6. BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN / प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच

6. BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN

(प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच)


BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN / प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच       BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN                     

        प्रशांत महासागर तथा उसके तटवर्ती सागर सम्मिलित रूप से विश्व के एक तिहाई भाग पर फैले हुए हैं। प्रशांत महासागर एक विशाल त्रिभुज के आकार का है जिसका विस्तार उत्तर में बेरिंग जलडमरूमध्य तथा दक्षिण में अंटार्कटिका महाद्वीप के मध्य है। इसके पश्चिम में एशिया तथा आस्ट्रेलिया और पूर्व में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप है। प्रशांत महासागर उत्तर से दक्षिण 14000 किलोमीटर लंबा और भूमध्यरेखा पर इसकी चौड़ाई 16000 किलोमीटर से कुछ अधिक है। प्रशांत महासागर की औसत गहराई 4572 मीटर है। प्रशांत महासागर में छोटे-बड़े मिलाकर लगभग 20,000 द्वीप पाए जाते हैं। यदि पश्चिमी तट द्वीपों की भरमार से आवृत है तो पूर्वी तट पर इनकी संख्या विरल है।

          सामान्य तौर पर प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत करते हैं।

(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)
               
         प्रशांत महासागर के मग्नतट उसके तटवर्ती क्षेत्रों की संरचना और बनावट पर निर्भर करते हैं। प्रशांत महासागर के पूर्वी तट पर मग्नतटों की चौड़ाई बहुत कम है। उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तटों के समानांतर क्रमशः रॉकी और एंडीज पर्वत मालाओं की उपस्थिति के कारण मग्नतट प्रायः अत्याधिक सँकरे हो गए हैं। उनकी औसत चौड़ाई 80 किलोमीटर है परंतु प्रशांत महासागर के पश्चिमी भाग में पर्वतों अथवा पठारों की समानांतर श्रृंखला के अभाव में मग्नतट अधिक विस्तृत है।
        ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी-द्वीप समूह तथा एशिया महाद्वीप से सटे मग्नतट का अपेक्षाकृत अधिक चौड़े हैं। इनकी औसत चौराहे 160 से 1600 किलोमीटर तक पाई जाती है। इन ग्नतटों की औसत गहराई 1000 मीटर से अधिक नहीं है। इन मग्नतटों पर प्रशांत महासागर के अनेक द्वीप (क्यूराइल, जापान द्वीप, फिलीपाइन्स, इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड आदि)  तथा कई आंतरिक एवं सीमांत सागर (बेरिंगसागर, ओखोटस्क, जापान सागर, पीत सागर, चीन सागर सागर, जावा सागर, कोरल सागर आदि) स्थित है।
(2) महासागरीय कटक / श्रेणी (Ocean Ridges)
           
       प्रशांत महासागर में अटलांटिक महासागर तथा हिंद महासागर के समान मध्यवर्ती कटक नहीं है। कुछ बिखरे कटक अवश्य मिलते हैं। जैसे- पूर्वी प्रशांत कटक (अलबट्रास पठार) लॉर्डहोवे कटक, टुआमामार्ट कटक, कोकरा कटक, हवायन कटक, होंशू कटक इत्यादि इसमें प्रसिद्ध है। पूर्वी प्रशांत कटक जिसे अलबट्रास पठार के नाम से जानते हैं 1600 किलोमीटर की चौड़ाई में विस्तृत है।
         23°- 35° दक्षिणी अक्षांश के बीच इसकी दो शाखाएँ हो जाती है। पूर्वी शाखा चिली तट की ओर चली जाती है तथा पश्चिमी शाखा इस्टर्न आईलैंड राइज के नाम से दक्षिण की ओर चली जाती है। दूसरा प्रमुख कटक न्यूजीलैंड रिज है। ऑस्ट्रेलिया के ग्रेट बैरियर रीफ के पश्चिम में क्वींसलैंड पठार प्रमुख कटक है। मध्य प्रशांत महासागर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कटक हवायन उभार है जो 960 किलोमीटर चौड़ा और 2640 किलोमीटर लंबा है।
 
(3) महासागरीय बेसिन/ मैदान/ द्रोणी (Oceans Besins)
                    
         प्रशांत महासागर के नितल का अधिकांश भाग गहरे अंत: समुद्री मैदानों से बना है। अन्य महासागरों की तुलना में इसमें अपेक्षाकृत अधिक गहरे अंत: समुद्री मैदान मिलते हैं। तट से मैदानों के में उतरते ही अचानक गहराई में वृद्धि हो जाती है। प्रशांत महासागर में कैलीफोर्निया के तट पर उत्तरी-पूर्वी बेसिन, जापान के तट पर उत्तरी-पश्चिमी बेसिन, पेरू एवं चिली के तट पर दक्षिणी-पूर्वी प्रशांत बेसिन और आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर दक्षिणी-पश्चिमी प्रशांत बेसिन, न्यूजीलैंड एवं पूर्वी आस्ट्रेलिया के बीच तस्मानियाँ बेसिन, फिजी द्वीप के दक्षिण में फिजी बेसिन स्थित है।
(4) महासागरीय गर्त /खाई (Ocean Deeps)
       
        प्रशांत महासागर में अभी तक 32 गर्तों की खोज की गई है। प्रशांत महासागर के अधिकांश गर्त पश्चिमी प्रशांत में मिलते हैं। ये गर्त या तो द्वीपीय चापों या पर्वतीय श्रृंखलाओं के समांतर पाए जाते हैं। प्रशांत महासागर में ही विश्व का सबसे गहरा गर्त मेरियाना ट्रेंच (11.02 Km) है जो फिलीपींस दीप के पूर्वी भाग में स्थित है।
         विश्व का दूसरा सबसे गहरा गर्त टोंगा गर्त (5022 मैदम) दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित है। इसके अतिरिक्त प्रशांत महासागर में क्यूराइल, फिलीपाइन, करमाडेक, पेरू-चिल्ली, अल्यूशियन, मध्य अमेरिका, रिक्यू, नीरो, मरे, ब्रूक, बेली, प्लानेट इत्यादि प्रमुख गर्त हैं।
निष्कर्ष

      उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच में भी अनेक विविधतापूर्ण विशेषताएँ मौजूद है। प्रशांत महासागरीय भूपटल भी महाद्वीपीय भूपटल के समान काफी जटिल संरचना वाले भूपटल है।


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5. BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN / हिंद महासागर के तलीय उच्चावच

5. BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN

(हिंद महासागर के तलीय उच्चावच)

BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN



BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN

         हिंद महासागर के तली का विस्तृत अध्ययन नहीं किया गया है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है। इसकी लंबाई लगभग 10000 किमी० और चौड़ाई 9000 किमी० है। इसका क्षेत्र 7.34 करोड़ वर्ग किमी० है। यह कुल महासागरीय जल का 20% जल अपने पास रखता है। इसके किनारे पर पूर्व में आस्ट्रेलिया, उत्तर में एशिया, पश्चिम में अफ्रीका और दक्षिण में अंटार्कटिका महाद्वीप उपस्थित है।

         हिंद महासागर का दक्षिणी भाग अंटार्कटिका के पास, पूरब में प्रशांत महासागर और पश्चिम में अटलांटिक महासागर से जुड़ जाता है। इसका तलीय भाग एवं तटीय भाग कठोर एवं सघन चट्टानों से निर्मित है। हिंद महासागर के तटीय भाग में ब्लॉक पर्वतों का प्रमाण मिलता है क्योंकि इसका निर्माण गोंडवाना भूखंड के विखंडन एवं उनके स्थानांतरण से हुआ है। हिन्द महासागर के पूर्वी भाग में मोड़दार पर्वतों की श्रेणियाँ है जो हिमालय का ही भाग माना जाता है। इसी मोड़दार पर्वत श्रृंखला पर कोको द्वीप, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह स्थित है। सामान्यत: प्रायद्वीपीय भारत दक्षिण में स्थित हिंद महासागर को दो भागों में बाँट देता है-

(1) बंगाल की खाड़ी

(2) अरब सागर।

       हिंद महासागर के सीमांत क्षेत्रों में कई छोटे-छोटे सागर मिलते हैं। जैसे- फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी, लाल सागर, मोजांबिक चैनल, अंडमान सागर इत्यादि।

     1965 में अंतरराष्ट्रीय हिंद महासागर अभियान जर्मन एवं भारतीय समुद्री वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। इनके अनुसार हिंद महासागर की औसत गहराई 4000 मीटर है। जॉनसन महोदय ने प्रादेशिक विशेषताओं के आधार पर हिंद महासागर को तीन भागों में वर्गीकृत किया है:-  

(1) पश्चिमी भाग- अफ्रीका के समीप, औसत गहराई 2000 फैदम

(2) पूर्वी भाग- ऑस्ट्रेलिया के पश्चिम में, औसत गहराई 3000 फैदम

(3) सँकरा और महाद्वीपीय मग्नढाल वाला क्षेत्र मध्यवर्ती भाग- एक उत्थित कटक के रूप में।

            सामान्य तौर पर हिंद महासागर के तलीय उच्चावच का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत करते हैं:-

(1) महाद्वीपीय मग्नतट

      हिंद महासागर के मग्नतट में काफी विविधता दिखाई देती है। इसकी औसत चौ० 640 किलोमीटर है। सबसे चौड़ा मग्नतट अफ्रीका के पूर्व और मेडागास्कर के समीप में पाए जाते हैं। इसी तरह बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर में भी चौड़े मग्नतट मिलते हैं। लेकिन आस्ट्रेलिया के पश्चिमी भाग और अंटार्कटिका के उत्तरी भाग में सँकरे मग्नतट मिलते हैं। जावा एवं सुमात्रा द्वीप के पास इसकी चौड़ाई मात्र 160 किलोमीटर है।

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल

     यह महाद्वीपों का अंतिम किनारा होता है। जिन-जिन क्षेत्रों में सँकरे महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ मग्नढाल तीव्र होता है और जिन क्षेत्रों में मंद ढाल वाले महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ पर महाद्वीपीय मग्नढाल भी मन्द होता है।

(3) महासागरीय कटक

       हिंद महासागर में उत्तर से दक्षिण दिशा में फैला एक मुख्य कटक मिलता है और इस मुख्य घटक के सहारे सहायक कटक भी मिलते हैं। हिंद महासागरीय कटक का आकार ‘Y’ अक्षर के समान है। यह समुद्र तल से 4000 मीटर नीचे तक अवस्थित है। यह कटक हिंद महासागर को पूर्वी एवं पश्चिमी भागों में बाँट देता है। कहीं-कहीं पर यह कटक समुद्री सतह से ऊपर चला जाता है जिस पर कई द्वीप बसे हुए हैं। जैसे- लक्षद्वीप, मालद्वीप, मॉरीशस द्वीप, कोकस किलिंग द्वीप, क्रिसमस द्वीप, रियूनियन द्वीप, सेशेल्स द्वीप, चैगोस द्वीप, डियागो गार्सिया द्वीप, प्रिंस एडवर्ड द्वीप, क्रोजेट द्वीप, कारगुलेन द्वीप, एमस्टर्डम द्वीप, सेंट पॉल द्वीप,  इत्यादि। यह उत्तर में प्रायद्वीपीय भारत के किनारे से शुरू होकर दक्षिण में अंटार्कटिका तक फैला हुआ है।

       प्रायद्वीपीय भारत के दक्षिण में इस कटक की चौड़ाई सर्वाधिक है। इसे लक्षद्वीप और मालद्वीप के बीच लक्काद्वीप चैगोस कटक कहते हैं। यही कटक दक्षिण की ओर बढ़ता चला जाता है। इसे विषुवत रेखा तथा 30° दक्षिणी अक्षांश के बीच चैगोस सेंटपॉल कटक कहते हैं। 30° से 50° दक्षिणी अक्षांश के बीच इसे एम्सटर्डम सेंटपॉल कटक कहते हैं। यहाँ पर इसकी चौड़ाई 1600 कि०मी० हो जाता है। 50° दक्षिणी अक्षांश के पास यह दो शाखाओं में विभक्त हो जाती है। पश्चिमी शाखा को करगुलेन गॉसबर्ग कटक और पूर्वी शाखा को इंडियन अंटार्कटिका कटक कहते हैं।

        हिंद महासागर का मुख्य कटक कई भागों में विभक्त है। जैसे- 5° दक्षिणी अक्षांश से एक शाखा निकलकर उत्तर-पश्चिम दिशा में चली जाती है जिसे सोकोत्रा चैगोस या कॉल्सबर्ग कटक कहते हैं। 18° दक्षिणी अक्षांश के पास से एक कटक निकलती है जिसे सेशेल्स कटक कहते हैं। यही कटक अचानक दक्षिण-पश्चिम दिशा में मुड़ जाता है जिसे मलागासी कटक कहते हैं। 48° दक्षिणी अक्षांश के पास हिंद महासागर के पश्चिमी भाग में एक कटक अवस्थित है, जिसे प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक कहते हैं। पूर्वी हिंद महासागर में 50° दक्षिणी अक्षांश के पास से ही एक कटक पूरब की ओर चली जाती है, जिसे दक्षिण-पूर्व इंडियन कटक कहते हैं।

सूची-

1. लक्काद्वीप चैगोस कटक

2. चैगोस सेंटपॉल कटक

3. एम्सटर्डम सेंटपॉल कटक

4. करगुलेन गॉसबर्ग कटक

5. इंडियन अंटार्कटिका कटक

6. सोकोत्रा चैगोस या कॉल्सबर्ग कटक

7. सेसिल्स कटक

8. मलागासी कटक

9. प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक

10. दक्षिण-पूर्व इंडियन कटक

(4) महासागरीय मैदान

      महासागरीय कटक हिंद महासागर को कई गहन सागरीय मैदानों में विभक्त करते हैं। जैसे-

(i) ओमान बेसिनओमान की खाड़ी में स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(ii) अरेबियन बेसिन- यह लक्काद्वीप चैगोस कटक और  सोकोत्रा द्वीप चैगोस के बीच स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट है।

(iii) सोमाली बेसिन- यह सोकोत्रा चैगोस, सेंटपाल कटक और सेशेल्स कटक के बीच स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(iv) मॉरीशस बेसिन- यह मलागासी और सेंट पाल कटक के बीच स्थित है। इसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट है।

(v) नेटाल बेसिन- मलागासी और दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी तट के बीच स्थित है। इसकी औसत गहराई 18000 फीट है।

(vi) अटलांटिक-भारतीय-अंटार्कटिका बेसिनयह अंटार्कटिका, दक्षिण अफ्रीका और प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक के बीच अवस्थित है। इसकी औसत गहराई 18000 फीट है।

(vii) अंडमान बेसिन- यह बंगाल की खाड़ी में अंडमान निकोबार के पूर्वी भाग में स्थित है। इसकी औसत गहराई 6000 से 12000 फीट है।

(viii) भारत-ऑस्ट्रेलिया बेसिन- इसका विस्तार 10° दक्षिणी अक्षांश से 50° दक्षिणी अक्षांश के बीच पूर्वी हिंद महासागर में हुआ है। इसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट के बीच है।

(ix) पूर्वी भारतीय अंटार्कटिका बेसिन- यह पूर्वी हिंद महासागर के सबसे दक्षिणी भाग में स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(5) महासागरीय गर्त

        हिंद महासागर में 6 प्रमुख गर्त मिलते हैं। इसके 60% भूभाग पर गहन सागरीय मैदान है। इसलिए इसमें गर्तों की संख्या बहुत कम है। हिंद महासागर का सबसे गहरा गर्त सुंडा गर्त है जो सुमात्रा एवं जावा द्वीप के पश्चिमी भाग में स्थित है जिसकी गहराई 7725 मीटर है।

निष्कर्ष

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट होता है कि हिंद महासागर के तलीय उच्चावच में भी अनेक विविधतापूर्ण विशेषताएँ मौजूद है।



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4. BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN / अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच

4. BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN 

(अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच)


BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN ⇒
BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN

           अटलांटिक महासागर पश्चिम में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका और पूर्व में यूरोप तथा अफ्रीका के मध्य 8.2 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अवस्थित है। यह संपूर्ण विश्व के क्षेत्रफल का 1/6 भाग तथा प्रशांत महासागर के क्षेत्रफल का 1/2 भाग है। इसका आकार अंग्रेजी के ‘S’ अक्षर के समान है जिससे यह प्रमाणित होता है कि प्रारंभ में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका यूरोप तथा अफ्रीका से मिले थे। बाद में महाद्वीपीय प्रवाह के कारण उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका अलग होकर पश्चिम दिशा में प्रवाहित हो गए। जिस कारण अटलांटिक महासागर का निर्माण हुआ।

       उत्तर में यह डेविस की खाड़ी तथा डेनमार्क जलडमरूमध्य एवं नार्वेजियन सागर द्वारा आर्कटिक सागर से जुड़ा हुआ है। अफ्रीका के दक्षिण में यह हिन्द महासागर से मिला हुआ है। अटलांटिक महासागर दक्षिण में सर्वाधिक चौड़ा है। 35° दक्षिणी अक्षांश पर इसकी पूर्वी-पश्चिमी चौड़ाई 5920 किलोमीटर है। भूमध्य रेखा की ओर यह निरंतर सँकरा होता जाता है। साओरोक अंतरीप तथा लाइबेरिया तट के बीच चौड़ाई 2560 किलोमीटर ही है। उत्तर की ओर चौड़ाई पुनः बढ़ती जाती है। 40° उत्तरी अक्षांश पर यह 4800 किलोमीटर हो जाती है। अटलांटिक महासागर के सीमांत सागरों में रूम सागर, कैरेबियन सागर, मेक्सिको की खाड़ी, बाल्टिक सागर, उत्तरी सागर, बैफिन की खाड़ी आदि प्रमुख है।

           अटलांटिक महासागर के नितल में निम्नलिखित चार प्रमुख रूप देखने को मिलते हैं:-

(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)

            कुछ भागों को छोड़कर अटलांटिक महासागर के चारों ओर चौड़े मग्नतट पाए जाते हैं। उत्तरी अटलांटिक महासागर में मग्नतट सर्वत्र सपाट एवं चौड़े हैं। मग्नतट की चौड़ाई समीपी तट के उच्चावच पर आधारित होती है। पर्वतीय अथवा पठारी तटों के मग्नतट अत्यधिक सँकरे और मैदानी तटों के मग्नतट अत्यधिक विस्तृत और समतल होते हैं। जैसे – बिस्के की खाड़ी से उत्तमाशा अंतरीप के बीच अफ्रीका का मग्नतट तथा 5°-10° S अक्षांश के बीच ब्राजील का मग्नतट सँकरा हो गया है। इसके विपरीत उत्तरी अमेरिका के उत्तरी-पूर्वी भाग तथा उत्तरी-पश्चिमी यूरोप के मग्नतट 240 से 400 किलोमीटर तक चौड़े है। न्यूफाउंडलैंड (ग्रांड बैंक) तथा ब्रिटिश द्वीप (डागर बैंक) के चारों ओर विस्तृत मग्नतट पाए जाते हैं। ग्रीनलैंड तथा आइसलैंड के बीच मग्नतट चौड़े हैं। दक्षिणी अटलांटिक महासागर में बाहियाब्लैंक तथा अंटार्कटिका के बीच चौड़े मग्नतट पाए जाते हैं। अटलांटिक महासागर के दक्षिणी भाग में सँकरे मैदान मिलते हैं। इस महासागर के मग्नतटों पर कई सीमांत सागर तथा असंख्य द्वीप पाए जाते हैं।

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल (Continental Slope)

        यह महाद्वीपों का अंतिम किनारा होता है। जिन-जिन क्षेत्रों में सँकरे महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ मग्नढाल तीव्र होता है और जिन क्षेत्रों में मंद ढाल वाले महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ पर महाद्वीपीय मग्नढाल भी मंद होता है। अटलांटिक महासागर में 12.4 प्रतिशत भाग पर मग्नढाल का विस्तार है।

(3) मध्य अटलांटिक कटक (Mid Atlantic Ridge)

           मध्य अटलांटिक कटक उत्तर में आइसलैंड से दक्षिण में बोवेट द्वीप तक ‘S’ अक्षर के आकार में 14400 किलोमीटर की लंबाई में फैला है तथा कहीं भी सागरतल से 4000 मीटर से नीचे नहीं जाता। इस श्रेणी की उपस्थिति ही अटलांटिक के नितल की सबसे बड़ी विशेषता है। भूमध्यरेखा के उत्तर इस कटक/श्रेणी को डॉल्फिन उभार तथा दक्षिण में चैलेंजर उभार कहते हैं। आइसलैंड और स्कॉटलैंड के बीच इस कटक को विविल थामसन कटक कहते हैं। ग्रीनलैंड के दक्षिण में कटक चौड़ा हो जाता है जिसे टेलीग्राफ पठार कहते हैं। 50°N अक्षांश के पास इस कटक की शाखा न्यूफाउंडलैंड उभार के नाम से अलग न्यूफाउंडलैंड तट तक चली जाती है। 40°N अक्षांश के दक्षिण मध्यवर्ती कटक से एक शाखा अजोर उभार के नाम से अजोर तट की ओर जाती है। भूमध्यरेखा पर सियरा लिओन उभार उ०-पू० की ओर तथा पारा उभार उत्तर-पश्चिम की ओर मध्यवर्ती कटक की दो शाखाओं के रूप में चले जाते हैं। 40°S  अक्षांश के पास इस कटक की एक शाखा वालविस कटक अफ्रीका के मग्नतट की ओर तथा दूसरी शाखा रियोग्रांडे उभार के नाम से दक्षिण अमेरिका की ओर मुड़ जाती है।

(4) महासागरीय बेसिन या द्रोणी (Oceanic Basin)

          मध्यवर्ती अटलांटिक कटक द्वारा अटलांटिक महासागर दो विस्तृत बेसिनों में विभक्त है जिनमें अनेक छोटी-छोटी बेसिनें पायी जाती हैं। इनमें प्रमुख बेसिन निम्नलिखित है:-

(i) लेब्राडोर बेसिन- यह उत्तर में ग्रीनलैंड तथा दक्षिण में न्यूफाउंडलैंड के मध्य 4000 मीटर की गहराई तक फैली है।

(ii) उतरी अमेरिका बेसिन- यह उत्तरी अटलांटिक महासागर की सबसे बड़ी बेसिन है। जिसका विस्तार 12° से 40° उत्तरी अक्षांशों के मध्य उत्तरी अमेरिका के तट से 5000 मीटर की गहराई तक विस्तृत है।

(iii) ब्राजील बेसिन- यह दक्षिणी अटलांटिक महासागर में भूमध्य रेखा से 30° दक्षिणी अक्षांश तथा दक्षिणी अमेरिका के तट एवं पारा उभार के मध्य स्थित है।

(iv) स्पेनिश बेसिन- यह मध्य अटलांटिक कटक के पूर्व आईबेरियन के पास 30° से 50° उत्तरी अक्षांश के बीच 5000 मीटर की गहराई तक है।

(v) उत्तरी तथा दक्षिणी कनारी बेसिन- यह दो वृत्ताकार बेसिनों से मिलकर बनी है, जिसका विभाजन उच्च भाग द्वारा होता है।

(vi) केपवर्ड बेसिन- यह मध्य अटलांटिक कटक तथा अफ्रीका के मध्य 10° से 20° उत्तरी अक्षांशों के बीच 5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(vii) गायना बेसिन- यह गायना कटक तथा सियरा लियोन के मध्य उ०-प० से द०-पू० दिशा में 4000-5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(viii) अंगोला बेसिन- अफ्रीका के तट से प्रारम्भ होकर उ०-पू० से द०-प० दिशा में वॉलविस कटक तक 5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(ix) केप बेसिन – 25° से 45° द० अक्षांशों के मध्य अफ्रीका के पश्चिम में स्थित है।

(x) अगुल्हास बेसिन – उत्तमाशा अंतरिप के दक्षिण में 40° से 50° दक्षिणी अक्षांश के मध्य इसका विस्तार अधिक है।

(5) महासागरीय गर्त (Ocean Deeps)

        अटलांटिक महासागर में प्रमुख 19 गर्त पाए जाते हैं। इनमें प्यूर्टोरिको गर्त सबसे गहरा है जिसकी गहराई 4812 फैदम है। प्यूर्टोरिको गर्त उत्तरी अटलांटिक महासागर में कैरेबियन सागर के प्यूर्टोरिको द्वीप के पास स्थित है। अटलांटिक महासागर के तटों के सहारे अभिनव वलन की अनुपस्थिति के कारण गर्त कम पाए जाते हैं। 19 प्रमुख गर्तों में रोमांश गर्त, नरेस गर्त, बाल्डीबिया गर्त, बुचानन, मोसले, चुन, दक्षिणी सैनविच गर्त है।

निष्कर्ष 

       उपर्युक्त तथ्यों के विवरण से स्पष्ट होता है कि अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच में भी अनेक विविधता पूर्ण विशेषताएँ देखने को मिलती है।


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3. Submarine Canyons / अंत: समुद्री कंदरायें/ कैनियन

3. Submarine Canyons / अंत: समुद्री कंदरायें/ कैनियनSubmarine Canyons



Submarine Canyons ⇒

                       स्थल  की भाँति महाद्वीपीय मग्नतट एवं महाद्वीपीय ढाल पर भी सँकरी, गहरी एवं खड़ी दीवाल से युक्त घाटियाँ पाई जाती है। ऐसे ही घाटियों को सागरीय कंदरायें कहते हैं। महासागरीय जल में डूबे होने के कारण इसे अंतः सागरीय कंदरायें कहते हैं।

विशेषताएँ

◆ समुद्री कंदरायें महाद्वीपीय मग्नतट और मग्नढाल पर वहीं मिलती है जहाँ पर बड़ी-बड़ी नदियों के मुहाना पाई जाती है।

◆ अंत: सागरीय कंदराएँ अधिकतर महासागरीय तटीय भागों के सहारे लंबवत रूप से पाए जाते है।

◆ समुद्री कंदराओं के पार्श्व का ढाल बिल्कुल खड़ा होता है इसका का अनुप्रस्थ काट V-आकार की घाटी के समान होता है।

◆ समुद्री कंदरा में ज्यों-ज्यों स्थलीय भाग से गहन सागरीय क्षेत्र की ओर जाते हैं त्यों-त्यों उसकी गहराई एवं ढाल में वृद्धि होती जाती है। सामान्यत: इसकी गहराई 2000 – 3000 फीट तक होता है।

◆ अंत: सागरीय कंदरा के तली में रेत, सिल्का, सिल्ट एवं बजरी जैसे पदार्थों का निक्षेपण पाया जाता है।

◆ निर्माण प्रक्रम के आधार पर अंत: सागरीय कंदराएँ दो प्रकार के होती है –

(i) हिमानी के द्वारा निर्मित कंदरायें

(ii) अन्य प्रक्रम के द्वारा निर्मित कंदरायें

उत्पत्ति

           हिमानी के द्वारा निर्मित कंदराओं को फियोर्ड कहते हैं। फियोर्ड का निर्माण प्रायः महाद्वीपीय एवं पर्वतीय हिमानी के अचानक समुद्र में उतरने के कारण होता है। फियोर्ड को कुछ समुद्रीवेता समुद्री कंदरा के श्रेणी में नहीं रखते। क्योंकि उनका मानना है कि इसका अध्ययन हिमानी के द्वारा निर्मित स्थलाकृति के अंतर्गत किया जाना चाहिए।

            अन्य प्रक्रम से निर्मित कंदराओं की उत्पत्ति के सम्बंध में कई सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं। जैसे :-

(1) पटलविरूपणी या वलन सिद्धान्त (Diastrophic Theory) –

             इस सिद्धांत के अनुसार महाद्वीपीय मग्नतट एवं मग्नढाल पर भूसंचलन की क्रिया के कारण निर्मित वलन या भ्रंशन के कारण समुद्री कंदराओं का निर्माण हुआ है। कैलिफोर्निया और हडसन की खाड़ी के तट पर इसी क्रिया से निर्मित समुद्री कंदरायें मिलती है।

(2) भू-पृष्ठीय अपरदन का सिद्धांत  –

             इसे डाना (1863) और शेफर्ड (1941) ने इस मत को प्रतिपादित किया था। इनके अनुसार स्थल भाग के निमग्न (डूबने) हो जाने के कारण स्थल पर मिलने वाली नदियाँ भी निमग्न हो गई। अंततः उन पर सागरीय जल का फैलाव हो गया। कालांतर में वही नदियाँ अंत: समुद्री कंदरायें कहलाए।

(3) पंक तरंग सिद्धान्त (Turbidity Current Theory) –

             इस मत का प्रतिपादक डेविस, डेली जैसे भूगोलवेत्ता है। इनके अनुसार तट की ओर चलने वाले तीव्र पवनों के कारण तटीय भागों में बड़ी मात्रा में जलराशि एकत्रित हो जाती है जिसमें पंक (कीचड़) मिला होता है। यही पंक जब पुनः समुद्र की ओर लौटती है तो उनके अपरदन से अंतः सागरीय कंदराओं का निर्माण होता है। यही सिद्धांत सर्वाधिक मान्यता रखता है।

वितरण 

             बियर्ड एवं शेफर्ड महोदय ने विश्व के 102 कन्दराओं पर शोध किया और पाया कि कंदराएँ सर्वत्र पाई जाती है। अटलांटिक महासागर में यू.एस.ए. के पूर्वी तट पर चेसापिक कैनियन और कनाडा में हडसन कैनियन प्रमुख है। फ्रांस के दक्षिण पश्चिम तट पर बिस्फे की खाड़ी में केप ब्रिटेन कैनियन, पुर्तगाल के पश्चिमी तट पर नजारे कैनियन, अफ्रीका के पश्चिमी तट पर कांगो कैनियन विश्व प्रसिद्ध है।

             इसी तरह प्रशांत महासागर के तट पर भी कई कैनियन मिलते हैं। जैसे- आलास्का तथा कनाडा के तट पर कोलंबियन कैनियन पाई जाती है।

            हिंद महासागर में गिरने वाली लगभग सभी प्रमुख नदियों के मुहानों पर कैनियन का प्रमाण मिलता है।

निष्कर्ष

        निष्कर्षत: इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से कहा जा सकता है कि अंत: सागरीय कंदराएँ या कैनियन महाद्वीपीय मग्नतट और महाद्वीपीय मग्नढाल पर मिलने वाली एक विशिष्ट सागरीय स्थलाकृति है।


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2. Ocean Bottom Relief / महासागरीय नितल उच्चावच

2. Ocean Bottom Relief 

(महासागरीय नितल उच्चावच)


 महासागरीय नितल उच्चावच⇒

       प्रारंभ में ऐसी मान्यता थी कि महासागरीय सतह तश्तरी के समान होते हैं अर्थात इसके किनारे में ऊँचाई अधिक और बीच में सबसे गहरा क्षेत्र होगा। लेकिन चैलेंजर अभियान (1884,1888) के बीच खोजों से कई चौकाने वाले तथ्य सामने आए। जैसे पूरे धरातल का 70.8 प्रतिशत भूभाग पर समुद्र और शेष 29.2 प्रतिशत भाग पर स्थल का फैलाव है। समुद्र में सबसे गहरा भाग किनारे पर है। विश्व का सबसे लंबा पर्वत श्रृंखला अटलांटिक महासागर में अवस्थित है। वस्तुतः इस अभियान के बाद यह मान्यता विकसित हुई कि पृथ्वी के भूपटल का अध्ययन दो भागों में बांट कर किया जाना चाहिए:-

(1) समुद्री स्थलाकृति

(2) स्थलीय स्थलाकृति

      क्योंकि समुद्री स्थलाकृति में भी वे सभी जटिलताएँ पाई जाती है जो स्थलीय स्थलाकृति में पाई जाती है। जिस प्रकार स्थलीय स्थलाकृति के विकास में भू-संचलन, अपरदन, निक्षेपन जैसे अंतर्जात एवं बहिर्जात बल का प्रभाव पड़ता है। ठीक उसी प्रकार समुद्री भूपटल पर भी पड़ता है। चैलेंजर अभियान के बाद समुद्री वैज्ञानिकों ने सोनार नामक वैज्ञानिक यंत्र का प्रयोग करके समुद्री उच्चावच का निर्धारण करने का प्रयास किया। वर्तमान में यह कार्य कृतिम उपग्रह के माध्यम से किया जा रहा है।

        अधिकतर समुद्री वैज्ञानिकों ने समुद्री उच्चावच का अध्ययन करने हेतु उच्चतादर्शी वक्र (Hypsographic Curve Method)  को महत्वपूर्ण मानते हैं। इस दिशा में कोसीना (1921), Severdrup (1942) का कार्य सबसे महत्वपूर्ण है। Severdrup महोदय ने समुद्री भूपटल के क्षेत्रफल का प्रतिशत के रूप में X-अक्ष पर और ऊँचाई को Y-अक्ष पर लेते हुए उच्चतादर्शी वक्र को खींचा।

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        Severdrup ने अपने अध्ययन में बताया कि समुद्र की औसत ऊँचाई 3800 मीटर और स्थल की औसत ऊँचाई 840 मीटर है। समुद्री उच्चावच का अध्ययन करने हेतु समुद्री भूपटल को छ: प्रमुख समुद्री स्थलाकृति के रूप में विभाजित कर अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल (Continental Slope)

(3) महासागरीय कटक एवं महासागरीय उभार (Oceanic Ridge and Sea Arc)

(4) महासागरीय बेसिन या मैदान (Oceanic Basin)

(5) महासागरीय गर्त (Oceanic Deeps)

(6) अन्य स्थलाकृतियाँ जैसे समुद्री कंदरा, समुद्री पहाड़ी, अवशिष्ट पहाड़ी, प्रवाल भित्ति इत्यादि।

        उपरोक्त स्थलाकृतियों को एक काल्पनिक Hypsographic Curve के द्वारा दिखाया गया है-

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(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelves)

         यह महाद्वीप का ही भाग है जो सागर में डूबा होता है। यह ग्रेनाइट जैसे चट्टान से निर्मित होता है। यहाँ सागर छिछला होता है। इसका निर्माण धँसान या उत्थान से या अपरदन क्रिया से संभव होता है। डेली जैसे समुद्रीवेता के अनुसार “प्लीस्टोसीन कल्प में हिमानीयुग के अंत होने के बाद समुद्र के सतह में 150m का उत्थान हुआ।” इसका तात्पर्य है कि प्लीस्टोसीन काल तक महाद्वीपीय मग्नतट स्थलखंड के ही प्रत्यक्ष भूभाग थे। इसका ढाल समुद्र की ओर होता है। इसका औसत ढाल 1°/ Km या 17 फीट/मील बताया जाता है। संपूर्ण समुद्री क्षेत्रफल का 8.6 प्रतिशत भाग महाद्वीपीय मग्नतट के अंतर्गत आता है।

   महाद्वीपीय मग्नतट का वितरण अत्यंत ही असमान है। इसका सर्वाधिक विस्तार उत्तरी अटलांटिक महासागर में हुआ है। यहाँ इसका विस्तार हडसन की खाड़ी से लेकर नार्वेजियन सागर तक लगभग लगातार हुआ है। इसका प्रमुख कारण इस प्रदेश में समुद्री प्लेटफार्म का अवस्थित होना है। ये प्लेटफॉर्म प्लीस्टोसीन युग में हिमानी के पिघलने के बाद बढ़े हुए समुद्री जलस्तर के अपरदन से निर्मित हुआ है।

    अटलांटिक महासागर के दक्षिणी भाग में सर्वाधिक सँकरे मग्नतट मिलते हैं। विश्व का सबसे सँकरा महाद्वीपीय मग्नतट अफ्रीका महाद्वीप में नामीबिया के अंगोला तट के मध्य मिलता है (चौ० 10 से 15 मीटर)। पुनः ब्राजील के तट, ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट, अफ्रीका के पूर्वी तट सँकरे महाद्वीपीय मगनतट का निर्माण करते हैं। इसका प्रमुख कारण भू-भ्रंश क्रिया है। ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी एवं दक्षिणी भाग और उत्तरी भाग में मग्नतट चौड़ा है। इसका प्रमुख कारण निक्षेपन का कार्य बताया जाता है। दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट या एंडीज तट सँकरे है। इसी तरह उत्तरी अमेरिका का प्रशांत तट सँकरा है। इसका प्रमुख कारण दो प्लेटो का प्रत्यावर्तन (टकराना) है। अधिकतर छिछले सागर में महाद्वीपीय मग्नतट काफी चौड़ा हैं। इसका प्रमुख कारण अपरदन को बताया जाता है। यूरोप का उत्तरी सागर एक छिछला सागर है। यही कारण है कि उस सागर में विश्व के बड़े-बड़े मछलियों के बैंक अवस्थित है। जैसे- डागर बैंक

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल (Continental Slope)

      यह महाद्वीपीय मग्नतट का अग्र भाग है। यह तीव्र ढाल का क्षेत्र है। यह ग्रेनाइट से निर्मित होता है। इसे महाद्वीपों का अंतिम किनारा माना जाता है। इसमें बेसाल्ट से निर्मित चट्टानें मिलने लगती है। औसतन 200 से 300 मीटर की गहराई तक महाद्वीपीय मग्नढाल मिलते हैं लेकिन चिली और पेरू का तट इसका अपवाद है। यहाँ पर महाद्वीपीय मग्नढाल 3700 मीटर की गहराई तक मिलते हैं। महासागरीय क्षेत्रफल का 8.5 प्रतिशत भूभाग इसके अंतर्गत आता है। इसका औसत ढाल 2° से 4.2°/Km होता है। ढालों का निर्माण धँसान क्रिया या प्लेटों के प्रत्यावर्तन से हुआ है। अफ्रीका के किनारे तथा उत्तरी अमेरिका एवं दक्षिण अमरिका के पश्चिमी तट पर प्रत्यावर्तन क्रिया के कारण ही ढाल तीव्र पाए जाते हैं। 

(3) महासागरीय कटक एवं महासागरीय उभार (Oceanic Ridge and Sea Arc)

          यह एक ऐसी स्थलाकृति है जिसकी ऊँचाई समुद्री भूपटल से समुद्र तल तक या उससे नीचे भी हो सकता है। यह एक पहाड़ीनुमा स्थलाकृति है जिसमें चोटियाँ पाई जाती है और पार्श्व का ढाल तीव्र होता है। संरचना के दृष्टिकोण से रेखीय होते हैं। इसमें बेसाल्टिक चट्टानों की प्रधानता होती है। महासागरीय कटक का निर्माण प्लेटों के अपसरण सीमा के सहारे हुआ है। अपसरण सीमा के सहारे प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती है और दरार का निर्माण करती है। इन दरारों से ही मैग्मा पदार्थ मैग्मा चैंबर से बाहर आकर शीतल होती है और कटकों का निर्माण करती है।

       विश्व का सबसे लंबा समुद्री कटक अटलांटिक महासागर में स्थित है जिसकी लंबाई 14400 किलोमीटर है जिसका आकार अंग्रेजी अक्षर ‘S’ के समान है। इसका विस्तार उत्तर में आइसलैंड से लेकर दक्षिण में अंटार्कटिका तक हुआ है। यह पृथ्वी पर का सबसे लंबा पर्वत श्रृंखला के रूप में जाना जाता है। इसकी औसत ऊँचाई 2000 से 4000 मीटर तक है। कई स्थानों पर समुद्र से बाहर आकर छोटे-छोटे द्वीपों का निर्माण किया है। इसे उत्तरी अटलांटिक महासागर में विविल थॉमसन कटक और डॉल्फिन कटक कहते हैं जबकि दक्षिणी अटलांटिक में विषुवत रेखा के पास चैलेंजर कटक कहते हैं।

       हिंद महासागर में भी कई समुद्री कटक मिलते हैं जिसकी लंबाई 9000 किलोमीटर है जिसका विस्तार लक्षद्वीप से लेकर अंटार्कटिका तक है। इसका औसत ऊंचाई 2000 मीटर है। इसी कटक पर मालद्वीप, सेल्सेस, मॉरीशस जैसे द्वीप स्थित है। इसके कई स्थानीय नाम है। जैसे- लक्का द्वीप चैगोस, सेंटपॉल चैगोस, एमस्टरडम सेंटपॉल कटक, करगुएलेन गॉसबर्ग कटक।

      प्रशांत महासागर में भी कई कटक मिलते हैं। जैसे- लॉर्डहोवे कटक, टुआमाई कटक, एलबेडरॉस कटक, कोकस कटक, हवाईयन कटक इत्यादि के नाम से प्रसिद्ध है।

(4) महासागरीय बेसिन या मैदान (Oceanic Basin)

       समुद्र के अंदर मिलने वाले सपाट मैदान को महासागरीय बेसिक या गहन सागरीय मैदान कहते हैं। सेवरडरूप ने बताया कि महासागरीय कटक के दोनों ओर महासागरीय मैदान का निर्माण हुआ है। यह मैदान 3000 से 6000 मीटर की गहराई में मिलते हैं। हैरिहेस महोदय ने इसकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण महासागरीय नितल प्रसार को बताया है।

       विश्व के सभी प्रमुख महासागर में महासागरीय मैदानों का प्रमाण मिलता है। जैसे अटलांटिक महासागर में अटलांटिक कटक के पश्चिमी भाग में चार गहन सागरीय मैदान मिलते हैं। जैसे- लैब्राडोर का मैदान, उत्तरी अमेरिकी बेसिन, ब्राजीलियन बेसिन, अर्जेंटीना बेसिन तथा अटलांटिक कटक के पूर्वी भाग में कुल सात मैदान मिलते हैं। जैसे – स्पेनिश मैदान, केपवर्डे मैदान, केनारी मैदान, गिनी मैदान, अंगोला मैदान, केप बेसिन, अगुल्हास बेसिन मिलते हैं।

      इसी तरह हिंद महासागर में ओमान बेसिन, अरब बेसिन, सोमाली बेसिन, मॉरीशस बेसिन, अंडमान बेसिन, अंटार्कटिक बेसिन, जैसे गहन सागरीय मैदान मिलते हैं।

     इसी तरह प्रशांत महासागर में कैलिफोर्निया के तट पर उत्तरी-पूर्वी बेसिन, जापान के तट पर उत्तरी-पश्चिमी बेसिन, पेरू एवं चिली के तट पर दक्षिण-पूर्वी प्रशांत बेसिन और आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत बेसिन मिलते हैं।

(5) महासागरीय गर्त (Oceanic Deeps)

        महासागरीय या समुद्री गर्त समुद्र का सबसे गहरा भाग होता है। इसकी औसत गहराई 6000 मीटर से अधिक होता है। यह एक रेखीय एवं सँकरी संरचना वाली आकृति है। इसके किनारे का ढाल काफी तीव्र होता है। इसकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण प्लेटों का प्रत्यावर्तन है। कुल समुद्री क्षेत्रफल का 7% भाग इसके अंतर्गत आता है।

    विश्व में प्रमुख 57 समुद्री गर्त है। विश्व का सबसे गहरा समुद्री गर्त मेरियाना गर्त (11.02 Km) है जो फिलीपींस द्वीप के पूर्वी भाग में अवस्थित है। विश्व का दूसरा सबसे गहरा गर्त टोंगा गर्त (5022 फैडम) जो दक्षिण प्रशांत महासागर में अवस्थित है। प्रशांत महासागर में प्रमुख 57 गर्तों में 32 गर्त और अटलांटिक महासागर में 19 गर्त तथा हिंद महासागर में 6 गर्त पाए जाते हैं।

   अटलांटिक महासागर का सबसे गहरा गर्त प्यूर्टोरिको गर्त है जबकि हिंद महासागर का सबसे गहरा गर्त सुंडा गर्त है। प्यूर्टोरिको गर्त उत्तरी अटलांटिक महासागर में कैरीबियन सागर के प्यूर्टोरिको द्वीप के पास स्थित है जिसकी औसत गहराई 4622 फैदम है। सुंडा गर्त इंडोनेशिया में सुमात्रा एवं जावा के मध्यवर्ती भाग में अवस्थित है जिसका औसत गहराई 3826 फैदम है।

(6) अन्य स्थलाकृतियाँ जैसे समुद्री कंदरा, समुद्री पहाड़ी, अवशिष्ट पहाड़ी, प्रवाल भित्ति इत्यादि

     समुद्री भूपटल पर कई स्थालाकृतियाँ भी मिलते हैं। जैसे- चूना पत्थर से युक्त जीव-जंतुओं के निक्षेप से प्रवाल भित्तियों का प्रमाण मिलता है। ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी-पूर्वी भाग में विश्व का सबसे लंबा प्रवाल भित्ति ग्रेट बैरियर रीफ मिलता है।   

        अन्य समुद्री स्थलाकृतियों में समुद्री कंदरा का विशेष स्थान प्राप्त है। यह ‘V’ आकृति का होता है। इसका निर्माण समुद्री तरंगों के अपरदन से महाद्वीपीय मग्नढाल पर होता है।

    समुद्री पहाड़ी (Sea Mount) तथा ग्योट दो विशिष्ट प्रकार के समुद्री स्थलाकृति है। सी माउंट का आकार गुंबदाकार पहाड़ी के समान होता है। जब सी माउंट का ऊपरी भाग टूटकर या अपरदित होकर सपाट हो जाता तो उसे ग्योट कहते हैं।

निष्कर्ष

   इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि महासागरीय भूपटल भी महाद्वीपीय भूपटल के समान काफी जटिल संरचनाओं वाली भूपटल है।


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1. Change in Sea Level / समुद्र तल में परिवर्तन

1. Change in Sea Level 

(समुद्र तल में परिवर्तन)


Change in Sea Level / समुद्र तल में परिवर्तन⇒Change in Sea Level

        समुद्री जल का तल (S.L.) समुद्री वातावरण का एक गत्यात्मक पहलू है। यद्यपि पृथ्वी तंत्र के कुल जल की मात्रा निश्चित है। लेकिन समय-समय पर जल के अवस्था में परिवर्तन के कारण समुद्र तल में भी परिवर्तन होता है। समुद्र तल का परिवर्तन कई कारकों का परिणाम है। जैसे-

◆ हिमयुग के आगमन से समुद्र तल में गिरावट आती है और जब हिमयुग की समाप्ति होती है तथा वातावरण का तापमान अधिक हो जाता है तो स्थलीय हिम पिघलकर समुद्र में आ जाते हैं और जल स्तर ऊँचा हो जाता है।

भूगर्भिक प्रक्रियाएँ भी समुद्र के जलस्तर में परिवर्तन लाते हैं। जैसे अगर भूगर्भिक हलचल के कारण समुद्री नितल का धँसान होता है तो जल स्तर गिरती है और जब उत्थान होता है तो जलस्तर बढ़ती है। जैसे- कई स्थलीय भूभागों पर समुद्री जीवाश्म के प्रमाण मिलते हैं जो यह बताता है कि कभी वहाँ पर समुद्री जल रहा होगा और जब वहाँ समुद्र रहा होगा तो निश्चित रूप से एक समुद्री जलस्तर भी रहा होगा। जब उस भू-भाग का उत्थान हो जाता है तो समुद्र का जलस्तर ऊपर की ओर खिसक जाता है लेकिन यह एक सापेक्षिक घटना है।

नोट : अगर समुद्र नितल का धँसान होता है तो जलस्तर नीचे चली जाती है और जब समुद्र नितल का उत्थान होता है तो समुद्र जलस्तर बढ़ जाता है।

विभिन्न जलवायु विज्ञान एवं समुद्री विज्ञान के वैज्ञानिकों ने समुद्र तल में होने वाले परिवर्तन को गत्यात्मक मानते हुए यह माना है कि समुद्र तल में परिवर्तन जल के आयतन में बढ़ोतरी या कमी से होती है।

         उपरोक्त तीनों कारकों में से प्रथम कारक है समुद्र तल परिवर्तन के लिए सबसे उत्तरदायी कारक है।

         विभिन्न अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि समुद्र तल में 110 से 140 मीटर तक परिवर्तन हुआ है। प्रायः सभी हिम युग में समुद्र का तल 100 से 150 मीटर के बीच नीचे चले गए थे। प्लीस्टोसीन के अंतिम हिमानी युग के अंत में समुद्र का तल वर्तमान तल से 110 मीटर नीचे पहुँच गया था। फेयरब्रिज के अनुसारमुद्रतल में सतत सूक्ष्म परिवर्तन होते रहते हैं।” लेकिन 1800 ई० के बाद में इसमें काफी स्थिरता आई है। हालाकि औद्योगिक क्रांति के बढ़ते प्रभाव के कारण 1970 के दशक से वातावरण में तापमान के बढ़ोतरी से समुद्र तल में भी बढ़ोतरी होने लगी है। सामान्य नियम के अनुसार 1℃ वायुमंडलीय तापमान के बढ़ने से 0.55 mm समुद्री तल में वृद्धि होती है। “विश्व जलवायु विज्ञान संस्था” के अनुसार 1985 से 1997 के बीच औसत तापमान में बढ़ोतरी 0.37℃ हुआ है।

परिणाम
        अनेक पारिस्थैतिक वैज्ञानिकों के अनुसार 2030 ई० तक समुद्रतल में 3 मीटर तक वृद्धि हो सकती है। ऐसी स्थिति में विश्व के कई द्वीपीय देश पूर्णत: जलमग्न हो सकते हैं। मालदीप तथा दक्षिणी प्रशांत महासागर के कई द्वीप समुद्र में डूब जाएँगे। कई तटीय महासागर जैसे मुंबई, न्यूयार्क, टोकियों, मैक्सिको सिटी, रियो डे जेनेरियो पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। कई प्रवाल भित्ति जलमग्न हो जाएंगे। अधिक समुद्री तल के परिवर्तन से जलवायु पर भी विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है। नदियों के मुहाने पर समुद्री ज्वार के कारण बाढ़ का प्रभाव बढ़ जाएगा। कई तटीय मैंग्रोव या ज्वारीय वनस्पति विलुप्त हो जाएंगे। केवल बांग्लादेश में ही 1.5 करोड़ जनसंख्या को विस्थापित होना पड़ेगा। अर्थात समुद्रतल में हो रहे परिवर्तन का विनाशकारी प्रभाव अवश्य संभावी है। 

उपाय

         भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने ग्लोबल वार्मिंग और समुद्र तल में हो रहे बढ़ोतरी का अध्ययन करवाया है। इन दोनों के बीच पाए जाने वाले सह संबंध को देखते हुए एक आपातकालीन योजना बनाने का निर्णय लिया है। इस योजना के तहत लगभग एक करोड़ आबादी को तटीय क्षेत्र से विस्थापित कर सुरक्षित स्थान पर बसाने का कार्य किया जा रहा है। इसी तरह विश्व के कई देश ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, समुद्र तल में हो रहे परिवर्तन पर नजर टिकाए हुए हैं। समुद्र तल में परिवर्तन न  हो इसके लिए कई देशों ने शिखर बैठक कर पृथ्वी सम्मेलन के दस्तावेज पर, क्योटो प्रोटोकॉल पर, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर अपना सहमति व्यक्त किया है ताकि एक ओर वायुमंडल को गर्म होने से बचाया जाय वहीं दूसरी ओर समुद्री तल में हो रहे परिवर्तन को भी रोक जाय।


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1. थार्नथ्वेट का जलवायु वर्गीकरण / Climatic Classification Of Thornthwaite

 1. थार्नथ्वेट का जलवायु वर्गीकरण

(Climatic Classification Of Thornthwaite)


थार्नथ्वेट का जलवायु वर्गीकरण ⇒

थार्नथ्वेट का जलवायु वर्

         थार्नथ्वेट एक अमेरिकी मौसम वैज्ञानिक थे जिन्होंने कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की आलोचना करते हुए एक वैकल्पिक जलवायु वर्गीकरण की योजना प्रस्तुत की। वर्तमान समय में कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की तुलना में थार्नथ्वेट के वर्गीकरण को अधिक मान्यता प्राप्त है। थार्नथ्वेट ने अपना जलवायु वर्गीकरण अनुसंधान प्रपत्रों के माध्यम से (1931, 1948) प्रस्तुत किया। लेकिन सर्वाधिक मान्यता 1948 में प्रस्तुत जलवायु वर्गीकरण की योजना महत्त्व रखता है। 1948 ई० में प्रस्तुत योजना “ज्योग्राफिकल रिव्यू” नामक पत्रिका में “An approach towards a rational classification of climate” नामक शीर्षक से प्रस्तुत किया।

जलवायु वर्गीकरण का आधार

        थार्नथ्वेट ने अपना जलवायु वर्गीकरण हेतु वनस्पति, तापमान और वर्षा को आधार बनाया। थार्नथ्वेट के अनुसार वनस्पति जलवायु का वायुदाब (बैरोमीटर) मापक यंत्र होता है। अर्थात वनस्पति की विशेषता को जानने के लिए तापमान एवं वर्षा के उन गुणों को जानना आवश्यक है जो वनस्पति के विकास, उनके प्रकार एवं विशेषताओं को निर्धारित करता है।

          थॉर्नथ्वेट ने कहा है कि जलवायु वर्गीकरण हेतु जलवायु के कार्यिक (Functional) अध्ययन आवश्यक है। क्योंकि वर्षा और तापमान की संपूर्ण मात्रा वनस्पतियों के विशेषताओं के निर्धारक नहीं होते है। अतः जलवायु के कार्यिक अध्ययन तापमान एवं वर्षा के प्रभावोत्पादकता के आधार पर किया जाना चाहिए। वर्षा एवं तापमान की प्रभावोत्पादकता को जानने के लिए वाष्पोत्सर्जन का अध्ययन आवश्यक है। अतः यह कहा जा सकता है कि थॉर्नथ्वेट के अनुसार जलवायु का मुख्य आधार वाष्पोत्सर्जन की क्रिया है न कि प्रत्यक्षता वनस्पति, वर्षा और तापमान है।

         वाष्पोत्सर्जन एक जटिल प्रक्रिया है। यह मृदा के नमी और भूमिगत जल स्तर के द्वारा निर्धारित होता है। दूसरी ओर वाष्पोत्सर्जन क्रिया भी मृदा के नमी, भूमिगत जल स्तर, वनस्पति और कृषि को भी निर्धारित करता है। थॉर्नथ्वेट महोदय ने वाष्पोत्सर्जन से सम्बंधित ऐसे चार कसौटियों का पहचान किया है जो जलवायु के निर्धारण में सहायक है। ये चारों कसौटियाँ निम्न प्रकार से है-

(i) नमी /आर्द्रता पर्याप्तता

(ii) तापीय दक्षता

(iii) नमी पर्याप्तता में मौसमी विषमता

(iv) तापीय दक्षता का ग्रीष्म ऋतु में केंद्रीयकरण

         ऊपर के चारों कसौटियों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि तीसरा कसौटी पहला से और चौथा कसौटी दूसरा से संबंधित है। थॉर्नथ्वेट ने यह भी बताया कि प्रथम दो कसौटी वार्षिक परिस्थितियों को बताता है जबकि अंतिम दो कसौटी मौसमी एवं मासिक परिस्थितियों को बताता है।

जलवायु वर्गीकरण की प्रणाली एवं योजना

        थॉर्नथ्वेट महोदय उपरोक्त चारों कसौटियों को आधार मानकर अपना जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया। इन्होंने अपने वर्गीकरण में सांख्यिकी विधियों का प्रयोग कर इसे अधिक वैज्ञानिक स्वरूप देने का प्रयास किया। इन्होंने ने भी जलवायु वर्गीकरण में कोपेन की भाँति सांकेतिक अक्षरों का प्रयोग किया लेकिन कोपेन के सांकेतिक अक्षर जलवायु के प्रत्यक्ष विशेषता को प्रकट करता है जबकि थॉर्नथ्वेट के संकेतिक अक्षर जलवायु के अप्रत्यक्ष गुणों को स्पष्ट करता है।

         थॉर्नथ्वेट ने जलवायु वर्गीकरण हेतु “संभावित वाष्पोत्सर्जन सूचक” को विकसित किया। इसका परिष्कृत मान cm से होगा। थॉर्नथ्वेट ने संभावित वाष्पोत्सर्जन इसलिए ज्ञात करने का प्रयास किया  क्योंकि वाष्पोत्सर्जन का वास्तविक मान कभी भी ज्ञात नहीं किया जा सकता। उन्होंने संभावित वाष्पोतर्जन निकालने के लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया है। जैसे-

PE=1.6 (10 t/i)a cm.

जहाँ

PE = संभावित वाष्पोत्सर्जन

t = डिग्री सेंटीग्रेड में वार्षिक औसत तापमान

i = प्रत्येक महीने के तापमान के योग का 1/5वाँ भाग

a = यह नियतांक है जिसका मान 1.514 होगा।

        संभावित वाष्पोत्सर्जन सूचकांक की मदद से उन्होंने नमी पर्याप्तता सूचक विकसित किया ताकि पूरे पृथ्वी पर “आर्द्रता प्रदेश” का निर्धारण किया जा सके। थॉर्नथ्वेट के अनुसार प्रत्येक आर्द्रता प्रदेश से एक विशिष्ट जलवायु का सूचक होगा। आर्द्रता प्रदेश के निर्धारण हेतु उन्होंने नमी पर्याप्तता सूचक निम्नलिखित सूत्र के माध्यम से ज्ञात किया है:-

Im= 100 P/PE-1

जहाँ :-

Im = नमी पर्याप्तता सूचक

P = वार्षिक वर्षा cm में

PE = संभावित वाष्पोत्सर्जन

      नमी पर्याप्तता सूचकांक के मदद से विश्व को उन्होंने 9 आर्द्रता प्रदेश या उपजलवायु क्षेत्र  में बाँटा:-

क्रम संकेत आर्द्रता प्रदेश या

उपजलवायु क्षेत्र

Im का मान (आर्द्रता सूचकांक)
1. A अति आर्द्र जलवायु 100 तथा उससे अधिक
2. B4 आर्द्र जलवायु आर्द्र जलवायु 80-100
3. B3 आर्द्र जलवायु 60-80
4. B2 आर्द्र जलवायु 40-60
5. B1 आर्द्र जलवायु 20-40
6. C2 नमी युक्त उपार्द्र जलवायु 0-20
7. C1 शुष्क उपार्द्र जलवायु -33.3 से 0
8. D अर्द्ध मरुस्थलीय जलवायु -66.7 से -33.3
9. E मरुस्थलीय जलवायु -100 से -66.7
              
        थॉर्नथ्वेट ने दूसरी कसौटी अर्थात तापीय दक्षता के आधार पर जलवायु प्रदेशों को उप जलवायु प्रदेशों में बाँटा। तापीय दक्षता का भी निर्धारण संभावित वाष्पोत्सर्जन सूचकांक के आधार पर उन्होंने किया था। उन्होंने तापीय दक्षता के आधार पर विश्व जलवायु को 9 प्रदेश या उप जलवायु प्रदेश में बाँटा:-
क्रम संकेत

तापीय दक्षता प्रदेश

या उप जलवायु क्षेत्र

PE का मान
1. A’ अति गर्म / उष्ण जलवायु 114 तथा उससे अधिक
2. B’4 गर्म जलवायु 99.7 से 114
3. B’3 गर्म जलवायु 85.5 से 99.7
4. B’2 गर्म जलवायु 71.2 से 85.5
5. B’1 गर्म जलवायु 57.0 से 71.2
6. C’2 न्यून उष्ण जलवायु 42.7 से 57.0
7. C’1 न्यून उष्ण जलवायु 28.5 से 42.7
8. D’ टुन्ड्रा जलवायु 14.2 से 28.5
9. E’ हिमाच्छादित जलवायु 14.2 से कम

          थॉर्नथ्वेट महोदय ने यह भी बताया है कि वार्षिक वर्षा और वार्षिक तापमान किसी भी जलवायु प्रदेश के अंदर पाई जाने वाली मौसमी विशेषता को स्पष्ट नहीं करता है। इसलिए थॉर्नथ्वेट महोदय ने आर्द्रता प्रधान वाले जलवायु क्षेत्र के लिए शुष्कता सूचक और शुष्क जलवायु प्रदेश के लिए आर्द्रता सूचक विकसित किया है।

       शुष्कता सूचक A से लेकर C2 तक के लिए और आर्द्रत सूचक C1 से लेकर E तक लागू होता है। थॉर्नथ्वेट ने ऐसा करने के पीछे तर्क यह दिया कि A से लेकर C2 तक वाले जलवायु क्षेत्र में नमी की कमी नहीं होती है। लेकिन कुछ ऐसे महीने हो सकते हैं जो शुष्क हो। इसी तरह C1 से लेकर E तक वाले जलवायु क्षेत्र में कुछ महीने ऐसे हो सकते हैं। जहाँ हल्की वर्षा या आकस्मिक वर्षा के कारण ही उपलब्ध हो जाती हो।  इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर उन्होंने मौसमी विभिन्नता को स्पष्ट करने हेतु तीसरे चरण का उपयोग किया। जैसे:-

A से C2 के लिए शुष्कता सूचक तालिका

क्रम सांकेतिक अक्षर  आर्द्रता का स्तर  शुष्कता सूचक 
1. r आर्द्रता की कमी कभी नहीं  0-10
2. s ग्रीष्म ऋतु में आर्द्रता की सामान्य कमी  10-20
3. w जाड़े की ऋतु में आर्द्रता में सामान्य कमी  10-20
4. s2 ग्रीष्म ऋतु में आर्द्रता में भारी कमी  20 से अधिक 
5. w2 जाड़े की ऋतु में आर्द्रता की भारी कमी  20 से अधिक 
C1 से लेकर E तक के लिए आर्द्रता सूचक तालिका 
क्रम  सांकेतिक अक्षर  शुष्कता का स्तर  आर्द्रता सूचक 
6. d किसी भी महीने में आर्द्रता की कमी नहीं  0-16.7
7. s जाड़े की ऋतु में अतिरिक्त  16.7-33.3
8. w ग्रीष्म ऋतु में अतिरिक्त आर्द्रता  16.7-33.3
9. s2 जाड़े की ऋतु में बहुत अधिक आर्द्रता  33.3 से अधिक 
10. w2 ग्रीष्म ऋतु में बहुत अधिक आर्द्रता  33.3 से अधिक 
                 
        थॉर्नथ्वेट महोदय ने यह भी बताया है कि औसत तापीय दक्षता का सर्वाधिक प्रभाव ग्रीष्म ऋतु में होता है अर्थात चौथे कसौटी के आधार पर थॉर्नथ्वेट ने कहा है कि तापीय दक्षता को केंद्रीयकरण ग्रीष्म ऋतु में होता है। अतः तापीय दक्षता का मापन थॉर्नथ्वेट ने प्रतिशतता के रूप में व्यक्त करते हुए एक और तालिका का विकास किया है जो ग्रीष्म ऋतु में तापीय दक्षता के केंद्रीयकरण को स्पष्ट करता है। 
क्रम  सांकेतिक अक्षर  गर्मी ऋतू में कुल तापीय दक्षता का प्रतिशत 
1. a’ 48% से कम 
2. b’4 48 – 51.9
3. b’3 51.9 – 56.3
4. b’2 56.6 – 61.6
5. b’1 61.6 – 68 
6. C’2 68 – 76.3
7. C’1 76.3 – 88
8. d’ 88 से अधिक 
               
     थॉर्नथ्वेट ने उपरोक्त चारों को कसौटियों के आधार पर विश्व की जलवायु को वर्गीकृत किया है। प्रथम दो कसौटियों के आधार पर उन्होंने आर्द्रता प्रदेश और तापीय दक्षता प्रदेश का निर्धारण किया। प्रथम और द्वितीय तालिका से स्पष्ट है कि पूरे विश्व को 9 आर्द्रता प्रदेश और 9 तापीय दक्षता प्रदेश में वर्गीकृत है। पुनः अंतिम दो कसौटियों के आधार पर सूक्ष्म स्तर पर जलवायु क्षेत्रों का विश्लेषण करने का प्रयास किया है। थॉर्नथ्वेट ने बताया है कि उपरोक्त चारों कसौटियों के आधार पर पूरे विश्व को 120 जलवायु क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है। लेकिन सभी का वर्णन करना संभव नहीं है। इसे कुछ उदाहरण से ही स्पष्ट किया जा सकता है। जैसे :-

(1) C1B’1da’ – भूमध्यसागरीय जलवायु या सन फ्रांसिस्को प्रकार की जलवायु

(2) C2C’2rb’1 – महाद्वीपीय या मास्को प्रकार की जलवायु

(3) EA’da’ – आंतरिक उष्ण मरुस्थलीय जलवायु या एलिस स्प्रिंग प्रकार की जलवायु

आलोचना

वर्षा और तापमान के द्वारा उत्पन्न प्रभावो-उत्पादकता का सही मूल्यांकन संभव नहीं हैं। थॉर्नथ्वेट महोदय ने इस तथ्य को स्वीकार करते हुए संभावित वाष्पोत्सर्जन शब्द का उपयोग किया है जिससे स्पष्ट होता है कि इनका भी वर्गीकरण अनुमानों पर आधारित है।

◆ यह एक जटिल वर्गीकरण की योजना है जिसमें कई सांख्यिकीय विधियों तथा तालिकाओं का प्रयोग किया गया है।

◆ ट्रीवार्था महोदय ने इनका आलोचना करते हुए कहा है कि थॉर्नथ्वेट ने अपने वर्गीकरण में उच्चावच का कोई महत्व नहीं दिया है।

◆ थॉर्नथ्वेट द्वारा प्रस्तावित जलवायु वर्गीकरण की योजना के आधार पर जलवायु क्षेत्र का निर्धारण तभी संभव है जब अति लघु सर पर आँकड़े उपलब्ध हो।

◆ थॉर्नथ्वेट में तापमान एवं वर्षा को अधिक महत्व नहीं दिया है। लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकतर फसलों के चयन में वर्षा एवं तापमान को अधिक महत्व दिया जाता है।

निष्कर्ष

       ऊपर वर्णित खामियों के बावजूद थॉर्नथ्वेट की योजना सर्वाधिक विश्वसनीय योजना मानी जाती है क्योंकि इस योजना के मदद से भूमिगत जल स्तर का निर्धारण, जल प्रबंधन और वानिकी जैसे कार्यों को नई दिशा प्रदान की जा सकती है। 1949 ई० में यूएसए के नवीन कृषि नीति में थॉर्नथ्वेट के जलवायु वर्गीकरण को विशेष महत्त्व दिया गया था। अतः इससे स्पष्ट होता है कि इनका जलवायु वर्गीकरण की विश्वसनीयता बरकरार है।

♦उत्तर लिखने का दूसरा सरल तरीका♦….

       सी. डब्ल्यू. थार्नथ्वेट नामक अमेरिकन जलवायु विज्ञानी ने अपने जलवायु वर्गीकरण की रूपरेखा को 1931 में प्रस्तुत किया। यह वर्गीकरण उत्तरी अमेरिका को आधार बनाकर प्रस्तुत किया गया था। 1933 में इन्होंने इसी वर्गीकरण को आधार बनाकर सम्पूर्ण विश्व को विभिन्न प्रकार के जलवायु प्रदेशों में विभक्त किया। थार्नथ्वेट का वर्गीकरण भी कोपेन के वर्गीकरण से साम्यता रखता है, क्योंकि

(i) कोपेन की भांति थार्नथ्वेट ने भी जलवायु प्रदेशों का सीमांकन मात्रात्मक विधि से किया।

(ii) यह वर्गीकरण भी वनस्पति पर आधारित है।

(iii) विभिन्न जलवायु प्रकारों को कोपेन की भांति ही अक्षरों के संयोगों द्वारा प्रदर्शित किया गया है।

1931 में प्रस्तुत जलवायु वर्गीकरण

        कोपेन की भांति थार्नथ्वेट का भी यह मानना था कि वनस्पति जलवायु की सूचक होती है तथा वनस्पति वर्षा की मात्रा, तापमान एवं वाष्पीकरण से प्रभावित होती है। थार्नध्वेट ने आंकड़ों की सहायता से वर्षण-वाष्पीकरण सूचक तैयार कर आर्द्रता प्रदेशों (Humidity Provinces) का निर्धारण किया। ये ही आर्द्रता प्रदेश उसके जलवायु वर्गीकरण में प्रथम क्रम के जलवायु प्रदेश बने।

       1931 में थार्नथ्वेट द्वारा प्रस्तुत जलवायु वर्गीकरण वर्षण प्रभाविता (Rainfall Effectiveness) और तापीय दक्षता (Temperature Efficiency) पर आधारित था । वर्षण प्रभावित अनुपात (Ratio) या P/E Ratio ज्ञात करने के लिए कुल मासिक वर्षा को कुल मासिक वाष्पीकरण से विभाजित कर देते हैं तथा 12 महीनों के वर्षण प्रभाविता अनुपात (P/E Ratio) का योग करके वर्षण प्रभाविता सूचक (P/E Index) प्राप्त किया जाता है।

P/E Ratio वर्षण प्रभाविता अनुपात = 11.5 (P/T- 10) 10/9

P = औसत मासिक वर्षण (इंचों में)

T = औसत मासिक तापमान (डिग्री फारेनहाइट में)

        इस सूत्र की सहायता से थार्नथ्वेट ने विश्व को 5 आर्द्रता प्रदेशों में बांटा जिनके बीच की सीमाएं संख्यात्मक रूप से ज्ञात की गईं। ये पांच आर्द्रता प्रदेश विश्व के पांच बड़े वानस्पतिक प्रदेशों यथा वर्षा प्रचुर वन (Rain Forest), वन (Forest), घास के मैदान (Grass land), स्टेपी (Steppe) और मरुस्थल (Desert) से सम्बन्धित है।

        P/E सूचक की भांति ही थार्नथ्वेट ने तापमान दक्षता सूचक (T/ E Ratio) का परिकलन (T – 32) / 4 सूत्र की सहायता से किया। इस सूत्र में T = औसत मासिक तापमान डिग्री फारेनहाइट में है।

        P/E सूचक और T/E सूचक तथा वर्षण के मौसमी वितरण के आधा पर थार्नथ्वेट ने विश्व को 32 जलवायु प्रकारों में विभाजित किया।

आर्द्रता और तापमान पर आधारित जलवायु प्रदेश तथा वर्षण का मौसमी वितरण

आर्द्रता पर आधारित जलवायु प्रदेश

अक्षर/संकेत आर्द्रता प्रदेश वनस्पति का प्रकार वर्षण प्रभाविता सूचकांक
A अत्यधिक आर्द्र वर्षा प्रचुर वन  128 से अधिक 
B आर्द्र वन 64-127
C उपआर्द्र  घास का मैदान 32-63
D अर्द्ध शुष्क  स्टेपी 16-31
E शुष्क मरुस्थल  16 से कम

तापमान पर आधारित जलवायु प्रदेश

अक्षर/संकेत तापमान प्रदेश तापीय दक्षता सूचकांक
A’ उष्णकटिबन्धीय 128 एवं अधिक
B’ समशीतोष्ण कटिबन्ध 64-127
C’ शीतोष्ण कटिबन्ध 32-63
D’ टैगा 16-31
E’ टुन्ड्रा 1-15
F’ हिमाच्छादित 0

वर्षण का मौसमी वितरण

r = सभी ऋतुओं में प्रचुर वर्षा

s = ग्रीष्म में वर्षा की कमी

w = ऋतु शीत ऋतु में वर्षा की कमी

d = सभी ऋतुओं में वर्षा की कमी

थार्नथ्वेट का विश्व का 32 जलवायु प्रकार

AA’r BA’r. CA’r DA’w EA’d D’   E’  F’
AB’r BA’w CA’w DA’d EB’d
AC’r BB’r CA’d DB’w EC’d
BB’w CB’r DB’s
BB’s CB’w DB’d
BC’s CC’r
BC’r CB’d
CB’s  DC’d
CC’s
CC’d

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