Archives 2022

(ड़) शक्ति (ऊर्जा) संसाधन / बिहार बोर्ड-10 Geography Solutions खण्ड (क) इकाई 1

बिहार बोर्ड वर्ग-10वाँ Geography Solutions

खण्ड (क) इकाई 1 (ड़) शक्ति (ऊर्जा) संसाधन

शक्ति


(ड़) शक्ति (ऊर्जा) संसाधन

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोतर 
1. किस राज्य में खनिज तेल का विशाल भंडार है?
(a) असम
(b) राजस्थान
(c) बिहार
(d) तमिलनाडु
उत्तर- (a) असम
2. भारत के किस स्थान पर पहला परमाणु ऊर्जा केंद्र स्थापित किया गया था?
(a) कलपक्कम
(b) नरौरा
(c) राणाप्रताप सागर
(d) तारापुर
उत्तर- (d) तारापुर 
3. कौन सा ऊर्जा स्रोत अनवीकरणीय है?
(a) जल
(b) सौर
(c) कोयला
(d) पवन
उत्तर- (c) कोयला
4. प्राथमिक ऊर्जा का उदाहरण नहीं है?
(a) कोयला
(b) विद्युत
(c) पेट्रोलियम
(d) प्राकृतिक गैस
उत्तर- (b) विद्युत
5. ऊर्जा का गैर-पारम्परिक स्रोत है।
(a) कोयला
(b) विद्युत
(c) पेट्रोलियम
(d) सौर-ऊर्जा
उत्तर- (d) सौर-ऊर्जा
6. गोंडवाना समूह के कोयले का निर्माण हुआ था।
(a) 20 करोड़ वर्ष पूर्व
(b) 20 लाख वर्ष पूर्व
(c) 20 हजार वर्ष पूर्व
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- (a) 20 करोड़ वर्ष पूर्व 
7. भारत में कोयले का सर्वप्रमुख उतपादक राज्य है:
(a) पश्चिम बंगाल
(b) झारखण्ड
(c) उड़ीसा
(d) छत्तीसगढ़
उत्तर- (b) झारखण्ड
8. सर्वोत्तम कोयले का प्रकार कौन-सा है?
(a) एंथ्रासाइट
(b) पीट
(c) लिग्नाइट
(d) बिटुमिनस
उत्तर- (a) एंथ्रासाइट
9. मुम्बई हाई क्यों प्रसिद्ध है?
(a) कोयले के निर्यात हेतु
(b) तेल शोधक कारखाना हेतु
(c) खनिज तेल हेतु
(d) परमाणु शक्ति हेतु
उत्तर- (c) खनिज तेल हेतु
10. भारत का प्रथम तेल शोधक कारखाना कहाँ स्थित है?
(a) मधुरा
(b) बरौनी
(c) डिगबोई
(d) गुवाहाटी
उत्तर- (c) डिगबोई
11. प्राकृतिक गैस किस खनिज के साथ पाया जाता है?
(a) यूरेनियम
(b) पेट्रोलियम
(c) चुना पत्थर
(d) कोयला
उत्तर- (b) पेट्रोलियम
12. भाखड़ा नंगल परियोजना किस नदी पर अवस्थित है?
(a) नर्मदा
(b) झेलम
(c) सतलज
(d) व्यास
उत्तर- (c) सतलज
13. दक्षिण भारत की सबसे बड़ी नदी घाटी परियोजना है?
(a) तुंगभद्रा
(b) शारावती
(c) चंबल
(d) हीराकुण्ड
उत्तर- (a) तुंगभद्रा 
14. ताप विद्युतकेंद्र का उदाहरण है?
(a) गया
(b) बरौनी
(c) समस्तीपुर
(d) कटिहार
उत्तर- (d) बरौनी
15. यूरेनियम का प्रमुख उतपादक स्थल है:
(a) डिगबोई
(b) झरिया
(c) घाटशिला
(d) जादूगोड़ा
उत्तर- (d) जादूगोड़ा
16. एशिया सबसे बड़ा परमाणु विद्युत गृह है:
(a) तारापुर
(b) कलपक्कम
(c) नरौरा
(d) कैगा
उत्तर- (a) तारापुर
17. भारत के किस राज्य में सौर-ऊर्जा के विकास की सर्वाधिक संभावनाएं हैं?
(a) असम
(b) अरुणाचल प्रदेश
(c) राजस्थान
(d) मेघालय
उत्तर – (c) राजस्थान
18. ज्वारीय एवं तरंग ऊर्जा उत्पादन हेतु भारत के सर्वाधिक अनुकूल परिस्थितियां कहाँ पायी जाती है?
(a) मन्नार की खाड़ी में
(b) खम्भात की खाड़ी में
(c) गंगा नदी में
(d) कोसी नदी में
उत्तर- (b) खम्भात की खाड़ी में
लघु उत्तरीय  प्रश्नोत्तर:
प्रश्न 1.पारम्परिक एवं गैर-पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों के तीन-तीन उदाहरण लिखिए।
उत्तर- पारम्परिक ऊर्जा स्रोत – कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, लकड़ी इत्यादि।
गैर-पारम्परिक ऊर्जा स्रोत– बायो गैस, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा।
प्रश्न 2. गोण्डवाना समूह के कोयला क्षेत्रों के नाम लिखिए।
उत्तर- गोण्डवाना समूह के कोयला क्षेत्र- 
(i) दामोदर घाटी
(ii) सोन घाटी
(iii) महानदी घाटी
(iv) वर्धा-गोदावरी घाटी।
प्रश्न 3. झारखण्ड राज्य के मुख्य कोयला उत्पादक क्षेत्रों के नाम अंकित कीजिए।
उत्तर-   झारखण्ड राज्य के मुख्य कोयला उत्पादक क्षेत्रों के नामझरिया, बोकारो, गिरीडीह, कर्णपुरा, रामगढ़।
 प्रश्न 4. कोयले के विभिन्न प्रकारों के नाम लिखिए।
उत्तर-   कोयले के विभिन्न प्रकारों के नाम-
(i) ऐंथासाइट
(ii) बिटुमिनस
(iii) लिग्नाइट
(iv) पीट।
प्रश्न 5. पेट्रोलियम से किन-किन वस्तुओं का निर्माण होता है?
उत्तर-  पेट्रोलियम से  गैसोलीन, डीजल, किरासन, तेल, स्नेहक, कीटनाशक दवाएँ, पेट्रोल, साबुन, कृत्रिम रेशा, प्लास्टिक इत्यादि वस्तुओं का निर्माण होता है।
 प्रश्न 6. सागर सम्राट क्या है?
उत्तर- यह मुम्बई तट से 176 किलोमीटर दूर स्थित एक जलयान है जो पानी के भीतर तेल के कुएँ खोदने का कार्य करता है।
 प्रश्न 7. किन्हीं चार तेल शोधक कारखाने का स्थान निर्दिष्ट कीजिए।
उत्तर- असम का डिग्बोई, मुम्बई का तारापुर, बिहार का बरौनी, उत्तर प्रदेश का मथुरा। 
प्रश्न 8. जल विद्युत उत्पादन के कौर-कौन से मुख्य कारक हैं?
उत्तर- जल विद्युत उत्पादन के निम्नलिखित कारण है:- 
   भौतिक दशाएँ –  
  •  सदावाहिनी नदी में प्रचुर जल की राशि
  • नदी मार्ग में ढाल
  • जल का तीव्र वेग
  • प्राकृतिक जल-प्रपात का होना
      आर्थिक दशाएँ-
  • सघन औद्योगिक, 
  • वाणिज्यिक विकास एवं आबाद क्षेत्रों जैसे बाजार
  • पर्याप्त पूँजी निवेश
  • परिवहन  के साधन
  • प्रौद्योगिकी ज्ञान
  • ऊर्जा के अन्य स्रोतों का अभाव।
प्रश्न 9. नदी घाटी परियोजनाओं को बहुउद्देश्यीय क्यों कहा जाता है?
उत्तर- क्योंकि नदी घाटी परियोजनाओं से एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति होती है, जैसे-
  • सिंचाई के साथ पनबिजली उत्पन्न करना।
  • बाढ़ का नियंत्रण।
  • मृदा अपरदन का नियंत्रण।
  • मत्स्य पालन।
  • पर्यटक स्थल का विकास।
  •  यातायात की सुविधा का विकास।
प्रश्न 10. निम्नलिखित नदी घाटी परियोजनाएँ किन-किन राज्यों में अवस्थित है- हीराकुण्ड, तुंगभद्रा, रिहन्द।
उत्तर-
हीराकुण्ड– उड़ीसा में
तुंगभद्रा– आंध्रप्रदेश में
रिहन्द– उत्तर प्रदेश में 
प्रश्न 11. ताप शक्ति क्यों समाप्य संसाधन है?
उत्तर- ताप शक्ति संयंत्रों में तापीय विद्युत का उत्पादन करने के लिए कोयला, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस का उपयोग होता है। ये सभी जीवाश्म का भंडार सीमित है जो समाप्त हो जायेंग। इसीलिए इसे समाप्य संसाधन कहा जाता है।
 
प्रश्न 12. परमाणु शक्ति किन-किन खनिजों से प्राप्त होता है?
उत्तर- परमाणु शक्ति इल्मेनाइट, बैैनेडियम, एंटीमनी, ग्रेफाइट, यूरेनियम, मोनाजाइट इत्यादि खनिजों से प्राप्त होता है।
 
प्रश्न 13. मोनाजाइट भारत में कहाँ-कहाँ उपलब्ध है?
उत्तर- भारत में मोनाजाइट केरल राज्यों में प्रचुरता से पाया जाता है। इसके अतिरिक्त, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा इत्यादि के तटीय क्षेत्रों में यह उपलब्ध है।
 
प्रश्न 14. सौर ऊर्जा का उत्पादन कैसे होता है ?
उत्तर- जब फोटोवोल्टाइक सेलों में विपाश्ति सूर्य की किरणों को ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है तो सौर ऊर्जा का उत्पादन होता है।
प्रश्न 15. भारत के किन-किन क्षेत्रों में पवन ऊर्जा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ हैं ?
उत्तर-  भारत में पवन ऊर्जा के लिए राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक में अनुकूल परिस्थितियाँ विद्यमान हैं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर :
प्रश्न 1. शक्ति संसाधनों का वर्गीकरण विभिन्न आधारों के अनुसार सोदाहरण स्पष्ट कीजिए?
उत्तर – शक्ति संसाधनों का वर्गीकरण विभिन्न आधारों के अनुसार निम्नलिखित हैं:-
A. उपयोग स्तर के आधार पर शक्ति के दो प्रकार है-
(i) सतत शक्ति – सौर किरणें, भूमिगत ऊष्मा, पवन, प्रवाहित जल इत्यादि।
(ii) समापनीय शक्ति – कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस इत्यादि।

B. उपयोगिता के आधार पर ऊर्जा को दो भागों में विभाजित किया जाता है 

(i) प्राथमिक ऊर्जा – कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस एवं रेडियोधर्मी खनिज।
(ii) गौण ऊर्जा- विद्युत, क्योंकि यह प्राथमिक ऊर्जा से प्राप्त किया जाता है ।

C. स्रोत की स्थिति के आधार पर शक्ति को दो भागों में बाँटा जाता है-

(i) क्षयशील शक्ति संसाधन- कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस तथा आण्विक खनिज।
(ii) अक्षयशील शक्ति संसाधन- प्रवाही जल, पवन, लहरें, सौर शक्ति इत्यादि।
D. संरचनात्मक गुणों के आधार पर ऊर्जा के दो स्रोत है-
(i) जैविक ऊर्जा स्रोत- मानव एवं अन्य प्राणी।
(ii) अजैविके ऊर्जा स्रोत- जल शक्ति, पवन शक्ति, सौर शक्ति तथा ईंधन शक्ति।

E. समय के आधार पर शक्ति संसाधन दो प्रकार होते है-

(i) पारम्परिक शक्ति संसाधन- कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैसा
(ii) गैर-पारम्परिक शक्ति संसाधन- सूर्य, पवन, ज्वार, परमाणु ऊर्जा, गर्म झरने इत्यादि।
 
प्रश्न 2. भारत में पारम्परिक शक्ति के विभिन्न स्रोतों का विवरण प्रस्तुत कीजिये?
उत्तर- पारम्परिक शक्ति स्रोत के अन्तर्गत कोयला, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस जैसे खनिज ईंधन सम्मिलित हैं।
(i) कोयला- यह शक्ति और ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत है। जनवरी 2008 तक भारत में 1200 मीटर की गहराई तक पाये जाने वाले कोयले का कुल अनुमानित भण्डार 26454 करोड़ टन आँका गया था। भारत में 96 प्रतिशत गोंडवाना समूह का और 4 प्रतिशत टर्शियरी समूह का कोयला पाया जाता है।
(ii) पेट्रोलियम- यह शक्ति के समस्त साधनों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं व्यापक रूप से उपयोगी संसाध है। आधुनिक युग में कोई भी राष्ट्र इसके बिना अपने अस्तित्व को कायम नहीं रख सकता है। यह शक्ति स्रोत के साथ-साथ अनेक उद्योग का कच्चा माल भी है। जैसे- गैसोलीन, डीजल, किरासन तेल, स्नेहक, कीटनाशक दवाएँ, पेट्रोल, साबुन, कृत्रिम रेशा, प्लास्टिक इत्यादि बनाये जाते हैं। भारत विश्व का मात्र एक प्रतिशत पेट्रोलियम पैदा करता है। भारत प्रथम बार 1866 में ऊपरी असम घाटी में तेल के कुएँ खोदे गये।1959 में खम्भात के तेल क्षेत्र की खोज हुई। 1975 ई० में मुम्बई हाई में तेल का पता चल गया । इसके बाद भारत में पेट्रोलियम के उत्पादन में वृद्धि होने लगी । 
(iii) प्राकृतिक गैस- यह हमारे वर्तमान जीवन में बड़ी तेजी से एक महत्वपूर्ण ईंधन बनता जा रहा है। इसका उपयोग विभिन्न उद्योगों में मशीन को चलाने में, विद्युत उत्पादन में, खाना पकाने में, मोटर गाड़ियां चलाने में किया जा रहा है।
                  भारत में एक अनुमान के अनुसार प्राकृतिक गैस की संचित भंडार 700 अरब घन मीटर है । 1984 में प्राकृतिक गैस प्राधिकरण की स्थापना देश की प्राकृतिक गैसों के परिवहन, वितरण एवं विपणन हेतु किया गया जो 5340 किलोमीटर गैस पाइप लाइन द्वारा देश भर में फैले उपभोक्ताओं की आवश्यकता पूर्ति करता है।
प्रश्न 3. गोंडवाना काल के कोयले का भारत में वितरण पर प्रकाश डालिये?
उत्तर- गोंडवाना समूह में भारत के 96 प्रतिशत कोयले का भण्डार है इससे कुल उत्पादन का 99 प्रतिशत भाग प्राप्त होता है। यहाँ के कोयले का निर्माण 20 करोड़ वर्ष पूर्व में हुआ था। गंडवाना कोयला क्षेत्र मुख्यतः चार नदी घाटियों में पाये जाते हैं-
(क) दामोदर घाटी क्षेत्र 
(ख) सोन नदी घाटी क्षेत्र
(ग) महानदी घाटी क्षेत्र तथा
(घ) वार्धा-गोदावरी घाटी क्षेत्र।
               गोंडवाना समूह का कोयला क्षेत्र भारत के निम्नलिखित राज्यों में पाया जाता है:-
झारखण्ड- कोयले के भण्डार एवं उत्पादन की दृष्टि से इसका स्थान  देश में प्रथम है। यहाँ के प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र-झरिया, बोकारो, गिरिडीह, कर्णपुरा, रामगढ़इत्यादि हैं।
छत्तीसगढ़- सुरक्षित भण्डार की दृष्टि से इस राज्य का स्थान तीसरा किंतु उत्पादन में यह भारत का दूसरा बड़ा राज्य है। यहाँ देश का 15 प्रतिशत सुरक्षित भण्डार है लेकिन उत्पादन 16 प्रतिशत होता है। यहाँ का उत्पादक क्षेत्र है चिरिमिरी, कुरसिया, विश्रामपुर, झिलमिली, सोनहाट, लखनपुर, हासदो-अरंड, कोरबा एवं मांड-रायगढ़ इत्यादि।
उड़ीसा- यहाँ देश का एक चौथाई कोयले का भण्डार है। यहाँ का मुख्य उत्पादक क्षेत्र है तालचर।
महाराष्ट्र- यहाँ भारत का मात्र  3 प्रतिशत कोयला सुरक्षित है। यहाँ के मुख्य उत्पादक क्षेत्र–चाँदा-वर्धा, कांपटी तथा बंदेर हैं।
मध्यप्रदेश- यहाँ देश का मात्र 7 प्रतिशत कोयला का भण्डार है। सिंगरौली, सोहागपुर, जोहिल्ला, उमरिया, सतपुड़ा क्षेत्र इत्यादि मुख्य उत्पादक क्षेत्र हैं।
पश्चिम बंगाल- यह राज्य देश के सुरक्षित भण्डार की दृष्टि से चौथा एवं उत्पादन में 7वां है। रानीगंज यहाँ का मुख्य उत्पादक क्षेत्र है।
प्रश्न 4. कोयले का वर्गीकरण कर उनकी विशेषताओं का उल्लेख को स्पष्ट कीजिए?
उत्तर- कार्बन की मात्रा के आधार पर कोयला को निम्नलिखित चार वर्गों में रखा गया है:-
(i) ऐंथ्रासाइट (Anthracite)- यह सर्वोच्च कोटि का कोयला है जिसमें कार्बन की मात्रा 90% से अधिक होती है। यह जलने पर धुआँ नहीं देता साथ ही साथ देर तक अत्यधिक ऊष्मा देता है। इसे कोकिंग कोयला भी कहा गया है तथा धातु गलाने के काम आता है।
(ii) बिटुमिनस- इसमें कार्बन की मात्रा 70 से 90% होती है। इसे परिष्कृत कर कोकिंग कोइला बनाया जा सकता है। भारत का अधिकतर कोयला इसी श्रेणी का है।
(iii) लिग्नाइट- यह निम्न कोटि का कोयला है । जीसमें कार्बन की मात्रा 30 से 70% होती है। यह धुआँ अधिक एवं ऊष्मा कम देता है। इसे भूरा कोयला भी कहते हैं।
(iv) पीट- इसमें कार्बन 30% से कम पाया जाता है । यह पूर्व केे दलदली क्षेत्र में पाया जाता है।
प्रश्न 5. भारत में खनिज तेल के वितरण का वर्णन कीजिए?
उत्तर- भारत में मुख्यतः पाँच  तेल उत्पादक क्षेत्र हैं–
(i) उत्तरी-पूर्वी प्रदेश- यह देश का सबसे पुराना तेल उत्पादक क्षेत्र है, जहाँ 1886 ई० में तेल के लिए खुदाई की गई थी । ऊपरी असम घाटी, अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड आदि का विशाल तेल क्षेत्र इसके अन्तर्गत आते है।
(ii) गुजरात क्षेत्र- यह क्षेत्र खम्भात के बेसिन एवं गुजरात के मैदान में विस्तृत है। यहाँ पहली बार 1958 में तेल का पता चला था। इसके मुख्य उत्पादक अंकलेश्वर, कलोल, नवगाँव, कोसांबा, मेहसाना इत्यादि हैं।
(iii) मुम्बई हाई क्षेत्र- यह मुम्बई तट से 176 किमी दूर उत्तर-पश्चिम दिशा में अरब सागर में स्थित है। यहाँ 1975 से तेल खोजने का कार्य शुरू हुआ।
(iv) पूर्वी तट प्रदेश- यह कृष्णा-गोदावरी और कावेरी नदियों के बेसिन तथा मुहाने के समुद्री क्षेत्र में  फैला हुआ है।
(v) बाड़मेर बेसिन- इस बेसिन के मंगला क्षेत्र में सितम्बर 2009 से उत्पादन शुरू हो गया है। यहां प्रतिदिन 56000 बैरल तेल का उत्पादन हो रहा है । 2012 तक यह भारत का 20% पेट्रोलियम उत्पादन करेगा।
प्रश्न 6. जल विद्युत उत्पादन हेतु अनुकूल भौगोलिक एवं आर्थिक कारकों की विवेचना करें।
उत्तर- जल विद्युत उत्पादन हेतु अनुकूल भौगोलिक दशाएँ  निम्नलिखित हैं – 
            भौतिक दशाएँ- 
◆ सदावाहिनी नदी में प्रचुर जल की राशि
◆ नदी मार्ग में ढाल
◆ जल का तीव्र वेग
◆ प्राकृतिक जल-प्रपात का होना
           आर्थिक दशाएँ-
◆ सघन औद्योगिक, 
◆ वाणिज्यिक विकास एवं आबाद क्षेत्रों जैसे बाजार
◆ पर्याप्त पूँजी निवेश 
◆ परिवहन  के साधन
◆ प्रौद्योगिकी ज्ञान
◆ ऊर्जा के अन्य स्रोतों का अभाव।
प्रश्न 7. संक्षिप्त भौगोलिक टिप्पणी लिखें-भाखड़ा-नंगल परियोजना, दामोदर घाटी परियोजना, कोसी परियोजना, हीराकुण्ड परियोजना, रिहन्द परियोजना और तुंगभद्रा परियोजना।
उत्तर- (i) भाखड़ा-नंगल परियोजना- सतलज नदी पर हिमालय प्रदेश में विश्व के सर्वोच्च बाँधों में एक भाखड़ा बांध की ऊंचाई 225 मीटर है। यह भारत की सबसे बड़ी परियोजना है, जहाँ चार शक्ति-गृह बनाये गए हसि। क भाखड़ा में, दो गंगुवाल में और एक कोटला में स्थापित होकर 7 लाख किलोवाट विद्युत उत्पादन कर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरांचल, उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान तथा जम्मू व कश्मीर राज्यों के कृषि एवं उद्योगों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है।
(ii) दामोदर घाटी परियोजना- यह परियोजना दामोदर नदी के भयंकर बाढ़ से झारखण्ड एवं पश्चिम बंगाल को बचाने के साथ-साथ तलैया, मैथन, कोनार और पंचेत पहाड़ी में बाँध बनाकर 1300 मेगावाट जल विद्युत उत्पन्न करने में सहायक है। इसका लाभ बिहार, झारखण्ड एवं पश्चिम बंगाल को प्राप्त है।
(ii) कोसी परियोजना- उत्तर बिहार का अभिशाप कोसी नदी पर हनुमान नगर(नेपाल) में बाँध बनाकर 20000 किलोवाट बिजली उत्पन्न किया जा रहा है। जिसकी आधी बिजली नेपाल को तथा शेष बिहार को प्राप्त होती है।
(iv) रिहन्द परियोजना- सोन की सहायक नदी पर रिहन्द उत्तरप्रदेश में 934 मीटर लम्बा बाँध और कृत्रिम झील ‘गोविन्द बल्लभ पंत सागर’ का निर्माण कर बिजली उत्पादित की जाती है। इस योजना से 30 लाख किलोवाट विद्युत उत्पादन करने की क्षमता है। यहाँ की बिजली का उपयोग रेणुकूट के अल्युमिनियम उद्योग, चुर्क के सीमेंट उद्योग, मध्य भारत के रेल मार्गों का विद्युतिकरण तथा हजारों नलकूपों के लिए किये जाते है।
(v) हीराकुण्ड परियोजना- महानदी पर विश्व का सबसे लम्बा बाँध (4801) मीटर बनाकर 2.7 लाख किलोवाट बिजली उत्पादन किया जाता है। इससे उड़ीसा एवं आस-पास के कृषि क्षेत्र एवं उद्योग में उपयोग किया जाता है।
(vi) तंगभद्रा परियोजना- यह कृष्णा नदी की सहायक नदी तुंगभद्रा पर आंध्रप्रदेश में स्थित दक्षिण भारत की सबसे बड़ी नदी घाटी परियोजना है जो कर्नाटक एवं आंध्रप्रदेश के सहयोग से तैयार हुआ है। इसकी बिजली उत्पादन क्षमता 1 लाख किलोवाट है जो सिंचाई के साथ-साथ सैकड़ों छोटे-बड़े उद्योगों को बिजली आपूर्ति करता है।
प्रश्न 8. भारत के किन्हीं चार परमाणु विद्युत गृह का उल्लेख कीजिए तथा उनकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भारत के चार परमाणु विद्युत गृह निम्न हैं-
(i) तारापुर परमाणु विद्युत गृह- यह एशिया का सबसे बड़ा परमाणु विद्युत गृह है। यहाँ जल उबालने वाली दो परमाणु भट्ठियाँ हैं जिनमें प्रत्येक की उत्पादन क्षमता 200 मेगावाट से अधिक है । अब यहाँ यूरेनियम के स्थान पर थोरियम से प्लूटोनियम बनाकर विद्युत उत्पन्न किए जा रहे हैं, क्योंकि भारत थोरियम के भण्डार में काफी समृद्ध है।
(ii) कलपक्कम परमाणु विद्युत गृह- तमिलनाडु में स्थित यह परमाणु गृह स्वदेशी प्रयास से बना है। यहाँ 335 मेगावाट के दो रिएक्टर क्रमश: 1983 एवं 1985 र्य करना शुरू कर दिया हैं।
(iii) नरौरा परमाणु विद्युत गृह- यह उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर के पास स्थित है। यहाँ भी 235 मेगावाट के दो रिएक्टर हैं।
(iv) ककरापास परमाणु विद्युत गृह- गुजरात राज्य में समुद्र के किनारे स्थित इस परमाणु गृह में 1992 से विद्युत उत्पादन प्रारम्भ हुआ है।
प्रश्न 9. शक्ति संसाधनों के संरक्षण हेतु कौन-कौन  कदम उठाये जा सकते हैं? आप उसमें कैसे मदद पहुंचा सकते हैं?
उत्तर- ऊर्जा संकट एक विश्व-व्यापी समस्या का रूप ले चुका है। इसके समाधान के निम्नलिखित उपाए किए जा रहे हैं-
(i) ऊर्जा के प्रयोग में मितव्ययिता- ऊर्जा संकट से बचने के लिए प्रथमतः ऊर्जा के उपयोग में मितव्ययिता बरती जाय। इसके लिए तकनीकी विकास आवश्यक है। ऐसे मोटर गाड़ियों का निर्माण हो जो कम तेल में ज्यादा चलते है। अनावश्यक बिजली का उपयोग रोककर हम ऊर्जा की बचत बड़े स्तर पर कर सकते हैं।
(ii) ऊर्जा के नवीन क्षेत्रों की खोज- ऊर्जा संकट समाधान की दिशा में परम्परागत ऊर्जा के नये क्षेत्रों का अन्वेषन किया जाय। इस दिशा में भारत में 1970 के बाद काफी तेजी आई है तथा अनेक नये-नये पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस के भण्डार का पता लगाया जा चुका है। अरब सागर, कृष्णा-गोदावरी क्षेत्र, राजस्थान क्षेत्र आदि में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस के स्रोत प्राप्त हुए हैं। इसके लिए सुदूर-संवेदी सूचना प्रणाली का भी उपयोग हो रहा है।
(iii) ऊर्जा के नवीन वैकल्पिक साधनों का उपयोग- वैकल्पिक ऊर्जा में पारम्परिक एवं गैर-पारम्परिक दोनों ही ऊर्जा सम्मिलित हैं। इन में से कुछ तो सतत् नवीकरणीय हैं तो कुछ समापनीय हैं । आज वैकल्पिक ऊर्जा में जल विद्युत, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, जैव ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा आदि का विकास क उपयोग करना शक्ति के संसाधनों को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। जीवाश्म ऊर्जा के अत्यधिक उपयोग से प्रदूषण, स्वास्थ्य एवं जलवायु परिवर्तन की आशंका प्रबल हो गई है। अतः इसके स्थान पर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोंतों पर ध्यान देना होगा।
(iv) अंतर्राष्टीय सहयोग– ऊर्जा संकट से बचने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है। विश्व के सभी राष्ट्र आपसी मतभेद को भुलाकर ऊर्जा संकट के समाधान हेतु आम सहमति से नीति निर्धारण करें नहीं तो आनेवाले दिनों में यह विश्व के लिए दुःखदायी साबित होगा।
                       इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र संघ (U.N.O.) आर्गनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कन्ट्रीज(OPEC), विश्व व्यापार संगठन(WTO), दक्षिण एशियाई 8 देशों का संगठन (G-8) जैसी अंतरष्ट्रीय संस्थाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
           इन सब के अलावे मैं अपने क्रियाकलाप में परिवर्तन कर इसमें सहायता कर सकता हूँ। जैसे-
★बिजली के बल्बों एवं अन्य उपकरणों का आवश्यकतानुसार प्रयोग कर।
★स्वचालित वाहनों के बजाय पैदल चलकर या साइकिल का अधिक उपयोग कर।
★गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा, बायोगैस इत्यादि का उपयोग कर।
★लोगों को इस संबंध में अपनी क्षमतानुसार जागरूक कर।

Read More:

(घ) खनिज संसाधन/ बिहार बोर्ड-10 Geography Solutions इकाई-1. खण्ड (क)

बिहार बोर्ड वर्ग-10वाँ Geography Solutions

खण्ड (क) इकाई-1. (घ) खनिज संसाधन



(घ) खनिज संसाधन खनिज संसाधन

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

1. भारत में लगभग कितने खनिज पाए जाते है?

(a) 50

(b) 100

(c) 150

(d) 200

उत्तर- (b) 100

2. इन में से कौन लौह युक्त खनिज का उदाहरण है?

(a) मैंगनीज़

(b) अभ्रक़

(c) बॉक्साइट

(d) चुना-पत्थर

उत्तर- (a) मैंगनीज

3. निम्नलिखित में कौन अधात्विक खनिज का उदाहरण है?

(a) सोना

(b) टिन

(c) अभ्रक

(d) ग्रेफाइट

उत्तर- (c) अभ्रक

4. किस खनिज की उद्योग की जननी माना गया है?

(a) सोना

(b) तांबा

(c) लोहा

(d) मैंगनीज

उत्तर- (c) लोहा

5. कौन लौह अयस्क का एक प्रकार है?

(a) लिग्नाइट

(b) हेमेटाइट

(c) बिटुमिनस

(d) इन में से सभी

उत्तर- (b) हेमेटाइट

6. कौन भारत का सबसे बड़ा लौह उत्पादक राज्य है?

(a) कर्नाटक

(b) गोवा

(c) उड़ीसा

(d) झारखंड

उत्तर- (c) कर्नाटक

7. छतीसगढ़ भारत का कितना प्रतिशत लौह अयस्क का उत्पादन करता है?

(a) 10

(b) 20

(c) 30

(d) 40

उत्तर- (b) 20

8. मैंगनीज उत्पादन में भारत का विश्व में क्या स्थान है?

(a) प्रथम

(b) द्वितीय

(c) तृतीय

(d) चतुर्थ

उत्तर- (c) तृतीय

9. एक टन इस्पात बनाने में कितने मैंगनीज़ का उपयोग होता है?

(a) 5 कि०ग्रा०

(b) 10कि०ग्रा०

(c) 15 कि०ग्रा०

(d) 20 कि०ग्रा०

उत्तर- (b) 10 कि०ग्रा०

10. उड़ीसा किस खनिज का सबसे बड़ा उत्पादक है?

(a) लौह अयस्क

(b) मैंगनीज

(c) टिन

(d) तांबा

उत्तर- (b) मैंगनीज

11. अल्युमिनियम बनाने के लिए किस खनिज की आवश्यकता पड़ती है?

(a) मैंगनीज

(b) टिन

(c) लोहा

(d) बॉक्साइट

उत्तर- (d) बॉक्साइट

12. देश में तांबे का कुल भण्डार कितना है?

(a) 100 करोड़ टन

(b) 125 करोड़ टन

(c) 150 करोड़ टन

(d) 175 करोड़ टन

उत्तर- (b) 125 करोड़ टन

13. बिहार-झारखंड में देश का कितना प्रतिशत अभ्रक़ का उत्पादन होता है?

(a) 60

(b) 70

(c) 80

(d) 90

उत्तर- (c) 80

14. सीमेंट उद्योग का सबसे प्रमुख कच्चा माल क्या है?

(a) चुना -पत्थर

(b) बॉक्साइट

(c) ग्रेनाइट

(d) लोहा

उत्तर- (a) चुना-पत्थर

लघु उत्तरीय  प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. खनिज क्या है?

उत्तर- खनिज निश्चित अनुपात में रासायनिक एवं भौतिक विशिष्टताओं के साथ निर्मित एक प्राकृतिक पदार्थ है। दूसरे शब्दों में, खनिज निश्चित रासायनिक संयोजन एवं विशिष्ट आंतरिक परमाणविक रचना वाले ठोस प्राकृतिक पदार्थ को कहा जाता है। संक्षेप में खान से निकाले गए पदार्थ को खनिज कहते है। जैसे- कोयला, पेट्रोलियम, सोना, लौह अयस्क इत्यादि।

प्रश्न 2. धात्विक खनिज के दो प्रमुख पहचान क्या है?

उत्तर– धात्विक खनिज के दो प्रमुख पहचान-

(l) ये कठोर एवं चमकीले होते है ।

(ll) ये प्रायः आग्नेय चाट्टानों में मिलते हैं।

प्रश्न 3. खनिजों की विशेषताओं का उल्लेख कीजिये

उत्तर–  खनिजों की विशेषताएँ-

◆ खनिजों का वितरण असमान होता है।

◆ अधिक गुणवत्ता वाले खनिज कम तथा कम गुणवत्ता वाले खनिज अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।

◆ खनिज समाप्य संसाधन है। एक बार उपयोग करने के बाद पुन: उपयोग नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 4. लौह अयस्क के प्रकारों के नाम लिखिए।

उत्तर– शुद्ध लोहे की मात्रा के आधार पर भारत मे पाये जाने वाले  लौह अयस्क तीन प्रकार के है – हेमेटाइट, मैग्नेटाइट और लीमोनाइट।

प्रश्न 5. लोहे के प्रमुख उत्पादक राज्यों के नाम लिखिए।

उत्तर – लोहे के प्रमुख उत्पादक राज्य- कर्नाटक, छतीसगढ़, उड़ीसा,  गोवा एवं झारखण्ड है।

प्रश्न 6. झारखंड के मुख्य लौह उत्पादक जिलों के नाम लिखिए।

उत्तर– झारखंड के मुख्य लौह उत्पादक जिला का नाम- पूर्वी एवं पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला, पलामू, धनबाद, हजारीबाग, लोहरदगा, तथा राँची।

प्रश्न 7.  मैंगनीज के  उपयोग पर प्रकाश डालिए।

उत्तर– मैंगनीज का उपयोग निम्नलिखित रूपों में किया जाता है-

(i) जंगरोधी इस्पात बनाने में।

(ii) शुष्क सेल के निर्माण में।

(iii) फोटोग्राफी में।

(iv) चमड़ा एवं माचिस उद्योग में।

(v) पेंट तथा कीटनाशक दवाओं के उत्पादन में इत्यादि।

प्रश्न 8. अल्युमिनियम के उपयोग का उल्लेख कीजिए।

उत्तर– अल्युमिनियम का बहुमुखी उपयोग निम्नलिखित रूपों में किया जाता है-

(i) वायुयान निर्माण में

(ii) विद्युत उपकरण के निर्माण में

(iii) घरेलू साज-सज्जा के साधनों के निर्माण में

(iv) बर्तन बनाने में

(v) सफेद सीमेंट तथा रासायनिक वस्तुएँ बनाने में इत्यादि।

प्रश्न 9. अभ्रक का उपयोग क्या है?

उत्तर– अभ्रक का उपयोग निम्नलिखित रूपों में किया जाता है-

(i) इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों में

(ii) आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में 

(iii)  विद्युत उपकरण बनाने में।

प्रश्न 10. चुना-पत्थर की क्या उपयोगिता है?

उत्तर– चुना-पत्थर का उपयोग निम्नलिखित रूपों में किया जाता है-

(i) सीमेंट बनाने में

(ii) लौह इस्पात बनाने में

(iii)रसायन उद्योग में

(iii) उर्वरक, कागज एवं चीनी उद्योग में।

प्रश्न 11. खनिजों की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर– खनिजों की मुख्य विशेषताएँ-

◆ खनिजों का वितरण असमान होता है।

◆ अधिक गुणवत्ता वाले खनिज कम तथा कम गुणवत्ता वाले खनिज अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।

◆ खनिज समाप्य संसाधन है। एक बार उपयोग करने के बाद पुन: उपयोग नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 12. खनिजों के संरक्षण एवं प्रबंधन से क्या समझते है?

उत्तर- खनिज क्षयशील एवं अनवीकरणीय संसाधन है। इनकी मात्रा सीमित है। इनका पुनर्निर्माण असंभव है। खनिज उद्योगों का आधार है किन्तु औद्योगिक विकास के लिए खनिजों का अतिशय दोहन एवं उपयोग उनके अस्तित्व के लिए संकट है। अतः खनिजों का संरक्षण एवं प्रबंधन आवश्यक है। खनिज संसाधन के विवेकपूर्ण उपयोग तीन बातों पर निर्भर है-

★ खनिजों के निरंतर दोहन पर नियंत्रण,

★ उनका बचतपूर्वक उपयोग तथा

★ कच्चे माल के रूप में सस्ते विकल्पों की खोज।

     खनिजों पर नियंत्रण के अलावे उनके विकल्पों को खोजना, खनिजों के अपशिष्ट पदार्थों को बुद्धिमतापूर्वक उपयोग, पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले कुप्रभाव पर नियंत्रण, खनिज निर्माण के लिए चक्रीय पद्धति को अपनाना प्रबंधन कहलाता है। यदि खनिजों के संरक्षण के साथ-साथ प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए तो खनिज संकट से निबटा जा सकता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. खनिज कितने प्रकार के होते है?  प्रत्येक  का  सोदाहरण  परिचय दीजिए।

उत्तर- खनिज मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-

(i) धात्विक खनिज-

        वैसे खनिज जिसमें धातु होती है, उसे धात्विक खनिज कहा जाता है। जैसे लौह अयस्क, ताँबा, निकेल, मैंगनीज आदि। पुनः इसे दो भागों में बाँटा जा सकता है

(क) लौहयुक्त खनिज-

      जिन धात्विक खनिज में लोहे का अंश अधिक पाया जाता है उसे लौहयुक्त खनिज कहते हैं, जैसे – लौह अयस्क, निकेल, टंगस्टन।

(ख) अलौहयुक्त खनिज-

       जिन धात्विक खनिज में लोहे की मात्रा न्यून होती है या नहीं होती है, अलौहयुक्त खनिज कहलाते हैं। जैसे – सोना, चाँदी, शीशा, बॉक्साइट ताँबा।

(ii) अधात्विक खनिज-

         वैसे खनिज जिसमें धातु की  मात्रा  नहीं होती है उसे  अधात्विक खनिज कहते है। जैसे-चूना पत्थर, अभ्रक, जिप्सम आदि।

 अधात्विक खनिज भी दो प्रकार के होते हैं-

(क) कार्बनिक खनिज-

         इसमें जीवाश्म होते हैं, ये पृथ्वी में दबे प्राणी, पादप जीवों के परिवर्तन से बनते हैं। जैसे-कोयला, पेट्रोलियम इत्यादि।

(ख) अकार्बनिक खनिज-

          इसमें जीवाश्म नहीं होते हैं। जैसे–अभ्रक, ग्रेफाइट।

प्रश्न 2. धात्विक एवं अधात्विक खनिजों में क्या अंतर है ? तुलना कीजिये।

उत्तर- धात्विक एवं अधात्विक खनिजों में  अंतर  एवं तुलना-

धात्विक अधात्विक
1. धात्विक खनिजों की रासायनिक संरचना में धातुएँ होती हैं। अधात्विक खनिजों की रासायनिक संरचना में धातुएँ नहीं होती है।
2. ये कठोर एवं चमकदार होते हैं। ये चमकदार नहीं होते हैं।
3. ये आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों में पाए जाते हैं। ये तलछटी चट्टानों में पाए जाते हैं।
4. धात्विक खनिजों को पिघलाकर/गलाकर धातुएँ प्राप्त की जा सकती है। इन खनिजों को पिघलाकर/गलाकर धातुएँ प्राप्त नहीं की जा सकती है।
5. ये खनिज लचीले होते हैं। ये खनिज लचीले और भंगुर नहीं होते हैं।
6. धात्विक खनिज ऊष्मा और विद्युत के अच्छे संवाहक होते हैं। अधात्विक खनिज ऊष्मा और विद्युत के कुचालक होते हैं।
7. इन खनिजों का गलनांक उच्च होता है। इन खनिजों का गलनांक बहुत कम होता है।
8. लोहा, एल्युमीनियम, सोना, चाँदी आदि के अयस्क धात्विक खनिजों के उदाहरण हैं। हीरा, स्लेट, पोटाश आदि गैर-धात्विक खनिजों के उदाहरण हैं।
9. इन्हें पीटकर तार बनाया जा सकता है। ये पीटने पर टूटते नहीं हैं। ये पीटने पर चूर-चूर हो जाते हैं।
10. इन्हें खानों से निकालने के बाद साफ करने की आवश्यकता होती है। इन्हें साफ करने की आवश्यकता नहीं होती है।
11. ये प्रायः अयस्क (ore) के रूप में पाए जाते है। ये अयस्क के रूप में नहीं पाए जाते हैं
प्रश्न 3. भारत क खनिज पट्टियों का नाम लिखकर किन्हीं दो का वर्णन करें।

उत्तर- भारत के अधिकांश खनिज निम्नलिखित तीन पट्टियों में पाई जाती हैं –

(i) उत्तर-पूर्वी पठार

(i) दक्षिणी-पश्चिमी पठार

(iii) उत्तर-पश्चिमी प्रदेश

(i) उत्तरी-पूर्वी पठार-

      यह देश की सबसे धनी खनिज पट्टी है जिसमें छोटानागपुर का पठार, उड़ीसा का पठार, छत्तीसगढ़ का पठार तथा पूर्वी आन्ध्रप्रदेश का पठार अवस्थित है। इस पट्टी में लौह अयस्क, मैंगनीज, अभ्रक, बॉक्साइट, चना पत्थर, डोलामाइट, ताँबा,थोरियम, यूरेनियम, क्रोमियम, सिलिमेनाइट तथा फास्फेट के विशाल भण्डार हैं।

(iii) उत्तर-पश्चिमी प्रदेश-

      इस पट्टी का विस्तार खम्भात की खाड़ी से लेकर अरावली की श्रेणियों तक है। यहाँ  अनेक अलौह धातुएँ, जैसे–चाँदी, सीसा, जस्ता, ताँबा आदि मिलते हैं। बालु पत्थर, ग्रेनाइट, संगमरमर, जिप्सम, मुल्तानी मिट्टी, डोलोमाइट, चूना-पत्थर, नमक आदि के भी पर्याप्त भंडार हैं।

        हिमालय एक अन्य खनिज पट्टी है जहाँ ताँबा, सीसा, जस्ता, कोबाल्ट आदि प्राप्त हैं।

प्रश्न 4. लौह अयस्क का वर्गीकरण कर उनकी विशेषताओं को लिखिए।

उत्तर- लौह अयस्क का वर्गीकरण इस प्रकार है-
(i) हेमेटाइट- इसमें 68% लौह अंश होता है। इसे लाल अयस्क भी कहते हैं।
(ii) मैग्नेटाइट- इसमें 60% लौह अंश होता है। इसे काला अयस्क भी कहते हैं।
(iii) लिमोनाइट- इसमें 40% लौह अंश होता है। इसे पीला अयस्क भी कहते हैं।
प्रश्न 5. भारत में लौह अयस्क के वितरण पर प्रकाश डालें।
उत्तर- भारत में लौह अयस्क प्रायः सभी राज्यों में पाया जाता है परन्तु यहाँ के कुल भण्डार का 96% कर्नाटक, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, गोवा, झारखण्ड, राज्यों में सीमित है। शेष भण्डार तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र एवं अन्य राज्यों में अवस्थित है। भारत में 1950-51 में 42 लाख टन लोहे का उत्पादन हुआ जो 2004-05 में बढ़कर 1427.1 लाख टन हो गया। अतः लोहे के उत्पादन में भारी विकास हुआ है।
          कर्नाटक राज्य भारत का लगभग एक-चौथाई लोहा उत्पादन करता है। यहाँ बेल्लारी, हास्पेट, सुदूर क्षेत्रों में लौह अयस्क की खानें हैं।
         
         छत्तीसगढ़ देश का दूसरा उत्पादन राज्य है जो देश का करीब 20 प्रतिशत लोहा उत्पन्न करता है। दाँतेवाड़ा जिले का बैलाडिला तथा दुर्गा जिले के डल्ली एवं राजहरा प्रमुख उत्पादक हैं। रायगढ़, विलासपुर तथा सरगुजा अन्य उत्पादक जिले हैं। यहाँ का अधिकांश लोहा विशाखापट्नम बंदरगाह से जापान को निर्यात किया जाता है।
           
         उड़ीसा देश का 19 प्रतिशत लोहा उत्पादन करता है। यहाँ की प्रमुख खानें गुरु माहिषानी, बादम पहाड़ (मगूरगंज) एवं किरिबुरू हैं।
         
        गोवा देश का चौथा बड़ा लोहा उत्पादक राज्य है तथा 16 प्रतिशत देश का लोहा यहीं से प्राप्त होता है। यहाँ की प्रमुख खाने साहक्वालिम, संग्यूम, क्यूपेम, सतारी, पौडा एवं वियोलिम में स्थित हैं। यहाँ के मर्मागांव पतन से लोहा निर्यात किया जाता है।
           
      झारखण्ड देश का पांचवां बड़ा अयस्क उत्पादक राज्य है और 15 प्रतिशत से अधिक लोहे का उत्पादन करता है। यहाँ के सिंहभूम, पलामू, धनबाद, हजारीबाग, लोहरदगा तथा राँची मुख्य उत्पादक जिले हैं।
   
       महाराष्ट्र में लौह अयस्क की खाने चन्द्रपुर, रत्नागिरि और भण्डारा जिलों में स्थित हैं।
             
       आन्ध्रप्रदेश के कसीमनगर, बारंगल, कुर्नुल, कड़प्पा आदि जिले लौह अयस्क उत्पादक हैं जबकि तमिलनाडु के तीर्थ मल्लाई पहाड़ियों (सलेम) एवं यादपल्ली (नीलगिरी) क्षेत्र में लोहे के भण्डार हैं।
प्रश्न 6. मैंगनीज तथा बॉक्साइट की उपयोगिता तथा देश में इनके वितरण का वर्णन कीजिए।
उत्तर- मैंगनीज अयस्क-
       मैंगनीज के उत्पादन में भारत का स्थान विश्व में रूस एवं दक्षिण अफ्रीका के बाद तीसरा है। यह मुख्य रूप से जंगरोधी इस्पात बनाने तथा लोहा एवं मैंगनीज के मिश्रधातु बनाने के उपयोग में आता है। इसका उपयोग शुष्क बैटरियों के निर्माण में, फोटोग्राफी में, चमड़ा एवं माचिस उद्योग में भी होता है। साथ ही इसका उपयोग पेंट तथा कीटनाशक दवाओं के बनाने में भी किया जाता है। भारत के कुल उत्पादन का 85% मैंगनीज का उपयोग मिश्रधातु बनाने में किया जाता है।
वितरण-
         भारत में मैंगनीज का संचित भण्डार 1670 लाख टन है। विश्व में जिम्बाब्वे के बाद भारत में ही मैंगनीज का सबसे बड़ा संचित भण्डार है जो विश्व के कुल संचित भण्डार का 20 प्रतिशत है।
         
        भारत के उत्पादन में मुख्य क्षेत्र उड़ीसा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आन्ध्रप्रदेश हैं। भारत का 78% से ज्यादा मैंगनीज अयस्क के भण्डार महाराष्ट्र के नागपुर तथा भण्डारा जिलों से लेकर मध्यप्रदेश के बालघाट एवं छिन्दवाड़ा जिलों तक फैली पट्टी में मिलते हैं।
     उड़ीसा भारत में मैंगनीज के उत्पादन में अग्रणी है। यहाँ देश के कुल उत्पादन का 37.6% मैंगनीज उत्पादन होता है। यहाँ मैंगनीज के मुख्य खादानें, सुन्दरगढ़, कालाहांडी, रायगढ़ बोलांगीर, क्योंझर, जालसुर एवं मयूरभंज जिलों में हैं। 
         
           महाराष्ट्र भारत के कुल उत्पादन का लगभग एक चौथाई मैंगनीज उत्पादन करता है। इस राज्य की मुख्य मैंगनीज उत्पादन पेटी नागपुर तथा भण्डारा जिले में हैं। इस पेटी में उत्तम कोटि के मैंगनीज अयस्क मिलते हैं। रत्नागिरि में उच्चकोटि का मैंगनीज का उत्पादन होता है।
            मध्यप्रदेश 21% मैंगनीज पैदा कर देश का तीसरा बड़ा उत्पादक राज्य है। बालघाट तथा छिन्दवाड़ा जिलों में मैंगनीज का उत्पादन होता है।
            कर्नाटक में मैंगनीज शिमोगा, तुमकुर, बेलारी, धारवाड़, चिकमंगलूर और बीजापुर जिले मुख्य उत्पादक हैं। पहले यहाँ देश का एक चौथाई मैंगनीज उत्पादन होता था किन्तु अब उत्पादन कम हो रहा है।
         
         आन्ध्रप्रदेश में देश के सकल उत्पादन का 6 प्रतिशत ही मैंगनीज का उत्पादन होता है। यहाँ मुख्य उत्पादक जिला श्रीकाकुलम है। अन्य उत्पादक जिलों में विशाखापतनम, कुडप्पा, विजयनगर, गुंटूर हैं।
बॉक्साइट-
        यह एक अलौह धातु निक्षेप है जिससे अल्यूमीनियम नामक धातु निकाली जाती है। भारत में बॉक्साइट का इतना भण्डार है कि अल्यूमीनियम में हम आत्मनिर्भर हो सकते हैं। इसका बहुमुखी उपयोग वायुयान निर्माण, बर्तन बनाने, सफेद सीमेंट तथा रासायनिक वस्तुएं बनाने में किया जाता है। भारत में बॉक्साइट का अनुमानित भण्डार 3037 मिलियन टन है।
वितरण-
          बॉक्साइट भारत के अनेक क्षेत्रों में मिलता है किन्तु मुख्य रूप से इसका भण्डार उड़ीसा, गुजरात, झारखण्ड, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं उत्तर प्रदेश में अवस्थित है। देश का आधा से अधिक भण्डार उड़ीसा में है। उड़ीसा भारत के कुल उत्पादन का 42 प्रतिशत बॉक्साइट उत्पादन करता है। कालाहांडी, बोलंगीर, कोरापुट, सुन्दरगढ़ तथा संभलपुर बॉक्साइट के मुख्य उत्पादक जिले हैं।
           
        गुजरात भारत का 17.35 प्रतिशत बॉक्साइट उत्पादन करके दूसरे स्थान पर है। जामनगर, कैरा, सबरकंठ तथा सूरत महत्वपूर्ण उत्पादक जिले हैं।
 
        झारखण्ड बॉक्साइट के उत्पादन में तीसरा स्थान रखता है तथा देश का 14 प्रतिशत बॉक्साइट उत्पादन करता है। इसके लोहरदगा राँची, लातेहार एवं पलामू मुख्य उत्पादक जिले हैं।
        महाराष्ट्र के कोलावा, रत्नागिरि तथा कोल्हापुर जिलों में बॉक्साइट का खनन होता है तथा 12 प्रतिशत उत्पादन करता है।
         
          छत्तीसगढ़ भारत का 6 प्रतिशत से अधिक बॉक्साइट उत्पादन करता है। सरगूजा का पठारी प्रदेश, रायगढ़ तथा विलासपुर जिले इसके उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं।
             
         अन्य उत्पादन राज्यों में कर्नाटक में बॉक्साइट के प्रमुख निक्षेप बेलगाम जिले में पाये जाते हैं।
       तमिलनाडु के नीलगिरि, सलेम, मदुरई और कोयम्बटूर जिले, उत्तरप्रदेश के बांदा जिले बॉक्साइट के अन्य उत्पादक हैं। जम्मू और कश्मीर के पूंछ एवं उधमपुर जिलों में उत्तम कोटि के बॉक्साइट पाये जाते हैं। भारत विभिन्न देशों को बॉक्साइट निर्यात करता है। मुख्य आयातक देश इटली, यू. के., जर्मनी, जापान हैं।
प्रश्न 7. अभ्रक की उपयोगिता एवं वितरण पर प्रकाश डालें।
उत्तर- भारत विश्व में शीट अभ्रक का अग्रणी उत्पादक है। अब तक इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों में इसका उपयोग होता रहा है, किन्तु कुछ कृत्रिम विकल्प आ जाने से अभ्रक के उत्पादन एवं निर्यात दोनों पर बुरा असर पड़ा है। वैसे तो प्राचीन काल से अभ्रक का प्रयोग आयुर्वेदिक दवाओं के लिए किया जाता रहा है, लेकिन विद्युत उपकरण में इसका खास उपयोग होता है। क्योंकि यह विद्युत रोधक होने के कारण उच्च विद्युत शक्ति को सहन कर सकता है।
           
             भारत में उत्पादन की दृष्टि से अभ्रक निक्षेप की तीन पट्टियाँ हैं जो बिहार, झारखंड, आन्ध्रप्रदेश तथा राजस्थान राज्यों के अन्तर्गत आती हैं। भारत में अभ्रक के कुल भण्डार 59065 टन है। 2002-03 में इसका उत्पादन 1217 टन था। बिहार एवं झारखण्ड में उत्तम कोटि के रूबी अभ्रक का उत्पादन होता है। पश्चिम में गया जिले में हजारीबाग, मुंगेर होते हुए पूर्व में भागलपुर तक फैला हुआ है। इसके अतिरिक्त धनबाद, पलामू, राँची एवं सिंहभूम जिलों में भी अभ्रक के भण्डार मिले हैं। बिहार एवं झारखंड भारत का 80% अभ्रक का उत्पादन करते हैं। आन्ध्रप्रदेश के नेल्लोर जिले में अभ्रक का उत्पादन होता है। राजस्थान देश का तीसरा अभ्रक उत्पादक राज्य है। यहाँ जयपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा, अजमेर आदि जिलों में अभ्रक की पेटी फैली हुई है। यू. एस. ए. भारतीय अभ्रक का मुख्य आयातक है।
प्रश्न 8. खनिजों के संरक्षण के उपाय सुझायें।
उत्तर- खनिज क्षयशील एवं अनवीकरणीय संसाधन है। इनकी मात्रा सीमित है। इनका पुनर्निर्माण असंभव है। खनिज उद्योगों का आधार है, किन्तु औद्योगिक विकास के लिए खनिजों का अतिशय दोहन एवं उपयोग उनके अस्तित्व के लिए संकट है। अतः खनिजों का संरक्षण एवं प्रबंधन आवश्यक है। खनिज संसाधन के विवेकपूर्ण उपयोग तीन बातों पर निर्भर है-
(i) खनिजों के निरंतर दोहन पर नियंत्रण, 
(ii) उनका बचतपूर्वक उपयोग एवं
(iii) कच्चे माल के रूप में सस्ते विकल्पों की खोज।

       खनिजों पर नियंत्रण के अलावे उनके विकल्पों को खोजना, खनिजों के अपशिष्ट पदार्थों को बुद्धिमतापूर्ण उपयोग, पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले कुप्रभाव पर नियंत्रण, खनिज निर्माण के लिए चक्रीय पद्धति को अपनाना प्रबंधन कहलाता है। अगर खनिजों के संरक्षण के साथ-साथ प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए तो खनिज संकट से निबटा जा सकता है।



Read More:

(ग) वन एवं वन्य प्राणी संसाधन / बिहार बोर्ड-10 Geography Solutions खण्ड (क) इकाई 1

बिहार बोर्ड वर्ग-10वाँ Geography Solutions

खण्ड (क)

इकाई 1 (ग) वन एवं वन्य प्राणी संसाधनवन एवं वन्य प्राणी संसाधन


वन एवं वन्य प्राणी संसाधन

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोतर

1. भारत में 2001 में कितने प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में वन का विस्तार था?
(a) 25
(b) 19.27
(c) 20
(d) 20.60
उत्तर- (b) 19.27
2. वन स्थिति रिपोर्ट (2005)के अनुसार भारत में वन का विस्तार है-
(a) 20.60 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में
(b) 20.55 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में
(c) 20 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- (a) 20.60 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में
3. बिहार में कितने प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में वन का फैलाव है?
(a) 15
(b) 20
(c) 20.5
(d) 7.1
उत्तर- (d) 7.1
4. पूर्वोत्तर राज्यों के 188 आदिवासी जिलों में देश के कुल क्षेत्र का कितना प्रतिशत वन है?
(a) 75
(b) 80.05
(c) 90.03
(d) 60.11
उत्तर- (d) 60.11
5. किस राज्य में वन का सबसे अधिक विस्तार है?
(a) केरल
(b) कर्नाटक
(c) मध्यप्रदेश
(d) उत्तर प्रदेश
उत्तर- (c) मध्यप्रदेश
6. वन संरक्षण एवं प्रबंधन की दृष्टि से वनों को वर्गीकृत किया गया है- 
(a) 4 वर्गों में
(b) 3 वर्गों में
(c) 5 वर्गों में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- (b) 3 वर्गों में
7. 1951 से 1980 तक लगभग कितना वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र कृषि भूमि में परिवर्तित हुआ?
(a) 30,000
(b) 26,000
(c) 25,200
(d) 35,500
उत्तर- (b) 26,200
8. संविधान की धारा 21 का संबंध है-
(a) वन्य जीवों तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण
(b) मृदा संरक्षण
(c) जल संसाधन संरक्षण
(d) खनिज सम्पदा संरक्षण
उत्तर- (a) वन्य जीवों तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण
9. एक एन०जी०ओ० की वानिकी रिपोर्ट के अनुसार 1948 में विश्व में कितने हेक्टेयर भूमि पर वन का विस्तार था।
(a) 6 अरब हेक्टेयर
(b) 4 अरब हेक्टेयर
(c) 8 अरब हेक्टेयर
(d) 5 अरब हेक्टेयर
उत्तर- (b) 4 अरब हेक्टेयर
10. प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण 1968 में कौन सा कनवेंशन हुआ था?
(a) अफ्रीकी कनवेंशन
(b) वेटलैंड्स कनवेंशन
(c) विश्व आपदा कनवेंशन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- (a) अफ्रीका कनवेंशन
11. इनमें कौन सा जीव है जो केवल भारत में ही पाया जाता है?
(a) घड़ियाल
(b) डॉलफिन
(c) ह्वेल
(d) कछुआ
उत्तर- (a) घड़ियाल
12. भारत का राष्ट्रीय पक्षी है-
(a) कबूतर
(b) हंस
(c) मयूर
(d) तोता
उत्तर- (c) मयूर
13. मैंग्रोवस का सबसे अधिक विस्तार है-
(a) अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के तटीय भाग में
(b) सुंदर वन में
(c) पश्चिमी तटीय प्रदेश में
(d) पूर्वोतर राज्य में
उत्तर- (b) सुंदर वन में
14. टेक्सोल का उपयोग होता है-
(a) मलेरिया में
(b) एड्स में
(c) कैंसर में
(d) टी०बी० के लिए
उत्तर- (c) कैंसर में
15. ‘चरक’ का संबंध किस देश से था?
(a) म्यांमार
(b) श्रीलंका
(c) भारत से
(d) नेपाल से

उत्तर- (c) भारत से
लघु उत्तरीय  प्रश्नोत्तर :
प्रश्न 1. बिहार में वन संपदा की वर्तमान स्थिति का वर्णन कीजिये।
उत्तर –बिहार विभाजन के बाद वन विस्तार में बिहार राज्य दयनीय स्थिति में आ गया है, क्योंकि वर्तमान बिहार में अधिकतर भूमि कृषि योग्य है। मात्र 6764.14 हेक्टेयर में वन क्षेत्र बच गया है जो कि सम्पूर्ण बिहार के  भोगोलिक क्षेत्र का मात्र 7.1 प्रतिशत है। बिहार के 38 जिलों में से 17 जिलों से वन क्षेत्र समाप्त हो गया है। पश्चिमी चम्पारण, मुंगेर, बांका, जमुई, नवादा, नालन्दा, गया, रोहतास, कैमूर और औरंगाबाद जिलों के वनों की स्थिति कुछ बेहतर है, जिसका कुल क्षेत्रफल 3700 वर्ग किमी है। शेष में अवक्रमित वन क्षेत्र है, वन के नाम पर केवल झाड़-झरमूट बच गऐ हैं।
 प्रश्न 2. वन विनाश के मुख्य कारकों को लिखिए।
उत्तर –वन विनाश के मुख्य कारक निम्न हैं-
◆पशुचारण
◆ईंधन के लिए लकड़ियों के उपयोग
◆यातायात(सड़क मार्ग, रेलमार्ग) के साधन का निर्माण
◆औद्योगिक एवं नगरीकरण का विकास
◆कुछ पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार भारत के कई क्षेत्रों में सम्वर्द्धन ‘वृक्षारोपण’ अर्थात  वाणिज्य की दृष्टि से  एकल वृक्ष रोपण करने से पेड़ों की दूसरी प्रजातियाँ  खत्म हो गयी है।
 प्रश्न 3. वन के पर्यावरणीय महत्व का वर्णन कीजिये।
उत्तर –वन मानव जीवन के प्रमुख हमसफर हैं। वन पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच जैसा है। यह केवल एक संसाधन ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में महत्वपूर्ण घटक है। हमारा इससे अटूट संबंध है । वास्तव में वन प्रकृति का एक अमूल्य  उपहार है। सृष्टि के आरम्भ से ही मानव इसके आँचल में पोषित होता रहा है।  यह इस जीवमंडल में सभी जीवों को संतुलित स्थिति में जीने के लिए अथवा संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में सर्वाधिक योगदान देता है क्योंकि सभी जीवों के लिए खाद्य ऊर्जा(Food Energy) का प्रारंभिक स्रोत वनस्पति ही है। 
प्रश्न 4. वन्य-जीवों के ह्रास के चार प्रमुख कारकों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर –वन्य जीवों के ह्रास के चार प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं-
(l) प्राकृतिक आवासों का अतिक्रमण- यातायात की सुविधाओं में वृद्धि आदि कारणों से भी वन्य जीवों के प्राकृतिक आवासों का अतिक्रमण हो हुआ है  जिससे  प्राकृतिक आवास के छीन जाने के दबाव से वन्य जीवों की सामान्य वृद्धि तथा  प्रजनन क्षमता में कमी आ गई।
(ll) प्रदूषण जनित समस्या- प्रदूषण के कारण वन्य जीवों का जीवन-चक्र गंभीर रूप से  प्रभावित हो रहा है।
(lll) आर्थिक लाभ- आर्थिक लाभ के लिए  योजनाबद्ध तरीके से खास प्रजातियों के पेड़-पौधों एवं वन्य जीवों को स्थानीय, क्षेत्रीय या राज्यस्तर पर दोहन किये जाने से कई प्रजातियाँ संकट ग्रस्त हो गयी है।
(lV) सह विलुप्तता-जब एक जाति विलुप्त होती है तब उसपर आधारित दूसरी जातियाँ भी विलुप्त होने लगती हैं।
प्रश्न 5. वन और वन्य जीवों के संरक्षण में सहयोगी रीति रिवाजों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर –सहयोगी रीति-रिवाजों का वन और वन्य जीवों के संरक्षण में काफी महत्वपूर्ण योगदान है। ग्रामीण लोग कई धार्मिक अनुष्ठानों में 100 से अधिक पादप प्रजातियों का प्रयोग करते हैं और इन पौधों को अपने खेतों में भी उगाते हैं। आदिवासियों को अपने क्षेत्र में पाये जाने वाले पेड़-पौधों तथा वन्य जीवों से भावनात्मक तथा आत्मीय लगाव होता है। वे प्रजनन काल में मादा वन पशुओं का शिकार नहीं करते हैं। वन संसाधनों का उपयोग चक्रीय पद्धति से करते हैं। वन के खास क्षेत्रों को सुरक्षित रख उसमें प्रवेश नहीं करते हैं। समय-समय पर आवश्यकतानुसार वृक्षारोपण तथा उनकी रक्षा करते है। इस प्रकार से जनजातीय क्षेत्रों के वन को स्वभाविक संरक्षण प्राप्त हो जाता है। 
प्रश्न 6. चिपको आंदोलन क्या है?
उत्तर – सुदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में  उत्तर प्रदेश के टेहरी- गढ़वाल पर्वतीय जिले में  वन की रक्षा हेतु जो आंदोलन चलाया गया उसे चिपको आन्दोदन के नाम से जाना जाता है। इस आंदोलन में स्थानीय लोग ठेकेदारों की कुल्हाड़ी से हरे-भरे पौधों को काटते देख, उसे बचाने के  लिए अपने आगोश में पौधा को घेर कर इसकी रक्षा करते थे। इस आंदोलन की शुरूआत 1972 में हुआ था।
प्रश्न 7. कैंसर रोग के उपचार में वन का क्या योगदान है ?
उत्तर – टेक्सस बेनकेटा एवं टी. ब्रव्ही फोलिया एक औषधीय पौधा है जो हिमालय और अरुणाचल प्रदेश के कई क्षेत्रों में पाया जाता है तथा  यह  एक सदाबहार वृक्ष  है। चीड़ की छाल, पत्तियों, टहनियों और जड़ों से टैक्सोल नामक रसायन निकाला जाता है। इससे कैंसर रोधी औषधि बनायी जाती है। यह विश्व में सबसे अधिक बिकने वाली कैंसर औषधि है।
प्रश्न 8. दस लुप्त होने वाले पशु-पंक्षियों का नाम लिखिए।
उत्तर –दस लुप्त होने वाले पशु-पंक्षियां का नाम – एशियाई चीता, गुलाबी सिर वाला बत्तख, डोडो, गिद्ध (भारत), थाईलैंसीन (आस्ट्रेलिया), ‘स्टीलर्स सीकाउ (रूस), शेर की तीन प्रजातियाँ (बाली, जावन एवं कास्पियन) (अफ्रिका), कस्तुरी मृग, चीतल, लाल पांडा।
प्रश्न 9. वन्य-जीवों के ह्रास में प्रदुषण जनित समस्याओं पर अपना विचार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर –बढ़ते प्रदूषणों ने कई समस्याओं को जन्म दिया है। पराबैंगनी किरणें, अम्ल वर्षा और हरितगृह प्रभाव प्रमुख प्रदूषक हैं जिन्होंने वन्य जीवों को काफी प्रभावित किया है। इसके अलावे वायु, जल एवं मृदा प्रदूषण के कारण वन एवं वन्य जीवों का जीवनचक्र गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। इससे इनकी प्रजनन क्षमता प्रभावित हो रही है। फलस्वरूप धीरे-धीरे वन्य जीवन संकटग्रस्त होते जा है। 
प्रश्न 10. भारत के दो प्रमुख जैवमंडल क्षेत्र का नाम, क्षेत्रफल एवं राज्यों का नाम बताएं।
उत्तर –
नीलगिरि -5520 वर्ग किमी – तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक।
सुंदरवन-9630 वर्ग किमी –पश्चिम बंगाल
 दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर : 
प्रश्न 1. वन एवं वन्य  जीवों के महत्व का विस्तार सेे वर्णण कीजिये।
उत्तर -पृथ्वी का वह बड़े भूभाग जो पेड़-पौधे तथा झाड़ियों द्वारा आच्छादित होते है, उसे वन कहा जाता है। एवं उसमें रहने वाले जीव-जंतुओं को वन्य जीव कहा जाता है। वन एवं वन्य जीव मानव के प्रमुख हमसफ़र है। वन पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है। वन जैव विविधताओं का आवास होता है। यह न केवल एक संसाधन ही है  बल्कि पारिस्थितिक तंत्र के निर्माण में इसकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। मानव का इससे अटूट संबंध है। वन प्रकृति का एक अमूल्य धरोहर है। वन एवं वन्य प्राणी मानव के लिए प्रतिस्थापित होने वाला संसाधन है। यह इस जीव-मंडल में सभी जीवों की संतुलित स्थिति में जीने के लिए पारिस्थितिक तंत्र के निर्माण में सर्वाधिक योगदान देता है क्योंकि सभी जीवों लिए खाद्य ऊर्जा का प्रारंभिक स्रोत वनस्पति होता है। वर्तमान समय के विकास की दौड़ में हम ने अपने अतीत के सभी गौरवशाली परंपराओं को नकार दिया है। वन एवं वन्य प्राणी के महत्व को नहीं समझ रहे हैं। और तेजी से इस संसाधन का विदोहन कर रहे है। वस्तुतः वन एवं वन्य प्राणी के महत्व को हमे समझना होगा और उसके संरक्षण पर पर ध्यान देना होगा।  
प्रश्न 2. वृक्षों के घनत्व के आधार पर वनों का वर्गीकरण कीजिये और सभी वर्गों का वर्णन विस्तार से कीजिये।
उत्तर- भारत में वनों का विस्तार एक समान नहीं है, यहां का पूर्वोत्तर राज्य एवम मध्यप्रदेश वनों की दृष्टि से काफी समृद्ध है, किंतु अंडमान निकोबार द्वीप समूह सबसे आगे है, जहां 90.3 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्रों में वन विकसित हैं। वृक्षों के घनत्व के आधार पर वनों को पांच वर्गों में बाँटा गया है-
1. अत्यंत सघन वन- भारत में इस प्रकार के वन विस्तार 54.6 लाख हेक्टेयर भूमि पर है जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 1.66 प्रतिशत है, असाम और सिक्किम को छोड़कर समूचा पूर्वोत्तर – राज्य इस वर्ग में आते हैं। इन क्षेत्रों में वनों का घनत्व 75% से अधिक है।
2.सघन वन- इसके अन्तर्गत 73.60 लाख हेक्टेयर भूमि आती है जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 3% है। हिमालय, सिक्किम, मध्यप्रदेश, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र एवं उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में इस प्रकार के वनों का विस्तार है। यहाँ वनों का घनत्व 621.99 प्रतिशत है।

3. खुले वन- 2.59 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर इस प्रकार के वनों का विस्तार है। यह कुल भौगोलिक क्षेत्र का 7.12% है, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा के कुछ जिले एवं असम के 16 आदिवासी जिलों में इस प्रकार के वनों का विस्तार है, असाम आदिवासी जिलों में वृक्षों का घनत्व 23.89% है।

4. झाड़ियाँ एवं अन्य वन- राजस्थान का मरुस्थलीय क्षेत्र एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्र में इस प्रकार के वन पाये जाते हैं। पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, बिहार एवं प. बंगाल के मैदानी भागों में वृक्षों का घनत्व 10% से भी कम है इसलिए यह क्षेत्र इसी वर्ग में सम्मिलित है। इसके अन्तर्गत 2.459 करोड़ हेक्टेयर भूमि आती है, जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 8.66% है।

5. मैंग्रोव (तटीय वन) – विश्व के तटीय वन क्षेत्र (मैंग्रोव्स) का मात्र 5% 4,500 किमी. क्षेत्र ही भारत में है, जो समुद्र तटीय राज्यों में फैला है, जिसमें आधा क्षेत्र पश्चिम बंगाल का सुंदरवन है, इसके बाद गुजरात के अंडमान निकोबार द्वीप समूह आते हैं, कुल मिलाकर 12 राज्यों तथा केन्द्र प्रशासित प्रदेशों में मैंग्रोव्स वन है जिनमें आंध्रप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तमिलनाडु, प. बंगाल, अंडमान-निकोबार, पाण्डेिचरी, केरल एवं दमन-द्वीप शामिल हैं।
 
प्रश्न 3. जैव विविधता क्या है? यह मानव के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? विस्तार से लिखिए।
उत्तर- जैव विविधता से तात्पर्य, पृथ्वी पर पाये पाई जाने वाली जीवों की विविधता से है। यह शब्द किसी विशेष क्षेत्र में पाये जाने वाले जीवों की विभिन्न रूपों की ओर इंगित करता है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक पृथ्वी पर जीवों की करीब एक करोड़ प्रजातियां पाई जाती हैं।
               ये हमारी धरा पर अमूल्य धरोहर हैं। वन्य जीव सदियों से हमारे सांस्कृतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। इनसे हमें भोजन, वस्त्र के लिए रेशे, खालें, आवास आदि सामग्री एवं अन्य उत्पाद प्राप्त होते हैं। इनकी चहक और महक हमारे जीवन में स्फूर्ति प्रदान करते हैं। पारिस्थितिकी के लिए ये श्रृंगार के समान हैं। भारत में इन्हें सदैव आदरभाव एवं पूज्य समझा गया। मनीषियों के लिए प्रेरणा का स्रोत तो सैलानियों के लिए आकर्षण का विषय रहा है। ये पर्यावरण संतुलन के लिए भी अति आवश्यक हैं तथा हमारी भावी पीढ़ियों के लिए भी ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हमारा देश जैविक विविधता में समृद्ध देश है। सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले क्षेत्र  पश्चिमी घाट और उत्तरी पूर्वी भारत है। इनमें  क्रमशः भारत का 4% और 5.2 % भौगोलिक क्षेत्रफल है, विश्व के 15 हॉट स्पॉट में इन्हें भी रखा गया  है।
प्रश्न 4. विस्तार पूर्वक बतायें कि मानव किस प्रकार प्राकृतिक वनस्पति और प्राणीजात के ह्रास के कारक है।
उत्तर- मानव के निम्नलिखित क्रियाकलापों वनस्पतियों एवं प्राणीजगत के ह्रास के कारक हैं –
◆आवासीय एवं कृषि योग्य भूमि का विस्तार
◆हानिकारक रसायनों का  प्रयोग
◆आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिये जैव विविधताओं का अति दोहन
◆जनसंख्या में वृद्धि
◆औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण में  वृद्धि
जंगली जीवों का शिकार इत्यादि।   
                    मानव जीवमण्डल का सबसे महत्वपूर्ण सदस्य है जो न के अन्य जैविक घटकों को ही प्रभावित करता है बल्कि पर्यावरण के अजैविक घटकों में भी अत्यधिक परिवर्तन लाता है। मानव अपनी बुद्धि और विवेक के कारण प्रकृति के दूसरे जीवों और अजैविक घटकों का प्रयोग कर अपने जीवन को सुखमय और आरामदायक बनाता है। किन्तु जब मानव के क्रियाकलाप अनियंत्रित हो जाते हैं तो पर्यावरण के घटकों जैसे-वायु, जल तथा मृदा एवं दूसरे जीवों में अनावश्यक परिवर्तन हो जाता है जिसका वनस्पतियों एवं प्राणियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मानव अपने आवास, खेती एवं कारखाने स्थापित करने के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों को काटता रहा है। शाकाहारी एवं मांसाहारी जानवरों का अंधाधुंध शिकार कर जीवों में असंतुलन पैदा कर दिया है और बहुत-से जन्तु लुप्त होने के कगार पर हैं। जैसे—सिंह, बाघ, चीता, गैंडा, बारहसिंगा, कस्तुरी मृग आदि।
5. भारतीय जैवमण्डल क्षेत्रों की चर्चा विस्तार से कीजिये।      
उत्तर- हमारा देश जैव विविधता के संदर्भ में विश्व के सर्वाधिक समृद्ध देशों में से एक है। इसकी गणना विश्व के 12 विशाल जैविक-विविधता वाले देशों में की जाती है। यहाँ विश्व की सारी जैव उप जातियों का 8 प्रतिशत संख्या (लगभग 16 लाख) पाई जाती है। राष्ट्र के स्वास्थ्य जैव मंडल एवं जैविक उद्योग के लिए समृद्ध जैव-विविधता अनिवार्य है। जैव-विविधता  से हम सभी लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से लाभ उठाते है। इससे भोज, औषधियां, भैषज्य दवाइयों, रेशों, रबड़, लकडियाँ इत्यादि करते है। कई सूक्ष्म जीवों का उपयोग बहुमूल्य उत्पाद तैयार करने के लिए उद्योगों में प्रयोग होता है। इन्हीं जैव विविधताओं के संरक्षण हेतु यूनेस्को के सहयोग से भारत में 14 जैव मण्डल आरक्षित क्षेत्र की स्थापना की गई है जिसका विवरण निम्नलिखित है-

वन एवं वन्य प्राणी संसाधन


Read More:

(ख) जल संसाधन / बिहार बोर्ड-10 Geography Solution खण्ड (क) इकाई 1.

बिहार बोर्ड वर्ग-10वाँ Geography Solution
खण्ड (क)

इकाई 1. (ख) जल संसाधन

जल संसाधन


जल संसाधन

 वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर:

1. वृहद क्षेत्र में जल की उपस्थिति के कारण ही पृथ्वी को कहते हैं-
(a) उजला ग्रह
(b) नीला ग्रह
(c) लाल ग्रह
(d) हरा ग्रह
उत्तर- (b) नीला ग्रह 
2. कुल जल का कितना प्रतिशत भाग महासागरों में निहित है?
(a) 9.5 %
(b) 95.5 %
(c) 96 %
(d) 96.6 %
उत्तर- (d) 96.6 % 
3. देश के बाँधों को किसने भारत का मंदिर कहा था?
(a) महात्मा गाँधी
(b) डॉ राजेन्द्र प्रसाद
(c) पंडित नेहरू
(d) स्वामी विवेकानंद
उत्तर- (c) पंडित नेहरू
4. प्राणियों के शरीर में कितना प्रतिशत जल की मात्रा निहित होती है?
(a) 55 %
(b) 60 %
(c) 65 %
(d) 70 %
उत्तर- (c) 65 %
5. बिहार में अति जल-दोहन से किस तत्व का सकेन्द्रण बढ़ा है?
(a) फ्लोराइड
(b) क्लोराइड
(c) आर्सेनिक
(d) लौह
उत्तर- (c) आर्सेनिक 
लघु उत्तरीय  प्रश्नोत्तर:
प्रश्न 1. बहुउद्देशीय परियोजना से आप क्या समझते है?
उत्तर – वैसी नदी घाटी परियोजना जिसका निर्माण दो या दो से अधिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु किया जाता है उसे बहुउद्देश्यीय परियोजना कहा जाता है। इन परियोजना के विकास के मुख्य उद्देश्य प्रायः इस प्रकार होते है-
          ● बाढ़ नियंत्रण
          ● मृदा अपरदन पर रोक
          ● पेयजल एवं सिंचाई हेतु जलापूर्ति
          ● विद्युत उत्पादन
          ● उद्योगों के जलापूर्ति
          ●  परिवहन
           मनोरंजन
          ● वन्य जीव संरक्षण, मत्स्य पालन, जल कृषि, पर्यटन इत्यादि।
जैसे- भाखड़ा-नाङ्गल, हीराकुंड, दमोदर, गोदावरी, कृष्णा इत्यादि  नदी परियोजन बहुउद्देशीय है।
प्रश्न 2. जल संसाधन के क्या उपयोग है? लिखें।
उत्तर– जल संसाधन का मानवीय जीवन में काफी उपयोगी है। यहाँ तक कि जीवन-सृजन में भी जल महत्वपूर्ण है। प्राणी एवम वनस्पति में भी अधिकांश भाग जल ही होते है। जल के उपयोग की सूची इस प्रकार है।  –पेयजल, घरलू कार्य, सिंचाई, उद्योग, जन स्वास्थ्य, स्वच्छ्ता तथा मूत्र विसर्जन इत्यादि।
प्रश्न 3. आन्तर्राष्ट्रीय जल-विवाद कारण है?
उत्तर– दो या अधिक राज्यों के बीच नदी जल के समुचित बंटवारे न होना ही जल-विवाद का मुख्य कारण है। चूँकि जल संसाधन का उपयोग सभी के लिए अति आवश्यक एवं व्यापक है।
जैस- कावेरी नदी के जल बंटवारे का विवाद कर्नाटक एवम तमिलनाडू के बीच काफी पुराना है।
प्रश्न 4. जल संकट क्या है?
उत्तर – जल की अनुपलब्धता ही जल संकट कहलाता है । जल संकट के भाव उत्पन्न  होते ही मानव मस्तिष्क पर सुख ग्रस्त या अनावृष्टि क्षेत्र(जहाँ वर्ष का अभाव हो) का चित्र उपस्थित होना स्वाभाविक है। पृथ्वी पर विशाल जल सागर होने एवं नवीकरणीय संसाधन होने के बावजूद जल संकट का होना एक जटिल समस्या है। जल संकट का मुख्य कारण बढ़ती जनसंख्या, उनकी व्यापक मांग, जल का अति उपयोग तथा जल के असमान वितरण का होना है। 
              
प्रश्न 5. भारत की नदियों के प्रदूषण के कारणों का वर्णन कीजिये।
उत्तर– भारत की नदियों के प्रदूषण के निम्नलिखित कारण है-
◆ मृत जानवरों एवं लाशों का नदियों में फेंक दिया जाना। 
◆ घरेलू एवं औद्योगिक अवशिष्टों का नदी में गिराया जाना।
◆  शहरों में बढ़ती आबादी एवं शहरी जीवनशैली।
◆ वाहित  मल कल का नदियों में निस्तारण। 
◆  धार्मिक अनुष्ठान एवम अन्धविश्वस।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर :
प्रश्न 1. जल संरक्षण से आप क्या समझते है ? इसके क्या उपाय है?
उत्तर –  जल संसाधनों की सीमित आपूर्ति,तेजी से फैलते प्रदूषण एवं वर्तमान समय मे मांग को देखते हुए जल संसाधनों का संरक्षण एवं प्रबंधन करना अति आवश्यक है ताकि लोगों के स्वस्थ जीवन, खाद्यान- सुरक्षा, आजीविका और उत्पादक अनुक्रियाओं को सुनिश्चित किया जा सके और नैसर्गिक परिवर्तनों के निम्नीकरण पर विराम लगाया जा सके। इस संदर्भ में निम्निलिखित विधियाँ कारगर हो सकती है –
(i) भूमिगत जल की पूनर्पूर्ति- पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने ‘जल मिशन’ संदर्भ देकर भूमि जल पुनर्पूर्ती पर बल दिया था। जिससे खातों, गांवों, शहरों, उद्योगों को पर्याप्त जल मिल सके। इसके लिए वृक्षारोपण, जैविक तथा कम्पोस्ट खाद का उपयोग, वेटलैंड्स(वेटलैंड्स) का संरक्षण, वर्षा जल का संचयन एवं मल-जल शोधन पुनः चक्रण जैसे क्रियाकलाप उपयोगी हो सकते हैं।
(ii) जल संभर प्रबंधन (Watershed Management)- जल प्रवाह या जल जमाव का उपयोग कर उद्यान, कृषि वानिकी, जल कृषि, कृषि उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। इससे पेयजल की आपूर्ति भी की जा सकती है। इस प्रबंधन को छोटी इकाइयों पर लागू करने की आवश्यकता है।
(iii) तकनीकि विकास- तकनीकी विकास से तात्पर्य ऐसे उपक्रम से है जिसमें जल का कम-से-कम उपयोग कर, अधिक से अधिक लाभ लिया जा सके। जैसे ड्रिप सिंचाई, लिफ्ट सिंचाई, सूक्ष्म फुहारों से सिंचाई, सीढ़ीनुमा खेती इत्यादि।
प्रश्न 2. वर्षा जल की मानव जीवन में क्या भूमिका है? इसके संग्रहण व पुनः चक्रण के विधियों का उल्लेख करें।
उत्तर – जल संकट की समस्या को को कम करने की दिशा में में वर्षा जल संग्रह एक लोकप्रिय एवं राहनीय कदम हो सकता है। वर्षा जल मानव जीवन मे काफी उपयोगी है पश्चिमी भारत खासकर राजस्थान में पेयजल हेतु वर्षा-जल का संग्रहण छत पर करते थे। पश्चिम बंगाल के बाढ़ मैदान में सिंचाई के लिए बाढ़ जल वाहिकाएँ बनाने का चलन था। शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में वर्ष-जल को एकत्रित करने के लिए गड्ढ़ों का निर्माण कर मृदा सिंचित का कार्य किया जाता था। मेघालय के शिलांग में छत पर वर्षा जल संग्रहण आज भी परम्परागत रूप में परिचित है।

                 कर्नाटक के मैसूर जिले में स्थित गंगथर गाँव में छत पर जल संग्रहण की व्यवस्था 200 घरों में है जो जल संरक्षण की दिशा में एक मिसाल है। वर्तमान समय में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश बाजस्थान एवं गुजरात सहित कई राज्यों में वर्षा-जल संरक्षण एवं पुनः चक्रण किया जा रहा है।


Read More:

इकाई-1. (क) प्राकृतिक संसाधन / बिहार बोर्ड-10 Geography Solutions खण्ड (क)

     बिहार बोर्ड वर्ग-10वाँ Geography Solutions

खण्ड (क)

इकाई-1. (क) प्राकृतिक संसाधन

प्राकृतिक संसाधन


प्राकृतिक संसाधन

वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

1. पंजाब में भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण है:
(a) वनोन्मूलन
(b) गहन खेती
(C) अति पशुचारण
(d) अधिक सिंचाई
उत्तर- (d) अधिक सिंचाईं

2. सौपानी कृषि किस राज्य में प्रचलित है?
(a) हरियाणा
(b) पंजाब
(C) कर्नाटक
(d) उत्तराखंड
उत्तर- (d) उत्तराखंड

3.मरुस्थलीय मृदा का विस्तार निम्न में से कहाँ है?
(a) उत्तर प्रदेश
(b) राजस्थान
(C) कर्नाटक
(d) महाराष्ट्र
उत्तर- (b) राजस्थान

4. मेढ़क के प्रजनन को नष्ट करने वाला रसायन कौन है?
(a) बेंजीन
(b) यूरिया
(c) एंड्रिन
(d) फॉस्फोरस
उत्तर – (c) एंड्रिन

5. काली मृदा का दूसरा नाम क्या है?
(a) बलुई
(b) रेगुर मृदा
(c) लाल मृदा
(d) पर्वतीय मृदा
उत्तर- (b) रेगुर मृदा

लघु उत्तरीय  प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. जलोढ़ मृदा के विस्तार वाले राज्यों के नाम बतावें। इस मृदा में कौन-कौन सी फसलें लगायी जा सकती हैं?
उत्तर– जलोढ़ मृदा के विस्तार वाले राज्य  बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा इत्यादि है।

       इस मृदा में गन्ना, धान, गेहूं, मक्का, दलहन, तेलहन जैसी फसल उपयुक्त मानी जाती है।

प्रश्न 2. समोच्च कृषि से आप क्या समझते है?
उत्तर– पहाड़ी क्षेत्रों में जल के तेज बहाव के कारण होने वाले मृदाअपरदन से बचने के लिए पहाड़ी ढलानों पर की जाने वाली सीढ़ीनुमा खेती को समोच्च कृषि कहा जाता है।
प्रश्न 3. पवन अपरदन वाले क्षेत्रों में कृषि की कौन-सी पद्धति उपयोगी मानी जाती है?
उत्तर– पवन अपरदन वाले क्षेत्रों में पट्टिका कृषि पध्दति उपयोगी मानी जाती है। यह फसलों के बीच घास की पट्टियां विकसित करने पर आधारित है। 

प्रश्न 4. भारत के किन भागों में नदी डेल्टा का विकास हुआ है ? यहाँ की क्या विशेषता है।

उत्तर– भारत के पूर्वी तटीय भागों में गंगा- ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, एवं कावेरी नदियों द्वारा डेल्टा का विकास हुआ है। यहाँ जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है जिसका निर्माण बालू, सिल्ट, एवं मृतिका के विभिन्न अनुपात से होता है। इसका रंग धुंधला से लेकर लालिमा लिये हुये भूरे होता है।

प्रश्न 5. फसल चक्रण मृदा संरक्षण में किस प्रकार सहायक है?
उत्तर– दो फसलों के बीच एक दलहन या तेलहन की फसलों को उगाना ही फसल चक्रण कहलाता है। इसके द्वारा मृदा के पोषणीय स्तर को बरकरार रखा जा सकता है क्योंकि इससे नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. जलाक्रांतता कैसे उपस्थित होता है ? मृदा अपरदन में इसकी क्या भूमिका है ?
उत्तर- अति सिंचन से जलाक्रांतता (WaterLogging) की समस्या पैदा होती है जिससे मृदा में लवणीय और क्षारीय गुण बढ़ जाती है जो भूमि के निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी होते है। अर्थात इससे मृदा की उर्वरा शक्ति घटते जाती है और भूमि धीरे-धीरे बंजर में बदल जाती है।                                                                                                                        
              इस प्रकार की समस्या मुख्यत: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अति सिंचाई से भूमि का निम्नीकरण की समस्या देखने को मिलती है।
प्रश्न 2. मृदा संरक्षण पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर- मृदा को बंजर या अनुपजाऊ होने से बचाना ही मृदा संरक्षण कहलाता है। मृदा पारितंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह न केवल पेड़ पौधों के विकास का माध्यम है बल्कि पृथ्वी पर विद्यमान अनेकों जीव समुदायों के भरण-पोषण भी करती है। मृदा में मौजूद उर्वराशक्ति मानव के आर्थिक क्रियाकलापों को प्रभावित करती है। लगभग 1 सेंटीमीटर मोटी मृदा परत के निर्माण में हजारों वर्षों का समय लगता है।                         
                     मृदा का अपने मूल स्थान से अपरदन के विविध क्रियाओं द्वारा स्थानांतरित होना भू-क्षरण कहलाता है। यह मृदा की एक बहुत बड़ी समस्या है। मृदा-क्षरण के कई कारणों जैसे वायु और जल के तेज बहाव, जलक्रांतता,अतिपशुचारण, खनन, रसायनों का अत्यधिक उपयोग जैसी मानवीय अनुक्रियाओं द्वारा होता है। वृक्षारोपण, पट्टिका कृषि, फसलचक्रण, समोच्च कृषि इत्यादि द्वारा मृदा-क्षरण को रोकना ही मृदा संरक्षण का मुख्य तरीका है। रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खाद का उपयोग मृदा संरक्षण में सहायक होता है। वृक्षारोपण से भी मृदा संरक्षण बढ़ता है; क्योंकि इससे मृदा को बाधा पहुँचती है और इनकी पत्तियों से प्राप्त ह्यूमस मृदा की गुणवत्ता को बढ़ाने में सहायक होते हैं।
प्रश्न 3. भारत में अत्यधिक पशुधन होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग नगण्य है। स्पष्ट करें।
उत्तर- भारत पशुधन के मामले में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल किया जाता है। विश्व मे सबसे अधिक पशु भारत में ही पाये जाते है परंतु यहाँ स्थायी चारागाह के लिए बहुत कम भूमि उपलब्ध है जो कि पशुधन के लिए पर्याप्त नहीं है। परिणामस्वरूप पशुपालन पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। 
            भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुधन का योगदान लगभग नगण्य होने का कारण निम्नलिखित कारण है-
◆उत्तम किस्म के पशुनस्लों में भारी कमी।
◆वैज्ञानिक प्रणाली एवं तकनीकी ज्ञान का अभाव।
◆चारागाह का अभाव।
◆बढ़ती आबादी का दबाव।
◆पूँजी का अभाव इत्यादि। 
◆ इच्छा शक्ति की कमी। 
◆पशुचिकित्सक का अभाव।

Read More:

इकाई 1 भारत : संसाधन एवं उपयोग / बिहार बोर्ड-10 GEOGRAPHY SOLUTIONS  खण्ड (क)

इकाई 1 भारत : संसाधन एवं उपयोग

खण्ड (क)

बिहार बोर्ड वर्ग-10वाँ GEOGRAPHY SOLUTIONS 

संसाधन एवं उपयोग



संसाधन एवं उपयोग

वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

1.कोयला किस प्रकार का संसाधन है?

(a) अनवीकरणीय

(b) नवीकरणीय

(c) जैव

(d) अजैव

उत्तर- (a) अनवीकरणीय

2.सौर ऊर्जा निम्नलिखित में से कौन-सा संसाधन है:

(a) मानवकृत

(b) पुनः पूर्तियोग्य

(C) अजैव

(d) अचक्रीय

उत्तर- (b) पुनः पूर्तियोग्य

3. तट रेखा से कितने कि०मी० क्षेत्र सीमा अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र कहलाते है?

(a) 100 N.M.

(b) 200N.M.

(C) 150 N.M.

(d) 250N.M.

उत्तर- (b) 200 N.M.

4. डाकुओं की अर्थव्यवस्था का संबंध है:-

(a) संसाधन संग्रहण से

(b) संसाधनों के अनियोजित विदोहन से

(C) संसाधन के नियोजित दोहन से

(d) इनमें से कोई नहीं।

उत्तर- (b) संसाधनों के अनियोजित विदोहन से

5. समुद्री क्षेत्र में राजनैतिक सीमा के कितनी कि०मी० क्षेत्र तक राष्ट्रीय सम्पदा निहित है:-

(a) 10.2 कि०मी०

(b) 15.5 कि०मी०

(C) 12.2 कि०मी०

(d) 19.2 कि०मी०

उत्तर- (d) 19.2 कि०मी०

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. संसाधन को परिभाषित कीजिये।

उत्तर- संसार में उपलब्ध वे सभी वस्तुएँ जिसका मानव अपने उपयोग में करता हो उसे संसाधन कहते है। जिमरमैन के अनुसार, संसाधन होते नहीं बनते हैं। संसाधन भौतिक एवं जैविक दोनों हो सकते हैं। भूमि मृदा,जल खनिज जैसे भौतिक संसाधन मानवीय आकांक्षाओं की पूर्ति संसाधन बन जाते हैं। जैविक संसाधन वनस्पति, वन्यजीव तथा जलीय जीव जो मानवीय जीवन को सुखमय बनाते हैं।

प्रश्न 2. संभावी एवं संचित-कोष संसाधन में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- संभावी संसाधन- संभावी संसाधन ऐसे संसाधन को कहते है जिसका उपयोग भविष्य में लाये जाने की संभावना बनी रहती है। यह किसी विशेष क्षेत्र में मौजूद होते है। जैसे- हिमालयी क्षेत्र का खनिज, राजस्थान एवम गुजरात क्षेत्र में पवन और सौर ऊर्जा का उपयोग अभी तक नहीं किया किया गया।

संचित-कोष संसाधन- ऐसे संसाधन जिसे वर्तमान में उपलब्ध तकनीक के आधार पर प्रयोग में लाया जा सकता है, संचित-कोष संसाधन कहलाता है। यह भी भविष्य की पूँजी है। जैसे – नदी जल का उपयोग भविष्य में व्यापक रुप से जल विधुत निर्माण में किया जाएगा।

प्रश्न 3. संसाधन संरक्षण की उपयोगिता को लिखिए।

उत्तर – संसाधनों का योजनाबद्व समुचित एवं विवेकपूर्ण उपयोग ही संसाधन संरक्षण कहलाता है। संसाधनों  का अविवेकपूर्ण या अतिशय उपयोग विविध प्रकार के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, एवं पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देते है। अतः इन समस्याओं से बचने हेतु विभिन्न स्तरों पर संरक्षण की आवश्यकता है। इस संदर्भ में महान दार्शनिक महात्मा गांधी के विचार प्रासंगिक है – “हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत कुछ है लेकिन पेटी के लिए कुछ नहीं”। मेधा पाटेकर का ‘नर्मदा  बचाओ आंदोलन’ सुंदर लाल बहुगुणा का ‘चिपको आंदोलन’ एवं संदीप पाण्डे  द्वारा वर्षा -जल संचय कर कृषित भूमि का विस्तार,संसाधन संरक्षण दिशा में अत्यंत सराहनीय  कदम है।

प्रश्न 4. संसाधन निर्माण में तकनीक की क्या भूमिका है, स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- संसाधन-निर्माण में तकनीक की भूमिका अत्यंत ही महत्वपूर्ण होती है, केवल संसाधनों की उपलब्धता से ही विकास संभव नहीं है बल्कि संसाधनों में वांछित परिवर्तन के साथ-साथ तकनीकी  का उपयोग करना अति आवश्यक है। क्योंकि अनेक प्रकृति-प्रदत्त वस्तुएँ तब तक संसाधन का रूप नहीं लेती जबतक कि किसी विशेष तकनीक द्वारा उन्हें उपयोगी नहीं बनाया जाता। जैसे- नदियों के बहते जल से पनबिजली उत्पन्न करना, बहती हुई वायु से पवन ऊर्जा उत्पन्न करना, भूगर्भ में उपस्थित खनिज अयस्कों का शोधन कर उपयोगी बनाना, इन सभी में अलग-अलग तकनीकों की आवश्यकता होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. संसाधन के विकास में ‘सतत विकास’ की अवधारणा की व्याख्या कीजिये।

उत्तर- पर्यावरण को क्षति पहुँचाये बिना भविष्य की आवश्यताओं के मद्देनजर, वर्तमान विकास को कायम रखने की धारणा ही ‘सतत विकास’ की अवधारणा कहलाता है। संसाधन मनुष्य के जीविका का आधार है। जीवन की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए संसाधनों के सतत विकास की अवधारणा अति आवश्यक है। ‘संसाधन प्रकृति प्रदत उपहार है’ की अवधारणा के कारण मानव ने इनका अंधाधुंध दोहन किया, परिणामस्वरूप अनेकों पर्यावरणीय समस्याएं उतपन्न हो गयी है। जैसे- भूमण्डलीय तपन (Global Warming), ओज़ोन क्षय, पर्यावरण-प्रदूषण, मृदाक्षरण, भूमि-विस्थापन, अम्लीय वर्षा, असमय ऋतु-परिवर्तन इत्यादि।

       अतः उपरोक्त समस्याओं से निजात पाने हेतु वर्तमान समय में सतत विकास की अवधारणा को विश्व स्तर पर पालन करने की आवश्यकता है ताकि विश्व शांति के साथ साथ जैव जगत को भी गुणवत्तापूर्ण जीवन लौट सके और वर्तमान विकास के  साथ भविष्य भी सुरक्षित हो सके।

प्रश्न 2. स्वामित्व के आधार पर संसाधन के विविध स्वरूपों का वर्णन कीजिये।

उत्तर- स्वामित्व के आधार पर संसाधन चार प्रकार के होते है-

व्यक्तिगत संसाधन: ऐसे संसाधन जिस पर किसी खास व्यक्ति का अधिकार हो उसे व्यक्तिगत संसाधन कहते है। जैसे- भूखंड, घर व अन्य जायदाद, बाग-बगीचा, तालाब, कुआँ इत्यादि जिस पर व्यक्ति निजी स्वामित्व रखता है।

सामुदायिक संसाधन- ऐसे संसाधन जिस पर किसी खास समुदाय का आधिपत्य होता है, उसे सामुदायिक संसाधन कहते है। जैसे- गाँवों में  श्मशान, मंदिर या मस्जिद परिसर, सामुदायिक भवन, तालाब आदि। शहरों में सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल, खेल मैदान, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, एवं गिरिजाघर।

राष्ट्रीय संसाधन- ऐसे संसाधन जिस पर राष्ट्र या देश का अधिकार हो, उसे राष्ट्रीय संसाधन कहते है। जैसे- किसी राजनीतिक सीमा के अंतर्गत भूमि, खनिज पदार्थ, जल संसाधन, वन व वन्यजीव एवं समुद्री जीव (200 KM महासागरीय क्षेत्र तक) राष्ट्रीय संसाधन है।

अंतरार्ष्ट्रीय संसाधन- ऐसे संसाधन जिस पर दो या दो से अधिक देशों का अधिकार हो, उसे अंतराष्ट्रीय संसाधन कहते है। जैसे- किसी देश की तट रेखा से 200 KM की  दूरी तक का क्षेत्र (अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र)।



Read More:

अध्याय 13 समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन

 खण्ड (ब)  अध्याय 13 समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन 

बिहार बोर्ड के 9वीं कक्षा का भूगोल विषय का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर

सरल एवं आसान शब्दों में उत्तर देना सीखें


 अध्याय 13 समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन 

13 समुदाय आधारित आपदा प्रबंवस्तुननिष्ठ प्रश्नोत्तर
 
1. आपदा प्रबंधन के तीन प्रमुख अंगों में कौन एक निम्नलिखित में शामिल नहीं है?
(क) पूर्वानुमान,चेतावनी एवं प्रशिक्षण
(ख) आपदा के समय प्रबंधन गतिविधियाँ
(ग) आपदा के बाद निश्चित रहना
(घ) आपदा के बाद प्रबंधन का कार्य करना
उत्तर – (ग) आपदा के बाद निश्चित रहना 
2. प्रत्येक ग्रीष्म ऋतु में कौन सी आपदा लगभग निश्चित है?
(क) आगजनी
(ख) वायु दुर्घटना
(ग) रेल दुर्घटना
(घ) सड़क दुर्घटना
उत्तर – (क) आगजनी
3. सामुदायिक प्रबंधन के अन्तर्गत निम्नलिखित में से कौन एक प्राथमिक क्रियाकलाप में शामिल नहीं है? 
(क) निकटतम प्राथमिक चिकित्सा केंद्र को सूचना। 
(ख) प्रभावित लोगों को स्वछ जल और भोजन की उपलब्धता की गारंटी करना।
(ग) आपदा की जानकारी प्रशासन तंत्र को नहीं देना।
(घ) आपातकालीन राहत शिविर की व्यवस्था करना। 
उत्तर – (ग) आपदा की जानकारी प्रशासन तंत्र को नहीं देना। 
4. ग्रामीण आपदा प्रबंधन समिति के प्रमुख कार्य नहीं है?
(क) प्राथमिक उपचार की व्यवस्था नहीं करना।
(ख) सभी को सुरक्षा देना।
(ग) राहत शिविर का चयन एवं राहत पहुँचाने का कार्य करना।
(घ) स्वछता का ख्याल रखना।
उत्तर – (क) प्राथमिक उपचार की व्यवस्था नहीं करना।
 
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
1.अग्निशमन दस्ता आने के पूर्व समुदाय द्वारा कौन से प्रयास किए जाने चाहिए?
उत्तर- अग्निशमन दस्ता के आने के पूर्व ही समुदाय इसके प्रभाव को कम करने का प्रयास करता है। ये निम्नलिखित काम होना चाहिए-
◆झुलसे हुए लोगों को एक जगह ले जाकर प्राथमिक उपचार आवश्यक है। 
◆आगजनी स्थिति में पंचायत या विद्यालय भवन में ले जाना महत्वपूर्ण है। 
◆ जले हुए भाग पर पानी डालना और चंदन के लेप लगाने से जले लोगों को बड़ी राहत मिलती है 
◆ जले हुए भाग पर बर्फ के उपयोग से भी राहत मिलती है। 
◆टेलीफोन या मोबाइल का प्रयोग करते हुए निकटतम अस्पताल से एंबुलेंस को मंगाकर अर्द्ध जले हुए लोगों को अच्छे उपचार के लिए अस्पताल पहुँचाना चाहिए।
◆ जले हुए क्षेत्र पर जल का छिड़काव करें या खलिहान के फसल को हटाने का कार्य करें।
2.ग्रामीण स्तर पर आपदा प्रबंधन समिति के गठन में कौन-कौन से सदस्य शामिल होते हैं?
उत्तर- ग्रामीण स्तर पर आपदा प्रबंधन समिति के गठन में निम्नलिखित सदस्य होते हैं-
◆ विद्यालय के प्रधानाचार्य
◆ गाँव के मुखिया
◆ गाँव के सरपंच
◆ गाँव के दो समर्पित
◆ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का एक डॉक्टर
◆ राष्ट्रीय सुरक्षा सेवा के सदस्य (NSS)
◆ ग्राम सेवक
◆  स्वयं सहायता समूह की दो महिलाएँ 
3.आपदा प्रबंधन के लिए समुदाय में किन अच्छे गुणों का होना आवश्यक है?
उत्तर- आपदा प्रबंधन के लिए समुदाय में निम्नलिखित अच्छे गुणों का होना आवश्यक है-
◆ समुदाय के लोग व्यक्तिगत हितों की अपेक्षा समाज के हित का ध्यान रखें।
◆ सामूहिक कार्यों के लिए साहसी, परिश्रमी लोगों का चयन करना चाहिए। कमजोर, आलसी और लालची लोग समाज पर बोझ बन जाते हैं।
◆ सामूहिक संगठन के सदस्यों में जात-पात, धर्म-संप्रदाय की तुच्छ भावना की जगह मानव कल्याण और सद्भाव की भावना रहनी चाहिए।
◆ सदस्यों में सजगता आवश्यक है जिससे वे आपदा से निपटने के लिए तुरंत काम कर सकें। अनेक ऐसे उदाहरण है जब समाज के प्रबुद्ध लोगों ने संप्रदायिक मतभेदों को दूर कर बड़ी घटनाओं को रोका है।
◆ समुदाय के लोगों में साहस, उत्साह तथा न्याय के गुण होने चाहिए, गैर-कानूनी कार्य करने वालों पर सख्ती बरतना भी समुदाय का आवश्यक गुण है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
1. आपदा प्रबंधन में समुदाय की केंद्रीय भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर- आपदा का रूप कोई भी क्यों ना हो उसका विनाशकारी प्रभाव जान-माल पर पड़ती ही है। आपदा का पहला झटका मनुष्य को ही लगता है और मनुष्य ही आपदा को पहला झटका भी देता है। जब वह आपदा को न्यून करने का समुदायिक प्रयास प्रारंभ करता है। आपदा से होने वाली वास्तविक ह्रास का सही अनुमान समुदाय ही लगा सकता है। आपदा प्रबंधन के लिए जो भी आकस्मिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती है उसके वितरण में तथा प्रत्येक परिवार तक उसके लाभ को पहुँचाने में समुदाय की केंद्रीय भूमिका होती है।
        समुदाय ही आपदा के पूर्वानुमान की जानकारी देता है और समुदाय के लोग ही सबसे पहले आपदा का सामना करते हैं। आपदा में मकान जल सकते हैं, घरें गिर सकती है, बाढ़ आ सकता है, किंतु समुदाय नहीं टूटता है। समुदाय सुख-दुख का साथी होता है और भारत जैसे ग्रामीण देश में आपदा प्रबंधन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी समुदाय की होती है। प्रशासनिक प्रबंधन कार्य और स्वयंसेवी संस्थाओं का प्रबंधन कार्य भी सामुदायिक नेतृत्व के माध्यम से ही सफलता पूर्वक संभव होता है।
2. ग्रामीण आपदा प्रबंधन समिति के कार्यों का विस्तृत वर्णन करें।
उत्तर – ग्रामीण आपदा प्रबंधन समिति के निम्नलिखित कार्य होते हैं-
◆ पूर्वानुमान के आधार पर चेतावनी एवं सूचना देना- यह प्रबंधन समिति जिला मुख्यालय से प्राप्त सूचनाओं को तत्काल लोगों तक पहुंच जाएगा।
◆ राहत शिविर का चयन और प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने का कार्य- इसी के साथ जिला प्रशासन को सूचित करेगा अगर आगजनी है तो दमकल को सूचित करेगा।
◆ राहत कार्य- मुख्य रूप से लोगों को भोजन एवं पेयजल उपलब्ध कराना। 
◆ प्राथमिक उपचार की व्यवस्था।
◆ सभी को सुरक्षा देना- महिला, बच्चों को विशेष रुप से ध्यान देना।
◆ स्वच्छता का ख्याल रखना- स्वच्छता रखने से विभिन्न प्रकार की बीमारी नहीं फैलती है।
3. आपदा प्रबंधन में समुदाय की भागीदारी को कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है?
उत्तर- आपदा प्रबंधन में समुदाय की भागीदारी को निम्नलिखित प्रकार से सुनिश्चित किया जा सकता है-
◆ निकटतम विद्यालय में विद्यार्थियों के बीच यह घोषित करना कि बाढ़ अथवा आंधी की संभावना है इसलिए घर में लोगों को सचेत कर देना।
◆ मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर में जाकर प्राकृतिक अथवा मानव जनित संभावित आपदाओं की जानकारी देना। यह जानकारी उस समय उचित होगा जब प्रार्थना के लिए अधिक से अधिक लोग उपस्थित हों। यदि आवश्यक हो तो धर्मस्थल में लगे हुए सार्वजनिक उदघोषणा के द्वारा भी जानकारी दी जा सकती है।
◆ ऐसे परिवारों की सूची बनाना जहाँ अत्यधिक उम्र के वृद्ध, शिशु, गर्भवती महिला, बीमार और विक्षिप्त लोग हों। ऐसे लोगों के विस्थापन हेतु विशेष दल का गठन करना।
◆ पंचायत भवन और गाँव के विद्यालय में राहत शिविर के लिए आपातकालीन व्यवस्था करना जिसमें खान-पान के अतिरिक्त नाव, तैरनेवाले जैकेट, चिकित्सक और अभियंताओं की व्यवस्था करना।

◆ आगजनी, महामारी, जाति और संप्रदायिक तनाव और ओलावृष्टि जैसे आपदा में परिवहन की व्यवस्था खना, जो संबंधित अधिकारी तक मोबाइल अथवा फोन नहीं रहने पर सूचना पहुँच सके।


Read More:

5. BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN / हिंद महासागर के तलीय उच्चावच

5. BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN

(हिंद महासागर के तलीय उच्चावच)

BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN



BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN

         हिंद महासागर के तली का विस्तृत अध्ययन नहीं किया गया है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है। इसकी लंबाई लगभग 10000 किमी० और चौड़ाई 9000 किमी० है। इसका क्षेत्र 7.34 करोड़ वर्ग किमी० है। यह कुल महासागरीय जल का 20% जल अपने पास रखता है। इसके किनारे पर पूर्व में आस्ट्रेलिया, उत्तर में एशिया, पश्चिम में अफ्रीका और दक्षिण में अंटार्कटिका महाद्वीप उपस्थित है।

         हिंद महासागर का दक्षिणी भाग अंटार्कटिका के पास, पूरब में प्रशांत महासागर और पश्चिम में अटलांटिक महासागर से जुड़ जाता है। इसका तलीय भाग एवं तटीय भाग कठोर एवं सघन चट्टानों से निर्मित है। हिंद महासागर के तटीय भाग में ब्लॉक पर्वतों का प्रमाण मिलता है क्योंकि इसका निर्माण गोंडवाना भूखंड के विखंडन एवं उनके स्थानांतरण से हुआ है। हिन्द महासागर के पूर्वी भाग में मोड़दार पर्वतों की श्रेणियाँ है जो हिमालय का ही भाग माना जाता है। इसी मोड़दार पर्वत श्रृंखला पर कोको द्वीप, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह स्थित है। सामान्यत: प्रायद्वीपीय भारत दक्षिण में स्थित हिंद महासागर को दो भागों में बाँट देता है-

(1) बंगाल की खाड़ी

(2) अरब सागर।

       हिंद महासागर के सीमांत क्षेत्रों में कई छोटे-छोटे सागर मिलते हैं। जैसे- फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी, लाल सागर, मोजांबिक चैनल, अंडमान सागर इत्यादि।

     1965 में अंतरराष्ट्रीय हिंद महासागर अभियान जर्मन एवं भारतीय समुद्री वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। इनके अनुसार हिंद महासागर की औसत गहराई 4000 मीटर है। जॉनसन महोदय ने प्रादेशिक विशेषताओं के आधार पर हिंद महासागर को तीन भागों में वर्गीकृत किया है:-  

(1) पश्चिमी भाग- अफ्रीका के समीप, औसत गहराई 2000 फैदम

(2) पूर्वी भाग- ऑस्ट्रेलिया के पश्चिम में, औसत गहराई 3000 फैदम

(3) सँकरा और महाद्वीपीय मग्नढाल वाला क्षेत्र मध्यवर्ती भाग- एक उत्थित कटक के रूप में।

            सामान्य तौर पर हिंद महासागर के तलीय उच्चावच का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत करते हैं:-

(1) महाद्वीपीय मग्नतट

      हिंद महासागर के मग्नतट में काफी विविधता दिखाई देती है। इसकी औसत चौ० 640 किलोमीटर है। सबसे चौड़ा मग्नतट अफ्रीका के पूर्व और मेडागास्कर के समीप में पाए जाते हैं। इसी तरह बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर में भी चौड़े मग्नतट मिलते हैं। लेकिन आस्ट्रेलिया के पश्चिमी भाग और अंटार्कटिका के उत्तरी भाग में सँकरे मग्नतट मिलते हैं। जावा एवं सुमात्रा द्वीप के पास इसकी चौड़ाई मात्र 160 किलोमीटर है।

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल

     यह महाद्वीपों का अंतिम किनारा होता है। जिन-जिन क्षेत्रों में सँकरे महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ मग्नढाल तीव्र होता है और जिन क्षेत्रों में मंद ढाल वाले महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ पर महाद्वीपीय मग्नढाल भी मन्द होता है।

(3) महासागरीय कटक

       हिंद महासागर में उत्तर से दक्षिण दिशा में फैला एक मुख्य कटक मिलता है और इस मुख्य घटक के सहारे सहायक कटक भी मिलते हैं। हिंद महासागरीय कटक का आकार ‘Y’ अक्षर के समान है। यह समुद्र तल से 4000 मीटर नीचे तक अवस्थित है। यह कटक हिंद महासागर को पूर्वी एवं पश्चिमी भागों में बाँट देता है। कहीं-कहीं पर यह कटक समुद्री सतह से ऊपर चला जाता है जिस पर कई द्वीप बसे हुए हैं। जैसे- लक्षद्वीप, मालद्वीप, मॉरीशस द्वीप, कोकस किलिंग द्वीप, क्रिसमस द्वीप, रियूनियन द्वीप, सेशेल्स द्वीप, चैगोस द्वीप, डियागो गार्सिया द्वीप, प्रिंस एडवर्ड द्वीप, क्रोजेट द्वीप, कारगुलेन द्वीप, एमस्टर्डम द्वीप, सेंट पॉल द्वीप,  इत्यादि। यह उत्तर में प्रायद्वीपीय भारत के किनारे से शुरू होकर दक्षिण में अंटार्कटिका तक फैला हुआ है।

       प्रायद्वीपीय भारत के दक्षिण में इस कटक की चौड़ाई सर्वाधिक है। इसे लक्षद्वीप और मालद्वीप के बीच लक्काद्वीप चैगोस कटक कहते हैं। यही कटक दक्षिण की ओर बढ़ता चला जाता है। इसे विषुवत रेखा तथा 30° दक्षिणी अक्षांश के बीच चैगोस सेंटपॉल कटक कहते हैं। 30° से 50° दक्षिणी अक्षांश के बीच इसे एम्सटर्डम सेंटपॉल कटक कहते हैं। यहाँ पर इसकी चौड़ाई 1600 कि०मी० हो जाता है। 50° दक्षिणी अक्षांश के पास यह दो शाखाओं में विभक्त हो जाती है। पश्चिमी शाखा को करगुलेन गॉसबर्ग कटक और पूर्वी शाखा को इंडियन अंटार्कटिका कटक कहते हैं।

        हिंद महासागर का मुख्य कटक कई भागों में विभक्त है। जैसे- 5° दक्षिणी अक्षांश से एक शाखा निकलकर उत्तर-पश्चिम दिशा में चली जाती है जिसे सोकोत्रा चैगोस या कॉल्सबर्ग कटक कहते हैं। 18° दक्षिणी अक्षांश के पास से एक कटक निकलती है जिसे सेशेल्स कटक कहते हैं। यही कटक अचानक दक्षिण-पश्चिम दिशा में मुड़ जाता है जिसे मलागासी कटक कहते हैं। 48° दक्षिणी अक्षांश के पास हिंद महासागर के पश्चिमी भाग में एक कटक अवस्थित है, जिसे प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक कहते हैं। पूर्वी हिंद महासागर में 50° दक्षिणी अक्षांश के पास से ही एक कटक पूरब की ओर चली जाती है, जिसे दक्षिण-पूर्व इंडियन कटक कहते हैं।

सूची-

1. लक्काद्वीप चैगोस कटक

2. चैगोस सेंटपॉल कटक

3. एम्सटर्डम सेंटपॉल कटक

4. करगुलेन गॉसबर्ग कटक

5. इंडियन अंटार्कटिका कटक

6. सोकोत्रा चैगोस या कॉल्सबर्ग कटक

7. सेसिल्स कटक

8. मलागासी कटक

9. प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक

10. दक्षिण-पूर्व इंडियन कटक

(4) महासागरीय मैदान

      महासागरीय कटक हिंद महासागर को कई गहन सागरीय मैदानों में विभक्त करते हैं। जैसे-

(i) ओमान बेसिनओमान की खाड़ी में स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(ii) अरेबियन बेसिन- यह लक्काद्वीप चैगोस कटक और  सोकोत्रा द्वीप चैगोस के बीच स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट है।

(iii) सोमाली बेसिन- यह सोकोत्रा चैगोस, सेंटपाल कटक और सेशेल्स कटक के बीच स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(iv) मॉरीशस बेसिन- यह मलागासी और सेंट पाल कटक के बीच स्थित है। इसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट है।

(v) नेटाल बेसिन- मलागासी और दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी तट के बीच स्थित है। इसकी औसत गहराई 18000 फीट है।

(vi) अटलांटिक-भारतीय-अंटार्कटिका बेसिनयह अंटार्कटिका, दक्षिण अफ्रीका और प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक के बीच अवस्थित है। इसकी औसत गहराई 18000 फीट है।

(vii) अंडमान बेसिन- यह बंगाल की खाड़ी में अंडमान निकोबार के पूर्वी भाग में स्थित है। इसकी औसत गहराई 6000 से 12000 फीट है।

(viii) भारत-ऑस्ट्रेलिया बेसिन- इसका विस्तार 10° दक्षिणी अक्षांश से 50° दक्षिणी अक्षांश के बीच पूर्वी हिंद महासागर में हुआ है। इसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट के बीच है।

(ix) पूर्वी भारतीय अंटार्कटिका बेसिन- यह पूर्वी हिंद महासागर के सबसे दक्षिणी भाग में स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(5) महासागरीय गर्त

        हिंद महासागर में 6 प्रमुख गर्त मिलते हैं। इसके 60% भूभाग पर गहन सागरीय मैदान है। इसलिए इसमें गर्तों की संख्या बहुत कम है। हिंद महासागर का सबसे गहरा गर्त सुंडा गर्त है जो सुमात्रा एवं जावा द्वीप के पश्चिमी भाग में स्थित है जिसकी गहराई 7725 मीटर है।

निष्कर्ष

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट होता है कि हिंद महासागर के तलीय उच्चावच में भी अनेक विविधतापूर्ण विशेषताएँ मौजूद है।



Read More:

4. BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN / अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच

4. BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN 

(अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच)


BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN ⇒
BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN

           अटलांटिक महासागर पश्चिम में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका और पूर्व में यूरोप तथा अफ्रीका के मध्य 8.2 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अवस्थित है। यह संपूर्ण विश्व के क्षेत्रफल का 1/6 भाग तथा प्रशांत महासागर के क्षेत्रफल का 1/2 भाग है। इसका आकार अंग्रेजी के ‘S’ अक्षर के समान है जिससे यह प्रमाणित होता है कि प्रारंभ में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका यूरोप तथा अफ्रीका से मिले थे। बाद में महाद्वीपीय प्रवाह के कारण उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका अलग होकर पश्चिम दिशा में प्रवाहित हो गए। जिस कारण अटलांटिक महासागर का निर्माण हुआ।

       उत्तर में यह डेविस की खाड़ी तथा डेनमार्क जलडमरूमध्य एवं नार्वेजियन सागर द्वारा आर्कटिक सागर से जुड़ा हुआ है। अफ्रीका के दक्षिण में यह हिन्द महासागर से मिला हुआ है। अटलांटिक महासागर दक्षिण में सर्वाधिक चौड़ा है। 35° दक्षिणी अक्षांश पर इसकी पूर्वी-पश्चिमी चौड़ाई 5920 किलोमीटर है। भूमध्य रेखा की ओर यह निरंतर सँकरा होता जाता है। साओरोक अंतरीप तथा लाइबेरिया तट के बीच चौड़ाई 2560 किलोमीटर ही है। उत्तर की ओर चौड़ाई पुनः बढ़ती जाती है। 40° उत्तरी अक्षांश पर यह 4800 किलोमीटर हो जाती है। अटलांटिक महासागर के सीमांत सागरों में रूम सागर, कैरेबियन सागर, मेक्सिको की खाड़ी, बाल्टिक सागर, उत्तरी सागर, बैफिन की खाड़ी आदि प्रमुख है।

           अटलांटिक महासागर के नितल में निम्नलिखित चार प्रमुख रूप देखने को मिलते हैं:-

(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)

            कुछ भागों को छोड़कर अटलांटिक महासागर के चारों ओर चौड़े मग्नतट पाए जाते हैं। उत्तरी अटलांटिक महासागर में मग्नतट सर्वत्र सपाट एवं चौड़े हैं। मग्नतट की चौड़ाई समीपी तट के उच्चावच पर आधारित होती है। पर्वतीय अथवा पठारी तटों के मग्नतट अत्यधिक सँकरे और मैदानी तटों के मग्नतट अत्यधिक विस्तृत और समतल होते हैं। जैसे – बिस्के की खाड़ी से उत्तमाशा अंतरीप के बीच अफ्रीका का मग्नतट तथा 5°-10° S अक्षांश के बीच ब्राजील का मग्नतट सँकरा हो गया है। इसके विपरीत उत्तरी अमेरिका के उत्तरी-पूर्वी भाग तथा उत्तरी-पश्चिमी यूरोप के मग्नतट 240 से 400 किलोमीटर तक चौड़े है। न्यूफाउंडलैंड (ग्रांड बैंक) तथा ब्रिटिश द्वीप (डागर बैंक) के चारों ओर विस्तृत मग्नतट पाए जाते हैं। ग्रीनलैंड तथा आइसलैंड के बीच मग्नतट चौड़े हैं। दक्षिणी अटलांटिक महासागर में बाहियाब्लैंक तथा अंटार्कटिका के बीच चौड़े मग्नतट पाए जाते हैं। अटलांटिक महासागर के दक्षिणी भाग में सँकरे मैदान मिलते हैं। इस महासागर के मग्नतटों पर कई सीमांत सागर तथा असंख्य द्वीप पाए जाते हैं।

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल (Continental Slope)

        यह महाद्वीपों का अंतिम किनारा होता है। जिन-जिन क्षेत्रों में सँकरे महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ मग्नढाल तीव्र होता है और जिन क्षेत्रों में मंद ढाल वाले महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ पर महाद्वीपीय मग्नढाल भी मंद होता है। अटलांटिक महासागर में 12.4 प्रतिशत भाग पर मग्नढाल का विस्तार है।

(3) मध्य अटलांटिक कटक (Mid Atlantic Ridge)

           मध्य अटलांटिक कटक उत्तर में आइसलैंड से दक्षिण में बोवेट द्वीप तक ‘S’ अक्षर के आकार में 14400 किलोमीटर की लंबाई में फैला है तथा कहीं भी सागरतल से 4000 मीटर से नीचे नहीं जाता। इस श्रेणी की उपस्थिति ही अटलांटिक के नितल की सबसे बड़ी विशेषता है। भूमध्यरेखा के उत्तर इस कटक/श्रेणी को डॉल्फिन उभार तथा दक्षिण में चैलेंजर उभार कहते हैं। आइसलैंड और स्कॉटलैंड के बीच इस कटक को विविल थामसन कटक कहते हैं। ग्रीनलैंड के दक्षिण में कटक चौड़ा हो जाता है जिसे टेलीग्राफ पठार कहते हैं। 50°N अक्षांश के पास इस कटक की शाखा न्यूफाउंडलैंड उभार के नाम से अलग न्यूफाउंडलैंड तट तक चली जाती है। 40°N अक्षांश के दक्षिण मध्यवर्ती कटक से एक शाखा अजोर उभार के नाम से अजोर तट की ओर जाती है। भूमध्यरेखा पर सियरा लिओन उभार उ०-पू० की ओर तथा पारा उभार उत्तर-पश्चिम की ओर मध्यवर्ती कटक की दो शाखाओं के रूप में चले जाते हैं। 40°S  अक्षांश के पास इस कटक की एक शाखा वालविस कटक अफ्रीका के मग्नतट की ओर तथा दूसरी शाखा रियोग्रांडे उभार के नाम से दक्षिण अमेरिका की ओर मुड़ जाती है।

(4) महासागरीय बेसिन या द्रोणी (Oceanic Basin)

          मध्यवर्ती अटलांटिक कटक द्वारा अटलांटिक महासागर दो विस्तृत बेसिनों में विभक्त है जिनमें अनेक छोटी-छोटी बेसिनें पायी जाती हैं। इनमें प्रमुख बेसिन निम्नलिखित है:-

(i) लेब्राडोर बेसिन- यह उत्तर में ग्रीनलैंड तथा दक्षिण में न्यूफाउंडलैंड के मध्य 4000 मीटर की गहराई तक फैली है।

(ii) उतरी अमेरिका बेसिन- यह उत्तरी अटलांटिक महासागर की सबसे बड़ी बेसिन है। जिसका विस्तार 12° से 40° उत्तरी अक्षांशों के मध्य उत्तरी अमेरिका के तट से 5000 मीटर की गहराई तक विस्तृत है।

(iii) ब्राजील बेसिन- यह दक्षिणी अटलांटिक महासागर में भूमध्य रेखा से 30° दक्षिणी अक्षांश तथा दक्षिणी अमेरिका के तट एवं पारा उभार के मध्य स्थित है।

(iv) स्पेनिश बेसिन- यह मध्य अटलांटिक कटक के पूर्व आईबेरियन के पास 30° से 50° उत्तरी अक्षांश के बीच 5000 मीटर की गहराई तक है।

(v) उत्तरी तथा दक्षिणी कनारी बेसिन- यह दो वृत्ताकार बेसिनों से मिलकर बनी है, जिसका विभाजन उच्च भाग द्वारा होता है।

(vi) केपवर्ड बेसिन- यह मध्य अटलांटिक कटक तथा अफ्रीका के मध्य 10° से 20° उत्तरी अक्षांशों के बीच 5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(vii) गायना बेसिन- यह गायना कटक तथा सियरा लियोन के मध्य उ०-प० से द०-पू० दिशा में 4000-5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(viii) अंगोला बेसिन- अफ्रीका के तट से प्रारम्भ होकर उ०-पू० से द०-प० दिशा में वॉलविस कटक तक 5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(ix) केप बेसिन – 25° से 45° द० अक्षांशों के मध्य अफ्रीका के पश्चिम में स्थित है।

(x) अगुल्हास बेसिन – उत्तमाशा अंतरिप के दक्षिण में 40° से 50° दक्षिणी अक्षांश के मध्य इसका विस्तार अधिक है।

(5) महासागरीय गर्त (Ocean Deeps)

        अटलांटिक महासागर में प्रमुख 19 गर्त पाए जाते हैं। इनमें प्यूर्टोरिको गर्त सबसे गहरा है जिसकी गहराई 4812 फैदम है। प्यूर्टोरिको गर्त उत्तरी अटलांटिक महासागर में कैरेबियन सागर के प्यूर्टोरिको द्वीप के पास स्थित है। अटलांटिक महासागर के तटों के सहारे अभिनव वलन की अनुपस्थिति के कारण गर्त कम पाए जाते हैं। 19 प्रमुख गर्तों में रोमांश गर्त, नरेस गर्त, बाल्डीबिया गर्त, बुचानन, मोसले, चुन, दक्षिणी सैनविच गर्त है।

निष्कर्ष 

       उपर्युक्त तथ्यों के विवरण से स्पष्ट होता है कि अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच में भी अनेक विविधता पूर्ण विशेषताएँ देखने को मिलती है।


Read More:

3. Submarine Canyons / अंत: समुद्री कंदरायें/ कैनियन

3. Submarine Canyons / अंत: समुद्री कंदरायें/ कैनियनSubmarine Canyons



Submarine Canyons ⇒

                       स्थल  की भाँति महाद्वीपीय मग्नतट एवं महाद्वीपीय ढाल पर भी सँकरी, गहरी एवं खड़ी दीवाल से युक्त घाटियाँ पाई जाती है। ऐसे ही घाटियों को सागरीय कंदरायें कहते हैं। महासागरीय जल में डूबे होने के कारण इसे अंतः सागरीय कंदरायें कहते हैं।

विशेषताएँ

◆ समुद्री कंदरायें महाद्वीपीय मग्नतट और मग्नढाल पर वहीं मिलती है जहाँ पर बड़ी-बड़ी नदियों के मुहाना पाई जाती है।

◆ अंत: सागरीय कंदराएँ अधिकतर महासागरीय तटीय भागों के सहारे लंबवत रूप से पाए जाते है।

◆ समुद्री कंदराओं के पार्श्व का ढाल बिल्कुल खड़ा होता है इसका का अनुप्रस्थ काट V-आकार की घाटी के समान होता है।

◆ समुद्री कंदरा में ज्यों-ज्यों स्थलीय भाग से गहन सागरीय क्षेत्र की ओर जाते हैं त्यों-त्यों उसकी गहराई एवं ढाल में वृद्धि होती जाती है। सामान्यत: इसकी गहराई 2000 – 3000 फीट तक होता है।

◆ अंत: सागरीय कंदरा के तली में रेत, सिल्का, सिल्ट एवं बजरी जैसे पदार्थों का निक्षेपण पाया जाता है।

◆ निर्माण प्रक्रम के आधार पर अंत: सागरीय कंदराएँ दो प्रकार के होती है –

(i) हिमानी के द्वारा निर्मित कंदरायें

(ii) अन्य प्रक्रम के द्वारा निर्मित कंदरायें

उत्पत्ति

           हिमानी के द्वारा निर्मित कंदराओं को फियोर्ड कहते हैं। फियोर्ड का निर्माण प्रायः महाद्वीपीय एवं पर्वतीय हिमानी के अचानक समुद्र में उतरने के कारण होता है। फियोर्ड को कुछ समुद्रीवेता समुद्री कंदरा के श्रेणी में नहीं रखते। क्योंकि उनका मानना है कि इसका अध्ययन हिमानी के द्वारा निर्मित स्थलाकृति के अंतर्गत किया जाना चाहिए।

            अन्य प्रक्रम से निर्मित कंदराओं की उत्पत्ति के सम्बंध में कई सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं। जैसे :-

(1) पटलविरूपणी या वलन सिद्धान्त (Diastrophic Theory) –

             इस सिद्धांत के अनुसार महाद्वीपीय मग्नतट एवं मग्नढाल पर भूसंचलन की क्रिया के कारण निर्मित वलन या भ्रंशन के कारण समुद्री कंदराओं का निर्माण हुआ है। कैलिफोर्निया और हडसन की खाड़ी के तट पर इसी क्रिया से निर्मित समुद्री कंदरायें मिलती है।

(2) भू-पृष्ठीय अपरदन का सिद्धांत  –

             इसे डाना (1863) और शेफर्ड (1941) ने इस मत को प्रतिपादित किया था। इनके अनुसार स्थल भाग के निमग्न (डूबने) हो जाने के कारण स्थल पर मिलने वाली नदियाँ भी निमग्न हो गई। अंततः उन पर सागरीय जल का फैलाव हो गया। कालांतर में वही नदियाँ अंत: समुद्री कंदरायें कहलाए।

(3) पंक तरंग सिद्धान्त (Turbidity Current Theory) –

             इस मत का प्रतिपादक डेविस, डेली जैसे भूगोलवेत्ता है। इनके अनुसार तट की ओर चलने वाले तीव्र पवनों के कारण तटीय भागों में बड़ी मात्रा में जलराशि एकत्रित हो जाती है जिसमें पंक (कीचड़) मिला होता है। यही पंक जब पुनः समुद्र की ओर लौटती है तो उनके अपरदन से अंतः सागरीय कंदराओं का निर्माण होता है। यही सिद्धांत सर्वाधिक मान्यता रखता है।

वितरण 

             बियर्ड एवं शेफर्ड महोदय ने विश्व के 102 कन्दराओं पर शोध किया और पाया कि कंदराएँ सर्वत्र पाई जाती है। अटलांटिक महासागर में यू.एस.ए. के पूर्वी तट पर चेसापिक कैनियन और कनाडा में हडसन कैनियन प्रमुख है। फ्रांस के दक्षिण पश्चिम तट पर बिस्फे की खाड़ी में केप ब्रिटेन कैनियन, पुर्तगाल के पश्चिमी तट पर नजारे कैनियन, अफ्रीका के पश्चिमी तट पर कांगो कैनियन विश्व प्रसिद्ध है।

             इसी तरह प्रशांत महासागर के तट पर भी कई कैनियन मिलते हैं। जैसे- आलास्का तथा कनाडा के तट पर कोलंबियन कैनियन पाई जाती है।

            हिंद महासागर में गिरने वाली लगभग सभी प्रमुख नदियों के मुहानों पर कैनियन का प्रमाण मिलता है।

निष्कर्ष

        निष्कर्षत: इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से कहा जा सकता है कि अंत: सागरीय कंदराएँ या कैनियन महाद्वीपीय मग्नतट और महाद्वीपीय मग्नढाल पर मिलने वाली एक विशिष्ट सागरीय स्थलाकृति है।


Read More:

2. Ocean Bottom Relief / महासागरीय नितल उच्चावच

2. Ocean Bottom Relief 

(महासागरीय नितल उच्चावच)


 महासागरीय नितल उच्चावच⇒

       प्रारंभ में ऐसी मान्यता थी कि महासागरीय सतह तश्तरी के समान होते हैं अर्थात इसके किनारे में ऊँचाई अधिक और बीच में सबसे गहरा क्षेत्र होगा। लेकिन चैलेंजर अभियान (1884,1888) के बीच खोजों से कई चौकाने वाले तथ्य सामने आए। जैसे पूरे धरातल का 70.8 प्रतिशत भूभाग पर समुद्र और शेष 29.2 प्रतिशत भाग पर स्थल का फैलाव है। समुद्र में सबसे गहरा भाग किनारे पर है। विश्व का सबसे लंबा पर्वत श्रृंखला अटलांटिक महासागर में अवस्थित है। वस्तुतः इस अभियान के बाद यह मान्यता विकसित हुई कि पृथ्वी के भूपटल का अध्ययन दो भागों में बांट कर किया जाना चाहिए:-

(1) समुद्री स्थलाकृति

(2) स्थलीय स्थलाकृति

      क्योंकि समुद्री स्थलाकृति में भी वे सभी जटिलताएँ पाई जाती है जो स्थलीय स्थलाकृति में पाई जाती है। जिस प्रकार स्थलीय स्थलाकृति के विकास में भू-संचलन, अपरदन, निक्षेपन जैसे अंतर्जात एवं बहिर्जात बल का प्रभाव पड़ता है। ठीक उसी प्रकार समुद्री भूपटल पर भी पड़ता है। चैलेंजर अभियान के बाद समुद्री वैज्ञानिकों ने सोनार नामक वैज्ञानिक यंत्र का प्रयोग करके समुद्री उच्चावच का निर्धारण करने का प्रयास किया। वर्तमान में यह कार्य कृतिम उपग्रह के माध्यम से किया जा रहा है।

        अधिकतर समुद्री वैज्ञानिकों ने समुद्री उच्चावच का अध्ययन करने हेतु उच्चतादर्शी वक्र (Hypsographic Curve Method)  को महत्वपूर्ण मानते हैं। इस दिशा में कोसीना (1921), Severdrup (1942) का कार्य सबसे महत्वपूर्ण है। Severdrup महोदय ने समुद्री भूपटल के क्षेत्रफल का प्रतिशत के रूप में X-अक्ष पर और ऊँचाई को Y-अक्ष पर लेते हुए उच्चतादर्शी वक्र को खींचा।

ocean-bottom-relief

        Severdrup ने अपने अध्ययन में बताया कि समुद्र की औसत ऊँचाई 3800 मीटर और स्थल की औसत ऊँचाई 840 मीटर है। समुद्री उच्चावच का अध्ययन करने हेतु समुद्री भूपटल को छ: प्रमुख समुद्री स्थलाकृति के रूप में विभाजित कर अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल (Continental Slope)

(3) महासागरीय कटक एवं महासागरीय उभार (Oceanic Ridge and Sea Arc)

(4) महासागरीय बेसिन या मैदान (Oceanic Basin)

(5) महासागरीय गर्त (Oceanic Deeps)

(6) अन्य स्थलाकृतियाँ जैसे समुद्री कंदरा, समुद्री पहाड़ी, अवशिष्ट पहाड़ी, प्रवाल भित्ति इत्यादि।

        उपरोक्त स्थलाकृतियों को एक काल्पनिक Hypsographic Curve के द्वारा दिखाया गया है-

ocean-bottom-relief

(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelves)

         यह महाद्वीप का ही भाग है जो सागर में डूबा होता है। यह ग्रेनाइट जैसे चट्टान से निर्मित होता है। यहाँ सागर छिछला होता है। इसका निर्माण धँसान या उत्थान से या अपरदन क्रिया से संभव होता है। डेली जैसे समुद्रीवेता के अनुसार “प्लीस्टोसीन कल्प में हिमानीयुग के अंत होने के बाद समुद्र के सतह में 150m का उत्थान हुआ।” इसका तात्पर्य है कि प्लीस्टोसीन काल तक महाद्वीपीय मग्नतट स्थलखंड के ही प्रत्यक्ष भूभाग थे। इसका ढाल समुद्र की ओर होता है। इसका औसत ढाल 1°/ Km या 17 फीट/मील बताया जाता है। संपूर्ण समुद्री क्षेत्रफल का 8.6 प्रतिशत भाग महाद्वीपीय मग्नतट के अंतर्गत आता है।

   महाद्वीपीय मग्नतट का वितरण अत्यंत ही असमान है। इसका सर्वाधिक विस्तार उत्तरी अटलांटिक महासागर में हुआ है। यहाँ इसका विस्तार हडसन की खाड़ी से लेकर नार्वेजियन सागर तक लगभग लगातार हुआ है। इसका प्रमुख कारण इस प्रदेश में समुद्री प्लेटफार्म का अवस्थित होना है। ये प्लेटफॉर्म प्लीस्टोसीन युग में हिमानी के पिघलने के बाद बढ़े हुए समुद्री जलस्तर के अपरदन से निर्मित हुआ है।

    अटलांटिक महासागर के दक्षिणी भाग में सर्वाधिक सँकरे मग्नतट मिलते हैं। विश्व का सबसे सँकरा महाद्वीपीय मग्नतट अफ्रीका महाद्वीप में नामीबिया के अंगोला तट के मध्य मिलता है (चौ० 10 से 15 मीटर)। पुनः ब्राजील के तट, ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट, अफ्रीका के पूर्वी तट सँकरे महाद्वीपीय मगनतट का निर्माण करते हैं। इसका प्रमुख कारण भू-भ्रंश क्रिया है। ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी एवं दक्षिणी भाग और उत्तरी भाग में मग्नतट चौड़ा है। इसका प्रमुख कारण निक्षेपन का कार्य बताया जाता है। दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट या एंडीज तट सँकरे है। इसी तरह उत्तरी अमेरिका का प्रशांत तट सँकरा है। इसका प्रमुख कारण दो प्लेटो का प्रत्यावर्तन (टकराना) है। अधिकतर छिछले सागर में महाद्वीपीय मग्नतट काफी चौड़ा हैं। इसका प्रमुख कारण अपरदन को बताया जाता है। यूरोप का उत्तरी सागर एक छिछला सागर है। यही कारण है कि उस सागर में विश्व के बड़े-बड़े मछलियों के बैंक अवस्थित है। जैसे- डागर बैंक

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल (Continental Slope)

      यह महाद्वीपीय मग्नतट का अग्र भाग है। यह तीव्र ढाल का क्षेत्र है। यह ग्रेनाइट से निर्मित होता है। इसे महाद्वीपों का अंतिम किनारा माना जाता है। इसमें बेसाल्ट से निर्मित चट्टानें मिलने लगती है। औसतन 200 से 300 मीटर की गहराई तक महाद्वीपीय मग्नढाल मिलते हैं लेकिन चिली और पेरू का तट इसका अपवाद है। यहाँ पर महाद्वीपीय मग्नढाल 3700 मीटर की गहराई तक मिलते हैं। महासागरीय क्षेत्रफल का 8.5 प्रतिशत भूभाग इसके अंतर्गत आता है। इसका औसत ढाल 2° से 4.2°/Km होता है। ढालों का निर्माण धँसान क्रिया या प्लेटों के प्रत्यावर्तन से हुआ है। अफ्रीका के किनारे तथा उत्तरी अमेरिका एवं दक्षिण अमरिका के पश्चिमी तट पर प्रत्यावर्तन क्रिया के कारण ही ढाल तीव्र पाए जाते हैं। 

(3) महासागरीय कटक एवं महासागरीय उभार (Oceanic Ridge and Sea Arc)

          यह एक ऐसी स्थलाकृति है जिसकी ऊँचाई समुद्री भूपटल से समुद्र तल तक या उससे नीचे भी हो सकता है। यह एक पहाड़ीनुमा स्थलाकृति है जिसमें चोटियाँ पाई जाती है और पार्श्व का ढाल तीव्र होता है। संरचना के दृष्टिकोण से रेखीय होते हैं। इसमें बेसाल्टिक चट्टानों की प्रधानता होती है। महासागरीय कटक का निर्माण प्लेटों के अपसरण सीमा के सहारे हुआ है। अपसरण सीमा के सहारे प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती है और दरार का निर्माण करती है। इन दरारों से ही मैग्मा पदार्थ मैग्मा चैंबर से बाहर आकर शीतल होती है और कटकों का निर्माण करती है।

       विश्व का सबसे लंबा समुद्री कटक अटलांटिक महासागर में स्थित है जिसकी लंबाई 14400 किलोमीटर है जिसका आकार अंग्रेजी अक्षर ‘S’ के समान है। इसका विस्तार उत्तर में आइसलैंड से लेकर दक्षिण में अंटार्कटिका तक हुआ है। यह पृथ्वी पर का सबसे लंबा पर्वत श्रृंखला के रूप में जाना जाता है। इसकी औसत ऊँचाई 2000 से 4000 मीटर तक है। कई स्थानों पर समुद्र से बाहर आकर छोटे-छोटे द्वीपों का निर्माण किया है। इसे उत्तरी अटलांटिक महासागर में विविल थॉमसन कटक और डॉल्फिन कटक कहते हैं जबकि दक्षिणी अटलांटिक में विषुवत रेखा के पास चैलेंजर कटक कहते हैं।

       हिंद महासागर में भी कई समुद्री कटक मिलते हैं जिसकी लंबाई 9000 किलोमीटर है जिसका विस्तार लक्षद्वीप से लेकर अंटार्कटिका तक है। इसका औसत ऊंचाई 2000 मीटर है। इसी कटक पर मालद्वीप, सेल्सेस, मॉरीशस जैसे द्वीप स्थित है। इसके कई स्थानीय नाम है। जैसे- लक्का द्वीप चैगोस, सेंटपॉल चैगोस, एमस्टरडम सेंटपॉल कटक, करगुएलेन गॉसबर्ग कटक।

      प्रशांत महासागर में भी कई कटक मिलते हैं। जैसे- लॉर्डहोवे कटक, टुआमाई कटक, एलबेडरॉस कटक, कोकस कटक, हवाईयन कटक इत्यादि के नाम से प्रसिद्ध है।

(4) महासागरीय बेसिन या मैदान (Oceanic Basin)

       समुद्र के अंदर मिलने वाले सपाट मैदान को महासागरीय बेसिक या गहन सागरीय मैदान कहते हैं। सेवरडरूप ने बताया कि महासागरीय कटक के दोनों ओर महासागरीय मैदान का निर्माण हुआ है। यह मैदान 3000 से 6000 मीटर की गहराई में मिलते हैं। हैरिहेस महोदय ने इसकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण महासागरीय नितल प्रसार को बताया है।

       विश्व के सभी प्रमुख महासागर में महासागरीय मैदानों का प्रमाण मिलता है। जैसे अटलांटिक महासागर में अटलांटिक कटक के पश्चिमी भाग में चार गहन सागरीय मैदान मिलते हैं। जैसे- लैब्राडोर का मैदान, उत्तरी अमेरिकी बेसिन, ब्राजीलियन बेसिन, अर्जेंटीना बेसिन तथा अटलांटिक कटक के पूर्वी भाग में कुल सात मैदान मिलते हैं। जैसे – स्पेनिश मैदान, केपवर्डे मैदान, केनारी मैदान, गिनी मैदान, अंगोला मैदान, केप बेसिन, अगुल्हास बेसिन मिलते हैं।

      इसी तरह हिंद महासागर में ओमान बेसिन, अरब बेसिन, सोमाली बेसिन, मॉरीशस बेसिन, अंडमान बेसिन, अंटार्कटिक बेसिन, जैसे गहन सागरीय मैदान मिलते हैं।

     इसी तरह प्रशांत महासागर में कैलिफोर्निया के तट पर उत्तरी-पूर्वी बेसिन, जापान के तट पर उत्तरी-पश्चिमी बेसिन, पेरू एवं चिली के तट पर दक्षिण-पूर्वी प्रशांत बेसिन और आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत बेसिन मिलते हैं।

(5) महासागरीय गर्त (Oceanic Deeps)

        महासागरीय या समुद्री गर्त समुद्र का सबसे गहरा भाग होता है। इसकी औसत गहराई 6000 मीटर से अधिक होता है। यह एक रेखीय एवं सँकरी संरचना वाली आकृति है। इसके किनारे का ढाल काफी तीव्र होता है। इसकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण प्लेटों का प्रत्यावर्तन है। कुल समुद्री क्षेत्रफल का 7% भाग इसके अंतर्गत आता है।

    विश्व में प्रमुख 57 समुद्री गर्त है। विश्व का सबसे गहरा समुद्री गर्त मेरियाना गर्त (11.02 Km) है जो फिलीपींस द्वीप के पूर्वी भाग में अवस्थित है। विश्व का दूसरा सबसे गहरा गर्त टोंगा गर्त (5022 फैडम) जो दक्षिण प्रशांत महासागर में अवस्थित है। प्रशांत महासागर में प्रमुख 57 गर्तों में 32 गर्त और अटलांटिक महासागर में 19 गर्त तथा हिंद महासागर में 6 गर्त पाए जाते हैं।

   अटलांटिक महासागर का सबसे गहरा गर्त प्यूर्टोरिको गर्त है जबकि हिंद महासागर का सबसे गहरा गर्त सुंडा गर्त है। प्यूर्टोरिको गर्त उत्तरी अटलांटिक महासागर में कैरीबियन सागर के प्यूर्टोरिको द्वीप के पास स्थित है जिसकी औसत गहराई 4622 फैदम है। सुंडा गर्त इंडोनेशिया में सुमात्रा एवं जावा के मध्यवर्ती भाग में अवस्थित है जिसका औसत गहराई 3826 फैदम है।

(6) अन्य स्थलाकृतियाँ जैसे समुद्री कंदरा, समुद्री पहाड़ी, अवशिष्ट पहाड़ी, प्रवाल भित्ति इत्यादि

     समुद्री भूपटल पर कई स्थालाकृतियाँ भी मिलते हैं। जैसे- चूना पत्थर से युक्त जीव-जंतुओं के निक्षेप से प्रवाल भित्तियों का प्रमाण मिलता है। ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी-पूर्वी भाग में विश्व का सबसे लंबा प्रवाल भित्ति ग्रेट बैरियर रीफ मिलता है।   

        अन्य समुद्री स्थलाकृतियों में समुद्री कंदरा का विशेष स्थान प्राप्त है। यह ‘V’ आकृति का होता है। इसका निर्माण समुद्री तरंगों के अपरदन से महाद्वीपीय मग्नढाल पर होता है।

    समुद्री पहाड़ी (Sea Mount) तथा ग्योट दो विशिष्ट प्रकार के समुद्री स्थलाकृति है। सी माउंट का आकार गुंबदाकार पहाड़ी के समान होता है। जब सी माउंट का ऊपरी भाग टूटकर या अपरदित होकर सपाट हो जाता तो उसे ग्योट कहते हैं।

निष्कर्ष

   इस तरह ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि महासागरीय भूपटल भी महाद्वीपीय भूपटल के समान काफी जटिल संरचनाओं वाली भूपटल है।


Read More:

1. Change in Sea Level / समुद्र तल में परिवर्तन

1. Change in Sea Level 

(समुद्र तल में परिवर्तन)


Change in Sea Level / समुद्र तल में परिवर्तन⇒Change in Sea Level

        समुद्री जल का तल (S.L.) समुद्री वातावरण का एक गत्यात्मक पहलू है। यद्यपि पृथ्वी तंत्र के कुल जल की मात्रा निश्चित है। लेकिन समय-समय पर जल के अवस्था में परिवर्तन के कारण समुद्र तल में भी परिवर्तन होता है। समुद्र तल का परिवर्तन कई कारकों का परिणाम है। जैसे-

◆ हिमयुग के आगमन से समुद्र तल में गिरावट आती है और जब हिमयुग की समाप्ति होती है तथा वातावरण का तापमान अधिक हो जाता है तो स्थलीय हिम पिघलकर समुद्र में आ जाते हैं और जल स्तर ऊँचा हो जाता है।

भूगर्भिक प्रक्रियाएँ भी समुद्र के जलस्तर में परिवर्तन लाते हैं। जैसे अगर भूगर्भिक हलचल के कारण समुद्री नितल का धँसान होता है तो जल स्तर गिरती है और जब उत्थान होता है तो जलस्तर बढ़ती है। जैसे- कई स्थलीय भूभागों पर समुद्री जीवाश्म के प्रमाण मिलते हैं जो यह बताता है कि कभी वहाँ पर समुद्री जल रहा होगा और जब वहाँ समुद्र रहा होगा तो निश्चित रूप से एक समुद्री जलस्तर भी रहा होगा। जब उस भू-भाग का उत्थान हो जाता है तो समुद्र का जलस्तर ऊपर की ओर खिसक जाता है लेकिन यह एक सापेक्षिक घटना है।

नोट : अगर समुद्र नितल का धँसान होता है तो जलस्तर नीचे चली जाती है और जब समुद्र नितल का उत्थान होता है तो समुद्र जलस्तर बढ़ जाता है।

विभिन्न जलवायु विज्ञान एवं समुद्री विज्ञान के वैज्ञानिकों ने समुद्र तल में होने वाले परिवर्तन को गत्यात्मक मानते हुए यह माना है कि समुद्र तल में परिवर्तन जल के आयतन में बढ़ोतरी या कमी से होती है।

         उपरोक्त तीनों कारकों में से प्रथम कारक है समुद्र तल परिवर्तन के लिए सबसे उत्तरदायी कारक है।

         विभिन्न अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि समुद्र तल में 110 से 140 मीटर तक परिवर्तन हुआ है। प्रायः सभी हिम युग में समुद्र का तल 100 से 150 मीटर के बीच नीचे चले गए थे। प्लीस्टोसीन के अंतिम हिमानी युग के अंत में समुद्र का तल वर्तमान तल से 110 मीटर नीचे पहुँच गया था। फेयरब्रिज के अनुसारमुद्रतल में सतत सूक्ष्म परिवर्तन होते रहते हैं।” लेकिन 1800 ई० के बाद में इसमें काफी स्थिरता आई है। हालाकि औद्योगिक क्रांति के बढ़ते प्रभाव के कारण 1970 के दशक से वातावरण में तापमान के बढ़ोतरी से समुद्र तल में भी बढ़ोतरी होने लगी है। सामान्य नियम के अनुसार 1℃ वायुमंडलीय तापमान के बढ़ने से 0.55 mm समुद्री तल में वृद्धि होती है। “विश्व जलवायु विज्ञान संस्था” के अनुसार 1985 से 1997 के बीच औसत तापमान में बढ़ोतरी 0.37℃ हुआ है।

परिणाम
        अनेक पारिस्थैतिक वैज्ञानिकों के अनुसार 2030 ई० तक समुद्रतल में 3 मीटर तक वृद्धि हो सकती है। ऐसी स्थिति में विश्व के कई द्वीपीय देश पूर्णत: जलमग्न हो सकते हैं। मालदीप तथा दक्षिणी प्रशांत महासागर के कई द्वीप समुद्र में डूब जाएँगे। कई तटीय महासागर जैसे मुंबई, न्यूयार्क, टोकियों, मैक्सिको सिटी, रियो डे जेनेरियो पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। कई प्रवाल भित्ति जलमग्न हो जाएंगे। अधिक समुद्री तल के परिवर्तन से जलवायु पर भी विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है। नदियों के मुहाने पर समुद्री ज्वार के कारण बाढ़ का प्रभाव बढ़ जाएगा। कई तटीय मैंग्रोव या ज्वारीय वनस्पति विलुप्त हो जाएंगे। केवल बांग्लादेश में ही 1.5 करोड़ जनसंख्या को विस्थापित होना पड़ेगा। अर्थात समुद्रतल में हो रहे परिवर्तन का विनाशकारी प्रभाव अवश्य संभावी है। 

उपाय

         भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने ग्लोबल वार्मिंग और समुद्र तल में हो रहे बढ़ोतरी का अध्ययन करवाया है। इन दोनों के बीच पाए जाने वाले सह संबंध को देखते हुए एक आपातकालीन योजना बनाने का निर्णय लिया है। इस योजना के तहत लगभग एक करोड़ आबादी को तटीय क्षेत्र से विस्थापित कर सुरक्षित स्थान पर बसाने का कार्य किया जा रहा है। इसी तरह विश्व के कई देश ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, समुद्र तल में हो रहे परिवर्तन पर नजर टिकाए हुए हैं। समुद्र तल में परिवर्तन न  हो इसके लिए कई देशों ने शिखर बैठक कर पृथ्वी सम्मेलन के दस्तावेज पर, क्योटो प्रोटोकॉल पर, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर अपना सहमति व्यक्त किया है ताकि एक ओर वायुमंडल को गर्म होने से बचाया जाय वहीं दूसरी ओर समुद्री तल में हो रहे परिवर्तन को भी रोक जाय।


Read More:

error: