते हैं।

(6) अयनवृतीय ज्वार & भूमध्यरेखीय ज्वार (Tropical Tides & Equatorial Tides)- ज्वार चंद्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण उत्पन्न होती है। एक चंद्रमास में चंद्रमा कर्क रेखा, मकर रेखा और भूमध्य रेखा के सम्मुख बारी-बारी से आती है। जब चंद्रमा कर्क एवं मकर रेखा पर होती है तो उस वक्त उत्पन्न ज्वार  को अयनवृत्तीय ज्वार (मध्य अक्षांशीय ज्वार) कहते हैं लेकिन जब चंद्रमा विषुवत रेखा पर होती है तो उस स्थिति में उत्पन्न ज्वार को विषुवतीय ज्वार (भूमध्यरेखीय ज्वार )कहते हैं।

ज्वार-भाटा की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत 

       ज्वार-भाटा की उत्पत्ति से संबंधित प्रक्रिया को कई भूगोलवेताओं ने सैद्धांतिकरण करने का प्रयास किया है। उन सिद्धांतों में प्रमुख सिद्धांत है:-

(i) संतुलन का सिद्धांत (Equilibrium Theory)- न्यूटन

(ii) प्रगामी तरंग सिद्धांत (Progressive Wave Theory)- विलियम वेवेल

(iii) स्थायी तरंग सिद्धांत (Stationary Wave Theory)-  हैरिस

(iv) नहर सिद्धान्त- एयरी

(v) गतिक सिद्धान्त- लाप्लास

    उपरोक्त सिद्धान्तों में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत संतुलन का सिद्धांत को माना जा रहा है जिनकी व्याख्या नीचे की जा रही है।

संतुलन का सिद्धांत (Equilibrium Theory)

         संतुलन सिद्धांत के प्रस्तुतकर्ता सर आइजक न्यूटन रहे हैं। इन्होंने 1687 ई० में गुरुत्वाकर्षण के आधार पर संतुलन का सिद्धांत प्रस्तुत किया। न्यूटन ने बताया कि विभिन्न आकाशीय पिंड एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। ये आकर्षण बल आकाशीय पिंडों के द्रव्यमान के गुणनफल पर और दूरी के वर्ग पर निर्भर करते हैं। इसे प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने निम्नलिखित सूत्र का प्रतिपादन किया।  

जहाँ,  F = आकर्षण बल

G = एक नियतांक

m1 = पृथ्वी का द्रव्यमान

m2 = चन्द्रमा का द्रव्यमान

r = दोनों आकाशीय पिण्डों के बीच की दूरी

        इस नियम के अनुसार न्यूटन ने बताया कि सूर्य एवं चंद्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण ही समुद्र में ज्वार उत्पन्न होते हैं। कालांतर में लाप्लास महोदय ने इस सिद्धांत को और विकसित करने का प्रयास किया। लाप्लास के अनुसार ज्वार चंद्रमा एवं सूर्य के आकर्षण बल तथा अपकेंद्रीय बल दोनों के कारण उत्पन्न होती है। उन्होंने बताया कि जब कोई पिंड वृत्ताकार पथ पर गतिशील होती है तो आकर्षण शक्ति के विरुद्ध अपकेंद्रीय बल का जन्म होता है ताकि आकर्षण बल एवं अपकेंद्रीय बल के कारण संतुलन की स्थिति बना रहे।

       न्यूटन एवं लाप्लास दोनों ने बताया कि सूर्य की तुलना में चंद्रमा के आकर्षण बल का प्रभाव पृथ्वी पर अधिक पड़ता है क्योंकि सूर्य की तुलना में चन्द्रमा काफी निकट है। चंद्रमा के ठीक सामने वाला पृथ्वी का भाग केंद्र की अपेक्षा 6400 किलोमीटर चंद्रमा के निकट होता है। जबकि इसके विपरीत वाला भाग चंद्रमा से 12800 किलोमीटर अधिक को दूर होता है जिसके कारण चंद्रमा के सम्मुख वाले पृथ्वी के भाग पर अधिक आकर्षण बल कार्य करता है जबकि ठीक उसके विपरीत आकर्षण बल का प्रभाव नगण्य होता है। विपरीत भाग में आकर्षण बल को संतुलित करने हेतु अपकेंद्रीय बल लगने लगता है। इन दोनों बलों के कारण ही समुद्री जल में उछाल आती है।जिससे ज्वार उत्पन्न होता है। 

आलोचना-     

       कई समुद्रवेत्ताओं ने इस सिद्धांत को दो आधारों पर आलोचना किया है। 

(1) पृथ्वी के धरातल पर अगर केवल जल ही होता तो इस सिद्धांत के क्रियाशील होने की संभावना थी परंतु, पृथ्वी के धरातल पर जल एवं स्थल का वितरण काफी असमान है। यहाँ ज्वार चंद्रमा की आकर्षण बल के कारण एक ही देशांतर पर एक ही बार ज्वार उत्पन्न नहीं होता है। 

(2) सागर की गहराई सागर की नितलीय उच्चावच, चक्रवात और चंद्रमा की कलाएँ इत्यादि का ज्वार-भाटा की उत्पत्ति में कोई उल्लेख नहीं किया है। 

(3) इस नियम के अनुसार प्रतिदिन एक देशांतर पर निश्चित अंतराल पर दो बार ज्वार और दो बार भाटा आना चाहिए। लेकिन इंग्लिश चैनल में एक दिन में चार बार ज्वार और चार बार भाटा आती है। इसके कारणों का भी स्पष्टीकरण न्यूटन ने नहीं किया है। 

(4) चंद्रमा के आकर्षण शक्ति का प्रभाव पृथ्वी की एक ही देशांतर पर एक समान रूप से पड़नी चाहिए थी और एक देशांतर पर जल का उत्थान भी एक समान होनी चाहिए था। लेकिन सामान्य रूप से ऐसा नहीं होता। जैसे- उत्तरी अमेरिका के तट पर अवस्थित फंडी की खाड़ी में विश्व के सबसे ऊँचा ज्वार उत्पन्न होता है। यहाँ 15 से 18 मीटर तक जल में उछाल आता है जबकि ठीक उसी देशांतर पर इतनी ऊँची-ऊँची ज्वारें नहीं आती। 

निष्कर्ष:-  इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि न्यूटन के द्वारा प्रतिपादित संतुलन सिद्धांत की कई सीमाएँ हैं। इसके बावजूद ज्वार-भाटा के उत्पत्ति की व्याख्या करने वाला सबसे मान्य सिद्धांत है।


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14. Currents of The Pacific Ocean / प्रशांत महासागर की जलधाराएँ

14. Currents of The Pacific Ocean

(प्रशांत महासागर की जलधाराएँ)

Currents of The Pacific Ocean



Currents of The Pacific Ocean

प्रशांत महासागर की जलधाराएँ⇒

         प्रशांत महासागर की धाराएँ अटलांटिक महासागर के धाराओं के समान बहती है। केवल थोड़ा बहुत परिवर्तन महासागर के विस्तार और स्वरूप के कारण आ जाता है। प्रशांत महासागर में निम्नलिखित धाराएँ चलती है-

(A) उत्तरी प्रशांत महासागर की जलधाराएँ

(i) उत्तरी भूमध्य रेखीय धारा-

      इसका प्रारंभ उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका के मिलन स्थल पर पश्चिमी भाग से होती है। यहां से प्रारंभ होकर यह धारा संपूर्ण प्रशांत महासागर की 7500 मील की यात्रा करके फिलीपाइन द्वीप समूह के तट पर आकर टकराती है और उत्तर की ओर मुड़ जाती है। यह एक गर्म जलधारा है। यह पूर्व से पश्चिम दिशा में बहती है। यह संसार की सबसे लंबी जलधारा है।

(ii) क्यूरोशियो या जापान धारा-

     उतरी विषुवतीय प्रशांत जलधारा की ही अग्रभाग है जो दक्षिण से उत्तर की ओर चलती है। यह फिलीपींस से 35°N अक्षांश के बीच जापान के पूर्वी तट के सहारे चलती है। 40°अक्षांश के पास यह सीधे पूरब की ओर मुड़ जाती है और उत्तरी प्रशांत प्रवाह को जन्म देती है। लेकिन इसके पहले क्यूशू द्वीप से टकराकर इसकी दो शाखा हो जाती है। एक शाखा जापान सागर में “शुसीमा धारा” कहलाती है।

(iii) क्यूराइल या ओयाशिवो ठंडी जलधारा- 

     यह एक ठंडी जलधारा है। उत्तरी आर्कटिक महासागर से चला हुआ जल बेरिंग जलडमरूमध्य से होकर दक्षिण की ओर प्रवाहित होता है जिसे ओयाशिवो जलधारा कहते हैं। होकैडो द्वीप के पास यह क्यूरोशियो जलधारा से मिल जाती है। इसे कमचटका धारा भी कहते हैं।

(iv) उत्तरी प्रशांत महासागरीय ड्रिफ्ट-

     उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट के समान ही प्रशांत महासागर में क्यूरोशियो धारा से टकराकर जब पछुआ पवनों के प्रभाव में आती है तो पूर्व की ओर मुड़ जाती है। तब इसकी गति मंद होती है। इसकी एक शाखा बेरिंग समुद्र में घुसकर अल्युशियन द्वीपों के उत्तरी भाग में घड़ी की सुई के विपरीत दिशा में घूमती है। यह एक ठंडी धारा के रूप में क्यूराइल से जाकर मिल जाती है। इसे अल्युशियन जलधारा भी कहते हैं। दूसरी शाखा अलास्का की खाड़ी में प्रवेश करके अलास्का धारा के नाम से जानी जाती है। यह गर्म जलधारा के रूप में बहती है जिसके कारण कनाडा के तटीय क्षेत्र में हिम को जमने नहीं देता है।

(v) कैलिफोर्निया जलधारा- यह एक उपसतही ठंडी जलधारा है जो उत्तर से दक्षिण की ओर कैलिफोर्निया की खाड़ी के तट के सहारे चलती है और उत्तरी विषुवतीय जलधारा से जाकर मिल जाती है।

(B) दक्षिणी प्रशांत महासागर की जलधारा

(i) दक्षिण विषुवतीय जलधारा- 

     दक्षिण पश्चिम वाणिज्य पवन के कारण पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली जलधारा है। यह एक गर्म जलधारा है। मध्य प्रशांत महासागर में यह धारा अनेक द्वीपों की स्थिति के कारण विभाजित हो जाती है।

(ii) पूर्वी आस्ट्रेलियन धारा-

      जब दक्षिणी विषुवतीय प्रशांत जलधारा न्यूगिनी तट से टकराती है तो इसका अधिकांश जल दक्षिण की ओर मुड़कर आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट के सहारे बहने लगती है। इसे ही पूर्वी ऑस्ट्रेलियन जलधारा कहते हैं। न्यूजीलैंड के निकट इसकी दो शाखाएं क्रमशः पश्चिम तथा पूरब से बहकर बहती है और पुनः मिल जाती है। 40°S अक्षांश के निकट यह पूर्व की ओर प्रवाहित होने लगती है और दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट तक चलती चली जाती है।

(iii) अंटार्कटिक प्रवाह- 

     यह धारा अंटार्कटिका के चारों ओर चक्कर लगाती है। इसकी दिशा पश्चिम से पूरब की ओर है। यह एक ठंडी जलधारा है जो पछुआ पवनों के प्रवाह में रहती है। इसे पछुआ पवन प्रवाह जलधारा भी कहते हैं। अवरोध के अभाव में स्वतंत्र रूप से बहती है।

(iv) पेरू या हंबोल्ट की ठंडी जलधारा- 

      पेरू के तट पर दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है। यह अंटार्कटिका ड्रिफ्ट की एक शाखा है। इसकी खोज 1522 ई० में हुआ। 1802 में इसका नाम हंबोल्ट ने अपने नाम पर रखा। तट से इसका विस्तार 900 किलोमीटर दूर तक मिलता है। इसके कारण गैलपोगस द्वीप पर पेंग्विन पक्षी मिलते हैं।

(v) एलनीनो जलधारा- 

     यह एक गर्म जलधारा है। यह फरवरी-मार्च में चलती है। 3°S से 33°S के बीच उत्पन्न होती है। एक मान्यता के अनुसार एलनीनो की उत्पत्ति जाड़े की ऋतु में धाराओं के दक्षिणी गोलार्ध में खिसकने के फलस्वरुप होती है। इसका तापमान सामान्य जल से 3℃ से 6℃ अधिक होता है।

(vi) विपरीत विषुवतीय जलधारा- 

       विषुवत रेखा के सहारे पश्चिम से पूरब की ओर चलती है। यह एक गर्म जलधारा है। इसकी उत्पत्ति प्रशांत महासागर के पश्चिम में जल संचय से होता है।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका 

       प्रशान्त महासागर की जधाराएं उत्तरी प्रशान्त महासागर में, उत्तरी विषुवतीय धारा पूर्व से पश्चिम की ओर महासागर के आर-पार बहती है। यह धारा जैसे जैसे पश्चिम की ओर बढ़ती है, इसके आयतन में वृद्धि होती जाती है। मध्य अमरीका के पश्चिमी तट से शुरू होकर यह पश्चिमी प्रशान्त महासागर में फिलिपीन द्वीपसमूह तक पहुंचती है। वहां से यह उत्तर की ओर मुड़ती है और क्यूरोसिबो धारा के नाम से फिलीपीन द्वीप समूह, ताईवान तथा जापान के तटों के साथ लगी हुई उत्तर की ओर बहती है। यह गर्म जल की धारा है। इसकी एक शाखा सुशिमा धारा के नाम से जापान सागर में प्रवेश करती है।

          जापान के दक्षिण-पूर्वी तट के समीप क्यूरोसियो धारा प्रचलित पछुआ पवन की चपेट में आ जाती है और महासागर के आर-पार पश्चिम से पूर्व दिशा में उत्तरी प्रशान्त धारा के नाम से बहती है। उत्तरी अमेरीका के पश्चिमी तट पर पहुंचकर यह दो शाखाओं में बंट जाती है। उत्तरी शाखा ब्रिटिश कोलंबिया तथा अलास्का के तटों पर घड़ी की सुइयों के विपरीत दिशा में अलास्का धारा के नाम से बहती है। इस क्षेत्र के समुद्री जल की अपेक्षा इस धारा का जल अधिक गर्म होता है। उत्तरी प्रशान्त धारा की दूसरी शाखा कैलिफोर्निया के तट पर दक्षिण की ओर बहती है। यह ठण्डी जलधारा है और इसे कैलिफोर्निया धारा कहते हैं। यह धारा निचले अक्षांशों में आकर उत्तरी विषुवतीय धारा से मिल जाती है। यह उत्तरी विषुवतीय धारा, व्यापारिक पवन के प्रभाव से महासागर के आर-पार, 14,500 किमी की दूरी तय करती है। इस प्रकार इन धाराओं का एक चक्र पूरा होता है।

        प्रशान्त के उत्तरी भाग में ओयासिवो धारा कमचटका प्रायद्वीप के तट के समीप उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है। यह एक दण्डी जलधारा है। उत्तरी प्रशान्त की दूसरी ठण्डी जलधारा ओखोटस्क धारा है। जो सखालीन के समीप बहती है और होकडो के निकट ओयासिवो धारा से मिल जाती है। ओयासिवो धारा अन्त में क्यूरोसियो धारा से मिलकर उसके गर्म जल के नीचे डूब जाती है।

        दक्षिणी प्रशान्त महासागर में दक्षिणी विषुवतीय धारा पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और पूर्वी आस्ट्रेलियाई धारा के नाम से दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। आगे चलकर तस्मानिया के समीप यह दक्षिणी प्रशान्त धारा में मिल जाती है जो पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। दक्षिणी अमरीका के दक्षिण-पश्चिमी तट पर पहुंचकर यह उत्तर की ओर मुड़ जाती है। यहाँ इसे पेरू धारा कहते हैं। यह एक ठण्डी जलधारा है जो अन्त में दक्षिणी विषुवतीय धारा में विलीन होकर एक चक्र पूरा करती है। उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धाराओं के बीच एक जलधारा पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है, जिसे विरुद्ध विषुवतीय धारा कहते हैं। उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धाराएं महासागर के पश्चिमी भाग में विशाल जलराशि एकत्र करती रहती हैं। जिससे महासागरीय जलस्तर असन्तुलित होता रहता है। इस असन्तुलन को दूर करने का कार्य विरुद्ध विषुवतीय धारा करती हैं।



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13. Atlantic Oceanic Currents

13. Atlantic Oceanic Currents

(अटलांटिक महासागर की जलधारा) 

Atlantic Oceanic Currents


Atlantic Oceanic Currents

अटलांटिक महासागर की जलधारा⇒

         अटलांटिक महासागर पश्चिम में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका और पूर्व में यूरोप तथा फिर का कीमत 8.24 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अवस्थित है। उत्तर में यह डेविस की खाड़ी, डेनमार्क जलडमरूमध्य तथा नार्वेजियन सागर द्वारा आर्कटिक सागर से जुड़ा हुआ है। अफ्रीका के दक्षिण में यह हिंद महासागर से मिला हुआ है। इसका आकार अंग्रेजी के S- अक्षर के समान है।अटलांटिक महासागर में मंद व तीव्र तथा उष्ण एवं शीतल सभी प्रकार के धाराएं प्रवाहित होती है। अटलांटिक महासागर की प्रमुख धाराएं निम्नलिखित है –

(A) उत्तरी अटलांटिक की जलधारा

1.उतरी अटलांटिक विषुवतीय गर्म जलधारा

2. कैरेबियन जलधारा

3. यूकाटन जलधारा

4. मैक्सिको जलधारा

5. गल्फ स्ट्रीम

6. उतरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह

7. पूर्वी ग्रीनलैंड जलधारा

8. नार्वेजियन जलधारा

9. इरमिंजर जलधारा

10. लैबराडोर जलधारा

11. केनारी जलधारा

(B) दक्षिणी अटलांटिक की जलधारा

1. दक्षिणी अटलांटिक विषुवतीय गर्म जलधारा

2. ब्राजीलियन गर्म जलधारा

3. फॉकलैण्ड जलधारा

4. अंटार्कटिका पछुआ प्रवाह (विश्व मे)

5. वेंगुएला जलधारा

(A) उत्तरी अटलांटिक की जलधारा 

(1) उत्तरी अटलांटिक विषुवतीय गर्म जलधारा- इसका विस्तार 0° से 10°N अक्षांश तक होता है। व्यापारिक हवा के कारण इस धारा की प्रवाह दिशा पूर्व से पश्चिम की ओर है। यह अफ्रीका के तट को छोड़ने के बाद अपने गुणों को प्राप्त करती है। यह एक गर्म जलधारा है। मध्य अटलांटिक कटक को पार कर उत्तर पश्चिम की ओर मुड़कर दो शाखाओं में बँट जाती है। वेस्टइंडीज के पूर्व में “एंटीलीज जलधारा” और पश्चिम में “कैरेबियन जलधारा” कहलाता है। कैरेबियन जलधारा ही मैक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करता है। 

(2) फ्लोरिडा जलधारा- यह कैरेबियन जलधारा का अग्रभाग है जो यूकाटन चैनल से होती हुई मैं मैक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करती है। मैक्सिको की खाड़ी अर्द्धचंद्राकार रूप में है। वुस्ट महोदय के अनुसार यह गर्म जलधारा औसतन 26 मिलियन घन मीटर/सेकंड वार्षिक जलराशि फ्लोरिडा जल डमरूमध्य से होकर अटलांटिक महासागर में लाती है। इस जलधारा का विस्तार 30°N अक्षांश तक रहता है। भूमध्यरेखा से मैक्सिको की खाड़ी तक इस धारा का तापक्रम 75° F तथा सतह की लवणता 36% रहती है। 30°N अक्षांश से आगे एंटीलिस जलधारा से मिल जाती है।

(3) गल्फ स्ट्रीम धारा- यह एक गर्म जलधारा है। इसकी खोज 1513 ई० में पास दि लियोन ने की थी। फ्लोरिडा की धारा का जहाँ अंत होता है वहाँ से यह धारा प्रारम्भ होती है। मैक्सिको की खाड़ी में जन्म लेने के कारण इसका नाम गल्फ स्ट्रीम पड़ा है। यह सेंटलॉरेन्स नदी के मुहाने तक निर्विध्न रूप से चलती है। 40°N अक्षांश के पास तक यह उत्तरी-पूर्वी दिशा में बहती है और इसके बाद एकदम पूर्व की ओर मुड़ जाती है।

                  न्यूफाउंडलैंड तट के पास यह उत्तर की ओर से आने वाले लैब्रोडोर ठंडी जलधारा से मिलकर घना कोहरा उत्पन्न करती है। 45° W देशांतर के बाद गल्फस्ट्रीम कई शाखाओं में बँट जाती है। बिस्के की खाड़ी में बहने वाली धारा रेनेल धारा कहलाती है। यह इंग्लिश चैनल में भी प्रवेश करती है। एक शाखा नार्वे के तट से होकर बहती है जो नॉर्वेजियन जलधारा कहलाता है। आईसलैंड के दक्षिणी किनारे पर चलने वाली शाखा इरमिंजर जलधारा कहलाती है।                              

                 न्यूफाउंडलैंड के बाद गल्फस्ट्रीम धारा की दिशा व प्रवाह गति पर पछुआ पवनों का विशेष प्रभाव पड़ता है। पुनः 40° N अक्षांश पर इसकी दिशा पृथ्वी के विक्षेपक बल के कारण बदलती, 45°W अक्षांश के बाद गल्फस्ट्रीम ही उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह जलधारा कहलाती है।

(4) लैब्रोडोर धारा- उत्तरी अटलांटिक महासागर में लैब्रोडोर तट के सहारे उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूरब की ओर चलने वाली जलधारा लैब्रोडोर जलधारा कहलाती है। यह एक ठंडी जलधारा है। यह उत्तरी ध्रुव महासागर का ठंडा जल खींचकर ले आती है। सेंट लारेंस नदी के मुहाने पर न्यूफाउलैंड द्वीप के समीप यह गल्फस्ट्रीम से मिल जाती है जिससे घना कोहरा बनता है।

(5) केनारी जलधारा- अफ्रीका के उत्तर-पश्चिम तट के सहारे के केनारी द्वीपों के पास से बहने वाली जलधारा केनारी जलधारा कहलाती है। यह धारा ठंडी है और उतर से दक्षिण दिशा में बहती है। वाणिज्य पवन इसे विशेष गति प्रदान करते हैं। यह धारा आगे चलकर उतरी विषुवतीय जलधारा में मिल जाती है। यह एक उपसतही जलधारा है।

(6) पूर्वी ग्रीनलैंड जलधारा- ग्रीनलैंड के पूर्व से भी एक ठंडी जलधारा दक्षिण की ओर चलती है जिसे पूर्वी ग्रीनलैंड जलधारा कहते हैं। यह उतरी अटलांटिक प्रवाह में मिल जाती है।

                      उत्तरी अटलांटिक महासागर के मध्य में जलधाराओं का एक वृत्त बन जाता है जिसकी प्रवाह दिशा घड़ी की सूईयों की गति की तरह होती है। इसके बीच का भाग स्थिर रहता है, जिसमें सारगैसो नामक समुद्री घास उग जाती है। जिसके कारण इसे सारगैसो सागर करते हैं। इसका विस्तार 20° से 35°N के बीच है। लेक के अनुसार दूसरे महासागरों में इस प्रकार की विशेषता नहीं पाई जाती है। मगर मारशक के अनुसार विश्व के महासागरों में ऐसे सागरों की संख्या 6 तक हो सकती है। इसके संबंध में अभी ज्ञान अधूरा है। अतः उनकी उचित खोज आवश्यक है।Atlantic Oceanic Currents

(B) दक्षिणी अटलांटिक की धाराएँ :-

(1) दक्षिणी अटलांटिक विषुवतीय जलधारा- इस धारा का प्रवाह क्षेत्र 0° से 20°S अक्षांश के मध्य पश्चिमी अफ्रीकी तट से प्रारंभ होकर दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तट पर जाकर सैनरॉक नामक टापू से टकराकर दो भागों में बँट जाती है। इसकी एक शाखा उतरी विषुवतीय धारा से तथा दूसरी शाखा ब्राजील तट के पास से दक्षिण की ओर गुजरती है जो ब्राजील गर्म जलधारा कहलाती है। 

(2) विपरीत विषुवतीय जलधारा- इस धारा की दिशा उत्तरी तथा दक्षिणी विषुवतीय धारा के प्रतिकूल दिशा में होती है। यह पश्चिम से पूरब की ओर प्रवाहित होती है। यह एक गर्म एवं कम शक्तिशाली जलधारा है। यही धारा पुरब में गिनी खाड़ी में पहुंचकर गिनी गर्म धारा के रूप में प्रवाहित होती है। 

(3) ब्राजील गर्म जलधारा- दक्षिण विषुवतीय धारा दक्षिण अमेरिकी के पूर्वी तट पर सैन रॉक अंतरीप से टकराकर दो भागों में विभक्त हो जाती है। एक शाखा तट के सहारे उत्तर की ओर चलती है जबकि दूसरी शाखा दक्षिण की ओर चलती है जो ब्राजील गर्म जलधारा कहलाता है। इसकी जल 40°S अक्षांश के निकट पहुंचकर फॉकलैंड की धारा से मिल जाती है।

(4) फाकलैंड की ठंडी जलधारा- दक्षिणी अटलांटिक में फाकलैंड द्वीप के पास अर्जेंटीना तट के सहारे दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है। अंटार्कटिका ड्रिफ्ट का एक अंग होने के कारण यह एक ठंडी धारा है।

(5) दक्षिणी अटलांटिक ड्रिफ्ट या पछुआ प्रवाह – जब 40° अक्षांश के पास ब्राजील व फाकलैंड पछुआ पवनों के प्रभाव में आती है तो समुद्री धारा का प्रवाह पश्चिम से पूर्व की ओर होने लगता है। इसे पश्चिम वायु प्रवाह (West Wind Drift) भी कहते हैं। यह एक ठंडी जलधारा है। अंटार्कटिका महाद्वीप के तट के सहारे चलती है। यह 40° से 60°S अक्षांशों के मध्य बहती है।

(6) बेंगुएला जलधारा- पश्चिमी वायु प्रवाह का कुछ जल पृथ्वी की दैनिक गति के कारण थोड़ा-सा उत्तर की ओर मुड़ जाता है। यह धारा दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी तट से टकराकर उत्तर की ओर प्रवाहित होती है। यह एक ठंडी जलधारा है जो कालाहारी मरुस्थल के तट पर चलती है। उत्तर में यह दक्षिणी विषुवतीय जलधारा से मिल जाती है और अंततः चक्र को पूरा करता है।

                 अत: उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उत्तरी एवं दक्षिणी अटलांटिक महासागर में अलग-अलग विशेषताओं से युक्त कई जलधाराएं मिलती है।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका 

                       अटलाण्टिक महासागर की धाराएँ प्रचलित व्यापारिक पवन, विषुवत् रेखा के उत्तर और दक्षिण में महासागर के धरातलीय जल को प्रेरित करते हैं। इससे यहां का जल दो धाराओं के रूप में पश्चिम की ओर बहता है। इन्हें उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धारा कहते हैं। इस प्रकार से असन्तुलित हुए जलस्तर पर सन्तुलन वापस लाने के उद्देश्य से एक वापसी धारा जिसे विरुद्ध विषुवतीय धारा कहते हैं, उपरोक्त दोनों विषुवतीय धाराओं के बीच पश्चिम से पूर्व की और बहती है। पश्चिमी अफ्रीका के तट के समीप इसे गिनी धारा कहते हैं।

               ब्राजील के साओ राक अन्तरीप के समीप दक्षिणी विषुवतीय धारा दो शाखाओं में बंट जाती है। इसकी उत्तरी शाखा उत्तरी विषुवतीय धारा में मिल जाती है। इस सम्मिलित धारा का कुछ अंश कैरिबियन सागर तथा मेक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करता है, जबकि शेष भाग वेस्टइंडीज द्वीप समूह के पूर्वी किनारे पर अंटाईल्स धारा के नाम से बहता हुआ गुजरता है।

                जो शाखा मेक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करती है, उसमें व्यापारिक पवन द्वारा प्रेरित तथा मिसिसिपी नदी द्वारा प्रदत्त अतिरिक्त जल की आपूर्ति होती है। इसके परिणामस्वरूप खाड़ी का जलस्तर अटलाण्टिक महासागर के जलस्तर की अपेक्षा कुछ ऊंचा हो जाता है। अतः खाड़ी से जल की धारा फ्लोरिडा के मुहाने से होकर बाहर खुले महासागर में निकलती है, जहां अंटाईल्स की धारा इससे मिल जाती है। फ्लोरिडा अन्तरीप से यह सम्मिलित धारा संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी तट पर बहने लगती है। इसे हटेरस अन्तरीप तक फ्लोरिडा धारा कहते हैं। हटेरस अन्तरीप से न्यू फाउंडलैण्ड के समीप स्थित ग्रैंड बैंक तक इस धारा को गल्फस्ट्रीम कहते हैं। गहरे जल में यह गल्फस्ट्रीम सुस्पष्ट रहती है।

          ग्रैंड बैंक से गल्फस्ट्रीम, पछुआ पवन के प्रभाव में आकर, पूर्व की ओर मुड़ जाती है और अटलाण्टिक के आर-पार उत्तरी अटलाण्टिक धारा के नाम से पूर्व की ओर बहती है। महासागर के पूर्वी भाग में पहुंचकर यह धारा दो मुख्य शाखाओं में बंट जाती है। मुख्य धारा ब्रिटिश द्वीप समूह पहुंचकर वहां के नार्वे के तट पर बहने लगती है, जिसे नार्वे धारा कहते हैं। वहां से यह आर्कटिक महासागर में प्रवेश कर जाती है। दक्षिणी शाखा स्पेन तथा एजोर्स के मध्य दक्षिण की ओर बहती है। यहाँ इसे कनारी धारा कहते हैं। यह एक ठण्डी जलधारा है। अन्त में यह उत्तरी विषुवतीय धारा में विलीन होकर उत्तरी अटलाण्टिक में धाराओं के चक्र (Gyre) को पूरा करती है। बीच के शान्त क्षेत्र को सारगेसो सागर कहते हैं जो सारगेसम नामक समुद्री शैवाल से भरा हुआ है।
                दो ठण्डी जलधाराएं आर्कटिक महासागर से अटलाण्टिक महासागर में बहती हैं। ये हैं- पूर्वी ग्रीनलैण्ड धारा तथा लेब्राडोर धारा।       

           लेब्राडोर धारा कनाडा के पूर्वी तट पर दक्षिण की ओर  बहती हुई गर्म गल्फस्ट्रीम से मिलती है। भिन्न तापमान वाली इन दो धाराओं के संगम से न्यू फाउंडलैण्ड के समीप विश्व विख्यात कोहरे का निर्माण होता है। यहां संसार का सबसे महत्वपूर्ण मत्स्य-आखेट क्षेत्र है।

                  दक्षिणी अटलाण्टिक महासागर में दक्षिणी विषुवतीय धारा की एक शाखा साओ राक अन्तरीप से दक्षिण की ओर दक्षिणी अमेरीका के पूर्वी तट से लगी हुई बहती है। इसे ब्राजील धारा कहते हैं। लगभग 35° अक्षांश पर ब्राजील धारा पूर्व की ओर मुड़ जाती हैं और पछुआ पवन से प्रेरित दक्षिणी अटलाण्टिक धारा से मिलकर पश्चिम से पूर्व की ओर बहने लगती है।

                   गुड होप अन्तरीप के निकट, दक्षिणी अटलाण्टिक धारा की एक शाखा दक्षिणी अफ्रीका के पश्चिमी तट पर उत्तर की ओर बहती है। यह ठण्डी जलधारा है और इसे बेंगुएला धारा कहते हैं। यह अन्त में दक्षिणी विषुवतीय धारा से मिलकर दक्षिणी अटलाण्टिक महासागर की धाराओं का चक्र पूरा करती है। एक ठण्डी जलधारा दक्षिणी अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी तट पर दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है, जिसे फाकलैण्ड धारा कहते हैं।


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12. Indian Ocean Currents / हिन्द महासागर की जलधारा

12. Indian Ocean Currents

(हिन्द महासागर की जलधारा)

Indian Ocean Currents


Indian Ocean Currents

हिन्द महासागर की जलधारा⇒

                 हिन्द महासागर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी महासागर है। यह एकमात्र ऐसा महासागर है जो आर्कटिक महासागर से नहीं जुड़ा हुआ है। पूरब में प्रशांत महासागर और पश्चिम में अटलांटिक महासागर से जुड़ा हुआ है। हिंद महासागर के पूर्व में आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और मलाया प्रायद्वीप है। उत्तरी भाग में एशिया, पश्चिम में अफ्रीका और दक्षिण में अंटार्कटिका महाद्वीप स्थित है। विषुवत रेखा इस महासागर को दो भागों में बांटती है-

(i) उत्तरी हिंद महासागर और

(ii) दक्षिणी हिंद महासागर।

            दक्षिणी हिंद महासागर एक पूर्ण महासागर है। इसमें समुद्री जल धाराएं सामान्य नियमों के अनुरूप प्रवाहित होती है जबकि उत्तरी हिंद महासागर की जलधाराएं ऋतु के अनुरूप अपना मार्ग परिवर्तित करती है। उत्तरी हिंद महासागर की जलधाराएं मुख्यतः तीन कारकों से प्रभावित होती है-

(i) मानसूनी जलवायु

(ii) तटीय आकृति तथा

(iii) उत्तर में महाद्वीपीय स्थिति के कारण उत्पन्न तापीय प्रभाव।

                        हिंद महासागर के जलधाराओं का अध्ययन मुख्यतः दो भागों में बांटकर करते हैं-

(A) दक्षिणी हिंद महासागर की जलधारा 

(B) उत्तर हिंद महासागर की जलधारा 

(A) दक्षिणी हिंद महासागर की जलधारा- 

                  दक्षिण हिन्द महासागर में पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण विषुवतीय क्षेत्रों में हिंद महासागरीय गर्म विषुवतीय जलधारा उत्पन्न होती है। यह जलधारा पूरब से पश्चिम दिशा की ओर चलते हुए पूर्वी अफ्रीकी तट से टकराती है। लेकिन मेडागास्कर द्वीप के कारण दो भागों में बँट जाती है। 

         प्रथम शाखा मोजांबिक और मेडागास्कर के बीच से गुजरती है जिसे मोजांबिक जलधारा कहते हैं। दूसरी शाखा मेडागास्कर के पूर्वी तट से गुजरती है जिसे मलागासी जलधारा कहते हैं। ये दोनों जलधारायें दक्षिण की ओर अग्रसारित होकर आपस में मिल जाती है और अगुलहास जलधारा को जन्म देती है। यह जलधारा दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी तट पर चलती है। यह जल आगे अग्रसारित होकर विश्व स्तरीय जलधारा पछुआ वायु प्रवाह (West Wind Drift) अंटार्कटिक प्रवाह से मिल जाती है।

          अंटार्कटिका प्रवाह पश्चिम से पूरब चलने की प्रवृति रखती है। इसकी उत्पत्ति अंटार्कटिका के हिमानी पिघलने से होती है। इसलिए इसकी प्रकृति ठंडी होती है। अंटार्कटिका प्रवाह का अधिकांश जल प्रशांत महासागर में प्रविष्ट कर जाता है लेकिन थोड़ा बहुत जल ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी भाग से टकराकर दक्षिण से उत्तर की ओर चलने लगती है। यह एक ठंडी जलधारा है जिसे पश्चिमी आस्ट्रेलियन ठंडी जलधारा के नाम से जानते हैं और ये जलधारा अंततः विषुवतीय गर्म जलधारा से मिल जाती है इस तरह ये एक चक्र को पूरा करती है। इसे आगे के मानचित्र में भी देखा जा सकता है।

Indian Ocean Currents
(B) उत्तरी हिंद महासागर की जलधारा –
                       उत्तरी हिंद महासागर एक अपूर्ण महासागर है। इसका नितल काफी छिछला है। हिंद महासागर में भारतीय प्रायद्वीप काफी अंदर तक घुसा हुआ है। आर्कटिक महासागर से नहीं जुड़े रहने के कारण इसमें ठंडी जलधाराएं नहीं पाई जाती है। यह एकमात्र ऐसा महासागर है जिसमें जलधाराएं ऋतु के अनुरूप अपने दिशा में परिवर्तन लाती है।
             उतरी हिंद महासागर में समुद्री जल जुलाई माह में घड़ी की सुई की दिशा में चलती है। जबकि जनवरी महीने में उत्तरी पूर्वी मानसून या वाणिज्यिक हवा के प्रभाव में आकर घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में प्रवाहित होने लगती है। जुलाई के महीने में चलने वाली धारा को दक्षिण-पश्चिम मानसून प्रवाह और जनवरी के महीने में चलने वाली जलधारा को उत्तरी-पूर्वी मानसून प्रवाह कहते हैं।

         विषुवतीय क्षेत्रों में पूर्वी अफ्रीका के तट पर विशाल जलराशि के जमाव के कारण विषुवतीय प्रति जलधारा का भी निर्माण होता है।

★ दक्षिण पश्चिम मानसून प्रवाह उत्तरी पूर्वी मानसून प्रवाह की तुलना में ठंडी होती है।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका 

                  हिन्द महासागर की धाराओं का प्रवाह क्रम प्रशान्त एवं अटलाण्टिक महासागर की धाराओं के प्रवाह-क्रम से भिन्नता लिए हुए है। हिन्द महासागर की धाराओं पर स्थलखण्डों एवं मानसूनी पवनों का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। हिन्द महासागर उत्तर में भारतीय उपमहाद्वीप, पश्चिम में अफ्रीका तथा दक्षिण में आस्ट्रेलिया महाद्वीप से घिरा हुआ है फलतः इस महासागर में धाराओं का स्थायी क्रम अस्तित्व में नहीं रह पाता है। उत्तरी हिन्द महासागर में उत्तर पूर्वी तथा दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं के कारण वर्ष में दो बार धाराएं अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती हैं। स्पष्ट है कि हिन्द महासागर में स्थायी और सामयिक दोनों ही प्रकार की धाराएं प्रवाहित होती हैं।

(A) सामयिक धाराएं

                        विषुवत् रेखा के उत्तर में हिन्द महासागर की समस्त धाराएं मानसून के प्रभाव से अपनी दिशा एवं क्रम में वर्ष में दो बार परिवर्तन कर लेती हैं। मानसूनी पवनों से प्रवाहित होने के कारण इन्हें मानसून प्रवाह भी कहते हैं।

(1) उत्तर-पूर्वी मानसून धारा- शरदकाल में (उत्तरी गोलार्द्ध में) उत्तर-पूर्वी मानसूनी हवाएं स्थल से जल की ओर चलती हैं। जिस कारण उत्तरी हिन्द महासागर में अण्डमान तथा सोमाली के बीच पश्चिम दिशा में प्रवाहित होने वाली उत्तर-पूर्वी मानसून धारा का जन्म होता है। यह धारा 5° उत्तरी अक्षांश से होकर प्रवाहित होती है। यह एशिया महाद्वीप के दक्षिणी तटों के सहारे बहते हुए अफ्रीका के तट पर पहुंचती है। फिर अफ्रीका के शृंग से टकराकर दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। विषुवत् रेखा के उत्तर में यह पूर्व की ओर मुड़कर पूर्वी द्वीप समूह तक जाती है। इस सम्पूर्ण चक्र को उत्तर-पूर्वी मानसून प्रवाह कहते हैं। यह एक मन्द समुद्री धारा है।

(2) भारतीय प्रतिधारा- यह उपर्युक्त 2° से 8° दक्षिणी अक्षांशों के मध्य शीतकाल में जंजीबार से सुमात्रा के बीच पूर्व की ओर बहने वाली धारा है।

(3) दक्षिण-पश्चिमी मानसून धारा- ग्रीष्मकाल में (उत्तरी गोलार्द्ध में) मानसूनी हवाओं की दिशाएं उलट कर दक्षिण-पश्चिमी हो जाती हैं। जिस कारण उत्तरी हिन्द महासागर का धारा क्रम भी उलट जाता है। उत्तर-पूर्वी मानसून धारा उलट जाती है और उसकी जगह पर दक्षिण-पश्चिमी मानसून धारा का जन्म होता है, जो मोजाम्बिक के पास से प्रारम्भ होकर अफ्रीका के पूर्वी तट के सहारे बहती हुई अरब सागर में प्रवेश करती है और दक्षिणी एशिया के तटवर्ती भागों का अनुसरण करती हुई सुमात्रा के पश्चिमी तट तक पहुंचती है। अन्त में यह भूमध्य रेखीय धारा से मिल जाती है।

(B) स्थायी धाराएं

               हिन्द महासागर के दक्षिणी भाग में स्थायी धाराओं का क्रम पाया जाता है जो निम्नलिखित हैं :

(1) दक्षिणी विषुवत्रेखीय धारा- यह धारा दक्षिणी हिन्द महासागर में 10° से 15° दक्षिणी अक्षांश के बीच आस्ट्रेलिया और अफ्रीका के बीच दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पश्चिम की ओर बहती है। 10° अक्षांशों के निकट यह मालागासी द्वीप के उत्तर में दो शाखाओं में विभाजित होकर दक्षिण की ओर बहती है।

(2) मोजाम्बिक धारा- उपर्युक्त धारा के मालागासी के उत्तर में दो भाग हो जाते हैं जिसका पश्चिमी भाग मोजाम्बिक धारा कहलाती है। यह शाखा अफ्रीका महाद्वीप और मालागासी द्वीप के बीच भाग से दक्षिण की ओर बहती है।

(3) अगुलहास की धारा-  मेडागास्कर द्वीप के दक्षिण में दक्षिणी विषुवतरेखीय धारा की दो विभाजित शाखाएं पुनः मिलकर एक हो जाती हैं और दक्षिण की और दक्षिण-पूर्व अफ्रीका के तट के सहारे अगुलहास की धारा के नाम से बहते हुए अन्ततः अण्टार्कटिक प्रवाह से मिल जाती हैं।

(4) मालागासी धारा- यह धारा उपर्युक्त वर्णित दक्षिणी विषुवतरेखीय धारा की (जब वह पूर्वी अफ्रीका तट पर दक्षिण की ओर बहती है और मेडागास्कर के उत्तर से दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है।) पूर्वी शाखा को ही, जो मेडागास्कर के पूर्व से होकर दक्षिण दिशा में बहती है, मेडागास्कर या मालागासी धारा कहते हैं।

(5) अण्टार्कटिक प्रवाह-  हिन्द महासागर के दक्षिण पश्चिम भाग में अगुलहास धारा जब पछुआ हवाओं के प्रभाव में आती है तो पूर्व की ओर मुड़कर निर्वाध रूप से बड़ी तीव्र गति से पूर्व की ओर बहती है। यह बड़ी ठण्डी धारा होती है।

हिन्द महासागर की धाराओं एवं पवनों में सम्बन्ध तथा ऋत्विक भिन्नता-

              हिन्द महासागर की धाराओं का अध्ययन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि यहां उत्तरी हिन्द महासागर में प्रवाहित होने वाली धाराएं अस्थायी तथा शीतकालीन व ग्रीष्मकालीन मानसूनी पवनों की दिशा के अनुरूप होती हैं। जबकि दक्षिणी हिन्द महासागर में चलने वाली धाराएं स्थायी तो है, परन्तु उनकी गति व दिशा पर भी (प्रत्येक महासागर की धाराओं की तरह) पवनी का प्रभाव दिखाई पड़ता है। पवनों व धाराओं का जितना स्पष्ट सम्बन्ध हिन्द महासागर में दिखाई पड़ता है, उतना किसी भी महासागर में प्रतीत नहीं होता है।

            उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी की मौसमी पवनों तथा धाराओं का अध्ययन किया गया। 1857 से 1952 ई. तक हिन्द महासागर की मौसमी पवनों के 6 माह एक दिशा में तथा 6 माह दूसरी दिशा में प्रवाहित होने के कारणों का पता लगाने के लिए इस क्षेत्र में 16 बार समुद्री खोज की गई।

               1968 में हेले ने स्पष्ट किया था कि मानसून पवनें दक्षिणी गोलार्द्ध में व्यापारिक पवनों की पेटी से उत्पन्न होती हैं तथा  पृथ्वी की घूर्णन गति से उत्पन्न विक्षेपक बल के कारण ये पवनें पश्चिमी भारत के वर्षा क्रम के अन्तर्गत आ जाती है।

             पीसारोटी ने अन्तर्राष्ट्रीय भारतीय समुद्री खोज के समय सिद्ध किया कि जितने जल की मात्रा भूमध्य रेखा को पार करके अरब सागर में पहुंचती है, उससे भी तिगुनी वाष्पभरी पवनें जुलाई के महीने में भारत के पश्चिमी तट को पार करके प्रायद्वीपीय भारत में पहुंचती है।

            लाइट हिल ने 1969 में यह स्पष्ट किया कि हिन्द महासागर में सोमालीलैण्ड के निकट सोमाली धारा केवल स्थानीय क्षेत्र के मानसून पवनों के प्रवाह एवं आयतन को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि सम्पूर्ण क्षेत्र की पवनों एवं समुद्र की गति को प्रभावित करती है। इन्होंने भूमध्यरेखीय भागों में स्थित होने के कारण हिन्द महासागर में पवनों की गति का प्रभाव वहां की लहरों पर आंका है।


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11. Ocean current / समुद्री  जलधारा

 11. Ocean current / समुद्री  जलधारा 


Ocean current / समुद्री  जलधारा

Ocean current                                         

                    मोंकहाउस ने समुद्री जलधारा को परिभाषित करते हुए कहा है कि “समुद्री नितल के ऊपर स्थित विशाल जलराशि की एक निश्चित दिशा में प्रवाहित होने वाली सामान्य गति को महासागरीय जलधारा करते हैं।” जलधाराओं के अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि जलधाराएं नदी के समान होती है। इनके किनारों पर जल लगभग स्थिर होते हैं जबकि मध्यवर्ती भाग में गति अधिक होती है। जलधाराएं न केवल समुद्री सतह के ऊपर चलती है बल्कि गहराई में भी चलती है। जलधाराएं एक निश्चित दिशा में निरंतर प्रवाहित होती रहती है। जलधाराओं में जल की गति 2 से 10 किलोमीटर प्रति घंटा तक होती है। समुद्री जलधाराएं भौतिक विशेषता गति एवं स्थिति के आधार पर कई प्रकार की होती है। जैसे :- भौतिक विशेषता के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार की होती है-

(i) ठंडी जलधारा 

(ii) गर्म जलधारा 

               विषुवतीय क्षेत्र से चलने वाले जलधाराएं गर्म प्रकार की होती है जबकि ध्रुवीय क्षेत्रों से उत्पन्न होने वाली जलधाराएं ठंडी होती है। जैसे – तीनों महासागरों में चलने वाले विषुवतीय जलधारा गर्म जलधारा का उदाहरण है। जबकि हम्बोल्ट (पेरू) जलधारा, अंटार्कटिका, पछुआ प्रवाह ठंडी जलधारा का उदाहरण है। 

            स्थिति के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार की होती है। 

(i) सतही जलधारा

(ii) अधोवाहिनी जलधारा / उप सतही जलधारा

(i) सतही जलधारा (Surface Current)- ध्रुवों और भूमध्यरेखीय भागों के बीच तापक्रम में अधिक अंतर पाया जाता है। समुद्री जल गर्म होकर हल्की होती है और ठंडी होकर भारी होती है। इसलिए विषुवतीय क्षेत्र से ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने वाली जलधाराएं समुद्र सतह के ऊपर से प्रवाहित होती है। ऐसी जलधारा को सतही जलधारा कहते हैं।

(ii) अधोवाहिनी जलधारा / उप सतही जलधारा- ध्रुवों से विषुवतीय क्षेत्र की ओर प्रवाहित होने वाली जलधाराएं ठंडी एवं भारी होती है। इसलिए वे समुद्री नितल के ऊपर से प्रवाहित होने लगती है और धीरे-धीरे गर्म होकर ऊपर उठने की प्रवृत्ति रखती है। ऐसी जलधाराओं को ही अधोवाहिनी जलधारा या उपसतही जलधारा कहते हैं। 

         गति के आधार पर समुद्री जल धाराएं तीन प्रकार की होती है –

(i) प्रवाह (Drift)- जब सागरीय जल मंद गति से प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है तो उसे प्रवाह कहते हैं। प्रवाह में समुद्री जल केवल ऊपरी सतह पर प्रगतिशील रहता है। प्रवाह की उत्पत्ति में प्रचलित हवाओं का विशिष्ट योगदान है। प्रवाह की कोई निश्चित गति सीमा निर्धारित नहीं है।

(ii) धारा (Current)- धारा की औसत गति 30 से 40 किलोमीटर प्रतिदिन होता है। इसमें समुद्री नितल के ऊपर स्थित संपूर्ण समुद्री जलराशि प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है। धारा की गति प्रवाह की तुलना में अधिक होती है।

(iii) स्ट्रीम (Stream)-  स्ट्रीम विशाल मात्रा में समुद्री जलराशि किसी एक निश्चित दिशा में तीव्र गति से प्रभावित होने की प्रवृत्ति रखती है। स्ट्रीम की गति धारा से भी अधिक होती है।

समुद्री जलधारा की उत्पत्ति के कारक

                समुद्री जलधाराओं में क्षैतिज गति पाई जाती है। इसकी उत्पत्ति के कारकों को मोटे तौर पर 4 वर्गों में बांटा जा सकता है – 

(1) पृथ्वी की विशेषता से जुड़े हुए कारक (पृथ्वी की आकृति एवं गुरुत्वाकर्षण बल, पृथ्वी की घूर्णन गति)

(2) वायुमंडलीय कारक / बाह्य सागरीय कारक (वायुदाब, वायु की दिशा, वाष्पीकरण, वर्षण)

(3) समुद्री जल की विशेषता से जुड़े हुए कारक (लवणता, घनत्व, तापमान)

(4) धाराओं की दिशा को प्रभावित करने वाला कारक (समुद्री नितल की उच्चावच, तटीय आकृति, मौसम परिवर्तन, पृथ्वी का भ्रमण/कोरियोलिस बल)

(1) पृथ्वी की विशेषता से जुड़े हुए कारक- पृथ्वी की आकृति, गुरुत्वाकर्षण बल एवं घूर्णन गति का प्रभाव जलधाराओं की उत्पत्ति पर पड़ता है। विषुवत रेखा पर गुरुत्वाकर्षण बल न्यूनतम एवं अपकेंद्रीय बल अधिकतम होता है। जबकि ध्रूवों पर गुरुत्वाकर्षण बल अधिकतम तथा अपकेंद्रीय बल न्यूनतम होता है। इसके कारण विषुवतीय प्रदेश का सागरीय जल ध्रूवों की ओर प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखता है।

                      अर्थात पृथ्वी अपने दोनों ध्रुवों पर नारंगी की तरह धँसी हुई है। जबकि विषुवतीय भाग में ऊपर उठी हुई है। पुनः ध्रुवीय भागों में गुरुत्वकर्षण शक्ति अधिक होने के कारण जल का ऊपरी स्तर नीचे की ओर दवा हुआ रहता है। जबकि विषुवतीय क्षेत्र में गुरुत्वाकर्षण क्षमता कम होने के कारण जल का स्तर ऊपर उठा रहता है। फलतः उच्च  जल स्तर से निम्न जल स्तर की ओर जल में प्रवाह की प्रवृति होती है।

                    इसी तरह पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण ही जलधाराएँ उत्पन्न होती है। पृथ्वी पश्चिम से पूरब की ओर घूम रही है। चूंकि समुद्र की सतह ठोस है। जबकि समुद्री पानी द्रव है। इसीलिए जब पृथ्वी पश्चिम से पूरब घूमती है तो समुद्री जल में पूरब से पश्चिम की ओर क्षैतिज गति उत्पन्न होती है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण सभी विषुवतीय गर्म जलधाराएँ हैं। पृथ्वी की घूर्णन गति का पर प्रभाव समुद्री सतह पर जलधारा सर्वाधिक विषुवतीय क्षेत्र में ही पड़ता है।

(2) वायुमंडलीय कारक / बाह्य सागरीय कारक- वायुमंडलीय कारकों के अंतर्गत को शामिल किया जाता है-

(i) वायुदाब

(ii) वायु की दिशा 

(iii) वाष्पीकरण

(iv) वर्षण 

वायुदाब- सामान्यत: निम्न वायुदाब प्रदेश के जल उच्च वायुदाब प्रदेश की तरफ गतिशील हो जाते हैं क्योंकि दोनों के जलसतह में अंतर होता है। जैसे – केनारी जलधारा, कैलिफ़ोर्निया जलधारा ये सभी उपध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र से उपोष्ण उच्च वायुदाब क्षेत्र की ओर चलती है।

वायुदिशा/प्रचलित पवनें एवं घर्षण बल- समुद्री जलधाराओं के निर्धारण में वायुदिशा का अभूतपूर्व प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः इतना प्रभाव किसी भी अन्य कारक का नहीं है। वायुदिशा के अनुरूप समुद्री जलधाराएं हजारों किलोमीटर तक प्रवाहित होती है। विश्व के प्रमुख प्रचलित वायु के समानांतर ही कई जलधाराएं चला करती है।

जैसे – 

◆ उत्तरी-पूर्वी वाणिज्य हवा- उत्तरी विषुवतीय गर्म जलधारा 

◆ दक्षिणी-पूर्वी वाणिज्य हवा- दक्षिणी विषुवतीय गर्म जलधारा 

◆ उत्तरी गोलार्ध की पछुआ वायु- उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह और उत्तरी प्रशांत प्रवाह 

◆ दक्षिणी गोलार्ध की पछुआ वायु- पश्चिमी वायु प्रवाह

वाष्पीकरण- अधिक वाष्पीकरण के कारण जल की मात्रा कम हो जाती है। साथी जल की लवणता एवं घनत्व में वृद्धि होती है। इन सबका सम्मिलित प्रभाव यह होता है कि अधिक वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों में जल का तल नीचा हो जाता है।  फलस्वरुप कम वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों से अधिक वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों की ओर समुद्री जल जलधाराओं के रूप में प्रवाहित होती है। 

वर्षण- जिन क्षेत्रों में वर्षण क्रिया से अतिरिक्त जल की आपूर्ति होती है। उन क्षेत्रों से जल कम वर्षण वाले क्षेत्रों की ओर प्रवाहित होती है। जैसे – विषुवतीय क्षेत्र में वर्षण की क्रिया से अधिक जलापूर्ति होने के कारण जलधाराएँ उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र के कम वर्षा वाले क्षेत्र की ओर प्रवाहित होती है।

(3) समुद्री जल की विशेषता से जुड़े कारक / अंतः समुद्री कारक- सागरीय जल के तापमान, लवणता, घनत्व आदि में स्थानीय परिवर्तन होते हैं जिसके कारण जल धाराओं की उत्पत्ति होती है। तापमान के कारण लवणता प्रभावित होती है और लवणता के कारण जल का घनत्व प्रभावित होता है। अतः ये तीनों कारक आपस में जुड़े हुए हैं। सामान्यतः निम्न घनत्व के जल अधिक घनत्व जल की तरफ गतिशील होते हैं। जैसे- निम्न घनत्व वाले अटलांटिक महासागर का जल अधिक घनत्व वाले भूमध्यसागर की ओर प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है। सामान्यत: समुद्री जलधारा की उत्पत्ति में घनत्व का सबसे कम प्रभाव है।

समुद्र जल का तापमान- समुद्र की सतह के तापीय विषमता ही जल धाराओं को उत्पन्न करती है। जैसे निम्न अक्षांश क्षेत्र के जल उच्च अक्षांश क्षेत्र की तुलना में गर्म होती है। इसका परिणाम यह है कि सभी समुद्रों में जलधारा की सामान्य प्रवाह निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की तरफ होती है। गर्म जल सापेक्षिक रूप से उठे हुए होते हैं। इसी तरह ध्रुवोय क्षेत्रों में हिमानी के कारण और सूर्य के तापीय प्रभाव कम होने के कारण जल का तापमान कम हो जाता है। ऐसे जल उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर प्रवाहित होती है।

(4) समुद्री जल धाराओं के दिशाओं को प्रभावित करने वाले कारक

उच्चावच एवं तट की आकृति- समुद्री नितल का उच्चावच और तटीय आकृति समुद्री जलधाराओं की दिशा निर्धारण में मदद करते हैं। इसलिए इसे संशोधनात्मक कारक कहा जाता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण उत्तरी अटलांटिक महासागर में विषुवतीय गर्म जलधारा का मध्य अटलांटिक कटक के पास उत्पन्न प्रतिरोध के कारण उत्तर की तरफ मुड़ जाना है। इसी तरह सभी विषुवतीय जलधाराएं महाद्वीपों के पूर्वी तट से टकरा कर निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की तरफ चलने की प्रवृत्ति रखते हैं। इसी तरह छोटे द्वीपों के कारण जलधाराएं कई भागों में विभक्त होकर प्रवाहित होती है।

                                          पृथ्वी की घूर्णन गति से उत्पन्न कोरियोलिस बल या विक्षेप बल (Deflective Force) के कारण जलधाराएं उत्तरी गोलार्ध में दायीं ओर एवं दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मुड़ जाती है। पृथ्वी के पश्चिम से पूरब दिशा में घूर्णन के कारण धाराओं का मार्ग गोलाकार हो जाता है।  

मौसम परिवर्तन का प्रभाव:- जब सूर्य उत्तरायण होता है तो समुद्री धाराओं  का प्रवाह क्षेत्र थोड़ा सा उत्तर की ओर खिसक जाता है एवं दक्षिणायन होता है तो धारा क्षेत्र थोड़ा दक्षिण की ओर खिसक जाता है। मानसूनी पवनों की दिशा में परिवर्तन के कारण उत्तरी हिंद महासागर में धाराओं की दिशा में भी परिवर्तन हो जाता है।

                 इस प्रकार स्पष्ट है कि समुद्री जल धाराओं की उत्पत्ति में कई कारकों का प्रभाव होता है।


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10. OCEAN WAVE / समुद्री तरंग

10. OCEAN WAVE (समुद्री तरंग)

OCEAN WAVE


OCEAN WAVE (समुद्री तरंग)

          समुद्री जल में कई प्रकार की गतियाँ पायी जाती है। जैसे- ज्वार-भाटा, जलधारा, तरंग इत्यादि। रिचर्ड महोदय ने समुद्री तरंग को परिभाषित करते हुए कहा है कि “समुद्री लहर महासागर की तरल सतह का एक विक्षोभ गति है।” इसे दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि समुद्री जल का ऊपरी भाग किसी एक निश्चित बिंदु के इर्द-गिर्द दोलन करने वाली गति को तरंग कहते हैं। समुद्री लहरें व्यापक एवं सर्वत्र पायी जाने वाली गति है। लहरों की उत्पत्ति में वायु, ज्वार-भाटा तथा भूकंप का योगदान होता है। इन तीनों में सर्वाधिक योगदान वायु की होती है। वायु जब सागरीय जल के साथ घर्षण करते हुए आगे बढ़ती है तो सागरीय जल के ऊपरी भाग में एक दोलन गति उत्पन्न होती है। इस गति में जल का स्थानांतरण नहीं होता है बल्कि जल एक निश्चित बिंदु के आगे या पीछे ऊपर या नीचे दोलन करती है।

OCEAN WAVE

 

लहर की संरचना

          तरंग में जल के लगातार उठाव और गिराव का क्रम जारी रहता है। इसके उठाव वाले भाग को शिखर या शीर्ष कहते हैं। जबकि गिराव वाले भाग को गर्त कहते हैं। दो क्रमबद्ध शीर्ष या दो क्रमबद्व गर्त के बीच की दूरी को तरंग की लंबाई कहते हैं।

           गर्त बिंदु से शीर्ष बिंदु के बीच की लम्बवत ऊंचाई को तरंग की ऊंचाई कहते हैं। दो शीर्ष बिंदुओं को एक निश्चित बिंदु से गुजरने में जो समय लगता है उसे तरंग की अवधि कहते हैं। तरंग की वेग और उसकी अवधि वायु की गति पर निर्भर करती है। जैसे- खुले समुद्रों में निर्विध्न रुप से हवाएं चलती है वहां अधिक लंबी एक ऊंची लहरें उत्पन्न होती है। पवन का प्रभाव सागर के भीतर 100 वर्ग मीटर की गहराई तक पड़ता है।
         सागरीय तरंगे तट की ओर अग्रसर होती है। जैसे-जैसे लहरें तट के निकट आते जाती है वैसे-वैसे सागरों की गहराई में भी कमी आते जाती है। इसी कारण से छिछले समुद्र में तरंग का निचला भाग समुद्र नितल से रगड़ खाकर आगे बढ़ने लगता है। रगड़ के कारण तरंग के प्रवाह में रुकावट आती है जिसके कारण लहरों की ऊंचाई अधिक हो जाती है लेकिन तरंग की लंबाई कम हो जाती है। तरंग की शीर्ष की ऊंचाई अधिक हो जाने से वह टूटकर आगे गिरता है। तरंग की टूटी हुई जल की भाग को सर्फ या ब्रेकर या स्वाश कहा जाता है। इसमें जल पीछे की ओर गिरते हुए प्रतीत होता है। 
 चित्र  : समुद्र में उत्पन्न तरंग एवं सर्फ
 
         समुद्री तरंगों में उत्पन्न तरंग दो कारकों पर निर्भर करते हैं-
(i) जल की गहराई पर
(ii) तरंग की ऊंचाई पर
      टुक्कर नामक समुद्रीवेता ने तरंग की लंबाई ज्ञात करने के लिए एक सूत्र का प्रयोग किया। जैसे-
तरंग की लंबाई = तरंग के दो शीर्षों की लम्बाई ÷ उनकी अवधि
        इस सूत्र के आधार पर टुक्कर ने बताया कि यदि तरंग की लंबाई अधिक है और जल की गहराई कम है तो उसकी गति पर नियंत्रण जल की गहराई का होता है। यदि लहर की लंबाई कम है तो गति पर लहर की लंबाई का नियंत्रण होता है। खुले समुद्रों में लहरों की गति एवं आकार पर जल की गहराई और वायु के वेग पर निर्भर करती है। लेकिन तटवर्ती क्षेत्रों में तटीय आकृति का भी लहरों पर प्रभाव पड़ने लगता है।
तरंग की प्रकार
 
      दोलन के आधार पर सागरीय तरंग दो प्रकार के होते हैं:-
1. अनुप्रस्थ
2. अनुधैर्य
        अनुप्रस्थ तरंग की तुलना प्रकाश तरंग से और अनुदैर्ध्य तरंग की तुलना ध्वनि गति से की जा सकती है। अनुप्रस्थ तरंग में जल किसी निश्चित बिंदु के इर्द-गिर्द लंबवत रूप से ऊपर उठने एवं नीचे बैठने की प्रवृत्ति रखता है जबकि अनुदैर्ध्य तरंग में क्षैतिज रूप से जल दोलन करने की प्रवृत्ति रखता है। ब्यूफोर्ट महोदय ने कुछ विशिष्ट लहरों का विवरण प्रस्तुत किया है। जैसे- 
(1) स्वेल- स्वेल तरंग में तरंग का शीर्ष गोलाकार तथा गर्त ज्यावक्रीय होती है। इसमें जल की सतह हल्के उभार वाली होती है। 
(2) फेनिल तरंग (Surf)- ऐसे तरंगें छिछले सागरों में उत्पन्न होते है। छिछले सागर में तरंग की शीर्ष टूटकर सर्प का निर्माण होता है। 
(3) स्थानांतरण तरंग- स्थानांतरण तरंग में जल की वास्तविक गति और तरंग की गति एक ही दिशा में होती है। स्थानांतरण तरंग में जल की ऊपरी सतह से लेकर सागर की तली तक का समस्त जल एक ही दिशा में गतिशील होता है।
(4) दोलन करने वाली लहरें- जब किसी निश्चित बिंदु के इर्द-गिर्द तरंगों के शीर्ष एवं गर्त का निर्माण होता है तो उसे दोलन करने वाली लहरें कहते हैं।
(5) हानिकारक तरंग- इसे ब्यूफोर्ट महोदय ने पुनः दो भागों में बाँटा है:-
(i) सूनामी- सुनामी समुद्री क्षेत्रों में आने वाले भूकंप एवं ज्वालामुखी उद्गारों के कारण उत्पन्न होते हैं। सुनामी एक जापानी शब्द है जिसका तात्पर्य भूकंप से उत्पन्न समुद्री लहर है। सुनामी लहर के उत्पन्न में वायु का कोई योगदान नहीं होता। सुनामी सामान्य लहरों की तुलना में बड़ी एवं विनाशकारी होती है। भूकम्प आने के 12 मिनट बाद सुनामी लहरें आती है। समुद्र में जितने भूकंप के झटके आते हैं समुद्र में उतने ही सुनामी लहरें आती है। प्रशांत महासागर सुनामी तरंगों के लिए प्रसिद्ध है। फिलीपींस, जापान, हवाई द्वीप सुनामी तरंगों से अत्याधिक प्रभावित होते हैं। खुले समुद्रों में सुनामी तरंगे अधिक हानिकारक नहीं होती है। लेकिन तटीय क्षेत्रों में इनकी भयंकर परिणाम होते हैं। 1883 ई० में इंडोनेशिया के क्राकाडोवा द्वीप पर भयंकर ज्वालामुखी उद्गार से 360 मीटर ऊँची तरंगे उत्पन्न हुई थी जिसमें 36000 लोग मारे गए थे। 26 दिसंबर 2004 को सुमात्रा के दक्षिणी भाग में आए भूकंप के कारण उत्पन्न सुनामी लहरों के कारण लाखों लोग मारे गए।
(ii) तूफानी तरंग- जब हरिकेन जैसे चक्रवात उत्पन्न होते हैं तो तटीय भागों में ऊंची-ऊंची लहरें उठती है। इससे प्रायः तटीय भागों में जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।
समुद्री तरंग का महत्व
(1) समुद्री तरंगों के द्वारा तट का कटाव होता है। कटे-फटे तट जलयानों एवं बंदरगाहों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
(2) लहरों के द्वारा होने वाले कटाव के कारण कृषि योग्य भूमि इत्यादि विलीन हो जाते हैं।
(3) लहरों के कारण वायु और जल में मिश्रण का कार्य होता है जिससे समुद्री जीव ऑक्सीजन ग्रहण कर जीवित रहते हैं। 
(4) लहरों के कारण संचार व्यवस्था प्रभावित होती है।
(5) लहरों के कारण समुद्री तट पर कई प्रकार के निक्षेप एकत्रित हो जाते हैं।
(6) लहरी तरंग ऊर्जा के उत्पादन में सहायक होता है।
निष्कर्ष:- इस उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री लहर मानव जीवन को कई प्रकार से प्रभावित करते हैं।

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9. Oceanic Deposits / महासागरीय निक्षेप

Oceanic Deposits

(महासागरीय निक्षेप)  



Oceanic DepositsOceanic Deposits (महासागरीय निक्षेप)  

         समुद्र के तली पर मिलने वाले अनेक असंगठित पदार्थों के निक्षेप को समुद्री निक्षेप कहते है। इन निक्षेपों में अकार्बनिक एवं कार्बनिक दोनों प्रकार के पदार्थ शामिल होते है। समुद्री निक्षेप के विषय में अनेक अध्ययन समुद्रीवेताओं के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। समुद्री निक्षेप के सम्बन्ध में सर्वप्रथम जानकारी यूनानी भूगोलवेत्ता हेरोडोटस ने दिया था। उसके बाद 1773 ई० में कैप्टन किप्स, 1872 ई० में मर्रे और रेनार्ड ने समुद्री निक्षेप का मानचित्र प्रस्तुत किया। उसके बाद गरहार्ड स्कॉट महोदय ने विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया।

        इन विद्वानों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि समुद्री निक्षेप के कई स्रोत है। जैसे स्थलीय भाग, ज्वालामुखी उदगार से प्राप्त मलबा, वायुमंडल, ब्रह्मांड एवं समुद्र से मिलने वाले अनेक जीव जंतु। इन स्रोतों से प्राप्त होने वाले पदार्थों का निक्षेपण लाखों वर्षों से हो रहा है। इसकी मोटाई एक समान नहीं है। लेकिन कहीं-कहीं पर मोटाई 500 मीटर से अधिक पाई गई है। समुद्री निक्षेपों का वितरण कणों के आकार-प्रकार, समुद्री लवणता एवं समुद्री जल की गतियों पर निर्भर करता है। समुद्री निक्षेप के जमाव का दर बहुत ही मन्द है। इन निक्षेपों में स्थलीय निक्षेप की भाँति स्तर नहीं पाए जाते हैं। लेकिन यह स्पष्ट है कि समुद्र तल से ज्यों-ज्यों गहराई में जाते हैं, त्यों-त्यों समुद्री निक्षेप की गहनता में वृद्धि होती जाती है। इसी तरह तटीय क्षेत्र से गहन सागर क्षेत्रों की ओर जाने पर इनके वितरण प्रारूप में परिवर्तन होता जाता है।

समुद्री निक्षेप का वर्गीकरण

      समुद्री निक्षेपों का कई आधार पर एवं कई विद्वानों के द्वारा वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है। जैसे:-

(1) मरे के अनुसार-  मरे महोदय ने स्थिति के आधार पर समुद्री निक्षेप को दो भागों में बांटा है- 

(i) भूमिज निक्षेप

(ii) पेलाजिक निक्षेप

      मरे के अनुसार 100 फैदम या 200 मी० की गहराई तक भूमिज निक्षेप और उसके आगे पेलाजिक निक्षेप पाई जाती है।

(2) जेनकिंस के अनुसार- जेनकिंस ने समुद्र की गहराई को आधार मानते हुए समुद्री निक्षेप को तीन भागों में बांटा है:-

(i) तटीय निक्षेप- तटीय निक्षेप उच्च ज्वार और निम्न ज्वार के बीच में तटीय भागों में पाई जाती है। यह सामान्यतः 100 फैदम की गहराई तक पाए जाते हैं। इसमें मूलतः कंकड़, बालू, बजरी जैसे पदार्थों का निक्षेपण पाया जाता है।

(ii) छिछला सागर निक्षेप- यह 100 से 200 फैदम में समुद्री गहराई के बीच मिलते हैं।

(iii) गहन सागरीय निक्षेप- इसे जेनकिंस महोदय ने पेलाजिक निक्षेप से भी संबोधित किया है।

(3) जॉनसन के अनुसार- जॉनसन ने समुद्री निक्षेपों के प्रकृति को आधार मानते हुए समुद्री निक्षेप को तीन भागों में बांटा है :-

(i) छिछला सागरीय समुद्री निक्षेप- कुल समुद्री भूपटल के क्षेत्र का 9.1% भाग पर फैला है। 

(ii) भूमिज निक्षेप- इसका विस्तार 15.4% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

(iii) पेलाजिक निक्षेप- इसका विस्तार 75.5% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

(4) स्रोत के आधार पर समुद्री निक्षेप का वर्गीकरण

         यह किसी एक समुद्रीवेता के द्वारा  प्रस्तुत नहीं किया गया है। समुद्री निक्षेप का सबसे उपयुक्त एवं वैज्ञानिक विश्लेषण स्रोत के आधार पर ही किया जा सकता है। स्रोत के आधार पर किए गए वर्गीकरण से उसकी उत्पत्ति एवं प्रत्येक की विशेषता का भी विश्लेषण स्पष्ट हो जाता है। अतः स्रोत के आधार पर समुद्री निक्षेप को 6 भागों में बांटते हैं:-

(i) भूमिज निक्षेप (Terrigenous Deposits)

(ii) ज्वालामुखी निक्षेप (Volcanic Deposits)

(iii) अजैविक निक्षेप (Inorganic Deposits)

(iv) ब्रह्माण्डीय निक्षेप 

(v) जैविक निक्षेप (Organic Deposits)

(vi) लाल चिका 

(1) भूमिज निक्षेप (Terrigenous Deposits)- 

       समुद्र के तली पर निक्षेपित अधिकतर पदार्थ स्थलीय भागों से ही प्राप्त होते हैं। स्थलीय भागों के चट्टानें सतत ऋतुक्षरित होते रहती है। ऋतुक्षरण से प्राप्त मलबा को अपरदन के दूत समुद्र के नितल तक पहुंचाते रहते हैं। इनमें सबसे प्रमुख योगदान नदियों का है। भूमिज निक्षेप को उत्पत्ति, कणों की आकृति और रासायनिक संगठन के आधार पर कई भागों में बांटते हैं :-

(A) गोलाश्म और बजरी (Bolder and Gravel)

(B) रेत या बालू (Sand)

(C) गाद (Silt)

(D) मृतिका (Clay)

(E) पंक (Mud)

           गोलाश्म के टुकड़ों का व्यास न्यूनतम 256 mm होता है जबकि बजरी का व्यास 2 से 256 mm तक होता है। ये दोनों समुद्री तरंगों के द्वारा तटीय क्षेत्रों में सतत किए जा रहे अपरदन से प्राप्त होते हैं। इनका निक्षेपण प्राय: तटीय क्षेत्रों में देखने को मिलता है। 

          रेत या बालू के कणों का व्यास 1/8 से 2mm तक होता है। बालू की प्राप्ति स्थानीय चट्टानों के ऋतुक्षण एवं अपरदन से होता है। रेत के कण भी कई प्रकार के होते हैं। जैसे :- बहुत मोटी रेत, मोटी रेत, मध्यम बालू/ रेत, बारिक रेत और बहुत बारीक रेत।

           गाद, मृतिका और पंक के कणों के व्यास 1/8192mm से 1/8mm तक होता है। गाद पंक के चट्टानी कणों को जोड़ने का कार्य करता है। छिछली एवं शांत सागरों में मृतिका एवं पंक बारीक कण के रूप में पानी पर लटके रहते हैं।

        सबसे सूक्ष्म भूमिज निक्षेप में पंक या कीचड़ को शामिल किया जाता है। कीचड़ प्रायः 1000 फैदम गहराई के बाद ही पाये जाते हैं। मर्रे महोदय ने बताया कि ये कई रंग के होते है। रंग के आधार पर उन्होनें पंक या कीचड़ को तीन भागों में बांटा है- 

(i) नीला पंक (Blue Mud)

(ii) लाल पंक (Red Mud)

(iii) हरा पंक (Green Mud)

        नीला पंक उन चट्टानों के अवशेषों से बनती है जिसमें आयरन सल्फाइड एवं अन्य जैविक तत्व मौजूद रहते है। नीली पंक सभी महासागरों में मिलती है। इसका विस्तार लगभग 232 लाख वर्ग किमी में है।

         लाल पंक का निर्माण लौह ऑक्साइड वाले चट्टानों के ऋतुक्षरण से हुआ है। इसका सर्वाधिक विस्तार पीला सागर और अटलांटिक महासागर के ब्राजील के तट पर देखा जा सकता है।

       हरा पंक का निर्माण नीला पंक के रासायनिक परिवर्तन से होता है। इसमें हरा रंग Gluconites नामक खनिज के कारण होता है। हरा पंक उतरी अमेरिका के प्रशांत एवं अटलांटिक तट पर, ऑस्ट्रेलिया और जापान के तट पर तथा दक्षिण अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के तट पर पाये जाते हैं।

(2) ज्वालामुखी निक्षेप 

           ज्वालामुखी उदगार के कारण बड़े पैमाने पर मलबा का जमाव स्थलीय एवं सागरीय भूपटल पर होता रहता है। स्थलीय भाग पर होने वाला ज्वालामुखी उदगार से निकले मलबा, लावा धीरे-धीरे ठंडा होने की प्रवृति रखते है। जबकि सागरीय भूपटल पर होने वाला ज्वालामुखी उदगार से निकले लावा तेजी से ठंडा होता है। अतः इसके आधार पर ज्वालामुखी निक्षेप को दो भागों में बांटते हैं –

(i) समुद्री ज्वालामुखी निक्षेप

(ii) स्थलीय ज्वालामुखी निक्षेप

         स्थलीय ज्वालामुखी पदार्थ अपरदन के दूतों के द्वारा समुद्री भूपटल पर लाये जाते हैं जो भूमिज के निक्षेप के साथ मिश्रित हो जाते है जिसके कारण इन्हें अलग से पहचान करना संभव नहीं हो पाता है। जबकि समुद्री ज्वालामुखी से प्राप्त पदार्थ अपने मौलिक अवस्था में लंबे समय तक बने रहते हैं। अपरदन एवं ऋतुक्षरण के अभाव में इनका मौलिक गुण यथावत रहता है। 10 लाख वर्ग किमी० समुद्री भूपटल पर इनका निक्षेपण हुआ है। इसका प्रमाण महासागरीय कटक और ज्वालामुखी द्वीपों के सहारे मिलता है।

(3) अजैविक निक्षेप (Inorganic Deposits) 

      अजैविक समुद्री निक्षेप का मुख्य स्रोत वायुमण्डल है। जब जलवायु परिवर्तन होता है तो वैसी स्थिति में वायुमण्डल के ठोस कण सतह पर गिरने लगते है और रासायनिक प्रतिक्रिया कर ग्लूकोनाइट जैसे खनिज का निर्माण करते हैं। इसी तरह यदि वायुमण्डल से CO2 हटा दिया जाय तो डोलोमाइट, सिलिका और लौहे के कण सतह पर गिरकर विशिष्ट अजैविक समुद्री निक्षेप का निर्माण करते हैं। इनका निक्षेपण लगभग सभी सागरों में हुआ है। 

(4)  ब्रह्माण्डीय निक्षेप

          ब्रह्माण्डीय पिंडों से हमारी समुद्री सतह पर निक्षेपित होने वाली पदार्थों को ब्रह्माण्डीय निक्षेप कहते है। स्पष्ट है कि इसका स्रोत हमारी पृथ्वी या वायुमण्डल नहीं है बल्कि हमारे सौरमण्डल या अन्य खगोलीय पिंड इसके स्रोत है। इस प्रकार के निक्षेप सबसे अधिक प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर और हिन्द महासागर में हुआ है। प्रशांत महासागर के 0.25% क्षेत्रफल पर इसका विस्तार हुआ है। ब्रह्माण्डीय निक्षेप का रंग काला होता है तथा इसमें लोहे का अंश अधिक होता है।

(5) जैविक निक्षेप 

            समुद्री जल में अनेक प्रकार के जीव जंतु पाए जाते हैं। जब ये सागरीय जीव मरते हैं तो उन जीवों के हड्डियां, मांस एवं उनके शरीर में पाए जाने वाले खनिज पदार्थों इत्यादि का जमाव समुद्री नीतल पर होता रहता है। जैविक समुद्री निक्षेप गर्म सागरीय क्षेत्रों में अधिक पाए जाते हैं। गुणों के आधार पर जैविक निक्षेप को दो भागों में बांटते हैं –

(i) नेरेटिक जमाव/ तट तलवासी निक्षेप

(ii) पेलाजिक जमाव/अगाध सागरस्थ निक्षेप

           समुद्र में पाए जाने वाले जीव-जंतुओं की हड्डियों, मछलियों, प्रवाल, शीप, स्पंज इत्यादि के स्थिर पंजर वाले अवशेषों को नेरेटिक जमाव कहते हैं। नेरिटिक जमाव समुद्री तली में किसी विशिष्ट स्थान पर नहीं पाए जाते। लेकिन इन पर लगातार समुद्री लहरों एवं जल धाराओं के प्रहार के कारण महीन कण के रूप में टूटते रहते हैं। 

           पेलाजिक जमाव कीचड़ के समान होता है जिसे ऊज (Ooze) भी कहा जाता है। सूखने पर यह पाउडर के समान हो जाता है। इसका निर्माण विशिष्ट प्रकार के शैवाल, प्रोटोजोआ, डायटम जैसे जीवों के द्वारा होता है। ये प्रायः सागरीय क्षेत्रों में मिलते हैं। रसायनिक विशेषता के आधार पर इसे दो भागों में बांटते हैं –

(A) चुना प्रधान पेलाजिक- दो प्रकार के

(i) टेरोपॉड

(ii) ग्लोबीजेरिना

(B) सिलिका प्रधान पेलाजिक- दो प्रकार के

(i) रेडियोलेरियन पेलाजिक

(ii) डायटम पेलाजिक

       टेरोपॉड का विस्तार 0.4%, ग्लोबीजेरिना का विस्तार 29.2%, रेडियोलेरीयन का विस्तार 3.4% और डायटम का विस्तार 6.4% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

      टेरोपॉड चूनायुक्त पदार्थ है। इसका स्रोत चूना प्रधान वाले जीवों का शरीर होता है। इस निक्षेप का नाम भी टेरोपॉड नामक जीव के आधार पर किया गया है। यह प्रायः उष्ण एवं छिछले सागरों में पाया जाता है। यह 1600-3000 मीटर की गहराई में मिलते हैं। इसका सर्वाधिक विस्तार अटलांटिक महासागर में हुआ है।

        ग्लोबीजेरिना का रंग सफेद होता है। इसका प्रमुख स्रोत फेरामिनीफेरा नामक समुद्री जीव है। 3000 से 4000 मीटर की गहराई पर मिलते हैं। ठंडे सागरीय जल में कम और गर्म सागरीय जल में अधिक मिलते हैं।

          डायटम सिलिका प्रधान जैविक निक्षेप है। इसका रंग स्लेटी होता है। 1200 से 4000 मीटर की गहराई पर अधिक मिलते हैं। इसका प्रमुख स्रोत डायटम नामक जीव है। उच्च अक्षांशीय भागों के ठंडे सागरीय क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है। अंटार्कटिका के इर्द-गिर्द इसका निक्षेप सर्वाधिक हुआ है। 

       रेडियोलेरियन नामक समुद्री निक्षेप का मुख्य स्रोत रेडियोलेरियन नामक जीव है। जो उष्ण जल में मिलने वाला जीव है। 4000-10000 मीटर की गहराई तक इसका निक्षेपण हुआ है। प्रशांत महासागर में इसका विस्तार सबसे अधिक है।

(6) लाल चीका 

        यह मुख्यतः एलुमिनियम और ऑक्सीकृत लोहा के हाइड्रेट सिलिकेट से निर्मित होता है। प्राथमिक मान्यता यह रही है कि इसका निर्माण विभिन्न प्रकार के समुद्री निक्षेपों से प्राप्त होने वाले खनिजों के टूटने से बनता है। लेकिन नवीन मान्यता वाईविल थॉमसन ने विकसित करते हुए कहा है कि यह भी एक प्रकार का जैविक निक्षेप ही है जिसका निर्माण चूना प्रधान वाले जीवों के विघटन से होता है। लाल चिका चूना प्रधान वाले जीवों में मिलने वाला ऐसा खनिज है जिसका विलियन संभव नहीं हो सका है। लाल चिका का निक्षेपण तीनों महासागरों में हुआ है। 

          इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि स्रोत के आधार पर किया गया वर्गीकरण को सबसे अधिक मान्यता प्राप्त है। समुद्री निक्षेपों के वितरण को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।



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