PG Regular Semester-I Examination 2025 QUESTION PAPER PPU, PATNA

PG Regular Semester-I Examination 2025

Patliputra University, Patna



PG Regular Semester-I Examination 2025

PG (Regular) (Sem.-I)

Examination, 2025

(Session: 2025-27)

GEOGRAPHY

Paper Code: 920701

(Geomorphology)

Time: Three Hours] [Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all sections as directed.

परीक्षार्थी यथासम्भव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question. [10-2-20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए।

1. (i) The inability of S-waves to propagate through which part of the Earth provides evidence of its liquid state?

(a) Crust

(b) Mantle

(c) Outer core

(d) Inner core

पृथ्वी के किस भाग के माध्यम से S-तरंगों के संचरण में असमर्थता उसके द्रव अवस्था का प्रमाण देती है?

(a) भू-पर्पटी

(b) मेंटल

(c) बाहरी कोर

(d) भीतरी कोर

(ii) The discovery of symmetrical patterns of magnetic stripes on either side of mid-ocean ridges provides evidence for:

(a) Plate destruction

(b) Sea-floor spreading

(c) Plate collision

(d) Continental drift only

मध्य-महासागरीय पर्वत श्रृंखलाओं के दोनों ओर चुंबकीय धारियों के सममित पैटर्न की खोज किस बात का प्रमाण है?

(a) प्लेट विनाश

(b) समुद्री तल प्रसारण

(c) प्लेट टकराव

(d) केवल महाद्वीपीय विस्थापन

(iii) Which phrase is associated with the Huttonian principle and emphasizes the continuity of geological processes over time?

(a) “Catastrophes shape the Earth”

(b) “The Earth is millions of years old”

(c) “The present is the key to the past”

(d) “Mountains rise and fall quickly”

हटनियन सिद्धान्त से सम्बन्धित कौन-सा वाक्य भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के समय के साथ निरंतरता की प्रमुखता दर्शाता है?

(a) “आपदाएँ पृथ्वी को आकार देती हैं”

(b) “पृथ्वी लाखों साल पुरानी है”

(c) “वर्तमान ही अतीत की कुंजी है”

(d) “पहाड़ जल्दी उठते और गिरते हैं”

(iv) In a rejuvenated landscape, which of the following is most likely to occur?

(a) Formation of new volcanoes

(b) Increased erosion and deepening of valleys

(c) The development of large flat plains

(d) The formation of glacial features

एक नवोन्मेष स्थलाकृति में, निम्नलिखित में से क्या होने की सबसे अधिक संभावना है?

(a) नए ज्वालामुखियों का निर्माण

(b) घाटियों का अपरदन और गहरा होना

(c) बड़े समतल मैदानों का विकास

(d) हिमनद विशेषताओं का निर्माण

(v) Which of the following is not a typical feature of Karst landscapes?

(a) Stalagmite

(b) Sinkholes

(c) Glacial moraines

(d) Limestone pavements

निम्नलिखित में से कौन-सा कार्स्ट भूआकृतिकी की एक सामान्य विशेषता नहीं है?

(a) स्टैलेग्माइट

(b) सिंकहोल

(c) हिमनदीय हिमोढ़

(d) चूना पत्थर की पट्टी

(vi) Which of the following is not a depositional landform created by glaciers?

(a) Moraine

(b) Drumlin

(c) Cirque

(d) Kettle lake

निम्नलिखित में से कौन-सा ग्लेशियर द्वारा निर्मित एक निक्षेपात्मक स्थलाकृति नहीं है?

(a) हिमोढ़

(b) ड्रमलिन

(c) सर्क

(d) केटल लेक

(vii) Which period is mainly responsible for the tectonic uplift of the Shillong Plateau?

(a) Pre-Cambrian

(b) Tertiary

(c) Quaternary

(d) Paleozoic

शिलांग पठार के विवर्तनिक उत्थान के लिए मुख्य रूप से कौन-सा भूगर्भीय काल जिम्मेदार है?

(a) प्री-कैम्ब्रियन

(b) टर्शियरी

(c) क्वाटरनरी

(d) पैलियोजोइक
(viii) If a river has a Sinuosity Index close to 1, it means the river is:

(a) Highly meandering

(b) Braided

(c) Almost straight

(d) Incised

यदि किसी नदी का वक्रता सूचकांक 1 के करीब होता है, तो इसका अर्थ है कि नदी:

(a) अत्यधिक घुमावदार है

(b) शाखित है

(c) लगभग सीधी है

(d) कटावदार है

(ix) Incised meanders are a result of:

(a) River deposition

(b) River rejuvenation and vertical erosion

(c) Lateral erosion

(d) Volcanic activity

अन्तःकर्तित विसर्प किसके परिणामस्वरूप बनते हैं?

(a) नदी द्वारा निक्षेपण

(b) नदी-पुनर्युवन और ऊर्ध्वाधर अपरदन के कारण

(c) पार्श्व अपरदन

(d) ज्वालामुखी गतिविधि

(x) Which of the following is a typical periglacial landform?

(a) Cirque

(b) Pingo

(c) Drumlin

(d) Moraine

निम्नलिखित में से कौन-सा एक विशिष्ट पेरिग्लैसियल स्थलाकृति है?

(a) सर्क

(b) पिंगो

(c) ड्रमलिन

(d) मोरेन

Section-B / खण्ड-व

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

2. Describe in brief about the continental drift theory.

महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त के बारे में संक्षेप में वर्णन कीजिए।

3. Describe in brief about the factors responsible for river rejuvenation.

नदी नवोन्मेष के लिए उत्तरदायी कारकों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

4. Discuss in brief the formation of ‘Sand dunes’ in Arid regions.

शुष्क क्षेत्रों में बालू के स्तूपों के निर्माण पर संक्षेप में चर्चा कीजिए।

5. Discuss on the geomorphic evolution of the Chota Nagpur Highlands.

छोटो नागपुर पठार के भूआकृतिक विकास पर चर्चा कीजिए।

6. Write about the application of Geomorphology in Engineering projects.

इंजीनियरिंग परियोजनाओं में भू-आकृतिक विज्ञान के अनुप्रयोग के बारे में लिखिए।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following: [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

7. Explain the concept of Sea-floor spreading, the evidence supporting it and its significance in the theory of plate tectonics.

सागर नितल प्रसारण की अवधारणा, इसके समर्थन में प्रमाण, और प्लेट टेक्टोनिक्स के सिद्धान्त में इसका महत्व समझाइए।

8 Explain the concept of William Morris Davis’ cycle of Erosion, describing the different stages of geomorphic evolution.

विलियम मॉरिस डेविस की ‘अपरदन चक्र’ अवधारणा को समझाइए, जिसमें भू-आकृतियों के विकास के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।

Describe the major erosional and depositional landforms created by glaciers. Explain the processes responsible for their formation.

हिमनद द्वारा निर्मित प्रमुख अपरदनात्मक और निक्षेपणानात्मक भू-आकृतियों का वर्णन कीजिए। उनके निर्माण के लिए जिम्मेदार प्रक्रियाओं को समझाइए।

10. Explain and compare the models of slope development proposed by Walther Penck and L.C. King.

वाल्थर पेंक और एल.सी. किंग द्वारा प्रस्तावित ढलान विकास के मॉडलों की व्याख्या कीजिए और उनकी तुलना कीजिए।

11. Explain the concepts of drainage morphometry, stream order, and drainage density. Discuss their significance in understanding the characteristics of a drainage basin.

अपवाह आकारमिति, धारा क्रम और अपवाह घनत्व की अवधारणाओं की व्याख्या कीजिए। किसी अपवाह बेसिन की विशेषताओं को समझने में उनके महत्व पर चर्चा कीजिए।



PG (Regular) (Sem.-I)

Examination, 2025

(Session: 2025-27)

GEOGRAPHY

Paper Code: 920702

(Climatology & Oceanography)

Time: Three Hours] [Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all sections as directed.

परीक्षार्थी यथासम्भव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question : [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए:

1. (i) Which of the following pair of gases account for 99% of gaseous composition of the atmosphere till a height of 25 km?

(a) Nitrogen and Oxygen

(b) Oxygen and Argon

(c) Nitrogen and Carbon dioxide

(d) Carbon dioxide and Oxygen

निम्नलिखित में से कौन-सी गैस जोड़ी 25 किमी. की ऊँचाई तक वायुमंडल की गैसीय संरचना का 99% हिस्सा बनाती है?

(a) नाइट्रोजन और ऑक्सीजन

(b) ऑक्सीजन और आर्गन

(c) नाइट्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड

(d) कार्बन डाइऑक्साइड और ऑक्सीजन

(ii) The balance between the amount of insolation received from the Sun and the outgoing terrestrial radiation is known as the Earth’s:

(a) Precipitation Budget

(b) Heat Budget

(c) Radiation Budget

(d) All of the above

सूर्य से प्राप्त सूर्यातप की मात्रा और बाहर जाने वाले स्थलीय विकिरण के बीच के संतुलन को पृथ्वी के के रूप में जाना जाता है।

(a) वर्षण बजट

(b) ताप बजट

(c) विकिरण बजट

(d) उपरोक्त सभी

(iii) A large body of air whose physical properties especially temperature and moisture content are relatively uniform horizontally is known as:

(a) Front

(b) Cyclone

(c) Anti-cyclone

(d) Air mass

वायु का एक बड़ा पिंड जिसके भौतिक गुण विशेष रूप से तापमान और नमी की मात्रा क्षैतिज रूप से एक समान होती है के रूप में जाना जाता है।

(a) वाताग्र

(b) चक्रवात

(c) प्रतिचक्रवात

(d) वायु राशि

(iv) Anticyclones are usually associated with which type of weather?

(a) Stormy and wet

(b) Hot and humid

(c) Calm clear and dry

(d) Cold and snowy

प्रतिचक्रवात आमतौर पर किस प्रकार के मौसम से जुड़े होते हैं?

(a) तूफानी और गीला

(b) गर्म और आर्द्र

(c) शांत, साफ और शुष्क

(d) ठंडा और बर्फीला

(v) The carbon dioxide theory of climatic change was advanced by:

(a) T.C. Chamberlin

(b) Arthur Holmes

(c) Solberg

(d) Kennelly

जलवायु परिवर्तन का कार्बन डाइऑक्साइड सिद्धान्त किसके द्वारा दिया गया था?

(a) टी.सी. चैंबरलिन

(b) आर्थर होम्स

(c) सोलबर्ग

(d) केनेली

(vi) What happens to Indian monsoon in an el-nino year?

(a) Monsoon remains unaffected

(b) Monsoon becomes weak

(c) Monsoon becomes strong

(d) All of the above

अल-नीनो वर्ष में भारतीय मानसून का क्या होता है?

(a) मानसून अप्रभावित रहता है

(b) मानसून कमजोर हो जाता है

(c) मानसून मजबूत हो जाता है

(d) उपरोक्त सभी

(vii) Which of the following deposits is formed by the decomposition of rocks containing iron oxide?

(a) Blue mud

(b) Red mud

(c) Green mud

(d) Yellow mud

निम्नलिखित में से कौन-सा निक्षेप आयरन ऑक्साइड युक्त चट्टानों के अपघटन से बनता है?

(a) नीला पंक

(b) लाल पंक

(c) हरा पंक

(d) पीला पंक

(viii) A horse-shoe shaped coral reef is known as:

(a) Fringing reef

(b) Barrier reef

(c) Atoll

(d) Boat channel

घोड़े की नाल के आकार की प्रवाल भित्ति को के रूप में जाना जाता है।

(a) तटीय भित्ति

(b) अवरोधक भित्ति

(c) एटॉल

(d) नाव चैनल

(ix) Which of the following theories regarding the origin of submarine canyons is propounded by Shepard?

(a) Sub-aerial erosion and submergence theory

(b) Diastrophic theory

(c) Submarine density current theory

(d) Submarine spring sapping theory

शेपर्ड द्वारा अधो सागरीय कंदरा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है?

(a) भू-पृष्ठीय अपरदन और निमज्जन का सिद्धान्त

(b) पटल विरूपण सिद्धान्त

(c) अंतः समुद्री घनत्व धारा का सिद्धान्त

(d) अन्तः समुद्री जल स्रोत अधः खनन का सिद्धान्त

(x) Flat topped sea mounts found on the ocean floor are known as:

(a) Volcanic island

(b) Guyot

(c) Ridge

(d) None of the above

समुद्र तल पर पाए जाने वाले सपाट शीर्ष वाले समुद्री के रूप में जाना जाता है। पर्वतों को

(a) ज्वालामुखी द्वीप

(b) गायोट

(c) कटक

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

Section-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5-20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

2. What is the relationship of climatology with Physics and Oceanography?

जलवायु विज्ञान का भौतिकी और समुद्र विज्ञान से क्या सम्बन्ध है?

3. What is Front? Discuss the different types of fronts in brief.

वाताग्र क्या है? विभिन्न प्रकार के वाताग्रों की संक्षेप में चर्चा कीजिए।

4. Write a note on the Milankovitch theory of climate change.

जलवायु परिवर्तन के मिलनकोविच सिद्धान्त पर एक टिप्पणी लिखिए।

5. The major fishing grounds in the world are located over the continental shelves. Give reason why?

विश्व के प्रमुख मछली पकड़ने के क्षेत्र महाद्वीपीय शेल्फ पर स्थित हैं। कारण बताइए क्यों?
6. Write a short note on the Equilibrium theory given regarding the origin of tides.

ज्वार-भाटा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में दिए गए संतुलन सिद्धान्त पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following: [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

7. Describe the thermal structure of the atmosphere.

वायुमंडल की तापीय संरचना का वर्णन कीजिए।

8. Discuss the origin, mechanism and characteristics of a tropical cyclone.

उष्णकटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति, क्रियाविधि और विशेषताओं की चर्चा कीजिए।

9. Discuss the consequences of climate change.

जलवायु परिवर्तन के परिणामों की चर्चा कीजिए।
10. Describe the bottom relief of Atlantic ocean. अटलांटिक महासागर के भूतल के उच्चावच का वर्णन कीजिए।

11. Critically examine the land subsidence theory regarding the origin of coral reefs.

प्रवाल भित्तियों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में दिए गए भू-अवतलन सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।



PG (Regular) (Sem.-I)

Examination, 2025

(Session: 2025-27)

GEOGRAPHY

Paper Code: 920703

(History of Geographical Thought)

Time: Three Hours] [Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figure in the margin indicate full marks. Answer from all sections as directed.

परीक्षार्थी यथासम्भव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Multiple Choice Questions)

(बहुविकल्पीय प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question: [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए:

1. (i) In what way is geography distinct from other social sciences like economics or political science?

(a) It uses empirical methods more rigorously

(b) It exclusively studies human behaviour

(c) It emphasizes the role of space and place in shaping phenomena

(d) It disregards temporal change

भूगोल अर्थशास्त्र या राजनीति विज्ञान जैसे अन्य सामाजिक विज्ञानों के किस तरह अलग है?

(a) यह अनुभवजन्य विधियों का अधिक कठोरता से उपयोग करता है

(b) यह विशेष रूप से मानव व्यवहार का अध्ययन करता है

(c) यह घटनाओं को आकार देने में स्थान और जगह की भूमिका पर जोर देता है

(d) यह कालिक परिवर्तन की उपेक्षा करता है

(ii) Who among the following ancient Indian scholars is considered to have contributed significantly to cartographic and astronomical geography?

(a) Kalidas

(b) Aryabhatta

(c) Panini

(d) Charaka

निम्नलिखित प्राचीन विद्वानों में से किसको कार्टोग्राफिक और खगोलीय भूगोल में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला माना जाता है?

(a) कालिदास

(b) आर्यभट्ट

(c) पाणिनी

(d) चरक

(iii) Postmodern conceptions of space tend to focus on:

(a) Quantitative measurement and mapping

(b) Determinism and environmental control

(c) Fragmented, subjective and culturally constructed spaces

(d) Uniform space with universal laws

अंतरिक्ष की उत्तर आधुनिक अवधारणाएँ निम्नलिखित पर ध्यान केंद्रित करती हैं:

(a) मात्रात्मक माप और मानचित्रण

(b) स्थानिक नियतिवाद और पर्यावरण नियंत्रण

(c) खंडित, व्यक्तिपरक और सांस्कृतिक रूप से निर्मित स्थान

(d) सार्वभौमिक नियमों के साथ एक समान स्थान

(iv) Which post-independence geographer is noted for his contributions to regional planning and quantitative techniques in Indian Geography?

(a) Gopal Krishna

(b) R.L. Singh

(c) Majid Hussain

(d) O.H.K. Spate

स्वतंत्रता के बाद का कौन-सा भूगोलवेत्ता भारतीय भूगोल में प्रादेशिक नियोजन और मात्रात्मक तकनीकों में अपने योगदान के लिए जाना जाता है?

(a) गोपाल कृष्ण

(b) आर.एल. सिंह

(c) मजीद हुसैन

(d) ओ.एच.के. स्पेट
(v) The main criticism of quantitative geography from humanistic geographers is that it:

(a) Ignores environmental data

(b) Lacks visual presentation

(c) Uses outdated maps

(d) Neglects human experience and subjectivity

मानवतावादी भूगोलवेत्ताओं द्वारा मात्रात्मक भूगोल की मुख्य आलोचना यह है कि यह:

(a) पर्यावरणीय डेटा की उपेक्षा करता है

(b) दृश्य प्रस्तुति का अभाव है

(c) पुराने मानचित्रों का उपयोग करता है

(d) मानवीय अनुभव और व्यक्तिपरकता की उपेक्षा करता है

(vi) Which of the following models is used for explaining agricultural location patterns in relation to market and transport cost?

(a) Von Thunen Model

(b) Central Place Model

(c) Bid Rent Theory

(d) Gravity Model

बाजार और परिवहन लागत के सम्बन्ध में कृषि स्थान पैटर्न को समझाने के लिए निम्नलिखित में से किस मॉडल का उपयोग किया जाता है?

(a) वॉन थुनेन मॉडल

(b) केंद्रीय स्थान मॉडल

(c) बोली किराया सिद्धान्त

(d) गुरुत्वाकर्षण मॉडल

(vii) What is the primary aim of applied geography?

(a) Theoretical abstraction of space

(b) Study of historical processes

(c) Solving real-world problems through geographical knowledge

(d) Creating aesthetic maps

अनुप्रयुक्त भूगोल का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?

(a) स्थान का सैद्धान्तिक अमूर्तन

(b) ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का अध्ययन

(c) भौगोलिक ज्ञान के माध्यम से वास्तविक दुनिया की समस्याओं का समाधान

(d) सौंदर्य मानचित्र बनाना
viii) David Harvey’s book Social Justice and the City (1973) is significant because it:

(a) Critiques urban capitalism and advocates for a Marxist geography

(b) Introduces geospatial technology

(c) Advocates for environmental planning

(d) Explores rural settlement patterns

डेविड हार्वे की पुस्तक सोशल जस्टिस एंड द सिटी (1973) महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह:

(a) नगरीय पूँजीवाद की आलोचना करती है और मार्क्सवादी भूगोल की वकालत करती है

(b) भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी का परिचय देती है

(c) पर्यावरण नियोजन की वकालत करती है

(d) ग्रामीण बस्तियों के पैटर्न की खोज करती है

(ix) The concept of the personal is political in feminist geography suggests that:

(a) Women’s personal lives should be kept separate from political movements

(b) Gender differences are primarily biological

(c) Geography should only focus on public policies

(d) Personal experiences of oppression are inherently linked to wider social structures

नारीवादी भूगोल में व्यक्तिगत राजनीतिक है की अवधारणा यह सुझाव देती है कि:

(a) महिलाओं के व्यक्तिगत जीवन को राजनीतिक आंदोलनों से अलग रखा जाना चाहिए

(b) लिंग भेद मुख्य रूप से जैविक है

(c) भूगोल को केवल सार्वजनिक नीतियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए

(d) उत्पीड़न के व्यक्तिगत अनुभव स्वाभाविक रूप से व्यापक सामाजिक संरचनाओं से जुड़े होते हैं

(x) Social Justice and the City is a key book by which postmodern geographer?

(a) Edward Soja

(b) David Harvey

(c) Doreen Massey

(d) Henry Lefebvre

सोशल जस्टिस एंड द सिटी किस उत्तर आधुनिक भूगोलवेत्ता की एक प्रमुख पुस्तक है?

(a) एडवर्ड सोजा

(b) डेविड हार्वे

(c) डोरेन मैसी

(d) हेनरी लेफेब्रे

Section-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

2. Briefly discuss the contributions of Ptolemy in the evolution of geographical knowledge.

भौगोलिक ज्ञान के विकास में टॉलेमी के योगदान पर संक्षेप में चर्चा कीजिए।

3. Explain the difference between absolute and relative space with examples.

निरपेक्ष और सापेक्ष स्थान के बीच अन्तर को उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए।

4. Name any two paradigms in geography and briefly describe them.

भूगोल में किन्हीं दो प्रतिमानों के नाम बताइए और उनका संक्षेप में वर्णन कीजिए।

5. How does humanistic geography differ from quantitative geography?

मानवतावादी भूगोल मात्रात्मक भूगोल से किस प्रकार भिन्न है?
6. Discuss the key types of feminism in the light of their views on women’s rights and social change.

महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक परिवर्तन पर उनके विचारों के आलोक में नारीवाद के प्रमुख प्रकारों पर चर्चा कीजिए।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following: [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

7. Discuss the development of Geographical ideas in ancient India with reference to religious texts, literature and scientific contributions.

धार्मिक ग्रंथों, साहित्य और वैज्ञानिक योगदान के संदर्भ में प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों के विकास पर चर्चा कीजिए।

8. Discuss the major challenges in the growth of geography in India. Suggest solutions.

भारत में भूगोल के विकास में प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। समाधान सुझाइए।
9. Define geographical models. Discuss the various types of models used in geography.

भौगोलिक मॉडल को परिभाषित कीजिए। भूगोल में उपयोग किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के मॉडलों पर चर्चा कीजिए।

10. Discuss the evolution of applied geography, highlighting its role in the development of geographical ideas.

भौगोलिक विचारों के विकास में इसकी भूमिका पर प्रकाश डालते हुए अनुप्रयुक्त भूगोल के विकास पर चर्चा कीजिए।

11. Define Postmodernism in Geography. How does it differ from modernist approaches in geographical thought?

भूगोल में उत्तर आधुनिकतावाद को परिभाषित कीजिए। यह भौगोलिक विचार में आधुनिकतावादी दृष्टिकोणों से किस प्रकार भिन्न है?



PG (Regular) (Sem.-I)

Examination, 2025

(Session: 2025-27)

(COMMON FOR ARTS)

AECC-1

Paper Code: 940191(Arts)

(Environmental Sustainability &

Swachchha Bharat Abhiyan Activities)

Time: Two Hours] [Maximum Marks: 50

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer the questions from all the sections as directed.

परीक्षार्थी यथासंभव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

1. Choose the correct option from each question : [10×1=10]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए :

(i) What is the study of the relationship between living organisms and their environment called?

(a) Biology

(b) Ecology

(c) Geology

(d) Physics

पर्यावरण और जीवों के बीच सम्बन्धों के अध्ययन को क्या कहा जाता है?

(a) जीवविज्ञान

(b) पारिस्थितिकी

(c) भूविज्ञान

(d) भौतिकी

(ii) Which of the following is a renewable resource?

(a) Coal

(b) Petroleum

(c) Solar Energy

(d) Natural Gas

निम्नलिखित में से कौन-सा नवीकरणीय संसाधन है?

(a) कोयला

(b) पेट्रोलियम

(c) सौर ऊर्जा

(d) प्राकृतिक गैस

(iii) When was the Swachh Bharat Abhiyan officially launched?

(a) 2nd October, 2012

(b) 15th August, 2014

(c) 2nd October, 2014

(d) 26th January, 2015

स्वच्छ भारत अभियान को आधिकारिक रूप से कब शुरू किया गया था?

(a) 2 अक्टूबर, 2012

(b) 15 अगस्त, 2014

(c) 2 अक्टूबर, 2014

(d) 26 जनवरी, 2015

(iv) What is the best way to manage biodegradable waste at the household level?

(a) Burn it in the backyard

(b) Dump it in the street

(c) Compost it

(d) Mix it with plastic waste

घरेलू स्तर पर जैव-अपघट्य कचरे को प्रबंधित करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?

(a) उसे आँगन में जलाना

(b) सड़क पर फेंकना

(c) कंपोस्ट बनाना

(d) प्लास्टिक कचरे के साथ मिलाना

(v) Which of the following is a key component of Swachh Bharat Abhiyan (Urban)?

(a) Construction of flyovers

(b) Smart classrooms

(c) Solid waste management

(d) Rural electrification

स्वच्छ भारत अभियान (शहरी) का एक प्रमुख घटक कौन-सा है?

(a) फ्लाईओवर का निर्माण

(b) स्मार्ट कक्षाएँ

(c) ठोस अपशिष्ट प्रबंधन

(d) ग्रामीण विद्युतीकरण

(vi) Which of the following is a type of ecosystem?

(a) Desert

(b) School

(c Hospital

(d) Market

निम्नलिखित में से कौन पारिस्थितिकी तंत्र का एक प्रकार है?

(a) रेगिस्तान

(b) स्कूल

(c) अस्पताल

(d) बाजार

(vii) Which ministry is responsible for implementing the Swachh Bharat Abhiyan?

(a) Ministry of Environment, Forest and Climate Change

(b) Ministry of Health and Family Welfare

(c) Ministry of Jal Shakti

(d) Ministry of Housing and Urban Affairs

स्वच्छ भारत अभियान को लागू करने की जिम्मेदारी किस मंत्रालय की है?

(a) पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय

(b) स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय

(c) जल शक्ति मंत्रालय

(d) आवास और शहरी कार्य मंत्रालय

(viii) What does “Reduce, Reuse, Recycle” primarily aim to minimize?

(a) Water consumption

(b) Air pollution

(c) Land acquisition

(d) Waste generation

“घटाओ, पुनः उपयोग करो, पुनः चक्रित करो” का मुख्य उद्देश्य क्या है?

(a) जल की खपत

(b) वायु प्रदूषण

(c) भूमि अधिग्रहण

(d) अपशिष्ट उत्पादन

(ix) Which of the following can be considered a sustainable practice?

(a) Excessive groundwater extraction

(b) Use of single-use plastics

(c) Solar energy utilization

(d) Deforestation

निम्नलिखित में से कौन-सा एक स्थायी अभ्यास माना जा सकता है?

(a) अत्यधिक भूजल दोहन

(b) सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग

(c) सौर ऊर्जा का उपयोग

(d) वनों की कटाई

(x) Which community is known for protecting the Khejari trees in Rajasthan?

(a) Bishnoi

(b) Bhil

(c) Gond

(d) Santhal

राजस्थान में खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए कौन-सा समुदाय प्रसिद्ध है?

(a) बिश्नोई

(b) भील

(c) गोंड

(d) संथाल

Section-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions from the following. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. What are the key objectives of the Swachh Bharat Abhiyan?

स्वच्छ भारत अभियान के प्रमुख उद्देश्य क्या हैं?

3. Explain the importance of waste segregation at the source in promoting environmental sustainability.

पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देने में स्रोत पर कचरे के पृथक्करण का महत्त्व समझाइए।

4. What is Biodiversity?

जैवविविधता क्या है?

5. Write two causes of air pollution.

वायु प्रदूषण के दो कारण लिखिए।

6. Write the name of two environmental protection policies in India.

भारत में पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित दो नीतियों के नाम लिखिए।

7. Explain the role of human communities in environmental conservation.

पर्यावरण संरक्षण में मानव समुदायों की भूमिका समझाइए।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any two questions from the following. [2×10=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Explain the relationship between environmental sustainability and responsible consumption. How can responsible consumer behaviour contribute to a cleaner and greener future?

पर्यावरणीय स्थिरता और जिम्मेदार उपभोग के बीच सम्बन्ध को समझाइए। एक जिम्मेदार उपभोक्ता का व्यवहार किस प्रकार स्वच्छ और हरित भविष्य में योगदान कर सकता है?

9. Describe the major threats to biodiversity and suggest conservation measures.

जैव विविधता के प्रमुख खतरों का वर्णन कीजिए और संरक्षण उपाय सुझाइए।

10. What are the causes, effects and control measures of environmental pollution?

पर्यावरण प्रदूषण के कारण, प्रभाव और नियंत्रण उपायों को समझाइए।

11. Analyse the relationship between human activities and environmental degradation. Suggest ways to promote sustainable practices.

मानव गतिविधियों और पर्यावरणीय क्षरण के बीच सम्बन्ध का विश्लेषण कीजिए। सतत् प्रथाओं को बढ़ावा देने के उपाय सुझाइए।

14. Correlation analysis (सहसंबंध विश्लेषण)

Correlation analysis

(सहसंबंध विश्लेषण)




⇒ Correlation analysis deals with the association between two or more Variables.

⇒ The degree of relationship between the Variables Under consideration is measured through the correlation analysis.

⇒ The measure of correlation called the “Correlation coefficient or correlation index” Summarizes in Figure the direction & degree one of correlation.

Example1

x⇑ y⇑
10 15
12 20
15 22
18 25
20 37
25 43

👉  ऊपर दिए गए आँकड़ों में x और y के मानों को देखने पर स्पष्ट होता है कि जैसे-जैसे x का मान बढ़ता है, वैसे-वैसे y का मान भी बढ़ रहा है।

👉  अर्थात्, x में वृद्धि होने पर y में भी वृद्धि की प्रवृत्ति दिखाई देती है, जिससे दोनों चर आपस में सकारात्मक रूप से संबंधित हैं।

👉 यहाँ x और y के बीच धनात्मक (Positive) सहसंबंध है।

Example2

x⇑ y⇓
20 40
30 30
40 22
50 15
60 10
80 4

👉  दिए गए आँकड़ों में जैसे-जैसे x का मान बढ़ता है, वैसे-वैसे y का मान घटता जाता है

👉  अतः x और y के बीच नकारात्मक (ऋणात्मक) सहसंबंध पाया जाता है।

👉  चूँकि परिवर्तन नियमित और स्पष्ट है, इसलिए यह प्रबल नकारात्मक सहसंबंध (Strong Negative Correlation) को दर्शाता है।

Type of Correlation

1. Positive Correlation (Direct Correlation):-

   If both the Variable in Same direction. x⇑, y⇑ or x⇓, y⇓ e.g., Height & Weight, Rainfall & Yeild

2. Negative Correlation (Inverse Correlation):-

    If both the variables Varies in opposite direction. x⇑, y⇓ or x⇓, y⇑ e.g., Price & Demand

3. Zero Correlation (No Correlation):-

      When there is no relationship between variables. or When one variable changes, the other variable does not change in any consistent way. x⇑⇓, y or x, y⇑⇓ e.g., Shoe size & intelligence

Correlation Coefficient (r)

     The correlation coefficient is a statistical measure that shows the strength and direction of the relationship between two variables. Its value ranges from −1 to +1, where positive values indicate direct correlation, negative values indicate inverse correlation, and zero indicates no relationship.

r = +1 ⇒ Perfect Positive Correlation,

r = -1 ⇒ Perfect Negative Correlation,

r = 0 ⇒ No Relation,

r = 0.8, 0.9, 0.95 अर्थात जब r का Value 1 के करीब आता है तो उसे Strong +ve Correlation कहा जाता है।

r = -0.85, -0.9, -0.95 अर्थात जब r का Value लगभग -1 के करीब आता है तो उसे Strong Negative Correlation कहा जाता है।

Method of Finding Correlation Coefficient (r)

          The correlation coefficient (r) is found using several methods. The Karl Pearson’s method is the most common, where r is calculated by dividing the covariance of two variables by the product of their standard deviations.

     The Spearman’s rank correlation method is used when data are ranked or not normally distributed.

    Another method is the concurrent deviations method, suitable for time-series data showing direction of change.

             Scatter diagram method finds correlation coefficient (r) by plotting paired data points, observing pattern direction, and estimating strength visually.

   These methods help measure the degree and direction of relationship between variables, with values of r ranging from –1 to +1.

1. Karl Pearson’s method

2. Spearman’s rank correlation method

3. Concurrent deviations method

4. Scatter diagram method

1. Karl Pearson’s Product Moment Method

      Karl Pearson’s Product Moment Method measures the degree and direction of linear relationship between two quantitative variables. It uses covariance divided by the product of their standard deviations, producing a correlation coefficient (r) ranging from –1 to +1, indicating negative, positive, or no correlation.

 

Ex. (i) Find coefficient of correlation of the following data.

x y
9 15
8 16
7 14
6 13
5 11
4 12
3 10
2 8
1 9

Solution:

x y x2 y2 xy
9 15 81 225 135
8 16 64 256 128
7 14 49 196 98
6 13 36 169 78
5 11 25 121 55
4 12 16 144 48
3 10 9 100 30
2 8 4 64 16
1 9 1 81 9
Total sum = 45 108 285 1356 597

n = No. of pair of observers

n = 9

Σxy = 597

Σx = 45

Σy = 108

Σx2 = 285

Σy2 = 1356

Correlation analysis

16. Regression Analysis (प्रतीगमन या प्रत्यागमन विश्लेषण)

Regression Analysis

(प्रतीगमन या प्रत्यागमन विश्लेषण)



Regression Analysis

परिचय

      ‘प्रतीपगमन’ (Regression) शब्द का अर्थ ‘पीछे लौटना’ अथवा ‘वापस आना’ (to regress or return back) है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1877 में सर फ्रांसिस गाल्टन (Sir Francis Galton) ने अपने शोध लेख ‘पैतृक ऊँचाई में मध्यमता की ओर प्रतीपगमन’ (Regression towards mediocrity in hereditary stature) में किया था।

     प्रत्यागमन विश्लेषण (Regression Analysis) सांख्यिकी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक उपकरण है, जिसका उपयोग दो या दो से अधिक चर (Variables) के बीच संबंधों का अध्ययन करने के लिए किया जाता है। यह न केवल चर के बीच संबंधों की दिशा एवं ताकत को मापता है, बल्कि इस आधार पर भविष्य के मूल्यों का पूर्वानुमान (Prediction) भी करता है। इसीलिए इसे पूर्वानुमान के लिए सबसे प्रभावी सांख्यिकीय विधियों में से एक माना जाता है।

      प्रत्यागमन विश्लेषण मुख्य रूप से निर्भर चर (Dependent Variable) और स्वतंत्र चर (Independent Variable) के बीच संबंधों पर आधारित होता है। उदाहरण के लिए, यदि हम जानना चाहें कि किसी छात्र के परीक्षा-अंक उसकी पढ़ाई के घंटों पर कैसे निर्भर करते हैं, तो हम Regression Analysis का उपयोग करेंगे।

प्रत्यागमन विश्लेषण की परिभाषा     

      “Regression उस सांख्यिकीय तकनीक को कहते हैं जिसके द्वारा दो चर के बीच मात्रात्मक संबंध स्थापित किया जाता है और उसके आधार पर संबंधित चर के मूल्यों का अनुमान लगाया जाता है।”

सक्षेप में-

    Regression वह पद्धति है जिसमें हम एक चर के माध्यम से दूसरे चर के मूल्यों का अनुमान लगाते हैं।

Regression Analysis की आवश्यकता और उपयोगिता

(i) पूर्वानुमान (Prediction):-

          Regression Analysis की आवश्यकता और उपयोगिता पूर्वानुमान में इसलिए है कि यह चर (variables) के बीच संबंध स्थापित कर भविष्य के मानों का अनुमान लगाने, रुझान पहचानने और निर्णय-निर्धारण में सहायता करता है।

    बिक्री, उत्पादन, मांग, तापमान, GDP, जनसंख्या आदि का भविष्य अनुमान लगाने में उपयोगी।

(ii) निर्णय-निर्माण (Decision Making):-

    Regression Analysis की आवश्यकता निर्णय-निर्माण में इसलिए होती है क्योंकि यह भविष्य के रुझानों का अनुमान, चर-परिवर्तनशीलताओं का प्रभाव और नीतिगत या व्यावसायिक विकल्पों की सटीकता को बढ़ाता है।

(iv) चर-संबंधों का अध्ययन:-

  Regression Analysis की आवश्यकता चर-संबंधों को मात्रात्मक रूप से समझने, पूर्वानुमान बनाने, कारण-प्रभाव दिशा पहचानने और विभिन्न स्वतंत्र चरों का आश्रित चर पर प्रभाव मापने में होती है;

(v) प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभावों की माप

   जैसे- आय का उपभोग पर प्रभाव, शिक्षा का आय पर प्रभाव।

(vi) वैज्ञानिक व सामाजिक अनुसंधान में उपयोग

    मनोविज्ञान, जनसांख्यिकी, भौतिकी, जीवविज्ञान, भूगोल आदि में व्यापक उपयोग।

Regression के प्रकार (Types of Regression Analysis)

1. Simple Regression (सरल प्रत्यागमन)

     जब एक स्वतंत्र चर और एक निर्भर चर के बीच संबंध स्थापित किया जाता है।

उदा.—उपभोग (Y) = f (आय X)

Regression Equation: Y = a+bX

2. Multiple Regression (बहु-प्रत्यागमन)

जब अनेक स्वतंत्र चर किसी एक निर्भर चर को प्रभावित करते हैं।

उदा.- आय (Y) = शिक्षा (X₁) + अनुभव (X₂) + कौशल (X₃)

Equation: Y=a+b1X1+b2X2+b3X3…….

3. Linear Regression (रेखीय प्रत्यागमन)

    जहाँ निर्भर चर और स्वतंत्र चर के बीच संबंध सीधी रेखा के रूप में हो।

Y = a+bX

Regression Line (प्रत्यागमन रेखा)

    Regression Analysis का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी रेखा खोजना होता है जो स्वतंत्र चर और निर्भर चर के बीच न्यूनतम त्रुटि (Minimum Error) के साथ संबंध दर्शाए।

Regression Coefficient (प्रत्यागमन गुणांक)

     Regression coefficient (b) यह बताता है कि स्वतंत्र चर में एक इकाई परिवर्तन होने पर निर्भर चर में कितना परिवर्तन होगा।

उदाहरण:

यदि b = 0.8

तो X में 1 इकाई वृद्धि होने पर Y में 0.8 इकाई वृद्धि होगी।

Regression coefficient के गुण:

⇒ b का मान धनात्मक (+) या ऋणात्मक (–) दोनों हो सकता है।

⇒ b = 0 मतलब दोनों चरों में कोई संबंध नहीं।

⇒ यदि दोनों b (bxy और byx) धनात्मक हों = सीधा संबंध।

⇒ यदि दोनों b ऋणात्मक हों = व्युत्क्रम संबंध।

Regression Analysis का एक सरल उदाहरण

        मान लीजिए किसी छात्र ने पढ़ाई (X) के घंटे और परीक्षा-अंक (Y) का विवरण दिया:

X (घंटे) Y (अंक)
2 40
3 50
4 60
5 70

Regression Equation:

Y=a+bX

यदि गणना से प्राप्त हो:

a = 20, b = 10

तो समीकरण होगा:

Y = 20+10X

यदि X = 6 घंटे पढ़ाई →

Y = 20+10(6)=80

अर्थात छात्र अनुमानतः 80 अंक प्राप्त करेगा।

Correlation और Regression में अंतर

बिंदु Correlation Regression
उद्देश्य संबंध मापना पूर्वानुमान करना
संबंध दिशा केवल दिशा/मजबूती बताता है आश्रित व स्वतंत्र का संबंध बताता है
Variables कोई dependent नहीं Y dependent, X independent
मान सीमा -1 से +1 कोई भी मान
परिणाम r (सहसंबंध गुणांक) Y = a + bX (प्रतिगमन समीकरण)
उपयोग संबंध की मजबूती Prediction (पूर्वानुमान)
निष्कर्ष

     प्रत्यागमन विश्लेषण एक अत्यंत प्रभावी एवं वैज्ञानिक सांख्यिकीय तकनीक है जो विभिन्न क्षेत्रों में भविष्य के अनुमान लगाने, संबंधों को समझने और निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह केवल दो चरों के बीच संबंधों का मात्रात्मक विश्लेषण ही नहीं करता, बल्कि इसके आधार पर व्यावहारिक समाधान भी प्रदान करता है।

   सटीक एवं विश्वसनीय आंकड़ों के साथ उपयोग करने पर Regression Analysis शोध, अर्थव्यवस्था, विज्ञान, समाजशास्त्र, नीति-निर्माण और व्यावसायिक क्षेत्रों में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है।

नोट:  गाल्टन ने लगभग एक सहस्र पिताओं तथा पुत्रो की ऊँचाइयों का अन्वेषण करके यह ज्ञात किया कि “लम्बे पिताओं के पुत्र भी लम्बे होते है, तथा छोटे पिताओं के पुत्र भी छोटे होते हैं, परन्तु लम्बे पिताओं के पुत्री की औसत ऊँचाई उनके पिताओं की ऊँचाई की औसत से कम होती है तथा छोटे पिताओं के पुत्रों की औसत ऊँचाई उनके पिताओं की ऊँचाई की औसत से अधिक होती है।”

     गाल्टन ने मानव जाति में सामान्य ऊँचाई (normal height) की ओर लौटने की प्रवृत्ति को प्रतीपगमन को संज्ञा दी है।




उत्तर लिखने का दूसरा तरीका




Regression Analysis

Introduction:

     The mutual relationship between two Series is measured with the help of Correlation. Under correlation the direction and magnitude of the relationship between two variables is measured. But it is not possible to make the best estimate of the value of a dependent Variable on the basis of the given value of the Independent Variable by correlation analysis.

     Therefor, to make the best estimates and future estimation, the Study of regression analysis is very Important useful.

Meaning:

     Regression is the Study of the nature of relationship between that one may be able to Predict the Unknown value of one variable for a known value of another Variable.

     In regression, one variable is considered as an independent Variable and another Variable is taken as dependent Variable. with the help of regression, possible values of the dependent Variable are estimated on the basis of values of the independent variable.

     for example demand and price.

On the basis of this relationship between demand and price probable Value of demand can be estimated Corresponding to the different Values of place.

⇒ Regression Analysis is the technique for measuring or estimating the relationship among Variables.

⇒ Regression Analysis provides estimates of Values of the dependent Variable From the Values of the independent Variable.

⇒ The device used to accomplish this estimation procedure is the regression line.

⇒ The regression line describes the average relationship existing between x and y.

Exmple-

x y
4 100
7 92
15 90
18 82
20 79
25 74
28 68
. .
. .
35 ?    (here, x given, y=?)
. .
. .
?  (here, y given, x=?) 20

Difference Between Correlation and Regression

Correlation Analysis Regression Analysis
1. Correlation coefficient  is a measure of degree of covariability between x and y. 1. Objective of regression analysis is to Study the nature of relationship between Variables.
2. In Correlation analysis we can not say that one Variable is the cause & other the effect. 2. in regression analysis it is possible to study Cause & effect relationship.
3. In Correlation analysis both rxy & ryx are Symmetric (rxy=ryx) 3. In regression analysis bxy & byx are not Symmetric. (bxy≠byx)
4. There may be measure Correlation which has no practical relevance such as Increase in income & increase in weight. 4. There is nothing like non-Sense regression.
5. Correlation coeff. is independent of change of scale and origin.  5. Regression coefficientsare independent of change of origin but not of scale.

Similarity: Correlation coeff. (r) and regression coeff. (bxy & byx always have Same Sign.

UTILITY OF REGRESSION

(i) Nature of Relationship:-

    Regression analysis explains the nature of relationship between two variables.

(ii) Estimation of Relationship:-

     The mutual relationship between two or more variables can be measured easily by regression analysis.

(iii) Prediction:-

      By regression analysis, the value of a dependent variable can be predicted on the basis of the value of an independent variable. For example, if the price of a commodity rises, what will be the probable fall in demand, this can be predicted by regression.

(iv) Useful in Economic and Business research:-

    Regression analysis is very useful in business and economic research. With the help of regression, business and economic policies can be formulated.

TYPES OF REGRESSION ANALYSIS

1. Simple and Multiple Regression:-

      In simple regression analysis, we study only two variables at the time, in which one variable is dependent and another is independent. For example income and expenditure.

      on the contrary, we study more than two variables at a time in multiple, regression analysis in which one is dependent variable and others are independent variable. For example the study of rain and irrigation, the study of effect of rain and irrigation on yield of wheat.

2. Linear and Non-Linear Regression:-

    when one variable changes with other variable in some fixed ratio, this is called linear regression. such type of relationship is depicted on a graph by means of straight line.

    On the other hand when one variable varies with other variable in a changing ratio, then it is referred to as curvi-linear or Non-linear regression. This relationship, expressed on a graph paper takes the form of curve.

3. Partial and Total Regression:-

     When two or more variables are studied for functional relationship but at a time relationship between only two variables is studied and other variables held constant then it is known as partial regression. On the other hand, in total regression all variables are studied simultaneous for the relationship among them.

Simple Linear Regression

Regression lines:

     Regression lines are linear equations that show the relationship between two variables. These help in making predictions, understanding trends and determining the direction of changes in the data.

Regression lines
Regression line of y on x Regression line of x on y
1. y-ȳ = byx (x-x̄)

byx is regression coeff. of y on x

byx =

1. x-x̄ = bxy (y-ȳ)

bxy is regression coeff. of x on y

bxy =

Both lines intersect at point (x̄, ȳ),  x̄ = Mean of x, ȳ = Mean of y
2. x→ Independent variable

y→ Dependent variable

2. x→Dependent variable

y→ Independent variable

3. Used to calculate y for given x 3. Used to calculate y for given y
4. Regression equation of y on x, y = a+bx 4. Regression equation of x on y, x = a+by

Methods of Obtaining Regression Lines

(i) Scatter Diagram Method:-

      This is the simplest method of constructing regression lines, In this method, values of the related variables are plotted on a graph. A straight line is drawn passing through the plotted points. The straight line is drawn with free hand. This shape of regression line can be linear or non-linear also. This depends upon the location of plotted points. This method is very rarely used in practicle because in this method, the decision of the person who draws the regression lines very much affects the result.

(ii) Least Square Method:-

    Regression lines are also constructed by least Square method. Under this method, the two regression lines, is fitted through different points in such a way that the sum of squares of the deviations of the observed values from the fitted line shall be least. The line drawn by this method is called the Line of Best Fit. In other words, regression line of Y on X is so drawn such that vertically, the sum of squared deviation becomes minimum relating to the different points and the regression line on X on Y is so drawn such that horizontally, squared deviations of different points add up to minimum.

Regression Lines

and

Degree of Correlation

REGRESSION EQUATIONS

   Regression equations are the algebraic formulation of regression lines. Regression equations present Regression lines.

(i) Regression equation of x on y

     This equation is used to estimate the probable value of x on the basis of the given value of y.

⇒ x-x̄ = bxy (y-ȳ)

(ii) Regression Equation of y on x

     This equation is used to estimate the probable value of y on the basis of given value of x.

⇒ y-ȳ = byx (x-x̄)

REGRESSION COEFFICIENTS

    Regression Coefficient measures the average change in the value of one variable for a unit change in the value of another variable. r Infact, it represents the slope of a regression line.

(i) Regression Coefficient x on y

     This Coefficient shows that with the unit change in the value of y variable, what will be the average change in the value of x variable.

bxy = r . σx/σy

(ii) Regression coefficient of y on x

    This Coefficient shows that with a unit change in the value of x variable, what will be the average change in the value of y variable.

byx = r . σy/σx

Example (i) Find both regression lines (x on y and y on x) for the following data.

x y
6 9
2 11
10 5
4 8
8 7

Calculation:

x y x2 y2 xy
6 9 36 81 54
2 11 4 121 22
10 5 100 25 50
4 8 16 64 32
8 7 64 49 56
30 40 220 340 214

n = 5

x̄ = Σx/n = 30/5 = 6

ȳ = Σy/n = 40/5 = 8

byx =

= 5×214 – 30×40 / 5×220 – 30×30

= -0.65

bxy =

= 5×214 – 30×40 / 5×340 – 40×40

= -1.3

now,

x on y ⇒ x-x̄ = bxy (y-ȳ)

⇒ x-6 = -1.3(y-8)

⇒ x-6 = -1.3y + 1.3×8

⇒ x = -1.3y + 10.4 + 6

⇒ x = -1.3y + 16.4

y on x ⇒ y-ȳ = byx (x-x̄)

⇒ y-8 = -0.65 (x-6)

⇒ y-8 = -0.65x + 0.65×6

⇒ y = -0.65x + 3.9+8

⇒ y = -0.65x + 11.9

Example (ii) From the following data:

(a) Obtain two regression lines

(b) Calculate correlation coeff.

(c) Estimate the value of y for x = 6.2

x y
1 9
2 8
3 10
4 12
5 11
6 13
7 14
8 16
9 15

Calculation:

(a) Obtain two regression lines

Note: x on y ⇒ x-x̄ = bxy (y-ȳ)

y on x ⇒ y-ȳ = byx (x-x̄)

(i) For direct method 

We’ll need ⇒ x̄, ȳ, bxy, byx

r =

bxy =

byx =

Finally we’ll need ⇒ n, Σx, Σy, Σx2, Σy2, Σxy 

(ii) For Short-cut method :-

       समानान्तर माध्य की संख्या पूर्णांक में हो तो प्रत्यक्ष रीति द्वारा प्रतीपगमन गुणांक सरलता से प्राप्त किये जा सकते हैं, लेकिन यदि ये माध्य पूर्णांक में नहीं आये तब लघु रीति अपनाना अधिक उपयुक्त होगा। इस रीति में अग्र सूत्रों की सहायता से प्रतीपगमन गुणांकों की गणना की जाती है:

Note: x→ dx = x-A,

y→ dy = y-B

x y d

(x-5)

dy

(y-12)

dx2  dy2 dx dy
1 9 -4 -3 16 9 12
2 8 -3 -4 9 16 12
3 10 -2 -2 4 4 4
4 12 -1 0 1 0 0
5 (A) 11 (B) 0 -1 0 1 0
6 13 1 1 1 1 1
7 14 2 2 4 4 4
8 16 3 4 9 16 12
9 15 4 3 16 9 12
45 108 0 0 60 60 57

Regression Co-efficient of X on Y

bxy = 9(57) – 0(0) / 9(60) – (0)2 

        = 0.95

Regression Co-efficient of Y on X

byx = 9(57) – 0(0) / 9(60) – (0)2

        = 0.95

x̄ = Σx/n = 45/9 = 5

ȳ = Σy/n = 108/9 = 12

now,

x on y ⇒ x-x̄ = bxy (y-ȳ)

⇒ x – 5 = 0.95(y-12)

⇒ x – 5 = (0.95)y – 0.95(12)

⇒ x = (0.95)y – 11.4 + 5

⇒ x = (0.95)y – 6.4

y on x ⇒ y-ȳ = byx (x-x̄)

⇒ y – 12 = 0.95(x – 5)

⇒ y – 12 = (0.95)x – 0.95 (5)

⇒ y – 12 = (0.95)x – 4.75

⇒ y = (0.95)x – 4.75 + 12

⇒ y = (0.95)x + 7.25

(b) Calculate correlation coeff.

(c) Estimate the value of y for x = 6.2

y on x ⇒ y-ȳ = byx (x-x̄)

⇒ y = (0.95)x + 7.25

⇒ y = (0.95)6.2 + 7.25

⇒ y = 5.89 + 7.25

⇒ y = 13.14

1. Ancient Classical Times in Geography (भूगोल में प्राचीन चिरसम्मत काल)

 Ancient Classical Times in Geography

(भूगोल में प्राचीन चिरसम्मत काल)




  Ancient Classical Times in Geography

प्रश्न प्रारूप

प्रश्न- प्राचीन चिरसम्मत काल (Classical Ancient Times) के भौगोलिक ज्ञान के स्वरूप पर प्रकाश डालिए।

अथवा, भूगोल में चिरसम्मत शास्त्रीय कालीन भूगोलवेताओं के योगदान का वर्णन कीजिए।

        चिरसम्मत शास्त्रीय काल में मुख्यतः यूनानी व रोमन भूगोलवेत्ताओं को सम्मिलित किया जाता है। इस काल में अधिकांश समय यूनानी भूगोलवेत्ताओं का प्रभुत्व ही भूगोल पर रहा। उन्होंने भूगोल को एक स्वतन्त्र विषय के रूप में तो मान्यता दिलाई ही साथ ही विभिन्न भौगोलिक पक्षों (Aspects) का वर्णन भी अपने ग्रन्थों में किया।

         यूनानी भूगोलवेत्ताओं द्वारा भूगोल का विकास प्रमुखतः तीन विधाओं द्वारा किया गया— अन्वेषण, मानचित्र और परिकल्पना।

यूनानी भूगोलवेत्ताओं द्वारा भूगोल की समस्त प्रमुख शाखाएँ स्थापित कर ली गई थीं। गणितीय भूगोल का जन्म, थेल्स, अनेग्जीमेण्डर तथा अरस्तु के द्वारा हुआ जिसे इरेटॉस्थनीज ने चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। पृथ्वी का गोल आकार जो कि आश्चर्यजनक रूप से शुद्धता के निकट था तथा विभिन्न स्थानों के अक्षांश व देशान्तर ज्ञात कर लिए गए थे। 

Ancient Classical Times in Geography

यूनानी भूगोलवेत्ताओं का योगदान 

1. महाकवि होमर (Homer) ⇒ 900 ई० पू०

         लगभग 900 ई० पू० में ये वस्तुतः एक इतिहासकार थे। इन्होंने दो महाकाव्य ओडिसी व इलियड लिखे। इनमें बहुत से क्षेत्रों, मानव वर्गों तथा जनपदों के वर्णन हैं। इनके अनुसार पृथ्वी तैरती हुई वृत्ताकार मानी गई थी। 500 वर्षों तक यह विचारधारा ठीक मानी जाती रही। दूसरे महाकाव्य ओडिसी में सुदूर पूर्व के विभिन्न भू-भागों को वर्णित किया गया है। इसमें यातायात तथा अन्य देशों के निवासियों के भी वर्णन हैं। होमर ने चार स्वर्गों की कल्पना की थी जो पृथ्वी के चारों कोनों पर स्थित माने जाते थे। उन्होंने चार प्रकार की पवनों का उल्लेख किया है—बोरस (उत्तरी हवा, साफ-स्वच्छ नीला आकाश, हवा ठण्डी और तेज); यूरस (पूर्वी हवा, गर्म और मन्द); नोटस (दक्षिणी पवन, यह वर्षा और झंझा युक्त होती हैं) और जेफिरस (पश्चिमी पवन, झंझावाती वेग) 

2. थेल्स (Thales) 700 ई० पू०

         यह एक दार्शनिक था जो यूनान में प्राकृतिक विज्ञान व दर्शनशात्र (Philosophy) का जन्मदाता था। 500 BC में इन्होंने विश्व की उत्पत्ति व नक्षत्रों के विषय में एक पुस्तक लिखी, जिससे उस समय गणितीय भूगोल का जन्म हुआ। थेल्स ने भी पृथ्वी  को चपटी, वृत्ताकार व पानी पर तैरती हुई माना था। इन्होंने बताया था कि जल में तैरने के कारण ही पृथ्वी पर भूकम्प आते हैं। सूर्यग्रहण व चन्द्रग्रहण के सन्दर्भ में भी इन्होंने अपने मत प्रकट किए थे।

3. पाइथागोरस (Pythagorus) ⇒ 

       सर्वप्रथम 582 BC में उन्होंने ब्रह्माण्ड विज्ञान के सन्दर्भ में अपने विचार प्रकट किए। इन्होंने मत प्रकट किया था कि पृथ्वी गोलाकार व अस्थिर है। यह अन्य आकाशीय पिण्डों की परिक्रमा करती है। इन्होंने सूर्य व चन्द्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा करते बताया था।

4. अनेग्जीमेण्डर (Anaximander) ⇒ 610-546 ई० पू०

          यह थेल्स के शिष्य थे। इनको नक्षत्र विज्ञान व ब्रह्माण्ड विज्ञान का पर्याप्त ज्ञान था। पृथ्वी की उत्पत्ति, आकार के बारे में इनके विचार प्रगतिवादी थे। इनका मत था कि पृथ्वी गोल है तथा ठोस पिण्ड के रूप में ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित है। वे विश्व के प्रथम मानचित्र के निर्माण में योगदान किया। सर्वप्रथम सूर्य घड़ी (Gnomon) का निर्माण किया। जैव भूगोल जैसे स्वतन्त्र विषयों की नींव रखी। विभिन्न जीव उत्पत्ति तथा प्रकाश सम्बन्धी लेख लिखे। उनका मत था कि पृथ्वी तल के समस्त जीव एक निरन्तर विकास प्रक्रिया के परिणाम है। उन्होंने कहा कि मानव की उत्पत्ति इसी विकास प्रक्रिया के परिणामस्वरूप मछली से हुई है।

5. अनेग्जीमैनस (Anaximenes) ⇒ 

          यह अनेग्जीमेण्डर का शिष्य था। ब्रह्माण्ड विज्ञान के सन्दर्भ में इन्होंने अपने स्वतन्त्र विचार प्रकट किए थे। इनका विचार था कि सूर्य व तारे पृथ्वी से काफी दूर हैं व पर्वतों द्वारा सूर्य का प्रकाश अवरुद्ध हो जाने से रात हो जाती है।

6. हिकेटियस (Hecataeus ⇒ 520 ई० पू०

        हिकेटियस (मलेशियम्) नगर का निवासी था। इन्होंने व्याख्यात्मक भूगोल पर अपने विचार प्रकट किए थे और पृथ्वी का वर्णन’ (Gesperiodos) नाम की पुस्तक लिखी। इसमें उस समय के ज्ञात विश्व का प्रादेशिक वर्णन था। इस ग्रन्थ द्वारा इन्होंने यूनान में प्रादेशिक भूगोल की नींव रखी। इसी पुस्तक में मलेशियस नगर का मानचित्र भी दिखाया गया था। पृथ्वी को इन्होंने वृत्ताकार माना था। हिकेटियस को भूगोल का जनक (Father of Geography) कहा जाता है।

7. हिरोडोटस (Herodotus) ⇒ 485-425ई० पू०

         इनको इतिहास का जन्मदाता मानते हैं। हिरोडोटस ने उन भौगोलिक क्षेत्रों का निरीक्षण एवं अन्वेषण किया था जो उस समय तक अज्ञात थे। इन्होंने दक्षिणी इटली, भूमध्यसागरीय क्षेत्रों, मिस्र, वेबीलोन, आदि क्षेत्रों का विशद वर्णन प्रस्तुत किया। इन्होंने विश्व के मानचित्र का भी निर्माण किया था और नील नदी के डेल्टा के निर्माण की प्रक्रिया का वर्णन किया था। हेरोडोटस ने ही सबसे पहले विश्व मानचित्र पर याम्योत्तर (Meridian) खींचा। हेरोडोटस ने विश्व की भूसंहति को तीन महादेशों- यूरोप, एशिया तथा लीबिया (अफ्रीका) में बांटा।

8. प्लेटो (Plato) ⇒ 428-348 ई० पू०

          प्लेटो (428-348 ई. पू.) का नाम तो सदैव दर्शनशास्त्र के साथ जोड़ा जाता है। परन्तु उन्होंने भौगोलिक अवधारणाओं के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। निगमनात्मक तर्कणा (Deductive Reasoning) के प्रबल प्रतिपादक प्लेटो को यह बताने का श्रेय प्राप्त है कि धरती एक गोलाभ (Sphare) की भांति है और ब्रह्माण्ड के केन्द्र में स्थित है तथा सूर्य सहित शेष सभी खगोलीय पिण्ड धरती के चारों ओर चक्कर काटते हैं। उनकी यह खोज उनके जमाने में बड़ी क्रांतिकारी सिद्ध हुई।

9. अरस्तु (Aristotle) – 384-322 ई० पू०

        यह प्रसिद्ध विचारक प्लेटो का शिष्य था। इसको वैज्ञानिक भूगोल का जन्मदाता माना जाता है। अरस्तु दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, जीवविज्ञान, आदि विषयों में प्रकाण्ड पण्डित थे। गणितीय भूगोल में इनका योगदान सराहनीय है। उन्हाने पृथ्वी की आकृति गोलाकार बताई थी। सर्वप्रथम जलवायु कटिबन्धों का निर्धारण किया था और मौसम विज्ञान पर ग्रन्थ लिखा था। इसमें वायु ऋतु परिवर्तन, वर्षा, ओला, भूकम्प आदि का वर्णन किया था। वातावरणवाद (Environmental Determinism) को सर्वप्रथम व्यवस्थित रूप में अरस्तु ने ही प्रस्तुत किया था।

10. सिकन्दर (Alexander) ⇒

        यह एक अन्वेषक यात्री थे। इन्होंने युद्धों के सन्दर्भ में अनेक यात्राएं की थी। इन यात्राओं के वर्णनों में भौगोलिक ज्ञान के दर्शन होते हैं तथा उन्होंने दक्षिण-पश्चिमी एशिया, दक्षिणी एशिया, मिस्र, आदि की खोज की थी। इनके वर्णन प्रादेशिक व सामान्य भूगोल के विकास में सहायक सिद्ध हुए तथा उनसे व्याख्यात्मक भूगोल को भी बल मिला।

11. थियोफ्रेस्टस (Theophrastus) ⇒ 

        यह अरस्तु के शिष्य थे। इन्होने अरस्तु के कार्यों को आगे बढ़ाया। जलवायु विज्ञान पर अपने स्वतन्त्र विचार भी प्रस्तुत किए। जलवायु व वनस्पति के सम्बन्धों का वर्णन किया। चट्टानों एवं मिट्टियों का अध्ययन किया। इन्होंने ‘हिस्ट्री ऑफ प्लेनेटस’ (History of Planets) नाम की पुस्तक लिखी जिसमें मैसिडोनिया के मैदानी क्षेत्रों, निकटवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों तथा अन्य क्षेत्रों की वनस्पति का तुलनात्मक अध्ययन किया था। इस प्रकार वनस्पति भूगोल की नींव डाली।

12. इरेटास्थनीज (Eratosthenes) ⇒ 276-196 ई० पू०इरेटास्थनीज           यह प्रसिद्ध गणित भूगोलवेत्ता थे और सिकन्दरिया (Alexandria) स्थित संसार की सर्वोच्च शिक्षा संस्था के पुस्तकालयाध्यक्ष थे। यहां इन्होंने अपने भौगोलिक ज्ञान में वृद्धि की तथा नक्षत्र विज्ञान व गणितीय भूगोल पर काफी लेख लिखे। इन्होने पृथ्वी की परिधि की गणना की थी जो शुद्ध माप से 14% अशुद्ध थी। उन्होंने उस समय के ज्ञात विश्व का मानचित्र भी बनाया था और पृथ्वी के वर्णन के लिए सर्वप्रथम ज्यॉग्राफी (Geography) शब्द का प्रयोग किया या भूगोल विषय पर पहली औपचारिक कृति ‘The Geographica’ नाम से इरेटास्थनीज ने ही लिखी।

इरेटास्थनीज

13. हिप्पार्कस (Hipparchus) ⇒ 190-125 ई० पू०

           हिप्पार्कस एक खगोलशास्त्री तथा गणितज्ञ था जिसने Equinoxes का पता लगाया तथा वर्ष की लम्बाई बतायीं। यह पहला विद्वान था जिसने असीरियाई गणित के आधार पर वृत्त को 360º में विभक्त किया था। इसने विषुवत रेखा तथा देशांतरीय वृत्त को वृहत्त वृत्त (Great Circle) बताया। इन्होंने ही नक्षत्रों के अध्ययन के लिए एस्ट्रोलेब (Astrolabe) नामक यंत्र का अविष्कार किया और इसकी सहायता से अक्षांश एवं देशांतर वृतों का भी निर्धारण किया। एस्ट्रोब नोमान की तुलना में सरलता से प्रयोग किया जा सकता था।

            अक्षांस एवं देशांतर के आधार पर उसने विश्व को क्लाइमाटा (Climata) अर्थात अक्षांश पेटियों में विभाजित किया। अक्षांश एवं देशांतर रेखा जाल की सहायता से इसने ज्ञात विश्व को 11 जलवायु प्रदेशों में विभाजित किया था।

         हिप्पार्कस ही पहला व्यक्ति था जिसने त्रि विमीय (Three Dimension) गोलाभ को दो विमीय (Two Dimension) तल में बदलने का तरीका खोज निकला, परिणामस्वरुप पृथ्वी के गोलीय भाग को समतल क्षेत्र में बनाना संभव हो पाया। इसने दो प्रक्षेप बनाने की विधि बताएँ- (1) समरूपीय प्रक्षेप (Stereographic Projection) और (2) लंबरेखीये प्रक्षेप (Orthographic Projection)। इसने अक्षांश और देशांतर के महत्व पर बल दिया। इस प्रकार उन्होंने वैज्ञानिक मानचित्र कला (Scientific Cartography) के क्षेत्र में सराहनीय कार्य किये।

14. पोसीडोनियस (Posidonius) ⇒ 135-50 ई० पू०

          पोसिडोनियस एक महत्वपूर्ण यूनानी इतिहासकार और भूगोलवेता था। इन्होंने ने “द ओसियन” नामक पुस्तक लिखा था। इसको समुद्र विज्ञान का विशेषज्ञ माना जाता है। क्योंकि  सर्वप्रथम इन्होंने ही बताया की पूर्णिमा (Full Moon) और अमावस्या (New Moon) के दिन सूर्य चन्द्रमा और पृथ्वी तीनो के एक सीध में होने के कारण समुद्र में दीर्घ ज्वार (Spring Tide) आते है और साथ ही कृष्ण पक्ष (Waning Moon) और शुक्ल पक्ष (Waxing Moon) को समकोण की स्थिती में होने के कारण लघु ज्वार (Neap Tide) आते हैं। महासागरों की गहराई ज्ञात करने वाला यह पहला भूगोलवेत्ता था। पोसिडोनियस ने भौतिक भूगोल को तर्कसंगत ढंग से विक्सित किया जिसके कारण इसे भौतिक भूगोल का पिता भी कहा जाता है। 

रोमन भूगोलवेताओं का योगदान 

1.  स्ट्रेबो (Strabo) ⇒ 64-20 ई० पू०

स्ट्रेबो

⇒ स्ट्रैबो ने उस समय के बसे हुए संसार के ज्ञात भाग का वर्णन 17 पुस्तकों की ग्रंथमाला (Geographical Encyclopedia) के रूप में संकलित किया था।

⇒ स्ट्रेबो द्वारा तत्कालीन समस्त भौगोलिक ज्ञान को एक साथ एकत्रित कर एक सामान्य पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करने का सबसे पहला प्रयास किया गया।

⇒ प्राचीन भूगोल के विषय में जो जानकारी आज उपलब्ध है वह मुख्य रूप से स्ट्रेबो की ‘ज्योग्राफी’ से ही ली गई है, क्योंकि प्रारंभिक भूगोलवेत्ताओं द्वारा लिखी गई अधिकांश पुस्तकें विलुप्त हो चुकी हैं। स्ट्रैबो ने 43 ग्रंथों की रचना ‘ऐतिहासिक स्मृतियाँ’ (Historical Memories) के शीर्षक से की है।

⇒ स्ट्रैबो प्रथम विद्वान था जिसने संपूर्ण भौगोलिक प्रबंध, उसकी सभी चारों शाखाओं (गणितीय, भौतिक, राजनीतिक एवं ऐतिहासिक) के संबंध में लिखे।

⇒ भूगोल एवं इतिहास के बीच के गहरे संबंध को उसने स्पष्ट करने का प्रयास किया। इतिहास के विकास पर भूगोल के प्रभाव का वर्णन करते हुए उसने यह लिखा कि इटली की विशेष सुरक्षित भौगोलिक स्थिति के कारण ही इस देश के निवासी प्रगतिशील एवं विकासशील रहे हैं।

⇒ स्ट्रैबो को नियतिवादी चिंतन का प्रथम महत्त्वपूर्ण विचारक माना जाता है।

⇒ उसने पहली बार एटलस एवं विसुवियस पर्वत का वर्णन किया है। विसुवियस को उसने ‘जलता हुआ पर्वत’ कहा है।

⇒ उसने अधिवासित प्रदेशों के लिए ‘ओकुमेन’ (Oikoumene) शब्द का प्रयोग किया, जिसे वर्तमान समय में ‘इकुमेन’ (Ecumene) कहा जाता है।

⇒ स्ट्रैबो ने पृथ्वी को दीर्घायत अर्थात (Oblong) माना था।

2. प्लिनी (Pliny) ⇒ 27-79 ई० पू०

           इन्होंने ‘हिस्टोरिया नेचुरेलिस‘ (Historia Naturalis) नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की थी जिसमें उसने ब्रह्माण्ड, जीव विज्ञान तथा मानव विज्ञान का वर्णन किया था।

3. टॉलमी (Ptolemy) ⇒ 90-168 ई० 

         टॉलमी ज्योतिष विज्ञान के प्रकाण्ड पण्डित थे। इनके अध्ययन के प्रमुख क्षेत्र गणितीय भूगोल, मानचित्र विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, आदि थे। इनके कार्य इरेटास्थनीज व स्ट्रैबों से काफी मिलते जुलते हैं। टॉलमी ने पृथ्वी को गोलाकार बताया था। अल्मागेस्ट (Almagest) टॉलमी की प्रसिद्ध पुस्तक है। इसमें गणितीय भूगोल तथा खगोलिकी की जटिल समस्याओं की चर्चा है। इन्होंने खगोलीय कार्यों के लिए कुछ यन्त्रों का प्रयोग किया था जिसमें टॉलमी मापक, म्यूरल चक्र यन्त्र (Mural Quardrand), गोला यन्त्र (Armillary), आदि प्रमुख हैं। मानचित्रांकन में टॉलमी ने प्रक्षेपों का सहारा लिया। टॉलमी ने अपने कार्यों में कुछ त्रुटियाँ भी की जिनका उत्तकालीन भूगोलवेत्ताओं पर व्यापक प्रभाव पड़ा।

3. पोम्पोनियस मेला (Pomponiums)  ⇒ 335-391 ई०

          इसकी पुस्तक दो खण्डों में लैटिन भाषा में प्रकाशित हुई। प्रथम खण्ड कॉस्मोग्राफी (Cosmography) एवं द्वितीय खंड डी-कोरोग्राफिया (De-Georographia) के नाम से जाना जाता है।

8. Sea Floor Spreading Theory / सागर नितल प्रसार का सिद्धांत

8. Sea Floor Spreading Theory

(सागर नितल प्रसार का सिद्धांत)



Sea Floor Spreading Theory

          सागर नितल प्रसार सिद्धान्त 1960 ई०  में हैरीहेस महोदय के द्वारा प्रस्तुत किया गया था यह सिद्धान्त उन्होंने समुद्री नितल का 5 वर्षों तक अनुसंधान करने के बाद प्रस्तुत किया था। हैरिहेस से पहले ऑर्थर होम्स महोदय ने सागरीय नितल के प्रसार के संबंध में संभावना व्यक्त किया था इसके संबंध में कोई विशेष मत प्रकट नहीं किया।  कालांतर में जब प्लेट टेक्टोनिक सिद्धान्त का आगमन हुआ तो उससे भी सागर नितल सिद्धान्त पर प्रकाश पड़ा।

                हैरिहेस महोदय ने अपना समुद्री नितल प्रसार सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर प्रस्तुत किया:-

1. हैरिहेस ने अपना सिद्धान्त तभी प्रस्तुत किया जब यह पूर्णत: स्पष्ट हो गया कि महासागरीय भूपटल की सामान्य मोटाई 6-7 KM और महाद्विपीय भूपटल की मोटाई 30-40 KM है । उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि महासागरीय भूपटल का तात्पर्य बेसाल्टिक चट्टानों से है और महाद्विपीय भूपटल का तात्पर्य ग्रेनाइट चट्टानों से है।

2. सभी महासागरों में महासागरीय कटक पाये जाते है जो बेसाल्टिक चट्टानों से निर्मित हैं और  महासागरीय नितल मैदान से इसकी सामान्य ऊंचाई 2-3 KM है।

3. हैरिहेस ने अपना मत तभी प्रस्तुत किया जब यह ज्ञात हो गया कि महासागरीय भूपटल की चट्टानें महाद्विपीय भूपटल की तुलना में कम आयु के है । महाद्विपीय चट्टानों के अधिकतम आयु 4600 मिलियन वर्ष और महासागरीय भूपटल की आयु 160 मिलियन वर्ष अनुमानित की गयी।

            इन्हीं तीन मान्यताओं के आधार पर हैरिहेस महोदय ने अपना सिद्धान्त प्रस्तुत किया। हैरिहेस ने अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हुए कहा कि “समुद्र का नितल सतत प्रसार की अवस्था मे है”।

सिद्धांत की व्याख्या   

     हैरिहेस ने महासागरीय नितल प्रसार का केंद्र महासागरीय कटक को माना है उन्होंने ऑर्थर होम्स की संवहन तरंग सिद्धान्त को आधार मानते हुए यह विचार प्रस्तुत किया कि मध्य महासागरीय कटक के पास संवहन तरंग लम्बवत रूप से ऊपर उठती है और अपनी ऊर्जा का उत्सर्जन करती है। लम्बवत ऊर्जा उत्सर्जन के कारण ही ज्वालामुखी की क्रिया होती है और उसी ज्वालामुखी क्रिया से महासागरीय कटक का निर्माण होता है। पुनः उन्होंने यह भी बताया की लम्बवत रूप से निकलने वाली संवहन तरंग का कुछ भाग भू-पटल के नीचे ही क्षैतिज रूप से प्रवाहित होने लगती है। इन्ही क्षैतिज तरंगों के कारण भू-पटल दो दिशाओं में खिसकने लगती है। ज्यों-ज्यों भूपटल का खिसकाव बढ़ता जाता है त्यों-त्यों लावा उत्सर्जन की मात्रा बढ़ने लगती है। यह क्रिया सतत सक्रिय रहती है। अतः उन्होंने बताया कि प्रत्येक महासागरीय कटक के पास नवीन भू-पटल का निर्माण होता है और उसी के साथ समुद्री नितल का प्रसार भी होता है।

          हैरिहेस महोदय ने बताया कि जब समुद्र नितल के प्रसार हो रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि पृथ्वी के परिधि में भी वृद्धि हो रही है। वास्तव में महासागरीय कटक के सहारे जब नवीन भूपटल का निर्माण होता है तो महासागरीय भूपटल का दूसरा किनारा महाद्वीपीय भूपटल से अभिसरण करता है। महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक होने के कारण महाद्वीपीय भू-पटल में प्रविष्ट कर जाता और गहराई में जाकर पिघलने की प्रवृत्ति रखता है। अतः यह सम्भव है कि महाद्वीपीय भूपटल की तुलना में महासागरीय भूपटल नवीन चट्टानों से निर्मित है।

सिद्धान्त के पक्ष में प्रमाण

      समुद्री नितल प्रसार के संबंध में प्रस्तुत किये गए प्रमाणों को दो वर्गों में बांटते है।

(A) हैरीहेस के द्वारा एकत्रित किये गए प्रमाण

(B) 1960 ई०के बाद नवीन अनुसंधानों के द्वारा एकत्रित प्रमाण

(A) हैरीहेस के द्वारा एकत्रित किये गए प्रमाण

      हैरिहेस महोदय ने अपने परिकल्पना के समर्थन में कुल 9 प्रमाण एकत्रित किये है-

1.चाट्टानो की आयु से संबंधित प्रमाण:–

       हैरिहेस के अनुसार महासागरीय भू-पटल में महासागरीय कटक के पास सबसे कम आयु के चट्टान और जहाँ पर महासागरीय भूपटल महाद्वीपीय भूपटल में प्रविष्ट कर रहा है वहां पर अधिक उम्र के चट्टानें मिलती है। पुनः उन्होंने यह भी कहा कि ज्यों-ज्यों गर्त से कटक की ओर जाते है त्यों -त्यों चट्टानों की आयु में कमी होती जाती है।  ऐसा तभी सम्भव है जब समुद्री नितल का प्रसार हो रहा हो।

2. महासागरीय नितल पर Sea mount और गयॉट जैसी अवशिष्ट पहाड़ियां मिलती है। ये दोनों स्थलकृतियाँ बेसाल्टिक चट्टानों से निर्मित है। हैरिहेस के अनुसार ये अवशिष्ट पहाड़ियां कभी महासागरीय कटक के शिखर थे । लेकि प्रसार प्रक्रिया के कारण ये महासागरीय कटक से दूर हट गए है । यह तभी संभव है जब महासगरीय नितल का प्रसार हो रहा हो।

3. हैरिहेस महोदय ने अपने अनुसंधान में पाया कि महासागरीय नितल पर अनेक अंत: नितल दरार पाये जाते है। अमेरिका के कैलिफोर्निया तट से रूस के कमचटका प्रायद्वीप तक ऐसे लगभग 2 दर्जन दरारें है। इन्ही दरारों से मैग्मा पदार्थ बाहर निकलकर ज्वालामुखी द्वीपों का निम्न करती है। इन दरारों का निर्माण होना सागरीय नितल प्रसार के संबंध में सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है।

4. महासागरीय नितल के किनारे महासागरीय गर्त का पाया जाना नितल प्रसार के पक्ष में एक महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करता है। हैरिहेस के अनुसार समुद्री गर्तों का निर्माण प्लेटों के प्रत्यावर्तन से संभव है  और प्रत्यावर्तन तभी संभव है जब समुद्री नितल का प्रसार हो रहा हो।

5. तटीय वलित पर्वतों के निर्माण भी महासागरीय नितल प्रसार का महत्वपूर्ण प्रमाण है। वस्तुतः प्रसारित हो रहे समुद्री नितल के दबाव से ही महाद्वीपीय चट्टाने मुड़कर किनारों पर वलित पर्वत का निर्माण करते है।

6. पुरा-चुम्बकीय प्रमाण:-

      यह साबित हो चुका है कि प्रति तीन लाख वर्ष के बाद चुम्बकीय दिशा में परिवर्तन हो जाता है। ऐसा तभी सम्भव है जब भूपटल के गर्भ से मैग्मा पदार्थ बाहर निकल रहे हो । नवीन चट्टानों के निर्माण कर रहे हो और भूपटल एक दूसरे के सापेक्ष में प्रसारित हो रहे हो।

7. महासागरीय नितल और तटवर्ती क्षेत्रों में होने वाली विवर्तनिकी क्रियाएं भी महासागरिय नितल प्रसार की पुष्टि करते है। अभिसरण और अपसरण के क्षेत्र में ही अधिकांश भूकंप एवं ज्वालामुखी की क्रियाएँ होती है जो समुद्री नितल प्रसार की पुष्टि करते है। 

8. विभिन्न महाद्वीपों के विस्थापन तथा अनेक प्रवाली द्वीपों का विस्थापन भी नितल प्रसार को पुष्टि करता है।

9. महासागरीय मैदान के सतह पर परतदार चट्टान का न पाया जाना भी महासागरीय नितल का प्रमाण प्रस्तुत करता है।

(B) 1960 ई०के बाद नवीन अनुसंधानों के द्वारा एकत्रित प्रमाण

             हैरिहेस महोदय सागर नितल प्रसार के संबंध में विशेष अनुसंधान कार्य किया था जिस पर प्रकाश डालने के लिए 1960 ई० के बाद कई और वैज्ञानिकों ने साक्ष्य इक्कठे किये। जैसे-

1. 1962 ई० में Mason(मासोन) महोदय ने प्रशांत महासागर के नितल का पुराचुम्बकीय अध्धयन किया जिसके आधार पर उन्होंने बताया कि प्रशांत महासागर कर नितल का प्रसार जारी है।

2. 1963 ई० में F.J. Vine और D.H. Mathus के द्वारा हिन्द महासागर का पुरचम्बकीय अध्ययन किया गया जिसके आधार पर उन्होंने बताया कि हिन्द महासागर में अवस्थित महासागरीय कटक के सहारे समुद्री नितल का प्रसार हो रहा है।

3. प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के द्वारा यह प्रमाणित हो चुका है कि अपसरण सीमा के सहारे समुद्री नितल का प्रसारहो रहा है और अभिसरण सीमा के सहारे पुराने नितल का विनाश हो रहा है।

4. 1981 ई० में C.D. Ollier महोदय ने विवर्तनिकी एवं भूआकृति नामक पुस्तक लिखा जिसमें महासागरीय नितल प्रसार के संबंध में कई प्रमाण प्रस्तुत किये। जैसे- उन्होंने बताया कि अंटार्कटिका और न्यूजीलैंड के बीच एक महासागरीय कटक है जहाँ महासागरीय नितल का फैलाव 6 मीटर प्रतिवर्ष के दर से हो रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि जुरासिक काल के पहले दो ही महासागर थे– प्रथम अटलांटिक महासागर दूसरा प्रशांत। हिन्द महासागर का निर्माण जुरासिक काल के बाद सागरीय नितल प्रसार के परिणामस्वरूप ही हुआ है।

5. 1968 ई० में Joides Report प्रस्तुत  किया गया जिसका पूरा नाम Joint Oceanography Institution  of Deep Earth  Shivling  इस अंनुसन्धान Report  ने समुद्र नितल के 84 स्थानों पर अनुसंधान का कार्य किया। अपने अनुसंधान कर्यों में इसने भी समर्थन किया कि समुद्र नितल का प्रसार हो रहा है।

6. 2003 में NASA  उत्तरी अमेरिका अनुसंधान के एक रिपोर्ट के द्वारा लाल सागर के मध्य बैसाल्टिक संरचना का अध्ययन किया गया जिससे यह साबित हुआ कि लाल सागर का प्रसार हो रहा है।

          अतः स्पष्ट है कि अधिकतम नवीन प्रमाण हैरिहेस के परिकल्पना की पुष्टि करते है लेकि अभी इससे जुड़ी हुई कई समस्याएं है जैसे– पहला सबसे बड़ी समस्या यह है कि महासागरीय नितल के ऊपर विशाल जल राशि मौजूद होने के वाबजूद कैसे संतुलित बना हुआ है। दूसरी आलोचना प्लेट विवर्तनिकी से संबंधित है जो कहता है समुद्री नितल का प्रसार नहीं हो रहा है बल्कि प्लेटो का विस्तार/प्रसार हो रहा है।

निष्कर्ष 

          इन आलोचना के वाबजूद साग नितल प्रसार सिद्धान्त को व्यापक मान्यता प्राप्त है। इस पर किया गया अनुसंधान कार्य भूगर्भशास्त्र में अनुसंधान हेतु सन्दर्भ बिन्दु का कार्य करता है।



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17. Karst Topography / कार्स्ट स्थलाकृति

17. Karst Topography

(कार्स्ट स्थलाकृति)



चुना प्रधान वाले क्षेत्रों को कार्स्ट प्रदेश के नाम से जानते हैं। कार्स्ट प्रदेश शब्द एड्रियाटिक सागर के पूर्वी भाग में स्थित चूना पत्थर युक्त मैदान से लिया गया है। युगोस्लाविया के लोग ही चुना पत्थर (limestone) मैदान को कार्स्ट नाम से संबोधित करते हैं।  

        कार्स्ट प्रदेश में भूमिगत जल (underground water)अपरदन का सबसे प्रमुख दूत (agent) होता है। कार्स्ट प्रदेश में बनने वाले स्थलाकृतियों का सबसे पहले 1911 ई०  में जे.डब्ल्यू. बीड  एवं 1918 ई० में जे. स्वीजिक  ने अध्ययन किया था। कार्स्ट स्थलाकृति का निर्माण उन्हीं प्रदेश में होता है जहाँ निम्नलिखित तीन परिस्थितियाँ रहती है:-

(i) जहाँ विलियन (soluble) करने वाली चुना प्रधान चट्टाने पाई जाती हो।

(ii) चुना प्रधान चट्टानों में संरोध (Joints) का विकास हुआ हो।

(iii) चुना प्रधान चट्टानों के नीचे अपारगम्य चट्टान (Impermeable) पाई जाती हो तथा उसके अंदर पर्याप्त ढाल का विकास हुआ हो।

        कार्स्ट स्थलाकृति में निम्नलिखित अपरदित एवं निक्षेपित स्थलाकृति का निर्माण होता है-

अपरदित स्थलाकृति

(1) लैपिज (Lapies)

(2) विलियन रन्ध्र (Swallow Holes) और घोलरन्द्र (Sink Holes)

(3) डोलाइन (Doline)

(4) युवाला (Uvalas)

(5) पोल्जे (Polje) 

(6) पोनोर (Ponor)

(7) अंधी घाटी (Blind Valley)

(8) पोल्जे (Polje)

(9) कार्स्ट खिड़की (Karst Window)

निक्षेपित स्थलाकृति

(1) स्टैलैक्टाइट (Stalactite)

(2) स्टैलेग्माइट (Stalagmite)

(3) कन्दरा स्तम्भ/ गुफा स्तम्भ (Cave Pillars)

(4) टेरारोसा (Tera Rosa)

अपरदित स्थलाकृति

लैपिज (Lapies):

     लैपिज स्थलाकृति की तुलना यारदांग से की जा सकती है। यह यारदांग के समान उबड़-खाबड़ स्थलाकृति है। लैपीज का विकास उसी चूना पत्थर प्रदेश में होता है जहाँ संरोध का विकास नहीं हो पाता है। संरोध के अभाव में चूना पत्थर जल के साथ घुल कर प्रवाहित हो जाती हैं और धरातल पर उबड़-खाबड़ स्थलाकृति का विकास होता है, जिसे लैपीज कहते हैं।

विलियन रन्ध्र और घोलरन्द्र:   

         जिस चूना प्रधान प्रदेश में संरोध का विकास होता है उन प्रदेशों में संरोध के ऊपरी भाग में चूना पत्थर युक्त चट्टान जल में घुलकर भूमिगत हो जाती है जिससे घोलरन्ध्र (Sink Holes) का निर्माण होता है। घोलरन्द्र का आकार एक कीप के समान होता है। लेकिन जब चुना पत्थर चट्टान का विलियन तेजी से होता है तो घोलरन्ध्र के स्थान पर विलियन रन्ध्र (Swallow Holes) का निर्माण होता है। विलियन रन्ध्र का आकार एक बेलन के समान होता है।

डोलाइन (Doline):

      डोलाइन घोलरन्ध्र का ही विकसित रूप है। इसका ऊपरी व्यास 30 फीट से 40 फीट तक होता है। इसकी गहराई 6 से 75 फीट तक होता है। डोलाइन एक अस्थायी झील के समान होता है। कुछ समय के बाद इसके जल संरोध के सहारे भूमिगत हो जाते हैं और झील सूख जाती है। युगोस्लाविया से अलग हुए सर्बिया राज्य में डोलाइन के अनेक उदाहरण मिलते हैं।

 

पोनोर (Ponor):

        डोलाइन के नीचे स्थित संरोध के सहारे जब जल भूमिगत होती है तो संरोध के किनारे स्थित चूना पत्थर का विलियन हो जाता है जिसके कारण संरोध काफी चौड़ा हो जाता है। इसी चौड़े संरोध वाले स्थलाकृति को पोनोर कहते हैं। अर्थात् पोनोर एक प्रकार का संरचनात्मक पाइप है, जो डोलाइन एवं उपसतही (Subsurface Cave) के मध्य विकसित होता है। इसका विकास भी संरोध के सहारे होता है। इसे गुफा का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।

 

युवाला (Uvalas):

    डोलाइन भी क्रमशः बड़ा होता जाता है। जब दो डोलाइन आसपास होते हैं तो बढ़ते-बढ़ते उनके बीच की दीवार टूट कर गिर जाती है और वे आपस में मिल जाते हैं। इससे एक वृहद् गड्ढे का निर्माण होता है, जो युवाला (Uvalas) कहलाता है।

      अर्थात् जब दो या दो से अधिक डोलाइन आपस में मिल जाते हैं तो एक विस्तृत गर्तनुमा स्थलाकृति का निर्माण होता है जिसे युवाला कहते हैं। युवाला का व्यास कई किलोमीटर तक हो सकता है। जल से भर जाने पर यह एक वृहद् झील के रूप में नजर आता है।

 
पोल्जे (Polje)

      अंधी गुफा के ऊपरी छत में घोलरन्ध्र के सहारे विकसित संरोध विलयन की क्रिया से चौड़ा होकर कार्स्ट खिड़की का निर्माण करती है। जब अंधी घाटी का ऊपरी छत धँस जाता है तो धँसान से निर्मित गर्त को पोल्जे कहते हैं।

      पोनोर के सहारे जब विलियन की क्रिया अति तीव्र हो जाती है तो धरातल और अपारगम्य चट्टान के बीच एक चौड़ी गुफानुमा स्थलाकृति का विकास होता है जिसे अंधी घाटी या अंधी गुफा कहते हैं। दूसरे शब्दों में, पोनोर का ही अति विस्तृत भाग अंधी घाटी या अंधी गुफा कहलाता है।

कार्स्ट खिड़की (Karst Window):

     गुफा स्तंभ के अभाव में जब कभी गुफा की छत का कुछ भाग ध्वस्त होकर गिर जाता है तो गुफा की छत में वृहद् छिद्र का निर्माण हो जाता है, जो ‘कार्ट खिड़की’ के नाम से जाना जाता है। इसे खिड़की इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसके द्वारा घरातल के ऊपर से भूमिगत जल-प्रवाह एवं अन्य उपसतही स्थल रूपों को देखा जा सकता है।

निक्षेपित स्थलाकृति

(1) स्टैलैक्टाइट (Stalactite)

(2) स्टैलेग्माइट (Stalagmite)

(3) कन्दरा स्तम्भ/ गुफा स्तम्भ (Cave Pillars)

(4) टेरारोसा (Tera Rosa)

      चुना प्रधान प्रदेशों में निक्षेपण की प्रक्रिया दो स्थानों पर संभव है:-

(i)  धरातल के ऊपर और

(ii) गुफा के अंदर।

     धरातल के ऊपरी भाग में स्थित चूना पत्थर युक्त चट्टानें घुलकर किसी निम्न प्रदेशों में निक्षेपित हो जाती है तो चूना पत्थर युक्त मिट्टी के मैदान का निर्माण करती है। चुना पत्थर युक्त मिट्टी को ही टेरारोसा कहते हैं और निर्मित मैदान को टेरारोसा का मैदान कहते हैं।

         ब्राजील के दक्षिणी पूर्वी भाग में टेरारोसा मैदान का विकास हुआ है। इसी मैदान में वहाँ बड़े पैमाने पर कहवा की खेती की जाती है।

     गुफा के अंदर निम्न प्रकार के निक्षेपित स्थलाकृति विकसित होते हैं।

(i)  स्टैलेक्टाइट

(ii) स्टैलेगमाइट

(iii) कन्दरास्तम्भ

(iv) ट्रेवर्टाइन (Travertine)

         स्टैलेगटाइट का निर्माण गुफा के छत के सहारे होता है जबकि स्टैलेगमाइट का निर्माण गुफा के निचली सतह पर होता है।

         जब स्टैलेक्टाइट और स्टैलेगमाइट आपस में मिल जाते हैं तो उससे स्तंभ का निर्माण होता है। जब अंधी गुफा के ऊपरी क्षेत्र में स्थित संरोध के सहारे जल भूमिगत होती है तो चूना पत्थर युक्त जल गुफा के सतह पर बूंद-बूंद टपकने की प्रवृत्ति रखती है। धरातल पर चुनायुक्त जल के गिरते ही जल वाष्पीकृत हो जाता है और चुना का निक्षेपण हो जाता है तो उससे निर्मत गुम्बदाकार स्थलाकृति को स्टैलेगमाइट कहते हैं।

     जब गुफा (कन्दरा) में गुफा के छत के सहारे निर्मित संरोध के सहारे भूमिगत होने वाले जल का रफ्तार काफी धीमी हो तो चुना का निक्षेपण मधुमक्खी के छत के समान गुफा के छत के सहारे हो जाता है जिसे स्टैलेगटाइट करते हैं।

  Karst Topography

     कालांतर में जब स्टैलेक्टाइट और स्टैलेगमाइट मिल जाते हैं तो उसे कन्दरा स्तम्भ करते हैं। जब गुफा के अन्दर चूना पत्थर प्रधान वाले क्षेत्रों में लंबे समय तक अपरदन एवं निक्षेपण का कार्य  चलता रहता है तो अंत में “अपरदन सह निक्षेपित मैदान” मैदान का निर्माण होता है जिसे कार्स्ट मैदान के नाम से जानते हैं। इसे समप्राय मैदान से तुलना की जा सकती है।

ट्रेवर्टाइन (Travertine):

     गुफा की सतह पर निक्षेपित चूना-प्रधान मलबों कोट्रेवर्टाइनकहते हैं। ये प्रायः सफेद, हल्का पीला या पीला-भूरा होते हैं। चूना या कार्बोनेट खनिज की प्रधानता के कारण ये मुलायम एवं पारगम्य होते हैं। बाद में, इन्हीं निक्षेपित मलबों द्वारा कार्स्ट मैदान का निर्माण होता है।

        समप्राय मैदान के समान ही यहाँ भी कठोर चट्टान के टीले मिलते हैं जिसे यूरोप के लोग हम्स (Hums), क्यूबा के लोग मेंगॉट या Hay Stack तक कहते हैं।

निष्कर्ष:

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि चुना पत्थर वाले प्रदेश में भूमिगत जल से अनेक प्रकार के अपरादित एवं निक्षेपित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

नोट: सर्वप्रथम अमेरिकी भूगर्भवेत्ता जे.डब्ल्यू. बीडे (J.W. Beede) ने सन् 1911 ई. में “कार्स्ट प्रदेश में अपरदन चक्र की संकल्पना” प्रस्तुत की थी। बाद में सन् 1918 ई. में, साइबेरियाई भूगोलवेत्ता जोवान स्वीजिक (Jovan Cvijic) ने यूगोस्लाविया के कार्स्ट क्षेत्र के अध्ययन के आधार पर “कार्स्ट चक्र की संकल्पना” को व्यवस्थित ढंग से सामने रखा।

बिहार के रोहतास पठार पर पायी जाने वाली गुप्त-धाम कंदरा भी अंतर्भौम गुफा का एक प्रमुख उदाहरण है।



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16. Arid Topography / पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति/शुष्क स्थलाकृति

16. Arid Topography

(पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति/शुष्क स्थलाकृति)



पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति/शुष्क स्थलाकृति⇒Arid Topography             वैसे भौगोलिक क्षेत्र जहाँ वार्षिक वर्षा 50 सेमी० से कम होती है, उसे शुष्क प्रदेश या मरुस्थलीय प्रदेश कहते हैं। जैसे- सहारा, कालाहारी, पश्चिम आस्ट्रेलिया, मध्य एशिया, गोबी, थार, सोनोरान, अटाकामा, पेटागोनिया मरुस्थल इत्यादि।

        डेविस के अनुसार किसी भी भौगोलिक प्रदेश में दिखाई देने वाले विशिष्ट स्थलाकृतियों के समूह को भूदृश्य / भूआकृति या भ्वाकृतिक कहते हैं। भ्वाकृतियों या स्थलाकृतियों के विकास पर प्रक्रम का प्रभाव पड़ता है। प्रक्रम का तात्पर्य अपरदन के दूतों से है। शुष्क प्रदेश में अपरदन के दो प्रमुख प्रक्रम सक्रिय रहते हैं। जैसे:

(1) शुष्क वायु

(2) बहता हुआ जल (आकस्मिक वर्षा)

       ये दोनों प्रक्रम शुष्क प्रदेशों में अपरदन, परिवहन एवं निक्षेपण का कार्य करते रहते हैं।

अपरदन – शुष्क वायु अपरदन की क्रिया तीन प्रकार से करती है-

(i) अपवाहन (Deflation)- अपवाहन क्रिया में वायु चट्टान-चूर्ण उड़ाकर अपरदन का कार्य करती है।

(ii) अपघर्षण(Abrasion)- तीव्र वेग से वायु के साथ उड़ते हुए रेत व धूलकण मार्गवर्ती शैलों को रगड़ते एवं घिसते हैं।

(iii) सन्निघर्षण (Attrition)- वायु के साथ उड़ते हुए धूल व रेत कण परस्पर टकराकर चूर-चूर हो जाते हैं।

    शुष्क वायु अपरदन को प्रभावित करने वाले कारक:-

(i) वायु की गति

(ii) वायु में रेत व धूलकणों की मात्रा

(iii) शैलों की संरचना

(iv) जलवायु

परिवहन- जब वायु अपरदन किए हुए चट्टान-चूर्ण को अपने साथ लेकर प्रवाहित होती है तो उसे परिवहन कहते हैं।

निक्षेपण- जब चट्टान-चूर्ण के साथ उड़ते हुए वायु के मार्ग में कोई अवरोधक  मिलता है तो उसकी वहन क्षमता कम जाती है और चट्टान-चूर्ण का जमा होने लगता है, जिसे निक्षेपण कहते हैं।

शुष्क वायु द्वारा निर्मित अपरदित स्थलाकृति

1. वात गर्त/अपवाहन बेसिन

2. ज्यूगेन

3. यारडांग

4. गारा

5. छत्रक शिला

6. भूस्तंभ

7. मरुस्थलीय खिड़की

8. मरुस्थलीय पूल या मेहराव

9. ड्राई कान्टर

10. मरुस्थलीय बेसिन/अपवाह बेसिन

11. पेडीप्लेन एवं इंसेलवर्ग

निक्षेपित स्थलाकृति

1. बालुका स्तूप

(i) बरखान

(ii) सीफ

2. उर्मिल मैदान

3. लोएस मैदान

आकस्मिक व भारी वर्षा से निर्मित स्थलाकृति

1. जलोढ़ पंख

2. जलोढ़ शंकु

3. बाजदा

4. बालसन

5. प्लाया

6. सेलीनॉस

7. पेडीमेंट/पेडीप्लेन

8.अंत: प्रवाही नदी

अपरदित स्थलाकृति

1. ज्यूगेन:-

        जब शुष्क प्रदेश में कठोर एवं मुलायम चट्टान क्षैतिज एवं वैकल्पिक रूप में पायी जाती है। यदि सतह पर कठोर चट्टान हो तो तापीय प्रभाव से उसमें दरारें पड़ जाती है। उन दरारों के माध्यम से वायु प्रविष्ट कर मुलायम चट्टानों के अपरदन प्रारम्भ कर देती है, जिससे दवातनुमा स्थलाकृति बनती है, उसे ज्यूगेन कहते है।

जैसे – USA के कोलरेडो, दक्षिण कैलिफोर्निया क्षेत्र में

2. यारडांग:- 
        कठोर एवं मुलायम चट्टान लम्बवत एवं वैकल्पिक रूप में हो तो शुष्क वायु चट्टान के ऊपरी भाग मुलायम चट्टानों का अपघर्षण के माध्यम से अपरदित कर देती है और कठोर चट्टान यथावत रह जाता है, इसे यारडांग कहते है।
3. गारा एवं छत्रक शिला:- 
        मरुस्थलीय भागों में यदि कठोर शैल के रूप में ऊपरी आवरण के नीचे कोमल शैल लंबवत रूप में मिलती है तो इस कारण पवन द्वारा निचले भाग में अत्यधिक अपघर्षण द्वारा आधार कटने लगता है जबकि उसका ऊपरी भाग अप्रभावित रहता है। इस आकृति को गारा एवं छत्रक शिला कहा जाता है। 
* यदि पवन एक ही दिशा से चलती है तो कटाव एक ही दिशा में होती है- गारा 
* पवन कई दिशाओं में- छत्रक शिला
4. भूस्तम्भ:- 
         शुष्क प्रदेशों में जहाँ पर असंगठित एवं कोमल शैल के ऊपर कठोर तथा प्रतिरोधी शैल का आवरण होता है, वहाँ कठोर शैलों के नीचे कोमल शैलों का अपरदन नहीं हो पाता है परंतु समीप के कोमल चट्टानों का अपरदन हो जाता है। जैसे- कालाहारी एवं कोलरैडो
5. मरुस्थलीय खिड़की तथा मरुस्थलीय मेहराव/पुल:- 
    मरुस्थलीय क्षेत्रों में कांग्लोमरेट चट्टानों की प्रधानता होती है। इन चट्टानों की सामान्य विशेषता है कि कठोर भाग के मध्य में मुलायम चट्टानें भी मिलती है। मुलायम चट्टानें अपरदित होने के बाद खिड़की जैसी आकृति का निर्माण होता है जिसे मरुस्थलीय खिड़की कहते है।  जैसे- पेंटागोनिया मरुस्थल
 
      मरुस्थलीय खिड़की के विस्तृत रूप को ही मरुस्थलीय मेहराव/पुल कहा जाता है
6. अपवाह बेसिन/वात गर्त:- 
        सतह के ऊपर असंगठित तथा कोमल शैलों  के ढीले कणों को उड़ा ले जाती है जिस कारण छोटे-छोटे गर्तों का निर्माण होता है, जिसे अपवाह बेसिन कहते हैं। जैसे- सहारा, कालाहारी, यूएसए के पश्चिमी शुष्क प्रदेश
7. पेडीप्लेन एवं इंसेलवर्ग:- इसके निर्माण में जलीय प्रक्रम का अधिक योगदान होता है। 
* एल.सी. किंग- मरुस्थलीय प्रदेश के अंतिम अवस्था में अपरदन एवं निक्षेपण के परिणामस्वरूप लगभग समतल मैदान को- पेडिप्लेन 
* जगह-जगह मिलने वाले कठोर चट्टानों (लम्बवत) को- इंसलबर्ग कहते है 
8. ड्राइकांटर:- पथरीले मरुस्थल में सतह पर पड़े शीलाखंडों पर पवन के अपरदन द्वारा शिलाखंड चतुष्फलक आकृति का बन जाता है तो उसे ड्राइकांटर कहते हैं।
निक्षेपित स्थलाकृति 
1.बालुका स्तुप:- 
        जब चलती हुई शुष्क वायु के मार्ग में कोई अवरोधक मिल जाता है तो इन्हीं अवरोधकों  से टकराकर शुष्क वायु धूलकण निक्षेपण करने की प्रवृत्ति रखती है जिससे बालुका स्तूप का निर्माण होता है। वेगनौल्ड महोदय ने बालुका स्तूप को दो भागों में बाँटा है-
* अनुप्रस्त बालुका स्तूप- बरखान
* अनुधैर्य- सीफ
2. बरखान:- इसमें वायु का निक्षेपण अवरोधक के दोनों किनारों पर होता है जिसके कारण अर्धचंद्राकार आकृति बन जाती है, जिसे बरखान कहा जाता है।
3. सीफ:- जब बरखान का एक बाँह की लंबाई बढ़ जाती है तो देखने पर हॉकी स्टिक के समान लगता है जिसे सीफ कहते हैं।
4. उर्मिल मैदान:- जब बालू एवं धूलकणों का निक्षेपण तरंगित मैदान के रूप में होता है तो उसे उर्मिल मैदान कहते है
5. लोएस का मैदान:- आर्द्रता ग्रहण करने के कारण शुष्क वायु वहन क्षमता खो देती है। जैसे- चीन के मंचूरियन प्रांत- टकलामकान तथा गोबी  मरुस्थल के मैदान बालू से निर्मित है
 
आकस्मिक या भारी वर्षा से निर्मित स्थलाकृति
1. बाजदा:- प्लाया और पर्वतीय अग्रभाग के मध्य मंद ढाल वाले मैदान को बाजदा कहते है। इसका निर्माण मलवा के निक्षेपण से होता है
2. बालसन:- रेगिस्तानी भागों में पर्वतों से गिरी बेसिन को वालसन कहते हैं।
3. प्लाया:- बालसन के नीचे गर्त में महीन बालू कण, घुलनशील चट्टानों और जलयुक्त अस्थायी झील को प्लाया कहते हैं।
4. सेलिनॉस:- जब प्लाया झील का जल वाष्पीकृत होकर उड़ जाता है तो प्लाया झील बालसन का हिस्सा बन जाता है।
* कभी-कभी प्लाया झील सूखने के बाद नमक की परत दिखाई देती है वैसी परिस्थिति में उसे सेलिनॉस कहते हैं।
5. I आकार की घाटी:- USA के कोलरेडो पठार पर- I आकार की घाटी – ग्रैंड कैनियन
6. पेडीमेंट/पेडीप्लेन:-
       जब किसी उत्थित भूखंड पर आकस्मिक वर्षा होती है तो उत्थित भूखंड के ढाल पर स्थित ऋतुक्षरित चट्टानें  बहते हुए जल के साथ नीचे गिर जाती है। फलत: उत्थित भूभाग का ऊपरी भाग पूर्णत: नग्न हो जाता है जिसे पेडीमेंट/ पेडीप्लेन कहा जाता है।
7. अंत: प्रवाही नदी:- 
         मरुस्थलीय प्रदेशों में जब तीव्र वर्षा होती है तो छोटी-छोटी सरिताओं का विकास होता है लेकिन यह नदियाँ समुद्र से जाकर नहीं मिलती है। इसीलिए इसे अंत: प्रवाही नदी कहते है

निष्कर्ष:-   उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि मरुस्थलीय अथवा शुष्क प्रदेशों में शुष्क वायु, आकस्मिक भारी वर्षा के द्वारा कई विशिष्ट अपरदित एवं निक्षेपित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

विश्व के मरुस्थलीय क्षेत्र



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  15. GLACIAL PROCESS AND LANDFORMS / हिमानी प्रक्रम और स्थलरुप

 15. GLACIAL PROCESS AND LANDFORMS 

(हिमानी प्रक्रम और स्थलरुप)



विश्व में हिमानी के दो प्रमुख क्षेत्र है- 

(1) ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र (High mountainous regions)      

(2) ध्रुवीय क्षेत्र (Polar regions)

        नदी के समान प्रवाहित हो रहे हिम को हिमानी या हिमनद कहते है। नदियों की तरह हिमानी भी तीन प्रकार के कार्यों में संलग्न रहती है। 

(1) अपरदन (Erosion)

(2) परिवहन (Transportaion)

(3) निक्षेपण (Deposion)

     हिमानी अपरदन का कार्य कई तरह से सम्पादित करती है। जैसे-

(1) उत्पाटन (Plucking):- 

      जब हिमानी अपने मार्ग से गुरुत्वाकर्षण बल या हिमानी दबाव के कारण प्रवाहित होती है तो वैसी परिस्थिति में अगर कोई कठोर चट्टान मिल जाता है तो उसे हिमानी उखाड़कर फेंक डालती है, उसे उत्पाटन (Plucking) कहते है।

(2) तुषार अपरदन (Frost Erosion):- 

           जब ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में या ध्रुवीय क्षेत्रों में स्थित चट्टानों के संधि या दरारों में जल जमकर हिम के रूप में बदल जाता है तो हिम के आयतन बढ़ने से चट्टानों के ऊपर दबाव बल कार्य करने लगता है फलतः चट्टानें कमजोर होकर टूटने लगती है। इसे ही तुषार अपरदन (Frost Erosion) कहते है।

(3) अपघर्षण (Abrasion):-  

       हिमनद में छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते है। ये कंकड़ पत्थर ही अपरदन के यंत्र होते है। इन्हीं कंकड़-पत्थर की सहायता से हिमानी तलीय एवं क्षैतिज अपरदन का कार्य करती है।

(4) प्रसर्पण (Sweeping):-  

     वास्तव में नदी जल और हिमानी के गति में अंतर होता है। नदी जल में महीन तथा बारीक धूलकण नदी जल में लटककर और बड़े चट्टानी कण तली में लुढ़कते हुए चलते है। जबकि  हिमानी में सभी आकार के चट्टान एक ही साथ आगे बढ़ते है। जब हिम और सभी आकार के चट्टानी कण किसी ढ़ाल के सहारे एक ही साथ फिसलते हुए आगे बढ़ते है तो उसे प्रसर्पण कहते है।

(5) जलीय अपरदन (Water erosion):-

         हिमानी हिमरेखा (Snow line) के बाद पिघलना प्रारंभ हो जाती है जिसे अधोहिमानी (Subglacial) कहते है। अधोहिमानी में जहां एक ओर हिम के द्वारा अपरदन का कार्य होता है वहीं बहता हुआ जल भी अपरदन कार्यों में संलग्न रहती है। 

        जब हिमानी ढाल एवं गुरुत्वाकर्षण के सहारे आगे बढ़ती है तो उसमें मौजूद चट्टानी कणों को हिमोढ़ (Moraine) कहते है। हिमानी के द्वारा हिमोढ़ को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पर ले जाना, परिवहन कहलाता है। पुनः जब हिमानी पिघलने लगता है तो उसकी वहन क्षमता समाप्त हो जाती है जिसके फलस्वरूप हिमोढ़ का बड़े क्षेत्रों पर जमाव हो जाता है, जिसे निक्षेपण कहते है।

        हिमानी मुख्यतः तीन प्रकार के होते है:-

(1) पर्वतीय हिमानी/अल्पाइन हिमानी (Mountain Glaciers)

(Continental Glaciers

(2) महाद्वीपीय हिमानी (Continental Glaciers)

(3) पर्वतपदीय हिमानी (Piedmont Glaciers)

     पर्वतीय हिमानी का उदाहरण हिमालय पर्वत, आल्पस पर्वत, रॉकी एवं एंडिज पर्वत के ऊपरी भाग में मिलती है। 

(1) पर्वतीय हिमानी में गुरुत्वाकर्षण बल के कारण बर्फ ऊपर से नीचे की ओर आने की प्रवृति रखती है। 

(2) महाद्वीपीय हिमानी का प्रमाण ध्रुवीय क्षेत्रों में देखने को मिलता है। महाद्वीपीय हिमानी में हिम का प्रवाह बहुत ही मन्द होता है।

(3) पर्वतपदीय हिमानी का प्रमाण पेंटागोनिया के पठार पर मिलता है क्योंकि एंडिज पर्वत के पदीय भाग में स्थित होने के कारण इसे पर्वत पदीय हिमानी कहते है।

हिमानी के द्वारा निर्मित स्थलाकृति

      स्थलाकृति के विकास में पर्वतीय & महाद्वीपीय हिमानी का मुख्य योगदान होता है।

      पर्वतीय हिमानी के द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृतियों का विकास होता है :-

पर्वतीय हिमानी से निर्मित स्थलाकृति

(1) U-आकार की घाटी (U-Shaped Valley) & लटकती हुई घाटी (Hanging Valley)

(2) हिमगहवर/सर्क (Cirque)

(3) एरेट (Arete)

(4) कॉल (Col)

(5) पिरामिडल हॉर्न (Pyramidal Horn)

(6) अनुव्रती सोपान (Follow-up steps)

महाद्वीपीय हिमानी से निर्मित स्थलाकृति

(1) नुनाटक (Nunatak)

(2) रॉशमुतौनी (Roche Moutonnee)

(3) रॉक बेसिन (Rock Basins)

(4) टॉर्न (Tarn)

(5) अंगुलीनुमा झील (Finger Lake)

⇒ U-आकार की घाटी & लटकती हुई घाटी

        यह पर्वतीय हिमानी के द्वारा निर्मित एक अपरदित स्थलाकृति है। इसका अनुप्रस्थ काट U-आकार का होता है। जब पर्वतीय हिमानी ऊपरी भाग से नीचे की ओर खिसकती है तो हिम टुकड़ों के द्वारा तली पर एक समान अपरदन की क्रिया होती है। इसके अलावे हिम के द्वारा अपघर्षण का भी कार्य होता है। जिसके परिणामस्वरूप U-आकार की घाटी (U-Shaped Valley) विकसित होता है।

        जब कोई मुख्य हिमानी में सहायक हिमानी मिलती है तो उसमें भी छोटी U-आकार की घाटी विकसित होती है। लेकिन संगम स्थल पर मुख्य हिमानी की तुलना में सहायक हिमानी की तली ऊपरी भाग में लटका हुआ दिखाई देता है जिसके कारण उसे लटकती हुई घाटी कहते है।

⇒ हिमगहवर/सर्क/कोरी

        यह पर्वतीय हिमानी द्वारा निर्मित अपरदित स्थलाकृति है। इसका आकार  एक आरामकुर्सी के समान होता है। इसका निर्माण पर्वतपदीय क्षेत्र में होता है। क्योंकि जब ऊंचाई वाले क्षेत्रों से बर्फ (हिम) नीचे गिरती है तो हिम दबाव के कारण भूपटल का कुछ भाग अपरदित हो जाता है और अपरदन से आरामकुर्सी के समान गर्त का निर्माण होता है। इसी गर्त को हिमगहवर (Cirque) कहते है।

⇒ एरेट,कॉल तथा पिरामिडल हॉर्न

       जब किसी पर्वत के दोनों ढालों पर श्रृंखलाबद्ध अनेक सर्क का विकास हो जाय/ साथ ही कालांतर में दोनों ढालों पर विकसित सर्क आपस में मिल जाये तो ऐसी स्थिति में पहाड़ी के आर-पार अनुप्रस्थ घाटी का निर्माण हो जाता है। इन्हीं अनुप्रस्थ घाटियों को कॉल (Col) कहते है। इसकी तुलना दर्रा से भी की जाती है। दर्रा एवं कॉल में एक सामान्य अंतर यह है कि कॉल का निर्माण हिमानी अपरदन से होता है जबकि दर्रा का निर्माण नदी के अपरदन से होता है।

         दो कॉल के बीच स्थित कठोर चट्टान पिरामिड के समान दिखाई देते है जिन्हें पिरामिडल हॉर्न (Pyramidal Horn) कहा जाता है। जब कोई लम्बी पर्वतीय श्रृंखला के कटक पर स्थित मुलायम चट्टानों को हिमानी के द्वारा अपरदित कर दिया जाता है तो कठोर  चट्टानें एक श्रृंखला में या कंघी के समान दिखाई देते है। ऐसे ही कंघीनुमा पर्वतीय कटक को एरेट/अरेट (Arete) कहते है।

◆ स्वीटजरलैंड में मैटरहॉर्न पर्वत पर अरेट, पिरामिडल हॉर्न एवं कॉल का प्रमाण मिलता है।

कुमायूँ हिमालय में स्थित माना एवं नीति कॉल का उदाहरण है।

अनुवर्ती सोपान (Follow-up steps)

        यह एक सीढ़ीनुमा स्थलाकृति है। यह पर्वतीय हिमानी की लम्बवत घाटी है। अर्थात पर्वतीय हिमानी (स्रोत) से समुद्र तट (मुहाना) तक निर्मित हिमानी के अनुवर्ती घाटी को अनुवर्ती सोपान / हिमसोपान (Glacial Stairway) कहते है। अनुवर्ती सोपान की उत्पति के सम्बंध में तीन प्रमुख विचार प्रकट किए गए है।

प्रथम विचारजब हिमानी के मार्ग में कठोर एवं लम्बवत चट्टानें मिल जाती है तो हिमानी उसे अपरदन नहीं कर पाता है जिसके कारण सीढ़ीनुमा स्थलाकृति का विकास होता है।

दूसरा विचारधारा- जब कोई मुख्य हिमानी में आकर सहायक हिमानी मिलती है तो उस परिस्थित में हिम का मात्रा बढ़ जाने के कारण संगम स्थल से आगे तलीय अपरदन और बढ़ जाता है। पुनः जब एक और सहायक हिमानी मिलती है तो पुनः अपरदन में होने वाले वृद्धि से सोपानीकृत अनुवर्ती घाटी का विकास होता है।

तीसरे विचार- ऐसी सोपानीकृत अनुवर्ती घाटी का विकास भूतल उत्थान एवं धंसान से भी हो सकता है।

      अनुवर्ती सोपान का उदाहरण नार्वे, स्वीडन, आइसलैंड, ग्रीनलैण्ड में देखने को मिलता है।

महाद्वीपीय हिमानी से निर्मित स्थलाकृति

          महाद्वीपीय हिमानी में पर्वतीय हिमानी के समान घाटी का निर्माण नहीं होता है बल्कि विस्तृत क्षेत्र के हिम रेंगते हुए धीमी गति से गुरुत्वाकर्षण ढाल के अनुरूप आगे बढ़ते है। ऐसी स्थिति में महाद्वीपीय हिमानी के द्वारा कई स्थलाकृति का विकास होता है। 

       जब महाद्वीपीय हिमानी के मार्ग में कोई कठोर चट्टान या अवरोधक मिल जाता है तो हिमानी अपना मार्ग न बदलकर उसी कठोर चट्टान के ऊपर से पार कर जाता है जिसके कारण महाद्वीपीय हिमानी के बीच-बीच में उभरा हुआ भाग दिखाई देता है जिसे नुनाटक कहते है।

रॉशमुतौनी / भेड़शैलपीठ / मेशशिलापीठ

           यदि किसी महाद्वीपीय हिमानी के मध्य कठोर चट्टान की पहाड़ी मिल जाती है तो हिमनी अपना मार्ग न बदलकर उस कठोर चट्टान के ऊपर चढ़कर पार करने की प्रवृति रखती है जिधर से हिमानी चढ़ने की प्रवृति रखती है उधर वाला भाग अपघर्षण से चिकना हो जाता है। लेकिन पहाड़ी के शीर्ष पर पहुँचने के बाद हिमानी दूसरे ढाल पर गुरुत्वाकर्षण के कारण हिम टूटकर नीचे गिरती है और पहाड़ी के दूसरी ढाल पर उबड़-खाबड़ सतह के निर्माण करती है। जिसके कारण भेड़ के समान स्थलाकृति का विकास होता है जिसे रौशमुतौनी/भेड़शैलपीठ (Roche Moutonnee) कहते है।

रॉक बेसिन/ टॉर्न तथा अंगुलीनुमा झील

             यदि हिमनी के सतह पर कोई छोटी कठोर एवं उत्थित चट्टान मिलती है तो उसे हिमानी उखाड़ फेंकती है। चट्टानों के उखड़ जाने से जिस गर्त का निर्माण होता है उसे रॉक बेसिन (Rock Basins) कहते है। रॉक बेसिन के निर्माण होते ही उसमें बर्फ भर जाता है और हिमानी के प्रवाह की दिशा में उसका अग्र भाग अपरदित होकर टॉर्न का निर्माण करती है। जब टॉर्न का लम्बी अवधि तक अपरदन होता है तो अंगुलीनुमा झील का निर्माण होता है ऐसी स्थलाकृति का उदाहरण फिनलैण्ड और कनाडा में बड़े पैमाने पर देखने को मिलती है।

फियोर्ड (Fiords)

         यह भी हिमानी के द्वारा निर्मित एक अपरदित स्थलाकृति है। इसका निर्माण महाद्वीपीय एवं पर्वतीय दोनों हिमानी से होता है। फियोर्ड का निर्माण प्रायः समुद्रतलीय क्षेत्रों में होता है क्योंकि जब पर्वतीय या महाद्वीपीय हिमानी समुद्र में उतरती है तो किनारों पर अपरदन का कार्य अधिक होता है और ज्यों-ज्यों किनारे से समुद्र की ओर जाते है त्यों-त्यों तलीय अपरदन का कार्य कम होता है। फलतः फियोर्ड में किनारे में अधिक गहरा और समुद्र की ओर जाने पर उसकी गहराई घटते जाती है। ऐसी स्थलाकृति का प्रमाण नार्वे तट पर अधिक देखने को मिलता है। 

⇒ नार्वे के तट को फियोर्ड तट के नाम से जानते है।

⇒ विश्व के सबसे लंबा फियोर्ड सोगनी फियोर्ड है।

हिमानी के द्वारा निर्मित निक्षेपित स्थलाकृति

         अपरदन के अन्य दूत के समान हिमानी भी कई प्रकार के निक्षेपित स्थलाकृति का निर्माण करते है। जब हिमानी आगे की ओर बढ़ती है तो वह भी पर्याप्त मात्रा में चट्टान, धूलकण, गाद, बोल्डर क्ले इत्यादि को लेकर आगे बढ़ती है। हिमानी के द्वारा ले जाया जाने वाले मलवों के समूह को हिमोढ़ कहते है। हिमोढ़ के निक्षेपण से दो प्रकार के स्थलाकृति विकसित होती है :-

1. अस्तरित  स्थलाकृति (Unstratified Topography)

2. स्तरित स्थलाकृति (Stratified Topography)

             हिमनी अपरदन से बोल्डर क्ले का विकास बड़े पैमाने पर होता है जिनका स्तरीकरण संभव नहीं हो पाता है उससे विकसित स्थलाकृति को अस्तरित स्थलाकृति कहते है। 

              लेकिन जब हिमानी के मलवे आपस में चूना पत्थर, क्ले, गाद इत्यादि के कारण एक-दूसरे से जुड़ जाते है तो स्तरित स्थलाकृति का विकास होता है।

            अस्तरित स्थलाकृति का विकास हिमरेखा के ऊपरी भाग में जबकि हिमरेखा के नीचे स्तरित स्थलाकृति का विकास होता है।

⇒ हिमरेखा- ऐसी रेखा जहाँ से बर्फ पिघलकर हिम के साथ-साथ पानी भी प्रवाहित होने लगती है।

अस्तरित स्थलाकृति

        जब हिमानी अपने घाटी मार्ग से आगे की ओर बढ़ती है तो बड़े पैमाने पर हिमोढ़ का जमाव करते हुए आगे प्रवाहित होती है। जब हिमोढ़ का जमाव तलीय भाग में होता है तो तलीय हिमोढ़ (Ground Moraines) कहते है। जब हिमोढ़ का जमाव किनारों पर होता है तो उसे पार्श्व हिमो (Lateral Moraines) कहते है। जब दो हिमानी के मिलन बिंदु पर हिमोढ़ का जमाव होता है तो उसे मध्य हिमोढ़ (Medial Moraines) कहते है और जब हिमानी अपने मुहाना पर हिमोढ़ का जमाव करती है तो उसे अंतिम हिमोढ़ (Terminal Moraines) कहते है।

         अंतिम हिमोढ़ के बाद कभी-कभी हिमोढ़ का निक्षेपण उल्टे हुए नाव के समान होता है जिसे ड्रमलिन (Drumlin) या अंडों की टोकरी वाली स्थलाकृति कहते है। इसका अक्ष हिमनी प्रवाह की दिशा में होता है।

        जब महाद्वीपीय हिमानी आगे की ओर प्रवाहित होती है तो बड़े क्षेत्रों में या हजारों किमी. भूभाग में बोल्डर क्ले का निक्षेपण कर देती है जिससे निर्मित स्थलाकृति को टिल प्लेन (Till Plain or Till Sheet) कहते है।

अमेरिका का प्रेयरी मैदान और साइबेरिया का मैदान (रूस) टिल प्लेन का उदाहरण है।

 स्तरित स्थलाकृति

          स्तरित स्थलाकृति का निर्माण हिम रेखा के बाहर होता है। ऐसी स्थलाकृति में बोल्डर क्ले एवं अन्य चट्टानी कण एक-दूसरे से जुड़ जाती है। स्तरित स्थलाकृति में सबसे प्रमुख अवक्षेप का मैदान, केम, केटल (Kettles), सन्दूर घाटी एवं एस्कर है।

         जब हिमरेखा के बाहर बर्फ पिघलना प्रारंभ होता है तो हिम के द्वारा लाये गए हिमोढ़ एवं क्ले का निक्षेपण बड़े क्षेत्रों में किया जाता है तो अवक्षेप मैदान (Outwash Plain) का निर्माण होता है।

         हिम रेखा के बाहर जब बर्फ पिघलने लगती है तो नदी के समान ही कई शाखाओं में बंटकर हिमजल उपसरिताओं में बहने लगती है। ये उपसरिताएँ ही सन्दूर घाटी (Sandur Valley) कहलाती है।

         संदूर घाटी के बीच-बीच में मिलने वाले डेल्टानुमा स्थलाकृति को केम (Kame) कहते है।

         कभी-कभी जब महाद्वीपीय हिमानी प्रवाहित होती है तो उसके मार्ग में मिलने वाला गर्त बर्फ से भर जाता है तथा उसके चारों ओर हिमोढ़ का जमाव हो जाता है। कालांतर में जब बर्फ पिघलता है तो चित्र के अनुरूप स्थलाकृति का विकास होता है। इसे केम-केटल स्थलाकृति कहते है।GLACIAL PROCESS AND LANDFORMS

        जब महाद्वीपीय हिमानी का बर्फ पिघलने लगता है तो हिमानी के तली पर जलोढ़ एवं हिमोढ़ का जमाव एक तटबंधनुमा स्थलाकृति के रूप में होता है, जिसे एस्कर (Easker) कहा जाता है। कभी-कभी एस्कर का आकार माला के समान हो जाता है, इसीलिए इसे मालाकार एस्कर (Garland eskar) भी कहा जाता है। 
निष्कर्ष 

        उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमानी के अपरदन एवं निक्षेपण से हिमरेखा के अंदर एवं बाहर कई स्थलाकृतियों का विकास होता है।


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  14. River Landforms / नदी द्वारा निर्मित स्थलाकृति

  14. River Landforms

(नदी द्वारा निर्मित स्थलाकृति)



River Landforms

        बहते हुए जल को नदी की संज्ञा दी जाती है। जहाँ से नदी निकलती है उसे स्रोत क्षेत्र और जहाँ नदी समुद्र में मिलती है उसे मुहाना कहते है। अपरदन के दूतों में बहता हुआ जल सबसे प्रमुख अपरदन का दूत है। अमेरिकी भूगोलवेत्ता डब्लु० एम० डेविस ने सबसे पहले नदी से निर्मित स्थलाकृतियों की विवेचना अपरदन चक्र सिद्धान्त के माध्यम से करने का प्रयास किया था।

          डेविस के अनुसार नदी द्वारा अपरदन का कार्य चक्रिय होता है। नदी हमेशा आधारतल तक अपरदन का कार्य करती है। आधारतल तक नदी अपरदन समाप्त करती है तो ही नई उत्थान की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। जिससे पुनः नया अपरदन चक्र प्रारम्भ होती है। नदी के द्वारा ऊपरी भाग में अपरदित और निचले भाग में निक्षेपित स्थलाकृति का निर्माण होता है। नदी निम्नलिखित अपरदित स्थलाकृति का निर्माण करती है।

1. नदी घाटी का विकास–

(i) I- आकार की घाटी 

(ii) V- आकार की घाटी 

(iii) गॉर्ज तथा कैनियन

2. जलप्रपात

3. उच्छल्लिका/क्षिप्रिका एवं जलगर्तिका & अवनमन कुण्ड 

4. नदी वेदिका

5. नदी विसर्प (River terraces)

6. समप्राय मैदान और मोनाडनॉक (Monadanox)

नदी घाटी का विकास– 

(i) I- आकार की घाटी तथा

(ii) V- आकार की घाटी 

      डेविस महोदय ने बतलाया कि उत्थान के तत्काल बाद लघु सरिताएँ ढ़ाल के अनुरूप बहने लगती है जिसके कारण तलीय अपरदन का कार्य तीव्र गति से होने लगता है जिसके कारण I- आकार की घाटी विकसित होती है। इसी घाटी में कुछ समय के बाद तलीय अपरदन कम और क्षैतिज अपरदन अधिक हो जाने के कारण V- आकर की घाटी का निर्माण होता है। 

            

(iii) गॉर्ज तथा कैनियन

      गॉर्ज तथा कैनियन दोनों ही V-आकार की घाटियों के रूप में होते है जिनमें किनारे की दीवाल अत्यंत खड़े ढ़ाल वाली होती है तथा चौड़ाई की अपेक्षा गहराई बहुत अधिक होती है। जब नदियाँ कठोर चट्टानों को काटती है तो निर्मित गहरी घाटी गॉर्ज तथा जब मुलायम चट्टानों को काटती है तो निर्मित गहरी घाटी कैनियन कहलाता है। जैसे- सिंधु नदी द्वारा निर्मित सिंधु गॉर्ज (जम्मू कश्मीर में गिलगिट के पास) तथा कोलरैडो नदी द्वारा निर्मित ग्रांड कैनियन (USA)।

2. जलप्रपात

      जब नदियाँ अधिक ऊँचाई से खड़े ढाल के ऊपरी भाग से नीचे की ओर गिरती है तो जलप्रपात का निर्माण करती है। इसमें कठोर एवं मुलायम चट्टान क्षैतिज व्यवस्थित होती है। उदाहरण भारत मे शरावती नदी पर निर्मित जोग जलप्रपात (कर्नाटक)।

3. उच्छल्लिका/क्षिप्रिका

      जब नदी अपने मार्ग से प्रवाहित हो रही हो और इस क्रम में इसके तल पर अगर कठोर चट्टानों एवं मुलायम चट्टानों लम्बवत व्यवस्थित हो तो मुलायम चट्टानों का तो तो अपरदन कर देती है लेकिन कठोर चट्टान के अपरदन न कर पाने के कारण चट्टानों पर जल उछलते हुए बहने की प्रवृति रखती है। इसे ही उच्छल्लिका/क्षिप्रिका कहते हैं। उदाहरण- USA का सेंट लौरेंस नदी पर स्थित नियाग्रा जलप्रपात विश्व का सबसे बड़ा Rapid  का उदाहरण है।

जलगर्तिका & अवनमन कुंड (Potholes and Plunge pools)

      नदी की तली में स्थित चट्टानों को जब नदी उखाड़कर फेंक देती है तो निर्मित गर्तों को जलगर्तिका (Potholes) कहते है। जब जलगर्तिका की गहराई तथा व्यास अधिक हो जाता है तो उसे अवनमन कुंड (Plunge pools) कहते है।

4. नदी वेदिका

        नदी की घाटी के दोनों किनारों पर स्थित जलस्तर में परिवर्तन के कारण या भूपटल के उत्थान एवं पतन के कारण सीढ़ीनुमा स्थलाकृति का विकास होता है जिसे नदी वेदिका की संज्ञा दी जाती है।

5. नदी विसर्प 

      जब नदी प्रौढ़ावस्था से गुजर रही होती है तो नदियाँ मोड़ लेकर बहने लगती है जिसे नदी विसर्प कहा जाता है। मोड़ लेती हुई नदी के जलस्तर में या आधारतल में किसी तरह का परिवर्तन होता है तब मोड़ के अंदर मोड़ विकसित होता है। इसे अधःकर्तित विसर्प कहते है।

6. समप्राय मैदान और मोनाडनॉक

        डेविस के अपरदन चक्र की अंतिम अवस्था में नदियों द्वारा लम्बवत अपरदन नहीं हो पाता है। निरपेक्ष तथा सापेक्ष उच्चावच दोनों न्यूनतम होते है। घाटियाँ उथली तथा अत्यधिक चौड़ी हो जाती है इस पर नदियाँ मियांडर बनाती हुई विस्तृत बाढ़ के मैदानों का निर्माण करती है, लगभग इस समतल मैदान को डेविस ने सम्प्राय मैदान (पेनिप्लेन) का नाम दिया है। इस सतह पर कठोर चट्टान के लम्बवत टुकड़े यत्र-तत्र दिखाई पड़ते है इन अवशिष्ट पहाड़ियों को ही डेविस ने मोनाडनॉक कहा है।

नदी द्वारा निर्मित निक्षेपित स्थलाकृति

नदी  निम्नलिखित निक्षेपित स्थलाकृतियों का निर्माण करती है-

1. जलोढ़ शंकु

2. जलोढ़ पंख

3. प्राकृतिक तटबन्ध

4. बाढ़ का मैदान

5. गोखुर झील (Ox-bow lake)

6. डेल्टा

1. जलोढ़ पंख और जलोढ़ संकु-

      पहाड़ी भाग में नदियाँ संकीर्ण एवं ढलवाँ भाग को छोड़कर ज्यों ही मैदानी भाग में प्रवेश करती है तो ढ़ाल में कमी होने के कारण नदी जल की गति घट जाती है। जिसके कारण पहाड़ी क्षेत्र से लाये गए मलवा का निक्षेपण प्रारंभ हो जाता है। बड़े आकार के चट्टानों के निक्षेपण अगले भाग में होता है। साथ ही छोटी-छोटी सरिताएँ मार्ग बदलते हुए इधर-उधर प्रवाहित होते रहती है जिस कारण शंकुनुमा स्थलाकृति का निर्माण होता है। इसे जलोढ़ शंकु कहते है। जैसे- शिवालिक पर्वत के दक्षिणी ढ़ाल पर।

      कई जलोढ़ शंकु जब आपस में मिल जाते है तब जलोढ़ पंख का निर्माण होता है।  

जलोढ़ पंख

2. प्राकृतिक तटबंध और बाढ़ का मैदान

      वर्षा ऋतु में जब बाढ़ आती है तो नदी जल के साथ लाये गए मलवा को नदी किनारे पर  समतल क्षेत्र में फैला देती है जिससे एक चौरस मैदान का निर्माण होता है, उसे जलोढ़ मैदान या बाढ़ का मैदान कहते है। अगर बाढ़ के दिनों में नदी के जल के प्रवाह में अचानक वृद्धि हो जाये तो मैदानी क्षेत्र में पहले से फैले पानी स्थिर रह जाते है, जिसके कारण नदी के किनारों पर एक उत्थित स्थलाकृति का निर्माण होता है, जिसे प्राकृतिक तटबंध कहते है। गंगा नदी के द्वारा पटना के पास, ब्रह्मपुत्र नदी के द्वारा गुवाहाटी के पास, चीन का ह्वांगहो नदी और गुजरात के पास, ताप्ती नदी प्राकृतिक तटबंध का निर्माण करती है। 

3. गोखुर झील-

               जब नदियाँ मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है तो मोड़ लेकर बहने लगती है जिसे विसर्प (Meander) कहते है।                         

            कालान्तर में एक समय ऐसा आता है जब नदी के दो मोड़ आपस में मिल जाते है और मुड़ा हुआ भाग अलग हो जाता है, चूंकि इसकी आकृति गाय के खुर के समान होता है, इसीलिए इसे गोखुर झील कहा जाता है। गंगा के मैदानी क्षेत्र में इसके कई प्रमाण मिलते है। 

4. डेल्टा-

      जब नदी जल समुद्र के शांत पानी में प्रवेश करती है तो नदी का प्रवाह रुक सा जाता है जिसके कारण नदी के मुहाने पर मलवा के निक्षेपण से त्रिभुजाकार स्थलाकृति का निर्माण होता है जो डेल्टा कहलाता है। 

• डेल्टा शब्द की उत्पति मिस्र से हुई है।

• डेल्टा शब्द का प्रथम प्रयोग ‘हेरोडोटस’ के द्वारा किया गया था। 

• डेल्टा आकार के दृष्टिकोण से यह कई प्रकार का होता है-

         चापाकार डेल्टा (नील नदी का डेल्टा, गंगा ब्रह्मपुत्र का डेल्टा), पंजाकर डेल्टा (मिसौरी तथा मिसीसिपी का डेल्टा), एश्चुअरी डेल्टा (इसका निर्माण जलमग्न नदियों के मुहाने पर एश्चुअरी के किनारों पर जमाव के कारण होता है- भारत की नर्मदा एवं ताप्ती नदियाँ)

निष्कर्ष

           उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि बहते हुए जल से आर्द्र प्रदेश में विशिष्ट अपदनात्मक एवं निक्षेपणात्मक स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।


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13. NORMAL CYCLE OF EROSION / सामान्य अपरदन चक्र का सिद्धान्त – By W.M. DEVIS

13. NORMAL CYCLE OF EROSION

(सामान्य अपरदन चक्र का सिद्धान्त – By W.M. DEVIS)



NORMAL CYCLE OF EROSION

    जब समुद्रतल से ऊपर उठा हुआ कोई भी भूभाग बाह्य शक्ति या अपरदन के दूतों  के द्वारा काँट- छाँट कर एक अकृतिविहीन समतल मैदान का निर्माण किया जाता है तो इस समयावधि को अपरदन चक्र कहते है।

     पृथ्वी का भूपटल दृढ़ भूखण्डों से निर्मित है जिसे प्लेट कहते है। पृथ्वी के भूपटल पर आंतरिक एवं बाह्य दो प्रकार की शक्तियाँ सतत कार्यरत रहती है। आंतरिक शक्तियों में ज्वालामुखी, भूकम्प एवं भूपटल को विरूपित करने वाले अन्य शक्ति (जैसे- संवहन तरंग) को शामिल करते है। जबकि बाह्य शक्तियों में जलवायु, बहता हुआ जल, भूमिगत जल, हिमानी, शुष्क वायु, समुद्री तरंग, इत्यादि को शामिल करते है।

     आंतरिक शक्तियाँ भूपटल में विषमता (उत्थान, धंसान, वलन) उत्पन्न करती है । जबकि बाह्य शक्तियां भूपटल में उतपन्न विषमता को समाप्त कर समतल मैदान के रूप में बदलने का प्रयास करती है अर्थात बाह्य शक्तियां  प्राकृतिक कैंची के समान है जो अपरदन के माध्यम से धरातल को अपरदित कर समतल करते रहती है

        अपरदन चक्र की संकल्पना सर्प्रथम स्कॉटलैंड के भूगोलवेत्ता जेम्स हटन ने प्रस्तुत किया था। इन्होनें भूपटल का भूवैज्ञानिक अध्ययन कर अपना मत प्रस्तुत किया कि “भूपटल पर न तो आदि का लक्षण है और न ही अंत की कोई आशा” जेम्स हटन के इसी विचार ने अपरदन चक्र की संकल्पना को जन्म दिया। जेम्स हटन के बाद अमेरिकी भूगोलवेत्ता W. M. डेविस और जर्मन भूगोलवेत्ता पैंक ने अपरदन चक्र पर अलग-अलग मत प्रस्तुत किया।

      प्रारम्भ में डेविस महोदय ने “सामान्य अपरदन चक्र सिद्धान्त” प्रस्तुत किया। बाद में जब उनकी आलोचना होने लगी तो उन्होनें कहा कि जब पहले से एक अपरदन चक्र चल रहा हो तो बीच में आंतरिक एवं बाह्य शक्तियां आधार तल में परिवर्तन ला सकती है। जिसके कारण पूर्व का अपरदन चक्र बाधित हो जाता है और नवीन अपरदन चक्र प्रारम्भ हो जाता है। इस तरह किसी भी भौगोलिक क्षेत्र में एक से अधिक अपरदन चक्र के स्थलाकृति का प्रमाण मिलने वाले क्षेत्र को “बहुचक्रिय स्थलाकृति क्षेत्र” से सम्बोधित किया।

      इस तरह डेविस को बहुचक्रीय  स्थलाकृति की संकल्पना प्रस्तुत करने का श्रेय जाता है। कालान्तर में जर्मन भूगोलवेत्ता वाल्थर पैंक और एल्बर्ट पैंक (फादर) ने डेविस के सामान्य अपरदन चक्र सिद्धान्त का आलोचना करते हुए संशोधित एवं आधुनिक अपरदन चक्र का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इस तरह आधुनिक स्थलाकृति विज्ञान का जन्मदाता पैंक (फादर- बेटा) को माना जाता है।

डेविस का सामान्य अपरदन चक्र 

          डेविस का सामान्य अपरदन चक्र सिद्धान्त भौगोलिक चक्र का सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। अमेरिकी भूगोलवेत्ता W. M. डेविस ने 1889 ई० में “Geographical Essay” नामक पुस्तक में अपरदन चक्र सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

          डेविस ने अपरदन चक्र सिद्धान्त को परिभाषित करते हुए कहा कि “अपरदन चक्र समय की वह अवधि है जिसके अंतर्गत एक उत्थित भूखण्ड अपरदन क्रिया द्वारा प्रभावित होकर एक आकृतिविहीन समतल मैदान का निर्माण करती है।”  

     डेविस ने बताया कि किसी समतल भूखण्ड के उत्थान के बाद उस पर तीन कारकों का प्रभाव पड़ता है –

(i) संरचना (Structure)

(ii) प्रक्रम (Process) और

(iii) समय (Time or Stage)।

       इसी आधार पर डेविस ने यह परिकल्पना प्रस्तुत किया कि किसी भौगोलिक क्षेत्र का “भूदृश्य संरचना, प्रक्रम और समय का फलन होता है।” A landscape is a function of structure, process and time इस परिकल्पना को डेविस का त्रिकट (Trio of Devis) के नाम से जानते है। 

       अपरदन  चक्र आर्द्र प्रदेश में, शुष्क प्रदेश में, चुना पत्थर प्रधान क्षेत्रो में, समुद्र तलीय क्षेत्र में,एवं ध्रुवीय क्षेत्रों में सतत चलता रहता है। डेविस ने अपना सिद्धान्त आर्द्र प्रदेश के संदर्भ में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि आर्द्र प्रदेश में बहता हुआ जल/नदी अपरदन का दूत होता है। बहता हुआ जल सम्पूर्ण प्रदेश को अपरदन क्रिया से प्रभावित करता है और प्रदेश में अपरदन चक्र को संचालित करता है। आर्द्र प्रदेश में अपरदन की क्रिया चक्रीय रूप से सक्रिय रहती है।

      डेविस ने अपरदन चक्र की तुलना मानव के जीवन चक्र से किया है। जैसे एक मानव जन्म के बाद युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था से होकर गुजरते हुए अपने जीवन लीला को समाप्त करता है और पुनः जन्म लेता है ठीक उसी प्रकार से सामान्य अपरदन चक्र उपरोक्त तीनों अवस्थाओं से होकर गुजरती है। उन्होंने पुनर्जन्म को पुनरुत्थान से तुलना किया है। 

मान्यताएँ (Assumptions):-

     डेविस का अपरदन  चक्र सिद्धांत निम्नलिखित तीन मान्यताओं पर आधारित है-

1. अपरदन चक्र के लिए उत्थान अति आवश्यक है तथा उत्थान में समय बहुत कम लगता है।

2. जब उत्थान के कार्य पूरा हो जाता है तब अपरदन का कार्य प्रारंभ होता है।

3. उत्थित भूखण्ड में तीव्र ढ़ाल होती है जिसके कारण उसमें अनियमितताएँ आती है तथा बहता हुआ जल अनेक स्थलाकृति को जन्म देती है।

          डेविस के अनुसार जो भी स्थलखंड तीन मान्यताओं को पूरा करती है वहाँ पर अपरदन चक्र सक्रिय रहता है। किसी भी प्रदेश का अपरदन चक्र निम्नलिखित अवस्थाओं से पूरा होती है:-

(1) युवावस्था/तरुणावस्था (Youth Stage)

(2) प्रौढावस्था (Mature Stage)

(3) वृद्धावस्था (Old Stage)

          उपरोक्त तीनों अवस्थाओं का निम्नलिखित विशिष्टाएँ है:-NORMAL CYCLE OF EROSION

 (1) युवावस्था (Youth Stage)

         युवावस्था में भूपटल के उत्थान के बाद अपरदन की क्रिया प्रारंभ हो जाती है। इसीलिए इस अवस्था को अपरदन की अवस्था कहते है। युवावस्था में निम्नलिखित विशिष्ट स्थलाकृतिक का विकास होता है। 

• सरिताएँ I- आकर की घाटी का निर्माण करती है।

• छोटे-छोटे सरिताओं का विकास होता है।

• युवावस्था में तलीय कटान अधिक और क्षैतिज कटान बहुत कम होता है जिससे सँकरी एवं गहरी घाटी (गॉर्ज) का विकास होता है।

• क्षैतिज कटान कम होने के कारण जलविभाजक रेखा चौड़ी होती है।

• इस अवस्था में सरिता अपहरण की घटना होती है। जिसके कारण जगह-जगह पर मृत नदी घाटी या सुस्त नदी घाटी दिखाई देता है।NORMAL CYCLE OF EROSION• तलीय अपरदन के कारण उच्छल्लिका (Rapids) का निर्माण होता है। उच्छल्लिका का निर्माण उस वक्त होता है जब नदी मार्ग के नीचे कोई लम्बवत कठोर चट्टान मिलती है। जब नदी के नीचे मिलने वाला कठोर चट्टान पूर्णतः क्षैतिज होता है तो जलप्रपात का निर्माण होता है।

• अगर नदी मार्ग में मिलने वाला कठोर चट्टान छोटा एवं हल्का हो तो उसे नदी उखाड़कर फेंक देती है और जलगर्तिका का निर्माण करती है।NORMAL CYCLE OF EROSION

          इस अवस्था के प्रारम्भ में उच्चावच कम होती है। लेकिन अवस्था के अंत में तलीय कटान के कारण उच्चावच अधिकतम हो जाती है।

(2) प्रौढ़ावस्था (Mature Stage)

            प्रौढ़ावस्था को दो भागों में बाँटा जाता है।

(i) प्रारम्भिक प्रौढ़ावस्था

(ii) अंतिम प्रौढ़ावस्था

     प्रारम्भिक प्रौढ़ावस्था में  क्षैतिज अपरदन का कार्य तेजी से होने लगता है और तलीय अपरदन कम होने लगता है। क्षैतिज अपरदन से V– आकार का घाटी का निर्माण होता है। जल विभाजक रेखा को चौड़ाई घटने लगता है। 

      अंतिम प्रौढ़ावस्था में V-आकर की घाटी और खुलने लगती है। जल विभाजक की  चौड़ाई में और कमी आने लगती है। अंतिम प्रौढ़ावस्था में अपरदन और निक्षेपण दोनों साथ-साथ होती है। इसीलिए उच्चावच और ढ़ाल में कमी आने लगती है। तलीय अपरदन न्यून हो जाता है। कम ढ़ाल के कारण नदियाँ गाद लेकर प्रवाहित होने लगती है। अंतिम प्रौढ़ावस्था में नदियाँ बाढ़ का मैदान गोखुर झील और प्राकृतिक बांध का निर्माण करती है। इन स्थलाकृतियों को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है। NORMAL CYCLE OF EROSION(3) वृद्धावस्था (Old Stage)

       डेविस ने बताया कि वृद्धावस्था में केवल निक्षेपण का कार्य होता है। नदियाँ वितरिका में बँटने लगती है। जल विभाजक की चौड़ाई न्यूनतम हो जाती है। “खुली हुई V-आकार की घाटी” का निर्माण करती है। मुहाना पर डेल्टा का निर्माण होता है। वृद्धावस्था के अंत में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है जिसे समप्राय मैदान (Peneplain) कहते है। समप्राय मैदान में कहीं कहीं कठोर चट्टाने दिखाई देती है। जिसे मोनाडनौक (Monadnock) कहते है।

    डेविस ने अपरदन चक्र के विभिन्न अवस्थाओं में बनने वाले घाटी, समप्राय मैदान, मोनाडनौक और अवस्था का नीचे के मॉडल से समझाया है।NORMAL CYCLE OF EROSION

         डेविस के अनुसार जब कोई उत्थित भौगोलिक भूखण्ड वृद्धावस्था से गुजर रहा होता है तो तभी उसमें पुनरुत्थान की क्रिया होती है तो उसके बाद पुनः नवीन अपरदन चक्र प्रारम्भ होता है। डेविस ने पुनरुत्थान की क्रिया को मानव के पुनर्जन्म से तुलना किया था। 

आलोचना (Criticism)

      डेविस के अपरदन चक्र सिद्धांत की कई आधारों पर आलोचना की गई है:-

1. डेविस ने माना कि उत्थान के बाद अपरदन होता है तो इस पर प्रश्न उठाया जाता है कि क्या भूखण्ड के उत्थान होने तक अपरदन के दूत निष्क्रिय रहते है।

2. डेविस ने बताया कि उत्थान में समय बहुत कम लगता है लेकिन वास्तव में उत्थान बहुत लंबी अवधि तक चलने वाली क्रिया है। 

3. डेविस ने यह भी कहा था कि जलखण्ड के उत्थान हो जाने के बाद लंबे समय तक स्थिर है लेकिन यह मान्य नहीं है।

4. डेविस ने यह नहीं बताया कि भूखंडों का उत्थान क्यों होता है?

5. जर्मन विद्वान वाल्थर पेंक ने कहा है कि कोई भी अपरदन चक्र अवस्था का फलन नहीं होता है बल्कि दशाओं (Phase) का फलन होता है। 

6. डेविस ने एक भी समप्राय मैदान का उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया है और न ही वैसे क्षेत्रों का उदाहरण दिया है जहां पर अपरदन चक्र चल रही हो। ऐसे में यह सिद्धान्त काल्पनिक जान पड़ता है।

7. जर्मन विद्वानों ने इसके नामाकरण पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

8. जर्मन विद्वान ओमाल ने कहा है कि यह एक अत्यंत सरलीकृत परिकल्पना है।

निष्कर्ष

         इन आलोचनाओं के बावजूद डेविस के सिद्धांत को व्यापक मान्यता प्राप्त है क्योंकि इस दिशा में उसके द्वारा किया गया प्रथम प्रयास था। बाद में डेविस के ही अपरदन चक्र सिद्धान्त को आधार मानकर पेंक ने अपना विचार प्रकट किया।



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7. Plate Tectonic Theory / प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत

7. Plate Tectonic Theory

(प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत)




Plate Tectonic Theory

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत⇒

Plate Tectonic Theory

      प्लेट विवर्तनिकी एक ऐसा सिद्धान्त है जो भू-भौतिकी से संबंधित अनेक घटनाओं जैसे- पर्वत निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखी क्रिया इत्यादि के संबंध में व्यक्त किये गये सभी परम्परागत सिद्धान्तों का परित्याग कर एक नया विचार प्रस्तुत करता है।

       इस परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी का ऊपरी भाग दृढ़ भूखंडों से निर्मित है। ये भूखंड कई भागों में विभक्त है, इसके एक भाग को प्लेट से संबोधित करते है। अर्थात् पृथ्वी के ऊपरी ठोस परत को ही प्लेट कहते है। इसके अंतर्गत न सिर्फ महाद्वीपीय एवं महासागरीय भूपटल (Crust) शामिल हैं बल्कि मैंटल का ऊपरी पतला हिस्सा भी शामिल है। वास्तव में यह स्थलमंडल (Lithosphere) ही है, जिसके नीचे दुर्बलमंडल (Astheno sphere) स्थित है।

सर्वप्रथम वर्ष 1955 में कनाडा के भू-वैज्ञानिक जे. टूजो विल्सन (J-Tuzo Wilson) ने ‘प्लेट’ शब्द का प्रयोग किया था। इन प्लेटों के  स्वभाव और प्रवाह से संबंधित अध्ययन को ही प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त कहते है। यह सिद्धांत किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित नहीं है बल्कि इसमें कई विद्धानों (मोर्गन, मैकेंजी व पार्कर इत्यादि) का योगदान है। इस सिद्धांत के विकास में पहले से चली आ रही निम्नलिखित तीन सिद्धांतों का महत्वपूर्ण योगदान हैः-

(i) महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत (अलफ्रेड वेगनर, 1912 ई.)

(ii) संवहन तरंग सिद्धांत (ऑर्थर होम्स, 1929 ई.)

(iii) समुद्र तली प्रसार सिद्धांत (हैरीहेस, 1960 ई.)

परंतु 1962 ई० में हैरिहस महोदय ने इन सभी विचारों को संगठित कर एक सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत किया।

{नोट:

♣ प्लेट शब्द- टूजो विल्सन

♣ प्लेट विवर्तनिकी शब्द- मोर्गन

♣प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का प्रतिपादन- हैरिहेस

♣ प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत की वैज्ञानिक रूप से विस्तृत व्याख्या- मोर्गन

♣ प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत में अन्य भू-वैज्ञानिक जो सहायता किए- मैकेंजी व पार्कर}

प्लेटों का स्वभाव तथा संख्या

   इस परिकल्पना के अनुसार प्लेटों की अधिकतम मोटाई महाद्वीपीय भागों में 100 किमी० और न्यूनतम मोटाई  महासागरीय भागों में 5 किमी० तथा औसत मोटाई 70 किमी० है। अमेरिकी अर्थ साइंस के अनुसार पृथ्वी  के 7 बड़े और 6 छोटे प्लेट निम्नलिखित है-

प्रमुख प्लेट (बड़े प्लेट)- 7

1. प्रशांत महासागरीय प्लेट

2. उ० अमेरिकी प्लेट

3. द० अमेरिकी प्लेट

4. अफ्रीकन प्लेट

5. यूरेशियन प्लेट

6. इण्डियन प्लेट (इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट)

7. अंटार्कटिका प्लेट

नोट: कुछ विद्वान उत्तरी अमेरिका एवं दक्षिणी अमेरिका को एक ही प्लेट मानते हैं। ऐसी स्थिति में बड़े प्लेटों की संख्या 6 हो जाती है।

गौण प्लेट (छोटे प्लेट)- 6

(i) अरेबियन प्लेट

(ii) फिलीपींस /फिलीपाइन प्लेट

(iii) कोकस प्लेट

(iv) नास्का प्लेट

(v) स्कोशिया प्लेट

(vi) कैरेबियन प्लेट

Plate Tectonic Theory

प्लेटों के प्रकार

⇒ गति के आधार पर

    इस सिद्धांत के अनुसार गति के आधार पर प्लेटों को दो भागों में बांटा जाता है–

1. स्थिर प्लेट

2. गतिशील प्लेट

       स्थिर प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे नहीं चल रही है जबकि गतिशील प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे चल रही है।

⇒ संरचना के आधार पर

     संरचना के दृष्टिकोण से प्लेट दो प्रकार के होते है-

1. महासागरीय प्लेट:-  प्रशांत महासागरीय प्लेट, इण्डियन प्लेट या इंडो-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट।

⇒ गति- 5 सेमी० प्रति वर्ष

2. महाद्वीपीय  प्लेट:- उ० अमेरिकी प्लेट, द० अमेरिकी प्लेट, अफ्रीकन प्लेट, युरेशियन प्लेट, अंटार्कटिका प्लेट।

⇒ गति- 2 सेमी० प्रति वर्ष

       महासागरीय प्लेट बैसाल्ट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व (2.9 ग्राम/सेमी०3) अधिक है जबकि महाद्वीपीय प्लेट ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व (2.7 ग्राम/सेमी०3)  कम है।

प्लेट सीमांत तथा प्लेट सीमा        

      इस सिद्धांत के अनुसार किसी एक प्लेट के किनारे या अंत के हिस्से को प्लेट सीमांत (Plate Margins) कहते है।

      ‘प्लेट सीमा’ (Plate Boundaries) दो या दो से अधिक प्लेटों के मध्य का वह क्षेत्र है जिसके सहारे वे आपस में मिलते (converge) हैं या दूर जाते (diverge) हैं या घर्षण (slide) करते हैं।

    इसके अनुसार प्लेट में 3 प्रकार की सीमाएं होती है। इसे  निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-

(i) अभिसारी प्लेट सीमा
(ii) अपसारी प्लेट सीमा
(iii) संरक्षी प्लेट सीमा
प्लेटों के संचालन शक्तियाँ

        इस सिद्धांत के अनुसार सभी प्लेट पृथ्वी के अक्ष का अनुसरण करते हुए पूरब से पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हो रही है। प्लेटों में गति हेतु कई कारक उत्तरदायी माना गया हैजैसे-

(i) पृथ्वी के घूर्णन गति,

(ii) प्लवनशीलता बल,

(iii) गुरुत्वाकर्षण बल और प्लेटों का 45° पर प्रत्यावर्तन,

(iv) सूर्य एवं चन्द्रमा का ज्वारीय बल,

(v) संवहन तरंग आदि।

         इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों में 3 प्रकार के गतियाँ पायी जाती है जैसे-

(i) निर्माणकारी प्लेट गति- इसकी उत्पत्ति अपसरण प्लेट सीमा के सहारे होती है।

(ii) विनाशकारी प्लेट गति- इसकी उत्पति अभिसारी प्लेट सीमा के सहारे होती है।

(iii) संरक्षी प्लेट गति- इसकी उत्पति संरक्षी प्लेट सीमा के सहारे होती है।

प्लेटों का क्रियाविधि

         उठती हुई संवहन तरंगे अपसरण सीमा को जन्म देती है। इसी सीमा के सहारे दरार का निर्माण होता है। इन दरारों से ही दुर्बलमंडल से लावा/मैग्मा निकलती है, जिससे ज्वालामुखी क्रिया होती है। गिरती हुई संवहन तरंगे अभिसारी सीमा का निर्माण करती है। इस सीमा के सहारे अधिक घनत्व वाले प्लेट कम घनत्व वाले प्लेट में घुसने की प्रवृति रखती है। प्लेट अत्यधिक अंदर जाकर पिघलती है और “बेनी ऑफ जोन” निर्माण करती है तथा चट्टानों के वलन के साथ-साथ ज्वालामुखी का उदगार भी होता है। इसे निम्न चित्र से समझा जा सकता है-

सिद्धांत के पक्ष में प्रस्तुत किये गए प्रमाण

   प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के समर्थन में निम्नलिखित प्रमाण प्रस्तुत किये गए है–

1. ज्वालामुखी:

         विश्व के ज्वालामुखी वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी क्रियाएं अभिसारी प्लेट सीमा के सहारे होती है।

2. भूकम्प:

       भूकम्पीय वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित क्षेत्रों में आती है ये क्षेत्र संरक्षी प्लेट सीमा के सहारे स्थित है।

3. सागर नितल प्रसार और पुराचुम्बकत्व:-

        सागर नितल प्रसार सिद्धान्त से स्पष्ट है कि सागर नितल प्रसार अपसारी सीमा के सहारे हो रही है तथा नवीन चट्टानों में पुराचुम्बकत्व का गुण कम तथा पुराने चट्टानों में पुराचुम्बकत्व का गुण अधिक पाया जाता है।

4. भूगर्भिक समस्याओं का समाधान:-

        प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के माध्यम से कई भूगर्भिक समस्याओं का समाधान होता है। जैसे- पर्वतों के उत्त्पति, भूकंप, भूसंचलन, महाद्वीपीय विखण्डन, समुद्री नितल प्रसार, पुराचुम्बकत्व, द्वीपीय चाप के निर्माण आदि।

आलोचना

       उपरोक्त विशेषताओं के वाबजूद इस सिद्धांत की कई खामियाँ है। जैसे- 

(i) प्लेटों की संख्या का स्पष्ट पता नहीं चल पाता है। जैसे-जैसे सर्वेक्षण किए जा रहे हैं, प्लेटों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है।

(ii) हॉट स्पॉट की संख्या का भी स्पष्ट पता नहीं चल पाता है।

(iii) कई संभावित क्षेत्रों में बेनी ऑफ जोन का निर्माण नहीं हुआ है।

(iv) बेनी ऑफ जोन से निकलने वाला मैग्मा पदार्थ के परिणाम का वैज्ञानिक व्याख्या नहीं करता। 

(v) प्लेटों में संवहन तरंगे क्यों उत्पन्न होती है? इसकी स्पष्ट व्याख्या नहीं किया गया है।

(vi) एक प्लेट को एक ही दिशा में गतिशील होना चाहिए, लेकिन कई प्लेटों में विपरीत (opposite) गति के प्रमाण भी मिलते हैं, जैसे- अफ्रीकी प्लेट।

(vii) कई प्राचीन मोड़दार पर्वतों के निर्माण की व्याख्या करने में यह सिद्धांत सक्षम नहीं है, जैसे- सेरा डो मार (Serra do Mar) पर्वत (ब्राजील), ड्रेकेन्सबर्ग पर्वत (दक्षिण अफ्रीका), ग्रेट डिवाइडिंग रेंज (ऑस्ट्रेलिया) आदि पर्वतों की अवस्थिति प्लेट सीमा पर नहीं है, वरन् प्लेटों के मध्य है।

(viii) रचनात्मक सीमा मध्य महासागरीय कटक के रूप में सभी महासागरों में पाए जाते हैं, लेकिन विनाशात्मक सीमा अथवा प्रत्यावर्तन क्षेत्र (सिंक/Sink) सभी महासागरों में नहीं पाए जाते हैं। ये मुख्यतः प्रशांत महासागर के तटों के सहारे ही देखे जाते हैं।

     इन सीमाओं के वाबजूद भूगर्भ विज्ञान का एक क्रांतिकारी विचार है क्योंकि भूपटल से संबंधित सभी भूगर्भिक घटनाओं का एक बार में ही व्याख्या प्रस्तुत करता है।



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  5. Isostasy / भूसंतुलन /समस्थिति 

5. Isostasy 

भूसंतुलन /समस्थिति


Isostasy⇒Isostasy

            भूसंतुलन भूगोल की एक ऐसी संकल्पना है जो भूपटल के विभिन्न स्तंभों के मध्य पाये जाने वाले संतुलन को व्याख्या करता है। भूसंतुलन का सामान्य अर्थ  “परिभ्रमण करती हुई पृथ्वी के ऊपर उभरे हुये क्षेत्र (जैसे-पर्वत, पठार, मैदान) एवं नीचे स्थित क्षेत्रों  (सागर, झील) में भौतिक एवं यांत्रिक स्थिरता भूसंतुलन कहलाता है।”

     भूसंतुलन आंग्ल भाषा में ‘Isostasy या Equilibrium’ कहलाता है। Isostasy शब्द ग्रीक भाषा के Isostasius से बना है जिसका तात्पर्य समस्थिति होता है। आइसोस्टैसी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1889 ई० में अमेरिकी भूवैज्ञानिक C.F. डटन ने किया था। इन्होंने कहा था कि समस्थिति के कारण ही पर्वत, पठार, मैदान और समुद्र साथ-साथ स्थित है। बहिर्जात बल पर्वतों से मिट्टी काट-काट कर समुद्र एवं मैदान में निक्षेपित करते रहते हैं। इसीलिए मैदान एवं समुद्र तली का भार अधिक तथा पर्वतों के भार कम होते है। भार में कमी या अधिकता के कारण भूगर्भ के भूपटल पर दबाव समान रूप से नहीं पड़ता है। समस्थिति इसी दबाव के विभिन्नता को संतुलन बनाये रखने में मदद करता है।

        डटन ने बताया कि जिस रेखा के सहारे भूपटलीय संतुलन कायम रहता है उसे ‘समदबाव तल’ (Level of Uniform Pressure) अथवा ‘समतोल तल’ (Isotatic Level) या ‘क्षतिपूर्ति तल’ (Level of Compensation) कहते है।

        ऑर्थर होम्स महोदय ने भूसंतुलन की व्याख्या करते हुए कहा है कि “संतुलन की वह दशा जो भूपटल पर विभिन्न ऊँचाई वाले पर्वत, पठार, मैदान अथवा सागरीय नितल के मध्य पायी जाती है, भूसंतुलन कहलाता है।”

भूसंतुलन सिद्धांत का बुनियाद

      भूकम्पीय तरंगो के अध्ययन से यह सिद्ध हो चुका है कि पृथ्वी के विभिन्न भागों के घनत्व भिन्न-भिन्न है। इनकी पुष्टि भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा भी किया गया है। 1859 ई० में गंगा सिंधु मैदान के मध्य में अक्षांश ज्ञात करते समय दो विधियों को प्रयोग में लाया गया:-

 (l) साहुल विधि

 (ll) त्रिभुजीकरण विधि          

         यह अक्षांशीय मापन का कार्य कल्याण एवं कल्याणपुर नामक स्थान पर किया जा रहा था। इन दोनों स्थानों पर उपरोक्त दोनों विधियों द्वारा आये परिणाम में भारी अंतर था। यह अंतर 5.236 सेकंड बताया गया। इस अंतर का कारण बताते हुए विद्वानों ने बताया कि साहुल को हिमालय पर्वत अपनी ओर आकर्षित कर रही है लेकिन पुनः यह प्रश्न उठाया गया कि अगर हिमालय साहुल को अपनी ओर आकर्षित कर रही है तो हिमालय जितना विशाल है उस दृष्टि से आकर्षण और अधिक होना चाहिए तथा अंतर 15 सेकेंड से भी अधिक होना चाहिए। कालांतर में इसी जटिल तथ्यों की व्याख्या भूसंतुलन से करने का प्रयास किया गया। बताया गया कि हिमालय के नीचे स्थित चट्टानों के घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व से भी कम है। जबकि समुद्र नितल का घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व से अधिक है। यही कारण है कि दोनों के बीच संतुलन की स्थिति कायम है। भूसंतुलन को स्पष्ट करने हेतु अनेक मत प्रतिपादित किये गये है:-

(1) एयरी का मत

(2) प्रौट का मत

(3) हिस्कानेन का मत

(4) जौली का मत

(1) एयरी का मत

       1859 ई० में एयरी ने अपना मत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार “भूपटल के प्रत्येक स्तम्भ का घनत्व समान है, जो भाग जितना ऊँचा है वह उसी अनुपात में भूगर्भ में घुसा हुआ है। अर्थात जो भाग अधिक ऊंचा है उसका अधिक भाग और जो भाग कम ऊँचा है उसका कम ही भाग भूगर्भ में घुसा हुआ है।”

           एयरी महोदय ने पृथ्वी के विभिन्न भू-स्तंभों की तुलना जल में तैरते हुए हिमशीलाखंडों से किया है। उन्होंने अपने मत का व्याख्या करने हेतु आर्कमिडीज के सिद्धान्तों का सहारा लिया है। अर्कमिडीज के अनुसार “कोई भी तैरती हुई वस्तु अपनी मात्रा के समतुल्य द्रव्य को नीचे से हटा देती है”। हिम के संबंध में कहा कि “हिम जब पानी के ऊपर तैर रहा होता है तो उसका 1/9 भाग जल के ऊपर तथा शेष 8/9 भाग जल में डूबा रहता है।”

          धरातल के प्रत्येक भाग के लिए उसका 8 गुणा भाग धरातल के नीचे धंसा रहता है। इसे  सिद्ध करने के लिए एयरी ने एक प्रयोग के माध्यम से प्रदर्शित किया है। एयरी ने भूपटल के विभिन्न भागों की तुलना लौह धातु के छोटे-बड़े टुकड़ों से किया है। उन्होंने बताया कि जब लोहे के विभिन्न ऊँचाई वाले टुकड़े को द्रव में डुबोया जाता है तो जिस लोहे के टुकड़े की ऊँचाई अधिक होता है उसका उतना अधिक भाग द्रव में डूबा रहता है और जो लोहा का टुकड़ा कम ऊँचा रहता है उसका उतना ही कम भाग द्रव में डूबा रहता है।

Isostasy

आलोचना

      अगर एयरी के मत को सही मान लिया जाय तो इनके अनुसार जो भाग जितना ऊँचा होगा उसका उतना ही भाग धरातल के अंदर घुसा हुआ होगा। जैसे -अगर हिमालय की ऊँचाई को आधार बनाया जाय तो 2 लाख 70 हजार फीट गहरा जड़ होना चाहिए लेकिन दूसरी ओर यह भी ज्ञात है कि धरातल के नीचे जाने पर प्रति 32 मीटर की गहराई पर 1°C तापमान बढ़ जाती है। इस प्रकार हिमालय की इतनी गहरी जड़ धरातल के अंदर अति उच्च तापमान के कारण यथावत नहीं रह सकती। अतः इनका विचार भ्रामक है।

       एयरी के मत का दूसरा आलोचना यह है कि पृथ्वी के सभी भू-स्तंभों का औसत घनत्व एक समान है जबकि भूकम्पीय तरंगो के अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि पृथ्वी के विभिन्न स्तम्भों का घनत्व अलग-अलग है।

निष्कर्ष:

       एयरी के द्वारा भूसंतुलन के दिशा में किया गया यह प्रथम प्रयास था। उनके मत को “Uniform Density with Varying Depthness” (एक समान घनत्व के साथ बदलता हुआ गहराई) नामक सिद्धांत से भी जानते है। दूसरी एयरी के मत से यह भी स्पष्ट हुआ कि पहाड़ों के जड़ें होते है। इस तरह एयरी के विचार में कुछ खामियों के बावजूद विशेष महत्व रखता है।

प्रौट के मत

           प्रौट महोदय ने अपना विचार Royan Geography of Landform (1859 ई०) में प्रस्तुत किया था। उन्होंने कल्याण एवं कल्याणपुर के बीच साहुल एवं त्रिभुजीकरण विधि से किये गए मापन के परिणाम में आये अंतर के संबंध में विचार प्रकट करते हुए कहा कि पृथ्वी के सभी भू-स्तंभो का घनत्व एक समान नहीं है बल्कि अलग-अलग है। जैसे- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व पठारी चट्टानों के घनत्व से कम है। पठारी चट्टानों का घनत्व मैदानी चट्टानों के घनत्व से कम है और मैदानी चट्टानों के घनत्व समुद्री भूपटल के घनत्व से कम है।

          प्रौट महोदय ने बताया कि पृथ्वी का सभी भू-स्तंभ एक क्षतिपूर्ति रेखा के सहारे एक-दूसरे के परिपेक्ष्य में संतुलित है। उन्होंने ऊँचाई और घनत्व के बीच व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध  बताया अर्थात पृथ्वी के ऊपर स्थित भू-स्तंभ का घनत्व भले ही अलग-अलग हो लेकिन सभी भू-स्तंभ एक समान गहराई के साथ भूपृष्ठ में धँसे हुए है। इसे स्पष्ट करने के लिए उन्होंने निम्नलिखित प्रयोग के माध्यम से पुष्टि करने का प्रयास किया है:-

चित्र: प्रौट का भू-संतुलन

         प्रौट अपने मत (Varying Density With Uniform Depth) को उपरोक्त चित्र के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि पृथ्वी के विभिन्न भू-स्तंभ के घनत्व अलग-अलग है और चित्रानुसार ही एक क्षतिपूर्ति रेखा के सहारे सभी भू-स्तंभ संतुलित है।            

आलोचना

    बहुत से विद्वानों ने प्रौट के विचारों का आलोचना करते हुए कहा कि इनका मत एयरी के मत का ही संशोधित रूप है। कुछ विद्वानों ने यह भी कहा है कि भूपटल के विभिन्न भू-स्तंभ उस तरह से नहीं है जैसा कि विभिन्न धातुओं का उदाहरण देकर प्रौट ने बताया है। फिर भी इन आलोचनाओं के बावजूद क्षतिपूर्ति रेखा और विभिन्न घनत्व के निर्मित भू-स्तंभ भूसंतुलन संकल्पना की सराहनीय कदम है।                                                  

हिस्कानेन  का मत

        1933 ई०  में भूसंतुलन के संबंध में हिस्कानेन  अपना अवधारणा प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने एयरी तथा प्रौट के विचारों को संगठित रूप से प्रदर्शित किया। हिस्कानेन ने बताया कि समुद्री भूपटल की चट्टानों का घनत्व ऊँचे उठे हुए भूभाग से अधिक होता है। इन्होंने यह भी अनुमान लगाया कि भूपटल के प्रत्येक स्तंभों में भी अलग-अलग गहराई पर घनत्व में परिवर्तन होता रहता है। इसके अतिरिक्त विभिन्न स्तम्भों का घनत्व एवं उनकी लंबाई भी भिन्न-भिन्न होती है। इस अनुमान के आधार पर हिस्कानेन ने पुनः बताया कि अधिक घनत्व वाले भूस्तम्भ का लंबाई कम होगा और कम घनत्व वाले भूस्तम्भ की लंबाई अधिक होगी तथा भिन्न-भिन्न गहराई पर  भूस्तम्भों का घनत्व भी भिन्न-भिन्न होगी। लेकिन एक भू-स्तम्भ के नीचे जाने पर घनत्व बढ़ता जाएगा।

             इस तरह हिस्कानेन के मत से पर्वतों के जड़ की व्याख्या होती ही है साथ ही भू-स्तम्भों के विभिन्न भागों में घनत्व की विभिन्नता का भी समाधान प्रस्तुत करता है।

जौली का मत

         1925 ई०में जौली महोदय ने भूसंतुलन सिद्धान्त का प्रतिपादन कर यह स्पस्ट किया कि क्षतिपूर्ति तल की गहराई 100 KM  है। जौली के अनुसार भूपटल के ऊपरी भाग का घनत्व 2.7 है। इसके नीचे 16 KM गहरी पट्टी है। जिसमें पदार्थों के घनत्व में विभिन्नता पायी जाती है। इसका कारण औसत घनत्व 3 है। इसी 16 KM पट्टी के ऊपर कम घनत्व के पदार्थ पाये जाते है जिस प्रकार बर्फ पानी में तैरता हुआ अपने वजन के बराबर पानी हटाता है। ठीक उसी प्रकार महाद्वीपीय एवं महासागरीय भूपटल सीमा के ऊपर तैर रहे है।

              ये दोनों भूपटल अपने अपने वजन के अनुरूप भूपटल के नीचे स्थित सीमा के पदार्थों को विस्थापित करते है और एक-दूसरे के परिपेक्ष्य में संतुलित रहते है।

Isostasy

        भूसंतुलन का सिद्धांत कुछ संदर्भों में सही प्रतीत होता है। लेकिन कुछ ऐसे भी प्रमाण मिले हैं जो भूसंतुलन सिद्धात के आधार पर व्याख्या नहीं किया जाता है। ऐसे में इस सिद्धांत पर प्रश्न चिन्ह खड़े किए जाते है। फिर भी पृथ्वी के विभिन्न भू-स्तम्भों के मध्य पाया जाने वाला संतुलन का व्याख्या करने में यह सिद्धांत सक्षम है।


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