Category ECONOMIC GEOGRAPHY (आर्थिक भूगोल)

25. The Distribution and Production of Coal in World (विश्व में कोयला के वितरण पवं उत्पादन)

25. The Distribution and Production of Coal in World

(विश्व में कोयला के वितरण पवं उत्पादन)



प्रश्न प्रारूप

Q. विश्व में कोयला के वितरण पवं उत्पादन पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the distribution and production of coal in world.)

उत्तर- विश्व में कोयले का वितरण-

      आधुनिक अनुमानों के अनुसार विश्व में लगभग 10,009 करोड़ मीट्रिक टन कोयला संचित है, फिर भी इसका भण्डार प्रति वर्ष घटता-बढ़ता रहा है, क्योंकि बहुत सारे देशों में अभी सर्वेक्षण अपूर्ण है। यूरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया में ज्ञात भण्डार का 90 प्रतिशत कोयला सुरक्षित है, जबकि आस्ट्रेलिया, दक्षिणी अमेरिका और अफ्रीका का अंश मात्र 10 प्रतिशत है। सुरक्षित भण्डार के दृष्टिकोण से संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, चीन, भारत, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, ब्राजील और कनाडा अग्रणी देश हैं।

कोयला का उत्पादन:-

     विश्व में 1860 के बाद वृहद पैमाने पर कोयले का उत्पादन होने लगा। 1860 में विश्व का कुल उत्पादन मात्र बीस करोड़ मीट्रिक टन 1930 में 141 करोड़ मीट्रिक टन, 1960 में 262 करोड़ मीट्रिक टन और 1986 में 430 करोड़ मीट्रिक टन रह गया, लेकिन 2007 में पुनः बढ़कर 639.6 करोड़ मीट्रिक टन पहुँच गया।

     वर्तमान समय में अग्रणी उत्पादकों में चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत, आस्ट्रेलिया एवं रूस हैं, जो विश्व उत्पादन का 74.5 प्रतिशत से अधिक कोयला उत्पादित करते हैं। सर्वाधिक उच्च कोटि का कोयला भी इन्हीं देशों में उत्पादित होता है। अन्य प्रमुख उत्पादकों में दक्षिणी अफ्रीका, जर्मनी, पोलैण्ड, इण्डोनेशिया और कजाकिस्तान का सामूहिक उत्पादन 15 प्रतिशत है। इस प्रकार केवल 10 देश विश्व का 88.4 प्रतिशत कोयला उत्पादित करते हैं। गौण उत्पादकों में ब्राजील, कोलम्बिया, हंगरी और पूर्व यूगोस्लाविया है जहाँ का उत्पादन पचास लाख मीटरी टन से कम है।

उत्तरी अमेरिका:-

      उत्तरी अमेरिका में संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको विश्व का लगभग 18 प्रतिशत से अधिक कोयला उत्पादित करते हैं। यहाँ विश्व का 28 प्रतिशत से अधिक कोयला भण्डार सुरक्षित है।

संयुक्त राज्य अमेरिका:-

     संयुक्त राज्य अमेरिका में विश्व का 27.9 प्रतिशत कोयला भण्डार है। फलतः यह विश्व का अग्रणी देश है। 1970 तक इसका उत्पादन भी विश्व में सर्वाधिक 25.7 प्रतिशत था लेकिन संरक्षण नीति, अन्य ऊर्जा स्रोतों के अधिक उपयोग और चीन में कोयला उत्खनन में तीव्रता के कारण 2007 में इसका योगदान घटकर 16.2 प्रतिशत होने के फलस्वरूप विश्व में इसका स्थान दूसरा हो गया है।

        संयुक्त राज्य अमेरिका में तीन वृहद् कोयला उत्पादक क्षेत्र हैं जहाँ अधिकांश उच्च कोटि का कोयला उत्पादित होता है-

(1) अप्लेशियन क्षेत्र, जो देश के पूर्वी भाग में उत्तर-पूरब से दक्षिण-पश्चिम की लम्बाई में फैला है।

(2) आन्तरिक क्षेत्र, जो महान झीलों से खाड़ी तक कई टुकड़ों में वितरित है और

(3) वृहद् मैदानी क्षेत्र, जो रॉकी पर्वत के समानान्तर उत्तर से दक्षिण तक फैला है इन क्षेत्रों में अनेक लघु क्षेत्र भी हैं। साथ ही प्रशान्त तटीय क्षेत्र में भी कोयला उत्खनन होने लगा है।

प्रशान्त तटीय क्षेत्र:-

      इस क्षेत्र का विस्तार वाशिंगटन, ओरेगन और कैलीफोर्निया राज्यों में छिट-पुट रूप में है। जल विद्युत और पेट्रोलियम की स्पर्द्धा के कारण यहाँ बहुत कम उत्पादन होता है।

कनाडा:-

     उत्तरी अमेरिका का दूसरा प्रमुख कोयला उत्पादक देश कनाडा है। यहाँ 2007 में विश्व का 1.1 प्रतिशत कोयला उत्पादित हुआ था। यहाँ कोयले का उत्खनन मुख्यतः अलबर्टा, सस्केचवान एवं ब्रिटिश कोलम्बिया राज्यों में होता है। कठोर शीत ऋतु के कारण उत्खनन और परिवहन बाधित होते हैं। फिर भी यह अपनी आवश्यकता पूरा कर लेता है।

रूस:-

    रूस अधिक समय तक विश्व का तीसरा बड़ा कोयला उत्पादक देश था लेकिन 2007 में इसका अंशदान केवल 4.9 प्रतिशत था। उल्लेखनीय है कि सोवियत संघ के

विघटन के बाद इसका दक्षिणी क्षेत्र-यूक्रेन और मध्य एशिया विलग हो गये हैं, जिससे इसका योगदान 1970 में 20.2 प्रतिशत से घटकर 5.1 प्रतिशत हो गया है। वर्तमान समय में यूक्रेन 1.2 प्रतिशत, कजाकिस्तान 1.5 प्रतिशत और उजबेकिस्तान 0.2 प्रतिशत कोयला उत्पादित करते हैं। 1948 में विश्व कोयला उत्पादन में रूस का भाग मात्र बारह प्रतिशत था, जो 1960 में बढ़कर उन्नीस प्रतिशत हो गया। इस समय से इसके उत्पादन में धीरे-धीरे कमी आई है, क्योंकि तेल और गैस का प्रयोग बढ़ गया है। रूस का संचित भण्डार विशाल है।

     अनुमानतः विश्व का लगभग एक चौथाई सुरक्षित भंडार रूस और अलग हए देशों में हैं। अभी उत्पादन कुछ ही देशों में हो रहा है। फिर भी छोटे-बड़े 81 क्षेत्रों में उत्खनन होता है। यहाँ के प्रमुख उत्पादकों में 11 क्षेत्र विशेष उल्लेखनीय हैं।

(1) डोनवास क्षेत्र,

(2) कुजवास क्षेत्र,

(3) करागम बेसिन,

(4) मास्को क्षेत्र,

(5) यूराल क्षेत्र,

(6) काकेशस क्षेत्र,

(7) लीना बेसिन,

(8) येनीसी बेसिन,

(9) बैकाल झील क्षेत्र,

(10) अरटम सूचन क्षेत्र और

(11) सखालीन क्षेत्र

एशिया:-

     एशिया महाद्वीप के देशों में विश्व का लगभग 32 प्रतिशत कोयला भंडार है, जिसमें चीन, भारत, इण्डोनेशिया और जापान अग्रणी देश हैं। उत्पादन की तीव्रगति के कारण चीन विश्व का अग्रणी कोयला उत्पादक देश बन गया है।

चीन:-

     हाल के दशकों में चीन कोयला के उत्पादन में जिस तीव्रगति से आगे बढ़ा है, वह एक उदाहरण बन गया है। 1970 तक यह कोयला उत्पादन में तीसरे स्थान पर था, लेकिन 1990 में यह विश्व का प्रथम देश बन गया। वर्तमान अनुमानों के अनुसार इसका संचित भंडार विश्व का 13 प्रतिशत है। 2007 में यहाँ का उत्पादन 253.7 करोड़ मीटरी टन हो गया, जो विश्व का 39.7 प्रतिशत है। यहाँ का अधिकांश कोयला बिटुमिनस एवं एन्थ्रासाइट किस्म का है।

भारत:-

    यह विश्व का तीसरा बड़ा कोयला उत्पादक देश बन गया है। 2007 में यहाँ का उत्पादन 47.8 करोड़ मीट्रिक टन से अधिक था जो विश्व उत्पादन का 7.5 प्रतिशत होता है। 1900 में भारत का उत्पादन मात्र 60 लाख मीट्रिक टन था, जो बढ़कर 1957 में 349, 1971 में 743 और 1986 में 1574 लाख मीट्रिक टन हो गया। 2000- 2001 में तो इसका उत्पादन 3096 लाख टन तक पहुँच गया। स्पष्ट है कि भारत में कोयले का उत्पादन बहुत तेजी से बढ़ा है। यहाँ अधिकांश कोयला गोण्डवाना युग का है। तृतीय युग का कोयला भूरा या लिग्नाइट वर्ग का है।

     भारत में कोयला भण्डार का सर्वेक्षण अपूर्ण है फिर भी अनुमानों के अनुसार यहाँ लगभग 21.390 मीट्रिक टन कोयले का संचित भंडार है, जो विश्व के संचित भंडार का 10 प्रतिशत से अधिक है।

एशिया के अन्य कोयला उत्पादक देश-

    चीन और भारत के बाद इण्डोनेशिया, उत्तरी कोरिया, जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम और तुर्की एशिया में अन्य प्रमुख कोयला उत्पादक देश हैं। उत्तरी कोरिया प्रतिवर्ष 620 लाख मीट्रिक टन एवं तुर्की 391 लाख मीट्रिक टन कोयले का उत्पादन करते हैं। जापान अपनी खपत का एक लघु अंश ही उत्पादित करता है। फलस्वरूप इसे कोयले का आयात करना पड़ता है।

यूरोप:-

    प्रारंभ से ही यूरोप कोयला उत्पादन में अग्रणी रहा है। आज यहाँ विश्व भंडार का केवल 16 प्रतिशत कोयला सुरक्षित रह गया है। विश्व उत्पादन का लगभग एक-चौथाई कोयला यूरोपीय देशों में निकाला जा रहा है। यहाँ कुछ न कुछ कोयला सभी देशों में पाया जाता है लेकिन महाद्वीप के कुल उत्पादन का 80 प्रतिशत केवल जर्मनी, यूनान, पोलैण्ड, ब्रिटेन, पूर्व यूगोस्लाविया, रोमानिया, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया, बेल्जियम और फ्रांस में उत्पादित होता है।

जर्मनी:-

     यूरोप के कोयला उत्पादकों में जर्मनी का योगदान महत्त्वपूर्ण हो गया है। 2007 में जर्मनी का उत्तम कोटि का उत्पादन 2019 लाख मीट्रिक टन था, जो विश्व उत्पादन का 3.2 प्रतिशत है, जबकि 1970 में इसका योगदान विश्व उत्पादन में 6.5 प्रतिशत था। स्पष्ट है कि इसका उत्पादन संरक्षण नीति के कारण संतुलित है। यहाँ अब कुल ऊर्जा का 55 प्रतिशत तेल से पूरा किया जा रहा है। संचित भंडार की दृष्टि से यह यूरोप का प्रथम देश है। यहाँ उत्तम कोटि और सामान्य वर्ग दोनों तरह के कोयले का विशाल भंडार है। अधिकांश प्रयोग ताप-विद्युत, कृत्रिम पेट्रोल, कृत्रिम रबर और विविध रसायन उद्योगों में किया जाता है।

पोलैण्ड:-

    कोयले के उत्पादन के पोलैण्ड विश्व का सबसे बड़ा देश है। यहाँ 2007 में 1458 लाख मीटरी टन उच्च कोटि के कोयले का उत्पादन हुआ था, जो विश्व उत्पादन का 23 प्रतिशत है। वर्तमान समय में जर्मनी के बाद पोलैण्ड यूरोप का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक देश है। कुछ समय पूर्व ब्रिटेन प्रमुख उत्पादक था, लेकिन अब वहाँ भंडार कम जाने के कारण संरक्षण नीति अपनाई गई है। पोलैण्ड का प्रधान कोयला क्षेत्र साइलेसिया है जहाँ उत्तम किस्म का बिटुमिनस कोयला निकाला जाता है। इस क्षेत्र के अतिरिक्त जापान क्षेत्र दूसरा प्रमुख, उत्पादक है। जर्मनी की सीमा के निकट लिग्नाइट की खानें हैं।

ब्रिटेन:-

     कोयले के उत्पादन में पहले ब्रिटेन एक अग्रणी देश था लेकिन अन्य देशों में उत्पादन बढ़ जाने से इसकी सापेक्षिक स्थिति बदलती गई। 1970 में यहाँ 1470 लाख मीट्रिक टन उत्तम कोटि का कोयला उत्पादित हुआ था लेकिन घटता भंडार, बढ़ता उत्पादन व्यय, खनिज तेल का अधिक प्रयोग आदि के कारण 2007 में इसका उत्पादन केवल 257 लाख मीट्रिक टन रह गया। ग्रेट ब्रिटेन में पाँच प्रधान कोयला उत्पादक क्षेत्र हैं जहाँ से देश का तीन-चौथाई से अधिक कोयला प्राप्त होता है, यथा-यार्कशायर-नाटिंघम-डर्बी क्षेत्र, नार्थम्बरलैण्ड-डरहम क्षेत्र, लंकाशायर क्षेत्र, दक्षिणी वेल्स और क्लाइड घाटी क्षेत्र। इनके अतिरिक्त पन्द्रह छोटे-छोटे क्षेत्र भी कोयले का उत्पादन करते हैं।

यार्कशायर-नाटिंगघम-डर्बी क्षेत्र-

     यह ब्रिटेन का सर्वश्रेष्ठ कोयला उत्पादक क्षेत्र है, जो लगभग पाँच हजार वर्ग कि०मी० क्षेत्र में फैला है। यहाँ का उत्पादन कपड़ा, इस्पात और इंजीनियरिंग उद्योगों में प्रयुक्त होता है।

नार्थम्बर लैण्ड-डरहम क्षेत्र-

  यह ब्रिटेन का दूसरा प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र है। इंगलैण्ड के पूर्वी छोर पर स्थित इस क्षेत्र से उत्तम कोटि का बिटुमिनस कोयला प्राप्त किया जाता है, अधिकांश उत्पादन समीपवर्ती औद्योगिक क्षेत्रों में खप जाता है। यहाँ के कोयले से उत्तम कोटि का कोक बनाया जाता है।

यूनान-

   हाल के वर्षों में यूनान का कोयला उत्पादन तेजी से बढ़ा है। 2007 में यहाँ 625 लाख टन कोयला उत्पादित हुआ था। जो विश्व उत्पादन का 1.0 प्रतिशत है। यहाँ मध्यम किस्म का कोयला उत्पादित होता है।

चेक गणराज्य-

   यह यूरोप का चौथा बड़ा और विश्व का पन्द्रहवाँ बड़ा कोयला उत्पादक देश है। 2007 में यहाँ 626 लाख मीट्रिक टन कोयले का उत्पादन हुआ था, जो विश्व का एक प्रतिशत से कम है।

रोमानिया-

       यूरोपीय देशों में रोमानिया का कोयला उत्पादन तेजी से बढ़ा है जिसके कारण यह यूरोप का पाँचवां बड़ा कोयला उत्पादक देश बन गया है। 2007 में यहाँ विश्व का 0.5 प्रतिशत कोयला उत्पादित हुआ था। 1970 से ही इसका उत्पादन अपनी आवश्यकता के अनुकूल होता रहा है।

बुल्गेरिया-

     यूरोप का छठवां और विश्व का अठारहवाँ बड़ा कोयला उत्पादक देश है, जहाँ विश्व का मात्र 0.2 प्रतिशत कोयला उत्पादित होता है।

पूर्व युगोस्लाविया-

      यह यूरोप का सातवां और विश्व का उन्नीसवां बड़ा उत्पादक देश है। 2007 में यहाँ 60 लाख मीट्रिक टन उत्तम किस्म का तथा 932 लाख मीट्रिक टन लिग्नाइट का उत्पादन हुआ था, जो विश्व उत्पादन का 0.2 प्रतिशत था। यहाँ के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में पिलजेन और साइलेशिया है जहाँ से देश का अधिकांश उत्पादन प्राप्त किया जाता है।

अन्य यूरोपीय उत्पादक देश-

      यूरोप के अन्य प्रमुख उत्पादकों में फ्रान्स, बेल्जियम, नीदरलैण्ड, हंगरी और स्पेन विशेष उल्लेखनीय है। 2007 में फ्रांस का उत्पादन केवल 70 लाख मीट्रिक टन था। इसका अधिकांश उत्पादन केवल 70 लाख मीट्रिक टन था। इसका अधिकांश उत्पादन फ्रेंको बेल्जियम क्षेत्र, लारेन पठारी क्षेत्र, लीकूसोट तथा अटिपे कोयला क्षेत्र से प्राप्त किया जाता है।

    बेल्जियम का उत्पादन 2007 में 10 लाख मीट्रिक टन उत्तम कोटि का और 249 लाख मीट्रिक टन लिग्नाइट था। इसका अधिकांश उत्पादन फ्रैंको बेल्जियम एवं कैम्पाइन क्षेत्रों से प्राप्त किया जाता है। नीदरलैण्ड में लिम्बर्ग बेसिन और जील बेसिन प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र हैं।

दक्षिणी अफ्रीका संघ

   यह विश्व का छठवां बड़ा कोयला उत्पादक देश है। 2007 में इसका उत्पादन 2694 लाख मीट्रिक टन था, जो विश्व का 4.2 प्रतिशत होता है। इसका संचित भंडार भी पर्याप्त है। यहाँ के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में ट्रांसवाल और नेटाल राज्य अग्रणी हैं, जहाँ से देश का 85 प्रतिशत कोयला प्राप्त किया जाता है। यहाँ अधिकांशतः

उच्च कोटि का बिटुमिनस कोयला निकाला जाता है, जो निर्यात किया जाता है।

आस्ट्रेलिया-

     यह विश्व का चौथा बड़ा कोयला उत्पादक देश बन गया है। 1970 में 420 लाख मीट्रिक टन कोयले का उत्पादन हुआ था, जो बढ़कर 2007 में 3939 लाख मीट्रिक टन हो गया। यह प्रतिवर्ष 293 लाख मीट्रिक टन लिग्नाइट का उत्पादन भी करता है। साथ ही यहाँ विश्व का 1.4 प्रतिशत कोयला भंडा संचित है, जिसमें अधिकांश उच्च कोटि का है। यहाँ के उत्पादन का अस्सी प्रतिशत कोयला न्यूसाउथ वेल्स की खानों से प्राप्त होता है। प्रसिद्ध खदानों में न्यूकौंसिल की उत्तरी खदान, लिथस की पश्चिमी खदान तथा कैम्बला बंदरगाह के समीप की पश्चिमी खदान विशेष उल्लेखनीय है।



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2. Cotton Textile Industry (सूती वस्त्र उद्योग)

Cotton Textile Industry

(सूती वस्त्र उद्योग)



प्रश्न प्रारूप

Q1. सूती वस्त्र उद्योग की समस्या की चर्चा करे।

Q2. भारत में सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण तथा वर्तमान गतिविधियों की चर्चा करे।

Q3. भारत में सूती वस्त्र के स्थानीयकरण हेतु कारकों का विश्लेषण कीजिए तथा इस उद्योग में अभिनव प्रवृतियों को बताएँ।

Q4. सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण हेतु कारकों की विवेचना कीजिए तथा इसके वितरण प्रतिरूप का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर- सूती वस्त्र उद्योग भारत का सबसे पुराना उद्योग है। यह भारत का सबसे बड़ा उद्योग है। यह भारत का सबसे बड़ा रुग्ण उद्योग भी है। भारत में सर्वाधिक कर्मचारी इसी उद्योग में संलग्न है। भारत कभी विश्व का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक देश हुआ करता था। लेकिन, इंगलैण्ड में हुए औद्योगिक क्रांति के कारण भारतीय सूती वस्त्र उद्योग को प्रायोजित तरीके से पीछे कर दिया गया।

विकास / वृद्धि

    सूती वस्त्र उद्योग यद्यपि भारत का सबसे प्राचीन उद्योग है। फिर इसका आधुनिक कारखाना 1818 ई० में कलकता के ‘फोर्ट ग्लोस्टर’ नामक स्थान पर लगाया गया था। लेकिन कच्चे माल के अभाव में असफल रहा। पुनः सफल सूती वस्त्र का कारखाना 1850 ई० में कलकत्ता में स्थापित किया गया। इस सफल प्रयास के बाद इस उद्योग का विकास सतत् जारी है। 

      1905 ई० तक भारत में 206 सूती वस्त्र के मील स्थापित हो चुके थे। 1958 ई० तक भारत में मीलों की संख्या 1767 पहुंच गयी थी। वर्तमान समय में इसकी संख्या बढ़कर 2000 से भी अधिक हो चुकी है।

स्थानीयकरण

      बेवर ने अपने न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत में बताया कि सूती वस्त्र उद्योग शुद्ध कच्चा माल पर आधारित एक ऐसा उद्योग है जिसमें हम जितना कच्चा माल लगाते है उतने ही मात्रा में शुद्ध उत्पाद प्राप्त करते है। ऐसे उद्योगों को समभार उद्योग कहा जा सकता है। इस प्रकार के उद्योगों का स्थानीकरण कच्चे माल वाले क्षेत्रों में, बाजार में या दोनों स्थानों पर हो सकता है। जैसे- मुम्बई के आसपास इस उद्योग का विकास बड़े पैमाने पर हुआ है क्योंकि महाराष्ट्र के काली मिट्टी की भूमि पर बड़े पैमाने पर कपास की खेती होती है।

      पुनः इस उद्योग का स्थानीयकरण कोलकाता के आस-पास हुआ है जबकि पूरे पश्चिम बंगाल में कपास की खेती कहीं नहीं की जाती है। अतः कलकत्ता के आस-पास सूती वस्त्र उद्योग विकास बाजार के कारण हुआ है।

विकास के विभिन्न चरण या नवीन प्रवृति या वितरण

    भारत उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु वाला देश है। इसलिए सम्पूर्ण भारत में सदैव सूती वस्त्र की माँग होती रही है। प्रारंभ में इसके विकास में केन्द्रीयकरण की प्रवृति थी। कालान्तर में यह विकेन्द्रीकृत उद्योग बना। केन्द्रीयकरण से विकेन्द्रीकृत उद्योग बनने में काफी लम्बा समय लगा है। इस समय को चार चरण में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

प्रथम चरण:-

  भारत में सूती वस्त्र उद्योग का प्रथम चरण 1854–1900 ई. तक माना जाता है। प्रथम चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास केवल मुम्बई महानगर में हुआ। यहाँ पर इस उद्योग के स्थानीयकरण के चार कारक महत्त्वपूर्ण थे। जैसे-

(1) मुम्बई भारत का सबसे बड़ा बंदरगाह रहा है।

  • कपास निर्यात करने के लिए यहाँ लाये जाते थे।
  • कपास के व्यापारी मुम्बई में ही रहा करते थे। उनके पास पूँजी और तकनीक पहले से मौजूद थी।
  • पुनः मुम्बई की आर्द्र जलवालु सूती वस्त्र उद्योग के लिए उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराती थी।

     यही कारण था कि मुम्बई द्वीप पर सूटी वस्त्र उद्योग का प्रथम विकास हुआ।

(2) चीन में विकसित हो रहे सूती वस्त्र उद्योग में धागा आपूर्ति करने का कार्य ब्रिटिश कंपनियाँ किया करती थी। जब ब्रिटिश कंपनियाँ चीन को पर्याप्त मात्रा में धागा आपूर्ति करने में असफल होने लगी तो उन्होंने भारतीय व्यापारियों के इस क्षेत्र में पूंजी निवेश के लिए प्रोत्साहित किया।

(3) मुम्बई महानगर में वाणिज्यिक ऊर्जा की कमी थी लेकिन द० अफ्रीका से आयातित कोयला पर मुम्बई के पास तापीय विद्युत केन्द्र की स्थापना की गई तो सुचारू रूप से विद्युत की आपूर्ति होने लगी।

(4) सस्ते श्रमिक और आन्तरिक बाजार की उपलब्धता भी यहाँ पर इस उद्योग के विकास में सहायक रहा।

    ऊपर वर्णित कारकों के कारण 19वीं सदी के अन्त तक मुम्बई द्वीप पर करीब 40 कारखाने विकसित हो चुके थे। इसे “भारत का मैनचेस्टर” या “कपास की महानगरी” भी कहा जाने लगा। स्वेज नहर के पूरब में सूती वस्त्र उत्पादन करने वाला यह सबसे बड़ा केन्द्र बन गया।

दूसरा चरण:-

      1900-23 ईo के मध्य लगे सूती वस्त्र उद्योग को इस चरण में शामिल करते हैं। इस चरण में उद्योगों का विकास मुम्बई के बाहरी क्षेत्रों में हुआ क्योंकि मुम्बई महानगर में लगातार जमीन का मूल्य बढ़ता जा रहा था। श्रमिक संगठनों का विकास बड़े पैमाने पर हो चुका था। मलीन बस्तियाँ विकसित होने लगी थी। अतः निवेशकों ने मुम्बई के बाहरी क्षेत्रों में पूँजी निवेश का कार्य प्रारंभ किया। इस चरण में स्थानीयकरण की दो प्रवृति थी- प्रथम मुम्बई के ही बाहरी क्षेत्रों में सूती वस्त्र के कारखाने लगाये गये।

     पुनः सूती वस्त्र कारखाना लगाने हेतु मुम्बई के आप-पास के नगरों का चयन किया जहाँ मुम्बई के समान सभी परिस्थितियाँ अनुकूल थी। जैसे- इस चरण में कल्याण, थाणे, पुणे, नासिक, सूरत, बड़ोदरा तथा अहमदाबाद जैसे नगरों में सूती वस्त्र उद्योग का तेजी से विकास हुआ क्योंकि ये सभी केन्द्र अरब सागर के निकट थे जिसके कारण नम जलवायु उपलब्ध थी। बड़ौदरा, सूरत बंदरगाह थे। “टाटा हाइड्रल प्रोजेक्ट” के द्वारा विद्युत की आपूर्ति सुनिश्चित हो चुकी थी। मुम्बई के ही समान सस्ते श्रमिक तथा बाजार उपलब्ध थे।

तीसार चरण:-

     1923 से 1947 ई० के बीच लगे उद्योगों को इस चरण में शामिल करते हैं। इस चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास दक्कन के लावा के पठारी क्षेत्र तथा मध्यवर्ती पठार पर हुआ। दक्कन के पठार पर पोरबन्दर, राजकोट, सुरेन्द्रनगर (सूरत), भूसावल, अहमदनगर, नागपुर, कोल्हापुर, सोलापुर, गुलवर्गा प्रमुख केन्द्र के रूप में थे। इन केन्द्रों में इस उद्योग का विकास कपास की खेती, सस्ते श्रमिक तथा बाजार की उपलब्धता के कारण हुआ।

      भारत के उ० मध्यवर्ती पठारी क्षेत्र में इस उद्योग का विकास इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, भोपाल, इटारसी, भिलवाड़ा, अजमेर, जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर में हुआ। इन क्षेत्रों में सूती वस्त्र उद्योग का विकास कई कारणों के चलते हुआ। जैसे-

(1) इन क्षेत्रों में कई बड़े देशी रियासत रहा करते थे। इन रियासतों ने इस उद्योग में रुचि लिया। ब्रिटिश कंपनियों ने भी देशी रजबाड़ों को इस क्षेत्र में आमंत्रित किया। देशी रजबाड़ों ने ब्रिटिश कंपनियों को भूमि दिया तो दूसरी ओर ब्रिटिश कंपनियों ने बड़े पैमाने पर पूंजी तथा तकनीक का निवेश किया। इसके अलावे मैदानी भारत का बाजार, सस्ते श्रमिक उपलब्धता और कपास की खेती ने भी इस उद्योग को आकर्षित किया।

     इसी चरण में कानपुर, आगरा, दिल्ली, हैदराबाद, बंगलोर, विशाखापतन तथा कलकता भी सूती वस्त्र केन्द्र के रूप में उभरे क्योंकि यहाँ की सभी भौगोलिक परिस्थितियाँ अनुकूल थी तथा सस्ते श्रमिक और बाजार उपलब्ध थे।

   आजादी के बाद भारत में सूती वस्त्र उद्योग

चौथा चरण:-

     आजादी के बाद विकसित हुए सूती वस्त्र उद्योगों को इसमें शामिल करते हैं। इस चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास चार क्षेत्रों में हुआ-

(i) उ०-प० भारत-

   इसमें पंजाब तथा हरियाणा को शामिल करते हैं। सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने के कारण इन क्षेत्रों में कपास की खेती प्रारंभ की गई। कपास की स्थानीय उपलब्धता के करण जालंधर, लुधियाना, अम्बाला, चंडीगढ़ अमृतसर तथा गंगानगर जिला सूती वस्त्र उद्योग केन्द्र के रूप में उभरे।

(ii) UP तथा बिहार-

   यहाँ पर सस्ते श्रमिक तथा बाजार की उपलब्धता के कारण इस उद्योग का विकास हुआ। UP में मेरठ, गाजियाबाद, सहारनपुर, मोदीनगर, मुरादाबाद, वाराणसी, मिर्जापुर जैसे नगर में और बिहार में गया, डुमराँव, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, पटना इत्यादि में विकसित हुआ। इस क्षेत्रों में सस्ते श्रमिक तथा बाजार उपलब्ध होने के कारण इस उद्योग कर विकास हुआ था।

(iii) पूर्वी भारत-

   बाजार की सुविधा, सस्ते श्रमिक, आयात-निर्यात की सुविधा तथा हुगली औद्योगिक प्रदेश में विकसित संरचनात्मक सुविधाओं के कारण इस उद्योग का यहाँ विकास हुआ। यहाँ इस उद्योग के मुख्य केन्द्र कोलकाता, हावड़ा, मानिकपुर, नैहाटी, चन्दन नगर, सियारामपुर, दीमापुर, इम्फाल, गुवाहाटी तथा कटक थे।

(iv) द० भारत-

    यहाँ सस्ते जल विद्युत की अपलब्धता तथा कपास की खेती किए जाने के कारण इस उद्योग का विकास हुआ। विजयवाड़ा,  बेलगाँव मैसूर, काँचीपुरम्, मदुरई, तिरुचिरापल्ली, पाण्डिचेरी तथा तिरुअनन्तपुरम जैसे नगरों में इस उद्योग का विकास हुआ। कोयम्बटूर को “दक्षिण भारत का मैनचेस्टर” भी कहा जाने लगा। भारत में सर्वाधिक सूती वस्त्र का मील तमिलनाडु राज्य में ही स्थित है।

   उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में सूती वस्त्र उद्योग का अभूतपूर्व विकेन्द्रीकरण हुआ है। भारत के प्रमुख सूती वस्त्र केन्द्रों को नीचे मानचित्र में देखा जा सकता है।

Cotton Textile Industry

चित्र: भारत के प्रमुख सूत्री वस्त्र उद्योग केंद्र

   भारत में सूती वस्त्र का उत्पादन तीन क्षेत्रों में किया जाता है:-

(1) मील 

(2) पावरलूम (छोटे-छोटे मशीन से)

(3) हथकरघा / चरखा

   इन तीनों क्षेत्रों में होने वाला उत्पादन को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है:-

Sector Approx Share (Indicative) Role
Powerloom Majority (सबसे बड़ा) कपड़े का बड़ा उत्पादन भाग Powerloom से आता है
Handloom छोटा हिस्सा पारंपरिक हस्तकल्याणित बुनाई
Mill औद्योगिक उत्पादन बड़े पैमाने पर घेराबंदी
Others न्यून खास/विशिष्ट वस्त्र

           नीचे के तालिका में सूत उत्पादन को प्रदर्शित किया जा रहा है:-     

वर्ष सूत का उत्पादन हजार टन में
1950-51  835
1960-61 1075
1970-71 1050
1980-81 1400
1990-91 1430
2000-01 1600
2010-11 4500
2020–21
5200

विश्लेषण 

  • 1950–51 से 1970–71 तक सूत उत्पादन में धीमी वृद्धि देखी जाती है।

  • 1980–81 के बाद आधुनिकीकरण, पावरलूम और मिल सेक्टर के विस्तार से उत्पादन तेज़ी से बढ़ा।

  • 2000–01 के बाद तकनीकी प्रगति, निर्यात वृद्धि और निजी निवेश के कारण उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई।

  • 2010–11 से 2020–21 के बीच भारत विश्व के प्रमुख सूत उत्पादक देशों में शामिल हो गया।

भारत में सूती वस्त्र उत्पादन करने वाले 5 प्रमुख राज्य

1. महाराष्ट्र 

  • सर्वाधिक सूती वस्त्र उत्पादन
  • प्रमुख केंद्र: मुंबई, नागपुर, शोलापुर, पुणे

2. गुजरात 

  • दूसरा स्थान
  • प्रमुख केंद्र: अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा

3. तमिलनाडु 

  • दक्षिण भारत में सबसे प्रमुख
  • प्रमुख केंद्र: कोयंबटूर, मदुरै, तिरुपुर

4. पश्चिम बंगाल

  • हावड़ा, हुगली क्षेत्र प्रमुख
  • जूट के साथ-साथ सूती वस्त्र उद्योग भी विकसित

5. मध्य प्रदेश

  • इंदौर, उज्जैन क्षेत्र
  • कपास उत्पादन के कारण सूती वस्त्र उद्योग को बढ़ावा

समस्या तथा संभावना

    सूती वस्त्र उद्योग कई समस्याओं का सामना कर रही है। जैसे-

(1) कच्चे माल की समस्या-

    भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण वस्त्र की माँग लगातार बढ़‌ती ही जा रही है। बढ़ती हुई मांग को देश पूरा नहीं कर पा रहा है जिसके कारण कपास का मूल्य लगागर बढ़‌ता ही जा रहा है। फलतः भारत को अन्य देशों से कपास आयात करना पड़ता है।

    भारत के पास कपास उत्पादन हेतु विस्तृत काली मिट्टी का क्षेत्र उपलब्ध है। अतः सिंचाई सुविधाओं का विकास कर कपास का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। उत्पादन को बढ़ाकर आयात पर से निर्भरता कम की जा सकती है।

(2) पुराने मशीन-

    भारत में अधिकांश वस्त्र का उत्पादन पूराने मशीनों से किया जाता है। जबकि USA, चीन, मिस्र, जैसे आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर सूती का उत्पादन करते हैं जिसके कारण भारतीय सूती वस्त्र उद्योग अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पिछड़‌ता जा रहा है। लेकिन, नई औद्योगिक नीति की घोषणा से यह उम्मीद जगी है कि भारत में नवीन विदेशी तकनीक आगमन होगा।

(3) अनियमित विद्युत की आपूर्ति-

     देश में लगातार ऊर्जा की मांग बढ़ती जा रही है। माँग के अनुरूप विद्युत की आपूर्ति न होने के कारण कोई भी कारखाना निर्बाध्य रूप से नहीं चल पाता है। लेकिन, आने वाले समय में परमाणु ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा इत्यादि के विकास से इस समस्या से निजात मिल सकेगा।

(4) हड़ताल तथा तालाबंदी-

    सूती वस्त्र उद्योग से जुड़े हुए श्रमिक संगठन काफी मजबूत है। ये संगठन अपने मांगों को लेकर हड़ताल करते हैं। अगर उनकी मांग पूरी नहीं हुई तो कंपनी में ताला लटका देते हैं, जिसके कारण उत्पादन में कमी आती है।

     हालांकि न्यापालिका के हस्तक्षेप से और सरकार के बीच-बचाव से इस समस्या में लगातार कमी आ रही है।

(5) कृत्रिम रेशे के साथ प्रतिस्पर्द्धा-

       देश की गरीब जनता कृत्रिम रेसे से बने वस्त्र का उपयोग करते हैं जो अधिक टिकाऊ, सस्ता तथा आकर्षक होता है जबकि सूती वस्त्र कम टिकाऊ तथा महंगा होता है।

(6) घाटे में चल रही मील-

    भारत में सबसे ज्यादा सूती वस्त्र मील तमिलनाडु में है। लेकिन, तमिलनाडू भारत का मात्र 6.4% ही सूती वस्त्र का उत्पादन करता है। उत्तर भारत में खाद्यान्न फसल की खेती कपास उपजाने वाले भूमि पर की जाने लगी, जिसके कार‌ण कच्चे माल की कमी हो गई। फलतः अधिकांश उत्तर भारत के सूती वस्त्र उद्योग बन्द हो गए। पुनः अधिक आयात शुल्क होने के कारण उसका आयात भी संभव नहीं था। लेकिन नवीन औद्योगिक नीति के कारण इसमें सुधार आने की संभावना है।

निष्कर्ष:

       ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत के सूती वस्त्र उद्योग कई समस्याओं का सामना कर रही है। फिर भी, यह भारत का सबसे बड़ा उद्योग है, इस उद्योग में सबसे अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

      यह भारत का पूर्ण रूप से विकेन्द्रित उद्योग है। भारत के पास देशी एवं विदेशी बाजार उपलब्ध है। अतः कहा जा सकता है कि भारत में सूती वस्त्र उद्योग का भविष्य काफी उज्ज्वल है।

1. Iron and Steel Industry (लौह-इस्पात उद्योग)

Iron and Steel Industry

(लौह-इस्पात उद्योग)



Q. भारत में लौह इस्पात उद्योग के विकास, स्थानीयकरण, समस्या एवं संभावना की चर्चा विस्तार से करें।

उत्तर- किसी भी राष्ट्र की लौह इस्पात उद्योग आधुनिक अर्थव्यवस्था के बुरी होती है। प्रति व्यकि इस्पात की उपलब्धता के आधार पर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का मूल्यांकन किया जा सकता है। भारत में लौह-इस्पात उद्योग के विकास का इतिहास काफी पुराना है। भारत में कई आदिम समाज परम्परागत तरीके से लैह-इस्पात उत्पादन करने में कार्य करती हैं। जैसे- MP के अगरिया जनजाति के लोग इस कार्य में दक्ष है।

      भूगोलवेत्ताओं के अनुसार, भारत में लौह-इस्पात उघोग का इतिहास 4000 वर्ष पुराना है। भारत में प्रथम लोहा का प्रमाण 800 ईसा पूर्व का मिलता है। दिल्ली में कुतुबमीनार के निकट लौह-स्तंभ काफी पुराना है। प्राचीन काल में लौह-इस्पात उत्पादन का तकनीक काफी उन्नत था। यही कारण है कि खुले वातावरण में दिल्ली का लौह स्तंभ स्थित होने के बावजूद आज भी उसमें जंक नहीं लगा।

     आधुनिक तरीके से लौह-इस्पात उत्पादन करने का प्रथम प्रयास 1830 ई० में तमिलनाडु के पोर्टोनोवा नामक स्थान पर किया गया जो असफल रहा है। पुन: कच्चे लोहे का उत्पादन पहली बार 1874 ई० में प. बंगाल के कुल्टी में स्थित ‘बराकर आयरन बर्क्स’ में किया गया जो सफल रहा।

      भारत में लौह इस्पात उद्योग के विकास के दिशा में वृहत प्रयास 1907 ई० में शुरू हुई जब J.N. टाटा ने शाकची (जमशेदपुर का पुराना नाम) स्थान पर प्रथम इस्पात कारखाना नींव रखी। इससे “टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी” (टिस्को) कहा गया। इसने 1911 ई० से इस्पात उत्पादन का कार्य प्रारंभ किया। इसके बाद “इण्डियन आयरन एण्ड स्टील कंपनी लि०” (TISCO) की स्थापना 1918 ई० में प० बंगाल में हीरापुर में किया गया। पुन: 1923 ई० में भद्रावती (कर्नाटक) में विश्वेश्वरैया आयरन एण्ड स्टील कंपनी लि० की स्थापना की गई। प्रारंभ में ये ‘मैसूरु स्टील वर्क्स’ कहलाता था। यह सार्वजनिक क्षेत्र की पहली इस्पात कंपनी थी।

      1936 ई० में कुल्टी और हीरापुर के कारखाने को मिलाकर “भारतीय लौह एवं इस्पात कंपनी” का नाम दिया गया। 1953 ई० में बर्नपुर स्थित इस्पात के कारखाने को भारतीय लौह एवं इस्पात कंपनी में मिला दिया गया।

     स्वतंत्रता के बाद इस्पात उद्योग के विकास हेतु कई प्रयास किये गये। जैसे- दूसरी पंचवर्षीय योजना में लौह-इस्पात उद्योग का काफी विकास हुआ। पूर्व USSR की सहायता से भिलाई में, ब्रिटेन की सहायता से दुर्गापुर में, प० जर्मनी की सहायता से राउरकेला में एक-एक इकाई की स्थापना की गई। इन तीनों को “हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड” के अन्तर्गत रखा गया। तीसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान पूर्व सोवियत संघ की सहायता से बोकारों में इस्पात के प्लाण्ट लगाये गये जिसने उत्पादन का कार्य 1974 ई० में प्रारंभ किया।

    चौथी पंचवर्षीय योजना के दौरान इस्पात उद्योग के विकास की दिशा में कोई विशेष प्रयास नहीं किया गया। लेकिन, भारतीय इस्पात प्राधिकरण की स्थान 1973 ई० में की गई। इसका नाम बदलकर 1978 ई० में (SAIL) स्टील ऑथोरिटी ऑफ इण्डिया लि० कर दिया गया।

    पांचवी पंचवर्षीय योजना के दौरान पाराद्वीप, सलेम तथा विशाखापतनम में लौह इस्पात केन्द्र की स्थापना की गई। पांचवी पंचवर्षीय योजना के बाद लौह- इस्पात उद्योग के क्षेत्र में निजी क्षेत्रों को बढ़ावा दिया जाने लगा। भारत में कहीं भी इस्पात का कारखाना सार्वजनिक क्षेत्र में नहीं लगाया जा रहा है हलाँकि संयुक्त उपक्रम के रूप में ‘पास्को इण्डिया लिमिटेड’ के द्वारा पाराद्वीप में इस्पात का एक संयंत्र स्थापित की जा रही है। पुनः जिंदल ग्रुप ने महाराष्ट्र, छतीसगढ़ तथा दिल्ली में छोटे-2 इस्पात के कई इकाईयों की स्थापना की है।वर्तमान में लौह-इस्पात उद्योग का विकास निजी क्षेत्रों के माध्यम से जारी है।

स्थानीयकरण

     1 टन लौह इस्पात के लिए 5.5 टन खनिज की आवश्यकता पड़ती है। इनमें 2 टन लौह अयस्क, 2 टन कोयला, 0.5 टन चूना-पत्थर, 0.5 टन मैगनीज तथा डोलोमाइट हथा शेष अन्य खनिजों की आवश्यकता पड़‌ती है। बेबर के अनुसार लौह-इस्पात उद्योग वजन ह्रास उद्योग है। इसलिए इसकी स्थापना समान्यतः कच्चे माल के क्षेत्र में होना चाहिए। पुनः बेबर ने बताया कि लौह-इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण में दो खनिज पदार्थों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे उद्योगों को स्थापना का निर्धारण त्रिकोण मॉडल से करते हैं। इसे नीचे के चित्र से भी समझा जा सकता है।

Iron and Steel Industry

    अगर भारतीय इस्पात उधोग के स्थानीयकरण की प्रवृति को देखा जाय तो पाते हैं कि भिलाई, भद्रावती तथा सलेम का इस्पात कारखाना लौह-अयस्क क्षेत्र में है। दुर्गापुर, बर्नपुर तथा बोकारो का कारखाना कोयला क्षेत्र में जमशेदपुर तथा राउरकेला का कारखाना लौह अयस्क और कोयला क्षेत्र के मध्य में है। पुनः विशाखापतनम तथा पाराद्वीप का कारखाना बंदरगाह के पास स्थित है।

     भारत में कुल 12 लौह-इस्पात संयंत्र है। इनमें से TISCO को छोड़कर सभी कारखाने सार्वजनिक क्षेत्र के है जिसका प्रबंधन का कार्य SAIL करती है। भारत का प्रमुख लौह-इस्पात केन्द्र और उसके स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों को नीचे देखा जा सकता है।

  • जमशेदपुर (झारखण्ड)

लौह अयस्क- गुरुमहीसानी (उड़ीसा के मयूरभंज जिला), नोवामुंडी

कोयला- झरिया, पश्चिमी बोकारो  

मैगनीज- क्योंझर , सुन्दरगढ़ से चुना पत्थर

विद्युत एवं जल की आपूर्ति-  डिमना झील झील से जल (स्वर्णरेखा और खरकई नदी के संगम पर स्थित), चांडिल बांध परियोजना से जल विद्युत

  • भद्रावती (कर्नाटक)

लौह अयस्क- बाबाबुदन की पहाड़ी से (चिकमंगलूर जिला)

कोयला- स्थानीय लकड़ी कोयला

मैगनीज- शिमोगा जिला से

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- भद्रा नदी से जल प्राप्ति और महात्मा गाँधी तथा भद्रावती परियोजना से विद्युत की आपूर्ति 

  • ISCO (बर्नपुर, हीरापुर, कुल्टी-पश्चिम बंगाल)

लौह अयस्क- क्योंझर, मयुरभंज

कोयला- रानीगंज तथा झरिया

मैगनीज- क्योंझर

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- बराकर नदी से जल, DVC से विद्युत

  • दुर्गापुर

लौह अयस्क- नुवामुन्डी (325 किमी० दूर)

कोयला- झरिया तथा बोकारो से (110 किमी० दूर)

मैगनीज- क्योंझर से

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- दामोदर नदी से जल, DVC से विद्युत

  • राउरकेला

लौह अयस्क- क्योंझर तथा कोनाई से (75 किमी०)

कोयला- झरिया, बोकारो तथा तलचर से  

मैगनीज- क्योंझर से

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- जल शंख नदी से, तालचेर से विद्युत

नोट: शंख नदी (Sankh River) भारत के झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा राज्यों में बहने वाली एक नदी है।

  • भिलाई

लौह अयस्क- डाली राजहरा से

कोयला- झरिया, बोकारो तथा कोरबा से

मैगनीज- बालाघाट तथा  भंडारा से

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- तेंदुला बांध से, विद्युत्- कोरवा से

  • बोकारो

लौह अयस्क- क्योंझर

कोयला- झरिया

मैगनीज-किरिबुरु

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- बोकारो नदी तथा दगहा डैम से जल, विद्युत-चन्द्रपुरा से

  • सलेम

लौह अयस्क- शिवाराय की पहाड़ी से 

कोयला- नवेली

मैगनीज- सलेम

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- जल तथा विद्युत मैटूर बांध से

  • विजय नगर

लौह अयस्क- बाबाबुदन की पहाड़ी से

कोयला- सिंगरैनी तथा कान्हन घाटी

मैगनीज- स्थानीय विजयनगर

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- तुंगभद्रा परियोजना से

  • विशाखापत्तनम

लौह अयस्क- बैलाडीला

कोयला- आस्ट्रेलिया

मैगनीज- बालाघाट

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- तुंगभद्रा परियोजना से

समस्या

         भारत का लौह इस्पात उद्योग कई समस्याओं से गुजर रही हैं। जैसे-

(1) पूँजी की समस्या:-

    इस उद्योग की स्थापना में अधिक पूँजी की आवश्यकता पड़ती है। चूँकि भारत एक विकासशील देश है जिसके सदैव इसके पास पूँजी का अभाव बना रहता है।

(2) आधुनिक तकनीक का अभाव।

(3) सार्वजनिक क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले इस्पात केन्द्रों में कुप्रबंधन की समस्या।

(4) सरकार द्वारा लौह एवं इस्पात का मूल्य निर्धारित किया जाता है जिसके कारण इस्पात उलादन कंपनी घाटे में रखती है।

(5) लघु इस्पात संयंत्रों का घाटे में चलना।

(6) अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्द्धा।

(7) परिवहन की समस्या।

(8) SAIL द्वारा निराशाजनक प्रदर्शन।

संभावना

       निश्चय ही भारतीय इस्पात उद्योग कई समस्याओं के दौर से गुजर रहे हैं। लेकिन भारत के पास लौह अयस्क, कोयला, मैगनीज, चुना-पत्थर इत्यादि का विशाल भण्डार है जिसके आधार पर इस उद्योग का विकास बड़े पैमाने पर किया जा सकता है। भारत की अर्थव्यवस्था दूसरी सबसे तेज गति से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था है जिसके कारण यहाँ पर निर्माण कार्य बड़े पैमाने पर चल रहे हैं जिसके कारण देशी माँग में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

      पुन: भारत के किसी भी पड़ोसी देश में इस्पात उत्पादन नहीं होता है। ऐसे में पड़ोसी देशों के साथ संबंध स्थापित क अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पैठ बना सकता है। स्वर्णीम चतुर्भुज  परियोजना या सड़क-निर्माण क्रांति, फ्रेड रेलवे कोरीडोर के निर्माण से परिवहन की समस्या समाप्त हो जायेगी। अधुनिक औद्योगिक नीति से विदेशी पूँजी और आधुनिक तकनीक का आगमन भारत में हो रहा है। ओडिशा के पाराद्वीप में निर्मित होने वाला पोस्को इस्पात केन्द्र एक ऐसा केन्द्र है जहाँ अब तक सबसे बड़ा विदेशी पूँजी का निवेश हुआ है।

     आर्थिक सुधार के दूसरे चण में विनिवेश की नीति को अपनाकर प्रबंधन में सुधार लाने प्रयास कर रही है।

निष्कर्ष:

       उपरोक्त तथ्यों के विवेचना से स्पष्ट है कि भारत में लौह-इस्पात उद्योग का भविष्य उज्ज्वल है।

22. Primary, Secondary, Tertiary and Quaternary Economic Activities of Humans (मानव के प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुर्थक व्यवसाय)

Primary, Secondary, Tertiary and Quaternary Economic Activities of Humans

(मानव के प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुर्थक आर्थिक गतिविधियाँ)



Q. मानव के प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुर्थक आर्थिक गतिविधियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- मानव अपनी मूलभूत और उच्चतर आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ करता है। इन क्रियाओं द्वारा मानव की आर्थिक प्रगति होती है। मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। चूंकि पृथ्वी सतह पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण में क्षेत्रीय विभिन्नता विद्यमान है, अतः मानव की आर्थिक क्रियाओं में भी क्षेत्रीय विभिन्नता पाई जाती है।

     उदाहरण के लिए वनों में मानव एकत्रीकरण या संग्रहण, आखेट एवं लकड़ी काटने जैसे आर्थिक क्रियाएँ सम्पन्न करता है तो घास के मैदानों में पशुचारण, उपजाऊ समतल मैदानी भागों में कृषि, खनिजों की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में खनन, जल की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में मत्स्याखेट जैसी आर्थिक क्रियाएँ करता है। साथ ही अनुकूल अवस्थिति वाले क्षेत्रों में विनिर्माण उद्योगों, परिवहन, व्यापार एवं सेवाओं से सम्बन्धित आर्थिक गतिविधियों में भी संलग्न रहता है।

     मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं या गतिविधियों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, यद्यपि ये चारों वर्ग एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं:

1. प्राथमिक व्यवसाय (Primary Occupation):-

       प्राथमिक व्यवसाय पूर्णतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं। प्राथमिक व्यवसायों के संचालन हेतु अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती है। वनों से संग्रहण, आखेट, लकड़ी काटना घास के मैदानों में पशु चराना, पशुओं से दूध, मांस, खालें, आदि प्राप्त करना, समुद्रों, नदियों एवं झीलों से मछली पकड़ना, कृषि तथा खानों से खनिज निकालना, आदि प्रमुख प्राथमिक व्यवसाय हैं।

     विश्व के विकासशील देशों में कार्यशील जनसंख्या का अधिकांश भाग प्राथमिक व्यवसायों में लगा हुआ है और विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग तृतीयक एवं चतुर्थक व्यवसायों में कार्यरत है।

  भारत में 60 प्रतिशत, चीन में 50 प्रतिशत, इथोपिया में 80 प्रतिशत, नाइजीरिया में 70 प्रतिशत जनसंख्या प्राथमिक व्यवसायों में लगी हुई है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 8 प्रतिशत, ग्रेट ब्रिटेन में 1 प्रतिशत, जापान में 5 प्रतिशत जनसंख्या ही प्राथमिक व्यवसायों में संलग्न है।

2. द्वितीयक व्यवसाय (Secondary Occupation):-

    द्वितीयक या गौण व्यवसाय में वे सभी प्रकार के विनिर्माण उद्योग सम्मिलित किए जाते हैं जो प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, पशुपालन, मत्स्य संग्रहण, लकड़ी काटना, आदि से प्राप्त उत्पादों को कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त कर मशीनी प्रक्रिया द्वारा उसे तैयार माल में बदलते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा गौण व्यवसाय कच्चे माल के स्वरूप में परिवर्तन करते हैं, उसके मूल्य में वृद्धि करते हैं और उसकी उपयोगिता को बढ़ा देते हैं।

     उदाहरण के लिए कृषि से प्राप्त गन्ना गौण व्यवसाय के लिए कच्चा माल है, मशीनी प्रक्रिया द्वारा गन्ने से चीनी बनाई जाती है। इस प्रकार गन्ने का स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है, गन्ने से शक्कर बनने पर उसके मूल्य और उपयोगिता में वृद्धि हो जाती है।

     इसी प्रकार लौह अयस्क का खनन प्राथमिक व्यवसाय है, लेकिन लोहा-इस्पात का निर्माण गौण व्यवसाय है। विभिन्न प्रकार के उद्योग एक-दूसरे के निकट स्थापित हो जाते हैं, क्योंकि एक उद्योग का तैयार माल दूसरे उद्योग के लिए कच्चा माल हो सकता है। उदाहरण के लिए लौह इस्पात उद्योग अनेक प्रकार के इंजीनियरिंग उद्योगों को विकसित कर सकता है।

     उद्योगों का विकास कच्चे माल, शक्ति, श्रमिक, पूंजी और तैयार माल के लिए बाजार की उपलब्धि पर निर्भर है। इन कारकों के अलावा परिवहन और संचार की सुविधाएं, कच्चे माल और शक्ति का लागत मूल्य, श्रमिकों का वेतन तथा तैयार माल का लागत मूल्य भी उद्योगों की स्थापना और विकास में महत्वपूर्ण आर्थिक कारक है।

     किसी देश में गौण व्यवसायों में कितनी विविधता है तथा उन व्यवसायों में कितने लोग काम करते हैं, यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश में औद्योगिक विकास कितना हुआ है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, जर्मनी, फ्रांस, इटली, ग्रेट ब्रिटेन, जापान, कनाडा, आस्ट्रेलिया, आदि देशों में प्राथमिक व्यवसायों की तुलना में गौण व्यवसायों में अधिक लोग काम करते हैं।

     उद्योगों में कार्यरत लोगों की संख्या, उपयोग में आने वाली यान्त्रिक शक्ति तथा निर्मित उत्पादों के मूल्य के आधार पर उद्योग तीन प्रकार के होते हैं यथा- वृहत् उद्योग, लघु उद्योग और कुटीर उद्योग।

     दस्तकार स्थानीय पदार्थों का उपयोग करके दस्तकारी की वस्तुएं बनाते हैं। हथकरघा, बुनकर, टोकरी बनाने वाले, कालीन बनाने वाले, आदि गौण व्यवसायों में लगे हैं। इन गौण व्यवसायों को कुटीर उद्योग कहते हैं। कुटीर उद्योग की प्रत्येक इकाई में लोग कम संख्या में काम करते हैं और इनमें यांत्रिक शक्ति का प्रयोग नहीं होता है।

    लघु उद्योग यांत्रिक शक्ति का उपयोग करते हैं। ये उद्योग बड़े उद्योगों के लिए पुर्जे भी बनाने हैं। इलेक्ट्रोनिक वस्तुएं बनाने वाली औद्योगिक इकाइयां जैसे- रेडियो, टी. वी. सेट, प्लास्टिक की वस्तुएं, सामान्यतः लघु उद्योगों की श्रेणी में आते हैं।

Tertiary and Quaternary Economic

प्लास्टिक की वस्तुएं

     वृहत् उद्योगों में सैकड़ों लोग काम करते हैं और इनमें करोड़ों रुपए की पूंजी लगी हुई होती है। इनमें से कुछ उद्योग जैसे मोटर कार उद्योग या दुपहिया वाहन उद्योग अधिक उत्पादन के लिए एसेम्बली लाइन तकनीक का उपयोग करते हैं। एसेम्बली लाइन में अलग-अलग स्थानों पर कच्चे पदार्थ तथा विविध पुर्जों को जोड़ने का कार्य होता है।

     एसेम्बली लाइन पर जैसे-जैसे निर्माणाधीन वस्तु आगे सरकती है, प्रत्येक श्रमिक कोई निश्चित काम करता है, फिर दूसरी निर्माणाधीन वस्तु में वह वही काम करता है। इस तरह अन्त तक पहुंचते-पहुंचते वस्तु का निर्माण पूरा हो जाता है और इस प्रकार एसेम्बली लाइन में से निर्मित वस्तु बाहर निकलती है। इस विधि में प्रत्येक श्रमिक किसी एक काम में विशेष दक्ष होता है, जिसे वह बार-बार दोहराता है। निर्माण उद्योगों के परिणामस्वरूप प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, मत्स्य ग्रहण, आदि में भी मशीनों का खूब प्रयोग होने लगा है।

3. तृतीयक व्यवसाय (Tertiary Occupation):-

      तृतीयक व्यवसायों में समाज को दी जाने वाली व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक सेवाएं सम्मिलित हैं। इस व्यवसाय को सेवा श्रेणी भी कहा जाता है। सामान्यतः विकास की प्रक्रिया का एक निश्चित क्रम होता है। प्रारम्भ में प्राथमिक व्यवसायों की प्रधानता होती है। इसके बाद गौण व्यवसायों का महत्व बढ़ता है तथा अन्त में तृतीयक और चतुर्थक व्यवसाय महत्वपूर्ण बन जाते हैं।

    तृतीयक व्यवसायों के अन्तर्गत समाज को प्रदान की जाने वाली सेवाओं में रेल, सडक, जहाज, वायुयान, सेवाएं, डाक-तार सेवाएं, दूरदर्शन, रेडियो, फिल्म, साहित्य, कानूनी सेवाएं, जनसम्पर्क और परामर्श, विज्ञापन, वित्त, बीमा, थोक और फुटकर व्यापार, मरम्मत के कार्य जैसी सेवाएं, स्थानीय, राज्यीय, राष्ट्रीय प्रशासन, पुलिस, सेना और अन्य जन सेवाएं तथा गैर सरकारी संगठनों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएं उल्लेखनीय हैं।

     उद्योगों के विकास के साथ-साथ नगरीय जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की सेवाओं की मांग में भी वृद्धि हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में नगरीय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक संख्या में लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं।

     विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग सेवाओं में लगा हुआ है। उदाहरण के लिए जापान में 70 प्रतिशत, आस्ट्रेलिया में 73 प्रतिशत, कनाडा में 74 प्रतिशत, जर्मनी में 64 प्रतिशत कार्यशील लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं जबकि भारत में 23 प्रतिशत और चीन में 28 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या ही तृतीयक व्यवसायों में लगी हुई है।

    विकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय के बढ़ने से विभिन्न प्रकार की सेवाओं विशेषकर मनोरंजन, परिवहन और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्राथमिक एवं गौण व्यवसायों में काम करने वाले लोगों की भांति तृतीयक व्यवसायों में सेवारत लोगों के कार्य भी महत्वपूर्ण हैं। प्राथमिक और गौण व्यवसायों में लगे लोग, समाज के लिए आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करते हैं और तृतीयक व्यवसायी समाज को विभिन्न सेवाएं प्रदान करते हैं।

4. चतुर्थक व्यवसाय (Quaternary Occupation):-

       वर्तमान समय में मानव के आर्थिक क्रियाकलाप दिनोंदिन बहुत ही विशिष्ट और जटिल होते जा रहे हैं। फलतः मानव की कानून, वित्त, शिक्षा, शोध और संचार से जुड़ी उन आर्थिक गतिविधियों को जो सूचना (information), सूचना के संग्रहण, (Acquisition), सूचना के संसाधन, (Manipulation) और सूचना के प्रसारण (Transmission) से सम्बन्धित है, को चतुर्थक व्यवसाय के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है।

    वर्तमान में विश्व के लगभग सभी देशों में और विशेषकर विकसित देशों में चतुर्थक व्यवसाय में संलग्न लोगों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। इस व्यवसाय के लोगों में उच्च वेतनमान और पदोन्नति की चाह में गतिशीलता अधिक पाई जाती है।

    कम्प्यूटर के बढ़ते प्रयोग और सूचना प्रौद्योगिकी ने इस व्यवसाय के महत्व को बहुत बढ़ा दिया है। परिणामस्वरूप औद्योगिक समाज के तकनीकी तत्वों में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ गया है और वर्तमान आर्थिक क्रियाकलाप मुख्य रूप से उन अप्रत्यक्ष उत्पादों से प्रभावित हो गए हैं जिनके उत्पादन में ज्ञान, सूचना और संचा अधिक महत्वपूर्ण है।

MCQs/UGC NET/JRF Quick Revision

1. मानव की आर्थिक क्रियाओं में क्षेत्रीय विभिन्नता का सबसे उपयुक्त कारण कौन-सा है?

Which best explains regional variation in human economic activities?

(A) केवल जनसंख्या का आकार / Population size only

(B) भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण की क्षेत्रीय विभिन्नता / Regional variation in physical and social environment

(C) केवल राजनीतिक सीमाएँ / Political boundaries only

(D) केवल तकनीकी विकास / Technological development only

Answer: (B)

2. निम्न में से कौन-सा आर्थिक क्रियाओं के चार-स्तरीय वर्गीकरण का सही क्रम है?

Which is the correct four-fold classification of economic activities?

(A) Primary → Secondary → Tertiary → Quaternary

(B) Primary → Tertiary → Secondary → Quaternary

(C) Secondary → Primary → Quaternary → Tertiary

(D) Tertiary → Primary → Secondary → Quaternary

Answer: (A)

3. निम्नलिखित में से कौन-सी गतिविधि प्राथमिक व्यवसाय की मूल प्रकृति को सर्वाधिक स्पष्ट करती है?

Which activity best represents the basic nature of a primary occupation?

(A) Software development

(B) Banking

(C) Forest resource collection

(D) Retail trade

Answer: (C)

4. प्राथमिक व्यवसायों के संबंध में निम्न में से कौन-सा कथन सही है?

Which statement is correct regarding primary occupations?

(A) वे पूर्णतः प्रकृति से स्वतंत्र होते हैं।

(B) वे मुख्यतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं।

(C) उनमें विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता कभी नहीं होती।

(D) वे केवल विकसित देशों में पाए जाते हैं।

Answer: (B)

5. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक व्यवसायों का समूह है?

Which is a group of primary occupations?

(A) Banking, insurance, trade

(B) Mining, agriculture, fishing

(C) Teaching, research, consulting

(D) Manufacturing, construction, processing

Answer: (B)

6. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक व्यवसाय नहीं है?

Which is NOT a primary occupation?

(A) Fishing

(B) Mining

(C) Agriculture

(D) Manufacturing

Answer: (D)

7. प्राथमिक व्यवसायों के लिए अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होने का मुख्य कारण क्या है?

Why do primary occupations generally require relatively extensive areas?

(A) वे सीधे प्राकृतिक संसाधनों एवं भूमि पर निर्भर होते हैं।

(B) उनमें केवल urban population कार्य करती है।

(C) उनमें केवल मशीनों का प्रयोग होता है।

(D) उनका प्राकृतिक पर्यावरण से कोई संबंध नहीं है।

Answer: (A)

8. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक व्यवसाय और उसके पर्यावरण के बीच सही संबंध दर्शाता है?

Which correctly relates a primary occupation to its environment?

(A) घासभूमि — पशुपालन

(B) खनिज क्षेत्र — मत्स्य ग्रहण

(C) नदी — खनन ही केवल

(D) वन — बैंकिंग

Answer: (A)

9. आखेट एवं संग्रहण आधारित अर्थव्यवस्था की सबसे प्रमुख विशेषता क्या है?

What is the major characteristic of hunting and gathering economy?

(A) पूर्णतः स्थायी कृषि

(B) अत्यधिक औद्योगिकीकरण

(C) स्थानीय प्राकृतिक पर्यावरण पर अत्यधिक निर्भरता

(D) बड़े पैमाने का विनिर्माण

Answer: (C)

10. निम्न में से कौन-सा आखेट एवं संग्रहण से संबंधित नहीं है?

Which is NOT associated with hunting and gathering?

(A) फल एवं जड़ें एकत्र करना

(B) पशु-पक्षियों का आखेट

(C) मछली पकड़ना

(D) बड़े पैमाने पर मशीन आधारित उद्योग

Answer: (D)

11. निम्न में से कौन-सा समूह source के अनुसार आखेट-संग्रहण से संबंधित समुदायों का उदाहरण देता है?

Which group represents communities associated with hunting and gathering according to the source?

(A) पिग्मी, सेमांग, बुशमैन

(B) मसाई, फुलानी, बद्दू

(C) गुज्जर, गद्दी, बकरवाल

(D) डेनमार्क के डेयरी किसान

Answer: (A)

12. उष्ण कटिबंधीय वनों में वाणिज्यिक संग्रहण में निम्न में से किसका संग्रह किया जाता है?

Which may be collected commercially in tropical forests?

(A) लाख, गोंद एवं जड़ी-बूटियाँ

(B) केवल गेहूँ

(C) केवल कोयला

(D) केवल लौह-अयस्क

Answer: (A)

13. आखेट-संग्रहण समुदायों की प्राकृतिक पर्यावरण के प्रति गहरी जानकारी का प्रमुख कारण क्या है?

Why do hunting-gathering communities possess detailed knowledge of their natural environment?

(A) उनकी आवश्यकताओं का बड़ा भाग स्थानीय पर्यावरण से पूरा होता है।

(B) वे केवल आधुनिक उद्योगों पर निर्भर होते हैं।

(C) वे स्थायी कृषि करते हैं।

(D) वे केवल आयातित वस्तुओं का उपयोग करते हैं।

Answer: (A)

14. पशुपालन के विकास के संदर्भ में निम्न में से कौन-सा क्रम source की व्याख्या से सर्वाधिक संगत है?

Which sequence is most consistent with the source’s explanation of the development of pastoralism?

(A) व्यापार के बाद संग्रहण का विकास

(B) उद्योग के बाद आखेट का विकास

(C) आखेट-संग्रहण के बाद पशुपालन का विकास

(D) कृषि के बाद ही सभी प्रकार के पशुपालन का विकास

Answer: (C)

15. निम्न में से कौन-सा पशु-पर्यावरण का सही युग्म है?

Which is the correctly matched animal-environment pair?

(A) मरुस्थल — ऊँट

(B) टुण्ड्रा — गाय-बैल

(C) सवाना — याक

(D) तिब्बत — ऊँट

Answer: (A)

16. तिब्बत एवं हिमालय के पर्वतीय प्रदेशों में किस पशु का पालन source में बताया गया है?

Which animal is associated with pastoralism in Tibet and Himalayan mountainous regions?

(A) Camel

(B) Yak

(C) Reindeer

(D) Alpaca

Answer: (B)

17. निम्न में से कौन-सा चलवासी पशुपालन की मूल विशेषता है?

Which is a basic characteristic of nomadic pastoralism?

(A) चारे एवं पानी की खोज में स्थान परिवर्तन

(B) एक ही खेत में स्थायी फसल उत्पादन

(C) केवल urban market services

(D) पूर्णतः factory-based livestock production

Answer: (A)

18. चलवासी पशुपालक अपने स्थान परिवर्तन के दौरान मुख्यतः किन संसाधनों की खोज करते हैं?

Which resources primarily determine the movement of nomadic pastoralists?

(A) चारा और पानी

(B) कोयला और लौह-अयस्क

(C) बाजार और बैंक

(D) कारखाने और बंदरगाह

Answer: (A)

19. निम्न में से कौन-सा चलवासी पशुपालन का क्षेत्र source में उल्लिखित है?

Which is an area of nomadic pastoralism mentioned in the source?

(A) सहारा मरुस्थल

(B) अमेजन का शहरी क्षेत्र

(C) पश्चिमी यूरोप का औद्योगिक क्षेत्र

(D) जापान का महानगरीय क्षेत्र

Answer: (A)

20. निम्न में से कौन-सा समुदाय चलवासी पशुपालन से संबंधित है?

Which community is associated with nomadic pastoralism?

(A) मसाई

(B) डेनिश डेयरी किसान

(C) पम्पास के आधुनिक कृषक

(D) कनाडाई लकड़ी उद्योग कर्मी

Answer: (A)

21. पर्वतीय क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतु में ऊँचाई की ओर और शीत ऋतु में घाटियों की ओर पशुपालकों का जाना कहलाता है—

Seasonal movement of pastoralists to higher elevations in summer and valleys in winter is called:

(A) Transhumance / ऋतु प्रवास

(B) Plantation

(C) Shifting cultivation

(D) Truck farming

Answer: (A)

22. निम्न में से कौन-सा ऋतु प्रवास का सही उदाहरण है?

Which is an example of transhumance?

(A) कनाडा के औद्योगिक श्रमिक

(B) सहारा के स्थायी कृषक

(C) हिमालय के गुज्जर, गद्दी एवं बकरवाल

(D) डेनमार्क के डेयरी किसान

Answer: (C)

23. निम्न में से कौन-सा कथन Transhumance को Nomadic Pastoralism से अलग करता है?

Which distinguishes transhumance from nomadic pastoralism?

(A) Transhumance में seasonal movement एक अपेक्षाकृत निश्चित ऊर्ध्वाधर/क्षेत्रीय pattern का अनुसरण करता है।

(B) Transhumance में पशुपालन नहीं होता।

(C) Nomadic pastoralism में कभी movement नहीं होता।

(D) दोनों में कोई अंतर नहीं है।

Answer: (A)

24. आधुनिक काल में कुछ क्षेत्रों में चलवासी पशुपालन के स्थान पर व्यापारिक पशुपालन आने का एक प्रमुख कारण क्या बताया गया है?

What is one reason for the replacement of nomadic pastoralism by commercial livestock farming in some regions?

(A) कृषि का पूर्ण अंत

(B) प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण अभाव

(C) पशुओं का विलुप्त होना

(D) उद्योगों एवं आधुनिक सुविधाओं का विकास 

Answer: (D)

25. व्यापारिक पशुपालन की कौन-सी विशेषता उसे चलवासी पशुपालन से अलग करती है?

Which feature distinguishes commercial livestock farming from nomadic pastoralism?

(A) पशुपालक एक स्थान पर रहकर वैज्ञानिक एवं व्यापारिक तरीके अपनाते हैं।

(B) वे लगातार नए चरागाह खोजते हैं।

(C) वे केवल प्राकृतिक घास पर निर्भर रहते हैं।

(D) वे बाजार से पूर्णतः कटे रहते हैं।

Answer: (A)

26. व्यापारिक पशुपालन में चारे की फसलों की खेती का क्या महत्व है?

What is the significance of fodder cultivation in commercial livestock farming?

(A) पशुओं के लिए नियंत्रित एवं पौष्टिक चारा उपलब्ध कराना

(B) पशुपालकों को प्रवास के लिए बाध्य करना

(C) प्राकृतिक चरागाह समाप्त करना ही इसका उद्देश्य है।

(D) केवल निर्यात फसल पैदा करना

Answer: (A)

27. निम्न में से कौन-सा व्यापारिक पशुपालन का प्रमुख क्षेत्र source में उल्लिखित है?

Which is a major region of commercial livestock farming mentioned in the source?

(A) उत्तरी अमेरिका का प्रेयरी क्षेत्र

(B) सहारा का केंद्रीय मरुस्थल ही

(C) हिमालय का प्रत्येक भाग

(D) अमेजन का प्रत्येक भाग

Answer: (A)

28. व्यापारिक पशुपालन में नस्ल सुधार एवं रोग नियंत्रण का महत्व किस बात को दर्शाता है?

What does emphasis on breeding and disease control indicate in commercial livestock farming?

(A) इसका वैज्ञानिक एवं बाजारोन्मुख स्वरूप

(B) इसका पूर्णतः निर्वाह स्वरूप

(C) इसका पर्यावरण से पूर्ण विच्छेद

(D) इसका केवल खानाबदोश स्वरूप

Answer: (A)

29. लकड़ी काटने का व्यापारिक विकास विशेष रूप से किस प्रकार के वन प्रदेश में हुआ?

Commercial logging developed particularly in which forest region?

(A) मरुस्थलीय प्रदेश

(B) शंकुधारी वन प्रदेश

(C) टुण्ड्रा का बर्फीला क्षेत्र

(D) घासभूमि

Answer: (B)

30. निम्न में से कौन-सा लकड़ी काटने वाले प्रमुख देशों का समूह है?

Which group represents major commercial logging countries mentioned in the source?

(A) अर्जेंटीना, ब्राजील, वेनेजुएला, उरुग्वे

(B) मिस्र, सऊदी अरब, लीबिया, चाड

(C) भारत, श्रीलंका, मलेशिया, इंडोनेशिया

(D) स्वीडन, फिनलैंड, रूस, कनाडा 

Answer: (D)

31. लकड़ी से लुग्दी एवं कागज बनाने वाले उद्योगों का वनों से संबंध किस प्रकार का है?

What is the relationship between pulp and paper industries and forests?

(A) वन कच्चा माल प्रदान करते हैं।

(B) वन केवल बाजार प्रदान करते हैं।

(C) वन केवल श्रमिक प्रदान करते हैं।

(D) वन का कोई संबंध नहीं है।

Answer: (A)

32. मध्य अक्षांशीय तटीय प्रदेशों में व्यापारिक मत्स्य ग्रहण के विकास में कौन-सा कारक महत्वपूर्ण है?

Which factor is important for commercial fishing in middle-latitude coastal regions?

(A) शक्तिचालित नावों एवं जलपोतों का उपयोग

(B) केवल पारंपरिक भाले

(C) केवल ऊँट परिवहन

(D) केवल वर्षा जल

Answer: (A)

33. बड़े मत्स्य जहाजों में मछलियों को संसाधित एवं पैक करने की सुविधा किस प्रवृत्ति को दर्शाती है?

Processing and packing fish aboard large fishing vessels indicates:

(A) मत्स्य व्यवसाय का औद्योगिक एवं व्यापारिक स्वरूप

(B) केवल निर्वाह मत्स्य ग्रहण

(C) पशुपालन

(D) स्थानान्तरी कृषि

Answer: (A)

34. खनन को प्राथमिक व्यवसाय क्यों माना जाता है?

Why is mining classified as a primary occupation?

(A) इसमें पृथ्वी से प्राकृतिक खनिज संसाधनों का प्रत्यक्ष निष्कर्षण होता है।

(B) इसमें केवल manufactured goods बेचे जाते हैं।

(C) इसमें केवल financial services होती हैं।

(D) इसमें केवल research किया जाता है।

Answer: (A)

35. निम्न में से कौन-सा खनन के व्यापारिक दोहन को प्रभावित करने वाला कारक नहीं है?

Which is NOT a factor affecting commercial exploitation of minerals?

(A) अयस्क की मांग

(B) अयस्क की गुणवत्ता

(C) खान की गहराई एवं सुगम्यता

(D) केवल देश की भाषा

Answer: (D)

36. खनिजों के वितरण के संबंध में कौन-सा कथन सही है?

Which statement is correct regarding mineral distribution?

(A) खनिजों का वितरण असमान है और अधिकांश खनिज non-renewable हैं।

(B) सभी देश खनिजों में आत्मनिर्भर हैं।

(C) सभी खनिज renewable हैं।

(D) खनिज पूरे विश्व में समान रूप से वितरित हैं।

Answer: (A)

37. खनन प्रारम्भ होने के बाद किसी क्षेत्र में परिवहन सुविधाओं के विकास और बस्ती विस्तार का क्या संबंध हो सकता है?

What may be the relationship between mining and transport/settlement development?

(A) खनन के कारण परिवहन सुविधाएँ विकसित हो सकती हैं और लोगों का आगमन बढ़ सकता है।

(B) खनन हमेशा बस्तियों को समाप्त करता है।

(C) खनन का परिवहन से कोई संबंध नहीं है।

(D) खनन केवल समुद्र में होता है।

Answer: (A)

38. पेट्रोलियम शोधनशालाओं के संदर्भ में source में कौन-सा तर्क दिया गया है?

What reasoning is given in the source regarding petroleum refineries?

(A) अशुद्ध पेट्रोलियम का परिवहन कई petroleum products की तुलना में सस्ता हो सकता है।

(B) पेट्रोलियम का परिवहन असंभव है।

(C) सभी refineries केवल खानों के ऊपर स्थापित होती हैं।

(D) पेट्रोलियम का कोई परिवहन नहीं होता।

Answer: (A)

39. कृषि के विकास के संदर्भ में सबसे प्राचीन रूप किसे बताया गया है?

Which is described as the oldest form of agriculture?

(A) स्थानान्तरी कृषि

(B) रोपण कृषि

(C) मिश्रित कृषि

(D) ट्रक फार्मिंग

Answer: (A)

40. स्थानान्तरी कृषि की मूल प्रक्रिया में क्या शामिल है?

What is involved in the basic process of shifting cultivation?

(A) वनस्पति को काटना-जला कर भूमि साफ करना और कुछ वर्षों बाद दूसरी भूमि पर जाना

(B) स्थायी खेतों में लगातार एक ही भूमि पर खेती करना

(C) केवल greenhouse cultivation

(D) केवल commercial dairy farming

Answer: (A)

41. स्थानान्तरी कृषि में भूमि को कुछ वर्षों के बाद छोड़ने का प्रमुख कारण क्या है?

Why is land left fallow after a few years in shifting cultivation?

(A) समुद्री जल का बढ़ना

(B) भूमि की उर्वरता/उत्पादकता में कमी और नए क्षेत्र की आवश्यकता

(C) उद्योगों की अधिकता

(D) बाजार का पूर्ण अभाव

Answer: (B)

42. निम्न में से कौन-सा स्थानान्तरी कृषि का प्रमुख क्षेत्र source में बताया गया है?

Which is a major area of shifting cultivation mentioned in the source?

(A) उष्ण कटिबंधीय वन

(B) शीतोष्ण घासभूमि ही

(C) मरुस्थलीय क्षेत्र ही

(D) ध्रुवीय हिम क्षेत्र

Answer: (A)

43. स्थायी कृषि के विकास का एक प्रमुख सामाजिक-भौगोलिक परिणाम क्या था?

What was a major socio-geographical consequence of permanent agriculture?

(A) अतिरिक्त खाद्यान्न समाप्त हो गया।

(B) मानव पूरी तरह खानाबदोश बन गया।

(C) परिवहन समाप्त हो गया।

(D) स्थायी बस्तियों को प्रोत्साहन मिला।

Answer: (D)

44. व्यापारिक कृषि की प्रमुख विशेषता क्या है?

What is a major characteristic of commercial agriculture?

(A) बाजार/निर्यात के लिए विशेष फसलों का बड़े पैमाने पर उत्पादन

(B) केवल स्थानीय निर्वाह के लिए उत्पादन

(C) केवल जंगली पौधों का संग्रहण

(D) केवल पशुपालन

Answer: (A)

45. रोपण कृषि को कृषि का विशिष्टीकृत रूप क्यों कहा जाता है?

Why is plantation agriculture considered a specialized form of agriculture?

(A) केवल वन्य उत्पादों का संग्रहण

(B) केवल छोटे घरेलू खेतों में खाद्यान्न उत्पादन

(C) केवल पशुपालन

(D) बड़े क्षेत्र में चाय, कॉफी, रबर आदि विशेष फसलों का मुख्यतः व्यापारिक/निर्यात उद्देश्य से उत्पादन

Answer: (D)

46. निम्न में से कौन-सा रोपण कृषि का सही समूह है?

Which is the correct group of plantation crops?

(A) चाय, कॉफी, रबर

(B) गेहूँ, जौ, बाजरा

(C) चना, मसूर, मटर

(D) केवल घास और चारा

Answer: (A)

47. मिश्रित कृषि की सबसे उपयुक्त पहचान क्या है?

What best identifies mixed farming?

(A) फसल उत्पादन और पशुपालन का एक साथ होना

(B) केवल फल उत्पादन

(C) केवल पशुपालन

(D) केवल वन संग्रहण

Answer: (A)

48. ट्रक फार्मिंग मुख्यतः किससे संबंधित है?

Truck farming is mainly associated with:

(A) मरुस्थल में ऊँट पालन

(B) नगरीय क्षेत्रों के समीप साग-सब्जियों की कृषि

(C) पर्वतीय क्षेत्रों में याक पालन

(D) समुद्र में मत्स्य ग्रहण

Answer: (B)

49. उद्यान कृषि का प्रमुख स्थानिक संबंध किससे है?

What is the major locational association of horticulture mentioned in the source?

(A) केवल ध्रुवीय क्षेत्रों में कृषि

(B) केवल खनिज क्षेत्रों में कृषि

(C) नगरीय उपभोग केन्द्रों के समीप फल एवं फूलों की कृषि

(D) केवल समुद्र के भीतर कृषि

Answer: (C)

50. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक आर्थिक गतिविधियों के बदलते स्वरूप को सबसे अच्छी तरह दर्शाता है?

Which best represents the changing nature of primary economic activities?

(A) प्रकृति से पूर्ण स्वतंत्रता

(B) निर्वाह से व्यापारिक एवं वैज्ञानिक उत्पादन की ओर बढ़ता विशिष्टीकरण

(C) प्राथमिक गतिविधियों का पूर्ण अंत

(D) केवल शिकार पर स्थायी निर्भरता

Answer: (B)

21. Primary Economic Activities of Humans (मनुष्य की प्राथमिक आर्थिक गतिविधियाँ)

Primary Economic Activities of Humans

(मनुष्य की प्राथमिक आर्थिक गतिविधियाँ)



Q. मानव के प्राथमिक व्यवसायों का विस्तार से वर्णन कीजिए।

Primary Economic Activities

उत्तर- मानव अपनी मूलभूत और उच्चतर आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएं करता है। इन क्रियाओं द्वारा मानव की आर्थिक प्रगति होती है। मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। चूंकि पृथ्वी सतह पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण में क्षेत्रीय विभिन्नता विद्यमान है, अतः मानव की आर्थिक क्रियाओं में भी क्षेत्रीय विभिन्नता पाई जाती है।

     उदाहरण के लिए वनों में मानव एकत्रीकरण या संग्रहण, आखेट एवं लकड़ी काटने जैसी आर्थिक क्रियाएं सम्पन्न करता है तो घास के मैदानों में पशुचारण, उपजाऊ समतल मैदानी भागों में कृषि, खनिजों की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में खनन, जल की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में मत्स्याखेट जैसी आर्थिक क्रियाएं करता है। साथ ही अनुकूल अवस्थिति वाले क्षेत्रों में विनिर्माण उद्योगों, परिवहन, व्यापार एवं सेवाओं से सम्बन्धित आर्थिक गतिविधियों में भी संलग्न रहता है।

        मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं या गतिविधियों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, यद्यपि ये चारों वर्ग एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं:-

1.  प्राथमिक व्यवसाय (Primary Occupation)

2. द्वितीयक व्यवसाय (Secondary Occupation)

3. तृतीयक (Tertiary Occupation)

4.  चतुर्थक  व्यवसाय (Quaternary Occupation)

1. प्राथमिक व्यवसाय (Primary Occupation):

      प्राथमिक व्यवसाय पूर्णतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं। प्राथमिक व्यवसायों के संचालन हेतु अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती है। वनों से संग्रहण, आखेट, लकड़ी काटना, घास के मैदानों में पशु चराना, पशुओं से दूध, मांस, खालें, आदि प्राप्त करना, समुद्रों, नदियों एवं झीलों से मछली पकड़ना, कृषि तथा खानों से खनिज निकालना, आदि प्रमुख व्यवसाय हैं।

    विश्व के विकासशील देशों में कार्यशील जनसंख्या का अधिकांश भाग प्राथमिक व्यवसायों में लगा हुआ है और विकसित देशों में कार्यशील जनसंख्या का अधिकांश भाग तृतीयक एवं चतुर्थक व्यवसायों में कार्यरत हैं। भारत में 60 प्रतिशत, चीन में 50 प्रतिशत, इथोपिया में 80 प्रतिशत, नाइजीरिया में 70 प्रतिशत जनसंख्या प्राथमिक व्यवसायों में लगी हुई है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 8 प्रतिशत, ग्रेट ब्रिटेन में 1 प्रतिशत, जापान में 5 प्रतिशत जनसंख्या ही प्राथमिक व्यवसायों में संलग्न है। मानव के प्रमुख प्राथमिक व्यवसायों का विवरण निम्नानुसार है:-

(i) आखेट, एकत्रीकरण या संग्रहण:-

    विश्व के कुछ प्रदेशों में आज भी लोग आखेट, संग्रहण या एकत्रीकरण जैसी आर्थिक क्रियाओं द्वारा अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। उष्ण कटिबन्धीय वनों में रहने वाले अफ्रीका के पिग्मी, मलेशिया के सेमांग, कालाहारी मरुस्थल के बुशमैन, आस्ट्रेलिया के मरुस्थल में रहने वाले आदिम लोग, उत्तरी ध्रुवीय प्रदेशों में रहने वाले एस्किमो एवं लैप्स लोग इस प्रकार की आर्थिक क्रियाओं में संलग्न हैं।

     ये लोग अपने आस-पास के पर्यावरण पर पूर्णतया आश्रित होते हैं। ये लोग अपने भोजन के लिए पौधों से विभिन्न प्रकार के फल, जड़ें और पत्तियाँ एकत्रित करते हैं। ये इन पदार्थों की खोज में इधर-उधर घूमते रहते हैं। पशु-पक्षियों के आखेट तथा झीलों और नदियों में मछली पकड़कर ये लोग अपनी भोजन सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। आखेट के लिए ये भाले और धनुष-बाण जैसे साधारण हथियारों का प्रयोग करते हैं।

     अपनी वस्त्र और मकान सम्बन्धी आवश्यकता पूर्ति के लिए ये लोग अपने आस-पास के पर्यावरण में उपलब्ध सामग्री उपयोग में लाते हैं। इन लोगों को अपने प्राकृतिक आवास की पूरी जानकारी होती है, क्योंकि इनकी सभी आवश्यकताएं स्थानीय पर्यावरण से ही पूरी होती हैं।

     उष्ण कटिबन्धीय वनों में रहने वाले लोग साधारण पैमाने पर जीविकोपार्जन हेतु और निर्यात के लिए वाणिज्यिक संग्रहण का कार्य करते हैं। इसके लिए ये चिकिल रस (इसका उपयोग चिविंग गम बनाने में किया जाता है), बलाता (इसका उपयोग समुद्री केविल, गोल्फ की गेंद का खोल बनाने में किया जाता है), नट (गिरी फल), रेशों, जड़ी-बूटियों, लाख, गोंद, आदि संग्रहण करते हैं।

(ii) पशुपालन:-

     आखेट और संग्रहण युग के बाद पशुपालन युग का प्रारम्भ हुआ। इस युग में विभिन्न पर्यावरण में रहने वाले लोगों ने विभिन्न प्रकार के पशुओं को पालतु बनाया। उदाहरण के लिए सवाना घास भूमियों में गाय-बैल, मरुस्थलों में ऊंट, स्टेपी घास भूमियों में भेड़, टुण्डा प्रदेशों में रेण्डियर, एण्डीज के पर्वतीय प्रदेशों में तामा और अल्पाका तथा तिब्बत एवं हिमालय के पर्वतीय प्रदेशों में याक, आदि पशुओं को पालतू बनाया गया। इन पालतू पशुओं से मानव को दूध, मांस, ऊन और खालों की प्राप्ति होती है। इनसे मानव की भोजन, वस्त्र और अन्य अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

     चलवासी पशुपालक अपने पालतू पशुओं के लिए चारे और पानी की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं। प्रत्येक चलवासी जाति एक निश्चित क्षेत्र में रहती है तथा उन्हें अपने उस क्षेत्र में चारागाहों और जल की आपूर्ति के स्रोत क्षेत्रों तथा ऋतुओं के अनुसार होने वाले परिवर्तनों की पूरी जानकारी होती है।

      सहारा मरुस्थल, पूर्वी अफ्रीका के तटीय भाग, सऊदी अरब, इराक, ईरान, अफगानिस्तान, चीन, मंगोलिया के शुष्क भाग, दक्षिण-पश्चिमी अफ्रीका, मालागासी के पश्चिमी भाग तथा यूरेशिया के दुण्ड्रा के दक्षिणी सीमान्त पर स्थित क्षेत्रों में चलवासी पशुपालन होता है।

      पूर्वी अफ्रीका के मसाई, नाइजीरिया के फुलानी, सहारा मरुस्थल में बद्दू, मध्य एशिया में खिरगीज लोग चतवासी पशुपालन में संलग्न हैं। इन क्षेत्रों में जलवायु उष्ण एवं शुष्क है। यहाँ घास छोटी एवं विरल होती है जो ग्रीष्म ऋतु में सूख भी जाती है। इन क्षेत्रों में प्रति इकाई भूमि की वहन क्षमता कम होती है। ये पशुपालक अपने पशुओं के साथ चारागाहों की खोज में घूमते रहते हैं। ये लोग तम्बुओं में रहते हैं और कठोर जीवन व्यतीत करते हैं।

     पर्वतीय प्रदेशों में चरवाहे ग्रीष्म ऋतु में अपने पशुओं को चराने के लिए अधिक ऊंचे स्थानों पर ले जाते हैं और शीत ऋतु में घाटियों में उतर आते हैं। इस प्रकार अपने पशुओं के साथ पशुपालकों के ऋतुओं के अनुसार प्रवास को ऋतु प्रवास (Transhumance) कहते हैं। उदाहरण के लिए हिमालय के पर्वतीय प्रदेश के गुज्जर, गद्दी, बकरवाल और भोटिया ऋतु प्रवास करते हैं।

     इसी प्रकार दुण्डा प्रदेश के लैप्स चरवाहे ग्रीष्म ऋतु में उत्तर की ओर तथा शीत ऋतु में दक्षिण में कोणधारी वनों की ओर प्रवास करते हैं।

    वर्तमान में चलवासी पशुचारण क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना हो जाने से लोग अब उद्योगों के पास पक्के मकानों में रहने लगे हैं। इसी प्रकार दक्षिणी अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में चलवासी पशुचारण का स्थान व्यापारिक पशुपालन ने ले लिया है। किरगीजस्तान, कजाखस्तान और उजबेकिस्तान में चलवासी पशुचारण क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध कराके कपास की कृषि की जाने लगी है।

    आधुनिक युग में पशुपालन वैज्ञानिक तरीकों से व्यापारिक आधार पर हो रहा है। उत्तरी अमेरिका का प्रेयरी क्षेत्र, ब्राजील का पठारी भाग और अर्जेण्टीना में विस्तृत पम्पास घास स्थल, वेनेजुएला का लानोस घास स्थल, दक्षिणी अफ्रीका का वेल्ड क्षेत्र, आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड की शीतोष्ण घास भूमि, कैम्पियन सागर के पूर्व तथा अरल सागर के उत्तर के विस्तृत भाग व्यापारिक पशुपालन के उल्लेखनीय क्षेत्र हैं।

     व्यापारिक पशुपालन उद्योग पूर्णतया प्राकृतिक चारागाहों पर आश्रित नहीं है। विस्तृत क्षेत्रों में चारे की फसलों और पौष्टिक घासों की खेती की जाती है। पशुओं को सुख-सुविधा सम्पन्न बाड़ों में रखकर खिलाया-पिलाया जाता है। विशेष नस्ल के पशु पाले जाते हैं, जिनकी दूध या मांस उत्पादन क्षमता अत्यधिक होती है। पशुओं के प्रजनन, नस्ल सुधार, रोगों की रोकथाम तथा बीमार पशुओं के इलाज, आदि की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है।

     पशुओं को बड़े-बड़े बाड़ों में रखा जाता है। इनमें मांस के लिए पशु पाले जाते हैं। डेनमार्क तथा न्यूजीलैण्ड में बड़े पैमाने पर दुग्ध व्यवसाय होता है। आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड में भेड़ ऊन तथा मांस के लिए व्यापारिक स्तर पर पाली जाती हैं।

    व्यापारिक पशुचारण में लोगों को प्रवास नहीं करना पड़ता है। वे एक ही स्थान पर रहते हैं। चारे की फसलों की खेती तथा दूध और मांस से संसाधित पदार्थ बनाने के लिए मशीनों का अत्यधिक प्रयोग होता है। इन संसाधित पदार्थों का बाजार अन्तर्राष्ट्रीय है।

(iii) लकड़ी काटना:-

    लकड़ी काटने के व्यवसाय का व्यापारिक स्तर पर विकास मुलायम लकड़ी के वृक्षों वाले शंकुधारी वन प्रदेशों में हुआ है। इमारती लकड़ी, लुग्दी, कागज तथा कृत्रिम रेशे बनाने के लिए वनों से लाखों पेड़ काटे जाते हैं। स्वीडन, फिनलैण्ड्स, रूस, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका के विस्तृत क्षेत्रों में शंकुधारी वन हैं। इन देशों के इन वनों में लकड़ी काटने का काम व्यापारिक स्तर पर होता है।

      पेड़ काटने तथा ल‌ट्ठे ढोने के लिए मशीनों का उपयोग होता है। चिराई के कारखाने लकड़ी के ल‌ट्ठों को संसाधित करके लुग्दी और कागज बनाते हैं। इन प्रदेशों में काटे गए पेड़ों के स्थान पर नए पेड़ लगाने का कार्य साथ-साथ चलता रहता है। इन प्रदेशों में परिवहन की पर्याप्त सुविधाएं हैं। बड़ी मात्रा में लुग्दी, कागज और अखबारी कागज संसार के अनेक देशों को निर्यात किया जाता है।

     उष्ण और उपोष्ण कटिबन्धीय वनों में लकड़ी काटने का व्यवसाय कुछ सुगम्य क्षेत्रों तक ही सीमित है। सागौन, महोगनी, चंदन और रोजवुड के वृक्ष उष्ण कटिबन्धीय वनों में तथा बीच, वर्थ, मैपिल और ओक के वृक्ष मध्य अक्षांशीय वनों में मिलते है। इनका उपयोग इमारते तथा कर्नीचर बनाने में किया जाता है।

     भारत, चीन तथा अफ्रीका के घने बसे कुछ देशों में जलाऊ लकड़ी तथा काठ-कोयले की मांग को पूरा करने के लिए पेड़ों, झाड़ियों तथा दूसरे पौधों का सफाया हो चुका है। इन प्रदेशों में काटे गए पेड़-पौधों के स्थान पर नए पेड़ न लगाने के कारण मिट्टी का अपरदन और बाढ़ों की आवृत्ति बढ़ी है।

(iv) मत्स्य ग्रहण:-

     मध्य अक्षांशों के तटीय प्रदेशों में मछली पकड़ने का काम व्यापारिक स्तर पर विकसित हो चुका है। शक्ति चालित नावों तथा जलपोतों के द्वारा मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। बड़े-बड़े जहाज तैरते हुए कारखानों का काम करते है जिनमें पकड़ी हुई मछलियों को संसाधित करके डिब्बों में पैक कर दिया जाता है। जहाजों में बने प्रशीतकों की सुविधा के कारण मछलियों को संसार के अनेक देशों में निर्यात किया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, ग्रेट ब्रिटेन, जापान तथा नार्वे में व्यापारिक मत्स्य ग्रहण बड़े पैमाने पर विकसित हो गया है।

(v) खनन:-

     भू-गर्भ में से खनिजों को निकालने की क्रिया को खनन कहते हैं। खनिजों की उपलब्धता वाले क्षेत्रों को खान क्षेत्र कहते हैं। खनिज प्रकृति में पाए जाने वाले वे जड़ पदार्थ हैं जो रासायनिक तत्व भी हो सकते हैं और यौगिक भी। पृथ्वी पर खनिजों का वितरण असमान है। अधिकांश खनिज नवीकरण के योग्य नहीं हैं।

     कोई भी देश खनिजों की उपलब्धता की दृष्टि से आत्मनिर्भर नहीं है। खनिजों के व्यापारिक दोहन को अयस्क की मांग, अयस्क की गुणवत्ता, भू-वैज्ञानिक दशाएं, खान की गहराई तथा पहुंच की दृष्टि से खानों की सुगम्यता, उपलब्ध प्रौद्योगिकी, आवश्यक पूंजी की उपलब्धता, श्रमिकों की आपूर्ति, आदि कारक प्रभावित करते हैं। खनन का कार्य शुरू होने से परिवहन की सुविधाओं का विकास होने लगता है तथा उस क्षेत्र में लोग बसने के लिए आने लगते हैं।

     अयस्कों के बेनीफिसीएशन संयन्त्र या तो खानों के समीप स्थापित होते हैं या फिर उपभोक्ता केन्द्रों के निकट स्थापित होते हैं। पेट्रोलियम से प्राप्त अनेक प्रकार के उत्पादों के परिवहन की तुलना में अशुद्ध पेट्रोलियम का परिवहन सस्ता पड़ता है। अतः तेल शोधनशालाएं बन्दरगाहों के समीप या उपभोक्ता केन्द्रों के समीप स्थापित की जाती हैं।

       खनन तथा उससे जुड़े व्यवसायों में लगे लोगों की संख्या में प्रतिवर्ष परिवर्तन होता रहता है। इस परिवर्तन के अनेक कारण है, जैसे एक खान के बन्द होने के बाद दूसरी खान का प्रारम्भ होना, अयस्क का लागत मूल्य, अयस्क की मांग, अन्य देशों में नए निक्षेपों की खोज, आदि। अनेक देशों की अर्थव्यवस्था में खनिजों का उत्पादन उल्लेखनीय स्थान रखता है। बोत्सवाना, अजरबेजान, गेबन, कजाखस्तान, चिली, पश्चिमी सहारा, जाम्बिया, आदि कुछ ऐसे देश हैं जिनके कुछ निर्यात मूल्य में 90 प्रतिशत तक भाग खनिजों का होता है।

(vi) कृषि:-

    कृषि एक बहुप्रचलित व्यवसाय है। कृषि के लिए सबसे पहले भूमि से वनस्पति को साफ करना पड़ता है। इसके बाद जुताई करके, चुने हुए पौंधों की खेती की जाती है। जिनसे मानव की भोजन, रेशों या अन्य उत्पादों की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

     कृषि के सबसे प्राचीन रूप को स्थानान्तरी कृषि कहते हैं। स्थानान्तरी कृषि अधिकतर उष्ण कटिबन्धीय वनों में रहने वाले लोगों द्वारा की जाती है। वे वनों में पेड़-पौधों को काटकर जला देते हैं। इस प्रकार वन भूमि साफ हो जाती है। वे कुदाल की मदद से रतालू, मैनिआक, टैपिओका, आदि जड़ वाली फसलें उगाते हैं।

     वन भूमि के साफ किए गए भागों को दो या तीन साल तक खेती करने के बाद परती भूमि के रूप में छोड़ दिया जाता है और अन्यत्र वन भूमि का दूसरा टुकड़ा साफ कर कृषि की जाती है। स्थानान्तरी कृषि की इस प्रक्रिया में मूल वनों का स्थान कम घने वन ले लेते हैं। इस प्रकार की कृषि में एक छोटे से समुदाय के निर्वाह के लिए विशाल क्षेत्र की आवश्यकता होती है। उत्तर-पूर्वी भारत की जनजातियाँ, मलेशिया के सेमांग तथा अमेजन बेसिन की जनजातियाँ स्थानान्तरी कृषि करती हैं।

     मानव सभ्यता के विकास में स्थायी कृषि एक महत्वपूर्ण चरण था। इससे स्थाई बस्ती बसाने को प्रोत्साहन मिला, क्योंकि आसपास ही खेतों में वर्ष भर काम रहता था। प्रत्येक ऋतु में चुनी हुई फसलों की खेती करने के लिए ऋतुओं की दशाओं का सावधानीपूर्वक अध्ययन जरूरी था। भूमि को साफ करने, मिट्टी की जुताई, उपलब्ध जल का सावधानीपूर्वक सिंचाई द्वारा उपयोग तथा फसल काटने के लिए गांव में रहने वाले लोगों का सहयोग आवश्यक हो गया था।

       अतिरिक्त भोजन सामग्री उपलब्ध होने के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान में जाने की कोई आवश्यकता नहीं रह गई। फसलों से प्राप्त भूसे तथा पुआल, आदि से पालतू पशुओं को चारा मिल जाता था। पशुओं का खेतों की जुताई तथा कृषि के अन्य कार्यों में उपयोग किया जाता था। इस प्रकार एक प्रभावशाली संगठन बन गया।

      अतिरिक्त खाद्यान्न उन लोगों के हिस्से में आता था जो समुदाय की किसी न किसी रूप में सेवा करते थे। पहिए की खोज के बाद पशुओं को गाड़ी खींचने के काम में लाया जाने लगा। अतिरिक्त खाद्यान्न को अन्य उत्पादों से बदलने के लिए गाड़ियों में लाद कर बाहर ले जाया जाने लगा। सड़कों के निर्माण से विभिन्न समुदाय सम्पर्क में आने लगे, विचारों का आदान-प्रदान शुरू हुआ।

     कृषि का प्रारम्भ निर्वाह कृषि के रूप में हुआ, क्योंकि इससे स्थानीय समुदाय की आवश्यकताएं तुरन्त पूरी हो जाती थी। पिछले 125 वर्षों में परिवहन तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के विकास के साथ-साथ कृषि में विशिष्टीकरण हो गया है। अधिकतर कृषि कार्यों में मशीनों का प्रयोग करके, विशाल क्षेत्रों में एक फसल की खेती विशेष रूप से होने लगी है।

    दूसरे देशों को निर्यात करने के लिए फसल विशेष की कृषि जैसे- कपास, मक्का, गेहूँ, आदि बड़े पैमाने पर होने लगी है। इस प्रकार की कृषि को व्यापारिक कृषि कहते हैं।

    रोपण कृषि, कृषि का एक विशिष्टीकृत रूप है। रोपण कृषि के अन्तर्गत सैकड़ों हेक्टेअर भूमि में कहवा, चाय, मसाले, रबड़, आदि की फसलें पैदा की जाती हैं। इन फसलों को मुख्य रूप से निर्यात के लिए ही पैदा किया जाता है। निर्यात से पूर्व इन फसलों को बड़े-बड़े कारखानों में संसाधित किया जाता है। रोपण कृषि में भारी मात्रा में पूंजी का निवेश होता है तथा इसमें बड़ी संख्या में श्रमिकों की आवश्यकता होती है। रोपण कृषि भारत, श्रीलंका, मलेशिया, आदि देशों के कुछ भागों में की जाती है।

     मिश्रित कृषि में फसलें उगाने तथा पशुओं को पालने का कार्य एक साथ किया जाता है। मिश्रित कृषि यूरोप, उत्तरी अमेरिका के पूर्वी भाग, अर्जेण्टीना के पम्पास, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका तथा न्यूजीलैण्ड में की जाती है।

     ट्रक फार्मिंग एक विशेष प्रकार की कृषि है जिसमें साग-सब्जियों की कृषि नगरीय क्षेत्रों के समीप की जाती है।

     उद्यान कृषि के अन्तर्गत नगरीय उपभोग केन्द्रों के समीपवर्ती क्षेत्रों में फल औ फूलों की कृषि की जाती है।

    आधुनिक कृषि के अन्तर्गत कृषि के विभिन्न कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न मशीनों का प्रयोग किया जाता है। अधिक उपज लेने के लिए उन्नत बीज, उर्वरक, कीटनाशक दवाइयाँ तथा सिंचाई की उत्तम सुविधा का प्रयोग किया जाता है।

    विस्तृत कृषि, व्यापारिक कृषि, मिश्रित कृषि, डेयरी फार्मिंग कृषि, उद्यान कृषि आदि आधुनिक ढंग से की जाती है।

MCQs/UGC NET/JRF Quick Revision

1. मानव की आर्थिक क्रियाओं में क्षेत्रीय विभिन्नता का सबसे उपयुक्त कारण कौन-सा है?

Which best explains regional variation in human economic activities?

(A) केवल जनसंख्या का आकार / Population size only

(B) भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण की क्षेत्रीय विभिन्नता / Regional variation in physical and social environment

(C) केवल राजनीतिक सीमाएँ / Political boundaries only

(D) केवल तकनीकी विकास / Technological development only

Answer: (B)

2. निम्न में से कौन-सा आर्थिक क्रियाओं के चार-स्तरीय वर्गीकरण का सही क्रम है?

Which is the correct four-fold classification of economic activities?

(A) Primary → Secondary → Tertiary → Quaternary

(B) Primary → Tertiary → Secondary → Quaternary

(C) Secondary → Primary → Quaternary → Tertiary

(D) Tertiary → Primary → Secondary → Quaternary

Answer: (A)

3. निम्नलिखित में से कौन-सी गतिविधि प्राथमिक व्यवसाय की मूल प्रकृति को सर्वाधिक स्पष्ट करती है?

Which activity best represents the basic nature of a primary occupation?

(A) Software development

(B) Banking

(C) Forest resource collection

(D) Retail trade

Answer: (C)

4. प्राथमिक व्यवसायों के संबंध में निम्न में से कौन-सा कथन सही है?

Which statement is correct regarding primary occupations?

(A) वे पूर्णतः प्रकृति से स्वतंत्र होते हैं।

(B) वे मुख्यतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं।

(C) उनमें विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता कभी नहीं होती।

(D) वे केवल विकसित देशों में पाए जाते हैं।

Answer: (B)

5. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक व्यवसायों का समूह है?

Which is a group of primary occupations?

(A) Banking, insurance, trade

(B) Mining, agriculture, fishing

(C) Teaching, research, consulting

(D) Manufacturing, construction, processing

Answer: (B)

6. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक व्यवसाय नहीं है?

Which is NOT a primary occupation?

(A) Fishing

(B) Mining

(C) Agriculture

(D) Manufacturing

Answer: (D)

7. प्राथमिक व्यवसायों के लिए अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होने का मुख्य कारण क्या है?

Why do primary occupations generally require relatively extensive areas?

(A) वे सीधे प्राकृतिक संसाधनों एवं भूमि पर निर्भर होते हैं।

(B) उनमें केवल urban population कार्य करती है।

(C) उनमें केवल मशीनों का प्रयोग होता है।

(D) उनका प्राकृतिक पर्यावरण से कोई संबंध नहीं है।

Answer: (A)

8. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक व्यवसाय और उसके पर्यावरण के बीच सही संबंध दर्शाता है?

Which correctly relates a primary occupation to its environment?

(A) घासभूमि — पशुपालन

(B) खनिज क्षेत्र — मत्स्य ग्रहण

(C) नदी — खनन ही केवल

(D) वन — बैंकिंग

Answer: (A)

9. आखेट एवं संग्रहण आधारित अर्थव्यवस्था की सबसे प्रमुख विशेषता क्या है?

What is the major characteristic of hunting and gathering economy?

(A) पूर्णतः स्थायी कृषि

(B) अत्यधिक औद्योगिकीकरण

(C) स्थानीय प्राकृतिक पर्यावरण पर अत्यधिक निर्भरता

(D) बड़े पैमाने का विनिर्माण

Answer: (C)

10. निम्न में से कौन-सा आखेट एवं संग्रहण से संबंधित नहीं है?

Which is NOT associated with hunting and gathering?

(A) फल एवं जड़ें एकत्र करना

(B) पशु-पक्षियों का आखेट

(C) मछली पकड़ना

(D) बड़े पैमाने पर मशीन आधारित उद्योग

Answer: (D)

11. निम्न में से कौन-सा समूह source के अनुसार आखेट-संग्रहण से संबंधित समुदायों का उदाहरण देता है?

Which group represents communities associated with hunting and gathering according to the source?

(A) पिग्मी, सेमांग, बुशमैन

(B) मसाई, फुलानी, बद्दू

(C) गुज्जर, गद्दी, बकरवाल

(D) डेनमार्क के डेयरी किसान

Answer: (A)

12. उष्ण कटिबंधीय वनों में वाणिज्यिक संग्रहण में निम्न में से किसका संग्रह किया जाता है?

Which may be collected commercially in tropical forests?

(A) लाख, गोंद एवं जड़ी-बूटियाँ

(B) केवल गेहूँ

(C) केवल कोयला

(D) केवल लौह-अयस्क

Answer: (A)

13. आखेट-संग्रहण समुदायों की प्राकृतिक पर्यावरण के प्रति गहरी जानकारी का प्रमुख कारण क्या है?

Why do hunting-gathering communities possess detailed knowledge of their natural environment?

(A) उनकी आवश्यकताओं का बड़ा भाग स्थानीय पर्यावरण से पूरा होता है।

(B) वे केवल आधुनिक उद्योगों पर निर्भर होते हैं।

(C) वे स्थायी कृषि करते हैं।

(D) वे केवल आयातित वस्तुओं का उपयोग करते हैं।

Answer: (A)

14. पशुपालन के विकास के संदर्भ में निम्न में से कौन-सा क्रम source की व्याख्या से सर्वाधिक संगत है?

Which sequence is most consistent with the source’s explanation of the development of pastoralism?

(A) व्यापार के बाद संग्रहण का विकास

(B) उद्योग के बाद आखेट का विकास

(C) आखेट-संग्रहण के बाद पशुपालन का विकास

(D) कृषि के बाद ही सभी प्रकार के पशुपालन का विकास

Answer: (C)

15. निम्न में से कौन-सा पशु-पर्यावरण का सही युग्म है?

Which is the correctly matched animal-environment pair?

(A) मरुस्थल — ऊँट

(B) टुण्ड्रा — गाय-बैल

(C) सवाना — याक

(D) तिब्बत — ऊँट

Answer: (A)

16. तिब्बत एवं हिमालय के पर्वतीय प्रदेशों में किस पशु का पालन source में बताया गया है?

Which animal is associated with pastoralism in Tibet and Himalayan mountainous regions?

(A) Camel

(B) Yak

(C) Reindeer

(D) Alpaca

Answer: (B)

17. निम्न में से कौन-सा चलवासी पशुपालन की मूल विशेषता है?

Which is a basic characteristic of nomadic pastoralism?

(A) चारे एवं पानी की खोज में स्थान परिवर्तन

(B) एक ही खेत में स्थायी फसल उत्पादन

(C) केवल urban market services

(D) पूर्णतः factory-based livestock production

Answer: (A)

18. चलवासी पशुपालक अपने स्थान परिवर्तन के दौरान मुख्यतः किन संसाधनों की खोज करते हैं?

Which resources primarily determine the movement of nomadic pastoralists?

(A) चारा और पानी

(B) कोयला और लौह-अयस्क

(C) बाजार और बैंक

(D) कारखाने और बंदरगाह

Answer: (A)

19. निम्न में से कौन-सा चलवासी पशुपालन का क्षेत्र source में उल्लिखित है?

Which is an area of nomadic pastoralism mentioned in the source?

(A) सहारा मरुस्थल

(B) अमेजन का शहरी क्षेत्र

(C) पश्चिमी यूरोप का औद्योगिक क्षेत्र

(D) जापान का महानगरीय क्षेत्र

Answer: (A)

20. निम्न में से कौन-सा समुदाय चलवासी पशुपालन से संबंधित है?

Which community is associated with nomadic pastoralism?

(A) मसाई

(B) डेनिश डेयरी किसान

(C) पम्पास के आधुनिक कृषक

(D) कनाडाई लकड़ी उद्योग कर्मी

Answer: (A)

21. पर्वतीय क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतु में ऊँचाई की ओर और शीत ऋतु में घाटियों की ओर पशुपालकों का जाना कहलाता है—

Seasonal movement of pastoralists to higher elevations in summer and valleys in winter is called:

(A) Transhumance / ऋतु प्रवास

(B) Plantation

(C) Shifting cultivation

(D) Truck farming

Answer: (A)

22. निम्न में से कौन-सा ऋतु प्रवास का सही उदाहरण है?

Which is an example of transhumance?

(A) कनाडा के औद्योगिक श्रमिक

(B) सहारा के स्थायी कृषक

(C) हिमालय के गुज्जर, गद्दी एवं बकरवाल

(D) डेनमार्क के डेयरी किसान

Answer: (C)

23. निम्न में से कौन-सा कथन Transhumance को Nomadic Pastoralism से अलग करता है?

Which distinguishes transhumance from nomadic pastoralism?

(A) Transhumance में seasonal movement एक अपेक्षाकृत निश्चित ऊर्ध्वाधर/क्षेत्रीय pattern का अनुसरण करता है।

(B) Transhumance में पशुपालन नहीं होता।

(C) Nomadic pastoralism में कभी movement नहीं होता।

(D) दोनों में कोई अंतर नहीं है।

Answer: (A)

24. आधुनिक काल में कुछ क्षेत्रों में चलवासी पशुपालन के स्थान पर व्यापारिक पशुपालन आने का एक प्रमुख कारण क्या बताया गया है?

What is one reason for the replacement of nomadic pastoralism by commercial livestock farming in some regions?

(A) कृषि का पूर्ण अंत

(B) प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण अभाव

(C) पशुओं का विलुप्त होना

(D) उद्योगों एवं आधुनिक सुविधाओं का विकास 

Answer: (D)

25. व्यापारिक पशुपालन की कौन-सी विशेषता उसे चलवासी पशुपालन से अलग करती है?

Which feature distinguishes commercial livestock farming from nomadic pastoralism?

(A) पशुपालक एक स्थान पर रहकर वैज्ञानिक एवं व्यापारिक तरीके अपनाते हैं।

(B) वे लगातार नए चरागाह खोजते हैं।

(C) वे केवल प्राकृतिक घास पर निर्भर रहते हैं।

(D) वे बाजार से पूर्णतः कटे रहते हैं।

Answer: (A)

26. व्यापारिक पशुपालन में चारे की फसलों की खेती का क्या महत्व है?

What is the significance of fodder cultivation in commercial livestock farming?

(A) पशुओं के लिए नियंत्रित एवं पौष्टिक चारा उपलब्ध कराना

(B) पशुपालकों को प्रवास के लिए बाध्य करना

(C) प्राकृतिक चरागाह समाप्त करना ही इसका उद्देश्य है।

(D) केवल निर्यात फसल पैदा करना

Answer: (A)

27. निम्न में से कौन-सा व्यापारिक पशुपालन का प्रमुख क्षेत्र source में उल्लिखित है?

Which is a major region of commercial livestock farming mentioned in the source?

(A) उत्तरी अमेरिका का प्रेयरी क्षेत्र

(B) सहारा का केंद्रीय मरुस्थल ही

(C) हिमालय का प्रत्येक भाग

(D) अमेजन का प्रत्येक भाग

Answer: (A)

28. व्यापारिक पशुपालन में नस्ल सुधार एवं रोग नियंत्रण का महत्व किस बात को दर्शाता है?

What does emphasis on breeding and disease control indicate in commercial livestock farming?

(A) इसका वैज्ञानिक एवं बाजारोन्मुख स्वरूप

(B) इसका पूर्णतः निर्वाह स्वरूप

(C) इसका पर्यावरण से पूर्ण विच्छेद

(D) इसका केवल खानाबदोश स्वरूप

Answer: (A)

29. लकड़ी काटने का व्यापारिक विकास विशेष रूप से किस प्रकार के वन प्रदेश में हुआ?

Commercial logging developed particularly in which forest region?

(A) मरुस्थलीय प्रदेश

(B) शंकुधारी वन प्रदेश

(C) टुण्ड्रा का बर्फीला क्षेत्र

(D) घासभूमि

Answer: (B)

30. निम्न में से कौन-सा लकड़ी काटने वाले प्रमुख देशों का समूह है?

Which group represents major commercial logging countries mentioned in the source?

(A) अर्जेंटीना, ब्राजील, वेनेजुएला, उरुग्वे

(B) मिस्र, सऊदी अरब, लीबिया, चाड

(C) भारत, श्रीलंका, मलेशिया, इंडोनेशिया

(D) स्वीडन, फिनलैंड, रूस, कनाडा 

Answer: (D)

31. लकड़ी से लुग्दी एवं कागज बनाने वाले उद्योगों का वनों से संबंध किस प्रकार का है?

What is the relationship between pulp and paper industries and forests?

(A) वन कच्चा माल प्रदान करते हैं।

(B) वन केवल बाजार प्रदान करते हैं।

(C) वन केवल श्रमिक प्रदान करते हैं।

(D) वन का कोई संबंध नहीं है।

Answer: (A)

32. मध्य अक्षांशीय तटीय प्रदेशों में व्यापारिक मत्स्य ग्रहण के विकास में कौन-सा कारक महत्वपूर्ण है?

Which factor is important for commercial fishing in middle-latitude coastal regions?

(A) शक्तिचालित नावों एवं जलपोतों का उपयोग

(B) केवल पारंपरिक भाले

(C) केवल ऊँट परिवहन

(D) केवल वर्षा जल

Answer: (A)

33. बड़े मत्स्य जहाजों में मछलियों को संसाधित एवं पैक करने की सुविधा किस प्रवृत्ति को दर्शाती है?

Processing and packing fish aboard large fishing vessels indicates:

(A) मत्स्य व्यवसाय का औद्योगिक एवं व्यापारिक स्वरूप

(B) केवल निर्वाह मत्स्य ग्रहण

(C) पशुपालन

(D) स्थानान्तरी कृषि

Answer: (A)

34. खनन को प्राथमिक व्यवसाय क्यों माना जाता है?

Why is mining classified as a primary occupation?

(A) इसमें पृथ्वी से प्राकृतिक खनिज संसाधनों का प्रत्यक्ष निष्कर्षण होता है।

(B) इसमें केवल manufactured goods बेचे जाते हैं।

(C) इसमें केवल financial services होती हैं।

(D) इसमें केवल research किया जाता है।

Answer: (A)

35. निम्न में से कौन-सा खनन के व्यापारिक दोहन को प्रभावित करने वाला कारक नहीं है?

Which is NOT a factor affecting commercial exploitation of minerals?

(A) अयस्क की मांग

(B) अयस्क की गुणवत्ता

(C) खान की गहराई एवं सुगम्यता

(D) केवल देश की भाषा

Answer: (D)

36. खनिजों के वितरण के संबंध में कौन-सा कथन सही है?

Which statement is correct regarding mineral distribution?

(A) खनिजों का वितरण असमान है और अधिकांश खनिज non-renewable हैं।

(B) सभी देश खनिजों में आत्मनिर्भर हैं।

(C) सभी खनिज renewable हैं।

(D) खनिज पूरे विश्व में समान रूप से वितरित हैं।

Answer: (A)

37. खनन प्रारम्भ होने के बाद किसी क्षेत्र में परिवहन सुविधाओं के विकास और बस्ती विस्तार का क्या संबंध हो सकता है?

What may be the relationship between mining and transport/settlement development?

(A) खनन के कारण परिवहन सुविधाएँ विकसित हो सकती हैं और लोगों का आगमन बढ़ सकता है।

(B) खनन हमेशा बस्तियों को समाप्त करता है।

(C) खनन का परिवहन से कोई संबंध नहीं है।

(D) खनन केवल समुद्र में होता है।

Answer: (A)

38. पेट्रोलियम शोधनशालाओं के संदर्भ में source में कौन-सा तर्क दिया गया है?

What reasoning is given in the source regarding petroleum refineries?

(A) अशुद्ध पेट्रोलियम का परिवहन कई petroleum products की तुलना में सस्ता हो सकता है।

(B) पेट्रोलियम का परिवहन असंभव है।

(C) सभी refineries केवल खानों के ऊपर स्थापित होती हैं।

(D) पेट्रोलियम का कोई परिवहन नहीं होता।

Answer: (A)

39. कृषि के विकास के संदर्भ में सबसे प्राचीन रूप किसे बताया गया है?

Which is described as the oldest form of agriculture?

(A) स्थानान्तरी कृषि

(B) रोपण कृषि

(C) मिश्रित कृषि

(D) ट्रक फार्मिंग

Answer: (A)

40. स्थानान्तरी कृषि की मूल प्रक्रिया में क्या शामिल है?

What is involved in the basic process of shifting cultivation?

(A) वनस्पति को काटना-जला कर भूमि साफ करना और कुछ वर्षों बाद दूसरी भूमि पर जाना

(B) स्थायी खेतों में लगातार एक ही भूमि पर खेती करना

(C) केवल greenhouse cultivation

(D) केवल commercial dairy farming

Answer: (A)

41. स्थानान्तरी कृषि में भूमि को कुछ वर्षों के बाद छोड़ने का प्रमुख कारण क्या है?

Why is land left fallow after a few years in shifting cultivation?

(A) समुद्री जल का बढ़ना

(B) भूमि की उर्वरता/उत्पादकता में कमी और नए क्षेत्र की आवश्यकता

(C) उद्योगों की अधिकता

(D) बाजार का पूर्ण अभाव

Answer: (B)

42. निम्न में से कौन-सा स्थानान्तरी कृषि का प्रमुख क्षेत्र source में बताया गया है?

Which is a major area of shifting cultivation mentioned in the source?

(A) उष्ण कटिबंधीय वन

(B) शीतोष्ण घासभूमि ही

(C) मरुस्थलीय क्षेत्र ही

(D) ध्रुवीय हिम क्षेत्र

Answer: (A)

43. स्थायी कृषि के विकास का एक प्रमुख सामाजिक-भौगोलिक परिणाम क्या था?

What was a major socio-geographical consequence of permanent agriculture?

(A) अतिरिक्त खाद्यान्न समाप्त हो गया।

(B) मानव पूरी तरह खानाबदोश बन गया।

(C) परिवहन समाप्त हो गया।

(D) स्थायी बस्तियों को प्रोत्साहन मिला।

Answer: (D)

44. व्यापारिक कृषि की प्रमुख विशेषता क्या है?

What is a major characteristic of commercial agriculture?

(A) बाजार/निर्यात के लिए विशेष फसलों का बड़े पैमाने पर उत्पादन

(B) केवल स्थानीय निर्वाह के लिए उत्पादन

(C) केवल जंगली पौधों का संग्रहण

(D) केवल पशुपालन

Answer: (A)

45. रोपण कृषि को कृषि का विशिष्टीकृत रूप क्यों कहा जाता है?

Why is plantation agriculture considered a specialized form of agriculture?

(A) केवल वन्य उत्पादों का संग्रहण

(B) केवल छोटे घरेलू खेतों में खाद्यान्न उत्पादन

(C) केवल पशुपालन

(D) बड़े क्षेत्र में चाय, कॉफी, रबर आदि विशेष फसलों का मुख्यतः व्यापारिक/निर्यात उद्देश्य से उत्पादन

Answer: (D)

46. निम्न में से कौन-सा रोपण कृषि का सही समूह है?

Which is the correct group of plantation crops?

(A) चाय, कॉफी, रबर

(B) गेहूँ, जौ, बाजरा

(C) चना, मसूर, मटर

(D) केवल घास और चारा

Answer: (A)

47. मिश्रित कृषि की सबसे उपयुक्त पहचान क्या है?

What best identifies mixed farming?

(A) फसल उत्पादन और पशुपालन का एक साथ होना

(B) केवल फल उत्पादन

(C) केवल पशुपालन

(D) केवल वन संग्रहण

Answer: (A)

48. ट्रक फार्मिंग मुख्यतः किससे संबंधित है?

Truck farming is mainly associated with:

(A) मरुस्थल में ऊँट पालन

(B) नगरीय क्षेत्रों के समीप साग-सब्जियों की कृषि

(C) पर्वतीय क्षेत्रों में याक पालन

(D) समुद्र में मत्स्य ग्रहण

Answer: (B)

49. उद्यान कृषि का प्रमुख स्थानिक संबंध किससे है?

What is the major locational association of horticulture mentioned in the source?

(A) केवल ध्रुवीय क्षेत्रों में कृषि

(B) केवल खनिज क्षेत्रों में कृषि

(C) नगरीय उपभोग केन्द्रों के समीप फल एवं फूलों की कृषि

(D) केवल समुद्र के भीतर कृषि

Answer: (C)

50. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक आर्थिक गतिविधियों के बदलते स्वरूप को सबसे अच्छी तरह दर्शाता है?

Which best represents the changing nature of primary economic activities?

(A) प्रकृति से पूर्ण स्वतंत्रता

(B) निर्वाह से व्यापारिक एवं वैज्ञानिक उत्पादन की ओर बढ़ता विशिष्टीकरण

(C) प्राथमिक गतिविधियों का पूर्ण अंत

(D) केवल शिकार पर स्थायी निर्भरता

Answer: (B)

20. Meaning and Scope of Economic Geography (आर्थिक भूगोल का अर्थ एवं विषय-क्षेत्र)

Meaning and Scope of Economic Geography

(आर्थिक भूगोल का अर्थ एवं विषय-क्षेत्र)



प्रश्न प्रारूप

Q. आर्थिक भूगोल को परिभाषित करते हुए इसके विषय-क्षेत्र एवं नूतन प्रवृतियों की विवेचना कीजिए।

Meaning and Scope of Economic

उत्तर- पृथ्वी मानव का घर है और मानव व पृथ्वी तल दोनों ही तथ्य अस्थिर एवं परिवर्तनशील हैं। पृथ्वी की भौतिक परिस्थितियों और मानव के कार्य-कलापों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा के जन्मदाता गोट्ज (1882) थे। इसके अध्ययन में हम मानव की आर्थिक क्रियाओं का ही अध्ययन करते हैं। मानव की आकांक्षाएं एवं आवश्यकताएं अत्यधिक असीमित और विविध हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव अनेक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा जिन वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर सकता उनका क्रय करता है तथा अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं से उनका विनिमय करता है।

       प्रो. मेकफरलेन के अनुसार आर्थिक भूगोल के अध्ययन में हम मानव के आर्थिक प्रयत्नों पर भौगोलिक तथा भौतिक पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।

      प्रो. जी. चिशौल्म के अनुसार आर्थिक भूगोल में हम उन भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं जो वस्तुओं के उत्पादन, परिवहन तथा विनिमय को प्रभावित करती हैं।   

        इस अध्ययन के माध्यम से किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र के भावी आर्थिक और व्यापारिक क्रियाओं पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों के अध्ययन का सम्मिलित प्रभाव भी जाना जाता है।

      सुप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हंटिंगटन जीविकोपार्जन प्रदान करने वाले सभी प्रकार के पदार्थों, साधनों, क्रियाओं, रीति-रिवाजों तथा मानव शक्तियों का अध्ययन आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मानते हैं।

       प्रो. शॉ के अनुसार मानव की आर्थिक क्रियाएं विश्व के उद्योगो, संसाधनों तथा औद्योगिक उत्पादन के अनुरूप होती हैं।

       इसी प्रकार डॉ. एन. जी. जे. पाउण्ड्स के अनुसार आर्थिक भूगोल भू-पृष्ठ पर मानव की उत्पादन क्रियाओं के वितरण का अध्ययन है।

      प्रो. रैयन तथा बैगस्टन के शब्दों में आर्थिक भूगोल के अध्ययन में विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में मिलने वाले आधारभूत संसाधन एवं स्रोतों का अध्ययन किया जाता है। इन स्रोतों के शोषण पर पड़ने वाली भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव की विवेचना की जाती है। विभिन्न प्रदेशों के आर्थिक विकास के अन्तर की व्याख्या की जाती है।

       भूगोल की अन्य शाखाओं की भांति आर्थिक भूगोल की विषय-वस्तु एवं विषय-क्षेत्र पर भूगोलवेत्ताओं के विचारों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कुछ विद्वान मानव के भौतिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के अध्ययन को अधिक महत्व देते हैं, तो कुछ मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा जीविकोपार्जन के अनेकानेक साधनों के अध्ययन को मुख्य मानते हैं। संक्षेप में विश्व के विभिन्न भागों में मिलने वाले खनिज, कृषि, औद्योगिक साधनों का उत्पादन, उपभोग, वितरण, परिवहन तथा व्यापारिक अध्ययन आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

         वर्तमान में मानव ने विज्ञान और तकनीक की सहायता से आशानुरूप विकास कर लिया है। मानव ने अपने आर्थिक क्षेत्र का विस्तार, समुद्र, भू-गर्भ और अन्तरिक्ष तक कर लिया है। व्यावहारिक जगत में आर्थिक भूगोल के अध्ययन का अत्यधिक महत्व है; इसके अध्ययन के माध्यम से कृषक, श्रमिक, व्यापारी, उद्योगपति तथा राजनीतिज्ञ सव ही लाभान्वित होते हैं।

         विभिन्न देशों को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने तथा विकास की भावी योजनाओं के निर्माण में आर्थिक भूगोल के अध्ययन को आधार बनाना पड़ता है। किसी प्रदेश के आर्थिक साधनों का उच्चतम सीमा तक विकास कर वहां की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए जीविकोपार्जन के साधन सुलभ किए जा सकते हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सन्तुलित तथा मानव शक्ति को उत्पादन क्रिया से सम्बद्ध करने में आर्थिक भूगोल का योगदान बड़ा महत्वपूर्ण होता है।

        मानव की आधुनिक अनुसन्धान एवं अन्वेषण की प्रवृत्ति ने मानव के आर्थिक क्रिया-कलापों को और अधिक विस्तृत बना दिया है।

        इस विषय की मुख्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) आर्थिक भू-दृश्य:-

     इसमें किसी प्रदेश के आर्थिक व्यक्तित्व को अभिव्यक्त किया जाता है। मानव द्वारा प्राकृतिक साधनों के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया जाता है।

(2) गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य:-

     इस संकल्पना में सदैव परिवर्तन एवं विकास के तत्व को महत्व दिया गया है। जहां आर्थिक भू-दृश्य भूतकाल के आर्थिक कार्यों का परिणाम है, वहां गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य पुरोगामी और भावी विकास की सम्भावनाओं को व्यक्त करता है।

(3) वर्तमान आर्थिक भू-दृश्य:-

     ये संसाधन, संरचना, आर्थिक विकास एवं आर्थिक प्रक्रिया द्वारा उपलब्धि के परिचायक हैं। वहां की आर्थिक स्थिति को विकासावस्था स्तर भी प्रकट करते हैं। युवावस्था में संसाधनों के शोषण के अवसर उपलब्ध रहते हैं; चरमोत्कर्ष की परिपक्व अवस्था में संसाधनो के उच्चतम उपभोग एवं वृद्धावस्था में विकास की अवरुद्ध एवं धीमी प्रगति के आसार दृष्टिगोचर होते रहते हैं।

(4) आर्थिक क्रिया-कलापों की स्थिति में सिद्धान्तों और नियमों के आधार पर स्थिति-स्थापना तथा वितरण की व्याख्या की जाती है। इसमे विषय-वस्तु उपागम तथा प्रादेशिक उपागम को आधार बना कर अध्ययन किया जाता है।

(5) क्षेत्रीय आर्थिक भिन्नता के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं जैविक भिन्नता के अन्तर के परिणामस्वरूप उपलब्धि के स्तर में भी भिन्नता मिलती है।

(6) क्षेत्रीय क्रियात्मक अन्योन्यक्रिया में विभिन्न प्रदेशो में विचित्र-सा पारस्परिक क्रियात्मक अन्तर सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है। यह सम्बन्ध लम्बवत् और क्षैतिज दोनों प्रकार का होता है।

(7) भू-दृश्यों का क्षेत्रीय कार्यात्मक सगठन संकेन्द्रीय और समान दोनों प्रकार का होता है। इसमें पारस्परिक सम्बन्ध कहीं स्पष्ट तो कहीं अस्पष्ट होता है। अस्पष्ट सम्बन्धों को परिवहन और संचारवाहन से सम्बद्ध किया जाता है।

(8) क्षेत्रीय आर्थिक विकास संकल्पना में विकास की तुलना, अन्य प्रदेशों से सांस्कृतिक तथा तकनीकी प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर की जाती है। प्रगति के लिए क्षेत्र विशेष के आर्थिक संसाधनों के विकास पर अधिकाधिक बल दिया जाता है।

आर्थिक भूगोल के अध्ययन उपागम एवं विधियाँ

(APPROACHES AND METHODS OF ECONOMIC GEOGRAPHY)

     आर्थिक भूगोल के सन्तुलित अध्ययन के लिए कई उपागमों व अध्ययन विधियों का प्रयोग किया जाता है, जो कि एक-दूसरे की पूरक हैं। निम्नांकित चार उपागम अध्ययन दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

(1) वस्तुगत उपागम (Commodity Approach):-

     इस उपागम के अन्तर्गत विभिन्न वस्तुओं, जैसे- गेहूं, चावल, गन्ना, लोहा, पेट्रोलियम आदि के उत्पादन एवं वितरण का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। किन्तु कुछ विद्वान इस उपागम में वस्तुओं के उत्पादन एवं वितरण का विश्लेषण न करके व्यवसाय का वितरण और विश्लेषण करते हैं। जैसे- कृषि व्यवसाय, वस्तु संग्रह एवं आखेट व्यवसाय, खनन व्यवसाय, उद्योग आदि। इस कारण इस उपागम को ‘व्यवसाय उपागम’ (Occupational Approach) भी कहा जाता है।

(2) प्रादेशिक उपागम (Regional Approach):-

      इस उपागम के अन्तर्गत सर्वप्रथम विश्व को कुछ बृहत् प्राकृतिक प्रदेशों में विभक्त कर लिया जाता है और प्रत्येक प्रदेश के प्राकृतिक वातावरण तथा विभिन्न वस्तुओं के वितरण प्रतिरूप का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है।

(3) सैद्धान्तिक उपागम (Theoretical Approach):-

      इस उपागम के अन्तर्गत किसी भी वस्तु या प्रदेश की विशेषताओं एवं वितरण प्रतिरूप का अध्ययन पूर्व निर्धारित सिद्धान्तों के सन्दर्भ में किया जाता है। इस अध्ययन विधि से मुख्यतः सिद्धांतों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण माना जाता है, न कि वितरण प्रतिरूप का विश्लेषण करना।

(4) क्रमबद्ध उपागम (Systematic Approach):-

     इस उपागम के अन्तर्गत वस्तुओं के वितरण की सामान्य विशेषताओं का क्रमबद्ध विश्लेषण किया जाता है। यह क्रमबद्ध अध्ययन तीन चरणों में सम्पन्न किया जाता है:-

(1) प्रथम चरण में किसी भी वस्तु की स्थिति तथा वितरण के प्रतिरूप का अध्ययन किया जाता है।

(ii) द्वितीय चरण में उस वस्तु विशेष की विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।

(iii) तृतीय चण में उस वस्तु का अन्य प्राकृतिक एवं मानवीय तत्वों से सम्बन्ध का विश्लेषण किया जाता है। ये अन्तर्सम्बन्ध ‘कार्यकरण सम्बन्ध’ (Cause and Effect Relationship), ‘क्रियात्मक सम्बन्ध’ (Functional Relationship) तथा ‘क्षेत्रीय सम्बन्ध’ (Areal Relationship) के रूप व्यक्त किए जाते हैं।

18. The Industrial regions of the world (विश्व के औद्योगिक प्रदेश)

18. The Industrial regions of the world

(विश्व के औद्योगिक प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप

Q. What are the industrial regions of the world? Discuss the characteristics of each region.

(विश्व के औद्योगिक प्रदेश कौन-कौन हैं? प्रत्येक की विशेषताओं का वर्णन करें।)

उतर- औद्योगिक प्रदेश एक महत्त्वपूर्ण प्रदेश होता है। उसका समूचा स्वरूप ही उद्योगों पर निर्भर होता है। इस प्रकार औद्योगिक प्रदेश वह है जहाँ अधिकतर लोगों की जीविका का साधन उद्योग है। उस प्रदेश में मानव का मुख्य क्रियाकलाप उद्योगों से सम्बंधित होता है। ऐसे प्रदेश में औद्योगिक इकाइयों में सम्बद्धता होती है। वह सम्पूर्ण प्रदेश उद्योगों से परिपूर्ण होता है। इन गुणों के विद्यमान रहने पर हम उसे औद्योगिक प्रदेश कह सकते हैं। इसी संदर्भ में किसी अर्थशास्त्री ने उद्योग के लिए 9 ‘M’ को महत्त्वपूर्ण माना है जो इस प्रकार है-
1. Money (मुद्रा)

2. Material (माल/सामग्री)

3. Man (मानव)

4. Market (बाजार)

5. Machinery (मशीनें)

6. Motive (शक्ति)

7. Management) (प्रबंधन)

8. Means of transport (यातायात के साधन)

9. Momentum of early start (पहले कारखाना खोलने से विकास की गति)।

      विश्व को उनकी औद्योगिक सम्बद्धता के आधार पर निम्नलिखित औद्योगिक प्रदेशों में बाँट सकते हैं-

(1) संयुक्त राज्य अमेरिका का औद्योगिक प्रदेश

(2) कनाडा औद्योगिक प्रदेश

(3) ग्रेट ब्रिटेन का औद्योगिक प्रदेश

(4) जर्मनी औद्योगिक प्रदेश

(5) सोवियत रूस औद्योगिक प्रदेश

(6) जापान का औद्योगिक प्रदेश

(7) चीन का औद्योगिक प्रदेश

(8) भारत का औद्योगिक प्रदेश

(9) आस्ट्रेलिया का औद्योगिक प्रदेश

(10) दक्षिणी अफ्रिकी गणराज्य।

(1) संयुक्त राज्य अमेरिका:-

     U.S.A. विश्व का सबसे विकसित औद्योगिक देश है। यहाँ अनेक वस्तुओं का उत्पादन होता है। अलग-अलग प्रदेशों में विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनती हैं। अतः यहाँ कई क्षेत्रों में औद्योगिक विकास हुआ है, जो इस प्रकार हैं-

(i) दक्षिणी न्यू इंग्लैंड प्रदेश

(ii) मध्य-अटलांटिक तटीय प्रदेश

(iii) पिट्सबर्ग-लेक एरी प्रदेश

(iv) डेट्रॉइट औद्योगिक प्रदेश

(v) महान झील औद्योगिक प्रदेश

(vi) दक्षिणी अप्लेशियन प्रदेश

(vii) पूर्वी टेक्सास प्रदेश

(viii) प्रशांत तटीय प्रदेश

(ix) राकी पर्वतीय प्रदेश

(x) मध्य न्यूयार्क क्षेत्र।

    लोहा-इस्पात उद्योग सबसे अधिक यहीं केन्द्रित है। दक्षिण-पूर्वी U.S.A में देश का 85% लोहा-इस्पात के कारखाने स्थित हैं। इसके कारण अन्य उद्योग भी यहाँ स्थापित हैं।

(2) कनाडा औद्योगिक प्रदेश:-

     उत्तरी अमेरिका में U.S.A. के बाद दूसरा सबसे विकसित औद्योगिक देश कनाडा है। यहाँ कच्चे माल की सुविधा तथा यातायात की सुगमता के कारण उद्योगों का विकास हुआ है। यहाँ के औद्योगिक प्रदेश इस प्रकार है-

(i) ओण्टोरियो औद्योगिक प्रदेश

(ii) क्यूवेक,

(iii) समुद्री प्रान्तों का प्रदेश

(iv) ब्रिटिश कोलम्बिया,

(v) प्रेयरी प्रदेश का औद्योगिक प्रदेश।

    कनाडा में भी अलग-अलग प्रदेशों में औद्योगिक पट्टियों का विकास हुआ है। ओण्टोरियो प्रदेश में भारी उद्योगों के संयंत्र स्थापित हैं। समुद्री भाग में मत्स्य उद्योग औद्योगिक प्रदेश है।

(3) ग्रेट ब्रिटेन का औद्योगिक प्रदेश:-

     ग्रेट ब्रिटेन से ही विश्व में औद्योगिक क्रान्ति शुरू हुई। कुछ ही समय में वह एक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक राष्ट्र बन गया। यहाँ के प्रमुख औद्योगिक प्रदेश इस प्रकार हैं-

(i) नार्थम्बरलैंड डरहम क्षेत्र

(ii) यार्क-डर्बी- नार्टिघमशायर प्रदेश

(iii) मिडलैंड औद्योगिक प्रदेश

(iv) साउथ वेल्स

(v) लंकाशायर

(vi) स्काटलैंड मध्यघाटी औद्योगिक प्रदेश।

       इस समय ग्रेट ब्रिटेन विभिन्न प्रकार के उद्योगों में पीछे हो गया है।

(4) जर्मनी के औद्योगिक प्रदेश:-

     जर्मनी विश्व के बड़े औद्योगिक देशों में से एक है। यहाँ भारी उद्योगों की स्थापना हुई है। यहाँ के औद्योगिक प्रदेश इस प्रकार हैं-

(i) बेस्टपफैलिया औद्योगिक प्रदेश

(ii) बवेरिया क्षेत्र

(iii) सार बेसिन क्षेत्र

(iv) सेक्सोनी क्षेत्र।

(5) सोवियत रूस के औद्योगिक प्रदेश:-

      यहाँ के बड़े भाग में उद्योगों का विकास हुआ है। इसके औद्योगिक प्रदेश निम्नलिखित हैं-

(i) यूक्रेन क्षेत्र

(ii) केन्द्रीय प्रदेश

(iii) यूराल प्रदेश

(iv) लेनिनग्राड

(v) मध्य वोल्गा

(vi) कृजवास प्रदेश

(vii) ट्रांस काकेशिया

(viii) एशियाई क्षेत्र

(ix) वैकाल झील क्षेत्र

(x) सुदूर पूर्वी क्षेत्र

(xi) क्रोशिया प्रदेश।

(6) जापान का औद्योगिक प्रदेश:-

        यहाँ के औद्योगिक प्रदेश निम्नलिखित हैं-

(i) टोकियो-योकोहामा क्षेत्र

(ii) नागोया क्षेत्र

(iii) कोवे ओसाका क्षेत्र

(iv) नागासाकी क्षेत्र

(v) कमैसी प्रदेश

(vi) द० होकैडो क्षेत्र।

(7) चीन का औद्योगिक प्रदेश-

      यहाँ के औद्योगिक प्रदेश निम्नलिखित हैं-

(i) उत्तरी-पूर्वी चीन क्षेत्र

(ii) पेकिंग प्रदेश

(iii) शंघाई-वुहान क्षेत्र

(iv) कैण्टन।

(8) भारत के औद्योगिक प्रदेश:-

      भारत के औद्योगिक प्रदेश निम्नलिखित हैं-

(i) हुगलीघाटी औद्योगिक प्रदेश

(ii) दामोदर घाटी एवं स्वर्णरेखा घाटी औद्योगिक प्रदेश

(iii) मुम्बई-अहमदाबाद क्षेत्र

(iv) दक्षिण-भारत के औद्योगिक प्रदेश

(v) गंगा-यमुना की घाटी का औद्योगिक प्रदेश।

(9) आस्ट्रेलिया का औद्योगिक प्रदेश:-

      आस्ट्रेलिया में उद्योग का विकास हो हा है। यहाँ के औद्योगिक प्रदेश ये हैं-

(i) न्यूसाउथ वेल्स का औद्योगिक प्रदेश

(ii) न्यूजीलैंड का औद्योगिक प्रदेश।

(10) दक्षिण अफ्रिका के औद्योगिक प्रदेश:-

        दक्षिण अफ्रिका गणराज्य में कच्चे माल की प्राप्ति के काण उद्योगों का विकास हुआ है।

17. The Commercial Grain Farming in the world (विश्व में व्यापारिक अन्न कृषि)

17. The Commercial Grain Farming in the world

(विश्व में व्यापारिक अन्न कृषि)



प्रश्न प्रारूप

Q. Discuss the Commercial Grain Farming in the world.

(विश्व में व्यापारिक अन्न कृषि का वर्णन करें।)

उत्तर- जिस कृषि की उपजों को स्थानीय उपभोग के लिए नहीं बल्कि बाजारों में व्यापार के लिए प्रयोग किया जाता है, उसे व्यापारिक कृषि कहते हैं। इस प्रकार की कृषि से मुद्रा की प्राप्ति होती है। अतः इसे मुद्रादायिनी फसल भी कहते हैं। बाजारों में बेचकर इससे तुरन्त धन कमाया जाता है, इसी से इसे (Cash crop) या नकदी फसल भी कहा जाता है। इस प्रकार की फसल विश्व के अनेक क्षेत्र में उपजाई जाती है।

      वास्तव में इस प्रकार की कृषि अधिक आबादी के देशों में स्थानीय उपभोग के लिए की जाती है। दक्षिणी पूर्वी एशिया के देशों में व्यापारिक खाद्यान्न कृषि व्यापार के लिए नहीं बल्कि स्थानीय उपभोग के लिए की जाती है। अतः इस क्षेत्र में गेहूँ जीवन निर्वाहण कृषि है। परन्तु U.S.A., कनाडा आदि देशों में गेहूँ का उत्पादन व्यापार के लिए होता है, अतः यहाँ यह व्यापारिक कृषि के अन्तर्गत आता है।

विस्तीर्ण व्यापारिक खाद्यान्न कृषि की विशेषताएँ:

     इस प्रकार कृषि की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं:

1. आधुनिक युग की कृषि:-

    व्यापारिक खाद्यान्न कृषि वास्तव में आधुनिक युग की देन है। यह मध्य आक्षांशों के आर्द्र एवं शुष्क प्रदेशों के बीच में की जाती है। ये क्षेत्र अत्यन्त ही विरल जनसंख्या वाले हैं। इनके अधिकांश जनसंख्या यूरोपीय किस्म की है।

2. एक ही फसल के उत्पादन पर बल:-

    प्रत्येक देश में या उसके उप प्रदेश में, केवल एक ही मुख्य फसल के उत्पादन पर बल दिया जाता है। वह फसल बाजार में बिक्री के लिए उत्पन्न की जाती है। जैसे- गेहूँ। इन प्रदेशों की सर्वप्रमुख फसल गेहूँ ही है। संयुक्त राज्य अमेरिका में एक पेटी में मक्का भी बोई जाती है। गेहूँ के अलावा जौ, जई और राई का थोड़ा-थोड़ा उत्पादन देशी या स्थानीय माँग पूर्ति के लिए किया जाता है। लगभग 70% से 80% कृषि भूमि पर गेहूँ का उत्पादन होता है।

3. मानव एवं पशुओं का कम प्रयोग:-

     मानव एवं कृषि पशुओं का प्रयोग कृषि में कम होता है। अधिकतम कार्य मशीनों से होता है।

4. बड़े-बड़े कृषि फार्म:-

     कृषि फार्म बड़े-बड़े होते हैं। U.S.A. एवं अर्जेन्टाइना में 300 एकड़ से 1000 एकड़ तक कृषि फार्म होते हैं। कृषि फार्म पर ही कृषक का निवास तथा मशीनों के रखने आदि की जगह होती है।

5. फसलों में विशेषीकरण:-

     यह केबल एक फसल का विशेषीकरण होता है। इस कृषि की मुख्य फसल गेहूँ है। बड़े पैमाने पर गेहूँ का उत्पादन होता है तथा विश्व के गेहूँ का कुल निर्यात इन्हीं देशों से होता है।

6. कृषि कार्य वैज्ञानिक ढंग से:-

     कृषि का प्रत्येक कार्य वैज्ञानिक ढंग से किया जाता है। उर्वरकों का पूर्ण प्रयोग होता है।

7. मैदानी भागों में कृषि:-

      यह कृषि विशाल समतल मैदानी प्रदेशों में की जाती है।

उत्पादन-

     FAO Production year book, 2011 के अनुसार विश्व में गेहूँ का कुल उत्पादन 5190 लाख मेट्रिक टन हुआ। नीचे के तालिका में कुछ प्रमुख देशों का उत्पादन इस प्रकार रहा-

विश्व में गेहूँ का उत्पादन, 2011

देश कुल उत्पादन लाख मेट्रिक टन में विश्व के कुल उत्पादन का %
चीन 951 18.32
U.S.S.R. 835 16.9
भारत 565 10.88
U.S.A. 605 11.66
फ्रांस 401 7.23
कनाडा 364 7.01
टर्की 275 5.30
पाकिस्तान 205 3.95
ब्रिटेन 195 3.76
जर्मनी 154 2.97
ऑस्ट्रेलिया 115 2.21
अन्य देश 525 10.11
कुल विश्व 5190 100%

विश्व वितरण-

    इस प्रकार की कृषि मध्य अक्षांशों में स्थित समशीतोष्ण कटिबंधीय घास के मैदानों में की जाती है। इसके क्षेत्र निम्नलिखित हैं-

1. सोवियत संघ में स्टेपी घास के मैदान:-

     गेहूँ के उत्पादन में U.S.S.R. का स्थान दूसरा है। यह विश्व का 14.5% गेहूँ उत्पन्न करता है। यहाँ गेहूँ के दो क्षेत्र हैं-

(i) शीतकालीन पट्टी- उत्तरी यूक्रेन प्रदेश में

(ii) बसन्त कालीन गेहूँ पट्टी- कैस्पियन सागर एवं कालासागर के आस-पास। यहाँ उपजाऊ मिट्टी, गर्मी में वर्षा तथा मशीनों का पूर्ण प्रयोग से यहाँ कृषि की जाती है।

2. उत्तरी अमेरिका में तथा कनाडा के प्रेयरी मैदान:-

    यहाँ विश्व का लगभग 10% गेहूँ उत्पादन होता है। यहाँ बड़े पैमाने पर मशीनों द्वारा गेहूँ की व्यापारिक कृषि होती है। यहाँ गेहूँ के 4 प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं।

(i) बसन्तकालीन गेहूँ क्षेत्र- प्रेयरीज के उत्तरी भाग में डेकोटा, मोण्टाना और मिन्नेसोटा में।

(ii) शीतकालीन गेहूँ क्षेत्र- कन्सास ओकलाहोमा, नेबास्का, टेस्सास।

(iii) कोलम्बिया पठार गेहूँ क्षेत्र

(iv) कैलिफोर्निया गेहूँ क्षेत्र

3. दक्षिणी अमेरिका अर्जेटिना का पम्पा प्रदेश:-

    इस प्रदेश में यूरुग्वे एवं पराग्वे नदी के डेल्टा प्रदेश में पम्पा नामक घास का विस्तृत मैदान है। इसमें गेहूँ की विस्तृत खेती की है। यहाँ से गेहूँ विदेशों को निर्यात होता है।

4. दक्षिणी पूर्वी अफ्रीका में वेल्ड नामक घास के मैदान:-

     यह क्षेत्र दक्षिण अफ्रिका गणराज्य के द० पूर्वी भाग में स्थित है। यहाँ भी गेहूँ के उत्पादन के लिए लगभग सारी भौगोलिक परिस्थितियाँ उपलब्ध है। अतः यहाँ भी बड़े पैमाने प व्यापा के लिए गेहूँ की खेती की जाती है।

5. आस्ट्रेलिया में डार्लिंग डाउन्स का मैदान:-

       आस्ट्रेलिया के डाउन्स क्षेत्र में गेहूँ की काफी उपज होती है। यहाँ गेहूँ के उत्पादन के लिए समतल मैदानी भाग, उत्तम मिट्टी तथा वैज्ञानिक ढंग से कृषि की सुविधा प्राप्त है। यहाँ गेहूँ के दो क्षेत्र हैं:

(i) दक्षिणी पूर्वी भाग जो विक्टोरिया तथा न्यूसाउथ वेल्स में है,

(ii) भूमध्य सागरीय जलवायु के प्रदेश में, जो पश्चिमी आस्ट्रेलिया में स्थित है।

16. The Reserve, Production and Distribution of Petroleum in the world (विश्व में पेट्रोलियम के भंडार, उत्पादन एवं वितरण)

16. The Reserve, Production and Distribution of Petroleum in the world

(विश्व में पेट्रोलियम के भंडार, उत्पादन एवं वितरण)



प्रश्न प्रारूप

Q. Describe the reserve, production and distribution of Petroleum in the world.

(विश्व में पेट्रोलियम के भंडार, उत्पादन एवं वितरण का वर्णन करें।)

उत्तर- पेट्रोलियम एक महत्त्वपूर्ण शक्ति का साधन है। इसका स्थान शक्ति के साधनों में कोयला के बाद है। यह केवल शक्ति का साधन ही नहीं अपितु कई उद्योगों का कच्चा माल भी है। वर्तमान युग में इसका महत्त्व और भी बढ़ गया है। अतः इसकी कीमत हमेशा बढ़ रही है।

   अन्तर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार विश्व में पेट्रोलियम का कुल भण्डार 110 अरब मैट्रिक टन तेल की संचित राशि बताई गई है। इस राशि का तीन-चौथाई अर्थात् 76% भाग केवल एशिया महादेश में संचित है। इसमें दक्षिण-पश्चिम एशिया में विश्व के कुल भंडार का 66% भाग है। संयुक्त राज्य अमेरिका में 10%, लैटिन अमेरिका में 8%, अफ्रिका में 3%, पूर्वी एशिया में 4% तथा शेष 9% अन्य देशों में पाया जाता है। संसार के कुछ महत्त्वपूर्ण उत्पादक देश इस प्रकार हैं-

क्रम उत्पादक देश उत्पादन प्रतिशत
1. मध्य पूर्व 54.4 %
2. संयुक्त राज्य अमेरिका 15.5 %
3. पूर्वी यूरोपीय देश 14.6 %
4. लैटिन अमेरिका 14.5 %
5. अन्य देश 10.0 %
6. कुल विश्व 100.00 %

      Statistical year book-1991, संयुक्त राष्ट्र संघ, के अनुसार विश्व के प्रमुख देशों के उत्पादन तथा भंडार दिखाए गए हैं। इन देशों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस प्रकार यह तालिका स्पष्ट करता है कि किस देश में तेल का उत्पादन तथा भंडार क्या है-

देश संचित भंडार (करोड़ टन में) विश्व के कुल भंडार का % कुल उत्पान करोड़ टन में) विश्व में कुल उत्पादन का %
सोवियत रूस 3080 2.8 61.5 23.2
संयुक्त राज्य अमेरिका 397 3.6 46.2 16.2
सऊदी अरब 2280 20.4 36.4 12.3
मेक्सिको 690 6.3 15.6 5.4
चीन 275 2.5 13.1 4.7
ईरान 780 7.1 9.8 3.7
वेनेज्वेला 105 1.00 10.6 3.4
इराक 410 3.7 8.3 3.0
कुवैत 880 8.0 7.6 2.6
इंडोनेशिया 675 6.1 7.2 2.5
संयुक्त अरब अमिरात 440 4.0 6.8 2.4
लीबिया 3.8 2.8 5.2 2.0
अन्य देश शेष  शेष  शेष  शेष
कुल विश्व 11000 100% 290.00 100%

     उपरोक्त तालिका से यह स्पष्ट होता है कि सोवियत रूप विश्व में पेट्रोलियम के उत्पादन में सबसे आगे है। केवल उत्पादन में ही नहीं अपितु संचित राशि में भी अग्रगण्य है। ऊपर से महत्त्वपूर्ण पाँच देश विश्व के पेट्रोलियम के उत्पादन के 85% भाग सोवियत रूस, U.S.A. सउदी अरब, मेक्सिको, ईरान, इराक आदि देशों से होता है। इस प्रकार ये देश तेल के उत्पादन में सर्वोपरि हैं।

1. सोवियत संघ-

     सोवियत संघ विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। उत्पादन तथा संचित भंडार दोनों दृष्टिकोणों से इसका स्थान विश्व में प्रथम है। सोवियत रूस के तीन क्षेत्रों में इसका विशेष उत्पादन होता है, जो निम्नलिखित हैं-

(i) वोल्गा-यूराल क्षेत्र- सोवियत रूस के कुल उत्पादन का 75% यहीं से होता है। इसके प्रमुख केन्द्र पर्म, उफा, कुडसेव आदि प्रमुख हैं।

(ii) बाकू क्षेत्र- इस प्रदेश को काकेशश क्षेत्र भी कहते हैं। इसके मुख्य प्रदेश बाकू, माखघकला, प्रोजनी, माइकोप, रशुका, कोसाहागिल आदि है।

(iii) अन्य क्षेत्र- इस प्रदेश में कई छोटे-छोटे तेल क्षेत्र आते हैं। इनमें एम्बा, तुर्कमेनिस्तान, कुंभदाग, चेलेकिन, पेचोरा, फरगन, साईबेरिया, सखालिन आदि सम्मिलित हैं।

2. संयुक्त राज्य अमेरिका-

    यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। यहाँ 4 लाख से अधिक तेल के कुएँ हैं। यह विश्व का सबसे अधिक तेल की खपत करता है। यहाँ के प्रमुख तेल क्षेत्र निम्न हैं-

(i) अप्लेशियन क्षेत्र।

(ii) लीमा-इडियाना क्षेत्र।

(iii) मध्यवर्ती क्षेत्र।

(iv) खाड़ी क्षेत्र।

(v) कैलिफोर्निया क्षेत्र।

3. सऊदी अरब-

    यह देश संचित राशि की दृष्टि से दूसरा तथा उत्पादन की दृष्टि से विश्व का तीसरा बड़ा देश है। यहाँ का तेल भंडार विश्व का 20% तथा उत्पादन 12-3% है। यहाँ तेल का क्षेत्र 3 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है। यहाँ का प्रमुख तेल क्षेत्र धावर, अवकेक, ऐनदार, शेदगम, हरद, दम्मान, सफानियाँ कार्डिक, अबूसफा, फथीली आदि हैं। यहाँ से तेल रास तनुरा तेलशोधक कारखाने में भेजा जाता है। यहाँ से कच्चा तेल साफ होने के लिए भूमध्यसागर के तट पर हैको को भी भेजा जाता है। यह विश्व का बड़ा तेल उत्पादक देश बन सकता है।

4. ईरान-

    ईरान में कुल तेल का भंडार 65 अरब टन है। यह पूरे विश्व के भंडार का 7.8 प्रतिशत है। ईरान का वार्षिक तेल उत्पादन 30 अरब टन है। इसके मुख्य तेल कूप अजागरी, मस्जिदे सुलेमान, हफ्तेकेल, खानक्वीन, नफ्त खनाह, लाली, गुलखरी, बीबी हाकीमेह, करंज आदि हैं।

5. इराक-

    इसका भंडार 4.7 अरब टन तथा उत्पादन 10 करोड़ टन है। किरकुक तथा बसरा दो बड़े तेल क्षेत्र हैं। इसके अन्य तेल कूप नफ्तखनाह, वुटमाह तथा मइला है। यहाँ से तेल तेल पाइप द्वारा त्रिपोली तथा बनियास को भेजा जाता है।

6. कुवैत-

    इस छोटे देश के पास विश्व का 10% तेल का भंडार है। यहाँ का सबसे बड़ा तेल प्रदेश बुरधान का पहाड़ी-प्रदेश है। इसका वार्षिक उत्पादन 9 करोड़ टन है। यहाँ लगभग 105 तेल कूप हैं।

7. मध्यपूर्व के अन्य क्षेत्र-

    यहाँ के अन्य तेल उत्पादक देश संयुक्त अब अमिरात, ओमान, कतार आदि हैं। इन सभी देशों में प्रत्येक का उत्पादन एक करोड़ टन वार्षिक से अधिक है।

8. वेनेज्वेला-

     दक्षिणी अमेरिका में यह देश काफी महत्त्वपूर्ण है। कैरेबियन सागर के दक्षिण में यह क्षेत्र में स्थित है। यहाँ के तीन क्षेत्रों के उत्पादन होता है। यह इस प्रकार हैं-

(i) माराकैवो बेसिन

(ii) ओरिनिको बेसिन

(iii) आपुरो बेसिन।

      इस देश का वार्षिक उत्पादन 10 करोड़ टन है। यहाँ के कुल उत्पादन का 90% भाग निर्यात कर दिया जाता है।

9. भारत- भात का अभी कुल उत्पादन 5 करोड़ टन हो गया है। यहाँ भी तीन क्षेत्रों में उत्पादन होता है-

(i) असम क्षेत्र में डिगबोई।

(ii) गुजरात-अंकलेश्व क्षेत्र।

(iii) मुम्बई उच्च प्रदेश।

10. अन्य क्षेत्र- इनके अलावे एशिया में बर्मा, चीन, दक्षिणी अफ्रिका, अल्जिरिया, इन्डोनेशिया आदि से तेल का उत्पाद होता है।

19. The Chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world (विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताएँ तथा वितरण)

19. The Chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world

(विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताएँ तथा वितरण)



प्रश्न प्ररूप

Q. Discuss the chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world.

(विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताओं तथा वितरण का वर्णन करें।)

उत्तर- बगानी या बगाती या रोपण कृषि, कृषि का एक विशिष्टीकृत रूप है जो मुख्य रूप से उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ही की जाती है। इस प्रकार की कृषि में कोई एक ही फसल उत्पन्न की जाती है। यह फसल भी मुख्य रूप से बाजारों में बिक्री के लिए की जाती है। इन फसलों में रबड़, चाय, कहवा, गन्ना, केला, नारियल आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार की कृषि को एक फसली (One-crop Mono-Culture) की खेती कहते हैं। कुछ विद्वान गन्ने को भी बगानी फसल मानते हैं किन्तु वास्तव में गन्ना बगानी फसल नहीं है।

बगानी कृषि के क्षेत्र-

(i) पश्चिमी द्वीप समूह में क्यूबा, जमाइका, पोर्टिरिको, आदि

(ii) मध्य अमेरिका में होण्डुरस, ग्वाटेमाला त्तथा कोस्टारिका

(iii) पश्चिमी अफ्रिका के गिनीतट, घाना आदि।

(iv) दक्षिण अफ्रिका में नेटाल आदि

(व) दक्षिणी एशिया में द० भारत, श्रीलंका, मलेशिया, इन्डोनेशिया आदि।

(vi) आस्ट्रेलिया में क्वींसलैंड क्षेत्र।

       इस प्रकार की रोपण (Plantation) कृषि में मुख्य रूप से यूरोपीय लोगों की पूँजी तथा प्रबंध क्षमता लगी हुई है। इस प्रकार की कृषि में मूल निवासी लोग श्रमिकों का काम करते हैं। इस प्रकार की कृषि प्रणाली में फसलों के उत्पादन में बहुत से प्रक्रम (Processes) ऐसे होते हैं जिनके लिए बड़ी सावधानी की आवश्यकता होती है। इस कृषि की विधियाँ बहुत ही दक्षतापूर्ण और वैज्ञानिक होती हैं। इसकी फसलों के लिए वैज्ञानिक प्रणाली तथा सावधानी बरती जाती है। इसके पौधे काफी नाजुक होते हैं।

     रोपण (Plantation) कृषि में उन फसलों का उत्पादन होता है जिसके पदार्थों के माँग पिछले दो शताब्दियों में नगरीय संस्कृति के विकास के साथ-साथ बढ़ती गई है। आज की वर्तमान आधुनिक दुनिया में पेय पदार्थों का महत्व बहुत बढ़ गया है। इनमें चाय, कॉफी, कोको काफी लोकप्रिय हो गए हैं। विश्व के उन्नत देशों में इन पदार्थों की काफी माँग है।

रोपण कृषि की विशेषताएँ-

     रोपण कृषि की कुछ मूलभूत विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(i) यह एक फसली (Mono culture) कृषि है। इसमें एक ही फसल के उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

(ii) इसमें अधिक पूँजी, उच्च प्रबंध और वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाता है।

(iii) इसकी फसलें केवल बिक्री द्वारा मुद्रा प्राप्त करने के लिए उत्पन्न की जाती है।

(iv) अधिकतर उत्पादन व्यापार के लिए होता है। स्थानीय क्षेत्रों में इसका उपभोग बहुत ही, कम होता है।

(v) इसके अन्तर्गत खेत (Holdings) बहुत विस्तृत तथा खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।

(vi) इसमें मानव श्रम की अधिक आवश्यकता पड़ती है।

(vii) इस कृषि पर बाजार-माँग की घट-बढ़ का और मूल्य में उतार-चढ़ाव का गहरा प्रभाव पड़ता है।

(viii) इस प्रकार की कृषि के लिए भारी पूँजी की आवश्यकता होती है क्योंकि रख-रखावों,, प्रक्रिया तथा यातायात में काफी खर्च पड़ता है।

(ix) इस कृषि की फसलों में बीमारी लगने का काफी भय रहता है। अतः फसल के खराब होने से बहुत हानि होती है।

(x) इस कृषि का बाजार सम्पूर्ण विश्व के नगरों में फैला हुआ है। अतः ग्रह फसल नगरीय सभ्यता तथा संस्कृति का द्योतक है।

(xi) यह एक महत्त्वपूर्ण मुद्रादायिणी फसल है।

     इस प्रकार की फसलों का उत्पादन प्रायः विकासशील या अविकसित क्षेत्रों में होता है। जैसे दक्षिणी अमेरिका, मध्य अफ्रिका, तथा दक्षिणी एशिया के अधिकतर देश या तो विकासशील हैं या अविकसित हैं, परन्तु इसका बाजार अधिकतर विकसित देशों के महानगरों में से है।

      इसका मुख्य खरीददार U.S.A., कनाडा तथा यूरोपीय महादेश के देश हैं। आस्ट्रेलिया भी इसका अच्छा बाजार है। इस प्रकार इसका उत्पादन उष्ण कटिबंधीय देशों में तथा इनकी बिक्री समशीतोष्ण तथा शीत प्रदेशों में है। उदाहरणस्वरूप विश्व में चाय का सबसे बड़ा निर्यातक भारत, श्रीलंका है। कॉफी का सबसे बड़ा निर्यातक ब्राजील है। परन्तु सबसे बड़ा आयातक U.S.A. तथा यूरोप के देश हैं।

विश्व में बगानी कृषि की फसलें तथा उनके क्षेत्र-

(1) रबड़- मौनसून एशिया में मलेशिया, इन्डोनेशिया, थाइलैंड, श्रीलंका, भारत, हिन्दचीन के देश- सिंगापुर, फिलीपीन, अफ्रिका- गिनी तट के देश घाना, नाइजीरिया, आइवरी कोस्ट आदि तया दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील। 

(2) चाय- मौनसून एशिया में चीन, भारत, श्रीलंका, जापान, बंगलादेश, इन्डोनेशिया, मलेशिया आदि पश्चिमी एशिया में ईरान, दक्षिणी रूस आदि, अफ्रिका में केन्या, जायरे, जाम्बिया, तंजानियाँ आदि दक्षिणी अमेरिका में अर्जेन्टिना तथा ब्राजील।

(3) नारियल- दक्षिणी-पूर्वी एशिया के देश- इन देशों के समुद्र तटीय प्रदेश, भूमध्यरेखीय अफ्रिका तथा दक्षिणी अमेरिका के तटीय प्रदेश।

(4) कहवा- दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील, कोलम्बिया, इक्वेडोर, वेनेज्वेला तथा पेरू, अफ्रिका में गिनी तट के देश-आइवरी कोस्ट, घाना, अंगोला, उगाण्डा, एथियोपिया, जैसे आदि तथा मौनसून एशिया में भारत, हिन्दचीन आदि।

(5) केला- मौनसून एशिया में भारत, फिलीपिन, हिन्देशिया, मलेशिया, सिंगापुर और अफ्रिका तथा दक्षिणी अमेरिका के भूमध्यरेखीय प्रदेश शामिल है।

(6) मसालें- मौनसून एशिया में भारत, श्रीलंका, मलेशिया तथा तंजानियाँ आदि। तंजानियाँ में जंजीवार द्वीप लौंग के उत्पादन के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

(7) कोको- इसका सबसे बड़ा उत्पादक अफ्रिका महादेश है। इसमें अप वोल्टा, घाना, नाजीरिया आदि हैं। कोको का कुछ उत्पादन दक्षिणी अमेरिका के ब्राजील में भी होता है।

15. The Dairy farming in the world (विश्व में दुग्ध व्यवसाय)

15. The Dairy farming in the world

(विश्व में दुग्ध व्यवसाय)



प्रश्न प्रारूप

Q. Discuss the dairy farming in the world.

(विश्व में दुग्ध व्यवसाय का वर्णन करें।)

उत्तर- दूध पशुपालन विश्व के प्रत्येक देश में कुछ-न-कुछ होता है परन्तु कुछ भागों में यह व्यवसाय व्यापारिक स्तर पर किया जाता है। इन प्रदेशों में बड़े पैमाने पर पशुचारा तथा उनको खिलाने लायक अनाजों का उत्पादन होता है। आधुनिक समय में तीव्रगामी परिवहन तथा प्रशीतलन विधि से यह उद्योग और भी महत्त्वपूर्ण हो गया है। दुग्ध पशुपालन की कुछ विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(i) इस प्रकार की कृषि में दुधारु पशुओं का विशेष महत्त्व होता है।

(ii) इसमें अधिक पूँजी, प्रचुर श्रम तथा मवेशियों के रखने की वैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग होता है।

(iii) कार्य के आकार एवं उपयोग में भिन्नता होती है।

(iv) दूध एवं दूध सामग्रियों का वितरण सापेक्ष दूरी के अनुसार होता है। ताजा दूध निकट के नगरों में तथा मक्खन एवं पनीर दूर के नगरों से प्राप्त किया जाता है।

(v) इस उद्योग में कुछ देशों ने विशेषीकरण प्राप्त कर लिया है।

(vi) इस उद्योग का विकास कम जनसंख्या वाले देशों में हुआ है।

(vii) यह व्यवसाय विश्व के समशीतोष्ण क्षेत्र में ही अधिक विकसित है।

विश्व में दुग्ध उत्पादन

       दूध की प्राप्ति गाय, भैंस, भेड़ तथा बकरी से होती है। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1988 में विश्व भर में कुल 53 करोड़ टन दूध का उत्पादन था। विश्व भर में कुल दूध उत्पादन में पिछले तीन दशकों में आश्चर्यजनक रूप से लगभग दोगुना से अधिक की बढ़ोत्तरी हुई है। 30 साल बाद अर्थात 2018 में कुल दुग्ध उत्पादन 84.3 करोड़ टन हो गया है। साधारण शब्दों में कहें तो तीन दशक के भीतर कुल दूध उत्पादन में लगभग 60 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है।

    दूध का उत्पादन विश्व में निम्नलिखित क्षेत्रों से होता है।

विश्व में शीर्ष 10 दुग्ध उत्पादक देश (2019)

क्रम  देश उत्पादन (प्रतिशत में)
1. भारत 21
2. अमेरिका 11
3. पाकिस्तान  06
4. ब्राजील 04
5. चीन  04
6. रूस  04
7. जर्मनी 04
8. तुर्की 03
9. फ्रांस 03
10. न्यूजीलैंड 02

प्रमुख क्षेत्र

    विश्व में पशुपालन के प्रमुख क्षेत्र इस प्रकार हैं-

(1) उत्तरी अमेरिका का U.S.A. तथा कनाडा का मध्य पूर्वी भाग।

(2) पश्चिमी यूरोप का उत्तरी भाग, फ्रांस, जर्मनी, हॉलैंड, डेनमार्क, ग्रेट ब्रिटेन तथा U.S.S.R का पश्चिमी भाग।

(3) दक्षिणी अमेरिका के अर्जेन्टाइना

(4) आस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड

(5) गौण क्षेत्र पश्चिमी U.S.A., मध्य चिली, द० अफ्रीका तथा पूर्वी जापान।

(1) उत्तरी अमेरिका:

     दूध कृषि व्यवसाय U.S.A. तथा कनाडा में विकसित हैं। यहाँ के सभी बड़े नगरों के पास ताजे दूध के लिए यह किया जाता है। इसका सबसे अधिक केन्द्रीकरण U.S.A. के मक्का पट्टी के उत्तर ग्रेट लेक्स तथा सेंट लारेंस प्रदेश में हुआ है। यह घनी शहरी आबादी के पास स्थित है, जहाँ दूध, मक्खन एवं पनीर की बड़ी माँग है। यहाँ भी अनुकूल जलवायु तथा पहाड़ी प्रदेश अन्य कृषि के लिए अनुपयुक्त हैं। यहाँ क्यूवेक एवं ओण्टोरियो में लगभग 4000 से अधिक पनीर बनाने के कारखाने हैं। कनाडा से पनीर ब्रिटेन भेजा जाता है।

    U.S.A. में दूध उत्पादक क्षेत्र अटलांटिक तट से लेकर प० में मिसौरी नदी तक फैला है। न्यू इंगलैंड स्टेट, पेन्सिलवानिया, न्यूयार्क एवं विस्कौन्सिन राज्यों में दूध उत्पादन अधिक होता है। यहाँ दूध उत्पादन के लिए निम्नलिखित सुविधाएँ प्राप्त हैं-

(i) ऊँची-नीची पहाड़ी भूमि पर पशु-चरण होता है।

(ii) ग्रीष्मकालीन वर्षा तथा कम गर्मी से घासें उगती है।

(iii) निकट की मक्का पट्टी से मकई से साइलेज बनाने की सुविधा।

(iv) निकट के बंदगाह से दूध पदार्थों के निर्यात की सुविधा

(v) समशीतोष्ण जलवायु के कारण दूध खराब नहीं होता है।

(vi) मशीनों का विभिन्न कार्यों में प्रयोग।

(vii) अच्छी नस्लों की जर्सी, गार्न से, आयर शायर आदि से अधिक दूध की प्राप्ति।

(viii) यातायात तथा शीतलन विधि की सुविधा।

     दूध तथा मक्खन के उत्पादन में U.S.A. का स्थान विश्व में रूस के बाद दूसरा तथा पनीर के उत्पादन में प्रथम है। इसने 1981 में विश्व का 15-6% दूध तथा मक्खन एवं 21-3% पनीर का उत्पादन किया।

(2) पश्चिम यूरोपीय प्रदेश:

    यह प्रदेश अच्छी मिट्टी एवं नम जलवायु के मुलायम घासों के लिये प्रसिद्ध है। यह दूध उत्पादन के लिए आदर्श है। यहाँ के दूध क्षेत्र प० फ्रांस, हॉलैंड, डेनमार्क, स्वेडन, ब्रिटेन तथा रूस तक फैला है।

    हॉलैंड में विशाल मैदान, नम जलवायु, उपजाऊ घास तथा उच्च गायों से अधिक दूध मिलता है। हॉलैंड का एडाम पनीर विश्व विख्यात है। डेनमार्क विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। समस्त डेनमार्क एक गऊशाला है। यहाँ दूध की नदी बहती है। यहाँ के लोगों की यह मुख्य पेशा है। यहाँ के दूध विकास के निम्न कारण हैं-

(i) यहाँ खनिजों का अभाव है।

(ii) जलवायु नम एवं अनुकूल।

(iii) छोटे-छोटे खेतों में घास

(iv) खेती के स्थान पर घासों का उत्पादन

(v) यहाँ दुग्ध शालाएँ लगभग 8000 से अधिक सहकारी समितियाँ द्वारा संचालित।

(vi) यहाँ 80% मक्खन तथा 10% पनीर

(viii) गाएँ उत्तम नस्ल की है।

        आधुनिक युग में पशुपालन वैज्ञानिक तरीकों से व्यावसायिक आधार पर हो रहा है। उत्तरी अमेरिका का प्रेयरी क्षेत्र, ब्राजील का पठारी भाग और अर्जेण्टीना में विस्तृत पम्पास घास स्थल, वेनेजुएला का लानोस घास स्थल, दक्षिणी अफ्रीका का वेल्ड क्षेत्र, आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड की शीतोष्ण घास भूमि, कैस्पियन सागर के पूर्व तथा अरल सागर के उत्तर के विस्तृत भाग व्यापारिक पशुपालन के उल्लेखनीय क्षेत्र हैं।

     व्यापारिक पशुपालन उद्योग पूर्णतया प्राकृतिक चरागाहों पर आश्रित नहीं है। विस्तृत क्षेत्रों में चारे की फसलों और पौष्टिक घासों की खेती की जाती है। पशुओं को सुख-सुविधा सम्पन्न बाड़ों में रखकर खिलाया-पिलाया जाता है। विशेष नस्ल के पशु पाले जाते हैं, जिनकी दूध या मांस उत्पादन क्षमता अत्यधिक होती है। पशुओं के प्रजनन, नस्ल सुधार, रोगों की रोकथाम तथा बीमार पशुओं के इलाज, आदि की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है। पशुओं को बड़े-बड़े बाड़ों में रखा जाता है।

      डेनमार्क तथा न्यूजीलैण्ड में बड़े पैमाने पर दुग्ध व्यवसाय होता है। आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड में भेड़ ऊन तथा मांस के लिए व्यापारिक स्तर पर पाली जाती हैं। व्यापारिक पशुचारण में लोगों को प्रवास नहीं करना पड़ता है। वे एक ही स्थान पर हते हैं। चारे की फसलों की खेती तथा दूध और मांस से संसाधित पदार्थ बनाने के लिए मशीनों का अत्यधिक प्रयोग होता है। इन संसाधित पदार्थों का बाजा अन्तर्राष्ट्रीय है।

       भारत में डेरी कृषि का विकास सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है। गुजरात की अमूल डेयरी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। अधिकांश राज्यों में डेयरी विकास बोर्ड बनाए गए हैं। झांसी में चारा शोध संस्थान तथा करनाल में डेरी शोध संस्थान का भी गठन किया गया है। भारत में अधिकांश दूध गायों से नहीं बल्कि भैंसों से प्राप्त किया जाता है।

14. WTO (विश्व व्यापार संगठन) की स्थापना के उद्देश्य एवं कार्य

14. WTO (विश्व व्यापार संगठन) की स्थापना के उद्देश्य एवं कार्य



WTO

प्रश्न प्रारूप

Q. विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना के उद्देश्यों एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- ओपेक जैसे संगठनों के अस्तित्व और वस्तुओं के आयात पर भारी प्रशुल्कों से विश्व में वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार में कृत्रिम बाधा उपस्थित होती है। इन कृत्रिम बाधाओं को दूर करने के लिए तथा अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास हेतु तथा मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने हेतु अनेक देशों ने प्रादेशिक स्तर पर साझा बाजार की स्थापना की है।

      इस प्रकार के साझा बाजार का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच कृत्रिम बाधाओं को दूर करते हुए वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना है। साझा बाजार के सदस्य देश अपनी वस्तुओं का आयात-निर्यात बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा, भेदभाव और प्रशुल्क दरों के बीच स्वतंत्रतापूर्वक कर सकते हैं।

     इस प्रकार के साझा बाजारों में यूरोपियन आर्थिक समुदाय (EEC) या यूरोपियन संघ (EC) या यूरोपियन साझा बाजार (ECM) उल्लेखनीय हैं जिसकी स्थापना 1951 में 6 यूरोपियन देशों द्वारा अपने कोयला और इस्पात उद्योग के समन्वय विकास हेतु हुई।

      वर्तमान में 15 सदस्य देशों के साथ यह एक शक्तिशाली साझा बाजार व्यवस्था है। अन्य साझा बाजार व्यवस्था वाले संगठनों में 1994 में कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और मेक्सिको द्वारा स्थापित उत्तरी अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता (नाफ्टा), 1973 में 13 केरीबियन देशों द्वारा स्थापित केरीबियन समुदाय और साझा बाजार (केरीकोम), 1969 में स्थापित लैटिन अमेरिकी स्वतंत्र व्यापार संघ (लाफ्टा) उल्लेखनीय हैं।

     देशों के बीच मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों के अन्तर्गत हवाना में 1947-48 में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें 53 देशों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन का गठन करने सम्बन्धी एक चार्टर पर हस्ताक्षर किए, किन्तु अमेरिका का समर्थन न मिल पाने के कारण विश्व व्यापार संगठन स्थापित नहीं किया जा सका।

    अन्ततः विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1.1.1995 को प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी सामान्य करार (General Agreement on Trade and Tarrif) (GATT) के उरुग्वे दौर में हुए समझौते के परिणामस्वरूप हुई। विश्व व्यापार संगठन (WTO) का मुख्यालय स्विट्जरलैंड के जिनेवा (Geneva) शहर में स्थित है।

प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी करार (गैट):-

    गेट एक बहुपक्षीय व्यापार सन्धि है जो जेनेवा में 23 देशों के मध्य हुए समझौते के आधार पर 1 जनवरी, 1948 से लागू हुई। इसका उद्देश्य परस्पर सहमति द्वारा व्यापारिक प्रतिबन्धों को समाप्त करना था। गैट वार्ताओं के अब तक कुल बारह चक्र आयोजित किए गए हैं। उरुग्वे के पश्चात् दोहा और कानकुन में इन वार्ताओं के दौर आयोजित किए जा चुके हैं।

    सात वर्षीय उरुग्वे दौर में चार नए समझौते हुए जो अब डब्ल्यू. टी. ओ. के मूलभूत समझौते के भाग हैं। ये समझौते निम्न हैं-

1. व्यापार सम्बन्धी बौद्धिक सम्पदा अधिकार (ट्रिप्स),

2. व्यापार सम्बन्धी निवेश उपाय (ट्रिम्स),

3. सेवाओं में व्यापार का सामान्य समझौता (गैट्स)

4. कृषि।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य

     डंकल समझौते के अन्तर्गत ही गैट के स्थान पर 1 जनवरी, 1995 को विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया। इस संगठन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जीवन-स्तर में वृद्धि करना।

(ii) पूर्ण रोजगार एवं प्रभावपूर्ण मांग में वृहत्स्तरीय एवं ठोस वृद्धि करना।

(iii) वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(iv) सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(v) विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना।

(vi) सुस्थिर या टिकाऊ विकास की आवधारणा को स्वीकार करना।

(vii) पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण करना।

(viii) विकास के वैयक्तिक स्तरों की आवश्यकता के साथ निरन्तर चलते रहने के साधनों में वृद्धि करना।

        इन उद्देश्यों में प्रथम तीन गैट के भी उद्देश्य थे। गैट के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के पूर्ण उपयोग की बात कही गई थी जबकि विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग पर अधिक बल दिया गया तथा सुस्थिर विकास एवं पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण के उद्देश्यों को भी जोड़ा गया है।

     अतः विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य अधिक व्यापक एवं प्रभावी हैं। विश्व व्यापार संगठन की प्रस्तावना में विकासशील देशों और विशेष रूप से कम विकसित देशों के लिए ऐसे सकारात्मक प्रयासों की आवश्यकता बताई गई जो उनकी विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में उनकी हिस्सेदारी को बढ़ा सकें।

विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य

    विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों को मूर्तरूप देने के लिए विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं:-

(i) अन्तर्राष्ट्रीय समझौते से सम्बन्धित विचार विमर्श के लिए एक सामूहिक संस्थागत मंच के रूप में काम करना।

(ii) विश्व व्यापार समझौता, बहुपक्षीय तथा बहुवचनीय समझौते के क्रियान्वयन, प्रशासन तथा परिचालन हेतु सुविधाएं प्रदान करना।

(iii) व्यापार एवं प्रशुल्क सम्बन्धी किसी भी मसले पर सदस्यों को विचार-विमर्श हेतु मंच प्रदान करना।

(iv) व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया (Trade Policy Revise mechanism) से सम्बन्धित नियमों एवं प्रावधानों को लागू करना।

(v) सदस्य राष्ट्रों के बीच विवादों के निपटारे से सम्बन्धित नियमों एवं प्रक्रियाओं को प्रशासित करना।

(vi) वैश्विक आर्थिक नीति निर्माण में अधिक सामजस्य भाव लाने हेतु विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से पूरा-पूरा सहयोग करना।

(vii) विश्व में संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग को बढ़ावा देना।

     इस प्रकार विश्व व्यापार संगठन के कार्यों में उन सभी बातों का समावेश है जिससे उसके सदस्य देशों को समझौते से सम्बन्धित मामलों पर विचार विमर्श का एक सामूहिक संस्थागत मंच प्राप्त होने के साथ-साथ एक एकीकृत स्थायी एवं मजबूत बहुपक्षीय प्रणाली द्वारा व्यापार सम्बन्धों को बढ़ाने, वैधानिक ढंग से विवादों के निपटाने और व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया के प्रावधानों को लागू करने में सहायता मिलेगी।

     गैट और उसके पश्चात् विश्व व्यापार संगठन के गठन होने से प्रायः सभी देश इसकी नीतियां एवं प्रावधानों से प्रभावित हुए हैं। 90 के दशक से विश्व स्तर पर उदारीकरण और वैश्वीकरण द्रुतगति से प्रसारित हो रहे हैं। प्रत्येक देश इनका लाभ उठाने के लिए अपनी नीतियों में संशोधन क हा है।




उत्तर लिखने का दूसरा तरीका




विश्व व्यापार संगठन

(World Trade Organisation)

परिचय
    विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization) एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है जिसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच व्यापार को मुक्त, पारदर्शी, संतुलित और विवाद-रहित बनाना है।

    इसका गठन 1 जनवरी 1995 को किया गया था। इससे पहले विश्व व्यापार व्यवस्था को नियंत्रित करने वाला मुख्य समझौता GATT (General Agreement on Tariffs and Trade – 1948) था, जिसे आगे बढ़ाते हुए WTO की स्थापना की गई।

    WTO आज वैश्विक व्यापार का सबसे प्रभावशाली संस्थान है, जिसमें 160 से अधिक देश सदस्य हैं। यह न केवल व्यापार नियमों को निर्धारित करता है, बल्कि व्यापार से जुड़े विवादों का समाधान भी करता है।

WTO की संरचना एवं कार्यप्रणाली

    WTO एक सदस्य-चालित संगठन है, अर्थात् इसके सभी निर्णय सदस्य देशों की सहमति से लिए जाते हैं। इसकी प्रमुख संस्थाएँ हैं- 

1. मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (Ministerial Conference):

     सर्वोच्च नीति-निर्माण निकाय; हर दो वर्ष में बैठक।

2. सामान्य परिषद (General Council):-

     दैनिक कार्यों का संचालन; यही विवाद निपटान निकाय (DSB) और व्यापार नीति समीक्षा निकाय (TPRB) के रूप में भी कार्य करता है।

3. विभिन्न समितियाँ:-

    कृषि, सेवाएँ, बौद्धिक संपदा (TRIPS), निवेश, प्रतिस्पर्धा आदि।

   WTO सभी सदस्यों पर एक समान नियम लागू करता है। इसका प्रमुख सिद्धांत ‘Most Favoured Nation – MFN’ है, जिसके तहत एक देश किसी सदस्य को जो व्यापार लाभ देता है, वह सभी सदस्यों को देना पड़ता है।

WTO के प्रमुख समझौते

1. GATT–1994 (वस्तु व्यापार):- 

     वस्तुओं पर टैरिफ कम करना, गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाना।

2. GATS (सेवाओं पर व्यापार):-

     बैंकिंग, बीमा, शिक्षा, पर्यटन आदि सेवाओं का उदारीकरण।

3. TRIPS (बौद्धिक संपदा अधिकार):-

     पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क की सुरक्षा।

4. TRIMS (निवेश संबंधी उपाय):-

     निवेश पर भेदभाव खत्म करना।

5. कृषि समझौता (AoA):-

      कृषि सब्सिडी, बाजार पहुंच और निर्यात सब्सिडी का नियमन।

WTO के उद्देश्य

      इस संगठन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जीवन-स्तर में वृद्धि करना।

(ii) पूर्ण रोजगार एवं प्रभावपूर्ण मांग में वृहत्स्तरीय एवं ठोस वृद्धि करना।

(iii) वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(iv) सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(v) विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना।

(vi) सुस्थिर या टिकाऊ विकास की आवधारणा को स्वीकार करना।

(vii) पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण करना।

(viii) विकास के वैयक्तिक स्तरों की आवश्यकता के साथ निरन्तर चलते रहने के साधनों में वृद्धि करना।

(ix) अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मुक्त प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना।

(x) टैरिफ और अन्य प्रतिबंधों को कम कर व्यापार को सरल और पारदर्शी बनाना।

(xi) व्यापार विवादों का निष्पक्ष समाधान करना।

(xii) विकासशील देशों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखना।

WTO और विकासशील देश

      WTO अपने नियमों में विकासशील और अल्प विकसित देशों को विशेष और भिन्न सुविधा (Special and Differential Treatment) देने की व्यवस्था करता है।

⇒ उन्हें कुछ समझौतों को लागू करने के लिए अधिक समय मिलता है।

⇒ निर्यात क्षमता बढ़ाने के लिए तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

⇒ अल्प विकसित देशों को बाजार पहुंच में विशेष रियायत मिलती है।

     परंतु अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि WTO विकसित देशों के हितों की अधिक रक्षा करता है और विकासशील देशों की आवाज उतनी प्रभावशाली नहीं होती।

WTO और भारत

   भारत WTO का संस्थापक सदस्य है। WTO में भारत की भागीदारी का प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में देखा जाता है।

सकारात्मक प्रभाव

1. निर्यात अवसरों में वृद्धि:- सेवाओं के क्षेत्र, विशेषकर IT और BPO (Business process outsourcing) में भारत को भारी लाभ मिला।

2. प्रतिस्पर्धा में वृद्धि:- उद्योगों ने बेहतर तकनीक अपनाई और निर्यात-उन्मुख उत्पादन बढ़ा।

3. कृषि निर्यात में सुधार:- मसाले, चाय, कॉफी, समुद्री उत्पादों के निर्यात में बढ़ोतरी।

4. FDI प्रवाह में वृद्धि:- वैश्विक व्यापार मानकों के कारण निवेश में पारदर्शिता आई।

नकारात्मक प्रभाव

1. कृषि क्षेत्र पर दबाव:- विकसित देशों द्वारा भारी सब्सिडी के कारण भारतीय किसानों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा मुश्किल।

2. दवा क्षेत्र में प्रभाव:- TRIPS समझौते के कारण दवाओं पर पेटेंट नियम कड़े हुए, जिससे सस्ती जनरिक दवाओं का उत्पादन सीमित हो सकता है।

3. आयात में वृद्धि:- सस्ते विदेशी उत्पादों के कारण घरेलू उद्योग पर दबाव बढ़ा।

4. निर्णय लेने में असमानता:- WTO में विकसित देशों का प्रभाव अधिक माना जाता है।

WTO की आलोचनाएँ

⇒ यह संगठन बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विकसित देशों को अधिक लाभ पहुंचाता है।

⇒ कृषि सब्सिडियों के मामले में असमानता विकसित देश अधिक सब्सिडी देते हैं जबकि विकासशील देशों पर रोक।

⇒ पर्यावरण और श्रम मानकों पर स्पष्ट नियम नहीं।

⇒ TRIPS समझौता गरीब देशों की स्वास्थ्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

⇒ निर्णय-प्रक्रिया बहुत जटिल और धीमी है।

WTO के समक्ष चुनौतियाँ

1. वैश्विक संरक्षणवाद का बढ़ना:-

     कई देश घरेलू उद्योग बचाने के लिए प्रतिबंध बढ़ा रहे हैं।

2. विवाद निपटान तंत्र में संकट:-

     अपीलीय निकाय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में अड़चनें।

3. डिजिटल व्यापार:-

     नए नियम बनाने की आवश्यकता।

4. कृषि सुधार:-

     विकसित देशों की सब्सिडी नीति WTO को चुनौती देती है।

5. बहुपक्षीय वार्ताओं में गतिरोध:- दोहा विकास एजेंडा वर्षों से अधर में।

भारत की मांगें और रुख

⇒ कृषि सब्सिडियों में न्यायसंगत नियम।

⇒ खाद्य सुरक्षा के लिए Public Stockholding व्यवस्था को स्थायी समाधान।

⇒ विकासशील देशों की विशेष सुविधाएँ जारी रहें।

⇒ सेवाओं में Mode-4 (लो-कॉस्ट वर्कफोर्स मूवमेंट) को मजबूत करना।

⇒ भारत WTO में विकासशील देशों की सामूहिक आवाज को मजबूत करने में प्रमुख भूमिका निभाता है।

निष्कर्ष

    WTO वैश्विक व्यापार व्यवस्था का केंद्रीय स्तंभ है, जिसने दुनिया भर में व्यापार को अधिक उदार और पारदर्शी बनाया है। हालांकि इसके सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं विशेषकर विकसित और विकासशील देशों के बीच असमानता, कृषि सब्सिडी, और पेटेंट नियमों के विवाद।

     भारत जैसे विकासशील देशों के लिए WTO एक अवसर और चुनौती दोनों है। सही नीति-निर्माण, सामूहिक कूटनीति और राष्ट्रीय हितों के साथ तालमेल रखते हुए WTO भारत की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर और मजबूत बनाने में सहायक हो सकता है।

नोट:

GATT: The General Agreement on Tariffs and Trade

GATS: The General Agreement on Trade in Services

TRIPS: The Agreement on Trade-Related Aspects of Intellectual Property Rights

TRIMS: The Agreement on Trade-Related Investment Measures

♣ लो-कॉस्ट वर्कफोर्स मूवमेंट (Low-Cost Workforce Movement):-

       यह एक ऐसा श्रम-गतिशीलता (labour mobility) मॉडल है, जिसमें कम लागत पर उपलब्ध श्रमिक एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र, या एक देश से दूसरे देश में आर्थिक अवसरों, जीवन-स्तर सुधार और रोजगार सुरक्षा की तलाश में स्थानांतरित होते हैं। यह अवधारणा मुख्यतः वैश्वीकरण, औद्योगिकीकरण और सेवा क्षेत्र के तेज विस्तार से जुड़ी है।

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